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यह दूसरी बात है कि विजय ने फोन पर रघुनाथ की बात को मजाक में उडा दिया था जबकि हकीकत यह थी कि बिजय आग के बेटों का चेलेंज सुनकर चिंतित हो उठा । वास्तव में आग के बेटों द्धारा दिया. गया ये चैलेंज बडा विचित्र था । बिजय की समझ नही आ रहा था कि आग के बेटों की व्यक्तिगत रूप से रघुनाथ अथवा रैना से क्या शत्रुता हो सकती है ? कुछ देर तक वह सोचता रहा।।
अभी वह बिस्तर मे ही था कि रघुनाथ का फोन मिला । कुछ सोचकर वह उठा और अपने प्राइवेट रूम में पहुँचा तथा फोन पर नबर रिग करके पवन के रूप में भर्राए-से स्वर में . बोला… " हैलो मिस आशा I"
"यस चीफ! " दूसरी और से आशा का एकदम सतर्क स्वर सुनाई दिया ।
"शहर में उडता समाचार तुम तक पहुच गया होगा ?" विजय पवन कै भर्राए स्वर में बोला ।।
"यस सर रैना भाभी के आहरण की धमकी वाला समाचार !"
" तुम तुरत अन्य एजेंटों' को भी आदेश दें दो…वे फौरन रघुनाथ की कोठी पर पहुच जाएं । इस बार किसी भी कीमत पर आग के बेटे सफल नहीं होने चाहिए ।"
-"ओके सर ।" दूसरी ओर से आशा के शब्द सुनते ही विजय ने तुरत सबध'…विच्छेद कर दिया । फिर कुछ देर… तक खडा सोचता रहा और पुनः नबर रिग किए…दूसरी आरै से उसके पिता ठाकुर साहब की आबाज गूजी ।
" हैलो । कौन है ?"
, . . "'ठाकुर !" विजय पवन के-से भर्राए हुए स्वर मे बोला---" शहर में दो घटे के लिए कर्पयूं लगा दो I”
" जैसी आज्ञा सर ।" दूसरी ओर से पवन का भर्राया हुआ स्वर सुनकर ठाकुर साहब एकदम सतर्क हो गए । वे जानते थे कि भर्राई हुई ये आवाज़ स्रीकेट सर्विस के चीफ़ की होती है । उनके आदेश का पालन प्रत्येक कीमत पर किया जाता है क्योंकि सीक्रेट सर्विस भारत की सर्वोत्तम जासूसी सस्था हे । पद की दृष्टि. से पवन ठाकुर साहब से उच्व पदाधिकारी है । अत: प्रत्येक, आदेश का पालन करना उनका कर्तव्य है, किन्तु वह क्या जानते थे कि इसका वास्तविक अधिकारी उनका वही कुपुत्र है, जिसे उन्होंने आवारा, गुडा, बदचलन जैसी… अनेकों उपाधियों से सम्मानित करके घर से निकाल रखा हे l वे क्या जानते थे अपने उसी बदचलन बेटे की वास्तविकता ।
विजय ,ने तुरंत सबध-विच्छेद कर दिया । उसे पूर्ण विश्वास था कि अजले कुछ ही क्षणों में उसके आदेशानुसार कर्फ्यू लगा दिया जाएगा l
वह शीघ्रता से तैयार होने लगा और अगले पाच मिनटों में उसकी कार तीव्र वेग से रघुनाथ की कोठी की ओर जा रही थी । वह लापरवाही से सीटी बजाता हुआ कार ड्राइव कर रहा था । इस समय उसने कोई मेकअप नहीं किया था । वह अपनी वास्तविक सूरत मे छैला बना हुआ. था ।
. ठीक पांच मिनट पश्चात विजय रघुनाथ कौ कोठी पर पहुचाI
तभी पुलिस जीपे कर्फ्यू की घोषणा करती हुईं उधर आ निकली ।
लोगों की भीड छंटने लगी-जो लोग नहीं. गए उन्हे सख्ती के साथ सेना ने कट्रोल किया । विजय ने अभी कोठी में कदम रखा ही था कि बिकास दौडते हुए उसके निकट आया और लगभग चीखा-"नमस्ते I झकझकिए अकल ।"
" नमस्ते प्यारे दिलजले ।" विजय मुस्कराता हुआ बोला--- "ये क्या कबाडा फैला रखा है ?"
" पता नही अंकल कोई बता नहीं रहा कि बात क्या है…आप ही बताइए न अकल ?"
"अबे ओ मिया दिलजले तुम्हें और न पता हो ?” विजय एक प्यार-भरा चपत बिकास के प्यारे कपोल पर मारता हुआ बोला I
तभी रघुनाथ उनके निकट आकर बोला…"विजय फोन पर तुमने मेरी बात को मजाक समझा था फिर अब......!"
" ये समय-समय की बात है प्यारे तुलाराशी तुम ये बताओ भाभी कहा है ?” विजय आंख मारता हुआ बोला l
तभी रघुनाथ ने विकास से कहा--- "तुम अदर जाओ बिकास!!
विकास महाशय मुह लटकाए अदर क्री और रेगे I बिकास के चले जाने के पश्चात रघूनाथ धीरे से बिजय के कान में बोला---" विकास को इस बारे मे कुछ नहीं बताया गया हे l वह बार-बार पूछ रहा है कि इस बार आग के बेटे यहां क्या करने आ रहे है ? किंतु वास्तविकता उसे किसी ने नहीं बताई है। आखिर बच्चा ही तो है…रैना समझदार होकर घबरा रही है तुम भी विकास से कुछ न कहना I"
"प्यारे तुलाराशि I" बिजय मुस्कराता हुआ बोला-…"वास्तविकता पूछो तो भगबान से जरा-सी भूल हो गई I इस साले विकास को भूल से तुम्हारा लडका और हमारा भतीजा वना दिया । वास्तव में यह हमारा और तुम्हारा बाप है और रही सही कसर उस साले लूमड़ ने पूरी का दी । मैं देख रहा हूं कि तुम घबरा रहे हो लेकिन दावे से यह कह सकता हूं कि विकास यह जानने के बाद भी नहीं घबराएगा क्योकि उसका गुरु ही साला लुमड है ।"
. . "लेकिन फिर भी विजय-…विकास हमारे लिए तो बच्चा ही है I"
"खैर ठीक है । तुम ये बताओ भाभी कहा है ?"
"अदर वाले कमरे में ।" रघुनाथ घडी देखता हुआ बोला जिसमेँ दस बजने में पाच मिनट शेष थे I तभी रघुनाथ के दिमाग को तीव्र झटका लगा । विजय ने उसके चेहरे के भावो . मे परिबर्तन स्पष्ट देखा था-औंर उस समय वह' चौके बिना न रहा सका जब रघुनाथ का रिवाॅल्बर एक झटके के साथ होलस्टर से निकलकर उसके हाथ में आ गया और वह उसे विजय की ओर तानकर कडे स्वर मेँ गुर्राया । ~
"ठहरो इसकी क्या गारंटी है कि तुम बिजय हो ?!" अगले ही पल बिजय के अधरों पर मुस्कान बिखर गई I
अजीब-से लहजे मे वह बोला-"इसकीं क्या गारटी है कि तुम हमारे प्यारे तुलाराशी . हो ?"
"बको मत l" रघुनाथ सख्त स्वर में गुर्राया तथा विज़य क्री आखों मे झांका---
. "इन बेकार को बातों में समय गवाने के स्थान पर समय का सदुपयोग करोगे तो अधिक बुद्धिमानी होगी प्यारे । वेसे खुशी हुई कि तुम काफी सतर्कता बरत रहे हो । ध्यान रखो आग के बेटे किसी के मेकअप मे नहीं बल्कि आग की लपटों में लिपटे हुए होंगे !"
तत्पश्चात रघुनाथ ने पूरी तसल्ली कर ली कि सामने. खडा व्यक्ति वास्तव में विजय के अतिरिक्त कोई नहीं है तो विजय को रैना का कमरा बता दिया । मुस्ककराता हुआ विजय रैना के कमरे की ओर बढ गया ।
रैना का कमरा भीतर से बद था-जिसमेँ रैना के साथ पाच सेना के जबान उपस्थित थे । उसने कमरा खुलवाया और अंदर प्रबिष्ट हुआ ।
उसे देखते ही रैना उठी और बोली ----" बिज़य भैया I" अभी रैना आगे कुछ कहने ही जा
"अरे भाभी हमारे होते घबरा रही हो…अरे हम आ गए हैं ठाकुर के पूत । हम साले इन आग कै बेटों को छठी का दूध याद दिला I" विजय ने यह शब्द कछ इस प्रकार सीना अकडाकर कहे थे कि पांचो मिलिट्री वालों के साथ स्वय रैना भी बिना मुस्कराए न रह सकी थी ।।
तभी कमरे में विकास प्रविष्ट हुआ और बोला… "हेलो अंकल…यहा घर क्या हो रहा है ? अगर आप नहीं बताना चाहते तो मत बताइए…लेकिन अंकल एक नई बनाई हुई दिलज़ली तो सुनिए !"
"विकास तुम हमेशा शैतानी......!"
"औफ्फो भाभी...." विजय बीच मे ही बोला---"तुम्हें किस मूर्ख ने यह अधिकार दिया कि तुम चाचा-भतीजे के बीच में बोलो । क्यों मिया दिलजले…हम ठीक कह रहे हैं न ?”
अतिम शब्द विजय ने विकास को ओर देखकर कहे थे, इससे पूर्व कि विकास कुछ कहे रैना बोली ।
"तुम इस शैतान को सिर पर चढाते जा रहे हो भैया ।"
"घबराओ नहीं भाभी हमारा सिर भी बहुत ऊचा है, वहा तक पहुचने के लिए तो अभी दिलजले को बहुत पापड बेलने पडेगें I हा तो मिया दिलजले पेश करो अपनी दिलजली और जला दो हमारा दिल । ऐसा जलाना कि आग की लपटें निकलने
लगें किंतु धुंआ नहीं l” बिजय विकास की और देखकर बोला ।
-"हा तो अकल-" ये मैं अपना फर्ज समझता हूं क्रि बिना कर्ज एक दिलजली अर्ज करू । हा तो मैं जौ सुनाता हू उसे ध्यान से सुनो क्योंकि ये दिलजली सप्रेटा घी में तली हुई है । विकास कै कहने के ढग पर विजय बिना मुस्कराए न रह सका ।
जबकि विकास इस बात से बेखबर अपनी दिलजली कुछ इस प्रकार सुना रहा था ,
" एक बार छिड़ गई जंग, चुहो और मच्छरो मे भारी
आकाश कांप गया -- धरती डगमगाई सारी
दोनों ओर ही थे , योद्धा एक से एक भारी !
दुंदुभी बजी--- युद्ध की हो गई तैयारी ।
चुहो में आतक फैला , सैना घबराई सारी ।
क्योंकि मच्छरो में थे, बहादुर छाताधारी ।
इतना सब कुछ देख, धबराए सब नर नारी ।
चुहे थे बेचारे शाकाहारी , मच्छर मासाहारी ।
मच्छरो ने शुरू कर दी , जोरदार बमबारी,
चुहों की सैना घबराई, क्या करती घुडसबारी ।
बच्चों. में आतक़ फैला , चिल्लाई चुहिया सारी,
एक एक मरने लगे---चुहे सब बारी बारी ।
देखकर आया क्रोध, चुहे कै सरदार को ।
आगे बढ़कर ललकारा मच्छरों कै बाप को I
मच्छर बोले ले आओ अपने हिमालयी साँप को,,
किन्तु सरलता सै नही छोडते चुहे भी मैदान को ।
अणुबम डाला मच्छरो ने , सोचा यह बाजी ले गया ।
लेकिन चुहो का सरदार बम को मुँह मे ले गया ।
ली हाजमे की गोली , बम को हजम कर गया ,
दैखकर करिश्मा मच्छरों का सरदार बेहोश होगया ।
फिर क्या था चुहे रूक गए जाते-जाते,,
बम मुह में लैकर गोली सी हजम कर जाते ।
अगर नही भागते मच्छर तो बही मारे जाते ।
रखे रह गए बही सब, उनके छाते वाते !"
"अवे ओं मिया दिलजले l अब अपनी बोलती पर ढक्कन लगा लो । हम कुछ कह नहीं पा रहे हैं तो तुम अपनी दिलजली को राजकपूर की फिल्मी को भाति लम्बी करते जा रहे हो ।" विजय हाथ उठाकर बोला ।
अन्य सभी विकास की दिलजली पर मुस्करा उठे । रैना भी मुस्कराए बिना न रह सकी I
अभी वह बिस्तर मे ही था कि रघुनाथ का फोन मिला । कुछ सोचकर वह उठा और अपने प्राइवेट रूम में पहुँचा तथा फोन पर नबर रिग करके पवन के रूप में भर्राए-से स्वर में . बोला… " हैलो मिस आशा I"
"यस चीफ! " दूसरी और से आशा का एकदम सतर्क स्वर सुनाई दिया ।
"शहर में उडता समाचार तुम तक पहुच गया होगा ?" विजय पवन कै भर्राए स्वर में बोला ।।
"यस सर रैना भाभी के आहरण की धमकी वाला समाचार !"
" तुम तुरत अन्य एजेंटों' को भी आदेश दें दो…वे फौरन रघुनाथ की कोठी पर पहुच जाएं । इस बार किसी भी कीमत पर आग के बेटे सफल नहीं होने चाहिए ।"
-"ओके सर ।" दूसरी ओर से आशा के शब्द सुनते ही विजय ने तुरत सबध'…विच्छेद कर दिया । फिर कुछ देर… तक खडा सोचता रहा और पुनः नबर रिग किए…दूसरी आरै से उसके पिता ठाकुर साहब की आबाज गूजी ।
" हैलो । कौन है ?"
, . . "'ठाकुर !" विजय पवन के-से भर्राए हुए स्वर मे बोला---" शहर में दो घटे के लिए कर्पयूं लगा दो I”
" जैसी आज्ञा सर ।" दूसरी ओर से पवन का भर्राया हुआ स्वर सुनकर ठाकुर साहब एकदम सतर्क हो गए । वे जानते थे कि भर्राई हुई ये आवाज़ स्रीकेट सर्विस के चीफ़ की होती है । उनके आदेश का पालन प्रत्येक कीमत पर किया जाता है क्योंकि सीक्रेट सर्विस भारत की सर्वोत्तम जासूसी सस्था हे । पद की दृष्टि. से पवन ठाकुर साहब से उच्व पदाधिकारी है । अत: प्रत्येक, आदेश का पालन करना उनका कर्तव्य है, किन्तु वह क्या जानते थे कि इसका वास्तविक अधिकारी उनका वही कुपुत्र है, जिसे उन्होंने आवारा, गुडा, बदचलन जैसी… अनेकों उपाधियों से सम्मानित करके घर से निकाल रखा हे l वे क्या जानते थे अपने उसी बदचलन बेटे की वास्तविकता ।
विजय ,ने तुरंत सबध-विच्छेद कर दिया । उसे पूर्ण विश्वास था कि अजले कुछ ही क्षणों में उसके आदेशानुसार कर्फ्यू लगा दिया जाएगा l
वह शीघ्रता से तैयार होने लगा और अगले पाच मिनटों में उसकी कार तीव्र वेग से रघुनाथ की कोठी की ओर जा रही थी । वह लापरवाही से सीटी बजाता हुआ कार ड्राइव कर रहा था । इस समय उसने कोई मेकअप नहीं किया था । वह अपनी वास्तविक सूरत मे छैला बना हुआ. था ।
. ठीक पांच मिनट पश्चात विजय रघुनाथ कौ कोठी पर पहुचाI
तभी पुलिस जीपे कर्फ्यू की घोषणा करती हुईं उधर आ निकली ।
लोगों की भीड छंटने लगी-जो लोग नहीं. गए उन्हे सख्ती के साथ सेना ने कट्रोल किया । विजय ने अभी कोठी में कदम रखा ही था कि बिकास दौडते हुए उसके निकट आया और लगभग चीखा-"नमस्ते I झकझकिए अकल ।"
" नमस्ते प्यारे दिलजले ।" विजय मुस्कराता हुआ बोला--- "ये क्या कबाडा फैला रखा है ?"
" पता नही अंकल कोई बता नहीं रहा कि बात क्या है…आप ही बताइए न अकल ?"
"अबे ओ मिया दिलजले तुम्हें और न पता हो ?” विजय एक प्यार-भरा चपत बिकास के प्यारे कपोल पर मारता हुआ बोला I
तभी रघुनाथ उनके निकट आकर बोला…"विजय फोन पर तुमने मेरी बात को मजाक समझा था फिर अब......!"
" ये समय-समय की बात है प्यारे तुलाराशी तुम ये बताओ भाभी कहा है ?” विजय आंख मारता हुआ बोला l
तभी रघुनाथ ने विकास से कहा--- "तुम अदर जाओ बिकास!!
विकास महाशय मुह लटकाए अदर क्री और रेगे I बिकास के चले जाने के पश्चात रघूनाथ धीरे से बिजय के कान में बोला---" विकास को इस बारे मे कुछ नहीं बताया गया हे l वह बार-बार पूछ रहा है कि इस बार आग के बेटे यहां क्या करने आ रहे है ? किंतु वास्तविकता उसे किसी ने नहीं बताई है। आखिर बच्चा ही तो है…रैना समझदार होकर घबरा रही है तुम भी विकास से कुछ न कहना I"
"प्यारे तुलाराशि I" बिजय मुस्कराता हुआ बोला-…"वास्तविकता पूछो तो भगबान से जरा-सी भूल हो गई I इस साले विकास को भूल से तुम्हारा लडका और हमारा भतीजा वना दिया । वास्तव में यह हमारा और तुम्हारा बाप है और रही सही कसर उस साले लूमड़ ने पूरी का दी । मैं देख रहा हूं कि तुम घबरा रहे हो लेकिन दावे से यह कह सकता हूं कि विकास यह जानने के बाद भी नहीं घबराएगा क्योकि उसका गुरु ही साला लुमड है ।"
. . "लेकिन फिर भी विजय-…विकास हमारे लिए तो बच्चा ही है I"
"खैर ठीक है । तुम ये बताओ भाभी कहा है ?"
"अदर वाले कमरे में ।" रघुनाथ घडी देखता हुआ बोला जिसमेँ दस बजने में पाच मिनट शेष थे I तभी रघुनाथ के दिमाग को तीव्र झटका लगा । विजय ने उसके चेहरे के भावो . मे परिबर्तन स्पष्ट देखा था-औंर उस समय वह' चौके बिना न रहा सका जब रघुनाथ का रिवाॅल्बर एक झटके के साथ होलस्टर से निकलकर उसके हाथ में आ गया और वह उसे विजय की ओर तानकर कडे स्वर मेँ गुर्राया । ~
"ठहरो इसकी क्या गारंटी है कि तुम बिजय हो ?!" अगले ही पल बिजय के अधरों पर मुस्कान बिखर गई I
अजीब-से लहजे मे वह बोला-"इसकीं क्या गारटी है कि तुम हमारे प्यारे तुलाराशी . हो ?"
"बको मत l" रघुनाथ सख्त स्वर में गुर्राया तथा विज़य क्री आखों मे झांका---
. "इन बेकार को बातों में समय गवाने के स्थान पर समय का सदुपयोग करोगे तो अधिक बुद्धिमानी होगी प्यारे । वेसे खुशी हुई कि तुम काफी सतर्कता बरत रहे हो । ध्यान रखो आग के बेटे किसी के मेकअप मे नहीं बल्कि आग की लपटों में लिपटे हुए होंगे !"
तत्पश्चात रघुनाथ ने पूरी तसल्ली कर ली कि सामने. खडा व्यक्ति वास्तव में विजय के अतिरिक्त कोई नहीं है तो विजय को रैना का कमरा बता दिया । मुस्ककराता हुआ विजय रैना के कमरे की ओर बढ गया ।
रैना का कमरा भीतर से बद था-जिसमेँ रैना के साथ पाच सेना के जबान उपस्थित थे । उसने कमरा खुलवाया और अंदर प्रबिष्ट हुआ ।
उसे देखते ही रैना उठी और बोली ----" बिज़य भैया I" अभी रैना आगे कुछ कहने ही जा
"अरे भाभी हमारे होते घबरा रही हो…अरे हम आ गए हैं ठाकुर के पूत । हम साले इन आग कै बेटों को छठी का दूध याद दिला I" विजय ने यह शब्द कछ इस प्रकार सीना अकडाकर कहे थे कि पांचो मिलिट्री वालों के साथ स्वय रैना भी बिना मुस्कराए न रह सकी थी ।।
तभी कमरे में विकास प्रविष्ट हुआ और बोला… "हेलो अंकल…यहा घर क्या हो रहा है ? अगर आप नहीं बताना चाहते तो मत बताइए…लेकिन अंकल एक नई बनाई हुई दिलज़ली तो सुनिए !"
"विकास तुम हमेशा शैतानी......!"
"औफ्फो भाभी...." विजय बीच मे ही बोला---"तुम्हें किस मूर्ख ने यह अधिकार दिया कि तुम चाचा-भतीजे के बीच में बोलो । क्यों मिया दिलजले…हम ठीक कह रहे हैं न ?”
अतिम शब्द विजय ने विकास को ओर देखकर कहे थे, इससे पूर्व कि विकास कुछ कहे रैना बोली ।
"तुम इस शैतान को सिर पर चढाते जा रहे हो भैया ।"
"घबराओ नहीं भाभी हमारा सिर भी बहुत ऊचा है, वहा तक पहुचने के लिए तो अभी दिलजले को बहुत पापड बेलने पडेगें I हा तो मिया दिलजले पेश करो अपनी दिलजली और जला दो हमारा दिल । ऐसा जलाना कि आग की लपटें निकलने
लगें किंतु धुंआ नहीं l” बिजय विकास की और देखकर बोला ।
-"हा तो अकल-" ये मैं अपना फर्ज समझता हूं क्रि बिना कर्ज एक दिलजली अर्ज करू । हा तो मैं जौ सुनाता हू उसे ध्यान से सुनो क्योंकि ये दिलजली सप्रेटा घी में तली हुई है । विकास कै कहने के ढग पर विजय बिना मुस्कराए न रह सका ।
जबकि विकास इस बात से बेखबर अपनी दिलजली कुछ इस प्रकार सुना रहा था ,
" एक बार छिड़ गई जंग, चुहो और मच्छरो मे भारी
आकाश कांप गया -- धरती डगमगाई सारी
दोनों ओर ही थे , योद्धा एक से एक भारी !
दुंदुभी बजी--- युद्ध की हो गई तैयारी ।
चुहो में आतक फैला , सैना घबराई सारी ।
क्योंकि मच्छरो में थे, बहादुर छाताधारी ।
इतना सब कुछ देख, धबराए सब नर नारी ।
चुहे थे बेचारे शाकाहारी , मच्छर मासाहारी ।
मच्छरो ने शुरू कर दी , जोरदार बमबारी,
चुहों की सैना घबराई, क्या करती घुडसबारी ।
बच्चों. में आतक़ फैला , चिल्लाई चुहिया सारी,
एक एक मरने लगे---चुहे सब बारी बारी ।
देखकर आया क्रोध, चुहे कै सरदार को ।
आगे बढ़कर ललकारा मच्छरों कै बाप को I
मच्छर बोले ले आओ अपने हिमालयी साँप को,,
किन्तु सरलता सै नही छोडते चुहे भी मैदान को ।
अणुबम डाला मच्छरो ने , सोचा यह बाजी ले गया ।
लेकिन चुहो का सरदार बम को मुँह मे ले गया ।
ली हाजमे की गोली , बम को हजम कर गया ,
दैखकर करिश्मा मच्छरों का सरदार बेहोश होगया ।
फिर क्या था चुहे रूक गए जाते-जाते,,
बम मुह में लैकर गोली सी हजम कर जाते ।
अगर नही भागते मच्छर तो बही मारे जाते ।
रखे रह गए बही सब, उनके छाते वाते !"
"अवे ओं मिया दिलजले l अब अपनी बोलती पर ढक्कन लगा लो । हम कुछ कह नहीं पा रहे हैं तो तुम अपनी दिलजली को राजकपूर की फिल्मी को भाति लम्बी करते जा रहे हो ।" विजय हाथ उठाकर बोला ।
अन्य सभी विकास की दिलजली पर मुस्करा उठे । रैना भी मुस्कराए बिना न रह सकी I