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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

अगले दिन मंगलू की आंखों खुली तो आठ बज रहे थे । नहा-धोकर वो तैयार हुआ । नए कपड़े पहन, तब दस बजने जा रहे थे । उसकी आखों के सामने बार-बार कामिनी की सुरत नाच रही थी । भोली-भाली खूबसूरत कामनी । मुस्कराती तो दांत लड़ी की तरह चमकने लगते । उसकी बातों मे रस था । वो आज़ कामिनी को फिर अपने सामने देखाना चाहता था ।

भवतारा करवट लिए गहरी नीद में था ।।

मंगलू वहाँ से निकला और मंदिर से बाहर जाकर पुलिया पर जा पहुचा।

वहां गुनगुनी-सी धूप फैली हुई थी ।

लोग मंदिर में आ-जा रहे थे ।

कामिनी ने भला वहां कहां होना था । पुलिया को खाली पाकर मंगलू के चेहरे पर बैचेनी-सी आ ठहरी । पुलिया पर बैठकर वह रह-रहकर बेचैनी से पहलू बदलने लगा । निगाह हर पल कामिनी की तलाश में इधर-उधर फिर रही थी ।

वक्त बीतने लगा । तब साढे ग्यारह-बारह का समय रहा होगा, जब उसे कामिनी दिखी ।

मंगलू का चेहरा खिल उठा ।

वो इधर ही आ रही थी । कल वाला सूट ही उसने पहन रखा था । आज उसने प्रेस किए कम कपडे उठा रखे थे । वो ही झुमके । वो ही सव कुछ । उसने भी मंगलू को देख लिया था । वो मुस्कराई उसे देखकर ।।

चेहरे पर मुस्कान समेटे मंगलू उठ खड़ा हुआ ।

" तुम आज भी यहां बैठे हो?" पास आते कामिनी कह उठी।

" मै तो दस बजे का यहां बैठा, तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।" मंगलू ने जैसे शिकायत की ।

" मेरा इंतजार?"

" हां, तो और क्या?"

"मैंने कब कहा था कि मैं आज मिलूगी । तुम अपने मन से ही मेरा इंतजार करने लगे हो, मेरा क्या कसूर---!"

"मेरा मन कहता था कि तुम आज भी जरूर आओगी ।"

"मन तो जो भी कहे, मैंने तेरे से कुछ नहीं कहा ।" कामिनी हंसी ।।

हंसते हुए कामिनी की खूबसूरती और भी बढ गई थी ।

मंगलू मंत्रमुग्ध सा उसे देखने लगा ।

"वो मैने कल भी कहा था, मुझे ऐसे मत देखा कर !"

"दिल में कुछ-कुछ होता है ।"

" हां, होगा नहीं क्या, बापू कहते हैं अब मैं बडी हो गई हूँ । मुझे यूं ही किसी से बात नहीं करनी चाहिए ।"

"मेरे से तो बात कर सकती है?"

" हां , तेरे से तो बात कर सकती हूं ।" कामिनी ने सिर को दाएं-बाएं हिलाया ।

"तू मुझे वहुत अच्छी लगती है ।"

"धत ।"

"बैठ जा, कपड़े थामे ऐसे ही खडी रहेगी क्या?" मंगलं ने कहा ।

"ओह! मैं तो मूल गई । तू यहीं बैठ मैं… अभी कपडे देकर आती हूं।" कहकर बो आगे बडी ।

" जल्दी आना ।"

"हां-हाँ, जल्दी आऊंगी ।"

मंगलू पुलिया पर बैठ गया और जाती कामिनी को देखने लगा । दस मिनट बाद कामिनी लौटी । हाथ में पैसे पकड़े हुए थे ।

"मैं आ गई ।"

"बैठ-बैठ !", मंगलू ने पुलिया पर हाथ मारा---" आज जब मैं सोकर उठा तो मुझे तेरा ख्याल आया कि शायद तू यही पर मिले मुझे ।"

"मेरे बापू को तेरा ख्याल पता चल गया तो वो मुझे घर बिठा लेगा । बाहर ही नहीं निकलने देगा !"

"तेरे बापू को कैसे पता चलेगा? हम बताएंगे ही नहीं ।"

"हा , ये बात तो तूने ठीक कही !"

मंगलू कामिनी को निहारने लगा ।

" फिर-फिर तू मुझे वैसे ही देख रहा है ।" कामिनी ने जैसे शिकायत की ।

" तू मुझे देखने से रोका मत कर।"

"क्यों?"

"तेरे को देखकर मुझे अच्छा लगता है !"

"याद आया कल जो तेरा मालिक आया था , जिसके पास तु नौकरी करना है, वो मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता ।"

“क्यों?"

"देखा नहीं था कल कि कैसे आखे फाड़-फाडकर मुझे देख रहा था । मुझे तो डर लगा उससे !"

मंगलू ने गहरी सांस लेकर कहा।

" मुझे भी वो अच्छा नहीं लगता !

"तो छोड़ दे उसकी नौकरी, क्यों उसके पास काम करता है?” कामिनी ने सलाह दी ।

"नहीं छोड़ सकता । उससे पैसा लेना है ।"

"कितना पैसा?"

बहुत-सा।"

" तो देता क्यों नहीं?”

" कल कह रहा था कि दो-चार दिन में दे देगा ।" मंगलूने कामिनी की देखकर कहा ।

"ठीक है । तू उससे पैसा लेकर, उसकी नौकरी छोड देना । वो जरा भी अच्छा नहीं है ।"

" ऐसा ही करूण, लेकिन तब तेरे से कैसें मिलूंगा?"

"इसी पुलिया पर आकर बैठ जाना । मैं तो रोज ही मंदिर मे कपडे देने जाती हूं।" कामिनी ने सरल स्वर में कहा ।

इसी तरह भोलेपन से भऱी उनकी बाते होती रहीं ।

@@@@@@@@@@@@@@@

सबसे पहले सुबह मोना चौधरी की आंखें खुली थी । सुबह के सात बज रहे थे । उसने सतपाल और राजन पर निगाह डाली, जो कि गहरी नींद में थे, फिर उसने रूम सर्विस में तीन कप चाय का आर्डर किया और कमरे का दरवाजा खोला । रोज की तरह दरवाजे के बाहर आज़ का अखबार मौजूद था । अखबार लेकर मोना चौधरी ने दरवाजा बंद कर दिया ।

मोना चौधरी कुर्सी पर बैठी और अखबार खोला । अगले ही पल उसकी नज़रे अखबार पर जा टिकी । आखें सिकुड गई । अखबार में रात हुई युवती की हत्या का जोर-शोर के साथ जिक्र था । मृत युवती के चेहरे की तस्वीर जो अखवार में छपी और खबर कुछ इस प्रकार थी---

"एक लाश पिछली रात मिली और दूसरी रात को । दोनों ही लाशों के शरीर में खुन की एक बूंद नहीं थी । दोनों लाशों के गले पर किसी तीखी चीज के चुभोए जाने के निशान मिले । हत्यारा अपने शिकार के शरीर मे से खून की आखिरी बूद तक निकाल लेता है । कौन है हत्यारा और क्यों ये हत्याएँ कर रहा है? खौफ का सिलसिला कब तक चलेगा? अब तो लोग रात के अंधेरे मे धर से बाहर निकलने में भी डरने लगे है !"

इसी सिलसिले में अखबार का यह पना भरा हुआ था । पुलिस वालों का इंटरव्यू भी छाप रखा था । अखबार में तरह-तरह की अटकलों को जन्म दे रखा था ।

मोना चौधरी ने व्याकुलता से भरी सांस ली और अखबार एक तरफ रख दिया ।

वही हुआ जिसका डर था ।

भवतारा जिन्दा हो चुका था । इंसानी लहू उसका प्रिय भोजन था । इंसानी खून पीने के लिए ही वो पुन: जीवित हुआ था । अब उसने अपने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया था । वो रात को ही बाहर निकलता था अपनी जगह से और किसी एक को शिकार बनाकर, अपने ठिकाने पर वापस चला जाता था ।

सतपाल ने ठीक कहा था कि वो जिन्दा हो गया तो कहर वरपा देगा ।

उसंने इंसानों का खून पीना शुरू कर दिया था ।

खौफनाक हकीकत थी ये ।

इसे जैसे भी हो, रोकना होगा।

और शैतान के बेटे को रोक पाना आसान न था ।

मोना चीथरी अपने ही विचारों में उलझे बेचैन होती जारही थी ।

तभी दरवाजा खटखटाकर वेटर ने भीतर प्रवेश किया और चाय-के तीन प्याले रखकर चला गया ।

वेटर के आने-जाने के बीच सतपाल की आख खुल गई ।

"बढिया किया चाय मंगवा ली ।" सतपाल उठता हुआ बोला और साथ सोए राजन को थपथपाया----" उठ जा । बहुत सो लिया ।"

राजन भी उठा।

वे तीनों वेड टी लेने लगे !

"अखबार पढ़ तो ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।

"खास खबर है क्या?" अखबार उठाता सतपाल कह उठा।

"शैतान के बेटे ने रात एक ओंर शिकार किया !" मोना चौघऱी ने गहरी सांस ली।

"क्या?" राजन चिंहुक उठा ।

"फिर तो ये बात पक्की होगई कि भवतारा जीबित ही नही हुआ, बल्कि इंसानों का खून पीना भी शुरु कर द्रिया है ।" कहने के साथ अखबार खोला और खबर पर नजरें दौडाता चला गया ।।

राजन ने भी अखबार पढा ।

वे तीनों ही अब गभीर नजर आने लगे ।

"अब ऐसी लाशें मिलती रहेगी ।" राजन बोला-…"भवतारा ये सिलसिला कभी खत्म न होने देगा ।!

"हमें उसे रोकना होगा !"

" कैसे रोकेंगे?" राजन ने सतपाल को देखा।

"वो खबरी.. .!" सतपाल ने कहना चाहा ।

" जाने वो खबरी कब मिलेगा हमें ।" मोना चौधरी उठि----" हम उसके भरोसे नहीं बैठे रह सकते !"

"मोना चौधरी ठीक कहती है ।" राजन ने कहा ।

"क्या पता तात्रिक मोहम्मद की वात सही भी है या नहीं !" मोना चौधरी ने पुन: कहा !

"मोहम्मद ने ठीक कहा या गलत, ये बात नहीं है । बात ये है कि हमें कुछ करना होगा ।"

सतपाल ने दोनों को देखा । वो बेचैन दिख रहा था ।

"अगर हमने कुछ नहीं किया तो शैतान का बेटा ऐसी लाशे बिछाकर शहर को हिला देगा ।" राजन ने पुन: कहा ।

"हम कर भी क्या सकते हैं?" सतपाल गंभीर स्वर में बोला ।

"शेतान के बेटे का ठिकाना तलाश करना होगा ।"

“इतने बड़े शहर में हम उसके ठिकाने को कहाँ तलाश करेगे?"

"कोशिश तो कर सकते हैं । हम तीन हैं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में भाग-दौड़ कर सकते हैं ।" मोना चौधरी बोली ।

" माना कि हमने उसे तलाश कर लिया. ..फिर......?" सतपाल ने दोनों को देखा ।।

" तुम कहना क्या चाहते हो ?" राजन बोला ।

"क्या हम शैतान के बेटे का मुकाबला कर पाएंगे?"

"क्यों नहीं कर सकते ?" मोना ने कहा-----" हम मुकाबला कर सकते हैं । तांत्रिक मोहम्मद हमारे साथ है । उसने कहा था कि हम लोग जब भी मुसीबत में पडेगे, तो उसे अपने पास ही पाएंगे ।"
 
सतपाल के होंठ भिंच गए ।

"एक मिनट!" राजन ने टोका और सतपाल से कहा…"क्या हम मोहम्मद पर भरोसा कर सकते हैं?"

"हां ।" सतपाल ने गंभीरता से सिर हिलाया ।

"क्या मोहम्मद शैतान के बेटे से टकराने का हौंसला रखता है?” मोना चौधरी ने पूछा ।

" पता नहीं ।" सतपाल बेचैन हुआ ।

उसी पल कमरे का दरवाजा खुला और दरवाजे पर तांत्रिक मोहम्मद खड़ा दिखा ।

वे तीनों चिहुक पड़े ।

"आप?'" सतपाल के होंठों सै निकला ।

तात्रिक मोहम्मद भीतर आया और मोना चौधरी को देखते हुए कहं उठा ।

"मैं पूरी तरह भवतारा का मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि उसकी शैतानी ताकतों की पहुच वहुत है ।"

"फिर तुम हमें किस बात की तसल्ली दे रहे थे कि तुम हमारे साथ हो ।" मोना चौधरी कह उठी ।

"हम उस पर बार कर नहीं सकते तो कम-से-कम उसके बारों से अपना बचाव तो कर सकते हैं ।। बचाव का मतलब, उस पर वार करना ही है । उसके द्वारा किए गए वार खाली जाएंगे तो वो उसकी हार ही है !" तांत्रिक मोहम्मद ने शांत स्वर में कहा ।

"फिर भी इस तरह हम ज्यादा देर तक उसका मुकाबला नहीं कर सकेंगे । उसका कोई भी वार हम पर सफल हो सकता, है ।"

तात्रिक मोहम्मद गंभीर दिखा ।

"तुम्हारी इस बात को मैं स्वीकार करता । मोना चौधरी! जब दुश्मन ताकतवर हो तो उसे चालाकी से मारा जाना चाहिए ।"

"चालाकी-मैँ समझी नहीं?”

"तुम्हारी सब बातों का जवाब 'खबरी' देगा ।"

"आखिर खबरी है कौन?"

"ये तो मैं भी नहीं जानता । इस बात का रहस्य तो वक्त आने पर ही खुलेगा है"

"और वक्त कब आएगा ?"

"कभी भी आ सकता है । आज भी आ सकता है और महीने बाद भी ।। कई बातों का ज़वाब मेरे पास भी नहीं ।"

"क्या हम बाहर निकलकर शैतान के बेटे के ठिकाने की तलाश करने की चेष्टा कर सकते हैं?"

“अवश्य, परंतु ये इतना आसान नहीं होगा, उसके बारे मे कोई जानकारी पा लेना असंभव जैसा है । फिर भी कोशिश कर सकते हो ।"

"क्या हम शैतान के बेटे को, खत्म कर पाने में सफ़ल होंगे?" राजन ने पूछा ।

" तुम लोगों की बुद्धि पर निर्भर है !"

" बुद्धि ?"

" मैने पंहले ही कहा है कि दुश्मन ताकतवर हो तो चालाकी से काम लेना चाहिए ।"

"तुम एकाएक कैसे हम तक पहुच जाते हो या पास ही में कहीं हो?" सतपाल ने पूछा।

"मेरे तार तुम लोर्गो से बंधे हुए है अब । जब तुम मेरी बात करोगे या खतरे में महसूस करोगे तो मुझे खबर हो जाएगी । तब मैं आना

चाहूं तो उसी पल अपने सूक्ष्म शरीर के साथ हाजिर हो सकता हूं . . । जैसे कि अब हुआ हूं।”

“ये तुम्हारा सूक्ष्म शरीर है?” सतपाल ने अजीब-से स्वर मे कहा ।

तांत्रिक मोहम्मद के चेहरे पर रहस्य से भरी मुस्कान उभरी और लुप्त हो गई ।

वे तीनों उसे ही देख रहे थे

तात्रिक मोहम्मद पलटा और खुले दरवाजे से बाहर निकल गया ।

उसी पल मोना चौधरी तेजी से दरवाजे की तरफ़ बढी और फिर दरवाजे से बाहर झांका परंतु तांत्रिक मोहम्मद कहीं भी न दिखा ।

वो गायब से चुका था ।

" हमें…!" तभी राजन ने कहा---“शेतान के बेटे का ठिकाना तलाश करने की चेष्टा करनी चाहिए ।"

मोना चौधरी और सतपाल उसकी बात से सहमत थे, परंतु ये भी मानते थे कि ये वेहद कठिन काम है ।

@@@@@@@@@@@@@@@

भवतारा जब तैयार हुआ तो दिन का एक बज रहा था । आईने के सामने खड़े होकर उसने बाल संवारे । नए कपडे पहने हुए थे । होंठों के बीच मीठी मुस्कान तैर रही थी । दो घंटे पहले जब नीद से उठा था तो मंगलू को वहां नहीं पाया था । वो समझ गया कि मंगलू मंदिर के बाहर वाली पुलिया पर ही होगा । पुलिया के विचार के. साथ ही उसकी आंखों सामने कामिनी का चेहरा उभरा और गहरी सांस लेकर रह गया । सच में उसकी सुंदरता काबिले-तारीफ थी ।।

भवतारा ने अलमारी के नीचे बाले खाने मे रखा छोटा सा ब्रीफकेस निकाला, जो कि पुराना था, परंतु नए के हाल में था । उसने अच्छी तरह ब्रीफकेस साफ़ किया और उसे खोला।

वो खाली था । भवतारा ने ब्रीफकेस सामने रखा । उसे बंद किया, फिर ब्रीफ्लोस पर हाथ रखे आखें बंद किए होठों-ही-होंठों में कुछ बड़बड़ाने लगा ।

ये सिलसिला करीब दो मिनट तक चला।

उसके बाद वो रुका, ब्रीफकेस पर हाथ फेरा, फिर उसे खोला । अब ब्रीफकेस में ठसाठस नोटों की गडिडया भरी थी ।

भवतारा मुस्कराया । ब्रीफकेस बंद किया और उसे साथ लिए उठ खडा हुआ ।

ठीक इसी पल वहां जंगला की आवाज गूंजी ।

"शेतान के बेटे को जंगला का नमस्कार ।"

भवतारा ठिठका और शान्त स्वर में बोला ।

"कहो जंगला !"

"मालिक-बेलीराम बहुत परेशान हो रहा है ।"

"क्यों? "

"तांत्रिक मोहम्मद उसे धमकियों दे रहा है क्योंकि मैंने उसकी शक्तियों वाला धागा तोड दिया था, आपके चाकूकी रक्षा करते हुए ।"

"हूं !"

"रात मोहम्मद ने बेलीराम को मारा मी !"

"मुझसे क्या चाहते हो?”

“बेलीराम आपसे मोहम्मद की शिकायत करना चाहता था ।। रात की बात है, आप नीद में थे तो मैंने बेलीराम से बात की । वो चाहता है कि आप स्वयं मोहम्मद से निबटे । मोहम्मद मानने वाला नहीं । वो और तंग करेगा।”

शैतान के बेटे का चेहरा बिल्कुल शांत था ।

"मुझें इस मामले में आने की क्या जरूरत है । बेलीराम को चाहिए कि बौ मोहम्मद को समझाए ।"

"मोहम्मद मानने वाला नहीं ।"

"क्या चाहता है वो?" भवतारा ने पूछा ।

"ये स्पष्ट नहीं है, परंतु वो बेलीराम को तंग करने में लगा हुआ है ।" जंगला की आवाज गूंज रही थी ।"

“बेलीराम से कहो कि वो मोहम्मद से निबट ले ।"

"मोहम्मद ज्यादा ताकत रखता है मालिक... ।"

भवतारां के माथे पर वल उभरे ।

“तो बेलीराम ताकते इकट्ठी करके मोहम्मद का मुकाबला कर सकता है ।"

"बेलीराम के बस का नहीं लगता, मोहम्मद से निबटना।"

"बेलीराम चाहता है कि ये काम मैं करूं?”

“उसकी यहीं इच्छा है !"

"क्या में लड़ाई-झगाडों के लिए जीवित हुआ हूं। क्या इन्हीं कामो के लिए मैंने इतनी मेहनत की?"

जंगला की तरफ से कोई आवाज नहीं आईं ।

"मैं अपने आराम के लिए जीवित हुआ हूं । इंसानी खून पीने की इच्छा को शांत करने के लिए जीवित हुआ हू। इंसानी जीवन का आनन्द लेने के लिए मैं पुन: अपने शरीर आया हूं । ऐसे में मैं अपना सुनहरी वक्त झगडों में क्यों खराब करूं !"

"आप ठीक कह रहे हैं मलिक !"

"इंसानी खून मेरी शक्तियों को बढाएगा । मेरा शैतान और ताकतवर होगा । बेलीराम को अच्छी तरह समझा दो कि मैं झगडों के लिए अपने शरीर में नहीं आया । मेरे अपने कुछ लक्ष्य है । उन्हें पाना है मैंने ।" भवतारा का स्वर तीखा था ।

"जी मालिक !"

" उससे कहो कि अपने तौर पर मोहम्मद से निबटे, शैतानी शक्तियों को इकटूठा कर ले । तब मोहम्मद बच नहीं पाएगा ।"

"में कह दूगा ।"

"मोहम्मद पर विजय हासिल करने के बाद, मुझें अवश्य खबर करे ।"

"जी मालिक!"

"मैं सिर्फ एक से ही झगडा करूंगा ।‘"

"किससे?"

"सतपाल से । उसने मेरे शैतानों को यहां से वापस हमारी धरती पर भेजा है । मेरे जो शैतान धरती पर आकर, इंसानी शरीरों में प्रवेश करके यहाँ का मजा लेना चाहते हैं, सतपाल उन्हें अपनी ताकतों से वापस भेज देता है । गलत करता है वो । वहुत शिकायतें मेरे पास आई हैं उसकी । उसका जीवित रहना नुकसानदेह है हमारे लिए । मेरे लिए उसकी जान लेना जरूरी है ।"

"बो तीन भाई है ।"
 
"तीनों ही मरेंगे । मैं अपने चंद खास काम कर लूं, फिर इन तीनों को मौत दूंगा । इनके अलावा और किसी से मैं झगडा नहीं करू'गा । मुझे इंसार्नी खून पीकर अपनी ताकतों को मजवूत करना है । इतना मजबूत कि जव यहां से वापस जाऊं तो इतना ताकतवर बन जाऊं कि पूरा शैतान वन जाऊं । अपने पिता से भी ज्यादा ताकतवर ।"

" ऐसा ही होगा मालिक!"

"मेरे पिता अब बूढे हो चुके हैं । शायद डरने भी लगे है । उन्होंने मुझे बहुत रोका कि मैं अभी अपने शरीर में वापस न जाऊं, ये समय उचित नहीं है । मेरे ख्याल में ये उनका डर बोल रहा था । समय तो अपने हाथ में होता है । समय को उचित या अनुचित बनाना भी अपने हाथ में होता है । मेरे पिता अब कमजोर होते जा रहे हे`। जल्द ही मुझें उनकी जगह संभालनी होगी ।"

" ऐसा ही होगा मालिक ।"

"बेलीराम को समझा दो कि मोहम्मद का मुकाबला करे। उसे खत्म कर दिया जाए । इस काम में तुम भी बेलीराम की सहायता करो । बेशक नर्क से कुछ और शैतानों को बुला लो, परंतु मोहम्मद को सबक सिखाकर रहो ।" भवतारा ने कठोर स्वर में कहा ।

"अवश्य मालिक! मैं अभी बेलीराम से इस बारे में बात करता हूं !"

भवतारा ने, कुछ न कहा और ब्रीफकेस थामे कमरे से बाहर निकल गया ।

@@@@@@@@@@@@@@@

" ओह मा! "कामिनी एकाएक बडबडाकर पुलिया से उठ गई-----“मैँ जाती हूं।"

"इतनी जल्दी?" मंगलू के होंठों से निकला ।

"बहुत देर हो गई और वो भी आ रहा है, तुम्हारा मालिक !"

मंगलू ने फौरन गर्दन घुमाकर देखा ।

भवतारा ब्रीफकेस थामे इसी तरफ़ बढता आ रहा था ।

" तुम जाओ ।" मंगलू बेचैनी से कह उठा-"कल मिलना-----यहीं पर ।”

“ठीक है !" कामिनी ने कहा औंर पलटकर तेजी से आगे बढती चली गई ।

भवतारा पास आ पहुचा ।

“कामिनी को क्यों भेज दिया तुमने !" भवतारा ने मुस्कास्कऱ पूछा ।

"मैंने कहां भेजा,वो तो अपने आप गई है ।" मगलू कह उठा।

भवतारा जवाब में सिर्फ मुस्कराकर रह गया।

"रात तुमने क्या किया ?” एकाएक मंगलू ने पूछा ।

" रात' "

"हां, उस लडकी के साथ गली में .......?" मंगलू का स्वर तीखा हो गया ।

"क्या किया?" भवतारा ने उसे देखा !

"तुम्हें अच्छी तरह पता होगा, क्योंकि जो किया, तुमने किया है !" मगलू की निगाह उस पर थी ।

“रात गई, बात गई ।"

"तुमने उसे मार दिया । रात तुम्हारे कपडों पर खून लगा हुआ था ।"

" अच्छा मुझे नहीं पता ।"

" कैसे मारा उसे तुमने-------क्यों मारा? मैंने पास जाकर उसकी लाश देखी थी । तुम्हे दूढ़ने गया था वहां मैं !"

"रात की बात मत करों !"

"क्यों न करूँ ? तुम्हारे कहने पर मैंने उसे भेजा, लेकिन तुमने उसकी जान ले ली ।"

भवतारा मुस्कराया ।

मगंलू गुस्से से उसे देखता रहा ।

कुछ पल ऐसे ही बीत गए ।।

मंगलू ने उसके हाथ में पकड़े ब्रीफकेस को देखा ।

"इसमें क्या है?"

"कुछ सामान है !"

"कहा जाना है है !"

" तुम यहीं रहो, मुझे अकेले ही जाना है । जल्दी वापस आऊंगा, उसके बाद एक साथ चलेगे !"

"एक साथ----- आज फिर थकाओगे मुझे।"

भवतारा पुनः मुस्कराया ।

" मेरे पैसे कब दोगे ?"

" जल्दी ही , रोज रोज पैसों की बात मत किया करो !"

" मुझे जरूरत है पैसों की !"

" अच्छा !" भवतारा होले से हंसा…" क्या करना है तुम्हें पैसौं का ?"

मंगलू होंठ भीचकर रह गया ।

" जब नाराज होते हो तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो ।" भवतारा बोला ।।

"एक तो मेरे पैसे नही दे रहे, ऊपर से मेरा मजाक उड़ा रहेहो।"

"तू मेरा दोस्त है मंगलू .! मैँ तेरा मजाक कैसे उडा सकता हूं ? ये तो हमारे बीच प्यार-भरी बाते होरही हैं।"

मंगलू मुह फेरे रहा ।

" कामिनी क्या कह रही थी ?"

"कुछ नहीं ।"

"मेरे वारे में कोई बात तो कर रही होगी?"

"कह रही थी तुम्हारे मालिक से डर लगता है ।" मगलू ने तीखे स्वर में कहा-"तुम क्यों पूछ रहे हो?”

" यूं ही ।" भवतारा होले से हंसा--"कामिनी मुझे अच्छी लगती है । तुम्हें भी अच्छी लगती है क्या?"

" वो बंदरी मुझे क्या अच्छी लगेगी? खामखाह यहां जाकर बैठ जाती है ।" मंगलू मुंह बनाकर कह उठा ।

भवतारा विना कुछ कहे आगे बढ गया ।

मंगलू पीछे से, भवतारा को खा जाने वाली नजरों से देखता रहा ।

@@@@@@@@@@@@@@@

भवतारा ऐसे आगे बढा जा रहा था जैसे कि उसे पता हो कि कहाँ जाना है । पुलिया से काफी आगे जाकर उसने सडक छोड्री और कच्चे रास्ते पर उतर गया ।

सामने ही कच्चे-पक्के मकानों की कालोनी नजर आ रही थी । वहां पर लोग आते-जाते और छोटे बच्चे खेलते नजर आ रहे थे ।

हल्की-सी धूप खिली हुई थी । वो कच्चा रास्ता पार करके भवतारा कालोनी की बाहरी सढ़क पर ही आगे बढ़ गया । कुछ आगे सड़क किनारे झोंपडी बनी हुई थी । पास ही दो पेडों की छांव: में, एक बूढा-सा आदमी टेबल लगाए प्रेस कर रहा था ।

भवतारा उसके पास आकर रुका । कपडे प्रेस करने वाले ने गर्म प्रेस पत्थर पर रखते हुए उन्हें देखा ।

"कहिए बाबू जी?" वो बोला-" किसका पता पूछना है?”

"नाम क्या है तुम्हारा ?" भवतारा ने मधुर स्वर में पूछा ।

" दीनू।" वो सवालिया नजरों से उसे देखने लगा ।

"कामिनी तुम्हारी बेटी है?”

"हां !" वो अचकचाया----" उससे कोई गलती हो गई बाबूजी?"

"नहीं, मैं मंदिर में रहता हूं । कामिनी वहां कपड़े देने आती है । देखा उसे कई बार ।"

दीनू भवतारा को देखता रहा ।

"मैं तुमसे ही मिलने आया हू बिठाओगे नहीं मुझे?"

"जरूर बिठाऊंगा ।"

फिर उसने झोपड़ी की तरफ मुह करके आवाज लगाई-"कामिनी , ओ कामिनी!"

"आई बापू ।" झोंपडी के भीतर से कामिनी की आवाज आई ।

"कुर्सी लेकर आ बैठने के लिए, साब आए है ।"

चंद पलों बाद कामिनी फोल्डिंग चेयर उठाए झोंपड़े से बाहर निकली । भवतारा को देखते ही वो ठिठकी । पहले चेहरे पर हैरानी आई फिर नापसंदगी के भाव आ ठहरे।

भवतारा उसे देखकर प्यार से मुस्कराया ।

" ला-ला, कुर्सी ला ।" दीनू बोला ।
 
कामिनी अनमने मन से पास आई और पुरानी-सी कुर्सी खोलकर रख दी !

"बैठो बाबूजी! और तू जा, साबजी के लिए चाय बना ला । मदिर से आए हैं ।"

कामिनी विना कुछ कहे वापस चली गई ।

भवतारा कुर्सी पर बैठा ।।

दीनू उसके पास ही नीचे बैठता हुआ कह उठा ।

"कहिए बाबूजी! वैसे मैं कपड़े ठीक से प्रेस करता हूं। अगर कही कमी रह गई हो तो.. !"

" ऐसी बात नहीं है ।" भवतारा ने मुस्कराकर मधुर स्वर में कहा ।

"तों?”

"मुझे तुम्हारी बेटी कामिनी वहुत अच्छी लगी ।"

"ये क्या कह रहे हैं बाबूजी?" दीनू हैरानी से कह उठा ।।

"क्यो-क्या मुझे तुम्हारी बेटी पसंद नहीं आ सकती?" भवतारा : उसी मधुर अंदाज में बोला ।

"कहां आप, कहाँ हम-----ये नहीं हो सकता ।"

" दीनू मुझ पर भरोसा रखो ।"

"नहीं बाबूजी ये नहीं हो सकता ।" दीनू हाथ सिर हिलाता कह उठा… " हम ठहरे गरीब झोंपडी वाले और...!"

" मैने तुमसे अभी तो जवाब नहीं मांगा ।"

दीनू को समझ न आ रहा था कि क्या कहे और क्या न कहे ।

"ये रख लो ।" भवतारा उसकी तरफ़ ब्रीफकेस बढाता हुआ बोला ।

"क्या है इसमें?" दीनू अजीब-से स्वर में बोला ।

भवतारा ने ब्रीफकेस खोला और उसे दिखाया ।

भीतर ठूंसी नोटों की गड्डियां देखकर दीनू की घिग्गी बंध गई ।

भवतारा ने ब्रीफकेस बंद करके दीनू के पास रखा और उठते हुए बोला ।

"मै फिर आऊंगा दीनू! मेरी बात मानोगे तो कामिनी राज करेगी, राज़ ।" भवतारा ने मधुर स्वर में कहा और बापस चल पडा ।

दीनू फटी-फटी आखों से पास रखे ब्रीफकेस को देखे जा रहा था ।

@@@@@@@@@@@@@@@

दीनू घबराया-हड़बड़ाया सा ब्रीफकेस थामे झोंपड़े में प्रविष्ट हुआ ।

"कामिनी की मा---" ओ बसन्ती!"

"चिल्ला क्यों रहा है बूढे, दिखता नहीं, तेरे सामने बैठी हूं।"

पचपन बरस की औरत पीली साड्री पहने प्याज काट रही थी । पास ही कामिनी अपनी किताब खोले पन्ने पलट रही थी कि अपने बापु के हाथ में ब्रीफकेस देखकर उसकी आखें सिकुडी ।

"ये हाथ में छोटा बैग क्या थाम रखा है बापू?" कामिनी कह उठी ।

“ये....ये हमारा भाग्य है ।" दीनू खुशी से कहता पास ही बैठ गया ।

"भाग्य?"

“बूढा पागल हो गया लगता है ।" बसन्ती ने मुह बनाकर कहा ।

"हां, मैं पागल हो गया हूं , तुम भी पूरी बात सुनकर पागल हो जाओगी !"

" ऐसा क्या?"

"हाँ ।"

"तो बता-क्या बात है?" बसन्ती ने पूछा ।

" 'बापू! ये बैग तो मैंने उस आदमी के हाथों

में देखा था ।" कामिनी बोली ।

"तू थोडी देर चुप रहेगी ।" दीनू ने कामिनी को झिड़का ।

कामिनी खामोश हो गई ।

दोनों ही दीनू को देख रही थी ।

दीनू ने कांपते हाथों से ब्रीफकेस खोला ।

" ये देख कितने सारे नोट ।

बसन्ती की आखें फैल गई, ब्रीफकेस में पडी नोटों की गड्डिर्यो को देखते ही ।

" हे राम! " बसन्ती के होंठो से निकला ।

बसन्ती के चेहरे पर अजीब-से भाव आ ठहरे थे ।

"एकदम असली है । दीनू खुशी से बोला।

"क्यों बूढे--कहीं चोरी की तूने ?" बसन्ती एकाएक कह उठी ।

"शुभ बोल, शुभ! ! मैं क्या तेरे को चोर दिखता हूं । किसी की कमीज की जेब से प्रेस करते वक्त दस रुपए भी मिलते हैं तो उसे वापस कर देता हू , जबकि तू ही कहती है कि रख लिया करो , लेकिन मै बापस ......!"

"अपनी बडाई मत कर बूढे! काम की बात बता, पैसे कहा से लिए?" बसन्ती प्याज काटना भूल गई थी ।

"साहब आया था अभी, वो दे गया । तूने उसे चाय भी नहीं पिलाई ।"

"क्यों दे गया वो ?"

" उसे कमिनी पसंद आगई है !"

"पसंद आ गई है?" बसंती के होठो से निकला ।

ज़बकि कामिनी चौक पड्री थी।

"हां, वो कामिनी से शादी करना चाहता है ।"

'बूढा है वो?"

"नहीँ, एकदम कडक नौजवान सजीला है । कामिनी ने तो देखा भी है उसे, क्यों कामिनी?"

कामिनी हक्की-बक्की थी ।

"जवान है तो इतना पैसा काए को दिया?"

" बहुत पैसा होगा उसने पास तभी दिया । बड़ा अमीर लगता वो ।"

"रहता कहां है?"

"कह रहा था मंदिर में रहता है ।कुछ दिन के लिए मंदिर में रहने आया होगा । हमारे तो भाग्य खुल गए ।"
 
बसन्ती चमक-भरी नजरों से ब्रीफकेस में पड्री नोटों की गड्डियों को देख रही थी ।

"कितने पैसे हैं ?" पूछा बसन्ती ने।

"मुझे गिनने कहाँ आवे । कामिनी पढी-लिखी है, ये ही गिनती..... !"

"मुझे नहीं करनी उससे शादी !" कामिनी एकाएक कह उठी ।

""क्यों?" बसन्ती ने उसी पल तुनकर पूछा।

" मुझे बो अच्छा नहीं लगता ।"

"दिमाग तो खराब नहीं हो गया तेरा । बूढा ठीक कहता है कि हमारा भाग्य खुल गया है । तू भी क्या प्रेस करने वाले से या ठेला खींचने बाले से व्याह करेगी सारी जिन्दगी उसके साथ खराब कर देगी । तेरी शादी उसी से होगी ।"

"मैँ नहीं करूंगी उससे, वो मुझे अच्छा नहीं लगता ।"

"वो पैसे वाला है । देखे तो कितना दे गया है, अभी तो वो ओऱ देगा । तुझे रानी बनाकर रखेगा !"

"बोला तो .......।" कामिनी ने उठते हुए पांव पटके-----" मै उससे शादी नहीं करूंगी ।"

"तू क्या तेरी तो मां भी करेगी ।" दीनू उखड़कर बोला ।

"तो मां उससे शादी कर ले । मुझे नहीं करनी ।" कामिनी ने पाव पटकते हुए कहा और झोंपड़े से बाहर निकल गई ।

" देखा बूढे! कैसे नखरे दिखा रही है, अब तो टिड्डिर्यो को मी पर लग गए हैं, उडी जा रही है।”

"सब्र रख-सब्र रख !"

"क्या सब्र रखूं । पहली बार तो नोट देखे हैं और तू कहता है कि सब्र रख । कभी खाने देगा भी या नहीं!"

" पेट-भर के खाइयों, रिशतेदारों को भी खिलाइयो, लेकिन सब्र रख । छोरी उखड्री जा रही है, मना तो लेने दे उसे !"

"तू फिक्र मत कर बूढे मैं उसे सीधे रास्ते पर ले आऊंगी !"

“प्यार से, डंडा दिखा के नहीं, छोरी जवान हो रही है, भाग गई तो मुह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे ।"

"दुनिया की छोकरियों भागती हैं, वो क्या मर जाते हैं । कामिनी को मैं समझा दूंगी ।" बसन्ती ने बांह नचा के कहा…"तू जाके कपडे प्रेस कर, ग्राहकों को टेम पे देने हैं ।"

"कामिनी से कहना, नोट गिनकर तो बताइए कि कितने हैं ?"

"तू बाहर जाकर नोटों का ढोल न पीटता फिरियो। कहीं सुबह तक हमारी गर्दनें क्टी पडी हों और काम खत्म हो जाए ।"

"मेरे को क्या बच्चा समझती...!"

"जा बूढे जा, मेरा भेजा मत चाट । जरा नोटों पर हाथ फेर के तो देख लूं।"

"कभी मेरे पे भी हांथ फेर लिया कर.. .मैं...!"

"बेरी के सड़े पेड़, तेरे बदन पर कांटों के अलावा और क्या है जो हाथ फेरू । सठिया गया है तू !"

दीनु ने बाहर निकल जाने में ही भलाई समझी ।

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भवतारा और मंगलू कल की तरह आज भी सड़को पर घूमते रहे । अब शाम हो रहीं थी । सूर्य पश्चिम की तरफ सरकता जा रहा था । लाली बढती जा रही थी । आखिरकार मंगलू कह उठा ।

" तुमने आज फिर थका दिया ।"

भवतारा ने कुछ नहीं कहा ।

"इस तरह घूमने से तुम्हें क्या मिलता है !"

" मुझे अच्छा लगता है घूमना ।"

" तो मुझे अपने साथ क्यों रखते हो?" मंगलू झल्लाया ।

" तुम दोस्त हो, मेरे साथ नहीं रहोगे तो किधर रहोगे ।" भवतारा मुस्कराकर बोला ।।

"दोस्त…!"

"क्यों, मेरे दोस्त नहीं हो क्या?"

“तुम मुझें दौलत तो देते नहीं, जो देने का वादा किया था, फिर दोस्त क्या हो तुम ?"

" पैसा, मेरी नजरों में तुम्हें पैसे की जरूरत नहीं है ।"

" कयों नहीं है?"

"तुमने करना ही क्या हैं पैसे का । पैसा आ जाने से इंसान अपने मकसद से भटक जाता है । क्या तुम भी भटकना चाहते हो?"

"अजीब बाते कर रहे हो तुम, मेरा मकसद ही क्या है,.जो मै भटक जाऊंगा?"

"तुम्हारा मकसद मेरी सेवा करना है । एक दोस्त की तरह मेरा ख्याल रखना है । पैसा मिलते ही तुम भटक जाओगे ।"

“समझा, तुम ये सोचते हो कि तुमने मुझे पैसा दिया तो मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊंगा?"

"हां ।"

"मैं ऐसा नहीं करूंगा । मैं तुम्हारे पास ही, तुम्हारी सेवा में रहूंगा !"

"पकाका ?"

"हां, पक्का वादा ।"

"ठीक है ।"

"तो लाओ मुझे पैसा दो ।"

"तुम्हारे लिए तो पैसा बेकार की चीज है ।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुमने हर पल मेरी सेवा में रहना है। पैसे का तो इस्तेमाल करना ही नहीं है तुमने फिर तुम्हें पैसे की चाह क्यों ?"

" पैसे पास में होगा तो नीद अच्छी आती है ।" उसने कड़वे स्वर कहा ।।

"मैं जानता हु, नींद तुम्हें वैसे भी अच्छी आती है !"

“मैं सब समझता हूं, तुम मुझे पैसा देना नहीं चाहते ।"

" नाराज क्यों होता है मंगलू! कुछ दिन ठहर, मेरा पैसा आने वाला हैं, जरूर दूंगा तुम्हें ।"

मंगलू नाराज-सा दूसरी तरफ, देखता रहा ।

“में तुम्हें इतना पैसे दूगा, तुम संभाल नहीं सकोगे ।"

"कब दोगे?"

" जल्दी ही, मेरे कुछ काम हैं, वो पूरे हो लेने दो ।"

" मुझे बताओं क्या काम है?"

"बताने की जरूरत नहीं । वो मैंने ही पूरे करने है, ।" भवतारा ने कहा । दोनों फुटपाथ पर आगे बढे जा रहे थे । सड़क पर वाहन आ जा

रहे थे ।

"मैं तुम्हें अभी तक ठीक से समझ नहीं पाया ।"

"मुझे क्या समझना है, मैं तो तुम्हारा दोस्त हूं।"

मंगलु ने गहरी सांस ली और दूसरी तरफ देखने लगा ।

कुछ देर बाद भवतारा ने कहा ।
 
वो जगह कितनी दूर है, जहाँ कल शाम वो लडकी हमें मिली थी।

"थोडी ही दूर है------क्यों ?"

“चलो, वहीं चलते है ।"

"नहीं ।"

"क्यों?"

"आज फिर कोई लड़की मिल गई तो तुम फिर उसे मार दोगे, क्योंकि उसे देने को तुम्हारे पास पैसा तो है नहीं । काम हो जाने के बाद वो तुमसे पैसे मांगेगी, झगडा करेगी और तुम्हें गुस्सा आ जाएगा ।"

"आज नहीं मारूगा ।।"

" मुझे तुम विश्वास नहीं ।"

" हम दोस्त है ,तुम्हें मुझ पर भरोसा करना चाहिए !"

" जब तक तुम मुझे पैसा नहीं दोगे, मुझे तुम पर भरोसा नहीं होगा । तुम अपना वादा पूरा करों !"

" अब, इसी वक्त तो वादा पूरा कर नहीं कर सर्कता । दो-चार दिन रुको, तुम्हें पैसा मिल ज़ाएगा !"

“ये बात तो तुम कब से कह रहे हो?"

"तुम्हारी शिकायत जल्दी ही दूरकर दूंगा !"

मंगलू चुप रहा !

"चलो, आज फिर कल वाली जगह पर चलते हैं !"

"कल तो तुमने उस लड़की के साथ किया था, आज फिर क्या जरूरत पड़ गई ?"

"मन कर रहा है 1"

"ये अच्छी बात नहीं है !"

“चलों भी मंगलू! तुम बहस वहुत करते हो !"

" जब मेरे पैसे दे दोगे तो तब बहसं नहीं करूगा !"

“दे दूंगा । मैं दोस्तों से दगा नहीं करता, ,परंतु जब तुम अड जाते हो तो अच्छा नहीं लगता !"

"आओं सड़क पार करै । कल वाली जगह पर जाने के लिए हमें उस तरफ चलना होगा !" मंगलू ने कहा !!

दोनों ने रास्ता बदला और उस तरफ बढ़ गए ।

सूर्य पश्चिम में छिप चुका था !! अब लाली ही बहा बची थी ।

"तुमने बताया नहीं कि आज कामिनी से तुम्हारी क्या वात हुई ?" भवतारा कह उठा ।

"मुझसे कामिनी की बात मत करो !"

"क्यों ?"

"बो मुझे अच्छी नहीं लगती !”

" उसमें बुराई क्या है, मुझे तो काफी अच्छी लगती है !"

"तुम्हें लगती होगी, मुझे नहीं अच्छी लगती !" मंगलू ने, मुंह बनाकर कहा !

भवतारा मुस्कराकर रह गया । कहा कुछ नहीं ।

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अंधेरा धिर चुका था।

कुछ पहले ही उजाला छुई-मुई-सा अंधेरे की गोदने जा सिमटा था । आकाश में तारे चमकते नजर आने लगे थे । मद्धिम सी ठंडी हवा चलने लगी थी ।

भवतारा और मंगलू कल वाली जगह पर ही खडे थे । भवतारा के शरीर में कई बार ऐठन उठ चुकी थी । इस दौरान चेहरे का स्वरूप बदला, किसी दरिंदे जैसा लगने लगा था बो, परंतु शीघ्र ही उसने अपने आप पर काबू पा लिया था ।

मंगलू अंधेरे में उसके बदले रूप को नहीं देख पाया था । उसका ध्यान दूसरी तरफ था ।

"क्या पता आज कल की तरह कोई लड़की न मिले ।" मंगलू कह उठा ।

"क्या पता मिल जाए ।" भवतारा के शरीर में रह-रहकर ऐठन के भाव उठ रहे थे।

मगंलू की नज़रे आस-पास को उठ रही थीं ।

यही वक्त था कि स्कूटी पर कल वाली युवती वहाँ से निकली । उन्हें देखा । मंगलू को उसने पहचान लिया था । घूमकर पुन: वापस आई और उसके पास स्कूटी रोककर बोली ।

"क्यों हीरों आज तो नोट लाया होगा, चलना है क्या ?"

भवतारा मंगलू के कानों में बोला ।

"ये ठीक है ।"

“तुम गली में चलो , मैं इससे बात करके उस तरफ़ भेजता हूं।" मंगलू ने कहा ।

भवतारा वहां से हटा और कुछ दूर नजर आ रही, कल वाली गली की तरफ चल पड़ा ।।

"उसे कहां खिसका दिया , वो भी चल जाता ।"

मंगलू उसके पास पहुँचा !

"मैं आज उसे खास तौर से तुम्हारे लिए यहाँ लायां हूँ ।" मंगलू ने कहा ।

"मेरे लिए?"

"हां । कल मैंने तेरे को देखा तो तू मुझे अच्छी लगी । वो मेरा मालिक है । उसे ले आया ।“

"तो वो चला किधर गया?" लडकी ने दूर भवतारा को जाते देखा ।

"शर्म आती है उसे मेरे से । मैंनै उसे गली में भेज दिया, तू स्कूटी यही खडी कर और उसके पीछे जा ?"

" नोट कौन देगा ?"

" वो ही देगा । वहुत पैसे वाला है, बात तय करके नोट उससे पहले है ही ले लेना ।"

"समझी, परंतु गती में कोई आ जाएगा । मेरे पास जगह है, मैं उसे वहीं ले जाती हूं !"

"आज तो गली मे निबटा ले, आगे की बात पक्की करके उसे अपने ठिकाने का पता दे देना ।"

"ठीक है । ऐसे ही सही !" वो स्कूटी से उतरी और उसे सड़क किनारे खड़ा किया----"तू यहीं है ना ।"

"हां ।"

"स्कूटी का ध्यान रखना । कोई उठाकर न ले जाए इसे ।"

“फिक्र मत कर ।"

"नाम क्या है उसका?"

"भवतारा ।। "

"बहुत अजीब नाम है ।" कहने के साथ ही युवती उस तरफ बढ गई, जिधर भवतारा गया था ।

मंगलू अपनी जगह खडा युवती को जाते देखता रहा ।

जब वो कुछ आगे चली गई तो मंगलू दबे पाव उसके पीछे चल पड़ा । आज वो देख लेना चाहता था कि लड़की के पैसे मांगने पर भवतारा क्या करेगा । उसे डर था कि कही आज भी वो युवती का खून न कर दे ।

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लडकी ने गली में कदम रखा। सिर्फ एक लैम्प पोस्ट जल रहा था, जिसकी रोशनी अपर्याप्त थी । अधिकतर गली अंधेरे में थी । युवती कछ आगे सर्व, परंतु भवतारा उसे न दिखा । वो ठिठकी ।

"कहां हो तुम?" युवती ने पुकारा।

कोई जवाब नहीं ।

"शरमाकर छिप क्यों गए, सामने आ जाओ ।" युवती होले-होले आगे बढने लगी ।

उसके आगे वढ़ने की आहट कमी-कभार गूंज जाती थी ।

वो लगभगं आधी गली तक आ पहुची थी ।

"अगर अब तुम सामने न आए तो मैं चली....... !" युवती अपने शब्द पूरे न कर सकी । पास ही के अंधेरे से कोई दरिंदा युवती पर झपटा और उसे अंधेरे में खींचकर ले गया।

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दुर गली के किनारे से झाकते मंगलू ने ये सब देखा ।

"साला" मंगलू बड़बड़ाया-----"नोर्टों की बात किए बिना ही लड़की को पकड लिया । काम के बाद झगडा होगा । वो नोट मांगेगी और वो देगा नहीं ।" मंगलू गली के भीतर नजरे ट्रिकाए खड़ा रहा। देखता रहा ।

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"छोड भी ये क्या कर रंहा है?" युवती का स्वर गूंजा ।

"थोड़ा और ।"

"नहीं, मैं थक गई हूं । पीछे हट, कपड़े पहनने दे मुझे।"

ये बातें हो रही थी गली में । अंधेरे में दीवार के साथ खडी कार के भीतर । कार की पीछे वाली सीट पर 18 बरस की कमसिन युवती और बीस बरस का लड़का मौजूद था । घुप्प अंधेरा था कार में ।

लडकी के पक्के इनकार के बाद युवक ने जिद नहीं की । दोनों कपड़े पहनने लगे ।

"मजा आया?” लडके ने पेछा ।

मुझे मम्मी की चिंता हो रही बहुत देर हो गई घर से निकले ।" युवती की आवाज सुनाई दी ।

" पढने निकली हो तो देर हो ही जाती है ।”

"मम्मी ने उस सहेली के यहाँ फोन कर लिया, जिसका नाम लेकर निकली हूँ तो क्या होगा?"

" तुम तो खामखाह घबराती हो ।"

"सुबह मुझे फोन करना ।"

"क्यों ?"

"मम्मी दो दिन के लिए मौसी के घर जा रही हैं । दिन में मैं घर में अकेली रहूंगी ।"

" वाह! ये हुई बात !"

"छोडी भी, तुम्हें तो इन कामों के अलावा कुछ आता ही नहीं ।” उसकी हंसने की आवाज़ सुनाई र्दी।।

"उम्र ही ऐसी है ।"

"चलो अब आगे वाली सीट पर चलते हैं । जल्दी से निकलो यहा से, मुझें धर पहुंचना है ।"

" दिल नहीं करता कि तुम जाओ !"

" ऐसा है तो मेरे से शादी क्यों नहीं कर लेते ?" युवती बोली ।

"दो बडी बहने हैं घर में, उनकी शादी से पहले मेरी शादी तो हो ही नहीँ सकती । चलो अब चले !"

दोनों पीछे बाती सीट से आगे वाली सीटों पर आए ।

युवक ने कार स्टार्ट की ।

हैडलाइट आँन की ।

उसी पल पूरी गली प्रकाश से जगमगा उठी ।

अगले ही क्षण युवक और युवती जड़ रह गए । नजारा ही ऐसा था ।।

उनकी कार से पंद्रह फीट आगे वो दरिन्दा युवती को अपनी टांगों में भीचे नीचे बैठा था । उसके मुंह से निकले दात युवती के गले में धंसे थे । सिर के बोल खडे थे । चेहरा ऐसा भयानक कि ऐसे … चेहरे को देखने की किसी ने कल्पना भी न की होगी ।

उगलिर्यो के नाखून इंच-इंच भर बढे हुए थे । आखे लाल सुर्ख ।।

रोशनी होने पर भी वो दरिन्दा अपने काम में व्यस्त रहा, परंतु उसकी आखें टेढी होकर कार पंर जा टिकी थी । होठ-मुह पर खुन लगा रोशनी में चमक रहा था ।

उसी क्षण युवती के होठो से खौफ भरी चीख निकली ।

दरिन्दे ने युवती के गले से दांत हटाए और कार को देखकर गुर्राया ।

अगले ही पल गश खा चुके युवक ने किसी तरह कार दौडा दी ।

देखते-ही-देखते कार गली से बाहर निकलती चली गई ओंर गली पुन अंधेरे में डूब गई ।

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इतना ही वक्त काफी था मंगलू कै लिए ।

मंगलू ने रोशनी में जो देखा, उसे देखकर वो सन्न रह गया था । जिस्म में रह-रहकर सिहरन दौड़ऩे लगती । आखों पर विश्वास न आ रहा था, परंतु कार की हैडलाइट की रोशनी में उसने जो देखा था, उसे झुठला भी न सकता था ।

वो दरिन्दा, उस युवती का खून पी रहा था ।।

राक्षस जैसा-दो दात बाहर को निकले हुए

युवती को उसने स्पष्ट तौर पर पहचाना था ।

वो ही स्कूटी वाली युवती थी, जिसे उसने गली में भेजा था, भवतारा के पास; क्या वो दरिन्दा ही अवतारा है?

नहीँ नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ।

भवतारा दरिन्दा थोडे न है! वो इस तरह खून क्यों पीएगो?

वो कोई और है !

भवतारा किधर गया !

सकते की-सी हालत में खड़ा मंगलू गली में ही, उसी जगह पर देखता रहा ।।

पाच मिनट और बीत गए।

फिर उसने दरिंदे को, उठते देखा । कुछ क्षणों वाद उसे गली के दूसरी तरफ़ जाते देखा । वो झूम -सा रहा था जैसे बहुत शराब पी ली हो । आकृति उसे भवतारा की ही लगी वो ।

एकाएक मंगलू गली में प्रवेश कर गया और दवे पांव आगे बढा ।

वो अंत तक अपनी तसल्ली कर लेना चाहता था । मन में कोई वजह न छोड़ना चाहता था कि जो कुछ उसने देखा, उसके बीच शायद जैसा शब्द आ लगे । मंगलू दूर रहकर उसका पीछा कर रहा था ।

जव गली के लैम्प पोस्ट के नीचे से निकला तो उसने स्पष्ट पहचाना कि वो कपडे भवतारा के ही हैं । चलने का ढंग भी भवतारा जैसा ही है, परंतु चेहरा जो उसने देखा था, कार की हेडलाइट की रोशनी में?

मंगलू के दिलो-दिमाग में खलबली मची हुई थी।

दिल धाड़-धाड बज रहा था ।

सब कुछ देख समझकर भी उस पर विश्वास न करना चाहता था ।

वो गली से बाहर निकलकर मुडा तो मंगलू ने दौड़कर गली पार की और किनारे पर रुककर थोडा सिर आगे करते हुए झांका । वो आगे जा रहा था । एकबार भी उसने पीछे मुड़कर न देखा था ।

मंगलू सावधानी से उसके पीछे लगा रहा।।

करीब पंद्रह मिनट बाद वो सडक किनारे बहती हुई टूटी के सामने रुका और पानी के छींटे अपने चेहरे पर मारने लगा । पास ही दुकान थी ।

जहाँ से आती रोशनी वहाँ पड़ रही थी और उसने रोशनी में स्पष्ट पहचाना कि के भवतारा ही है ।

मंगलू का मस्तिष्क सांय-ब करने लगा ।

@@@@@@@@@@@@@@@
 
मंगलू को चक्कर-से आ रहे थे।

सब कुछ देख-समझकर भी उस पर विश्वास करने को मन नहीं कर रहा था, परंतु सत्य को झुठलाए भी तो कैसे?

मंगलू तब तक अंधेरे में दुबका रहा, जब तक भवतारा ह्यथ-मुंह धोकर आगे न बढ गया ।

वो उसे तब तक देखता रहा, जब तक कि वो नजरों से ओझल न होगया।

मंगलू ने गहरी सांस ली और वापस चल पड़ा । जाने क्यों अपनी टांगों में हल्का हल्का सा कम्पन महसूस कर रहा था । उसे ऐसा लग रंहा था जैसे पांव ठीक से जमीन पर न पड़ रहे हों ।

भवतारा उसकी आंखों के सामने उस युवती के गले पर दांत टिकाए उसका खून पी रहा था । उसके दो दांत भी उसने बाहर निकले देखे थे । उसके मुंह पर खून लगा देखा था । युवती की गर्दन एक तरफ लुढ़की पड़ी थी और उसकी आखें खुली थी । शायद बो मर चुकी थी या-या जिन्दा थी ?

कल भी अवतारा ने उस युवती के साथ ऐसा ही कुछ किया होगा, तभी उसकी जान गई ।

उसी पल उसे याद आया कि बीती दोनों सुबह उसने भवतारा की कमीज पर खून लगा देखा था । तो क्या पिछली दोनों राते उसने इसी तरह किसी का खून पिया था ।

सच को स्वीकार करने में मंगलू को कठिनाई आ रही थी ।

शैतान का बेटा?

सच में भवतारा शैतान था ।

थके-से अंदाज में मंगलू ने उसी गली में प्रवेश किया और आगे बढ़ने लगा । वो एक बार युवती की लाश देख लेना चाहता था । जाने क्यों बो पूरी तरह अपनी तसल्ली कर लेना चाहता था।

गली में सामने से उसे दो व्यक्ति भी आते दिखे । युवती की लाश अंधेरे में पडी होने की वजह से वो दोनों नहीं देख सके और आगे निकलते चले गए ।

मंगलू लाश के पास पहुचा और सिर घुमाकर उन दोनों आदमियों को देखा । वो गली से बाहर निकल चुके थे ! मंगलू ने अंधेरे में पडी युवती की टांग खींचकर उसे रोशेनी मे किया ।

युवती की आंखें फटी हुई थी ।

चेहरा सफेद, पीला-सा लग रहा था ।

गले पर उसने दो निशान देखे, जहाँ दांत धसें थे । वो मरी पडी थी । मंगलू के चेहरे पर दुख के भाव उभरे और वो गली मे आगे बढ गया । उसे डर था कि कहीं कोई आ न जाए ।

अब उसके सामने ये बात स्पष्ट थी कि भवतारा सव में शैतान था ।

वो इंसानों का खून पीता था और शायद यहीं उसका भोजन था। बीती रात भी इसी गली में उसने युवती का खून पीया था ओंर आज भी । उससे पहले की रात वो अकेला गया था, तब भी वो किसी का खून पीकर आया था, क्योंकि उसकी कमीज पर खून लगा हुआ था ।

स्पष्ट बात तो ये थी कि भवतारा की हकीकत जानने के पश्चात मंगलू खौफ से भर उठा था। उसका मन नहीं कर रहा था वापस जाने को, लेकिन लालच अभी भी मन में सवार था ।

भवतारा से पैसा लेने का लालचा ये बात तो मंगलू-कै मन में एक बार भी नहीं आई कि भवतारा उसका खून भी पी सकता है । अगर ये सोचा होता उसने तो लालच भाग जाता और वो किसी भी कीमत पर बापस न जाता ।

@@@@@@@@@@@@@@@

मंगलू वापस पहुचा ।

मंदिर का गेट बंद था । आज भी वो कल की तरह दीवार फलांगकर अंदर पहुंचा और दीवार सरकाकर गोल कमरे में प्रवेश कर गया ।

सब कुछ बैसा ही था, जैसा वो छोडकर गया था ।

नजरे उठाकर उसने ऊपर वाले दोनों कमरों की तरफ देखा ।

वहां खामोशी छाई हुई थी । कहीं से कोई आवाज नहीं आ रहीँ थी ।

न चाहते हुए भी उसके कदमं सढियों की तरफ बढ गए । आज सीढियां चढते उसका दिल जोरो से धड़क रहा था । मस्तिष्क में भवतारा का खौफ प्रवेश कर चुका था ।

ऊपर पहुंचकर उसने भवतारा के कमरे में झांका ।

वो गहरी नीद में डूबा हुआ था । उसके होंठों से खरटि गूंज को रहे थे ।

. . . . उसकी कमीज पर आज भी खून लगा हुआ था ।

मंगलू की टांगे कांपी और वो पीछे हट गया । गहरी-गहरी सांसे लेने लगा । आंखों के सामने रह-रहकर वो ही भवतारा का दरिंदों वाला चेहरा नाच रहा था और इस वक्त सोया हुआ वो कितना मासूम . . लग रहा था ।।

कहां फंस गया वो ??

परंतु भवतारा से मिलने वाली दोलत का लालच उसे वहीं रुकने पर मजबूर कररहा था ।।।।

@@@@@@@@@@@@@@@

अगले दिन सुबह मंगलू उठा और नहा-धोकर कल की तरह पुलिया पर जा बैठा । आज वो गंभीर था । रात की घटना वो भूल नहीं पा रहा था । इसी बारे में सोच-सोचकर वो बेचैन हो रहा था ।

ज्यादा देर न बीती होगी कि उसे कामिनी आती दिखी ।

मंगलू की निगाह उस पर टिक गई, परंतु उसके चेहरे पर खुशी न झलकी जो रोज झलकती थी ।।

कामिनी के हाथों में आज कपडे न थे, बल्कि गोल किया हुआ अखबार था । वो भी ज्यादा खुश न नजर आ रही थी । चुप-चुप ही थी वो , पास आते ही वो कह उठी ।।

" आज हम यहां नही बैठेंगे ।"

" क्यों ?"

"तुम्हारा मालिक आ जाएगा । मुझे बो अच्छा नही लगता!" कामिनी ने मंदिर के गेट पर नजर डाली ।

मंगलू उठ खडा हुआ ।

" चौधरी के बाग की तरफ चलते है ।" कामिनी बोली ।

"ठीक है ।!

दोनों सडक का रास्ता छोड़कर कच्चे रास्ते की तरफ बढ गए ।

दोनों ही चुप थे । कोई बात न कर पा रहे थे ।

"तेरे हाथ में क्या है?" मंगलू बोला ।

"ओह । हां, अखबार है आज की खबर पढी तूने, कोई शहर में इंसानों का खून पी रहा है ।" कामिनी बोली ।

"इंसानों का खुन ?" मंगलू के होंठों से निकला ।

"हां । ये देख अखबार ।" चलते-चलते कामिनी ने अखबार खोलकर उसे दिखाया----.." पूरा इसी बारे में लिखा है । बीच के पन्नो पर भी कई जगह ये खबर है । मैंने सब पढा है, तेरे को पढाने लाई हूं ।"

" तू ही बता दे, क्या लिखा है?" मंगलू ने गंभीरता से कहा ।

" तीन रार्तों से पुलिस को हर रात ऐसी लाश मिल रही है, जिसमे खून नहीं होता । अखबार वाले कहते हैं कि कोई उनका खून पी लेता है, इसी कारण मौत हो जाती है, अखबार वालों ने तो खून पीने वाले को नर-पिशाच और ड्राकुला का नाम भी दे दिया है । शहर के लोग घबराए हुए हैं, अब तो रातों को भी बाहर निकलना बंद कर रहे है !"

"अच्छा !"

" हां, पहली बार नर-पिशाच ने एक आदमी का खून पिया, उसके बाद अगली दो राते उसका शिकार दो युवतियां वनी ।"

मंगलू ने होंठ भीच लिए।

"तेरे को क्या लगता है कि वो कौन होगा मगंलू ?"

मंगलू का दिल किया भवतारा के बारे में बता दे कि वै ही शेतान का बेटा है । वो ही ये सब कर रहा है, परंतु अपनी बात दिल मे ही दबाकर रह गया ।

वो कामिनी को डराना नहीं चाहता था और इससे बात खुल जाने का भी खतरा था । भवतारा को पता चला कि बात उसने खोली है तो कहीं उसे भी न मार दे ।।

" पता नहीं वो कौन होगा, जो ऐसा कर रहा है । पहले तो मैं रात को कहीं झोपडी से बाहर भी आ जाती थी, लेकिन अब नहीं निकलूंगी मुझे तो डर लगता है कि के कहीं मेरा खून पी गया तो?"

मंगलू जबरन मुस्कराया ।

"वो यहाँ पास में थोडे न रहता है जो तेरा खून पीएगा" । मगलू के होंठों पर जबरन वाली मुस्कान छाई थी ।

"क्या फ्ता बो किधर रहता है । मैं तो अखबार पढ़ते ही डर गई ।" कामिनी ने गहरी सांस लेकर उसे देखा ।

चलते-चलते मगंलू ने उसका हाथ थाम लिया !
 
कामिनी ने शरमाकर मंगलू को देखा, पंरतु कहा कुछ नहीं । न ही हाथ छुड़ाया ।

वो दोनों सुनसान जैसे रास्ते पर चलते रहे ।

"मंगलू! तेरा मालिक बहुत गंदा है । तू उसके पास काम न कर ।" एकाएक कामिनी गभीर-सी कह उठी ।

“क्यों?" भवत्तारा का जिक्र आते ही मंगलू संभला ।

"कल वो झोपड़े पर आया था, बापू से मिला और.........!"

"तुम्हारे झोंपड़े पर आया था ।" मंगलु अचकचाकर ठिठकं गया-" ये क्या कह रही है कामिनी?"

" 'ठीक कह रही हूं ।" कामिनी ने परेशान स्वर में कहा…“उसके इरादे ठीक नहीं हैं ।"

"मैं समझा नहीं ।"

" कल वो ब्रीफकेस में नोट भरकर लाया और बापू को नोट देकर बोला कि वो मेरै से शादी करना' चाहता है ।"

मंगलू हक्का-बक्का-सा कामिनी को देखने लगा ।

"मंगलू । "

"वो ब्रीफकेस में नोट भरकर लाया । तेरे बापू को दे गया सारे नोट?"

"हां ।"

"क कब?"

" जब मैं तेरे पास से, पुलिया से गई थी । तभी आ गया था वो !" कामिनी बोली ।

मंगलू को ध्यान आया कि कल भवतारा ने ब्रीफकेस पकडा हुआ था, जब वो पुलिया के पास आया था और उसे ये कहकर कि अभी आता है, आगे चला गया था । तो तब वो कामिनी के बाप से मिलने गया था ।

ब्रीफ़केस में नोट भी पड़े थे और उसे कहता है कि पैसा कहीं से आएगा तो उसे देगा ।

कांमेनी से शादी करना चाहतां है भवतारा?

मगलू को जैसे पावों तले से जमीन निकलती महसूस होने लगी ।

"तू चुप क्यों है मंगलू?"

मगलू ने खुद को संभाला । कामिनी को देखा । कामिनी उसे ही देख रही थी ।

"क्या हुआ ?" कामिनी ने पूछा ।।

"त.. तू उससे शादी कर लेगी कामिनी?" मंगलू ने हड़बड़ाए स्वर में पूछा ।

"कभी नहीं ।" कामिनी दृढ़ स्वर में बोली…"मैंने मां और बापू को मना कर दिया है कि मै उसेसे शादी नहीं करूंगी लेकिन मा और बापू मेरे पर बराबर जोर डाल रहे हैं कि मैं उससे व्याह कर लूं ।”

" क्यों ?"

"जो नोट वो दे गया है, उससे मां और बापू का दिमाग खराब हो गया है । कल से मेरा मां और बापू से झगडा हो रहा है, इसी बात पर ।" कहते-कहते कामिनी के चेहरे पर गुस्से के भाव आ गए थे ।

"वो अच्छा इंसान नहीँ है, तू उससे शादी मत करना ।" मंगलू ने जल्दी से कहा ।

"नहीं करूगी मैं.......!"

"पक्का वादा करती है?"

“वादा तो है, परंतु......!"

"क्या परंतु? "

"आखिर कब तक मां और बापू का सामना कर सकूगी। थक-हारकर हां तो कहनी पडेगी ।"

"नहीं कामिनी! नहीं !* मंगलू जैसे तड़प उठा----" वो बहुत बुरा है, तू उससे व्याह मत करना ।"

कामिनी मंगलू को देखकर कह उठी ।

"मैं जानती हूं कि वो बुरा है, लेकिन तू तो बुरा नहीं है ।"

"क्या मतलब ?"

"तू मुझसे शादी कर ले... । "

मंगलू कामिनी को देखता रह गया ।

" मै अच्छी नहीं लगती क्या?"

"बहुत अच्छी लगती है !"

"तो फिर मेरे से ब्याह क्यों नहीं कर लेता?" कामिनी ने प्यार से कहा ।

"वो नहीं करने देगा ।" मंगलू के होंठों से निकला ।

"कौन तेरा मालिक!!"

"हां ।"

"तू डरता है उससे?"

"पहले नहीं डरता वा, लेकिन अव डरने लगा हू। बहुत बुरा हैं वो । मैंने उसे अब पहचाना है!!"

" उसकी नौकरी छोड दे !”

"वो मुझे जाने नहीं देगा ।”

" तो हम यहां से कहीं भाग चलते हैं, तव कोई भी… !"

"वो हमे दूंढ़ लेगा ।" मगंलू ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी…“मेरे ख्याल में बो ताकतवर..... वो बहुत ताकतवर . .है !"

" इतना डरते क्यों हो उससे ?"

" वो शैतान का बेटा है ।"

"शेतान का बेटा-----ये क्या होता है?"

"मेरा मतलब! " मंगलू ने तुरंत बात संभाली…" बो बुरा है, शैतान है, वो तुमसे शादी करना चाहता है तो उंसे ये बात कैसे पसंद आएगी कि तुम उससे शादी न करके, मुझसे शादी कर लो ।"

"बात तो तेरी सही है । पैसे वाला हैं, कुछ भी कर सकता है । -तभी कह रहीं हू , हम भाग चलते हैँ।"

"नहीँ, भाग जाने से बात नहीँ बनेगी !"

"मैं समझ गई, तू मुझे प्यार नहीं करता .....तभी !"

"ये बात नहीं है कामिनी! ", मंगलू उसके दोनों हाथ पकडकर प्यार से कह उठा----"मुझे बहुत अच्छी लगती है, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं , लेकिन लेकिन जैसी जल्दबाजी तू चाहती है, बो करना ठीक नहीं होगा ।"

"मां-बापू मेरे को.......!"

"तू कोई बहाना बना, ऐसा बहाना कि हमे कुछ वक्त मिल जाए कोई रास्ता निकालने का ।"

"वो तो मैं ये भी कह सकती हू कि ये क्लास पास करने के बाद ही मैं शादी करूंगी ।"

"हां । ठीक है तू ऐसा ही कहना, इसी बात पर अडी रहना । इस तरह हमें वक्त मिल जाएगा कि हम इस मुसीबत का सामना कर सके । बचने का कोई रास्ता निकल सकें ।" मंगलू ने कहा ।

"वो तो ठीक है , पर तू अपने मालिक से डरता बहुत है ।"

मंगलू की आखों पर भवतारा का रात बाला रूप आ ठहरा ।

" तू क्रोई और बात कर, उसकी बात ही मत कर ।" मंगलू ने अपने सूख रहे होंठों पर जीभ फेरी ।

"डरपोक कहीं का ।" एकाएक कामिनी खिलखिलाकर हंस पडी ।

मंगलू भी मुस्कराया । जबरन मुस्कराया । व्याकुलता और परेशानी भरी मुस्कराहट ।।

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दोपहर हो रही थी ।

दीनू कल की तरह ही आज भी झोंपडी के बाहर रखी लकडी की टेबल पर कपड़े प्रेस कर रहा था । कुल देर पहले ही कामिनी आई थी और वो झोपडी के भीतर थी ।

भवतारा वहां पहुचा ।

उसे देखते ही दीनू खिल उठा । सव काम छोड़कर उसकी सेवा में लग गया ।

" अरी ओ कामिनी की मां! देख तो कौन आया है । कामिनी! कुर्सी ला, जल्दी से ।"

भवतारा मुस्कराता हुआ उसे देख रहा था ।

"आप कैसे हैं जंबाई बाबू?" दीनू प्रसन्नता से बोला ।

"अच्छा हूं।"

“कामिनी की मां आपको बहुत याद करती है । हर वक्त आपके ही गुणगान करती रहती है ।"

तभी कामिनी झोंपडी से निकली, उसके हाथ में कल वाली ही कुर्सी थी । भवतारा को वहाँ आया पाकर उसके चेहरे पर नापसंदगी के भाव उभरे । कुर्सी लेकर वो आगे बढ़ी ।

" जल्दी कर, जंबाई बाबू कब से ख़ड़े हैं ।" भवतारा मीठी मुस्कान साथ कामिनी को देख रहा था ।

कामिनी ने कूर्सी रखी ओर झोंपड्री के भीतर चली गई ।

भवतारा कुर्सी पर बैठा।

कल की भांति दीनू पास ही नीचे बैठ गया ।

तभी बसन्ती झोंपडी से निकली । भवतारा को देखा ।

"आ. आ शरमाती क्यों हैं? अपने जंवाई बाबू हैं । कल ही तो आए थे ।"

" कितनी खुशी हुई है तुम्हें देखकर जंवाई बाबू!" बसन्ती तुरंत पास आ पहुँची------" मै तुम्हे देखना चाहती थी । आह, लाखों में एक है हमारा जंवाई वावू। नजर न लगे किसी की । कामिनी का भाग्य कितना अच्छा है?"

"राज करेगी हमारी बेटी ।" दीनू कह उठा ।

"क्या लोगे जंवाई बाबू ठण्डा-गर्म?"

"कुछ नहीं ।"

'यै कैसे हो सकता हे कि कुछ नहीँ, क्या हमे सेवा का मौका नही दोगे?"

"हमारे यहां रिवाज है कि रिश्ता तय होने से पहले हम लड़की के घर का नहीं खाते ।" भवतारा बोला ।

"रिश्ता तय ही तय है, क्यों कामिनी की मा..!"

"हां, हां, हमने मनाही तो नहीं की ।"

"कामिनी ने हां कह दी !" भवतारा ने पूछा ।

"कह देगी, बच्ची है, धीरे-धीरे हां कहेगी, अभी शरमाती है ।" बसन्ती मुस्कराकर बोली ।

"मुझें उसकी हां की ज्यादा ज़रूरत है ।" भवतारा बोला ।

"हमारी जुबान पर विश्वास करो, वो भी हां कह देगी ।" बसन्ती ने जल्दी से कहा ।

"क्या कहती है अब?"

"कहना क्या है, ऐसे ही ना नुकर । मुझे अभी शादी नहीं करनी, खामखाह के नखरे ।"

"उसे तैयार करना आपका काम है ।"

"वो ही तो, उसे तैयार ही कर रहे हैं । दो-चार दिन में उसकी भी हां हो जाएगी । एक बात तो बताओ जंवाई बाबू?"

" क्या?"

"ऐसे क्यों लगता है मुझे कि तुम मंदिर में बने उस शेतान के बुत जैसे हो ?"

भवतारा मुस्कराया ।

"सच कहा आपने । मेरा चेहरा बहुत हद तक उस बुत से मिलता है । कुछ और लोगों ने भी कहा ।"

बसन्ती रे फौरन दाएं-बाएं सिर हिलाकर कहा ।

" सा हो जाता है कभी-कभी, तुम्हारे घर में और, कौन-कौन है ?"

"कोई नहीं है, मैं हू ! जमीन-जायदाद और बंगला है । कामिनी को किसी तरह की कमी नही होगी।"

"मंदिर में क्यों ठहरे हो?"

"कुछ काम था तो मंदिर में आ गया ।"

"हमारे रहने की जगह ऐसी नहीं है कि तुम्हें अपने पास रख ले ।" बसन्ती ने कहा ।

"मैं जानता हूं !! कोई बडी जगह ले लीजिए ।"

" तुम्हारी मेहरबानी रही तो वो भी ले लेंगे, वरना हमारी क्या औकात?"

"तू ठीक कहती है कामिनी की मां ।"

"जंवाईं बाबू !" कामिनी की मां बोली-" ये तो तुमने देख ही लिया है कि हमारी हैसियत क्या है?"
 
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