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एक अनोखा बंधन**:-कि नई शुरुआत (2) complete

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"नेहा....बेटी इधर तो आ|" अम्मा ने नेहा को आवाज लगाईं| नेहा सामने आ कर खड़ी हो गई| अम्मा ने अपना हाथ झोले में डाला और गुलाबी कागज में बंधा हुआ कुछ निकला और उसे खोलने लगी| जब उन्होंने उसे खोला तो उसमें चाँदी की पायल निकली| बहुत खूबसूरत थी....

उन्होंने वो पायल नेहा को दी और उसका माथा चूम कर बोलीं; "ये मेरी बेटी के लिए.... वैसे ये थी तो तेरी माँ के लिए पर उससे ज्यादा तेरे पाँव पर जचेगी! और मुझे माफ़ कर दे बेटी उस दिन मैं ने सच में तुझ पर ध्यान नहीं दिया| तेरे पापा की तबियत के बारे में सुन कर मैं बहुत परेशान थी... सॉरी (sorry)!"

नेहा ये सुनते ही अम्मा से लिपट गई और बोली; "सॉरी नहीं sorry ... और अम्मा माँ ने मुझे समझा दिया था... its okay!" पता नहीं अम्मा को क्या समझ आया पर उन्होंने फिर से लड़खड़ाते हुए कहा; "टहंक ऊ" ये सं कर हम सब की हँसी छूट गई और नेहा ने उन्हें फिर से बताया की; "अम्मा thank you होता है!" ये सुन का र अम्मा के मुंह पर बी मुस्कान आ गई| खेर सब क जाने का समय नजदीक आ रहा था| पिताजी (ससुर जी) ने Innova taxi मँगवाई थी और वे खुद सबको छोड़ने T3 जा रहे थे| मेरे लाख मन करने पर भी ये उठ के बहार बैठक में आ गए और सभी के पाँव छुए और उन्हें विदा किया| सबने जाते हुए इन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए| सबके जाने के बाद घर में बस मैं, माँ, नेहा और ये ही रह गए थे| जैसे ही ये अपने कमरे में आये इन्हें sinus का अटैक शुरू हो गया!

अब आगे.....

दरअसल इन्हें कभी-कभी ठंडी हवा से, ज्यादा मसालेदार खाना खाने से, कुछ ठंडी चीज खाने या पीने से, नींद पूरी न होने पर, थकावट से, धुल-मिटटी से और कभी कभी किसी अजीब सी महक से allergy है और तब इनकी छींकें शुरू हो जाती हैं| छीकें इस तरह आती हैं की इनका पूरा बदन झिंझोड़ कर रख देती हैं| पूरा शरीर पसीने से भीग जाता है और नाक से पानी आने लगता है| नाक से सांस लेना मुश्किल हो जाता है| ऐसा लगता है मानो नाक अंदर से छिल गई हो! पर ये कभी-कभी होता है... मुझे इसका पता था इसलिए मैंने इन्हें अंदर कमरे में रहने को कहा था| अब चूँकि बाहर का कमरा ठंडा था और इन्हें सब को see off करना था तो इन्होने बाहर आने की जिद्द की| अब जब इनका ये अटैक शुरू हुआ तो मैंने फ़ौरन पानी गर्म करने को रख दिया और इन्हें steam दी पर कोई रहत नहीं मिली| मैंने इन्हें किसी तरह लिटा दिया और सोचा की सब को फ़ोन कर दूँ... माँ ने तो कहा भी की पिताजी (ससुर जी) को फोन कर दे पर इन्होने मन कर दिया| छींक-छींक कर इनका बुरा हाल था, रुमाल पर रुमाल भीगते जा रहे थे, इनका बदन ठंडा होने लगा था जो की चिंता का विषय था| गर्दन से पेट तक पूरा जिस्म ठंडा पड़ने लगा था, जब की आमतौर पर इनका जिस्म गर्म रहता है| इन्होने नर्स राजी को बुलाने को कहा तो मैंने उन्हें जल्दी से फोन मिलाया और सारी बात बताई| उन्होंने कहा की मैं आ रही हूँ.. तब तक मैं माँ और नेहा इन्हीं के पास बैठे थे| नेहा की आँखों में आँसूं थे उससे इनकी ये पीड़ा देखि नहीं जा रही थी| हाल तो कुछ मेरा भी ऐसा ही था पर खुद को मजबूत कर के बैठी थी| आखिर छींकते-छेंकते इन्होने tissue paper के दो box खत्म कर दिए| करीब आधे घंटे के अंदर नर्स राजी आ गईं और उनके साथ nebullizer था| उन्होंने जल्दी से मशीन को बिजली के पॉइंट से plug किया और कुछ दवाई दाल कर इन्हें mask पहना दिया और मशीन के चलने पर भाप जैसा कुछ निकलने लगा और इन्होने उस भाप को सुंघा और तब धीरे-धीरे इनकी हालत में सुधार आया| bedpost का सहारा ले कर इन्होने सब inhale किया और फिर जब आराम मिल गया तो हम ने इन्हें वापस लिटा दिया और रजाई उढ़ा दी| इनकी हालत में सुधार देख हमारी जान में जान आई| नेहा भी अब normal लग रही थी... मैंने उसे चाय बनाने को कहा| माँ उठ के fresh होने के लिए कमरे में गई| अब कमरे में बस हम दोनों रह गए थे| दोनों ख़ामोशी से बैठे हुए थे... जब चाय बन गई तब माँ ने हम दोनों को बाहर बुलाया और हम सारे drawing room में बैठ कर चाय पी रहे थे|

नेहा ने T.V. चालु किया और CID के पुराने एपिसोड देखने लगे| मुझे जो बात अजीब लगी वो ये थी की राजी भी उतना ही interest ले रही थी जितना मैं और माँ ले रहे थे| शायद राजी मेरे घर के बारे में बहुत कुछ जानती थी! तभी नेहा अचानक से उठी और कमरे की तरफ भागी और बाहर आके बोली; "आंटी पापा उठ गए!" माँ ने मुझे इशारे से कहा की मैं भी साथ जाऊँ| माँ के पाँव में सूजन रहती है तो वो ज्यादा चलती फिरती नहीं| जब मैं और राजी कमरे में घुसे तो ये bedpost का सहारा ले कर बैठे हुए थे| इन्हें इस तरह बैठा हुआ देख, राजी बोली; "आप कैसे हो मिठ्ठू?" इन्होने मुस्कुरा कर जवाब दिया; "मैं.......(तीन सेकंड का cinematic pause ले कर) ठीक हूँ!" ये सुन कर दोनों खिल-खिला कर हँसने लगे| मुझे इनका ये बर्ताव बहुत अजीब लगा...क्योंकि ये cinematic pause तो इन्होने कभी मेरे साथ बात करते हुए भी नहीं लिया था! पर मैं चुपो रही क्योंकि मैं उस वक़्त कोई scene खड़ा नहीं करना चाहती थी और वैसे भी मेरे लिए जर्रुरी ये था की इनकी तबियत ठीक हो गई है| शायद मैं कुछ ज्यादा ही सोच रही थी...... शायद!!!

मैं नेहा को इन दोनों के पास छोड़ कर अदरक वाली चाय बनाने चली गई| पता नहीं मैंने नेहा को वहां क्यों छोड़ा? ऐसा तो नहीं था की मुझे इन पर शक था...पता नहीं क्यों...... मेरे चाय ले कर आते-आते माँ भी अंदर आ गईं थीं और फिर वहां बातों का माहोल शुरू हो चूका था| तभी ये बोले; "यार भूख लग रही है| ऐसा करो omlet बनाओ!" मैं थोड़ा हैरान थी क्योंकि अभी तक इन्हें खाने के लिए मसालेदार खाना नहीं दिया जा रहा था| मुझे तो कुछ समझ नहीं आया पर लगा की राजी जर्रूर मन कर देगी पर उसने तो आगे बढ़ कर कहा; "मैं बनाती हूँ!" हैरानी से मेरी भँवें तन गईं पर तभी नेहा बोली; "पर घर में eggs तो हैं ही नहीं?"

ये सुन कर इनका मुँह बन गया और मुझे ख़ुशी महसूस हुई क्योंकि मैं कतई नहीं चाहती थी की एक गैर हिन्दू लड़की मेरी रसोई में घुसे! पर नेहा से अपने पापा की ये सूरत नहीं देखि गई उसने बोला; "मैंdon't worry पापा ... मैं ले आती हूँ|" इन्होने उसे मना भी किया; "बेटा बाहर बहुत ठण्ड है|" पर नेहा जिद्द करने लगी आखिर इन पर जो गई है! हारकर इन्होने उसे जाने की इजाजत दी पर मोटी वाली जैकेट पहन के जाने के लिए बोला| अब ये सब सुन और देख मेरा मुँह उतर गया पर किसी तरह अपने भावों को छुपा कर मैं नार्मल रही|

राजी को रसोई के बारे में सब पता था ... और ये देख मैं हैरान थी! मुझे लगा था की वो मुझसे पूछेगी की तेल कहाँ है, प्याज कहाँ है पर नहीं ...उसने एक शब्द भी नहीं पूछा जैसे की उसे सब कुछ पता था|

खेर मेरे ना चाहते हुए भी राजी ने ने अपने, नेहा और इनके लिए ऑमलेट बनाया| मैंने और माँ ने नहीं खाया...माँ तो वैसे भी नहीं खाती थीं पर मैं...मैं सिर्फ और सिर्फ इनके हाथ का बना हुआ ऑमलेट खाती थी| उस जलन को मैंने किस तरह छुपाया मैं ही जानती हूँ..... !

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मेरे चाय ले कर आते-आते माँ भी अंदर आ गईं थीं और फिर वहां बातों का माहोल शुरू हो चूका था| तभी ये बोले; "यार भूख लग रही है| ऐसा करो omlet बनाओ!" मैं थोड़ा हैरान थी क्योंकि अभी तक इन्हें खाने के लिए मसालेदार खाना नहीं दिया जा रहा था| मुझे तो कुछ समझ नहीं आया पर लगा की राजी जर्रूर मन कर देगी पर उसने तो आगे बढ़ कर कहा; "मैं बनाती हूँ!" हैरानी से मेरी भँवें तन गईं पर तभी नेहा बोली; "पर घर में eggs तो हैं ही नहीं?"

ये सुन कर इनका मुँह बन गया और मुझे ख़ुशी महसूस हुई क्योंकि मैं कतई नहीं चाहती थी की एक गैर हिन्दू लड़की मेरी रसोई में घुसे! पर नेहा से अपने पापा की ये सूरत नहीं देखि गई उसने बोला; "मैंdon't worry पापा ... मैं ले आती हूँ|" इन्होने उसे मना भी किया; "बेटा बाहर बहुत ठण्ड है|" पर नेहा जिद्द करने लगी आखिर इन पर जो गई है! हारकर इन्होने उसे जाने की इजाजत दी पर मोटी वाली जैकेट पहन के जाने के लिए बोला| अब ये सब सुन और देख मेरा मुँह उतर गया पर किसी तरह अपने भावों को छुपा कर मैं नार्मल रही|

राजी को रसोई के बारे में सब पता था ... और ये देख मैं हैरान थी! मुझे लगा था की वो मुझसे पूछेगी की तेल कहाँ है, प्याज कहाँ है पर नहीं ...उसने एक शब्द भी नहीं पूछा जैसे की उसे सब कुछ पता था| खेर मेरे ना चाहते हुए भी राजी ने ने अपने, नेहा और इनके लिए ऑमलेट बनाया| मैंने और माँ ने नहीं खाया...माँ तो वैसे भी नहीं खाती थीं पर मैं...मैं सिर्फ और सिर्फ इनके हाथ का बना हुआ ऑमलेट खाती थी| उस जलन को मैंने किस तरह छुपाया मैं ही जानती हूँ..... !

अब आगे........

चलो यही सोच लिया की कम से कम इनकी तबियत तो ठीक है| पिताजी के आने पर उन्हें ये सब पता चला तो वो भी नाराज हुए की आखिर क्यों इन्होने कमरे से बाहर निकलने की जहमत उठाई और सब के लिए तकलीफें बढ़ाई| ये सब पिताजी के शब्द थे ... ना की मेरे| तीन घंटे बाद मेरे पिताजी का फोन आया और जब मैंने उन्हें ये सब बताया तो वो भी घबरा गए और लगा की जैसे अगली फ्लाइट पकड़ के घर आ जायेंगे पर इन्होने बात संभाली और अपनी तबियत ठीक होने की खबर दे कर उन्हें संतुष्ट किया| दोपहर को बिना खाना खाए इन्होने राजी को जाने नहीं दिया| जाते-जाते वो कह गई; "take care मिठ्ठू!" और ये भी मुस्कुरा कर बोले; "i will"खेर मैंने ये भी बर्दाश्त कर लिया| रात सोने का समय आया तो नेहा और आयुष हम दोनों के बीच में आ कर सो गए| अगले दिन ये काफी देर से उठे, इनका पूरा बदन दर्द कर रहा था (ये उन छींकों का असर था|) ... रात में पिताजी ने सख्त हिदायत दी थी की इन्हें कमरे से निकलने की मनाही है! नाश्ता करने के बाद जनाब बिस्तर पर बैठे फिल्म देख रहे थे| मुझे पता था की ये बहुत बोर हो रहे हैं तो मैंने इन्हें Xossip पर लोगिन करने को कहा| सोचा इसी बहाने ये आप लोगों से कुछ बात कर लेंगे ... आगे कुछ लिखेंगे| पर हुआ कुछ अलग ही.... जैसे ही इन्होने थ्रेड पर अपने दुबारा दिखने की खबर दी, राजेश भाई का कमेंट आया| उनका कहने का मतलब था की इन्हें पहले आराम करना चाहिए उसके बाद ऑनलाइन आना चाहिए पर इन्होने उसका कुछ और ही मतलब निकला और फैसला कर लिया की ' मैं अब कभी नहीं लिखूँगा|" देखा जाए तो इनकी भी कोई गलती नहीं... दरअसल एक ही कमरे में बंद रहने से इंसान थोड़ा बहुत चीड़चिड़ा हो ही जाता है|

मैंने इन्हें समझने की बहुत कोशिश की पर ये हमेशा कहते; "यार प्लीज मुझसे इस बारे में बात मत करो|" इनका वो अकेलापन ...वो तड़प मैं अच्छे से महसूस कर रही थी| मैंने सोच लिया की मैं किसी भी तरह से इन्हें फिर से लिखने के लिए मना लूँगी| एक वही तो जरिया था जिसके जरिये ये अपने मन की बात सब से share कर पा रहे थे| लिखना बंद करने के बाद तो इन्होने अपने आप को बच्चों के साथ बिजी कर लिया.... कभी आयुष के साथ games खेलने लगते तो कभी नेहा से बातें करने लगते| दोनों की बातें सुन कर ऐसा लगता की पिछले 12-15 साल की सारी बातें इन्हें सुननी है...वो हर एक दिन जो नेहा ने इनके बिना काटा वो सब इन्हें सुन्ना था| इन्हीं बातों में नेहा ने अपने डर को जाहिर किया!

उसकी बातें सुन कर जो मुझे समझ आया वो ये था;.......

जब नेहा पैदा हुई तो मुझे वो ख़ुशी नहीं हुई जो आयुष के पैदा होने पर हुई थी| कारन ये की आयुष मेरे और 'इनके' प्यार की निशानी था और नेहा...वो तो मेरे साथ हुए धोके की निशानी! उस का जो भी लालन-पालन मैंने किया वो सिर्फ एक कर्तव्य समझ के किया, माँ होने का एहसास तो मुझे कभी हुआ ही नहीं! इसी कारन मैंने नेहा पर कही ध्यान नहीं दिया... उस समय मैं बस अपने जीवन को ही कोसती रहती थी| दिन में वो मिटटी में खेल रही है या धुप में मैंने कभी ध्यान नहीं दिया और रात में .... रात में उसे खुद से अलग दूसरी चारपाई पर सुलाती थी| रात में उसे डरावने सपने आते ... जैसे की हर बच्चे को आते हैं| सपने में किसी ऊँची जगह से गिरते हुए देखना, कभी सीधी से गिर जाना, कभी भूत-प्रेत देखना...ये ही सपने नेहा को परेशान किया करते| ऐसे में जब वो डर कर मुझे नींद से उठाने की कोशिश करती तो मैं उस पर चिल्ला कर उसे चुप करा दिया करती| वो मेरी डाँट से इतना डरती थी की उसने अब मुझे नींद से उठाना बंद कर दिया और चुप-चाप सहम के रह जाया करती| घर में उसे वैसे भी कोई प्यार दुलार करता नहीं था| जो कुछ प्यार उसे मिला वो अपने नानानानी से मिला... कुछ अनिल से मिला जब कभी वो वहाँ होता| मुझसे तो वो उम्मीद ही नहीं करती थी...... फिर जब मैं इनसे मिली.... दूसरी बार मिली.... ...... इन दोनों दफा नेहा को इनसे कुछ प्यार मिला... या फिर वो भी मेरी तरह इनकी तरफ आकर्षित होने लगी थी| जब मैं 'इनसे' तीसरी बार मिली तो इन्होने नेहा के लिए अपना प्यार बस स्टैंड जाते समय जाहिर किया .... और जब ये गाँव आये तब तो इन्होने अपना प्यार नेहा पर लूटना शुरू कर दिया| वो एक महीना नेहा को इनसे जो प्यार मिला वो ..... उसकी अभी तक की जिंदगी का सारा रास था| जितने दिन ये गाँव रुके नेहा का रात में डर के उठ जाना कम हो गया| आमतौर पर उसका डर हफ्ते में 4-5 से बार होता था, और इनकी मौजूदगी में ये 1-2 बार ही हुआ होगा|

जब भी नेहा इनके साथ इनकी छाती से लिपट कर सोती तो उसे सुरक्षित होने का एहसास होता| “i feel safe.” ये उसका कहना था... अब इसे मैं उसका बचपना समझूँ या फिर अपने पापा के लिए प्यार? या फिर नेहा को भी उनके सीने से वही तपिश मिलती है जो मुझे मिलती है जब मैं इनके गले लगती हूँ| "मैं आपको खोना नहीं चाहती|" ये भी उसी के शब्द थे..... सच में मैं उसके लिए कभी अच्छी माँ साबित नहीं हो पाई और इस बात का गिला मुझे सारी उम्र रहेगा|

“I love you my baby! और अब मेरे बच्चे को किसी भी चीज से डरने की बात नहीं|” ये कह कर 'इन्होने' नेहा को अपने गले लगा लिया| पर नेहा के जीवन से अभी भी पूरी तरह पर्दा नहीं उठा है|अगले कुछ दिन इसी तरह बीते.... लघ-भाग रोज राजी का फ़ोन आता और 'ये' उससे घंटों बात करते रहते| मैं ये सोच कर चुप रही की कम से कम इनका टाइम पास हो जाता है| पर मुझे इनका उससे बात करना फूटी आँख नहीं भाता था! खाना-खाने के लिए इन्हें कहना पड़ता थकी; "पहले खाना खा लो फिर बात करना|" और तब ये मुस्कुराते हुए राजी से कहते; "वार्डन आ गई है! खाना खा के फोन करता हूँ|" पर मैं इन्हें खाना खाने के बाद जबरदस्ती सुला देती और जब ये नहीं मानते तो बच्चों को इन के पास भेज देती और नेहा और आयुष इन्हें सुला ही देते| दिन पर दिन इनकी सेहत अच्छी होने लगी थी.... इसलिए पिताजी ने जो इन पर कमरे से बाहर निकलने का बैन लगाया था वो भी उठा लिया और अब ये ड्राइंग रूम में बैठ जाया करते और टी.वी. भी देखा करते| पर जो बदलाव मैंने इनमें देखा वो ये था की इनका मन कुछ न कुछ लिखने को करता पर ये अपना मन दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करते| कभी पिताजी से estimate पर discussion करते तो कभी बच्चों का होमवर्क ले कर बैठ जाते| हाँ होमवर्क करते समय 'ये' उनका mathematics का होमवर्क कभी नहीं करते, उससे इन्हें डर लगता था! (ही..ही...ही...)

पर मैंने भी ठान ली थी की इन्हें फिर से लिखने के लिए उकसा कर रहूँगी| इसलिए मैंने राजेश भाई से मदद माँगी| मैंने अपनी आप बीती लिखना शुरू किया और जीता भी लिखती उन्हें मेल कर दिया करती| मेरा प्लान था की मैं इस आप बीती के बारे में इन्हें तब बताउंगी जब मैं पूरा लिख लूंगी| तब उससे पढ़ने के बाद शायद इनका मन बदल जाए और ये फिर से लिखना शुरू कर दें| इसलिए मैं राजेश भाई से हुई सारी बातें इन से छुपाने लगी और इन्हें मुझ पर इतना भरोसा है की इन्हें जरा सा शक भी नहीं हुआ|

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दिन पर दिन इनकी सेहत अच्छी होने लगी थी.... इसलिए पिताजी ने जो इन पर कमरे से बाहर निकलने का बैन लगाया था वो भी उठा लिया और अब ये ड्राइंग रूम में बैठ जाया करते और टी.वी. भी देखा करते| पर जो बदलाव मैंने इनमें देखा वो ये था की इनका मन कुछ न कुछ लिखने को करता पर ये अपना मन दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करते| कभी पिताजी से estimate पर discussion करते तो कभी बच्चों का होमवर्क ले कर बैठ जाते| हाँ होमवर्क करते समय 'ये' उनका mathematics का होमवर्क कभी नहीं करते, उससे इन्हें डर लगता था! (ही..ही...ही...)

पर मैंने भी ठान ली थी की इन्हें फिर से लिखने के लिए उकसा कर रहूँगी| इसलिए मैंने राजेश भाई से मदद माँगी| मैंने अपनी आप बीती लिखना शुरू किया और जीता भी लिखती उन्हें मेल कर दिया करती| मेरा प्लान था की मैं इस आप बीती के बारे में इन्हें तब बताउंगी जब मैं पूरा लिख लूंगी| तब उससे पढ़ने के बाद शायद इनका मन बदल जाए और ये फिर से लिखना शुरू कर दें| इसलिए मैं राजेश भाई से हुई सारी बातें इन से छुपाने लगी और इन्हें मुझ पर इतना भरोसा है की इन्हें जरा सा शक भी नहीं हुआ|

अब आगे.......

एक दिन की बात है ... मैं ड्राइंग रूम में बैठी लैपटॉप पर अपनी आप बीती टाइप कर रही थी| मेरी पीठ कमरे की तरफ थी, क्योंकि डाइनिंग टेबल की मैं कुर्सियों पर सिर्फ 'इनका' और पिताजी (ससुरजी) का हक़ है| मुझे लगा की ये सो रहे होंगे क्योंकि मैंने नेहा और आयुष को 'इनके' पास सोने के लिए भेजा था| पता नहीं चला कब ये मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए और पता नहीं इन्होने क्या-क्या पढ़ा होगा| मुझे तो तब पता चल जब इनका हाथ मेरे सर पर आया|मैंने एकदम पलट के देखा और हैरान रह गई. ऐसा लगा जैसे इन्होने मेरी कोई चोरी पकड़ ली हो| मुझे तो लगा शायद ये मुझ पर गुस्सा होंगे, पर ‘इन्होने’ कुछ नहीं कहा और सर पर हाथ फेर कर कमरे में जाने लगे और बोले; "keep it up"| मेरा सरप्राइज फुर्ररर हो गया था.... फ़रवरी का महीना शुरू हो चूका था और अब इनकी तबियत काफी ठीक हो चुकी थी और आयुष का जन्मदिन आ रहा था| पर मैं अब भी बहुत सावधानी बारात रही थी| घर से बाहर कहीं भी नहीं जाने देती थी| जानती थी की मैं इनके साथ जबरदस्ती कर रही हूँ पर क्या करूँ, प्यार भी तो इतना करती हूँ इनसे! इधर इन्होने आयुष के जन्मदिन की planing शुरू कर दी थी| मैंने इन्हें बहुत समझाया की हम इस बार जन्मदिन हर पर ही मनाएंगे पर ये नहीं माने| इन्होने तो आजतक का सबसे best birthday plan बनाया था! जैसे-जैसे दिन नजदीक आने लगा, आयुष ने अपने जन्मदिन का राग अलापना शुरू कर दिया| पर उसे जरा भी भनक नहीं थी की जन्मदिन पर उसे क्या मिलने वाला है| इधर मैंने ‘इनका’ कुछ ज्यादा ही ध्यान रखना शुरू कर दिया| दिन पर दिन इनकी तबियत ठीक होने लगी थी, जिसका श्रेय ये मुझे देते हैं पर मैं इसकी हक़दार नहीं| इनका घर पर रहने को जरा भी मन नहीं था और ये दिन पर दिन बेचैन होने लगा था| मैं चाह कर भी इन्हें घर पर रोक नहीं पा रही थी| मेरा दिल कह रहा था की ये अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, और मैं नहीं चाहती थी की बिना पूरी तरह ठीक हुए ये घर से बाहर कदम रखें|मैंने इन्हें बहुत समझाने की कोशिश की पर ये नहीं माने| इनका कहना था; "यार मेरी बीमारी की वजह से बहुत खर्च हो गया है| पिताजी ने नए projects उठाना भी बंद कर दिया है| अब मुझे काम सम्भालना पड़ेगा|" बात सही भी थी पर मन बहुत बेचैन था तो मैंने माँ से बात की| उन्होंने पिताजी से और फिर हम तीनों ने इनसे बात की पर ये अपनी जिद्द पर अड़े रहे| आखिर पिताजी ने इन्हें इजाजत दे दी पर एक शर्त के साथ, वो ये की working hours सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक रहेंगे| अब काफी बहस बाजी के बाद इन्होने हमारे आगे हार मान ही ली| रात में खाना खाने के बाद जब हम लेटे तो हमेशा की तरह नेहा इनकी छाती पर चढ़ कर सो गई और आयुष हम दोनों के बगल में सोया था| दोनों सो चुके थे तभी ये बोले; "मुझसे शादी कर के तुम्हें की मिला? B.P. की प्रॉब्लम......sinus की प्रॉब्लम.... हुँह.... तुमने पहले ही इतना सब...... और अब मेरी वजह से....." बस कुछ कहते कहते ये रूक गए| मुझे ये सुन कर बहुत गुस्सा आया और मैं जोर से बोली; "आप मानोगे नहीं ना? आपने शादी से पहले मुझे सब बता दिया था ना? ये B.P. की प्रॉब्लम तो hereditary है... माँ को है.. पिताजी को है...इसमें आपकी क्या गलती? और आपकी sinus की प्रॉब्लम ... अगर मैं गलत नहीं तो ये (sinus) और B.P. की प्रॉब्लम मुझसे दूर रहने के बाद ही शुरू हुई है तो इसकी कसूरवार तो मैं हूँ! और आप कहते हो की आपसे शादी कर के मुझे क्या मिला? तो आप बताओ की मुझसे शादी कर के आपको क्या मिला? you don't want me to say anything right?" मेर आक्रोश सुन कर ये चुप हो गए और मुझे sorry बोला| इनका sorry सुन्न कर मेरा गुस्सा काफूर हो गया और मैंने इन्हें kiss किया और आयुष के साथ मैं भी इन्हें झप्पी डालकर सो गई|

अगली सुबह मैंने इन्हें एक छोटे बच्चे की तरह अच्छे से नाश्ता कराया और साइट पर जाने दिया| (मन तो नहीं था पर क्या करूँ|) हर एक घंटे बाद इन्हें फोन करती और फोन करते समय यही सोचती की इनकी तबियत कैसी होगी? जान निकल के रख दी थी इन्होने मेरी! एक बजे मैंने जब इन्हें फोन किया तो इन्होने फोन नहीं उठाया| दुबारा मिलाया .... फिर नहीं उठाया| अब मुझे बहुत चिंता होने लगी थी| मैंने तीसरी बार फोन मिलाया तो घंटी मुझे अपने नजदीक बजते हुए सुनाई दी| मेरे पीछे पलटने से पहले ही इन्होने मुझे पीछे से आ कर जकड लिया और कान में खुसफुसाते हुए बोले; "surprise मेरी जान!" ये सुन कर मेरी जान में जान आई पर मैंने थोड़ा नाराज होने का नाटक किया; "फोन क्यों नहीं उठाया? जानते हो मेरी जान निकलगई थी! मैं आपसे बात नहीं करुँगी!"

"यार ऐसा करोगे तो अबकी बार जान मेरी निकल जाएगी?" मैं ये सुनते ही इनसे लिपट गई| पर हमारा ये मिलान बहुत छोटा था| अचानक माँ आ गईं और मिअन छिटक कर इनसे अलग हो गई| (माँ ने हमारा ये प्रेम-मिलाप जर्रूर देखा होगा!) मैं 'इनसे' अलग तो हो गई... पर इनके जिस्म की तपिश ने मुझे जल के राख कर दिया था|मेरे लिए खुद पर काबू कर पाना मुश्किल हो रहा था| अगर उस समय माँ नहीं आई होती तो शायद वो सब..........हो जाता! खाना बनाने का समय हो रहा था.... तो जैसे-तैसे मैंने खुद को काबू करने की कोशिश की और खाना बना कर मैं फटाफट बाथरूम में घुस गई| नल खोला तो उसमें बर्फीला पानी आ रहा था| जब तक बाल्टी भर रही थी मैं खुद को फिर से काबू करने लगी| मैं जानती थी की मेरे जिस्म को इनके प्यार की जर्रूरत है, पर इनकी बिमारी के कारन मैं इन्हें खुद से दूर रख रही थी|मैं अच्छी तरह जानती थी की इन्हें भी मेरे प्यार की उतनी ही जर्रूरत है जितना मुझे थी| पर फिर भी इन्होने मेरे सामने ये बात कभी भी जाहिर नहीं की थी| बाल्टी भरते ही मैंने अपने ऊपर ठंडा पानी डालना शुरू कर दिया .... उस ठन्डे पानी का जैसे मेरे ऊपर कोई असर ही नहीं हो रहा था| जिस्म अंदर से भट्टी की तरह जल रहा था| आधे घंटे तक ठन्डे पानी की बौछारों ने जिस्म की इस आग को शांत किया| जब मैं बाहर आई तो ये लैपटॉप पर कुछ काम कर रहे थे| फिर ये उठ कर बाथरूम में चले गए और जब बाहर आये तो मुझे डाँटते हुए बोले; "ठन्डे पानी से क्यों नहाये?" ये सुनते ही मुझे लगा की मेरी चोरी पकड़ी गई है| मैं जवाब सोचने लगी; "वो....वो जल्दी-जल्दी में geyser चलाना भूल गई!"

"ऐसी भी क्या जल्दी थी? खाना तो बन चूका था, और पिताजी को आने में अभी समय है?" इनके सवाल के आगे मेरे पास कोई जवाब नहीं था| मैं सर झुकाये खड़ी थी| ये चल कर मेरे पास आये और मेरी ठुड्डी पकड़ के मेरे चेहरे को ऊपर उठाके बोले; "मन कर रहा था न?" ये सुन कर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए| "यार इस तरह ठन्डे पानी से नहाओगे तो बीमार पड़ जाओगे!" मेरे अंदर तो हिम्मत ही नहीं थी की मैं इनसे नजरें मिलाऊँ इसलिए मैं सर झुकाये खड़ी रही और फिर इनकी छाती से लिपट गई| जिस आग को मैंने इतनी मुश्किल से शांत किया था, उसे मैंने फिर से भड़का दिया था| दिल एक अजीब सी हालत में फंस गया था, मुझे इनका प्यार भी चाहिए था पर डर लग रहा था की कहीं मेरे स्वार्थ के चलते ये फिर से बीमार न पड़ जाएँ क्योंकि इनकी body अब भी recover कर रही थी|

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अगली सुबह मैंने इन्हें एक छोटे बच्चे की तरह अच्छे से नाश्ता कराया और साइट पर जाने दिया| (मन तो नहीं था पर क्या करूँ|) हर एक घंटे बाद इन्हें फोन करती और फोन करते समय यही सोचती की इनकी तबियत कैसी होगी? जान निकल के रख दी थी इन्होने मेरी! एक बजे मैंने जब इन्हें फोन किया तो इन्होने फोन नहीं उठाया| दुबारा मिलाया .... फिर नहीं उठाया| अब मुझे बहुत चिंता होने लगी थी| मैंने तीसरी बार फोन मिलाया तो घंटी मुझे अपने नजदीक बजते हुए सुनाई दी| मेरे पीछे पलटने से पहले ही इन्होने मुझे पीछे से आ कर जकड लिया और कान में खुसफुसाते हुए बोले; "surprise मेरी जान!" ये सुन कर मेरी जान में जान आई पर मैंने थोड़ा नाराज होने का नाटक किया; "फोन क्यों नहीं उठाया? जानते हो मेरी जान निकलगई थी! मैं आपसे बात नहीं करुँगी!"

"यार ऐसा करोगे तो अबकी बार जान मेरी निकल जाएगी?" मैं ये सुनते ही इनसे लिपट गई| पर हमारा ये मिलान बहुत छोटा था| अचानक माँ आ गईं और मिअन छिटक कर इनसे अलग हो गई| (माँ ने हमारा ये प्रेम-मिलाप जर्रूर देखा होगा!) मैं 'इनसे' अलग तो हो गई... पर इनके जिस्म की तपिश ने मुझे जल के राख कर दिया था|मेरे लिए खुद पर काबू कर पाना मुश्किल हो रहा था| अगर उस समय माँ नहीं आई होती तो शायद वो सब..........हो जाता! खाना बनाने का समय हो रहा था.... तो जैसे-तैसे मैंने खुद को काबू करने की कोशिश की और खाना बना कर मैं फटाफट बाथरूम में घुस गई| नल खोला तो उसमें बर्फीला पानी आ रहा था| जब तक बाल्टी भर रही थी मैं खुद को फिर से काबू करने लगी| मैं जानती थी की मेरे जिस्म को इनके प्यार की जर्रूरत है, पर इनकी बिमारी के कारन मैं इन्हें खुद से दूर रख रही थी|मैं अच्छी तरह जानती थी की इन्हें भी मेरे प्यार की उतनी ही जर्रूरत है जितना मुझे थी| पर फिर भी इन्होने मेरे सामने ये बात कभी भी जाहिर नहीं की थी| बाल्टी भरते ही मैंने अपने ऊपर ठंडा पानी डालना शुरू कर दिया .... उस ठन्डे पानी का जैसे मेरे ऊपर कोई असर ही नहीं हो रहा था| जिस्म अंदर से भट्टी की तरह जल रहा था| आधे घंटे तक ठन्डे पानी की बौछारों ने जिस्म की इस आग को शांत किया| जब मैं बाहर आई तो ये लैपटॉप पर कुछ काम कर रहे थे| फिर ये उठ कर बाथरूम में चले गए और जब बाहर आये तो मुझे डाँटते हुए बोले; "ठन्डे पानी से क्यों नहाये?" ये सुनते ही मुझे लगा की मेरी चोरी पकड़ी गई है| मैं जवाब सोचने लगी; "वो....वो जल्दी-जल्दी में geyser चलाना भूल गई!"

"ऐसी भी क्या जल्दी थी? खाना तो बन चूका था, और पिताजी को आने में अभी समय है?" इनके सवाल के आगे मेरे पास कोई जवाब नहीं था| मैं सर झुकाये खड़ी थी| ये चल कर मेरे पास आये और मेरी ठुड्डी पकड़ के मेरे चेहरे को ऊपर उठाके बोले; "मन कर रहा था न?" ये सुन कर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए| "यार इस तरह ठन्डे पानी से नहाओगे तो बीमार पड़ जाओगे!" मेरे अंदर तो हिम्मत ही नहीं थी की मैं इनसे नजरें मिलाऊँ इसलिए मैं सर झुकाये खड़ी रही और फिर इनकी छाती से लिपट गई| जिस आग को मैंने इतनी मुश्किल से शांत किया था, उसे मैंने फिर से भड़का दिया था| दिल एक अजीब सी हालत में फंस गया था, मुझे इनका प्यार भी चाहिए था पर डर लग रहा था की कहीं मेरे स्वार्थ के चलते ये फिर से बीमार न पड़ जाएँ क्योंकि इनकी body अब भी recover कर रही थी|

अब आगे......

मेरा जिस्म मेरा साथ नहीं दे रहा था| टांगें कापने लगी थीं और लगा था जैसे मैं अभी लड़खड़ा जाऊँगी| 'इन्होने' मेरे दिल को जैसे पढ़ लिया और बहुत धीरे से बोले; "मेरे होते हुए मेरी बीवी ठन्डे पानी से नहीं नहाएगी!" फिर 'इन्होने' जा कर कमरे के दरवाजे की चिटकनी लगा दी| बच्चे स्कूल से लौटने वाले थे और माँ उन्हें लेने स्कूल के लिए निकल चुकी थीं|

दरवाजा बंद कर के 'ये' मेरे पास आये और मुझे गोद में उठा लिया और बिस्तर पर लिटा दिया| रजाई खोल दी और...................... शुरू में मैंने 'इन्हें' रोकना चाहा ये कह कर की; "अभी आप पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो... और ऐसे में आप मेरी वजह से...." मैंने बात अधूरी छोड़ दी| 'इन्होने' मुस्कुराते हुए कहा; "कुछ नहीं होगा मुझे!" असल में मैं खुद इन्हें रोकना नहीं चाहती थी| मैं जानती थी की हमारे पास समय बहुत कम है इसलिए जो भी करना था वो इस थोड़े से समय में करना था| नजाने मुझ पर क्या वहशीपन सवार हुआ की मैंने इनकी नंगी पीठ को कुरेदना शुरू कर दिया| गर्दन पर जगह-जगह काट लिया और इनकी छाती तो मैंने काट-काट कर पूरी लाल कर दी| मुझे सच में उस समय कोई होश नहीं था! इन्होने भी मेरी इस प्रिक्रिया पर कोई ऐतराज नहीं जताया| पर समागम के बाद जब मैंने इन्हें देखा और वो सब निशानों पर मेरी नजर गई तो मुझे खुद पर कोफ़्त होने लगी! ये कैसा जंगलीपना आ गया था मुझ में? मैंने अपने ही प्यारको इस तरह नोच खाया था की...... मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं उनसे नजर मिलाऊँ| खुद से नफरत होने लगी थी!

"hey! क्या हुआ?" इन्होने पूछा|

"मैंने कुछ कहा नहीं बस ना में गर्दन हिला दी और दुबारा नहाने के लिए बाथरूम में घुस गई| जब नल खोला तो उसमें से गर्म पानी आ रहा था, मतलब 'इन्हें' सब पता था! मैं जल्दी से नहा कर बाहर आई और अपने बाल पोंछ रही थी की तभी ये मुस्कुराते हुए मेरे पास आये| इनके जिस्म पर मेरे दिए हुए जख्मों पर मेरी नजर गई तो मैं शर्म से पानी-पानी हो गई| पर 'इनके' चेहरा देख कर तो लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं| 'ये' बिलकुल नार्मल लग रहे थे.... खाना खाते समय मैंने खुद को सहेज कर रखा| पर एक डर था की कहीं 'इनकी' तबियत फिर से ख़राब न हो जाये| इसी डर के चलते मैंने सोचा की आज फिर बच्चों को 'इनके' पास भेज दूँगी, ताकि ये सो जाएं| पर बच्चों के exams नजदीक थे और ऊपर से आयुष का जन्मदिन भी नजदीक आ गया था| उस दिन जो भी 'इनका' प्लान था उसके चलते आयुष पढ़ने वाला तो था नहीं इसलिए मैंने नेहा को आयुष को पढ़ाने का काम दिया और हुड इनके पास कमरे में चली गई| पिताजी तो खाना खा कर site पर चले गए थे और माँ drawing room में बैठी CID देख रही थीं| मैं bedpost का सहारा ले कर बैठ गई और 'इन्होने' मेरी गोद में सर रख लिया| इनकी आँख लग गया और मैं सोच में डूब गई| समझ ही नहीं आ रहा था की मुझे क्या हो गया था? अपनी इस हरकत पर मुझे खुद शर्म आने लगी और मैं ने मन ही मन सोचा की मैं अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करुँगी|

शाम को जब ये उठे तब भी इन्होने कुछ नहीं कहा| इन्होने मुझे पहले की ही तरह प्यार करना जारी रखा.... जब भी समय मिलता ये मुझे पीछे से जकड़ लेते और हंसी-ठिठोली करते रहते| मैं भी इसी तरह इनका जवाब देती.... पर दुबारा इन्हें प्यार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी| जब कभी इनके बदन का स्पर्श मुझे होता तो मुझे अपने द्वारा की हुई वो भयानक करतूत याद आने लगती| मुझे एक डर और सता रहा था.... की यदि हमारे प्रेम-मिलाप के दौरान इनकी तबियत ख़राब हो गई तो?

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ऐसे करते-करते आयुष का जन्मदिन आ ही गया| इन्होने adventure park जाने का प्लान बनाया| मुझे चिंता होने लगी थी की इनकी तबियत अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं है ऐसे में इनका ये exertion खतरनाक साबित ना हो| मैंने इन्हें बहुत समझाया पर ये अपनी जिद्द पर अड़े रहे| इन्होने सारा प्लान बना रखा था| रात बारह बज ने से पहले इन्होने मुझे, माँ और पिताजी को सारा प्लान बता दिया| इनके प्लान के अनुसार हमने साड़ी तैयारी कर ली थी| जैसे ही बारह बजे ये आयुष के कमरे में घुसे, आयुष और नेह दोनों सो रहे थे| आयुष के सिरहाने जा कर इन्होने उसके माथे को चूमा और उसे प्यार से उठाने लगे| फिर उसे गोद में उठाया और उसके कान में बोले; "Happy Birthday बेटा!" आयुष कुनमुनान लगा और फिर इनसे लिपट गया| मैंने आगे बढ़ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा; "Happy Birthday बेटा!" पर आयुष अब भी कुनमुना रहा था| इन्होने मेरी तरफ देखा और मुझे इनके चेहरे पर बेबसी साफ़ नजर आ रही थी| ये आयुष को नींद से जगाना नहीं चाहते थे| पर उसके जागे बिना सारी तैयारी ख़राब हो जाती| मैंने इनसे कहा; "कोई बात नहीं...आज उसका जन्मदिन है और अपनी इतनी तैयारी जो की है उसके लिए|" फिर इन्होने आयुष के कान में कुछ खुसफुसाया और वो एक दम से उठ गया और :"Thank You!!!" बोला| वो जल्दी से इनकी गोद से नीचे उतरा और जा कर अपने दादा-दादी के पाँव छूने लगा और उनसे अपने जन्मदिन की बधाई ली| फिर वो मेरे पास आया और मेरे पाँव छू कर आशीर्वाद लिया| आखिर में वो इनके पास गया और इनके पाँव छू कर आशीर्वाद लिया और इन्होने उसे गोद में उठा लिया और बहुत प्यार किया| अब तक नेहा भी जाग चुकी थी और उसने भी आयुष को बधाई दी और हैरानी की बात ये की आयुष ने उसके भी पाँव छुए| सभी ये देख कर हैरान रह गए और हँसने पड़े...क्योंकि आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था| आयुष हमेशा नेहा को तंग ही किया करता था| इतने संस्कार मैंने तो नहीं दिए थे! हाँ मैंने आयुष को बड़ों का आदर करना शिखाया था पर आज जो कुछ हुआ वो देख कर बहुत अच्छा लगा| खेर मुझे ज्यादा सोचने की जर्रूरत नहीं थी....जवाब मेरे सामने खड़ा था| अब तो मैं बस ये सोच रही थी की आज क्या surprise मिलने वाला है हम लोगों को? हमेशा की तरह, इन्होने सबकुछ प्लान कर रखा था| "आयुष बेटा अब सो जाओ कल सुबह दस बजे तक तैयार हो जाना|" इन्होने आयुष से कहा| आयुष ने आगे कुछ नहीं पूछा और सब को Thank You बोल कर एकदम से लेट गया| ये देख कर हम सब हंसने लगे... दोनों बच्चों को माथे पर Kiss कर के इन्होने कमरे की लाइट बंद की और हम सब बाहर बैठक में आ गए| बाहर आ कर पिताजी ने इनसे कल के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो इन्होने सारा प्लान बता दिया| परन्तु एक बात नहीं बताई .....जो मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी!

अगली सुबह आयुष सब से पहले तैयार हो गया और सारे घर में हड़कंप मचा दिया| सारे घर में कूद रहा था.....आज पहली बार मैंने उसे 'इतना' खुश देखा था! साढ़े दस बजे तक हम सब तैयार हो कर घर से निकले|हमें पूरा डेढ़ घंटा लगा वहां पहुँचने में.... और पूरा रास्ता आयुष शैतानी करता रहा| कभी music high volume में चालता तो कभी इनके फ़ोन पर गेम खेलने लगता| बैठे-बैठे अपनी और हमारी अलग-अलग pictures खींचने लगता| इतनी साड़ी selfie खींचीं की पूछो मत| नेहा भी selfie खींचने में मग्न थी और वो तो Facebook पर पिक्चरें upload करती जा रही थी| मैं बस मन ही मन सोच रही थी की आखिर amusement park होता कैसा है? मैंने तो आजतक टी.वी. पर ad ही देखि थी| उस ad में लड़कियां swim wear पहन के water park में मजे कर रही होतीं थीं| ये ख़याल आते ही मैंने सोच लिया की मैं कभी भी वो छोटे-छोटे कपडे पहनने नहीं वाली!

जब हम park के बाहर पहुंचे तो बाहर से ही जो नजारा दिखा उसे देखते ही मैं और बच्चे हैरान रह गए! 'ये' हमें एक तरफ खड़ा कर के टिकट लेने चले गए| टिकट ले कर जब हम अंदर घुसे तो अंदर का नजारा देख कर हम तीनों के मुंह से निकला; "oh my god!" ये एक jurrasic theme amusement park था| जगह-जगह पर dinosaur के पुतले और तसवीरें थीं| ऐसा लगता था मानों हम jurassic park फिल्म के सेट पर आ गए हो| जानती हूँ दोस्तों आपको सुन कर ये बहुत ज्यादा लगेगा पर मैंने और बच्चों ने अपने जीवन में आजतक ऐसा amusement park नहीं देखा| amusement park के नाम पर हमने सिर्फ एक मेला देखा था वो भी जब कभी गाँव में कोई त्यौहार होता था तब| उस मेले में बस giant wheel झूला होता था या फिर वो छोटे बच्चों के लिए एक घूमने वाला झूला| इससे ज्यादा हमने कभी नहीं देखा था|

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Thanks Dosto //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg Aap logo ka sath isi prkar bna rhe ,,,,, Again Thanks........ Mitro//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg
 
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