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एक नया संसार

अजय सिंह अपनी पुलिस की वर्दी पहने बेटी को मुॅह बाए देखता रह गया। कानों में कहीं दूर से हथौड़े की चोंट का एहसास करने लगा था वो। फिर सहसा जैसे उसे वस्तुस्थित का ख़याल आया तो बोला__"मतलब क्या है बेटी? क्या तुम ये कहना चाहती हो कि तुम्हारे ही पुलिस डिपार्टमेंट के लोगों ने अपनी छान बीन में ग़लत रिपोर्ट दी है? जबकि तुम्हारे अनुसार उनकी इस रिपोर्ट के उलट कुछ और ही रिपोर्ट निकल सकती थी? इससे तो यही ज़ाहिर होता है कि तुम्हें अपने ही पुलिस डिपार्टमेंट की इस छान बीन के फलस्वरूप बनाई गई रिपोर्ट पर शक है?"

"मैंने ये कब कहा डैड कि मुझे अपने डिपार्टमेंट द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर शक है?" रितू ने कहा__"मैंने तो सिर्फ अपनी बात रखी है इस सिलसिले में कि अगर औपचारिकता की बजाय ठीक तरह से छान बीन की जाती तो शायद निष्कर्श कुछ और ही निकलता।"

"तुम्हारे कहने का मतलब तो वही हुआ बेटी।" अजय सिंह जाने क्या सोच कर पल भर को मुस्कुराया था, फिर बोला__"तुम्हें लगता है कि तुम्हारे डिपार्टमेंट वालों ने अपनी छान बीन में महज अपनी औपचारिकता निभाई है। इसका मतलब तो यही हुआ कि उन्होंने तुम्हारी नज़र में गंभीरता से छानबीन ही नहीं की।"

"बिलकुल।" रितू ने कहा__"पर ये उन पर मेरा कोई आरोप नहीं है डैड। क्योंकि मुझे पता है सबका अपना अपना दिमाग़ होता है, और सब अपने उसी दिमाग़ की वजह से किसी भी चीज़ का रिजल्ट निकालते हैं। जिसका जितना दिमाग़ चलता है वो उतना ही बता पाता है, मगर ज़रूरी नहीं होता कि कोई सच उतने ही दिमाग़ से निकलने वाला सच कहलाए। ख़ैर जाने दीजिए...मैं आपको ये खुशख़बरी सुनाने आई हूॅ कि इस केस को मैंने रिओपेन किया है जिसके लिए मैंने कमिश्नर से बड़ी मिन्नते की थी। मुझे अंदेशा है कि मेरे डिपार्टमेंट ने ठीक तरह से छान बीन नहीं की। इस लिए अब ये केस मैंने खुद अपने हाॅथ में लिया है और अब मैं खुद इसकी छानबीन करूॅगी।"

"क क्या????" अजय सिंह उछल पड़ा, चहरे पर पसीने की बूॅदे झिलमिला उठीं। फिर जल्दी ही उसने खुद को सम्हालते हुए कहा__"भला इसकी क्या ज़रूरत थी बेटी? मेरा मतलब है कि मान लो ये पता लग भी जाए कि फैक्टरी में आग वास्तव में किस वजह से लगी थी तो भी क्या होगा? क्या इससे वो सब वापस मिल जाएगा जो जल कर खाक़ मे मिल चुका है?"

"मैं मानती हूॅ डैड कि अब वो सब कुछ नहीं मिल सकता जो जल कर खाक़ हो गया है।" रितु ने कहा__"लेकिन छान बीन से हकीक़त का पता भी तो चलना चाहिए। आखिर पता तो चलना ही चाहिए कि फैक्टरी में आग खुद लगी थी या किसी के द्वारा लगाई गई थी?"

"किसी के द्वारा?" सहसा इस बीच अभय ने कहा__"इसका क्या मतलब हुआ रितू बेटी?"

"मतलब साफ है चाचा जी।" रितू ने अभय से मुखातिब होकर कहा__"फैक्टरी में आग अगर खुद नहीं लगी रही होगी तो ज़ाहिर है किसी के द्वारा आग लगाई गई थी। उस सूरत में सवाल यही उठता है कि किसने और किस वजह से फैक्टरी में आग लगाई? आप ही बताइए क्या ये जानना ज़रूरी नहीं है कि हम ऐसे इंसान का पता लगाएं जिसने हमारी फैक्टरी को आग लगा कर हमारा सब कुछ बरबाद कर दिया?"

"बिलकुल बेटा।" अभय ने कहा__"अगर छानबीन में यही सच सामने आता है तो इसका पता तो चलना ही चाहिए कि किसने ये सब किया और क्यों किया?"

अजय सिंह के काॅनों में सीटियाॅ सी बजने लगी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह ऐसा क्या करे कि उसकी बेटी फैक्टरी की दुबारा छानबीन न करे? क्योंकि उसे पता था कि अगर रितू ने दुबारा छानबीन शुरू की तो वो सच्चाई भी सामने आ जाएगी जिसको वह किसी भी कीमत पर सामने नहीं लाना चाहता। पहले जो छानबीन हुई थी उसमें अजय सिंह ने ऊपर ऊपर से ही फैक्टरी की छानबीन करवाई थी वो भी सिर्फ औपचारिकता के लिए। सब उसके ही आदमी थे, पुलिस भी और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग भी। किन्तु अब ये केस फिर से रिओपेन हो गया, वो भी उसकी अपनी ही बेटी के द्वारा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी बेटी को दुबारा से छानबीन करने से कैसे रोंके?

"रितू दीदी ठीक ही कह रही हैं डैड।" सहसा इस बीच काफी देर से चुपचाप बैठा शिवा भी अपने अंदाज़ में कह उठा__"फैक्टरी की दुबारा से छानबीन तो होनी ही चाहिए। कम से कम असलियत तो सामने आ ही जाए कि किसने ये सब किया है? कसम से डैड...जिसने भी ये किया होगा उसको छोड़ूॅगा नहीं मैं। कुत्ते से भी बदतर मौत मारूॅगा उसे।"

"खामोशशशशश।" अजय सिंह लगभग चीखते हुए कहा था__"चुपचाप बैठो, नहीं तो कमरे में जाओ अपने। तुम्हें बीच में बोलने की कोई ज़रूरत नहीं है समझे??"

"पर डैड मैंने ऐसा क्या ग़लत कह दिया?" शिवा ने बुरा सा मुॅह बनाते हुए कहा__"जिसकी वजह से आप मुझे इस तरह डाॅटकर चुप करा रहे हैं।"

 
अजय सिंह का जी चाहा कि वह अपने इस नालायक बेटे को गोली मार दे, किन्तु फिर बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से को काबू में किया उसने।

"मैं तो कहता हूॅ बेटी कि बेवजह ही तुम इसके लिए परेशान हो रही हो।" अजय सिंह ने बात को किसी तरह सम्हालने की गरज से कहा__"क्योंकि अगर ये पता चल भी गया कि फैक्टरी में आग खुद नहीं लगी थी बल्कि किसी के द्वारा लगाई गई थी तो तब भी ये कैसे पता लगाओगी कि किसने ये सब किया? वो जो कोई भी रहा होगा वो इतना बेवकूफ नहीं रहा होगा कि इतना बड़ा काण्ड करने बाद अपने पीछे अपने ही खिलाफ कोई सबूत या कोई सुराग़ छोंड़ गया होगा। क्योकि ये तो उसे भी भली भाॅति पता होगा कि इतना कुछ करने के बाद अगर वह पकड़ा जाएगा तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा, बल्कि पकड़े जाने पर जेल की सलाखों के पीछे पहुॅचा दिया जाएगा।"

"जुर्म चाहे जितनी होशियारी या सफाई से किया जाए डैड।" रितु ने कहा__"वह कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में ऐसा सबूत या सुराग़ ज़रूर छोंड़ जाता है जिसकी बिना पर जुर्म करने वाले को कानून के हाॅथों पकड़ कर जेल की सलाखों के पीछे पहुॅचा दिया जा सके। मुझे पूरा यकींन है डैड...जिसने भी ये सब किया है वो अपने पीछे अपने ही खिलाफ सबूत या सुराग़ ज़रूर छोंड़ कर गया होगा। आप खुद सरकारी वकील रह चुके हैं इस लिए ये बात आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि मुजरिम के खिलाफ जब कोई एक सबूत या सुराग़ कानून के हाॅथ लग जाता है तो फिर ज्यादा समय नहीं लगता उस मुजरिम को पकड़ कर जेल की सलाखों के पीछे डाल देने में।"

अजय सिंह हैरान भी था और परेशान भी। हैरान इस लिए कि उसकी बेटी के मुख से जिस तरह के डायलाॅग निकल रहे थे उसकी उसने कल्पना तक न की थी और परेशान इस लिए कि अपनी ही बेटी द्वारा इस छानबीन को करने से वह किसी भी तरीके से रोंक नहीं पा रहा था। अपनी बेटी द्वारा छानबीन करने की उसकी ज़िद को देख उसका दिल बैठा जा रहा था। हलाॅकि वह चाहता तो बेटी को ठेस लहजे में कह कर इसके लिए मना कर देता किन्तु तब हालात और बात दोनो ही बिगड़ जाते। उसकी बेटी के मन में ये बिचार ज़रूर उठता कि उसका बाप उसके द्वारा इस छानबीन को न करने पर इतना ज़ोर क्यों दे रहा है? बेटी क्योंकि अब पुलिस वाली बन चुकी थी इस लिए अब उसके सोचने का नज़रिया बदल चुका था। उसे तो अब हर आदमी में एक मुजरिम नज़र आने लगा था जिससे उसकी निगाह अब सबको शक की दृष्टि से देखने लगी थी। इस लिए अजय सिंह अब ये किसी कीमत पर भी नहीं चाह सकता था कि किसी भी वजह से उसके प्रति उसकी बेटी के सोचने का नज़रिया बदल जाए।

"चलती हूॅ डैड।" सहसा रितू ने अपनी खूबसूरत कलाई पर बॅधी एक कीमती घड़ी पर नज़रें डालते हुए कहा__"मैं आपका पुलिस स्टेशन में इंतज़ार करूॅगी।" फिर उसने अभय की तरफ भी देख कर कहा__"चाचा जी आपका भी।"

इतना कहने के बाद ही वह खूबसूरत बला पलटी और लम्बे लम्बे डग भरती हुई ड्राइंगरूम से बाहर निकल गई। किन्तु उसके जाते ही वहाॅ पर ब्लेड की धार जैसा पैना सन्नाटा भी खिंच गया।

अजय सिंह का दिल जैसे धड़कना भूल गया था। उसे अपनी आंखों के सामने अॅधेरा सा नज़र आने लगा। जाने क्या सोचकर वह तनिक चौंका तथा साथ ही घबरा भी गया। फिर एक ठंडी साॅस खींचते हुए, तथा अपनी आॅखों को मूॅद कर सोफे की पिछली पुश्त से अपना पीठ व सिर टिका दिया। आॅख बंद करते ही उसे फैक्टरी के बेसमेंट मे बने उस कारखाने का मंज़र दिख गया जहां पर सिर्फ और सिर्फ ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद थी। ये सब नज़र आते ही अजय सिंह ने पट से अपनी आंखें खोल दी तथा एक झटके से सोफे पर से उठा और अपने कमरे की तरफ भारी कदमों से बढ़ गया।

उस वक्त दोपहर के लगभग साढ़े ग्यारह या बारह के आसपास का समय था जब अजय सिंह, प्रतिमा व अभय सिंह रितू के कहे अनुसार फैक्टरी पहुॅचे। इन लोगों के साथ अजय सिंह का बेटा शिवा भी आना चाहता था किन्तु अजय सिंह उसे अपने साथ नहीं लाया था। उसे डर था कि कहीं वह किसी समय ऐसा वैसा न बोल बैठे जिससे कोई बात बिगड़ जाए। शिवा इस बात से अपने स्वभाव के चलते नाराज़ तो हुआ लेकिन पिता के द्वारा सख़्ती से मना कर देने पर वह मन मसोस कर रह गया था।
 
फैक्टरी के अंदर जाने से पहले की तरह ही कानूनन अभी प्रतिबंध लगा हुआ था। हलाॅकि पहले हुई छानबीन के मुताबिक प्रतिबंध हटाया ही जा रहा था कि ऐन समय पर रितू के द्वारा जब केस फिर से रिओपेन हो गया तो प्रतिबंध पूर्वत् लगा ही रहा। इसके साथ ही जाने क्या सोच कर इंस्पेक्टर रितू ने वहाॅ की सिक्योरिटी भी टाइट करवा दी थी।

अजय सिंह ने अपनी तरफ से कोशिश तो बहुत की कि उसे एक बार फैक्टरी के अंदर जाने दिया जाए लेकिन उसकी एक न चली थी। उसे इस बात ने भी बुरी तरह हैरान व परेशान कर दिया था कि इस शहर का पूरा पुलिस डिपार्टमेंट ही बदल दिया गया है। ऊॅची रैंक के सभी अफसरों का तबादला हो चुका था एक दिन पहले ही। सब-इंस्पेक्टर से लेकर कमिश्नर तक सबका तबादला कर दिया गया था। अजय सिंह इस बात से बेहद परेशान हो गया था, पुलिस कमिश्नर उसका पक्का यार था जिसके एक इशारे पर उसका हर काम चुटकियों में हो जाता था। अजय सिंह अपनी हार न मानते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री से भी संबंध स्थापित कर इस केस को रफा दफा करने का दबाव बढ़ाने को कहा किन्तु मुख्यमंत्री ने ये कह कर अपने हाॅथ खड़े कर दिये थे कि वह ऐसा चाह कर भी नहीं कर सकता क्योंकि ऊपर से हाई कमान का शख्त आदेश था कि इस केस से संबंधित किसी भी प्रकार की बात किसी के द्वारा नहीं सुनी जाएगी और न ही किसी के द्वारा कोई हस्ताक्षेप किया जाएगा। पुलिस को पूरी इमानदारी के साथ इस केस की छानबीन करने की छूट दी जाए।

प्रदेश के मुख्यमंत्री की इस बात ने अजय सिंह की रही सही उम्मीद को भी तोड़ दिया था। उसकी हालत उस ब्यक्ति से भी कहीं ज्यादा गई गुज़री हो गई थी जिसे चलने के लिए दो दो बैसाखियों का भी मोहताज होना पड़ता है। अजय सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि एक ही दिन में ये क्या हो गया है? शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेंट का क्यों तबादला कर दिया गया?? और....और ऐसा क्या है जिसके चलते प्रदेश के सीएम तक को अपने हाॅथ मजबूरीवश खड़े कर देने पड़े? लाख सिर खपाने के बाद भी ये सब बातें अजय सिंह की समझ में नहीं आ रही थीं। वह इतना ज्यादा परेशान व हताश हो गया था कि उसे हर तरफ सिर्फ और सिर्फ अॅधेरा ही अॅधेरा दिखाई देने लगा था। ऐसा लगता था कि वह चक्कर खा कर अभी गिर जाएगा। हलाॅकि वो ये सब अपने चेहरे पर से ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता था किन्तु वह इसका क्या करे कि लाख कोशिशों के बाद भी दिलो दिमाग़ में ताण्डव कर रहे इस तूफान को वह अपने चेहरे पर उभर आने से रोंक नहीं पा रहा था।

इंस्पेक्टर रितु पुलिस की वर्दी पहने कुछ ऐसे पोज में खड़ी थी कि अजय सिंह को वह किसी यमराज की तरह नज़र आ रही थी।

अजय सिंह अपनी ही बेटी से बुरी तरह भयभीत हुआ जा रहा था। बार बार वह अपने रुमाल से चेहरे पर उभर आते पसीने को पोछ रहा था।

"मैं आप सबको ये बताना चाहती हूॅ कि फैक्टरी की इसके पहले हुई छानबीन से मेरा कोई मतलब नहीं है।" रितु ने अजय सिंह के साथ आए बाॅकी सब पर एक एक नज़र डालने के बाद अजय सिंह से कहा__"अब क्योंकि ये केस फिर से मेरे द्वारा रिओपेन हुआ है तो इस केस की छानबीन मैं शुरू से और नए सिरे से ही करूॅगी। उम्मीद करती हूॅ कि आपको इस सबसे कोई ऐतराज़ नहीं होगा बल्कि इस छानबीन में आप खुद पुलिस का पूरा पूरा सहयोग देंगे।"

"तुमने बेकार ही इस केस को रिओपेन किया है बेटी।" अजय सिंह ने नपे तुले भाव से कहा__"मैं तो कहता हूॅ कि अभी भी कुछ नहीं हुआ है, अभी भी इस केस की फाइल बंद की जा सकती है। कोई ज़रूरत नहीं है इस सबकी, क्योंकि इससे वो सब कुछ मुझे वापस तो मिलने से रहा जो जल कर खाक़ हो गया है।"

"अब ये केस रिओपेन हो चुका है ठाकुर साहब।" रितु ने अपने ही बाप को ठाकुर साहब कह कर संबोधित किया। अजय सिंह इस बात से हैरान रह गया, जबकि रितु कह रही थी__"और जब तक इस केस से संबंधित कोई रिजल्ट सामने नहीं आता तब तक ये केस क्लोज नहीं हो सकता। केस को क्लोज करना मेरे बस में नहीं है बल्कि ये ऊपर से ही आदेश है कि केस को अब अच्छी तरह से ही किसी नतीजे के साथ बंद किया जाए।"

"ठीक है रितु बेटी।" सहसा प्रतिमा ने कहा__"तुम अपनी ड्यूटी निभाओ, हम भी देखना चाहते हैं कि इस सबके पीछे किसका हाॅथ है?"

"मुआफ़ कीजिये, इस वक्त मैं आपकी बेटी नहीं बल्कि एक पुलिस आॅफिसर हूॅ और अपनी ड्यूटी कर रही हूॅ।" रितु ने सपाट लहजे से कहा__"एनीवे, तो शुरू करें ठाकुर साहब??"

रितु की बात से जहाॅ प्रतिमा को एक झटका सा लगा वहीं अजय सिंह की घबराहट बढ़ने लगी थी।

"मेरा सबसे पहला सवाल।" रितु ने कहा__"फैक्टरी में आग लगने की सूचना सबसे पहले आपको कैसे हुई?"

अजय सिंह क्योंकि समझ चुका था इस लिए अब उसने भी अपने आपको इस केस से संबंधित किसी भी प्रकार की छानबीन या तहकीकात के लिए तैयार कर लिया।
 
"फैक्टरी में आग लगने की सूचना उस रात लगभग तीन बजे मेरे पीए के द्वारा मुझे मिली।" अजय सिंह ने कहा__"मैं अपनी पत्नी के साथ अपने कमरे में उस वक्त सोया हुआ था, जब मेरे पीए का फोन आया था। उसने ही बताया कि हमारी फैक्टरी में आग लग गई है।"

"इसके बाद आपने क्या किया?" रितू ने पूछा।

"मैने वही किया।" अजय सिंह कह रहा था__"जो हर इंसान इन हालातों में करता है। अपने पीए के द्वारा फोन पर मिली सूचना के तुरंत बाद ही मैं वहां से शहर के लिए निकल पड़ा। जब सुबह के प्रहर मैं यहाॅ पहुॅचा तो सब कुछ तबाह हो चुका था।"

"फैक्टरी पहुॅच कर आपने क्या ऐक्शन लिया?" रितू ने पूछा।

"किसी प्रकार का ऐक्शन लेने की हालत ही नहीं थी उस वक्त मेरी।" अजय सिंह बोला__"अपनी आॅखों के सामने अपना सब कुछ खाक़ में मिल गया देख होश ही नहीं था मुझे। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करूॅ क्या न करूॅ? वो तो मेरे पीए ने ही बताया कि फैक्टरी में आग लगने के बाद उसने इस संबंध में क्या क्या किया है?"

"मैं आपके पीए का बयान लेना चाहती हूॅ।" रितू ने कहा__"आप उन्हें बुला दीजिए प्लीज।"

अजय सिंह को बुलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्यों पीए वहीं था, और पीए ही बस क्यों बल्कि फैक्टरी के स्टाफ का लगभग हर ब्यक्ति वहाॅ मौजूद था। सबको पता हो चुका था कि फैक्टरी की दुबारा छानबीन हो रही है इस लिए हर ब्यक्ति उत्सुकतावश वहाॅ मौजूद था।

अजय सिंह ने इशारे से पीए को बुलाया। वह तुरंत ही हाज़िर हो गया।

"आपका नाम?" रितु ने पीए के हाज़िर होते ही सवाल किया।

"जी मेरा नाम दीनदयाल शर्मा है।" पीए ने बताया।

"ठाकुर साहब की फैक्टरी में कब से ऐज अ पीए काम कर रहे हैं?" रितू ने पूछा।

"जी लगभग छः साल हो गए।" दीन दयाल ने कहा।

"छः साल काफी लम्बा समय होता है ये तो आप भी जानते होंगे?" रितु ने अजीब भाव से कहा__"कहने का मतलब ये कि इन छः सालो में आपको अपने मालिक और उनके काम के बारे अच्छी तरह जानकारी होगी।"

"जी शायद।" दीनदयाल ने अनिश्चित भाव से कहा__"शायद शब्द इस लिए कहा कि छः साल अपने मालिक के नजदीक रह कर भी ये बात मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि मैं उनके और उनके काम के बारे में पूरी तरह ही जानता हूॅ। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो कोई भी मालिक अपने किसी नौकर को बताना ज़रूरी नहीं समझता।"

"आपने बिलकुल ठीक कहा।" रितू ने कहा__"खैर, तो अब आप बताइये कि उस रात क्या क्या और किस तरह हुआ?"

"ज जी क्या मतलब?" दीनदयाल चकराया।

"मेरे कहने का मतलब है कि जिस रात फैक्टरी में लगी थी।" रितू ने कहा__"उस रात की सारी बातें आप विस्तार से बताइए।"

दीनदयाल ने कुछ पल सोचा फिर वो सब बताता चला गया जो उस रात हुआ था। उसने वही सब बताया जो हवेली में अभय सिंह से पूछने पर अजय सिंह ने उसे बताया था और उधर मुम्बई में निधि ने सबको अखबार के माध्यम से बताया था। (दोस्तो, आप सबको भी पता ही होगा)

सब कुछ सुनने के बाद रितू ने गहरी साॅस ली और वहीं पर चहलकदमीं करते हुए कहा__"तो आपकी और पुलिस की छानबीन के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार फैक्टरी में आग लगने की मुख्य वजह सिर्फ सार्ट शर्किट ही है?"

"जी पुलिस ने तो अपनी यही रिपोर्ट छानबीन के बाद तैयार करके दी थी।" दीनदयाल ने कहा।

"क्या आपने इस बात पर विचार नहीं किया या फिर क्या आपने इस नज़रिये से नहीं सोचा कि फैक्टरी में आग किसी के द्वारा लगाई गई भी हो सकती है?" रितू ने पूछा था।
 
"इस बारे में न सोचने की भी वजह थी इंस्पेक्टर।" सहसा अजय सिंह ने कमान सम्हालते हुए कहा__"दरअसल जिस दिन फैक्टरी में आग लगी थी उस दिन सभी वर्कर्स के लिए अवकाश था। इस लिए उस रात फैक्टरी में कोई था ही नहीं। और जब कोई था ही नहीं तो भला इस बारें में कैसे कह सकते थे किसी अन्य के द्वारा फैक्टरी में आग लगी?"

"चलिए मान लिया कि उस रात अवकाश के चलते कोई भी वर्कर फैक्टरी में नहीं था।" रितू ने कहा__"किन्तु सवाल ये है कि अवकाश के चलते क्या कोई भी फैक्टरी में नहीं था? जहाॅ तक मुझे पता है तो इतनी बड़ी फैक्टरी में अवकाश के चलते हर कोई फैक्टरी से नदारद नहीं हो सकता। मतलब फैक्टरी की सुरक्षा ब्यवस्था के लिए वहाॅ गार्ड्स मौजूद होते हैं और बहुत मुमकिन है कि फैक्टरी के स्टाफ में से भी कोई न कोई फैक्टरी में मौजूद रहता है।"

"बिलकुल इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने कहा__"हप्ते में एक दिन फैक्टरी बंद रहती है इस लिए फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को अवकाश दे दिया जाता है। लेकिन उस अवकाश वाले दिन ऐसा नहीं होता कि पूरी फैक्टरी सुनसान हो जाती है, बल्कि फैक्टरी की देख रेख और उसकी सुरक्षा ब्यवस्था के लिए वहाॅ पर चौबीसों घंटे सिक्योरिटी गार्ड्स रहते हैं तथा फैक्टरी स्टाफ के भी कई मेंबर फैक्टरी में रहते हैं।" इतना कहने के बाद अजय सिंह एक पल रुका फिर कुछ सोच कर बोला__"अगर तुम्हारा ख़याल ये है इंस्पेक्टर कि इन्हीं सब लोगों में से ही किसी ने फैक्टरी में आग लगाई हो सकती है तो तुम्हारा ख़याल ग़लत है। क्योकि ये सब मेरे सबसे ज्यादा फरोसेमंद आदमी हैं जिनकी ईमानदारी पर मुझे लेस मात्र भी शक नहीं है।"

"अपने आदमियों पर भरोसा करना बहुत अच्छी बात है ठाकुर साहब।" रितू ने कहा__"लेकिन अंधा विश्वास करना कोई सबझदारी नहीं है। ख़ैर, तो आपके कहने का मतलब है कि फैक्टरी से रिलेटेड किसी भी ब्यक्ति ने फैक्टरी में आग नहीं लगाई हो सकती?"

"बिलकुल।" अजय सिंह ने जोर देकर कहा__"इन पर मेरा ये भरोसा ही है वर्ना अगर भरोसा नहीं होता तो मैं पहले ही इन सब पर इस सबके लिए शक ज़ाहिर करता और तुम्हारे पुलिस डिपार्टमेंट से इस बारे में तहकीकात करने की बात कहता। और एक पल के लिए अगर मैं ये मान भी लूॅ कि मेरे आदमियों में से ही किसी ने ये काम किया हो सकता है तब भी ये साबित नहीं हो सकता। क्योकि अवकाश वाले दिन फैक्टरी में ताला लगा होता है और बाकी के फैक्टरी स्टाफ मेंबर फैक्टरी से अलग अपनी अपनी डेस्क या केबिन में होते हैं। यहाॅ पर अगर ये तर्क दिया जाए कि अवकाश से पहले ही या फैक्टरी में ताला लगने से पहले ही किसी ने ऐसा कुछ कर दिया हो जिससे फैक्टरी के अंदर आग लग जाए तब भी ये तर्कसंगत नहीं है। क्योकि ये तो हर स्टाफ मेंबर जानता है कि फैक्टरी में हुए किसी भी हादसे से सबसे पहले उन्हीं पर ही शक किया जाएगा, उस सूरत में उन पर कड़ी कार्यवाही भी की जाएगी और अंततः वो पकड़े ही जाएॅगे। इस लिए कोई भी स्टाफ मेंबर जानबूझ कर अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार लेने वाला काम करेगा ही नहीं।"

"आपके तर्क अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं ठाकुर साहब।" रितु ने एक हाॅथ में पकड़े हुए पुलिसिया रुल को अपने दूसरे हाॅथ की हॅथेली पर हल्के से मारते हुए कहा__"अब इसी बात को अपने फैक्टरी स्टाफ के नज़रिये से देख कर ज़रा ग़ौर कीजिए। कहने का मतलब ये कि मान लीजिए कि मैं ही वो फैक्टरी की स्टाफ मेंबर हूॅ जिसने फैक्टरी में आग लगाई है और मैं ये बात अच्छी तरह जानती हूॅ कि मेरे द्वारा किए गए काण्ड से आपका शक सबसे पहले मुझ पर ही जाएगा जो कि स्वाभाविक ही है, इस लिए आपके मुताबिक मैं ये काम नहीं कर सकती, क्योंकि सबसे पहले मुझ पर ही शक जाने से मैं फॅस जाऊॅगी, ये आप सोचते हैं। जबकि मैंने आपकी सोच के उलट ये काम कर ही दिया है और आप सोचते रहें कि मैंने ये काम नहीं किया हो सकता।"

"दिमाग़ तो तुमने काबिले-तारीफ़ लगाया है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने मुस्कुराकर कहा__"यकीनन तुमने दोनो पहलुओं के बारे में बारीकी से सोच कर तर्कसंगत विचार प्रकट किया है लेकिन ये एक संभावना मात्र ही है, कोई ज़रूरी नहीं कि इसमें कोई सच्चाई ही हो।"

"सच्चाई का ही तो पता लगाना है ठाकुर साहब।" रितु ने कहा__"और उसके लिए हर किसी के बारे में दोनों पहलुओं पर सोचना ही पड़ेगा। ख़ैर, मुझे ऐसा लगता है कि आप ही इस प्रकार से सोच विचार नहीं करना चाहते, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। ये सोचने वाली बात है।"

अजय सिंह ये सुन कर एक पल के लिए गड़बड़ा सा गया। फिर तुरंत ही सहल कर बोला__"ऐसा कुछ नहीं है इंस्पेक्टर। मैं तो बस इस लिए नहीं सोच विचार कर रहा क्योंकि मेरे हिसाब से इस सबका रिजल्ट पहले निकाला जा चुका है।"
 
अजय सिंह की इस बात से रितू ने कुछ न कहा बल्कि बड़े ग़ौर से अपने पिता के चेहरे की तरफ देखती रही। ऐसा लगा जैसे कि वह अपने पिता के चेहरे पर उभर रहे कई तरह के भावों को समझने की कोशिश कर रही हो। वहीं अजय सिंह ने जब अपनी बेटी को अपनी तरफ इस तरह गौर से देखते हुए देखा तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ। उससे नज़रें मिलाने में उसकी हिम्मत जवाब देने लगी। उसे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी बेटी उसके चेहरे के भावों को पढ़ कर ही सारा सच जान गई हो। इस एहसास ने उसे अंदर तक कॅपकॅपा कर रख दिया। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हालते हुए कहा__"क्या हुआ इंस्पेक्टर, इस तरह क्यों देख रही हो मुझे? अपनी कार्यवाही को आगे बढ़ाओ।"

"देख रही हूॅ कि आपके चेहरे पर उभरते हुए अनगिनत भाव किस बात की गवाही दे रहे हैं?" रितू ने अजीब से भाव से कहा।

"क क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था।

"जाने दीजिए।" रितू ने कहा__"देखिए फारेंसिक डिपार्टमेंट वाले भी आ गए। आइए फैक्टरी के अंदर चलते हैं।"

अजय सिंह एकाएक अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा सा गया। उसे तो लगने लगा था कि बातें अब तक उसके पक्ष में ही हैं और इतनी पूछताॅछ के बाद कार्यवाही बंद कर दी जाएगी। लेकिन उसे अब महसूस हुआ कि ये सब तो महज एक औपचारिक पूछताॅछ थी असली छानबीन तो अब शुरू होगी।

फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट की टीम आ चुकी थी तथा खोजी दस्ता भी। गाड़ियों से निकल कर सब बाहर आ गए। अजय सिंह उस वक्त और बुरी तरह चौंका जब गाड़ियों के अंदर से कुछ कुत्ते बाहर निकले। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि ये कुत्ते इस सबकी छानबीन मे उन सबकी सहायता के लिए ही हैं।

पल भर में ही अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। इस सबके बारे में उसने ख्वाब तक में न सोचा था। आज पहली बार उसे लगा कि अपनी बेटी रितू को पैदा करके उसने बहुत बड़ी भूल की थी।

इंस्पेक्टर रितू के निर्देशानुसार पुलिस और बाॅकी विभाग की टीम्स फैक्टरी की तरफ बढ़ चली, और साथ ही बढ़ चली थी अजय सिंह की हृदय गति। हलाॅकि उसके साथ आए बाॅकी सब नार्मल थे। प्रतिमा और अभय के चेहरे पर गंभीरता के भाव ज़रूर थे किन्तु ये दोनो अजय सिंह की तरह अपनी हालत से लाचार या परेशान नहीं थे।

छानबीन करने आई बाॅकी सब टीमों के पीछे पीछे अजय, प्रतिमा व अभय भी चल रहे थे किन्तु अजय सिंह के कदम बड़ी मुश्किल से उठ रहे थे।

"सब ठीक हो जाएगा अजय।" सहसा प्रतिमा ने अजय की हालत देख उसे दिलाशा देने की गरज से कहा__"अब तो हमारी बेटी ने खुद ही इस केस को अपने हाॅथ में ले लिया है। मुझे पूरा यकीन है कि वो सब कुछ पता कर लेगी। हमारी फैक्टरी में आग लगाने के पीछे तथा हमें बरबाद करने के पीछे जिस किसी का भी हाॅथ होगा वह उसे ज़रूर पकड़ लेगी। तुम बस खुद को सम्हालो और अपनी ऐसी शकल न बनाए रखो।"

"भाभी बिलकुल ठीक कह रही हैं बड़े भइया।" अभय ने कहा__"आपको अब इस तरह परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। यकीनन रितू बेटी के चलते सब कुछ ठीक हो जाएगा। मुझे अपनी भतीजी पर गर्व है कि उसने पुलिस फोर्स ज्वाइन किया और ज्वाइन करते ही उसे अपनी ही फैक्टरी में लगी आग का ये केस मिल गया। मुझे उसकी काबिलियत पर पूरा भरोसा है। आप बेफिक्र हो जाइए भइया...इवरीथिंग विल वी आलराइट।"

अजय सिंह इन दोनो को भला क्या कहता??? वह भला क्या कहता कि वह किस बात से परेशान है? वह भला क्या कहता कि जिस भतीजी पर वह गर्व कर रहा है उसकी उसी भतीजी की वजह से आज वह पल पल इस हालत से मरा जा रहा है। हालात ने कितना बेबस व लाचार बना दिया था उसे कि सक्षम होने के बावजूद भी वह कुछ नहीं कर सकता था। हिन्दू धर्म के जितने भी देवी देवताओं का उसे पता था उसने उन सबको मन ही मन याद करके उनसे ये फरियाद कर डाली थी कि ये केस तथा ये छानबीन बस यहीं पर रुक जाए मगर ऐसा होता उसे अब तक नज़र नहीं आया था। इतना बेबस तथा इतना परेशान आज से पहले वह अपनी ज़िन्दगी में कभी न हुआ था। उसने तो ये तक सोच लिया था कि अगर ये छानबीन रुक जाए तथा ये केस बंद हो जाए तो वह अब से इस गैर कानूनी काम को करने से हमेशा के लिए तौबा कर लेगा। मगर ये भी सच है न दोस्तो कि जब हम किसी चीज़ के बीज बो चुके होते हैं तो फिर बाद में हमें उस बीज के द्वारा उत्पन्न हुई फसल को काटना भी पड़ता है या उस बीज से उग आए फल को खाना भी पड़ता है। यही नियति बन गई थी अजय सिंह की, मगर अब वह अपने ही द्वारा बोये हुए बीज से उत्पन्न हुए फल को खाना नहीं चाहता था।

उधर फैक्टरी के इंट्री गेट पर लगे ताले को पुलिस के एक हवलदार ने अपनी जेब से चाभी निकाल कर खोला। ताला खोलने के बाद भारी भरकम लोहे के गेट को दो आदमी की मदद से खोला गया। गेट के खुलते ही सब अंदर की तरफ बढ़ गए। पुलिस के साथ आए खोजी कुत्ते भी एक पुलिस वाले के हाथ में थमी जंजीर के सहारे फैक्टरी के अंदर चले गए। ये लिखने की आवश्यकता नहीं कि इन सबके पीछे अजय, प्रतिमा व अभय भी अंदर चले गए।
 
ये एक बहुत बड़ा फार्म हाउस हुआ करता था पहले। अजय सिंह ने जब इस बिजनेस की शुरुआत की थी तो किसी दूसरे सेठ की वर्षों से बंद कपड़ा फैक्टरी को सस्ते दामों में खरीदा था। (ये सब बातें कहानी के पहले या दूसरे अपडेट में बताई जा चुकी हैं) उस समय ये कपड़ा फैक्टरी शहर के बीच ही बनी हुई थी। कुछ सालों बाद जब अजय सिंह की इस बिजनेस से अच्छे खासे मुनाफे के रूप में तरक्की हुई तो उसने इस फैक्टरी को नये सिरे से तथा नई मशीनों के साथ शुरू करने का विचार किया। अजय सिंह क्योंकि बहुत ही लालची व महत्वाकांक्षी आदमी था, और बढ़ती आय के साथ उसकी बुरी आदतों में भी इज़ाफा हुआ इस लिए पैसे के लिए वह उन रास्तों को भी अपना लिया जिसे गैर कानूनी कहा जाता है। इस रास्ते में उसके कई अपने गैर कानूनी लोग भी थे। किन्तु गैर कानूनी काम में रिश्क बहुत था तथा शहर के बीच उस छोटी सी फैक्टरी में इस काम को अंजाम देने में आसानी नहीं होती थी। कभी भी लोगों के बीच खुद की असलियत सामने आ जाने का खतरा बना रहता था। इस लिए उसने बहुत सोच समझ कर शहर से बाहर एक बहुत बड़ी ज़मीन ख़रीदी तथा वहाॅ पर इसने नये तरीके से फैक्टरी का निर्माण किया। फैक्टरी काफी बड़ी थी तथा उसके नीचे एक बड़ा बेसमेंट भी बनवाया गया था जो सिर्फ गैर कानूनी चीज़ों के उपयोग में ही आता था। यहाॅ पर उसे किसी चीज़ का खतरा नहीं था। फैक्टरी में मजदूरों को हप्ते में एक दिन अवकाश देने के पीछे भी उसका एक मकसद था। वो मकसद ये था कि अवकाश वाले दिन ही वह स्वतंत्र रूप से अपने गैर कानूनी धंधे को चलाता था। जिसके बारे में कभी किसी को भनक तक न लगी थी। फैक्टरी को बहुत सोच समझ कर ही बनवाया गया था। फैक्टरी के अंदर सिर्फ मशीनें थी जहाॅ पर मजदूर काम करते थे, जबकि फैक्टरी के आला अफसर या बाॅकी स्टाफ फैक्टरी से दूर कुछ फाॅसले पर बने एक बड़े से आफिस में होते थे।

अजय सिंह ने कदाचित ख़्वाब में भी न सोचा था कि कभी ऐसा भी समय उसके जीवन में आ जाएगा जब उसकी इस विसाल फैक्टरी में आग लग जाएगी और इस सबकी छानबीन खुद उसकी ही बेटी पुलिस इंस्पेक्टर बन कर करेगी। कानून का डर उसे कभी नहीं था क्योंकि उसने कानून के नुमाइंदों को अपने वश में कर लिया था। हर महीने वह अच्छी खासी रकम पुलिस के आला अफसरों तक पहुॅचवा देता था। उसके मंत्री तक से अच्छे संबंध थे इस लिए उसे इस धंधे में किसी का कोई डर नहीं था। मगर होनी को कौन टाल सकता था भला? होनी तो अटल होती है, बिना बताए तथा बिना किसी सूचना के वो अपना काम कर डालती है। यही अजय सिंह के साथ हुआ था।

ख़ैर ये सब तो बीती बातें हैं दोस्तो, आइए हम सब वर्तमान की तरफ चलते हैं और देखते हैं कि आगे क्या हो रहा है?

फैक्टरी के अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग था। जैसा कि आप सब जानते हैं कि फैक्टरी में भीषण आग लगी हुई थी जिसमें सब कुछ जल कर खाक़ में मिल चुका था। अंदर हर चीज़ कोयला बन चुकी थी। हर जगह पानी में सनी हुई राख तथा टूटे हुए बहुत से टुकड़े पड़े थे। कुछ पल के लिए तो रितू को भी समझ न आया कि इस राख में वह क्या तलाश करे? किन्तु कुछ तो करना ही था, केस रिओपेन हुआ था। इस लिए बिना किसी नतीजे के वह बंद नहीं हो सकता था। ऊपर से आदेश था कि छानबीन अच्छे से होनी चाहिए।

पुलिस के खोजी कुत्ते तथा फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग अपने अपने काम में लग गए। खुद रितू भी वहाॅ की हर चीज़ को बारीकी से देख देख कर जाॅच करने लगी। जबकि इधर अजय, प्रतिमा व अभय चुपचाप उन सबकी कार्यप्रणाली को देखते रहे।

बड़ी बड़ी मशीनों पर जले हुए कपड़ों की राख तथा टुकड़े लिपटे हुए थे। कहीं कहीं पर पिघले हुए शीशे एवं प्लास्टिक नज़र आ रहे थे। अजय सिंह ये सब होने के बाद पहली बार ये सब ध्यान से देख रहा था तथा साथ ही अंदर ही अंदर दुखी भी हो रहा था। कुछ भी हो आखिर उसकी मेहनत का पैसा था वह, फिर चाहे गैर कानूनी वाला हो या फिर सच्चाई वाला।

"मैडम, यहाॅ पर कुछ है।" सहसा एक हवलदार रितू को दूर से ही चिल्लाते हुए कहा।

रितु के साथ साथ सबके कान खड़े हो गए। अजय सिंह की बढ़ी हुई धड़कन मानों उसे रुकती हुई प्रतीत हुई। चेहरे पर तुरंत ही ढेर सारा पसीना उभर आया, तथा चेहरा भय व घबराहट की वजह से पीला पड़ता चला गया। उसने जल्दी से खुद को सम्हाला। अपने दाहिने हाॅथ में लिए रुमाल से उसने तुरंत ही अपने चेहरे का पसीना पोंछा और सरसरी तौर पर इधर उधर देखा। प्रतिमा उसे देख कर तुरंत ही उसके करीब गई तथा हौले से पूछा__"क्या बात है अजय, तुम इतना परेशान और घबराए हुए क्यों लग रहे हो?"

"म मैं क कहाॅ परेशान हूॅ?" अजय सिंह हकलाते हुए बोला__"मैं ठीक हूॅ? ऐसा क्यों लगता है तुम्हें कि मैं परेशान व घबराया हुआ हूॅ?"

प्रतिमा ने उसे बड़े ग़ौर से देखा, फिर कहा__"मुझे ऐसा क्यों लगता है अजय कि जैसे तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो? या फिर ऐसा कि तुम किसी बात से इस लिए घबरा रहे हो कि किसी को वो बात पता न चल जाए।"

अजय सिंह हड़बड़ा गया, आॅखें फाड़े प्रतिमा को देखने लगा। मन में विचार उभरा 'बेटी क्या कम थी जो अब उसकी माॅ भी मेरी जान लेने पर उतारू हो गई है'।

"ऐसे क्यों देख रहे हो मुझे?" प्रतिमा ने कहा__"क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया है?"
 
"देखो प्रतिमा।" अजय सिंह ने खुद को सम्हाल कर कहा__"मैं इस वक्त किसी से कुछ नहीं कहना चाहता, इस लिए बेहतर होगा कि तुम भी मुझसे कोई सवाल जवाब न करो।"

"मैं तुम्हारी पत्नी हूॅ अजय।" प्रतिमा ने एकाएक अधीरता से कहा__"तुम्हें इस तरह परेशानी की हालत में नहीं देख सकती। तुम जानते हो कि हर काम में मैं तुम्हारे साथ हूॅ, फिर चाहे वो काम कैसा भी क्यों न हो। तुम्हारी खुशी के लिए हर वो काम कर जाती हूॅ जिसे करने का तुम मुझसे कहते हो। मैं ये भी जानती हूॅ कि तुम मुझसे कोई भी बात नहीं छुपाते फिर ऐसी क्या बात हो गई है जिसे तुम मुझसे छुपा कर खुद अंदर ही अंदर घुटे जा रहे हो?"

"ऐसी कोई बात नहीं है।" अजय सिंह ये सोच कर घबराया जा रहा था कि कहीं कोई ये सब बातें सुन न ले, इस लिए वह बोला__"अब चुप हो जाओ प्लीज।"

"अगर ऐसी कोई बात नहीं है तो यही बात तुम मेरे सिर पर हाॅथ रख कर कहो।" प्रतिमा ने कहने साथ ही अजय सिंह का एक हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया।

"ये क्या पागलपन है यार?" अजय सिंह ने तुरंत ही प्रतिमा के सिर से अपना हाॅथ एक झटके में खींच कर थोड़ी ऊॅची आवाज़ में कहा था। उसकी आवाज़ सुन कर अभय का ध्यान उनकी तरफ गया तो वह सीघ्र ही उनके पास आकर ब्याकुलता से बोला__"क्या हुआ भइया? कुछ परेशानी है क्या?"

"न नहीं छोटे।" अजय सिंह मन ही मन झुंझला उठा था किन्तु प्रत्यक्ष मे उसने यही कहा__"ऐसी कोई बात नहीं है।"

अभय ने उसके चेहरे की तरफ कुछ पल देखा फिर वह वापस अपनी जगह पर आकर खड़ा हो गया। जबकि अभय के जाते ही अजय सिंह ने प्रतिमा की तरफ देख कर कहा__"फार गाड शेक..अब कुछ मत बोलना।"

"ये तुम बिलकुल भी अच्छा नहीं कर रहे हो अजय।" प्रतिमा ने कहा__"अगर कोई बात है तो तुम्हें मुझसे बेझिझक बता देना चाहिए, हो सकता है कि मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूॅ।"

"अगर कोई बात है भी तो।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली__"तो इस वक्त नहीं बता सकता, बट बिलीव मी तुम्हें सब कुछ ज़रूर बताऊॅगा। अब जाओ यहाॅ से और मुझे अकेला मेरे हाल पर छोंड़ दो।"

प्रतिमा ने कुछ देर अजय की आंखों में देखा और फिर पलट कर अभय के पास आ गई। उसके मन में हज़ारों विचार किसी बिच्छू की तरह डंक मार मार कर उछल कूद कर रहे थे।

उधर हवलदार के चिल्लाने पर रितू तेज़ी से उसके करीब पहुॅची। रितू के आते ही हवलदार ने सामने की तरफ इशारा किया। रितू ने हवलदार की बताई हुई जगह को देखा तो चौंक गई। दरअसल पिघले हुए प्लास्टिक के नीचे कोई चीज़ थी लाल रंग की। रितू फर्स पर बैठ कर उसे ध्यान से देखने लगी। अपने हाॅथों में ग्लव्स पहन कर उसने उस लाल रंग की चीज़ को उठा लिया। अभी वह उसे ध्यान से देख ही रही थी कि फाॅरेंसिक टीम का एक ब्यक्ति उसके नज़दीक आकर बोला__"मैडम, यहाॅ पर एक बेसमेंट भी है।"

"क्या??" रितू चौंकी।

"यस मैडम।" उस ब्यक्ति ने कहा__"खोजी कुत्ते के द्वारा पता चला है।"

" चलो दिखाओ।" रितू तुरंत ही उठकर चल दी। कुछ देर में ही वो ब्यक्ति रितू को लेकर उस जगह पहुॅचा। रितू ने देखा सचमुच वो तहखाना ही था। किन्तु वह ये देख कर चौंकी कि वह अस्त ब्यस्त हुआ लग रहा था जैसे किसी चीज़ से उसे उड़ाया गया हो। उसे तुरंत ही अपने हाॅथ में ली हुई चीज़ का खयाल आया। उसने अपने हाॅथ में ली हुई चीज़ को उस ब्यक्ति को दिखाकर पूछा__"इस चीज़ को देखो और बताओ ये क्या है?"

"अजयययययय।" अचानक ही एक ज़ोरदार चीख फिज़ा को चीरती हुई सबके कानों से टकराई।

चीख बाहर से आई थी, रितू के साथ साथ सबने सुना किन्तु रितू बाहर की तरफ ये कह कर दौड़ पड़ी कि__"माॅम।"

यकीनन ये चीख प्रतिमा की ही थी। रितू ने बाहर आकर देखा उसकी माॅ और अभय चाचा उसके डैड के पास अजीब हालत में बैठे थे। अजय सिंह जमीन में पड़ा था। अभय ने तुरंत ही उसे अपनी गोंद मे लिटा लिया था।

"माॅम।" रितू करीब पहुॅचते ही बोली__"ये क्या हुआ? डैड इस तरह जमीन में कैसे?"

"पता नहीं बेटा अचानक ही खड़े खड़े धड़ाम से गिर गए।" प्रतिमा ने रोते हुए कहा__"शायद फैक्टरी की ये हालत देख इन्हें गहरा सदमा लगा है जिसके चलते ये चक्कर खाकर गिर गए हैं।"

अजय सिंह पानी से सनी राख पर गिरा था। जमीन में हर तरफ छोटे बड़े पत्थर भी पड़े थे जो अजय सिंह के सिर पर लगे थे और उसके सिर से खून बहने लगा था।

"इन्हें हास्पिटल लेकर जाना पड़ेगा रितू बेटा।" अभय ने कहने के साथ ही अजय सिंह को दोनो हाथों से पकड़ कर उठा लिया और तेज़ कदमों के साथ लोहें वाले गेट से बाहर निकल गया।

"मैं भी उनके साथ हास्पिटल जा रही हूं बेटी।" प्रतिमा ने कहा__"तुझे अपनी ड्यूटी करना है तो कर या तू भी अपने डैड के साथ चल।"

"साॅरी माॅम।" रितू की आॅख में आॅसू आ गए__"इस वक्त मैं आनड्यूटी पर हूॅ और केस के सिलसिले में यहाॅ अपनी टीम्स के साथ हूॅ इस लिए मैं डैड के साथ नहीं जा सकती। लेकिन डैड से कहना कि मुझे उनकी इस हालत से बहुत तकलीफ हो रही है।"

"अच्छी बात है।" प्रतिमा ने कहा और बाहर की तरफ दौड पड़ी। जबकि अपने आॅसू पोंछते हुए रितू पलटी और फैक्टरी के अंदर की तरफ बढ़ गई।
 
"मैडम ये तो किसी टाइम बम्ब के टुकड़े जैसा लगता है।" रितू के आते ही फारेंसिक टीम के उस आदमी ने कहा।

"क्या???" रितू उछल पड़ी__"ये क्या कह रहे हैं आप??"

"जी पक्के तौर पर तो नहीं कह सकता मगर ज्यादातर संभावना यही है।" उस आदमी ने कहा__"और अगर इस संभावना को सच मान लिया जाय तो ऐसा भी लगता है कि किसी टाइम बम्ब द्वारा ही इस बेसमेंट को उड़ाया गया है। बेसमेंट की हालत इस बात का सबूत है मैडम।"

रितू को उस आदमी की बात में सच्चाई के ढेर सारे अंश महसूस हुए। क्योकि बेसमेंट की हालत सचमुच ऐसी थी जैसे उसे बम्ब के द्वारा उड़ाया गया हो।

"अगर ऐसा है तो।" रितू ने कहा__"ये साबित हो गया कि फैक्टरी में लगी आग महज सार्ट शर्टिक से नहीं बल्कि किसी के द्वारा बम्ब से लगाई गई।"

"बिलकुल।" उस आदमी ने कहा।

"मतलब साफ है कि किसी ने टाइम बम्ब को तहखाने में फिट किया।" रितू कह रही थी__"और वो बम्ब अपने निर्धारित समय पर फट गया। बम्ब के फटते ही बेसमेंट उड़ गया और इसके साथ ही उसके अंदर से तेज़ी से आग का झोंका बाहर आकर यहाॅ चारो तरफ फैले कपड़ों और मशीनों से टकराया। कपड़ों पर लगी आग ने तेज़ी से अपना काम किया और देखते देखते सारी फैक्टरी में आग ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।"

"निःसंदेह।" आदमी ने कहा__"और क्योंकि फैक्टरी बाहर से अवकाश के चलते बंद थी इस लिए जब तक किसी को पता चलता तब तक आग ने उग्र रूप धारण कर सबकुछ बरबाद कर दिया।"

"बेसमेंट के अंदर की क्या पोजीशन है?" रितू ने कहा__"अगर अंदर जाने लायक है तो चलकर जाॅच शुरू करते हैं। देखते हैं और क्या पता चलता है?"

कहने के साथ ही रितू और वो आदमी बेसमेंट के अंदर की तरफ देखने लगे। बेसमेंट के अंदर पुलिस और फाॅरेंसिक के कुछ लोग थे। रितू भी उनके बीच पहुॅच गई।

उधर अजय सिंह को आनन फानन में अभय ने कार में पिछली सीट पर प्रतिमा की गोंद में लिटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार स्टार्ट की। लगभग बीस मिनट बाद वो सब हास्पिटल में थे।

अजय सिंह को तुरंत ही एक रूम में ले जाया गया और डाक्टर ने उसका चेकअप शुरू कर दिया।

शाम होने से पहले पहले अजय सिंह को हास्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया था। डाॅक्टर ने बताया था कि अजय सिंह को किसी गहन चिन्ता तथा किसी सदमे की वजह से चक्कर आया था। बाॅकी उन्हें कोई बीमारी नहीं है। हास्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद अजय सिंह अपनी पत्नी प्रतिमा तथा छोटे भाई अभय के साथ सीधा हवेली ही आ गया था। फैक्टरी में हो रही छानबीन का क्या नतीजा निकला ये उसे पता नहीं था। हलाॅकि उसका पीए और बाॅकी स्टाफ फैक्टरी में ही थे। हास्पिटल से हवेली लौटते समय सारे रास्ते अजय सिंह ख़ामोश रहा। अभय सिंह कार को ड्राइव कर रहा था जबकि अजय सिंह व प्रतिमा कार की पिछली सीट पर बैठे थे।

प्रतिमा ने इस समय अभय की मौजूदगी में अजय सिंह से कुछ भी पूॅछना उचित नहीं समझा था इस लिए वह भी चुप ही रही। ये अलग बात है कि उसके दिलो दिमाग़ में विचारों का बवंडर चल रहा था।

हवेली पहुॅच कर वो सब कुछ देर ड्राइंग रूम में बैठे रहे। अभय सिंह थोड़ी देर बाद अपने घर की तरफ चला गया। अजय सिंह व प्रतिमा का बेटा शिवा इस वक्त हवेली में नहीं था।

सोफे पर बैठा अजय सिंह खामोश था किन्तु अब उसके चेहरे पर गहन सोच और चिन्ता के भाव फिर से नुमायाॅ होने लगे थे। उसका ध्यान फैक्टरी में हो रही छानबीन पर ही लगा हुआ था।

"इस तरह चिन्ता करने से कुछ नहीं होगा अजय।" प्रतिमा अपने सोफे से उठकर अजय वाले सोफे पर उसके करीब ही बैठ कर बोली__"अब जो होना है वो तो होकर ही रहेगा। हलाॅकि मैं ये नहीं जानती कि ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से तुमने अपनी ये हालत बना ली है किन्तु इतना ज़रूर समझ गई हूॅ कि ये चिन्ता या ये सदमा सिर्फ फैक्टरी में आग लगने से हुए नुकसान बस का नहीं है, बल्कि इसकी वजह कुछ और ही है।"

अजय सिंह कुछ न बोला, बल्कि ऐसा लगा जैसे उसने प्रतिमा की बात सुनी ही न हो। वह पूर्वत उसी तरह सोफे पर बैठा रहा। जबकि उसके चेहरे की तरफ ग़ौर से देखते हुए तथा उसके दोनो कंधों को पकड़ कर झिंझोड़ते हुए प्रतिमा ने ज़रा ऊॅचे स्वर में कहा__"होश में आओ अजय, क्या हो गया है तुम्हें? प्लीज मुझे बताओ कि ऐसी कौन सी बात है जिसकी चिन्ता से तुमने खुद की ऐसी हालत बना ली है?"

प्रतिमा के इस प्रकार झिंझोड़ने पर अजय सिंह चौंकते हुए गहन सोच और चिन्ता से बाहर आया। उसने अजीब भाव से अपनी पत्नी की तरफ देखा फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव बदले।

"इस छानबीन को होने से रोंक लो प्रतिमा।" अजय सिंह भर्राए से स्वर में कहता चला गया__"अपनी बेटी से कहो कि वह फैक्टरी की छानबीन न करे, वर्ना सब कुछ बरबाद हो जाएगा। ये सब रोंक लो प्रतिमा, मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूॅ। प्लीज रोंक लो अपनी बेटी को।"
 
प्रतिमा हैरान रह गई अपने पति का ये रूप देख कर। किसी के सामने न झुकने वाला तथा किसी से न डरने वाला और न ही किसी से हार मानने वाला इंसान इस वक्त दुनिया का सबसे कमज़ोर व दीन हीन नज़र आ रहा था। प्रतिमा को कुछ पल तो समझ ही न आया कि वह क्या करे किन्तु फिर तुरंत ही जैसे उसे वस्तुस्थित का आभास हुआ।

"कैसे इस सबको रोंकूॅ अजय?" प्रतिमा ने अधीरता से कहा__"तुमने तो मुझे कुछ बताया भी नहीं कि बात क्या है? आज तक अपनी हर बात मुझसे शेयर करते रहे मगर ऐसी क्या बात थी जिसे तुमने मुझसे कभी शेयर करने के बारे में सोचा तक नहीं? क्या तुम ये समझते थे कि तुम्हारी किसी बात से मुझे कोई ऐतराज़ होता? या फिर तुम ये समझते थे कि मैं तुम्हें किसी काम को करने से रोंक देती?? तुम जानते हो अजय कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूॅ तथा ये भी जानते हो कि तुम्हारे कहने पर दुनियाॅ का हर नामुमकिन व असंभव काम करने को तुरंत तैयार हो जाती हूॅ, फिर वो काम चाहे जैसा भी हो। मगर इसके बावजूद तुमने मुझसे कोई बात छुपाई अजय। क्यों किया तुमने ऐसा?"

"मुझे माफ कर दो प्रतिमा।" अजय सिंह ने प्रतिमा के दोनो हाॅथों को थाम कर कहा__"मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई। तुम चाहो तो इस सबके लिए मुझे जो चाहे सज़ा दे दो लेकिन इस सबको रोंक लो प्रतिमा...वर्ना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मैं अपनी ही बेटी की नज़रों में गिर जाऊॅगा, उसका और उसके कानून का मुजरिम बन जाऊॅगा।"

"ऐसी क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने झुॅझलाकर कहा__"आखिर तुम कुछ बताते क्यों नहीं? जब तक मुझे बताओगे नहीं तो कैसे मुझे समझ आएगा कि आगे क्या करना होगा मुझे?"

"क्या बताऊॅ प्रतिमा।" अजय सिंह ने हताश भाव से कहा__"और किन शब्दों से बताऊॅ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"

"भला ये क्या बात हुई अजय?" प्रतिमा ने उलझ कर कहा__"जो जैसा है उसे वैसा ही बताओ न।"

अजय सिंह ने एक गहरी साॅस ली। अंदाज़ ऐसा था उसका जैसे किसी जंग के लिए खुद को तैयार कर रहा हो।

"मुझसे वादा करो प्रतिमा।" सहसा अजय सिंह ने प्रतिमा का हाॅथ अपने हाॅथ में लेकर कहा__"कि मेरे द्वारा सब कुछ जानने के बाद तुम मुझसे न तो नाराज़ होओगी और ना ही मुझे ग़लत समझोगी।"

"ठीक है मैं वादा करती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा__"अब बताओ क्या बात है??"

"म मैं अपने इस बिजनेस के साथ साथ ही।" अजय सिंह ने धड़कते दिल के साथ कहा__"एक और बिजनेस करता हूॅ प्रतिमा लेकिन वो बिजनेस गैर कानूनी है।"

"क क्या????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी__"य..ये तुम क्या कह रहे हो अजय? तुम गैर कानूनी बिजनेस भी करते हो??"

"मुझे माफ कर दो प्रतिमा।" अजय सिंह ने भारी स्वर में कहा__"पर यही सच है। मैं शुरू से ही इस धंधे में था।"

प्रतिमा आश्चर्यचकित अवस्था में मुह और आॅखें फाड़े अजय सिंह को देखे जा रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अजय सिंह गैर कानूनी काम भी करता है। कुछ देर तक वह अवाक् सी देखती रही उसे फिर एक गहरी साॅस लेते हुए गंभीरता से बोली__"क्यों अजय क्यों...आख़िर क्या ज़रूरत थी तुम्हें ऐसा काम करने की? तुम्हें तो पता था कि ऐसे काम का एक दिन बुरा ही नतीजा निकलता है। फिर क्यों किया ऐसा?? आखिर किस चीज़ की कमी रह गई थी अजय जिसके लिए तुम्हें गैर कानूनी काम भी करना पड़ गया??"

"ये सब मेरी ही ग़लती से हुआ है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"मेरी ही महत्वाकांछाओं के चलते हुआ है। मैं हमेशा इसी ख्वाहिश में रहा कि मेरे और मेरे बच्चों के पास धन दौलत व ऐश्वर्य की कोई कमी न हो। मेरा एक बहुत बड़ा नाम हो और सारी दुनियाॅ मुझे पहचाने। इसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था, इस बारे में कभी नहीं सोचा कि मेरी इन चाहतों से कभी मुझे ऐसा भी दिन देखना पड़ सकता है।"
 
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