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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete



मोना चौधरी ने दरवाजा ,खोला और भीतर प्रवेश करते हुए, दरवाजा बंद कर दिया । उसके चेहरे पर गंभीरता ठहरी हुई थी । उसकी सोचे चाकू , मंगलू और सतपाल के गिर्द घूम रही थी । उसने तो सोचा था कि मंगलू उसे फ्लैट के बाहर ही कहीं मिलेगा, परंतु वो कहीं भी नहीं नजर आया था ।

मोना चौधरी जानती थी कि मंगलू इस तरह खामोश नहीं बैठने बाला था ।

वो जल्दी ही कहीं पर, उससे मुलाकात करेगा ।

ये तो उसने सपने में भी नहीं था कि मंगलू उसके फ्लेट में छिपा, उसका इंतजार कर रहा है ।

मोना चौधरी का, विचार-नहाने का था । उसके बाद काफी लेने का ।

ज्यों ही मोना चौधरी पीछे वाले कमरे में पहुंची कि ठिठकुकर रह गई ।

सामने की कुर्सी पर मंगलू बैठा था ।

“तुम......." मोना चौधरी चौंकी ।

मंगलू कठोर निगाहों से उसे देखता रहा।

मोना चौधरी ने गहरी सांस ली-खुद को संभाला ।

"यहां क्या कर रहे हो तुम?" मोना चौधरी के स्वर में अब सतर्कता आगई थी। "

"तुम्हारा इंतजार मोना चौधरी ।"

"यहां से बाहर निकल जा !" दोबारा कभी इधर नहीं आना ।" मोना चौधरी के दांत भिंच गए । "

“ठीक कहा तुमने । मैं फिर से तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहता ।" मंगलू उठता हुआ बोला-----" वो चाकू मेरे हवाले कर दो, मैं यहां से चला जाता हूं । तुम्हें वो चाकू नहीं लेना चाहिए था ।"

" चाकू नहीं मिलेगा तुम्हे ?"

"वहम है तुम्हारा ।"

कुछ चुप रहकर मंगलू पूर्ववत् स्वर मे बोला ।

"वो चाकू शैतान के बेटे का है । तुम्हें हर हाल में चाकू वापस देना होगा । अगर तुमने ज्यादा एतराज उठाया तो तुम्हारी जान भी जा सकती है । बेहतर यहीं होगा कि चाकू मेरे हवाले कर दो ।"

"तुम फिर मेरे हाथों पिटना चाहते हो ?"

" पहले की बात और थी । तुमसे झगडा करने के लिए मैं तैयार नहीं था।" मंगलू ने कहा।

"मतलब कि अब तैयार होकर आए हो ।" मोना चौधरी का लहजा कडवा हो गया है . ,,

"तुम्हारी भला इसी में है की चाकू........ !"

"नहीं मिलेगा तुम्हें ।"

इसी पल मंगलू ने गुर्रा कर उसके ऊपंर छलांग लगा दी ।।

मोना चौधरी सतर्क थी ।

उसने फुर्ती से अपनी जगह छोडी और आगे जाते मंगलू की पीठ पर घूंसा जड़ दिया।

मगंलू फर्श पर लुढक गया ।

मोना चीथरी पलटी और मंगलू को देखने लगी ।

मंगलू संभला और मोना चौधरी को कहर-भरी नजरों से देखता कह उठा ।

"मैं अभी भी तुम्हें कम समझ रहा हूं लेकिन अब तुम मेरे हाथों से नहीं वचोगी ।"

मोना चौधरी वैसे ही खडी उसे देखती रही ।

मंगलू धीरे-धीरे सावधानी से मोना चौधरी की तरफ बढने लगा ।

एकाएक मोना चौधरी ने रिवॉल्वर निकाल ली ।

मंगलू ठिठका ।

"मेरी एक उंगली हिलेगी और तुम मर जाओगे रिवॉल्वर को जानते हो ना?"

" चाकू मुझे वापस दे दो !"

"यहां से बाहर निकल जा । दोबारा मेरे सामने पड़ा तो तेरी जान लिए बिना मानूंगी नही !"

" तू मेरे .......!"

"बाहर निकल जा, चल ड्राइंगरूम मे, दरवाजा खोल और निकल जा, वरना गोली मार दूंगी ।"

मंगलू दांत भिंचे पलटा और कमरे से निकलकर ड्राइंगरूम मे पहुचा ।

"मंगलू !" जंगला की फुसफुसाहट उसके कानों में पडी----"तू फिर बेबस होगया ।"

"क्या करूं ? उसने रिवॉल्वर पकड रखी है ।"

"जानता हूं रिवॉल्वर की गोली तेरे शरीर को नुकसान पहुचा देगी । दर्द देगी तेरे को ।"

" कया करूं मैं?"

तभी मोना चौधरी की आवाज मंगलू के कानों में पडी ।

"स्क क्यों गया मंगलू? बाहर निकल जा यहां से ।" मंगलूं धीमे ढंग से दरवाजे की तरफ़ बढा । "

"मैं आऊँ?" जंगला ने पूछा।

"आ जा !"

इसके बाद दो पल ही बीते होंगे कि मंगलू एकाएक फर्श पर गिरकर तड़पने लगा ।

मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े । रिवॉल्वर उसके हाथ में दबी थी ।

" मिनट-भर बीता कि मंगलू का शरीर शांत पड गया ।

मोना चौधरी सावधान थी कि मंगलू कोई ड्रामा न कर रहा हो ।

परंतु जब उसका शरीर शांत पड़ा और होंठों से झांग निकलते देखा तो मन-ही-मन चौकी ।

मिनट-भर और बीत गया । मंगलू के शरीर में जरा भी हरकत न हुई तो मोना चौधरी सावधानी से उसके पास पहुंचने लगी ।

“मंगलू ...!" मोना चौधरी ने पुकारा ।

मंगलू का शरीर वैसे ही पड़ा रहा।

मोना चौधरी कुछ और पास पहुंची ।

"मंगलू उठो…अपना चाकु ले लो ।"

परंतु मंगलू के शरीर में हरकत नहीं हुई ।

मोना उसके करीब जा पहुंची ।

यहीं चूक हो गई मोना चौधरी से ।

उसी क्षण मंगलू की आंखें खुली ओंर उसके शरीर ने तेजी से हरकत की ।

मंगलू के जूते की ठोकर मोना चौधरी कै रिवाल्वर वाले हाथ की कलाई पर पडी।

सच बात तो ये थी कि ये सब इतनी तेजी से हुआ कि मोना चौधऱी कुछ भी न समझ पाई।

रिवॉल्वर उसके हाथ से निकलकर छत से जा टकराईं और कोने में जा गिरी।

उसी पल मंगलू का शरीर रबड़ के पुतले की तरह उछला और उसके जूते की ठोकर उसके सिर पर पडी । मोना चौधरी के होठो से चीख निकली और सोफे टकराती वो नीचे जा गिरी ।

एक तो कलाई का दर्द ऊपर से ठोकर की बजह से घूमता सिर । मोना चौधरी ने अपने पर काबू पाने की चेष्टा की, परंतु सफ़ल नहीं हो सकी । बेदम-सी वहीं पड़ी रही ।

मगलू पास पहुंचा और मुट्ठी में मोना चौधरी के सिर के बालों को पकडकर भिंचता बोला ।

"चाकू दे मुझे ।"

नीचे पडी मोना चौधरी ने मंगलू की टांगे खींचनी वही, परंतु सफ़ल न हो सकी ।

मंगलू ने सिर के बाल छोड़े और उसकै सिर पर घूंसा मारा ।

मोना चौधरी पूरी तरह फर्श पर लुढ़कती चली गई बेहोश होगई।

उसी पल मंगलू लगा जैसे उसके भीतर से कोई चीज निकली ।

अगले ही पलं मंगेलू के कानो मे जंगला की फुसफुसाहट पड्री ।

"कैसा रहा मंगलू?"

"वहुत अच्छा ।"

" देखा, मैंने तीन वारों में ही मोना चौधरी को लुढका दिया ।"

"हां । तुममें सच से वहुत ताकत है ।"

 


" ऐसी ही ताकत वक्त बीतने के साथ तेरे में भी आ जाएगी । मैंने तो चालाकी से काम लिया । पहले बेहोश होने का नाटक किया, जब मोना चौधरी लापरवाह हो गई तो मैंने उस पर हमला कर दिया ।"

" तुम्हारी चालाकी देखकर मुझे अच्छा लगा ।"

"दुश्मन काबू में न आए चालाकी से काम लेते हैं । याद रखना ।"

" हां !"

"चल इसके पास से चाकू निकाल ।”

मंगलू आगे बढकर मोना की तलाशी लेने लगा ।

फिर पीछे हटता परेशान-सा बोला ।

"चाकू इसके पास नहीं है ।"

"ये कैसे हो सकता है, तूने ठीक से तलाशी ली?"

" हां !"

"कपडे उतार इसके।"

मंगलू एक-एक करके बेहोश पड्री मोना चौधरी के कपडे उतारने ने लगा ।

तीन चार मिनट में उसने बेहोश रोना चौधरी पूरे कपडे उतार दिए ।

चाकू कहीँ भी न मिला ।

"ओंह । तो मोना चौधरी ने चालाकी की हमसे ।" जंगला की फुसफुसाहट कानों में पडी ।

“चालाकी?"

“हां ।। मोना चौधरी यहां आने से पहले चाकू कही रख आई है । इसे शक होगा कि तू इससे चाकू लेने आएगा ।"

“ओह! तो अब क्या किया जाए? मैं मोना चौधरी को होश में लाता हूं ।

"ऐसे नहीं । होश में आकर, ये के बेकाबू हो जाएगी ।" जंगला की फुसफुसाहट कानों में पड़ रही थी----" पहले इसे उठाकर कुर्सी पर लिटा और सख्ती से इसके हाथ-पांव बांध दे ।"

" ठीक है !" मंगलू डायनिंग टेबल की कुर्सी ले आया । पर्दे की डोरी निकाल ली । मोना चौधरी को कुर्सी पर बैठाया और पुश्त से पीठ लगाकर सख्ती से डोरी लपेटकर बांधी, फिर टांगे बांधी ।

बेहोश मोना चौधरी से बंध गई ।

परेशान कर देने वाली बात ये कि उसके शरीर पर कोई कपडा न था ।।

परंतु मंगलू पर जैसे इस बात का कोई असर नहीं हो रहा था ।

वो बाथरूम में गया और पानी का भरा मग ले लया और मोना चौधरी पर छींटे मारकर उसे होश में लाने का प्रयत्न करने लगा ।

"मंगलू ।" जंगला की फुसफुसाहट कानो में पड्री-'ये मोना चौधरी है शानदार ।"

"मेरे से बेकार की बातें न कर ।"

" ये बेकार की वाते है ?"

"मेरे लिए !"

" तेरे लिए काम की बातें क्या है ?"

"पैसा-मुझे पैसा चाहिए और कुछ नहीं ।"

“पैसा आ गया तो तू औरतों के चक्कर में पडेगा ।"

“मैं नहीं जानता !"

"हुम्म ! मैं जब इंसान होता था से कितने मजे लेता था, लेकिन मोना चौधरी जैसी मुझे नहीं मिली थी ।"

मंगलू छींटे मारते हुए मोना चौधरी को होश में लाने का प्रयत्न .. कर रहा था है ।

" तेरे को मालूम है कि जब मैं इंसान होता था तो मेने तेरह औरतों के साथ बलात्कार किया ।"

" तेरह के साथ !"

" हां, पुलिस परेशान हो गई, परंतु मुझे ढूंढ़ न सकी, किसी और को ही पकडकर उसे बलात्कारी बना दिया । वेचार खामखाह ही फस गया और मैं मौज करता रहा परंतु…!"

"परंतु क्या.......!"

"मोना चौधरी जैसी कोई नहीं मिली मुझे ।"

"ये बाते छोड़, मुझे चाकू की फिक्र हो रही है । शैतान के बेटे को मैं क्या कहूंगा कि मैं उसके चाकू की रक्षा नहीं कर सका । ये चाकू को जाने कहां रख आई है ।" मंगलू व्याकुल-सा कह उठा ।

तभी मोना चौधरी के होंठों से हल्की-सी कराह निकली ।

“होश में आ रही है !" जंगला की फुसफुसाहट उसके कानों में पड़ी ।।

अगले मिनट-भर में मोना चौधरी ठीक से होश में आ गई ।।

अपने शरीर पर कपडे न पाकर और खुद को बंधा पाकर वो तड़प उठी । अपने को आजाद कराने की चेष्टा की, परंतु कोई फायदा न हुआ । दांत पीसकर वो मंगलू को देखने लगी ।

मगंलू कहर भरे अंदाज में मुस्कराया।

"तुम मेरा मुकाबला नहीँ कर सकती ।"

"मेरे कपड़े उतारने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गई ?" मोना चौधरी है गुर्राई ।

" तुम्हारे कपडों मेँ से चाकू तलाश कर रहा था !"

" वो तुम्हें कमी नहीं मिलेगा ।"

"तुम्हें हमसे झगडा नहीं मोल लेना चाहिए । हमारी तकतों का तुम मुकाबल नहीं कर सकती । हम जब भी चाहें, तेरी जान ले सकते और तू हमारा कुछ नहीं बिगाड सकती ।" मगलू ने शांत स्वर में कहा ।

मोना चौधरी उसे खा जाने वाली नजरों से देखती रही ।

"शैतान के बेटे का चाकू मुझे दे दे ।"

"मेरे पास नहीं है ।"

"तो किसे दिया है तूने?"

"कभी भी मालूम नहीं कर सकोगे ।" मोना चौधरी दृढता भरे स्वर में कह उठी ।

"भूल है तुम्हारी हमें सब पता चल जाएगा ।"

 


तभी मंगलू के कानों मे'जंगला की फुसफुसाहट पडी ।

"ये बता देगी । तू इसके शरीर पर चाकू से कट लगा ओर उस पर नमक-मिर्च लगा, बहुत दर्द होगा इसे । बताएगी ये । तू पता कर चाकू इसने किसे दिया !"

"ओह तो फिर इसे यातना देनी होगी ।"

" दे.......जल्दी कर.....।"

मंगलू मोना चौधरी से बोला । "

" मोना चौधरी सीधी तरह चाकू दे दे, वरना तेरे को बहुत तकलीफ़ दूंगा ।"

मोना चौधरी होंठ भिंचे उसे देखती रही।

" मै तेरे जिस्म पर कट लगाऊंगा और उस पर नमक-मिर्च लगाऊंगा । तेरे को बताना ही पडेगा कि तूने चाकू कहां रखा है !"

"कोशिश कर ।"

मंगलू किचन में गया और चाकू के साथ नमक और लाल मिर्च भी ले आया ।

" तू ये काम किसके लिए कर रहा है?" मोना चौधरी ने पूछा ।

" शैतान के बेटे के लिए कर रहा हूं ।" उसने नमक-मिर्च एक तरफ रखा ।

"क्यों ?"

" वो मुझे ढेर सारा पैसा देगा । वहुत पैसा देगा ।"

"तू मेरा साथ दे, मैं तेरे को पैसा दूंगी ।"

"ये कभी नहीं हो सकता, मैं सिर्फ शेतान कै बेटे की सेवा करूगा ओर उसी से पैसा लूंगा ।"

चाकू थामे मंगलू मोना चौधरी के पास आ पहुचा…"बोल, चाकू देती है या यातना का दौर शुरू करूं ।"

"तू जीत नहीं सकेगा, बेशक मेरे शरीर के टुकड़े हीं क्यों न कर दे ।"

मंगलू ने चाकू की नोक उसकी बाह में घूसेडी और लम्बा चीरा लगा दिया ।

@@@@@@@@@@@@

तात्रिक बेलीराम इस वक्त अपने आरामकक्ष में लेटा हुआ था, कि एकाएक चौंककर उठ गया है उसे अहसास हुआ कि पास में कोई है, परंतु देखने पर भी कोई न दिखा ।।

"बेलीराम !" तभी वहां शेतान के बेटे का मद्धिम-सा स्वर गूंजा ।

"ओह, महागुंरु !" बेलीराम जल्दी नीचे उतरा और फर्श पर दंडवत हो गया ।

"खडा हो ।" शेतान के बेटे का स्वर पुन: गूंजा ।

बेलीराम खड़ा हुआ । "

"हुक्म महागुरु!"

"समस्या है ।"

"मेरे होते हुए समस्या कैसे आ सकती है महागुरु?"

"आ गई ।"

"समस्या बताइए ?"

"मैं मृत्यु से वापस जीवन में आना चाहता हूं। ये बात तुम अच्छी तरह जानते हो । तैयारी पूर्ण हो चुकी है, परंतु कोई मुझे रोक रहा है और जो रोक रहा है, वो कोई युवती है और मेरी शक्तियां मुझे इस बात का अहसास दिला रहीं कि उस युवती का नाम मोना चौधरी है ।" शैतान के बेटे की आवाज गूजी ।

"असम्भब तुम जैसी महाशक्ति का रास्ता रोक पाने की हिम्मत किसमें हे?”

"इस वक्त मैं मजबूर हूं क्योंक्रि मैं मृत्यु से वापस जीवन में प्रवेश करने की चेष्टा में व्यस्त हूं । ऐसे मे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नही कर सकता !"

" ओह !"

"ओह...!"

"तुम्हे मेरी सहयता करनी होगी ।"

"हुक्म कीजिए ।"

"मंगलु मेरा चाकू लेकर तुम तक आ रहा था कि रास्ते में मोना चौधरी नाम की युवती के साथ उलझ गया और वो चाकू मोना चौधरी ने हथिया लिया ।"

" समझा, वो युवती क्या साधारण है?”

" हां, साधारण है, परंतु दूढ़ इच्छाशक्ति की मालिक है !! मंगलू ने उसे दोबारा दूंढ़ निकाला, परंतु चाकू वो कहीं पर छुपा चुकी है । ऐसे में मंगलू उसे बांधकर शारीरिक कष्ट दे रहा है कि वो चाकू के बारे में बता दे ,परंतु मेरी शक्ति मुझे इस बात का अहसास करा चुकी है कि मोना चौधरी चाकू के बारे में मंगलू को कुछ नहीं बताएगी ।"

तात्रिक बेत्तीराम के चेहरे पर गंभीरता दिखाई देने लगी थी ।

"अब मेरी आशाएं तुम पर है वेलीराम! "

“मैं हमेशा आपकी आशाओं पर खरा उतरा हूं।"

" कुछ ऐसा इतजाम करो कि मोना चौधरी खामोशी से चाकू मंगलू के हवाले कर दे ।"

"अबश्य । इन साधारण लोगों की सबसे बडी कमजोरी, इनके रिश्ते होते हैं । जिसकी वज़ह से ये सब बाते मानने पर मजबूर हो जाते हैं । मुझे मोना चौधरी का पता बताइए । "

“मै जंगला को तुम्हारे पास भेज़ता हुं, उससे तुम जो चाहो, पूछ लेना" ।

"अवश्य महागुरु, जंगला इस वक्त मंगलू का साथ दे रहा है ?"

" हां !"

इसके वाद वहां चुप्पी छा गई ।

बेलीराम व्याकुलता-भरी मुद्रा में उस कमरे में टहलने लगा । दो मिनट बीतें होंगे कि जंगला का स्वर वहां गूंजा ।

" कहो बेलीराम, तुमने मुझे याद किया?"

बेलीराम ठिठका । बोला ।

" क्या मोना चौधरी चाकू के बारे में जानकारी दे देगी?"

"कुछ समझ मे नही आता वो यातना मे तडप रही है , परंतु चाकू , के बारे मे नही बता रही।"

"उसे यातना देनी बंद कर दो ।"

"जो हुक्म ।"

"उसे आजाद छोड़ दो । मंगलू को उससे दुर कर दो !"

" ऐसा ही होगा ।"

"मोना चौधरी कां पता बताओ मुझे ।"

जंगला ने मोना चौधरी का पता बताया ।

"ठीक है, अब तुम जाओं और जैसा कहा है वैसा ही करो ।"

 


तांत्रिक बेलीराम कुछ देर तक वैसे ही खड़ा सोचता रहा फिर आगे बढा और अपने तकिए के नीचे रखा मोबाइल फोन उठाकर किसी के नम्बर मिलाने लगा ।

" तीन-चार बार कोशिश करने पर नम्बर मिला । बेल बजने लगी ।

" हैलो ।" उधर से आवाज आई

"रंजन तिवारी बोल रहे हो ?" बेलीराम बोला ।

" हां, तुम कौन हो ?”

"पहचाना नहीं, हम तांत्रिक बेलीराम हैं ।"

" ओह। बेलीराम जी । पांव लागूं…पांव लागू...!

"कैसे हो?"

"आपका आशीर्वाद है ।"

"तुम पर मर्डर के तीन केस चल रहे थे उनका क्या हुआ?"

“आपके आशीर्वाद से सब ठीक हो गया । जब से आपने मुझें ताबीज दिया है, मेरी सारी मुसीबते भाग गई हैं । तीनों केसों के गवाह पीछे हट गए । मैं साफ़ बच गया । आपने मुझे बचा लिया ।"

"कोई और समस्या हो तो बताना" ।

"अब तो आपका ही भरोसा है ।"

" हमारा एक काम है, अर्जेंट ।"

"हुक्म कीजिए।"

" एक युबती है मोना चौधरी । तुम्हारे शहर की ही है । उसने हमारा कीमती चाकू छीन लिया।"

"मुझ पर भरोसा रखिए, मैं उससे चाकू लेकर, आपको सौंप दूंगा !"

"वो इस तरह चाकू नहीं देगी, हम अपनी शक्ति से देख चुके है ।"

"उसके किसी खास सम्बंधी को पकड़कर उस पर दबाव बनाओ, तभी ये काम होगा ।"

"मै समझ गया, आप उसका पता बताइए बेलीराम जी !" तांत्रिक बेलीराम ने पता बताया ।

"काम हो जाएगा !"

"कब तक होगा काम?” बेलीराम बोला-" उसके पास देर तक वो चाकू रहना ठीक नहीं...!"

"आज के दिन में ही काम हो जाएगा ।"

"मुझे काम होने की खबर कर देना ।"

"अवश्य..!"

बेलीराम ने फोन बंद किया ।

चेहरे पर गंभीरता नाच रही थी ।

@@@@@@@@@@@@

मोना चौधरी का बदन जगह-जगह से कटा हुआ था । हर कट पर मंगलू नमक और लाल मिर्च लगा चुका था । असहनीय पीड़ा हो रही थी मोना चीथरी को, परंतु होंठ भिंचे वो सह रही थी।

रह…रहकर दर्द से उसका पूरा शरीर कांप उठता था । मंगलू बार-बार उससे चाकू मांग रहा था, परंतु मोना चौधरी मुंह खोलने को तैयार नहीं थी ।

मोना चौधरी के लिए ये तकलीफ-भरा दौर था ।

एकाएक मंगलू व्यंग-भरे अंदाज़ में हंसकर बोला ।

“तुम ज्यादा देर अपना मुह बंद नहीं रख सकती । जल्दी टूट जाओगी । तव बताओगी मुझे कि चाकू कहां छिपाया है तुमने?”

“अपनी कोशिश करते रहो।" मोना ने भिंचे स्वर मे कहा।

"तुम मुझसे हार जाओगी ।" मंगलू पुन: हंसा ।

मोना चौधरी की बांह-पेट-छातियां हर जगह चाकू के कट लगे दिखाई दे रहे थे । उनसे बहता खून रुक चूका था । बार- बार उसके जिस्म में दर्द की लहरें उठ रही थी ।

मंगलू ने पुन: चाकू उठाया और उसकी टांगों को देखा ।

"अब तुम्हारी टांगों की बारी है ।" इसी पल मंगलू के कानों में जंगला की फुसफुसाहट गूंजी ।

" मगंलू.....!"

"क्या है ?"

मोना चौधरी की निगाह भी मंगलू पर जा टिकी ।

" छोड़ दे मोना चौधरी को ।"

"क्यों छोड़ दूं ?"

" तांत्रिक बेलीराम कहता है ।"

" ये कौन है?”

"शैतान के बेटे का खास सेवक है । मेरा बड़ा है, उसने मना किया है, ये सब करने को ।"

"क्यों मना किया?"

" उसका कहना है कि इस तरह मोना चौधरी नहीं बताएगी, वो कोई और रास्ता इस्तेमाल करेगा ।"

"मैं बेलीराम की बात क्यों मानूं?"

" माननी पड़ेगी, वो शैतान के बेटे का सबसे खास सेवक है । जों हमारे साथ है, वो बेलीराम की बात मानेगा ।"

"मैँ न मानूं तो !"

"तो तेरे को सजा मिलेगी । मेरी मान तो इस काम को रहने दे ।"

"तू तांत्रिक बेलीराम से मिलकर आया है अभी ?"

"हां, उसने बुलाया था, जाना पड़ा ।"

"उसे कह कि मैं इसी तरह मोना चौधरी का मुह खुलवाकर चाकू के बारे मे पता लगा लूंगा।"

"वो अपनी ताकत से देख चुका है कि मोना चौधरी इस तरह चाकू के बारे मे नहीँ बताएगी।"

मंगलू का चेहरा कठोर होगया ।।

 


मोना चौधरी, मंगलू के होठो से निकलने वाले शब्दों की ध्यानपूर्वक सुन रही थी । इतना तो वह समझ चुकी थी कि मंगलू इस वक्त किसी, से बात कर रहा है और दूसरी आवाज उसे सुनाई नहीं दे रही ।

" तुम मेरे काम में अडचन डाल रहे हो जंगला !"

" जो कह रहा हूं मेरी बात मान । छोड़ दे मोना चौधरी को ।"

मंगलू उठ खड़ा हुआ ।।

" ये मुझे अच्छा नहीं लग रहा । मुझे इस तरह काम से नही रौकना चाहिए !"

" भले के लिए रोका जा रहा हैं !"

"तो अब मैं क्या कसं?"

“मोना चौधरी को बंधनों से आजाद कर और यहाँ से बाहर निकल जा ।"

"कहीँ तू मोना चौधरी के शरीर का दीवाना तो नहीं हो गया, जो उसे बचाना चाहता. . . । "

"बकवास मत कर । अगर मैं इंसान होता तो तब तू ये बात कह सकता था !"

" तो अब तू क्या है?"

"प्रेत-समझदाऱ प्रेत.......!"

मगंलू ने बेमन से पास रखा चाकू उठाया और मोना चौधरी के बंधन काटने लगा ।

मोना चौधरी आजाद हो गई । अगले ही पल वे अपने कपडों पर झपटी और कपड़े पहनने लगी । इतना तो बो जान चुकी थी कि मंगलू उसे आजाद नहीं करना चहता, परंतु किसी के कहने पर उसे आजाद करना पड़ रहा है ।

" किसके ?

कोई जंगला नामक व्यक्ति तो नहीं । मंगलू ने बातों के दोरान जंगला नाम का जिक्र कियो था ।

"यहां से बाहर निकल जा ।" जंगला की फुसफुसाहट मंगलू के कानों में पडी ।

मगंलू दरवाजे की तरफ बढा और देखते-ही-देखते बाहर निकल गया ।

कपड़े डालती मोना चौधरी हैरान थी, मंगलू के इस तरह चले जाने से ।

मंगलू चाकू लिए विना उसे छोड़कर नहीं जा सकता था, परंतु चला गया ।

जाने क्यों सोना चौधरी को अब और भी ज्यादा खतरा महसूस होने लगा । अवश्य कोई खास बात है, जो मंगलू उसे आजाद छोडकर चला गया ।

इन्हें सोचों में डूबी मोना चौधरी ने अपने शरीर पर बने कट्स की तरफ ध्यान दिया । कट ज्यादा गहरे न थे । वो खुद ही इन पर दवा लगा सकती थी, परंतु मंगलू उसे छोडकर खामोशी से क्यों चला गया?

@@@@@@@@@@@@

मनका!

पचास बरस का सूखा- सा पतला व्यक्ति था । उसके सिर के वाल अक्सर बेतरतीबी से बिखरे रहते थे ।

किसी ने भी उसे अच्छे कपडे पहने नहीं देखा था । अक्सर उसकै शरीर पर मैले से ही हो रहे कपड़े नजर आते थे । लोग उसे पहले दर्जे का बेवकूफ समझते थे ।

एक थैला कंधे पर लटकाए उसने फ्लैट में प्रवेश किया तो सामने ही मिथलेश और सतपाल बैठे दिखे । सतपाल दुसरी कुर्सी पर टांगे रखे सिगरेट के कश ले रहा था।

"तो सिगरेट फूंकी जा रही है ।" मनका हंसकर कह उठा ।

" तुम्हारा इंतजार हो रहा है !"

" मै तो आ गया । सिगरेट पिलाओ ।"

सतपाल ने पैकेट निकलकर उसकी तरफ बढाया ।

मनका ने सिगरेट सुलगाई और ।मिथलेश को देखकर बोला. ।

"राजन के क्या हाल हैं?"

"बढिया हैं !"

"किधर है वो ?"

"क्यों?" मिथलेश मुस्कराया…"तेरे को उससे क्या काम पड गया?"

" पिछली बार का दो हजार रूपया उससे लेना है । ये काम है ।" मनका ने कश लिया ।।

“तू बढिया सामान लाता नहीं।” मिथलेश बोला ।।

" इसबार बढिया सामान है।"

" दिखा !"

कश लेने के पश्चात मनका ने अपना थैला टेबल परं रखा और उसमे से छोटा-सा अजीब-सी शक्ल का हथियार निकाला । जो कि वहुत हद तक रिवॉल्वर से मेल खाता था, परंतु उसका आगे का मुंह डेढ़ इंच व्यास में खुला हुआ था । इस हथियार का रंग गहरा भूरा था ।।

" ये क्या है?" सतपाल से पूछा ।

" इससे आत्माएं दूर रहती ।" मनका मुस्कराया ।।

" कैसे ?"

" ऐसे! " कहते हुए मनका ने उस हथियार का मुंह दूसरी तरफ़ किया और ऊपर लगा बटन अंगूठे से दबा दिया ।

तेज आवाज के साथ, हथियार के मुंह से आग का मनका भाले की तरह उठा और सात फीट आगे तक गया । फुर्ती से बटन पर से हाथ हटा लिया ।

भभका गायब हो गया ।।

सतपाल मुस्कराया ।।

"ये अच्छी चीज है ।"

"मेरी इस पर वहुत मेहनत लगी । पैसा भी वहुत लगा है !" मनका ने उस हथियार को टेबल पर रखा----“हथियार का नाम मैंने अपने नाम पर मनका रखा है ।"

फिर उसने थैले में से कांटेदार बाॅल निकाली, जिस पर रबड़ की डोर बंधी थी-----" ये कांटों वाली बाॅल है । रबड़ की डोरी से बंधी है । ऐसी देखी होंगी तुमने, परंतु उन पर कांटे नहीं होते । इस पर एकाएक इंच लम्बे कांटे हैं और इसे ठीक से फेका जाए तो सात से दस कीट तक दूर जा सकती है । कांटे जिसको लगेंगे वो भाग जाएगा ।"

"और जव वार करके बाॅल वापस आएगी तो हाथ से कैसे पकड़ी जाएगी । कांटे लगेंगे ।" बोला सतपाल ।।

"नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा । बॉल जब बापस आएगी तो बाॅल के कांटे बाॅल में धंस जाएंगे । बाॅल की डोरी-ज्यों लम्बी होरी, कांटे बाॅल से निकलकर खुलते चले जाएंगे । ये देखो ।" मनका ने करके दिखाया ।

" बढिया है ।" सतपाल बोला । .

" पहले वाले मनका हथियार पर मेरे वहुत पैसे खर्च हुए हैं ।" मनका बोला ।

"अब तू क्या मांगता है?"

“पच्चीस हजार ।"

“ये तो ज्यादा हैं ।"

"मैं सिर्फ तुम्हारे लिए काम करता हूं रोटी-पानी नहीं चलेगी तो आगे कैसे काम कर पाऊंगा ।"

"मिथलेश दे दे इसे ।" सतपाल बोला ।

 


मिथलेश उठा और दूसरे कमरे की तरफ़ बढ गया ।

"दो हजार पहले का भी है..!" मनका ने कहना चाहा ।

" वो राजन से लेना, वो ही देगा" ।

"वो है कहां?"

"काम पर है ।" मिथलेश दूसरे कमरे में चला गया ।

तभी सतपाल के फोन की बेल बजी ।

उसने स्क्रीन पर आया ऩम्बरं देखा और तुरंत सीधा बैठता बोला ।

"कहो राजन....!"

"..राजन !" मनका फौरन बोला…“इससे मेरे दो हजार के बोरे में पूछ लो !"

"मैं तांत्रिक बेलीराम के ठिकाने पर पहुंचने वाला हू । थोड़ा-सा रास्ता बचा है ।"

"सावधार्ना से काम करना, बेलीराम शातिर है!"

"मैं सतर्क रहुंगा ।"

" खबर देने रहना ।"

"ये कठिन होगा । फोन की चार्जिग खत्म हो जाएगी तो वहां कहां फोन चार्ज हो पाएगा

"

"तुमने बेलीराम की भीतरी जानकारियां हासिल करनी हैं, खास तौर से ये वात जाननी है कि उसने शैतान के बेटे का शरीर कहा पर सुरक्षित छिपाकर रखा हुआ है ।" सतपाल ने कहा ।

"ठीक है बंद करता हू ।" उधर से राजन ने कहा ।

सतपाल ने फोन बंद करके जेब में रखा ।

“मेरे दो हजार के बारे में उससे पूछ लेते, वो ये तो बता देता कि मैँ सच कहा रहा हूं ।"

सतपाल ने कुछ नही कहा ।।

" यै शैतान के बेटे का क्या चक्कर है?" मनका ने पूछा ।।

"मुझे बताओगे तो मैं उसी के हिसाब से हथियार वनाऊंगा ।" मनका ने कहा ।

" शैतान का बेटा पुन: अपने मृत शरीर में आकर जीवित होना चाहता है ।"

"शेतान का बेटा ताकतवर है?"

"बहुत । 210 बरस पहले उसे अपना शरीर छोडकर भागना पडा था ।। पुन: जीवित इसलिए होना चाहता है कि इसका प्रिय भोजन इंसानी खून है । खुन पीने में इसे बहुत मजा आता है ।"

“डेंजरस है ।"

" हद से ज्यदा ।।"

" शैतान के बेटे से मुकाबला करने के लिए मैं कोई हथियार बनांऊगा , वेसे ये जो मनका हथियार है, ये भी शैतान के बेटे पर इस्तेमाल किया जा सकता है । क्योंकि इसमे से पवित्र आग निकलती है, बुरी आत्माएं पवित्र आग से डरती, हैं ।।"

तभी मिथलेश नोटों की गड्रिडयां थामे वहां पहुंचा ।

"ये लो ।" टेबल पर रखते वो बोला… "पच्चीस हजार !"

मनका ने गड्डियां उठाकर अपने थैले में डालते हुए कहा ।।

" राजन बाला दो हजार भी दे देते तो हिसाब नक्की हो जाता ।"

"इस बारे में हमें राजन ने कुछ नहीं बताया ।"

"वो भूल गया होगा ।" मनकर ने सतपाल से पूछा…"तुम्हारा क्या ख्याल है, शैतान का बेटा अपने शरीर में आकर जीवित हो जाएगा ।"

"'यकीन के साथ कुछ नहीं कंह सकता ।"

"लेकिन वो अपनी कोशिश में सफल होने कर दम रखता, है ।" मिथलेश ने कहा ।

" समझा ।" मनका थैला संभालते बोला-“चलता हू बुरी आत्माओं से लड़ने के लिए कोई नया हथियार सोचता हूं ।"

मनका चला गया।।

सतपाल ने मिथलेश को राजन के फोन के बारे मैं बताया ।

" अगर बेतीररम जान गया राजन की असलियत तो राजन खतरे में पड़ सकता है !" मिथलेश ने कहा ।

सतपाल खामोश रहा ।

"मोना चौधरी को फोन करो ।" मिथलेश बोला ।

"मोना चौधरी को ?"

" उससे चाकू के बारे में फिर पूछो !"

सतपाल ने क्षणिक सोच के पश्चात फोन निकाला और मोना चौधरी का नम्बर मिलाने लगा । दूसरी तरफ वेल बजी, फिर मोना चौधऱी की आबाज कानों मे पडी ।

"हैलौ !!"

"मैं बोल रहा हूं , तुम्हें चाकू हमे है देना चाहिए मोना चौधरी।"

"फोन पर तुम्हें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए।"

" तो ?"

"पारसनाथ ने तुम लोगों के' पास बैठकर फोन पर मेरे से जो बात कही, उसे मगंलू जान गया था !"

"तव मंगलू पास था, तुम्हारे फ्लैट पर ।"

" अब भी आस-पास ही है । पाच मिनट पहले वो यहां से गया ।"

"क्या मतलब ?"

 


मोना चौघऱी ने सतपाल को कम शब्दों मे बताया कि उसके साथ क्या हुआ।

सुनकर सतपाल कह उठा ।

" तो वो अचानक तुम्हें छोड़कर क्यों चला गया ?"

" यही तो समझ मे नहीं आ रहा !"

"ये उनकी कोई चाल है वरना तुम्हें छोड़ देने का कोईं मतलब भी नहीं था !"

“मेरा भी यही ख्याल था।"

"तुम्हें वो चाकू हमें देना चाहिए । तुम्हारे पास से निकल गया तो बहुत गडबड हो जाएगी !"

मीमोना चौधरी चुप रही।

" बोलो !"

" इस बारे मे पारसनाथ से बात कर लो !" मोना चौधरी ने शांत स्वर मेँ कहा…।

" ओह समझा ।" कहकर सतपाल ने फोन रखा----" वो चाकू पारसनाथ के पास है !"

" क्या कह रहे हो?" मिथलेशबोला।

" चाकू लेकर मोना चौधरी सीधे उसके पास ही चाकू रखने गइ होगी?"

"मोना चौधरी हमें चाकू देने को तैयार है?"

"हाँ वो कहती है कि पारसनाथ से ले लो । तुम्हारे पास पारसनाथ का फोन नम्बर होगा !"

" हां ।" मिथलेश फोन टेबल के पास पहुचा और ड्रायर खोलकर उसके भीतर पड़े कार्डों को चैक करने लगा । चंद पलों के बाद ही उसके हाथ से पारसनाथ का कार्ड था ।

उन्होंने पारसनाथ को फोन किया ।

उधर से डिसूजा ने फोन उठाया ।

"पारसनाथ से बात कराओ ।" मिथलेश ने कहा ।

"वो इस वक्त है नहीं ।"

"उसका मोबाइल फोन नम्बर दो ।"

"नहीं दिया जा सकता । आप आधे घंटे तक फोन कर ले । शायद वो आ जाएं ।"

मिथलेश ने रिसीवर रखते हुए कहा ।

" पारसंनाथ इस वक्त वहां नहीं है।"

"हम वहीं चलते हैं पारसनाथ के रेस्टोरेंट में !"

@@@@@@@@@@@@

मोना चौधरी ने अपने सारे जख्मों को साफ़ करके, उन पर दवा लगाई और ऊपर कपड़े पहन लिए । अव जख्म शरीर के नीचे वाले हिस्सों में थे, इसलिए वे कपडों के नीचे छिप गए थे ।।

मोना चौधरी अभी तक नहीं समझ पा रही थी कि मंगलू उसे यातना देते-देते एकाएक छोड़कर क्यों चला गया? क्या वजह रहीँ उसे एकाएक छोड़ देने की? मोना चीधरी ने काॅफी और ब्रेड पीस तैयार किए । खाने के पश्चात आराम किया । घंटा-भर उसकी आंख भी लग गई । फिर कॉलबेल के तीव्र आवाज पर ही उसकी आंख खुली थी । मोना चौधरी उठी ।

आई मैजिक से बाहर देखा तो कोई अजनबी चेहरा ही दिखा । कुछ सोचने के बाद उसने दरवाजा खोला और सामने खड़े व्यक्ति को देखा । उसके साथ दो लोग थे ।

"नमस्कार जी! मेरा नाम रंजन तिवारी है ।" उस व्यक्ति ने हाथ जोडकर कहा-----" आप मोना चौधरी हैं?"

" हाँ ।" मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े ।

"अपना परिचय मैं दे दूं । इलेक्शन दो बार हार चुका हूं । खून खराबा मामूली बात है, पुलिस से मेरा याराना है । अव तो आप समझ ही गई होंगी कि मैं कैसा बंदा हूं । भीतर नहीं आना मुझें, मैं यहीं पर खड़ा होकर बात करूंगा और चला जाऊंगा ।" फिर वो अपने आदमी से बोला-----" फोन लगा ।"

उसका साथी फोन लगाने लगा ।

"क्या चाहते हो तुम लोग?" मोना चौधरी के माथे पर बल नजर आने लगे ।

"अभी बता देते हैं ।"

फोन लगा तो उस आदमी ने फोन रंजन तिवारी की तरफ़ बढाया।

रंजन तिवारी ने फोन मोना चौधरी की तरफ बढाया ।

"ले बात कर. .!"

"किससे?"

"कर लो, पता चल जाएगा !"

मोना चौधरी ने फोन थामा बात की।

" हैलो !"

" मोना चौधरी ।" राधा की आवाज कानों है पडी-“ये क्या तेरे लोग है, जिन्होंने मुझें पकड रखा है । दो घंटे पहले ये मेरे धर मे घुस आए और मुझे उठाकर यहां ले आए । ये सब क्या हो रहा है?"

 


"क्या कहते हैं ये?" मोना चौधरी ने रंजन तिवारी पर, नजर डाली ।

"कहते है, मोना चौधरी कहेगी तो तेरे को छोड़ देगे ।"

मोना चौधरी ने फोन बंद करके रंजन तिवारी की तरफ़ बढाया ।

"क्या चाहते हो?" मोना चौधरी के चेहरे पर कठोरता आ गई थी।

“राधा की जिंदगी चाहती हो या मौत?"

'जिदगी! उसे कुछ नहीं होना चाहिए ।"

" वो चाकू मेरे हवाले कर दो !"

मोना चौधरी चौंकी ।

""चाकू?"

रंजन, तिवारी के चेहरे पर खतरनाक भाव उभरे ।

" अगर राधा को जिन्दा देखना चाहती हो तो ।" उसने दात भिंचकर कहा ।

"तुम्हारा चाकू से क्या मतलब?!

" तात्रिक बेलीराम को चाहिए वो चाकू।"

मोना चौधरी उसे देखती रही।

"देती हो या राधा को खत्म कर दें ।" रंजन तिवारी ने पूर्ववत स्वर में कहा--"ज्यादा इंतजार करने की मेरी आदत नहीं है । तेरा

इंकार होगा तो राधा को मारकर हम फेक देंगे । उसके बाद तेरे को भी नहीं छोड़ेगे । तु भी मरेगी ।"

"मेरे को जानते हो?”

“क्या जानना है तेरे को, तू खूबसूरत है, जबान है, लेकिन इस वक्त मैं काम पर हूं । तेरी जवानी की तरफ ध्यान नहीं है मेरा ।"

मोना चौधरी कुछ कहने लगी कि खामोश हो गई ।

" रधा कहां है?”

" अभी तक तो ठीक है ।"

"उसे ले आओ और चाकू ले जाओं ।"

" अगर तुम कोई खेल-खेल रही हो तो?”

"राधा ममेरे हवाले करों और चाकू ले जाओं ।"

"ठीक है, मेरे आदमी राधा को लेकर आते हैं, तब तक मैं भीतर तुम्हारे पास रहूंगा । मेरे भीतर रहने पर तुम्हें कोई ऐतराज तो नहीं अगर तुम्हारा मन साफ है तो ऐतंराज़ नहीं होना चाहिए।”

"आ जाओ भीतर ।" रंजन तिवारी ने अपने दोनों आदमियों को कहा ।

" राधा को यहीं ले आओ ।"

वे दोनों चले गए । रंजन तिवारी भीतर आया, बैठा और फोन निकालकर नम्बर मिलाने लगा ।

मोना चौधरी को राधा की सलामती की ज्यादा फिक्र थी । महाजन भी हिन्दुस्तान में नहीं था । ऐसे में राधा को किसी तरह की तकलीफ होना गंवारा न था ।

"नमस्कार बेलीराम जी ।" फोन मिलते ही रंजन तिवारी बोला--"काम हो रहा है आपका, परंतु समस्या है ।"

"क्या?"

"मैं चाकू को पहचानूंगा कैसे कि मोना चौधरी मुझे वो ही चाकू दे रहीं है, जिसकी अपको जरूरत है?"

" कहां हो?” मोना चौधरी के फ्लेट पर, उसके सामने ।"

"वहीँ रहो, कुछ देर वाद तुम्हारे पास मंगलु नाम का युवक पहुंचेगा, वो चाकू को पहचानता है ।"

"ठीक है ।" रंजन तिवारी ने कहकर फोन बंद कर दिया ।

उधर मोना चौधरी पारसनाथ को फोन करने के लिए फोन के पास पहुंची कि फोन बजने लगा ।

"हैलो!" मोना चौधरी ने रिसीवर उठाया ।

"मोना चौधरी!" पारसनाथ की आवाज कानों मैं पंड्री----“मेरे पास सतपाल और मिथलेश आए हुए हैं, वो कह रहे हैं कि तुमने इन्हें चाकू लेने मेरे पास भेजा है।"

"तुमने चाकू दिया तो नहीं?"

"नहीं, पूछने के लिए फोन किया है क्या दे दूं ?"

" नही, चाकू लेकर मेरे पास आओ । राधा को कुछ लोगों ने उठा लिया है और वे चाकू माग रहे हैं।"

"ओह _ये कब हुआ ?"

"मुझे अंभी पता चला है । वो लोग राधा को लेकर आ रहे हैं तुम चाकू ले आओ।"

"मैं अभी पहुचता हूं ।"

@@@@@@@@@@@@

 


तात्रिक बेलीराम रंजन तिवारी से बात करने के बाद समाधि पर बैठा और मंत्रों का उच्चारण करके उसने जंगला को अपने पास बुलाया ।

"मुझे कैसे याद किया बेलीराम?"

"मंगलू को मोना चौधरी के फ्लैट पर जाना होगा ।"

" क्यों?"

"वहां रंजन तिवारी मौजूद है । वो मंगलू को शेतान कै बेटे का चाकू दिखाएगा। मंगलू को पहचानना है कि ये वो ही चाकू है । कहीं मोना चौधरी दुसरा चाकू तो नहीं दे रही ।" बेलीराम ने कहा ।

"समझा । तो मोना चौधरी चाकू देने के लिए तैयार हो गई ।"

" तेरे को जो कहा है, बो ही कर । मंगलू को मोना चौधरी के फ्लेट पर भेज !"

@@@@@@@@@@@@

मोना चौधरी और रंजन तिवारी खामोश ही वहां बैठे थे ।

" तुम बेलीराम को कैसे जानते हो?" एकाएक मोना चौधरी ने पूछा ।।

" जानता हूं !" रंजन तिवारी ने छोटा-सा ज़वाब दिया !

"उसके लिए ऐसे ही काम करते हो?"

" पहली बार कर रहा हूं !"

"मैं तुम्हें दस-बीस लाख रुपया दे सकतीं हूं राधा के बदले ।" मोना चौधरी ने कहा ।

"बात पैसे की नहीं, श्रद्घा की है ।" रंजन तिवारी ने गभीर स्वर में कहा…“मैं बेलीराम की इज्जत करता हूं।”

"उस चाकू का महत्व जानते हो?”

"नहीं और जानना भी नहीं चाहता, मुझे बताना भी मत !"

" क्यों ?"

"कहीँ सुनकर मन में कोई लालच आ गया तो कोई गड़बड़ न कर दूं , इसलिए चाकू के बारे में नहीं जानना चाहता ।"

मोना चौधरी समझ गई कि सामने बैठा शख्स अपनी वात का -पक्का है ।

"चाकू कहां है?”

"मेरा दोस्त लेकर आ रहा है ।" मोना चौधरी ने कहा ।

तभी कॉलबेल बजी ।

मोना चौधरी ने आगे बढकर दरवाजा खोला तो चौकी ।

बाहर मंगलू खड़ा था ।

" तुम?"

मंगलं ने धक्का मारकर दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश कर गया।

रंजन तिवारी की नजर भी दरवाजे की तरफ थी ।

" मैं मंगलू ।" मंगलू ने रंजन तिवारी से कहा ।

" बैठ जा ।" रंजन तिवारी बोला------"अभी चाकू आएगा तो तुम्हें पहचानना है कि बो, वो ही चाकू है, जिसकी हमें जरूरत है या फिर कोई दूसरा चाकू है ।"

@@@@@@@@@@@@

राधा और पारसनाथ पाच मिनट के हेर-फेर ने मोना चौधरी के फ्लैट पर पहुचे थे ।।

पारसनाथ साथ सतपाल और मिथलेश भी थे ।

"मोना चौधरी?" सतपाल भीतर आते ही बोला-----" क्या हो रहा हे?,.तुमने कहा था कि पारसनाथ से मैं वो चाकू ले लूं परंतु ये हमे यहां ले आया, जबकि पहले ये चाकू देने को तैयार था ।"

रंजन: तिवारी ने तीनों को देखा ।

तीनों ने मंगलू और रंजन तिवारी को देखा ।

तीनों ने मंगलू और रंजन तिवारी की देखा ।

" ये दोनों कौन हैं?" पारसनाथ ने चुभते स्वर में कहा ।

"रंजन तिवारी और वो मंगलू।"

पारसनाथ ने गहरी निगाहों से मंगलू को देखा ।

"मुझे चाकू दो मोना चौधरी!" सतपाल की निगाह भी मंगलू पर पड चुकी थी । मिथलेश की नजर भी । दोनों अब पहले से सतर्क दिखाई देने लगे थे, अलबत्ता मंगलू क्रो इस प्रकार वहा बैठे देखकर उन्हे हैरानी भी थी ।

मोना के चेहरे पर गंभीरता नजर आने लगी थी

मोना चौधरी ने पारसनाथ की तरफ़ हाथ बढाया तो पारसनाथ ने अपने कपडों में छिपा रखा, लैदरकैस युक्त चाकू निकाला और, मोना चौधरी के हाथ पर रख दिया । उस चाकू को देखते ही मंगलू की आखों में चमक आ ठहरी थी ।

"यही है चाकू?" रंजन तिवारी ने मंगलू से पूछा।

"लगता तो यहीं है । एक बार हाथ में लेकर देख लूं तो..।"

"हाथ में भी आ जाएगा । थोड़ी देर रुकना पडेगा।"

" चाकू मुझे दो मोना चौधरी!" सतपाल ने तेज स्वर में कहा ।

मोना चौधरी ने गभीर निगाहों से सतपाल को देखा, फिर कहा ।

" ये चाकू मैंने तुम्हें ही देनां था सतपाल! "

"देना था…क्या मतलब?"

" इस चाकू को पाने के लिए मंगलू और उसके साथी ने मेरे दोस्त की पत्नी का अपहरण कर लिया है । उसे वापस पाने के लिए ये चाकू इन लोगों को लौटाना होगा ।" मोना चौधरी का स्वर गंभीर थे। ।

सतपाल ने मगलू को देखा ।

मंगलू के चेहरे पर जहरीली मुस्कान नृत्य कर रही थी ।

“तुम पागल तो नहीं हो गई ।" एकाएक मिथलेश भडककर कह उठा है।।

"इसमे मागत होने की क्या बात है?" मोना चौधरी का स्वर कठोर हो गया ।

"एक की जान बचाने के लिए, तुम कितनों की जिन्दगी खतरे मैं डाल रही हो । चाकू इन्हें दे देने का मतलब है शैतान के बेटे का जीबत हो जाना ! शैतान के बेटे के जीवित होने, पर वो जाने, कितनी ही जाने......!"

"मुझें राधा को सलामत वापस पाना है ।" मोना चौधरी ने कठोर … स्वर में कहा ।

"एक को बचाने के लिए तुम बहुत जाने खतरे में डाल रही हो ।"

"राधा को बचाना मेरे लिए बहुत जरूरी है ।"

"तुम समझ नहीं पा रही कि शैतान का बेटा जिन्दा हो गया तो कैसा कहर बरपा देगा ।" सतपाल गुस्से से बोला----"इसी चाकू से जिन्दा होगा ।"

"मैं माफी चाहती हूं।” मोना चौधरी गंभीर दुढ़ता भरे स्वर में कह उठी…"इस वक्त मैं तुम लोगों की बात नहीँ मान सकती ।"

सतपाल ने मोना चौधरी से चाकू छीनना चाहा ।

मोना चौधरी फुर्ती से पीछे हट गई ।

 


"ये क्या हो रहा है?” रंजन तिवारी ने पूछा।

" नहीं समझ में आ रहा तो चुपचाप बैठे रहो ।" मंगलू ने शात स्वर से कहा ।

मोना चौधरी सतपाल को घूरते हुए कह उठी।

"फिर चाकू छीनने की कोशिश मत करना ।"

सतपाल मिथलेश क्रोध से भरे बेबस-से लग रहे थे ।

" राधा कहां है?" मिथंलेश कह उठा ।

"आ जाएगी अभी ।"

" वहाँ सब खामोश थे, परंतु' उनमे तनाव भंरी खामोशी छाई हुंई थी।

यही वो ववत्त था जब चार आदमियों के बीच फंसी राधा ने भीतर प्रवेश किया ।

" मोना चौधरी।" राधा उसे देखते ही कह उठी…"ये देखो , ये मुझे तंग कर रहें हैं।"

मोना चौधरी का चेहरा कठोर पड़ गया ।

"इन्होंने तुम्हें कुछ कहा तो नहीं?”

"कहते तो इनकी टागें न तोडड देती ।" राधा ने मुह बनकर कहा ।

सतपाल और मिथलेश व्याकुल नजर आ रहे थे । दोनों की नजरें मिली, फिर मोना चौधरी के हाथ में दवे चाकू को देखा । वो चाकू छीन लेना चाहते थे , परंतु हालात इस हक में न थे ।।

मगंलू के अलावा वहां छ: लोग थे और इधर मोना चौधरी और पारसनाथ थे ।

आठ लोगों का मुकाबला करना उनके लिए असम्भव था ।

मिथलेश आहिस्ता से सरककर सतपाल के सास पहुचा ।

" सतपाल, शैतान के बेटे का चाकू हमारे हाथ से निकला जारहा है !"

"हां, बुरा हो रहा है !"

"ये बेवकूफ लोग नहीं जानते कि कितनी बडी गड़बड़ हो जाएगी अगर चाकू का इस्तेमाल शैतान के बेटे ने कर लिया ।"

"लेकिन हम कुछ नहीँ कर सकते।"

रंजन तिवारी और मंगलू उठ खड़े हुए थे ।

रंजन तिवारी के इशारे पर उन लोगों ने राधा को छोडा तो राधा मोना चौधरी की तरफ़ आ गई ।।

“चाकू दो ।" कहते हुए रंजन तिवारी ने रिवॉल्वर निकालकर हाथ मे ली ।

मोना चौधरी जानती थी कि इस वक्त कोई गड़बड़ करना खतरनाक होगा । ये छोटा-सा कमरा लाशों से भर जाएगा और वो भी बचने वाले नहीं । सबकी लाशें गिरेगी ।

मोनमना चौधरी !" सतपाल व्याकुल स्वर में कह उठा--“एक बार फिर सोच लो तुम !"

"मैं फैसला कर चुकी हूं ।" मोना चौधरी ने कहा और चाकू रंजन तिवारी की तरफ़ उछाल दिया ।

सतपाल के करीब से होकर वो चाकू निकला, लेकिन सतपाल चाकू पकडने में चूक गया ।

' रंज़न तिवारी ने चाकू थामा फिर पास खडे मंगलू को थमा दिया ।

मंगलू की आखें चमक उठी थी । उसने जल्दी से केस से चाकू बाहर निकाला और उसे उलट-पलटकर देखा ।

"यही है वो चाकू ।" मगंलू चाकू को केस में डालता, पीछे वाले कमेरे की तरफ वढा।

"कहां जा रहा है मंगलू?" एकाएक रंजन तिवारी ने पूछा।

"आता हूं।" मंगलू उस कमरे में प्रवेश कर गया ।

सव चुप-चाप से खड़े एक-दूसरे को देख रहे थे ।

फौरन ही मंगलू-वापस: लौटा । उसके हाथ में चौडी टेप का रोल था । सबके देखते-ही-देखते उसने पैट को खोलकर नीचे किया और घुटने से ऊपर टेप से चाकू लपेटकर रोल को एक तरफ उछाला और वापस पैंट बांधी ।

उसी पल मंगलू कै कानों में जंगला की फुसफुसाहट गुंजी ।

"तेरा काम हो गया मंगलू! निकल जा यहां से ।"

मंगलू ने रंजन तिवारी को देखकर कहा ।

"मैं जा रहा हूं।"

रंजन तिवारी सिर हिला दिया ।

मंगलू बाहर निकला तो तिवारी अपने साथियों से बोला ।

"चलो ।"

फिर देखते-ही-देखते वो भी बाहर निकल गए ।

वहां मोना चौधरी सतपाल, मिथलेश, पारसनाथ और राधा रह गए ।

"तुम वहुत गलत.....!" सतपाल ने कहना चाहा ।

परंतु मोना चौधरी ने उसकी बात सुनी ही नहीं और बाहर निकलती चली गई ।

सतपाल के होंठ र्भिच गए, मोना चौधरी को वहा से गया पाकर ।

" ये कहाँ गई ?" मिथलेश ने पारसनाथ को देखा ।

"मुझे क्या पता?" पारसनाथ ने कहा और राधा से बोला----" चलो भाभी तुम्हें घर छोड़ दूं।"

"छोडना क्या है ।" राधा ने कहा-“टैक्सी में बिठा दो, चली जाऊंगी, ब्यूटी पॉलंर भी जाना है, थ्रेडिंग करवानी है ।"

"तुम दोनों बाहर चलो ।" पारसनाथ ने कहा-"फलैट बंद करना ।"

सतपाल तौर मिथलेश का गुस्से से खून उबल रहा था ।

सिर्फ ये ही सोच रहे थे कि उनके अलावा हालात की गंभीरता को कोई नहीं समझ रहा कि चाकू मंगलू को वापस देकर कैसा गजब कर डाला है ।

"ये सब हो क्या रहा है?" राधा ने पारसनाथ को देखा--“क्यों भैया?"

"मोना चौधरी बताएगी ।" पारसनाथ ने कहा ।

"तुम क्यों नहीं बताते?" राधा बोली ।

"मुझे पूरी बात नहीं पता ।" पारसनाथ ने टालने वाले लहजे में कहा ।

"कोई बात नहीं, आधी बता दो । उन लोगों ने सिर्फ चाकू लेने के लिए, मेरे को बंधक बना लिया था?"

" हां !"

“तो उन्हें कैसे पता चला कि मैं मोना चौधरी की पहचान की हूं !"

"पता लगा लिया होगा ।"

" ऐसे कैसे पता लगा लिया…मैंने तो किसी को बताया नहीं ।"

सतपाल और मिथलेश बाहर निकल गए ।

" ये दोनों कौन थे?”

"मोना चौधरी की पहचान वाले थे । चलो यहां से ।"

दोनों बाहर आए । पारसनाथ फ्लैट का दरवाजा बंद कर रहा था कि राधा कह उठी।

"यह हमें घूरता है ।"

"कौन?" पारसनाथ पलटा।

तभी पारसनाथ की निगाह नंदराम पर पडी । जरा-सा दरवाजा खोले मुर्गे की तरह गर्दन बाहर निकले नंदराम राधा को देख रहा था ।

जब्र पारसनाथ को अपनी तरफ देखते पाया तो उसने फौरन गर्दन पीछे की और दरवाजा बंद कर लिया ।

"'कितने अजीब लोग रहते है यहाँ ।"’ राधा मुंह बनाकर कह उठी ।

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