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अब प्रत्येक इसान उन दोनों के मध्य से हट गया था I उपस्थित प्रत्येक इंसान को बिदित था कि महज चद भावनाओं में बहका अधेड ने मोत को ललकारा है…जिसकै फलस्वरूप कुछ ही क्षणों उपरात हाल मे उसकी लाश तडपती नजर आएगी ।
"यह तुम क्या कर रहे हो चौधरी ? वह आज का सबसे खतरनाक आदमी जिम्बोरा है ।" एकाएक अधेड के कानों मे अपने पास खडे काउटरमैन की बडबडाहट टकराई किन्तु उस पर इसका लेश्मात्र भी अतर न पडा । वह उसी प्रकार नीग्रो को धूरता रहा I
अचानक नीग्रो कै मोटे, लटके हुए भद्दे और काले होठों ~ पर एक ऐसी क्रूर और जहरीली मुस्कान नाच उठी…मानो उसने अधेड को उसके इस अपराध के लिए क्षमा कर दिया हो । वह अत्यत भयानक और घरघराती-सी आवाज़ में लडकी से सबोधित होकर बोला l
"ये हिंदोस्तानी मच्छर तेरी क्या रक्षा करेगा छोकरी? अगर जिम्बोरा इसे फूंक भी. मार दे तो रस्सातल में समा जाए ।"
अधेड का उबलता खून मानो उफ़न गया I उफ़नकर मानो समस्त लहू आखों में तैर आया । समस्त जिस्म की नसों मे एकदम तनाव आ गया ।
ज़बडे शक्ति के साथ एकदूसरे पर जम गए । अत्यत खूखार दृष्टि से नीग्रो को घूरता हुआ वह चीखा ।…"कहा कै बे कालिए । मैं तोरी टाग पै टाग धर कै ~ चीर दूगो I"
उपरोक्त वाक्य ने मानो एकदमं नीग्रो की मुस्कान छीन ली । उसके भयानक जबडे किसी राक्षस की भांति फैले । भयानक तरीके से वह अधेड की तरफ़ बढा । इस बीच उसकी खतरनाक ~ कटार भी उसके हाथों में दबी थी I अधेड में न जाने कौन सी शक्ति का सचार हो गया था I
उसने भी लड़की को धीरे से स्नेह के साथ स्वयं से अलग किया और मौत बनकर, मौत से टकराने के लिए आगे बढा ।
. . समस्त हाल मे भयानक भय व्याप्त हो गया था । वहा मौत जैसी शाति थी ।
एक मौत दूसरी मौत की मृत्यु हेतु आगे बढ रही थी I
,ट्रांसमीटर पर दूसरी ओर की गुर्राहट सुनकर बिजय. इस. प्रकार सीट से उछल पडा जैसे--अचानक उसे बिच्छु ने डक मार दिया हो । क्षणमात्र के भी हजारवे भाग में वह समय की गभीरता को भाप गया । वह जान गया कि आग के बेर्टों का चीफ़ निहायत ही चालाक हे-उसका राज अब राज न रहा था l विद्युत गति से उसके हाथ अपने रिवाॅल्बर पर पहुच गए । वास्तव मेँ इस मामले में विजय ने अपनी सम्पूर्ण फुत्ती का प्रयोग किया था किन्तु इसका क्या किया जाए कि वह अपने इरादे मेँ असफ़ल रहा l इसके कई कारण थे…पहला ये कि आँस्टिन अत्यत छोटी थी और उसमें छः सात इंसान' बडी. कठिनाई से जमाए हुए थे I इतने छोटै-से स्थान पर इस स्थिति में विजय के लिए उन पाचों से टकराना असभव ही था ।
परिणामस्वरूप जेसे ही उसका हाथ रिवॉल्वर तक पहुचा कि वह सिहर उठा । एक साथ तीन रिबॉंल्वरौ की नालो ने उसके जिस्म के विभिन्न अगो' को स्पर्श किया ।
दो रिबॉंल्बर पीछे बैठी छायाओं ने उसकी गुद्दी से चिपका दिए और तीसरा रिवॉल्वर दाए बैठे एक अन्य नकाबपोश ने उसकी पसलियों से सटा दिया I
उसका हाथ जहां-का तहां ही चिपक गया । तभी उसके कानों मे अपने पीछे वाले के शब्द टकराए
-"'अगर कोई भी चालाकी दिखाने की चेष्ठा की तो खुदागंज पहुचा दिए जाओगे l"
"नहीं नहीं भाई साहब ऐसा बिल्कुल मत करना l"
बिजय चहककर बोला--- "अगर हम खुदागज पहुच गए तो हमारे बीवी-बच्चों का क्या होगा ? बेचारे अनाथ हो जाएगे I अरे वाह अरे वाह वाह I" बिजय ऐसे बोला…मानो स्टेज पर खडा कोई शायर "का" भतीजा-" क्या झकझकी याद आई है I हा तो झकझकी का विषय है अनाथ हो जाएगे । भई वाह हा . . तो प्या…!"
"'बको मत I ” अचानक पीछे वाला खतरनाक स्वर में गुर्राया ।
कारणवश विजय की कैची की भाति चलती जुबान में ब्रेक लग गए । उसकी बोलती पर ढक्कन लग गया किंतु--- वह भी अपने नाम का बस एक ही बिजय था I उसकी बोलती पर तो ढक्कन नि:सदेह लग गया, किंतु अब वह शतुरमुर्ग की भाति अपनी गरदन अकडाए, अपने चेहरे पर मूर्खता के भाव किए बडी विचित्र नजरो से एक…एक को घूर रहा था । तभी पीछे वाला गुर्राया ।
…"अगर बकवास की तो गोली मार दूंगा I”
"'"भाईं साहब आप बुरा न माने तो एक बात कहू।" बिजय के लहजे' से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह पैदाइशी शरीफ रहा हो I उसके बाद कोई शरीफ पैदा ही न हुआ हो I बैसे . इस समय वह अपनी पुरानी चाल चल रहा था । अत बेकार की बकवास. से शत्रु को बोर करके उसे असावधान करने की चाल I उसके उपरोक्त वाक्य से क्योकि शराफत टपकती थी ~ इसलिए पाचो चुप रहे I
विजय फिर बोला I
"हां तो भाई साहब…क्या मैं कहू ?"
"बको क्या बकना चाहते हो ?" पीछे बाला कुछ झुझलाए-से स्वर में बोला । I
"हां ,तो भाई स्राहब बात ये है कि मै आप लोगों को एक झकझकी सुनाना चाहता हूं I वेसे तो मे झकझकी सुनाने का टैक्स लेता हूं किंतु' इस समय क्योकि तुम मेरे बीबी-बच्चों को अनाथ करने का परमिट रखते हो----- --- इसलिए मैं तुम्हें मुफ्त मे एक झकझकी सुनाता हूं ।" विजय लगातार बके जा रहा था और वे पांचो' शात उसकी बात सुन रहे थे । विजय आगे बोला । . .
"हा तो मैं कह रहा था कि झका--- ये हैं एक बार एक बिल्ली और कुत्ते में फ्री स्टाइल कुश्ती हो रही थी बिल्ली मोसी ने कुत्ते मामा के छक्के छुड़ा दिए या यू कहिए कि उसे नाकों चने चबवा रखे थे या यू कहिए कि छठी का दूध याध दिला रखा था या यू कहिए.....!"
"चुप I" पीछे वाला सख्ती के साथ गुर्राया !!
" बंद कर अपनी ये बकवास ।"
एक बार फिर विजय की बोलती पर ढक्कन लग गया ।
--'"अगर अब आगे तुमने एक लफ्ज भी कहा तो मैँ तुम्हारी खोपडी मेँ रोशनदान बना दूगां ।" वह व्यक्ति गुर्राया I
"देखो भाई साहब I" विजय फिर उसी शराफत के साथ बोला…“बात यह है क्रि आप खोपडी में रोशनदान बनाए या चूहेदान लेकिन हम भी अपना झक्का पूरा किए बिना बाज नहीं आएगे । हा तो हम कह रहे थे कि बिल्ली ने कूत्ते मामा की ऐसी-तैस्री कर रखी थी कि तभी चूहा ताऊ उनके बीच में आया और उनका फैसला करने लगा । अब जनाब फैसला तो हो गया किंतु तभी बिल्ली मोसी और कुत्ते मामा चूहे ताऊ पर झपटे ।" इतना कहकर विजय एकदम चूप हो गया मानो लकवा मार गया हो ।
उन पाचो में से किसी के पास बुद्धि का इतना स्टॉक न था कि उसके झक्के के अर्थ को समझ पाते । अत एक-दुसरे की और प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे । मानो एकदूसरे से पूछ रहे हो कि झक्के का अर्थ क्या हुआ? ?
किन्तु वे बेचारे क्या अर्थ सोच सकते थे जबकि वास्तविकता यह थी कि विजय खुद इस बकवास का अर्थ नही जानता था । वह तो उन्हे असावधान करने कै लिए, जो उसके दिमाग में आया, बकता चला गया और वास्तव में वह किसी हद' तक उन लोगों को अपनी अटपटी बातो से उलझाकर असाबधान कर भी चुका था---- किन्तु इस छोटी सी आस्टीन मे कुछ करने मे असफल रहा ।
वातावरण अभी स्याह रात के दामन की कैद से मुक्त नहीं हो पाया था । चारों ओर उसी प्रकार का सन्नाटा-
वही नीरवता वही भयानकता व्याप्त. थी ।
प्रोफेसर हेमत की विशाल कोठी अबादी से दूर एकात में स्थित थी । स्याह अंधकार में खडी विशाल इमारत किसी दैत्य की भाति प्रतीत. होती थी कोठी के चारों और दूर-दूर तक का इलाका खेर्तों और मैंदानों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था ।
ऐसा प्रतीत होता था मानो नाटे कद के स्याह साए को आवारागर्दी के अतिरिक्त दूसरा कोई काम ही नहीं आप मानो सारी रात वह इसी प्रकार व्यतीत कर देना चाहता हो । इस समय वह प्रोफेसर हेमत की दैत्याकार कोठी के सामने वाली झाडियों¸ मे चुपचाप पड़ा था।
न जाने किसकी प्रतीक्षा थ्री उसे ? झाडियों में छिपे नाटे स्याह साए की आखें प्रत्येक पल प्रोफेसर हेमत की इमारत पर जमी हुई । उसे आज की रात वहा कुछ होने का सदेह हो ।
कभी कभी वह दूर तक बीरान पडी उस सडक को भी देख लेता था जो शात सोई हुई थी…क्रोठी के बरामदे में निरतर उसे एक जुगनू ऊपर-नीचे होता हुआ चमक रहा था । जब यह जूगनू ऊचा उठता तो क्षणमात्र के लिए प्रोफेसर हेमत के चौकीदार पठान का रोबीला चेहरा दमक उठता । यह जुगनू बीडी के अतिरिक्त कुछ भी न था-जो पठान ने अभी कुछ क्षणों पूर्व ही सुलगाई थी । नाटे कद के साए ने सब कुछ देखा था किन्तु शात था । वह चुपचाप झाडियों मे छुपा रहा l रघुनाथ की कोठी के पास से वह सीधा यही आया ओर उसे झाडियों में पडे लगभग दो घटे व्यतीत हो गए थे । किन्तु उसने अपना धैर्य नहीं खोया था ।
तब से अब तक कोई विशेष घटना भी घटित नहीं हुई थी किंतु उसे शायद पूर्ण आशा थ्री क्रि कोई
घटना अवश्य घटित होगी-तभी तो वह धैर्य के साथ झाडियों, में पडा हेमत की कोठी की निगरानी कर रहा था । निगरानी भी विशेषतया हेमत के कमरे की ।
हेमत का कमरा दुसरी मंजिल पर था । जिसके शीशे युक्त खिडकी से कमरे के भीतर का दृश्य हल्का व नीला घुघयुक्त-सा दीख पडता था क्योकि' कमरे में शायद नीले. रग का नाइट बल्ब हस रहा था । टकटंकी बाधे नांटा साया उसी खिडकी ,को घूर रहा था कभी-कभी उसकी निगाह रिक्त सडक की ओर भी उठ जाती थी । वातावरण यू ही शात रहा…किसी घटना अथवा दुर्घटना ने जन्म नही लिया किंतु कमाल था इस नाटे में भी-उसने भी अपना धैर्य नहीँ खोया था । शात पडा वह किसी बिशेष घटना की प्रतीक्षा कर रहा. था ।
"यह तुम क्या कर रहे हो चौधरी ? वह आज का सबसे खतरनाक आदमी जिम्बोरा है ।" एकाएक अधेड के कानों मे अपने पास खडे काउटरमैन की बडबडाहट टकराई किन्तु उस पर इसका लेश्मात्र भी अतर न पडा । वह उसी प्रकार नीग्रो को धूरता रहा I
अचानक नीग्रो कै मोटे, लटके हुए भद्दे और काले होठों ~ पर एक ऐसी क्रूर और जहरीली मुस्कान नाच उठी…मानो उसने अधेड को उसके इस अपराध के लिए क्षमा कर दिया हो । वह अत्यत भयानक और घरघराती-सी आवाज़ में लडकी से सबोधित होकर बोला l
"ये हिंदोस्तानी मच्छर तेरी क्या रक्षा करेगा छोकरी? अगर जिम्बोरा इसे फूंक भी. मार दे तो रस्सातल में समा जाए ।"
अधेड का उबलता खून मानो उफ़न गया I उफ़नकर मानो समस्त लहू आखों में तैर आया । समस्त जिस्म की नसों मे एकदम तनाव आ गया ।
ज़बडे शक्ति के साथ एकदूसरे पर जम गए । अत्यत खूखार दृष्टि से नीग्रो को घूरता हुआ वह चीखा ।…"कहा कै बे कालिए । मैं तोरी टाग पै टाग धर कै ~ चीर दूगो I"
उपरोक्त वाक्य ने मानो एकदमं नीग्रो की मुस्कान छीन ली । उसके भयानक जबडे किसी राक्षस की भांति फैले । भयानक तरीके से वह अधेड की तरफ़ बढा । इस बीच उसकी खतरनाक ~ कटार भी उसके हाथों में दबी थी I अधेड में न जाने कौन सी शक्ति का सचार हो गया था I
उसने भी लड़की को धीरे से स्नेह के साथ स्वयं से अलग किया और मौत बनकर, मौत से टकराने के लिए आगे बढा ।
. . समस्त हाल मे भयानक भय व्याप्त हो गया था । वहा मौत जैसी शाति थी ।
एक मौत दूसरी मौत की मृत्यु हेतु आगे बढ रही थी I
,ट्रांसमीटर पर दूसरी ओर की गुर्राहट सुनकर बिजय. इस. प्रकार सीट से उछल पडा जैसे--अचानक उसे बिच्छु ने डक मार दिया हो । क्षणमात्र के भी हजारवे भाग में वह समय की गभीरता को भाप गया । वह जान गया कि आग के बेर्टों का चीफ़ निहायत ही चालाक हे-उसका राज अब राज न रहा था l विद्युत गति से उसके हाथ अपने रिवाॅल्बर पर पहुच गए । वास्तव मेँ इस मामले में विजय ने अपनी सम्पूर्ण फुत्ती का प्रयोग किया था किन्तु इसका क्या किया जाए कि वह अपने इरादे मेँ असफ़ल रहा l इसके कई कारण थे…पहला ये कि आँस्टिन अत्यत छोटी थी और उसमें छः सात इंसान' बडी. कठिनाई से जमाए हुए थे I इतने छोटै-से स्थान पर इस स्थिति में विजय के लिए उन पाचों से टकराना असभव ही था ।
परिणामस्वरूप जेसे ही उसका हाथ रिवॉल्वर तक पहुचा कि वह सिहर उठा । एक साथ तीन रिबॉंल्वरौ की नालो ने उसके जिस्म के विभिन्न अगो' को स्पर्श किया ।
दो रिबॉंल्बर पीछे बैठी छायाओं ने उसकी गुद्दी से चिपका दिए और तीसरा रिवॉल्वर दाए बैठे एक अन्य नकाबपोश ने उसकी पसलियों से सटा दिया I
उसका हाथ जहां-का तहां ही चिपक गया । तभी उसके कानों मे अपने पीछे वाले के शब्द टकराए
-"'अगर कोई भी चालाकी दिखाने की चेष्ठा की तो खुदागंज पहुचा दिए जाओगे l"
"नहीं नहीं भाई साहब ऐसा बिल्कुल मत करना l"
बिजय चहककर बोला--- "अगर हम खुदागज पहुच गए तो हमारे बीवी-बच्चों का क्या होगा ? बेचारे अनाथ हो जाएगे I अरे वाह अरे वाह वाह I" बिजय ऐसे बोला…मानो स्टेज पर खडा कोई शायर "का" भतीजा-" क्या झकझकी याद आई है I हा तो झकझकी का विषय है अनाथ हो जाएगे । भई वाह हा . . तो प्या…!"
"'बको मत I ” अचानक पीछे वाला खतरनाक स्वर में गुर्राया ।
कारणवश विजय की कैची की भाति चलती जुबान में ब्रेक लग गए । उसकी बोलती पर ढक्कन लग गया किंतु--- वह भी अपने नाम का बस एक ही बिजय था I उसकी बोलती पर तो ढक्कन नि:सदेह लग गया, किंतु अब वह शतुरमुर्ग की भाति अपनी गरदन अकडाए, अपने चेहरे पर मूर्खता के भाव किए बडी विचित्र नजरो से एक…एक को घूर रहा था । तभी पीछे वाला गुर्राया ।
…"अगर बकवास की तो गोली मार दूंगा I”
"'"भाईं साहब आप बुरा न माने तो एक बात कहू।" बिजय के लहजे' से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह पैदाइशी शरीफ रहा हो I उसके बाद कोई शरीफ पैदा ही न हुआ हो I बैसे . इस समय वह अपनी पुरानी चाल चल रहा था । अत बेकार की बकवास. से शत्रु को बोर करके उसे असावधान करने की चाल I उसके उपरोक्त वाक्य से क्योकि शराफत टपकती थी ~ इसलिए पाचो चुप रहे I
विजय फिर बोला I
"हां तो भाई साहब…क्या मैं कहू ?"
"बको क्या बकना चाहते हो ?" पीछे बाला कुछ झुझलाए-से स्वर में बोला । I
"हां ,तो भाई स्राहब बात ये है कि मै आप लोगों को एक झकझकी सुनाना चाहता हूं I वेसे तो मे झकझकी सुनाने का टैक्स लेता हूं किंतु' इस समय क्योकि तुम मेरे बीबी-बच्चों को अनाथ करने का परमिट रखते हो----- --- इसलिए मैं तुम्हें मुफ्त मे एक झकझकी सुनाता हूं ।" विजय लगातार बके जा रहा था और वे पांचो' शात उसकी बात सुन रहे थे । विजय आगे बोला । . .
"हा तो मैं कह रहा था कि झका--- ये हैं एक बार एक बिल्ली और कुत्ते में फ्री स्टाइल कुश्ती हो रही थी बिल्ली मोसी ने कुत्ते मामा के छक्के छुड़ा दिए या यू कहिए कि उसे नाकों चने चबवा रखे थे या यू कहिए कि छठी का दूध याध दिला रखा था या यू कहिए.....!"
"चुप I" पीछे वाला सख्ती के साथ गुर्राया !!
" बंद कर अपनी ये बकवास ।"
एक बार फिर विजय की बोलती पर ढक्कन लग गया ।
--'"अगर अब आगे तुमने एक लफ्ज भी कहा तो मैँ तुम्हारी खोपडी मेँ रोशनदान बना दूगां ।" वह व्यक्ति गुर्राया I
"देखो भाई साहब I" विजय फिर उसी शराफत के साथ बोला…“बात यह है क्रि आप खोपडी में रोशनदान बनाए या चूहेदान लेकिन हम भी अपना झक्का पूरा किए बिना बाज नहीं आएगे । हा तो हम कह रहे थे कि बिल्ली ने कूत्ते मामा की ऐसी-तैस्री कर रखी थी कि तभी चूहा ताऊ उनके बीच में आया और उनका फैसला करने लगा । अब जनाब फैसला तो हो गया किंतु तभी बिल्ली मोसी और कुत्ते मामा चूहे ताऊ पर झपटे ।" इतना कहकर विजय एकदम चूप हो गया मानो लकवा मार गया हो ।
उन पाचो में से किसी के पास बुद्धि का इतना स्टॉक न था कि उसके झक्के के अर्थ को समझ पाते । अत एक-दुसरे की और प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे । मानो एकदूसरे से पूछ रहे हो कि झक्के का अर्थ क्या हुआ? ?
किन्तु वे बेचारे क्या अर्थ सोच सकते थे जबकि वास्तविकता यह थी कि विजय खुद इस बकवास का अर्थ नही जानता था । वह तो उन्हे असावधान करने कै लिए, जो उसके दिमाग में आया, बकता चला गया और वास्तव में वह किसी हद' तक उन लोगों को अपनी अटपटी बातो से उलझाकर असाबधान कर भी चुका था---- किन्तु इस छोटी सी आस्टीन मे कुछ करने मे असफल रहा ।
वातावरण अभी स्याह रात के दामन की कैद से मुक्त नहीं हो पाया था । चारों ओर उसी प्रकार का सन्नाटा-
वही नीरवता वही भयानकता व्याप्त. थी ।
प्रोफेसर हेमत की विशाल कोठी अबादी से दूर एकात में स्थित थी । स्याह अंधकार में खडी विशाल इमारत किसी दैत्य की भाति प्रतीत. होती थी कोठी के चारों और दूर-दूर तक का इलाका खेर्तों और मैंदानों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था ।
ऐसा प्रतीत होता था मानो नाटे कद के स्याह साए को आवारागर्दी के अतिरिक्त दूसरा कोई काम ही नहीं आप मानो सारी रात वह इसी प्रकार व्यतीत कर देना चाहता हो । इस समय वह प्रोफेसर हेमत की दैत्याकार कोठी के सामने वाली झाडियों¸ मे चुपचाप पड़ा था।
न जाने किसकी प्रतीक्षा थ्री उसे ? झाडियों में छिपे नाटे स्याह साए की आखें प्रत्येक पल प्रोफेसर हेमत की इमारत पर जमी हुई । उसे आज की रात वहा कुछ होने का सदेह हो ।
कभी कभी वह दूर तक बीरान पडी उस सडक को भी देख लेता था जो शात सोई हुई थी…क्रोठी के बरामदे में निरतर उसे एक जुगनू ऊपर-नीचे होता हुआ चमक रहा था । जब यह जूगनू ऊचा उठता तो क्षणमात्र के लिए प्रोफेसर हेमत के चौकीदार पठान का रोबीला चेहरा दमक उठता । यह जुगनू बीडी के अतिरिक्त कुछ भी न था-जो पठान ने अभी कुछ क्षणों पूर्व ही सुलगाई थी । नाटे कद के साए ने सब कुछ देखा था किन्तु शात था । वह चुपचाप झाडियों मे छुपा रहा l रघुनाथ की कोठी के पास से वह सीधा यही आया ओर उसे झाडियों में पडे लगभग दो घटे व्यतीत हो गए थे । किन्तु उसने अपना धैर्य नहीं खोया था ।
तब से अब तक कोई विशेष घटना भी घटित नहीं हुई थी किंतु उसे शायद पूर्ण आशा थ्री क्रि कोई
घटना अवश्य घटित होगी-तभी तो वह धैर्य के साथ झाडियों, में पडा हेमत की कोठी की निगरानी कर रहा था । निगरानी भी विशेषतया हेमत के कमरे की ।
हेमत का कमरा दुसरी मंजिल पर था । जिसके शीशे युक्त खिडकी से कमरे के भीतर का दृश्य हल्का व नीला घुघयुक्त-सा दीख पडता था क्योकि' कमरे में शायद नीले. रग का नाइट बल्ब हस रहा था । टकटंकी बाधे नांटा साया उसी खिडकी ,को घूर रहा था कभी-कभी उसकी निगाह रिक्त सडक की ओर भी उठ जाती थी । वातावरण यू ही शात रहा…किसी घटना अथवा दुर्घटना ने जन्म नही लिया किंतु कमाल था इस नाटे में भी-उसने भी अपना धैर्य नहीँ खोया था । शात पडा वह किसी बिशेष घटना की प्रतीक्षा कर रहा. था ।