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एक नया संसार

फ्लैशबैक अब आगे_______

विजय सिंह खाना पीना खा कर अपने कमरे में लेटा हुआ था। उसके दिलो दिमाग़ से आज की घटना हट ही नहीं रही थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी माॅ समान भाभी उसके साथ इतनी गिरी हुई तथा नीचतापूर्ण हरकत कर सकती है। उसकी ऑखों के सामने वो दृश्य बार बार आ रहा था जब प्रतिमा ने उसके लंड को अपने मुह में लिया हुआ था। विजय सिंह अपनी ऑखों के सामने इस दृश्य के चकराते ही बहुत अजीब सा महसूस करने लग जाता था। उसके मन में अपनी भाभी के प्रति तीब्र घृणा और नफ़रत भरती जा रही थी।

उधर अजय सिंह और प्रतिमा को ये डर भी सता रहा था कि विजय सिंह आज की इस घटना का ज़िक्र कहीं किसी से कर न बैठे। हलाॅकि उसकी फितरत के हिसाब से उन दोनो को यही लग रहा था कि वो इस बारे में किसी से कुछ कहेगा नहीं। पर कहते हैं न कि अपराध का बोध अगर स्वयं को हो तो उसका दिमाग़ एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। वही हाल प्रतिमा व अजय सिंह का था। दोनो ने फैसला कर लिया था कि कल ही अपने बच्चों को लेकर शहर चले जाएॅगे। जब ये घटना पुरानी हो जाएगी तो फिर उस हिसाब से देखा जाएगा।

रात को सारे कामों से फुरसत हो कर गौरी ऊपर अपने कमरे में पहुॅची। बच्चे क्योंकि अब बड़े हो गए थे इस लिए वो सब अब अलग कमरों में सोते थे। निधि हमेशा की तरह अपने भइया विराज के साथ ही सोती थी।

गौरी जब कमरे में पहुॅची तो विजय सिंह को बेड पर पड़े हुए किसी गहरी सोच में डूबा हुआ पाया। वो खद भी पिछले काफी दिनों से महसूस कर रही थी कि विजय सिंह काफी उदास व परेशान सा रहने लगा है। उसके द्वारा पूछने पर भी उसने कुछ न बताया था।

"पिछले कुछ दिनो की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही परेशान नज़र आ रहे हैं आप।" गौरी ने बेड के किनारे पर बैठते हुए किन्तु विजय के चेहरे पर देखते हुए कहा___"मैं जब भी आपसे इस परेशानी की वजह पूछती हूॅ तो आप टाल जाते हैं विजय जी। क्या आप पर मेरा इतना भी हक़ नहीं कि मैं आपके मन की बातें जान सकूॅ?"

"ऐसा क्यों कहती हो गौरी?" विजय ने चौंक कर कहा था___"तुम्हारा तो मुझ पर सारा हक़ है। मेरे दिल में और मेरे मन में भी। लेकिन, कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिन्हें अगर ज़ुबान से बाहर निकाल दी जाएॅ तो कयामत आ जाती है। तुम्हारे पूछने पर हर बार मैं टाल देता हूॅ, यकीन मानो मुझे तुम्हारी बातों का जवाब न दे पाने पर बेहद दुख होता है। पर मैं क्या करूॅ गौरी? मैं चाह कर भी वो सब तुम्हें बता नहीं सकता।"

"अगर आप बताना नहीं चाहते हैं विजय जी तो कोई बात नहीं।" गौरी ने गंभीरता से कहा___"मैं तो बस इस लिए जानना चाहती थी कि मैं आपको इस तरह उदास और परेशान नहीं देख सकती। हर वक्त सोचती रहती हूॅ कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से आपके चेहरे का वो नूर खो गया है जो इसके पहले दमकता था।"

"समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।" विजय ने गहरी साँस ली___"ये तो बदलता ही रहता है और बदलते हुए इस समय के साथ ही इंसान से जुड़ी हर चीज़ भी बदलने लगती है।"

"आपने कहा कि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें अगर ज़ुबान से बाहर निकाल दी जाएॅ तो कयामत आ जाती है।" गौरी ने कुछ सोचते हुए कहा___"मेरे मन में ये जानने की तीब्र उत्सुकता जाग गई है कि ऐसी भला कौन सी बातें हैं जिनके बाहर आ जाने से कयामत आ सकती है? मैं तो आपकी धर्म पत्नी हूॅ, हमारे बीच आज तक किसी का कोई राज़ राज़ नहीं रहा फिर क्या बात है कि आज कोई बात मेरे सामने राज़ ही रख रहे हैं?"

"मैं जानता हूॅ गौरी कि जब तक तुम उस बात को जान नहीं लोगी तब तक तुम्हारे मन को शान्ति नहीं मिलेगी।" विजय सिंह ने गंभीरता से कहा___"इस लिए मैं तुम्हें वो सब बता ही देता हूॅ लेकिन उससे पहले तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा।"

"वचन??" गौरी के माॅथे पर बल पड़ा___"कैसा वचन चाहते हैं आप मुझसे?"

"यही कि जो कुछ मैं तुम्हें बताने वाला हूॅ उस बात को कभी किसी से कहोगी नहीं।" विजय सिंह ने कहा___"वो सारी बात हम दोनो के बीच ही रहेगी। यही वचन चाहिए तुमसे।"

"ठीक है विजय जी।" गौरी ने कहा__"मैं आपको वचन देती हूॅ कि आपके द्वारा कही गई किसी भी बात का ज़िक्र मैं कभी किसी से नहीं करूॅगी।"

गौरी के वचन देने पर विजय सिंह कुछ पल तक उसे देखता रहा फिर एक लम्बी व गहरी साँस लेकर उसने वो सब कुछ गौरी को बताना शुरू कर दिया। उसने गौरी से कुछ भी नहीं छुपाया। शुरू से लेकर आज तक की सारी राम कहानी उसने गौरी को विस्तार से बता दी। उसके मुख से ये सब बातें सुन कर गौरी की हालत किसी निर्जीव पुतले की मानिन्द हो गई। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसे इन सारी बातों पर ज़रा सा भी यकीन न हो रहा हो।

"आज की इस घटना ने तो मुझे अंदर से बुरी तरह हिला कर रख दिया है गौरी।" विजय सिंह ने कहा___"समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूॅ मैं? मैं सोच भी नहीं सकता था कि वो कुलटा औरत मेरे साथ इतनी नीच और घटिया हरकत भी कर सकती थी।"

"ये सब मेरी वजह से हुआ है विजय जी।" गौरी ने नम ऑखों से कहा___"अगर मैं बीमार ना होती तो कभी भी वो औरत खेतों में आपको खाने का टिफिन देने न जा पाती। आज तो मैं खुद ही आपको खाना लेकर आने वाली थी लेकिन उसने ही मुझे जाने नहीं दिया। कहने लगी कि अभी मुझे और आराम करना चाहिये। भला मैं क्या जानती थी कि उसके मन में क्या खिचड़ी पक रही थी?"

"इसका चरित्र तो निहायत ही घटिया है गौरी।" विजय सिंह ने कहा__"ये बहुत शातिर औरत है। इसी ने मेरे भाई को अपने रूप जाल में फॅसाया रहा होगा। मेरे भइया तो ऐसे नहीं हैं। वो बस इसकी बातों में ही आ जाते हैं।"

"आपके बड़े भाई का चरित्र भी कुछ ठीक नहीं है विजय जी।" गौरी ने कहा___"हो सकता है कि आपको मेरी इस बात से बुरा लगे मगर सच्चाई तो यही है कि आपके बड़े भाई साहब खुद भी आपकी भाभी की तरह ही चरित्रहीन हैं।"

"ये क्या कह रही हो तुम गौरी?" विजय सिंह ने हैरतअंगेज लहजे में कहा___"बड़े भइया के बारे में तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?"

"मैने आज तक आपसे उनके बारे में यही सोच कर नहीं बताया था कि आपको बुरा लगेगा।" गौरी ने कहा___"पर आज जब आपने अपनी भाभी के चरित्र का वर्णन किया तो मैंने भी आपको आपके भाई के चरित्र के बारे में बताने का सोच लिया।"

"आख़िर ऐसा क्या किया है बड़े भइया ने तुम्हारे साथ?" विजय सिंह का लहजा एकाएक ही कठोर हो गया, बोला__"मुझे सबकुछ साफ साफ बताओ गौरी।"

गौरी ने विजय सिंह को शुरू से लेकर अब तक की बात बता दी। सुन कर विजय सिंह ठगा सा बैठा रह गया बेड पर। ऑखों में आश्चर्य के साथ साथ दुख के भाव भी नुमायां हो गए थे।
 
"पहले मुझे लगा करता था कि ये सब शायद मेरा वहम है।" गौरी धीर गंभीर भाव से कह रही थी___"पर धीरे धीरे मुझे समझ आ गया कि ये वहम नहीं बल्कि सच्चाई है। जेठ जी की नीयत में ही खोट है। वो अपने छोटे भाई की बीवी पर ग़लत नीयत से हाॅथ डालना चाहते हैं।"

"ये सब तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया गौरी?" विजय सिंह ने कहा___"भगवान जानता है कि मैंने कभी भूल से भी अपने बड़े भाई व भाभी का कभी बुरा नहीं सोचा। बल्कि हमेशा उन्हें राम और सीता समझ कर उनका मान सम्मान किया है। मगर मुझे क्या पता है कि ये दोनो राम व सीता जैसे कभी थे ही नहीं। मैं कल ही बाबू जी से इस बारे में बात करूॅगा। ये कोई मामूली बात नहीं है जिसे चुपचाप सहन करते रहें। हमारे आदर सम्मान देने को वो लोग हमारी कमज़ोरी समझते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा। माॅ बाबू जी को इस बात का पता तो चलना ही चाहिए कि उनका बड़ा बेटा और बड़ी बहू कैसी सोच रखते हैं?"

"नहीं विजय जी।" गौरी बुरी तरह घबरा गई थी, बोली___"भगवान के लिए शान्त हो जाइये। आप ये सब माॅ बाबू जी से बिलकुल भी नहीं बताएॅगे। बड़ी मुश्किल से तो उन्हें ऐसा दिन देखने को मिला है जब उनके बड़े बेटे और बहू खुशी खुशी हम सबसे मिल जुल रहे हैं। इस लिए आप ये सब उनसे बताकर उन्हें फिर से दुखी नहीं करेंगे।"

"क्यों न बताऊॅ गौरी?" विजय सिंह ने आवेश में कहा___"ये ऐसी बात नहीं है जो अगले दिन खत्म हो जाएगी बल्कि ऐसी है कि ये आगे चलती ही रहेगी। जब किसी का मन इन बुरी चीज़ों से भर जाता है तो वो ब्यक्ति किसी के लिए फिर अच्छा नहीं सोच सकता। अभी तो ये शुरूआत है गौरी। जब आज ये हाल है तो सोचो आगे कैसे हालात होंगे?"

"सब ठीक हो जाएगा विजय जी।" गौरी ने समझाने वाले भाव से कहा___"आप बस उनसे दूर रहियेगा। माॅ बाबूजी से आप इस सबका ज़िक्र नहीं करेंगे।"

"ज़िक्र तो होगा गौरी।" विजय सिंह ने निर्णायक भाव से कहा___"अब तो रात काफी हो गई है वरना अभी इस बात का ज़िक्र होता। मगर सुबह सबसे पहले इसी बात का ज़िक्र होगा।"

"आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे।" गौरी ने कहा___"आपको हमारे राज की कसम है विजय जी आप माॅ बाबू जी से उनके बारे में कुछ भी नहीं कहेंगे।"

"मेरे बेटे की कसम देकर तुमने ये ठीक नहीं किया गौरी।" विजय सिंह असहाय भाव से कहा था।

"मुझे माफ कर दीजिए विजय जी।" गौरी ने नम ऑखों से कहा___"पर आपको भी तो सोचना चाहिए था न। सोचना चाहिये था कि इस सबसे माॅ बाबू जी पर क्या गुज़रेगी जब उन्हें ये पता चलेगा कि उनका बड़ा बेटा और बड़ी बहू क्या करतूत कर रहे हैं?"

विजय सिंह कुछ न बोला बल्कि बेड पर एक तरफ करवॅट लेकर लेट गया। गौरी को समझते देर न लगी कि विजय सिंह उससे नाराज़ हो गया है। आज जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था कि विजय सिंह गौरी से नाराज़ हो गया था।

कुछ देर गौरी उसे एकटक देखती रही फिर वह भी उसके बगल में लेट गई। ऑखों में ऑसू थे और मन में बस एक ही बात कि मुझे माफ कर दीजिए विजय जी।

सुबह जब गौरी की नीद खुली तो बगल में विजय सिंह को न पाया उसने। वह समझ गई कि हर दिन की तरह विजय सिंह खेतों पर चले गए हैं। मगर तुरंत ही उसे रात की बायों का ख़याल आया। वह एकदम से हड़बड़ा गई। उसे आशंका हुई कि विजय सिंह कहीं अपनी कसम तोड़ कर माॅ बाबू जी से वो सब बताने तो नहीं चले गए? ये सोच कर गौरी झट से बेड से उठी। अपनी सारी को दुरुस्त करके वह बिना हाॅथ मुॅह धोए ही कमरे से बाहर निकल गई।

नीचे आकर देखा तो सब कुछ सामान्य था। उसे कहीं पर भी कुछ महसूस न हुआ कि जैसे कुछ बात हुई हो। ये देख कर उसने राहत की साँस ली। मन में खुशी के भाव भी जागृत हो गए, ये सोच कर कि विजय जी ने बेटे की कसम नहीं तोड़ी।

हवेली के मुख्य द्वार की तरफ जाकर उसने बाहर लान में देखा तो चौंक पड़ी। बाहर अजय सिंह प्रतिमा व उसके बच्चे सब कार में बैठ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो लोग शहर जा रहे हों। गौरी को समझते देर न लगी कि वो लोग इतना जल्दी क्यों यहाॅ से शहर जा रहे हैं। हर बार तो ऐसा होता था कि जब भी उसके जेठ व जेठानी शहर जाते थे तब वह उनके पाॅव छूकर आशीर्वाद लेती थी। मगर आज उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि दरवाजे से तुरंत ही पलट गई वह, ताकि किसी की नज़र न पड़े उस पर। जेठ जेठानी के लिए उसके मन में नफरत व घृणा सी भर गई थी अचानक। वह पलटी और वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
 
वर्तमान अब आगे________

रितू विधी से मिलने के बाद शाम को अपने घर हवेली पहुॅची। विधी की कहानी और उसकी बातों ने उसे सच में अंदर तक हिला दिया था। वह प्यार मोहब्बत जैसी चीज़ों को बकवास ही मानती थी। किन्तु विधी से मिलने के बाद उसे इस प्यार मोहब्बत की अहमियत समझ आई थी। उसे समझ आया कि कैसे लोग किसी के प्यार में इस क़दर पागल से हो जाते हैं कि अपने महबूब की खुशी के लिए वो कोई भी काम किस हद से बाहर तक कर सकते हैं। विधी से मिलकर और उसके प्यार की सच्चाई व गहराई को जानकर उसे एहसास हुआ कि आज के युग में भी अभी ऐसे लोग हैं जो प्यार के लिए क्या नहीं कर डालते?

विधी की हालत और उसके प्यार की दास्तां ने रितू के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया था। एक तेज़ तर्रार लड़की जो खुद को किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं समझती थी आज विधी की असलियत ने उसके दिल को छू लिया था। उसके हृदय में विधी के प्रति पीड़ा जाग गई थी और जिस पीड़ा ने उसकी ऑखों से ऑसू छलका दिये थे।

वह आज तक नहीं समझ पाई और ना ही कभी समझने की कोशिश की कि क्यों वह अपने चाचा चाची के लड़के विराज से नफ़रत करती थी? क्यों उसने कभी उससे बात करना ज़रूरी नहीं समझा? क्यों उसने हमेशा विराज को अपना भाई नहीं समझा? आख़िर क्या अपराध किया था उसने उसके साथ? जहाॅ तक उसे याद था जब कभी भी विराज उससे बात किया था तो बड़ी इज्ज़त से किया था। हमेशा उसे दीदी और आप कह कर संबोधित करता था।

विधी से मिलने के बाद रितू हवेली में जाकर सीधा अपने कमरे में बेड पर लेट गई थी। उसकी माॅ ने तथा उसकी छोटी बुआ नैना ने उससे बात करना चाहा था मगर उसने सबको ये कह कर अपने पास से वापस लौटा दिया था कि वह कुछ देर अकेले रहना चाहती है।

बेड पर पड़ी हुई रितू ऊपर छत के कुंडे पर लगे हुए पंखे को घूर रही थी अपलक। उसकी ऑखों के सामने विधी का वो रोता बिलखता हुआ चेहरा और उसकी वो करुण बातें घूम रही थी।

"मेरी आपसे एक विनती है दीदी।" फिर विधी ने अलग होकर तथा ऑसू भरी ऑखों से कहा।

"विनती क्यों करती है पागल?" रितू का गला भर आया___"तू बस बोल। क्या कहना है तुझे?"

"मु मुझे एक बार।" विधी की रुलाई फूट गई, लड़खड़ाती आवाज़ में कहा___"मुझे बस ए एक बार वि..विरा...ज से मिलवा दीजिए। मुझे मेरे महबूब से मिलवा दीजिए दीदी। मैं उसकी गुनहगार हूॅ। मुझे उससे अपने किये की माफ़ी माॅगनी है। मैं उसे बताना चाहती हूॅ कि मैं बेवफा नहीं हूॅ। मैं तो आज भी उससे टूट टूट कर प्यार करती हूॅ। उसे बुलवा दीजिए दीदी। मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा अगर दम निकले तो उसकी ही बाहों में निकले। मेरे महबूब की बाॅहों में दीदी। आप बुलवाएॅगी न दीदी? मुझे एक बार देखना है उसे। अपनी ऑखों में उसकी तस्वीर बसा कर मरना चाहती हूॅ मैं। अपने महबूब की सुंदर व मासूम सी तस्वीर।"

"बस कर रे।" रितू का हृदय हाहाकार कर उठा___"मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं तेरी ऐसी करुण बातें सुन सकूॅ। मैं तुझसे वादा करती हूॅ कि तेरे महबूब को मैं तेरे पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगी विधि और उसे ढूॅढ़ कर तेरे सामने हाज़िर कर दूॅगी। मैं अभी से उसका पता लगाती हूॅ। तू बस मेरे आने का इंतज़ार करना।"

ये सब बातें रितू की ऑखों के सामने मानो किसी चलचित्र की तरह बार बार चलने लगती थी। जितनी बार ये दृष्य उसकी ऑखों के सामने से गुज़रता उतनी बार रितू के अंदर एक हूक सी उठती और उसके समूचे अस्तित्व को हिला कर रख देती।

"क्या सचमुच प्यार ऐसा होता है विधी?" रितू ने सहसा करवॅट बदल कर मन ही मन में कहा___"क्या सचमुच प्यार में लोग अपने महबूब की खुशी के लिए इस हद से बाहर तक गुज़र जाते हैं? तुम्हें देख कर और तुम्हारी बातें सुन कर तो ऐसा ही लगता है विधी। तुम सच में बहुत महान हो विधी। मेरे उस भाई से तुमने इस हद तक प्यार किया जिस भाई से मैं बात तक करना अपनी शान के खिलाफ़ समझती थी। और एक वो था कि हमेशा मुझे इज्ज़त देता था, मुझे दीदी कहते हुए उसका मुह नहीं थकता था। जब भी वो मुझसे बात करने की कोशिश करता तो हर बार मैं उसे दुत्कार देती थी। मुझे याद है विधी, जब मैं उसे दुत्कार कर भगा देती थी तब उसकी ऑखों में ऑसू होते थे। जिन्हें वह ऑखों से छलकते नहीं देता था बल्कि उन्हें ऑखों में ही जज़्ब कर लेता था। मैने तेरे विराज को बहुत दुख दिये हैं विधी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।"

एकाएक ही रितू की ऑखों से ऑसू छलक कर उसके कपोलों को भिगोने लगे। सहसा जैसे उसे कुछ याद आया। वह तुरंत ही बेड से उठी और तेज़ी से बगल में दीवार से सटी हुई आलमारी के पास पहुॅची। उसने आलमारी का हैण्डल घुमाया लेकिन वो न घूमा। मतलब साफ था कि आलमारी लाॅक थी।

रितू दूसरी साइड रखे एक टेबल की तरफ बढ़ी और उसकी कबड को खोल कर उसमें से एक चाभी का गुच्छा निकाला। गुच्छा लेकर वह तुरंत आलमारी के पास वापस पहुॅची और गुच्छे से एक चाभी को चुन कर उसने आलमारी के की-होल पर डाल कर घुमाया। आलमारी एकदम से अनलाॅक हो गई। रितू ने हैण्डल पकड़ कर घुमाया और फिर आलमारी के दोनो फटकों को दोनो साइड खोल दिया।

आलमारी के अंदर कई सारे पार्ट्स थे जिनमें कुछ पर कपड़े व कुछ पर कुछ किताबें व फाइलें रखी हुई थी। किन्तु रितू की नज़र उन सब पर नहीं बल्कि आलमारी के अंदर मौजूद एक और लाॅकर पर थी। उसने एक दूसरी चाभी से उस लाकर को खोला। उसके अंदर भी कुछ काग़जात जैसे ही थे। एक प्लास्टिक का डिब्बा था। रितू ने उन काग़जातों को एक ही बार में सारा का सारा बाहर निकाल लिया।

उन सबको निकाल कर वह पलटी और बेड पर उन सभी काग़जातों को फैला दिया। उनमें कुछ रसीदें थी, कुछ एग्रीमेंट जैसे काग़जात थे और कुछ लिफाफे थे। रितू ने झट से एक लिफाफा उठा लिया। उसे खोल कर देखा तो उसमें कुछ फोटोग्राफ्स थे। रितू ने लिफाफे से सारे फोटोग्राफ्स निकाल लिये और फिर एक एक कर देखने लगी। पाॅच छः फोटोग्राफ्स को देखने के बाद रितू एक दम से रुक गई। एक फोटोग्राफ्स पर उसकी नज़र जैसे गड़ सी गई थी। कुछ देर देखने के बाद उसने बाॅकी सारे फोटोग्राफ्स को बेड पर गिरा दिया और बस एक फोटोग्राफ्स को लिए वह बेड पर एक साइड बैठ गई।

फोटोग्राफ्स में उसके माॅम डैड, नीलम, शिवा एवं वह खुद भी थी। किन्तु रितू की नज़र उन सबके पीछे कुछ दूरी पर खड़े विराज पर टिकी हुई थी। ये फोटोग्राफ्स कुछ साल पहले का था। हवेली में कोई कार्यक्रम था तब ही शहर से किसी फोटोग्राफर को बुलवाया गया था और ये तस्वीरें खींची गई थी। अन्य तस्वीरों में बाॅकी सबकी तस्वीरें थी लेकिन विजय सिंह गौरी व उनके बच्चों की कोई तस्वीरें नहीं थी। इस तस्वीर में भी ग़लती से ही विराज की फोटो आ गई थी। रितू को याद आया कि शिवा बार बार विराज से इस बात पर लड़ पड़ता था कि वो उसके साथ फोटो न खिंचवाए। मगर उत्सुकतावश वो आ ही जाता था।
 
"वि..राज मेरे भाई।" रितू ने अपने एक हाॅथ से तस्वीर में विराज के चेहरे पर हाॅथ फेरा। उसकी ऑखों से ऑसू बह चले, बोली__"मैं जानती हूॅ कि तुझे भाई कहने का भी मुझे कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। मगर बस एक बार मुझे मिल जा भाई। अपनी इस दीदी के लिए नहीं बल्कि अपनी उस विधी के लिए जिसे तू आज भी उतना ही प्यार करता होगा मैं जानती हूॅ। मुझे पता है कि आज भी अगर तू मुझे मिल जाए तो तू मुझे उतनी ही इज्ज़त से के साथ दीदी कहेगा जैसे पहले कहा करता था। और सच कहूॅ तो मुझे नाज़ है तुझ पर कि मेरा भाई है। एक मेरा है जिसने मुझे इज्ज़त तो दी लेकिन उसकी उस इज्ज़त में भी कितनी इज्ज़त होती है ये मुझसे बेहतर भला और कौन जानता होगा भाई। पर ये तो मेरी सोच और मेरे नसीब की बात है मेरे भाई कि जिसने मुझे सच में इज्ज़त दी उसे मैने हमेशा दुत्कारा और जिसकी इज्ज़त में भी गंदगी भरी थी उसे अपने सीने से लगा कर भाई कहा। ख़ैर, ये सब छोड़ भाई। ये बता कि कहाॅ है तू? मुम्बई में ऐसी कौन सी जगह पर है जहाॅ से मुझे तेरा पता मिल जाए? मैने तेरी विधी से वादा किया है भाई कि मैं उसके सामने तुझे ले आऊॅगी। इस लिए भाई मुझे किसी तरह से मिल जा।"

रितू उस तस्वीर से जाने क्या क्या कहे जा रही थी मगर भला वो तस्वीर उसको विराज का पता कैसे बताती?

"मैने कभी इस बात पर ग़ौर नहीं किया भाई कि क्यों मेरे अंदर तेरे लिए ये नफ़रत थी? क्यों मैं तुझसे हमेशा मुह मोड़ लेती थी?" रितू करुण भाव से कह रही थी___"इसकी वजह शायद ये हो सकती है कि बचपन से ही मेरे माॅम डैड ने मुझे और मेरे भाई बहनों को तुझसे और तेरे माता पिता व बहन से दूर ही रहने की शिक्षा दी। वो हमेशा हमें यही बताते थे कि तुम लोग अच्छे लोग नहीं हो। बचपन से हमें यही सब सिखाया पढ़ाया गया था भाई, इस लिए हम भी उनके कहे अनुसार तुम लोगो से दूर ही रहे। और जब चाची पर वो सब इल्जाम लगा और उन्हें हवेली से निकाल दिया गया तो हम बच्चों के मन में और भी ये बात बैठ गई कि तुम लोग वाकई में अच्छे लोग नहीं हो। मगर आज जब मैंने विधी से उसके और तुम्हारे प्यार के बारे में जाना तो जाने क्यों ऐसा लगा कि तुम उतने बुरे तो नहीं हो सकते मेरे भाई जितना कि आज तक हम तुम्हें समझते आ रहे थे। अगर होते तो कोई भी लड़की तुम्हारे लिए प्यार में इस हद तक अपनी कुर्बानी नहीं देती। इंसान की बुराई कभी किसी से नहीं छिपती भाई। अगर तुम वास्तव में बुरे होते तो क्या ये बात विधी को कभी पता न चलती? ज़रूर चलती भाई, मगर ऐसा नहीं था। वो पागल तो कह रही है कि वो तुम्हारी ही बाॅहों में अपनी आख़िरी साँस लेना चाहती है। आख़िर कुछ तो खूबी होगी ही न तुझमें भाई। मैने कभी तुझे समझा ही नहीं भाई...मुझे माफ़ कर दे विराज।"

रितू उस तस्वीर को अपने सीने से लगा कर रोए जा रही थी। इस वक्त उसे इस हालत में देख कर कोई नहीं कह सकता था कि ये वही तेज़ तर्रार रितू है जो अकेले चार चार हट्टे कट्टे लड़कों धूल चटा देती है। हौंसले ऐसे बुलंद कि आसमान की बुलंदी भी क्या चीज़ है।

तभी उसका मोबाइल बजा। उसने देखा बेड के एक साइड पर रखे आईफोन की स्क्रीन पर कोई नम्बर फ्लैश कर रहा था। रितू ने फोन उठाया और काल रिसीव कर उसे कनपटी से सटा कर कहा___"हैलो।"

"..............." उधर से कुछ कहा गया।

"ये क्या कह रहे हो तुम?" रितू के चेहरे पर चेहरे पर चौंकने वाले भाव थे।

"..............." उधर से फिर कुछ कहा गया।

"पूरी बात बताओ साफ साफ।" रितू ने कहा।

".............." उधर से कुछ देर तक बताया गया।

"ओह चलो ठीक है।" रितू ने कहा__"तुमने बहुत अच्छा काम किया है। अब एक काम और तुम्हें दे रही हूॅ। और वो काम क्या है ये तुम्हें तुम्हारे फोन पर मेरे द्वारा भेजे गए मैसेज से पता चल जाएगा। सारे काम छोंड़ कर तुम्हें ये काम करना है। तुम्हारे पास सिर्फ और सिर्फ आज रात बस का समय है। कल मार्निंग में मेरी ऑख तुम्हारे फोन करने पर ही खुले। ये बात भूलना मत।"

रितू ने कहा और फोन काट दिया। उसने बेड पर बिखरे हुए काग़जातों की तरफ देखा और फिर उसकी नज़र विराज वाली तस्वीर पर पड़ी। उस तस्वीर को एक तरफ रख कर बाॅकी सारी चीज़ें उसने उठा कर वापस उसी लाॅकर के अंदर रख दी और आलमारी बंद कर दी। विराज वाली तस्वीर को तकिये के नीचे सरका वह बेड से नीचे उतरी और अपने कपड़े उतारने लगी। कुछ ही देर में वह सिर्फ पैन्टी और ब्रा में थी। कपड़े उतारने में उसे थोड़ी तक़लीफ हुई थी। क्योंकि पीठ पर चाकू का लछा चीरा आज ही का तो था। वह ब्रा पैन्टी में किसी हालीवुड की सुपर माॅडल से कम नहीं लग रही थी। उसने तुरंत ही बाथरूम की तरफ रुख़ किया। बाथरूम से फ्रेश होने के बाद वह पुनः कमरे में आई और दूसरे कपड़े पहन कर वह कमरे से बाहर निकल गई। बेड से मोबाइल फोन उठाना नहीं भूली थी वह। पीछे साइड कमर में सर्विस रिवाल्वर छुपा हुआ था उसके।

कुछ ही देर में वह डायनिंग हाल में पहुॅच कर एक कुर्सी पर बैठ गई।

"माॅम अगर खाना रेडी हो तो जल्दी से दे दीजिए मुझे।" उसने किचेन की तरफ मुह करके ज़रा ऊॅची आवाज़ में कहा था।

"बस दो मिनट बेटी।" किचेन से प्रतिमा की आवाज़ आई।

ठीक दो मिनट बाद ही रितू के सामने बड़ी सी टेबल पर एक थाली रख दी गई। थाली लाने वाली नैना थी।

"तो अकेले रहने से उकता गई हमारी पुलिस वाली रितू बेटी?" नैना ने ज़रा मुस्कुराते हुए कहा था।
 
"कुछ चीज़ों के लिए तन्हाॅई सबसे अच्छी होती है बुआ।" रितू ने रोटी का एक निवाला तोड़ते हुए कहा___"अगर यही तन्हाई हमें काटती है तो यही तन्हाई कभी कभी हमें बड़ा सुकून भी देती है।"

"ओहो क्या बात कही है तुमने।" नैना ने हैरानी से कहा___"इतनी गहरी बात यूॅ ही तो तुम्हारे दिमाग़ में नहीं आई होगी? आई नो कुछ तो वजह है इसकी। इस लिए अगर उचित समझो तो अपनी इस बुआ को बताओ फिर।"

"ज़रूर बताऊॅगी बुआ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"पर आज नहीं। पहले मैं खुद भी तो इसकी वजह समझ लूॅ। आख़िर मुझे भी तो समझ आए कि इतनी गहरी बात मेरे दिमाग़ में आई कैसे? क्योंकि ये सब बातें तो उनके ही दिमाग़ में आती हैं जो ज़रा गंभीर तबीयत का होता है फिर सबसे अलग रहना पसंद करता है।"

"ओहो अनादर वन।" नैना मुस्कुराई___"सच सच बता किसी लड़के से कोई चक्कर वक्कर तो नहीं चल गया? वैसे जहाॅ तक मैं तुझे समझती हूॅ तो ऐसा प्वासिबल है नहीं। कोई पागल ही होगा जो तुमसे प्यार का राग अलापेगा। वरना अपने हाॅथ पैर की हड्डियाॅ तो सबको प्यारी ही होती हैं।"

"व्हाट डू यू मीन बुआ?" रितू की ऑखें फैल गई___"मतलब आप ये समझती हैं कि मैं कोई बैंडिड क्वीन हूॅ जो किसी की भी हड्डियाॅ तोड़ दूॅगी?"

"अरे तुम तो नाराज़ हो गई मेरी डाल।" नैना ने हॅस कर कहा___"मेरा वो मतलब नहीं था रे। आई वाज जस्ट किडिंग डियर।"

"कोई बात बेवजह ही मुख से नहीं निकला करती बुआ।" रितू सहसा गंभीर हो गई__"हर बात के पीछे उसका कोई न कोई मतलब भी छिपा होता है। और ये बात भी आपने मेरे कैरेक्टर को देख कर ही कही है। मैं मानती हूॅ बुआ कि मुझे लड़के लड़कियों के बीच की ये चोंचलेबाज़ी शुरू से ही पसंद नहीं थी मगर ये भी सच है बुआ कि मेरे सीने में भी एक दिल है। जो धड़कना जानता है। उसको भी ये एहसास होता है कि प्यार क्या है और नफ़रत क्या है?"

नैना कुछ बोल न सकी बल्कि आश्चर्य से रितू को देखती रह गई। उसे अहसास हुआ कि उसकी बड़ी भतीजी आज गंभीर है। और शायद बहुत ज्यादा गंभीर है। पर किस लिए ये उसे समझ न आया।

"क्या बातें हो रही हैं बुआ भतीजी के बीच ज़रा मुझे भी बताओ?" प्रतिमा ने किचेन से आते हुए कहा था।

"कुछ नहीं माॅम।" रितू ने सहसा सामान्य होकर कहा___"बुआ पूछ रही थी कि अब रात में मैं कहाॅ जा रही हूॅ?"

"क्या???" प्रतिमा तो चौंकी ही लेकिन नैना उससे ज्यादा चौंकी थी, जबकि प्रतिमा ने कहा___"तुम इस वक्त अब कहाॅ जा रही हो?"

"कुछ ज़रूरी काम है माॅम।" रितू ने सामान्य भाव से कहा___"आप तो जानती हैं कि पुलिस की नौकरी में किसी भी वक्त कहीं भी जाना पड़ जाता है।"

"मुझे तो तुम्हारा ये पुलिस की नौकरी करना शुरू से ही नापसंद था बेटी।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"मगर मेरी बात मानता ही कौन है यहाॅ? जिसे जो करना है करे।"

"शुरू से आपकी और डैड की बात मानते ही तो आ रहे हैं माॅम।" रितू के मुह से जाने ये कैसे निकल गया__"अब अगर एक काम मैने अपनी खुशी से कर लिया तो क्यों ऐतराज़ हो गया आपको?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा ने हैरानी से ऑखें फैला कर कहा___"और ये किस लहजे में बात कर रही हो तुम? दिमाग़ तो सही है ना तुम्हारा?"

"पता नहीं माॅम।" रितू ने हाॅथ धोते हुए अजीब भाव से कहा___"कभी कभी सोचती हूॅ कि इसी हवेली के अंदर कभी परिवार के सारे लोग कितना हॅसी खुशी से रहा करते थे। मगर जाने ऐसा क्या हो गया कि आज इस हवेली में सिर्फ हम रह गए। बाॅकियों को ये ज़मीन खा गई या फिर आसमान निगल गया कुछ समझ ही नहीं आया आजतक?"

"आज ये क्या हो गया है तुझे?" प्रतिमा की हवा निकल गई थी अंदर ही अंदर, बोली__"ये कैसी फालतू की बातें कर रही है तू?"

"कमाल है न माॅम?" रितू ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आज आपको अपनी ही बेटी की बात फालतू लग रही है। सुना है कि कोई अगर ग़लती कर दे तो उसे आख़िर में माफ़ ही कर दिया जाता है। मगर कुछ ऐसे भी बेचारे बदनसीब होते हैं जिनको कोई माफ़ भी नहीं करता। सुना तो ये भी है माॅम कि परिवार अगर किसी कारण से एक दूसरे से अलग हो जाता है या बिखर जाता है तो परिवार के मुखिया हर संभव यही प्रयास करता है कि उसका बिखरा हुआ परिवार फिर से जुड़ जाए। कदाचित तभी एक सच्चे मुखिया के दिल को सुकून मिलता है। कहते हैं कि हर परिवार के बीच कभी न कभी कोई न कोई अनबन हो ही जाती है मगर उसका मतलब ये तो नहीं होता न कि फिर उनसे हर रिश्ता ही तोड़ लिया जाए? या फिर उस अनबन को दूर ही न किया जाए।"

"तू आख़िर कहना क्या चाहती है?" प्रतिमा ने तीखे भाव से कहा___"क्या चल रहा है तेरे मन में? अगर कोई बात है तो उसे साफ साफ कह। यूॅ घुमा फिरा कर कहने का क्या मतलब है तेरा?"

"जाने दीजिए माॅम।" रितू कुर्सी से उठते हुए बोली___"मैं क्या कह रही हूॅ वो आप समझ तो गई ही हैं न? फिर साफ साफ कहने की क्या ज़रूरत है? ख़ैर चलती हूॅ माॅम। बाय डियर बुआ जी।"

"बाय बेटा।" नैना ने रुॅधे हुए गले से कहा। उसकी ऑखों में ऑसू तैर रहे थे।

"पुलिस की नौकरी क्या करने लगी इसका सारा दिमाग़ ही ख़राब हो गया है।" प्रतिमा भुनभुनाते हुए टेबल से थाली उठाते हुए कहा___"पता नहीं कहाॅ से ऐसी बेकार की बातें सीख कर आती है ये?"

"सच ही तो कह रही थी वो।" नैना ने गंभीरता से कहा___"भला ऐसा किस परिवार में होता है भाभी कि अगर परिवार में किसी से कोई ग़लती हो जाए तो उसे कभी माफ़ ही न किया जाए? कितनी खुशियाॅ थी इस घर में। हम सब कितना हॅसी खुशी से रहते थे सबके साथ। परिवार में सबकी एकता को देख कर माॅ बाबूजी कितना खुश थे। मगर आज इस घर में न वो खुशियाॅ हैं और न ही खुशियाॅ फैलाने वाला परिवार का कोई बाॅकी सदस्य। विजय भइया की मौत क्या हुई मानो इस घर से खुशियाॅ ही चली गई। माॅ बाबू जी आज भी कोमा से बाहर नहीं आए। अगर कोई पूछे कि इस सबका जिम्मेदार कौन है तो किसका नाम लिया जाए?"
 
"अभी एक यही राग अलाप कर गई है और अब तुम भी यही राग अलापने लगी नैना?" प्रतिमा की भृकुटी तन गई__"और ये क्या कह रही हो तुम कि इस सबका जिम्मेदार कौन है और किसका नाम लिया जाए? इस बात का क्या मतलब हुआ? क्या तुम ये कहना चाहती हो कि इस सबके जिम्मेदार हम हैं?"

"मैने ऐसा तो नहीं कहा भाभी।" नैना ने अधीरता से कहा___"पर एक बात तो सही है न कि जो परिवार का बड़ा सदस्य होता है उसे सबको एक साथ में लेकर चलना चाहिए? घर के मुखिया तो अजय भइया और आप ही हैं। गाॅव समाज के लोग तो यही कहेंगे न कि छोटे अगर नासमझ थे या कोई ग़लती कर रहे थे तो ये बड़े का फर्ज़ था कि छोटे को उसकी ग़लती पर एक बार माफ़ ही कर देना चाहिये था। लोग तो कहेंगे न भाभी कि किसी ग़लती की इतनी बड़ी सज़ा नहीं देना चाहिए कि छोटे से हर रिश्ता तोड़ कर उसे घर से बेदखल ही कर दिया जाए।"

"कुछ ग़लतियाॅ ऐसी होती हैं नैना जिनके लिए कोई मुआफ़ी नहीं होती।" प्रतिमा ने ठोस लहजे में कहा___"बल्कि अगर उन ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो उससे सब कुछ बरबाद हो जाता है। तुम्हारे भइया ने क्या नहीं किया इस परिवार के लोगों को एक करने के लिए मगर हुआ क्या? नैना, हमारी अच्छाईयाॅ और कुर्बानियाॅ कोई नहीं देखेगा बल्कि सिर्फ यही देखेगा कि हम परिवार को एक नहीं कर पाए।"

"कल पड़ोस की वो कमला भाभी मुझे मिली थी आते वक्त।" नैना ने कहा___"मुझे देख कर उसने आवाज़ दी मुझे। उससे थोड़ी देर बातें हुई। उसकी बातों का असल मुद्दा हमारे परिवार से ही था।"

"क्या कह रही थी वो?" प्रतिमा के कान खड़े हो गए।

"कह रही थी कि मझली ठकुराईन(गौरी) तो ऐसी थी ही नहीं।" नैना ने कहा___"वो दोनो मियां बीवी तो बड़े धर्मात्मा इंसान थे। दूर दूर तक उनकी अच्छाई और उनके उच्च आचरण की चर्चा होती थी। आज भी कोई यकीन नहीं करता कि मझली ठकुराइन ने ऐसा कोई नीच काम अपने जेठ के साथ किया होगा।"

"उस कलमुही को क्या पता?" प्रतिमा ने सहसा गुस्से में कहा___"वो क्या यहाॅ देखने आई थी कुतिया? जबकि मैने अपनी ऑखों से देखा है। पहले भी कई बार मैने गौरी को ऐसे ही चोरी चोरी अजय के कमरे में जाते देखा था। मैने इस बारे में अजय से भी बताया था और अजय से ये भी कहा था कि उससे दूर रहना। पति मर गया है तो अब उससे अपने जिस्म की गरमी बर्दास्त ही नहीं हो रही है। इसी लिए अब वो मेरे पति पर डोरे डाल रही है। एक दिन तो मैने अपने कमरे ही उसे सारी उतारे हुए अपने भोसड़े में उॅगली करते हुए पकड़ लिया था। वो तो अच्छा था कि मैं कमरे में पहुॅच गई थी वरना अगर कहीं तुम्हारे भइया पहुॅच गए होते तो क्लेश ही हो जाना था उस दिन। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि गौरी को उसकी इस नीच हरकत करने से कैसे रोंकूॅ? किसी से कह भी नहीं सकती थी। क्योंकि कोई मेरी बातों का यकीन ही नहीं करता। उल्टा मुझ पर ही दोषारोपण लग जाता। इस लिए मैने सोचा कि इस बार जब गौरी ऐसी कोई हरकत करेगी तो मैं उसकी इस नीचता का सबूत तैयार करूॅगी। अजय शिवा के लिए एक कैमरा लाए थे। कुछ दिन बाद ही मुझे फिर से गौरी की हरकत का पता चल गया। मैं जब कमरे में गई तो अंदर से आवाजें आ रही थी। मैने कमरे को हल्का अंदर की तरफ धकेल कर देखा तो गौरी अजय के ऊपर चढ़ी हुई थी। जबकि अजय उसे डाॅटे जा रहे थे और उसे अपने से दूर कर रहे थे। मैने सोचा इससे बड़ा सबूत और क्या होगा। मैं तुरंत शिवा के कमरे में गई और उसका कैमरा उठा लाई। अपने कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने अंदर चल रहे काण्ड की फोटो खींची। मैं और भी फोटो खींचना चाहती थी। मगर कैमरे में रील खत्म हो चुकी थी। शायद शिवा ने पहले ही सारी रील खत्म कर दी थी। शुकर था लास्ट की एक बची थी। उसमें एक ही फोटो खींची मैने। उसके बाद फिर मैं अंदर गई और उस गौरी की चुटिया पकड़ कर उसे अजय के ऊपर से खींच कर नीचे लाई। मैं बहुत गुस्से में थी इस लिए पहले मैने उसे वहीं पर पीटा फिर बाहर लेकर आई। साली कितनी कमीनी और निर्लज्ज थी कि वैसा नीच काम करने के बाद भी उल्टा यही बोले जा रही थी कि मैने कुछ नहीं किया मुझे फॅसा रहे हैं ये सब मिलकर। तो ये थी उस जलील और कुलटा औरत की करतूत।"
 
नैना प्रतिमा की ये लम्बी चौड़ी बात सुन कर हैरान नहीं हुई क्योंकि ये बात प्रतिमा पहले भी सबसे बता चुकी थी। पर उसे न पहले उसकी बात पर यकीन था और ना ही आज यकीन हो रहा था। मगर वो इसके खिलाफ़ कुछ कह नहीं सकती थी। क्योंकि उसके खिलाफ़ कुछ बोलने के लिए भी कोई न कोई आधार के रूप में सबूत चाहिए था जो कि उसके पास भला कैसे हो सकता था। नैना और सौम्या दोनो बहनों को तो ये सब बाद में बताया गया था।

"ये बात तो वो कमला भाभी भी कह रही थी कि मझली ठकुराईन को जान बूझ कर फॅसाया गया था।" नैना ने कहा___"वो कह रही थी गाॅव का हर ब्यक्ति यही कहता है कि उन्हें फॅसाया गया था।"

"भला उसे कोई क्यों फॅसाएगा नैना?" प्रतिमा ने झुॅझला कर कहा___"वो हमारी कोई दुश्मन तो नहीं थी और ना ही हमारा उससे कोई बैर था। फिर भला उसे क्यों कोई जान बूझ कर फॅसाएगा? गाॅव के लोगों को तो बस बातें बनाना आता है नैना। ये किसी के भी बारे में अच्छा नहीं सोच सकते।"

"ख़ैर जाने दीजिए भाभी।" नैना भला अब क्या कहती___"सब कुछ समय पर छोड़ दीजिए। जो जैसा करेगा वो उसका फल तो पाएगा ही।"

"ये अजय अब तक नहीं आए।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"वो भी आ जाते तो हम सब मिल कर डिनर कर लेते।"

"आते ही होंगे भाभी।" नैना ने कहा___"फैक्टरी को रिन्यू कराने में काफी ब्यस्त हैं वो आजकल।"

इनके बीच बस ऐसी ही थोड़ी देर बातें होती रही। कुछ देर बाद ही अजय सिंह आ गया था।

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उस वक्त रात के नौ बजे थे जब रितू पुनः अपने फार्महाउस पर पहुॅची थी। लोहे वाले गेट पर दो बंदूखधारी ब्यक्ति खड़े। रितू की कार को देखते ही दोनो ने गेट को खोल दिया। गेट के खुलते ही रितू ने कार को गेट के अंदर की तरफ बढ़ा दिया और फिर वो सीधा पोर्च में ही रुकी। कार से बाहर आ कर रितू ने कार को लाॅक किया। तब तक वो दोनो बंदूखधारी भी आ गए।

"क्या समाचार है काका?" रितू ने एक से पूछा।

"समाचार बढ़िया है बिटिया।" काका ने कहा___"जैसा तुमने कहा था वैसा ही कर दिया है हमने। वो सब वहीं तहखाने मा रस्सी से बॅधे हुए हैं। कुछ देर पहले ही हम जाकर देखे थे तो सब होश में आ गए थे। सबने जब खुद को अजनबी जगह पर इस तरह रस्सियों से बॅधा हुआ पाया तो सब के सब रोने लगे बिटिया। हमका देख के पूछन लगे कि ये हमें कहाॅ ले आया गवा है और ई तरह रस्सी से काहे बाॅथा गवा है?"

"अच्छा, चलो फिर उनको जवाब भी दे देते हैं न काका।" रितू ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"क्या विचार है आपका?"

"हम तो एक ही बात जानत हैं बिटिया कि ऐसे ससुर के नातियों को बीच चौराहे पर नंगा करके गोली मार दैं।" काका ने गर्मजोशी से कहा___"ऐसे लोगन का जीयै का कौनव अधिकार नहीं है।"

"बात तो आपकी बिलकुल दुरुस्त है काका।" रितू ने कहा___"लेकिन ये तो बहुत आसान मौत होगी न उन सबके लिए?"

हाँ ई बात तो है बिटिया।" शंकर काका ने कहा___"तो फिर ऐसा करत हैं कि ससुरों को तड़पा तड़पा के मारते हैं।"

"शंकर काका ये तो आपने बिलकुल ठीक कहा।" रितू मुस्कुराई___"हरिया काका तो एक ही बार में गोली मार देने को कह रहे थे।"

"अरे ऊ ता हम जल्दबाज़ी मा अउर एकदम से गुस्से मा कह दिये रहे बिटिया।" हरिया काका ने झेंपते हुए कहा___"वरना ई बात ता हम ई सरवा शंकर से पहले ही कह देते।"

"चलो कोई बात नहीं काका।" रितू ने कहा__"अब तो कह दिये न आप? अब चलो उनको देखे ज़रा।"

"अउर कुछू साथ मा लेके चलैं का है का बिटिया?" हरिया काका झट बोल पड़ा था।

"और क्या ले चलना है भला?" रितू चकराई।

"अरे बाल्टी मा पानी ले चलत हैं ना बिटिया।" हरिया ने कहा__"ऊ का है ना, हमका अइसन लागत है कि उहाॅ जाइके तुम उन सबको बहुतै धुनाई करोगी। ता थुनाई मा कउनौ सारे बेहोश होई गै तो? उनका होश मा लाने की खातिर पानी ता चाहिए ना बिटिया।"

"क्या बात है काका।" रितू हॅस पड़ी___"क्या दिमाग़ लगाया है आपने। मानना पड़ेगा आपको। दिमाग़ बहुत तेज़ है आपका।"

 
रितू की प्रसंसा पाने से हरिया काका तन कर चलने लगा। वह शंकर को इस तरह देखने लगा था जैसे अब उसके सामने उसकी कोई औकात ही नहीं है। शंकर उसे इस तरह अकड़ते हुए चलते देख बुरा सा मुह बना कर रह गया।

"पर काका।" रितू ने कहा___"मुझे लगता है कि आपका ये दिमाग़ काकी की वजह से तेज़ हुआ है।"

"अरे का बात करती हो बिटिया?" हरिया काका ने नागवारी भरे भाव से कहा___"ऊ ससुरी तो शुरू से ही दिमाग़ से पैदल है। हमरे साथ रह रह के ही तो थोड़ा बहुत दिमाग़ आ गवा है उसमे।"

"ओए तूने भाभी जी को ससुरी बोला?" शंकर ने झड़प कर कहा हरिया से___"रुक अभी जा के बताता हूॅ उनसे।"

"अबे रुक जा बे खबीस।" हरिया काका की सारी अकड़ तेल लेने चली गई___"सरवा मरवाएगा का हमका?"

हाँ तो भाभी जी को ससुरी क्यों बोला?" शंकर अभी भी उसे घुड़कता बोला__"और क्या बोला कि तेरे साथ रह रह कर ही उनमें थोड़ा बहुत अकल आई है। साला झूॅठा कहीं का।"

"तू ना अब मुह बंद ही कर ले समझा।" हरिया भी ताव खा गया___"वरना उल्टा तुझे ही पिटवा दूॅगा मैं उस ससुरी से।"

"वो कैसे भला?" शंकर बुरी तरह हैरान।

"अरे हम कह देंगे कि ये शंकरवा तुझे कहत रहा कि अब भौजी ससुरी बुड्ढी होई गई है।" हरिया ने कहा___"अउर ये भी कह देंगे कि मोटी भैस जइसन होई गई है।"

"ओये ये मैने कब कहा?" शंकर परेशान।

"नहीं कहा ता का हुआ?" हरिया बोला__"हम ता कह देंगे न कि ई शंकरवा अइसनै कहत रहा।"

"देखा रितू बिटिया।" शंकर ने मानो रितू से गुहार लगाई___"ये जबरदस्ती मुझे अपनी जोरू से पिटवाना चाहता है।"

"चिन्ता मत कीजिए काका।" रितू ने कहा___"सिर्फ आप ही बस नहीं पिटेंगे बल्कि आपके साथ साथ हरिया काका भी काकी से पिटेंगे।"

"अरे ई का कहत हो बिटिया?" हरिया काका ने हड़बड़ा कर कहा___"हम भला काहे पिटेंगे ऊ ससुरी से?"

"वो इस लिए कि मैं काकी से बताऊॅगी कि काका आपको जब देखो तब दिमाग़ से पैदल और ससुरी ससुरी कहते रहते हैं।" रितू ने कहा___"आपकी तो कोई इज्ज़त ही नहीं करते ये दोनो। फिर देखना काका, कैसे आप दोनो का हाल बनाएॅगी काकी।"

"अरे हमका माफ़ कर दो बिटिया।" काका ने दोनो हाॅथ जोड़ लिए बोला___"ई सब ना ई शंकरवा की कारण होई जात है। वरना हम ता बिंदिया की बहुत इज्जत करत हैं। ऊ ता हमरी जान है, प्राण प्यारी है बिटिया।"

"अच्छा छोड़ो ये सब।" रितू ने कहा__"अब चलिये उन सबका हाल चाल भी तो देखना है।"

"ठीक है बिटिया चलो।" हरिया ने कहा और फिर वो रितू के पीछे चल दिया। जबकि शंकर लोहे वाले गेट की तरफ बढ़ गया।

कुछ ही देर में रितू और हरिया काका तहखाने में पहुॅचे। तहखाना काफी बड़ा था। वहाॅ पर सामान तो कुछ नहीं था बस ज़मीन पर सीलन जैसा प्रतीत होता था। दीवार के चारो तरफ बल्ब लगे हुए थे। एक तरफ की दीवार से सटे वो चारो रस्सी में बॅधे खड़े थे। सभी के हाॅथों को ऊपर करके बाॅधा गया था और पैरों को नीचे विश्राम की पोजीशन में चारों लड़कों के पैरों से जोड़ते हुए बाॅधा गया था। लेकिन उनमें से कोई भी अपने पैरों को हिला नहीं सकता था। दोनो तरफ की दीवारों पर एक एक तरफ से पैरों में बॅधी रस्सी को खींच कर बाॅधा गया था।

उन चारों की हालत बहुत ही अजीब हो गई थी। डर और दहशत से उन सभी का बुरा हाल था। पहले से ही रितू की मार से लहू लुहान थे वो चारो और अब इस डर व भय ने उनकी हालत खराब कर दी थी जाने वो यहाॅ कैसे और क्यों लाए गए हैं। ये तो वो भी समझ चुके थे कि उनके साथ कुछ बहुत ही बुरा होने वाला है।

तहखाने में दो तरफ के बल्ब जल रहे थे। इस लिए तहखाने में काफी रोशनी थी। पसीने तथपथ उन चारों के चेहरों को बखूबी देखा जा सकता था। रितू और हरिया काका जैसे ही तहखाने में पहुॅचे तो उन चारो ने उनकी आहट से अपनी अपनी गर्दन उठा कर सामने देखा। रितू पर नज़र पड़ते ही सबकी घिग्घी बॅध गई। चेहरे पर डर के मारे हल्दी सी पुत गई। जूड़ी के मरीज़ की तरफ एकदम से काॅपने लगे थे वो चारो।

"काका इन लोगों की खातिरदारी नहीं की क्या आपने?" रितू ने उन चारों को एक एक नज़र देखने के बाद हरिया से कहा था।

"अरे हमरा मन ता बहुत रहा बिटिया।" हरिया ने कहा___"लेकिन ऊ का है न हमका परमीशॅनवा ही मिला था। वरना हम ता इन ससुरन की अइसन पेलाई करते कि ई ससुरे यहीं पषर टट्टी कर देते।"

"चलो अच्छा हुआ काका जो मैने आपको परमीशन नहीं दी थी।" रितू ने कहा___"वर्ना अगर ये टट्टी कर देते तो साफ भी तो आपको ही करना पड़ता न?"

"अरे हाॅ बिटिया।" हरिया ने हैरानी से कहा___"ई ता हम सोचे ही नहीं। पर कउनव बात नहीं बिटिया। हम ता साफ न करते लेकिन ई सब ससुरे लोग जरूर साफ करते। अउर ना करते तो हम ई ससुरन का अउर अच्छे से पेलते।"

रितू ने हरिया की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया बल्कि वह ऑखों में आग लिए उन चारो की तरफ बढ़ी। उन सबकी हालत बड़ी ही दयनीय हो गई। उन सबकी टाॅगें इस तरह काॅपने लगी थी जैसे उन पर अब उनका कोई ज़ोर ही न रह गया हो।

"क्या सोचा था तुम सबने? रितू के मुख से शेरनी की सी गुर्राहट निकली___"इतने सारे गुनाह करके तुम सब बड़े मज़े में रहोगे?? कोई तुम्हारा बाल बाॅका कर ही नहीं सकता?"

"ह हमें माफ़ कर दो।" सूरज चौधरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हम किसी के साथ कोई भी ग़लत काम नहीं करेंगे अब।"

"करोगे तो तब जब करने के लिए ज़िंदा बचोगे।" रितू ने बर्फ की मानिन्द ठंडे स्वर में कहा___"अब तो तुम चारों का रिज़र्वेशन हो गया है नरक में जाने का। लेकिन चिन्ता मत करो क्योंकि नरक में यहाॅ से ज्यादा तुम लोगों को यातनाएॅ नहीं सहनी पड़ेगी।"

"नहीं नहीं।" रोहित बुरी तरह रो पड़ा__"हमें कुछ मत करो प्लीज़। हम मरना नहीं चाहते। आ आख़िर किस वजह से तुम हमारे साथ ये सब कर रही हो? हमें यहाॅ से जाने दो इंस्पेक्टर वरना तुम नहीं जानती कि हमें इस तरह यहाॅ बंधक बना कर रखने से तुम्हारा क्या अंजाम हो सकता है?"

"और तुम्हें भी ये अंदाज़ा नहीं है लड़के कि मैं तुम सबके बापों के साथ क्या कर सकती हूॅ?" रितू ने सहसा रोहित के सिर के बाल को मुट्ठी मे पकड़ कर खींचते हुए कहा___"अगर मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तुम्हारे बापों बीच चौराहे पर नंगा करके दौड़ाऊॅ। मगर फिलहाल ये बाद में अभी तो तुम सबके साथ ही हिसाब किताब करना है।"

"हरामज़ादी कुतिया साली हमारे बाप को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ाएगी तू।" सहसा सूरज चौधरी गुर्रा उठा___"एक बार मेरे हाॅथ पैर खोल दे फिर देख तेरा क्या हस्र करता हूॅ मैं?"

"देखा था सुअर की औलाद।" रितू नोंकदार बूट की ठोकर ज़ोर से सूरज के पेट में मारते हुए कहा। सूरज के मुख से हलाल होते बकरे की सी चीखें निकली जबकि रितू बोली__"उस दिन तेरी मर्दानगी भी देखी थी। तुम सबकी देखी थी। उसी का नतीजा है कि आज यहाॅ बॅधे पड़े हो।"

"हमें छोड़ दो इंस्पेक्टर।" किशन ने गुहार लगाते हुए कहा___"आख़िर हमने किया क्या है? किस लिए हमें यहाॅ लाकर हमारे साथ ये सब कर रही हो तुम?"

"काका, इसे पता ही नहीं है कि इसने किया क्या है?" रितू ने कहा___"ये साला ऐसा शरीफ बन रहा है बहनचोद जैसे इसने कभी किसी चींटी तक को चोंट न पहुॅचाई हो।"

"ज़ुबान सम्हाल कर बात करो इंस्पेक्टर।" सहसा सूरज कह उठा___"और याद रखो कि अगर हममें से किसी को भी कुछ हुआ तो उसका खामियाजा तुम्हें और तुम्हारे पूरे खानदान को भुगतना होगा।"

 
"मेरे खानदान की तू फिक्र मत कर।" रितू ने कहा___"मेरे खानदान तक जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि तेरे और तेरे बाप को कुत्ते की मौत मार देने के लिए मैं ही काफी हूॅ। तुम चारों को ऐसा तड़पा तड़पा कर मारूॅगी कि मौत की भीख माॅगोगे मगर मौत दूॅगी नहीं आसानी से।"

"पर ये तो बताओ इंस्पेक्टर।" अलोक वर्मा के तिरपन काॅप गए, बोला___"हमने ऐसा किया क्या है जिसके कारण तुम हमारे साथ ऐसा ब्यौहार कर रही हो?"

हाँ हाॅ बताती क्यों नहीं हमें?" किशन ने अलोक की बात में कहा___"हमें भी तो पता चले कि हमने ऐसा किया क्या है?"

"विधी चौहान याद है???" रितू ने अलोक का गिरहबान पकड़ कर झिंझोड़ा___"वही विधी चौहान जो तुम लोगों के साथ ही काॅलेज में पढ़ती थी, और जिसके साथ तुम चारों ने मिल कर गैंग रेप किया था? कुछ याद आया या फिर इतना जल्दी भूल गए सब?"

चारों के दिलो दिमाग़ में जैसे विष्फोट हुआ। दिमाग़ की बत्ती एक साथ सबकी जल उठी। अब समझ आया था उन्हें कि ये सब उनके साथ क्यों हो रहा था। सब कुछ समझ में आते ही चारों के चेहरे पीले पड़ गए। किसी के भी मुख से बोल न फूटा।

"किसी की बहन बेटियों की इज्ज़त से इस तरह खेलने का बहुत शौक है न?" रितू ने गुर्राते हुए कहा___"कितनी लड़कियों की ज़िंदगियाॅ बरबाद कर दी है तुम सब हराम के पिल्लों ने। उन सब लड़कियों की बरबादी का हिसाब देना होगा तुम लोगों को।"

"ये सब झूठ है।" सूरज पूरी शक्ति से चीखा था, बोला___"सरासर झूॅठ है इंस्पेक्टर। हम में से किसी ने भी उसके साथ कुछ नहीं किया। तुम बेवजह ही हमें इस तरह यहाॅ पकड़ कर ले आई हो। हमने कुछ नहीं किया। हमें छोड़ वरना बहुत पछताओगी तुम देख लेना।"

"तू साले रंडी की औलाद मुझे पछताने का बोल रहा है बहनचोद।" रितू ने सूरज के पेट में दो चार घूॅसे एक साथ ही जड़ दिये। सूरज बुरी तरह दर्द से बिलबिलाया था, जबकि रितू ने कहा___"तेरी भी एक बहन है न। मुझे सब पता है। तेरी बहन का नाम रचना चौधरी है न। सुना है वो बहुत ही जवान है। तू चिन्ता मत कर बहुत जल्द वो तेरे सामने यहीं पर होगी और तुम चारो खुद एक एक करके उसका रेप करोगे।"

"इंस्पेक्टर।" सूरज गीदड़ की तरह चीखा___"अगर तूने मेरी बहन को हाॅथ भी लगाया तो देख लेना।"

"क्यों पिछवाड़े में आग लगी क्या तेरे?" रितू ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ सूरज के गाल पर रसीद करते हुए कहा___"और जब तू दूसरों की बहन बेटियों को बरबाद करता तब क्या मज़ा आता है मादरचोद?"

"बिटिया हम का कहत हैं कि ये बाल्टी का पानी जो हम लेके आए हैं।" सहसा हरिया काका ने कहा___"ऊ का बेकार मा लेके आए हैं? हम ता सोचत रहे कि तुम इन ससुरों को मार मार कर बेहोश करती जाओगी अउर हम इन ससुरन का ई पानी से होश मा ले आते रहेंगे।"

"चिन्ता मत करो काका।" रितू गुर्राई__"बहुत जल्द ऐसा भी होने वाला है।

"फेर ता ठीक है बिटिया।" काका ने कहा___"अगर कहौ ता हमहू इन ससुरन का जी भर कै धुन देई? ऊ का है ना हमरा हाॅथ मा बहुतै खुजली होई रही है।"

"तो ठीक है काका आप ही अपने हाॅथ की खुजली मिटा लो।" रितू ने कहा___"मैं इन कुत्तों से कल मिलूॅगी। तब तक आप इनकी अच्छे से खातिरदारी करना। बस इतना याद रहे कि इनमें कोई भी मरने न पाए।"

"अइसनै होई बिटिया।" काका ने खुश होते हुए कहा___"हम ई ससुरन केर अम्मा चोद देब। तुम फिकर ना करो बिटिया। अब जाओ तुम इहाॅ से। अब ई.....डि...अरे बिटिया ऊ का कहत हैं एखा...? अरे हाॅ याद आई गा। अब ई डिपारटमेंट हमरा है। हाॅ डिपारटमेंट।"

"डिपारटमेंट नहीं काका उसे डिपार्टमेन्ट कहते हैं।" रितू ने मुस्कुराकर कहा।

"अरे हाॅ बिटिया उहै।" काका ने कहा___"तुम समझ गई हौ ना। ई है बहुत है।"

"अच्छा काका मैं चलती हूॅ।" रितू ने कहा__"आप सम्हाल लेना ओके?"

"अरे तुम कउनव चिन्ता न करा बिटिया ई ता हमरे बाएं हाथ का चीज है।" काका ने गर्व से कहा___"ई ससुरन का मार मार के हम इनकर टट्टी निकाल देब। अउर का।"

रितू हरिया काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने से बाहर निकल गई। जबकि रितू के जाते ही काका ने तहखाने का गेट बंद किया और फिर अपने दोनो हाॅथ मलते हुए रोहित मेहरा के पास पहुॅचा।

"का रे मादरचोद।" काका ने कहा___"तोरे केतनी अम्मा है अउर केतने बाप हैं?"

"तमीज़ से बात करो ओके।" रोहित डर तो गया था लेकिन फितरत के चलते बोल ही गया था।

"तोरी माॅ की चूत मारूॅ ससुरे के।" काका के हाॅथ में जो मोटा सा लट्ठ था उसने घुमा कर रोहित की टाॅग में ज़ोर से धमक दिया। रोहित दर्द से बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा। काका तो बहुत देर से सब्र किये बैठा था। उसे इस बात का बेहद गुस्सा भी था कि इन लोगों ने रितू उल्टा सीधा भी बोला था।

हरिया काका उन चारों पर पिल पड़ा। फिर तो तहखाने में बस रोने और चीखने की आवाज़ें ही आ रही थी। हरिया काका तब तक उन सबकी धुनाई करता रहा जब तक कि उसका पेट न भर गया था। धुनाई करने के बाद वह उन चारों को अधमरी हालत में छोंड़ कर तहखाने से बाहर चला गया और बाहर से तहखाने को लाॅक कर दिया।

 
फ्लैशबैक अब आगे______

गौरी अभी ये सब बता ही रही थी कि सहसा डोर बेल की आवाज़ से सबका ध्यान भंग हो गया। डोर बेल की आवाज़ से ही उन सबको ये एहसास हुआ कि समय कितना हो चुका था। वरना ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर बैठे हुए उन्हें समय का आभास ही न हुआ था। वो सब तो गौरी के द्वारा सुनाए जा रहे अतीत के किस्सों में ही डूबे हुए थे।

"लगता है कि जगदीश भाई साहब आ गए हैं।" गौरी ने गहरी साँस लेते हुए कहा__"जा गुड़िया दरवाज़ा खोल दे।"

"जी माॅ।" निधी ने भी गहरी साँस लेकर कहा और सोफे से उठ कर मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गई।

"रात के नौ बज गए हैं।" गौरी ने सामने दीवार पर लगी घड़ी पर देखते हुए कहा___"इस कहानी के चक्कर में रात का खाना बनाना भी रह गया अभय। चलो ये कहानी अब कल बताऊॅगी। अभी खाना बना लूॅ फटाफट। जगदीश भाई साहब को दस बजे तक खाना खाकर सो जाने की आदत है।"

"ठीक है भाभी आप जाइए।" अभय ने गंभीर भाव से कहा था। वो अभी भी उन अतीत के दृष्यों में खोया हुआ लगा। उसके ऐसा कहने पर गौरी उठ कर किचेन की तरफ बढ़ गई।

तभी ड्राइंगरूम में जगदीश ओबराय दाखिल हुआ। उसके पीछे पीछे ही निधी भी आ गई। जगदीश ओबराय की नज़र अभय सिंह पर पड़ी तो उसने बगल से रखे सोफे पर बैठे विराज की तरफ देखा।

"ये मेरे अभय चाचा जी हैं अंकल।" विराज ने जगदीश का आशय समझ कर कहा___"आज सुबह करीब ग्यारह बजे के आस पास आए हैं।"

"ओह ये तो बहुत अच्छी बात है।" जगदीश ओबराय के चेहरे पर खुशी के भाव नुमायां हुए, फिर उसने अभय की तरफ देखते हुए कहा___"कैसे हैं भाई साहब?"

अभय ने हल्की मुस्कान के साथ पहले उसे नमस्ते किया फिर बोला___"जी मैं ठीक हूॅ आप सुनाइये।"

"मैं तो बहुत ज्यादा ठीक हूॅ भाई साहब।" जगदीश ने हॅस कर कहा___"जब से ये बच्चे और गौरी बहन यहाॅ आए हैं तब से ज़िंदगी खुशहाल लगने लगी है। वर्ना इतने बड़े बॅगले में नौकर चाकर रहने के बाद भी अकेलापन ही महसूस होता था।"

"ऐसा क्यों कहते हैं आप?" अभय सिंह चौंका था___"इसके पहले अकेलापन क्यों महसूस होता था आपको?"

"अरे भाई अब मेरे सिवा मेरा कोई था ही नहीं तो अकेलापन महसूस तो होगा ही।" जगदीश ने कहा___"नसीब और भाग्य बहुत अजीब होते हैं। अच्छा खासा परिवार हुआ करता था मेरा। मगर फिर सब कुछ खत्म हो गया। धन दौलत तो नसीब से बहुत मिली हमें लेकिन उस दौलत को भोगने वालों को नसीब ने छीन लिया हमसे। जी जान से प्यार करने वाली बीवी थी, वो भी हमें छोंड़ कर इस फानी दुनियाॅ को अलविदा कह दिया। एक बेटा और बहू थे तो वो भी चले गए हमें छोंड़ कर। बस तब से अकेले ही थे। मगर फिर शायद भगवान को हमारे अकेलेपन पर तरस आ गया और उसने हमारे उजड़े हुए गुलशन में फिर से बहार लाने के लिए इन सबको भेज दिया। अब लगता है कि अपना भी कोई है।"

अभय सिंह जगदीश ओबराय की बातें सुन कर हैरान था। उसे याद आया कि विराज ने उससे कहा था कि ये सब अब अपना ही है। तो इसका मतलब वो सही कह रहा था। यानी मेरा भतीजा अब करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक है? अभय सिंह को यकीन नहीं हो रहा था मगर हक़ीक़त तो उसके सामने ही थी इस लिए यकीन करना ही पड़ा उसे। वह सोचने लगा कि उसका बड़ा भाई यानी अजय सिंह तो अक्सर यही कहता था कि विराज किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोता होगा। मगर भला वो भी कैसे ये कल्पना कर सकता था कि विराज आज के समय में कितना बड़ा आदमी बन चुका था। वह चाहे तो चुटकियों में उसे और उसकी पूरी प्रापर्टी को खरीद सकता था।

"ये सब भगवान की अजब लीला ही है भाई साहब।" फिर अभय सिंह ने गहरी साँस लेकर कहा___"वो जो कुछ भी करता है बहुत सोच समझ कर करता है। किस इंसान कब कहाॅ और किस चीज़ की ज़रूरत होती है वो उसे उस जगह पहुॅचा ही देता है। हम नासमझ होते हैं जो ये समझ बैठते हैं कि भगवान ने हमें दिया ही क्या है?"

हाँ ये बात तो है।" जगदीश ने कहा___"और सच पूछो तो भगवान की इस लीला से मैं खुश हूॅ भाई साहब। पहले ज़रूर उससे शिकायतें थी कि उसने मेरा सब कुछ छीन लिया मगर आज कोई शिकायत नहीं है। ये सब मुझे अपना समझते हैं। मुझे वैसे ही चाहते हैं जैसे कोई सगा अपनों को चाहता है। यूॅ तो इस दुनियाॅ में अपने भी अपनों के लिए नहीं होते। मगर कोई अजनबी भी ऐसा मिल जाता है जो अपनों से कम नहीं होता। चार दिन का जीवन है, इसे सबके साथ खुशी खुशी जी लो तो आत्मा तृप्त हो जाती है। क्या लेकर हम इस दुनियाॅ में थे और क्या लेकर जाएॅगे? ये धन दौलत तो सब यहीं रह जाएगी मगर हमारे कर्म ज़रूर हमारे साथ जाएॅगे।"

"आप ठीक कहते हैं भाई साहब।" अभय ने कहा___"आप तो वैसे भी किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं वरना कौन ऐसा है जो किसी ग़ैर को अपना सब कुछ दे दे?"

"अगर मैने अपना सब कुछ विराज बेटे को दे दिया है तो उससे मुझे मिला भी तो बहुत कुछ है भाई साहब।" जगदीश ने कहा___"मुझे वो मिला है जिसके लिए मैं वर्षों से तड़प रहा था। मैं किसी अपने के लिए तड़प रहा था, तथा अपनों के बीच रह कर जो खुशी मिलती है मैं उसके लिए तरस रहा था। आज मेरे पास ये सब खुशियाॅ है भाई साहब और ये सब मुझे किसी रिश्वत के चलते नहीं मिला है। बल्कि मेरे नसीब से मिला है। मैं तो विराज को बहुत पहले से अपनी सारी प्रापर्टी का वारिस बनाना चाहता था मगर ये ही मना कर रहा था। एक अच्छे व खुद्दार इंसान का बेटा जो था। किसी की ऐसी मेहरबानी को कबूल कैसे कर सकता था ये? मगर मैं चाहता था कि विराज ही मेरा वारिस बने। क्योंकि इसके चेहरे पर ही मुझे अपने बेटे की झलक दिखती थी। अगर ये मेरी बात नहीं मानता तो मैं इसके सामने अपनी झोली फैला कर भीख भी माॅग लेता भाई साहब।"

अभय सिंह जगदीश की ये सब बातें सुन कर चकित रह गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि दुनियाॅ कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है। ख़ैर इन दोनों के बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। कुछ समय बाद ही गौरी ने सबको खाने का कहा। सब डायनिंग हाल में आ गए और कुर्सियों में बैठ गए। गौरी ने सबको खाना सर्व किया। सबके खाने के बाद गौरी ने भी खाना खाया और फिर सब अपने अपने कमरे में सोने के लिए चल दिये। रास्ते में चलते समय विराज से गौरी ने पूछा___"तेरा काॅलेज कब से शुरू हो रहा है??"

"कल से माॅ।" विराज ने कहा___"कल सुबह मुझे थोड़ा जल्दी उठा दीजिएगा। ऐसा न हो कि पहले दिन ही मैं लेट हो जाऊॅ।"

"चल ठीक है।" गौरी ने कहा___"मैं तुझे भोर के समय पर ही उठा दूॅगी। अब जा आराम से सो जाना।"

गौरी के कहने पर विराज अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। उधर गौरी भी पलट कर अपने कमरे की तरफ चली गई।

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