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आग के बेटे / complete

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यह दूसरी बात है कि विजय ने फोन पर रघुनाथ की बात को मजाक में उडा दिया था जबकि हकीकत यह थी कि बिजय आग के बेटों का चेलेंज सुनकर चिंतित हो उठा । वास्तव में आग के बेटों द्धारा दिया. गया ये चैलेंज बडा विचित्र था । बिजय की समझ नही आ रहा था कि आग के बेटों की व्यक्तिगत रूप से रघुनाथ अथवा रैना से क्या शत्रुता हो सकती है ? कुछ देर तक वह सोचता रहा।।

अभी वह बिस्तर मे ही था कि रघुनाथ का फोन मिला । कुछ सोचकर वह उठा और अपने प्राइवेट रूम में पहुँचा तथा फोन पर नबर रिग करके पवन के रूप में भर्राए-से स्वर में . बोला… " हैलो मिस आशा I"

"यस चीफ! " दूसरी और से आशा का एकदम सतर्क स्वर सुनाई दिया ।

"शहर में उडता समाचार तुम तक पहुच गया होगा ?" विजय पवन कै भर्राए स्वर में बोला ।।

"यस सर रैना भाभी के आहरण की धमकी वाला समाचार !"

" तुम तुरत अन्य एजेंटों' को भी आदेश दें दो…वे फौरन रघुनाथ की कोठी पर पहुच जाएं । इस बार किसी भी कीमत पर आग के बेटे सफल नहीं होने चाहिए ।"

-"ओके सर ।" दूसरी ओर से आशा के शब्द सुनते ही विजय ने तुरत सबध'…विच्छेद कर दिया । फिर कुछ देर… तक खडा सोचता रहा और पुनः नबर रिग किए…दूसरी आरै से उसके पिता ठाकुर साहब की आबाज गूजी ।

" हैलो । कौन है ?"

, . . "'ठाकुर !" विजय पवन के-से भर्राए हुए स्वर मे बोला---" शहर में दो घटे के लिए कर्पयूं लगा दो I”

" जैसी आज्ञा सर ।" दूसरी ओर से पवन का भर्राया हुआ स्वर सुनकर ठाकुर साहब एकदम सतर्क हो गए । वे जानते थे कि भर्राई हुई ये आवाज़ स्रीकेट सर्विस के चीफ़ की होती है । उनके आदेश का पालन प्रत्येक कीमत पर किया जाता है क्योंकि सीक्रेट सर्विस भारत की सर्वोत्तम जासूसी सस्था हे । पद की दृष्टि. से पवन ठाकुर साहब से उच्व पदाधिकारी है । अत: प्रत्येक, आदेश का पालन करना उनका कर्तव्य है, किन्तु वह क्या जानते थे कि इसका वास्तविक अधिकारी उनका वही कुपुत्र है, जिसे उन्होंने आवारा, गुडा, बदचलन जैसी… अनेकों उपाधियों से सम्मानित करके घर से निकाल रखा हे l वे क्या जानते थे अपने उसी बदचलन बेटे की वास्तविकता ।

विजय ,ने तुरंत सबध-विच्छेद कर दिया । उसे पूर्ण विश्वास था कि अजले कुछ ही क्षणों में उसके आदेशानुसार कर्फ्यू लगा दिया जाएगा l

वह शीघ्रता से तैयार होने लगा और अगले पाच मिनटों में उसकी कार तीव्र वेग से रघुनाथ की कोठी की ओर जा रही थी । वह लापरवाही से सीटी बजाता हुआ कार ड्राइव कर रहा था । इस समय उसने कोई मेकअप नहीं किया था । वह अपनी वास्तविक सूरत मे छैला बना हुआ. था ।

. ठीक पांच मिनट पश्चात विजय रघुनाथ कौ कोठी पर पहुचाI

तभी पुलिस जीपे कर्फ्यू की घोषणा करती हुईं उधर आ निकली ।

लोगों की भीड छंटने लगी-जो लोग नहीं. गए उन्हे सख्ती के साथ सेना ने कट्रोल किया । विजय ने अभी कोठी में कदम रखा ही था कि बिकास दौडते हुए उसके निकट आया और लगभग चीखा-"नमस्ते I झकझकिए अकल ।"

" नमस्ते प्यारे दिलजले ।" विजय मुस्कराता हुआ बोला--- "ये क्या कबाडा फैला रखा है ?"

" पता नही अंकल कोई बता नहीं रहा कि बात क्या है…आप ही बताइए न अकल ?"

"अबे ओ मिया दिलजले तुम्हें और न पता हो ?” विजय एक प्यार-भरा चपत बिकास के प्यारे कपोल पर मारता हुआ बोला I

तभी रघुनाथ उनके निकट आकर बोला…"विजय फोन पर तुमने मेरी बात को मजाक समझा था फिर अब......!"

" ये समय-समय की बात है प्यारे तुलाराशी तुम ये बताओ भाभी कहा है ?” विजय आंख मारता हुआ बोला l

तभी रघुनाथ ने विकास से कहा--- "तुम अदर जाओ बिकास!!

विकास महाशय मुह लटकाए अदर क्री और रेगे I बिकास के चले जाने के पश्चात रघूनाथ धीरे से बिजय के कान में बोला---" विकास को इस बारे मे कुछ नहीं बताया गया हे l वह बार-बार पूछ रहा है कि इस बार आग के बेटे यहां क्या करने आ रहे है ? किंतु वास्तविकता उसे किसी ने नहीं बताई है। आखिर बच्चा ही तो है…रैना समझदार होकर घबरा रही है तुम भी विकास से कुछ न कहना I"

"प्यारे तुलाराशि I" बिजय मुस्कराता हुआ बोला-…"वास्तविकता पूछो तो भगबान से जरा-सी भूल हो गई I इस साले विकास को भूल से तुम्हारा लडका और हमारा भतीजा वना दिया । वास्तव में यह हमारा और तुम्हारा बाप है और रही सही कसर उस साले लूमड़ ने पूरी का दी । मैं देख रहा हूं कि तुम घबरा रहे हो लेकिन दावे से यह कह सकता हूं कि विकास यह जानने के बाद भी नहीं घबराएगा क्योकि उसका गुरु ही साला लुमड है ।"

. . "लेकिन फिर भी विजय-…विकास हमारे लिए तो बच्चा ही है I"

"खैर ठीक है । तुम ये बताओ भाभी कहा है ?"

"अदर वाले कमरे में ।" रघुनाथ घडी देखता हुआ बोला जिसमेँ दस बजने में पाच मिनट शेष थे I तभी रघुनाथ के दिमाग को तीव्र झटका लगा । विजय ने उसके चेहरे के भावो . मे परिबर्तन स्पष्ट देखा था-औंर उस समय वह' चौके बिना न रहा सका जब रघुनाथ का रिवाॅल्बर एक झटके के साथ होलस्टर से निकलकर उसके हाथ में आ गया और वह उसे विजय की ओर तानकर कडे स्वर मेँ गुर्राया । ~

"ठहरो इसकी क्या गारंटी है कि तुम बिजय हो ?!" अगले ही पल बिजय के अधरों पर मुस्कान बिखर गई I

अजीब-से लहजे मे वह बोला-"इसकीं क्या गारटी है कि तुम हमारे प्यारे तुलाराशी . हो ?"

"बको मत l" रघुनाथ सख्त स्वर में गुर्राया तथा विज़य क्री आखों मे झांका---

. "इन बेकार को बातों में समय गवाने के स्थान पर समय का सदुपयोग करोगे तो अधिक बुद्धिमानी होगी प्यारे । वेसे खुशी हुई कि तुम काफी सतर्कता बरत रहे हो । ध्यान रखो आग के बेटे किसी के मेकअप मे नहीं बल्कि आग की लपटों में लिपटे हुए होंगे !"

तत्पश्चात रघुनाथ ने पूरी तसल्ली कर ली कि सामने. खडा व्यक्ति वास्तव में विजय के अतिरिक्त कोई नहीं है तो विजय को रैना का कमरा बता दिया । मुस्ककराता हुआ विजय रैना के कमरे की ओर बढ गया ।

रैना का कमरा भीतर से बद था-जिसमेँ रैना के साथ पाच सेना के जबान उपस्थित थे । उसने कमरा खुलवाया और अंदर प्रबिष्ट हुआ ।

उसे देखते ही रैना उठी और बोली ----" बिज़य भैया I" अभी रैना आगे कुछ कहने ही जा

"अरे भाभी हमारे होते घबरा रही हो…अरे हम आ गए हैं ठाकुर के पूत । हम साले इन आग कै बेटों को छठी का दूध याद दिला I" विजय ने यह शब्द कछ इस प्रकार सीना अकडाकर कहे थे कि पांचो मिलिट्री वालों के साथ स्वय रैना भी बिना मुस्कराए न रह सकी थी ।।

तभी कमरे में विकास प्रविष्ट हुआ और बोला… "हेलो अंकल…यहा घर क्या हो रहा है ? अगर आप नहीं बताना चाहते तो मत बताइए…लेकिन अंकल एक नई बनाई हुई दिलज़ली तो सुनिए !"

"विकास तुम हमेशा शैतानी......!"

"औफ्फो भाभी...." विजय बीच मे ही बोला---"तुम्हें किस मूर्ख ने यह अधिकार दिया कि तुम चाचा-भतीजे के बीच में बोलो । क्यों मिया दिलजले…हम ठीक कह रहे हैं न ?”

अतिम शब्द विजय ने विकास को ओर देखकर कहे थे, इससे पूर्व कि विकास कुछ कहे रैना बोली ।

"तुम इस शैतान को सिर पर चढाते जा रहे हो भैया ।"

"घबराओ नहीं भाभी हमारा सिर भी बहुत ऊचा है, वहा तक पहुचने के लिए तो अभी दिलजले को बहुत पापड बेलने पडेगें I हा तो मिया दिलजले पेश करो अपनी दिलजली और जला दो हमारा दिल । ऐसा जलाना कि आग की लपटें निकलने

लगें किंतु धुंआ नहीं l” बिजय विकास की और देखकर बोला ।

-"हा तो अकल-" ये मैं अपना फर्ज समझता हूं क्रि बिना कर्ज एक दिलजली अर्ज करू । हा तो मैं जौ सुनाता हू उसे ध्यान से सुनो क्योंकि ये दिलजली सप्रेटा घी में तली हुई है । विकास कै कहने के ढग पर विजय बिना मुस्कराए न रह सका ।

जबकि विकास इस बात से बेखबर अपनी दिलजली कुछ इस प्रकार सुना रहा था ,

" एक बार छिड़ गई जंग, चुहो और मच्छरो मे भारी

आकाश कांप गया -- धरती डगमगाई सारी

दोनों ओर ही थे , योद्धा एक से एक भारी !

दुंदुभी बजी--- युद्ध की हो गई तैयारी ।

चुहो में आतक फैला , सैना घबराई सारी ।

क्योंकि मच्छरो में थे, बहादुर छाताधारी ।

इतना सब कुछ देख, धबराए सब नर नारी ।

चुहे थे बेचारे शाकाहारी , मच्छर मासाहारी ।

मच्छरो ने शुरू कर दी , जोरदार बमबारी,

चुहों की सैना घबराई, क्या करती घुडसबारी ।

बच्चों. में आतक़ फैला , चिल्लाई चुहिया सारी,

एक एक मरने लगे---चुहे सब बारी बारी ।

देखकर आया क्रोध, चुहे कै सरदार को ।

आगे बढ़कर ललकारा मच्छरों कै बाप को I

मच्छर बोले ले आओ अपने हिमालयी साँप को,,

किन्तु सरलता सै नही छोडते चुहे भी मैदान को ।

अणुबम डाला मच्छरो ने , सोचा यह बाजी ले गया ।

लेकिन चुहो का सरदार बम को मुँह मे ले गया ।

ली हाजमे की गोली , बम को हजम कर गया ,

दैखकर करिश्मा मच्छरों का सरदार बेहोश होगया ।

फिर क्या था चुहे रूक गए जाते-जाते,,

बम मुह में लैकर गोली सी हजम कर जाते ।

अगर नही भागते मच्छर तो बही मारे जाते ।

रखे रह गए बही सब, उनके छाते वाते !"

"अवे ओं मिया दिलजले l अब अपनी बोलती पर ढक्कन लगा लो । हम कुछ कह नहीं पा रहे हैं तो तुम अपनी दिलजली को राजकपूर की फिल्मी को भाति लम्बी करते जा रहे हो ।" विजय हाथ उठाकर बोला ।

अन्य सभी विकास की दिलजली पर मुस्करा उठे । रैना भी मुस्कराए बिना न रह सकी I
 
अब दस बजने मे केवल दो मिनट ही शेष थे । शहर पर पूरी तरह कर्पयूं लग चुका था । सेना का सुदृढ जाल फैला हुआ था । सभी जिज्ञासा के साथ आग के बेटों के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे l विजय स्वय रैना के पास बैठा था । वह पूर्णतया सतर्क था l बाहर ठाकुर साहब पूर्णतया सतर्क थे I सागर में नेवी का पनडुब्बी जाल, राजनगर मेँ सेना का चक्रव्यूह । सभी को प्रतीक्षा थी-आग के बेर्टों की।

ठीक दस बजे ।

एक विचित्र हरकत की बिकास ने ।

एक_ ऐसी विचित्र हरकत, जिससे विजय भी भौचक्का रह गया । वह विकास के उस भोले…भाले और मासूम चेहरे क्रो ताकता ही रह गया । विजय का मुख इस समय आश्चर्य के साथ खुला हुआ था । उसके लिए विकास एक बार फिर पहेली बन. . गया । . . हुआ यह कि दस बजते ही विकास ने विजय के कान मे रहस्यमय ढग से फुसफसाकर कहा ।

. . " अंकल आग के बेटों को गिरफ्तार करा सकता हूं I”

विकास के मुख से उपरोक्त शब्द सुनकर विजय को अपनी खोपडी घूमती-सीं प्रतीत` हुईं । उसकी समझ में नहीं आया कि यह लडका क्या कह रहा है और इसके कहने का तात्पर्य क्या है ? वह तो विकास के मासूम-से मुखडे को ताकता ही रह गया ।।

उसके गुलाबी अधरों पर गजब की रहस्यमय मुस्कान नृत्य कर रही थी । इतनी रहस्यपूर्ण कि विजय को ऐसा लगा कि विकास इंसान न होकर कोई फरिश्ता तो नहीं ! अवाक-सा .खडां कुछ देर तक वह विकास को ताकता रहा फिर स्वय पर सयम पाकर बोला…"क्या मालूम है…क्या बक रहे हो ?"

"मेरे साथ आओ अंकल I" विकास ने उसी प्रकार रहस्यमय ढग से कहा' और दरवाजे की तरफ़ बढ, गया । विजय, विकास को इस प्रकार देख रहा था, मानो वह ससार के समस्त आश्चर्यो से बडा आश्चर्य देख रहा हो । वह यह भी निर्णय नहीं कर सका कि विकास यह सब किसी शरारत के अतर्गत कह रहा है अथवा वास्तव में वह आग के बेटों का कोई रहस्य जानता है । वह कुछ निर्णय लेने मे असफल रहा किन्तु फिर वह उठ खडा हुआ और विकास के पीछे चल दिया । पीछे से रैना ने टोका…"क्या बात भैया…इस शरारती ने कान में क्या कहा ??"

"कुछ नहीं भाभी l" विजय बोला------- "लगता है इस साले दिलजले को समझने कै लिए हमे भी दूसरा जन्म लेना पडेगा । " कहता हुआ विजय बाहर आ गया ।

विजय द्वारा कहा वाक्य बिकास के कानों में पडा जिसे सुनकर उसके होंठ शरारत से मुस्करा उठे-वह मुडा नहीँ बल्कि लान में होता हुआ कोठी के पिछवाडे की ओर चला । विजय के दिमाग में न जाने क्या-क्या विचार आ रहे थे कितु वह चुपचाप उसका पीछा करता रहा I विकास दिन-पर-दिन उसके लिए एक पहेली बनता जा रहा था I विकास बाथरूम मे घुस गया और सकैत से विजय को भी अदर आने क्रो कहा । विजय के लिए विकास की प्रत्येक हरकत रहस्यपूर्ण बनती जा रही थी I उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि विकास चाहता क्या है ? बिना कुछ बोले वह भी बाथरूम में प्रविष्ट हो गया l

बाथरूम में पहुचते ही बिजय बोला-"क्या बात है . दिलजले…ये तुम क्या कर रहे हो ?"

"अकल मेरे बिचार से आज यहा आग के बेटे अवश्य आएगे ।" विकास उसी प्रकार रहस्य-भरे शब्दों में बोला ।

"देखो मिया दिलजले i” विजय विकास क्रो घूरता हुआ बोला- "यह समय शरारत का नहीं है । जल्दी से बोलो क्या कहना चाहते हो ?? सभी. जानते हैं कि आज यहा आग के बेटे अपने चैलेंज को पूरा करने के लिए जरुर आएंगे । इसमें नई बात क्या है ?"

"कैसा चैलेंज अंकल…कहीँ आप मम्मी के विषय मे तो बाते नहीं कर रहे हैं ।" अजीब गभीरा के साथ बिकास अत्यत रहस्यमय ढग से बोला ।

विकास के इस वाक्य पर विजय के दिमाग को तीव्र झटका लगा I वह जान गया कि विकास सब जानता है । स्वय को सभालने क्री कोशिश करता हुआ वह बोला-"तो तुम सब कुछु जानते हो ?" . .

" अकल ध्यान है-आज क्या है ??” विकास अपने लहजे में उसी प्रकार रहस्य उत्पन्न किए बोला ।

"सोमवार हे लेकिन इससे क्या मतलब है तुम्हारा?"

" विकास की प्रत्येक बात बिजय के लिए एक रहस्य थी ।

" आज तारीख क्या है ?"

"पहली !!! लेकिन आखिर तुम्हारा मतलब क्या है ??’” विजय इस बार झुझला गया ।

“महीना I” विकास के होंठो पर अजीब-सी एक रहस्य-भरी मुस्कान थी ।

-"अप्रैल..... अरे...... !" विजय बुरी तरह चौंककर बोला…" पहली अप्रैल !" उसके मस्तिष्क मे धमाका-सा

हुआ ।

उसने विकास की शरारत-भरी मुस्कान देखी ।

उसकी खोपडी जेसे चक्कर काटने लगी ।।

-"कैसा बनाया फर्स्ट अप्रैल ।" विकास शरारत के साथ बोला ।

"क्या मतलब ? कैसा अप्रैल फूल? ?” विजय की आखें आश्चर्य से फैल गई ।

"यस अक्ल । मम्मी के अपहरण का पत्र आग के बेटों ने नहीं…मैंने पापा की मेज पर रखा. था ताकि उनको अप्रैल फूल बना सकू लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इतने सारे लोग इस चक्कर में आ गए और कोई भी कुछ न समझ सका----

आप भी नहीं अंकल-आप तो अपने-आपमें इतने बडे जासूस बनते हो । कहों कैसा रहा मेरा मजाक? ?" बिकास ने चहककर रहस्योद्घाटन किया ।।

रहस्योंद्धाटन ऐसा था कि विजय की आखे' हैरत से फैल रह गई । वह भोले और मासूम मुखडे वाले इस मासूम विकास को देखता रह गया जिसने कितना गभीर मजाक किया था । उसकी समझ में नहीं आया कि ईश्वर ने इसे इतनी बुद्धि आखिर दे कहा से दी ? कितना भयानक और गभीर मजाक किया था विकास ने । एक ही क्षण में विकास के इस मजाक के परिणाम घूम गए-रघुनाथ और रैना की परेशानी I समस्त सरकारी महकमे का ही नहीं, बल्कि नेवी और सेना का हरकत में आना, राजनगर में भयानक आतक और कर्फ्यू , सीक्रेट सर्विस का हिल जाना…सभी का कारण था यह मजाक । क्या अप्रैल फूल बनाने का विकास को यहीँ तरीका मिला उसका तो सिर ही चकरा गया था । मजाक I कितु इतना गभीर' ? नही उसने ऐसा मजाक कभी नहीं किया । विजय को लगा कि इस मजाक का परिणाम भी अत्यत भयानक होगा । लोग इसे सिर्फ मजाक में उडा देंगे. ..? नहीं, इस घटना से जनता भडक उठेगी । फिर सरकार से मजाक करने का किसी भी नागरिक को कोई अधिकार नहीं' है और मजाक भी इतना भयानक-जिससे सपूंर्ण भारत सरकार कांप कर रह गई है । हो सकता है लोग विकास के प्रति भडक… उठें। विजय के दिमाग मे क्षण मात्र मे अनेको विचार घूम गए । उसने सामने खडे विकास को देखा, जो अभी भी मुस्करा रहा था l विजय को तरस आया बालक' विकास की बुद्धि पर । वह जानता था कि विकास ने वह हरकत कर दी जो उसके दिमाग में उपजी । उसका भयानक परिणाम वह नहीं जानता I वह नहीं जानता कि उसने कितना भयानक खतरनाक कार्य कर दिया है ।

विजय ने उसकी मुस्कान देखी और बोला---- "तो इसका मतलब यह है कि यहा आग के बेटे नहीं आएगे !"

" क्यों नही आऐगे--- आवश्य आऐगे ।।" विकास दृढता से बोला ।

"क्या बकबाँस कर रहे हो ?" विकास के उत्तर पर विजय न सिर्फ झुझला गया, बल्कि क्रोधित भी हो गया । वह विकास को लगभग फटकारते हुआ बोला-"मतलब वह कागज तुमने मेज पर रखा था तो आग के बेटे क्यो आएगे?"

विकास एक बार फिर शरारत के साथ मुस्कराया और बोला…"अकल मेरा पत्र लिखकर रखना सिर्फ अप्रैल फूल बनाना ही न था, वल्कि एक चाल चलना भी था I यह समझो, बो कहावत है ना एक पथ दो काज ।।।"

"क्या मतलब? " विजय एक बार फिर उछलकर रह गया ।

"मतलब ये अंकल कि वह पत्र रखकर मैंने अप्रैल फूल तो बनाया ही…साथ ही आग के बेटों को यहा आने के लिए बाध्य का दिया ।" उसी प्रकार मुस्कराता हुआ विकास कहता चला गया ।

"तुम ये आखिर क्या बक रहे हो ?” .

" अकल…आपके दिमाग मे इतनी सी बात नही आ रही । आप ही सोचिए जब ये खबर आग के बेटों तक पहुचेगी कि किसी ने चैलेंज दिया है तो वे चौंककय ये जानने का प्रयास नहीं करेगे कि जब ये चैलेंज हमने नही दिया तो किसने दिया है ? और वे ये जानने यहां अवश्य आएगे !"

. विकास की बात सुनकर विजय के दिमाग में फिर घंटियां-सी गुनगुनाने लगीं I वह फिर विकास को घूरता ही रह गया । उसकी समझ में नहीं आया . कि आखिर विकास को भगवान ने इतनी बुद्धि कहां से दे डाली? वास्तव में उसे लगा कि विकास जो कुछ कह रहा हैं वह सत्य है । आग के बेटे ये जानने के लिए यहा अवश्य आएगे कि ये धमकी किसने दी लेकिन फिर विजय अटककर रह गया ।

उसने विकास से पूछा …-"'लेकिन तुम्हारा उन्हें बुलाने का अभिप्राय क्या है ?"

"वाह अकल…जिन्होंने रिजर्व बैंक का खजाना खाली कर दिया । जिनकी खोज में पुलिस परेशान हे…उन्हें यहा बुलाना क्या आसान काम है ?”

"लेकिन तुम पहचानोगे कैसे कि आग के बेटे हैं कौन?" बिजय ने प्रश्न किया ।

"मेरे ख्याल से कर्पयूं में आम आदमी हमारी कोठी के आसपास नहीँ आएगे I" विकास ने कहा और विजय एक बार फिर बिकास के मुखडे को ताकता रह गया I उसे लगा जैसे वास्तव मेँ विकास ठीक कह रहा था । उसे कदम-कदम पर विकास के दिमाग का लोहा मानना पड़ रहा था l उसने समय की गंभीरता को समझा । वह जानता था कि अगर यह समय उसने विकास की बुद्धि पर आश्चर्य करने. में निकाल दिया तो स्थिति गभीर हो सकती है । दूसरी ओर यदि आग के बेटे आए भी होंगे तो वे भी निकल जाएगे ।

उसने सोचा, जब ये भयानक खतरा विकास ने पैदा कर ही दिया है तो क्यों न वह इस समय का लाभ उठाए ? अत वह विकास से बोला ।

"देखो मिया दिलजले अब मेरी बात ध्यान से सुनो ।" विजय ने उसे समझाया…“तुमने जो कुछ किया है उसका परिणाम कितना भयानक है यह तुम नहीं जानते । अब तुम एक काम करो वह यह कि वेसा ही कागज टाइप करो और . उस पर लिखो…कैसा रहा फ़र्स्ट अप्रैल......और इससे अधिक एक शब्द भी न लिखना-बर्ना मिया दिलजले छठी का दूध याद आ जाएगा । ध्यान रहे नीचे अपना नाम नही लिखना है ओर न ही किसी अन्य को बताना हैं कि ये हरकत तुम्हारी थी । ध्यान रहे किसी किसी भी कीमत पर कोई यह न जान सके कि यह तुम्हारी हरकते हैं ।" . .

"क्यों अकल? ”

"बेटे दिलजले जो कह रहा हूं अब चुपचाप उसे करो I वरना अपने प्यारे तुलाराशि भी दूढते फिरेंगे कि उनके सुपुत्र महोदय किधर गए ।"

उसके बाद विजय ने वडी बारीकी

से विकास की सब कुछ समझाया और बाथरूम से बाहर भेज दिया ।

अब उसका इरादा इस अवसर से कुछ लाभ उठाने का था…ब्रात उसके दिमाग में भी बैठ गई थी कि आग के बेटे इस कोठी के आसपास ही होंगें निश्चित रूप से । अत उसने बाथरूम के द्वार क्रो देखा-जो कोठी के पीछे एक अत्यत ~ पतली गदी और अघकारयुक्त गली में खुलता था । जहा यह दरवाजा खुलता था-उसको अगर गली न कहकर 'आवचक' कहा जाए तो अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि गली हमेशा मैलयुक्त रहती थी और एक तरफ से बद भी थी । अत वहा कभी कोई व्यक्ति' नहीं जाता था । उसने सोचा क्यों न वह गुप्त रूप से इसी मार्ग से निकले और फिर ध्यान से देखे क्रि कोठी . के आसपास कोई सदिग्ध व्यक्ति तो नहीं है । यह बिचार कर अपने विचार को कार्यान्वित करने हेतु दस्वाजा खोलने के लिए चिटकनी की ओर हाथ बढाया ही था क्रि चोक. पडा । उसके कानो में फसफुसाहट-भरा स्वर टकराया ।

"दस बजकर दस मिनट हो गए हैं अभी तक कोई आया नहीं है ।" यह आवाज दरवाजे के पार गदी गली से आ रही थी । बिजय ने दरवाजे से कान लगा दिए और ध्यान से सुनने लगा…एक अन्य स्वर ने पहली आवाज का जवाब दिया । जवाब फुसफुसाहट के साथ कुछ इस प्रकार दिया गया ।

…" पता नहो क्या चक्कर है ?"

"मेरी समझ में नहीं आ रहा कि जब यह धमकी हम लोगों ने नहीँ दी तो फिर किसने दी ?"

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रघुनाथ के पिछवाडे. वाली गली में दिन के सवा दस बजे भी अंधकार व्याप्त था । औंर जो प्रकाश था भी-उसे. कोठियों के धुएं ने घुघला बना दिया था-इस पतली-सी गली मे कोठियों के रोशनदान थे, जिनमें से धुआं निकलकर वातावरण को और . भी धुघला बना रहा था । यह धुआं घरों मे सुलगती अंजठियो के कारण था । अत: वातावरण लगभग. अधकारमय था कि किसी को महज ही देखना सभव न था ।।

वह एक बूढा आदमी था । यूं उसे बूढा भी नहीँ कहा जा सकता, उसे अधेड कहना अघिक उपयुक्त होगा, उसके… चेहरे पर चेचक के दाग थे…एक स्थान पर ऐसा चिह था…जैसे किसी दुर्घटना मे उसको काफी चोटे आई थीं । हल्की कटारीदार. . मूछें' उसके रोबीले चेहरे पर खूब फब रही थी I हल्की दाढीयुक्त उसका चेहरा धुंघ-सी में विलुप्त था I उसके जिस्म पर एक सफेद धोती और खद्दर का एक घुटनों तक लटकने वाला कुर्ता था । पैरो में जूतियां पहने वह अघकारयुक्त गली मे न जाने उद्देश्य से खडा. था I

एक बार उसने अपनी सीधी कलाई में. बंधी घडी, देखी , और मुंह बिचका दिया । कुछ देर तक वह यु ही शात' खडा, न . जाने क्या विचारता रहा । अचानक वह स्थान से हिला और गदी गली के अदर को बढने लगा । वह शायद. जानता. था कि आगे गली बद है तो वह चहलकदमी-सी कर रहा था । उसे अपने सामने का भाग अघिक स्पष्ट दिखाई दे रहा था क्योंकि बीच में धुआं तैर रहा था I अभी वह कुछ ही कदम आगे बढा था कि शिकारी कुत्ते की भांति उसके कान खडे होगए I

उसके कानों के पर्दों में गली कै अंदर से कुछ व्यक्तियों कै फुसफुसाहट की ध्वनि स्पष्ट सुनाई पड रही थी I वह सिर्फ फुसफूसाहट ही सुन पा रहा था ,

स्पष्ट कुछ भी सुनने ने वह असफल था । अलबत्ता वह इस धीमी फुसफुसाहट को सुनकर सतर्क होगया और एक गदी दीवार से पीठ टिकाकर धुए के पार घूरने का प्रयास करने लगा. । स्पष्ट कुछ भी देख नहीं सका _ किन्तु इतना उसने अवश्य अस्पष्ट-सा देखा कि छायाए दीवांर से पीठ टिकाए आपस में कुछ… बाते कर रही है , उसकी समझ में नहीँ आया कि ये छायाए कौन हैं ? अत हृदय में उनका परिचय जानने हेतु जिज्ञासा ने जन्म लिया ।

कुछ देर तक वह सास रोके विचारत्ता रहा और फिर पूर्ण सतर्कता . के साथ वह नि शब्द आगे बढा । कुछ दूर वह कोई भी ध्वनि उत्पन्न किए बिना दीवार के सहारे-सहारे छायाओं की ओर बढ गया । ये दूसरी बात है कि इस प्रयास मे उसका खद्दर का कुर्ता दीवारों के सहारे लगे पतनालो के कारण कीचड से लथपथ होगया -कितु' उसने इस ओंर लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया । उसकी आखें उन फुसफुसाती छायाओं पर ही जमी हुई थीं । अब वह उन छायाओं क्रो किसी हद तक स्पष्ट देख सकता था ।

ये तीन व्यक्ति थे…जो आपस में किन्ही बातों में व्यस्त थे । वे. क्या बाते कर रहे हैं । यह जानने के लिए वह चुपचाप अपने स्थान पर खडा रहा और अभी तक उनकी बाते सुनने का प्रयास कर ही रहा था कि सहसा वह चौक पडा । न सिर्फ चौका बल्कि उसे लेने-के-देने पड गए । ऐसा तो उसने स्वप्न में भी नहीँ सोचा था कि इन लोगों कै अतिरिक्त भी इस गली मे कोई अन्य उपस्थित हो सकता हे किन्तु उसने यही नही सोचा और यही चोट खा गया ।

अभी वह उनका कोई शब्द ध्यान से सुन भी नहीं पाया कि अचानक उस्रकै पीछे से किसी ने एक जोरदार ठोकर मारी और परिणामस्वरूप वह घडाम से कीचड-भरी गली मे मुह के बल गिरा और और दो-तीन इच कीचड पर रपटता वला गया ।

उन तीन छायाओं के लिए भी शायद यह घटना अचानक ही हुई थी । अत वे भी बुरी तररु चौक पडे किंतु उस समय उनकी आखों में हल्की-सी चमक उभर आई जब उन्होंने कीचड में मुह के बल पडे अधेड के पीछे अपने तीन साथियों पर दृष्टि डाली । पीछे वाले तीनों में से एक आगे बढकर बोला I

"जफ्रीला सेशन-ये बूढा गली में खडा आप लोगों की बाते सुनने का प्रयास कर रहा था ।"

अचानक I

वह सब हुआ जिसकी इन छहों मे से किसी को आशा न थी । उनके बिचार से तो यह बूढा कुछ इस बुरी तरह से कीचड मे गिरा था कि उसके लिए उठना शीघ्र ही संभब नहीँ था । उनकी आशा, के एकदम विपरीत वह अधेड बिजली की-सी गति से न सिर्फ उछला, बल्कि. उसने-बहुत-कुछ कर दिया । एक बिजली-सी कौधी । कीचड में पडा. अधेड छलावे कीं भांति उछला और पलक झपकते ही उसके हाथ मेँ दबी एक गुप्ती जर्फीला सेशन कें पेट मे धंस गई । इसके पूर्व कि कोई कुछ समझ . सके…खून का फवारा निकला-जर्फीला सेशन के कंठ से घुटी-घुटी-सी चीख निकल गई । समस्त गुप्ती उसके पेट में धस गई थी । तभी अन्यू पार्चों उस पर झपटे किन्तु वह बूढा भी कम शैतान नहीं था जैसे ही .वे उस पर झपटे उसने गुप्ती जर्फीला सेशन के पेट मे ही छोड दी और अपने स्थान से अलग हट गया । पाचो की स्थिति भिन्न और बिचित्र थो । कोई लडखडाकर कीचड में गिरा तो किसी ने दीवार में टकाकर मारकर खून निकाल लिया ।

उसके बाद I

अगले कुछ ही पलो मे गली मे भयानक उत्पात जारी हो गया । वह बूढा पाचो' से भिंड गया । किंतु वास्तविकता-यह थी कि पाच उस पर भारी .पड रहे थे । तभी रघुनाथ के बाथरुम का दरवाजा खुला, जो इस गदी गली में खुलता था और वहा से बिजय निकला । तभी इस नई परेशानी को देखकर वे छओ कुछ चकराए-किन्तु बूढे ने सर्वप्रथम स्वय पर काबू पाया ओर फिर उन पर पिल गया l

विजय को भी न जाने क्या सूझा कि वह लडाई में उस बूढे का साथ देने लगा । अब उन पाचो पर ये. दोनों भ्रारी पड रहे थे, क्योंकि ये दोनों कुछ विचित्र ढग से लड रहे थे । अभी इस उत्पात को कठिनता से एक ही मिनट व्यतीत हुआ था कि बिजय और वह बूढा आश्चर्यचकित रह गए ।

उनके मुख आश्चर्य से खुले रह गए, उनकी समझ में नहीं आया कि वे क्या देख रहे हैं ?

उनके देखते ही-देखते पहले उन पाचों' में से एक के कठ से भयानक चीख निकली-ऐसी चीख मानो किसी ने उसे गोली मार दी हो । जबकि उसे किसी वे मारा नहीं था'। अभी वह आश्चर्य के सागर से निकल भी नहीं पाए थे कि उस समय तो उनके आश्चर्य मे चार चाद लग गए, जब दुसरा भी उसी प्रकार भयानक चीख कै साथ ढेर हो गया, इसके बाद तो जैसे सभी को भयानक बिमारी चढ गई ।

सभी चीखे और क्रीचड मे गिरखकर ठडे' हो गए । वहा सिर्फ वे दो ही जीवित थे । उन्होंने एक-दुसरे की तरफ देखा…जेसे पूछ रहे हों कि क्या तुम बता सकते हो कि ये सब कैसे मर गए? अभी वे एक… दूसरे को देख ही रहे थे कि' गली से बाहर उन्होंने मिलिट्री के जवानों मे कुछ हलचल-सी अनुभव 'की । इस हलचल के उत्पन्न होते ही उस समय बिजय की खोपडी घूम गई…ज़ब अधेड का एक शक्तिशाली घूसा उसके जबडे पर पडा । वह क्योंकि इस घूसे के लिए तैयार न था-अत धडाम से कीचड में जा गिरा । तभी उस अधेड ने उसकी पीठ पर एक जोरदार ठोकर रसीद की ।

विजय के कठ से एक चीख निकल गई । वह कराहकर एक ओर को पलट गया । तभी गली मे भारी जुतो की आवाजे गूर्जी-जो निरतर निकट आती जा रही थी । अचानक अधेड ने भयानक फुर्ती. का परिचय देते हुए रघुनाथ के बाथरूम में जम्प लगा दी । विजय भी फुर्ती के साथ उठा ओंर लपका किंतु उसी क्षण दरवाजा एक झटके से बद हो गया । तभी भागते हुए मिलिट्री के तीन जवान वहां पहुचे छः लाशों की देखकर चौंके…और अंगले ही पल उनकी टॉमीगने विजय की ओर तन गई, किंतु विजय शीघ्रता से बोला ।

"'अबे. . .अबे ठहरो प्यारे जवानो ! कहीं हमें ही खुदा को प्यारा न कर देऩा .इन छहों का हत्यारा तो सुपस्टिंडेट, की कोठी मे है…मेरे साथ आओ ।" ~

तभी ठाकुर साहब वहां आ गए । विजय को देखते ही बुरी तरह से चौंककर बोले…"तुम . .तुम यहां. . .?"

….""य. . .यस डैडी I.” विजय स्वयं को संभालकर बोला---" हत्यारा रघुनाथ की कोठी में गया हे-जल्दी कोठी को घेरकर उसे गिरफ्तार कीजिए l”

तत्पश्चात !

क्षणमात्र में ही पूरी कोठी में उस रहस्यमय अघेड़ व्यक्ति की तलाश होने लगी-अथिक देर नहीं लगी-शीघ्र ही वह अधेड, चमक गया,

किंतु' उफ् !

भयानक खतरा. . !

अधेड. व्यक्ति ने बाथरूम में प्रविष्ट होते ही फुर्ती के साथ दरवाजा अदर से बोल्ट कर दिया । एक क्षण' भी, उसने व्यर्थ नही’ किया…तुरंत ही उसने कोठी के अदर का बाथरूम का दरवाजा खोला…किन्तु दरवाजा खौलते ही विकास उसके सामने आ गया । एक क्षण कै लिए तो वह चौका और अगले ही पल उसने विकास को दबोच लिया । विकास ने कई हुनर दिखाए, किन्तु' उस व्यक्ति के सामने सब असफल सिद्ध हुए ।

अचानक अघेड़ ने रिवॉल्वर निकालकर बिकास कै माथे से सटा दी और धीमे, किंतु खतरनाक स्वर मे गुर्राया-" अगर एक लफ्ज भी मुह से निकाला तो गोली मार दुगा' ।"

विकास एकदम ढीला पड गया । उसका तना हुआ. जिस्म . एकदम साधारण स्थिति में आ गया ।

वह व्यक्ति बडी. फुर्ती से अपना कार्य कर रहा था l उसने तुरत ही विकास को कुछ इस प्रकार से उठा लिया कि विकास कोई हरकत न करे और रिवॉल्वर उसके सिर से सटाए वह फुर्ती के साथ कमरे से बाहर की ओर भागा ।

अभी वह कमरे से बाहर ही निकला था कि ठिठक गया । उसके सामने मिलिट्री के जवान थे । उसे देखकर ठिठकं वे भी गए, किंतु जब तक उनके हथियार तनते उससे पूर्व हीं अधेड फिर गुर्राया-" कोई गन न चलाए, वरना इस बच्चे की जान ले लूगा ।"

मिलिट्री के जवान ठिठक गए । उसके आदेश पा उन्हें हथियार डालने के लिए बाध्य होना पड़ा ।

इस बीच विकास ने भी निकलने का प्रयास किया था, किन्तु अधेड व्यक्ति आवश्यकता से कुछ अघिक ही चालाक था…जिसके सामने उनकी एक न चली। इस समय उस अधेड की आखों से चिगारियां निकल रही थी ।

तभी वहा विजय रघुनाथ और ठाकुर साहब इत्यादि आ गए I उन्होंने अभी कुछ कहना चाहा था क्रि अधेड की उगलियों की पकड रिवॉल्वर पर कुछ सख्त हो गई और भयानक स्वर में वह गुर्राया ।

"खबरदार ।। कोई न हिले वर्ना इस वच्चे की मौत.......!"

सभी ठिठककर रह गए । किसी का साहस न था कि विकास को इस तरह मौत के मुह में देखकर भी कोई गलत हरकत करने जैसी मूर्खता करे

अब सब ठिठक गए।

" सब अपने-अपने हथियाऱ गिरा दे I" उसने गुर्राकर गुर्राकर कडे शब्दों में चेतावनी दी । सभी उसकी आज्ञा-पालन करने के लिए बाध्य थे । अत: विजय, रघुनाथ और ठाकुर साहब सहित सबने हथियार डाल दिए l अधेड कै मौटे व काले हौठो पर विजयात्मक मुस्कान दौड गई ।

"मिस्टर !" वह विजय की और उन्मुख होकर बोला…"कहीं तुम विजय तो नहीँ हो ?" ~

"ठीक पहचाना प्यारे। हम ही विजय हैं, लेकिन इस बेहूदा हरकत और इन सवाल-ज़वाब का क्या मतलब और प्यारे खूसट मियां अंतिम बात ये कि तुम कौन हो ?"

विजय अजीब ढग से मुस्कराकर बोला . ।।

"तुमसे हिसाब बाद मे होगा । इस समय तो यहा से निकलना है I" अघेड़ विजय को घूरता हुआ बोला ।

…"'क्यों प्यारेलाल-कैसा हिसाब ?" विजय अभी आगे कुछ कहने ही जा रहा था कि वह फिर गुर्राया---"बको मत ! मुझे यहां से बाहर का रास्ता दिखाओ ।"

स्थिति कुछ ऐसी थी कि विजय कुछ भी करने में असमर्थ था । अत: उसे बाहर का रास्ता दिखाने लगा ।

ठाकुर साहब, बिजय, रघुनाथ ओर विकास इत्यादि के अतिरिक्त अन्य सभी अवसर की तलाश मे रहे…किन्तु वह अधेड आवश्यकता से अघिक चतुर और सतर्क था । तभी तो उसने किसी को कोई भी

अवसर नहीँ दिया और' अत में इतने सख्त पहरे के बावजूद भी वह एकं पुलिस जीप के निकट पहुच गया । जीप के निकट वह कुछ देर ठहरा औंर फिर चेतावनी-भरे लहजे में जोर से चीखा ।

" -~-अगर जीप के चलने मर किसी ने भी जीप पर फायऱ इत्यादि किया अथवा किसी अन्य ढग से मुझे रोकने का प्रयास किया तो मैँ इस बच्चे को लाश मे बदलने में जरा भी नहीं हिचकूगां ।"

वास्तव में अधेड व्यक्ति ने धमकी ही ऐसी दी थ्री कि कोई भी कुछ न कर सका । उसने स्वयं जीप स्टार्ट की और विद्युत गति से जीप रिक्त सडक पर दौडा दी । सभी बेबस-सी निगाहों से जीप के पिछले भाग को देखते रहे । जीप में एक रहस्यमय

अपराधी विकास को लेकर खतरनाक पहरा होते हुए भी फरार .

हो रहा था. .. विजय यह भी न जान सका कि यह अधेड था कौन ।।

उसके बाद !

. . तब-जबकि जीप आखो से ओंझल हो गई । पुलिस और मिलिट्री के ट्रांसमीटर और टेलीफोन घनघनाने लगे l समस्त राजनगर में यह खबर आग की तरह फैल गई, किन्तु कोई लाभ नहीं । जीप की खोज जोर-शोर से जारी हो गई ।
 
लगभग आधे घटे बाद एक निर्जन स्थान पर वह जीप मिल गई और मिल गया विकास, जो बेहोश जीप की पिछली सीट पर पड़ा हुआ था, किन्तु' अघेड़ गघे के सिर से सींग की भांति गायब था । रहस्यमय अधेड वास्तव में सबके लिए एक रहस्य ही बनकर रह गया था । "

जब बिकास को होश आया तो उसने कोई विशेष बात न बताई--सिर्फ इतना बताया कि उस अधेड ने उसके गले, की नस दबाकर बेहोश कर दिया । उसके बाद वह न जाने कहां चला गया ।

इस घटना ने समस्त राजनगर को चौंकाकर रख दिया क्योकि रैना के अपहरण कै स्थान पर विकास का अपहरण हुआ था लेकिन वह भी अधूरा पुलिस इस पहेली को न सुलझा सकी ।। पुलिस यह भी नहीँ जानती थी कि उनको विकास के द्वारा अप्रैल फूल बना दिया गया था क्योकि उन्हें ऐसा कोई पत्र प्राप्त न हुआ था-जैसा विजय ने बिकास को लिखने को कहा था ।

यह एक अन्य रहस्य-भऱी बात थी।

विकास इस समय विजय की कार की डिक्की में था । कार विद्युत गति से अनजाने लक्ष्य की ओर अग्रसर थी । आज रविवार होने कै नाते बिकास के कालेज का अवकाश था-अतः वह ~ विजय से मिलने उनकी कोठी पर पहुचा । उस समय विजय कही जाने की तैयारी कर रहा था । विकास के दिमाग का शरारती कीडा कुलबुलाया -अत वह स्वय को छिपाकर अपने झकझक्रिए अकल की प्रत्येक हरकत देखनें लगा । "

विजय विकास की उपस्थिति से एकदम अनभिज्ञ था ।

अत वह मस्ती मे सीटी बजाता हुआ--ऊंगली मे क्रार की चाबी घुमाता हुआ गैरेज तक आया । गैराज से कार निकालकर चला, किन्तु इसका क्या किया जाए कि विकास तव तक कार की डिक्की मे स्वय को सुरक्षित कर चुका था

और तब से अब तक वह डिक्की में था । कार विद्युत गति से फर्राटे भरती हुई निरंतर अग्रसर थी । कार का लक्ष्य क्या है ? इस बात से विकास बिल्कुल अनभिज्ञ था किंतु' वह भी मस्त बैठा था…सास लेने के लिए उसे पर्याप्त वायू की प्राप्ति होती रहे इसलिए उसने डिक्की में एक झिरी उत्पन्न कर दी W आख सटाकर कभी कभी वह बाहर का दृश्य भी देख लेता था । इस समय जब उसने देखा तो अनुभव किया कि कार किसी सुनसान सडक पर दोड रही है क्योकि इस सडक पर आवागमन अत्यधिक कम था । कभी कोई भूला-भटका वाहन गुजर जाता ।निश्चित तो विकास कुछ. नहीं कह सकता था, किन्तु' इतना अनुमान उसने अवश्य लगा लिया था कि कार लगभग तीस मिनट पश्चात थम गई । कुछ देर तक विकास शात बैठा रहा ।

और फिर डिक्की से बाहर झाका । अवसर अच्छा था…अत डिक्की से निकलकर एक ओर को रेग गया । न जाने इस समय उसके दिमाग में यह कौन-सा क्रीडा कुलबुला रहा था । उसने देखा । जहा कार खडी थी…उसके दाई ओर एक विशाल और सुदर कोठी थी । उसने झाडियों से छुपकर देखा कि विजय उसी कोठी की तरफ बढा । उस कोठी के मेन गेट पर एक पठान चौकीदार स्टूल पर बैठा था ।

विजय उस चौकीदार के निकट गया बोला…" क्यों प्यारेलाल-क्या प्रोफेसर हेंमत अदर हैं ।"

"यस सर !" पठान ने स्टूल से खडे होकर' उत्तर दिया ।

"उनसे मिलाने का क्या लोगे ?" विजय मुस्कराकर मूड में बोला ।

"अरे वल्ला…हम रिश्वत नहीं लेता है ।” वह पठान थरथरम्बी-सी आवाज में बोला---""आइए, मेरे साथ आइए ! यह समय उनका मेहमानों से मिलने का ही है !”

विजय मुस्कराया और पठान कै साथ चल दिया । इधर विकास दबे पाव स्वय को छुपाता उनके पीछे चल दिया ।

तब जबकि वे एर्क गेलरी मे पहुचे। पठान विजय' से बोला…"इस कमरे में साहब हैं ।" उसका सकेत पास वाले कमरे की ओर था I

" ठीक है ।" विजय ने कहा और कमरे की ओर बढ गया ।

पठान वापस लौटने लगा-विकास नै फुर्ती और चुस्ती के साथ स्वयं को छिपा लिया l मस्ती मेँ झूमता हुआ पठान उसके निकट से निकल गया, किन्तु उसकी नजर विकास पर नहीं पडी. I उसके गुजरने के बाद विकास ने झाककर विजय. की ओर देखा जो उस, कमरे की घटी बजा रहा, था । तभी दरवाजा खुल गया-विजय की आवाज़ विकास के कानों तक पहुची' ।

…"गुड मार्निंग प्रोफेसर साहब I."

…"अरे. . विजय बेटे, तुम. . .तुम आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए ?" बिकास के कान मे प्रोफेसर हेमत के ये शब्द पड़े तो अवश्य, किंतु' वह हैमत को देख नहीं सकता था I तभी प्रोफेसर हेमत आगे बोले…-"अरे खड़े क्यो हो ? आओ, अंदर आओ !"

बिकास के देखते-ही-देख़ते विजय मुस्कराता हुआ कमरे..... में दाखिल हो गया । उसके अदर प्रविष्ट होते ही विकास सावधानी के साथ अपने स्थान से हटा और फुर्ती के साथ दरवाजे ' तक पहुंचकर उसने ‘की' होल’ में आख लगा दीं। अदर का सीमित दृश्य वह स्पष्ट देख रहा था । उसने देखा. .. l

प्रोफेसर हेमत का ऊपरी शरीर अभी नग्न ही था…वे अपनी शर्ट पहन रहे थे । जिसकी वे अभी बाह ही पहन पाए थे । हेमत की पीठ को वह, स्पष्ट देख सकता था l अगले ही पल हेमत ने शर्ट पहनी । फिर हेमत का स्वर विकास के कानो से टकराया ।

-"'कहो , ठाकुर के क्या हाल है ?" प्रोफेसर हेमत विजय से कह रहा था' I

~'"उनके हालं तो आप ही मुझसे बेहतर जान सकते है-बैसे इन आग के बेटों ने सभी के हाल खस्ता कर रखै हैं I” विजय की मुस्कराती-सी आवाज़ ।।

विकास 'की छोटी बुद्धि ने उनकी बातो का यही परिणाम निकाला कि प्रोफेसर हेमत उसके दादाजी यानी बिजय के पिता शहर के इस्पेक्टर जर्नल के पुराने मित्र हैं तभी तो उन्होंने मिलते ही ठाकुर साहब के. हाल पूछे । उसके कान अभी भी अदर ही लगे हुए थे-प्रोफेसर हेमत कह रहे थे…"ओह I तो अब समझा कि तुम यहा किसलिए आए हो ?"

--“ समझ गए ?" बिजय भी मुस्कराकर बोला ।

विकास उनके वार्तालाप का एक-एक शब्द सुन रहा था ।

"यही कि तुम मेरे पास अपने मतलब से आए हो । और वह मतलब यह हे कि तुम आग के बेटों के विषय मे कुछ जानना चाहते हो ।" प्रोफेसर हेमत हसते. हुए बोले ।

" आप ठीक समझे…वास्तव में मै इसीलिए आपके पास आया हू।" -लेकिन मैं तुम्हे इस तरह कुछ भी नही बताने बाला ।" हेमत बोला……'"पहले तुम्हें चाय पीनी होगी उसके बाद इस विषय पर बातें होंगी l”

-""चाय तों हम भी पिएगे अंकल I" विकास की इस आवाज ने उन दोनों को चौंका दिया । विजय की आखे एक बार फिर आश्वर्य से फैल गई । उसे लगा कि किसी दिन यह लडका उसके लिए भयानक खतरा बन सकता है । उसके मुख से अनायास ही निकला-"तुम ?”

~ “यस अंकल I मै यानी विकास-आप मुझे हर जगह देखकर हैरान क्यों हो जाते हैं ?” उछलता हुआ विकास उनके निकट आ गया । प्रोफेसर हेमत तो अभी कुछ समझ भी न पाए थे-अत वह मुह बाए उस गोरे…चिटटे सुदर लडके को देख रहे थे ओर कुछ समझने का प्रयास कर रहे थे ।

"मियां दिलजले I” विजय अपने आश्चर्य पर काबू पाते हुए बोला----- "तुम प्रगट ही ऐसी जगह होते हो कि बिना आश्चर्य किए यह बात कंठ से नीचे नहीं उतरती कि तुम यहा हो सकते हो !!!"

"आप तो बेकार में आश्चर्य करते है अकल-मैं तो आपको सिर्फ एक दिलजली सुनाने आया था I यहा आकर चाय की बात सुनी तो हमने भी चाय पीने के लिए कह दिया ।" शब्द कहते समय मानो विश्व की समस्त मासूमियत सिर्फ विकास के मुखडे पर ही आकर एकत्रित हो गई थी ।

बिकास का मुखडा इतना मासूम था कि बिजय. के होठों पर भी मुस्कान आ गई ।वह प्रोफेसर से बोला ।

"इसे पहचाना आपने प्रोफेसर ?” उसका सकेंत विकास की ओर था ।

"नहीं तो भाई…कौन है हम इसे नहीं पहचाने I" प्रोफेसर हेमत कुछ उलझ-से गए I

" आप पहचानते भी कैसे ? आप कभी इसकी बर्थ-डे पर नहीं आए…वर्ना.. अधिकांश-भारतीय ही नहीं-विश्व के अधिकांश लोग इसे पहचानते हैं ।" बिजय ने कहा ।

"अरे कही ये रघुनाथ का लडका विकास तो नही है ??” प्रोफेसर हेमत ने जैसे उसे एकदम पहचान लिया ।

"ठीक पहचाना अकल I" विजय बोला…" यह वही शेतान हे अब देखिए ना…मुझें मालूम भी नही और यह मेरी डिक्की में बैठकर यहा तक आ गए ।" विजय विकास को घूर रहा था ।

"अरे अकल!" विकास भी आश्चर्य के साथ बोला-"आप तो जानते हे कि मैं आपकी कार की डिक्की में था I”

“तुम्हारा अक्ल हूं वेटे ।" मुस्कराते हुए विजय ने कहा ।

विजय के उपरोक्त वाक्य पर न सिर्फ हेमत और विकास ने ठहाका लगाया बल्कि स्वय बिजय भी हस दिया । ठहाका लगाने कै बाद हसते हुए प्रोफेसर हेमन्त बोले-" अब याद आया I ऐसा लग रहा था , तुम्हें कही देखा हो अब पहचान लिया…तुम्हारा फोटो मैंने कईं बार अखबार मे देखा था ।"
 
ये शब्द प्रोफेसर हेमत बिकास… से कह रहे थे-" मेरे ख्याल से मर्डरलैड को और वहा की राजकुमारी जैक्सन को, जो कि विश्व के लिए खतरा बन चुकी थी, तुम्ही ने समाप्त किया था I”

-~-“ओह यस दादा जी । ठीक पहचाना I” विकास उछलता हुआ बोला-"अब क्या आप चाय नहीं पिलाएगे' ?"

विकास की इस बात पर विजय और हेमत दोनों ही हस दिए-उसके बाद हेमत ने अपने नौकर को चाय लाने का आदेश दिया ।

चाय आने तक विकास अपनी, चटपटी बातो से उनको हसाता रहा ।

कुछ समय बाद चाय आ गईं…चाय की चुस्की लेता हुआ विजय प्रोफेसर हेमत की ओर देखता हुआ बोला-"क्यो प्रोफेसर-आपके ख्याल में ये आग के बेटे है क्या ??""

" विजय. I." हेमत ने गभीर स्वर में कहा-"जिस दिन से आग के बेटे देखे गए हैं अथवा जिस दिन से इनका ~ आतक राजनगर मे फैला है. . .उसी दिन से मै एक वैज्ञानिक होने के नाते उनके विषय में काफी सोच रहा हूं । मैँ ये सोच रहा हूं कि-आखिर ये आग के बेटे लपलपाती हुई भयानक आग में जलते क्यों नहीं. . .जीवित कैसे रहते हैं ? ये सब क्या रहस्य है? अभी तक किसी परिणाम व निश्या पर पहुचने में असमर्थ हू ! किन्तु पूर्ण आशा करता हू कि शीघ्र ही मै इस रहस्य की तह तक पहुच जाऊंगा l वेसे मैने आशिक रूप से सफलता भी अर्जित. की है, किंतु अभी विश्वास कै साथ नहीं कह सकता, कि जौ प्रयोग मैँ कर रहा हू-वह एकदम सही हे I”

"यह आंशिक सफलता क्या है प्रोफेसर ?"' विजय ने प्रश्न किया ।

विकास इस समय एक गभीर बालक की भाति उन दोनों का वार्तालाप सुन रहा था…कितु न जाने कभी…कभक वह प्रोफेसर हेमंत की ओर एक विशेष दृष्टि से देखता . . .ऐसी दृष्टि से जैसे हैमत से पहले जन्म की शत्रुता रही हो I

"वह सफलता तुम्हें मै अभी नहीं बता सकता ।" हेमत्त' बोला-- "अभी सयम रखो । कल नही तो परसो तक मैं इस रहस्य तक पहुच ही जाऊगा ओर सारे विश्व को बता दूगा-आग कै बेटों को परास्त करने का वैज्ञानिक आविष्कार भी कर लूंगा-ताकि ये आग के बेटे अब अघिक समय तक आतक न फैला सकै । यह मैं विश्वास करता हू ।" प्रोफेसर हेमंत ने बताया ।

विजय जानता था कि अधिकाश वेज्ञानिक तब तक अपने रहस्य को किसी को नहीं बताते-जब तक कि वे अपने अविष्कार को पूर्ण नहीं कर लेते I अत वह चुप रह गया । चाय का अतिम घूंट लेकर उसने कहा ।

"अच्छा तो प्रोफेसर मैं अब परसों आऊगा I”

"मैँ आशा करता हू कि परसो तुम्हें मेरी सफलता पर हर्ष होगा ।" हेमत गभीर स्वर में बोला ।

--"'अब आप ही लोग बात करते रहेंगे अथवा मैं भी भाग ले सकता हू ?" विकास ने खाली कप मेज पर रखते हुए कुछ इस प्रकार कहा कि विजय और हेमत हसे बिना न रह

सके किंतु अगले ही पल बिकास अपनी प्यारी मासूम-स्री आखों से हेमत को खूखार तरीके से घूरता हुआ बोला---"मै तुम्हें पहचान चुका हूं--बूढे उसके इस वाक्य पर दोनों इस प्रकार उछले कि मानो बिच्छू ने डक मार दिया हो । विजय को विकास की इस बेहूदगी पर अत्यधिक क्रोध आया. . हेमंत ¸का चेहरा भी कनपटी तक लाल हो गया । वास्तव मे यह विकास की अत्यत ही बेहूदगी-भरी हरकत थी । इतनी बेहूदगी-भरी कि बिजय विकास को कभी माफ नहीं कर सकता था I प्रोफेसर से बोलने का भला ये क्या

ढग था ??? इससे पूर्व कि उन दोनों में से कोई कह सके l

विकास ने एक अव्यत. अश्लील हरकत की ।

उसने कहा ।।

"टमाटर की तरह ,लाल क्यों हुए जा रहे हो बूढे, तुम्हें मैं पहचान चुका हूं।"

"विकास......! '" विजय सख्ती के साथ बोला…"यह क्या बेहुदगी है ?"

वास्तव मे अब वह विकास को क्षमा नही कर सकता था ।

अब बिकास की हरकते इतनी बढती. जा… रही, थी कि उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता था ।

प्रोफेसर का क्रोध भी सातवें आसमान पर पहुचा-वे लगभग अपनी पूरी शक्ति से चीखे ।

"यह क्या बदतमीजी I"

" तुम खुद को विजय अंकल से छुपा सकतें हो बूढे लेकिन मै तुम्हें अच्छी तरह पहचान चुका हू I" विकास उसी प्रकार हेमत को घूरता हुआ बोला I

"विकास I" विजय कठोर शब्दों में चीखा…" अब तुम्हारी हरकत हद से अधिक बढती जा रही है जानते हो ये कौन हो......!"

"ये जो भी हैं अंकल लेकिन इनका जो रूप मैं पहचान गया हूं उसे आप नहीं जानते । क्यों बे बूढे मैं ठीक कह रहा हू ना ?” एक बार फिर विकास ने वही वेहूदगी-भरे शब्द बोले I
 
अपना इतना अपमान प्रोफेसर हेमत सहन न कर सकै । उनका क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचा और विकास को पकडने के लिए वे उस पर झपटे किन्तु तभी बिकास ने अपनी . पैंट की जेब से न जाने क्या चीज निकाली और अपनी छोटी और गोरी हथेली कै बीच में फसाकर प्रोफेसर हेमत' के सामने अपनी हथेली कर दी । हथेली पर मौजूद वस्तु को बिजय न देख सका ।

किन्तु अगले क्षण उसने जो परिवर्तन महसूस किया उससे उसकी भी आखे आश्वर्य से फैल गईं ।

प्रोफेसर. हेमत ने विकास की हथेली देखी । उसकी हथेली के बीच एक स्टार फंसा हुआ था । यह कोई विशेष स्टार नहीं था बल्कि साधारण सिगरेट के पैकेट के कागज को काटकर एक स्टार की शक्ल दे दी गई थी । प्रोफेसर हेमत ने बिकास की हथेली के बीच फसा वह स्टार देखा और एकदम ठिठक गया I उसकी आखे स्टार पर जमी रह गई । स्टार क्रो देखते ही हेमत की आखें आश्चर्य से फैलती चली गई । क्षणमात्र में उसकी आखों' में मौत के भय की परछाइयां तैरने लगीं ।

उसका सुर्ख चेहरा एकदम हल्दी की भाति पीला पडता चला गया । भय से हेमत थरथर कापने लगा । उसके होंठ फडफडाने लगे--- स्थिति ऐसी हो गई…मानो उसे कोई भयानक यातनाएं दी जा रही. हो । न जाने इस स्टार में ऐसी क्या बात थी कि हेमत भयभीत होकर न सिर्फ कापने लगा…बल्कि गिडगिडाने लगा । …""प्लीज़...प्लीज. . इसे मेरे सामने से हटा लो ।"

…,…""हा…हा…हा ।।" एकाएक विकास ने पागलो की भांति कहकहा लगाया और बोला…"क्यो बूढे. . .मैं पहचान गया' न तुम्हें.....अब बोलो-तुम्हारा' क्या किया जाए ?"

…""नही. . . नहीं l.” प्रोफेसर… गिडगिडाया.."ये मेरे सामने से हटा तो ।"

लेकिन विकास ने उछलकर उसे चिढाया. ।

प्रोफेसर इस प्रकार डर रहा था मानो शेर के सामने कोई बुजदिल और निहत्था व्यक्ति ! हेमत' की हालत वास्तव में ही बडी अजीब थी ।

विजय..!

वह अलग आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहा था । उसकी, समझ मेँ नहीं' आ रहा था कि यह सब क्या है. . .? इतना अनुमान तो वह लगा ही चुका था कि हेमत' का कोई ऐसा रहस्य है जिससे वह परिचित नहीं है और किसी तरह विकास जान गया है । वह हेमत की स्थिति मे परिवर्तन स्पष्ट महसूस कर रहा था। मानो साक्षात मौत उसके सामने खडी. हो । विजय भी यह भी न देख पाया कि विकास की हथेलियों के बीच आखिर. है क्या ? लेकिन वह इतना अनुमान लगा सकता था कि विकास के हाथ में कोई ऐसी वस्तु अवश्य हे जिसका हेमत के जीवन से गहरा सबध है । उसे तो आश्चर्य हो रहा था विकास पर, आखिर लडका, है क्या ? आखिर वह हेमंत के किसी रूप से कैसे परिचित हो गया…जबकि वह उनसे पहली बार मिल रहा हे l

विजय की समझ मे कुछ नहीं आया । उसकी समझ में नहीं. आया कि हेमत इतना घबरा क्यों रहा है ? ये विकास आखिर हे क्या ? उसकी समझ में नहीं आ रहा था ।।

प्रत्येक कदम पर उसे विकास एक नए रूप में नजर आता । रूप भी ऐसा जो रहस्यपूर्ण होता ।

हैरतअंगेज होता !

आखिर ये लडका बना किस मिट्टी का. है ?

. विजय जितना उसके विषय में सोचता, उतना ही उलझता. जाता । जब उसकी समझ में नही आया कि यह चक्कर क्या है तो उसने फिर अपना ध्यान उस ओर लगाया ।

विकास अभी तक प्रोफेसर हेमत को परेशान कर रहा था । हेमत उसी प्रकार भय से थर-थर क्राप रहा था । एकाएक वह उछला औंर विकास की और झपटता हुआ चीखा । "विकास ये क्या बदतमीजी है ?”

…"अभी ये रहस्य तो मैं आपको भी नहीं बताऊगा अंकल !"

विकास फुर्ती के साथ क्रभरे से बाहर हो गया । विजय ने भी फुर्ती का परिचय दिया और गैलरी से जब बाहर-आकर देखा…-विक्रास तेजी से भागता चला जा रहा था । वह-उसकै पीछे दौडा किन्तु वह उस समय आश्चर्यचकित रह गया जब . किसी जिन्न की भाति विकास को भागतें देखा । विजय उसके पीछे दौडा नहीँ…-वल्कि उसी स्थान पर खडा भागते विकास को देखता रहा ।

उसने देखा I

भागते हुए विकास को देखकर अचानक पठान चौकीदार उठ खडा हुआ और उसका रास्ता रोक लिया किन्तु उस समय उसको न सिर्फ आश्चर्य हुआ बल्कि उसका पहाड-सा जिस्म धडाम से धरा पर गिरा…-जब विकास की फलाइग किक आश्वर्यपूर्ण ढग से उसके चेहरे पर पडी. । वह पठान इस बालक

से कदापि इतनी खतरनाक हरकत की आशा नहीं करता था कितु इसका क्या किया जाए कि बिकास उसे घूल चटाता हुआ गजब की जपों कै साथ कोठी से बाहर हो गया । अगले ही पल-इससे पूर्व कि पठान उठे…विकास ने बिजय की कार स्टार्ट की और दूसरे ही पल विकास ने विजय की तरफ हाथ हिलाकर कहा ।

…"टाटा अंकल फिर मिलेगे ।"

और अगले ही कार तीव्र वेग से दौडती चली गई । पठान उठकर कार तक भागा भी । किंतु वह कर भी क्या सकता था I

विजय अपने स्थान पर खडा विकास के बारे में सोचता रहा l आखिर ये लडका. है क्या ?

तभी वह चौंका-आखिर वह कार कैसे ले लेगया, उसने तो ताला लगाया था । तभी उसने जेब टटोली…चाबी जेब से नदारद' मिली । एक बार फिर वह आश्चर्यचकित होकर रह गया । उसे. जरा भी आभास न हो सका था कि विकास उसकी जेब से चाबी कब खिसक्राकर ले गया । वह सोचता ही रह गया कि अलफासे ने विकास को कितने कामों में दक्ष कर दिया था । विकास को उसने कितना खतरनाक बना दिया था ?

वह वापस लौटा-उसने प्रोफेसर हेमत से काफी पूछा कि आखिर विकास के हाथों मेँ क्या था ? वह भयभीत क्यों हो गया ? आखिर ये रहस्य क्या है ? कितु हेमत ने.किसी भी बात का उतर नहीं दिया l

उसने सिर्फ विजय को अपनी कोठी से चले जाने के लिए कहा । विजय ने लाख प्रयास किया-कितु प्रोफेसर हेमत ने उसके किसी भी प्रश्न का उत्तरं नहीं दिया l निराश होकर विजय वहां से चला आया, किंतु उसके-दिमाग में इस बिचित्र केस की कई ऐसी गुत्थियां घूम रही थीं, जो रहस्य से परिपूर्ण थी l इन गुत्थियों के अतिरिक्त एक अन्य इसान उसके मस्तिष्क में था । वह था विकास । उसकी समझ मे नहीं आया कि आखिर ये लडका है क्या । वह शीघ्र ही कोठी पर पहुचना चाहता था ताकि विकास किसी रहस्य से पर्दा उठा सके ।

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इस केस की प्रत्येक घटना विजय के मस्तिष्क. में एक रहस्य बनकर कुलबुला रही थी ।

उसके लिए सबसे पहला रहस्य तो वह लडकी. थी जो रिजर्व बेक के मेनेजर के पास आई और बाद में आग के बेटों का पत्र देकर धुआं बन गई ।

आखिर कौन थी लडकी. ? वह धुआं केसे बन गई ? उसका धुएं में परिवर्तित होने का रहस्य क्या है ?

आग के बेटे, आग क्री लपटों में भी रहते हुए भी जीवित कैसे रहते है ?

वे अपने-आपको जनकल्याणकारी क्रिस आधार पर कहते हैं ?

सागर मे जाकर वे क्या और क्रिस प्रकार विलुप्त हो जाते हैं ?

बैक मे पखों के पास वह अचानक कैसे अचेत हो गया ?

उसके बाद उस गली में आग के पाच बेटे आश्चर्यपूर्ण ढग से कैसे मर गए ?

उन्हें मारने वाला तो कोई नज़र नहीं आया था-फिर उन पार्चों की हत्या-क्यो और किसने की ?

खद्दरधारी अधेड कौन था? उसका इस कैस से कितना गहरा सबंध है ? वह कौन है ?

आग के बेटों का साथी तो लगता नहीँ था फिर वह किस उद्देश्य से गली से उपस्थित था ? और सबसे अतिम रहस्या सबसे अघिक रहस्य-भरा और आश्चर्य से परिपूर्ण था---- वह यह कि प्रोफेसर हेमत की वास्तविक जिदगी क्या है ? विकास ने उसे क्या दिखाया था , वह वस्तु क्या थी ? उसे देखकर प्रोफेसर हेमत बुरी तरह से भयभीत होकर क्यों कापने' लगा ? उस वस्तु का रहस्य क्या है ? इत्यादि-इत्यादि अनेक रहस्यों… से भरे प्रश्न थे, जो उसके मस्तिष्क में रहस्य बने हुए थे l इनसे भी अघिक रहस्य उसके लिए बना हुआ था, वह ग्यारह वर्ष का खूखार लडका विकास ।

वास्तव मे विकास भी एक रहस्य ही था l कदम-कदम पर वह नए-नए रूपो में सामने आ रहा था I उसे याद आया, समस्त राजनगर कै साथ उसका भयानक मजाक और दूसरी और

प्रोफेसर हेमत के साथ घटी घटना ।

न जाने यह खतरनाक लडका_ प्रोफेसर हेमत' के जीवन में किस रहस्य तक कैसे पहुच' गया ? वास्तव मे विकास प्रत्येक घटना के साथ क्या रूप धारण करता जा रहा था और निरंतर विजय के दिल में इस. बिचार कौ दृढ़ करता जा रहा था कि वक्त आने पर विकास अपराधियों की मोत बन सकता है ।

वह अपराध जगत मेँ एक भय बन सकता है। इस समय विजय टैक्सी में बैठा रघुनाथ की कोठी की ओर बढ़ रहा था । उसका दिमाग तेजी से सोच रहा था । कुछ समझने के स्थान पर-वह उलझता ही जाता । सबसे अधिक उसके मस्तिष्क को यह अतिम धटना कचोट रही थी । आखिर विकास ने किस प्रकार प्रोफेसर हेमत को इतना… भयभीत. कर दिया ?

लगभग पैंतालीस मिनट… पश्चातं उसकी टैक्सी रघुनाथ की कोठी पर थमी I उतरकर बिल चुकाया और अदर गया । वैसे उसे कहीं भी अपनी कारं नजर नहीं आई, विकास उसे अदर नहीं मिला ।

रैना ने इतना ही बताया कि वह तुम्हारी ही कोठी पर गया है I विजय लोट गया। उसने रैना को कुछ नहीँ बताया ।

इन्हीं बातों मे उलझा विजय अपनी कोठी पर पहुचा-वह थोडा चौंका, क्योंकि उसकी कार वहीं ख़डी थी । उसके कदम स्वयं अपने कमरे की ओर -बढे ।

~'"आइए अंकल, आइए ।" उसके कमरे मे प्रविष्ट होते ही विकास की आवाज कमरे मे गुजी ।

विजय ने विकास को देखा तो देखता ही रह गया l विकास आराम से सोफे पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था । उसे. देखकर वह कुछ. विचित्र ढग से मुस्कराया और बोला ।

"अकल' । यहां आपकी प्रतीक्षा कर रहा था, इसलिए सोचा कि क्यों न भोलू से एक कप चाय बनवाकर पी जाए ।"

“ वो तो ठीक है प्यारे दिलजले ।" विजय मुस्कराकर उसके सामने वाले सोफे पर बैठता हुआ बोला--

" तुम्हारी हरकते अब हद से बाहर होती जा रही हैं-वो साला तुलाराशि दोष मुझे देगा I” ~ ~

" अंकल आप नहीं जानते प्रोफेसर हेमत को पर मै उसे पहचान गया ।" विकास का लहजा गभीर था ।

……'"पहले ये बताओ कि ऐसा कागज टाइप करके मेज़ पर क्यों नहीं रखा-जैसा मैने कहा था ? "

"जिस कमरे मे टाइप रखी थी अंकल -बहां मिलिट्री का पहरा था I” विकास प्रत्येक बात का उत्तर न जाने क्यों गभीरता के साथ देता जा रहा था ।

इस समय उसके चेहरे पर मासूमियत थी मानो उससे अघिक भोला आज तक पैदा ही न हुआ हो ।

एक बार को तो विजय को उसका थोबडा देखकर क्रोध आया किंतु वह बोला ।

"खैर ये तो अच्छा हुआ…वहा हुई घटनाओं से पुलिस और जनता यही समझ रही है कि आग कै बेटों ने प्रयास किया था किन्तु सफल नहीं हुए, लेकिन तुम दूसरी बात का तो जवाब दो ।"

“वह क्या अंकल ?” बिकास के गुलाबी अधरों पर धीरे धीरे शरारत उत्पन्न होती जा रही थी ।

--“देखो, किसी प्रकार की शैतानी दिखाई तो बहुत पिटाई होगी I” बिजय विकास के चेहरे पर उत्पन्न चचलता के भाव पढ चुका था । अत चेतावनी-सी देकर बोला…"ये प्रोफेसर हेमत का क्या चक्कर है ?”

"ये चक्कर बडा प्यारा हे अकल l”

"बोलो क्या है ?” विजय कुछ डपटकर बोला ।

"अच्छा अकल I" विकास लाइन पर आता हुआ बोला---- "रहस्य कान में बताने वाला हे । हमारे और तुम्हारे अतिरिक्त अभी इस रहस्य से कोई परिचित नहीं होना चाहिए और आप जानते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं । अत: मैं आपके कान में बता सकता हूं I"

विजय को लगा कि लडका फिर कोई शरारत करने के मूड में हे । अत बिशेष दृष्टि से घूरते हुए बोला "अगर कोई शरारत.... ।"

"ओफ्फो अक्ल मैं शरारत नहीं करूंगा विकास विजय का वाक्य बीच में ही काटकर बोला-"आप कान इधर लाइए ।"

_ विजय रहस्य जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक था l अत विवशता थी । उसने कान विकास के सामने कर दिया । विकास भी बडे अदाज के साथ आगे आया और अपना मुह बिजय के कान से सटाकर अत्यत ही धीमे स्वर में न जाने क्या फुसफुसाने लगा । लगभग दो मिनट तक उनकी यही स्थिति रही विकास निरंतर उसके कान में कुछ कहे जा रहा था । समय के साथ विजय की आखें हैरत से फ़टती जा रही थीं । उसकी आखों से अनत आश्चर्य झाकने लगा और जब विकास ने अपनी बात पूरी करके मुह हटाया तो उसे समय विजय गहन आश्चर्य में गोते लगा रहा था । वास्तव मे विकास ने जो कुछ बताया था वह हैरतअगेज था । वह निश्चय नहीं कर पा रहा था कि वह कैसे विकास की बातो का विश्वास करे किन्तु विश्वास करने के लिए बाध्य था , कुछ देर तक तो वह आश्चर्य के साथ विकास के मासूम मुखडे को देखता रहा फिर एकदम उसे कुछ होश आया I

विकास से कहा ।

"क्या वास्तव में यह सत्य है ?."

"एकदम सच है अंकल I" विकास बोला-"अगर सच न होता तो प्रोफेसर स्टार देखकर इस बुरी तरह से भयभीत क्यो होता ?"

"लेकिन, अगर ऐसा है तो केस भयानक मोड ले रहा है !" विजय सोचता हुआ बोला I I

" आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं I” विकास ने कहा ।

तभी विजय को जैसे होश आया । वह सभंला......उसे ध्यान आया कि वह बाते किससे कर रहा है ।

अगले ही पल उसने मुद्रा बदली और डपटकर बोला…"लेकिन तुम्हें इन बातो से, क्या मतलब? तुम अपनी पढाई में मन लगाओ ।"

"वाह अक्ल l" विकास भी मुस्कराता हुआ ही बोला----" पहले तो सारा रहस्य जान लिया और फिर हमें ही डाटते हो I”

विकास की बात का विजय से कोई सतोषजनक उत्तर न बन पडा I

★★★★★
 
अंधकार काजल की भाति स्याह हो चला था । समस्त राजनगर गहन निद्रा की गोद में समाया हुआ था । चारों ओर निस्तब्धता अपना प्रभुत्व जमाए थी ।

वह नाटे कद का स्याह पोश था-जो रघुनाथ की कोठी के बगीचे में बिलकुल शात खडा था । अधकार में वह अधक्रार का ही एक भाग नजर आ रहा था । वह बिलकुल शात था , ऐसा प्रतीत होता था मानो वह किसी की प्रतीक्षा कर रहा था l

न जाने क्यों उसकी आखें प्रत्येक क्षण विकास वाले कमरे की ओर लगी थी l उसके चेहरे पर एक स्याह नकाब था l केवल आखों का स्थान रिक्त दिखाई दे रहा था I .

एकाएक वह धीमे से चौंका ।

अगले ही पल उसके अधरों पर विचित्र-सी मुस्कान नृत्य कर उठी । उसकी आखें चमक उठी । अपने नाटे-से जिस्म को समेटकर उसने कोठी में लगे पौधों के मध्य कर दिया और ध्यान से वह उस ओर देखने लगा…जिघर देखकर वह चौका था । उसने गोर से देखा ।

ये लगभग पांच इंसानी छायाएँ थी-स्वयं को अघकार में रखने का प्रयास करते हुए अत्यत सतर्कता के साथ दवे पाव---- --- कोठी में दाखिल हुई थीं । उनके जिस्मो पर भी काले लबादे थे, वह नाटे कद का साया उन्हें स्पष्ट देख पाने मे पूर्ण सफल था ।

वह शात खड़ा उनकी एकाएक हरकत नोट करता रहा ।

दो छायाएं नीचे खड्री हो गई । अन्य तीन पुर्ण सतर्कता के साथ कमरे की और बढ़ रही थीं I देखते-ही-देखते वे छायाएं लेशमात्र की ध्वनि भी न करके अदर गुम हो गई ।

अब नाटे कद का साया उन्हें देख नहीँ सकता था, क्योंकि बीच में बरामदे मेँ लगा एक खंवा था । अत: नाटे कद का वह स्याहपोश तुरत बगीचे में लेट गया और सतर्कता के साथ रेंगता हुआ ऐसे स्थान पर आ गया जहां से वह एक खुली खिडकी. के माध्यम से अदर का दृश्य देख सकता था I अदर का दृश्य देखने मेँ उसे किसी प्रकार की कठिनाई के स्थान पर सललता ही हो रही थी क्योकि' कमरे में एक नीले रग का छोटा-सा बल्ब मुस्करा रहा था ।

उसके धीमे और धुधले प्रकाश में नाटे कद के स्याहपोश ने स्पष्ट देखा कि तीनों छायाए बिकास के पलंग की ओर बढी I

मासूम विकास निद्रारानी की गोद का शरणार्थी बना हुआ था l धुघले प्रकाश में उसका मासूम मुखडा बडा ही भला प्रतीत होता था लगता था मानो वह इन सबसे अनभिज्ञ हो ।

एकाएक न सिर्फ वह नाटे कद की छाया चोक एडी, बल्कि कमरे मे उपस्थित तीन छायाएं भी उछल पडी, क्योकि आशा के विपरीत अचानक विकास बिस्तर से उछल पडा । उसका इरादा खतरनाक था क्योकि एक ही पल में उसके हाथ मे रिवोंत्वर भी चमक उठी I

किन्तु कमाल की फुर्ती और चतुरता हासिल थी इन तीनो छायाओँ को भी l विकास ने तो अपनी तरफ से गजब की फुर्ती का परिचय दिया ही था किंतु इसका क्या किया जाए कि लाख . फुर्ती दिखाने पर भी तीनो छायाए उससे कही अघिक फुर्तीली और शक्तिशाली थीं ।

एक ही पल में तीनों छाएं झपटीं और इससे. पूर्व कि बिकास कुछ कर सकै उन्होंने न सिर्फ विकास को दबोच लिया बल्कि उसके हाथ से रिवॉल्वर छीनकर एक कराटे के जरिए अचेत भी कर दिया।

सभी कुछ बडी शाति के साथ हो रहा था । नाटा साया भी शात खडा सब कुछ देख रहा था। ~

विकास अचेत होकर उनकी बाहो में झूल गया । छायाओं ने एक-दूसरे की ओर देखा । एक ने बिकास के बेहोश जिस्म को कंघे पर लादा और पूर्ण सावधानी के साथ वे वापस लौटे । बाहर खडी दोनो छायाएं किसी भी खतरे का सामना करने लिए पूर्णतया सतर्क थीं किन्तु प्रत्यक्ष रूप से कोई खतरा सामने न आया ।

अत: अग्रिम कुछ ही क्षणों मे वे पाचो छायाएँ शाति के साथ कोठी से बाहर की ओर जा रही थी । नाटे कद का साया उनसे भी अधिक सावधानी का परिचय दे रहा था । वह चुपचाप उनका अनुसरण कर रहा था I

कुछ ही आगे जाकर वे लोग सडक के एक और खडी काली आस्टिन के निकट पहुचे आस्टिन में पहले से ही कोई अन्य इसान उपस्थित था l किन्तु आस्टिन के भीतर की लाइट आफ़ थी इसलिए चमक नहीं रहा था किंतु अधेरे में उसकी भर्राई हुई आबाज अवश्य गूंजी ।

"काम होगया ??"

…"'यस सर I" एक छाया धीमे से फूसफुसाई I

उसके बाद. . . !

सब लोग गाडी मे समा गए I विकास इस बात से पूर्णतया अनभिज्ञ प्रतीत हो रहा था ।

लगभग एक मिनट पश्चात ही इजन स्टार्ट होने की ध्वनि ने सन्नाटे को पराजित कर दिया ।

अगले ही पल काली ऑस्टिन शात सडक के सीने को रौदती हुई आगे बढ गई ।

आस्टिन कठिनाई से तीस कदम. ही चल पाई थी कि एक मोटरसाइकिल उसके पीछे लग गई-मोटरसाइकल पर नाटे कद का साया बैठा था .

ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उसे इस--- घटना की पूर्व जानकारी अथवा सभाबना हो । तभी तो उसकी मोटरसाइकल पहले से ही झाडियों मे छिपी हुई थी। खैर बहरहाल जो कुछ भी हो रहा हो किन्तु इतना तो निःसदेह कहा जा सकता है कि नाटे कद का वह साया एक निश्चित दूरी निर्धारित करके बडी सतर्कता के साथ आस्टिन का अनुकरण कर रहा था । उसकी मोटरसाइकल की कोई भी लाइट आन नहीं थी । अब तक वे कईं मोड मुड चुके थे किन्तु एक मोड पर नाटे

कद का साया एकाएक बुरी तरह चोंक पडा क्योकि मुडने पर वह जहा तक देख सकता था…साफ सडक ही दीखी । बिलकुल रिक्त सडक l आंस्टिन की तो बात ही छोडिए-बहां आस्टिन… . का नामोनिशान तक नहीं था । नाटे कद के साए की खोपडी. मानो वायु मेँ चक्कर लगा रही थी l आस्टिन को अचानक धरती निगल गई. अथवा आसमान सटक गया ।

कुछ देर तक तो नाटा साया इस उद्देश्य क्रो लिए सडकों पर चकराता रहा कि कही आस्टिन के दर्शन हो जाए किंतु उसे जब सफलता नहीँ मिली तो वह झुझला गया । अब उसने मोटरसाइकिल की हेडलाइट आंन कर दी और अब उसका रूख रघुनाथ की कोठी की और था ~

परेशानी की-सी स्थिति मे वह रघुनाथ की कोठी पर पहुचा । उसकी मोटरसाइकल ठीक वहा स्थिर हुई जहा वह ओँस्टिन खडी थी । उसने मोटरसाइकिल वहीं स्टैंड पर खडी की और जेब से एक पेंसिल टार्च निकालकर वहां का निरीक्षण करने लगा ।

एकाएक. छाया चोकी । उसकी टोर्च का प्रकाश मिटटी में बने कुछ चिहो पर स्थिर हो गया । उसने ध्यान से देखा-वहाँ अनेक जूतों के चिह्न थे कितु' उनके बीच मे कुछ भिन्न प्रकार के चिह्न भी थे, कुछ इस प्रकार के चिह्न…जैसे किसी भारी वस्तु को खदेडा गया हो ।

नाटा साया कुछ देर तक तो उन चिहौं को देखता रहा फिर वह टार्च के प्रकाश को उन्ही चिहों पर उस तरफ़ को चलाने लगा…जिस ओंर कि किसी भारी वस्तु को खदेडकर ले जाया गया था ।

चिह झाडियों की ओर चले गए थे । टार्च के प्रकाश के सहारे वह झाडियों की ओर चला l

और अत में जब उसकी टॉर्च का प्रकाश उस भारी वस्तु पर केद्रित हुआ तो वह चौंके बिना न रह सका । यह एक लाश थी नग्न और जवान युवक की लाश I

~ उसके पेट मे चाकू ठूंस दिया गया या । खून से आसपास की झाडिंया रक्तिम थी । कुछ देर तक वह टार्च के प्रकाश मे लाश का निरीक्षण करता रहा पर उसने उसे हाथ नहीं लगाया ।

उसका दिमाग शायद यह सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है ?? यह लाश किसकी है ?
 
विकास, विजय को यह बता कर चला गया कि प्रोफेसर हेमत उस स्टार से भयभीत क्यों हो गया था कितु विजय के दिमाग में काफी उथल-पुथल छोड गया I विजय जानता था कि कुछ भी सही लेकिन फिर भी विकास है तो बालक-बुद्धि ही । यह बात तो उसके दिमाग में घर कर ही चुकी थी कि विकास साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा गजब. की कुशाग्रबुद्धि का वारिस है । लेकिन फिर भी विकास है तो बालक ही । यह तो ठीक था कि उसने प्रोफेसर हेमत की एक नस को पकडा था किंतु विजय _ जानता था. कि इसका परिणाम उसे अवश्य भुगतना होगा । अत उसके जाने के पश्चात बिजय चितिंत हो उठा ।।

वेसे अभी बिजय यह निश्चय करने में असफल था कि प्रोफेसर हेमत का भयभीत होना-आग के बेटे वाले कैस से कितना गहरा सबध रखता है ?? अथवा यह एक बिलकुल ही , पृथक घटना है--किन्तु इतना निश्चित था कि विकास खतरे मे है । उसके विचार से प्रोफेसर हैमत या तो विकास की हत्या का प्रयास करेगा अथवा उसका अपहरण किया जाएगा ।।

न जाने क्यो विजय का दिमाग आग के बेटे वाले अभियान से हटकर इधर लग गया I शायद इस कारण कि इस समय विकास की जान खतरे मेँ थी I उसे लग रहा था कि विकास के साथ अवश्य कोई अप्रिय घटना होगी I

अत स्याह रात के आगमन के श्रीगणेश से ही वह गुप्त रूप से विकास की सुरक्षा हेतु उसकी कोठी पर जाकर उसकी निगरानी करने लगा…वह अपनी तरफ से पूर्णतया सतर्क` … और लेस था किंतु फिर भी वह उस नाटे कद के साए को नहीं देख सका क्योकि वह कोठी के सामने की ओर के बगीचे में था और विजय कोठी के पीछे-कितु वह ऐसे स्थान पर था जहा से वह प्रत्येक क्षण विकास के कमरे पर बिना किसी परेशानी के निगाह रख सकता था ।

और वास्तव मे काम उसके सोचने के अनुसार ही हुआ । उस समय वह धीमे से चौंका…जब रात की घनी स्याही में किसी इजन की आवाज निकट आई और स्याही से बाहर निकलती स्याह आँस्टिन को उसने अपनी ओर ही आते महसूस किया, ।

विजय जैसे दक्ष व्यक्ति के लिए यह ऐसी नईं बात नहीं थी । अत धीमे से मुस्कराकर वह फुर्ती और सतर्कता के साथ निकट की झाडियों में रेंग गया । सास रोककर वह ध्यान से उस ओर देखने लगा । यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि विजय के हाथ में उसका रिवाॅल्बर आ चुका था । . स्याह आंस्टिन ठीक वही उन्हीं झाडियों के पास रुकी जिनमे विजय पडा हुआ था I रिवॉल्बर लिए वह शात पडा रहा I तभी आँस्टिन से पाच साऐ बाहर निकले ओंर ओंस्टिन मे शेष छठी छाया बोली ।

"सारा काम सतर्कता के साथ हो ।"

" चिता' न करें ।" पाच छायाओं मे से एक बोली ।।

----"उठाकर लाने में केवल दस मिनट लगने हैं I"

"यस सर I ” उसी ने उत्तर दिया और पाचो रघुनाथ की कोठी की दीबार की ओर बढ गईं।

बिजय को समझने में देर नहीं लगी कि इनकी योजना , विकास के अपहरण की हे…उसकी, हत्या की नहीं विजय. ने ~ तुरंत निश्चय किया कि उसे क्या करना है और छायाओँ से नज़र हटाकर आंस्टिन की ओर घूरने लगा । वह अभी घूर ही रहा था कि एकाएक अदर बैठी छाया ने लाइटर जलाया और अगले ही पल उसके हाथों के बीच फसी सिगरेट सुलग गई । तीसरे पल लाइटर की लौ बिलुत हो गई…किन्तु इतने समय में विजय अपने मतलब की प्रत्येक स्थिति देख चुका था कि यह स्याह कपडों में लिपटा एक इसान है जिसने सिगरेट पीने हेतु अपनी स्याह नकाब ऊपर कर ली थी तथा वह ओँस्टिन की बाई ओर

की विडों से टेक लगाए वैठा था…जबकि-विजय इस समय आंस्टिन क्री दाई ओर वाली झाडियों में छिपा हुआ था । विजय के होंठों पर एक विचित्र-सी मुस्कान खेल गई । अब वह आंस्टिन के भीतर जलती उस सिगरेट को बडी

सरलता से देख सकता था……जिसमे जब वह छाया कश मारती तो क्षणमात्र के लिए मानो उसका चेहरा भी दमक उठता था ।

विजय जानता था कि उसे अपना कार्य सिर्फ आठ मिनट मे शांति के साथ करना है l अत वह रिवाॅल्बर संभाले झाडियों से बाहर कार की ओर रेंगा ।।

रेंगते हुए आस्टिन का चक्कर लगाकर बाईं ओर पहुचने में मुश्किल से तीन मिनट लगे थे । इन तीन मिनटों के शेष सेकडों में ही वह भयानक फुर्ती के साथ खडा हुआ और इससे पूर्व कि वह छाया कुछ समझ सके अथवा कुछ कर सके, उसने रिबॉंल्बर का पिछला भाग शक्ति से उसकी कनपटी पर रसीद किया । ~

सिगरेट तो उसके हाथ से छूट गई ।

साथ ही उसने चीखना भी चाहा किंतु इसका क्या किया जाए कि उसके मुख पर रखा विजय का दाहिना हाथ उसे चीखने की अनुमति नहीं दे रहा था । वह छाया भी बिजय के हाथों में बुरी तरह मचली. ... . I

किंतु विजय जानता था कि अवसर देना खतरे से खाली नहीं होगा और विजय के यह सोच लेने के पश्चात उस बेचारे की क्या मजाल कि कुछ कर जाए I अतः विधुत गति से विजय. ने रिवॉल्वर वही छोडा और चाकू निकालकर उसके पेट में घोंप दिया l छाया भयानकता के साथ मचली…पूर्ण शक्ति से उस छाया ने चीखना चाहा…किंतु विजय इतना शरीफ कहाँ था कि उसे इस सब में सफल होने देता I अत परिणाम यह हुआ कि चाकू लगते ही उसने खुन की उल्टी कर दी । विजय का हाथ भी खून में सन गया । किंतु वह छाया दुनिया से कूच कर गई । इस बीच विजय ने इतनी सावधानी अवश्य बरती थी कि खून की एक बूद भी ओंस्टिन के अदर न गिरे और वह अपने इस कार्य मेँ सफ़ल भी रहा ।

ठीक सात मिनट में ही विजय उसे खदेडकर झाडियों में डाल आया और उसके… स्याह कपडे विजय के जिस्म पर लगभग फिट ही थे ।

मतलब ये कि आठवें मिनट में वह ओँस्टिन में बैठा उसी ब्राड की सिगरेट फूक रहा था-जिसे वह इंसान फूक रहा था, हालाकि विजय सिगरेट इत्यादि नहीं पीता था, किंतु ऐसो नफरत भी नहीं करता था, क्योंकि उसका काम ही ऐसा था, जिसमे न जाने कब क्या करना पड़े ।

कभी कभी वह सिगरेट मे कश लगाता और किसी झकझकी की एकाध पंक्ति बडवडाकर स्वय ही खुश हो लेता था ।

तब…जबकि पाचो छायाए विकास के बेहोश जिस्म के साथ बिना किसी परेशानी के अपना कार्य पूर्ण करके वहा आई तो उसने लगभग उसी स्वर में कहा ।

"काम हो गया ?”

"......!"

इत्पादि वार्तालाप. के पश्चात आस्टिन आगे बढी ।

विजय ही नहीं बल्कि अन्य पार्चों ने भी चेहरे नकाब से ढक लिए थे ।

ओँस्टिन तीव्र वेग से दौड रही थी I कोई किसी से न बोल रहा था…सभी शांत थे ।।

एकाएक विजय चौंक पडा. ।

आस्टिन मे लगा ट्रासमीटर पिंक पिंक करने लगा । ड्राइवर ने तुरत ट्रांसमीटर ऑन किया…उसमेँ से आवाज आई ।

~.. . "यस .नबर शर्बीला सेशन ?"'

" यस महान आग के स्वामी !" आई एम शर्बीला सेशन सपीकिंग !"

"इतनी बेवकूफी अच्छी नहीं होती ।" दूसरी ओंर के लहजे में तीव्र गुर्राहट थी ।

-""क्या मतलब महान स्वामी ।" वह एकदम चौंका ।

विजय को भय हुआ कि कहीं उसका रहस्य तो नहीं खुल गया , किन्तु फिर भी वह स्वय को सयत्त किए शांति से बैठा रहा। यह एक अन्य बात थी कि उसने किसी खतरे से निबटने के लिए स्वय को पूर्णतया सतर्क कर लिया था । वह ध्यान से सुनने लगा ।

"एक मोटस्सइकिल निरतर तुम्हारा पीछा कर रही हैं और तुम लोग अनभिज्ञ हो l”

_ ---“ क्षमा महान स्वामी क्षमा !" शर्बीला सेशन स्थिति को संभालने का प्रयास करता हुआ बोला…"हम शीघ्र ही उससे पोछा छुडाने में सफल होंगे !"

" उससे पीछा मैं स्वयं छुडा लूगा !" दुसरी ओर से गुर्राया स्वर-"तुम पहले अपने बराबर में बैठे शर्जीला सेशन को गिरफ्तार करो---वो भयानक जासूस विजय के अतिरिक्त कोई नहीं I”

विजय जेसे आकाश से गिरा......!

★★★★
 
वास्तव मे उस अधेड की हरकत ही ऐसी थी कि उसे रंगीन मिजाज की उपाधि देनी पडती. है । यह वही अधेड. था, जो रघुनाथ की कोठी के पिछबाडे वाली गली में देखा गया था और विकास के जरिए फरार होने के बाद गधे के सींग साबित हुआ था । इस समय वह राजनगर. के प्रसिद्ध होटल सेबिना मे था । वह पहले. भी सेबिना में कई बार दाखिल होने का प्रयास कर चुका था, किंतु इसका क्या किया जाए कि दरबान हर बार उसके चौधरी जैसे परिधान को देखकर उसे वहा से खिसकने पर मजबूर कर देता था । अत परिणामस्वरूप उसके समस्त इरादों पर पानी फिर जाता-किंतु था वह भी कोई रांड का जवाई ही ।

उसने भी शायद निश्चय ही कर लिया था कि उसे 'सेविना' में अवश्य जाना है । तभी तो आज़ उसके शानदार जिस्म पर धोती-कुर्ते के स्थान पर शानदार चमकीला सूट नजर आ रहा था । काउटर से टेक लगाए वह किसी छटे हुए सेठ की भाँति सिगार में कश लगा रहा था ।

हाल मे शायद आज कुछ बिशेष आयोजन था…तभी तो हाँल की लगभग समस्त सीटें भरी थी l बैरे तत्पर्ता के साथ कार्य कर रहे थे । शराब के घुए से वातावरण कुछ रगीन-सा था । इस रंगीनी में शेष कमी पूरी कर रहे थे -पुरुषों के मिश्रित कहकहे l प्रत्येक इसान स्वय में ही मस्त नजर आता था । उस अधेड को भी किसी से कोई मतलब न था, क्योंकि उसके हाथ में एक पेग था , ऊगंलियो में दबा हुआ एक सिगार और बगल में वह जो उसकी गर्म जेब को ठडा करने के इरादे से उससे लिपटी जा रही थी किंतु बिचित्र था वह अधेड भी ।

अगर वह उस कॉलगर्ल को अपने पास से हटा नहीं रहा था था तो उसे अघिक लिफ्ट भी नहीं दे रहा था किंतु कॉलगर्ल को इससे क्या मतलब-उसकी निगाहों, में तो वह आसामी था । . . .

अत पैसे के अनुसार उस पर अपनी अदाओं नजरों इत्यादि के तीर चलाने से नहीँ चूक रही थी । अत वह अपने तन से पूर्णतया अधेड पर न्योछावर थी ।

_ किन्तु अधेड अपने अघरों के बीच नृत्य करती मुस्कान स्थायी रूप से केंद बनाए-उसकी ओर से लापरवाह उस एक पैग को क्षण-भर के लिए घूरता रहा । तभी वह कॉलगर्ल अपनी समस्त अदाओं को एक साथ ही एकत्रित करके बडे रोमाटिक ढग से बोली ।

"ये तुम्हारा दसवा पेग है डार्लिग ।।"

अधेड ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया । किंतु अपनी चमकीली आखों से उसे देखा अवश्य । उसके देखने का ढग भी कुछ विचित्र-सा था । जिसमे छिपी भयानकता भी थी और प्यार…सा भी । न जाने क्यों कॉलगर्ल कुछ काप-सी गई किंतु कापकर भी वह उसके जिस्म से और अघिक सट गई I अधेड की मुस्कराहट में लेशमस्त्र भी अंतर नहीं आया किन्तु शीघ्र ही उसने लडकी के चेहरे से निगाहे हटाकर पैग को घूरा मानो पैग को आखों के रास्ते ही से पेट मेँ पहुचा देगा किंतु कुछ नहीं हुआ, बल्कि एक ही घूट में वह उस पैग को कंठ से नीचे उतार गया।

कर्लगर्ल का काम तो मानो नाजो-अदा ही दिखाना था ।

तभी अधेड ने अपने सें थोडी दूर पर जाते हुए एक बैरे को अपनी ही भाषा में आवाज लगाई ।

"अरे ओछो रे यूह कू सन ।"

बैरा एकदम उसकी और घूम गया फिर मुस्कराता हुआ. उसके निकट आकर बोला ।

“बोलिए साब ।"

"यार यहा यूई रंगीन-सी मिले है-ऊ ना है देस्सी ?"

एक बार को तो बैरे का मन किया कि वह खुलकर कहकहा लगा दे…किन्तु मजबूर था. . .क्योकि अधेड फिर भी ग्राहक ठहरा और वह सिर्फ एक बेरा, अत: स्वय' क्रो कठिनाई.. से रोककर वह बोला------"'नहीँ साब !"

और अभी. शायद वह बेरा आगे भी कुछ कहना चाहता था कि वह थम । समस्त हाल चौंक पड़ा और सभी की नजरें एक और घूम गई ।

कुछ लोगों कै मुख से भयभीत चीखें भी निकल गई । कालगर्ल अधेड से लता की भाति चिपक गई ।

अधेड. के पास जो बैरा खडा, था…उसके, हाथ में एक पानी का . जग .था…जो तुरंत फर्श पर गिर चकना--चूर हो गया ।

उसके पीछे खड़ा-काऊटरमैन सूखे पते की भाति कापने लगा l अपने सूखे अधरों पर जीभ फेरकर वह बहुत ही धीमे स्वर में बडबडाया… I

…"पता नहीं बास ने इस राक्षस क्रो यहां क्यों रखा है ?"" . .

वास्तविकता यह थी कि बैरे के वाक्यो को एक अति सुदर लडकी की चीख ने बीच में ही रोक दिया । समस्त हाल केसाथ अधेड, व्यक्ति की दृष्टि भी एक झटके कै साथ उधर ही उठ गई और वास्तव मे चौंक वह भी पडा. था ।।

वह…एक अत्यत खूबसूस्त लडकी. की चीख थी जिसे एक भयानक नजर आने वाला हट्टा-कट्टा काला नीग्रो लगभग घसीटता हुआ हाँल से गुजारता हुआ सीढियों. की ओर ले जा रहा था । वह लडकी. अपनी शक्ति और' क्षमता के अनुसार निरंतर और पूर्णतया उस नीग्रो का,विरोध कर रही थी, किंतु कहां वह कोमल कली और कहां वह भयानक रूपी नीग्रो ! नीग्रो के भयानक और मजबूत हाथ उस कली की गोरी और नाजुक कलाई को थामे घसीटते ले जा रहे थे ।

--"'बचाओ., बचाओ. . .!" वह लडकी. निरतर अपनी सम्पूर्ण शक्ति से चीख रही थी, किंतु किसी पर उसकी चीखों का कोई असर नहीं हो रहा था…बल्कि इस दृश्य को देखकर सबकी हालत खस्ता हो गई थी । सभी बुरी तरह से आतकित हो चुके थे । मानो वह भयानक शक्तिशाली नीग्रो इंसान न होकर बीसबी सदी का राक्षस रहा हो । सभी भयभीत-से इस दृश्य को देख रहे थे । अधेड ने कापते हुए बैरे और काउटरमैन को देखा । एक क्षण के लिए उसकी दृष्टि कार्लगर्ल पर भी गई फिर भी उसने आतकग्रस्त हाँल को निहारकर अपनी निगाह उस नीग्रो और लडकी पर जमा दी…जो हाल के दूसरे कोने पर पहुच चुके थे । एकाएक अधेड चीखा…"अरे ओ कालिए अरे कहा ले जाय याक्कू ??”

वाक्य सुनते ही भयानक नीग्रो का खूखार चेहरा एक तीव्र झटके के साथ उसकी और घूम गया और साथ ही घूम गए हाल में उपस्थित समस्त चेहरे । सभी की आखों में जहा महान आश्चर्य उमड रहा था वहीं अधेड के प्रति सहानूभूति के भाव भी थे किंतु अधेड मानो उनसे बिलकुल लापरवाह था ।

. . यह दूसरी बात है कि नीग्रो की भयानक और दहकती लाल आखो के तेवर देखकर अदर-ही-अदर वह भयभीत होकर काप गया हो किंतु प्रत्यक्ष मे वह तनिक भी भयभीत न . हुआ वास्तव मे अधेड भी जान चुका था कि जोश मे आकर आज उसने साक्षात मौत को छेड दिया है ।

उस भयानक नीग्रो को मौत कहा जाए तो अधिक उपयुक्त होगा । नीग्रो के घूमते ही अधेड को अपना ,इरादा कुछ बदलता हुआ महसूस हुआ । उसने मन-ही-मन अपने शब्द वापस लेकर अपनी भूल सुधारने और नीग्रो से न टकराने का निश्चय किया…क्योकि वह भाप गया कि इस खूखार नीग्रो से टकराने का मतलब तो साक्षात मौत है --- अभी वह सोच ही रहा था कि ~

एकाएक न जाने कैसे उस लडकी का हाथ खतरनाक निग्रो की सख्त पकड से मुक्त हो गया । मुक्त होते ही वह पहले थोडी-सी लडखडा गई~~~~ फिर वह सभलकर अधेड की ओर भागी I

भागी तो वह निःसदेह किंतु प्रत्येक कदम पर ऐसा लग रहा था जैसे अब गिरी ~~~ बस अब गिरी ।

भागती भागती ही वह अपनी संपूर्ण शक्ति से चीखी~~~~!!

" भैया---ऽऽऽ---!" यह शब्द चीखती हुई वह बुरी तरह से लडखडाती हुई अधेड की ओर भागी । लडखडाकर वह अथेड़ के कदमों मेँ गिरने ही वाली थी कि न जाने अधेड़ में कौन-सी शक्ति का संचार हुआ? भैया...शब्द ने जाने कौन-सी

शक्ति प्रदान कर ,दी कि एक झटके के साथ उसकी उगलियों के

बीच फसा वह सिगार और छोटा-सा गिलास तो टूट ही गए I

साथ ही उसने स्वयं से लिपटी कालगर्ल को घक्का देकर अलग कर दिया और लडखडाकर… अपने कदमों में गिरती लडकी को अपनी बाहों में सभालकर आलिंगन किया न जाने किन भावनाओं से प्रेरित हो गया वह अधेड कि अगले ही पल उसका हाथ ठीक इस प्रकार स्नेह से उस लडकी के बालों पर घूमा मानो वह वास्तव मे उस लडकी का सगा भाई हो ।

अचानक वह लडकी' बुरी तरह सिसककर अपने भाई के सीने से लग गई ।

अधेडं शायद जान गया कि साधारण-सी वेशभूषा मे नजर आने वाली लडकी मध्यम वर्ग की हे-जिसने कभी होटलों में हंगामे देखे न हो, जो इन रंगनियों से बहुत परे हो, जिसे ये लोग अपनी हवस का शिकार बनाने हेतु यहा उठा लाए हैँ I

वर्ना होटलों की दुनिया में पली लडकी नीग्रो के इस प्रकार ले जाने का न तो विरोध ही करती और अगर किसी कारण विरोध करके वह उसकी सहायता भी चाहती तो 'भैया' जैसा पवित्र शब्द कभी न कहती । वह तो होती उसं कॉलगर्ल` की भाति जो कि अभी कुछ समय पूर्व उसकी, जेब ठडी करने के इरादे से उससे लिपटी खडी. थी ।

सोचते-सोचते उस अधेड की आखों मेँ दृढता उभर आई…एक क्षण पूर्व नीग्रो से टकराने का जो इरादा डगमगा गया था-वह चटटान की भांति अडिग हो गया I उसकी आखों मे भी खून झाकने लगा । उसने भी जलती आखों' से उस भयानक नीग्रो को देखा जो खूंखार ढग से उसी ओंर घूर रहा था I

हाॅल में मोत जैस्रा सन्नाटा था।
 
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