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आग के बेटे / vedprkash sharma
विजय विकास अलफांसे सीरिज
आतक की छाया ने लगभग. आधे घटे में ही समस्त राजनगर को आगोश में ले लिया ।
भय की लहर राजनगर के निवासियों में कुछ इस तीव्रता और भयानकता के साथ व्याप्त हुईं-मानो प्लेग का रोग रहा हो । जिस चेहरे पर दृष्टि जाती वही पीला नजर आता ।
प्रत्येक मुखडे पर भय एव आश्चर्य के सयुक्त भाव दृष्टिगोचर होते......!!
राजनगर का समस्त कार्य अस्त-व्यस्त हो गया l
लोगों का ध्यान अपने कर्तव्यों से हटकर इस विचित्र-आश्चर्यजनक ओर भयावह घटना की ओर हो गया ।
जहा देखो एक ही चर्चा-जिघर जाओ डरावने चेहरे दीखते ।
स्थान…स्थानं पर लोगों के जत्थे जगह-जगह आदमियों' की भीड भिन्न-मिन्न आयु के बच्चे बूढे ज़बान स्त्री पुरुष बहादुर व कायर इत्यादि सभी इस विचित्र-से चैलेंज के बिषय मेँ सोच रहे थे । तर्क-वितर्क कर रहे थे ।
घडी की सुइया तेजी के साथ बढ रही थीं । साथ ही बढ रही थी लोगों की उत्सुक्ता । साथ ही उनके दिल तीव्र वेग के साथ धडक रहे थे । वे देखना चाहते थे-उस विचित्र और ~ साहसी चैलेंज का परिणाम-चैलेंज समस्त राजनगर को भयानक चेलेंज I
अभी.....!!
अब से ठीक एक घटा पहले-यानी साढे ग्यारह बजे तक तो सब कुछ सामान्य था । उसी प्रकार सामान्य-जैसे प्रतिदिन रहता था । सभी अपने कार्यो मे व्यस्त थे…किन्तु ठीक बारह बजे
आज का बारह बजना मानो कहर था ।
बात का श्रीगणेश भी कम आश्चर्यजनक नहीं था I सर्वप्रथम भय और आतक की इस लहर ने जन्म लिया था स्जिर्व बेक आफ इडिया से । यह बेक राज़नगर का सर्व-सुरक्षित बैंक था और चैलेंज था न सिर्फ उसकी सुरक्षा को…बल्कि समस्त सरकारी अफसरों और राजनगरवासियों को ।
ठीक उस समय-जब रिजर्व बेक का मेनेजर अपने कमरे मे बैठा एक मोटे-से रजिस्टर को ध्यान से देख रहा था कि एक मधुर ध्वनि ने उसकी तद्रा भग की…"मे आई कम इन सर?"
मेनेजर महोदय की "उगलियों में फसा' सिगार का टुकड़ा गिरते-गिरते बचा ।
चोककर उन्होंने दरवाजे पर देखा तो सामने एक हसीन युवती को मुस्कराते हुए पाया ।
उसके मुस्कराने कै अदाज से लगता था.…"मानो वह अब भी अदर आने की आज्ञा चाहती हो । उसकी आयु बीस और बाईस के बीच थी l जिस्म पर एक मिनी स्कर्ट…जिसमें से उसकी गोरी और गोल जधाए स्पष्ट दिखाई दे रही थीं ।
मैनेजर ने स्वय' को सभाला और बोला.…"आइए…आइए...!"
कमर को लचकाती हुई वह कमरे में प्रविष्ट हो गई ।
मैनेजर ने अपनी नाक पर रखे चश्मे को निश्चित स्थान पर जमाते हुए कहा-"वैठिए ।"
वह इठलाती-सी बैठ गई ।।
-…'"कहिए, आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ?"
प्रत्युत्तर-मे उस युवती ने कुछ नहीं कहा…बल्कि चुपचाप, किन्तु लापरवाही का प्रदर्शन करते हुए उसने एक सिगरेट निकाली और अधरों के बीच फंसाकर इस प्रकार मैनेजर से माचिस मांगी । मानो उसने मैनेजर द्वारा पूछे गए प्रश्व को सुना ही न हो ।
मेनेजर ने भी चुपचाप लाइटर उसकी और बढा दिया ।
माचिस के स्थान पर लाइटर देखकर युवती कै अधरों पर एक विचित्र-सी मुस्कान ने जन्म लिया, -किन्तु उसने चुपचाप सिगरेट सुलगाकर लाइटर उसकी ओर बढाया----लाइटर हाथ मे लेते ही मैनेजर चौक पडा । उसके भीतर हल्का सा भय उजागर हुआ ।
लाइटर के चारों ओर एक लाल…सुर्ख कागज लिपटा हुआ था । मैनेजर ने कागज को देखकर प्रश्नवाचक निगाहों से युवती को देखा, किंतु देखते ही उसके… मस्तिष्क मे खतरे की घंटियां घनघनाने लर्गी । वह आश्चर्य के सागर मे गोते लगाने लगा ।
उसने गोर से सामने बैठी युवती को देखा…आश्वर्य से उसकी आखें फैव गई । उसका चेहरा पीला पड गया था।
उसकै सामने कुर्सी पर बैठी युवती के जिस्म के पोर पोर से धुआं निकल रहा था l
नीले और सुनहरे रग का एक विचित्र-सा सयुक्त धुआ --- कुछ इस तरह की धीमी आवाज कमरे मे गूजने लगी…मानो अनेक मक्खियां सयुक्त रूप से भिनभिना रही हो ।
भिनभिनाहट कुछ तेज होती जा रही थी और साथ ही जिस्म से निकलने वाला धुआं भी तेज होता जा रहा था ।
विजय विकास अलफांसे सीरिज
आतक की छाया ने लगभग. आधे घटे में ही समस्त राजनगर को आगोश में ले लिया ।
भय की लहर राजनगर के निवासियों में कुछ इस तीव्रता और भयानकता के साथ व्याप्त हुईं-मानो प्लेग का रोग रहा हो । जिस चेहरे पर दृष्टि जाती वही पीला नजर आता ।
प्रत्येक मुखडे पर भय एव आश्चर्य के सयुक्त भाव दृष्टिगोचर होते......!!
राजनगर का समस्त कार्य अस्त-व्यस्त हो गया l
लोगों का ध्यान अपने कर्तव्यों से हटकर इस विचित्र-आश्चर्यजनक ओर भयावह घटना की ओर हो गया ।
जहा देखो एक ही चर्चा-जिघर जाओ डरावने चेहरे दीखते ।
स्थान…स्थानं पर लोगों के जत्थे जगह-जगह आदमियों' की भीड भिन्न-मिन्न आयु के बच्चे बूढे ज़बान स्त्री पुरुष बहादुर व कायर इत्यादि सभी इस विचित्र-से चैलेंज के बिषय मेँ सोच रहे थे । तर्क-वितर्क कर रहे थे ।
घडी की सुइया तेजी के साथ बढ रही थीं । साथ ही बढ रही थी लोगों की उत्सुक्ता । साथ ही उनके दिल तीव्र वेग के साथ धडक रहे थे । वे देखना चाहते थे-उस विचित्र और ~ साहसी चैलेंज का परिणाम-चैलेंज समस्त राजनगर को भयानक चेलेंज I
अभी.....!!
अब से ठीक एक घटा पहले-यानी साढे ग्यारह बजे तक तो सब कुछ सामान्य था । उसी प्रकार सामान्य-जैसे प्रतिदिन रहता था । सभी अपने कार्यो मे व्यस्त थे…किन्तु ठीक बारह बजे
आज का बारह बजना मानो कहर था ।
बात का श्रीगणेश भी कम आश्चर्यजनक नहीं था I सर्वप्रथम भय और आतक की इस लहर ने जन्म लिया था स्जिर्व बेक आफ इडिया से । यह बेक राज़नगर का सर्व-सुरक्षित बैंक था और चैलेंज था न सिर्फ उसकी सुरक्षा को…बल्कि समस्त सरकारी अफसरों और राजनगरवासियों को ।
ठीक उस समय-जब रिजर्व बेक का मेनेजर अपने कमरे मे बैठा एक मोटे-से रजिस्टर को ध्यान से देख रहा था कि एक मधुर ध्वनि ने उसकी तद्रा भग की…"मे आई कम इन सर?"
मेनेजर महोदय की "उगलियों में फसा' सिगार का टुकड़ा गिरते-गिरते बचा ।
चोककर उन्होंने दरवाजे पर देखा तो सामने एक हसीन युवती को मुस्कराते हुए पाया ।
उसके मुस्कराने कै अदाज से लगता था.…"मानो वह अब भी अदर आने की आज्ञा चाहती हो । उसकी आयु बीस और बाईस के बीच थी l जिस्म पर एक मिनी स्कर्ट…जिसमें से उसकी गोरी और गोल जधाए स्पष्ट दिखाई दे रही थीं ।
मैनेजर ने स्वय' को सभाला और बोला.…"आइए…आइए...!"
कमर को लचकाती हुई वह कमरे में प्रविष्ट हो गई ।
मैनेजर ने अपनी नाक पर रखे चश्मे को निश्चित स्थान पर जमाते हुए कहा-"वैठिए ।"
वह इठलाती-सी बैठ गई ।।
-…'"कहिए, आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ?"
प्रत्युत्तर-मे उस युवती ने कुछ नहीं कहा…बल्कि चुपचाप, किन्तु लापरवाही का प्रदर्शन करते हुए उसने एक सिगरेट निकाली और अधरों के बीच फंसाकर इस प्रकार मैनेजर से माचिस मांगी । मानो उसने मैनेजर द्वारा पूछे गए प्रश्व को सुना ही न हो ।
मेनेजर ने भी चुपचाप लाइटर उसकी और बढा दिया ।
माचिस के स्थान पर लाइटर देखकर युवती कै अधरों पर एक विचित्र-सी मुस्कान ने जन्म लिया, -किन्तु उसने चुपचाप सिगरेट सुलगाकर लाइटर उसकी ओर बढाया----लाइटर हाथ मे लेते ही मैनेजर चौक पडा । उसके भीतर हल्का सा भय उजागर हुआ ।
लाइटर के चारों ओर एक लाल…सुर्ख कागज लिपटा हुआ था । मैनेजर ने कागज को देखकर प्रश्नवाचक निगाहों से युवती को देखा, किंतु देखते ही उसके… मस्तिष्क मे खतरे की घंटियां घनघनाने लर्गी । वह आश्चर्य के सागर मे गोते लगाने लगा ।
उसने गोर से सामने बैठी युवती को देखा…आश्वर्य से उसकी आखें फैव गई । उसका चेहरा पीला पड गया था।
उसकै सामने कुर्सी पर बैठी युवती के जिस्म के पोर पोर से धुआं निकल रहा था l
नीले और सुनहरे रग का एक विचित्र-सा सयुक्त धुआ --- कुछ इस तरह की धीमी आवाज कमरे मे गूजने लगी…मानो अनेक मक्खियां सयुक्त रूप से भिनभिना रही हो ।
भिनभिनाहट कुछ तेज होती जा रही थी और साथ ही जिस्म से निकलने वाला धुआं भी तेज होता जा रहा था ।