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न जाने कितनी देर बाद कौशल ने कहा था - जानती हो अपर्णा, जिस दिन यह करोडों भूखे-नंगे लोग एक साथ उठ खड़े होंगे, अन्याय का यह साम्राज्य ध्वस्त होकर रह जाएगा... फ्रांस की खूनी क्रांति के विषय में सुना है न? ... उसी की तरह यहाँ भी खून की नदियाँ बहेंगी, ऐश्वर्य के राजप्रसाद ढहकर जमीन पर गिरेंगे, अन्यायियों के सर गिलोटिन में कटकर रास्तों में लुढ़कते फिरेंगे...
उसकी बात सुनकर अपर्णा सिहर उठी थी - कौशल...
- हाँ अपर्णा, यह छ्द्मवेशी राजे-महाराजे, उनके मंत्री, उनके पाले हुए गुंडे, धर्म के ठेकेदार... इनका अत्याचार अब चरम को पहुँच रहा है... इतिहास गवाह है, अब इनका प्रतिरोध होगा, प्रतिकार होगा... हर क्रिया की प्रतिक्रिया अनिवार्य है... बेजान वस्तु पर भी प्रहार करो तो टंकार उठती है, यह तो जीते-जागते मनुष्य हैं। कब तक चुप रहेंगे? कौशल की आवाज में अजीब खौल थी, गहरा उबाल -
रणभेरी बज उठी है... मुट्ठियाँ तन रही हैं, बाजू फड़क रहे हैं, झुके हुए सर, कंधे उठ रहे है, मेरुदंड सतर हो रहे हैं... शिराओं में रक्त का प्रवाह अब उष्ण हो रहा है... अन्यायी चेत जाए, अपनी सुखनिद्रा से जागे... युद्ध अवश्यमभावी है...
कौशल में जैसे कोई आसेव उतरा था। वह अजीब आवाज में बोल रहा था। नशे में चूर। सुनकर अपर्णा सचमुच डर गई थी - तुम यह सब क्या कह रहे हो कौशल... युद्ध! रणभेरी!
- हाँ, युद्ध, एक आर-पार की लड़ाई... अगर इसी तरह अन्याय, शोषण और दमन का यह भीषण चक्र चलता रहा तो एक दिन ऐसा ही होगा, निश्चित जानो... अपनी बात के अंत में आते-आते कौशल गहरी उत्तेजना में हाँफ रहा था।
उस रात बँगले के बरामदे में बैठी-बैठी शायद वह ऊँघ गई थी। न जाने कितनी देर बाद किसी की आहट पाकर यकायक उसकी आँख खुल गई थी। सामने मुल्की खड़ी थी - बदहवाश-सी। इससे पहले की वह उससे कोई सवाल कर पाती, उसके हाथ में कागज का एक पसीजा हुआ टुकड़ा थमाकर बँगले की सीढ़ियाँ उतरकर वह रात के अंधकार में तेजी से खो गई थी।
कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में बैठे रहकर उसने हाथ की मुट्ठी में बंद उस कागज के टुकड़े को खोलकर पढ़ने का प्रयत्न किया था। बहुत जल्दी में कुछ शब्द घसीटकर लिखे गए थे। शायद पसीने से अधिकतर अक्षर धुँधला गए थे -
अपर्णा दी, इसी निविड़ अरण्य में घुटकर मर जाना मेरी नियति है। तुमसे पहले भी मुझे किसी ने धूप नहाई दुनिया में चलने का निमंत्रण दिया था। मगर वह स्वयं यहाँ के गहन अंधकार में खोकर रह गया। तुमने पापा की बंदूक देखी है और उनकी बातें भी सुनी है। वह जिस जमीन में आज मिट्टी बनकर मिल गया है, उसी जगह पर खड़ा है चंपा का वह पेड़ जिसके फूल मैं तुम्हें भेंट दिया करती थी। मैं मेरे पापा के अपाहिज जीवन की एकमात्र बैशाखी हूँ और वे मुझे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहेंगे। उनकी विवशता ने उन्हें बहुत स्वार्थी बना दिया है। यह जंगल मेरे लिए एक जिंदा कब्र ही है जहाँ मुझे अपनी या पापा की अंतिम साँस तक रहना पड़ेगा... जो कोई भी मुझे उनसे दूर ले जाने की कोशिश करेगा, उसका हश्र भी वही होगा जो बहुत पहले किसी का हुआ था। तुम जितनी दूर हो सके यहाँ से चली जाना। मैं इस जंगल में एक और चंपा का पेड़ नहीं रोपना चाहती...
वह चिट्ठी पढ़ते हुए उसकी दृष्टि धुँधला गई थी। मेरुदंड में बर्फ उतरने लगी थी। बहुत मुश्किल से अपने अंदर उठती हुई कँपकँपाहट को रोका था उसने। सामने पड़ी मेज पर मानिनी का दिया हुआ चंपा का फूल अभी तक पड़ा हुआ था जो उसने उसे कल उसके बँगले से आते हुए दिया था - पीला और मुर्झाया...
यही फूल वह कौशल को दिया करती थी। एक गहरी साँस लेकर उसने बाहर की तरफ देखा था। गहरे घने जंगल में उतरी रात देर तक बरसकर अभी-अभी फीके हुए बादल के पीछे से यकायक निकल आए चाँद से गोरी हो आई थी। चेहरे से टकराती भीगी हवा में कहीं आसपास खिलते चंपा की मादक गंध थी। उसे अपने नासापुटों में महसूसते हुए उसे अनायास ख्याल आया था, न जाने इस हत्यारे जंगल में इनसानी खून से सींचे हुए रक्त चंपा के और कितने ऐसे अभागे पेड़ होंगे...
इसके बाद और कई दिन नामालूम-से बीते थे। अपने उपन्यास को फिनिशिंग टच देते हुए वह कहीं बाहर नहीं निकल पाई थी। कौशल भी कोलकाता गया हुआ था किसी काम से, इसलिए उससे भी मुलाकात नहीं हो पाई थी। उस दिन दोपहर को खाने के बाद बरामदे में आ बैठी थी। उपन्यास के आखिरी दृश्य में कुछ संशोधन करने थे।
थोड़ी देर बाद डाकिया उस दिन का डाक दे गया था - कुछ पत्रिकाएँ, चिट्ठियाँ...
अभी वह उन्हें देख ही रही थी कि बँगले के अहाते में धूल उड़ाती हुई एक पुलिस की जीप आकर रुकी थी। जीप के रुकते ही दो सिपाही कूदकर नीचे उतरे थे और फिर भागते हुए बँगले के पीछे की तरफ सर्वेट क्वाटर की तरफ चले गए थे। घटना की आकस्मिकता से वह यकायक घबरा उठी थी। पुलिस यहाँ क्यों आई थी...
एक इंस्पेक्टर को अपनी ओर बढ़ते देख वह अपनी कुर्सी से कपड़े सँभालते हुए उठ खड़ी हुई थी।
नमस्ते मैडम! अशिष्ट ढंग से कहते हुए वह इंस्पेक्टर उसके सामने खड़ा हो गया था - क्षमा कीजिएगा, इस तरह से आना पड़ा... अच्छा, ये गोपाल कहाँ है?
जी... वह उनके प्रश्न का आशय समझ नहीं पाई थी।
गोपाल... नहीं जानती आप उसे! सुना है, आपका तो काफी आना-जाना होता है उनकी बस्तियों में...
वह कोई जबाव देती इससे पहले ही दो सिपाही पुनिया और उसके पति को धकेलते हुए वहाँ ले आए थे। पुनिया का बेटा उसकी पीठ से बँधा जोर-जोर से रो रहा था। पुनिया भी काफी घबराई हुई दिख रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसका पति अपना दोनों हाथ जोड़े थर-थर काँप रहा था।
- क्यों रे, गोपाल को कहाँ छिपा रखा है?
इंस्पेक्टर साहब ने पुनिया के पति को रूलर से कोंचा था - सच-सच बताना, वर्ना तुम सब भीतर जाओगे। महाजन को मारा है, नकदी भी लूटी है...
- हमको कुच्छो नहीं मालूम सरकार!
पुनिया अब जोर-जोर से रोने लगी थी।
- नक्सल का साथ दोगे तो... अगर इधर आया तो थाना जरूर खबर करना...
कहते हुए इंस्पेक्टर एक बार फिर उसकी तरफ मुडा था - मैडम, घूमने आई हैं इधर आप, रेंजर साहब कह रहे थे। यहाँ के लफड़े से दूर ही रहिए... वर्ना मुसीबत में पड़ जाएँगी। लिखती हैं आप...
कहते हुए उसने बिना पूछे उसकी पांडुलिपि उठा ली थी - जल,जंगल, जमीन... शुभचिंतक हैं आप आदिवासियों की... अच्छा है, लिखिए... अभी कल ही कुछ आपत्तिजनक दस्ताबेज जब्त किए है दास बाबू से - पत्रकार हैं, लिखते हैं - आप ही की तरह, अब जाएँगे अंदर कुछ वर्षों के लिए...
भद्दे ढंग से हँसते हुए उसने पांडुलिपि फिर से मेज पर रख दी थी - कुछ रोमांस-वोमांस पर लिखिए - गुलशन नंदा टाइप... कॉलेज के दिनों में खूब पढ़ते थे हम भी - लरजते आँसू, झील के उस पार... फिल्म भी बनी थी उन कहानियों पर! आपने देखी होगी? खासकर वो वाला गीत - एक बार मुझको पिला दे शराब देख फिर होता है क्या... मुमताज! एकदम मस्त... हम तो हॉल में उठकर नाचने लगते थे... जवानी के दिन थे... हा हा हा... अच्छा नमस्कार!
उसकी बात सुनकर अपर्णा सिहर उठी थी - कौशल...
- हाँ अपर्णा, यह छ्द्मवेशी राजे-महाराजे, उनके मंत्री, उनके पाले हुए गुंडे, धर्म के ठेकेदार... इनका अत्याचार अब चरम को पहुँच रहा है... इतिहास गवाह है, अब इनका प्रतिरोध होगा, प्रतिकार होगा... हर क्रिया की प्रतिक्रिया अनिवार्य है... बेजान वस्तु पर भी प्रहार करो तो टंकार उठती है, यह तो जीते-जागते मनुष्य हैं। कब तक चुप रहेंगे? कौशल की आवाज में अजीब खौल थी, गहरा उबाल -
रणभेरी बज उठी है... मुट्ठियाँ तन रही हैं, बाजू फड़क रहे हैं, झुके हुए सर, कंधे उठ रहे है, मेरुदंड सतर हो रहे हैं... शिराओं में रक्त का प्रवाह अब उष्ण हो रहा है... अन्यायी चेत जाए, अपनी सुखनिद्रा से जागे... युद्ध अवश्यमभावी है...
कौशल में जैसे कोई आसेव उतरा था। वह अजीब आवाज में बोल रहा था। नशे में चूर। सुनकर अपर्णा सचमुच डर गई थी - तुम यह सब क्या कह रहे हो कौशल... युद्ध! रणभेरी!
- हाँ, युद्ध, एक आर-पार की लड़ाई... अगर इसी तरह अन्याय, शोषण और दमन का यह भीषण चक्र चलता रहा तो एक दिन ऐसा ही होगा, निश्चित जानो... अपनी बात के अंत में आते-आते कौशल गहरी उत्तेजना में हाँफ रहा था।
उस रात बँगले के बरामदे में बैठी-बैठी शायद वह ऊँघ गई थी। न जाने कितनी देर बाद किसी की आहट पाकर यकायक उसकी आँख खुल गई थी। सामने मुल्की खड़ी थी - बदहवाश-सी। इससे पहले की वह उससे कोई सवाल कर पाती, उसके हाथ में कागज का एक पसीजा हुआ टुकड़ा थमाकर बँगले की सीढ़ियाँ उतरकर वह रात के अंधकार में तेजी से खो गई थी।
कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में बैठे रहकर उसने हाथ की मुट्ठी में बंद उस कागज के टुकड़े को खोलकर पढ़ने का प्रयत्न किया था। बहुत जल्दी में कुछ शब्द घसीटकर लिखे गए थे। शायद पसीने से अधिकतर अक्षर धुँधला गए थे -
अपर्णा दी, इसी निविड़ अरण्य में घुटकर मर जाना मेरी नियति है। तुमसे पहले भी मुझे किसी ने धूप नहाई दुनिया में चलने का निमंत्रण दिया था। मगर वह स्वयं यहाँ के गहन अंधकार में खोकर रह गया। तुमने पापा की बंदूक देखी है और उनकी बातें भी सुनी है। वह जिस जमीन में आज मिट्टी बनकर मिल गया है, उसी जगह पर खड़ा है चंपा का वह पेड़ जिसके फूल मैं तुम्हें भेंट दिया करती थी। मैं मेरे पापा के अपाहिज जीवन की एकमात्र बैशाखी हूँ और वे मुझे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहेंगे। उनकी विवशता ने उन्हें बहुत स्वार्थी बना दिया है। यह जंगल मेरे लिए एक जिंदा कब्र ही है जहाँ मुझे अपनी या पापा की अंतिम साँस तक रहना पड़ेगा... जो कोई भी मुझे उनसे दूर ले जाने की कोशिश करेगा, उसका हश्र भी वही होगा जो बहुत पहले किसी का हुआ था। तुम जितनी दूर हो सके यहाँ से चली जाना। मैं इस जंगल में एक और चंपा का पेड़ नहीं रोपना चाहती...
वह चिट्ठी पढ़ते हुए उसकी दृष्टि धुँधला गई थी। मेरुदंड में बर्फ उतरने लगी थी। बहुत मुश्किल से अपने अंदर उठती हुई कँपकँपाहट को रोका था उसने। सामने पड़ी मेज पर मानिनी का दिया हुआ चंपा का फूल अभी तक पड़ा हुआ था जो उसने उसे कल उसके बँगले से आते हुए दिया था - पीला और मुर्झाया...
यही फूल वह कौशल को दिया करती थी। एक गहरी साँस लेकर उसने बाहर की तरफ देखा था। गहरे घने जंगल में उतरी रात देर तक बरसकर अभी-अभी फीके हुए बादल के पीछे से यकायक निकल आए चाँद से गोरी हो आई थी। चेहरे से टकराती भीगी हवा में कहीं आसपास खिलते चंपा की मादक गंध थी। उसे अपने नासापुटों में महसूसते हुए उसे अनायास ख्याल आया था, न जाने इस हत्यारे जंगल में इनसानी खून से सींचे हुए रक्त चंपा के और कितने ऐसे अभागे पेड़ होंगे...
इसके बाद और कई दिन नामालूम-से बीते थे। अपने उपन्यास को फिनिशिंग टच देते हुए वह कहीं बाहर नहीं निकल पाई थी। कौशल भी कोलकाता गया हुआ था किसी काम से, इसलिए उससे भी मुलाकात नहीं हो पाई थी। उस दिन दोपहर को खाने के बाद बरामदे में आ बैठी थी। उपन्यास के आखिरी दृश्य में कुछ संशोधन करने थे।
थोड़ी देर बाद डाकिया उस दिन का डाक दे गया था - कुछ पत्रिकाएँ, चिट्ठियाँ...
अभी वह उन्हें देख ही रही थी कि बँगले के अहाते में धूल उड़ाती हुई एक पुलिस की जीप आकर रुकी थी। जीप के रुकते ही दो सिपाही कूदकर नीचे उतरे थे और फिर भागते हुए बँगले के पीछे की तरफ सर्वेट क्वाटर की तरफ चले गए थे। घटना की आकस्मिकता से वह यकायक घबरा उठी थी। पुलिस यहाँ क्यों आई थी...
एक इंस्पेक्टर को अपनी ओर बढ़ते देख वह अपनी कुर्सी से कपड़े सँभालते हुए उठ खड़ी हुई थी।
नमस्ते मैडम! अशिष्ट ढंग से कहते हुए वह इंस्पेक्टर उसके सामने खड़ा हो गया था - क्षमा कीजिएगा, इस तरह से आना पड़ा... अच्छा, ये गोपाल कहाँ है?
जी... वह उनके प्रश्न का आशय समझ नहीं पाई थी।
गोपाल... नहीं जानती आप उसे! सुना है, आपका तो काफी आना-जाना होता है उनकी बस्तियों में...
वह कोई जबाव देती इससे पहले ही दो सिपाही पुनिया और उसके पति को धकेलते हुए वहाँ ले आए थे। पुनिया का बेटा उसकी पीठ से बँधा जोर-जोर से रो रहा था। पुनिया भी काफी घबराई हुई दिख रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसका पति अपना दोनों हाथ जोड़े थर-थर काँप रहा था।
- क्यों रे, गोपाल को कहाँ छिपा रखा है?
इंस्पेक्टर साहब ने पुनिया के पति को रूलर से कोंचा था - सच-सच बताना, वर्ना तुम सब भीतर जाओगे। महाजन को मारा है, नकदी भी लूटी है...
- हमको कुच्छो नहीं मालूम सरकार!
पुनिया अब जोर-जोर से रोने लगी थी।
- नक्सल का साथ दोगे तो... अगर इधर आया तो थाना जरूर खबर करना...
कहते हुए इंस्पेक्टर एक बार फिर उसकी तरफ मुडा था - मैडम, घूमने आई हैं इधर आप, रेंजर साहब कह रहे थे। यहाँ के लफड़े से दूर ही रहिए... वर्ना मुसीबत में पड़ जाएँगी। लिखती हैं आप...
कहते हुए उसने बिना पूछे उसकी पांडुलिपि उठा ली थी - जल,जंगल, जमीन... शुभचिंतक हैं आप आदिवासियों की... अच्छा है, लिखिए... अभी कल ही कुछ आपत्तिजनक दस्ताबेज जब्त किए है दास बाबू से - पत्रकार हैं, लिखते हैं - आप ही की तरह, अब जाएँगे अंदर कुछ वर्षों के लिए...
भद्दे ढंग से हँसते हुए उसने पांडुलिपि फिर से मेज पर रख दी थी - कुछ रोमांस-वोमांस पर लिखिए - गुलशन नंदा टाइप... कॉलेज के दिनों में खूब पढ़ते थे हम भी - लरजते आँसू, झील के उस पार... फिल्म भी बनी थी उन कहानियों पर! आपने देखी होगी? खासकर वो वाला गीत - एक बार मुझको पिला दे शराब देख फिर होता है क्या... मुमताज! एकदम मस्त... हम तो हॉल में उठकर नाचने लगते थे... जवानी के दिन थे... हा हा हा... अच्छा नमस्कार!