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गद्दार देशभक्त complete

उसने अपनी आजाद कलाइयों को मसला, दोनों पेरों को झटका दिया । फिर दोनों हाथ उठाकर आजादी की भरपूर अंगडाई ली ।

"अब देर मत करों कमांडर ।" एक दहशतगर्द उतावलेपन से बोला- हैलीकॉप्टर तैयार है । निकल चलो । फौरन ।"

"'चल रहा हूं भाई जान, चल रहा हूं ।" मुस्तफा बड़ी बेफिक्री से बोला-----“इतने सालों के बाद आजादी की सांसे लेना नसीब हुआ है, चलना तो है ही । वस जरा एक बार इन मोहतरमा का शुक्रिया अदा कर दूं जिनकी वजह से मुझे आजादी हासिल हुई ।" कहने के साथ वह चांदनी की तरफ पलटा ।

उसकी भयावह शक्ल को देखते ही चांदनी सिहर गई । होलकर ने हस्तक्षेप करना चाहा, लेकिन इरादा बदल दिया।

"तुम वाकई वहुत हसीन हो चंदा बीबी ।” मुस्तफा चांदनी सिंह के हसीन चेहरे पर नजरें गड़ाकर बोला------“बहुत ज्यादा। अौर खुशकिस्मत भी । तभी तो जैसी आई थी, वैसी जा रही हो ! हमारी दुनिया में वैसा होता नहीं है जैसा तुम्हारे साथ हुआ इसलिए, हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ है ।"

"म. . .मतलब?” होलकर दहाड़ा । मुस्तफा के अंतिम शब्दों से उपजी अाशंकाओं ने उसके समूचे अस्तित्व को झकझोर डाला था।

"रेप न सही, एक चुम्मा तो बनता है आईबी के पिट्ठू !" कहने के साथ उसने चांदनी सिंह को न केवल अपनी बलिष्ट भुजाओं मे भर लिया था बल्कि चीखने के लिए खुले चांदनी के होठों पर अपने होंठ भी रख दिए थे ।

"हरामजादे!'' होलकर, देशपांडे, अमरीक, शेखरन , भल्ला, गिरीश और प्रताप एक साथ हलक फाड़कर चिल्ला उठे थे ।

सबकी गनें मुस्तफा की तरफ घूम गई थी और इससे पहले कि कोई ट्रेगर दबाता, वह होलकर था जो पुरजोर अंदाज में चीखा था-----" कोई गोली नहीं चलाएगा, कोई हमला नहीं करेगा उस पर ।"

सबने एक झटके से उसकी तरफ देखा । सबके चेहरे भभक रहे थे ।

सबके जिस्म कांप रहे थे । और सबकी आंखों में खून उतरा हुआ था ।

खून तो होलकर की आंखों में भी उतरा हुआ था । जिस्म में तो उसके भी सनसनी दौड़ रहीं थी और जी तो उसका भी मुस्तफा को चीर-फाड़ डालने को चाह रहा था लेकिन इस सबके बावजूद उसने अपने विवेक पर उत्तेजना को हावी नहीं होने दिया था । जेहन में चल रहे इस विचार को मरने नहीं दिया था कि----" मुस्तफा का खात्मा इस तरह नहीं होना है । सिर्फ उसी तरह होना है जिस तरह वह बहुत पहले निर्धारित कर चुका है ।

इधर उसके सभी साथियों दिमागों में जलजला-सा चल रहा था

उधर चांदनी सिंह मुस्तफा के बंधनों में यूं छटपटा रही थी जैसे बाज की गिरफ्त में कबूतरी छटपटा रही हो ।

चीखना चाहकर भी वह चीख नहीं पा रही थी क्योकि उसका निचला होंठ दरिंदा अपने दांतों में दबाए हुए था ।

"उसे छोड़ दे मुस्तफा-----छोड़ दे उसे !" होलकर कहर भरे अंदाज में दहाडा था----“वरना अपनी मौत का जिम्मेदार तू खुद होगा ।"

"छोड दी । ले । छोड़ दी तेरे मुल्क की बुलबुल ।" कहने के साथ जब चांदनी सिह को छोड़कर उसकी तरफ घूमा तो अकेले होलकर ने ही नहीं, सभी ने उसके होंठो पर लगा खून देखा ।

उधर, चांदनी सिंह का जख्मी होंठ ।

यह बात सभी की समझ में आ चुकी थी कि मुस्तफा के होंठो पर लगा खून चांदनी सिंह का है और सभी की धमनियों में लावा बह रहा था । वे होलकर के हुक्म से न बंधे होते तो अपनी जान गंवाकर भी मुस्तफा के चीथड़े उड़ा देते । उस मुस्तफा के जो अब हिंसक जानवर की तरह हंस रहा था । उधर, रोती-कलपती और लड़खड़ाती दौड़ती चांदनी सिंह डेक के दूसरे किनारे की तरफ भाग गई थी । जैसे खुद को, किसी को अपना चेहरा दिखाने लायक न समझती हो ।

दोनों गमछाधारी दहशतगर्द उस सबसे पहले ही हैलीकॉप्टर में जा बैठे थे । उनसे से एक हेलीकॉप्टर को स्टार्ट भी कर चुका था । अपने कमांडर द्वारा अचानक की गई उस हरकत से वे भी हैरान थे मगर उन्हें तो प्रतिक्रिया व्यक्त करने तक का मौका नहीं मिला था ।

'होश' में आते ही उनमें से एक ने कहा था-----“चले कमांडर !"

मुस्तफा ने बाजू से अपने होंठों पर लगे चांदनी सिह के खून को पोंछा और हिकारत भरी आखिरी निगाह होलकर इत्यादि पर डालने के बाद टू सीटर में सवार हो गया ।

"व. . .वह जा रहा है अॉफिसर ।" हैलीकॉप्टर पर नजरें गडाए देशपांडे बेचैन होकर होलकर से बोला-------"हमारी आंखों के सामने

वह हमारी इज्जत लूटकर जा रहा है ।"

होलकर पथराई-सी आंखों से सारे दृश्य को देख रहा था ।

"क. . .कब करोगे ?" देशपांडे चिल्लाया था ।

हैलीकॉप्टर ऊपर उठता चला गया ।

ऊपर मंडराता दूसरा हैलीकॉप्टर पहले ही वहां से काफी ऊपर निकल गया था । मुस्तफा बाला हैलीकॉप्टर अब वहां पहुंच चूका था, जहाँ दो पल पहले दूसरा हैलीकॉप्टर मंडरा रहा था । फिर उसने मोड़ काटा और तेजी से एक ओर को उड़ता चला गया ।

देशपांडे छटपटाता-सा दहाड़ा------'"बटन दबाओ आफिसर !"

होलकर के जबड़े भिंच चूके थे ।

उसने एक निगाह चांदनी सिह पर डाली ।

उस चांदनी सिह पर जो उन सबसे वहुत दुर डेक की रेलिंग के साथ गठरी-सी बनी अपने साथ हुई जलालत के कारण रो रही थी ।

होलकर के चेहरे पर अजीब-सी सनसनी उभरी । उसने नजर उठाकर निरंतर दूर जाते दोनों हैलीकॉप्टर्स को देखा ।

फिर, नजरें छोटे हैलीकॉप्टर पर जम गई ।

दायां हाथ, बाएं हाथ में बंधी रिस्टवॉच पर पंहुच गया !

दिल जोर---जोर से धड़कने लगा था ।

"मुझें इस बात का अफ़सोस सारी जिदगी रहेगा कि मैंने अपनी आंखो सामने तेरे हाथों देश की बेटी को बेइज्जत होते देखा मगर अब...अब तेरा खेल खत्म हुआ शैतान मुस्तफा !" वह सर्द स्वर में बोला और साथ ही, रिस्टवॉच का नन्हा-सा बटन दबा दिया ।

बटन दबाते ही रिस्टवांच से एक मद्धिम मगर काफी तीखी आवाज उभरी । इसके साथ ही वायुमंडल में इतना प्रचंड धमाका गूंजा, जिसने चारों दिशाओं को कंपा दिया----

धड़ाम $$$$$!
 
मगर, वह धमाका मुस्तफा के हेलीकॉप्टर में नहीं बल्कि चांदनी सिंह के जिस्म में हुआ था ।

उसके जिस्म परखच्चे उड़ गए थे ।

सभी अवाकृ ।

होलकर तो जैसे पागल हो गया !

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नगमा सधे कदमों से चलती हुई चीरसिया के कम्यूटर डेस्क के पास पहुंची और चुपचाप कुर्सी के पीछे खड़ी हो गई ।

राजा चौरसिया अपने सामने मौजूद कम्यूटर पर पूरी तल्लीनता से काम करने में मशगूल था । उसकी उंगलियां बडी़ तेजी से कम्यूटर के की-बोर्ड पर उछल कुद कर रहीं थी ।

निगाहें कम्यूटर की विशाल स्कीन पर स्थिर थी ।

वहां गणनाएँ तेजी से बदल रही थी ।

डेस्क पर रखी कॉफी ठंडी हो चुकी थी ।

चौरसिया ने उसमें एक घूंट भी नहीं भरा था ।

वह पिछले छ: घंटे से निरंतर कम्प्यूटर के सामने डटा हुआ था ।

कई मिनट यूंही बीत गए मगर चौरसिया को अपने पीछे नगमा की मौजूदगी का आभास न हुआ ।

जव नगमा को लगा कि चौरसिया को आभास होने वाला भी नहीं था तो खंखारकर उसका ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया ।

क्री-बोर्ड पर थिरकती उंगलियों को जैसे ब्रेक लग गया । उसने अपनी अभी तक की प्रोग्रेस को सेव किया, फिर रिवांल्विग चेयर सहित नगमा की तरफ़ घूम गया ।

सामने खिली, निखरी और हमेशा की तरह अपने यौवन का लावण्य बिखेरती नगमा खड़ी थी ।

उसने गुलाबी रंग का बगैर बांहों तथा बगेर दुप्ट्टे वाला कढ़ाई दार सलवार-सूट पहन रखा था । वह उसके गोरे तथा भरे हुए मांसल बदन के साथ प्याज के छिलके की तरह चिपका हुआ था ।

पेरों में साधारण से स्वीपर, चेहरे पर मेकअप का नामोनिशान तक नहीं था । इसके बावजूद वह कयामत ढा रहीं थी ।

चौरसिया की धड़कने तेज हो गई ।

"सॉरी ।" उसे अपनी ओर मुखातिब पाकर वह कोमल मगर खेद भरे स्वर में बोली------" मैंने तुम्हे डिस्टर्ब किया ।"

चौरसिया के होंठों पर इत्मीनान भरी मुस्कराहट उभरी ।

उसने अपने दोनों हाथ सिर से ऊपर उठाकर भरपूर अंगडाई ली, फिर, कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।

"सॉरी बोलने की जरूरत नहीं है स्वीट हार्ट ।" वह आशा के विपरीत प्रफुल्लित स्वर में बोला------"'सच पुछो तो मुझें इस डिस्टर्बैस ,की बहुत सख्त ज़रूरत थी । आज मैं जब से यहाँ बैठा हूं , एक पल के लिये भी नहीं उठा । आमतौर पर मेरी कोई बैठक इतनी ज्यादा लम्बी नहीं होती ।"

"होनी भी नहीं चाहिए । बीच-बीच में रेस्ट जरूरी होता है !"

“हो गया न रेस्ट ।" वह वहुत ही आकर्षक अंदाज में मुस्कराया था--“इसीलिए तो कहा कि सॉरी बोलने की जरूरत नहीं है !"

"ओहो!” नगमा धीरे से हंस पड़ी, फिर डेस्क पर रखी उसकी कॉफी को देखकर बोली….......“तुम्हारी कॉफी ठंडी हो गई है ।"

"अब मुझे कॉफी की जरूरत नहीं है ।"

"क्यों भला?"

"बीयर की बोतल के सामने कॉफी को कौन पूछता है?"

"बियर की बोतल?" नगमा इठलाई--""मैं ?"

"और क्या ?"'

“क्या बात है जनाब, बहुत रोमांटिक हो रहे हो । चेहरे के साथ लहजे में भी खुशी नाच रही है । लगता है मंजिल के वहुत करीब हो?"

“मंजिल ?"

"मेरा मतलब नवाब के काम से है । लगता है तुमने एकाऊंट का पासवर्ड हासिल कर लिया है । यह सच है तो मेरा यकीन करो, तुम नहीं जानते कि तुमने क्या कारनामा कर दिखाया है । अब जल्दी से हां कहो तो मैं जाकर फोरन यह खुशखबरी नवाब को सुना दूं!"

"ऐसा कुछ नहीं है ।"

"क्या?" उसे जैसे झटका लगा । अांखों में नजर आने वाली चमक फीकी पड़ गई…“क्या कहा तुमने?"

“वही, जो तुमने सुना ।" वह आहिस्ता से बोला-----"बीस हजार करोड़ की चाबी ढूंढ़ना इतना आसान नहीं है ।"

“ओह ! और मैनें समझा था कि......

"तुमने जो समझा उस पर मेरा कोई जोर नहीं है ।"

"ठीक कहते हो ।"

"मिलन की तबीयत कैेसी है?"

उसके दमकते चेहरे पर उदासी छा गई-------रंगत फीकी पड़ गई । उदास स्वर में बोली------उस बीमारी में तबीयत केैसी हो सकती है !"

"लगता है ठीक नहीं है । सॉरी । मैं तुम्हारे पति परमेश्वर के लिए केवल दुआ ही कर सकता हूं ।"

वह शमोश रही ।
 
चौरसिया को लगा उसने गलत वक्त पर नगमा के पति का जिक्र छेड़ दिया है । वह औरत जो ऊपर से दिखती थी, अंदर से बैसी नहीं थी । अंदर से वह एक निहायत ही सम्वेदनशील औरत थी, जिसमें औरत के हिस्से का हर त्याग कूट-कूटकर भरा था ।

"चलो !" चौरसिया ने जैसे अपनी गलती सुधारने की मंशा से विषय बदला-----''खुले में चलकर बैठते हैं ।"

नगमा ने सहमति में सिर हिलाया ।

कम्प्यूटर लेब से निकलकर वे लॉन में पहुचे ।

वहां चारों तरफ हरियाली छाई हुई थी !

मंद-मंद हवा वह रहीं थी ।

वे घने पेड़ की सांय के नीचे स्टील की बेंच पर बैठ गए ।

कुछ देर की खामोशी के बाद चौरसिया ने कहा----"नगमा !"

"हूं !" वह जैसे कुछ सोच रही थी ।

"एक सवाल का जवाब दोगी?"

"हजार पूछो ।"

“क्या तुम्हें नवाब की इस बात पर यकीन है कि उन तीनो हैकर्स को उसने नहीं बल्कि उसके किसी दुश्मन ने मारा है?"

"इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए मुश्किल है । जितना मैं नवाब को जानती हूं उसके आधार पर यह बात दावे के साथ कह सकती कि नवाब एक निहायत ही शातिर और खूंखार इंसान है मगर कमीना बिल्कुल भी नहीं है । शायद इसीलिए अंडरवर्ल्ड के उसके कट्टर दुश्मन और प्रतिद्वंद्वी भी उसे इज्जत बख्शते है ।"

"मेरा दावा है क्रि इतनी रकम नवाब ने आज तक अपने तमाम काले धंधों से भी नहीं कमाई होगी । यह रकम उसे वह सव बना सकती है जो आज तक नहीं बना है ।"

"त. . तुम्हारा मतलब क्या है राजा?" नगमा ने उलझी हुई नजरों से चौरसिया को देखा-------"कहना क्या चाहते हो?"

"मैं जो कहना चाहता हूं तुम समझ रही हो । तुम्हें यकीन है कि उस रकम के बारे में नवाब सच बोल रहा है? वह कहता है वह स्विस बैंकिग के पैटर्न वाला एकाउंट उसका अपना एकाउंट है और उसके चार्टेड एकाउंटेट ने उसका यूजर आईडी और पासवर्ड इंटरनेट के किसी प्रोग्राम में सुरक्षित रखा था पर बाद में उसकी डैथ हो गई?"

"कहा तो उसने यही है ।”

"क्या तुम्हें यह सच लगता है?”

उसकी आंखों में देखती नगमा ने बहुत आहिस्ता से और हिचकते हुए कहा था-------'"मुमकिन है तुम्हारा शक सही हो !"

" गुड तो फिर मतलब साफ है । वह रकम नवाब की नही है-----वह सारी रकम जरूर किसी और की है ।"

"किसकी ? "

"शायद नवाब के किसी क्लाइंट की । अब यह मत पूछने लगना कि कौन क्लाइंट? अंडरवर्ल्ड के नवाब जैसे खलीफाओं का एक धंधा यह भी होता हेै…कांट्रेक्ट बेस पर काम लेना !"

"तो तुम यह कहना चाहते हो कि नवाब को उसके किसी क्लाइंट ने यह बीस हजार करोड़ रुपयों वाला कांट्रेक्ट सौंपा हुआ है, जिसे वह तुम्हारे जरिए पुरा करना चाहता है ।"

"यकीनन ।"

"में एक मिनट के लिए तुम्हारी बात पर यकीन कर लेती हूं , मान लेती हूं कि नवाब यह काम किसी और के लिए कर रहा है! उससे तम्हे क्या फ़र्क पड़ता है । तुम्हारा उससे जो तय हुआ है, वह रुपया वह देगा ।"

"मैं कुछ और ही सोच रहा हूं जानेमन !"

"'क्या सोच रहे तो?"

"अगर बीस हजार करोड़ रूपया नवाब के हाथ अा गया तो क्या वह सारा रूपया अपने क्लाइंट के हबाले कर देगा ?"

"सारा क्यों करेगा! क्लाइंट से उसके कांट्रैक्ट की जो कीमत तय होगी, वह रकम काटकर बाकी रुपया उसके हवाले कर देगा ।”

“तुम कितनी भोली हो स्वीट हार्ट !"

"वया मतलब?"

" मुझे जरा भी यकीन नहीं कि नवाब वह रुपया अपने क्लाइंट के हबाले करेगा ।"

"तो फिर?"

आज तक भले ही उसका कारोबारी रिकार्ड बेदाग रहा हो, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि आइंदा नहीं रह पाएगा ।"

"क्या कहना चाहते हो राजा, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा । चलो मान लेते हैं कि नवाब की नीयत बद हो जाएगी । उससे भी तुम्हारे उपर क्या फ़र्क पड़ता है? क्या तुम्हें संदेह है कि वह तुम्हारे साथ भी बेईमानी कर सकता है?”

"मुझे ऐसा कोई संदेह नहीं है क्योकि...

“क्योकि? "

"कम से कम मेरे साथ वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकेगा ।"

“वजह? "

"मेरे साथ धोखा करने की केशिश की तो मैं ऐसा इंतजाम कर जाऊंगा कि उसके हाथ सदा के लिए खाली रह जाएंगे ।"

"ऐसा है तो फिर क्या समस्या है?"

"समस्या मेरी तरफ़ से है ।”

"तुम्हारी तरफ से?"

"" नवाब सोच रहा है, वहीं मेरे दिमाग में भी चल रहा है ।”

नगमा के जेहन को तीव्र झटका लगा था ।

“र. . .र. . राजा ।" वह चौरसिया को देखकर हकलाई------"तुम वही कह रहे हो न, जो मैं सुन रहीं हूं------समझ रही हूं ! तुम नवाब को धोखा देना चाहते हो! तुम-तुम डबलक्रास करना चाहते हो और वह सारा का सारा रुपया खुद हड़प जाना चाहते हो!”

"अगर मैं ऐसा कर सकता है तो क्यों न करूं!"

"त----तुम पागल हो गए हो राजा । तुम्हें रकम नहीं सिर्फ मौत मिलेगी । तुम्हारी लाश का भी पता नहीं चलेगा ।"

" ऐसा कुछ नहीं होगा जाने जिगर । मेरा यकीन करो ।"

"मैं पागल अदमी की बात पर यकीन नहीँ कर सकती।" नगमा की आबाज बुरी तरह कांप रही थी------"' हरगीज नहीं ।"

"मैं पागल नहीं हूँ ।"

"तुम पागल हो ।" वह पुरजोर स्वर मे बोली-“पागल भी और लालची भी । लालची आदमी का एक ही हश्र होता है ।"

“नबाब तुम्हें कितना रुपया देता है--------पांच लाख । है न?"

"क्या कहना चाहते हो तुम?”

"मैं तुम्हें दस लाख रुपया महीना दूगा-----वह भी एक साल के एडवांस के साथ । दस लाख रुपए महीने के हिसाब से एक साल एडवांस जानती हो कितना हुआ"'

"मेरा दिमाग खराब मत करो ।"

“एक करोड़ बीस लाख ।" वह कहता चला गया'--“मैं तुम्हें एक करोड़ बीस लाख रुपए एडवांस दे रहा हू और दस लाख क्या महीना तुम्हारी तनख्वाह । क्या तुम्हें मेरा यह अॉफर मंजूर है! क्या तुम नवाब को छोड़कर मेरे लिए काम करने को तैयार हो?"

“र......राजा ।" मारे अविश्वास के नगमा की आंखें फट पडी थी-------“मुझे यकीन नहीं हो रहा । ये तुम क्या कह रहे हो?"

"मुझे तुम्हारा जवाब कहिए नगमा ।"
 
"मेरा जवाब वही है । तुम पागल हो गए हो । तुम खुद तो मरोगे ही मुझे भी साथ लेकर मरना चाहते हो ।"

"म . .मैं यह सब तुम्हारी खातिर ही कर रहा हूं पागल लडकी ।"

"म. . .मेरी खातिर?"

“मुझसे तुम्हारे अंदर सिसकती औरत नहीं देखी जाती------" मुझसे तुम्हारी तड़प नहीं देखी जा रही ।"

"मैं तुम्हारी क्या लगती हूं !"

" कोई नहीं । और देखो, मुझे गलत मत समझना । बदले में मुझें तुमसे कुछ भी नहीं चाहिए । तुम्हारा यह खूबसूरत शरीर तो हरगिज नहीं । ईसे तो अब अगर तुम मुझे जबरदस्ती भी देना चाहोगी तो भी मैं तुम्हारे जिस्म को हाथ नहीं लगाऊ'गा और न ही नवाब की तरह अपने किसी क्लाइंट को खुश करने के लिए परोसूंगा । नगमा!"

मैं तुम्हें बेबसी के इस नर्क से हमेशा के लिए आजाद देखना चाहता हूं ! अपने पति को लेकर इस शहर से बल्कि इस मुत्क से भी---------हमेशा के लिए चली जाओ और अपने पति की आखिरी सांस तक हर पल साथ रहो । जितना मुमकिन हो, उसका इलाज़ कराओ। इस सिलसिले में रुपयों की कमी मैं कभी तुम्हारे आड़े नहीं आने दूंगा । यह मेरा तुमसे वादा है ।"

नगमा -हक्की-बक्की सी होकर चौरसिया को देखने लगी थी ।

"अ------औंर तुम?" ये शब्द उसके मुह से स्वत: निकल गए थे ।

“मेरा क्या है, मेरे लिए तो सारा जहां हमारा है । राजा की पूजा तो केवल उसके अपने राज्य में ही होती है पर हुनरमंद इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए, वहीं उसके कद्रदान वन जाएंगे ।"

"इतने बड़े धोखे के बाद क्या वह हमें जिंदा छोड़ देगा ?"

" मैंने सब सोच लिया है । नवाब चाहे जितना ताकतवर सही मगर वह हमें नुकसान नहीं पहुचा सकेगा । मैं केवल तुम्हारी 'हां' का तलबगार हूं । बाकी सब देख लूंगा ।"

"तुम्हें यकीन है कि मैं तुम्हे इंकार नहीं करूंगी और नवाब से गद्दारी करने के लिए तैयार हो जाऊंगी?"

"मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा सुनहरा मौका दोबारा कभी आएगा ।" वह अपने एक-एक शब्द को जमाता हुआ बोला--"तुममे जरा-सा भी विवेक होगा तो इंकार नहीं करोगी?"

''खास मुझी पर यह उपकार किसलिए? अचानक ऐसा क्या हो गया कि मुझ पर इतने जज्बात उमड़ आए?"

"फिर कहता हूं पागल लड़की, मेरी नीयत पर शक मत करो ! हम गुनाहगारों का जमीर रोज नहीं जागता । हम बुरे लोगों के जीवन में कुछ अच्छा करने का मौका कभी-कभी ही आता है और मैं इस मौके को अपने हाथों से निकालना नहीं चाहता ।"

नगमा के दिलोदिमाग में भूचाल-सा उठ खड़ा हुआ था ।

जेहन में कई शोर चीखने लगे थे ।

आंखो में अजीब से जज्बात उभरकर लुप्त हो गए थे ।

"बोलो नगमा.........बोलो ।'" चौरसिया अंदर उठते तूफान का अनुमान लगाता हुआ बोला-----'"क्या कहती हो ? "

"त. . .तुम तो इस तरह बात कर रहे हो।” नगमा का स्वर बुरी तरह कांप रहा था-----जैसे कि. . .जैसे कि तुमने पासवर्ड ढूंढ भी लिया है और यह सारा रुपया तुम्हारे हाथ में भी आ गया हो?"

"तुमने ठीक कहा जानेमन ।" उसने रहस्योंद्घाटन किया-"यह सच है कि मैंने इंटरनेट के एक खास प्रोग्राम में छुपाया गया इस बैक एकाउंट का पासवर्ड और यूजर आईडी ढूंढ़ निकाले है । अब उस एकाउंट को आंपरेट करना मेरे लिए बाएं हाथ का खेल है। बल्कि सच पूछो नवाब से हुए कमिटमेंट के मुताबिक पांच सौ करोड़ रुपया अपने बैक एकांउंट में ट्रांसफ़र कर लिया है।"

"क. . .क्या?" नगमा भौंचक्की सी होकर उसका चेहरा देखने लगी । मारे अविश्वास के उसकी आंखें फैल गई थीं…"यह तुम क्या कह रहे हो राजा!"

"वहीं, जो सच है ।"

"म. . .मुझे यकीन नहीं होता ।"

"उससे सच्चाई नहीं बदल जाएगी । नवाब के बताए उस एकाउंट में सचमुच पूरा बीस हजार करोड़ रुपया था । इस वक्त सारा का सारा मेरी मुट्ठी में है । चाहे जब उसे अपने एकाउंट में ट्रांसफर कर लूं ! ठीक उसी तरह जैसे अपना हिस्सा ट्रांसफर किया है ।"

“मेरा जवाब इंकार में हुआ तो क्या करोगे ?"

"क्या करूंगा! " चौरसिया के चेहरे पर अवसाद के भाव उभर आए । कूछ देर एकटक नगमा की तरफ देखता रहा वह । यूं जैसे उसकी आंखों में खो जाना चाहता हो और फिर, खोया-सा ही, इस तरह बोलता चला गया जैसे सपने में बड़बड़ा रहा हो-----'"उस रुपए को भी वापस उसी एकाउंट में डाल दूंगा जिसे बतौर अपना मेहनताना, अपने एकाउंट में डाला है ।"

बुरी तरह हैरान नगमा के मुंह से निकला------"ए......ऐसा क्यों?"

"क्या करूंगा इतनी मोटी रकम का! अकेला हूं---अपनी जरूरत का पैसा जब चाहूं जिस एटीएम से चाहूं निकाल लूंगा ।"

नगमा उसे देखती रह गई ।

उसे, जिसके चेहरे पर इस वक्त बहुत ही अनोखी दीवानगी नजर अा रही थी । फिर, आहिस्ता से बोली----“मैं नवाब की वफादार हूं । मैं उसे जाकर सब कुछ सच-सच बता सकती हूं । ऐसा हुआ तो जानते हो क्या होगा?"

''तुम यकीनन ऐसा कर सकती हो लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि नहीं करोगी । तुम जैसी सम्वेदनशील औरत इतनी नाशुक्री कभी नहीं हो सकती, अपने लिए इतने निष्काम जज्वात रखने वाले शख्स की मौत का सामान कर गुजरे ।"

"राजा ।" नगमा कसमसाई, फिर धीरे-से बोली-----" मैं तुम्हारे जज्बातों की कद्र करती हूं, पर यह सचमुच वहुत बड़ा फैसला है जो आनन-फानन में नहीं लिया जा सकता । मुझे सोचने का वक्त दो ।"

" कितना? "

"चौबीस घंटे । कल इसी जगह पर इसी समय हम फिर मिलेंगे और तब मैं तुम्हें अपना फैसला बता दूंगी । लेकिन...

“लेकिन क्या?" चौरसिया ने व्यग्र होकर पूछा ।

"यह जरूरी नहीं है कि मेरा फैसला 'हां' ही हो । 'ना' भी हो सकता है । ऐसा होता है तो प्लीज माफ कर देना और मुझे मेरे हाल पर छोड़कर तुम जहाँ चाहो चले जाना ।"

"मुझें मालूम है, तुम्हारा फैसला 'ना' नहीं होगा ।"

"हद है । फिलहाल जो खुद मुझे नहीं मालूम, वो तुम्हें मालूम है ।" कहने के साथ नगमा खड़ी हो गई थी---“चलती हूं ! हमारा ज्यादा देर तक एकांत में बैठना नवाब के कान खड़े कर सकता है ।"
 
चौरसिया ने सहमति में सिर हिला दिया ।

नगमा बहां से चली गई ।

कल्याण होलकर मुम्बई स्थित आईबी मुख्यालय में चीफ़ बलवंत राव के सामने गुनाहगार की तरह खड़ा था ।

उसने दोनों हाथ पीछे बांध रखे थे ! सिर झुका हुआ था और चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थी ।

" आज पहली बार मुझे अपने किसी फैसले पर अफ़सोस हो रहा है ।" बलवंत राव जख्मी शेर की तरह कालीन को रोंदता दहाड़ रहा था-------“गहरा अफसोसा लेकिन क्या फायदा! गलत तो मैं ही था-----------गलती तो खुद मैंने ही की थी, इस मिशन की कमान एक ! उसने तमतमाया चेहरा उठाकर एक नजर होलकर को देखा-----एक होनहार और काबिल अॉफिसर के हाथों में सौंपकर । कितना भरोसा किया था मैंने तुम पर और मेरे उस भरोसे को लहूलुहान कर दिया । चांदनी सिह की टेरेरिस्टों हाथों मौत ने सारे मुल्क को झकझोर दिया है । हम न तो चांदनी सिह को बचा सके न ही मुस्तफा को रोक पाए । यह हमारे मुल्क के मुंह पर दहशतगर्दों का ऐसा झनझनाता हुआ तमाचा है, जिसकी चोट को हमें दशकों तक सहलाना होगा । बसंत स्वामी ने सारे विपक्ष को लामबंद करके सरकार की ऐसी घेराबंदी की है कि सरकार को जबाब नहीं सूझ रहा है । सारी दुनिया में हमारी जो किरकिरी हो रही है, उसकी तो मिसाल मिलना मुश्किल है । मीडिया ने अलग तूफान खड़ा कर रखा है । समूचे मुल्क में गहरा आक्रोश है और इस सबके इकलौते जिम्मेदार तुम हो होलकर-सिर्फ तुम । जलालत का ऐसा खूनी मंजर देखकर भी तुम्हें हार्ट अटैेक नहीं हुआ और तुम खुद चलकर यहीं तक आ गए ! तुमको तो वहीं...........समंदर में डूबकर मर जाना चाहिए था ।"

होलकर के सब्र का बांध जैसे एकाएक टूट गया । उसने तमतमाकर झुका हुआ चेहरा उपर उठाया और बोला…"गुस्ताखी माफ़ सर, खुदकुशी करना जहिलों का काम है और मेरे खयाल से आईबी में वुजदिलों को नहीं लिया जाता ।"

होलकर के जवाब ने बलवंत राव के गुस्से की अाग में घी का वाम किया था । वह बिफरकर बोला----"तुम क्या तुम खुद को बहादुर समझते हो! क्या तुम्हें लगता है कि यह तुम्हारा बहादुरी भरा कोई ऐसा कारनामा है, जिसके लिए भारत सरकार को तुम्हें बीर चक्र से नवाजना चाहिएं! मुझे नहीं पता आईबी में बुजदिलों की भर्ती होती है या नहीं, परंतु आईबी में नाकारा लोग यकीनन भरे पडे़ हैं । इसका सबूत तुम्हारे और तुम्हारी नाकारा टीम के रूप में लिया को मिल गया है । हमारे हिस्से में अाई इस दोहरी चोट ने दहशतगर्दों की ही नहीं, सारी दुनिया को हम पर हंसने का मौका दे दिया है ।"

“मैं अपनी शिकस्त कबूल करता हूं सर, लेकिन गलती अकेले मुझसे नहीं हुई है । हाई कमान से भी हुई है ।"

"ह. . .हाई कमान क्या ? " बलवंत राव बिफ़रां-------'"मतलब क्या है तुम्हारा! क्या तुम यह कहना चाहते हो कि मुझसे भी गलती हुई है? "

भन्ननाए हुए होलकर ने कहा------------“आपने ठीक समझा सर ।"

“इसके अलावा और क्या गलती हुई है मुझसे कि इतने महत्त्वपूर्ण मिशन का इंचार्ज मैंने तुम्हें बनाया?"

" आप कंट्रोल रूम में बैठकर सेटेलाइट के जरिए हर एक्टिविटी पर नजर रखे हुए थे और अापने ही हमें आश्वस्त किया था कि हमारी नेवी और एयरफोर्स पूरी तरह तेयार हैं । दुश्मन की तरफ से किसी धोखे के जवाब में हम पलक झपकते उसे नेस्तनाबूद कर देगें । मैं पूछता हूं जब दुश्मन ने चांदनी को ब्लास्ट किया तो क्या आप सबने वह दृश्य नहीं देखा था?”

"देखा था । हमने वह दिल दहला देने वाला दृश्य अपनी बेबस आंखों से देखा था मगर मजबूर थे । जब तुम बहां होकर उस सबको न रोक पाए तो हम यहाँ बैठकर कैसे रोक सकते थे?"

"आप बेशक चांदनी मेडम की मौत को नहीं रोक सकते थे लेकिन उसके कातिलों को तो नेस्तनाबूद कर ही सकते थे । उनके हैलीकॉप्टर ज्यादा दूर नहीं निकल पाए थे । फिर आपने ऐसा क्यों नहीं किया? अाप चुपचाप मोहतरमा की मौत का तमाशा क्यों देखते रहे? आपने तो कहा था कि. . . . . . . . . .

"दोंनों हेलीकॉप्टर तब तक पाकिस्तान की सीमा वाले समुद्री एरिया में पहुंच गए थे । ऐसे में उन पर हमारी तरफ से हमला किया जाता तो वह पाकिस्तान पर हमला करार दिया जाता । बदले में पाकिस्तान के ग्बादर क्षेत्र में तैनात चीनी नेवी सबसे पहला काम यह करती कि वहां सबसे करीब मोजूद तुम्हारे पोत को उड़ा देती ।"

“यही बंदिश हमारे सामने भी थी । इसीलिए हम भी अपने पोत पर तैनात विमानभेदी तोपों का इस्तेमाल नहीं कर सके । ऊपर से हमारे लिए तो यही अप्रत्याशित खबर थी कि दहशतगर्द वहां हैलीकॉप्टर पर आए ये । वह भी एक नहीं, दो-दो हेलीकॉप्टर पर । जबकि हमारा ख्याल था कि मुस्तफा की अदला-बदली के लिए दुश्मन मोटर बोट से ही आएगा या किर कोई छोटा-मोटा पोत उसके पास होगा । और,,,,,,,,,यह तो किसी ने भी, शायद आपने भी नहीं सोचा होगा कि दुश्मन चांदनी मेडम को इस तरह उडा देगा ।"

"तुम्हें सोचना चाहिए था--सिर्फ तुम्हें ही इसलिए क्योकि तुम इस मिशन के कैप्टन थे और कैप्टन किसी और को दोषी नहीं कह सकता । कामयाबी भी उसी की होती है और नाकामयाबी ही ।"

होलकर का सिर पुन: झुक गया ।

"पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय जांच के लिए सरकारने एक जांच आयोग का गठन कर दिया है । वह जांच आयोग अभी, इसी वक्त से अपना काम शुरू कर रहा है । तुम्हारे मालवाहक पोत को भी सील किया जा चुका है । यह भी जांच के बाद ही फ्ता लगेगा कि दहशतगर्दों के पास दोनों हेलीकाप्टर कहां से अाए ।"

"मेरे और मेरी टीम के बारे में सरकार ने क्या फैसला किया है? "

"फिलहाल तो तुम सबको सस्पेंड कर दिया गया है ।"

"फिलहाल ?"

"आगे क्या होगा, यह तो जांच पूरी होने के बाद ही तय किया जाएगा । तब तक इंतजार करों और ऊपर वाले से दुआ करो ।"

"किस बात की दुआ ?"

"कि जांच में तुम सबको क्लीन चिट मिल जाए----ऐसा नहीं हुआ तो भारी मुश्किल में पड़ जाओगे-------बहुत भारी मुश्किल में । तुम सबके खिलाफ़ बहुत सख्त एक्शन लिया जाएगा ।"

"कैसा सख्त एक्शन? "

"नौकरी से तो हाय धोना ही पड़ेगा------मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तारी भी की जा सकती है । हालांकि बसंत स्वामी के नेतृत्व में

सारा विपक्ष एकजुट होकर अभी भी तुम सबकी गिरफ्तारी तुम पर मुकदमा चलाए जाने की मांग कर रहा है ।"

''क्या मुकदमा चलाना चाहता है विपक्ष हमारे खिलाफ?"

"काम में लापरवाही का इल्जाम तो आयद होता ही है ।"

"तो सरकार हम पर रहम कर रही है, उसने हमें केवल सस्पेंड किया है । मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तार नहीं किया! क्यों?"

"तंज मत कसो आफिसर । तुम पर रहम करने की सरकार के पास कोई वजह नहीं है और न ही सरकार विपक्षियों की गुलाम है । कौन-सा काम कैसे किया जाना है, यह सरकार को बखूबी पता है ।" चहलकदमी करता बलवंत राव ठिठका और होलकर को देखकर गम्मीर लहजे में बोला------“मैं यह तो नहीं कह रहा आफिसर कि मुझे तुमसे सहानुभूति है लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि मौजूदा हालात में कोई बेवकूफी न करना और जांच कमीशन को सहयोग करना । हो सकता है इन्कवायरी कमीशन को तुम्हारी बेगुनाही का यकीन हो जाए और तुम सबको तुम्हारी नौकरी पर बहाल कर दिया जाए ।"

होलकर चुप रहा ।

"एक आखिरी बात और ।”

होलकर ने उसे सवालिया नजरों से देखा ।

“जब तक तुम्हारे खिलाफ़ जांच चल रही है ।" बलवंत राव के स्वर में सहसा चेतावनी का पुट आ गया था--------"तब तक तुम आईबी को सूचित किए बगैर शहर से बाहर नहीं जाओगे । यह वार्निंग देशपांडे सहित तुम्हारी टीम के बाकी लोगों पर भी लागू होती है । सबको अलग-अलग बुलाकर समझाने का मेरे पास वक्त नहीं है । इसी मामले पर गृहमंत्रालय की तरफ़ से दिल्ली में आपात मीटिंग

बुलाई गई है, जिसमें आईबी की तरफ़ से मुझे भी शिरकत करनी है । मैं एयरपोर्ट के लिए बस निकलने ही वाला हूं । अपनी टीम को यह बात तुम समझा देना ।"

"जरूर ।"

" अब तुम जा सकते हो ।"

होलकर ने सहमति में सिर हिलाया ।

जव वह भारी कदमों से, वहां से रुखसत हो रहा था तो दिमाग में जहां यह सोचकर राहत थी कि आईबी का चीफ और सारी दुनिया अभी तक भी यह सोच रही थी कि चांदनी सिंह को मानव बम अतंकवादियों ने बनाया था और उन्होंने ही उसे उड़ाया । इस बात का किसी को इल्म तक नहीं था कि वह उसकी रिस्टवॉच के रिमोट से उड़ी थी । यहीं, दिमाग यह सोच-------सोचकर हलकान हुआ जा रहा था कि जो चिप उसने खुद मुस्तफा की जेब में रखी थी, वह चांदनी सिंह के लिबास में कैसे पहुच गई?
 
बुरी तरह हड़वड़ाया----बौखलाया राकेश सिंघल भागता हुआ शंकरलाल कौशिक के आँफिस में पहुंचा ।

उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं ।

कौशिक एक विदेशी क्लाइंट के साथ मीटिंग मे व्यस्त धा।

कौशिक के चेहरे पर सख्त अप्रसन्नता के भाव अाये ! गर्दन घुमाकर तल्ख निगाहों से अपने लेफ्टिनेंट सिंघल को देखा।

सिंघल की हालत देखकर उसके जेहन को झटका लगा !

सिंघल जैसे शख्स की वह हालत बेवजह नहीं हो सकती थी।

जरूर कोई वहुत ही अहम बात थी ।

उस व्यवधान पर फारेनर क्लाइंट भी असमंजस में पड़ गया था !

"क्या बात है सिंघल ?" कौशिक का स्वर उलझ-सा गया था। उसके लहजे में आशंका घुल गई थी------" यह तुमने अपनी क्या हालत वना रखी है । सब ठीक तो है न?"

" कुछ भी ठीक नहीं है लाल साहब !" सिंघल हड़बड़ाए स्वर में बोला था---“कुछ भी ठीक नहीं है ।"

"बात क्या है?”

"न. . .नवाब ।" उसने जल्दी से कहा-------------“लगता है नवाब को हमारे और जगनलाल के बारे में पता लग गया है ।"

"यह तुम कैसे कह सकते हो?”

"नवाब यहां आया है । व. . .वह खुद यहां आया है लाल साहब । उसके तेवर बिल्कुल भी ठीक नहीं हैं । मुझे सीसी टीवी कैमरों ने बताया है कि अ. . .आंधी-तूफान वना वह इधर, आपके चेम्बर की तरफ़ ही आ रहा है ।"

उस खबर ने कौशिक को बुरी तरह चौंकाया था । नवाब जैसी शख्सीयत का बगैर किसी पूर्व सूचना के खुद उसके पास आना कोई साधारण घटना नहीं थी ।

कौशिक संभलकर बैठ गया ।

दिलोदिमाग में मचल मच गई थी ।

"क्या वह अकेला है?" उसने पूछा ।

"नवाब के साथ हमेशा उसके हथियारबंद लड़ाकों की बिग्रेड चलती है । यहां भी उसी के साथ आया है, मगर......."

"मगर ?"

"बिग्रेड बिल्डिंग के बाहर खडी है ! नवाब अकेला ही अंदर दाखिल हुआ है ।"

"मतलब वह मेरे पास अकेला ही अा रहा है?"

"मगर . . . "

"सिंघल ।" कौशिक के चेहरे का तनाव काफी हद तक छंट गया था….....“तुम बेवजह परेशान हो रहे हो । मेरे खयाल से तुम्हें या बाकी लोगों को भी इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है । नवाब मुझे नुकसान पहुचाने के इरादे से नहीं आ रहा है ।"

"आप ऐसा कैसे कह सकते हैं लाल साहब?"

"फिलहाल बताना जरूरी नहीं समझता लेकिन फिर भी कह रहा हूं कि तुम्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है । नवाब को निर्विघ्न मेरे पास अाने दो । उसे कोई भी रोकने की गलती न करे ।"

"लेकिन लाल साहब. . .

“मैँने जो कहा है, उस पर अमल करो सिंघल ।" कौशिक का लहजा सख्त हो गया-----"और खबरदार इस बारे में जब तक मैं न कहूं कोई भी जहांगीर साहब को खबर नहीं करेगा ।"

आश्वस्त न होने के बावजूद सिविल चुप रह गया ।

"और जनाब ऐलेक्स साहब ।” कौशिक अपने फारेनर क्लाइंट से मुखातिब हुआ-------“मीटिंग में पेश आने वाले इस व्यवधान के लिए माफी चाहता हूं ! अफसोस है कि इस वक्त हमे यह मीटिंग यहीं खत्म करनी पड़ रही है !"

"ओ नो मिस्टर कौशिक ।" ऐलेक्स अप्रसन्नता से बोला ।

"अगेन सौरी ।"

" व्हॉट इज एन इमरजेंसी?"

"यस ! ऐसा ही समझ लीजिए ।"

"आलराइट । नाओ आय एम गेट अलांग ।"

"थैंक्स !"

घोर असहिष्णुता का प्रदर्शन करता ऐलेक्स बाहर निकल गया ।

"तुम भी जाओं ।" कौशिक सिंघल से बोला----" और जो मैंने कहा है उस पर अमल करो । बल्कि नवाब को भेजो मेरे पास !"

सिंघल भी वहां से चला गया ।
 
शंकरलाल ने आने वाले पलों का सामना करने है लिए मन-ही-मन खुद को तैयार कर लिया था । तभी वहां ठीक किसी शहंशाह के अंदाज में चलता हुआ नवाब दाखिल हुआ । वह कौशिक को देखकर अपनी आदत के मुताबिक मीठे स्वर में बोला था-----"सलाम वालेकुम शंकरलाल ।"

"आओ नवाब ।" कौशिक भावहीन स्वर में बोला । उसने कुर्सी से उठने का उपक्रम नहीं किया था-------"तशरीफ रखो ।"

नवाब की तीखी नजरों ने कौशिक के समूचे आँफिस का जायजा लिया । फिर ऐलेक्स द्वारा खाली की गई चेयर पर बैठ गया !

"शुक्रिया ।” वह कौशिक की आंखो में देखता हुआ बोला-----" बहुत हैरान हो रहे होगे मुझे यहां देखकर!"'

“काम की बात करों नवाब ।" कौशिक सपाट स्वर में बोला-'"यहां क्यों आए हो?"

"तुम्हें मालूम है ।"

"मतलब ?"

योड़ा खामोश रहने के बाद नवाब बोला…"मेरा वफादार जगनलाल मेरी मर्जी के खिलाफ इस मुल्क से बाहर जा चुका है। इस शहर में ऐसा कारनामा केवल एक ही इंसान कर सकता था और उसका नाम जहांगीर है ।"

आखिर वही हुआ था, जिसका सिंघल ने अंदेशा जाहिर किया था । नवाब के आने का कारण जगनलाल ही था । सारे राज खुल चुके थे, अब धींगामुश्ती का कोई फायदा नहीं था । सो बोला-----''ते यह बात है! लेकिन तब तो तुम्हें जहांगीर के पास जाना चाहिए था मेरे पास क्यों आए हो?"

"क्योंकि जगनलाल जहांगीर के पास नहीं गया था ।" नवाब का लहजा जरा सख्त हुआ----"वह तुम्हारे पास अाया था ।"

"तो क्या हुआ ?" वह ढिठाई से बोला----"ज़गनलाल की समस्या का मेरे पास हल था । तुम जानते ही हो कि हमारी आर्गेनाइजेशन फर्जी पासपोर्ट के धंधे में भी दखल रखती है । हमने मुनासिब कीमत लेकर उसे कनाडा भेजने का इंतजाम कर दिया ।'"

"मुनासिब कीमत, जो कि नगदी नहीं बल्कि कुछ और था?"

“कीमत कई तरीके से अदा की जाती है । मुझे दुख है कि यह बात मुझे नवाब को बतानी पड़ रही है ।”

"नवाब का सिंडीकेट भी कांट्रेक्ट कीलिंग के धंथे में दखल रखता है । कल मेरे पास भी तुम्हारे लेफ्टिनेंट राकेश सिंघल के कत्ल की सुपारी आई थी । यदि वह मैंने ले ली होती तो अाज तुम्हारे लेफ्टिनेट की लाश पोस्मार्टम का इंतजार कर रही होती ।"

"त. . .तुम ऐसा नहीं कर सकते ।" वह तीखे स्वर में बोला-----" तुम यह दुस्साहस नहीं दिखा सकते ।'"

"नवाब को चेलेंज कर रहे हो! मुझे यह हौंसला दिखाने के लिए कितना वक्त देते हो…एक घंटा, एक दिन या एक हफ्ता? बैसे मेरे लिए एक घंटा काफी है । मैं यहीं, तुम्हारे सामने तुम्हारे आंफिस में बैठा रहूंगा । सिंघल को भी तुम इस बिल्डिंग से बाहर मत जाने देना । इसके बावजूद एक घंटे से पहले ही तुम्हें उसकी खून से लथपथ लाश मिल जाएगी ।'"

"फिर तुम्हारा क्या होगा? क्या भूल गए कि तुम इस वक्त कहां बैठे हो? क्या तब तुम यहाँ से जिंदा वापस जा पाओगे?"

“ये अल्फाज जहांगीर ने कहे होते तो मुझे जरा सोचना पड़ता, क्योंकि वह मेरे बराबर कद रखता है लेकिन तुम जहांगीर नहीं हो शंकरलाल कोशिक हो । नवाब के सामने तुम्हारी हैसियत कुछ नहीं है । मैं तुम्हारी लाश अपने कंधे पर लटकाकर भी यहां से बाहर निकल सकता हूं और यकीन करो, खरोंच तक नहीं आएगी ।'"

"बहुत बड़ा बोल, बोल हो नवाब । यह शायद तुम इमारत के बाहर मौजूद अपने आदमियों के बूते पर बोल रहे हो । मगर भूल रहे हो कि उससे तीन गुना ज्यादा आदमी और हथियार इस इमारत में मौजूद हैं, जो मेरे एक इशारे पर कयामत ला सकते है ।"

"नवाब का उसूल हेै…जो दिखता है उस पर वह कभी यकीन नहीं करता है और जिस पर उसका यकीन होता है, वह किसी को तव तक नहीं दिखता जब तक नवाब दिखाना न चाहे ! "

"इ......इसका क्या मतलब हुआ ?"'

"जहाँगीर जानता है । अगर तुम जहांगीर होते तो तुम्हारी समझ में भी फौरन आ गया होता । आजमाना चाहोगे?"

कौशिक कसमसाया । साफ़ जाहिर था कि नवाब की बातो और उसके आत्मविश्वास ने उसे विचलित कर दिया था ।

सबसे बडी बात, वह सब कुछ जानते-बुझते भी खुद दुश्मन सी मांद में आया था और इतना बेफिक्र दिखाई दे रहा था ।

"नबाब ।" वह थोडा नरम पड़ता हुआ बोला…“तुम्हारा आदमी तुमसे असंतुष्ट था । मैं उसका काम नहीं करता तो वह किसी और को दूंढ़ लेता । कबूल करता हूँ कि मुझे तुम्हारे मामले में दखल नही देना चाहिए था लेकिन अब जगन यह मुल्क छोड़कर जा चुका है इसीलिए इस बात को तुल देने से कोई फायदा नहीं होगा ।"

“कबूल करते हो कि तुमसे गलती हुई ?"

"अगर मेरी हां सुनने तुम्हारा अहम शांत होता है तो कर रहा हूं कि मुझसे गलती हुई है और यकीन करो, इस में जहांगीर का दखल नहीं है । हम दोनों के बीच तनाव या दुश्मनी दोनों में से किसी के भी हक में नहीं होगी, लिहाजा इस बात को यहीं खत्म कर दो तो बेहतर है ।"

"बात अगर इतनी-सी होती तो नवाब ने बहुत पहले ही इसे खत्म कर दिया होता शंकरलाल ।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?"

"नवाब के खिलाफ तुम्हारे दुस्साहस की फेहरिस्त बहुत लम्बी है । तुम्हें क्या लगता है,मेरे बुलावे पर मुम्बई आए उन कम्यूटर हैकर्स के कातिल का अभी तक नवाब को पता नहीं चला है?"

कौशिक के मुंह से ऐसी अन्दाज निकली जैसे ब्लाडर फटा हो ।

वह कमबख्त उसका पुरा कच्चा चिट्ठा साथ लेकर आया था ।

उस पर हर राज फाश हो चुका था ।

वह हर सच से वाकिफ होकर ही उसके पास पहुंचा था ।

उस सिलसिले में भी अब हुज्जत्त का कोई फायदा नहीं था । सो, धीरे से बोला…“कम्यूटर हैकर तुम्हारे आदमी नहीं थे और मैंने जब उन पर हाथ डाला तो तुम उनकी छुट्टी कर चुके थे !"

"तुम्हारा यह जवाब ढिठाई से भरा है शंकरलाल लेकिन मैं जानता हूं तुम्हारे पास कोई दूसरा जवाब है भी नहीं । वैसे भी बीस हजार करोड़ की रकम वहुत बड्री होती है । लगता होगा कि उसके लिए नवाब को दुश्मन वना लेने में हर्ज नहीं ।"

"यकीन मानो, मुझें उस समय मालूम नहीं था कि यह मामला बीस हजार करोड़ का है ।"

" अब मालुम हुआ जगनलाल से!"

"दरअसल नवाब. . .

"यह मैं तुमसे पूछ नहीं रहा, तुम्हें बता रहा हुं शंकरलाल कि यह तुम्हें मेरे अादमी जगनलाल से मालूम हुआ है ।"
 
कौशिक खामोश हो गया और असमंज़सपूर्ण नेत्रों से उसे देखने लगा । चेहरे पर उलझन तथा आश्चर्य के भाव उभर जाए थे ।

"तुम जरूर यह सोच रहे हो कि मुझे यह कैसे मालूम हुआ?" नवाब उसके चेहरे पर उभरते मनोभावों को पड़ता हुआ बोला-“मैं इसका जवाब दूंगा लेकिन अब अहम सवाल यह होता है कि जब तुम्हें बीस हजार करोड़ के बारे में मालूम ही नहीं था तो फिर उन हैकरों को पहले अगवा और फिर उनका कत्ल क्यों किया? क्या मैं यह समझूं कि यह काम तुमने किसी और के लिए किया था, जैसे कि यह काम मैं खुद भी किसी और के लिए कर रहा हूं ! और देखो शंकरलाल, हैरान होकर मत दिखाना । मुझें पता है कि तुम्हें यह अंदर की बात मालूम है कि बीस हजार करोड़ की चाबी किसी और के लिए हासिल कर रहा हूँ ।"

“क . . कैसे मालूम है?" उसके आश्चर्य में इजाफा हो गया था ।

"बताऊंगा, पहले मेरे सवाल का ज़वाब दो ।"

" कौन-से सवाल का?"

"हैकरों का कत्ल तुमने किसी और के लिए किया था । है न?"

"ह. . .हां ।" कौशिक ने बैचेनी से पहलू बदला-----'"यह सच है ।"

"उसका नाम बताओ ।"

"यह नहीं हो सकता । अपने धंधे की----अपने क्लाइंट की सीक्रेसी मैं किसी ओर…को नहीं बता सकता ।"

" मैं कोई और नहीं नवाब हूं--- नवाब !"

"फिर भी नहीं बता सकता ।"

"शंकरलाल ।" नवाब का लहजा सख्त हो गया----तुम सुलह के ख्वाहिशमंद नहीं हो----तुम बात को खत्म करना नहीं चाहते। तुम अमन नहीं चहते, तुम खून-खराबा चाहते हो । तुम अंडरवर्ल्ड के क्षितिज पर बारूद का धुआं उड़ता देखना चाहते हो । मेरे खयाल से मैंने तुम्हारे पास आकर गलती की है । मुझे जहांगीर के पास जाना चाहिए था और उससे पूछना चाहिए था कि वह क्या चाहता है । उसे यह भी बताना चाहिए था कि उसने अपने निजाम में ऐसे नाकारा लोगों को भर्ती कर रखा है जो मेरे और उसके बीच खूनी जंग छिड़वा सकते हैं । जो मुम्बई की सड़कों को खून से नहलाना चाहते है ।"

कौशिक तिलमिलाकर बोला------"' मैं नाकारा हूं तो तुम भी तारीफ के लायक नहीं हो । तुम अपने निजाम में बैठे जगनलाल जैसे गद्दार को नहीं पहचान पाए । तुम्हारा अपना आदमी खुद मेरे पास न आया होता तो मुझे तुम्हारे सीक्रेट अॉपरेशन के बारे कुछ भी मालूम नहीं हो पाता ।"

"नवाब का तजुर्बा और उसकी आंखें कभी धोखा नहीं खा सकती नादान अादमी । अगर जगनलाल गद्दार होता तो मैं उसे कभी उस ओहदे पर न बैठाता जहाँ पर बैठा रखा था ।"

"तो फिर क्या जगनलाल को वफादार कहना चाहिए !" कौशिक व्यंग से हंसा-------"' क्या मैं समझू कि तुम्हें वफादारी की परिभाषा ही नहीं पता?"

"तुम्हारी अक्ल पर मुझे तरस अा रहा है शंकरलाल ।" कहने के साथ उसने एक लिफाफा उसके सामने डाल दिया------“इसे देखे, तुम्हारी आंखे और तुम्हारी अक्ल, दोनों खुल जाएंगी ।"

''क्या है यह?” कोशिक ने लिफाफे को सशंक नजरों से देखा ।

"घबराओ मत । लेटर बम नहीं है ! तुम्हारे इतने करीब बैठकर मैं तुम्हें लेटर बम से नहीं उडाऊंगा ।"

कौशिक ने लिफाफा उठाकर खोला ।

यह देखकर सकपकाया कि उसमें एक पासपोर्ट व बीजा मौजूद था जो कि कनाडा का था । उसमें ज़गनलाल का फोटो लगा था लेकिन उसका नाम और पता फर्जी था ।

वह शत-प्रतिशत वही पासपोर्ट था, जिसका इंतजाम उसने जगनलाल को मुल्क से बाहर निकलने के लिए किया था ।

उसे पहचानने में कौशिक धोखा नहीं खा सकता था ।

वह पासपोर्ट नवाब उसे पेश कर रहा था । मतलब साफ था कि जगनलाल पकड़ा गया था और उसका खेल खत्म हो चुका था । सामने बैठे जल्लाद ने यकीनन उसे वहुत बूरी मौत दी होगी------वही मौत जो एक गद्दार के हिस्से में आती है । इसीलिए उसे तमाम सवालों के भी सटीक जवाब मालूम थे जो केवल ज़गनलाल से ही मालूम किए जा सकते थे ।

"लगता है तुमने पहचान लिया?" नवाब अर्थपूर्ण स्वर में कौशिक से बोला……""यही फर्जी पासपोर्ट बनवाकर तुमने मेरे आदमी को दिया था न, उसकी नवाजिशों की कीमत के तौर पर ?"

"य. . .ये पासपोर्ट तुम्हारे पास कैसे?"

"सोचो , कैसे? "

"उम्मीद तो नहीं कि जगनलाल जिंदा होगा, फिर भी.. .

"जिंदा है ।" अप्रत्याशित जवाब मिला ।

"जिंदा है?" कौशिक गहन अविश्वास से बोला----“यकीन नहीं होता । गद्दार को कौन जिंदा छोड़ता है?"

"जगन पूरी तरह गद्दार नहीं वना था । इसीलिए जिंदा है और अब तक तो वह कनाडा भी पहुंच चुका होगा ।"

"पासपोर्ट तुम्हारे पास है, फिर कनाडा केसे पहुंच गया होगा ?"

"अपने असली पासपोर्ट पर, जिसे मैंने जब्त कर रखा था ।"

"उसका पासपोर्ट तुमने उसे लौटा दिया? क्यों?"

" मेरे आदमी की विवशता भले ही उसे तुम्हारे पास ले लाई थी और उसने तुम्हें मेरे प्लान के बारे में बता दिया था मगर वो वफादारी जो जगन के खून में थी, उसने उसकी गेरत को धिक्कार कर लहुलुहान कर दिया वह खिंचा हुआ मेरे पास चला अाया !"

"क. . किसलिए?" कौशिक की जिज्ञासा बढ़ गई थी ।

"अपने किए का प्रायश्चित करने के लिए । उसने तुम्हारे उकसावे पर जो कुछ भी किया, उस बारे में मुझे सब-कुछ सव-सव बता दिया और तुम्हारा दिया हुआ पासपोर्ट मेरे सामने रख दिया--------तथा पश्चाताप भरे स्वर में बोला-----'नवाब साहव, गलती इंसान से ही होती है । थोडी़ देर के लिए एक नई जिंदगी की चाहत में दीवाना हो गया था और उसी दीवानगी में नादानी कर बैठा । पर तुरंत ही महसूस कर लिया कि अपने अन्नदाता के साथ इतना वड़ा विश्वासघात करके जी नहीं पाऊंगा । आज शाम की मेरी फ्लाइट है । चाहता तो इस पासपोर्ट पर हमेशा के लिए मुल्क छोड़ सकता था मगर मेरी गैरत आडे़ आ गई, मैं खुद को रोक नहीं पाया । अब सव आपके सामने है । चाहे तो इस गद्दार का सिर कलम कर सकते हैं । मैं उफ भी नहीं करूंगा ।'

"फिर तुमने क्या किया?"

"उसूलन तो मुझे उसका सिर कलम कर देना चाहिए था, हर गद्दार की यही सजा होती है लेकिन जगन गद्दार था ही कहां! वह तो बस थोड़ी देर के लिए भटक गया था-उसने मेरा भरोसा कहां तोड़ा था? उसने तो वफादारी की मिसाल पेश की थी और मेरा सीना फख़्र से भर दिया था । ऐसे इंसान को सजा देना मुर्खता थी । वह तो पुरस्कार का हकदार था, जो मैंने उसे दिया ।"

"उसके ओरिजनल पासपोर्ट के रूप में?"

"मैं खुद उसे एयरपोर्ट तक ड्रॉप करके आया था-----इस वादे के साथ कि वह कनाडा में बेटी के साथ अपनी नई जिंदगी जीने के लिए आजाद था और अगर उसे हिंदुस्तान में कभी किसी चीज की जरूरत पड़े तो बेहिचक मुझसे कह सकता था ।"

कौशिक मुग्ध'-सा होकर नवाब को देखने लगा था ।

"अब बोलो ।" नवाब विजयात्मक भाव से बोला------" कह सकते हो तो अब कहकर दिखाओ कि नवाब में लोगों को पहचानने की अक्ल नहीं है और नवाब तुम्हारी तरह नकारा है?"

"सॉरी नवाब ।" कौशिक का स्वर ढीला पड़ गया था----"मैं अपने अल्फाज वापस लेता हूं । तुम्हारे तजुर्वे और काबिलीयत पर शक करना मेरी गलती थी । नकारा मैं हूं जो तुम्हें नकारा कहा ।"

"शुक्रिया ।" नवाब बोला'--"इंसान को इतने खुले दिमाग का तो होना ही चाहिए कि गलती हो जाए तो उसे स्वीकार कर ले । ज्यादा अच्छा होता यदि तुम उस आदमी को लेकर मेरे सवाल का जबाब दे देते, जिसके लिए तुम्हारे और मेरे बीच तनाव पैदा हुआ !"

" यह मुमकिन नहीं है नवाब ।" कौशिक सपाट स्वर में बोला था--------इ मामले में मेरा वही ज़वाब है जो पहले था । चाहकर भी अपने क्लाइंट की सीक्रेट पास नहीं कर सकता ।"

"मैंने सचमुच यहाँ जाकर गलती की ।" नवाब ने जैसे अपना फैंसला सुनाया था----''मुझे जहांगीर के पास जाना चाहिए था । कोई बात नहीं, अपनी गलती को अब दुरुस्त किए लेता हूं ।" कहने के साथ वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ-----“मैं जहाँगीर के पास जाता हूं! वहां से भी यही जवाब मिलता है तो फिर मैं दो रास्ता अख्यियार करने पर मजबूर हो जाऊंगा जो दोनों सिंडीकेट्स की बरबादी की तरफ जाएगा । मुझे उम्मीद नहीं कि जहांगीर के पास जाने के बाद मुझें वह रास्ता अख्तियार करना पडेगा, क्योंकि जहांगीर तुम्हारी तरह अहमक नहीं है । होता. .जो जहांगीर न होता ।"

“अ. .अरे रुको नवाब ।" कौशिक हड़बड़ाकर जल्दी से बोला । फिर उसने आगे बोला…"प्लीज !"

नवाब ठिठका ।

प्रश्वसूचक नेत्रों से कौशिक को देखा ।

"बैठ जाओ ।"

"क्या फायदा? "

"फायदा भी होगा । बैठो तो सही ।"

नवाब वापस बैठ गया । बोला…“बोलो ।"

“नवाब ।" कौशिक कसमसाकर बेचैनी से पहलू बदलता हुआ बोलता----“वेसे तो यह हमारे धंधे के उसूलों के खिलाफ़ है, लेकिन…

"नाम बताओं ।"

"डबल एस ।"

"डबल एस ।" नवाब बुरी तरह चौका----“यानी संजय सिंह बो दिल्ली अंडरवर्ल्ड का खलीफा !"

" हां, तुम तो सव जानते हो!"

"कमाल है! मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी कि इस मामले के तार दिल्ली से जुडे होंगे !" नवाब के मस्तक पर बल पड गए !

दिल्ली अंडरवर्ल्ड के खलीफा को बीस हजार करोड़ के बारे में कैसे पता?"

"मेरे खयाल से वह भी ये काम किसी और के लिए कर रहा है ?"

" किस के लिए ?"

"नहीं पता ।"

"शंकरलाल ।" नवाब की आंखों की पुतलियां कौशिक के चेहरे पर जम गई…“क्या तुम सच कह रहे हो ?"

“यकीन करो । मुझे डबल एस के क्लाइंट के बारे मे मालूम करने की कोई जरूरत भी नहीं थी ।"

"क्या तुम उसके बारे में मालूम कर सकते हो?"

"मुझे क्या पड़ी है?"

“पड़ी है । यह काम तुम्हें मेरे लिए करना होगा !"

"तुम्हारे लिए?"

“तुम्हें इसकी कीमत दी जाएगी---------मुनासिब कीमत ।"

"कितनी मुनासिब?”

"तुम बताओ । समझ लो कि मैं इस वक्त तुम्हारा क्लाइंट हूं ।"

"तुम शायद मजाक कर रहे हो नवाब?”

"मजाक जरूर करता हू लेकिन धंधे में नहीं ।"

कौशिक जबरदस्त पशोपेश में पड़ गया ।
 
"कोई बात नहीं ।" नवाब बोला---सोच लो, अराम से बता देना । मुझे कोई जल्दी नहीं है ।"

"डबल एस के क्लाइंट के बारे में जानने में इतनी ही दिलचस्पी है तो यह काम खुद क्यों नहीं कर लेते?"

"इंकार कर दोगे तो मुझे ही करना पडे़गा । वैसे यह काम तुम्हारे लिए ज्यादा आसान होगा क्योंकि डबल एस मेरा नहीं तुम्हारा क्लाइंट है और क्लाइंट के क्लाइंट को जानना मुश्किल नहीं होगा ।"

कौशिक खामोश रहा ।

नवाब ने कहा----"एक बात और ?"

"बोलो ?"

"बीस हजार करोड के बारे में जानने के वाद अब उस फ्रंट पर तुम्हारा क्या मूवमेंट होगा? मेरा मतलब क्या तुम इतनी बड्री रकम का लालच छोड़ दोगे-------उसे हासिल करने का प्रयास नहीं करोगे?"

“बदले हुए हालात में यह कोशिश कामयाब हो पाएगी, इसमें मुझे संदेह है? रायता काफी बिखर गया है ।"

"राजा चौरसिया के कामयाब हो जाने की सूरत में भी?"

"क्या राजा चौरसिया कामयाब हो गया है?"

" सौ फीसदी ।"

"तब तो मेरी कोशिश जरूर कामयाब हो जाएगी ।" कौशिक ने कहा और हंस दिया ।

नवाब ने हंसी में उसका साथ दिया ।

फिर वह आशा भरे स्वर में बोला-------" तो क्या मैं यह समझू कि मेरे पास से निकलने के बाद चौरसिया अपने घर महफूज पहुंच पाएगा, वह तीनों मरहूमों की राह का मुसाफिर नहीं बनेगा?"

"कम से कम मेरी वजह से तो नहीं बनेगा ।"

“क्या तुम्हारी बात का यकीन किया जा सकता है ?"

"मैं अपनी गारंटी ले सकता हूं लेकिन दिल्ली में बैठे डबल एस की गारंटी नहीं ले सकता । मेरे इंकार की सूरत में वह मुम्बई में बैठे किसी और गिरोह को काम सौंप सकता है, या फिर खुद ही अपने शूटर मुम्बई भेज सकता है ।"

" डबल एस के पास इतनी सांसे बाकी नहीं हैं । नवाब के रास्ते में आने वाले से खुदा रूठ जाता है । वह केवल तभी तक जिंदा है जव तक तुम उसके क्लाइंट के बारे में मालूम नहीं कर लेते । उसके बाद डबल एस का अपने अंजाम को पहुंचना तय है ।"

"वह तुम्हारा निजी मामला है । जहां तक डबल एस के क्लाइंट की बात है, उसके बारे में एकाध दिन में पता करके बता दूंगा !"

" कीमत भी!"'

"कीमत के बारे में मैंने फैसला कर लिया है ।"

"कितनी?"

"वह जितनी भी है, सारी की सारी उधार रहेगी ।"

"दुश्मन पर कर्ज चढा़ रहे हो?"

"दुश्मन नवाब जैसा हो तो उसे कर्जदार बनाने में ही फायदा है !"

" नवाब और जहांगीर कभी दोस्त नहीं बन सकते , लेकिन तुम्हारी तरफ से इस दोस्ताना पहल की कोशिश मुझे अच्छी लगी !"

" शुक्रिया नवाब ! कुछ पीना पंसद करोगे !"

" नहीं ! फिर से शुक्रिया ! इजाजत चहुंगा !"

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निरंजननाथ दिल्ली स्थित गृहमंत्री बादल नारग के सरकारी आवास पर पहुंचकर उससे मिला ।

नारंग जीरे निरंजननाथ की वह मुलाकात वेहद अहम थी ।

निरंजन पैंतालीस साल की उम्र का एक सामान्य कद्र-काठी वाला शख्स था । उसका रहन-सहन भी बेहद सामान्य था ।

उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह मेम्बर आंफ़ पार्लियामेंट था और बिना किसी राजनैतिक दल के टिकट पर भारी बहुमत से चुना गया था । अपने चुनाव क्षेत्र तथा मुल्क की राष्ट्रीय राजनीति में निरंजन नाथ हाल ही में बवंडर की तरह उभरा था ।

उसकी छवि कट्टर हिंदूवादी राजनेता की थी और बीते तीन सालों में मुल्क का इकलौता ऐसा नेता था, जिसने हिंदुत्व को लेकर सबसे ज्यादा आक्रामक प्रचार किया था और सेक्युलरिज्म की राजनीति को धता बताकर, हिंदुत्व के विरोधियों के खिलाफ ऐसा जहर उगला था, जैसा आजादी के बाद से आज तक किसी राजनेता ने नहीं उगला था ।

वह मुल्क के अंदर खूले सभी मदरसों को दहशतगर्दी के ट्रेनिंग कैंप बताता था । मुसलमानों के खिलाफ़ और भी कई तरह से निरंतर जहर उगलता आया था, उसके बयानों के कारण राषट्रीय राजनीति में अाए दिन बवंडर खड़ा होता रहता था । क्योंकि आवाम का एक वहुत बड़ी हिस्सा निरंजननाथ के पक्ष में लामबंद होकर खडा था, इसलिए उसके बेतहाशा आक्रामक हमलों के बावजूद मुल्क के सेक्युलरवादी नुमाइंदे उस पर हाथ डालने से कतराते । निरंजननाथ के तर्क अकाट्य होते थे और जो कुछ भी वह बोलता था, उसके समर्थन में उसके पास पुख्ता सबूत होते थे ।

इसलिए उसके विरोधियों की जुबान वंद हो जाती थी और पार्लियामेंट में उसकी दहाड़ पर मरघट जैसी खामोशी छा जाती थी । निरंजननाथ अपनी इसी आक्रामक राजनीति के कारण हिंदूवादी एजेंडे का विरोध करने वाले कट्टरपथियों और पाकिस्तान समर्थित दहशतगर्दों के निशाने पर था । निरंजननाथ पर मंडराते खतरे को देखते हुए सरकार ने उसे जेड प्लस सुरक्षा मुहैया करा रखी थी ।
 
वह भी निरंजननाथ ही था, जिसने विपक्षी नेता बसंत स्वामी की पत्नी के किडनैप पर सरकार के घुटने टेकने पर सबसे मुखर विरोध किया था और उसे सरकार द्वारा देश की सौ करोड़ आवाम के साथ विश्वासघात बताया था ।

बाकी की पच्चीस करोड़ आवाम को निरंजननाथ हिंदुस्तानी जनता मानता ही नहीं था ।

अब, जबकि चांदनी सिंह का कत्ल हो चुका था और मुस्तफा भी हाथ से निकल गया था तो उसने सरकार और उसके मंत्रिमंडल को "मृत आत्माओं का समुह'' तक कह डाला था ।

गृहमंत्री बादल नारंग के इस्तीफे की मांग कर डाली थी ।

इस्तीफा न देने की सूरत में उसने आने वाली पांच तारीख को सरकार के खिलाफ एक महारैली करने का फैसला किया था ।

उसके लिए उसने दिल्ली के रामलीला मैदान को चुना था ।

देश के कोने-कोने से लोग पहुंचने वाले थे और पांच तारीख को वहां तीन लाख से ज्यादा की भीड़ इकट्ठा होने की उम्मीद थी ।

महारैली के लिए निरंजननाथ को सभी प्रमुख विपक्षी दलों का समर्थन तथा सहयोग प्राप्त हो गया था ।

मुस्तफा जैसे दुर्दांत आतंकवादी को रिहा करने और चांदनी की निर्मम हत्या के कारण सारा देश उबला हुआ था ।

सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ़ एक लहर-सी उमडी़ हुई थी ।

ऐसे सग्वेदनशील हालात में राजधानी में जमा होने वाली लाखों लोगो की भीड़ कोई भी गुल खिला सकती थी ।

इसीलिए, घबराई सरकार ने निरंजननाथ की मान मनौव्वल शुरू कर ही थी । वह आगामी पांच तारीख को होने वाली महारैली को हर कीमत पर रोकना चाहती थी !

गृहमंत्री बादल नारंग की काफी मिन्नतों के बाद निरंजननाथ ने उससे मिलना कबूल किया था है उसी सिलसिले में वह नारंग से मिलने उसके आवास पर पहुचा था ।

इस मुलाकात के बारे में उसने मीडिया से जिक्र कर दिया था ।

इस कारण उसके समर्थकों का हुजूम पहले ही गृहमंत्री आवास के बाहर इकट्ठा हो गया था ।

मीडिया से जिक्र उसने किया भी इसीलिए था ।

इस तरह उसने गृहमंत्री को अपनी ताकत दिखाई लेकिन नारंग से मुलाकात के लिए अकेला ही अंदर पहुंचा ।

बादल नारंग ने काफी गर्मजोशी उसका स्वागत किया था । लेकिन उससे निरंजननाथ के तेवरों में कोई फ़र्क नहीं आया । उसकी स्पष्टवादी सोच ने नारंग द्वारा किए गए अपने स्वागत को उसके द्वारा की गई चापलूसी करार दिया था ।

निरंजननाथ की धृष्टता पर बादल नारंग कई पलों तक मन--ही--मन सुलगता-सा बैठा रहा, फिर संयत स्वर में बोला-----"पांच तारीख करीब है निरंजन, उसमें ज्यादा वक्त नहीं रह गया है ।"

"सो तो है ।" निरंजननाथ रुखाई से बोला…“इसमें अापने नया क्या बताया? ये बात तो सभी जानते हैं ।"

" जिद बेमानी है । उकसावे की कार्यवाई है । तुम महारैली में की भीड इकट्ठा करके वाहवाही भले ही हासिल कर सकते हो लेकिन इसके अलावा और कुछ भी हासिल नहीं होने वाला ।"

“तब तो आपको खुश होना चाहिए । फिर आप मेरी महारैली से इतने बेचैन क्यों हैं?"

“मेरी बेचैनी मुल्क के लिए है----मुल्क के आवाम के लिए है ।"

"या अपनी कुर्सी के लिए है?"

“कुर्सी के लिए?"

" हाँ शायद. . . "

"अगर तुम यह समझ रहे हो निरंजन कि मेरी कुर्सी खतरे में है और मैंने अपनी कुर्सी के लिए फिक्रमंद होकर तुम्हें सुलह के लिए वुलाह है तो तुम गलत समझ रहे हो ।"

"अच्छा! फिर सच क्या है?"

"सच यह है कि मेरी कुर्सी को कोई खतरा नहीं है । मेरा यकीन करो, कम-से-कम तुम्हारी महारैली के कारण तो मेरी कुर्सी को जरा भी खतरा नहीं है ।"

"फिर भी मेरी खातिरदारी के लिए आप इतने उतावले हो रहे थे-----"फोन पर गिड़गिड़ा रहे थे?"

"तुम्हारी सलामती के लिए ।"

"मेरी सलामती! उसके लिए आप क्यों फिक्रमंद हैं?" इस वक्त वह दंभ में चूर था…"मुझे क्या होने वाला है?"

"तुम्हारी जान को खतरा है ।"

"क्या कह रहे हो जनाब?" निरंजननाथ संभलकर बैठ गया था----------''" जान को भला किससे खतरा है?”

“उन्ही से, जिनकी खिलाफत का तुमने अभियान चला रखा है-जिनको लेकर तुम रात-दिन जहर उगलते रहते हो ।"

"दहशतगर्दों से-पाकिस्तानी दहशतगर्दों से?”

"हां । खुफिया सूत्रों से यह पक्की खबर मिली है कि हाफिज लुईस के आप्रेशन औरंगजेब का अगला चरण शुरू हो चुका है । जिससे उसके जेहाद के खिलाफ माहोल तैयार करने वालों के सफाए का मुकम्मल प्तान है, उसमें एक नाम तुम्हारा भी है । वजह तुम्हें बताने की जरूरत नहीं है । इस बात को तुमसे बेहतर केई नहीँ जान सकता कि हिंदुत्व को लेकर तुम्हारे अंदर कैसा जुनून है ।"

"इसलिए वे लोग मुझे खत्म करना चाहते हैं?”

"यही कट्टरपन होता है । जो उसके रास्ते में बाधा पहुंचाए उसे खत्म कर दो । तुममें भी वही है, उनमें भी ।"

“मैं मौत से नहीं डरता जनाब । यह खतरा तो हमेशा से मुझ पर मंडराता आया है । इसीलिए मुझे जेड प्लस सुरक्षा दी गई है ! मुझें अफसोस है कि हिंदुत्व को लेकर यह जुनून आप में नहीं है । यह जुनून तो हर हिंदुस्तानी में होना चाहिए ।"

"हिंदू हम भी हैं मगर मुस्लिम विरोधी नहीं है । जबकि तुम एक खास कौम और मजहब के कट्टर विरोधी हो, जो निक नहीं है । ऐसा विरोध गलत हे-नाजायज है । यह जुनून केवल जर्मनी के तानाशाह हिटलर में था । इतिहास गवाह है कि उसकी देशभक्ति, साहस और जज्बे को दुनिया ने सराहा लेकिन विरोध के उसके इस अंधे जुनून को दुनिया ने ठेंगा दिखा दिया । याद रखो निरंजन, जिस जुनून के साथ आवाम नहीं होती, वह कभी इंकलाब नहीं वन पाता और ऐसी विचारधारा का पतन हिटलर की तरह ही होता है ।"

आपकी यह नसीहत मेरी समझ में नहीं आएगी । आवाम की ही बात है तो पांच तारीख को आपको उसका सुबूत मिल जाएगा । मरने का खौफ़ मेरे इरादों को कमजोर नहीं कर सकता । दहशतगर्दों के खौफ से मैं अपने मकसद से समझौता नहीं कर सकता ।"

" अरे नादान !" बादल नारंग चाहकर भी अपनी खीझ को रोक नहीं पाया था--------"'मुझे जो मालूम होगा वो होगा लेकिन उसे देखने के लिए उस वक्त शायद तुम दुनिया में नहीं होगे ।"

"क्या ?" निरंजननाथ ने हड़बड़ाहट का प्रदर्शन किया मगर उसमें व्यंग का पुट ज्यादा था…“यह अाप क्या कह रहे है सर?"
 
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