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उपन्यास -साथ चलते हुए...

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न जाने कितनी देर बाद कौशल ने कहा था - जानती हो अपर्णा, जिस दिन यह करोडों भूखे-नंगे लोग एक साथ उठ खड़े होंगे, अन्याय का यह साम्राज्य ध्वस्त होकर रह जाएगा... फ्रांस की खूनी क्रांति के विषय में सुना है न? ... उसी की तरह यहाँ भी खून की नदियाँ बहेंगी, ऐश्वर्य के राजप्रसाद ढहकर जमीन पर गिरेंगे, अन्यायियों के सर गिलोटिन में कटकर रास्तों में लुढ़कते फिरेंगे...

उसकी बात सुनकर अपर्णा सिहर उठी थी - कौशल...

- हाँ अपर्णा, यह छ्द्मवेशी राजे-महाराजे, उनके मंत्री, उनके पाले हुए गुंडे, धर्म के ठेकेदार... इनका अत्याचार अब चरम को पहुँच रहा है... इतिहास गवाह है, अब इनका प्रतिरोध होगा, प्रतिकार होगा... हर क्रिया की प्रतिक्रिया अनिवार्य है... बेजान वस्तु पर भी प्रहार करो तो टंकार उठती है, यह तो जीते-जागते मनुष्य हैं। कब तक चुप रहेंगे? कौशल की आवाज में अजीब खौल थी, गहरा उबाल -

रणभेरी बज उठी है... मुट्ठियाँ तन रही हैं, बाजू फड़क रहे हैं, झुके हुए सर, कंधे उठ रहे है, मेरुदंड सतर हो रहे हैं... शिराओं में रक्त का प्रवाह अब उष्ण हो रहा है... अन्यायी चेत जाए, अपनी सुखनिद्रा से जागे... युद्ध अवश्यमभावी है...

कौशल में जैसे कोई आसेव उतरा था। वह अजीब आवाज में बोल रहा था। नशे में चूर। सुनकर अपर्णा सचमुच डर गई थी - तुम यह सब क्या कह रहे हो कौशल... युद्ध! रणभेरी!

- हाँ, युद्ध, एक आर-पार की लड़ाई... अगर इसी तरह अन्याय, शोषण और दमन का यह भीषण चक्र चलता रहा तो एक दिन ऐसा ही होगा, निश्चित जानो... अपनी बात के अंत में आते-आते कौशल गहरी उत्तेजना में हाँफ रहा था।

उस रात बँगले के बरामदे में बैठी-बैठी शायद वह ऊँघ गई थी। न जाने कितनी देर बाद किसी की आहट पाकर यकायक उसकी आँख खुल गई थी। सामने मुल्की खड़ी थी - बदहवाश-सी। इससे पहले की वह उससे कोई सवाल कर पाती, उसके हाथ में कागज का एक पसीजा हुआ टुकड़ा थमाकर बँगले की सीढ़ियाँ उतरकर वह रात के अंधकार में तेजी से खो गई थी।

कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में बैठे रहकर उसने हाथ की मुट्ठी में बंद उस कागज के टुकड़े को खोलकर पढ़ने का प्रयत्न किया था। बहुत जल्दी में कुछ शब्द घसीटकर लिखे गए थे। शायद पसीने से अधिकतर अक्षर धुँधला गए थे -

अपर्णा दी, इसी निविड़ अरण्य में घुटकर मर जाना मेरी नियति है। तुमसे पहले भी मुझे किसी ने धूप नहाई दुनिया में चलने का निमंत्रण दिया था। मगर वह स्वयं यहाँ के गहन अंधकार में खोकर रह गया। तुमने पापा की बंदूक देखी है और उनकी बातें भी सुनी है। वह जिस जमीन में आज मिट्टी बनकर मिल गया है, उसी जगह पर खड़ा है चंपा का वह पेड़ जिसके फूल मैं तुम्हें भेंट दिया करती थी। मैं मेरे पापा के अपाहिज जीवन की एकमात्र बैशाखी हूँ और वे मुझे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहेंगे। उनकी विवशता ने उन्हें बहुत स्वार्थी बना दिया है। यह जंगल मेरे लिए एक जिंदा कब्र ही है जहाँ मुझे अपनी या पापा की अंतिम साँस तक रहना पड़ेगा... जो कोई भी मुझे उनसे दूर ले जाने की कोशिश करेगा, उसका हश्र भी वही होगा जो बहुत पहले किसी का हुआ था। तुम जितनी दूर हो सके यहाँ से चली जाना। मैं इस जंगल में एक और चंपा का पेड़ नहीं रोपना चाहती...

वह चिट्ठी पढ़ते हुए उसकी दृष्टि धुँधला गई थी। मेरुदंड में बर्फ उतरने लगी थी। बहुत मुश्किल से अपने अंदर उठती हुई कँपकँपाहट को रोका था उसने। सामने पड़ी मेज पर मानिनी का दिया हुआ चंपा का फूल अभी तक पड़ा हुआ था जो उसने उसे कल उसके बँगले से आते हुए दिया था - पीला और मुर्झाया...

यही फूल वह कौशल को दिया करती थी। एक गहरी साँस लेकर उसने बाहर की तरफ देखा था। गहरे घने जंगल में उतरी रात देर तक बरसकर अभी-अभी फीके हुए बादल के पीछे से यकायक निकल आए चाँद से गोरी हो आई थी। चेहरे से टकराती भीगी हवा में कहीं आसपास खिलते चंपा की मादक गंध थी। उसे अपने नासापुटों में महसूसते हुए उसे अनायास ख्याल आया था, न जाने इस हत्यारे जंगल में इनसानी खून से सींचे हुए रक्त चंपा के और कितने ऐसे अभागे पेड़ होंगे...

इसके बाद और कई दिन नामालूम-से बीते थे। अपने उपन्यास को फिनिशिंग टच देते हुए वह कहीं बाहर नहीं निकल पाई थी। कौशल भी कोलकाता गया हुआ था किसी काम से, इसलिए उससे भी मुलाकात नहीं हो पाई थी। उस दिन दोपहर को खाने के बाद बरामदे में आ बैठी थी। उपन्यास के आखिरी दृश्य में कुछ संशोधन करने थे।

थोड़ी देर बाद डाकिया उस दिन का डाक दे गया था - कुछ पत्रिकाएँ, चिट्ठियाँ...

अभी वह उन्हें देख ही रही थी कि बँगले के अहाते में धूल उड़ाती हुई एक पुलिस की जीप आकर रुकी थी। जीप के रुकते ही दो सिपाही कूदकर नीचे उतरे थे और फिर भागते हुए बँगले के पीछे की तरफ सर्वेट क्वाटर की तरफ चले गए थे। घटना की आकस्मिकता से वह यकायक घबरा उठी थी। पुलिस यहाँ क्यों आई थी...

एक इंस्पेक्टर को अपनी ओर बढ़ते देख वह अपनी कुर्सी से कपड़े सँभालते हुए उठ खड़ी हुई थी।

नमस्ते मैडम! अशिष्ट ढंग से कहते हुए वह इंस्पेक्टर उसके सामने खड़ा हो गया था - क्षमा कीजिएगा, इस तरह से आना पड़ा... अच्छा, ये गोपाल कहाँ है?

जी... वह उनके प्रश्न का आशय समझ नहीं पाई थी।

गोपाल... नहीं जानती आप उसे! सुना है, आपका तो काफी आना-जाना होता है उनकी बस्तियों में...

वह कोई जबाव देती इससे पहले ही दो सिपाही पुनिया और उसके पति को धकेलते हुए वहाँ ले आए थे। पुनिया का बेटा उसकी पीठ से बँधा जोर-जोर से रो रहा था। पुनिया भी काफी घबराई हुई दिख रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसका पति अपना दोनों हाथ जोड़े थर-थर काँप रहा था।

- क्यों रे, गोपाल को कहाँ छिपा रखा है?

इंस्पेक्टर साहब ने पुनिया के पति को रूलर से कोंचा था - सच-सच बताना, वर्ना तुम सब भीतर जाओगे। महाजन को मारा है, नकदी भी लूटी है...

- हमको कुच्छो नहीं मालूम सरकार!

पुनिया अब जोर-जोर से रोने लगी थी।

- नक्सल का साथ दोगे तो... अगर इधर आया तो थाना जरूर खबर करना...

कहते हुए इंस्पेक्टर एक बार फिर उसकी तरफ मुडा था - मैडम, घूमने आई हैं इधर आप, रेंजर साहब कह रहे थे। यहाँ के लफड़े से दूर ही रहिए... वर्ना मुसीबत में पड़ जाएँगी। लिखती हैं आप...

कहते हुए उसने बिना पूछे उसकी पांडुलिपि उठा ली थी - जल,जंगल, जमीन... शुभचिंतक हैं आप आदिवासियों की... अच्छा है, लिखिए... अभी कल ही कुछ आपत्तिजनक दस्ताबेज जब्त किए है दास बाबू से - पत्रकार हैं, लिखते हैं - आप ही की तरह, अब जाएँगे अंदर कुछ वर्षों के लिए...

भद्दे ढंग से हँसते हुए उसने पांडुलिपि फिर से मेज पर रख दी थी - कुछ रोमांस-वोमांस पर लिखिए - गुलशन नंदा टाइप... कॉलेज के दिनों में खूब पढ़ते थे हम भी - लरजते आँसू, झील के उस पार... फिल्म भी बनी थी उन कहानियों पर! आपने देखी होगी? खासकर वो वाला गीत - एक बार मुझको पिला दे शराब देख फिर होता है क्या... मुमताज! एकदम मस्त... हम तो हॉल में उठकर नाचने लगते थे... जवानी के दिन थे... हा हा हा... अच्छा नमस्कार!

 
उनके जाते ही उसने पुनिया से पूछा था - यह पुलिस गोपाल को क्यों ढूँढ़ रही थी? गोपाल को उसने कल रात बँगले के अहाते में देखा था। वह पुनिया की बहन का पति था। उनकी नई-नई शादी हुई थी। एक दिन पति-पत्नी शादी के बाद उसके पाँव छूने आए थे। गोपाल एक बेहद हँसमुख, सजीले स्वभाव का लड़का था। हमेशा हँसता रहता था। कितने खुश लगते थे दोनों पति-पत्नी एक साथ। कहाँ रहते हो पूछने पर दूर की पहाड़ियाँ दिखा दी थी - वहाँ माईजी...

- वहाँ... वहाँ कहाँ रे? वहाँ तो बस जंगल है...

- जंगल ही तो हमरा घर है माईजी...

पुनिया ने ही बाद में बताया था, गाँव के महाजन ने उनकी जमीन हथिया ली है। बाप-दादा के लिए उधार का ब्याज वर्षों से चुकाते रहे, मगर कर्ज खत्म न हुआ और अब न जाने कैसे-कैसे कागज दिखाकर उसकी बीघाभर जमीन भी हथिया ली। जवान खून था उसका, रोक नहीं पाया खुद को, पीट डाला महाजन को। अब पुलिस पीछे पड़ी है। जो भी सरपंच, महाजन या जमीदार के विरुद्ध आवाज उठाता है, उसे नक्सल कहकर अंदर करवा देते हैं या उसका एनकाउंटर करवा देते हैं।

कौशल सुनकर अनमन हो गया था - सामाजिक न्याय के अभाव में प्रतिरोध की चेतना कुंद होकर रह गई है लोगों की... कोई सर उठाता है तो कुचल दिया जाता है। यह एक चौतरफा लड़ाई है... और मंजिल दूर! मगर इसी से तो हारकर बैठ नहीं सकते...

- क्या कर सकेंगे? उसने झिझकते हुए पूछा था।

उसके अंदर एक अनाम डर घोंसला डाल चुका था, शायद इसमें कौशल के लिए उसकी चिंता छिपी थी। न जाने कहाँ-कहाँ फिरता है, किन लोगों के बीच उठता-बैठता है। वह सही है, वह जानती है, मगर समय सही नहीं। धूप की जड़ों में फैलती हुई काली, कदर्य परछाइयों को उसने महसूस लिया है। पथराए हुए मौन के ठीक पीछे कोई बवंडर दम साधे पड़ा है। एक छोटी-सी चिनगारी और बस, सब कुछ राख हो जायगा... बारूद की ढेर है यह रूँदी हुई जमीन, अपने भीतर आग के बीज अँखुआए पड़ी है - सदियों से स्तब्ध, निर्वाक... मगर रगो-रेश से खौलती हुई... कितनी आर्तनाद यहाँ की जमीन पर समय के साथ जमकर ठोस हुई है, अनगढ़ पठारों में तब्दील हुई है... सेमल की गंध से बोझिल हवा में घुली हल्की चिरांध को उसने सूँघ लिया है, तभी कहीं से अस्थिर है।

कौशल ने उसके सवाल का कोई जबाव नहीं दिया था, बस चुपचाप चलता रहा था। इस समय चाँद ठीक उसके पीछे था - खूब बड़ा और उजला... उसकी पीठ पर चमकता हुआ, किसी मुहर की तरह। आगे उसकी परछाई थी - दूर तक तैरती हुई... कुछ देर चलने के बाद कौशल अनायास उसकी ओर मुड़ा था - यदि कभी पुनिया की बहन तुम्हारे पास आए, उसे अपने पास छिपाकर रखना, माँ बननेवाली है वह...

- क्यों, वह क्यों आने लगी मेरे पास...? वह कहीं से लरज उठी थी - क्या हो रहा है यहाँ! कौशल ने फिर उसके सवाल का कोई जबाव नहीं दिया था - बस, इतना जरूर करना...

जंगल के माथे पर बादल घिर आए थे, साँवली, धूसर गठरियों की तरह - नीचे की ओर अपने भार से उतरते हुए, जैसे जमीन पर बिछ जाएँगे। ठंडी हवा में भीगी मिट्टी की गंध थी, कहीं दूर बारिश हो रही थी शायद। उन्होंने चलते हुए अपने कदम तेज कर दिए थे। काले, गंदले पानी से भरे हुए कोयला खदान के पास से गुजरते हुए उन्हें जानवर की देह की तेज दुर्गंध मिली थी। कौशल उसके पास सरक आया था -

हम यहाँ से जल्दी निकल चलें, सुना है, पड़ोस के जंगलों से कोई आदमखोर इस तरफ निकल आया है। कल ही जंगल से लकड़ी चुनकर लौटती हुई एक औरत पर हमला किया है, सदर अस्पताल में पड़ी है। लगता नहीं बचेगी। आधा चेहरा चबा डाला है, पहचान में नहीं आती...

सुनकर उसके शरीर पर काँटे उग आए थे।

कौशल ने उसके डर को समझा था शायद, इसलिए जब तक वह अपने कमरे में पहुँचकर अंदर से दरवाजा बंद नहीं कर लिया था, वह गेट पर खड़ा रह गया था।

उस रात उसने बैठकर पुराना अल्बम देखा था - काजोल की तस्वीरें - कितनी सारी - पहली बार अन्नप्रासन में खीर खाते हुए, घुटनों पर घिसटते हुए, डगमगाते कदमों से चलते हुए... सब कुछ याद आता है उसे। जैसे कल की घटी घटनाएँ हों। इच्छा होती है, उसे तस्वीर से निकालकर अपनी गोद में ले ले। जो इतना स्पष्ट, जीवंत है, वह कहीं नहीं... उसे यकीन करने में आज भी तकलीफ होती है। कई बार यथार्थ और कल्पना में फर्क करना कठिन हो जाता है। सब कुछ है, मगर नहीं है... काजोल की आवाज वह सुनती है, तुतली जबान में उसकी कविताएँ, उसका रोना, मचलना... उसका स्पर्श भी जीवित है - उसकी बाँहों में, गोद में! बालों की गंध, छोटे-छोटे हाथों की कोमल छुअन... वह हर पल जीती है उसे... इसलिए हर पल मरती भी है...

कितना त्रासद है यह सब कुछ उसके लिए - जिसमें उसकी खुशियाँ छिपी हैं, उसी में उसके दुख भी हैं - दुखों का उत्स... जिन स्मृतियों में वह रहना चाहती है, कभी उन्हीं को भुलाने की कामना करती है। उसका जीवन-मृत्यु, दुख-सुख- सब कुछ एक ही है, एक में है! वह अपनी काजोल की स्मृति के बिना जी नहीं सकती और उससे परे हुए बिना भी जी नहीं सकती। क्या करे वह... कहीं कोई हल नहीं! हारकर उसने सब कुछ वक्त के हाथों में छोड़ दिया है, जो होना है, वह समय ही तय करेगा। कुदरत की अपनी मर्जी, नियम और समय होता है, उसी के अनुसार सब कुछ होना है, होता रहा है।

न चाहते हुए भी अतीत बार-बार उसके सामने आ खड़ा होता है, तकलीफ देता है। जीवन का आधा जिस हिस्से में रख आई है, उसे भुलाया भी कैसे जा सकता है। कभी हँसी का कोई टुकड़ा, एक चेहरा, गंध, छुअन... यहाँ-वहाँ से निकलकर रास्ता रोक लेती है, हाथ पकड़ लेती है। वह छूटना चाहती है, मगर नहीं चाहती। वही खड़ी रह जाती है देर तक...

उसे याद आता है, एक पूरी रात रोने के बाद दूसरी सुबह वह जाने के लिए तैयार हो रही थी। आशुतोष और तापसी सुबह-सुबह शापिंग के लिए निकल गए थे। तापसी को फर्नीचर देखना था, उसे उनके बैठक का भूरा लेदर सोफा पसंद नहीं, वह कपड़ों का बना सोफा चाहती है। उनके जाने के बाद वह उस फ्लैट में अकेली रह गई थी। सागरिका ने फोन किया था, वह रात को दूसरे शहर से लौटते हुए उसे अपने साथ ले जाएगी। शायद दस बज जाए।

ड्रॉइंग रूम में बैठी वह सोचती रही थी। उस दिन वह हर तरह से मुक्त हो गई थी। शायद उसे खुश होना चाहिए था। अनचाहे रिश्ते का बोझ आज उतर ही गया था। मगर अंदर एक स्तब्ध चुप्पी अडोल दीवार की तरह खड़ी है। शोक और खुशी के बीच का अंतर खो गया है एकदम से...

वह अपने से बाहर निकलने की कोशिश में काँच की लंबी खिड़की से बाहर देखती है। वहाँ भी सब कुछ अंदर जैसा है - सफेद कागज पर अंकित चुप्पी की लंबी फेहरिस्त की तरह - एकदम शब्दहीन, निर्वाक...

कल रात से बर्फबारी हो रह है। रूई के गालों-से झरते आकाश के नीचे सबकु सफेद हो गया है। एक-एक फुट ऊँची बर्फ की चादर बिछी हुई है चारों तरफ। क्रिसमस के ऊँचे पेड़ बर्फ का लबादा ओढे ध्यान मग्न-से एक कतार में चुपचाप खड़े हैं। हर तरफ वही तटस्थ निःस्तब्धता और सील-सा बँधा हुआ एकांत... तेज हवा खिड़कियों पर दो हत्थड़-से मारते हुए गुजर रही हैं। काँच रह-रहकर झनझना रहे हैं।

वह एक गहरी साँस लेती है। एक बार फिर स्वयं को टटोलती है। अब वह क्या करना चाहती है? जिंदगी के नाम पर जो कुछ भी उसके पास बचा रह गया है, उसका कुछ तो बंदोबस्त करना है। सामने वही निरुत्तर मौन है - अहिल्या की तरह पाषाण खड़ा हुआ। उसे अनायास संदेह हुआ था - इस कुरुक्षेत्र के बाद उसके भीतर कुछ जीवित रह पाया है या नहीं - कुछ भी - हँसी या आँसू, जिसे जीवन का संकेत कहा जा सके। वह साँस लेती है, चलती-फिरती है, मगर अब शायद यह भी काफी नहीं। जीवन शायद इससे आगे की कोई चीज है। वह इस क्षण किसी हिसाब-किताब में उलझना नहीं चाहती थी। इन सब के लिए जिंदगी पड़ी है, खूब लंबी-चौड़ी...

सबसे पहले उसे यह तय करना है कि उसे खुद का करना क्या है। यकायक वह स्वयं को जिंदगी के बीचोबीच खड़ी पाती है - जैसे किसी नो मैन्सलैंड में - एकदम डिफेंसलेस और वलनरेवल... सारे सरहदों के पार... देश-विदेश के दायरे से परे...! बेघर शब्द की विडंवना को आपाद-मस्तक झेलते हुए!

पैतीस वर्ष की अवस्था है उसकी। वह यानी श्रीमती अपर्णा लाहिड़ी... आशुतोष लाहिड़ी की पत्नी, कल तक एक दस वर्ष की बच्ची की माँ - एक भरे-पूरे घर की मिस्ट्रेस... मगर आज नियति की एक ही ठोकर से हर रिश्ते से अचानक कटकर किसी भटके हुए नक्षत्र की तरह एकदम निसंग - अंतरिक्ष में यहाँ-वहाँ डोलती हुई, भारहीन, दिशाहीन, पूरी तरह से निरुद्देश्य...

अंदर किसी अनाम गहराई से एक घुमेर-सी उठती है और पहाड़ी धुंध की तरह अक्समात छाती चली जाती है। आसपास एक वृत्त-सा रचता है। आजकल वह अपनी हौलदिली को दोनों हाथों से समेटे खड़ी रहती है। ये डूबता हुआ-सा अहसास इन दिनों हमेशा बना रहता है। अवसाद के लिए वह कब से इलाज में है। गहरी, मटमैली अनुभूतियाँ अंदर पत्थर की तरह जमकर बँधने लगी है। इसके नीचे उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा चला गया है। पानी में तैरते हुए बर्फ की चट्टान की तरह - सतह पर कम और मन की नीली, स्याह गहराइयों में ज्यादा डूबा हुआ।

वह अपनी इन आर्द्र हथेलियों में क्या-क्या सहेजे, पूरा जीवन ही बिखरा पड़ा है। ठीक मेले के उठ जाने के बाद का-सा बिखराव... दूर-दूर तक...वह एक सिरा सँभालती है तो दूसरा सिरा हाथ से छूटकर गुम जाता है।

खिड़की से हटकर वह किचन में आ गई थी, कुछ करने, व्यस्त हो जाने की गरज से। आजकल यह बहुत जरूरी हो गया है - हर समय काम करना, खुद को उलझाए रखना। यह रात दिन का खुद से भागते रहना बहुत थका देनेवाला अनुभव था। मगर करे भी तो क्या, अपने भीतर दो घड़ी ठहरा भी तो नहीं जाता। वह परकोलेटर से उठते हुए भाप को अनमन देखती रही थी, अंदर हर क्षण घिर आते हुए आद्रता की बोझिल अनुभूति लिए।

 
एकांत में हर आवाज शोर बन जाती है। इसी शोर से वह आजकल हर समय घिरी रहती है। सब कुछ - सब कोई उससे इतनी दूर चले गए हैं कि अब उनकी आहट तक नहीं आती - मन से तो बिल्कुल नहीं आती। मगर उसकी असली त्रासदी शायद यह है कि जो लोग आहट से भी परे चले गए हैं, वह आज भी उन्हीं के इंतजार में अपनी दहलीज पर खड़ी रहती है। उसे बस उन्हीं की प्रतीक्षा है - हर पल, हर घड़ी... काश वह अपने इस इंतजार से कभी छूट पाती... मगर शायद यह अपने आप से छुटने जैसा ही कठिन है। इनसान सिर्फ हार-मांस का ही बना हुआ कहाँ होता है। उसके रचाव में यह संवेदनाएँ भी तो होती हैं - हर रेशे में गुँथी हुईं - हवा और गंध की तरह...

वह चाय का कप लेकर ड्राइंग रूम में आती है। पूरा कमरा अपनी हर चीज के साथ तटस्थ दिखता है - होटलों जैसी साफ-सफाई और सायास गढ़ी गई सुंदरता... कहीं घर जैसा आत्मीय बिखराव नहीं जहाँ दो पल निश्चिंत होकर पैर फैलाया जा सके। विडंबना तो यह है कि यह सब उसी के हाथों रचा-गढ़ा गया है, मगर उसमें मन के चाव की जगह अनुशासन और नियमों में रहने की बाध्यता ही ज्यादा हावी रही है।

अपने ही अनजाने वह कब इस मशीनी व्यवस्था की हिस्सा हो गई उसे पता ही नहीं चला। फिर यह मन ही क्यों पड़ा रह गया पीछे - उस देश में जहाँ रिश्तों की एक लंबी-चौड़ी फेहरिस्त में आज उसका कोई नहीं। क्यों इन ठंडे-प्राणहीन मकानों में रह-रहकर उस घर की याद हो आती है जिसकी छत और दीवारें रिश्तों की महक और उनके प्यार-तकरार से बनी हुई थी। उनके आँगन की एक टुकड़ा जाड़े की रेशमी धूप मेह-बर्फ से ठिठुरते मटमैले मौसमों में बोरसी के सुखद ताप की तरह अब भी स्मृतियों में छा जाती है। जिस जमीन में नाल गढता है, मन भी वही आजन्म गढ़ा रह जाता है शायद... फिर इनसान की बाँहें किसी भी आसमान को क्यों न छू लें।

एक मौसम होता है जब पक्षी अपने देश लौट जाना चाहता है, यह मौसम भी कुछ वैसा ही था। एक मछली की तरह अपने क्षण-क्षण निकट आती मौत की बेला में वह भी जैसे प्रतिकूल लहरों में कूद पड़ना चाहती है, बह जाना चाहती है नियति की निर्मम दारा में। कहीं तो वह जमीन मिले जहाँ जीवन पहली बार अँखुआया था, फिर मृत्यु ही क्यों न वहाँ प्रतीक्षा में खड़ी मिले...

मगर बीच में यह पंद्रह साल खड़े हैं - आसमान से भी ऊँची दीवार की तरह! और विडंबना यह है कि यह दीवार उन्होंने ही खड़ी की है - एक-एक ईंट जोड़कर... इसे तोड़ना, ध्वस्त करना भी अब खुद को है और यही सबसे कठिन काम है। पूरी देह-मन को जो लताएँ घेरी हुई हैं, उन्हें काटकर फेंक देना इतना सहज नहीं। यह रिश्ते हैं - उसके सायास बनाए हुए, उससे जन्मे और पले-पुसे हुए...

पंद्रह साल पहले वह गहने और सिंदूर से दपदपाती हुई इस देश में आई थी, साथ में थे ढेरों सपने और उन्हें पूरे करने के वे सातों बचन जो उसे अपने जीवन साथी से एक महीने पहले शादी के मंडप में मिले थे। वही उसका संबल था जिसे सहेजे वह इस पराई जमीन पर अपना घर बाँधने आ गई थी - अपनी पूरी आस्था और यकीन के साथ। तब उसे पता नहीं था, बहते हुए साहिल से ठिकाना माँगने का नतीजा बिखराव के सिवा और कुछ भी नहीं होता, हो नहीं सकता...।

शुरू-शुरू के दिन सपने जैसे थे - खुली आँखों के जीते-जागते सपने... दिन के उजाले में आकार लेते हुए, रचते हुए, खूबसूरत खिलौने जैसे घर, साफ-सुथरी चौड़ी-चौड़ी सडकें, जगमगाती हुई दुकानें, बाग-बगीचे... परियों का, किस्से-कहानियों का देश, ठीक जैसे बचपन में माँ से सुनती थी।

वह एक बार फिर अपने बचपन की उमंग में उतर आई थी। बड़े चाव से अपना डॉल हाउस सजाया था। उसका पति आशुतोष इंजीनियर था - प्रतिष्ठित और संपन्न! उसके डॉल हाउस के लिए उसने जो भी माँगा उसे दिया गया। उसने खूब चाव से सजाया अपना डॉल हाउस। प्यार की उंगली से हर कोने में इंद्रधनुष रचाया, अपना मन ही ओढ़ा दिया पूरे घर को...

उसे नीला रंग पसंद था, उसका घर नीले सुख-स्वप्न-सा बनकर झिलमिलाने लगा। मगर कागज-गत्ते की दीवारों में वह घर की मजबूती कहाँ से लाती... ये तो ठोस रिश्तों से ही बन पाते हैं। सतह के चाक्-चिक्य में भूली वह सजती-सँवरती रही, पति के साथ पार्टियों में जाती रही। हर वीक एंड में बंच, छुट्टियों में तफरीह... जीवन एक कभी खत्म न होनेवाले जश्न की तरह बीत रही थी।

इस चहल-पहल और रौनक के बीच उसने उन अदृश्य दुश्मन हाथों को नहीं देखा जो निरंतर उसके घर में सेंध लगा रहे थे। या देखकर भी अदेखा कर दिया। शायद जागने के लिए जिस सपने के टूट जाने की शर्त लगी थी, वह उसे स्वीकार नहीं था।

गोद में काजोल आई तो वह और भी निश्चिंत हो गई। घर की सारी खिड़की-दरवाजे खोलकर अपने सपनों की दुनिया में खो गई। एक दबी-सी आहट तो कभी-कभी उसे भी आती रही थी, मगर उसने उसे सायास रोक दिया था। अंदर का एक निःशब्द पलायन, जिसका उसे स्वयं पता नहीं था। वह किसी भी अभाव को स्वीकारना नहीं चाहती थी, और इसी अस्वीकार में अपना सुरक्षा देखती थी शायद। मगर आँख मूँदने से ही तो कबूतर बच नहीं जाता बिल्ली की झपट से...! वे थे और अंतःसलिला की तरह अंदर ही अंदर फैल भी रहे थे। जिस दिन यह बात जाहिर हुई, तब तक उसका प्रायः पूरा ही घर इस डूब के हिस्से आ गया था।

जड़ों में लगे दीमक इसकी सारी मजबूती चाट गए थे। एक तरफ वह थी, दूसरी तरफ आशुतोष - हर क्षण दूर जाते हुए, बदलते हुए। वह अंगुल-अंगुल चौड़ाते हुए इस खाई को जितना भी पाटने का प्रयास करती, वह उतना ही अजनबी बन जाता। कहाँ क्या कमी रह गई थी, वह समझ नहीं पा रही थी। और एक दिन आशुतोष ने ही कहा था - कोई कमी नहीं है, तभी तो...

मन का आखिरी बूँद तक भर जाना एक नए तरह के अभाव को जन्म देता है, तब वह कहाँ जानती थी। पता होता तो वह अपने संबंध को इतना परफेक्ट नहीं बनने देती। उसने जैसे हर तरह से भरकर अपने रिश्ते को खाली कर दिया था।

अंततः आशुतोष ने भी यही इल्जाम दिया था उसे। सजा हुआ घर, सजी हुई वह... सब कुछ सजा हुआ! ऐसे सजे हुए डॉल हाउस में एक गुड्डे की तरह जीना उसके लिए कठिन हो गया था, वह असली जिंदगी जीना चाहता था, रोमांच से भरी - ये आशुतोष के शब्द थे - नेजे की तरह उसमे उतरते हुए, लहूलुहान करते हुए... वह रोई थी- मगर इसमें उसका क्या कसूर? उससे तो यही सब उम्मीद की गई थी। बार-बार उससे कहा गया था, अपना देशीपन छोड़ो, यहाँ की दुनिया अलग है। यहाँ के तौर-तरीके सीखो, वरना कभी एक्सेपटेड नहीं हो पाओगी।

उसके लंबे बाल कतरवा दिए गए, साड़ी छुडवा दी गई। पार्टियों में जींस पहने, हाथ में वाइन का गिलास लिए वह स्वयं को ही पहचान नहीं पाती। आशुतोष पीते-पीते अपनी सिगरेट उसके होंठों से लगा देता, सबके सामने दबोचकर चूम लेता। शुरू-शुरू में वह लाल पड़ जाती थी। एक समय के बाद समुद्र तट में नंगी-अधनंगी विदेशी भीड़ के बीच बिकनी में सन क्रीम लगाकर धूप सेंकना उसके लिए कोई असहज बात नहीं रह गई थी...।

इतना तो बदल लिया था उसने स्वयं को आसुतोष के लिए, और क्या चाहता था वह उससे? वह अपना चेहरा उतार देती? अपना जिस्म बदल देती? क्या करती, और क्या करती...? कई बार वह दीवारों से बातें करती, आसमान से पूछती, मगर एक सर्द सन्नाटे के सिवा हाथ कुछ भी न आता।

आशुतोष बिना किसी प्रश्न का जबाव दिए और-और दूर होता चला गया था। देर रात तक घर न लौटना, सेमिनार, कान्फ्रेंस के नाम पर हफ्तों गायब रहना... पहली बार उसके ऑफिस की बूढ़ी सेक्रेटरी ने उसे चेताया था - यू इनोसेंट गर्ल, अपने पति पर नजर रखो, ये गोरी चुड़ैलें रात दिन मर्दों पर घात लगाए बैठी रहती हैं! सुनकर वह सन्न रह गई थी। वह मद्रासी ईसाई औरत शायद दोनों की चमड़ी के साझे रंग के लिए उससे सहानुभूति कर गई थी। इसके बाद ही उसे पता चला था, आशुतोष ने दूसरे शहर में बाकायदा अपार्टमेंट ले रखा है, जहाँ वह अपनी ब्राजिलियन प्रेमिका के साथ दिनों तक पड़ा रहता है। सुनकर उसने पूरा घर सर पर उठा लिया था। यहाँ तक कि आशुतोष का चेहरा तक नोंच लिया था।

बात खुलने पर आशुतोष बिल्कुल ही लापरवाह हो गया था। अब तिनके की ओट भी नहीं रह गई थी। इंटरनेट पर देर रात तक चेटिंग, पोर्न साइट में जाना, फोन सेक्स... सब कुछ उसके सामने खुला पड़ा था। बेशर्मी की इस हद ने उसे अवाक करके रख दिया था।

'मैं कहाँ चला जा रहा हूँ, हर रात तुम्हारे पास ही तो लौट आता हूँ! ये घर, बच्चा, सुख-सुविधाएँ - क्यों खुश नहीं रह सकती तुम...?'

उसकी बातों का जबाव न देकर वह अपने मायके चली गई थी। मगर फिर छह महीने में लौट भी आई थी। माँ के बाद मायके में कुछ नहीं बचा था, यह उसे समझा दिया गया था। यहाँ से भी शुभचिंतकों के फोन आते थे - कोई अपना घर इस तरह नहीं छोड़ता। लौट आओ, सब कुछ तुम्हारा है।

मगर लौटकर भी कोई बात बनी नहीं थी। इसके विपरीत आशुतोष का हौसला और भी बढ़ गया था। उसने समझ लिया था, उसका और कहीं आसरा नहीं। उसकी विवशता को उसने तुरत-फुरत नकद भी कर लिया था। झगड़ा, उपालंभ, मान-मनुहार - कुछ भी काम नहीं आया था। और आखिर एक दिन थककर उसने संधि कर ली थी।

इस संधि के निर्मम शर्तों ने उसे धीरे-धीरे अवसाद की स्याह गहराइयों में धकेल दिया था। आशुतोष ने जो रास्ता चुन लिया था, उसमें शायद कोई यू टर्न नहीं था। गेंद उसने उसके पाले में डाल दिया था - यू टेक इट अॅर लीव इट, द चॉयस इज योरस्... वह क्या छोड़ती, बस जो मिला, ले लिया... ये जीने की जुगाड़ थी, अस्तित्व का सवाल था, कोई विकल्प भी कहाँ था। उसने अपनी बच्ची पर कानसेंट्रेट करना शुरू कर दिया।

 
एक रोबोट की तरह वह चल-फिर रही थी, अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रही थी। मगर जिंदगी से खुशी, सुकून, यकीन जैसी नियामतें एक-एककर खोती चली गई थीं। वह कुछ भी नहीं कर पाई थी। अपने रिश्ते का असल ही उसका संबल था, अब जो वही नहीं था तो वह खुद चुकने से कैसे रह जाती। हर तरह से टूटती हुई वह खत्म होने के कगार पर पहुँच रही थी। हर दिन उसके अंदर से कुछ खोता जा रहा था। हर पल एक डूब अंदर बनी रहती थी। जैसे किसी तल टूटे जहाज का सफर - जितना सतह पर उससे ज्यादा नीचे की ओर...

समझौतों पर टिका हुआ रिश्ता आखिर कितना सहारा देता, और कब तक... मगर उसके सामने उसकी बच्ची का चेहरा था। खुद को भुलाकर वह उसके लिए जीने की कोशिश करती रही थी। वह नहीं चाहती थी, एक टूटे परिवार के घाव उसकी बच्ची को सहना पड़े। वह खुद जिंदगी की बारिश में भीगती हुई उसके लिए छतरी बनी हुई थी। उसे धूप, सर्दी-गर्मी से बचाना उसका अकेला मकसद रह गया था।

यहाँ सबके कदम के साथ कदम मिलाकर चलना सहज नहीं था उसके लिए। एक पागल दौड़ में यहाँ सभी शामिल हैं, मगर जाना कहाँ है शायद किसी को नहीं मालूम... बस पिछड़ जाने के डर से हमेशा त्रस्त हैं। यहाँ के ट्रेंडी लाइफ में कुछ भी आउट डेटेड नहीं हो सकता। अस्तित्व के खतरे ने सभी को हाँके में डाल रखा है, सभी भयभीत पशु की तरह दौड़ रहे हैं और दौड़ते हुए एक और जंगल में खोते जा रहे हैं। यहाँ सब कुछ इतना सधा-तना और योजनाबद्ध है कि एक पल के लिए भी असतर्क नहीं हुआ जा सकता। स्नायु जैसे प्रत्यंचा-सी चढ़ी रहती है हर समय। सब कुछ ठीक ढंग से करने की सायास चेष्टा, व्यवहार में ओढ़ी हुई सभ्यता, जबरन याद दिलाए गए एटिकेटस्...

प्रायवेसी की हद ये कि किसी का भला करते हुए भी दस बार सोचना पड़ता है कि हम किसी की प्रायवेसी या अधिकार के रास्ते में तो नहीं आ रहे हैं। पता नहीं, यहाँ लोग अपनी भलाई किस बात में देखते हैं। यहाँ आदमी जिस्म से जितना खुला है, मन से उतना ही बँधा हुआ है। वह हर कदम पर लकीरें खींचकर अपने लिए दायरे रच रहा है। एक-दूसरे से कट रहा है। अकेले होने और होते चले जाने की न जाने ये कैसी होड़ है, कैसी पागल जिद है...

जाने वह कब यहाँ की इस मशीनी जिंदगी का हिस्सा हो गई है, आईने के सामने खड़ी होकर उसे ख्याल आता है। आजकल वह स्वयं को शिनाख्त करने में ही जैसे असमर्थ हो गई थी। ये अंदर का सफर होता है जो इनसान को थका देता है। वह अपने ही अंदर के पत्थरों से टकराती रहती है, आहत होती रहती है। अपनों के बीच बढ़ते जा रहे फासलों को तय कर सके, वे पाँव वह कहाँ से लाए। ये काम जिन संवेदनाओं के बुते होते हैं, वे भी अब कहाँ रहे थे। जो पुल उन्हें एक-दूसरे तक पहुँचाता था, वह तो कब का टूट चुका था। अब उसके दुख दूसरी तरफ नहीं पहुँचते, न दूसरी तरफ की खुशियाँ इधर कभी दस्तक ही देती है। साझे का दुख-दर्द बँटकर चाहे कम न हो, मगर सह जाते हैं। अकेले की तो खुशियाँ भी बर्दाश्त नहीं होतीं। मन पर लगाम लगाए वह किस दौड़ का हिस्सा बनती, कहाँ तक पहुँचती...

वह जानती थी, एक दिन उसकी बच्ची भी औरों के बच्चों की तरह बड़ी हो जाएगी। इतनी बड़ी कि अपने माँ-बाप का कहा सुनना, मानना भी अपनी इनसल्ट समझ सके। वह यहाँ सालों से है। अपने परिचितों के घरों में देखती है, जो बच्चे कल तक इतने छोटे होते हैं कि वे टी.वी. पर क्या देख रहे हैं, माँ-बाप को ध्यान रखना पड़ता है, अचानक इतने बड़े हो जाते हैं कि हाई वे पर एक सौ अस्सी कि.मी. की तेज रफ्तार से गाड़ी चलाकर अपनी जान दे सकते हैं, नाइट क्लब में नशा करके जिस-तिस के साथ रात गुजार सकते हैं, और यह सब उनके अधिकार क्षेत्र में आता है! बात-बात पर उनका सीना निकालकर अपने बडों के सामने खड़ा हो जाना - इटस् माय लाइफ...

यहाँ लोग अपनी जिंदगी खुद पाते हैं, खुद जीते हैं। बीच में माँ-बाप या और कोई नहीं होता। हाँ, मदर्स डे या फादर्स डे में एक बड़े केक और फूल के साथ अपने माँ-बाप को यह लोग थैंक्स कहना कभी नहीं भूलते। आखिर यह औपचारिकता और शिष्टाचार का देश है - सभ्य लोगों का सभ्य देश... वह हैरत के साथ देखती है - लोगों के एक ही घर में कई-कई घर होते हैं और हर घर की अपनी-अपनी जिंदगी होती है!

गैर तो दूर की बात, अपने भी आवश्यकता के निहायत जरूरी क्षणों में इनमे बिना दस्तक दिए दाखिल नहीं हो सकते। हर दरवाजे पर 'डु नॉट डिस्टर्ब' की तख्ती लटकी रहती है। उठती जवानी का अबाध्य, उद्दंड व्यवहार, अवज्ञा, नशा... इन सब से लोगों को अकेले ही जुझना पड़ता है। एकल परिवार की विडंबनाएँ... जीवन के इन कठिन समय में संस्थाओं के अलावा शायद ही किसी अपने का साथ मिलता है। किसी के पास अतिरिक्त समय नहीं, समय का अभाव हर जीवन में बना रहता है।

अपने बच्चों की भलाई सोचते हुए अक्सर माँ-बाप उनके रास्ते का काँटा बन जाते हैं। वह आतंक के साथ देखती है, मिसेज मित्रा की पंद्रह वर्ष की बेटी अपनी माँ के मेडिसीन कैबिनेट से बर्थ कंट्रोल की गोलियाँ निकालकर बिंदास गटकती है और मिसेज मित्रा नजरें चुराती सामने खड़ी रह जाती हैं। सोलह वर्ष का बेटा कार पार्किंग में घंटों अपनी गर्लफ्रेंड के साथ कार में बंद होकर पड़ा रहता है और वे देखकर न देखने का बहाना करते हुए अपना सम्मान बचाती फिरती हैं।

कई बार पूरी-पूरी रात वे बच्चों की चिंता में जागकर काट देती हैं, मगर बच्चे उन्हें एक फोन करने की भी जरूरत नहीं समझते। पूछने पर वही जबाव मिलता है - नाउ वी आर बीग मॉम, स्टॉप बॅदरिंग... पार्टी, हाली डे आदि का सिलसिला कभी थमता ही नहीं। यहाँ आकर लोग यहाँ की सुख-सुविधाएँ देखते हैं, तो यहाँ का चलन और संस्कृति को भी झेलना ही पड़ेगा...

सबके अस्त--व्यस्त कमरे ठीक करते, खाना बनाते, लांड्री करते वह अक्सर सोचा करती थी कि वह अपनों के जीवन में क्या मायने रखती है। वह अपनी भूमिका तय नहीं कर पाती थी - वह अपनी बच्ची की माँ है या एक आया! एक पत्नी है, गृहिणी है या घर के काम करनेवाली एक अवैतनिक नौकरानी, जो कभी-कभी जिस्म की भूख मिटाने के भी काम आ सकती है। जीने के लिए इतनी सारी कठिन शर्तें... कभी-कभी उसने संजीदगी के साथ सोचा था, क्या मौत इससे बेहतर विकल्प नहीं!

जिस दिन उसने सुना था, आशुतोष की एक स्ट्रीप डांसर कीप ने उसके बच्चे को जन्म दिया है, वह अदालत में तलाक की अर्जी दे आई थी। सबने बहुत समझाया था, मगर उसके धैर्य की सीमा खत्म हो गई थी। उसका सीना आकाश से ज्यादा तो नहीं फैल सकता था न! धरती भी अंदर के दबाव से कभी फट पड़ती है, ढह जाती है, फिर वह तो हाँड़-मांस की एक इनसान ही थी। अपने अंदर सील की कठोरता कहाँ से लाए। दिल है और वह धड़केगा भी नहीं...!

तलाक की एक लंबी लड़ाई में भी वह अकेली ही रही। किसी से भावनात्मक सहारा तक नहीं मिला। सब अपनी-अपनी दुनिया में गुम थे। अपनों का साथ देने का, दुख-दर्द बाँटने का जो संस्कार अपनी जमीन, अपने देश में मिलता है, यहाँ लोग उनसे महरूम रह गए थे। दोष किसे देती! आसमान पाने की फिराक में अपने पाँव की जमीन भी खो बैठी थी। अब तो बस बहना और अंततः डूबना ही था।

चार साल तक हाथ में फाइल लिए वह इधर-उधर भटकती रही थी, वकीलों के हाथों शोषित होती रही थी। घरों में आग लगाकर हाथ सेंकनेवाले लोग थे वे। अच्छी संभावनाएँ दिखाकर गहरे पानी में ले जाकर हाथ छोड़ दिया था उसका। कानून ने भी कोई खास सहारा नहीं दिया था।

इन दिनों विदेशों में तलाक संबंधी कानून में बहुत सारे परिवर्तन आए थे। अब स्त्रियों को पहली जैसी सहूलियतें और लाभ नहीं मिलता है। एक तरह से उनके विरोध में ही कानून की कई धाराएँ खड़ी हो गई थीं। बच्चे के वयस्क हो चुकने की स्थिति में उनका प्राप्य सीधे उन्हें ही दे दिया जाता है। उसे बताया गया था तलाक हो जाने पर गुजारे लायक एक बँधी हुई रकम हर महीने पाँच साल तक उसे दिया जा सकता था। उसके बाद यह रकम भी मिलनी बंद हो जानेवाली थी। अदालत भविष्य के लिए अपनी योग्यता के अनुसार कोई काम ढूँढ़ने की सलाह तलाकशुदा औरतों को देती है। वैसे आशुतोष के पेंशन से उसे कुछ मिलनेवाला था जरूर, मगर वह पैसठ वर्ष की अवस्था के बाद ही।

इसी लड़ाई के बीच काजोल बीमार पड़ गई थी और वह सब कुछ भूलकर उसके साथ व्यस्त हो गई थी। सारी दुनिया पड़ी रहे, पहले काजोल, सिर्फ काजोल...

इन्ही दिनों उनके जीवन में तापसी का प्रवेश हुआ था। दुख की घड़ियों में वह सतर्क रहना भूल गई थी, दुनियादारी भूल गई थी, शी कुड नॉट केयरलेस... उसने एक बच्चे की तरह यकीन किया था, उसका तो यही हश्र होना था।

सुबह शॉपिंग के लिए निकलते हुए तापसी ने उसे सामानों का एक अदद लिस्ट पकड़ा दिया था, जो वह अपने साथ ले जा सकती थी। वह चाँदी का कटोरा जिससे उसने अपने बेटे को पहली बार अन्नप्रासन का खीर खिलाया था, अब महज एक सामान में तब्दील हो गया था। उसके बेगम अख्तर की गजलों का सी.डी. कलेक्शन भी अब पराया हो गया था, वह कश्मीरी कालीन भी जो उसने अपने हनीमून पर खरीदी थी।

पैसा आशुतोष का था, और पैसा जिसका होता है, सामान भी उसीका होता है, उसका नहीं जो उससे प्यार करता या सँभालता है। जो चीजें संवेदनाओं से जुडी थी, वे अब बेजान सामानों की फेहरिस्त में आ गई थीं। कल तक ये चीजें उसकी छुअन से धड़क-धड़क उठती थीं। उसकी उंगलियों के पोरों पर उनका स्पर्श हर क्षण जीवित था। बिना सोचे उसने काजोल के अन्न प्रासन का कटोरा उठा लिया था - इसकी कोई कीमत नहीं हो सकती थी...

जहाँ अपने होते हैं, वही अपना देश होता है। यही सोचकर एक दिन इस विदेश में आ बसी थी। मगर अपना परिवार खोने के बाद तो यह विदेश भी छूट गया था। बेघर हो जाना शायद सही अर्थों में इसी को कहते हैं। मगर इसका भी अपना एक परवटेड किस्म का सुख होता है, उसने पहली बार जाना था। कुछ भी खो जाने के भय से मुक्ति, निःशेष हो जाने की उपलब्धि... अचानक उसने लेंडिंग में जाकर अपना ओवरकोट पहन कर कानों पर शॉल लपेट ली थी - जरा ताजी हवा में घूम आएगी। झरते बर्फ में चलना उसे हमेशा अच्छा लगता है।

दरवाजा खोलते ही ठंडी हवा का रेला उसे झकझोर गया था। सारा दिन बैठे-बैठे कट गया था। अब शाम गहरी हो गई थी, रात से पहले का गहरा नीला अंधकार...

आज तक वह सुख-सुविधा की जिंदगी जीती रही थी, मगर एक कीड़े की तरह रेंगते हुए। आज भले वह यथार्थ की कठोर जमीन पर खड़ी है - मगर अपने पैरों पर, अपनी रीढ़ के बल पर खड़ी है! सामने निपट अँधेरे में डूबी सर्द रात है, मगर वह आगे बढ़ना चाहती है, रास्ता तलाशना चाहती है। अब बस, यही बात महत्व का है, बाकी सब गौण है।

उसने फ्रिज में एक शैंपेन की बोतल चिल करने के लिए रखी हुई है - आजादी, चाहे वह जिस कीमत पर भी मिली हो - उसका जश्न तो होना ही चाहिए। धीरे-धीरे टहलते हुए वह रूई के गालों-से झरते वर्फ के साथ अपने चेहरे पर सर्द हवा की हल्की थपथपाहट को आँखें मूँदकर महसूस करती है। उसे रात के और गहराने का इंतजार है, क्योंकि वह जानती है, सुबह ठीक उसके बाद ही आ सकेगी। एक उमर तक दूर-दूर तक भटकने के बाद आज उसे अपनी ओर लौटना अच्छा लग रहा है। एक निरर्थक तलाश को छोड़कर अपना देश, अपना घर अब उसे स्वयं ही बनना है...

न जाने रात का क्या समय हुआ था, जब उसके दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई थी। थोड़ी देर पहले ही उसकी आँख लगी थी। खाने के बाद वह काफी देर तक पुनिया की बहन सकालो से बात करती रही थी। सकालो देर शाम को उनके यहाँ आई थी, काफी अस्त-व्यस्त अवस्था में। परेशान लग रही थी। बाद में उसी ने बताया था, गोपाल एक दिन पहले फरार हो गया है। पुलिस उसे ढूँढ़ रही है।

क्या वह सचमुच नक्सल बन गया है? उसके सवाल पर सकालो उसे टुकुर-टुकुर ताकती रही थी - अब ई हम का जाने दीदिया, बात तो सिरफ यही है कि गाँव के महाजन ने हमरी जमीन ले ली। पूछताछ करने लगे तो मार-पीट की। इसको भी गुस्सा आ गया, उल्टा हाथ छोड़ बैठा। फिर पुलिस आई, का जाने महाजन ने का समझाया-बुझाया, अब पुलिस कहती है कि उ नक्सल बन गया है...

कौशल के कहे अनुसार उसने उसे उस रात अपने कमरे में सुला लिया था। फर्श पर एक तरफ चटाई बिछाकर वह सोई थी।

दस्तक की आवाज से उसके साथ-साथ सकालो भी उठ बैठी थी। दरवाजा अभी तक लगातार खटखटाया जा रहा था। उसने सकालो की तरफ देखा था। वह गठरी बनी फर्श पर बैठी हुई थी। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। विस्फारित आँखों से वह उसे देख रही थी।

उसे अलमारी की ओट में छिपने का इशारा करके उसने दरवाजा खोल दिया था। सामने इंस्पेक्टर खड़ा था -

आपने दरवाजा खोलने में बड़ी देर की मैडम! सो रही होंगी। एक बात बताइए, इधर सकालो आई थी! दोनों औरत, मरद भागे हुए हैं, बहुत बड़ा कांड किए हैं इलाके में...

- नहीं, इधर तो नहीं आई...

कहते हुए उसने यथासाध्य अपनी आवाज को संयत रखने की कोशिश की थी। अंदर अनायास आतंक की सर्द लहरे घुमड़ने लगी थीं। क्या हो जो वे उसके कमरे की तलाशी लेने लगे...

- अच्छा, नहीं आई...!

इंस्पेक्टर ने एक बार कमरे के अंदर सरसरी-सी निगाह फिराई थी और फिर मुड़कर सीढ़ियाँ उतर गए थे - आखिर भागकर जाएँगे कहाँ...

दरवाजा बंदकर वह अपने बिस्तर पर बैठ गई थी। उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था। सकालो भी आकर उसके सामने जमीन पर बैठ गई थी। वह भी शायद बहुत डर गई थी। दोनों एक-दूसरे से कुछ कह नहीं पाए थे। बस चुपचाप बैठे रह गए थे, बाहर की आहट लेते हुए। बाहर कोई जोर-जोर से बोल रहा था। उनमें पुनिया की आवाज भी सम्मिलित थी। वह रो रही थी शायद।

बहुत देर बाद, जब बाहर सुनाई देता हुआ शोर धीरे-धीर कम हुआ था, दोनों सो गए थे, न जाने कब! अपने ही अनजाने...

नींद में किसी पहर उसे अस्पष्ट-सा लगा था कि जैसे उसने कहीं दूर गोली चलने की आवाज सुनी हो। कुछ देर तक वह कान लगाकर सुनने की कोशिश करती रही थी, मगर फिर सब कुछ शांत हो गया था।

 
सुबह उठकर उसने देखा था, सकालो का बिस्तर खाली पड़ा है। जाने कब वह उठकर चली गई थी। बाहर निकलकर उसने देखा था, महुए के पेड़ के नीचे बैठी पुनिया रो रही है। गेट के पास कुछ लोग खड़े आपस में धीमी आवाज में बाते कर रहे थे। उसे देखकर सब चुप हो गए थे।

बाद में पुनिया ने ही बताया था, भोर रात को पुलिस ने गोपाल को सूखे नाले के पास गोली मार दी है। उसकी लाश को सदर अस्पताल ले जाया गया है। सुनकर सकालो भी वहाँ चली गई है। पुनिया ने उसे बहुत मना किया था, मगर उसने उसकी एक नहीं सुनी थी।

सुनकर वह देर तक चुप रह गई थी। पुनिया की आँखों से बहते हुए आँसू ने उसे कहीं से बहुत छोटा, बहुत बौना कर दिया था। कोई कद नहीं है उसका - उन जैसे लोगों का...

कमरे में बंद होकर वह अपने उपन्यास के पन्ने निरुद्देश्य उलटती-पलटती रही थी। कागजों पर लिखे इन्कलाब और उनका झूठा गुमान... मगर आज... जब जिंदगी की कटु सच्चाइयाँ सामने नंगी होकर खड़ी हैं, दरवाजा बंद करके स्वयं को महफूज कर लेने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प उसके पास नहीं है। शब्द और शब्द... खोखले और निरर्थक! इनमें अर्थ कहाँ है, सामर्थ्य भी क्या है इनका! इनके वास्तविक अर्थ को जीने का साहस तो इनके रचयिता के पास भी नहीं है। शब्दों के कागजी हथियार और नारे...

यकायक सब कुछ निरर्थक प्रतीत होने लगा था। जी चाहा था, अपना लिखा सारा कुछ अपने ही हाथों से मिटा दे, फूँक डाले...

उसे सकालो की याद आई थी, शादी के बाद सद्य प्रस्फुटित कुमुदिनी की तरह झिलमिला रही थी - उसी दुधिया आभा और लहक के साथ। बसंत में खिले किसी अमलतास की तरह उसका वह रूप, लावण्य - युवा और कोरा... चेहरे पर बैशाख की भोर की तरह निश्छल, ताजी हँसी... कितनी प्रांजल, जीवंत! बरसाती नाले की तरह उफनता हुआ यौवन उसका - उद्दाम और अबाध्य... साक्षात जीवन थी वह - जीवन का शाश्वत उत्स... बात-बात पर हँसकर दुहरी होती हुई, जैसे अंतस में खुशी का कोई बाँध टूट गया हो! आँखों की चावनी में प्रथम अनुराग का रंग था - ढेर सारा... गोपाल की तरफ देखकर न जाने किस आंतरिक ऊष्मा में ओस की बूँद की तरह पिघली जा रही थी। प्रेम का स्वप्निल स्वाद, उसका मोहमय बंधन... कितना खूबसूरत रहा होगा सब कुछ उसके लिए!

उसे उस दिन उस अपढ़, वन्य लड़की से ईर्ष्या हो आई थी। कुछ नहीं था उसके पास, मगर प्यार था - पूरी छाती भरकर, किनारे तक छलकी पड़ रही थी। अपने मरु हुए जीवन में उसने बहुत ढूँढ़ा था उस रात, कहीं एक फूल या मुस्कराहट नहीं था। जो कुछ भी सुंदर था, कमनीय था, एकदम से निःशेष हो गया था जैसे। कितनी गरीब हो गई थी वह उस दिन उस निर्धन के सामने...!

उस रात वह रोई थी, न जाने किस लिए। एक अबूझ पीड़ा में मन डूब गया था बेतरह। रूप है, गुण है, विद्या है उसके पास, मगर किसी का बूँद भर प्यार नहीं... अपना इस तरह एकदम से बेघर होना, होते चले जाना उसे दंश देता रहा था। सो नहीं पाई थी रात भर। बिस्तर के दूसरे हिस्से का सूनापन दरअसल उसी के जीवन का शून्य है, इस सत्य को शिद्दत से महसूस कर पाई थी वह।

पुलिस कह रही थी गोपाल खूनी है। बछरा गाँव की हत्या और लूटपाट में उसी का हाथ था... उसे सुनकर यकीन नहीं हो पाया था। उस गहरे साँवले युवक की आँखों में कैसा उजलापन था। हँसता था तो जैसे उसके अंदर की अच्छाइयाँ उसके चेहरे पर दूध की तरह रिस आती थी। हाथ में जंगली बेर का दोना लेकर उससे मिलने आया था। लड़कियों की तरह शर्मीली हँसी हँस रहा था... वह किसी की हत्या करेगा!

शाम को रेंजर साहब ने अपने ड्राइवर चाँद सिंह को भेजा था, उसे अपने यहाँ लिवा ले जाने के लिए। उनके बेटे का जन्मदिन था। वह चली गई थी, कुछ देर स्वयं से दूर होना जरूरी हो गया था। कभी-कभी अपना स्व ही एक कारावास में परिवर्तित हो जाता है।

बँगले के लॉन में बैठने की व्यवस्था की गई थी। चारों तरफ पानी का छिड़काव किया गया था। ताजी छँटी मेहँदी की झाड़ियाँ महक रही थीं - गर्म, तीखी गंध। दो-चार दिन बारिश होकर रुक गई थी। तापमान फिर चढ़ गया था। वहाँ पहुँचकर उसे अच्छा लगा था। दिन भर अपने कमरे में बंद होकर घुटती रही थी।

कमलिका भाभी आज बहुत खूबसूरत दिख रही थी। उन्होंने ताँत की गहरी बैंगनी साड़ी पहनी थी। ढीले जूड़े में मोगरे की वेणी। अपने बेटे को गोद में लेकर बाहर निकल आई थी, मुस्कराते हुए-

बाबा, आज कितने दिन बाद आपके दर्शन हुए कहिए तो! उस घुमंतू जीव के साथ आप भी उसी की तरह बनती जा रही हैं...

उनका इशारा कौशल की तरफ था। सुनकर वह मुस्कराती रही थी। थोड़ी देर बाद रेंजर साहब भी अन्य परिचितों से निपटकर उसके पास आ खड़े हुए थे -

कैसी हैं मिस अपर्णा?

- अच्छी हूँ...

एक संक्षिप्त-सा जबाव देकर वह फिर चुप रह गई थी। आज वह किसी भी तरह सहज नहीं हो पा रही थी। मन के अंदर बार-बार गोपाल का हँसता हुआ चेहरा आ खड़ा होता था, फिर सकालो का - आँखों में लिसरा हुआ काजल, कातर, गीली दृष्टि... किसी की एक पूरी दुनिया उजड़ गई और किसी को खबर तक न हुई!

एक कोने में बैठकर वह आम की पन्नी पीती रही थी। बीच में कमलिका भाभी आकर अपने एक विदेशी मेहमान का उससे परिचय करवा गई थी - मिस्टर हडसन, आदिवासियों के जीवन पर कोई किताब लिख रहे हैं। इसी सिलसिले में पिछले एक साल से इस इलाके में रह रहे थे। यहाँ की भाषा भी थोड़ी-बहुत बोलने लगे थे।

आदिवासियों की संस्कृति, उनका रहन-सहन आदि पर मिस्टर हडसन देर तक विस्तार से बोलते रहे थे। अपनी किताब को लेकर हर लेखक की तरह काफी उत्साहित लगते थे। वह उनकी बात सुनकर 'हाँ न' में सिर हिलाती रही थी।

इस पूरे प्रसंग में एक छोटा-सा अध्याय दोनों के अलक्ष्य छूट गया था - गोपाल और सकालो का प्रसंग! ऐसा ही होता है अक्सर - कहते हुए वही हिस्सा छूट जाता है जो असली कहानी होता है... लोग यहाँ की धरती से कितनी सारी रंग-बिरंगी कथा-कहानियाँ बटोर ले जाते हैं- वण्य लावण्य से आप्लावित संथाल लड़कियाँ, चाँदनी रातों में उनका सफेद वस्त्रों में कतार बद्ध नृत्य, मांदल की लयबद्ध धप-धप, महुआ की मादक गंध से बोझिल हवा... इन सब के बीच कहने-सुनने से रह जाता है बस वह खालिस दुख जो यहाँ की मिट्टी में युगों से दबा पड़ा है! किसी गूँगे की अव्यक्त पीड़ा की तरह... मूक बहता है - निःशब्द रातों के निर्जन एकांत में, किसी की विवश आँखों से या शनैः-शनैः बँधकर समय के साथ पत्थर बन जाता है हृदय के किसी निभूत कोने में।

एक उर्वर धरती क्यों इस तरह धीरे-धीरे बाँझ बनकर ऊसर, उलंग पड़ी रह गई, कोई शायद ही कभी जान सके... जो धरा रह गया है अदेखे, अजाने - परित्यक्त, अवहेलित, वही इस मिट्टी का असल है, इसका एकमात्र संबल... उसके अंदर एक तेज दर्द रह-रहकर घुमड़ उठता है - इस अन्याय का कोई प्रतिकार नहीं...

- अद्भुत देश है आपका... मिस्टर हडसन ने रोहू मछली के कलिया में अपना पूरा पंजा डुबोते हुए कहा था। जाहिर है काँटा चुनकर मछली खाने में उन्हें खासी असुविधा हो रही थी। उनके झक सफेद सफारी सूट में शोरबे के लाल, पीले धब्बे लगे हुए थे। उनकी नाक लगातार झर रही थी, जिसे वे रह-रहकर सी-सी करते हुए रूमाल से पोंछ रह थे - योर फूड इज वेरी हॉट... बट वेरी टेस्टी, स्पेशली दिज गोल्डन करीज... आई रीयली लाइक देम अ लॉट... लाल होकर उनकी नाक अब आलू बुखारे की तरह दिख रही थी। विराट गोरे चेहरे में जैसे खून रिस आया था।

- तो जो मैं कह रहा था मिस आपना...

- ...कि हमारा देश बहुत अद्भुत है... अपर्णा ने धैर्य के साथ कहा था।

- यस-यस... बहुत फनी है... इतनी भाषाएँ, जात-पात, धर्म... हर दो कदम में सब कुछ बदल जाता है - मौसम, परिवेश, लोग... फिर भी एक डीस्टींक्ट कैरेक्टर है जिसे हम इंडियन कह सकते हैं... इनटरेस्टींग, मस्ट से, वेरी इनटरेस्टींग...

- जी...

अपर्णा अनमन होकर उसकी बातें सुनती रही थी। हर विदेशी की तरह उसके वही कौतूहल थे, वही आब्जर्वेशंस - होली काउ, गॉडेज काली हु ड्रिंक्स् ब्लड, एक्सट्रीम पोवर्टी, डर्टी कैलकेटा, डर्टी गैनजेस, योगा, हिमालया, स्लमस्...

सी-सी करते हुए वह लगातार बोले जा रहा था - क्या देश है... सब कुछ इतना सस्ता, सामान से लेकर इनसान तक... दो शाम खाना देकर आदमी से गधे की तरह काम करवा लो। मैं जंगल में कैंप डालता हूँ। कंधे पर मनों का बोझ उठाकर ये कुली मीलों धूप, बारिश में पैदल चलते हैं, मिट्टी-पत्थर तोड़ते हैं, रात-रात जागकर पहरा देते हैं, बस थोडे-से पैसे और खाने के लिए... सैड, वेरी सैड...

व्हिस्की की चुस्की लेते हुए अब मिस्टर हडसन काफी संजीदा दिख रहे थे।

- कल ही मैं कुछ आदिवासी महिलाओं की तस्वीरें ले रहा था, ऑलमोस्ट न्युड... शरीर पर कपड़े के नाम पर बस चिथडे... बट व्युटीफुल... मैंने एक नामी पत्रिका के लिए उन्हें आज सुबह ही मेल किया है। शीर्षक रखा है 'व्युटी इन रैग्स्...' हाउ डु यु लाइक इट?

- लवली... अपर्णा मुस्कराई थी - हमारी यह गरीबी, भूख, नंगापन तो बहुत ऊँचे दामों में बिकते होंगे आपके अमीर देशों में? एकजॉटीक व्युटी, एक्सट्रीम पोवर्टी... वेरी इनटरेस्टींग, थ्रीलिंग... इन्हें बेचकर आप लोगों ने अच्छा कमाया होगा... गुड बिजनेस, प्रॉफिटेबल, नहीं?

- येस... आई मीन नो... नथिंग ऑफ दैट शॉर्ट... उसकी बात सुनकर मिस्टर हडसन यकायक हडबड़ा-से गए थे

- एनी वे... इट्स बीन ए प्लेजर मीटिंग यु मिस्टर हडसन... अपर्णा वहाँ से उठकर एक और मेहमान के पास जा बैठी थी। उस समय उसके अंदर कुछ सुलग रहा था। अभागा देश, अभागे लोग और उनको घेरकर सबका महोत्सव...

बहुत देर बाद कौशल वहाँ पहुँचा था। तब तक अधिकतर मेहमान खाकर जा चुके थे। अपने बेटे को सुलाकर कमलिका भाभी उनके पास आ बैठी थी। उस समय रेंजर साहब उन्हें पिछले दिनों मारे गए एक आदमखोर की कहानी सुना रहे थे। कौशल को देखकर सभी उठ खड़े हुए थे -

लीजिए, हमारे मुख्य अतिथि महोदय अब पधार रहे हैं... कमलिका भाभी ने उसकी बाँह में चिकोटी काटी थी-

भतीजा तो 'काका काका' करके सो भी गया देवरजी।।

- इस बार माफ करना पड़ेगा भाभी, सच, भारी अन्याय हो गया है हमसे...

कौशल बहुत थका हुआ दिख रहा था। आते ही एक कुर्सी पड़ बैठ गया था -

कुछ ठंडा पिलाइए भाभी, गला सूख रहा है। आज जो गर्मी पड़ रही है...

- हाँ-हाँ... कमलिका, भई, कुछ लाओ...

रेंजर साहब उनके बगल में बैठ गए थे -

वहीं से आ रहे हो क्या?

पूछते हुए उनका स्वर अनायास मद्धिम पड़ गया था।

- हाँ, फूँक आया अभागे को... बड़ी मुश्किल से बॉडी मिल पाई, सकालो की हालत देखी नहीं जाती... कौशल ने अपना सर दोनों हाथों से थाम लिया था। इस समय वह कितना थका और विसन्न दिख रहा था! अपर्णा की इच्छा हुई थी, बढ़कर उसे अपनी गोद में खींच ले। मगर वह असंपृक्त-सी एक कोने में चुपचाप बैठी रह गई थी। एक समय के बाद कौशल की दृष्टि उस पर पड़ी थी -

थैंक्स अपर्णा...

- वह किसलिए... वह एकदम से सकुचा गई थी।

- आप जानती हैं, किसलिए... कल आपने आसरा न दिया होता तो सकालो भी मारी जाती, वे पूरी तरह से तैयार होकर आए थे...

ओह! वह एकदम से सिहर गई थी -

अब क्या होगा उसका?

- होना क्या है। वही होगा जो अब तक होता आया है...

 
कहते हुए वह अपनी मुट्ठियाँ भींच-भींचकर खोलता रहा था - कल हम विरोध प्रदर्शन के लिए एक बहुत बड़ी रैली निकाल रहे हैं। बंद का आह्वान भी किया है। कोलकाता से पार्टी वर्कर्स आ रहे हैं, कुछ नेता भी। साथ में निरंजनदा... आज सारी रात सोना नहीं हो सकेगा... बहुत काम है!

- मैं साथ चलूँ? उसने झिझकते हुए पूछा था।

- नहीं, आज रात नहीं। कल किसी को भेजता हूँ, धरना पर आ जाइए...

खा चुकने के बाद वह उठ खड़ा हुआ था- चलिए , आपको डाक बँगले पर छोड़ते हुए मैं चला जाऊँगा।

रेंजर साहब और कमलिका भाभी गेट तक उन्हें छोड़ने आए थे।

- कौशल, थोड़ा सँभल के भाई... कहते हुए रेंजर साहब की आवाज में गहरी चिंता थी।

- इसके जीवन में कोई बंधन होता तो यूँ मारा-मारा न फिरता...

गाड़ी में बैठते हुए उसने कमलिका भाभी को कहते हुए सुना था। मगर चुप रह गई थी। वह जानती थी, उनका इशारा किस तरफ था।

खुली जीप में तेज हवा के कारण उसके बाल अस्त-व्यस्त हो गए थे। उन्हें दोनों हाथों से समेटती हुई उसने कौशल को देखा था, गाड़ी चलाते हुए उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे - एकदम निर्विकार, उदासीन... अपने अंदर कहीं गहरा डूबा हुआ था वह, कई दिनों से। न जाने क्यों उसे एक गहरे निसंगताबोध ने अनायास आ घेरा था। बिना किसी आहट के कौशल जैसे अचानक उससे दूर चला जा रहा है। कई बार उसने उसे बहुत महत्वपूर्ण महसूस करवाया है। उसे अच्छा भी लगा है - यह सब - किसी के लिए होना, एक सकारात्मक अर्थ में...

एक अर्से से वह अकेली हो गई है, जी भी रही है, मगर न जाने क्यों, अकेले जीने की आदत अभी तक नहीं हो पाई है। यह एक विवशता ही है, किसी सही विकल्प के अभाव में। कई बार मन में हूक उठती है, मगर क्या किया जा सकता है...

जीप की डेड लाइटस् में रह-रहकर जंगली झाड़ियों के बीच कई जोड़ी आँखें जल उठ रही हैं। जंगली खरगोश, सियार जैसे छोटे-मोटे जीव-जंतु यहाँ-वहाँ भागते, छिपते नजर आ रहे हैं। वन प्रांतर में उतरी हल्की रुपहली रात - मौसम के एक टुकड़े नए चाँद में नहाई हुई, किसी जंगली फूल की तीखी, कटु गंध से गंधवती... झींगुर की आवाज से विदीर्ण होती हुई रह-रहकर...

उसे न जाने क्यों अनायास यह ख्याल आता है कि आजकी यह रात कभी खत्म न हो, यूँ ही चलती रहे दूर तक...

उसके मौन को सुनता हुआ-सा कौशल अनायास बोला था -

यह सब कुछ सच नहीं लगता न?

- क्या...?

उसका आशय समझते हुए भी वह अनजान बन गई थी।

- यही सब कुछ - ये निशिगंधा-सी महकती रात, ये यात्रा और... तुम...

उसकी आवाज में कहते हुए न जाने कैसी गहरी चाह सिमट आई थी कि वह एकदम से सिहर गई थी, अंदर तक! उसने गौर किया था, कौशल सबके सामने तो उसे आप कहकर संबोधित कर रहा था, मगर एकांत होते ही तुम पर उतर आया था।

- मैं... मैं यथार्थ नहीं हूँ!

- तो फिर...

कौशल ने कौतुक से एक पलक देखा था उसे। उसने अक्सर उसकी आँखों में गहरे बादल और एक टूटा हुआ इंद्रधनुष देखा है। वह जानता था, अपर्णा अपने सपनों से सताई हुई वह औरत है जिसने जागकर भी उन्हें टूटने नहीं दिया... अब सजा पा रही है पलछिन... एक दिन इसी तरह जाया हो जाएगी अपनी जिंदगी से पूरी तरह...

यह ख्याल अब उसे निर्लिप्त नहीं रहने देता। अंदर कुछ कसकता है काँटे की तरह। अपनी सोच में वह न जाने कहाँ तक निकला था कि अचानक सड़क के बीचोबीच एक जंगली सूअर के आ जाने से उसे ब्रेक लगाना पड़ गया था। ब्रेक के लगते ही अपर्णा स्वयं को न सँभाल पाकर झटके से आगे की ओर झुकी थी। वह शायद सामने के डैशबोर्ड से टकरा ही जाती, मगर कौशल ने उसे हाथ बढ़ाकर रोक लिया था - माफ करना, मुझे इस तरह से ब्रेक लगाना पड़ा...

गाड़ी के हेड लाइट में कुछ देर चौंधियाए-से खड़े रहकर वह जंगली सूअर सड़क से उतरकर पास की झाड़ियों में गुम हो गया था। कौशल ने फिर एक्सलेटर पर पाँव का दबाव बढ़ाया था - तो तुम यथार्थ नहीं हो?

- हाँ, नहीं हूँ, कुहासा हूँ, हो गई हूँ... आर्द्र, अस्पष्ट, स्पर्श से परे... दिखती हूँ, मगर कहीं हूँ नहीं... एक दिन समय की धूप, उसका निर्मम उत्ताप, ऊष्मा मुझे पिघला देगी, एकदम शून्य में बदल देगी। मेरा यह होना, होने का आभास भी शेष हो जायगा। बस, समय की बात है... वह जैसे किसी गहरे खोह से बोल रही थी। एकदम तंद्रालस, नींद में डूबी हुई-सी।

- तुम्हारा यह न होना-सा होना किसी के होने का सबब भी हो सकता है, कभी सोचा है इस पर? कौशल की बातें पहेली बनती जा रही थी। वह समझकर भी नहीं समझी थी। कुछ चीजों को जस की तस छोड़ देनी चाहिए। उनकी सार्थकता इसी में होती है और शायद सबका हित भी।

चूना भट्टा के पास से गुजरते हुए उसे करोंजे की गंध आई थी, वन्य और आदिम... कितनी पुरातन प्रतीत होती है यह रात... थमकी हुई - विस्मित-सी... एक बेसुध गंध पूरे वन-वनांतर से गीली साड़ी की तरह लिपटी हुई, रची हुई जमीन, पहाड़ों पर अदृश्य अल्पना की तरह... कैसा अद्भुत रूप-रंग है इस वनभूमि का... वह डूबने लगती है। मगर दूसरे ही पल फिर गड़हा के पास तेज दुर्गंध आने लगती है। कोई जानवर मर गया लगता था।

- पोचरों की गतिविधियाँ इन दिनों इलाके में बढ़ती ही जा रही है... कौशल ने रूमाल अपनी नाक पर रखते हुए कहा था।

- कल ही किसी ने दो साँभर मारे हैं। पुरानी हवेली के पास एक बाघ का बच्चा मिला है, एकदम दुधमुँहा। लगता है, उसकी माँ को भी किसी ने मार डाला है... ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन कुछ भी नहीं बचेगा - न इस वन के जीव, न यहाँ के वनमानव...

- आपको इनकी चिंता होती है...

यह कोई सवाल नहीं, वल्कि एक बयान था, मगर कौशल हंसा था - विद्रूप भरी हँसी -

महज चिंता नहीं, सरोकार है... जिसे हम साधारण अर्थ में सभ्यता कहते हैं, उससे बड़ी कोई असभ्यता नहीं हो सकती... किसी की सत्ता, अधिकार, अस्मिता का सम्मान नहीं, बस, अपनी भूख, लालच और हिंसा... यह पूरी दुनिया जैसे कुछ लोगों की जठर अग्नि को शांत करने के लिए ही बनी है! फिर भी संतोष नहीं, कितना बड़ा पेट है इनका...

वह बिना कुछ कहे सुनती रही थी। मिट्टी का दुख उस तक भी पँहुचता है। मगर अन्याय की एक इतनी बड़ी दुनिया! किस-किस से लड़ा जाय...

बँगले के पास पँहुचकर दोनों एकदम से चुप हो गए थे। गेट खोलकर अंदर दाखिल होते हुए उसने मुड़कर देखा था, कौशल मुड़कर जा रहा था। अनायास उसका जी चाहा था, उसे पुकारकर रोक ले - न जाने क्या कहना था उससे, मगर फिर वह चुपचाप अंदर चली गई थी। कुछ चीजें अनकही ही रह जानी चाहिए, कहने का सुख खोने का दुख भी देता है, यह वह बहुत पहले जान चुकी है...

दूसरे दिन उठते ही पुनिया ने उसे खबर दी थी, मानिनी ने आत्महत्या कर ली है, उसी चंपा के पेड़ से लटककर! सुनकर वह देर तक चुपचाप बैठी रह गई थी। कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाई थी। कौशल ने सुरजन को भेजा था, एक स्थानीय कार्यकर्ता, उसे जुलूस में ले जाने के लिए, मगर वह जा नहीं पाई थी।

पहले मृत्यु महज एक शब्द था उसके लिए, मगर आज उसके जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ है, ऐसा यथार्थ जिसकी भयावह अनुभूति में जीने के लिए वह हर पल अभिशप्त है। मरता कोई भी हो, कहीं भी, मगर उसके लिए हर बार उसकी काजोल मरती है... और साथ में वह भी।

मृत्यु को बार-बार जीना - इस तरह से... बहुत त्रासद था उसके लिए। दिन भर जंगलों में भटकती रही थी उस दिन। कई चेहरे एकसाथ उसका पीछा करते रहे थे हर जगह। एक पल के लिए भी वह उनसे पीछा छुड़ा नहीं पाई थी। दो भयार्त आँखों की चावनी - कातर और मूक... डरी हुई हिरणी की तरह, उससे क्या कुछ कहती रहती थी। उसके कान झनझनाते रहे थे, मौन के चीत्कार से! मन विदीर्ण हो गया था। कहाँ जाय वह कि छूट जाय इस यंत्रणा से!

आकाश पर कुछ बादल उतरे थे, मगर एकदम ठहरे हुए, जैसे पत्थर के टुकड़े हों - मैले, धूसर... दोपहर की तेज धूप में गुलमोहर के फूल जल रहे थे, पूरे जंगल में जैसे आग लगी हो... वह अनासक्त भाव से सब कुछ देखती रही थी... अंतस में भी कुछ ऐसा ही था - धू-धू करता हुआ - दावानल!... आकाश बरस जाय या वही खुद को निचोड़कर आखिरी बूँद तक रो ले कि यह दाह कुछ शांत हो, अब असहनीय हो रहा है!

सुगना की क्षीण धारा के किनारे वह बैठी रही थी। माथे पर प्राचीन बरगद की छाँह ओढे, मगर धूप से बच नहीं पाई थी, पिघलती रही थी ओर-छोर... बँसवारी में छिपकर तीतर बोलता रहा था रुक-रुककर, सारी दोपहर ही - एकदम अलस और बोझिल... ऊपर उल्टी-पल्टी चलती हवा में पीपल की किरमिची हथेलियाँ आईना चमकाती रही थी। पानी में दोपहर का गर्म आकाश रह-रहकर कौंध रहा था चाँदी की पन्नी की तरह!

शाम के गिरते-गिरते कौशल वहाँ पहुँच गया था, साथ में पुनिया भी थी। दोनों उसे ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँचे थे। कौशल शायद सारा दिन ही धूप में घूमता रहा था। उसका रंग जलकर एकदम गहरा ताँबई हो रहा था। आते ही नाराज हो उठा था -

अब यह क्या है अपर्णा, कितनी बार कहा, इस तरह से इधर अकेली मत निकला करो...

वह बिना कुछ कहे सर झुकाए उनके पीछे-पीछे चलती रही थी। कहती भी तो क्या!

- मानिनी को भी श्मशान पहुँचा आया...

चलते हुए कौशल ने कहा था। वह फिर भी चुप रह गई थी। उसी चिता में अब तक वह भी जल रही थी, कह नहीं पाई थी।

- आज विरोध प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज हुआ, गिरफ्तारियाँ हुईं... निरंजन दा को भी अंदर कर दिया गया... वह तो मैं तब तक मानिनी के क्रिया-कर्म के लिए निकल चुका था, वर्ना... असल में जिस खनन कंपनी का विरोध चल रहा है, उसके डाइक्टरों में हमारे केंद्रीय मंत्रीजी भी हैं। उन्हीं के साले साहब के राजपाट में अशांति फैलाई थी अभागे गोपाल ने... मरना तो उसे था ही...

थोड़ा रुककर कौशल ने अपनी आवाज नीची करके कहा था, मगर एक गड़बड़ हो गई, मिस्टर हडसन का अपहरण कर लिया गया है। यह एक बहुत बड़ा षड्यंत्र है, इस मूवमेंट को बदनाम करने के लिए... हो न हो, यह किसी बाहरी आदमी की हरकत है... सब कुछ बहुत मुश्किल, बहुत पेचीदा होता जा रहा है। अब गरीबों पर आफत टूट पड़ेगी... इस अपहरण से बाहरी दुनिया को एक बहुत गलत संदेश पहुँचेगा। हमारा आंदोलन लोगों की सहानुभूति खो देगा जो ठीक बात नहीं। यही तो कुछ लोग चाहते हैं... अपर्णा चलते हुए चुपचाप उसकी बातें सुनती रही थी।

बँगले के गेट के पास पहुँचकर वह अचानक रुक गई थी - मैं आपका धन्यवाद करना चाहती थी कौशल...

- किसलिए?

कौशल भी रुक गया था।

- मुझे इस दुनिया से जोड़ने के लिए... बहुत अकेली थी मैं... अब जैसी भी हूँ, कम से कम अकेली नहीं हूँ...

कौशल थोड़ी देर तक उसकी तरफ देखता रहा था, न जाने कैसी नजर से, फिर बिना कुछ कहे अपनी जीप की ओर बढ़ गया था -

मैं फिर आऊँगा, अभी जाना होगा, थोड़ा काम है...

 
रात के आठ बजे के करीब जब कौशल डाक बँगले पर पहुँचा था, अपर्णा बरामदे में बैठी पी रही थी। आज उसके तेवर कुछ बदले हुए से लग रहे थे। उसे देखकर मुस्कराई थी, एक मदालस-सी मुस्कराहट - आओ... आइए कौशल, लेट्स सेलिब्रेट...

- 'तुम' ही कहो, अच्छा लगता है,

कौशल कुर्सी पर बैठ गया था -

और हाँ, क्या सेलिब्रेट करना है!'

- जब कोई खुशी न बची हो सेलिब्रेट करने के लिए तब दुख ही सेलिब्रेट करना सीख लेना चाहिए...

- बिल्कुल ठीक!

वह मुस्कराया था -

आज क्या पी रही हो! अरे, टकीला... लगता है, उस दिन पूरी बोतल खत्म नहीं हुई थी।

अपर्णा मुँह बनाकर नींबू का टुकरा चाटती रही थी। कुछ कहा नहीं था। कौशल ने छोटा-सा पैग ऊपर तक भरकर एक ही घूँट में गले से नीचे उतार दिया था। तेजाब की एक सुनहरी नदी उसकी शिराओं में चिनगारी फूँकती चली गई थी। और यकायक उसके सामने बैठी अपर्णा का चेहरा केसर हो उठा था। उसका बिगड़ा हुआ चेहरा देखकर अपर्णा अनायास खुलकर हँस पड़ी थी। हवा में बजते जल तरंग की नाजुक ठुनक महसूसते हुए वह चुपचाप बैठा रह गया था। कुछ बोलकर वह इस क्षण के तिलस्म को तोड़ना नहीं चाहता था। अपर्णा उसके लिए सचमुच स्वप्न-सा कुछ पारदर्शी रच रही थी। वह मंत्रमुग्ध था बिल्कुल।

- जानते हो कौशल, आज काजोल को गए एक साल हो गया...

कहते हुए वह अचानक रुक गई थी, जैसे शब्दों का बोझ उठा नहीं पा रही हो। उसके चेहरे की गहरी होती रेखाओं को देखकर प्रतीत हो रहा था कि वह अपने ही अंदर की किसी यंत्रणा भरी यात्रा में बहुत दूर निकल गई है। अप्रैल की हवा में सितारे घुले थे, क्षितिज की साँवली उजास में हल्का-सा मोतिया आब था, चाँद से अबरक झरकर रात गोरी हो आई थी...

कई क्षणों के लिए ठिठककर वह अपने लरजते हुए शब्दों के साथ इस तरह आगे बढ़ी थी जैसे कंधे पर मय्यत उठाए हुए हो -

- पहले-पहल लगा था, मैं जी नहीं पाऊँगी, मगर देखो, जी गई... कभी-कभी अपनी बेशर्मी पर शर्मिंदा हो उठती हूँ...

- हम सब को अपने हिस्से की जिंदगी जीना है अपर्णा...

- और अपना-अपना सलीब भी उठाना है...

- हाँ...

- कभी-कभी सिर्फ एक मौत नहीं होती, आस्था की एक पूरी दुनिया मर जाती है...

अपर्णा अपने गिलास के पारदर्शी द्रव्य को घूरती रही थी-

इनसान रोज मरता है, मगर जब साथ में किसी का भगवान भी मर जाय... ऐसी मौत की कल्पना कर सकते हो...

देर तक लगातार बोलते हुए अब वह शायद सचमुच थक गई थी, और उसकी यह थकान मानसिक ज्यादा प्रतीत हो रही थी। कौशल बैठा हुआ उसकी गहरी साँसों की आवाज सुनता रहा था। बहुत पहले उसने एक हलाल हुए जानवर को देर तक छटपटाने के बाद अंत में मरते हुए देखा था, तब वह कुछ इसी तरह साँसें ले रहा था। उस स्मृति की मटमैली छायाएँ उसे आज भी समय-असमय बोझिल कर जाती हैं। अपनी डूब से उबरने के लिए शांत जल में कंकर मारने की तरह हल्के-से पूछा था उसने -

हो गई खत्म तुम्हारी बातचीत? एकदम से चुप हो गईं...

अपर्णा ने अपनी तंद्रालस आँखें खोली थी और उसके पार देखती हुई जैसे नींद में बोली थी -

'कभी-कभी चुप रहकर ही सही अर्थों में बोला जा सकता है, विशेषकर तब जब मन की गहनतम भावनाएँ भाषा से परे हटकर स्वयं को निःशब्द व्यक्त करना चाहती हैं। ऐसे में भाषा की विडंबनाओं और सीमाबद्ध सत्य से परे होकर शब्द एकदम अर्थहीन हो जाते हैं। और फिर, हम दोनों का यूँ लगातार बोलना किसी सत्य को छूने से बचने की एक बचकानी कोशिश जैसी लगता है जो शायद हमारे चुप होते ही मुखर हो उठे...'

अपनी बात समाप्त करते हुए उसने उसे फिर अपनी उनींदी आँखों से देखा था। वह उसे उसके आरपार देख रही है, ये उसकी तरल हो आई चावनी से स्पष्ट था। कौशल यकायक अपनी शिराओं में पिघलते हुए शीशे का बहाव महसूस करने लगा था। उसकी निःशब्द इंगित उसके कपड़ों के अंदर पहुँचकर देह को छूने लगी थी शायद... अपने अंदर की आश्वस्ति को उसने सहेजा था, इतना धीरे कि कोई आहट न हो। इतनी जल्दी वह उसकी पकड़ में आना नहीं चाहता था। एक अर्सा हो गया था उसे खुद को छिपाते हुए। अब इस लुका-छिपी में मजा आने लगा था।

यह निशिगंधा-सी महकती रात और सागौन के दैत्याकार घने पेड़ों के पीछे से झाँकता शुक्ल पक्ष का आधा चाँद... उसने पलाश की सुलगती हुई डालों पर रात के किसी पक्षी की झटपटाहट टोहने का भान करते हुए अपनी दृष्टि फेर ली थी।

उसकी झिझक पर मुस्कराते हुए अपर्णा ने उसकी बाईं बाँह पर अपना हाथ हल्के से रख दिया था-

'क्या हुआ, झेंप गए?

- नहीं तो... कौशल का चेहरा अपने शब्दों के विरुद्ध रँग गया था।

- अच्छा, कौशल, तुम मेरा मौन गा सकते हो तो क्या मैं तुम्हारे गीतों की खामोशी नहीं सुन सकती! ऐसा तो अब तक हमारे बीच कुछ बँध ही चुका है जिसे रिश्तों का इल्जाम दिए बगैर जीया जा सकता है, ढोने की विडंबना से परे होकर...'

उसके इंगित बहुत विलक्षण हो उठे थे, कौशल ने अनुभव किया था, उसके अंदर माधवी की मीठी-कड़वी गंध के साथ किसी ग्लैशियर के निःशब्द दरकने का धीरे-धीरे फैलता हुआ कंपन तरंग था... बर्फ का एक पूरा प्रदेश आज अपना युगों का पथराया हुआ मौन तोड़ देना चाहता है... इस शोर की कल्पना नहीं की जा सकती। वह स्वयं को प्रस्तुत करने लगा था, न जाने किस आकस्मिकता के लिए। एक लंबे मौन के बाद उसने यकायक प्रसंग बदला था

'कहो, क्या लिखती रही इन दिनों? मैं तो बहुत व्यस्त रहा...

'जिंदगी, और क्या!'

- कितनी अजीब बात है, जिंदगी कागजों में छपती है... इतने सारे स्वप्न, उच्छ्वास, दर्द और संवेदनाओं की एक पूरी दुनिया और इनका कुछ पन्नों का अनुवाद... बस! क्या कभी तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि अगर एक कहानी की सफलता के लिए एक पूरे जीवन का विफल हो जाना जरूरी हो जाता है तो फिर इस कहानी का जन्म न लेना ही उचित है? किस-किस के मृत सपनों पर ये कागजी राजप्रसाद खड़े होते हैं... जीवन की विडंबनाओं को नकद करके लोग अपनी आजीविका चलाते हैं, कागज की जमीन पर लफ्जों का व्यापार... चिता पर हाथ सेंकते हुए लोग... नपुंसक बुद्धिजीवी...

कौशल के चेहरे पर आग रिस आई थी, कितना अजीब लग रहा था वह, एक तरह से निष्ठुर... शब्दों को चबाते हुए। अपर्णा डर गई थी। आहत भी हुई थी।

- कौशल...

- ओह! आई एम सॉरी अपर्णा... कौशल सचमुच झेंप गया था, अपने अभद्र शब्दों के इस्तेमाल पर -

डोंट टेक इट परशनली... मैं एक वर्ग विशेष की बात कर रहा था।

अपर्णा चुप रह गई थी। कुछ कह नहीं पाई थी। उसकी बातों की सच्चाई में हर रचनाकार के जीवन की विडंबना छिपी है, उसे बताना नहीं चाहती थी। शायद यह उसके कन्फेशन का समय नहीं था। उसने एक तटस्थ-सा बयान देने का प्रयत्न किया था -

हाँ, जीवन को शब्द देना...

'मगर तुम लेखकों को शब्दों, संवेदनाओं की क्या कमी, इमोशन के गोदाम होते हो - जब चाहे लज्जतदार शब्दों के ढेर लगा दो - रेडीमेड, ताजे - ओवन फ्रेश! रुपये के दस... अच्छा, चलो, बारह ले लो...

कहते हुए कौतुक में उसकी पुतलियाँ झिलमिलाने लगी थीं। शायद माहौल को हल्का करने की ही गरज से वह उसकी बात बीच में काटकर इस तरह से हँसने लगा था।

- ऐसा नहीं, हमारे अंदर नदी होती है तो पत्थर भी होते हैं। मन टकसाल होता तो संवेदनाओं की किल्लत पड़ते ही छाप लेते - हरे-हरे करारे नोट की तरह करारी संवेदनाएँ...'

कहते हुए इस बार अपर्णा भी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी। कौशल को प्रतीत हुआ था, एकदम से रात रानी फूल गई है, तंद्रालस, गर्म हवा उसी की तुर्श गंध से बोझिल है। यह मौसम जादू का है, शरीर टोनों का है, पल-पल घट रहा है - कुछ इस तरह - मौन में कविता रचते हुए निरंतर, खनकती मुस्कराहटों से...

कौशल अचानक उठ खड़ा हुआ था -

- अब चलूँगा, बहुत रात हो गई...

- अरे भई! तुम वन के इस निविड़ दुनिया में भी अपना समय ले आए! चलो, इस यंत्र को उतार फेंको और आज की रात को यहीं ठहर जाने दो हमेशा के लिए, इस आधे चाँद और नीली हवा में गूँथी आदिम चाहना की गंध के साथ... लिबास और मुखौटों की दुनिया से दूर, त्वचा पर अपना मन ओढ़े, ईप्सा के अतर में सराबोर, किरणों की गीली पगडंडियों पर महुआ मदालस हवा की तरह - उश्रृंखल, अबाध्य...'

कौशल समझा था, टकीला के नन्हें पैग अब उसके अंदर बड़े होने लगे थे, वह बहक रही थी -

मैं तो काजू टूँगकर गले तक भर गई हूँ। भूख बिल्कुल भी नहीं है, व्हाट एबाउट यु?

- मैं भी तो काजू खा रहा था, बिल्कुल भूख नहीं है...

- तब ठीक है, फिर क्यों न हम थोड़ा चलें... ये शाल, सागौन, महुआ, करम की आदिम, अभेद्य दुनिया हमें बुला रही है। यह दूर से आती संथालों के माँदल की धप्-धप् और हवा में महुआ की माताल गंध...'

 
वह अपनी बाँहें फैलाकर किसी राज हंसिनी की तरह अपनी मराल गीवा तानकर खड़ी हो गईे थी। उसे प्रतीत हुआ था, चाँदनी रात में ताजमहल देख रहा है - वही जमुना की नीली गवाही में ख्वाब और मुहब्बत से रची गई संगमरमर की उजली कहानी - हमेशा की तरह खूबसूरत और बेतरह उदास भी... वह एक गहरी साँस लेता है, अपने ही अनजाने। अपर्णा चलते-चलते रुक जाती है -

'नहीं चलोगे?'

'क्यों नहीं, तुम साथ दो तो चले हम आसमाँ तक...'

वह किसी पुराने गीत के बोल गुनगुना गया था। चलते हुए अंदर कोई अजनबी आवाज में कह रहा था, तुम्हारे साथ मैं जीवन के पार तक चलने के लिए तैयार हूँ... फिर ये आकाश और धरती क्या! अपने इस ख्याल पर उसे स्वयं आश्चर्य हो रहा था। अब तक कहाँ छिपी थी यह संवेदनाएँ, उसे पता तक नहीं चला... इनसान बहुत बार स्वयं को भी ठग लेता है, जैसे आज वह...

'तुम शायद सोच रहे हो इस वक्त हम कहाँ जा सकते हैं!'

वह कभी उसे आप कहकर संबोधित कर रही थी तो कभी तुम कहकर।

'तुम जैसी कोई शख्सियत साथ हो तो चलना अहम हो जाता है, मकसद या मंजिल नहीं!'

'अब आप कविता करने लगे...'

वह हल्के से हँसी थी और उसके चेहरे पर चाँद उतर आया था। वह उसे रात की ओट में देखता रहा था। आसपास फूलते किसी जंगली फूल की तेज, मदिर गंध उसे अनमन कर गई थी। मन का कोई अजाना कोना मीठे दर्द से नहा आया था। यह रात उसे ठग लेगी, बहुत बेईमान है... मगर वह सावधान नहीं होना चाहता, कैसी विंडबना है! वर्जनाएँ जब टूट गई हैं तब सीमाओं का अतिक्रमण भी होगा ही...

ग्रीष्म ऋतु में कोयल नदी की धार भी कृशकाय हो आई है। उसकी चाँदी की जंजीर-सी पतली धारा रात के फिके अंधकार में प्रायः निःशब्द बह रही है। आसपास फैली रेत की शुभ्र राशि में अबरक के अजस्र कण चाँद के आलोक में जुगनू की तरह झिलमिला रहे हैं। यहाँ पहुँचकर एक बड़े पत्थर का टेक लगाकर वह पैरों से पानी छपछपाने लगी थी। ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर बचपन का दूध छलक आया था। कौशल इस क्षण की मासूमियत को मन के अदृश्य कैमरे में कैद कर लेना चाहता था। ऐसी तस्वीरों पर कभी समय की धूल नहीं बैठती।

थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह फिर एक गंभीर-सा प्रश्न कर बैठी थी -

'क्यों कौशल, अपने विवाहित जीवन से कभी खुश थे?'

'हाँ, था, मगर खुशी की फितरत में ठहराव नहीं होता, भागती रहती है, लुका-छिपी का वही पुरातन खेल... अब सोचता हूँ, हमारे दुख के पीछे हमारी गलत उम्मीदें होती हैं, और कुछ नहीं... काश हम दूसरों से इतनी उम्मीदें न किया करें! जब तक यह बातें समझ पाया, बहुत देर हो चुकी थी, जिंदगी अपनी खुशियाँ समेटकर बहुत दूर निकल चुकी थी... जब हम अपने रिश्तों से ज्यादा उम्मीद नहीं करते, बहुत कुछ सहनीय हो जाता है। वर्ना उम्मीद और अपेक्षा में जीना बहुत कठिन होता है, यू सी...

वह घुटनों तक पानी में डूबी दोनों हाथों से पानी उलीचती रही थी, जैसे कुछ सुन ही न रही हो -

कभी प्यार किया है कायदे से...?

'हम क्या करें या करते प्यार-व्यार, प्यार तो अपनी मर्जी का मालिक होता है, वह आपको चुनता है, आप प्यार को नहीं! और जब ये आपके जीवन में घटित होता है, आप बस इसके साथ हो लेते हैं। इसके सिवा आपके पास कोई दूसरा विकल्प होता ही नहीं। प्यार हमारे चाहने न चाहने पर निर्भर नहीं करता अपर्णा, न यह कोई निर्णय ही होता है... अंदर एक इशारा होता है और बस, हम चल पड़ते हैं - इस पर खत्म होकर पूरे होने के लिए या फिर ठीक इसका उल्टा भी। प्रेम की यात्रा में सिर्फ यात्रा होती है, कोई मंजिल नहीं, क्योंकि मंजिल का अर्थ होता है ठहराव और ठहराव प्यार में आ जाए... यह हो नहीं सकता! कहते हैं न - 'न ये रुकती है, न ठहरी है, न ठहरेगी कभी, नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है...'

'हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू...'

अपर्णा ने न जाने कैसी स्वप्न भरी आवाज में उसकी पंक्तियाँ पूरी की थी।

'तुम ठीक कहते हो।'

कहते हुए उसका मोतिया आँचल हवा के हल्के झोंके से यकायक ढलक गया था और इसके साथ ही आकाश का आधा चाँद उसके सीने के दो पूरे चाँदों पर चमक उठा था। पीछे के बूढ़े बरगद पर कई रात के पक्षी एक साथ बोल उठे थे। कौशल भूला-सा उसे देखता रहा था। अंदर एक श्रृंखलाबद्ध आदिम पशु अपने बंधनों से जूझ रहा था। वह उसकी छटपटाहट से अस्थिर हो रहा था। मगर वह इस सबसे अनजान कहे जा रही थी -

'प्रेम हममें घटित होता है, हम प्रेम में होते हैं, ठीक जैसे जीवन हमारे अंदर होता है - किसी दैवीय इच्छा से, हमारे चाहने या न चाहने से नहीं। इस प्रेम का वितरण भी हमारे अधिकार में नहीं होता। कोई होता है अदृश्य जिसके संकेत से हम इसे सौंप देते हैं उसे, जिसका यह प्राप्य होता है। हमारा प्रेम किसी की सनातन थाती होता है। हमें तो बस इस अमानत को सँभालना होता है।'

'मगर अपना सब कुछ देकर भी प्रेम को जीवन में रोक कहाँ पाया...'

कौशल की आवाज में न जाने क्या था कि उठकर वह एकदम से उसके कंधे से लग गई थी -

'प्रेम को बांधना चाहोगे तो एक दिन यह जरूर खो जायगा। बंधन में कभी प्यार बँधा है! यह तो हवा की उंगलियों में उलझी खुशबू का झोंका है, मुक्त होकर दूर तक फैलती है, मगर मुट्ठी में बंद होकर मर जाती है

'नहीं, ऐसा नहीं कि मेरी जिंदगी में कुछ भी नहीं है। हैं कुछ लोग...' अपने एक क्षण की दुर्बलता के लिए अब वह शर्मिंदा हो रहा था।

'हाशिए में ठिठके हुए रिश्ते भी हमारे जीवन के हिस्से होते हैं, चाहे वह हिस्सा कितना ही छोटा क्यों न हो। मगर हाँ...'

अब वह उसकी बाँहों पर कुछ अदृश्य शब्द लिख रही थी, और उसके अंदर एक पागल नदी अपना तटबंध तोड़ देने के लिए मचली जा रही थी -

'कृष्ण की तरह सबमें बँटकर भी सबके हिस्से में पूरा-पूरा आ सको तो देने का सुख जान सको। सब में बँटकर खत्म हो जाना उदारता नहीं, अपने अंदर का कंगालपना है!

उसने महसूस किया था, एक आदमकद आईने के समान वह कभी-कभी जानलेवा सच बोलती है। उसके सामने किसी झूठ के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। न जाने चोट पहुँचाने की किस आदिम हिंस्र इच्छा के वशीभूत होकर उसने पूछ लिया था -

'और तुम, सिर्फ बेवफाई ही झेलती रही या कभी प्रेम-वेम भी किया...?'

कहते ही उसे लगा था, चाँद सफेद शव की तरह उसकी पुतलिओं पर उतर आया है। उसी समय आसमान पर रात के ढेर सारे पक्षी अपने पंख झटपटाते हुए सर के ऊपर से उड़ते हुए गए थे। उसके अंदर कहीं गहरे एक कच्ची दीवार जैसा कुछ अनायास बैठ गया था। अपर्णा एक ही क्षण में आत्मीयता का हाथ छुड़ाकर मीलों दूर चली गई थी। फिर न जाने कितनी सदियों बाद उसने अजनबी-सी आवाज में कहा था -

'हाँ, प्रेम मेरे जीवन में भी आया था। जब मैं प्रेम में थी, जाहिर है, बहुत अच्छी थी। प्रेम आप को मुकम्मल ही नहीं, बहुत अच्छा भी बना देता है। मगर एक भूल हो गई, लालच कर बैठी। प्रेम को पूरी तरह से पाना चाहती थी। अपने लॉकर में डालकर सुरक्षित महसूस करना चाहती थी। कुछ चीजें सिर्फ बाँटने से, शेयर करने से ही बढ़ती है, ये बात भूल गई थी। इसका प्रायश्चित भी किया - इसे अपना सर्वस्व दे दिया। तुम हैरान होकर मेरी बात सुन रहे हो, मगर प्रेम में सब कुछ इसी तरह लक्षणा में होता है - खोकर पाना, देकर लेना... तुम यह सब नहीं समझोगे। शब्दकोश के अर्थ से जो प्रेम को समझते आए हो अब तक। अच्छा, जो परिभाषित हो जाय वह प्रेम कैसा! यह तो गूँगे के मुँह में धीरे-धीरे पिघलती हुई गुड़ की डली है...'

कुछ देर चुप रहकर जैसे उसने स्वयं को ही सुनाकर कहा था -

'मैंने रुक्मिणी होकर सहेजा है, राधा होकर अराधा है और मीरा होकर त्यागा है... मगर, हर रूप में बस पाया ही पाया है। अपने ईष्ट को पूरी तरह समर्पित हुए बिना उसे पूर्णता में पाया नहीं जा सकता, यह हर औरत का सच है, फिर वह माँ हो, बहन हो या फिर प्रेयसी।'

न जाने किस अधिकार भावना से भरकर उसने उसे अपनी बाईं बाँह में बाँधकर डाक बँगले की ओर लौटना शुरू कर दिया था। वह भी बिना किसी प्रतिवाद के उसके संग चुपचाप चल पड़ी थी। इस सामीप्य से उसकी देह की हल्की आँच उसकी शिराओं में बह आई थी। नासापुटों में स्त्री देह की गंध थी, कहीं भँवरा फूलते हुए जंगली फूलों पर गुनगुना रहा था। रात की पलकें भारी हो आई थीं। कौशल ने उसे अपने और निकट खींचते हुए गहरी आवाज में पूछा था -

जीवन के सबसे खूबसूरत दिनों का एक हादसा बन जाना आपके अंदर सब कुछ ऊसर कर गया होगा, देह का स्वाद, चाहना - क्या आपके लिए यह सब एकदम वर्जित हो गया है?

उसके इस प्रश्न के पीछे कई प्रश्न छिपे हुए हैं, शायद यह वह भी समझ रही थी, तभी उससे यकायक परे हो गई थी -

'ऐसा कतई नहीं है। सेक्स मेरे लिए देह से की गई प्रार्थना है। ऐसी प्रार्थना जो दो शरीर दो हथेलियों की तरह एक साथ जुड़कर एक ही छंद, लय और ताल में एक ही उद्देश्य में करते हैं - उस बंधन में जो योग और अर्द्धनारीश्वर है और उस मुक्ति के लिए जो बुद्ध का निर्वाण या आशुतोष का मोक्ष है। प्रेम में घटित हुआ संभोग बंधन में अपनी मुक्ति तलाश लेता है और हर मुक्ति को अपना आलिंगन बना लेता है।'

अपनी बात समाप्त कर वह थोड़ी देर चुपचाप चलती रही थी। रुपहली चाँदनी में उसके अंग के रचाव और कटाव रह-रहकर तलवार की तरह चमक उठते थे, और वह उस क्षण के सम्मोहन में बँधा चलते-चलते ठिठककर खड़ा हो जाता था। रोशनी और छाया के मायावी आलोक में उसका कमनीय चेहरा उस समय कितना विलक्षण हो उठा था, कैसा दुर्दांत भी... और फिर उसके चेहरे के भाव देखते हुए अपर्णा के चेहरे की कठिन रेखाएँ अनायास नर्म हो आई थीं

सेक्स एक बहुत खूबसूरत अनुभव है। मगर हमें हमारी देह को जीना चाहिए, न कि उसमें मरना-खपना... आत्मा देह में रह सकती है, मगर आत्मा पर देह नहीं लद सकती, वर्ना इसकी यात्रा भी श्मशान की चिता तक पहुँचकर समाप्त हो जाएगी।

बँगले पर पँहुचकर अंदर घूसने से पहले उसने मुड़कर न जाने उसे किस नजर से देखा था - एक अनचीन्ही भाषा जो इससे पहले उसने कभी नहीं बोली थी - अपने पूरे वजूद में थी वह उस रात, एक मुकम्मल औरत... आधी-अधूरी या सिर्फ माँ नहीं। ममता के मातम में उसने अपने अंदर की औरत को मर जाने दिया था। मगर जीते जी मर जाना... मरने से पहले शायद ही कोई मर पाता है! वह जिंदा थी, उसकी आँखों में चमकता हुआ-सा कुछ निःशब्द कह रहा था - एक छोटी-सी चाहना... कि जी लूँ, कुछ साँसें, अपनी ही...

 
कौशल उसे निष्पलक देखता रहा था - आज क्या हुआ है इसे... बाँध टूटी नदी की तरह हो रही है, बह रही है निरंतर - अबाध्य, उश्रृंखल, एकदम अराजक... बढ़कर उसने उसका एक हाथ पकड़ लिया था -

सच कहो अपर्णा, क्या हुआ है तुम्हें? इतनी बातें, मुस्कराहट, उछाह... कौन-सा दुख तुम्हें आज इतना सता रहा है?

स्नेह का एक छोटा कतरा मरु को समंदर बना गया था - अपर्णा रोने को हो आई थी, साथ में शर्मिंदा भी - उसे कुछ भी छिपाना नहीं आता, आँखें चुगली कर जाती हैं हर बार...

- ऐसी कोई बात नहीं...

अपने शब्दों पर उसे भी यकीन नहीं आया था, मगर इस झूठ को निभाना जरूरी हो गया था - हर तरफ से कैसे पराजय स्वीकार ले...

- इससे अच्छा तो रो लेती...

कौशल ने उसकी चिकनी पलकें सहलाई थी, मौसम के नए पत्तों की तरह, उतना ही मुलायम, कोमल, हल्के-हल्के काँपती हुई...।

- हर बार रोना, वही रोना... ऊब गई हूँ... इसलिए...

उसकी आवाज गीली थी, रिसती हुई-सी। अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ी होकर अब वह उसे देख रही थी, ऐसे जैसे उसमें अपने पूरे वजूद के साथ उतर रही हो। इसी क्षण कौशल के जेहन में कुछ अद्भुत, कुछ विलक्षण-सा घटा था, जिसे एक जाना-पहचाना नाम देकर वह उसे सरलीकृत नहीं करना चाहता था। वह अपने अनुभव पर स्वयं चकित था। पीड़ा और हर्ष का ऐसा दुर्दांत स्वाद उसने आज से पहले इस तरह से कभी एक साथ नहीं चखा था। वह जो अब तक उसके आसपास थी, अब उसके अंदर थी, कुछ इस तरह से कि उसके लिए भी जैसे उसके ही अंदर अब कोई जगह नहीं बची थी। आश्रय पाकर निराश्रित हो जाने का ये कैसा अद्भुत अनुभव था...

अपर्णा ने यकायक आगे बढ़कर उसे अपने पास खींच लिया था, इतना कि वह नजर भर की दूरी तलाशने लगे। कैसी विडंबना है कि प्यार और आतंक की अनुभूति एक-सी होती है - वही नसों में लहू की नीली सनसनाहट, कनपटियों पर धड़कता दिल और निगाहों के सामने धुंध और धुआँ... अपर्णा ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए थे - भीगे और ऊष्ण! उनके मखमली दबाव को महसूस करते हुए कौशल अपनी नसों में बहती शहद की मीठी धार में अनायास डूबने लगा था। वह उसे हल्के-हल्के चूमती रही थी, रगो-रेश में स्फुलिंग जगाते हुए - चाहना के जलते-बुझते जुगनू, इच्छा के दीबे - आग के सुनहरे फूलों की पाँत, फागुन की इस रात - देह के आदिम वन में... यह क्षण सर्जना का था, एकमेव, एकसार हो जाने का था। देह का आदिम उत्साह अपना चरम चाहता था, सारी वर्जनाओं से परे होकर, सत्य की तरह निरावरण, निर्भय होकर...

उसकी देह से उठती पसीने और परफ्युम की मिली-जुली मादक स्त्री गंध का मौन निमंत्रण उसके अंदर कहीं आँच देने लगा था। वह अपनी रगो-रेश में उत्तेजना महसूस कर रहा था - स्वयं को पूरी तरह देकर उसे उसकी संपूर्णता में पाने की एक पागल इच्छा... अपने ही अनजाने उसके हाथ उसकी खुली हुई कमर के इर्द-गिर्द लिपट गए थे। उसके उरोजों का हरारत भरा नर्म दबाव उसके सीने पर था। उसे प्रतीत हो रहा था, दो सहमे हुए कपोत थरथराते हुए उसकी गर्म हथेलियों में अपना आश्रय ढूँढ़ रहे हैं। वह उन्हें इच्छा और प्यार से भरकर दबोच लेना चाहता था, सहलाना चाहता था दुलार से देर तक...

लेकिन इससे पहले कि उसके हाथ कुछ ज्यादा उद्दंड होते, वह अचानक उससे अलग हो गई थी -

नहीं! हम यही ठहर जाएँगे कौशल! अगर इतना-सा करीब नहीं आते तो जिंदगी भर एक ख्वाहिश हमारा पीछा करती रहती, और अगर इससे आगे बढ़ गए तो कुछ बहुत खूबसूरत हमेशा के लिए खो देंगे...'

वह कुछ न समझ पाने की स्थिति में उसे चुपचाप देखता रह गया था। वह पुरुष था, देह उसके लिए पूरा सच नहीं, मगर बहुत बड़ा सच जरूर था। देह के बिना न वह, न कोई संबंध मुकम्मल था; मगर अपर्णा सच होकर भी परछाईं बनकर खो जाना चाहती थी। उसने फिर आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया था -

'आज तुमसे बहुत कुछ पाया है कौशल! इसे आगे की यात्रा के लिए सहेजकर रखना चाहती हूँ - जिस्म के जंगल में खोना नहीं! तुम नहीं समझोगे, हम औरतों के लिए यह जिस्म ही अधिकतर पिंजरा बन जाता है... चाहती हूँ, इस देह से आगे भी कोई आए- वहाँ जहाँ पशुता की सीमा समाप्त करके इनसान इनसान बनता है, रूह, सोच और अहसास बनता है! अपनी रूहों के बीच से यह तन की माटी हटाना चाहती हूँ, यह हमें एक-दूसरे तक पहुँचने नहीं देती...! बहुत अकेलापन है इस हाँड़-मांस के राजप्रासाद में, ठीक जैसे राम का वनवास...''

कौशल के लिए उसके सारे शब्द पहेली थे। वह अभी भी अपने शरीर की आँच और उत्तेजना से उभर नहीं पाया था। उसका हवा, रेशम और गंध से गुँथा यह तिलस्मी शरीर उसे अपनी आदिम कैफियत में डाला हुआ था। अपर्णा ने हल्के-से उसके होंठों को अपनी उंगली से सहलाया था -

'आज की ये खूबसूरत रात हमेशा के लिेए रहने दो हमारे बीच... ताकि कभी उजाले में मिले तो नजर न चुराकर एक-दूसरे को पहचान सके।'

'मगर...'

उसके अंदर इच्छाओं का एक अनाम बवंडर उठकर उसकी आवाज को रौंद डाला था। 'अब कुछ मत कहना कौशल! जरूरी नहीं कि स्त्री-पुरुष के जिस्म हमेशा एक प्रार्थना में दो हथेलियों की तरह जुडे, वे एक ही दुआ में दो हाथ की तरह अलग-अलग रहकर भी एक सनातन साथ में हो सकते हैं! आओ, हम हमेशा एक दुआ की तरह साथ रहे, प्रार्थना में जुड़कर अपना अस्तित्व समाप्त न कर लें... तुमसे बहुत कुछ चाहती हूँ... पता नहीं क्या, मगर तय है कि कुछ इस देह से परे, इससे भी ज्यादा, कभी समझ पाई और समय या हौसला हुआ तो माँग लूँगी... मगर आज यह नहीं... इसके लिए तैयार नहीं... सच!'

बात खत्म करके उसने अपने कमरे में घुसकर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया था और वह उसकी कही हुई बातों का तात्पर्य समझने का प्रयत्न करता हुआ वहाँ न जाने कब तक खड़ा रह गया था।

पूरब में रात की साँवली कोर हल्के से रसमसाई थी, क्षितिज पर उजाले की नर्म दस्तक-सी थी। पास ही कही हरसिंगार के फूल निःशब्द झर रहे थे। हवा सुंगध से बोझिल हुई जा रही थी। सुबह होने में अब ज्यादा देर नहीं थी शायद, मगर ये रात अपनी गहरी तृष्णा और अमित तृप्ति के साथ अब उसके जीवन से कभी नहीं बीत पाएगी, ठहरी रह जाएगी अपनी अनोखी रस, गंध और स्वाद के साथ चिर दिन के लिए... अपने अंदर कहीं गहरे बहुत शिद्दत से वह यह महसूस कर रहा था।

कमरे में बंद हो कर अपर्णा अपने बिस्तर पर ढह गई थी, किसी बीमार दरख्त की तरह। एक बहुत बड़ी लड़ाई लड़कर आई थी वह, अपने ही साथ। इसलिए यह इतना आसान नहीं था। एक ही साथ दीवार बनना और हथियार भी... हर हाल में लहूलुहान उसे ही होना था - जीत में भी और हार में भी! वह नहीं जानती, वह जीत सकी या नहीं, मगर अंदर हार का दर्द है... रगो-रेश में ऐंठता, कसकता हुआ। पाना कुछ नहीं चाहा था, मगर अब अंदर खोने की-सी मनःस्थिति में हो आई है - एकदम शून्य और उदास...

वह चाहती है, अपने अंदर के मातम को कसकर पकड़े रहना। छूटना नहीं चाहती अपनी तकलीफ से। इसी तकलीफ में उसकी काजोल जिंदा है, उसकी स्मृतियाँ... उसे डर लगता है, इन्हें खोकर वह काजोल को भी खो देगी। उसके आँसू में, उच्छवासों में वह है - हर पल, हर क्षण - बनी रहती है उसके पास। उसके दुख में जब उसका हृदय अटाटूट भरा होता है, वह भी होती है उसके पास, निविड़ होकर। वह उसे महसूसती है बहुत करीब कहीं- उसकी देह की मीठी गंध, उसकी कोमल छुअन... वह कैसे कम हो जाने दे उस अनुभूति को जिसमें उसकी काजोल की याद, उसका सामीप्य और परस रची-बसी है! यही तो है उसका संबल, अकेला हासिल...

कई बार उसने एक गहरी ग्लानि और चौंक के साथ इन दिनों महसूस किया है, उसे जीना अच्छा लग रहा है, हँसना और गुनगुनाना भी। अंदर किसी सोते की तरह एक अहसास धीरे-धीरे जाग रहा है - कुछ मीठा और अच्छा-सा... यह अच्छा-अच्छा-सा लगना उसे दंश देता है - जिस दुनिया में, जिस जीवन में उसकी काजोल नहीं है, उसमें अच्छा क्या हो सकता है! वह खुद को समेटती है, अपने ही खोल में ठूँसती है बेरहमी से - यह गीत तेरा नहीं, यह स्वप्न और इच्छाएँ भी नहीं... अँधेरा तेरा एकमात्र प्राप्य है और यह आजीवन कारावास - दुखों और पीड़ाओं का... तुझे धूप, हवा और बारिश का क्या करना है। सब निषिद्ध है, एकदम वर्ज्य...

वह कसकर अपनी आँखें भींचती है, चाँद, तारों, खिलते मौसमों पर अपने दरवाजे बंद करती है, मुस्कराहट की चमकीली तितलियों के बाजू जुनून में तोड़ डालती है, मगर अंदर कुछ निःशब्द बहता रहता है - अपनी उसी अबाध गति से... क्या नाम है इसका? जिजीविषा... क्या यह कभी खत्म नहीं होती? इसे मौत क्यों नहीं आती? वह निढाल पड़ी रहती है, अपने हाँड़-मांस के इनसान होने का दंश सहती हुई... उसे जीना पड़ेगा, क्योंकि वह जिंदा है! मरी नहीं है हर अर्थ में, कितना कटु सत्य है यह...

दूसरे दिन उसे पता चला था, कौशल कोलकाता चला गया है। सुनकर अंदर कुछ अचानक बैठ गया था, कच्ची दीवार की तरह, एकदम बेआवाज... कल इतनी देर तक दोनों साथ रहे, मगर कौशल ने उसे इस बाबत कुछ बताया नहीं। कौशल का व्यक्तित्व धूप-छाँव की तरह था - हर पल बदलते हुए, जैसे पहाड़ों में देखा था - मायावी धूप और छाँव का अल्हड़ खेल... मुट्ठी में न बाँध पाने की-सी विवशता उसके साथ में बनी रहती है। बहुत पास, मगर करीब नहीं। कुछ छुटा रह जाने की प्रतीति... शायद इसलिए इतना आकर्षक भी... कौतुहल को न मिटने देता है, न शांत होने देता है, बनाए रखता है यथावत। उसके साथ रहते हुए एक हद तक उसे जानने लगी है, मगर एक बहुत बड़ा हिस्सा अजाना रह गया है, यह भी समझ पाती है।

एक सिरे से दूसरे सिरे तक की न जाने कितनी लंबी यात्रा अभी बची है दोनों के बीच, वह यह भी नहीं जानती कि वह इस यात्रा पर निकलना भी चाहती है या नहीं। मगर अंदर सवालों के ढेर इकट्ठे होने लगे हैं, वह जानना-समझना चाहती है, मगर क्या, स्वयं नहीं जानती। एक पहेली की तरह बनती जा रही है वह - दुरूह, कठिन... कभी खुद को लेकर बैठती है और देर तक उलझती रहती है, गिरह दुरुस्त नहीं कर पाती कई गाँठों का। गुंजल बनी रहती है देर तक...

सुबह-सुबह सकालो को देखा था - चुपचाप बैठी हुई थी, हर तरफ से निर्लिप्त, असंपृक्त... वह वहाँ थी, मगर नहीं थी, जैसे अपने ही भीतर से कहीं खो गई हो। पहचान में नहीं आ रही थी। कुछ ही दिनों में जीवन के न जाने कितने वर्ष एक साथ खर्च कर बैठी थी। अब कुछ बचा था तो एक गहरी चुप्पी और अंतहीन अभाव... कभी उसके घाव पुर पाएँगे? इतने सारे - दगदगाते हुए, भीषण... उसे देखते हुए उसकी आँखें जलने लगी थीं - एक हरा-भरा पौधा जली हुई मिट्टी में तब्दील हो गया था, पूरी तरह से। उसे देखकर प्रतीत होता था, बस भीगी लकड़ी की तरह धुँआ रही है, सुलगने की छटपटाहट से भरी हुई... ऐसा क्या देखती रहती थी वह अपनी शून्य दृष्टि से उस तरफ...! आकाश का वह कोना तो एकदम खाली था...!

 
थोड़ी देर बाद वह उसके पास उतर आई थी, बँगले के सामनेवाले खुले अहाते में -

कैसी हो सकालो?

पूछते हुए उसे स्वयं प्रतीत हुआ था, कुछ गलत कह गई है, कैसा होना है उसे ऐसी परिस्थिति में! उसे देखकर सकालो उठ खड़ी हुई थी -

ठीके हैं दीदिया...

- बहुत दिन नहीं आई, कहाँ रही इतने दिनों तक?

- पुलिस टेसन में रोज जाना पड़ता था हाजिरी देने, एहे के वास्ते...

सुनकर उसका दिल बैठ गया था, पुलिस स्टेशन... बात बदलने के गरज से उसने पूछा था - तबीयत ठीक है? बच्चा...

उसकी बात काटकर सकालो ने एकदम उदासीन भाव से कहा था, जैसे बयान दे रही हो - बच्चा तो नाश हो गया दीदिया!

- नाश हो गया... यानी... मर गया!

उसे यकायक उसकी बात का अर्थ समझ में नहीं आया था -

क्यों, क्या हुआ...?

- उस रात हम भागते रहे जंगल में, फिर पेट पर मार भी पड़ी थी, दरोगा ने बूट से...

कहते हुए वह अचानक रुक गई थी, शायद उसका गला भर आया था। एक लंबे सन्नाटे के बीच दोनों देर तक बैठे रह गए थे। उसे विश्वास नहीं हो रहा था, कहाँ आ गई है वह, किस जमाने में... आज के सभ्य समाज में ऐसा भी होता है... ह्युमन राइट्स, डेमोक्रेसी, फ्रीडम... क्या यह सब महज शब्द हैं - खोखले और अर्थहीन... इनका कोई अस्तित्व ही नहीं दुनिया के इस हिस्से में?

उसने सकालो की तरफ देखा था, उसकी आँखों के पथराए हुए मौन में अब कुछ भी नहीं बचा था - न तकलीफ, न कोई शिकायत। एक सपाट दीवार में तब्दील हो गई थी वह, अपने अंदर सारे कोलाहल समेटकर... जैसे अब क्या, कभी भी जीवित नहीं थी।

वह समझ सकती थी, इस तरह से सारे दरवाजे बंदकर यदि अपने अंदर पड़ी रही तो वह जल्द ही एक कब्र में तब्दील होकर रह जाएगी। एक गूँगे की पीड़ा अभिव्यक्ति न पाकर शेष पर्यंत पत्थर ही बन जाती है अक्सर, ठीक इन अनगढ़, बेडौल पठारों की तरह।

- अब क्या करोगी? उसने हिचकते हुए उससे पूछा था।

- मालूम नहीं दीदिया...

- सब ठीक हो जाएगा सकालो...

वह उसके पास से उठ आई थी। अपनी बातों पर उसे स्वयं यकीन नहीं था, सकालो क्या करती। आकाश में बहुत ऊपर एक चील चक्कर काट रहा था, उसकी आवाज तेज चीख की तरह सुनाई पड़ रही थी। न जाने किस शब पर उसकी नजर है... यहाँ इनकी कमी नहीं - इनसान और जानवरों के शव की... इस निविड़ वन के सीने में न जाने कितनी मौतें, हत्याएँ निःशब्द दर्ज हैं, होती रहती है! उनका कोई हिसाब नहीं। कुछ संख्याएँ, वह भी सही नहीं। मगर क्या फर्क पड़ता है... इस उर्वर जमीन पर जान और संपदा की कमी नहीं - चोरी, तस्करी, हत्या, लूट के लिए... जाने कब से चल रहा है यह सब - अमानवीय शोषण और दोहन...

वह मुड़कर सकालो को देखती है - जमीन की ओर देखती हुई, अपने जुडे हुए घुटनों पर थुथनी टिकाए, कितनी मलिन और कातर... उसके अंदर प्रतिकार एक तीव्र लपट की तरह उठा था - ऐश्वर्य की कोख से जन्में हुए यह गरीब, निर्धन लोग... खुद रिक्त होकर न जाने किस-किस की तिजोरियाँ भर रहे हैं! कब थम सकेगा यह सब?

उसी शाम वह न चाहते हुए भी डॉ. सान्याल के बँगले पर गई थी। उन्होंने ही मुल्की के हाथों खबर भिजवाई थी। वह कोलकाता लौट रहे थे। वहाँ के किसी वृद्धाश्रम में रहने के लिए। फिर शायद कभी लौटना न हो।

डॉ. सान्याल को वह यकायक पहचान नहीं पाई थी। एकदम से बहुत बूढ़े और कमजोर हो गए थे। कुर्सी पर किसी शब की तरह निढाल पड़े थे। वह समझ गई थी, वह ज्यादा दिन नह जी सकेंगे। यह उनकी अंतिम यात्रा है।

उसे देखते ही वह उसके हाथ पकड़कर रोने लगे थे, किसी बच्चे की तरह। उनके प्रति मन में गहरी वितृष्णा के भाव होते हुए भी वह कुछ कह नहीं पाई थी, चुपचाप बैठी रह गई थी। अब यह मनुष्य घृणा के योग्य भी शायद नहीं रह गया था - इतना दयनीय और असहाय... किसी भी क्षण घुन खाई दरख्त की तरह टूट पड़ने को तत्पर...

अपनी गीली, धूसर आँखों से वह उनकी तरफ टुकुर-टुकुर देखते रहे थे, मगर चाहकर भी कुछ कह नहीं पा रहे थे। होंठ किसी पर कटे परिंदे की तरह फरफराकर रह जाते थे। आखिर वह उठ खड़ी हुई थी -

अब मुझे चलना होगा काका बाबू!

- हाँ...

उन्होंने अपनी निरंतर बहती आँखों को उल्टी हथेली से पोंछने का प्रयास किया था-

फिर शायद हम कभी न मिलें... मगर मैं जानता हूँ, मुझे मौत जल्दी नहीं आएगी, सब कुछ यहीं चुकाकर जाना पड़ेगा।।

उनकी बातों का कोई जवाब दिए बगैर वह वहाँ से निकल आई थी। बँगले के गेट से निकलते हुए उसने देखा था - चंपा का पेड़ फूलों से लदा खड़ा है - सितारों-से चमकीले गहरे पीले फूल... जमीन पर झरे हुए फूलों की कालीन-सी बिछी हुई थी, चारों तरफ हवा उनकी बासी, उनींदी गंध से बोझिल हुई जा रही थी। उसने उनकी तरफ अपनी पीठ फेरकर कदम तेज कर दिए थे। चंपा की मादक सुगंध दूर तक उसका पीछा करती रही थी, साथ ही दो भीरु आँखों की कातर चावनी भी - मूक प्रार्थना से भरी हुई... वह जानती है, इनसे छूटने के लिए अब जीवन भर का पलायन भी पर्याप्त नहीं!

कौशल को गए कई दिन हो गए थे। उसका उपन्यास का काम भी खत्म हो चुका था। दो दिन पहले ही वह उसका फाइनल ड्राफ्ट अपने प्रकाशक को कुरियर करवा चुकी थी। अमेरिका जाने के लिए उसे टिकट आदि की व्यवस्था करने के लिए दिल्ली लौटना था। मगर कौशल से मिले बगैर वह जाना नहीं चाहती थी। न जाने क्यों कोलकाता जाने के बाद कौशल ने एक बार भी उसके साथ संपर्क नहीं किया था। उसकी मित्र अपने पूरे परिवार के साथ आनेवाली थी, मगर वह भी किसी कारण से अब आ नहीं पा रही थी।

वह रेंजर साहब से भी पूछ आई थी, उन्हें भी कौशल की तरफ से कोई सूचना नहीं मिली थी। वे कौशल के लिए चिंतित लग रहे थे।

- क्या करूँ मिस अपर्णा, यहाँ की हालत बहुत निराशाजनक है। या तो आप सब कुछ देखकर भी आँखें मूँदकर रहें या इनके दल में शामिल हो जाइए। दूसरा कोई विकल्प नहीं... अब सोच रहा हूँ यहाँ से चला जाऊँ, इस तरह से खुली आँख से सब कुछ देखते हुए चुपचाप रहा नहीं जाता... अंदर एक अदालत है जो कभी खारिज नहीं होती, चलती रहती है! बहुत त्रासद है यह सब...

वह अकेली पड़ी-पड़ी निराश होने लगी थी। कौशल का न होना एक अभाव-सा बनकर उसे दंश देने लगा था। पूरा जंगल ही नहीं, वह भी अंदर से एकदम निर्जन हो आई थी। किसी तस्वीर के यकायक हट जाने के बाद के दीवार की-सी हो रही थी जिंदगी - एक भद्दा दाग और खालीपन - एकदम निचाट... तस्वीर का न होना तस्वीर के कभी होने का बहुत शिद्दत से अहसास दिलाता है। वह तस्वीर जो दीवार के साथ-साथ जीवन का भी हिस्सा हो जाता है, अनजाने ही। उसका हट जाना जीवन के एक अहम हिस्से को एक नंगी, बदसूरत दीवार में तब्दील कर देता है... ठीक इस तरह से! वह आईने में खुद को देखती है और कहती है...

इन दिनों वह फिर खुद से बोलने लगी है! एकांत अंदर घोंसला डाल रहा है, अंधकार के विशाल डैने फैल रहे हैं, सब कुछ धूसर, विवर्ण है...

सकालो अपनी बहन के साथ जंगल जाती है, लकड़ियाँ बिनकर लाती है, महुआ सुखाती है और इन सब के बीच कभी अचानक बैठकर आकाश की तरफ देखने लगती है। ऐसे में उसकी आँखों में न जाने क्या होता है - किसी खंडहर की तरह भाँय-भाँय करता हुआ।

कई बार अपर्णा उससे बात करने की कोशिश करती है, मगर उसके अंदर सब कुछ सील की तरह बँधकर स्तब्ध हो गया-सा प्रतीत होता था। बस देखती रहती थी चुपचाप, आँखों में टँका उसका कहन शब्दों से परे होकर निसृत होता रहता था, अदृश्य उंगलियों से उसे छूता हुआ लगातार... वह सिहर-सिहर जाती थी।

एक बार पूछा भी था उससे उसने -

तुम्हारे मन में बदला लेने की बात नहीं उठती? उस जैसी तो कितनी औरतें स्वयं पर हुए अन्याय के विरोध में हाथ में हथियार उठा चुकी है, नक्सलियों या माओवादिओ के संगठन से जुड़ गई है...

 
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