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आग के बेटे / complete

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आग के बेटे / vedprkash sharma

विजय विकास अलफांसे सीरिज

आतक की छाया ने लगभग. आधे घटे में ही समस्त राजनगर को आगोश में ले लिया ।

भय की लहर राजनगर के निवासियों में कुछ इस तीव्रता और भयानकता के साथ व्याप्त हुईं-मानो प्लेग का रोग रहा हो । जिस चेहरे पर दृष्टि जाती वही पीला नजर आता ।

प्रत्येक मुखडे पर भय एव आश्चर्य के सयुक्त भाव दृष्टिगोचर होते......!!

राजनगर का समस्त कार्य अस्त-व्यस्त हो गया l

लोगों का ध्यान अपने कर्तव्यों से हटकर इस विचित्र-आश्चर्यजनक ओर भयावह घटना की ओर हो गया ।

जहा देखो एक ही चर्चा-जिघर जाओ डरावने चेहरे दीखते ।

स्थान…स्थानं पर लोगों के जत्थे जगह-जगह आदमियों' की भीड भिन्न-मिन्न आयु के बच्चे बूढे ज़बान स्त्री पुरुष बहादुर व कायर इत्यादि सभी इस विचित्र-से चैलेंज के बिषय मेँ सोच रहे थे । तर्क-वितर्क कर रहे थे ।

घडी की सुइया तेजी के साथ बढ रही थीं । साथ ही बढ रही थी लोगों की उत्सुक्ता । साथ ही उनके दिल तीव्र वेग के साथ धडक रहे थे । वे देखना चाहते थे-उस विचित्र और ~ साहसी चैलेंज का परिणाम-चैलेंज समस्त राजनगर को भयानक चेलेंज I

अभी.....!!

अब से ठीक एक घटा पहले-यानी साढे ग्यारह बजे तक तो सब कुछ सामान्य था । उसी प्रकार सामान्य-जैसे प्रतिदिन रहता था । सभी अपने कार्यो मे व्यस्त थे…किन्तु ठीक बारह बजे

आज का बारह बजना मानो कहर था ।

बात का श्रीगणेश भी कम आश्चर्यजनक नहीं था I सर्वप्रथम भय और आतक की इस लहर ने जन्म लिया था स्जिर्व बेक आफ इडिया से । यह बेक राज़नगर का सर्व-सुरक्षित बैंक था और चैलेंज था न सिर्फ उसकी सुरक्षा को…बल्कि समस्त सरकारी अफसरों और राजनगरवासियों को ।

ठीक उस समय-जब रिजर्व बेक का मेनेजर अपने कमरे मे बैठा एक मोटे-से रजिस्टर को ध्यान से देख रहा था कि एक मधुर ध्वनि ने उसकी तद्रा भग की…"मे आई कम इन सर?"

मेनेजर महोदय की "उगलियों में फसा' सिगार का टुकड़ा गिरते-गिरते बचा ।

चोककर उन्होंने दरवाजे पर देखा तो सामने एक हसीन युवती को मुस्कराते हुए पाया ।

उसके मुस्कराने कै अदाज से लगता था.…"मानो वह अब भी अदर आने की आज्ञा चाहती हो । उसकी आयु बीस और बाईस के बीच थी l जिस्म पर एक मिनी स्कर्ट…जिसमें से उसकी गोरी और गोल जधाए स्पष्ट दिखाई दे रही थीं ।

मैनेजर ने स्वय' को सभाला और बोला.…"आइए…आइए...!"

कमर को लचकाती हुई वह कमरे में प्रविष्ट हो गई ।

मैनेजर ने अपनी नाक पर रखे चश्मे को निश्चित स्थान पर जमाते हुए कहा-"वैठिए ।"

वह इठलाती-सी बैठ गई ।।

-…'"कहिए, आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ?"

प्रत्युत्तर-मे उस युवती ने कुछ नहीं कहा…बल्कि चुपचाप, किन्तु लापरवाही का प्रदर्शन करते हुए उसने एक सिगरेट निकाली और अधरों के बीच फंसाकर इस प्रकार मैनेजर से माचिस मांगी । मानो उसने मैनेजर द्वारा पूछे गए प्रश्व को सुना ही न हो ।

मेनेजर ने भी चुपचाप लाइटर उसकी और बढा दिया ।

माचिस के स्थान पर लाइटर देखकर युवती कै अधरों पर एक विचित्र-सी मुस्कान ने जन्म लिया, -किन्तु उसने चुपचाप सिगरेट सुलगाकर लाइटर उसकी ओर बढाया----लाइटर हाथ मे लेते ही मैनेजर चौक पडा । उसके भीतर हल्का सा भय उजागर हुआ ।

लाइटर के चारों ओर एक लाल…सुर्ख कागज लिपटा हुआ था । मैनेजर ने कागज को देखकर प्रश्नवाचक निगाहों से युवती को देखा, किंतु देखते ही उसके… मस्तिष्क मे खतरे की घंटियां घनघनाने लर्गी । वह आश्चर्य के सागर मे गोते लगाने लगा ।

उसने गोर से सामने बैठी युवती को देखा…आश्वर्य से उसकी आखें फैव गई । उसका चेहरा पीला पड गया था।

उसकै सामने कुर्सी पर बैठी युवती के जिस्म के पोर पोर से धुआं निकल रहा था l

नीले और सुनहरे रग का एक विचित्र-सा सयुक्त धुआ --- कुछ इस तरह की धीमी आवाज कमरे मे गूजने लगी…मानो अनेक मक्खियां सयुक्त रूप से भिनभिना रही हो ।

भिनभिनाहट कुछ तेज होती जा रही थी और साथ ही जिस्म से निकलने वाला धुआं भी तेज होता जा रहा था ।
 
मैनेजर के आश्चर्य की कोई सीमा नही थी । वह अवाक्-सा, जीती-जागती युवती को घुएं मे परिवर्तित होते देख रहा था ।

उसके लिए क्या, वल्कि सारे साधारण मानवों के लिए यह विश्व का महानतम आश्चर्य था ।

मैनेजर के देखते-ही-देखते वह लडकी धुएं मेँ परिवर्तित हो गई I अब उसके सामने वाली कुर्सी पर उसं युवती के स्थान पर धुएं की मानव आकृति विराजमान थी ।

मैनेजर कै मुह से एक आवाज तक न निकली-उसके देखते-ही-देखत्ते विचित्र धुएं की मानव आकृति कुर्सी से उठी और वायु की भाति तैरती-सी दरवाजे की और बढी ।

एकाएक मैनेजर को जैसे होश आया । वह भी तुरत अपनी कुर्सी से उछल पडा. और भयभीत होकर भयानक तरीके से चीखा-"भूत....भूत. ..भूत,..बचाओ...!" वह चीखता हुआ वायु में तैरते धुएं की ओर लपका ।।

तब तक धुआ कमरे से बाहर जा चुका था I मैनेजर की चीख-पुकार सुनकर सारे बैक में हंगामा-सा मच गया ।

बदुकधारी मेनेजर के कमरे की ओर लपके ।

कैशियर के कान खडे हो गए ।

तभी चीखता हुआ मैनेजर अपने कमरे से बाहर आ गया I

उसकी स्थिति पागलों जैसी हो गई थी I वह वायु में तैरते उस घुए को देख कर चीखा…"ये वही लडकी हैं जो अभी मेरे कमरे में आई था…गोली चलाओ I"

बदूकधारी ही नहीं बल्कि सभी आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि किसी ने भी किसी युवती को मेनेजर के कमरे में प्रबिष्ट होते नहीँ देखा था और दुसरी बात ये कि मैनेजर धुएं मे लडकी की सज्ञा दे रहा था । एक बार को तो सबके मस्तिष्क में आया कि कही ये मेनेजर पागल तो नहीँ हो गया है .?

किंतु ये बिचार अधिक समय तक उनके मस्तिष्क मे न रह सका, क्योंकि उस घुए का रग और वायु में तैरने का ढग कुछ बिचित्र-सा था ।

उपस्थित तमाम लोग आश्चर्य के साथ उस धुए को देख रहे थे ।

तभी मैनेजर चीखा…"गोली चलाओ |”

बदूकधारी मानो अभी तक अचेत थे…उनकी चेतना वापस आई, उन्होने बंदूक सीधी की…"घांय . .धाय. . . I.

समस्त वातावरण गोलियों की आवाज से थर्रा उठा ।

किंतु परिणाम देखकर समी लोर्गों की आखे हैरत से फैल गई । चेहरे बर्फ की भाति सफेद पढ़ गए ।

धुएं पर गोलियों का कोई प्रभाव न हुआ था । गोलिया घुए कै बीच से बिना रुकावट के पार हो गई ।

किसी ने छत पर लगी रांड तोडी तो कोई दीवर से लगकर शहीद हो गई । सारे बेक मे हंगामा खड़ा हो गया l

फायरों की आवाज ने सडक पर जाते लोगों के पैरों में बेडिया डाल दी । सभी लोग बदहवास-से हो गए ।

मेनेजर तो पागलों की भांति चीख रहा था ।

आश्चर्य और भय ही व्याप्त रहा और अजीब रग का वह अजीब धुआ बैक के सदर द्धार से यू ही वायु में तैरता हुआ बाहर आ गया I

हजारों लोगों ने हैरत के साथ उस धुंए को देखा ।

कुछ शरारती युवको ने अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए उस धुए पर कुछ पत्थर फेंके किन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात I लोगों के देखते-ही देखते धुआ वायुमडल में ऊचा उठता चला गया और कुछ ही क्षणों मे वह लोगों की आखों से ओझल......हो गया I

अब धुआ नज़र नहीं आ रहा था ।

उपस्थित व्यक्तियों के चेहरे पर हैरत के भाव थे । सब लोगों ने आश्वर्यपूर्ण निगाहों से एक…दूसरे क्रो देखा…मानो एक-दूसरे से पूछ रहे हो कि क्या तुम घुए का मतलब समझते ‘हो ? किंतु प्रत्येक चेहरा सिर्फ पूछ रहा था , उत्तर देना किसी के बस का रोग नही था ।।

मैनेजर तो मानो पागल हो गया था । पागलों की भाति दौडता, हुआ वह अपने कमरे मे पहुचा तुरत पुलिस स्टेशन से सबध स्थापित करके हडबडाते हुए दूटे-फूटे शब्दों मेँ समस्त धटना सक्षेप मे बताई!

~~~ दुसरी ओर सुनने वाले रघुनाथ को लगा कि या तो यह मैनेजर पागल हो गया अथवा कोई भयानकतम अपराधी सामने आ रहा है l

खैर मेनेजर को कुछ-सात्वना दी और घटनास्थल पर पहुंचने के लिए कहकर सबध विच्छेद कर दिया ।

मैनेजर को दुसरी ओर से फोन रखने की ध्वनि ऐसी लगी-मानो कहीँ आसपास बम गिरा हो l

तभी उसके कानों में बाहर से तेज शोर की ध्वनि पडी । वह भी फुर्ती के साथ कमरे से बाहर निकालकर सदर दरवाजे की ओर लपका ।

बाहर लोगों की भीड बैक के अदर प्रविष्ट होना चाहती थी, लेकिन बैक कै बंदूकधारी उन्हें रोकने का प्रयास कर रहे थे । इस विरोध मे लोगों की भीड एक तेज शोर की उत्पत्ति कर रही थी । मेनेजर का समस्त जिस्म पसीने से लथपथ हौ गया । एक तो वेसे ही युवती के धुए मे परिवर्तित होने वाली घटना से बदहवास था…ऊपर से लोगों की इस बेवकूफी' ने उसकी बदहवासी को यौवन पर पहुचा दिया ।

लोगों का शौर क्षण-प्रतिक्षण तीव्र रुप धारण करता जा रहा था ।
 
घटना के केवल पाच मिनट पश्चात रघुनाथ सज-धज़ कर घटनास्थल पर पहुच गया और उफनती भीड़ पर काबू पाया ।

जब रघुनाथ मैनेजर के पास पहुचा-उस समय उसकी स्थिति पागलों जैसी हो रही थी । रघुनाथ को इस बात में कोई सदेह नही रह गया था कि वास्तव मे यहां वह अनहोनी धटना घटी है ।

मैनेजर उसे अपने कमरे में ले गया । रघुनाथ सामने उसी कुर्सी पर बैठता हुआ बोला, जिस पर वह युवती. आकर बैठी थी…जो बाद में एक आश्चर्य बन गई ।

…"अब आप मुझे सारी घटना विस्तारपूर्वक बताइए ।”

मैनेजर अब तक स्वयं पर सयम पा चुका था । जेब से रूमाल निकालकर उसने -पसीना पोछा और फिर रघुनाथ के प्रश्न के उत्तर में लहजे को सतुलित करने का प्रयास करते हुए बोला…"'मैं बैठा हुआ था कि अचानक वह युवती आई. . .।"

तत्पश्चात मैनेजर ने सपूर्ण घटना विवरण सहित रघुनाथ को सुना दी ।

जिसे सुनकर स्वयं रघुनाथ को ऐसा लगा…जैसे उसकी खोपडी हवा मे चक्कर लगा रही हो ।

साऱी घटना आश्चर्य से परिपूर्ण थी l

समस्त घटना सुनाने के बाद मैनेजर स्वयं ही आश्चर्य के साथ बोला-"लेकिन एक अन्य बात ने मुझे हैरत में डाल दिया I"

" क्या ?" रघुनाथ उसकी ओर देखकर बोला I

"यही कि बैंक कै बदूकघारी ही नहीं, समस्त कर्मचारिर्यों कै बयान ये हैं कि उन्होंने किसी लडकी को मेरे कमरे मे प्रविष्ट होते हुए नहीँ देखा।"

" क्या तुम उस लडकी का हुलिया बता सकते हो ?"

उत्तर में मेनेजर ने हुलिया बताना शुरू किया तो जनाब हुलिए के स्थान पर उसके सौंदर्य का गुणगान अधिक करने लगे ।

जब रघुनाथ ने अनुभव किया कि अगर उसने न टोका तो , मेनेजर महोदय उस लडकीं की इतनी प्रशंसा करेगे कि अगर इस समय वह कहीं भी होगी तो वही बैठी-बैठी पानी दो जाए ।

अत रघुनाथ ने बुरा-सा मुह बनाया और मेनेजर से बोलती पर ढक्कन लगाने के लिए कहा।

मेनेजर की चोंच एकदम बद हो गई I

रघुनाथ ने मैनेजर से अगला प्रश्न किया---"वह लाइटर कहाँ है जिस पर उस लडकी ने लाल कागज लपेटकर तुम्हें वापस किया था ?"

"जीं.....!" मैनेजर एकदम चोका-उसे तो बिल्कुल ही भूल गया घबराहट में वह कहीँ गिर गया , यहीँ कही होगा I" मैनेजर कुर्सी से एकदम उठता हुआ बोला ।

रघुनाथ ने भी मेज के नीचे झाका देखा l

तभी उसकी दृष्टि सिगरेट पर पड गई…जो लगभग पूरी थी और अब बुझ चुकी थी ।

रघुनाथ ने उसे सावधानी के साथ रूमाल से उठाया और ध्यान से देखा तो पाया कि सिगरेट के फिल्टर वाले भाग पर लिपस्टिक के चिह्न थे ।

"ये सिगरेट यहा किसने पी ?” रघुनाथ ने पूछा l

"ये उसी लडकी ने पी थी ।" मैनेजर के चेहरे पर सिगरेट को देखते ही फिर पसीने को बूदे उभर आई ।

रघुनाथ ने चुपचाप सिगरेट जेब में रख ली फिर लाइटर की खोज जारी हो गई l

अधिक कठिनाई उठाए बिना ही. दरवाजे कै पास पड़ा लाइटर मिल गया । लाल कागज अभी तक उसके चारों और लिपटा हुआ था I

रघुनाथ ने वह कागज उठाया और पढा ।

पढते-पढते. ही रघूनाथ की आखों मे गहन आश्चर्य उभर आया । ऐसा लगता था वह अत्यंत परेशान हो गया हो । वह… उस पत्र को देखता ही रह गया । सबसे अघिक आश्चर्य उसे पत्र में लिखे नीचे वाले शब्द पर हो रहा था । यह पत्र भेजने वाले का नाम था जो आश्चर्य से परिपूर्ण था I वह उन्ही शब्दों को घूरे जा रहा था और कोई अर्थ निकालने की चेष्टा कर रहा था किन्तु वह कुछ समझ नहीं पा रहा था ।

पत्र मैनेजर ने भी पढ लिया था और उसकी स्थिति तो उस बालक जैसी थी, जिसे किसी हाथी ने सूड से लपेट लिया हो ।।

उसे लगा जैसे यह सब. यथार्थ. नहीं, बल्कि… वह कोई भयानक स्वप्न देख रहा है । उसकी निगाह भी पत्र के अंतिम शब्दों पर ही स्थिर होकर रह गई थी ।

मस्तिष्क में बार-बार वही शब्द टकरा रहे थे, किन्तु उनका अर्थ मीलों दुर था । वास्तव मे शब्द आश्वर्यपूर्ण थे।
 
रघुनाथ ने पत्र से दृष्टि हटाकर तुरत घडी पर निगाह मारी और फोन उठा लिया, तुरत शहर के इस्पेक्टर जनरल ठाकुर साहब से संबघ स्थापित. करके उसने उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया और अत में सारा पत्र पढकर सुनाया तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए

और …

उन्होंने तुरन्त रघुनाथ को चेतावनी दी कि वह स्वयं वहीं रहे ।

उसके बाद. . .!

राजनगर के सरकारी महकमों की घंटियां घनघनाने लगी ।

जो सुनता…आश्वर्य के सागर में गोते लगाने लगता-समस्त समाचार प्लेग की भाति ही राजनगर के . कोने कोने में व्याप्त हो गया…

चारो तरफ भय और आतक छा गया । जो पहली बार सुनता-सबसे पहले वह घडी. देखता और फिर रिजर्व बैक की और का रुख करता I

शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा रहा हो जिसने ये समाचार इस एक घंटे के अतर्गत सुन न . लिया हो और ऐसा व्यक्ति भी शायद ही कोई हो जिसने सुनते ही दातों तले उंगली न दबा ली हो ।

समस्त राजनगर बुरी तरह आतकिंत हो गया ।

भय और आतक का साम्राज्य फैल गया । एक बिचित्र-सा आतक छा गया' चारों और ।

राजनगर के समस्त बाजार बद होने लगे थे । लोग वास्तव मे अत्यंत -भयभीत हो चुके थे । सबकी निगाहे घडियों. पर . जमी हुई थी ।

~ फोन की घटिया रग लाई. । देखते-ही देखते सेना के ट्रक राजनगर की सडकों. को रौंदने लगे l सैनिक-हीँ-सैनिक सारे -राजनगर पर छा गए । रिजर्व बैक के चारों ओर सेनिक कुछ इस प्रकार छित्तरे हुए थे....मानो, शहर के चारों और मधुमक्खियाँ बैक के अदर-बाहर चारो ओर सैनिक-ही-सैनिक I

ऐसा प्रतीत होता था…मानो किसी भयानक युद्ध की तैयारी चल रही हो । ऐसा लगता था…"जैसे घडी. की सुइयां इस समय निरतर और तीव्र वेग से आगे बढ रही हों । पिछले कुछ ही क्षणों में भयानक कहानी ने जन्म लिया था

_ और आने वाले कुछ ही क्षण मानो मोत का पैगाम देना चाहते थे,,भयानक खतरों कै प्रतीक थे । आने वाले कुछ क्षण मानो भयानकता की चरम सीमा को स्पर्श कर जाएगे l भयानक चेलेंज, किंतु चैलेंज का परिणाम ?

एक प्रश्नचिह्न बनकर सभी के मस्तिष्क पर मानो चिपक गया था I

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" सर, यह है वह लाल कागज-जो उस लडकी ने बैक मेनेजर को लाइटर के ऊपर लपेटकर दिया था ।" सीक्रेट सर्विस के चीफ ब्लैक ब्वाॅय ने वही लाल कागज विजय की ओर बढाते हुए कहा ।

"वो तो ठीक है प्यारे काले लडके लेकिन सवाल ये है कि क्या मामला वास्तव में इतना गभीर हैं कि विजय दी ग्रेट यानी हमारी आवश्यकता आ पडी ?” विजय लाल कागज हाथ

में लेता हुआ बोला ।

--"आप तो सब कुछ जानते ही हैं ।" ब्लैक ब्वाॅय आगे बोला--" अभी केवल एक घटे पूर्व से ही राजनगर में किस प्रकार आतक्र छा गया है ? सर वास्तव मे यह घटना अपने ढग की एकदम नई और अनोखी घटना है । इस पत्र को पढकर आप भी उस अपराधी के साहस की दाद देगे और सबसे अधिक आश्चर्यजनक तो इस पत्र में लिखे अतिम शब्द हैं । इस पत्र कै प्राप्त होते ही समस्त राजनगर में सेनिक तैनात कर दिए गए है । लोग भयभीत हैं l गृह मन्त्रालय से स्वय गृहमत्री ने स्रीक्रेट सर्विस से सबध स्थापित किए और…उन्होने स्पष्ट कहा कि सपूर्ण सीक्रेट सर्विस अपराधी के इस साहसी चैलेंज का मुकाबला करे l विशेषतया यह केस मिस्टर विजय को यानी आपको सौंपा जाए' ।"

--"देखो प्यारे काले लडके. ।" विजय अकडकर सीना फूलाता बोला…"देखो विजय दो ग्रेट की शोहरत-स्वयं गृहमन्त्री ने हमें इस केस पर लगाया है ।"

ब्लैक ब्वाॅय के अधरों पर मुस्कान उभर आई ।

. . विजय ने लाल कागज खोलकर पढना… प्रारम्भ किया । लिखे हुए शब्द कुछ इस प्रकार थे. . . I

" 'प्यारे राजनगर वासियो और पुलिस अधिकारियों....

हमे कुछ इस तरह कै समाचार मिलै हैं कि आजकल रिजर्व वैंक आँफ़ इंडिंया की मुद्रा की सख्या कई करोङ तक पहुच गई है I अधिकारीगण जरा हमारी बात को गहराई से सोचे I वास्तविकता यह है कि हम लोग हमेंशा जनकल्याण के लिए तत्पर रहे हैं । हमारा अभी तक का जीवन जनकल्याण में ही व्यतीत हुआ हैं और उम्मीदें करते हैं कि अगर आप लोगों का सहयोग मिला तो जीवनपर्यत हम लोग इसी प्रकार परहिताय के लिए,प्रयत्नशील रहेगे ,अभी तक हम लोग-जनकल्याण कै छोटे-छोटे कार्य करते रहते थे…किन्तु हमने देखा कि भारत कुछ इतनी परेशानीयो में घिरा है कि अगर हमारी यह जनकल्याण की भावना इतनी धीमी रही तो हम कुछ नहीं कर पाएँगे क्यों और हमारा जीवन एक तरह से निरर्थक -सा ही ही हो जाऐगा । अतः हम लोग खुलकर सामने आ रहे है ।

हाँ तो मै उस विषय पर लिख रहा था जो जनकल्याण का कार्य हम अभी कुछ ही समय बाद करने जा रहे हैं । हम एक बाल फिर कहते हैं कि हमें समझने का प्रयास करे । बात ये हैं कि रिजर्व बैक मे मुद्रा आवश्यकता से अधिक हो गई है ।-

अब जरा आप लोग दिमाग से सोचे कि इतनी बडी रकम चुराने का लालच किस के दिमाग में नहीं आऐगा ? आजकल भारत में भ्रष्टाचार,धोखा चोरी, लूट इत्याद्वि जोरों पर हैं ।अब आप सोचिए कि क्या किसी भी वक्त वे लुटेरे रिजर्व बैक की दस करोड़ की रकम, जो भारतीय प्रजा की है, लूट नही सकते ? ? आपको हो या न हो , हम लोग तो क्योंकि जनक्लाण कै लिए जीतै हैं अत: प्रजा की सुरक्षा का ध्यान लगा रहता है । प्रजा के धन को अत्यंत सुरक्षित रखने कै लिए हम लोग यह धन ले जाऐगे । ताकि इसे अत्यंत सुरक्षा के साथ रखा जा सके । शायद आप लोग हमारे इस काम की निन्दा करे , लेकिन हम फिर भी कहेगे कि हमे समझने का प्रयास किया जाया । अगर यह धन यहां रहा तो हमेंशा चोरी होने का भय लगा रहेगा । संभब है कि इस प्रयास मे किसी की ह्नत्या हो जाए ओर हमारे होते हुए यह सब हो जाए तो हम किस बात के जनकल्याणी है ?

इस बात की संभाबना ही स्माप्त हो जाए, इसलिए हम ठीक दो बजे आऐगे ।

हमने अब बहुत कुछ लिख दिया हैं…

आशा करते है हमारे कार्यो मे बाधा डालने कै स्थान पर हमें सहयोग देंगे।

अंत मे ये लिखना अपना कर्त्तव्य समझते हैं कि अगर हमारे इस कल्याणकार्य में कोई हमारे विरूध आया तो दोस्तो ये याद रखना कि जो कार्य जनकल्याण कै लिए किए जाते हैं, कायंकर्ता उन सभी रोडों को ठिकाने लगाता हुआ अपनी मंजिल तक पहुचता है जो मार्गो में आतै हैं ।

यू तो हमारे द्वारा सुरक्षित रखनै पर भी चोरी होने का भय तो लगा ही रहेगा…स्वयं हमारी जान भी जा सकती है किन्तु हमें अपनी चिंता नहीं नही है---चिंता हैं तो आप लोगों की है ---- कहीं आप लोगों को किसी तरह का कष्ट न हो । अब. हम इस मुसीबत को अपने साथ ले जाने के लिए ठीक दो बजे आ रहे है
 
इस धन की सुरक्षा में अगर हम लोगों की जान भी चली जाए तो हम अपूना परहिताय जीवन सफल समझेगे । अच्छा, अब दो. बर्ज मिलेंगे ।।

जनकल्याणकारी , आप ही के दोस्त

आग के बेटे

विजय ने सपूर्ण कागज पढा…बास्तव में सारा पत्र एक विचित्र ढग से लिखा गया था । प्यार भरे शब्दों में ही एक खतरनाक चेलेंज दे दिया था…अतिम शब्दों पर तो वास्तव में उसकी. निगाहे जमकर रह गई ।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ये 'आग के बेटे' क्या बला हे ?

आग के बेटे कैसे होगे ?

आग के बेटों का आखिर…मतलब क्या है ?

. . उसने चौककर घडी. देखी…जो ठीक सवा बजने का सदेश दे रही थी I घडी देख कर उसने विचित्र ढग' से मुंह बिचकाया और फिर ब्लैक- ब्वाॅय की ओर देखकर बोला ।

"'तो प्यारे चीफ़ मियां, इसमें परेशानी क्या है ? ये साले आग के बेटे तो जनकल्याणकारी हैं । जो कर रहे है जनता के लाभ के लिए ही का रहे हैं । हम क्यों बेकार में इनके रास्ते में रोडे बने ?”

…"सर यह जानते हुए भी कि परिस्थिति कितनी गभीर है-आप मजाक कर रहे है . .शीघ्रता से सोचिए कि हमें करना क्या चाहिए ? समय कम है सर ।" ब्लेक ब्वाॅय चितित स्वर में बोला ।

"खैर प्यारे--अगर तुम कहते हो तो हम इन्है रोकने का प्रयास करेंगे l वेसे हमे लगता हे कि ये साले आग के बेटे किसी हरामी की औलाद हैं हमारे रोकने से रूकेगे नहीं लेकिन बो अगर आग के बेटे हैं तो हम भी ठाकुर के पूत हैं । साले इस तरह नहीं रूके तो दो-चार झकझकिया सुनकर धाराशायी कर देगे ।" विजय सीना फुलाता हुआ बोला l

-"सर I" ब्लैक ब्वाॅय उसी प्रकार गभीरता के साथ बोला

"मेरे ख्याल में क्यों न राजनगर मे तीन बजे तक के लिए कर्फ्यू लगा दिया जाए ?”

"नहीं नहीं प्यारे ।।" विजय एकदम सतर्क होकर बोला…" भूलकर भी ऐसा पवित्र कार्य न कर बैठना । इस समय अगर कर्फ्यू लगाया गया तो जनता भडक उठेगी और एक नईं मुसीबत खडी हो जाएगी । इस समय प्रत्येक कदम सोचकर उठाओ ।"

…"तो फिर क्या किया जाए सर ?"

" …"तुम अशरफ इत्यादि सभी को वहा पर भेज दो । तब तक हम भी पहुच रहे है I” विजय ने कहा और घडी को देखता हुआ तुरत सीक्रेटरूम से बाहर निकल आया ।। घड़ी डेढ बजने का सदेष दे रही थी ।

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3

ठीक पौने दो बजे बिजय रिजर्व बैक पहुचा । वहा उसके पिता राजनगर के आईं जीं के नेतृत्व में काफी भारी सख्या में पीएसी के नौजवान उपस्थित थे जों उमडती भीड पर काबू पाने का प्रयास कर रहे थे । काफी हद तक वे अपने प्रयास मे सफल भी थे । नेतृत्व क्योंकि खुद ठाकुर साहब कर रहे थे अत काफी सुदृढ था l

रिजर्व बैक के चारो और कुछ इस तरह के चक्रव्यूह का निर्माण किया गया था…मानो महाभारत कौ दोहराना हों ।

रघुनाथ ने स्वय एक ओर का मोर्चा सभाल लिया था । विजय ने देखा कि सीक्रेट सर्विस के अन्य सदस्य बिभिन्न. मेकअर्पो में वहा उपस्थितं थे । आशा इस समय किसी चिडचिडी और वदसूरत-सी बुढिया के मेकअप में थी…जिसकै काले भद्दे और चेचक के दाग वाले चेहरे की लम्बी और टैढी-मेढी नाक पर एक ऐनक लगभग लटक-सीं रही थी । उसके मोटे लटके हुए होंठों से पान की पीक बह रही थी । बाल पक चूकें थे

उसके हाथ में एक लठिया थ्री और वह अपने हुलिए के अनुसार कुशल अभिनय करने मेंसफ़ल थी ।

विजय इस समय स्वयं मेकअप में था…ताकिं ठाकुर साहब न पहचान सकै । इस समय वह ऐसे मेकअप में था कि उसे पहचानना कठिन ही नहीं, असभव था । उसको कुछ शरारत सूझी I अत: उसने आशा की ओर देखा और आख मार दी । उत्तर भे जो हरकत आशा ने की उससे वह मान गया कि आशा कमाल का अभिनय करती है । उसके आख मारते ही आशा ने ठीक किसी बुढिया की भाति तेवर बदले और दो-चार गालियों से विभूषित कर दिया ।

यह एक अलग बात है कि इस बीच पान की. पीक ने होंठों के बीच से निकलकर मैली कुचैली धोती पर एक सुंदर-सा प्रिंट बना दिया था । वेसे प्रिंट बनाना भी शायद आशा के अभिनय का एक भाग था I

बिजय तुरत भीड, मे विलुप्त हो गया । वह यह न जान सका कि आशा ने भी उसे पहचाना है अथवा नहीँ । वह भीड मे घुस गया और एक स्थान पर आराम से खडा होकर बैंक के उस चौपले को देखने लगा-जहा सिर्फ सकरारी कर्मचारी ही खड़े थे ।।

अभी वह ध्यान से सब कुछ देख ही रहा था कि वह चौक पड़ा-न सिर्फ चौंक पडा. बल्कि उछल पड़ा, जब भीड में से किसी ने ये बेहूदा हरकत की ।

हुआ ये कि विजय की कमर में किसी ने बहुत जोर की चुंटी काटी । परिणामस्वरूप वह उछल पडा. और अपने चारो और का निरीक्षण किया, किन्तु वह न जान सका कि ये हरकत किसकी है । जब उसे काफी प्रयासों के बाद भी असफलता ही हाथ लगी तो वह शात खडा हो गया और अपना ध्यान 'आग के बेटो' की और लगाने का प्रयास कर ही रहा था कि एक बार वह फिर चौक पडा।

कारण था फिर वही बेहुदा हरकत ।

बिजय को लगा कि कोई शरारार्ती बच्चा उसके साथ शरारत कर रहा है
 
किंतु तभी उसके दिमाग में प्रश्न उठा, आखिर ये शरारत उसी के साथ क्यो की जा रही है ?

कहीं इस छोटी-सी घटना के पीछे कोई बड़ा रहस्य तो नहीं? उसके दिमाग ने उत्तर दिया कि सभव है ऐसा ही हो क्योकि आग के बेटों के उस पत्र से स्पष्ट होता हे कि अपराधी कछ विचित्र-स्री आदतों का स्वामी है ।

कही अपराधी उसे छका तो नहीं रहा ? न जाने क्यों उसके दिमाग में यह बात घर कर गई कि हो न हो, ये हरकत कोई बहुत बडा रहस्य हे ।

अभी सोच ही रहा था कि इस बार किसी ने अपनी सपूर्ण शक्ति लगाकर चुटी काटी-इतनी शक्ति से कि विजय तिलमिला कर रह गया लगभग चीखा…"अबे ओ. . .भाई, कौन है बे ?"

" लेकिन जो भी था, वह उसके पास से गायब था । एक बार को तो विजय की खोपडी. घूम गई ।।

उसके बोलने के ढग पर उसके आसपास खडे लोग उसे बिचित्र-सी निगाहों से देखनें लगे ।

विजय ने मुखों की भाति चेहरा बनाया और शुतुरमुर्ग की भाति अपनी गर्दन लम्बी करके इधर-उधर देखने लगा । लोग मुस्कराकर रह गए ।

वैसे इस बार विजय पूर्णतया सतर्क था ! अब वह पता लगाना चाहता था कि आखिर ये हरकत है किसकी और उसका अभिप्राय क्या है , तभी वह चौंक पडा I

वास्तव में इस समय. उसे यहां जिस चेहरे कै दर्शन हुए-उसे देखकर वह बुरी तरह से चौक पडा । as लोगों की टार्गों के बीच से होता हुआ उसकी ओर आ रहा था. । वास्तव मे इस चेहरे की यहा इस समय उपस्थिति आश्यर्य थी ।

विजय चकरा-सा गया । आखिर उसने उसे मेकअप में मीं पहचान लिया ?

विजय के मन में इस प्रश्न की उत्पत्ति हुई और मन ने उत्तर मे यही कहा कि आखिर ये लडका है क्या ? वह उसके निकट आया और अभी चूटी काटने ही वाला था

कि विजय चीखा-"अबे ओ हरामखोर की औलाद कौन है तू ?"

" डैडी को गाली दी तो मैं आपकी दाढी पकडकर लटक जाऊगा-आप मुझे नहीं पहचानते-मैं विकास हू I" लगभग ग्यारह वर्षीय वह लडका शरारत-भरे लहजे में बोला l

विजय चकराकर रह गया ।

आखिर ये लडका उसे पहचान कैसे गया ? इस समय वह ऐसे मेकअप में था कि अच्छे-से-अच्छा पारखी भी उसे पहचान न सकता था. किंतु ग्यारह वर्षीय यह छोकरा I एक बार फिर विजय सोचने पर....मजबूर हो गया कि विकास खतरनाक शैतान है I यह तो उसे पता था कि अलफासे ने उसे न सिर्फ खतरनाक कार्यो मेँ दक्ष कर दिया था बल्कि दहकते शहर नामक केस का हीरो भी विकास ही था कितु विजय को पहचानना एक भिन्न और आश्वर्यपूर्ग बात थी l

विकास......!!!!

विकास, विजय के दोस्त रघुनाथ का लडका था । यह लडका अत्यंत खतरनाक बन गया था । इस अल्पायु मेँ ही अलफासे ने उसे गजब के हैस्तअगेज कारनामे सिखा दिए थे ।

. विजय को लगा कहीं ये खतरनाक लडका यहा उसकी पोल ही न खोल दे । अत वह तुरत भीड में से निकलकर एक ओर को चला गया । , . विकास के मासूम से अधरों पर शरारतपूर्ण मुस्कान थी और वह विजय के पीछे…ही-पीछे बाहर आया l

भीड से अलग आकर विजय उसकी और मुडकर बोला-"'क्यों वे दिलजले तुम यहा कैसे ?"

" अंकल सच बताऊ या झूठ ?"' विकास बोला ।

" देखो मिया दिलजले , तुम्हारी हरकते लम्बी होती जा रही हैं । पहले नेकर का नाडा बाघना सीखो…तब ऐसे खतरनाक स्थानों पर आया करो ।"

. . "अकल मैं पैट पहनता हूं जिसमेँ नाडा नहीं पेटी होती हैं ।"

विजय ने घडी देखी…दो बजने मे सिर्फ पाच मिनट शेष थे । अत इस समय वह विकास को यहा से खिसकाने के लिए उससे बिना उलझे बोला…"तुम यहां क्या आए हो बेटे ?"

.…" आपको दिलजली सुनाने ।"

…""अवे ओ ।" विजय अभी कछ कहने ही जा रहा था कि ठहर गया और स्वयं ही बात बदलकर बोला…"लेकिंन तुमने हमें पहचाना कैसे ?"

" लो ये भी कोई कठिन काम था झकझकिए अक्ल मैं आपको दिलजली सुनाने आपकी कोठी पर गया था । वह्य देखा तो पाया कि आप शीशे के सामने बैठे ये श्रृंगार कर रहे हैं । मेरे देखते ही-देखते आपने ये नकली दाढी-मूछे लगाई और यहा आ गए । मैं आपके पीछे पीछे था ।"

विजय विकास के मासूम प्यारे-प्यारे चेहरे को देखता ही रह गया । उसे बिश्वास नहीँ हुआ कि इतनी अल्पायु का किशोर इतनी विलक्षण बुद्धि रख सकता है । वह इतना खतरनाक हो सकता हे…जितना कि बिजय था ।

विजय को कुछ विचित्र-सा लगा ।

विकास को इतना जीनियस देखकर उसे विचित्र-सी खुशी का अहसास हुआ । विकास की एक-एक हरकत ऐसी थी कि जो विजय के मन मे घर कर जाती । विकास को वह भारत का ही नहीँ-बल्कि विश्व का सर्वोत्तम जासूस बनाने का दृढ निश्चय कर चुका किन्तु इस समय विकास को यहा देखकर न जाने I क्यों उसे कछ मानसिक परेशानी हुई । तभी वह विकास से कुछ कहने ही जा रहा था कि चौंक पडा ।
 
अचानक बेंक की तरफ से तगडे शोर की उत्पत्ति हुई और फिर समस्त वातावरण भयभीत चीखों से भर गया । भागीत हुई भीड का रेला उसी ओर आया ।

उसने विकास को सभालने के लिए बहां निगाह मारी-जहां विकास था, किंतु उस समय बिजय की आखें आश्चर्य से फैल गई जब उसने पाया कि विकास रूपी छलावा अपने स्थान से गायब है । बिजय को लगा कि यह लडका छलावा तो नहीं I आसपास उसे कही बिकास नज़र नहीं आया ! भागती हुई भीड का रेला उसके अत्यत निकट आ गया था । लोगों की भयभीत चीखें वातावरण पर अपना प्रभुत्व जमाएं

थीं I विजय ने फिलहाल अपना मस्तिष्क विकास से हटाकर उस

ओर लगा दिया I . .

वह एक और को हट गया और उधर देखा…जिघर से लोग चीखते हुए भाग रहे थे I उधर देखते ही बिजय बुरी तरह चौंक पडा। आश्चर्य से उसकी आखे सिकुड गई । वह उस ओर देखता ही रह गया । उसे ऐसा लगा वह जो देख रहा हे-वह स्वप्न मात्र है । वास्तव में इस समय विजय जो देख रहा था…वह उसी तरह मुर्खतापूर्ण बात थी जैसे ये सोचना कि आकाश गिर जाए ।

कुछ ऐसा ही दृश्य उसके सामने था जिस पर वह कदापि विश्वास नहीँ कर सकता था । वह इस बात पर तो बिश्वास कर सकता था कि हिमालय अपने स्थान से हिल गया…किन्तु इस दृश्य को सत्य नहीं मान सकता था, किंतु दृश्य कठोर यथार्थ के रूप में उसके सामने था ।

क्षण-प्रतिक्षण उसकी आखें हैरत से फैलती जा रही थी । दृश्य जितना स्पष्ट होता जाता, उसकी आखें उसी अनुपात मे हेरत से फैलती चली जाती थीं । वास्तव में था यह हेरत्तअगेज दृश्य । उसे अपने रोंगटे खडे होते हुए महसूस हुए । भयानक दृश्य उसने देखा । उस दृश्य को. देखकर लोग उससे भयभीत होकर न सिर्फ चीखने-चिल्ताने लगे थे, बल्कि अपनी-अपनी रक्षा हेतु भाग लिए थे I विजय को भी मानना पड़ा कि प्रस्तुत दृश्य मोत से भी भयानक औरं खतरनाक है ।

सबसे पहले उसने बदहवास-सी भागती… भीड़ के उस मार धुआं उठता देखा, जिसे देखकर एक ही क्षण में भीड काई की तरह फ़ट गई और प्रस्तुत दृश्य को देखकर विजय की आखें हैरत से फैल गई ।

उसके सामने आग के बेटे थे ।

वास्तव मे ये 'आग के बेटे' थे ! .

ये लगभग दस जीवित हाड़-मास के इसान थे-किंतु आश्चर्च की बात ये थी कि उनके सपूर्ण जिस्म आग की लपटों में घिरे हुए थे । समस्त जिस्म. से आग लपलपा रही थी-मानो किसी ने उनके जिस्मों पर पेट्रोल छिडककर आग लगा दी हो । उनके जिस्मों से लपलपाती हुई भयकर अग्निशिलाऐं धधक रही थीं।

लपटे कुछ इस प्रकार ऊंची उठ रही थीं मानो दस होलिया एक साथ जल रही हों । उनके जिस्मो से ज्वलित अगारे धरती पर गिरते जा रहे थे ।

भयकर अग्निशिलाऐं ऐसे लपलपा रही थी मानो गधक की अग्निशिलाएं जल रही हौं ।

उनका सपूर्ण जिस्म भयकर किस्म की लपलपाती आग की लपटों में था ।

इससे भी आगे आश्चर्यजनक ये था कि आग की लपटों में घिरे हुए वे आग के बेटे निरंतर. रिजर्व बैक की और बढ.. रहे थे ! लोगों को न सिर्फ आश्चर्य हो रहा था, बल्कि बदहवास हो गये थे । ये बात न सिर्फ उनके दिमाग से बाहर थी, हेरतअगेज भी थी कि इस. बुरी तरह आग की लपटों में लिपटे हुए इंसान जीवित भी रह सकते हैं । वे न सिर्फ जीवित थे, बल्कि मस्त हाथी की तरह झूमते हुए अपने लक्ष्य की और वढ़ रहे थे ।

मैदान साफ हो चुका था । पी.ए.सी. वाले विचित्र-सी परेशानी और कश्मकश में फंस गए थे । यह तो वे जानते ही थे कि उ'न्हें किन्हीं विशेष अपराधियों से टकराने के लिए बुलाया गया है, किन्तु उन्हें ऐसी आशा कदापि नहीं थी कि अपराधी इस विचित्र ढग के होगे l

स्वयं विजय को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे । अपने स्थान पर खड़ा विजय सामने के भयानक दृश्य को देख रहा था ।

सहसा वह चौका.. .उसने देखा ।

अचानक उसके पिता…'शहर के आईजी--ठाकुर साहब आग के बेटों के सामने आ डटे । बिजय देख चुका था कि ठाकुर साहब के चेहरे पर. भयानक भाव उभर आए हैं-जो इस बात का प्रमाण थे कि वे कोई भयानक निर्णय ले चुके हे' । इस समय विजय ने अपना कदम आगे बढना उचित न समझा । अत वही खडा रहकर सब कुछ देखता रहा I

ठाकुर साहब आग के बेटों के सामने रिवाल्वर तानकर खडे हो गए और चीखे…"इन्हें चारों ओर से घेर लिया जाए ! "

पी.ए.सी बदहबास तो हो ही चुके थे किंतु आदेश का उन्होने तुरत पालन किया I क्षण-मात्र मे आग के बेटे पी.ए.सी के वृत्त में कैद थे किंतु आग के बेटे मस्त हाथी थी की भाति झूमते हुंए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर थे । मानो इस घेराव से उन्हें सरोकार ही न हो । . . उनके ठीक सामने ठाकर साहब खडे थे I

आग के बेटे आगे बढते रहे --- ठाकुर साहब भी मानो अडिग चट्टान थे । वे जितने निकट आते जाते…उसी अनुपात मे ठाकुर साहब के चेहरे की भयानकता मे चार चाद लगते जाते थे । तब…जबकि वे अत्यत निकट आ गए, ठाकुर साहब बोले…"ठहरो नहीं तो भून दिए जाओगे" ।"

किन्तु ऐसा लगता था जैसे वे सभी बहरे हो I

ठाकुर साहब की आवाज का लेशमात्र भी प्रभाव उन पर न हुआ । वे उसी प्रकार बढ रहे थे I

विजय इस दृश्य को देख रहा था किंतु सिर्फ देख ही रहा था ।

'आग कै बेटे' निरंतरं आगे बढ रहे थें । ठाकुर साहब चीख-चीखकर चेतावनी दे रहे थे…जिसका उन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड रहा था…अलबत्ता ठाकुर साहब कै क्रोध में निःसंदेह वृद्धि होती जा रही थी

अत' मे तब-जबकि वे इतने निकट आ गए कि ठाकुर साहब को उनके जिस्मों से लपलपाती आग की ऊष्मा मिलने लगीं तो ठाकुर साहब चीखे

" फायर !"

"रेट. . .रेट. . रेट. . . ! "

आदेश के साथ ही पी ए सी वालो की गनों ने अपने भयानक जबडे खोल दिए । लपलपाते हुए भयकर आग के शोले आग के बेटों की ओर बढे । वे दहकते हुए जिस्मो से टकराए भी किन्तु उस समय विजय को आश्चर्य नहीं हुआ जब बेचारी गनों की गोलियां बिना कोई जौहर दिखाए शहीद हो गई । उसे पहले ही उम्मीद थी कि आग के बेटे इन आम हथियारो के बस मे आने वाले नही है बल्कि इनका अत करने के लिए दिमागी पेंर्चों को खटखटाना पडेगा । .

परिणाम देखकर ठाकुर साहब को जहा थोडा आश्चर्य हुआ-वही पी ए सी के जबान तो भौंचक्कै रह गए । आग के बेटे ठाकुर साहब के अधिकाधिक निकट आ गए थे । इत्तऩे निकट कि उन्हें अपना जिस्म जलता-सा प्रतीत होने लगा तो वे तुरत वहा से हट गए ।

उसके बाद ।

क्रम इसी प्रकार चलता रहा । ठाकुर साहब बार…बार आग के बेटों को खतरनाक लहजे और शब्दों मेँ चेतावनी देते रहे, किंतु जब उसका लेशमात्र` भी प्रभाव न देखते तो उन्हें स्वयं यह महसूस होता कि उनकी चेतावनी खोखली है । अनेक बार . गने गरजती किंतु परिणाम वही ढाक के तीन पात I अत में सदर दरवाजे से होते हुए आग की लपटों में लिपटे आग के बेटे बैंक के अदर चले गए। पुलिस का चक्रव्यूह उनको लेशमात्र भी हानि पहुचाने मे असफल रहा ।

ठाकुर साहब का क्रोध सातवें आसमान पर पहुच गया किंतु वह कर ही क्या सकते थे ? . , .

~सडक पर अब भी दहकते शोले बिखरे पडे थे।

विजय अभी कोई उपाय सोच ही रह्य था कि बुरी तरह से चौका । उसकी नजर छलावे पर पडी ।

हां…उसे छलावा ही क़ह सकता था । वास्तव में यह शेतान था…अल्पायु का खतरनाक शेतान I

वह विकास के अतिरिक्त कोई न था जिसे देखकर विजय चौंका था । वह सिर्फ विकास के चेहरे से नही चौका था ।

वास्तव में वह चौंका था विकास की हरकत से । उसकी समझ मेँ नहीं आया कि आखिर लडका. चाहता क्या हे ? आखिर विकास उसे कितनी बार आश्चर्य कै सागर में गोते लगवाएगा ।

विजय को लगा कि अगर यह लडका इसी तरह मोत के भयानक जबडों में छलाग लगाता रहा तो किसी दिन मौत कै जबड़े उसे अपने आगोश में ले लेगे ।

उसे गुस्सा आया अलफासे पर…जिसने विकास को इन खतरनाक खेलों में दक्ष किया था । इस अल्पायु में भला इतना खतरनाक लडका बनाने की क्या

तुक है ?
 
वास्तव में विकास की इस हरकत से चौंकने वाला सिर्फ विजय ही न था, बल्कि ठाकुर साहब और रघुनाथ के साथ-साथ अन्य पी.ए.सी. के जवान भी थे I

रघुनाथ और ठाकुर साहव के लिए सर्वप्रथम तो चौंकने का कारण विकास की यहां उपस्थिति ही थी । उससे भी अधिक थी विकास की हरकत ।

उनके देखते-ही-देखते विकास किसी भूत की भाति भागता हुआ आग कै बेटों के पीछे बैंक में प्रविष्ट हो गया । उसे देखते ही ठाकुर साहब और रघुनाथ के मुह' से निका

ला ।

" विकास.......!"

किन्तु वह खतरनाक छलावा बैंक के अंदर प्रविष्ट हो चुका था l

एक ही पल मे विजय ने निश्चय कर लिया । वह जान गया कि विकास 'मौत के जबड़े ने जम्प लगा चुका है।

अत: वह भी विघुत गति से झपटा और देखते-ही-देखते वह भी बैंक में समा गया ।

उसके पीछे ठाकुर साहब और रघुनाथ भी झपटे थे, किंतु वह जानता था कि दोनों में से कोई भी उसे पहचान न पाया है…वे केवल विकास की रक्षा हेतु मौत कै मुह में आ रहे हैं ।

बिना उनकी चिता किए वह अदर प्रविष्ट हो गया ।

अदर का दृश्य देखते ही एक बार बिजय को फिर चौक जाना पडा. ।

आग के बेटे उसी हालत में कैश की ओर बढ रहे थे और बिकास तेजी से फर्श पर रेंगता हुआ एक और बढ़ रहा था I

अभी तक विजय समझ नहीं पाया था कि आखिर ये लडका चाहता क्या है ?

उसने भी सिर्फ इतना किया कि वह रिबॉंल्बर निकालकर विकासंके पीछे रेंगने लगा । ताकि विकास के किसी मुसीबत मे फस जाने पर वह. उसकी रक्षा कर सके, लेकिन न जाने उसे क्यो ऐसा लगा कि विकास कोई साधारण लडका नहीं है, अवश्य ही उसे विधाता ने कोई बिशेष शक्ति प्रदान की है । उसकी समझ मे नहीं आ रहा था कि ये छटंकी सा लडका आग के बेटो का बिगाड क्या. लेगा ? आखिर वह रेगकर करना क्या चाहता हे ? बिकास का लक्ष्य क्या हे ? विजय जितना, विकास के विषय में सोचता-वह सिर्फ उलझकर रह जाता।

आग के बेटे उनसे लापरवाह थे । आग की लपटे अब भी लपलपाकर ऊपर उठ रही थी । शोले अब भी गिर रहे थे ।

. विजय तेजी से रेंगता हुआ विकास के निकट पहुचा और फुसफुसाया "क्यों बे मिया दिलजले क्या इरादे ?”

"आप भी आ गए अकल ?” बिकास उसी तरह रेंगता हुआ बोला ।

"यस बेटे लेकिन आखिर तुम चाहते क्या हो ?"

"अकल ये हाथ मे क्या है ?” बिकास विजय की बात का कोई उत्तर न देकर शरारत-भरे लहजे में बोला ।

"इसे रिवॉल्वर कहते है प्यारे दिलजले ।" बिजय हाथ में पकड़ी रिबॉंल्वर को हिलाता हुआ बोला ।

"ये कैसा रिवॉल्वर हे अंकल?"

बातों के बीच रेंगना निरंतर जाऱी था ।

" क्यों ?"

""इससे तो मुर्गा भी नहीं मरेगा ।" बिकास बोला ।

"चुप बे-शैतान कही का I” विजय मुस्कराता हुआ बोला ।

तभी रेगते हुए बिजय की नज़र बैंक क्री छत पर लगे पखों पर पडी ।

तुरत उसके दिमाग में एक बिचार आया क्यों न वह पंखे चला दे ।

शायद पखों की हवा से इसानों के जिस्मों मे लगी आग बुझ जाए । उसने उन्हे आंन करने के लिए स्विच को तलाश में निगाह इधर-उधर दोडाईं तो स्विच पर नजर पडते ही दग रह गया । इसलिए नहीँ कि स्विच में कोई विचित्र बात थी, बल्कि इसलिए कि विकास का रूख उसी ओर था । उसे एक बार फिर विकास. की बुद्धि का लोहा मानना पडा । न जाने; क्यों अब उसे . विकास के साहस, बुद्धि और. शक्ति देखकर प्रसन्नता होने लगी…तेजी से रेंगता हुआ वह बोला ।

"'क्यों प्यारे…तुम इस तरफ क्यो बढ़ रहे हो ?"

…""अकल, गर्मी लग रही है…-क्यो न पखे चला दे ?"

विजय समझ गया कि वास्तव मेँ यह लडका. ठीक समय पर ठीक सोच सकता है !

उसके बाद…जबकि विजय स्विचों तक पहुचा उस समय आग के बेटे पखों' के नीचे थे । उसने 'स्विच की ओर हाथ बढाया, किंतु उसी पल वह बुरी तरह चौका…न सिर्फ चोंक पड़ा, बल्कि अपना दिमाग घूमता-सा प्रतीत हुआ-उसे लगा कि जैसे वह हवा में तैर रहा है । वह स्वयं को सभाल न सका और धडाम. से लहराकर फर्श पर गिरा ।

विकास ने विजय का गिरना देखा और तुरत समय की गभीरता क्रो पहचाना गया और उस स्थान से दूसरी ओर रेंग गया ।।।

उसके बाद !

विकास कुछ भी न कर सका ।

ठाकूर साहब और रघुनाथ ने आकर उसे पकड लिया ।

देखते-ही-देखते ‘आग के बेटे' वापस लौटने लगे । पुलिस ने लाख प्रयास किए ।

प्रत्येक ने अपनी बुद्धि लडाई, किन्तु आग के बेटे किसी बात से प्रभावित न हुए ओंर न ही उन्होंने अपनी और से किसी की जान ली ।

शायद वास्तव में वे जनकल्याणकारी ही थे । हजारों लोगों के देखते-ही देखते आग के बेटे सागर के जल मे विलुप्त हो गए, किन्तु अपने पीछे छोड गए…भयाननक आतक और रिजर्व बैंक का खाली खजाना।

★★★★★
 
बात ही ऐसी थी कि रघुनाथ कापकर रह गया ! उसकी इतनी बडी. जिदगी में शायद. ही ऐसी बिचित्र और भयानक घटना घटी हो-जैसी अब उसके सामने थी । उसके माथे पर पसीने की वूदें उभर आई थीं । एक… ही पल में बाल कुछ इस प्रकार ,अस्त-व्यस्त हो गए कि ऐसा लगा मानो उसके किसी प्रिय का देहात हो गया हो I उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस गभीर स्थिति मे करे भी तो क्या. . .? रघुनाथ ऐसा आदमी न था, जो साधारण घटना से घबरा जाए अथवा उसमे सोचने-समझने की शक्ति न रहे, किंतु इस घटना ने वास्तव में उसके हाथ…पेर. . फुला दिए । उसकी समझ मे नहीँ आया कि आखिर आग के बेटों को उससे भला व्यक्तिगत रूप से क्या दुश्मनी हो सकती है । उसने अपने पीले पड़े हुए शुष्क अधरों पर जीभ फेरी, परेशानी की स्थिति मेँ गालो पर हाथ फेरा और फिर उसकी आखें उस लाल कागज पर जम गई…जो उसे अभी कुछ समय पूर्व ही प्राप्त हुआ था । उसकी परेशानी का कारण यही कागज़ था ।

परेशानी की हालत मे उसने माथा थाम लिया और फिर उन अक्षरों को पढने लगा…जो टाइप किए हुए थे । जैसे जैसे वह उस कागज को पढता गया…वेसे-बैसे उसकी आखो' से चिता झाकने लगी-होंठों की शुष्कता मे चार चांद लग गए, माथे पर पसीने की बूदों में वृद्धि, हो गई ।

हालाँकि इस समय उसने वह कागज पांचबी अथवा छठी बार पढा. था-किन्तु न जाने क्यों वह कापकर रह जाता ।

रघुनाथ ने घडी देखी और फिर कुछ निश्चय करके फोन विजय से मिलाकर बोला----" हैलो ! मै रघुनाथ बोल रहा हू।"

……"कौन मेघनाथ ? अरे. भईं कलियुग में मेघनाथ. कहां से आ गया ?"

दूसरी और से विजय जानबूझकर शरारत कर रहा है-यह आभास पाकर रघुनाथ बुरी तरह से झुझलाकर बोला "विज़य! मै रघूनाथ बोल रहा हूं।"

"अरे भाई बड़े विचित्र आदमी हे…आप । अभी-अभी आप कह रहे थे कि आप मेघनाथ हे और अब अपने-आपको बैद्यनाथ बता रहे है । भाई, बैद्यनाथ नाम का मेरा कोई दोस्त नहीं है I”

-"बिजय, गंभीर हो जाओं…मेरी बात सुनो ।" इस समय रघुनाथ की विचित्र-सी स्थिति हो गई थी । उसे इस समय विजय का मजाक, बहुत ही बुरा लगा था ।

…"अच्छा--प्यारे तुलाराशि बोल रहे हैं ।".विजय चहककर बोला…"प्यारे तुलाराशि-क्या आज सुबह-सुबह झकझकी सुनने का मूड बन गया है ? हम जानते थे रघु डार्लिग कि एक…न-एक दिन तुम हमारी झकझकिर्यों की महानता का महत्त्व समझोगे¸ औंर वह तुम्हारी रातो की नीद छीन लेगी तभी तो आज़ सुबह-सुबह हमें फोन मारा हे, लेकिन घबराओ नहीं प्यारे-हम तुम्हें निराश नहीं करेगे । अत: तुम्हारी सेवा मे एक महान औंर नबीन झकझकी पेश है ।"

इससे पूर्व कि रघुनाथ कुछ बोले, विजय ने सम्पूर्ण भाषण दे डाला । वह सास लेने के लिए थमा और इससे कि वह झकझकी की एक भी पंक्ति सुनाए…रघुनाथ शीघ्रता से बोला !!

"विजय. . मुझे आग के बेटों का पत्र मिला है ।"

" अवश्य मिला होगा प्यारे । हां तो हमारी यह महान झकझकी ये है ।” कहते हुए बिजय ने झकझकी बाकायदा मिक्सी धुन पर गाकर सुनाई ।

"राजेश खना हंस रहे, डिम्पल के संग।

ये नजारे देखकर, अंजू रह गई दंग I

अंजू रह गई दंग I तैश उसकै बाप को आया ।

इतना सुन लोग. बोले, ये कैसा कलियुग आया ।”

बिजय, प्लीज, गंभीर हो जाओं, स्थिति. बहुत गभीर है I” रघुनाथ गिडगिडाया.. ।।

" गभीर तो आज तक हमारा बाप मी नहीँ हुआ तुलाराशि ।" विजय उसी प्रकार बोला…"वैसे तुम सुनाओ हमारे यार आग के बेटों का क्या सदेश है ??"

"विजय उन्होंने इस बार व्यक्तिगत रूप से मुझे धमकी दी है । पता नहीं उन्हें मुझसे क्या शत्रुता है ? उन्होंने मुझें अब भयानक चैलेज दिया है ।"

"'अबे प्यारे तुलाराशि-बको भी क्या चैलेंज दिया ?"

"विजय उन्होंने तुम्हारी भाभी का अपहरण करने की धमकी दी है I”

~ “ क्या रैना भाभी ?" वास्तव मे विजय चोंक पडा l

“ हां विजय I” रघुनाथ के लहजे… मे परेशानी स्पष्ट झलक रही थी "उन्होंने इस बार व्यक्तिगत रूप से मुझे चैलेंज दिया है, उनका कहना है कि ठीक दस बजे आकर वे रैना को ले जाएगे।"

"लेकिन प्यारेलाल क्यों ? तुमसे अथवा रैना भाभी से उन्हें क्या शत्रुता हो सकती है ??"

"मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा है विजय-तुम्ही… सोचो कि अब क्या किया जाए ?"

" खैर प्यारे…तुम वो पत्र सुनाओ, जिसमे वह धमकी दी गई है !"

रघुनाथ की आखें फिर उस कागज पर जम गई…शुष्क होंठों पर जीभ फेरी और पत्र पढना प्रारम्भ किया l

बिजय ध्यानपूर्वक सुन रहा था ।

प्यारे रघुनाथ,

आप लोगों नै हमें, हमारे पहले कार्य में सहयोग दिया । सर्वप्रथम इसके लिए आप लोगों को धन्यवाद । हम आशा करते है कि आप लोग हमें हमारे जनकल्यान के प्रत्येक कार्य में इसी तरह सहयोग देते रहेगे।

आखिर तुम भी पुलिस के एक जिम्मेदार अधिकारी हो । अतः तुम भी जनकल्याण के पक्षपाति तो हो ही ।

हम जानते हैं कि तुम अपनी बीबी रैना सै बहुत अधिक प्यार करते हो यह प्यार इतना बढ गया हैं `कि तुम कभी-कभी रैना कै प्यार में अपने कर्तव्यों को भी भूल जाते हो जबकि ज़नकल्याकारिर्यों की दृष्टि में ये लेशमात्र भी ठीक नहीं हैं । किसी के व्यक्तिगत प्यार के लिए कोई अपने कर्तव्य को भूल जाए, यह बात जनकल्याणकारीयो की दृष्टि में तनिक भी उपयुक्त नही । अतः तुम- अपना सम्पूर्ण ध्यान अपने कर्तव्य ही की रख सको इसलिए हम तुम्हारी पत्नी रैना की ठीक दस बजे लेने आ रहे हैं, फिर रैना तुम्हें कभी नही मिलेगी , ताकि तुम जीवनपर्यत अपना ध्यान अपने कर्तव्यों पर केंद्रित कर सको और जन कल्यान कै जीते रहो I

अच्छा अब ठीक दस बजे मुलाकात होगी । आशा है हमारी जनकल्याण की भावनाओं को समझोगे और हमारे कार्य में बाधा उत्पन करने कै स्थान पर हमें सहयोग प्रदान करोगे। I

आप ही के दोस्त जनकल्याणकारी।

आग के बेटे ।।।

" ओह । ये बात है प्यारे तुलाराशि ।" विजय बोला ।

--"विजय, देखो नौ बज चुके हैँ-उनके द्वारा दिए गए चैलेंज मे सिर्फ एक घंटा शेष रह गया हैं l शीघ्रता से सोचो, क्या किया जाए ?" परेशान रघुनाथ बोला । ..

" सोचने की आवश्यकता है प्यारे तुलाराशि । साले लगता है तुम वास्तव मे अब असली सरकारी सांड नहीं रहे हो । अत: आग के बेटे अच्छा ही कर रहे है ।"

"प.....प्लीज, मजाक नहीं ।"

" खैर प्यारे-ये बताओ तुम्हें ये पत्र मिला कैसे ??"

" सुबह सोकर उठा ही था कि मैने इसे अपनी मेज पर रखा पाया । यह मेज पर पेपरवेट से दबा रखा था I"

" तो ठीक है प्यारे लाल----अब आग कै बेटों की प्रतिक्षा करो !" दूसरी ओर से विजय ने कहा और तुरत ही फोन रख दिया । ~

फोन रखने की आवाज़ रघुनाथ को ऐसी लगी जेसे किसी. . ने उसके सीने मे हथोडा मार दिया हो । हाथ मे रिसीवर लटकाए ~ वह बुत-स्रा खडा रहा । वह जानता था कि मुसीबत मे अपने भी पराए हो जाते हैं-तभी तो विजय' ने भी समय की गभीरता को बिना समझे ही मजाक मे उड़ा दिया । उसे लगा जेसे इस समय वह बिल्कुल अकेला हो । उसे. लगा कि जैसे वह आग के बेटों को रोक न सकेगा । अभी वह रिसीवर हाथ मेँ लिए विचारों में ही खोया हुआ था कि एकाएक चौंक पडा । .

…" क्या बात है ? आज़ आप सुबह-सुबह किसे फोन कर रहे हैं ?"

"ऐ ! ” रघुनाथ चौक पडा । उसने सामने खडी रैना को देखा जो हाथ मे चाय लिए खडी थी ।

वह स्वय को सभालता हुआ बोला…'"किसी को नहीं किसी को भी तो नहीं !" कहते हुए उसने तुरत ही रिसीवर को रख दिया और मुस्कराने का असफल प्रयत्न किया ।

"अरे !" रैना उसके हाथ मे दबे आग के वेर्टों के -पत्र की ओर सकैत करते बोली-" ये आपके हाथ मे क्या है ? औ इसका रग तो लाल है । क्या बात है ? आप परेशान लग रहे है ?"

" कुछ नहीं यू ही जरा-लाओ तुम चाय दो ।" रघुनाथ ने बात को टालने का प्रयास किया ।

किंतु रैना की नजरों से छुप न सका उसने चाय मेज पर रखी और रघुनाथ की ओर बढती हुई बोली…"पति नहीं आप हर बात मुझसे क्यो छिपाते हैं ? दिखाइए, क्या है ये ??"

"कुछ नहीं तुम्हारे मतलब की चीज नहीँ हे ये । लाओ चाय दो ।"

रघुनाथ पीछे हटता हुआ बोला ।

'रैना भी भला इस प्रकार कहा मानने बाली थी । कुछ समय तक तो दोनों मे छीना…झपटी होती रही अत मे रेना पत्र

लेने में कामयाब हो गई I

रघुनाथ माथा. पकडकर पंलग पर बैठ गया I
 
रैना ने पत्र पढना, आरम्भ किया ।

पढते-पढते, उसकी विचित्र-सी हालत हो गई । उसका मुख पीला पड… गया I उसकी आखों मे भय झाक्रने लगा । नजरे उठाकर उसने सामने लगे घंटे को देखा-जो सवा नौ बजने का सकेत कर रहा था।।

रैना के माथे पर भी पसीने की बूदों का साम्राज्य हो गया ।

कुछ सोचकर वह फोन की तरफ बढी तथा नंबर रिग करने लगी तो रघुनाथ बोला…"क्या करने जा रही हो किसे फोन कर रही हो ?”

"ठाकुर साहब को I" गभीरता के साथ रैना बोली ।

न जाने क्यो रघुनाथ चुप रह गया…वह कुछ भी कह न सका ।।

इधर रैना ने ठाकर साहब सै सबघ स्थापित होने पर कहा-"हैलो ! पिताजी मैं रैना बोल रही हू।"

" अरे रैना बेटी-आज सुबह-ही-सुबह कैसे ?"

--"पिताजी आपके अपराधियों ने हमें भयानक चैलेज़ दिया है ।" रैना का स्वर भयभीत था ।

"क्या मतलब ? कैसे अपराधी किसको' चैलेंज?" ठाकुर साहब चौंके I

"आग कै बेटों का चैलेज-" हमारे लिए I" रैना ने फिर कहा और उसके बाद उसने समूचा पत्र फोन पर ठाकुर साहब को सुना दिया ।

सुनकर ठाकूर साहब भी स्तब्ध रह गए I उनकी समझ मे नहीं आया कि ये आग के बेटे आखिर क्या हे ? इनका अखिर उद्देश्य क्या है?? किंतु फिर भी वे स्वय पर सयम पाकर बोले।

"घबराने की क्रोई बात नहीं है वेटी इस बार आग के बेटे किसी भी कीमत पर अपने अभियान मे सफल नहीं हो सकेंगे । इस बार भयानक ढग से उनका सामना किया जाएगा I घबराओ मत I रघुनाथ कहा है उसे फोन दो । " I

तब…जबकि फोन पर रघुनाथ बोला तो ठाकुर साहब बोले…"रघुनाथ बडे शर्म की बात है कि पुलिस के इतने बडे अधिकारी होते हुए भी छोटी-सी परेशानी से घबरा गए । ध्यान रहे…इस बार आग के बेटे किसी भी क्रीमत पर सफ़ल नहीं हो सकते । इस बार टैकों से उनका सामना किया जाएगा ।"

"ओके सर I" रघुनाथ ने स्वय को सयत किया और अलर्ट होकर कहा ।

उसके बाद ।।

र्सिंर्फ । पद्रह मिनट के अदर-अदर यह समाचार समस्त राजनगर में विद्युत-तरंगों` की 'भाति० प्रसारित हो गया । एक बार फिर समस्त राजनगर पर आतक का साम्राज्य था । सुनते ही सबका रुख रघुनाथ की कोठी होता , आग के बेटों के साथ इस बार पुलिस का चेलेजं भी प्रसारित किया गया था जिसमेँ कहा गया था कि इस बार किसी भी कीमत पर आग कै बेटे अपने अभियान में सफल नही होंगे । इस बार आग के बेटों का स्वागत मौत करेगी । अगले पद्रह मिनटों में पाच टैकों ने न सिर्फ रघुनाथ की कोठी को घेर लिया बल्कि अन्य सडकों. पर भी तीन अन्य टैंक आग के बेटों का स्वागत करने हेतु तत्पर थे ।सेना के जवान टॉमीगनों से लैस थे , राजनगर के सागरीय तट पर न सिर्फ अनेकों स्टीमरों का जाल था, बल्कि सागर के गर्भ मे नेवी के विख्यात जहाजों द्वारा सचालित अनेकों पनडुबियों का सुदृढ. जाल फैला हुआ था । ताकि आग के बेटों का अत तक स्वागत किया जा सकै । वास्तव में इस बार वे अपने प्रयासो में सफलता अर्जित न कर सकेंगे, क्योकि वास्तव में इस बार उनका स्वागत मोत करेगी ।

घडी की सुइया निरंतर बढ रही थीं । लोग दस बजने की प्रतीक्षा कर रहे थे । ऐसे समय मे एक इसान के मुख पर विचित्र-सी शरारतपूर्ण मुस्कान थी ।।

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उस रहस्यमय और विचित्र नकाबपोश के आगमन पर कई परिबर्तन एक साथ हुए थे । वहा उपस्थित समस्त इसान आदर के साथ झुक गए ।

समस्त हाल का प्रकाश मानो सिमटकर बस उस विचित्र नकाबपोश के जिस्म मे समाता चला जा रहा था ।

सपूर्ण हॉल में धुंध…सी छा गई । समस्त प्रकाश उस रहस्यमय . .नकाबपोश ने अपने अदर जब्त कर लिया था l वह एक लबा-चौडा और गोल हॉल था-जिसमे लगभग बीस खतरनाक किस्म के व्यक्ति खडे थे । उपस्थित समस्त व्यक्तियों के जिस्म पर एक-से ग्रीन व चुस्त लिबास थे I सबके सिरों पर लाल केप थी । वे हाँल में अपने-अपने स्थानों पर शात खडे थे । हाल के स्टेज पर वह विचित्र नकाबपोश प्रकट हुआ था ।

जिसके जिस्म पर कैसा लिबास है यह तो अघिक प्रकाश होने कै कारण कुछ स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था किंतु फिर भी उस नकाबपोश के नकाब के कुछ कण ऐसे थे जो सुनहरे थे यानी उसके जिस्म पर सुनहरे लिबास के साथ एक सुनहरा नकाब भी था । एक नजर मेँ वह इंसान न लगकर सिर्फ इसानी आकृति ही प्रतीत होता था क्योकि उसका सपूर्ण जिस्म प्रकाश से जगमगा रहा था I उसके सारे जिस्म पर अनेकों बल्ब लगे हुए थे वे भिन्न-भिन्न रगों के थे तथा जगमगा रहे थे । सिर्फ चेहरे वाला भाग अंधकार में विलुप्त था, किंतु नकाब पर किसी अत्यत चमकीले पदार्थ से 'आग के बेटे' शब्द लिखा गया था । उसके सपूर्ण' जिस्म पर बल्ब जगमगा रहे थे । उसके आगमन पर हाँल में उपस्थित सभी लोग आदर¸के साथ झुक गए । उन सभी के सीने पर वही आग के बेटे लिखा हुआ था ।

कुछ समय तक हाल मेँ मौत जैसा सन्नाटा छाया रहा ।

अचानक हाॅल मे विचित्र-सी भिनभिनाहट के साथ कुछ शब्द गूंजने लगे-"आग के बेटे आग की देबी को सलाम पहुचाते है ।ये शब्द उस रहस्यमय नकाबपोश के मुख से निकले थे जिसके आगमन पर अन्य सभी आग के बेटे एक बार फिर आदर के साथ झुक गए ।

उसके बाद रहस्यमय नकाबपोश की भिनभिनाहट फिर गूंजी…"वेटा नबर जर्फीला सेशन ।”

…'"यस महान आग के स्वामी ।" हाल मेँ उपस्थित एक .इसान आगे बढकर बोला…जिसको शायद जर्फीला सेशन नबर से सबोघित किया था ।

"क्या तुमने राजनगर मे उडता समाचार सुना ?”

आग के स्वामी की भिनभिनाहट ।

"'सब कछ आश्चर्यजनक है…महान आग के स्वामी ।" जर्फीला सेशन बोला I

"हम लोगों ने रघुनाथ के यहा ऐसा कोई भी पत्र नहीं ~ भेजा जिसकी चर्चा समस्त राजनगर में फैली हुई है । जिस समाचार के फैलने पर भारतीय सेना का जाल बिछा हुआ है । वे शायद आग के बेटों से टकराना चाहते है लेकिन हम आग

कै बेटे जनकल्यत्माकारी है । अत: व्यर्थ की मार-काट पसद नहीं करते और वैसे भी वह धमकी हम लोगों ने नही दी है । अगर वास्तव में रैना के अपहरण… का हमारा इरादा होता तो हम लोग वहा अवश्य जाते और सारे इंतजाम भला हमे क्या हानि पहुचा सकते थे किन्तु जब यह धमकी हमने दी ही नहीं तो फिर हम व्यर्थ ही क्यो उनसे टकराए । आग के स्वामी के ये शब्द सारे हाल में गुजे ।

"लेकिन महान स्वामी ।" जर्फीला सेशन आदर के साथ बोला;-- "ये बात तो हमारे लिए भी आश्चर्यजनक है कि हमारे नाम से ये धमकी आखिर दी किन लोगों ने है ? उनका उद्देश्य क्या है ? उन लोगों ने भी अपने-आपको आग के बेटे ही क्यों कहा ?"

" नंबर जर्फीला सेशन ।" आग का स्वामी अपनी बिशेष आबाज में बोला "यही तो एक गुत्थी है-जिसको सुलझाने. मे तुम्हें अपने पाच साथियों के साथ साधारण कपडों मे रघुनाथ नाथ की कोठी पर जाकर दस बजे देखना है कि आखिर ये धमकी किसने और किस उद्देश्य से दी है ?"

"जैसी आज्ञा महान स्वामी…हम वह्म जाएगे I” जर्फीला सेशन बोला I

. . उसके बाद स्टेज से ‘आग का स्वामी' विलुप्त हो गया ।

उसके जात्ते ही समस्त हाँल में प्रकाश जगमगा उठा । जर्फीला सेशन अपने साथियों का चुनाव करने लगा ।

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