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अगले दिन मंगलू की आंखों खुली तो आठ बज रहे थे । नहा-धोकर वो तैयार हुआ । नए कपड़े पहन, तब दस बजने जा रहे थे । उसकी आखों के सामने बार-बार कामिनी की सुरत नाच रही थी । भोली-भाली खूबसूरत कामनी । मुस्कराती तो दांत लड़ी की तरह चमकने लगते । उसकी बातों मे रस था । वो आज़ कामिनी को फिर अपने सामने देखाना चाहता था ।
भवतारा करवट लिए गहरी नीद में था ।।
मंगलू वहाँ से निकला और मंदिर से बाहर जाकर पुलिया पर जा पहुचा।
वहां गुनगुनी-सी धूप फैली हुई थी ।
लोग मंदिर में आ-जा रहे थे ।
कामिनी ने भला वहां कहां होना था । पुलिया को खाली पाकर मंगलू के चेहरे पर बैचेनी-सी आ ठहरी । पुलिया पर बैठकर वह रह-रहकर बेचैनी से पहलू बदलने लगा । निगाह हर पल कामिनी की तलाश में इधर-उधर फिर रही थी ।
वक्त बीतने लगा । तब साढे ग्यारह-बारह का समय रहा होगा, जब उसे कामिनी दिखी ।
मंगलू का चेहरा खिल उठा ।
वो इधर ही आ रही थी । कल वाला सूट ही उसने पहन रखा था । आज उसने प्रेस किए कम कपडे उठा रखे थे । वो ही झुमके । वो ही सव कुछ । उसने भी मंगलू को देख लिया था । वो मुस्कराई उसे देखकर ।।
चेहरे पर मुस्कान समेटे मंगलू उठ खड़ा हुआ ।
" तुम आज भी यहां बैठे हो?" पास आते कामिनी कह उठी।
" मै तो दस बजे का यहां बैठा, तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।" मंगलू ने जैसे शिकायत की ।
" मेरा इंतजार?"
" हां, तो और क्या?"
"मैंने कब कहा था कि मैं आज मिलूगी । तुम अपने मन से ही मेरा इंतजार करने लगे हो, मेरा क्या कसूर---!"
"मेरा मन कहता था कि तुम आज भी जरूर आओगी ।"
"मन तो जो भी कहे, मैंने तेरे से कुछ नहीं कहा ।" कामिनी हंसी ।।
हंसते हुए कामिनी की खूबसूरती और भी बढ गई थी ।
मंगलू मंत्रमुग्ध सा उसे देखने लगा ।
"वो मैने कल भी कहा था, मुझे ऐसे मत देखा कर !"
"दिल में कुछ-कुछ होता है ।"
" हां, होगा नहीं क्या, बापू कहते हैं अब मैं बडी हो गई हूँ । मुझे यूं ही किसी से बात नहीं करनी चाहिए ।"
"मेरे से तो बात कर सकती है?"
" हां , तेरे से तो बात कर सकती हूं ।" कामिनी ने सिर को दाएं-बाएं हिलाया ।
"तू मुझे वहुत अच्छी लगती है ।"
"धत ।"
"बैठ जा, कपड़े थामे ऐसे ही खडी रहेगी क्या?" मंगलं ने कहा ।
"ओह! मैं तो मूल गई । तू यहीं बैठ मैं… अभी कपडे देकर आती हूं।" कहकर बो आगे बडी ।
" जल्दी आना ।"
"हां-हाँ, जल्दी आऊंगी ।"
मंगलू पुलिया पर बैठ गया और जाती कामिनी को देखने लगा । दस मिनट बाद कामिनी लौटी । हाथ में पैसे पकड़े हुए थे ।
"मैं आ गई ।"
"बैठ-बैठ !", मंगलू ने पुलिया पर हाथ मारा---" आज जब मैं सोकर उठा तो मुझे तेरा ख्याल आया कि शायद तू यही पर मिले मुझे ।"
"मेरे बापू को तेरा ख्याल पता चल गया तो वो मुझे घर बिठा लेगा । बाहर ही नहीं निकलने देगा !"
"तेरे बापू को कैसे पता चलेगा? हम बताएंगे ही नहीं ।"
"हा , ये बात तो तूने ठीक कही !"
मंगलू कामिनी को निहारने लगा ।
" फिर-फिर तू मुझे वैसे ही देख रहा है ।" कामिनी ने जैसे शिकायत की ।
" तू मुझे देखने से रोका मत कर।"
"क्यों?"
"तेरे को देखकर मुझे अच्छा लगता है !"
"याद आया कल जो तेरा मालिक आया था , जिसके पास तु नौकरी करना है, वो मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता ।"
“क्यों?"
"देखा नहीं था कल कि कैसे आखे फाड़-फाडकर मुझे देख रहा था । मुझे तो डर लगा उससे !"
मंगलू ने गहरी सांस लेकर कहा।
" मुझे भी वो अच्छा नहीं लगता !
"तो छोड़ दे उसकी नौकरी, क्यों उसके पास काम करता है?” कामिनी ने सलाह दी ।
"नहीं छोड़ सकता । उससे पैसा लेना है ।"
"कितना पैसा?"
बहुत-सा।"
" तो देता क्यों नहीं?”
" कल कह रहा था कि दो-चार दिन में दे देगा ।" मंगलूने कामिनी की देखकर कहा ।
"ठीक है । तू उससे पैसा लेकर, उसकी नौकरी छोड देना । वो जरा भी अच्छा नहीं है ।"
" ऐसा ही करूण, लेकिन तब तेरे से कैसें मिलूंगा?"
"इसी पुलिया पर आकर बैठ जाना । मैं तो रोज ही मंदिर मे कपडे देने जाती हूं।" कामिनी ने सरल स्वर में कहा ।
इसी तरह भोलेपन से भऱी उनकी बाते होती रहीं ।
@@@@@@@@@@@@@@@
सबसे पहले सुबह मोना चौधरी की आंखें खुली थी । सुबह के सात बज रहे थे । उसने सतपाल और राजन पर निगाह डाली, जो कि गहरी नींद में थे, फिर उसने रूम सर्विस में तीन कप चाय का आर्डर किया और कमरे का दरवाजा खोला । रोज की तरह दरवाजे के बाहर आज़ का अखबार मौजूद था । अखबार लेकर मोना चौधरी ने दरवाजा बंद कर दिया ।
मोना चौधरी कुर्सी पर बैठी और अखबार खोला । अगले ही पल उसकी नज़रे अखबार पर जा टिकी । आखें सिकुड गई । अखबार में रात हुई युवती की हत्या का जोर-शोर के साथ जिक्र था । मृत युवती के चेहरे की तस्वीर जो अखवार में छपी और खबर कुछ इस प्रकार थी---
"एक लाश पिछली रात मिली और दूसरी रात को । दोनों ही लाशों के शरीर में खुन की एक बूंद नहीं थी । दोनों लाशों के गले पर किसी तीखी चीज के चुभोए जाने के निशान मिले । हत्यारा अपने शिकार के शरीर मे से खून की आखिरी बूद तक निकाल लेता है । कौन है हत्यारा और क्यों ये हत्याएँ कर रहा है? खौफ का सिलसिला कब तक चलेगा? अब तो लोग रात के अंधेरे मे धर से बाहर निकलने में भी डरने लगे है !"
इसी सिलसिले में अखबार का यह पना भरा हुआ था । पुलिस वालों का इंटरव्यू भी छाप रखा था । अखबार में तरह-तरह की अटकलों को जन्म दे रखा था ।
मोना चौधरी ने व्याकुलता से भरी सांस ली और अखबार एक तरफ रख दिया ।
वही हुआ जिसका डर था ।
भवतारा जिन्दा हो चुका था । इंसानी लहू उसका प्रिय भोजन था । इंसानी खून पीने के लिए ही वो पुन: जीवित हुआ था । अब उसने अपने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया था । वो रात को ही बाहर निकलता था अपनी जगह से और किसी एक को शिकार बनाकर, अपने ठिकाने पर वापस चला जाता था ।
सतपाल ने ठीक कहा था कि वो जिन्दा हो गया तो कहर वरपा देगा ।
उसंने इंसानों का खून पीना शुरू कर दिया था ।
खौफनाक हकीकत थी ये ।
इसे जैसे भी हो, रोकना होगा।
और शैतान के बेटे को रोक पाना आसान न था ।
मोना चीथरी अपने ही विचारों में उलझे बेचैन होती जारही थी ।
तभी दरवाजा खटखटाकर वेटर ने भीतर प्रवेश किया और चाय-के तीन प्याले रखकर चला गया ।
वेटर के आने-जाने के बीच सतपाल की आख खुल गई ।
"बढिया किया चाय मंगवा ली ।" सतपाल उठता हुआ बोला और साथ सोए राजन को थपथपाया----" उठ जा । बहुत सो लिया ।"
राजन भी उठा।
वे तीनों वेड टी लेने लगे !
"अखबार पढ़ तो ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।
"खास खबर है क्या?" अखबार उठाता सतपाल कह उठा।
"शैतान के बेटे ने रात एक ओंर शिकार किया !" मोना चौघऱी ने गहरी सांस ली।
"क्या?" राजन चिंहुक उठा ।
"फिर तो ये बात पक्की होगई कि भवतारा जीबित ही नही हुआ, बल्कि इंसानों का खून पीना भी शुरु कर द्रिया है ।" कहने के साथ अखबार खोला और खबर पर नजरें दौडाता चला गया ।।
राजन ने भी अखबार पढा ।
वे तीनों ही अब गभीर नजर आने लगे ।
"अब ऐसी लाशें मिलती रहेगी ।" राजन बोला-…"भवतारा ये सिलसिला कभी खत्म न होने देगा ।!
"हमें उसे रोकना होगा !"
" कैसे रोकेंगे?" राजन ने सतपाल को देखा।
"वो खबरी.. .!" सतपाल ने कहना चाहा ।
" जाने वो खबरी कब मिलेगा हमें ।" मोना चौधरी उठि----" हम उसके भरोसे नहीं बैठे रह सकते !"
"मोना चौधरी ठीक कहती है ।" राजन ने कहा ।
"क्या पता तात्रिक मोहम्मद की वात सही भी है या नहीं !" मोना चौधरी ने पुन: कहा !
"मोहम्मद ने ठीक कहा या गलत, ये बात नहीं है । बात ये है कि हमें कुछ करना होगा ।"
सतपाल ने दोनों को देखा । वो बेचैन दिख रहा था ।
"अगर हमने कुछ नहीं किया तो शैतान का बेटा ऐसी लाशे बिछाकर शहर को हिला देगा ।" राजन ने पुन: कहा ।
"हम कर भी क्या सकते हैं?" सतपाल गंभीर स्वर में बोला ।
"शेतान के बेटे का ठिकाना तलाश करना होगा ।"
“इतने बड़े शहर में हम उसके ठिकाने को कहाँ तलाश करेगे?"
"कोशिश तो कर सकते हैं । हम तीन हैं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में भाग-दौड़ कर सकते हैं ।" मोना चौधरी बोली ।
" माना कि हमने उसे तलाश कर लिया. ..फिर......?" सतपाल ने दोनों को देखा ।।
" तुम कहना क्या चाहते हो ?" राजन बोला ।
"क्या हम शैतान के बेटे का मुकाबला कर पाएंगे?"
"क्यों नहीं कर सकते ?" मोना ने कहा-----" हम मुकाबला कर सकते हैं । तांत्रिक मोहम्मद हमारे साथ है । उसने कहा था कि हम लोग जब भी मुसीबत में पडेगे, तो उसे अपने पास ही पाएंगे ।"
भवतारा करवट लिए गहरी नीद में था ।।
मंगलू वहाँ से निकला और मंदिर से बाहर जाकर पुलिया पर जा पहुचा।
वहां गुनगुनी-सी धूप फैली हुई थी ।
लोग मंदिर में आ-जा रहे थे ।
कामिनी ने भला वहां कहां होना था । पुलिया को खाली पाकर मंगलू के चेहरे पर बैचेनी-सी आ ठहरी । पुलिया पर बैठकर वह रह-रहकर बेचैनी से पहलू बदलने लगा । निगाह हर पल कामिनी की तलाश में इधर-उधर फिर रही थी ।
वक्त बीतने लगा । तब साढे ग्यारह-बारह का समय रहा होगा, जब उसे कामिनी दिखी ।
मंगलू का चेहरा खिल उठा ।
वो इधर ही आ रही थी । कल वाला सूट ही उसने पहन रखा था । आज उसने प्रेस किए कम कपडे उठा रखे थे । वो ही झुमके । वो ही सव कुछ । उसने भी मंगलू को देख लिया था । वो मुस्कराई उसे देखकर ।।
चेहरे पर मुस्कान समेटे मंगलू उठ खड़ा हुआ ।
" तुम आज भी यहां बैठे हो?" पास आते कामिनी कह उठी।
" मै तो दस बजे का यहां बैठा, तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।" मंगलू ने जैसे शिकायत की ।
" मेरा इंतजार?"
" हां, तो और क्या?"
"मैंने कब कहा था कि मैं आज मिलूगी । तुम अपने मन से ही मेरा इंतजार करने लगे हो, मेरा क्या कसूर---!"
"मेरा मन कहता था कि तुम आज भी जरूर आओगी ।"
"मन तो जो भी कहे, मैंने तेरे से कुछ नहीं कहा ।" कामिनी हंसी ।।
हंसते हुए कामिनी की खूबसूरती और भी बढ गई थी ।
मंगलू मंत्रमुग्ध सा उसे देखने लगा ।
"वो मैने कल भी कहा था, मुझे ऐसे मत देखा कर !"
"दिल में कुछ-कुछ होता है ।"
" हां, होगा नहीं क्या, बापू कहते हैं अब मैं बडी हो गई हूँ । मुझे यूं ही किसी से बात नहीं करनी चाहिए ।"
"मेरे से तो बात कर सकती है?"
" हां , तेरे से तो बात कर सकती हूं ।" कामिनी ने सिर को दाएं-बाएं हिलाया ।
"तू मुझे वहुत अच्छी लगती है ।"
"धत ।"
"बैठ जा, कपड़े थामे ऐसे ही खडी रहेगी क्या?" मंगलं ने कहा ।
"ओह! मैं तो मूल गई । तू यहीं बैठ मैं… अभी कपडे देकर आती हूं।" कहकर बो आगे बडी ।
" जल्दी आना ।"
"हां-हाँ, जल्दी आऊंगी ।"
मंगलू पुलिया पर बैठ गया और जाती कामिनी को देखने लगा । दस मिनट बाद कामिनी लौटी । हाथ में पैसे पकड़े हुए थे ।
"मैं आ गई ।"
"बैठ-बैठ !", मंगलू ने पुलिया पर हाथ मारा---" आज जब मैं सोकर उठा तो मुझे तेरा ख्याल आया कि शायद तू यही पर मिले मुझे ।"
"मेरे बापू को तेरा ख्याल पता चल गया तो वो मुझे घर बिठा लेगा । बाहर ही नहीं निकलने देगा !"
"तेरे बापू को कैसे पता चलेगा? हम बताएंगे ही नहीं ।"
"हा , ये बात तो तूने ठीक कही !"
मंगलू कामिनी को निहारने लगा ।
" फिर-फिर तू मुझे वैसे ही देख रहा है ।" कामिनी ने जैसे शिकायत की ।
" तू मुझे देखने से रोका मत कर।"
"क्यों?"
"तेरे को देखकर मुझे अच्छा लगता है !"
"याद आया कल जो तेरा मालिक आया था , जिसके पास तु नौकरी करना है, वो मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता ।"
“क्यों?"
"देखा नहीं था कल कि कैसे आखे फाड़-फाडकर मुझे देख रहा था । मुझे तो डर लगा उससे !"
मंगलू ने गहरी सांस लेकर कहा।
" मुझे भी वो अच्छा नहीं लगता !
"तो छोड़ दे उसकी नौकरी, क्यों उसके पास काम करता है?” कामिनी ने सलाह दी ।
"नहीं छोड़ सकता । उससे पैसा लेना है ।"
"कितना पैसा?"
बहुत-सा।"
" तो देता क्यों नहीं?”
" कल कह रहा था कि दो-चार दिन में दे देगा ।" मंगलूने कामिनी की देखकर कहा ।
"ठीक है । तू उससे पैसा लेकर, उसकी नौकरी छोड देना । वो जरा भी अच्छा नहीं है ।"
" ऐसा ही करूण, लेकिन तब तेरे से कैसें मिलूंगा?"
"इसी पुलिया पर आकर बैठ जाना । मैं तो रोज ही मंदिर मे कपडे देने जाती हूं।" कामिनी ने सरल स्वर में कहा ।
इसी तरह भोलेपन से भऱी उनकी बाते होती रहीं ।
@@@@@@@@@@@@@@@
सबसे पहले सुबह मोना चौधरी की आंखें खुली थी । सुबह के सात बज रहे थे । उसने सतपाल और राजन पर निगाह डाली, जो कि गहरी नींद में थे, फिर उसने रूम सर्विस में तीन कप चाय का आर्डर किया और कमरे का दरवाजा खोला । रोज की तरह दरवाजे के बाहर आज़ का अखबार मौजूद था । अखबार लेकर मोना चौधरी ने दरवाजा बंद कर दिया ।
मोना चौधरी कुर्सी पर बैठी और अखबार खोला । अगले ही पल उसकी नज़रे अखबार पर जा टिकी । आखें सिकुड गई । अखबार में रात हुई युवती की हत्या का जोर-शोर के साथ जिक्र था । मृत युवती के चेहरे की तस्वीर जो अखवार में छपी और खबर कुछ इस प्रकार थी---
"एक लाश पिछली रात मिली और दूसरी रात को । दोनों ही लाशों के शरीर में खुन की एक बूंद नहीं थी । दोनों लाशों के गले पर किसी तीखी चीज के चुभोए जाने के निशान मिले । हत्यारा अपने शिकार के शरीर मे से खून की आखिरी बूद तक निकाल लेता है । कौन है हत्यारा और क्यों ये हत्याएँ कर रहा है? खौफ का सिलसिला कब तक चलेगा? अब तो लोग रात के अंधेरे मे धर से बाहर निकलने में भी डरने लगे है !"
इसी सिलसिले में अखबार का यह पना भरा हुआ था । पुलिस वालों का इंटरव्यू भी छाप रखा था । अखबार में तरह-तरह की अटकलों को जन्म दे रखा था ।
मोना चौधरी ने व्याकुलता से भरी सांस ली और अखबार एक तरफ रख दिया ।
वही हुआ जिसका डर था ।
भवतारा जिन्दा हो चुका था । इंसानी लहू उसका प्रिय भोजन था । इंसानी खून पीने के लिए ही वो पुन: जीवित हुआ था । अब उसने अपने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया था । वो रात को ही बाहर निकलता था अपनी जगह से और किसी एक को शिकार बनाकर, अपने ठिकाने पर वापस चला जाता था ।
सतपाल ने ठीक कहा था कि वो जिन्दा हो गया तो कहर वरपा देगा ।
उसंने इंसानों का खून पीना शुरू कर दिया था ।
खौफनाक हकीकत थी ये ।
इसे जैसे भी हो, रोकना होगा।
और शैतान के बेटे को रोक पाना आसान न था ।
मोना चीथरी अपने ही विचारों में उलझे बेचैन होती जारही थी ।
तभी दरवाजा खटखटाकर वेटर ने भीतर प्रवेश किया और चाय-के तीन प्याले रखकर चला गया ।
वेटर के आने-जाने के बीच सतपाल की आख खुल गई ।
"बढिया किया चाय मंगवा ली ।" सतपाल उठता हुआ बोला और साथ सोए राजन को थपथपाया----" उठ जा । बहुत सो लिया ।"
राजन भी उठा।
वे तीनों वेड टी लेने लगे !
"अखबार पढ़ तो ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।
"खास खबर है क्या?" अखबार उठाता सतपाल कह उठा।
"शैतान के बेटे ने रात एक ओंर शिकार किया !" मोना चौघऱी ने गहरी सांस ली।
"क्या?" राजन चिंहुक उठा ।
"फिर तो ये बात पक्की होगई कि भवतारा जीबित ही नही हुआ, बल्कि इंसानों का खून पीना भी शुरु कर द्रिया है ।" कहने के साथ अखबार खोला और खबर पर नजरें दौडाता चला गया ।।
राजन ने भी अखबार पढा ।
वे तीनों ही अब गभीर नजर आने लगे ।
"अब ऐसी लाशें मिलती रहेगी ।" राजन बोला-…"भवतारा ये सिलसिला कभी खत्म न होने देगा ।!
"हमें उसे रोकना होगा !"
" कैसे रोकेंगे?" राजन ने सतपाल को देखा।
"वो खबरी.. .!" सतपाल ने कहना चाहा ।
" जाने वो खबरी कब मिलेगा हमें ।" मोना चौधरी उठि----" हम उसके भरोसे नहीं बैठे रह सकते !"
"मोना चौधरी ठीक कहती है ।" राजन ने कहा ।
"क्या पता तात्रिक मोहम्मद की वात सही भी है या नहीं !" मोना चौधरी ने पुन: कहा !
"मोहम्मद ने ठीक कहा या गलत, ये बात नहीं है । बात ये है कि हमें कुछ करना होगा ।"
सतपाल ने दोनों को देखा । वो बेचैन दिख रहा था ।
"अगर हमने कुछ नहीं किया तो शैतान का बेटा ऐसी लाशे बिछाकर शहर को हिला देगा ।" राजन ने पुन: कहा ।
"हम कर भी क्या सकते हैं?" सतपाल गंभीर स्वर में बोला ।
"शेतान के बेटे का ठिकाना तलाश करना होगा ।"
“इतने बड़े शहर में हम उसके ठिकाने को कहाँ तलाश करेगे?"
"कोशिश तो कर सकते हैं । हम तीन हैं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में भाग-दौड़ कर सकते हैं ।" मोना चौधरी बोली ।
" माना कि हमने उसे तलाश कर लिया. ..फिर......?" सतपाल ने दोनों को देखा ।।
" तुम कहना क्या चाहते हो ?" राजन बोला ।
"क्या हम शैतान के बेटे का मुकाबला कर पाएंगे?"
"क्यों नहीं कर सकते ?" मोना ने कहा-----" हम मुकाबला कर सकते हैं । तांत्रिक मोहम्मद हमारे साथ है । उसने कहा था कि हम लोग जब भी मुसीबत में पडेगे, तो उसे अपने पास ही पाएंगे ।"