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आखिर जीत हमारी है
पुजारी चौंक कर उठ बैठा । उसका हृदय जोर-जोर से धड़क रहा था । किसी अज्ञात भय की आशंका से वह काँप उठा ।
"हे ईश्वर ।"
संयम रखते हुए भी भय से एक चीख उसके मुंह से निकल ही गई जिसे सुनकर पास की चारपाइयों पर पड़े तीनों यात्री चौंककर उठ बैठे ।
"क्या बात है, पुजारी महाराज?"
पुजारी बोला, "सम्भवतः मैं कोई भयानक स्वप्न देखकर उठ बैठा हूँ । क्या आप लोगों को कोई कोलाहल सुनाई देता है ?"
"कोलाहल ? कैसा ?"
"जैसे कहीं बहुत दूर से लोग आर्तनाद कर रहे हों ।"
उस अँधेरी कोठरी में एकदम सन्नाटा छा गया और सब लोग कहीं दूर से आने वाले शब्द को सुनने का प्रयत्न करने लगे जो न जाने बाहर आंगन में, मैदान में, अथवा वन में कहीं था ।
"मुझे तो किसी प्रकार का शब्द सुनाई नहीं देता," उनमें से एक ने कहा, "सिवाय आंगन में खड़े पीपल के वृक्ष की पत्तियों की सनसनाहट के ।"
"ओह ! यह कोलाहल, तुम्हें क्या सुनाई नहीं दे रहा ?"
"हां ! हां ! अब तो कुछ सुनाई पड़ रहा है ।"
"ओह मेरे राम ! इस आर्तनाद का क्या अर्थ ?"
पुजारी ने उठकर अग्निकुंड में दबी आग को प्रज्वलित करने के लिए सूखे हुए फूँस की मुट्ठी डाली और कोठरी में पड़े दीपक को जलाया । इतने में तीनों यात्रियों ने खूंटियों पर लटकाये अपने शस्त्र उतार लिए । पुजारी ने एक को कोठरी का द्वार खोलते देखकर कहा, "कहां जा रहे हो ? न जाने बाहर कौन सी विपत्ति सहसा टपक पड़े ।"
वही यात्री बोला "सोते हुए मर जाने की अपेक्षा लड़कर जान देना हजार गुणा अच्छा है । हम वास्तविकता को जानना चाहते हैं । जिस काम का बीड़ा हमने उठाया है उसमें तो चौबीस घण्टे विपत्ति की आशंका लगी रहती है, जाने कब सिर धड़ की बाजी लगानी पड़े । यद्यपि हमें प्राणों के प्रति कोई ममत्व नहीं परन्तु फिर भी हम जीवित रहना चाहते हैं ।"
शिव मन्दिर का अंधकार में डूबा आंगन काले पानी की ऐसी झील समान दिखाई देता था, जिसमें कोई तरंग न उठ रही हो । पश्चिम दिशा में खड़े पीपल के वृक्ष के उस पार क्षितिज पर हल्की-हल्की लाली दिखाई दे रही थी ठीक ऐसे जैसे टहनियों की ओट में मंगल ग्रह चमक रहा हो ।
पुजारी और वे यात्री एक क्षण तक द्वार के बाहर चुपचाप खड़े रहे । हवा का एक तेज झोंका पीपल की पत्तियों को झंझोड़ता हुआ निकल गया । इतने में दूर गहन अन्धकार की भित्ति को फाड़ता हुआ चीत्कार और रुदन का शब्द वायुमण्डल को कँपाता हुआ सुनाई दिया जिस से पुजारी की नींद टूटी थी ।
"हे मेरे भगवान ! पुजारी भय से सिहर कर बोला, इस शोर में कितनी व्यथा और विवशता का आभास होता है । इसे सुनकर नाड़ियों का रक्त जमता सा अनुभव हो रहा है मानो घोर नर्क में पड़ी आत्माएँ कष्ट से रुदन कर रहीं हों ?"
"सामने छत पर चढ़ने की सीढ़ी किधर है ?"
"इस ओर," गहन अन्धकार में पुजारी ने अपना हाथ एक ओर हिला दिया और फिर स्वयं तीनों यात्रियों का मार्गदर्शन कराता हुआ कोठरी की उत्तरी पंक्ति की छत पर चढ़ने वाली सीढ़ियों की ओर चल दिया । वे सब बड़ी सावधानी से तेज कदम बढ़ाते हुए आंगन को पार कर सीढ़ियों से छत पर चढ़ गए ।
सामने दो मील दूर आम और कीकर के वृक्षों के झुंड और रेत के टीलों के बीच एक गांव जल रहा था । ऊँची-ऊँची अग्निशिखायें और धुएं के बादल जलती हुई झोंपड़ियों से उठकर चारों ओर फैल रहे थे । वह शोर उन लोगों का था जो उस आग से घिरे हुए थे, अथवा उसे बुझाने का प्रयत्न कर रहे थे ।
पुजारी बड़बड़ाया, "अरे ! यह तो हरिपुर जल रहा है इस शान्त वातावरण में जहां कोई आंधी या झक्कड़ दिखाई नहीं देता । यह आग कैसे लगी ?"
यात्रियों में से एक बोला, "आजकल एक ही तो उल्का है जो हँसती खेलती बस्तियों, झूमती हुई खेतियों को जलाकर राख कर देती है । वह है निरीह जनता पर बर्बर हूणों का अमानुषिक अत्याचार ।"
आग की लपटों की चमक और धुएं के बादलों में घिरी कितनी ही परछाइयां नाचती दिखाई देतीं । सारे वायुमंडल में रुदन और चीत्कार के शब्द गूँज रहे थे ।
पुजारी बोला, "समझ में नहीं आता हरिपुर वालों ने इन हूणों का ऐसा क्या अपराध किया है जिसके दण्डस्वरूप इन्होंने इनके घर-बार जला दिये हैं । अपराध ! इसमें इन ग्रामीणों का क्या अपराध ? हूण सैनिकों की टुकड़ियां इधर-उधर लूट मचाती फिरती हैं और भोली जनता तथा अबलाओं का अपमान करती फिरती हैं । वे प्रत्येक ग्राम में अपने भोजन के लिए बछड़े और आनंद के लिए स्त्रियां मांगते हैं । यदि गांव वालों ने विनाश और मृत्यु के डर से उनकी कामना पूरी कर दी तब तो ठीक, अन्यथा वे जबरदस्ती उनकी स्त्रियों और सम्पत्ति का अपहरण करते हैं, उनके घरों को आग लगाकर भस्म कर देते हैं और जो जान बचाकर भागने का प्रयत्न करता है उसे अपने पैने तीरों की मार से यमलोक में पहुंचा देते हैं ।"
पुजारी ने एक ठंडी सांस ली ।
यात्रियों में से एक अपने साथी से बोला, "परन्तु धूमकेतु, हमें इस अत्याचार के विरुद्ध कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए ।"
"हम निःसन्देह कुछ न कुछ करेंगे । बहुत कुछ करेंगे । परन्तु इसके लिए हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी ।"
"परन्तु मेरा तात्पर्य इस समय कुछ न कुछ करने से है ।"
"पागल हो गए हो क्या महाबाहु !"
"जो तुम्हारे मन में आए कह लो, परन्तु मैं यह कभी सहन नहीं कर सकता कि विदेशी लुटेरों की एक टुकड़ी हमारे गांवों को रोंदती फिरे और हम खड़े देखते रहें ।"
"ठीक है मेरे भाई, देश और जाति के लिए इतनी उग्र तड़प स्तुत्य है; परन्तु किसी बड़ी शक्ति से टक्कर लेने के लिए हमें अपने आपको शक्तिशाली बनाना होगा, हमारे हृदयों में भी वही चिंगारी सुलग रही है परन्तु हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी । अवसर आने से पूर्व पग उठाना बुद्धिमत्ता नहीं ।"
महाबाहु ने खून का घूंट पीकर आवेश में कहा, "कृपा करके मुझे नीचे ले चलो अन्यथा मैं क्रोध के वशीभूत होकर छत से कूद पड़ूंगा और इन बर्बर हूणों पर टूट पड़ूंगा, चाहे उन्हीं के हाथों मारा जाकर इसी आग में ही क्यों न जल जाऊँ ।"
इससे क्या लाभ होगा ? जहां सौ ग्रामवासी मारे गए हैं वहां तुम एक ही गिनती बढ़ाओगे । तनिक समय और धैर्य से काम लो महाबाहु ! बहुत शीघ्र ही इन अत्याचारियों से गिन-गिनकर बदले लेंगे । चलो नीचे चलें ।"
परन्तु महाबाहु की उत्तेजना समाप्त नहीं हो रही थी । जब वह अपने साथियों के साथ सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था उस समय उसकी मुट्ठियां कसी हुईं थीं, उसकी आकृति में कठोरता दिखाई देती थी और आवेश से अपने दांत भींच रहा था ।
पुजारी भारी मन से चल रहा था । उसके पैरों की आवाज सुनकर वृक्षों की टहनियों पर बसेरा करने वाले पक्षी ने पंख फड़फड़ाए । अज्ञात भय की आशंका से उसके रोंगटे खड़े हो गए । तभी किसी ने द्वार खटखटकाया । पुजारी की टांगें कांपने लगीं । वह चलते-चलते रुक गया । धूमकेतु ने महाबाहु से कहा, "लीजिये, आप हूणों पर आक्रमण करने जाना चाहते थे न ? वह स्वयं ही आ पहुंचे हैं ।"
पुजारी बड़बड़ाया, "अथवा हमारा काल हूणों के रूप में आ पहुंचा है ।"
पुजारी चौंक कर उठ बैठा । उसका हृदय जोर-जोर से धड़क रहा था । किसी अज्ञात भय की आशंका से वह काँप उठा ।
"हे ईश्वर ।"
संयम रखते हुए भी भय से एक चीख उसके मुंह से निकल ही गई जिसे सुनकर पास की चारपाइयों पर पड़े तीनों यात्री चौंककर उठ बैठे ।
"क्या बात है, पुजारी महाराज?"
पुजारी बोला, "सम्भवतः मैं कोई भयानक स्वप्न देखकर उठ बैठा हूँ । क्या आप लोगों को कोई कोलाहल सुनाई देता है ?"
"कोलाहल ? कैसा ?"
"जैसे कहीं बहुत दूर से लोग आर्तनाद कर रहे हों ।"
उस अँधेरी कोठरी में एकदम सन्नाटा छा गया और सब लोग कहीं दूर से आने वाले शब्द को सुनने का प्रयत्न करने लगे जो न जाने बाहर आंगन में, मैदान में, अथवा वन में कहीं था ।
"मुझे तो किसी प्रकार का शब्द सुनाई नहीं देता," उनमें से एक ने कहा, "सिवाय आंगन में खड़े पीपल के वृक्ष की पत्तियों की सनसनाहट के ।"
"ओह ! यह कोलाहल, तुम्हें क्या सुनाई नहीं दे रहा ?"
"हां ! हां ! अब तो कुछ सुनाई पड़ रहा है ।"
"ओह मेरे राम ! इस आर्तनाद का क्या अर्थ ?"
पुजारी ने उठकर अग्निकुंड में दबी आग को प्रज्वलित करने के लिए सूखे हुए फूँस की मुट्ठी डाली और कोठरी में पड़े दीपक को जलाया । इतने में तीनों यात्रियों ने खूंटियों पर लटकाये अपने शस्त्र उतार लिए । पुजारी ने एक को कोठरी का द्वार खोलते देखकर कहा, "कहां जा रहे हो ? न जाने बाहर कौन सी विपत्ति सहसा टपक पड़े ।"
वही यात्री बोला "सोते हुए मर जाने की अपेक्षा लड़कर जान देना हजार गुणा अच्छा है । हम वास्तविकता को जानना चाहते हैं । जिस काम का बीड़ा हमने उठाया है उसमें तो चौबीस घण्टे विपत्ति की आशंका लगी रहती है, जाने कब सिर धड़ की बाजी लगानी पड़े । यद्यपि हमें प्राणों के प्रति कोई ममत्व नहीं परन्तु फिर भी हम जीवित रहना चाहते हैं ।"
शिव मन्दिर का अंधकार में डूबा आंगन काले पानी की ऐसी झील समान दिखाई देता था, जिसमें कोई तरंग न उठ रही हो । पश्चिम दिशा में खड़े पीपल के वृक्ष के उस पार क्षितिज पर हल्की-हल्की लाली दिखाई दे रही थी ठीक ऐसे जैसे टहनियों की ओट में मंगल ग्रह चमक रहा हो ।
पुजारी और वे यात्री एक क्षण तक द्वार के बाहर चुपचाप खड़े रहे । हवा का एक तेज झोंका पीपल की पत्तियों को झंझोड़ता हुआ निकल गया । इतने में दूर गहन अन्धकार की भित्ति को फाड़ता हुआ चीत्कार और रुदन का शब्द वायुमण्डल को कँपाता हुआ सुनाई दिया जिस से पुजारी की नींद टूटी थी ।
"हे मेरे भगवान ! पुजारी भय से सिहर कर बोला, इस शोर में कितनी व्यथा और विवशता का आभास होता है । इसे सुनकर नाड़ियों का रक्त जमता सा अनुभव हो रहा है मानो घोर नर्क में पड़ी आत्माएँ कष्ट से रुदन कर रहीं हों ?"
"सामने छत पर चढ़ने की सीढ़ी किधर है ?"
"इस ओर," गहन अन्धकार में पुजारी ने अपना हाथ एक ओर हिला दिया और फिर स्वयं तीनों यात्रियों का मार्गदर्शन कराता हुआ कोठरी की उत्तरी पंक्ति की छत पर चढ़ने वाली सीढ़ियों की ओर चल दिया । वे सब बड़ी सावधानी से तेज कदम बढ़ाते हुए आंगन को पार कर सीढ़ियों से छत पर चढ़ गए ।
सामने दो मील दूर आम और कीकर के वृक्षों के झुंड और रेत के टीलों के बीच एक गांव जल रहा था । ऊँची-ऊँची अग्निशिखायें और धुएं के बादल जलती हुई झोंपड़ियों से उठकर चारों ओर फैल रहे थे । वह शोर उन लोगों का था जो उस आग से घिरे हुए थे, अथवा उसे बुझाने का प्रयत्न कर रहे थे ।
पुजारी बड़बड़ाया, "अरे ! यह तो हरिपुर जल रहा है इस शान्त वातावरण में जहां कोई आंधी या झक्कड़ दिखाई नहीं देता । यह आग कैसे लगी ?"
यात्रियों में से एक बोला, "आजकल एक ही तो उल्का है जो हँसती खेलती बस्तियों, झूमती हुई खेतियों को जलाकर राख कर देती है । वह है निरीह जनता पर बर्बर हूणों का अमानुषिक अत्याचार ।"
आग की लपटों की चमक और धुएं के बादलों में घिरी कितनी ही परछाइयां नाचती दिखाई देतीं । सारे वायुमंडल में रुदन और चीत्कार के शब्द गूँज रहे थे ।
पुजारी बोला, "समझ में नहीं आता हरिपुर वालों ने इन हूणों का ऐसा क्या अपराध किया है जिसके दण्डस्वरूप इन्होंने इनके घर-बार जला दिये हैं । अपराध ! इसमें इन ग्रामीणों का क्या अपराध ? हूण सैनिकों की टुकड़ियां इधर-उधर लूट मचाती फिरती हैं और भोली जनता तथा अबलाओं का अपमान करती फिरती हैं । वे प्रत्येक ग्राम में अपने भोजन के लिए बछड़े और आनंद के लिए स्त्रियां मांगते हैं । यदि गांव वालों ने विनाश और मृत्यु के डर से उनकी कामना पूरी कर दी तब तो ठीक, अन्यथा वे जबरदस्ती उनकी स्त्रियों और सम्पत्ति का अपहरण करते हैं, उनके घरों को आग लगाकर भस्म कर देते हैं और जो जान बचाकर भागने का प्रयत्न करता है उसे अपने पैने तीरों की मार से यमलोक में पहुंचा देते हैं ।"
पुजारी ने एक ठंडी सांस ली ।
यात्रियों में से एक अपने साथी से बोला, "परन्तु धूमकेतु, हमें इस अत्याचार के विरुद्ध कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए ।"
"हम निःसन्देह कुछ न कुछ करेंगे । बहुत कुछ करेंगे । परन्तु इसके लिए हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी ।"
"परन्तु मेरा तात्पर्य इस समय कुछ न कुछ करने से है ।"
"पागल हो गए हो क्या महाबाहु !"
"जो तुम्हारे मन में आए कह लो, परन्तु मैं यह कभी सहन नहीं कर सकता कि विदेशी लुटेरों की एक टुकड़ी हमारे गांवों को रोंदती फिरे और हम खड़े देखते रहें ।"
"ठीक है मेरे भाई, देश और जाति के लिए इतनी उग्र तड़प स्तुत्य है; परन्तु किसी बड़ी शक्ति से टक्कर लेने के लिए हमें अपने आपको शक्तिशाली बनाना होगा, हमारे हृदयों में भी वही चिंगारी सुलग रही है परन्तु हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी । अवसर आने से पूर्व पग उठाना बुद्धिमत्ता नहीं ।"
महाबाहु ने खून का घूंट पीकर आवेश में कहा, "कृपा करके मुझे नीचे ले चलो अन्यथा मैं क्रोध के वशीभूत होकर छत से कूद पड़ूंगा और इन बर्बर हूणों पर टूट पड़ूंगा, चाहे उन्हीं के हाथों मारा जाकर इसी आग में ही क्यों न जल जाऊँ ।"
इससे क्या लाभ होगा ? जहां सौ ग्रामवासी मारे गए हैं वहां तुम एक ही गिनती बढ़ाओगे । तनिक समय और धैर्य से काम लो महाबाहु ! बहुत शीघ्र ही इन अत्याचारियों से गिन-गिनकर बदले लेंगे । चलो नीचे चलें ।"
परन्तु महाबाहु की उत्तेजना समाप्त नहीं हो रही थी । जब वह अपने साथियों के साथ सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था उस समय उसकी मुट्ठियां कसी हुईं थीं, उसकी आकृति में कठोरता दिखाई देती थी और आवेश से अपने दांत भींच रहा था ।
पुजारी भारी मन से चल रहा था । उसके पैरों की आवाज सुनकर वृक्षों की टहनियों पर बसेरा करने वाले पक्षी ने पंख फड़फड़ाए । अज्ञात भय की आशंका से उसके रोंगटे खड़े हो गए । तभी किसी ने द्वार खटखटकाया । पुजारी की टांगें कांपने लगीं । वह चलते-चलते रुक गया । धूमकेतु ने महाबाहु से कहा, "लीजिये, आप हूणों पर आक्रमण करने जाना चाहते थे न ? वह स्वयं ही आ पहुंचे हैं ।"
पुजारी बड़बड़ाया, "अथवा हमारा काल हूणों के रूप में आ पहुंचा है ।"