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ऋचा (उपन्यास)

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“इस वक्त तेरा मज़ाक इन्ज्वाॅय करने के मूड में बिल्कुल नहीं हूँ, ऋचा। जानती है, मेरी अॅंगूठी का नाप ले गया है। मम्मी से शाम को चार बजे ज्वेलर के यहाँ ले जाने की इजाजत भी ले ली है।”

“ठीक है, उसकी दी हुई हीरे की अॅंगूठी पहनकर अपनी माँग का सिन्दूर दिखा देना। उसकी ओर से एक कीमती तोहफ़ा स्वीकार करने में कौन-सी बड़ी कठिनाई है। डाॅलर कमाने वाले के लिए एक अॅंगूठी कौन बड़ी चीज है।”

“ऋचा, अब बस कर, मेरी जान निकली जा रही है और तू है कि मज़ाक पर मज़ाक किए जा रही है। वक्त की नज़ाकत भी तो कोई चीज होती है।” स्मिता की आँखें भर आई।

“अच्छा, चल पहले उधर जाना है।” ऋचा ने उसका हाथ खींचा।

“अब किधर जा रही है एऋचा?” स्मिता ने पूछा।

“विशाल को साथ ले चलना है। तू यहीं रूक, मैं विशाल को लेकर आती हूँ।” स्मिता को सवाल पूछने का समय न दे, ऋचा विशाल डिपार्टमेंट की ओर बढ़ गई थी।

ऋचा को आया देख, विशाल का चेहरा खिल गया –

“अरे ऋचा, हमारा वादा तो शाम को कम्पनी बाग में मिलने का था। क्या शाम का इन्तज़ार कर पाना मुश्किल था?” विशाल हॅंस रहा था।

“अभी पूरी बात बताने का वक्त नहीं है, जल्दी चलो, ज़रूरी काम है।”

“वाह! हम पर इस तरह हक जमाने का आपका अन्दाज़ अच्छा लगा। कहिए, कहाँ चलना है? बन्दा तो आपके हुक्म का गुलाम है।”

आॅटो से तीनों रोहित के घर पहॅुचे। रोहित के कमरे में ही मण्डप बनाया गया था। रोहित और नीरज के चार-पाँच घनिष्ठ मित्र पहुँच चुके थे, पर नीरज अभी नहीं पहॅुंचा था। नीरज को न देख, स्मिता के चेहरे का रंग उड़-सा गया।

“कहीं नीरज ने अपना इरादा तो नहीं बदल दिया?” स्मिता शंकित थी।

“प्यार पर विश्वास नहीं था तो इतना बड़ा कदम क्यों उठाया, स्मिता?” ऋचा भी चिन्तित थी।

तभी नीरज आता दिखा। सबके चेहरे खिल गए। दोस्तों ने नीरज की पीठ ठोंक, बधाई दी। स्मिता ने पैकेट से एक लाल साड़ी निकालकर ऋचा की ओर बढ़ाते हुए कहा –

“आज इसी साड़ी से काम चलाना होगा, स्मिता। अगर तेरे घर से तेरी शादी होती तो बेशकीमती साड़ी पहनती।”

“प्यार से ज्यादा कीमती कोई दूसरी चीज नहीं होती, ऋचा। मेरे ख्याल में तो आज स्मिता और नीरज दुनिया के सबसे ज्यादा धनी इन्सान हैं।” विशाल ने ऋचा पर दृष्टि डाल, अपनी बात कही थी।

नीरज को रोहित ने अपना सिल्क का नया कुर्ता-पाजामा पहनाया। दोस्तों में अजीब उत्साह था। दोनों के साहस से वे अभिभूत थे। रोहित ने पण्डित जी से विवाह-संस्कार शुरू करने को कहा। तभी विशाल ने एक अजीब सवाल कर डाला-

“नीरज, एक सच बताना। कहीं तुम्हारे मन में स्मिता की सम्पत्ति का लोभ तो नहीं है? अगर स्मिता के मम्मी-पापा ने तुम्हें स्वीकार नहीं किया तो तुम्हें कुछ न मिलने का दुःख तो नहीं होगा?”

“स्मिता को पाकर मुझे सबकुछ मिल जाएगा। स्मिता की सम्पत्ति से मेरा कोई सरोकार नहीं। स्मिता के माता-पिता का दिया हुआ मुझे कुछ भी स्वीकार नहीं होगा, क्योंकि मेरा स्वाभिमान भीख-ग्रहण नहीं कर सकता।”

नीरज के जवाब पर दोस्तों ने तालियाँ बजा डालीं। नीरज के दृढ़ चेहरे पर मुग्ध दृष्टि डाल, स्मिता ने आँखें झुका लीं। पण्डित जी ने मन्त्रोच्चार शुरू कर दिए। रोहित ने ही कन्यादान का फ़र्र्ज़ पूरा किया। सोल्लास विवाह सम्पन्न हो गया।

रोहित ने सबके लिए लंच का आयोजन कर रखा था। विवाह के बाद ऋचा ने लड्डू खिलाकर वर-वधू का मुँह मीठा कराया। हल्के संगीत ने माहौल खुशनुमा कर दिया। दोस्तों के परिहास ने नीरज का मन हल्का जरूर कर दिया, पर आगे क्या होगा की चिन्ता सिर पर सवार थी। स्मिता का चेहरा लाज से लाल हो रहा था। इतना बड़ा कदम उठाना स्वप्नवत् था, पर नीरज का नाम सुनते ही मम्मी के चेहरे पर घृणा के जो भाव अंकित थे, उसके बाद नीरज के साथ विवाह की बात सोचना भी असम्भव था। मॅंुह बिचकाकर मम्मी ने कहा था-

“तू क्या सोचती है, वह तुझे प्यार करता है? देख स्मिता, मैं इस क्लास को अच्छी तरह जानती हूँ। जल्दी-से-जल्दी अमीर बन जाने के लिए किसी अमीर लड़की को फंसा लेना सबसे आसान तरीका है। वह तुझसे नहीं, तेरे पैसे से प्यार करता है।”

“नीरज ऐसा लड़का नहीं है, मम्मी। वह हमें सचमुच प्यार करता है।”

डरते-डरते स्मिता इतना ही कह सकी थी।

“बेवकू।फ़ लड़की, तुझमें ऐसा क्या है जिसकी वजह से कोई तुझे प्यार करे? मेरी तो समझ में नहीं आता, लाख कोशिशों के बावजूद तेरी पर्सनैलिटी डेवलप क्यों नहीं हुई? कान खोलकर सुन ले, नीरज का नाम भी लिया तो मुझसे बुरा कोई नही होगा। वह कंगला मेरा दामाद बनने का सपना इसीलिए देख सका, क्योंकि तू मूर्ख है।”

उमड़ते आँसुओं के साथ स्मिता कमरे के पलंग पर ढह-सी गई थी। नीरज हमेशा कहता, स्मिता दूसरी लड़कियों से बिल्कुल अलग थी। उसका निष्पाप चेहरा, उसका भोलापन नीरज को कितना प्रिय है।

दूसरे दिन ही अमेरिका से प्रशान्त आ गया था। प्रशान्त की ख़ातिर में मम्मी ने कोई कसर नहीं उठा रखी। अकेले में स्मिता को अच्छी तरह चेतावनी दे डाली, अगर उसने जरा भी गड़बड़ की तो पापा-मम्मी उसे नहीं बख्शेंगे। यह उनके सम्मान का प्रश्न था। स्मिता की जरा-सी ग़लती से उनकी नाक कट जाएगी। प्रशान्त की हर बात का जवाब स्मिता हाँ-ना में देती रही, फिर भी स्मिता जैसी बेवकूफ लड़की प्रशान्त को पसन्द आ गई। प्रशान्त की ‘हाँ’ पर मम्मी फूली न समाई। पहली बार स्मिता को सीने से चिपटाकर प्यार किया। स्मिता के उदास चेहरे पर उनकी नजर ही कहाँ पड़ी थी! स्मिता ने पूरी रात जागकर काटी थी। नीरज के बिना वह जी नहीं सकेगी। सुबह तक वह निर्णय ले चुकी थी। मम्मी-पापा अगले सप्ताह उसके विवाह की तारीख तय कर, शादी की तैयारियों की सोच रहे थे, और आज ……… स्मिता की शादी भी हो गई। अचानक स्मिता काॅप उठी। मम्मी-पापा का रौद्र-रूप उसे डरा गया।
 


अब सबसे बड़ी समस्या स्मिता और नीरज के घरवालों को सूचना देने की थी। विशाल ने पहले स्मिता के घरवालों से आशीर्वाद लेने जाने की सलाह दी। स्मिता के पाॅव नहीं उठ रहे थे, पर नीरज ने कन्धे पर हाथ रखकर तसल्ली दी थी। रोहित ने साहस दिया –

“अगर तुम्हें स्वीकार नहीं किया जाए तो दुःखी मत होना। हम सब तुम्हारे साथ हैं।”

जैसी उम्मीद थी, स्मिता के साथ नीरज को देख, स्मिता की मम्मी की आँखों से चिनगारियाँ बरसने लगीं। नीरज के साथ माँ के पाँवों पर झुकने के प्रयास में वह गरज उठीं-

“तेरी यह हिमाकत? इस कंगले से ब्याह कर हमारी नाक कटा दी। दूर हो जा मेरी आँखों के सामने से। आज से तू हमारे लिए मर गई।”

“ऐसा न कहो, मम्मी! हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। अपना आशीर्वाद दे दो, मम्मी।” स्मिता की आँखों से आँसू बहने लगे।

“खबरदार जो मुझे मम्मी कहा! हाँ इतना याद रखना, अगर भूख से मर भी रही हो तो इस दरवाजे पर दस्तक देने मत आना।”

“क्षमा करें, ऐसा दिन कभी नहीं आएगा। स्मिता मेरी ज़िम्मेदारी है, उसे सुख देने का पूरा प्रयास करूँगा, मम्मी जी।” इस बार नीरज ने दृढ़ता से कहा।

“अरे, तुम जैसे बहुत देखे हैं। अचानक अमीर बन जाने के लिए स्मिता जैसी मूर्ख और धनी लड़की को फंसा लेना बहुत आसान होता है, पर तेरा यहाँ सपना कभी पूरा नहीं होगा।” स्मिता के पापा के शब्दों में नीरज के प्रति सा।फ़ हिकारत झलक रही थी।

“माफ़ करें, आप बड़े हैं इसलिए आपका यह अपमान सह रहा हूँ। आपने शायद ऐसे ही व्यक्ति देखे होंगे, जो धोखेधड़ी से अमीर बन जाते हैं। हम तो बस आपका आशीर्वाद लेने आए थे, आपके पैसों से हमें कुछ भी लेना-देना नहीं है। चलो स्मिता।”

“हाँ-हाँ! फौरन हमारी नज़रों के सामने से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाओ। इस कुलकलंकिनी का मैं मुँह भी नहीं देखना चाहता। अब ज्यादा देर रूके तो पता नहीं, मैं क्या कर डालूँ। यह लड़की हमारे लिए मर गई है।” गरजते स्मिता के पापा ने उन दोनों के मॅंुह पर ही दरवाज़ा जोरों से बन्द कर दिया।

स्मिता की आँखों से आँसू बह निकले। प्यार से आँसू पोंछ, नीरज ने समझाया –

“हम दोनों इस स्थिति के लिए तैयार थे, स्मिता। तुम्हारे मन की हालत समझता हूँ, पर विश्वास रखो, जीवन में कभी तुम्हें दुःख नहीं पहुँचाऊॅंगा। मुझ पर यकीन है, न?”

‘हाँ’ में सिर हिला, स्मिता ने विश्वास भरी दृष्टि से नीरज को गर्व से देखा था।

“अभी तो एक ही मंजिल तय की है, इससे भी बड़ी परीक्षा मेरे घर में देनी होगी। तैयार हो जाओ, स्मिता।” अन्दर से चिन्तित नीरज ऊपर से मुस्करा रहा था।

नीरज के घर तो तूफ़ान ही आ गया। माँ-बाप फटी-फटी आँखों से देखते रह गए। जिस बेटे पर उन्होंने आशा लगा रखी थी, उसने बिना इजाज़त, बिना दहेज, घर पर एक और बोझ लाद दिया था। दो जवान बहनों की शादी किए बिना, बेटा बहू ब्याह लाया। माँ ने छाती पीट-पीट कर कोहराम मचा दिया। बहू की आरती उतारने की जगह चैखट पार न करने की कसम दे डाली। नीरज की छोटी बहनें सुधा और रागिनी भी विस्मित थीं। दरवाजे पर खड़े भाई और भाभी को घर के अन्दर लाने के लिए उन्होंने ही पहल की। सुधा ने समझाया था-

“माँ, जो हो गया सो हो गया। अब भइया-भाभी को दरवाजे पर खड़ा रखकर जग-हॅंसाई न कराओ।”

“हाँ, भाग्यवान। हमारी किस्मत में जो था, सो हो गया। अब उन्हें घर के अन्दर आने की इजाजत दे दो, नीरज की माँ।” धीमी आवाज में पिता ने कहा।

पड़ोसियों की भीड़ जमा देख, नीरज की माँ दरवाजे से पीछे ज़रूर हो गई, पर आग्नेय दृष्टि से स्मिता को देखकर अपशब्दों की बौछार करती रहीं। आँसुओं से धुंधली आँखों के साथ स्मिता ने श्वसुर-गृह में प्रवेश किया था। क्या इसी स्वागत के उसने सपने देखे थे?

नीरज और स्मिता के रहने के स्थान की समस्या थी। दो कमरों के घर में उनके लिए अलग कमरा कहाँ से मिलता। सुधा और रागिनी ने स्टोर का सामान इधर-उधर कर, एक खाट स्टोर में डाल दी।

गुलाब और बेले की लड़ियों से महकते सुवासित सुहाग-कक्ष की जगह मसालों और पुराने सामान की गन्ध थी। संकुचित नीरज, स्मिता की दुविधा समझ रहा था। प्यार से स्मिता को आलिंगन मे ले, नीरज ने क्षमा-सी माँगी थी-
 


“ऐसे सुहाग-कक्ष की तुम कल्पना भी नहीं कर सकती थीं, स्मिता। यकीन रखो, एक दिन हमारी ज़िन्दगी में गुलाब की सुगन्ध जरूर होगी। मुझे माफ़ कर सकती हो?”

“यह क्या कह रहे हो? तुम्हारे साथ मुझे काँटों की सेज भी स्वीकार है। तुम्हारे साथ काँटे भी फूल बन जाएँगे। बस हमें तुम्हारा प्यार चाहिए।” भावभीने शब्दांे में स्मिता ने कहा।

“मेरे प्यार पर बस तुम्हारा नाम लिखा है, स्मिता। हम दोनों मिलकर ज़िन्दगी को स्वर्ग बनाएँगे। एक दिन हमारे जीवन में सुनहरा सवेरा जरूर आएगा।” विश्वास से नीरज ने कहा।

“हमारी जिन्दगी में तो सुनहरा सवेरा आ ही गया है, नीरज। तुम मेरे सूरज हो।”

“वाह! अब तो मेरी स्मिता प्यारपगी बातें बनाने लगी हैं।”

नीरज के वक्ष में मॅंुह छिपा, स्मिता गौरैया-सी दुबक गई।

रोहित के घर से वापस लौटते विशाल ने ऋचा से अपना मेहनताना माँग डाला-

“आज का पूरा दिन आपके नाम समर्पित रहा, मोहतरमा, हमारी फ़ीस?”

“ओह गाॅड, तुम तो बड़े स्वार्थी वकील हो, उपकार या परोपकार नाम का शब्द शायद जनाब की डिक्शनरी में ही नहीं है? कहिए, क्या फ़ीस चाहिए?”

“जो माँगू मिलेगा? वादा करती हैं?”

“हाँ वादा करती हूँ। आज आपने इतनी मदद की है, बदले में कुछ दे सकॅंू तो हिसाब बराबर हो जाएगा।”

“अब जब बात हिसाब-किताब की आ गई तो अपना मेहनताना आप पर उधार छोड़ता हूँ। कभी ठीक वक्त पर मय-सूद वसूल लूँगा। “

“बड़े पक्के हिसाबी हैं, आप। चलिए, आज हमारी ओर से एक-एक आइसक्रीम हो जाए।” ऋचा खुश दिख रही थी।

“आपसे आइसक्रीम नहीं, पूरी दावत लूँगा। आखिर आपकी सहेली की शादी में मैं भी एक गवाह था।”

“जरूर! भगवान् करे सब ठीक रहे।”

“सच्चे प्रेमी हर तकलीफ़ हॅंसकर सह लेते हैं। वे दोनों बहादुर प्रेमी हैं। उनकी चिन्ता छोड़कर अपने पर ध्यान दीजिए।”

“सचमुच, प्रेम में बड़ी ताकत होती है, वरना स्मिता जैसी डरपोक लड़की भला इतना बड़ा कदम उठा पाती? भगवान् उसे सुखी रखें।” ऋचा ने सच्चे मन से कामना की थी।

“चलिए, आज का दिन हमेशा याद रहेगा। वैसे एक सलाह है, अब परोपकार छोड़कर पढ़ाई पर ध्यान दीजिए। बहुत कम दिन बचे हैं, परीक्षा में पहले नम्बर पर आना है न?”

“सलाह के लिए शुक्रिया। आज ही से जुट जाती हूँ। आपके लिए भी हमारी यही सलाह है।”

हॅंसते हुए दोनों ने विदा ली थी। प्रेस में नीरज व स्मिता की शादी की एक छोटी-सी सूचना बनाकर छपने को दे दी। घरवालों का सहयोग मिलने पर प्रेमियों का उत्साह दुगुना हो सकता था। काश, परिवार वाले अपने बच्चों की खुशी के लिए अपना अहम् छोड़ पाते?

घर पहुँंची ऋचा ने माँ के कामों में हाथ बॅंटाना शुरू कर, माँ को खुश कर दिया।

“क्या बात है, आज बड़ी खुश दिख रही है?”

“हाँ, माँ, आज स्मिता और नीरज की शादी हो गई।”

“क्या…… क्या…….. ? कल शाम तक तो ऐसी कोई बात नहीं थी?”

“हाँ, माँ, सब कुछ जल्दी में हो गया।”

“देख ऋचा, तू तो ऐसा नहीं करेगी न? हमारी मर्जी के बिना कोई गलत कदम मत उठाना।”

“हाँ, माँ, अगर ऐसा वक्त आया तो तुम्हारी इजाज़त लेकर ही शादी करूँगी।” हॅंसती ऋचा ने माँ के गले में बाँहें डाल दीं।
 


ऋचा सोच रही थी, स्मिता की नई सुबह कैसी होगी? क्या नीरज के घरवाले स्मिता को स्वीकार कर लंेगे? अचानक ऋचा को विशाल की बात याद हो आई। अब सचमुच उसे पढ़ाई में जुट जाना चाहिए। अब स्मिता का अपना जीवन है, उसके साथ नीरज जैसा जीवनसाथी है। दोनों को अपनी लड़ाई खुद जीतनी होगी। ऋचा किसी की बैसाखी नहीं बनेगी।

ऋचा ने पूरे मन से पढ़ाई शुरू कर दी। स्मिता ने अभी कॅालेज आना शुरू नहीं किया था। अखबार के दफ्तर में भी ऋचा कम समय दे पा रही थी, पर विशाल उससे किसी-न-किसी बहाने मिल ही लेता। विशाल का साथ ऋचा को अच्छा लगता। स्मिता की लम्बी गैरहाजिरी ऋचा को परेशान करती, जो भी हो, उसे फ़ाइनल परीक्षा देनी ही चाहिए। नीरज से पूरे समाचार नहीं मिल पा रहे थे। अचानक एक दिन ऋचा ने स्मिता के घर की ओर अपनी साइकिल मोड़ दी।

घर के बाहर से ही स्मिता की सास के कटु शब्द सुनाई दे रहे थे। बेटे को जाल में फंसाने वाली बहू का अपराध अक्षम्य था। एक तो शादी में दहेज तो दूर की बात, बर्तन-कपड़े तक नहीं मिले, उसपर घर के कामकाज में कोरी बहू को लेकर क्या उसकी आरती उतारेंगी?

नीरज की माँ के बड़े-बड़े अरमान थे। बेटे की शादी में ढेर-सा पैसा आएगा, उससे बेटियों के ब्याह का बोझ हल्का हो जाता। यहाँ तो कमानेवाला एक, उसपर एक और बोझ आ गया। नीरज ने शाम को काम करना शुरू कर दिया था, पर तनख्वाह तो एक माह बाद ही मिलेगी। ऋचा का मन भर आया। लाड़-प्यार में पली बेटी की यह दुर्दशा? दरवाजा ठेल, ऋचा अन्दर चली गई। उसे देख नीरज की माँ ने सुर बदल लिया, पर मन का आक्रोश चेहरे पर लिखा हुआ था।

ऋचा से चिपटकर स्मिता रो पड़ी। ऋचा की भी आँखे भर आई। अपने को सहेज ऋचा ने स्मिता के आँसू पोंछ दिए।

“तू कॅालेज क्यों नहीं आती, स्मिता?”

“मना कर दिया गया है।”

“क्यों, स्मिता? तेरा फाइनल इअर है, नीरज ने भी कुछ नहीं कहा?”

“घर में इतना क्लेश है कि वह परेशान हैं। कहते हैं, इस साल चुप रहो, अगले साल इम्तिहान दे देना। तब तक उन्हें भी नौकरी मिल जाएगी।”

“नहीं, स्मिता, एक्ज़ाम तो तू इसी साल देगी, मैं नीरज से बात करूँगी।” दृढ़ता से ऋचा ने कहा।

“सच, ऋचा? क्या यह हो सकेगा?” स्मिता की आँखे चमक उठीं।

“अगर यहाँ रहना मुश्किल है तो तुम दोनों रोहित के आउट-हाउस में क्यों नहीं चले जाते?”

“नीरज कहते हैं, माँ-बाप को पहले ही उनकी वजह से बहुत तकलीफ़ पहुँची है, अब अलग होकर और दुःख नहीं दे सकते। अभी उनका वेतन भी इतना नहीं कि हम दोनों गुजारा कर सकें।”

“तू कहीं कोई काम क्यों नहीं कर लेती? जानती है, मैट्रिक के बाद से मैंने अपनी पढ़ाई बच्चों की ट्यूशन्स लेकर पूरी की है। आज भी अखबार के दफ्तर में पार्ट-टाइम काम करके पैसा कमा रही हूॅ।”

“तेरी बात और है, ऋचा। हममें उतनी हिम्मत जो नहीं है।” स्मिता दयनीय हो आई।

“हिम्मत नहीं है, तो हिम्मत पैदा कर। देख, अपने लिए संघर्ष अब तुझे खुद करना है। यहाँ तक आ गई है तो आगे का रास्ता तुझे खोजना ही होगा। दूसरों की दया पर कब तक आश्रित रहेगी? आँसू ढलकाने से कुछ नहीं मिलने वाला।”

“तू ठीक कह रही है, ऋचा। नीरज की बहिन सुधा की शादी दहेज के कारण रूकी हुई है। अगर हम भी कमाएँगे तो घर में चार पैसे आएँगे। हम भी कहीं काम करेंगे।”

“सिर्फ तू ही क्यों? तेरी दोनों ननदों ने ग्रेज्युएशन किया है, वे भी कहीं काम कर सकती हैं। आजकल लड़के भी कामकाजी लड़कियों से शादी करना चाहते हैं, ताकि घर का आर्थिक स्तर ऊपर उठ सके।”

“आप ठीक कह रही हैं, ऋचा दीदी। हम भी काम करना चाहते हैं, पर अम्मा कहती हैं, लड़की कमाएगी तो दुनिया वाले उॅंगली उठाएँगे।” अचानक शर्बत लिए आती सुधा ने दोनों को चैंका दिया। सुधा के पीछे रागिनी भी आई थी।
 


सुधा और रागिनी दोनों ही समझदार युवतियाँ थीं। सौम्य-शान्त सुधा के विपरीत रागिनी के चेहरे पर चंचलता थी।

“सच, ऋचा जी। आपने तो हमारी आँखें खोल दीं। अब हम दोनों काम करेंगे।” रागिनी दृढ़ थी।

“स्मिता भाभी, आप भी कल से कॅालेज जाइए, हम अम्मा को समझा लेंगे।” सुधा ने गम्भीर स्वर में अपनी बात कही।

“ऋचा, मेरी ये दोनों ननदें ही मेरा सहारा हैं। तू तो जानती हैं, हमने घर के कामकाज कभी नहीं किए, पर यहाँ इनकी मदद से घर के कामकाज सीख रही हूँ।”

“नहीं, भाभी, अब आप घर के काम नहीं करेंगी, बल्कि मन लगाकर पढ़ाई करेंगी और परीक्षा दंेगी।” सुधा ने प्यार से कहा।

“हाँ, भाभी, अब हम सब मिलकर नौकरी तलाश करेंगे। जानती हैं, ऋचा जी, हमें भी लगता है, हम घर में बेकार बैठकर समय नष्ट कर रहे हैं।” रागिनी उत्साहित थी।

“तुम दोनों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। तुम्हारी भाभी भाग्यवान है, इसे इतनी अच्छी ननदें मिलीं। स्मिता, कल कॅालेज में तेरा इन्तजार करूँगी।”

बड़े हल्के मन से ऋचा घर लौटी। सुधा और रागिनी से बातें करके उसके मन में आशा जाग गई। स्मिता के कॅालेज आने की आशा बन गई थी। कल शाम विशाल ने गार्डेन में मिलने जाने का वादा ले लिया था। घर में रोहित को अपने इन्तजार में बैठा पा ऋचा आश्चर्य में पड़ गई। ऋचा के पहुँचने पर माँ ने शंकाभरी दृष्टि दोनों पर डाली थी।

“अरे, रोहित, यहाँ अचानक?”

“हाँ, ऋचा, मैं यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ। तुम्हें एक सनसनीखेज खबर देनी थी, सोचा, इसी बहाने तुमसे मिलना भी हो जाएगा।”

“माँ, रोहित आज यहीं खाना खाएँगे।” ऋचा ने माँ को वहाँ से हटाने में ही भलाई समझी।

“वैसे माँ ने तुम्हारी गैरहाजिरी में मेरा पूरा पोस्टमार्टम कर डाला। उन्हें डर है, शायद हमारे बीच प्रेम-वेम का कोई चक्कर है।” रोहित हॅंस रहा था।

“तब तो तुम्हें खाना खिलाना भारी पड़ेगा। हाँ बताओ, क्या खबर है?”

“कल सुनीता को उसके पति और घरवालों ने मिलकर जलाकर मार डालने की कोशिश की। वह ‘मेरी माउंट हाॅस्पिटल’ में बेहोशी की हालत में एडमिट है।”

“अरे सुनीता तो नर्स है, उसके साथ ऐसा क्यों, रोहित?”

“हाँ, ऋचा। बड़ी दुःख भरी कहानी है सुनीता की। उसके घर में एक विधवा माँ और दो छोटे भाई-बहिन हैं। विवाह के पहले सुनीता ही घर के दायित्व निभाती थी। छोटा भाई अभी बारहवीं पास करके टाइपिंग सीख रहा है। साथ में स्टेनोग्राफ़ी का कोर्स भी कर रहा है। बहिन दसवीं में पढ़ रही है।”

“ओह!, तब तो सुनीता पर ही परिवार का दायित्व है ।
 


हां ऋचा, सुनीता चाहती थी, उसके भाई की नौकरी लग जाए, उसके बाद ही वह शादी करे, पर राकेश ने जल्दी शादी के लिए दबाव डाला। उस वक्त तो उसने बड़ी-बड़ी बातें की थीं कि सुनीता अपना वेतन पहले की तरह अपने घर में देती रहेगी, पर शादी के बाद उसने रंग बदल दिया कि वह अपना वेतन उसे दे। सुनीता ने ऐसा करने से मना कर दिया। बस उसकी मनाही से उसपर अत्याचार शुरू हो गए।”

“अरे, यह तो अन्याय है, पहले तो पति ने वादा किया, बाद मे अपनी ही बात से पीछे हट गया।” ऋचा उत्तेजित थी।

“इतना ही नहीं, सुनीता नर्स है। कभी-कभी ज्यादा काम होने की वजह से उसे देर रात तक ड्यूटी करनी पड़ती है। देर से आने पर सास, सुनीता के चरित्र पर लांछन लगाकर, अपशब्द कहती और पति सुनीता को बेरहमी से पीट डालता।”

“सुनीता का अभी क्या हाल है, रोहित?”

“30ः जल गई है, वह तो पड़ोसियों ने उसकी चीखें सुनकर पुलिस में खबर कर दी, वरना सुनीता की राख ही मिलती। “

“हाँ, और हमेशा की तरह कह दिया जाता कि बेचारी किचेन में गैस या स्टोव के फटने से जल गई। मैं समझती थी, आत्मनिर्भर स्त्री की स्थिति बेहतर होती है, पर सच तो यह है कि औरत आज भी औरत ही है।”

“अब इस केस में तुम क्या करोगी, ऋचा?”

“सुबह होते ही सुनीता से मिलने जाऊॅंगी। अगर वह बात करने लायक हुई तो पूरी बात अखबार में छापॅंूगी, रोहित। थैंक्स फाॅर दि इन्फ़ाॅर्मेशन।”

“हाँ, अभी तो मैं वहीं से आ रहा हूँ। डाॅक्टर ने किसी को भी अन्दर जाने की इजाज़त नहीं दी है। वैसे पुलिस का पहरा है और सुनीता की सास मगरमच्छ के आँसू बहा रही है।”

“तुम कहाँ जा रहे हो, रोहित। तुम्हारी कमी बहुत महसूस होगी।” अचानक ऋचा को रोहित जा रहा है, याद हो आया।

“पापा चाहते हैं, अब मैं उनके काम में हाथ बटाऊॅं। वैसे भी फ़ाइनल एक्जाम्स के बाद यहाँ और रूकने का कोई अर्थ नहीं है।”

“क्यों, तुम्हारी लोकप्रियता तुम्हें नेता बना सकती थी, रोहित। तुम नेता बन जाते तो हमारा भी भाव बढ़ जाता।” ऋचा ने मजाक किया।

“तुम्हारा भाव तो आज भी खूब है। ऋचा से न सही, ऋचा के पत्रकार से तो लोग डरते ही हैं।”

तभी आकाश ने आकर खाना तैयार होने की सूचना दी थी। आजकल घर में बड़ी बहिन आई हुई थीं। दीदी के रहने से ऋचा की किचेन से छुट्टी हो जाती। दीदी और माँ की अच्छी पटती थी। अपनी इस बड़ी बहिन के लिए ऋचा के मन में बड़ी हमदर्दी और प्यार था। इस बार वह बहिन के पीछे पड़ी थी कि वह प्राइवेटली आगे की पढ़ाई करे और साथ में सिलाई का डिप्लोमा भी ले ले। अगर इला दीदी डिप्लोमा ले लेंगी तो उसे कहीं सिलाई-टीचर का काम मिल सकता है। घर के कामों के लिए कोई कामवाली रखी जा सकेगी। इला को ऋचा की बातों की सच्चाई समझ में आने लगी थी। क्या वह टीचर बन सकती है। सिलाई-कढ़ाई में इला शुरू से रूचि लेती रही है। श्वसुर-गृह में उसका काशीदाकारी किया गया सामान लोगों ने खूब सराहा था। ऋचा रोज बैठकर इला को अपने पाँवों पर खड़ी होने के सपने दिखाती। अगर कभी उन दोनों की बातों के कुछ शब्द माँ के कानों में पड़ जाते तो वह इला को चेतावनी दे डालती-
 


“ऋचा की बातों में आकर अपनी जिन्दगी मत खराब कर डालना, इला। तू अपनी ससुराल में जैसे रहती है वैसे ही रह। अरे, हम औरतों का तो धरम ही सेवा करना है।”

“हाँ-हाँ, अपनी जिन्दगी होम करके निष्क्रिय बैठे रहना ही औरत का धर्म है। हिन्दुस्तान की आधी आबादी इसी तरह घर में रहकर धर्म निभाती है। अगर औरतें भी काम करें, पैसे कमाएँ तो अपने घर का स्तर ऊंचा उठा सकती हैं।” ऋचा उत्तेजित हो उठती।

माँ के चले जाने के बाद इला ने धीमी आवाज में कहा था –

“तू ठीक कहती है, ऋचा। काश, मुझमें भी तेरी जैसी आग होती, पर अब मैं पढूँगी, सिलाई में डिप्लोमा लेकर टीचर बनूँगी।”

“सच, दीदी, पर इस काम के लिए जीजा जी और तेरे ससुराल वाले इजा।ज़त देंगे?”

“नहीं देंगे तो भूख-हड़ताल करूँगी, जैसे तूने पत्रकारिता कोर्स में प्रवेश के लिए की थी।”

दोनों बहिनें हॅंस पड़ीं। ऋचा को विश्वास हो गया, इला दीदी अब जरूर पढ़ेंगी। घरवालों का विरोध भी सह सकेंगी।

रोहित ने जी खोलकर खाने की तारीफ की थी। इला दीदी का चेहरा खुशी से चमक उठा। हॅंसकर कहा था-

“तुम्हारी अभी शादी नहीं हुई है। बाहर का खाना खाते हो, इसीलिए घर का खाना अच्छा लगता है।”

“नही दीदी, आप सचमुच अच्छी पाक-विशेषज्ञा हैं, अपनी बहिन को भी अपना यह गुण सिखा दीजिए। यह तो टाॅम ब्वाॅय बनी घूमती है। मुझे तो इसके होनेवाले पति की चिन्ता है।” रोहित ने मज़ाक किया था।

“देखो रोहित, तुम्हें हमारे लिए इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं ऐसा पति खोजॅंूगी जो तुम्हारी तरह खाने का शौकीन न हो। ” ऋचा ने गुस्सा दिखाया।

हॅंसते हुए रोहित ने विदा ली। उसके जाने के बाद इला दीदी ने दबी आवाज में ऋचा के मन की बात जाननी चाही थी-

“सच कह ऋचा, रोहित और तेरे बीच प्रेम का चक्कर तो नहीं? अगर वैसी कोई बात है तो हम माँ को मना लेंगे। रोहित अच्छा लड़का है।”

“मेरी भोली दीदी, रोहित बहुत अच्छा लड़का है, पर वह हमारा बस एक अच्छा दोस्त भर है। ज़िन्दगी में प्रेम के अलावा दूसरे रिश्ते भी हो सकते हैं। अब तुम सो जाओ।”

बिस्तर पर लेटते ही ऋचा के दिमाग में जली हुई सुनीता की तस्वीर उभरने लगी। सुनीता से ऋचा का परिचय अस्पताल में हुआ था। वहीं उसने जाना, सुनीता और रोहित पड़ोसी थे। सौम्य सुनीता के व्यवहार ने ऋचा को प्रभावित किया था। साइकिल से गिर जाने की वजह से ऋचा के पैर में चोट लग गई थी। फ़स्र्ट-एड कराने के साथ टिटनेस का इन्जेक्शन लगवाना जरूरी था। कभी-कभी सड़क की मामूली चोट भी ख़तरनाक सिद्ध हो सकती है। सुनीता के व्यवहार में एक अपनापन था। उसके बाद आकाश और माँ को जब भी जरूरत हुई, ऋचा ने अस्पताल में सुनीता की मदद ली थी। ऋचा को हमेशा सुनीता के चेहरे पर एक उदासी की छाया तैरती लगती। तीन वर्ष के एक बेटे की माँ सुनीता को क्या दुःख हो सकता है! रोहित से जब चर्चा की तो उसने बताया था, सुनीता के साथ उसके पति और घरवालों का व्यवहार ठीक नहीं रहता। अक्सर रातों में उसके घर से सुनीता की चीखें सुनाई पड़तीं। ऋचा ने रोहित से कहा था, वह सुनीता से बात क्यों नहीं करता? रोहित का सीधा जवाब था, एक युवक की दखल-अन्दाज़ी सुनीता की ज़िन्दगी की मुश्किलें और बढ़ा देंगी। रोहित की बातों में सच्चाई थी। ऋचा ने एकाध बार सुनीता से जानना चाहा, पर उसने बात टाल दी। कल सुबह कॅालेज जाने के पहले उसे अस्पताल जाना ही होगा।

सुनीता के वार्ड के बाहर पुलिस कांस्टेबल के साथ सुनीता का पति राकेश और उसकी माँ दुःखी चेहरा लिए बैठी थीं। कांस्टेबल ने सुनीता को रोकना चाहा, पर जवाब में सुनीता ने डाॅक्टर की अनुमति दिखा दी। वह पत्रकार है, सुनते ही राकेश के चेहरे पर घबराहट आ गई।

“देखिए, मेरी बीवी एक जबरदस्त हादसे से गुजरी है। उसे आराम की ज़रूरत है। आप अन्दर नहीं जा सकतीं।”

“उसको आराम की ज़रूरत है, आप यह बात समझते है।, राकेश जी?” किंचित् व्यंग्य से अपनी बात कहती ऋचा कमरे में चली गई।

सुनीता आँखें खोले छत को ताक रही थी। ऋचा की आहट पर उसने दृष्टि घुमाकर देखा था। ऋचा ने प्यार से सुनीता के माथे पर हाथ धरा तो उसकी आँखों से झरझर आँसू बह निकले। तभी पीछे से राकेश कमरे में आ गया।

“देखिए, आप पत्रकार हैं, इसका यह मतलब नहीं कि आप सुनीता को उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ाएँ।”

“आपने यह क्यो ंसोचा कि मैं सुनीता को कुछ उल्टा-सीधा सिखाने आई हूँ, जबकि कुछ गड़बड़ हुआ ही नहीं है, मिस्टर राकेश। क्यों, ठीक कह रही हूँ न?”

“नहीं, मेरा मतलब यह नहीं था………..” राकेश सकपका गया।

“आपका मतलब अच्छी तरह समझती हूँ। यहाँ आने के पहले इन्स्पेक्टर अतुल को ख़बर कर दी है, वह किसी भी समय यहाँ पहुँचने वाले हैं। अच्छा हो, आप कमरे के बाहर चले जाएँ, वरना आपकी शिकायत करनी होगी।”
 


सुनीता पर आग्नेय दृष्टि डाल, राकेश ने चेतावनी-सी दे डाली-

“एक बात याद रखना, इन लोगों के कहने से उल्टा-सीधा बयान मत देना। अर्जुन का ख्याल रहे।”

सुनीता सिहर-सी गई। राकेश की बात का अर्थ ऋचा अच्छी तरह से समझ गई। सुनीता का बेटा अर्जुन से हाथ धो बैठेगी। राकेश के बाहर जाते ही ऋचा ने सुनीता को हिम्मत दी थी।

“देखो सुनीता, अन्याय सहते रहना अपराध है। अन्यायी को दण्ड दिलाना ही न्याय है, भले ही वह तुम्हारा अपना पति हो।”

“मेरी कुछ समझ में नहीं आता। वह मुझे छोड़कर दूसरी शादी कर लेगा। मेरे बेटे का क्या होगा?” कठिनाई से अपनी बात कहकर सुनीता रो पड़ी।

“सच यही है न कि तुम्हारे पति ने तुम्हें जलाकर मार डालने की कोशिश की थी? तुम्हारे पड़ोसियों ने तुम्हारी मदद की वरना आज तुम्हारी जगह तुम्हारी राख ही बची होती।”

निःशब्द सुनीता की आँखों से आँसू बहते रहे। पति की धमकी सच बयान देने से रोक रही थी।

“देखो सुनीता, यूँ आँसू बहाने से कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला। आज तुम बच गई हो, पर कल किसी और तरीके से तुम्हें ख़त्म किया जा सकता है। अपने बेटे की ख़ातिर तुम्हें उस नरक से बाहर आ जाना चाहिए। तुम नर्स हो, अपने वेतन से तुम अपने बेटे को एक खुशहाल जिन्दगी दे सकती हो।”

ऋचा की बात से सुनीता के चेहरे पर आशा की झलक दिखाई दी थी। ठीक ही तो कह रही है ऋचा, हर रोज घर आने पर पति और सास उसे प्रताड़ित करने का कोई-न-कोई बहाना खोज ही लेते। माँ को पिटते-रोते देख, नन्हा अर्जुन कैसे सहम जाता है! इस महीने तो वेतन का पैकेट सुनीता से छीन लेने के बावजूद शराब के नशे में पति ने उसे रूई-सा धुन डाला था, क्योंकि सुनीता ने आधा वेतन अपनी माँ को देने की मनुहार की थी। उसकी माँग उसका अपराध समझा गया था। अर्जुन के माँ से लिपट जाने के कारण, पति ने उसे भी थप्पड़ मारकर ढकेल दिया था। अर्जुन की पिटाई का विरोध करने पर सास ने उकसाया था-

“अरे, कब तक इसे झेलेगा? रोज की खिचखिच से अच्छा होगा, इसे ख़त्म कर डाल। तेरे लिए रिश्तों की क्या कमी है? कमाऊ जवान है तू।”

माँ की बात से बढ़ावा पाकर केरोसिन का डिब्बा उठा, सुनीता पर उॅंडे़ल दिया था। गनीमत यही थी, डिब्बे में थोड़ा-सा केरोसिन बाकी था वरना …… सुनीता काँप उठी। तभी इन्स्पेक्टर अतुल आ गए थे।

“कहिए ऋचा जी, कोई सफलता मिली? सच्चाई यही है कि अक्सर महिलाएँ ऐसे ससुराल वालों के सम्मान की रक्षा में झूठा बयान देती हैं, जिन्होंने उन्हें जलाकर ख़त्म करने की कोशिश की हो, बदनाम हम पुलिस वाले होते हैं कि पैसा लेकर हमने केस दबा दिया।”

“आपकी बात से मैं सहमत हूँ। ताज्जुब इसी बात का है कि जो औरतें खुद नहीं कमातीं, अगर वे ससुराल से निकाली जाने के डर से सच्चाई छिपाएँ तो बात कुछ समझ में आती है, पर सुनीता जैसी आत्मनिर्भर औरतें भी सच्चा बयान देने में हिचकती हैं। क्यों सुनीता, क्या मैं गलत कह रही हूँ?”

“अगर मैं सच्चाई बताऊॅं तो मेरा बेटा मुझसे अलग तो नहीं किया जाएगा?”

“हम तुम्हें पूरा न्याय दिलाने की हर सम्भव कोशिश करेंगे, सुनीता।”

“अगर तुम्हारी कोशिश कामयाब न हुई तो?”

एक प्रश्न-चिहन सबके सामने उभरकर आ गया।

“मुझे लगता है, हमारा कानून तुम्हें न्याय देगा।” अतुल ने तसल्ली दी।

“अपने डर की वजह से तुम फिर उसी नरक में जाने को तैयार हो, सुनीता?” ऋचा ने सीधा सवाल किया।

“नहीं……… ई ई ……. पर, मेरा बेटा?”

“बेटे के भविष्य के लिए ही तुम्हें सच्चाई बतानी चाहिए, सुनीता।”
 


इन्स्पेक्टर अतुल और ऋचा के चेहरों पर नजर डाल, सुनीता ने निर्णय ले डाला। उसपर किए गए अत्याचारों के पड़ोसी गवाह हैं। मीना दीदी ने तो कई बार कहा, सुनीता को अलग हो जाना चाहिए। वह उसके समर्थन में कचहरी में गवाही देंगी। पड़ोसियों की हर जरूरत के वक्त सुनीता ने मदद की है, इसीलिए उनकी हमदर्दी उसके साथ है। अब सुनीता को सच्चाई से नहीं भागना चाहिए। दृढ़ स्वर में सुनीता ने कहा-

“मैं आपको सच्चाई बताने को तैयार हूँ, पर मेरी और मेरे बेटे की रक्षा की जिम्मेदारी आपको लेनी होगी, इन्स्पेक्टर।”

“मुझे मंजूर है।” इन्स्पेक्टर अतुल ने बयान दर्ज करना शुरू किया था।

पूरी घटना सुनकर ऋचा सन्न रह गई। एक पति इतना क्रूर कैसे हो सकता है! जिस पत्नी के साथ वह रातों में सोया, जिसके साथ उसे यौन-तृप्ति मिली, वह निर्ममता से उसका जीवन ख़त्म कर सकता है! सुनीता भी तो राकेश के बच्चे की माँ बनी थी। पति के सुख के लिए सुनीता ने क्या नहीं किया? क्यों एक औरत दूसरी औरत का दर्द नहीं समझ पाती? राकेश की माँ को अपने बेटे का दर्द है, पर सुनीता की ममता का उसे कोई ख्याल नहीं है। ठीक कहा जाता है, औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है। पति की उपेक्षिता पत्नी को तो अक्सर भरपेट खाना भी नहीं मिलता। ऐसी स्थितियों मंे सास को बहू नहीं, मुफ्त की नौकरानी मिल जाती है। बेटे को बहू के विरूद्ध भड़काते रहने से सास का वर्चस्व बना रहता है। सुनीता के मामले से यह सिद्ध हो गया कि अपने पाँवों पर खड़ी स्त्रियों की स्थिति भी उतनी ही दयनीय हो सकती है। अचानक घड़ी पर निगाह पड़ते ही ऋचा चैंक गई। आज कॅालेज का आखिरी दिन है। स्मिता के कॅालेज आने की बात है। वह पहले ही लेट हो चुकी है। इन्स्पेक्टर अतुल से क्षमा माँग, वह कालेज जाने के लिए खड़ी हो गई।

“इन्स्पेक्टर, अब सुनीता को न्याय आपको दिलाना है। बाहर इनके पति और सास बैठे है। उनके साथ आपको क्या करना है, आप जानते हैं।”

“ठीक है। हाँ, सुनीता के बयान की आप भी एक साक्षी रहेंगी।”

“ज़रूर। सच्चाई का मैंने हमेशा साथ दिया है और देती रहूँगी।” सुनीता को तसल्ली देकर, ऋचा ने कॅालेज की ओर रूख किया।

स्मिता को क्लास में देख, ऋचा खिल गई। स्मिता के चेहरे की व्यग्रता भी गायब हो गई थी।

“अच्छा तो हमारी स्मिता को कॅालेज आने की इजाज़त मिल ही गई?”

“हाँ, ऋचा। तेरी बातों का सुधा और रागिनी पर ऐसा असर हुआ कि दोनों माँ के सिर हो गई। बाबू जी तो पहले ही सीधे-सादे इन्सान हैं। उन्हें कोई ऐतराज नहीं था, पर माँ जी को मना पाना, मेरी ननदों के लिए ही सम्भव था।”

“चल, यह एक सुखद शुरूआत है। भगवान् को धन्यवाद दे कि तेरी ननदें समझदार हैं, वरना जिन परिस्थितियों में तेरी शादी हुई उसमें सभी अपना योगदान देकर, आग में घी डालने का काम करते हैं। सास, ननद और जेठानी यही तो नई ब्याहली के विरूद्ध मोर्चा-बन्दी करती हैं?”

“तू ठीक कहती है, पर मेरी ननदें अपवाद हैं। सास जी की भी अपनी मजबूरियाँ हैं। बाबू जी की छोटी-सी आय में परिवार चलाना और दो-दो बेटियों के ब्याह निबटाने की चिन्ता उन्हें खाए जाती है।”

“घबरा नहीं, यह एक अस्थायी स्थिति है। कुछ दिनों के बाद नीरज को अच्छी नौकरी मिल जाएगी। हाँ, अब तू भी नौकरी तलाश कर। कोई भी नौकरी कर ले, कहे तो अखबार के दफ्तर में काम देखॅंू?”

“ना …..ना, हमने न जाने क्यों जर्नलिस्म में एडमीशन ले लिया। हम इस प्रोफेशन के लिए बिल्कुल फ़िट नहीं हैं।”

“तब तो तूने बेकार एक सीट खराब की। अच्छा होता, प्रशान्त के साथ शादी करके अमेरिका जाकर मजे उड़ाती।” ऋचा ने परिहास किया।

“धत्, उसके पहले तो हम मर ही जाते। हम जैसे भी हैं, खुश हैं। नीरज हमें बहुत चाहते हैं।” स्मिता के चेहरे पर जरा-सा गर्व छलक आया।

“अच्छा-अच्छा, अब अपना नीरज-पुराण छोड़, चल आज क्लास के बाद कोई पिक्चर चलते हैं। कल से तो डटकर पढ़ाई करनी है।”

“नहीं, ऋचा। अगर हम देर से घर गए तो माँ जी नाराज होंगी। बेचारी सुधा और रागिनी को डाँट पड़ेगी।”

“ओह्हो, तो अब सुधा और रागिनी हमसे ज्यादा प्यारी हो गई? वैसे तेरी खुशी देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। सोचती हूँ, मैं भी किसी से प्रेम-विवाह कर डालूँ।” हॅंसते हुए ऋचा ने कहा।

“तेरे मुँह में घी-शक्कर। देर किस बात की है, जरा इशारा कर, लाइन लग जाएगी।”

“अच्छा, अब बड़ी बातें करने लगी है। हाँ, इतने दिन तूने जो क्लासेज मिस किए हैं, मैंने नोट्स तेरे लिए जीराॅक्स करा दिए हैं। पढ़ डाल। याद रख, तेरा पास होना ज़रूरी है।”

“थैंक्स, ऋचा। तू हमारा कितना ख्याल रखती है। तेरी मदद से हम ज़रूर पास हो जाएँगे।”

क्लासेज के बाद नीरज स्मिता को लेने आ गया था। ऋचा ने नीरज को छेड़ा-

“अब हम लोगों को भुला ही दिया। आज स्मिता आई है तो आप दिखाई दिए।”

“आपके पास हम जैसों के लिए समय ही कहाँ है? सुनते हैं, आज सवेरे-सवेरे भी आप किसी को इन्साफ़ दिलाने अस्पताल गई थीं।”

“हाँ, नीरज। बड़ी दुःख भरी कहानी है।” संक्षेप में ऋचा ने सुनीता के जलाए जाने की घटना सुना डाली। स्मिता काँप गई। दुनिया में ऐसे भी पति होते हैं? एक नीरज है, जो पूरे दिन पढ़ाई करने के बाद देर रात तक नौकरी करता है, ताकि स्मिता को कुछ सुख दे सके। नीरज पर प्यार-भरी दृष्टि डाल, स्मिता मुस्करा दी।
 


स्मिता के जाने के बाद ऋचा घर वापस लौटने ही वाली थी कि विशाल ने आकर चैंका दिया-

“अच्छा हुआ, आप पकड़ में आ गई, वरना मुझे अकेले ही भटकना पड़ता।” विशाल के चेहरे पर खुशी थी।

“अब भटकने का वक्त आप ही के पास होगा, वरना बाकी सब किताबों में डूब गए हैं।”

“ठीक कहती हैं। इन्सान अपने स्वभाव के व्यक्ति को तो पकड़ ही लेता है। इसीलिए तो सीधे चलकर आपके पास आया हूँ।”

“कहिए, क्या काम है?”

“सुभाष मैदान में हैंडीक्राफ्ट का मेला लगा है, आपके साथ एक चक्कर लगाने का मन है।”

“वाह रे आप और आपका मन! हमारे पास फालतू वक्त नहीं है।”

“सुबह-सुबह अस्पताल जा सकती हैं, घटनाओं की रिपोर्टिग कर सकती हैं, पर इस विशाल के लिए आपके पास दो घण्टों का भी वक्त नहीं है? हाय रे दुर्भाग्य!”

“आपके साथ बेकार मटरगश्ती करने और किसी मुसीबत में पड़े इन्सान की मदद करने में बहुत फर्क है, जनाब। वादा करती हूँ, मुश्किल के वक्त आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगी।” सहास्य ऋचा ने जवाब दिया।

“तो समझ लीजिए, आज हम सख्त मुश्किल में हैं। घर से छोटी बहिन ने अपने लिए हैंडीक्राफ्ट आइटेम्स खरीदने की डिमांड लिख भेजी है। मैं इस मामले में एकदम अनाड़ी ठहरा, लड़कियों की पसन्द-नापसन्द से एकदम अनजान। प्लीज ऋचा, इस मुसीबत में पड़े इन्सान की मदद करो।”

विशाल के नाटकीय अन्दाज पर ऋचा को हॅंसी आ गई। वैसे भी ऋचा के पास अभी कुछ समय था। लौटते वक्त अखबार के दफ्तर में ही बैठकर सुनीता के केस की खबर लिखकर दे देगी।

सुभाष पार्क में काफी भीड़ थी। विभिन्न प्रदेशों के कलाकारों द्वारा बनाई गई कलात्मक वस्तुएँ सचमुच सुन्दर थीं। बड़े उत्साह से ऋचा वस्तुएँ देख रही थी, पर विशाल को उसमें ज्यादा रूचि नहीं थी। एक साड़ी पर बड़ी सुन्दर काशीदाकारी की गई थी। काशीदाकारी में कलाकार की रूचि झलक रही थी-

“वाह! यह तो कला का अनुपम नमूना है। तुम्हारी बहिन को यह साड़ी जरूर पसन्द आएगी।”

“ठीक है, साड़ी पैक कर दो।”

कुछ और छोटी-मोटी वस्तुएँ लेने के बाद नीरज को ठण्डा पीने की जरूरत महसूस होने लगी। शीतल पेय लेकर दोनों एक घने पेड़ की छाया में पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। अचानक माथे पर बड़ा-सा टीका लगाए, रामनामी ओढ़े पण्डित जी ने उन्हें आशीर्वाद देकर चैंका दिया-

“जोड़ी बनी रहे। वकील साहब मुकदमे जीत कर नाम कमाएँ और बिटिया अपराधियों को सजा दिलवाएँ। हमारा आशीर्वाद याद रखना।”

“अरे महाराज, आप तो अन्तर्यामी हैं। आपने कैसे जाना कि हम वकालत पढ़ रहे हैं।”

“हम तो बेटा, माथे की लकीरें और हाव-भाव देखकर मन की बात पता कर लेते हैं।”

“पर पण्डित जी, हमारी तो शादी नहीं हुई है और आपने जोड़ी बना डाली।” ऋचा हॅंस दी।

नहीं हुई तो हो जाएगी। तुम्हारी जोड़ी तो ऊपरवाले ने बनाकर भेजी है, पर बेटा, अपने अहम् को काबू में रखना। स्त्री का सम्मान करने वाला ही जीवन में सफल होता है।

दोनों को कुछ कहने का समय न दे, ज्योतिषी महाराज तेजी से चले गए। ऋचा और विशाल विस्मित देखते रह गए। कुछ देर मैं चैतन्य होते विशाल ने परिहास किया –

“सुन लिया, हमारी जोड़ी ऊपरवाले ने बनाकर भेजी है। अब क्या इरादा है, जनाब का?”

“रहने दो, हम सब समझते हैं। यह जरूर तुम्हारी चाल थी। कहो, ज्योतिषी को कितने पैसे दिए थे?”

“यकीन करो ऋचा। मैं ऐसी फिल्मी बातों पर विश्वास नहीं करता। मैं खुद ताज्जुब में हूँ।”
 
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