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घुड़दौड़ ( कायाकल्प ) complete

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रात में खाने के बाद तक फरहत घर पर ही थी, और संभव है की देर रात अपने घर गयी हो। रात में मेरे आँख एक बार खुली थी, लेकिन मैंने उसको वहाँ नहीं देखा। सवेरे जब आँख खुली तो उसको अपने बगल बैठा पाया।

“गुड मोर्निंग!”

मैंने उसकी आँखों में देखा। वही मुस्कुराती हुई आँखें, खिला हुआ चेहरा! मैं भी मुस्कुरा उठा। बगल में सुमन भी खड़ी हुई थी.. मैंने साइड टेबल पर रखी घडी पर नज़र डाली तो देखा की सवेरे के छः बजे थे!

“गुड मोर्निंग! आप रात में घर चली गईं थीं?”

“जी..”

“अरे! इतने रात में क्यों? सेफ नहीं रहता!”

“आई नो.. लेकिन अब्बू को बताया नहीं था..”

“उनकी देखभाल कौन करता है?”

“वो कर लेते हैं.. और खाना पीना हमारे पड़ोसी पका देते हैं.. इसलिए दिक्कत नहीं होती।“

“फरहत.. ऐसे तो अगर आप रात में घर जायेंगे तो ठीक नहीं रहेगा.. आप दिन में जाइए.. लेकिन सेफ रहना ज़रूरी है..”

“हम्म..”

“इससे मुझे एक आईडिया आ रहा है.. आप अपना सामान ले कर यही क्यों नहीं आ जातीं? हमारा स्टोर-रूम एक हाफ रूम जैसा है, और खाली पड़ा हुआ है। खाने पीने की सारी व्यवस्था यहीं हो जायेगी! और सुमन भी पढाई लिखाई कर रही है.. वो कम से कम फ्री हो जायेगी।”

“आप ऐसे क्यों कहते हैं जैसे मुझे आपकी इस हालत से कोई मुश्किल है? मैं भी आपकी सेवा करना चाहती हूँ..”

“अरे नीलू.. तुम नाराज़ मत हो! तुम्हारे कारण ही तो मैं बच सका हूँ.. लेकिन तुम जानती हो न की मुझे ज्यादा ख़ुशी तब मिलेगी, जब तुम अपनी पढाई पर ज्यादा ध्यान लगाओगी! है न? और मेरा क्या? मैं तो यहाँ चौबीसों घंटे पड़ा रहूँगा! हा हा!”

“आप जल्दी से ठीक हो जाओ.. फरहत और मैं, दोनों ही आपको जल्दी से ठीक कर देंगे.. है न फरहत?”

“बिलकुल.. चलिए, मैं आपको मोर्निंग एक्टिविटीज के लिए रेडी करती हूँ..”

“मैं भी आपकी मदद करती हूँ..” सुमन ने कहा।

“नहीं नीलू.. प्लीज.. मैंने तुम्हारे सामने वो सब नहीं कर पाऊँगा.. प्लीज ट्राई टू अंडरस्टैंड!”

“जी.. ठीक है..” सुमन ने अनमने ढंग से कहा, और कमरे से बाहर निकल गयी।

फिर फरहत ने मुझे सहारा दे कर बाथरूम पहुँचाया। कल इतनी बार उसके सामने नंगा होना पड़ा था, की आज मुझे बहुत कम शर्म आ रही थी। खैर, इस स्थिति को मन ही मन ज़ब्त कर के मैंने अपनी नित्य क्रिया करी, और वापस बिस्तर पर आ लेटा। फरहत ने मेरी साफ़ सफाई कर के मुझे बिस्तर पर लिटाया। तब तक सुमन चाय और सैंडविच बना कर ले आई, जिसको हम तीनों ने साथ मिल कर खाया। उसका कॉलेज सवेरे जल्दी शुरू हो जाता था, इसलिए उसने जल्दी ही हमसे विदा ली।

इस बीच में हमारी कामवाली आ गयी, और खाना पकाने के कार्य में जुट गयी।

“रूद्र, चलिए, आपको स्पंज बाथ दे देती हूँ?”

“स्पंज बाथ?”

“हाँ.. नहायेंगे नहीं तो एक तो आपको बेड-सोर हो जाएगा, और ऊपर से बदबू आने लगेगी..” कह कर उसने अपने नाक सिकोड़ी..

“अरे.. मैं तो बस ये कह रहा था की मैं खुद ही..”

“ओह गॉड! नॉट अगेन! हमने कल ही तो इस बारे में बात करी है.. आप बिलकुल सब कुछ करियेगा, लेकिन पूरी तरह से ठीक होने के बाद.. ओके?”

फिर इधर उधर देख कर, “मैं अभी आती हूँ..”

कह कर फरहत कमरे से बाहर निकल गई.. ज़रूर रसोई में गयी होगी। क्योंकि जब वो वापस आई तो उसके हाथ में एक मुलायम तौलिया, एक साफ़ चद्दर और गुनगुने पानी से भरी एक बाल्टी थी। कामवाली एक और बाल्टी में में ठंडा पानी ले आई थी। उसके जाने के बाद फरहत ने कमरे का दरवाज़ा थोड़ा बंद कर दिया और फिर मेरे कपड़े उतारने की प्रक्रिया करने लगी। मैं बुरी तरह से नर्वस था, लेकिन मैंने देखा की मेरी शर्ट उतारते समय फरहत के होंठों पर एक बहुत ही मंद मुस्कान थी, और उसकी आँखों में एक प्रसंशा भरी चमक। अगले पांच मिनट बाद, जब मैं पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गया, तब उसकी बेहद मंद मुस्कान अब कुछ ज्यादा ही दिख रही थी।

“फरहत.. यू आर नॉट हेल्पिंग! आई ऍम नर्वस आलरेडी!!”

“ओह आई ऍम सॉरी! लेकिन आप नर्वस क्यों हैं?”

“अरे.. इस हालत में आपके सामने..”

“यू हैव अ नाईस मस्कुलर बॉडी! नर्वस तो.. मुझे होना चाहिए!” कह कर फरहत जोर से मुस्कुराई।

खैर, मैंने बात को आगे न खींचने का निर्णय लिया, और फरहत को उसका काम करने की छूट दे दी। वो तौलिये को भिगो कर मेरे पूरे शरीर को रगड़-रगड़ कर साफ करने लगी। गर्दन, सीना, पेट और बाहें साफ़ होने के बाद उसने मुझे धीरे से करवट बदलवाई, और पीठ, कमर, पुट्ठों और जांघों को उतने ही सावधानी से स्पंज बाथ देने लगी। मैं अचानक ही उछल गया – वो मेरी रीढ़ पर बारी-बारी से गर्म और ठंडा स्पंज करने लगी थी। उसने मुझे बताया की ऐसा करने से दिल और साँस के केन्द्र उत्तेजित हो जाते हैं, यह कई तरह के रोगों के निवारण करने में मदद करता है। एक बार फिर से उसने मेरी करवट बदल कर मुझे पीठ के बल लिटाया, और एक अलग छोटे तौलिये से मेरा चेहरा और सर पोंछकर सुखाने लगी।

साधारणतः, मेरा मेरी उत्तेजना पर अच्छा नियंत्रण रहता है। लेकिन एक अरसे से किसी भी तरह की यौन क्रिया न करने के कारण, मेरा लिंग बेकाबू सा हो गया। जैसे उसमें खुद ही सोचने समझने की की शक्ति आ गयी हो। ऐसा हो ही नहीं सकता की उसको मेरा उत्तेजित लिंग न दिख रहा हो, लेकिन वो बिलकुल प्रोफेशनल तरीके से मेरी सफाई कर रही थी। फरहत मगन हो कर जब मेरी सफाई कर रही थी, तब मैं उसके ही शरीर का जायजा ले रहा था – उसका कद कोई साढ़े पांच फ़ीट रहा होगा। चेहरा मोहरा तो साधारण ही था, लेकिन उसकी मुस्कान और जीवंत आँखें उसको सुन्दर बना देती थीं। उसकी यूनिफार्म तो आरामदायक थी, लेकिन फिर भी उसके स्तन और उनका आकार समझ में आ रहा था। उसने निप्पल भी खड़े हो कर यूनिफार्म के कपड़े को सामने से कुछ कुछ उभार रहे थे। उसने ज़रूर ही एक हल्का सा मेक-अप किया हुआ था.. कुल मिला कर वो सुन्दर लग रही थी।

इतने अरसे के बाद एक स्त्री का इस तरह का अन्तरंग सान्निध्य पा कर अब मेरा लिंग अपने पूरे तनाव पर पहुँच गया।

“अच्छा है ‘ये’ इस तरह से खड़ा हुआ है... सफाई करने में आसानी रहेगी!”

वो मुझे सुना रही थी, या खुद से बात कर रही थी?

उसने मेरा लिंग अपने हाथ में पकड़ा और उसकी सफाई करने लगी। उसके छूते ही मुझे एक झटका सा लगा.. वैसे यह झटका मुझे ही नहीं, उसको भी लगा। जब मेरा लिंग पूरी तरह से जीवंत होता है, तो उसका आकार, उसका घनत्व और उसकी दृढ़ता कभी कभी मुझे भी आश्चर्यचकित कर देती है। मुझे यह तो नहीं मालूम, की फरहत ने ऐसा लिंग... या फिर कोई भी लिंग कभी भी अपने हाथ में पकड़ा है या नहीं, लेकिन इतना तो तय है की उस पर असर बखूबी हो रहा था।

अभी तक इतने आत्म-विश्वास के साथ मेरी सफाई करने के बाद, उसकी भी घबराहट दिखाई देने लगी। उसने धीरे धीरे, मानो डरते हुए, मेरे लिंग को गीले तौलिये से साफ़ करना शुरू किया। मानो न मानो, मुझे उसका यह बदला हुआ रूप अब बहुत अच्छा लग रहा था। मुझे अपने लिंग, और उसके बल में बहुत भरोसा था, और मुझे लगता था की उसमें एक जादुई शक्ति है। जो भी लड़कियाँ मेरे जीवन में आईं, वो उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकीं। फरहत के हाथों का स्पर्श बड़ा ही आनंददायक साबित हो रहा था। लेकिन कुछ होता, उससे पहले ही मेरे लिंग और अण्डकोषों की सफाई हो गई, और फरहत जल्दी से तौलिया और बाल्टी उठा कर कमरे से बाहर हो गई।

आने से पहले उसने मुझे खुद को संयत करने का समुचित समय दिया। कुछ देर की निष्क्रियता के बाद ताना हुआ लिंग वापस शिथिल हो गया। फरहत कुछ देर बाद वापस कमरे में आई.. वो हमेशा की तरह मुस्कुरा नहीं रही थी.. लग रहा था की जैसे कुछ तनाव में हो। लेकिन मुझसे जैसे ही उसकी आँखें मिलीं, उसकी मुस्कान वापस आ गयी।

उसने मुझे सहारा दे कर उठाया, और एक आरामदायक कुर्सी पर बैठाया और चद्दर बदला। फिर मुझे वापस लिटा कर, एक नए चद्दर से ढक कर, मेरे और अपने लिए नाश्ता ले आई, और हम दोनों नाश्ता करते हुए वापस बातें करने लगे।

उसने मुझे उस दिन के बारे में बताया, जब उसको बतौर नर्स पहली नौकरी मिली थी। बंधी हुई तनख्वाह और अब्बू की मदद करने के ख़याल से ही रोमांच हो गया था उसको। कितनी खुश थी वह नौकरी पा कर! पहली बार नौकरी के लिए वो सफ़ेद यूनिफार्म पहनना, और फिर आइने के सामने खड़े होकर खुद को निहारना.. उसको आज भी याद है!

जहाँ उसको काम मिला था, वो एक नर्सिंग होम था। वहाँ पहले से काम करने वाली नर्स ने उसे धीरे-धीरे काम समझाना और सिखाना शुरू कर दिया। शुरू शुरू में वो मरीजों को इंजेक्शन देती थी, उनके चार्ट देख कर दवाई देती, आपरेशन के समय रोगियों को सम्हालती थी। वो ऑपरेशन होने पर शरीर से निकला कचरा और लोथड़े उठा कर फेंकने का भी काम करती। कई बार उस कचरे में साबूत बच्चा भी होता। सोचिए.. एक पूरा सबूत बच्चा! शुरू शुरू में इस काम में उबकाई आती, जी मचलाता और वापस काम पर आने का मन नहीं करता। लेकिन, धीरे धीरे वह इसकी आदी हो गई। अब वो सब बर्दाश्त कर लेती थी।

लेकिन उससे यह बात छुपी नहीं की यह और ऐसे कई नर्सिंग होम इस शहर का गटर थीं.. किस धड़ल्ले से यहाँ अवैध गर्भपात किया जाता है। जानते सभी हैं, लेकिन कोई कुछ कहता नहीं। नर्सिंग होम में काम करने वाले सारे कर्मचारी गूंगे और अंधे बन कर रहते हैं। फरहत ने भी ऐसे ही कुछ ही महीनों में कम बोलना सीख लिया... चुप रहना सीख लिया... और चेहरे को सपाट बनाना सीख लिया था। जल्दी ही उसका मन उकता गया और उसने वह नौकरी छोड़ दी, और रोगियों के साथ रह कर उनकी देखभाल करने का काम करने लगी।

यह सब बताने के बाद उसने मेरे बारे में पूछा। मैंने उत्तर में अपने काम के बारे में उसको बताया।

उसने फिर कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछे..

“आपकी और मैडम की लव मैरिज हुई थी न?” उसने दीवार पर टंगी रश्मि की तस्वीर सीखते हुए कहा।

“हाँ.. मैंने उसको उत्तराँचल में देखा था पहली बार... लव ऐट फर्स्ट साईट!” मैंने मुस्कुराते हुए कहा..

“आप उनसे बहुत प्यार करते हैं..”

रश्मि के बारे में याद आते ही उदासी छाने लगी।

“आप उदास हैं...” उसने कहा।

जब मैंने काफी देर तक कुछ नहीं कहा तो,

“आई ऍम सॉरी..”

“नहीं फरहत! डोंट से सॉरी! लेकिन.. रश्मि के जाने के बाद बहुत अकेला हो गया। न कुछ करने का मन होता, न ही जीने का.. जब एक्सीडेंट हो रहा था, तो लगा की अब इस दुःख से छुट्टी मिल जायेगी.. लेकिन.. लगता है की और जीना लिखा है किस्मत में!”

“अरे! आप ऐसे कैसे बोल रहे हैं? ज़रा सोचिये, जन्नत से मैडम आपको इस हालत में देखेंगी, तो क्या उनको अच्छा लगेगा? वो तो आपके लिए बस ख़ुशियाँ ही चाहती रही होंगी.. आपको ऐसे दुःख में देख कर उनको भी तो बहुत दुःख होगा न?”

“लेकिन फिर भी.. उसकी बहुत याद आती है..”

“याद तो आनी ही चाहिए! लेकिन उनको याद करके उदास मत होइए.. बल्कि खुश होइए.. साथ बिताये हुए ख़ुशी के मौके याद करिए.. और.. आप ऐसे ही उदास मत होइए। मैं हूँ न? मैं आपकी अच्छी दोस्त बन सकती हूँ! आप मुझसे दोस्ती करेंगे?”

“फरहत! आप पहले ही मेरी दोस्त बन चुकी हैं!” मैं मुस्कुराया।

बस.. ऐसे ही मेरे सुधार की गाडी आगे चल निकली। अस्पताल में तो समय बीतता ही नहीं था.. लेकिन यहाँ पर फरहत मेरे साथ मेरी छाया की तरह बनी रहती। लगता ही नहीं था की वो नर्स है.. बल्कि लगता की वो.. की वो.. मेरी पत्नी है! मेरी हर ज़रूरत को मुझसे भी पहले महसूस कर पूरा करने की कोशिश करती, हर लिहाज से मेरा पूरा ख़याल रखती।
 
दोपहर बाद सुमन कॉलेज से आती, और वो भी मेरे साथ ही रहती। मेरा जीवन वापस प्रेम से लबालब होने लगा। दोपहर बाद ही लगभग हर दिन कोई न कोई आ ही जाता - कभी नीचे मेडिकल स्टोर से कोई आ जाता, कभी कोई परिचित, कभी कोई ऑफिस से... तो कभी कोई पड़ोसी! अब तो जैसे आदत हो गयी.. दोपहर बाद आने वालों की प्रतीक्षा करना! लेकिन यह तो है की अब तक मुझे संसार और यहाँ के लोगों के बारे में जितनी भी गलतफहमियां थीं, वो सब ख़तम हो गईं। मैं समझ गया की दुनिया कठोर नहीं, बल्कि संवेदनशील है। मेरे एक्सीडेंट के बारे में जिसने भी सुना, वो सुनकर परेशान हो गया। भागा भागा चला आया देखने!

ऐसा कोई दिन नहीं गया जब रश्मि की याद न आई हो... उसकी याद आती तो मैं आँखें मूँद कर अतीत के संसार की यात्रा कर आता, उसके बारे में सोच कर आँसू भी ढुलका लेता, और भविष्य की चिंता में भी डूब जाता। कभी दर्द, तो कभी पीड़ा-भरी याद में जब मैं अचानक ही चिल्ला उठता, तो फरहत एक झटके से किसी फ़रिश्ते की तरह मुझे सम्हाल लेती।

कभी कभी उसकी बाते मुझे बोर भी करतीं। लेकिन उससे बात करना दिन का सबसे सुखद अनुभव होता था। वो रोज़ मुझसे बात करती, मुझे दवा देती, नहलाती, साफ़-सफाई करती, कभी कभार मुझे उपन्यास पढ़ कर सुनाती, तो कभी अखबार! वो मेरी फिजियोथेरेपी भी करती। ये सिलसिला चलता रहा। और उसी के साथ मेरी सेहत भी वापस आने लगी। हाथों और पैरों की हड्डियाँ जुड़ गईं, और उनमें ताकत वापस आने लगी। मैं अब खुद से चल फिर सकता था, और कई सारे छोटे मोटे काम कर सकता था.. लेकिन फरहत की आदत मुझे कुछ ऐसी लग गयी थी की मैं उसको मना नहीं कर पाता था। मेरी हालत में सुधार के बारे में उसको भी मालूम था, लेकिन वो भी कभी ऐसे नहीं दिखाती थी की उसको मुझे नहलाने इत्यादि में कोई झिझक नहीं महसूस होती थी।

एक दिन सवेरे वो मुझको स्पंज बाथ दे रही थी। वो हाँलाकि मेरे घर में ही रहती थी, लेकिन फिर भी पूरी इमानदारी से वो अपनी यूनिफार्म पहन कर ही मेरी देखभाल करती थी। लेकिन, आज जब वो नहा कर बाथरूम से बाहर आई, तो उसने आरामदायक, कैसुअल कपड़े पहने हुए थे। उसको टी-शर्ट और होसरी पजामा पहने देख कर मुझे अचम्भा हुआ, और अच्छा भी लगा।

“फरहत, तुम कितनी अच्छी लग रही हो आज!”

वो मुस्कुराई।

“जी.. वो.. मैं.. दो जोड़ी यूनिफार्म है.. और दोनों ही धोने में डाली हुई है..”

“आई ऍम नॉट कम्प्लैनिंग.. मैं तो कहता हूँ की तुम ऐसे ही रहा करो..”

हाँलाकि ये कोई सेक्सी कपड़े नहीं थी, लेकिन फिर भी बिना किसी बंधन के (उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी) उसके स्तन उसकी हर हरकत पर जिस प्रकार से हिल रहे थे, और जिस तरह से उसके पजामे ने उसके नितम्बो को उभार रखा था, उससे मेरे लिंग का स्तम्भन जल्दी कम नहीं होने वाला था। हर रोज़ की तरह जब वो कमरे से बाहर जाने को हुई, तो मैंने लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया।

“मेरे पास रहो..” न जाने कैसे मेरे मुँह से यह तीन शब्द निकल गए। निश्चित है, मेरी आँखों में वासना के डोरे फरहत को साफ़ दिख रहे होंगे!

फरहत कुछ नर्वस दिख रही थी। उसके होंठ कांप से रहे थे, और होंठों के ऊपर पसीने की एक पतली सी परत साफ़ दिख रही थी। मैं भी नर्वस था.. स्पंज-बाथ के बाद नग्नावस्था में लेटा हुआ था। न जाने क्या होने वाला था आज..!

“रूद्र..?”

मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसका हाथ पकड़े हुए ही उसको पहले तो बिस्तर पर बैठाया.. और उसका हाथ तब तक अपनी तरह खींचता रहा जब तक वो मेरे बराबर ही बिस्तर पर लेट नहीं गयी। जिस तरह से वो निर्विरोध यह सब कर रही थी, उससे तो तय था की आज हम दोनों का मिलन होना ही था।

“हम दोनों दोस्त हैं न?” वो पूछ रही थी, की बता रही थी? कुछ समझ नहीं आया.. लेकिन यह तो तय था की वो नर्वस बहुत थी।

“यस.. सो ट्रस्ट मी! ओके?” मैंने कहा।

उसके लेटते ही मैंने उसके होंठों पर एक चुम्बन रसीद कर दिया। उसके होंठ बहुत ही नरम थे। बहुत दिनों बाद किसी लड़की के होंठ चूमने को मिला! इसलिए मैंने चुम्बन जारी रखा और कुछ देर में मैंने उसके होंठ चूसने शुरू कर दिए। मैं उसके एक एक होंठ को अपने होंठों के बीच में दबा कर उनको जीभ से दुलारता। फरहत चुम्बन करने में अनाड़ी थी। मुझे समझ में आ गया की यह सब उसके साथ पहली बार हो रहा है (मतलब, हर बात में अनाड़ी थी)। मैंने जब अपनी जीभ उसके मुंह में डालने की कोशिश करी, तो कुछ हिचक के बाद उसने अपना मुंह खोल दिया। अब हमारी जीभें एक दूसरे के मुँह में थीं। इतने दिनों बाद ऐसा चुम्बन करने में मुझे बहुत आनंद आ रहा था।

चूमते हुए ही मेरा हाथ उसके सर और उसके बालों में फिरने लगा.. एकदम कोमल, मुलायम बाल!

“तुम्हारे बाल बहुत सुन्दर हैं.. एकदम सेक्सी!” इस शब्द का प्रयोग उसके सामने मैंने एक तो पहली बार किया और दूसरा, जान-बूझ कर किया। मैं चाहता था की हमारी आपस में हिचक दूर हो जाय। लेकिन फरहत नर्वस ही रही..

“हाँ.. सिर्फ बाल ही हैं..” शायद वो आगे ‘सेक्सी’ कहना चाहती थी, लेकिन हिचक रही थी।

उसको चूमते हुए मेरा हाथ उसके एक स्तन पर आ गया। जैसा मैंने बताया था, उसने ब्रा नहीं पहनी थी और उत्तेजना के मारे उसके निप्पल खड़े हुए थे। उसने झट से अपने हाथ से मेरे हाथ को पकड़ लिया। लेकिन उसके पकड़ने से मैं रुक नहीं सकता था, लिहाजा, मैंने उसका स्तन दबाना शुरू किया। कुछ ही देर में उसकी पकड़ कमज़ोर हो गयी और वो आहें भरने लगी। मैंने चुम्बन लेना जारी रखा, और साथ ही साथ उसकी टी-शर्ट को ऊपर उठाने लगा।

“नहीं.. प्लीज.. मुझे नंगी मत करिए!”

“देखते हैं न.. की तुम्हारा और क्या क्या सेक्सी है!”

“और कुछ भी सेक्सी नहीं है.. मैंने आपको बताया न!” फरहत विरोध नहीं कर रही थी.. मुझे ऐसा लग रहा था की यह एक सामान्य सा वार्तालाप है।

“फरहत.. आज हम दोनों रुक नहीं पाएँगे.. न तुम, और न ही मैं! ... लेकिन अगर तुम वाकई नहीं चाहती हो, तो हम ये नहीं करेंगे..”

कह कर मैं कुछ देर के लिए रुक गया, और उसकी किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगा। जब उसने कुछ विरोध नहीं किया और बिस्तर से उठने की कोई कोशिश नहीं करी, तो मैंने उसकी टी-शर्ट उसके शरीर से अलग कर दी। सामने का दृश्य देख कर आनंद आ गया – छत्तीस इंच के भरे पूरे गोल स्तन! लाल-भूरे रंग के छोटे छोटे निप्पल, और उसी रंग की areola!

कहने की आवश्यकता नहीं की मैंने उसके स्तनों को दबाते हुए चूसना आरम्भ कर दिया। फरहत भी अभी खुल कर आनंद लेने लगी। आदमी की अजीब हालत होती है – किसी भी उम्र का हो, अगर उसके सामने किसी लड़की या स्त्री का स्तन हो, तो उनको बिना पिए रह नहीं सकता।

‘ओह भगवान्! कितने दिन हो गए!’

‘ओह भगवान्! कितने दिन हो गए!’

मैं किसी भूखे बच्चे की तरह फरहत से लिपट कर उसका स्तन पी रहा था, और उनसे खेल रहा था। फरहत आँखें बंद किये हुए इस अनोखे अनुभव का मज़ा ले रही थी। उसकी भी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी – जो की उसकी भारी होती सांसों से परिलक्षित हो रहा था। वो खुद भी मेरे सर को अपने स्तन से सटा कर रखे हुए थी। उसने मेरे शरीर को सहलाना आरम्भ किया, और ऐसे सहलाते हुए उसका हाथ मेरे लिंग पर पहुंचा! साफ़ सफाई करते समय वो बिलकुल भी संकोच नहीं करती थी, लेकिन इस समय उसने अपना हाथ तुरंत हटा लिया।

“क्या हुआ?”

“य्य्य्ये बहुत बड़ा है।“

एक बार मैंने एक चुटकुला सुना था, जिसमे दुनिया के सबसे बड़े झूठों में एक यह बताया गया था की जब औरत किसी मर्द को कहे की तुम्हारा पुरुषांग बहुत बड़ा है।

अक्सर यह दलील दी जाती है की जब योनि में से पूरा बच्चा निकल आता है, तो फिर लिंग का साइज़ क्या चीज़ है? उसका उत्तर यह है की जब स्त्री प्रजनन करने वाली होती है, तो होर्मोन्स के प्रभाव से उसके शरीर में (ख़ास तौर पर जघन क्षेत्रों में) अभूतपूर्व लचीलापन आ जाता है.. यह क्रिया सामान्य अवस्था में नहीं होती है.. इसलिए अगर लिंग बड़ा है, और स्त्री ऐसा कहे, तो यह बात सुननी चाहिए, और आराम से काम करना चाहिए।

“आर यू ओके, फरहत?”

“पता नहीं..” फिर कुछ देर रुक कर, “.. मुझे डर लग रहा है, रूद्र! अभी जो हो रहा है, मैं उसके लिए बिलकुल भी रेडी नहीं थी... समझ नहीं आ रहा है की मैं क्या करूँ..!”

“तुमको कुछ भी करने से डर लग रहा है?” मैंने पूछा। फरहत वाकई डरी हुई लग रही थी।

“व्व्व्वो.. मैं.. आई.. आई ऍम स्टिल अ वर्जिन!”

“व्ही डोंट नीड टू डू एनीथिंग, इफ़ यू डोंट वांट टू, स्वीटी!” मैंने फरहत को स्वान्त्वाना देते हुए कहा, “व्ही कैन जस्ट बी विद ईच अदर!”

मेरी बात से फरहत कुछ तो शांत हुई.. लेकिन फिर उसकी आँखें मेरे पूरी तरह से सूजे हुए लिंग पर पड़ी।

“लेकिन... लेकिन.. आप क्या ‘करना’ नहीं चाहते?”

मैंने फरहत को अपनी बाहों में लेते हुए शांत स्वर में कहा, “बिलकुल करना चाहता हूँ.. लेकिन सिर्फ तभी, जब तुम भी चाहती हो। तुमने कभी सेक्स नहीं किया.. इसलिए अब यह तो मेरी जिम्मेदारी है की तुमको उसका पूरा आनंद मिले.. और उसके लिए सबसे पहले तुम्हारी रज़ामंदी चाहिए.. है न?”

मेरी इस बात पर फरहत मुझसे और चिपक सी गई, और उसने मेरे सीने पर अपना हाथ रख दिया। मैं इस समय उसके दिल की धड़कन सुन सकता था। फिर उसने एक गहरी सी सांस भरी और सर हिला कर हामी भरी।

“क्या हुआ फरहत?”

“रज़ामंदी है..”

“हंय?”

“आपने कहा न, की रज़ामंदी चाहिए? तो.. रज़ामंदी है!”

“पक्का फरहत? क्योंकि एक समय के बाद मैं भी खुद को रोक नहीं पाऊँगा!”

“पक्का.. बस, थोड़ा सम्हाल कर करिएगा.. सुना है की बहुत दर्द होता है!”

“फरहत, डरो मत! मैं तुमको दर्द नहीं होने दूंगा... बस, कोशिश कर के मजे करो! चलो, अभी जूनियर से कुछ जान पहचान बढ़ाओ..” मैंने मुस्कुराते हुए उसको हौसला दिया।

उसने हिचकते हुए मेरे लिंग को अपनी हथेली में पकड़ा और ऊपर नीचे करने लगी, उधर मैंने भी उसके पजामे के ऊपर से ही उसकी योनि को धीरे धीरे सहलाना शुरू किया। ऐसा अनुभव उसको पहली बार हो रहा था, इसलिए कुछ ही देर में फरहत बेकाबू हो गयी। लेकिन मैंने उसकी योनि का मर्दन जारी रखा। उसका रस निकलने लग गया था, क्योंकि पजामे के सामने का हिस्सा गीला और चिपचिपा हो गया था। फिर कोई दस मिनट बाद मैंने अपना हाथ उसके पजामे के अन्दर डाल कर उसकी योनि की टोह लेनी आरम्भ करी। फरहत कामुक आनंद के शिखर पर पहुँच गयी थी।

कुछ ही क्षणों में मैंने अपनी उंगली ज़ोर-ज़ोर से उसकी योनि पर रगड़ना शुरू किया, और वहाँ का गीलापन, और गर्मी अपनी उंगली पर महसूस किया। वो इस समय अपनी पीठ के बल बिस्तर पर निढाल लेट गयी थी और साथ ही साथ अपनी टाँगें भी कुछ खोल दी थीं, जिससे मेरे हाथ को अधिक जगह मिल सके। मैंने अपनी तर्जनी उंगली को उसकी योनि में घुसाने लगा। एक पल तो फरहत ने अपनी साँसें रोक ली, लेकिन उंगली पूरी अन्दर घुस जाने के बाद उसने राहत में सांस छोड़ी। उसकी योनि रश्मि की योनि के जैसे की कसी हुई थी! उतनी ही तंग! लेकिन आश्चर्य की बात है की वो कोमल भी बहुत थी! और, वहाँ पर काफी बाल भी थे.. आनंद आने वाला है!

कुछ देर तक उंगली को उसकी योनि के अन्दर बाहर करने के बाद फरहत दोबारा अपने चरम पर पहुँच गयी। उसकी कामुक आहें निकलने लगीं। जब तक उसने आहें भरीं, तब तक मैंने उंगली से मैथुन जारी रखा, लेकिन जब वो अंततः शांत हुई, तो मैंने उंगली निकाल ली और सुस्ताने लगा।

“आप रुक क्यों गये?” उसने पूछा।

“अब तो मेन एक्ट का टाइम है.. तुम रेडी हो?”

“बाप रे! अभी ख़तम नहीं हुआ? मैं तो थक गयी.. ओह्ह...”

“अभी कहाँ ख़तम? अभी तो हमें ‘कनेक्ट’ होना है.. तभी तो पूरा होगा..”

कह कर मैंने अपने लिंग की ओर इशारा किया, और उसका पजामा नीचे सरका कर उसके शरीर से मुक्त कर दिया। अब हम दोनों ही पूरी तरह नग्न मेरे बिस्तर पर थे। मैंने वापस उसके दोनों स्तनों को अपने हाथों में लेकर उसको मसलने लगा। वो पुनः वासना के सागर में गोते लगाने लगी। मैंने उसके कन्धों को चूमना शुरू कर दिया और वहाँ से होते हुए उसके कान को चूमा और उसकी लोलकी को चूसने लगा।

“फरहत, क्या तुम्हे अच्छा नही लग रहा?”

उसने सिर्फ सर हिला कर हामी भरी।
 
मैंने उसके हाथ में अपना लिंग दिया। कमाल की बात है फरहत के मज़बूत, नर्स वाले हाथ इस समय मेरे लिंग पर काफी मुलायम और नाज़ुक महसूस हो रहे थे। उधर मैंने उसके शरीर को चूमना और चाटना जारी रखा। मैं चूमते हुए उसकी गर्दन से होते हुए उसके पेट, और फिर वहाँ से उसकी योनि को चूमने और चाटने लगा। मैं जीभ की नोक से उसकी योनि के भीतर भी चूम रहा था। अभी कुछ ही समय पहले रिसा हुआ योनि-रस काफी स्वादिष्ट था। अब मैं भी रुकने की हालत में नहीं था, लेकिन फिर भी मैंने जैसे तैसे खुद पर काबू रखते हुए उसकी योनि चाटता रहा। कुछ देर बाद वो तीसरी बार स्खलित हो गयी। उसकी योनि का रंग उत्तेजना से गुलाबी हो गया था।

खैर, अंततः मैंने अपना लिंग उसकी टाँगों के बीच योनि के द्वार पर टिकाया, और धीरे धीरे अंदर डालने लगा। उसकी योनि काफी कसी हुई थी। फरहत गहरी गहरी साँसे भरते हुए मेरे लिंग को ग्रहण करना आरम्भ किया। खैर मैंने धीरे धीरे लिंग की पूरी लम्बाई उसकी योनि में डाल दी, और धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा। न तो मेरे पैरों में इतनी ताकत ही, और न ही हाथों में, की वो मेरे शरीर का बोझ ठीक से उठा सके और धक्के भी लगाने में मदद कर सके.. लेकिन जब इच्छाएं बलवती हो जाती हैं तो फिर किस बात का बस चलता है मानुस पर? वैसे भी, कामोत्तेजना इतनी देर से थी की गिने चुने धक्को में ही मेरा काम हो जाना था। दिमाग में बस यही बात चल रही थी की कितनी जल्दी और कैसे अपना वीर्य फरहत के अन्दर स्खलित कर दूं। यह एक निहायत ही मतलबी सोच थी, लेकिन क्या करता? उस समय शरीर पर मेरा अपना बस लगभग नहीं के बराबर ही था। फरहत अगर मदद न करती, तो कुछ भी नहीं कर पाता.. उसी ने खुद-ब-खुद अपनी टाँगे इतनी खोल दी थीं जिससे मेरी गतिविधि आसान इसे हो जाय। मुझे नहीं मालूम की उसको अपने जीवन के पहले सम्भोग से क्या आशाएं थीं, लेकिन जब मैंने उसको देखा तो उसकी आँखें बंद थीं और उसके चेहरे के भाव ने लग रहा था की उसको भी सम्भोग का आनंद आ रहा था।

मन में तो यह इच्छा हुई की बहुत देर तक किया जाय, लेकिन अपने शरीर से मैं खुद ही लाचार हो गया। कुछ ही धक्कों बाद मुझे महसूस हुआ की मैं स्खलित होने वाला हूँ। इसलिए मैंने तुरंत ही अपने लिंग को बाहर निकाल लिया। फरहत चौंकी।

“क्या हुआ?”

“नहीं.. कहीं तुम्हारे अन्दर ही एजाकुलेट (वीर्यपात) न कर दूं इसलिए बाहर निकाल लिया.. कहीं तुम प्रेग्नेंट हो गयी तो?”

मेरी इस बात पर फरहत मुस्कुराई, और मुझे चूमते हुए बोली,

“आपको पता है, की आपकी इसी बात पर तो मैं आपसे ‘करने’ के लिए तैयार हुई। मुझे हमेशा से मालूम था की आप मेरा किसी भी तरीके से नुकसान नहीं होने देंगे.. लेकिन मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं है। मैं एक नर्स हूँ... एंड, आई नो हाऊ टू कीप सेफ! नाउ प्लीज, गो बैक इन..”

“आर यू श्योर, स्वीटी?”

“यस हनी! आई वांट योर सीमन इनसाइड मी! प्लीज डू इट!”

मैं उसकी बात से थोड़ा भावुक हो गया, उसको कुछ देर प्यार से देखा, और वापस उसकी योनि की फाँकों को अपनी उँगलियों की सहायता से अलग कर के अपना लिंग अन्दर डाल दिया। इस घर्षण से फरहत की पुनः आहें निकल गईं। अब बस चंद धक्कों की ही बात थी.. मेरे भीतर का महीनो से संचित (वैसे ऐसा होता नहीं.. समय समय पर शरीर खुद ही वीर्य को बाहर निकाल देता है, और इस क्रिया को नाईट फाल भी कहते हैं) वीर्य बह निकला और फरहत की कोख में समां गया।

मैं वीर्य छोड़ने, और फरहत वीर्य को ग्रहण करने के एहसास से आंदोलित हो गए.. हम दोनों ही आनंद में आहें भरने लगे। उत्तेजना के शिखर पर पहुँचने का मुझ पर एक और भी असर हुआ.. स्खलित होते ही मेरे हाथ पांव कांप गए.. और मेरा भार सम्हाल नहीं पाए। ऐसे और क्या होना था? मैंने भदभदा कर फरहत के ऊपर ही गिर पड़ा, जैसे तैसे सम्हालते हुए भी मेरा लगभग आधा भार उस बेचारी पर गिर गया! संभव है की उत्तेजना के उन क्षणों में रक्त संचार और रक्त दाब इतना होता हो की उसको कुछ पता न चला हो, लेकिन मेरी बेइज्जती हो गयी!

“गाट यू.. गाट यू...” उसने मुझे सम्हालते हुए कहा। वाकई उसने मुझे सम्हाल लिया था.. उसकी बाहें मेरे पीठ पर लिपटी हुई थीं, और उसकी टाँगे मेरे नितम्बों पर।

“सॉरी” मैं बस इतना की कह पाया!

“सॉरी? किस बात का? आपने आज मुझे वो ख़ुशी दी है जिसके बारे में मैं ठीक से सोच भी नहीं सकती थी! सो, थैंक यू! आज आपने मुझे कम्पलीट कर दिया! आई ऍम सो हैप्पी!”

“तुमको दर्द तो नहीं हुआ!”

“हुआ.. लेकिन.. हम्म.. शुरू शुरू में मैं यह नहीं करना चाहती थी.. लेकिन फिर अचानक ही मुझे ऐसा लगा की मुझे यह करना ही है! और यह एकसास आते ही दर्द गायब हो गया!”

मैंने उसके माथे पर एक दो बार चूमा और कहा, “आर यू श्योर.. आई मीन, आर यू ओके विद आवर न्यू रिलेशनशिप?”

फरहत मुस्कुराई, “आई ऍम! आपको जब मन करे, मुझे बताइयेगा! और मुझे लगता है की मुझे भी इसकी (मेरे लिंग की तरफ इशारा करते हुए) बहुत ज़रुरत पड़ने वाली है! ही ही ही!”

सुमन का परिप्रेक्ष्य

फरहत के अथक प्रयासों का फल अब दिखने लग गया था। समय समय पर दवाइयाँ वगैरह देना, रूद्र की पूरी देखभाल करना, उनको व्यायाम करवाना और उनकी फिजियोथेरेपी करना। इन सब के कारण रूद्र की अवस्था अब काफी अच्छी हो गयी थी। मैंने एक और बात देखी - बहुत दिनों से देख रही हूँ की रूद्र और फरहत की नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। रूद्र स्पष्ट रूप से पहले से काफी खुश दिखाई देते हैं। उत्तराखंड त्रासदी के बाद से पहली बार उनको इतना खुश देखा है। मुझे ख़ुशी है की उनके स्वास्थ्य में काफी सुधार है, और यह भी लग रहा है की वो भावनात्मक और मानसिक अवसाद से अब काफी उबर चुके हैं।

उनके स्वास्थ्य में कई सारे सकारात्मक सुधार भी हैं.. रुद्र चल फिर पाते हैं... आज कल घर से ही अपने ऑफीस का काम भी कर लेते हैं... वैसे डॉक्टर ने उनको कुछ भी करने से माना किया है, लेकिन वो जिस तरह के व्यक्ति हैं... खाली नही बैठ सकते इसलिए एक तरह से अच्छी बात है की वो अपने काम में मशगूल रहते हैं. सवेरे उठने के बाद वो कुछ देर टहलते भी हैं।

लेकिन दुःख इस बात का है की मैं उनके इस सुधार का कारण नहीं बन पाई हूँ। यह सब कुछ फरहत के कारण है – उसके आने से वाकई घर की स्थिति में बहुत सारे सकारात्मक सुधार आये हैं। वो आई तो रूद्र की नर्स बन कर थी, लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी देखभाल के साथ ही साथ मेरी भी देखभाल करती थी – मेरे खाने पीने, सोने, स्वास्थ्य, और पढाई लिखाई में रूद्र के बराबर ही रूचि लेती थी और यह भी सुनिश्चित करती थी की सब कुछ सुचारू रूप से हो। घर के संचालन में फरहत को अपार दक्षता प्राप्त थी। फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जैसे ही घर में घूम घूम कर, ढूंढ ढूंढ कर काम करती! मुझे भी कभी कभी लगता था की जैसे मेरी दीदी या माँ ही फरहत के रूप में वापस आ गए हैं! सच में! बहुत बार तो फरहत को दीदी या मम्मी कह कर बुलाने का मन होता! मेरे मन से यह बात कि वो नर्स है, कब की चली गई!

ये सब अच्छी बातें थीं.. लेकिन मुझे एक बात ज़रूर खटकती थी। और वो यह, की मेरा पत्ता साफ़ हो रहा था.. जवानी में मैंने सिर्फ एक ही पुरुष की चाह करी थी, और वो है रूद्र! लेकिन अब वो ही मेरी पहुँच से दूर होते जा रहे थे। मुझे शक ही नहीं, यकीन भी था की फरहत और रूद्र में एक प्रेम-सम्बन्ध बन गया है। वो अलग बात है की मेरे घर में रहने पर ऐसा कुछ होता नहीं दिखता था... संभवतः वो दोनों सतर्क रहते थे। फरहत हमारे घर पर ही रहती थी (अभी वो सप्ताह में एक दिन अपने घर जाने लग गयी थी), और अब इतने दिनों के बाद हमारे परिवार का ही अभिन्न हिस्सा बन गयी थी।

एक रोज़, सप्ताहांत में, मैं सवेरे सवेरे उठी – उस रोज़ कुछ जल्दी ही उठ गयी थी। आज के दिन फरहत अपने घर जाती थी। मैंने सोचा की क्यों न आज काम-वाली बाई के बजाय मैं ही नाश्ता और चाय बना दूं और सब लोग साथ मिल कर आलस्य भरे सप्ताहांत का आरम्भ करें। मैं अपने कमरे से बाहर निकल कर दालान में आई ही थी, की मुझे रूद्र के कमरे से दबी दबी, फुसफुसाती हुई आवाजें सुनाई दी। हल्की हलकी सिसकियों, दबी दबी हंसी और खिलखिलाहट, और चुम्बन लेने की आवाजें।

प्रत्यक्ष को भला कैसा प्रमाण? मैं समझ गयी की इस समय अन्दर क्या चल रहा है। लेकिन फिर भी मन मान नहीं रहा था – हृदय में एक कचोट सी हुई।जो काम मैं खुद रूद्र के साथ करना चाह रही थी, वही काम कोई और उनके साथ कर रही थी।दुःख भी हुआ, और उत्सुकता भी! उत्सुकता यह जानने और देखने की की ये दोनों क्या कर रहे हैं!

मैं दबे पांव चलते हुए रूद्र के कमरे तक पहुंची, और दरवाज़े पर अपने कान सटा दिए।

“उम्म्म्मम्म.. ये गलत है..” ये फरहत थी।

“कुछ भी गलत नहीं..”

“गलत तो है.. आह... शादीशुदा न होते हुए भी यह सब.. ओह्ह्ह्ह.. धीरेएएए..!” फरहत ठुनकते हुए कह रही थी।

“जानेमन... मेरे लंड का तुम्हारी चूत से मिलन हो गया...शादी में इससे और ज्यादा क्या होता है?”

“छिः! कैसे कैसे बोल रहे हो! गन्दी गन्दी बातें! आअऊऊऊ! आप न, बड़े ‘वो’ हो.. अभी, जब आपके हाथ पांव ठीक से नहीं चल रहे हैं, तब मेरी ऐसी हालत करते हैं.. जब सब ठीक हो जाएगा तो...”

“अच्छाआआआ... तो ये नर्स मेरे ठीक होने के बाद भी मुझे नर्स करना चाहती है?”

फरहत को शायद रूद्र के शरारत भरे प्रश्नोत्तर का भान नहीं था।

“हाँ... क्यों? ठीक होने के बाद मुझसे कन्नी काट लोगे क्या?” फरहत ने शिकायत भरे लहजे में कहा।

“अरे! बिलकुल नहीं!”

“आऊऊऊऊऊ..” यह फरहत थी।

“कम.. लेट मी नर्स यू.. उम्म्म!”

“आऊऊऊऊऊ... आराम से! ही ही ही!!”

दोनों की बातचीत की मैं सिर्फ कल्पना ही कर सकती थी... मेरे दिमाग में एक चित्र खिंच गया की रूद्र ने फरहत के एक निप्पल को अपने मुंह में भर लिया होगा। अद्भुत और आनंददायक होता होगा न, ऐसे सम्भोग करना? अपनी प्रेयसी की स्तनों को चूसते हुए अपने लिंग को उसकी योनि में लगातार ठोंकते रहना। है न? लेकिन मुझे पता नहीं कैसा लगा – अजीब सा, रोमांच, गुस्सा, उत्सुकता... ऐसे न जाने कितने मिले जुले भाव!

मुझसे रहा नहीं जा रहा था... मैं वाकई देखना चाहती थी की अन्दर क्या चल रहा है – सिर्फ सुन कर उत्सुकता कम नहीं, बल्कि बढ़ने लगती है। मैंने की-होल से अन्दर देखने की कोशिश करी – छेद था तो, लेकिन कुछ ऐसा था की अन्दर बिस्तर का कोई हिस्सा नहीं दिख रहा था। तभी मुझे ख़याल आया की ड्राई बालकनी से मास्टर बाथरूम के रास्ते अन्दर का नज़ारा देखा जा सकता है। मैं भागी भागी उसी तरफ गयी... उम्मीद के विपरीत मुझे सीधा तो कुछ नहीं दिखाई दिया, लेकिन बाथरूम के अन्दर लगे आदमकद आईने से बेडरूम के खुले दरवाज़े के अन्दर का दृश्य साफ़ नज़र आ रहा था।

फरहत रूद्र की सवारी करते हुए सम्भोग कर रही थी। उसके नितम्ब के बार बार ऊपर नीचे आने जाने पर रूद्र का लिंग दिखाई देता था – फरहत की योनि रस से सराबोर वह लिंग कमरे की लाइट और बाहर की रौशनी से बढ़िया चमक रहा था। फरहत रूद्र के ऊपर झुकी हुई थी, जिससे रूद्र उसके स्तन पी सकें। हो भी वही रहा था – रूद्र के मुंह में उसका एक निप्पल था, और दूसरे स्तन पर उनका हाथ! मैं वही खड़े खड़े रूद्र और फरहत के संगम का अनोखा दृश्य देख रही थी।

“जानू.. जानू.. बस.. ब्ब्ब्बस्स्स.. आह! दर्द होने लगा अब... अब छोड़ अआह्ह्ह.. दो!”

‘जानू? वाह! तो बात यहाँ तक पहुँच गयी है? नीलू... तू क्या कर रही है??’

“क्या छोड़ दूं?” रूद्र ने फरहत का निप्पल छोड़ कर कहा (बेचारी का निप्पल वाकई लाल हो गया था), “चूसना, मसलना या फिर चोदना?”।

रूद्र को ऐसी भाषा में बात करते हुए सुन कर मुझे बुरा सा लगा – उनके मुंह से ऐसी भाषा वाकई शोभा नहीं देती है।

“चूसना और मसलना.. तीसरा वाला तो मैं ही कर रही हूँ.. आप तो आराम से लेटे हो!”

“ठीक है फिर.. चलो, यह शुभ काम अब मै ही करता हूँ.. अब खुश?”

कह कर रूद्र बिस्तर से उठने लगे, और साथ ही साथ फरहत को लिटाने लगे।उसके लेट जाने के बाद, रूद्र अब फरहत के होंठो को बड़े अन्तरंग तरीके से चूमने लगे। फरहत भी बढ़ चढ़ कर उनका साथ देने लगी। ऐसे ही चूमते हुए रूद्र ने अपनी एक उंगली फरहत की योनि में डाली, और उसे अन्दर बाहर करने लगे। फरहत की सिसकारियाँ मुझे साफ़ सुनाई दे रही थीं। वह आह ओह करते हुए, रूद्र के बालों को नोंच रही थी। रूद्र ने अब अपनी उंगली उसकी योनि से निकाल के उसके मुंह में डाल दी। वो मज़े ले कर अपनी ही योनि का रस चाटने लगी।
 
रूद्र और फरहत, दोनों ही समागम के लिए तड़प रहे थे। रूद्र ने फरहत की टांगो को खोला और अपना शिश्नाग्र उसकी योनि के खुले हुए मुख पर रख दिया। उनका लिंग कितना मोटा था! सच में! यह लिंग अगर मेरी योनि में जाएगा, तो अपार कष्ट तो होना ही है! लेकिन फरहत की योनि की अब तक इतनी कुटाई हो चुकी थी की रूद्र के एक ही झटके में उनके लिंग का आधा हिस्सा उसके अन्दर चला गया। फरहत के चेहरे पर मात्र हल्का सा कष्ट का भाव आया, और उसने रूद्र का लिंग अपनी योनि में सही तरह से ले लिया। रूद्र नीचे झुक कर उसके स्तनों पर भोग लगाने लगे और साथ ही साथ नीचे की तारफ अपनी कमर को एक झटका और दे कर के अपने लिंग को उसके अन्दर पूरी तरह प्रविष्ट कर दिया। फरहत ने अपने हाथ उनकी कमर के गिर्द लपेट कर अपनी तरफ और खींचने लगी। रूद्र पूरे जोशो खरोश के साथ सम्भोग करने लगे... उधर फरहत भी नीचे से अपनी कमर को उछाल कर उनका साथ दे रही थी।

मैं और अधिक नही देख सकती थी... भले ही सम्मुख दृश्य इतना रोचक और कामुक हो.. यह उन दोनो के बीच का अपना और बहुत ही अंतरंग संसर्ग संबंध था, और मैं ऐसे चोरी छिपे देख कर इस बात का अनादर नही कर सकती थी.. मैं जल्दी से अपने कमरे में वापस चली आई और बिस्तर पर लेट गयी और सोने का नाटक करने लगी। जब फरहत और रुद्र फ़ुर्सत पाकर कमरे से बाहर निकलेंगे, तब उनको किसी प्रकार की लज्जाजनक स्थिति का सामना नही करना पड़ेगा।

कुछ देर के बाद (कोई पंद्रह मिनट के बाद) मुझे उनके कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। मैं दम साध कर लेटी रही – जैसे अभी भी सो रही हूँ। मुझे वाकई बुखार सा हो गया था। ऐसे ही नाटक करते करते न जाने कब आँख लग गयी, मुझे कुछ याद नहीं है। लेकिन मेरी नींद तब खुली जब मैंने अपने गाल और माथे पर किसी के छूने का एहसास हुआ।

मैने आँखें खोलीं... सामने फरहत बैठी हुई थी...! वो मेरे गाल को प्यार से सहला रही थी।

"फरहत! आप?"

"श्श्ह्हह्ह्ह... अभी तबियत कैसी है?"

“तबियत?”

“हाँ.. बुखार से तप रहा था तुम्हारा शरीर! मैंने कोई दवाई नहीं दी, लेकिन सोचा कि पहले तुमको जगा लूं। कैसा लग रहा है अभी?”

“तप रहा था? मेरा शरीर?” फिर अचानक याद आया कि वो तो मेरे शरीर की कामाग्नि की तपन थी। मैंने सोचा की आज फरहत से इस बारे में बात कर ही ली जाय।

“ओह!” मैने कहा, “वो कुछ भी नहीं है... रूद्र कहाँ हैं?”

“वो तो बाथरूम में हैं! क्यों?”

“वो इसलिए, कि मुझे आपसे एक बात करनी थी!”

“क्या बात है? बताओ?”

मैं हिचकी, “फरहत, क्या आप और रूद्र... मतलब, क्या आप दोनों शादी करना चाहते हैं?”

“ऐसे क्यों पूछ रही हो, सुमन?” फरहत ने सतर्क होते हुए पूछा।

“मैंने आज आप दोनों को... सेक्स करते हुए...”

“हाय अल्लाह!” कहते हुए फरहत ने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया।

“बताइए न?”

“करना तो चाहती हूँ... लेकिन तुम भी तो..”

“मैं भी तो क्या?”

“तुम भी तो उनसे शादी करना चाहती हो.. है न?”

“ये आप कैसे कह रही हैं?” मैंने प्रतिरोध किया।

“सुमन, मैं भी औरत हूँ, और तुम भी! और औरत ही दूसरे औरत के मन की बात समझ सकती है! हमको कुछ कहने सुनने की ज़रुरत होती है क्या?”

मैं चुप ही रही। फरहत भी कुछ देर चुप रही, और फिर आगे बोली,

“रूद्र हैं ही ऐसे मर्द! क्यों न कोई लड़की उनको चाहने लगे? मर्द नहीं, सोना हैं सोना! मैं तो उनकी लौंडी (गुलाम) बन गयी हूँ!”

मैंने कुछ हिम्मत करी।

“आप मेरी इस बात का बुरा मत मानना, लेकिन पूछना ज़रूरी है। आप उनसे उनकी दौलत के लिए शादी करना चाहती हैं?”

फरहत मुस्कुराई, “हा हा! नहीं.. मैंने तुम्हारी बात का कोई बुरा नहीं माना। मुझे मालूम है कि रूद्र ने अपनी सब जायदाद आपके नाम कर दी है। नहीं... दौलत के लिए नहीं! मेरी नर्स की नौकरी में ज्यादा तो नहीं, लेकिन कम कमाई भी नहीं होती। आराम से चल जाता है। नहीं... उन्होंने जिस तरह से मुझे औरत होने का एहसास दिलाया है, मुझे जिस तरह से मान सम्मान दिया है, उसके लिए! ... कौन सी औरत नहीं करेगी उनके जैसे मर्द से मोहब्बत? रूद्र न केवल जिस्म से ही एक भरपूर मर्द हैं, बल्कि दिल से भी हैं।"

“लेकिन.. आप तो मुसलमान हैं?”

“हाँ! लेकिन, मुसलमान होने से पहले एक इंसान भी तो हूँ!”

“नहीं नहीं! मेरा वो मतलब नहीं था।“

“हा हा! हाँ भाई... मालूम है तुम्हारा वो मतलब नहीं था! हाँ.. मुसलमान हूँ.. अब्बू कुछ न कुछ नाटक कर सकते हैं!”

फिर कुछ रुक कर, “तुम्हे तो कोई दिक्कत नहीं? ... मेरा मतलब...”

मेरी उदासी मेरे चेहरे पर साफ़ दिखने लगी।

“नीलू, अगर तुम उनसे प्यार करती हो, तो तुमको उन्हें बताना चाहिए!”

“अगर का कोई सवाल ही नहीं है फरहत...”

“इसीलिए तो ये समझा रही हूँ तुमको! ऐसे मन में रखने से तो उनको मालूम नहीं होगा न? किसी को ख्वाब थोड़े न आ रहे हैं! और सच कहती हूँ.. अगर वो भी तुमको पसंद करते हैं, तो मुझे बहुत ख़ुशी मिलेगी.. और भी ख़ुशी मिलेगी अगर तुम दोनों मिल जाओ। दुःख तो बहुत होगा.. झूठ नहीं कह सकती... ऐसा शानदार मर्द हाथ से चला जायेगा, तो किसी को भी अफ़सोस होगा! लेकिन, मुझे ख़ुशी भी मिलेगी। सच कहती हूँ!“

“फरहत.. आप इतनी अच्छी हैं, मुझे भी लगता है कि उनको आपसे शादी करनी चाहिए!”

“सुमन, ऐसे मत कहो! मैं तो बहुत बाद में आई... लेकिन मुझे मालूम है कि तुमने उनकी सेवा में दिन रात एक कर दिया था। इस लिहाज़ से तुम्हे पहला हक़ है, उनसे प्यार जताने का। लेकिन रूद्र को नहीं मालूम कि तुम उनसे प्यार करती हो! मुझे भी काफी कुछ हो जाने के बाद मालूम पड़ा.. नहीं तो मैं कैसे भी उनसे इतना न घुल-मिल जाती।“

फरहत कुछ देर के लिए चुप हो गयी – कमरे की निस्तब्धता में दोनों लडकियाँ जैसे अभी अभी हुई बातों की वज़न का माप कर रही थीं। चुप्पी वापस फरहत ने ही तोड़ी –

“नीलू प्यारी, मेरी तो बस यही सलाह है कि तुम उनको बताओ। उनको बताओ की तुम उन्हें प्यार करती हो! बाकी तो सब अल्लाह का रहम!”

फरहत की ऐसी बात सुन कर मुझे बहुत राहत हुई – एक अरसे के बाद किसी से इस तरह बात करी। इस कारण मन का दुःख आँखों के रास्ते, आंसूं बन कर बाहर निकल आये। फरहत ने मुझे अपने गले से लगा लिया। और मुझे दिलासा देने लगी। कुछ देर के बाद वो ही बोली,

“क्यों न हम एक काम करें?”

मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि डाली,

“आज घर जाना कैंसिल कर देती हूँ! और... तुमको फुल-बॉडी मसाज देती हूँ! एक तो तुमको खूब अच्छा महसूस होगा, और दूसरा, कभी न कभी रूद्र तुम्हारे कमरे के सामने से गुजरेंगे! तुम्हारा नंगा बदन देख कर कुछ तो समझ आएगा न उस बुद्धू को?”

“धत्त फरहत! आप भी न!”

“अरे! इतना कमसिन जिस्म है! कभी दिखाओ तो उन्हें!”

“क्या! आप भी न !”

“अरे! आप भी न का क्या मतलब है? पता है, जब उन्होंने जब मेरी छातियाँ पहली बार नंगी करीं, तो कैसी आहें भरी थीं! मर्द के सामने अपनी छातियाँ परोस दो, बस! उसकी तो तुरंत लार टपकने लगेगी! और इस बेचारे को तो कितना दिन भी हो गया था!”

“छिः! कितनी गन्दी हो तुम!” मेरी आँखों के सामने सवेरे के दृश्य घूम गए।

“गन्दी नहीं! खैर, मर्द की ही क्या बात करें! हम औरतों की भी तो ऐसी ही हालत हो जाती है! इन चूचों पर मर्द की जीभ पड़ जाय बस! हा हा!”

“धत्त...”

“अरे! धत्त क्या! बेटा, अगर रूद्र मान गए, तो तेरा ऐसा बाजा बजेगा न, कि तुझे ऐसा लगेगा की सात जन्नतों की सैर करके आई हो! बाप रे! थका देते हैं वो तो! ... और, उनका औज़ार भी तो कितना तगड़ा...”

मैंने आगे कुछ भी सुनने से पहले अपने कान हाथों से बंद कर लिए, और अपनी आँखें भी मींच लीं!

फरहत बातों में तो माहिर थी। उससे भी अधिक उसमें स्नेह था। जो सारी बातें अभी फरहत ने कही थी, वो सारी बातें मेरे लिए भी उतनी ही सच थीं। अगर रूद्र फरहत को पसंद कर लें, तो मुझे भी बहुत ख़ुशी मिलेगी – दुःख होगा, लेकिन वाकई, ख़ुशी भी बहुत मिलेगी। एक बार तो मन हुआ कि क्यों न फरहत भी हमारे साथ ही रहे। शादी किसी की भी हो, लेकिन साथ तो हम तीनों ही रह सकते हैं! लेकिन इस प्लान में एक अड़चन यह थी की फरहत की शादी में दिक्कत आएगी...

हैं! कमाल है! मैं पहले से ही सोच रही हूँ कि रूद्र मुझे ही पसंद करेंगे, और मुझ ही से शादी करना चाहेंगे! मज़े की बात है, की मैंने अभी तक उनको अपने मन की बात भी नहीं बताई!

फरहत के उकसाने पर मैंने मालिश के लिए हामी भर दी। मुझे बहुत शर्म आ रही थी और मन में एक उलझन सी भी बन रही थी। कुछ दिनों पहले ही भानु के सामने मैं नंगी हो गयी थी, और उसके साथ न जाने क्या क्या कर डाला था, और आज फरहत है! क्या मैं ठीक हूँ? कहीं मैं लेस्बियन तो नहीं? सुना तो है कि स्त्रियाँ आसानी से समलैंगिक सम्बन्ध बना लेती हैं। लेकिन जो मैं रूद्र की तरफ आकर्षित होती हूँ, वो क्या है? और.. और... आज भी मैं फरहत को सिर्फ इसी कारण से यह सब करने दे रही हूँ, क्योंकि उसने मुझे रूद्र के सामने प्रदर्शन का लालच दिया है। शायद मैं ठीक हूँ!
 
फरहत कुछ देर के लिए कमरे से बाहर गयी हुई थी – मालिश के लिए तेल लाने। रूद्र दीदी की अक्सर ही मालिश करते थे – ख़ास तौर पर सप्ताहांत में। मालिश के साथ साथ दीदी के साथ जम कर सम्भोग भी करते थे। दीदी भले ही थक कर चूर हो जाती थी, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव, रहस्य भरी मंद मंद मुस्कान मुझसे छिपी नहीं रहती थी। वाकई, रूद्र इस कार्य में बहुत कुशल थे। मुझे बगल के कमरे से रूद्र और फरहत की दबी हुई आवाजें सुनाई दे रही थीं। न जाने क्या कह रही होगी ये उनसे! खैर, कोई पांच मिनट के बाद फरहत वापस कमरे में आई। जब उसने मुझे अपने पूरे कपड़ों में देखा तो उसने मुझे कपडे उतारने को कहा। मैं शरम के कारण दोहरी हो रही थी और मेरा चेहरा लाल सा हो गया था।

फरहत मुझे ऐसे देख कर मेरे पास आई, और मेरे दोनों हाथों को पकड़ कर बहुत ही धीमे स्वर में बोली, “नीलू, मुझसे शरमाओ मत! मैं तुम्हारी दोस्त हूँ! और, तुमने मुझे आज नंगा देखा है... और वो सब करते देखा है, जो नहीं देखना चाहिए! इसलिए, अब इतना तो बनता है न?”

फरहत की बात तो सही थी। मैंने अपने सूखे गले को थूक की एक घूँट से तर किया, और अपने कपडे उतार दिए। अन्दर कुछ पहना हुआ था नहीं, इसलिए मैं तुरंत ही पूर्ण नग्न हो गयी। मुझे इस हालत में देख कर फरहत भी एक बार हतप्रभ हो गयी।

“क्या बात है नीलू! सचमुच तुम बहुत सुन्दर हो – न केवल तुम्हारी सूरत, बल्कि ये (मेरे स्तनों की तरफ इशारा करते हुए) तेरी छातियाँ भी! और ये (फिर मेरी योनि की तरफ), तेरी चूत भी! जब चूत की फांके ऐसे दिखती हैं, तो क्या सुन्दर लगती हैं!”

बिकिनी वैक्स द्वारा बाल निकालने के बाद मेरी योनि पर बालों के हलके हल्के रोयें ही उगे हुए थे। ऐसे में मेरे योनि के दोनों होंठ स्पष्ट दिख रहे थे।

“मन करता है की इनको चूम लूं!”

कह कर उसने वाकई मेरी योनि के होंठों को चूम लिया।

“ईईश्श्श्ष! फरहत, मैंने इसे धोया नहीं था!” उसके इस काम से मुझे हलकी सी घिन आ गयी।

“धोया नहीं था? ह्म्म्म.. इसीलिए इतनी नमकीन थी!”

उसकी ऐसी बातों से मेरी शर्म और हिचकिचाहट कम तो नहीं होने वाली थी। इसलिए मैं बिस्तर पर मुँह छुपा कर लेट गयी। और फरहत ने हँसते हुए मेरी पीठ पर तेल डाल कर मालिश करना शुरू किया। हलके हाथों से धीरे धीरे मालिश होना – मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। कुछ ही देर में मेरे मुँह से सुख भरी आवाजें निकलने लगीं। कोई दस मिनट के बाद उसने मेरे पैरों मालिश शुरू करी। मालिश करते हुए उसके हाथ धीरे धीरे ऊपर की तरफ आ रहे थे – यह मुझे मालूम हो रहा था। ऐसा नहीं है की वो मुझसे छुपा कर कुछ भी कर रही हो।

खैर, जाँघों की मालिश करते हुए जब तब उसके हाथ मेरे नितम्बों के बीच में छू जाते थे। वैसे भी कुछ देर पहली की घटनाओं के कारण मैं वैसे ही गर्म हो गयी थी – अब तक मेरी योनि से रस भी रिसने लगा था। मेरी सिसकारियाँ अभी भी निकल रही थीं, लेकिन अब मुझे ही नहीं मालूम था की वो मालिश की संतुष्टि के कारण थी, या फिर कामुक!

अचानक ही फरहत ने मेरे हाथों की मालिश शुरू कर दी। एक तरह से मुझे राहत ही हुई। लेकिन जब दो मिनट बाद वो वापस मेरे पुट्ठों को मसलने लगी, तो मैं समझ गयी की बाहों की मालिश तो महज़ एक खाना पूरी थी। मेरे नितम्बों की मालिश वो ऐसे कर रही थी, जैसे आटा गूंथ रही हो। बीच बीच में रह रह कर वो दोनों पुट्ठों पर अपनी मुट्ठी से प्रहार भी करती। इस कारण से मीठा मीठा दर्द उभर कर निकल रहा था। मैं मीठी पीड़ा, आनंद, सुख और काम – इन न जाने कितने मिले जुले भावों के सागर में गोते लगाने लगी। अचानक ही फरहत की आवाज़ सुन कर मेरिन तन्द्रा भंग हुई,

“गुड़िया रानी, अब सामने की बारी!” कह कर उसने मुझे पीठ के बल लेटने को कहा।

मुझे सिहरन सी होने लगी। फरहत ने मेरे सामने की तरफ मालिश शुरू कर दी थी। पहले तो उसने मेरी गर्दन और कंधे की मालिश करी, और फिर दोनों स्तनों पर काफी तेल लगा कर कुछ ज्यादा ही जोर शोर से मालिश करने लगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरी उत्तेजना अब काफी बढ़ गयी थी। फरहत के हाथों की हरकतों के साथ साथ मेरी सिसकारियाँ भी बढती जा रही थीं।

लेकिन, फरहत का मन भरा नहीं था – उसका खेल जारी रहा। कुछ देर तबियत से मेरे स्तनों की मालिश करने के बाद वो मेरे चूचकों के साथ भी खिलवाड़ करने लगी। वो कभी उनको अपनी तर्जनी और अंगूठे के बीच पकड़ कर मसलती, तो कभी उनको बाहर की तरफ हल्के से खींचती । उसने ऐसा न जाने कितनी बार किया – लेकिन मेरी हालत खराब हो गयी। मेरी आहें और भी भारी और तेज हो गई। हार कर मैंने उसका हाथ पकड़ कर उसको रोक दिया। तब कहीं जा कर उसके मेरे स्तनों का पीछा छोड़ा।

अगली बारी पेट की थी। मैंने राहत की सांस ली। कोई पांच मिनट के बाद उसने आखिरकार मेरी योनि की मालिश आरम्भ कर दी। डर के मारे मैंने अपने दोनों पैर एकदम सटा लिए थे, जिससे वो योनि से खिलवाड़ न कर सके। लेकिन उसकी उंगली रह रह कर जाँघों की बीच की दरार में लुका छिपी खेल रही थी। रूद्र के साथ रह रह कर फरहत को कुछ तरीके तो आ ही गए थे। उसकी इन हरकतों से मैं फिर से उत्तेजित हो गई, और मेरे पैर खुद ब खुद खुलते चले गए। फरहत को मेरी योनि साफ़ साफ़ दिखने लगी।

“कितने पतले पतले होंठ हैं...” फरहत अपनी ही दुनिया में थी और इस समय मेरे योनि के होंठों को हलके से मसलते हुए कहा, “गुलाबी गुलाबी! सच में! गुलाब की कली जैसी!”

मुझे योनि से काम-रस बहता हुआ महसूस हुआ! उस स्थान पर गीला गीला और ठंडा ठंडा लग रहा था।

“मज़ा आ रहा है न नीलू?” उसने धीरे धीरे से मेरे भगनासे सहलाते हुए पूछा।

मैं क्या ही कहती? मेरी फिर से आहें निकलने लगीं, और मैं अपना सिर इधर-उधर कर के छटपटाने लगी। फरहत को मेरी हालत तो साफ़ पता चल ही रही होगी! उसने अगले कोई दो मिनट तक अनवरत उस हिस्से को कुछ तेज़ गति से रगड़ा। देखते ही देखते मैं मस्त आहें भरते हुए चरमोत्कर्ष पर पहुँचते हुए स्खलित हो गई।

जब मैंने वासना की मस्ती में चूर आँखें खोलीं, तो फरहत ने कहा,

“मज़ा आया?”

मैं मुस्कुरा दी।

“तुम जन्नत की हूर हो, नीलू!”

उसने कुछ देर मेरे एक स्तन को सहलाया और फिर कहा, “तुम हिम्मत कर के उनको अपने दिल की बात बता दो! तुमको भी खुश रहने का पूरा हक़ है!”

फिर उसने मेरे माथे को चूमते हुए कहा, “हमेशा खुश रहो!”

फरहत की हरकतों से मेरे शरीर में आग लग गयी। वो मुझे उकसाने का प्रयास कर रही थी, जिसमे वो शत प्रतिशत सफल रही। उसके कहने के बाद मैंने मन में ठान लिया कि मैं रूद्र से अपने प्रेम का इज़हार करूंगी।

मैंने इंतज़ार किया जब रूद्र नहा धो कर बाहर निकलेंगे, तब मैं उनसे बात करूंगी। कमरे की आहात से पता चल गया कि वो कुछ ही देर में बाहर आ जायेंगे... उसके पहले मैं ही कमरे में चली गयी।

“आप कैसे हैं?”

“एकदम बढ़िया, नीलू!”

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा किया, जो तुम मुझसे बात करने चली आयीं। मुद्दत हो गयी, तुमसे आराम से बात किया हुए।“

“हाँ! मैं भी चाहती थी की हम फॉर्मल जैसी बाते न करें!”

मेरी इस बात ने ज़रूर उनके दिल को कहीं न कहीं कचोट दिया होगा। फॉर्मल बाते ही तो होती हैं हमारे बीच! उनका सुन्दर चेहरा उतर गया.. वो कुछ कह न पाए! मैंने बात सम्हालने की कोशिश करी,

“म्म्मेरा वो मतलब नहीं था..”

“नहीं नीलू! तुम सही ही तो कह रही हो! मेरी हरकतों के लिए मेरे पास कोई बहाना नहीं है.. हो सके तो माफ़ कर दो!”

“नहीं नहीं.. आप माफ़ी क्यों कह रहे हैं! मैंने आपको उलाहने देने के लिए यह नहीं कहा!”

“मुझे मालूम है नीलू! तुम्ही तो हो, जो मेरा इतना ख़याल रखती है!” उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश करी! मुस्कुराते हुए ये कितने सुन्दर लगते हैं!!

“और भी रखूंगी.. अगर आप ऐसे ही हँसते मुस्कुराते रहें!”

“हा हा! हाँ! .. अच्छा चलो, बताओ.. कॉलेज कैसा चल रहा है?”

“बढ़िया!”

“दोस्त बनाए वहां?”

“हाँ! बहुत से हैं!”

“मुझे तो बस भानु का ही पता है!”

“उसके अलावा भी कई हैं...”

“लड़के भी?”

“हाँ!”

“ह्म्म्म... गुड! कोई ख़ास?”

“नहीं! उनमें कौन ख़ास हो सकता है!”

“अरे क्यों?”

“अच्छा.. आप मेरी नहीं अपनी बताइए! आपकी कोई गर्ल फ्रेंड है?”

“मेरी गर्ल फ्रेंड? हा हा!”

“सच सच बताइयेगा?”

“हम्म.. नीलू, कोई और होता तो झूठ बोल देता.. लेकिन तुमसे झूठ नहीं कह सकता! फरहत अच्छी लगती है मुझे!”

“हाँ! फरहत तो है भी अच्छी!”

“तुमको अच्छी लगती है?”

“हाँ! उसके आने से आप कितना खुश रहने लगे हैं!”

“अरे! ऐसे क्यों कह रही हो? तुम्हारे साथ क्या मैं गुस्सा था?”

मैं चुप रही। रूद्र भी कुछ देर सोच में पड़ गए,

“या शायद था! तुमने मेरी लाइफ, और पर्सनालिटी का सबसे खराब भाग झेला है!”

“नहीं! मैं कोई शिकायत नहीं कर रही हूँ! मैं तो बस इसी बात से खुश हूँ की वो पुराने वाले रूद्र वापस आ रहे हैं!”

“हः! पुराना वाला रूद्र तो तुम्हारी दीदी के साथ ही चला गया, नीलू।“ रूद्र की आँखों से खामोश आंसूं निकलने लगे, ”वो तो मेरी आत्मा थी। अब तो बस मेरा ढाँचा ही बच रहा है!”

“हाँ! दीदी तो सबसे अच्छी थी!” मेरा दिल बैठ गया ‘थी’ कहते हुए!

“सच में... उसके बिना सब फीका फीका लगता है..”

“फरहत के रहते हुए भी?”

“नीलू, फरहत मुझे अच्छी ज़रूर लगती है, लेकिन वो मेरी गर्ल फ्रेंड नहीं है! हम लोग सेक्स करते हैं, लेकिन अभी तक दिल के सम्बन्ध नहीं बन पाए हैं! और... मुझे लगता भी नहीं की ऐसा कुछ होगा!”

“ऐसा क्या हुआ फरहत के साथ?”

“नहीं.. बात सिर्फ फरहत की नहीं है... मुझे नहीं लगता कि किसी भी लड़की के साथ मुझे अब रश्मि जैसा लग सकेगा!”

यही समय था!

“रश्मि की परछाईं के साथ भी नहीं?” मेरी आवाज़ में एक तरह की ठंडक सी आ गयी थी..

रूद्र एकदम से ठिठक गए,

“मतलब?”

मेरा गला सूख गया,

“आप.. मुझसे शादी करेंगे?” बहुत धीमी आवाज़ निकली।

“नीलू! ये तुम क्या कह रही हो?”

“रूद्र! मैं आपसे प्यार करती हूँ! और आपसे शादी करना चाहती हूँ! मैं चाहती हूँ की मैं आपके सारे दुःख बाँट सकूं, और आपको सब प्रकार के सुख दे सकूं!”

“नीलू!.. नीलू.. लेकिन तुम मुझसे .. मुझसे कितनी तो छोटी हो!”

“चौदह साल! तो क्या हुआ?”

रूद्र वाकई हक्के बक्के हो गए थे।

“लल्ल.. लेकिन.. मेरी.. ओह भगवान्!”

“रूद्र! मेरी तरफ देखिए... मुझे मालूम है, कि आपने मुझे उस नज़र से कभी नहीं देखा, लेकिन मैंने पहली ही नज़र से आपसे हमेशा प्रेम ही किया है.. हाँ – यह सच है की उस प्रेम के रूप बदलते चले गए। अगर दीदी न होती, तो मैं आपसे ही शादी करती। उनके बाद, मैंने इतने दिनों तक अपने मन में यह बात रखी हुई है.. लेकिन, अब और नहीं होगा। मैंने मन ही मन आपको अपना पति माना हुआ है! बाकी सब आपके हाथ में है!”

कह कर मैं कमरे से बाहर निकल गयी। ह्रदय का बोझ काफी हल्का हो गया।
 
मेरा मन अत्यंत अशांत था – कहने सुनने में तो आज का दिन भी पहले के दिनों के ही समान था, लेकिन मन में न जाने कितने विचार आ और जा रहे थे। सुमन की विवाह प्रस्तावना मेरे लिए अत्यंत अप्रत्याशित थी। अचानक ही जीवन ने एक नया ही मोड़ ले लिया। एक तो ये ‘अचानक’ जैसे की मेरे पीछे ही पड़ गया है – कभी तो इससे मुझे लाभ हुआ, और कभी भारी हानि भी उठानी पड़ी – रश्मि से मिलना एक अचानक और अप्रत्याशित घटना थी... जीवन के उन कुछ सालों में मैं इतना खुश था, जितना कभी नहीं। फिर वो अचानक ही चल दी! फिर अचानक ही मेरा एक्सीडेंट हो गया... अचानक ही फरहत के साथ सम्बन्ध बने.. और आज, अचानक ही सुमन ने यह प्रश्न दाग दिया!

कैसी कमाल की बात है न? हम दोनों इतने सालों से साथ में हैं, लेकिन मुझे कभी इस बात का भान भी नहीं हुआ की सुमन मुझको ले कर ऐसे सोचती है। खैर, भान भी कैसे होता? मैं तो अपने ही ग़म में इतना घुला हुआ था की आस पास का ध्यान भी कहाँ था? लेकिन अब जब यह बात खुल कर सामने आ ही गयी है तो इस पर विचार करना ही पड़ रहा है – क्या सुमन के साथ मेरा होना ठीक रहेगा? मैं उससे चौदह साल बड़ा हूँ... चौदह साल! उसने बोला था की “तो क्या हुआ?” एक तरह से देखो तो वाकई, तो क्या हुआ? रश्मि मुझसे बारह साल छोटी थी....। लेकिन इन दो बातों में क्या समानता है? रश्मि से मुझे प्रेम हुआ था। जब प्रेम होता है, तो उम्र, जाति, बिरादरी, धर्म इत्यादि का कोई स्थान नहीं होता – बस पुरुष और नारी का! (और कुछ लोगों में पुरुष पुरुष और नारी नारी का!) इस लिहाज से देखा जाय तो या कोई बड़ी अनहोनी नहीं थी। सुमन को भी मुझसे प्रेम हुआ था। अब मेरे सामने एक ही प्रश्न है, और वो यह कि क्या मुझे भी उससे प्रेम है? मतलब, प्रेम तो है.. लेकिन वो प्रेम, जिसकी परिणति विवाह हो?

लेकिन सुमन मेरे लिए विवाह प्रस्ताव लाई थी। इस नाते यह सब तो सोचना ही पड़ता है न! अभी तो वह नयी नयी जवान हुई है। जवान शरीर की अपनी मांगे होती हैं। मेरी हालत तो अभी पूरी तरह से ठीक तो है नहीं। फिर मन में विचार आता है की यह सब एक बहाना है। फरहत को मैंने इसी हालत में इस प्रकार संतुष्ट किया है की वो मेरी मुरीद बन गयी है! फरहत को क्या कहूं? उसको कैसा लगेगा? वो भी कितनी अच्छी लड़की है! उसका दिल टूट जाएगा! सच कहूं तो मेरे पास कुछ ख़ास विकल्प नहीं हैं... जो हैं वो वास्तव में सबसे अच्छे हैं। या तो सुमन से विवाह करूँ, या फिर फरहत से! किसी भी एक विकल्प को चुनने से दूसरे का दिल तो अवश्य टूटेगा। यह सोचना मेरे लिए कष्टप्रद है। जो भी होगा, इन दोनों को ही सुनने का पूरा हक़ है।

कहीं किसी को कहते हुए सुना है – प्रेम कहीं से भी, किसी से भी और किसी भी रूप में आये या मिले, तो उसको लपक कर ले लेना चाहिए। और मुझे तो बैठे बैठे जैसे झोली में डाल कर या थाली में परोस कर प्रेम मिल रहा था। कुछ तो अच्छा किया होगा मैंने अपने जीवन में – पहले रश्मि, फिर फरहत और अब सुमन! नहीं नहीं – क्रम में कुछ गड़बड़ है – सुमन फरहत के पहले से है। खैर, क्रम का क्या है? वृत्त में भला क्या कोई आदि या अंत होता है? ठीक वैसे ही, प्रेम में भी क्या आदि या अंत?

मेरे लिए यह भी सोचने वाली बात थी कि मैं प्रेम के खातिर विवाह करना चाहता था, या इसलिए कि मेरा बिस्तर गरम रहे? फरहत से मुझे शारीरिक संतुष्टि तो बहुत मिल रही है... यह उसी की देन है कि आज मैं अपने हाथ पांव का ठीक से इस्तेमाल कर पा रहा हूँ। उसका बहुत उपकार है मुझ पर। लेकिन, क्या मैं उससे शादी कर सकता हूँ? उसके धर्म से मुझे कोई लेना देना नहीं है.. लेकिन, मन में यह बात तो अटकी हुई है की मैं उससे प्यार तो नहीं करता। वो मुझे अच्छी लगती है, मेरी सबसे ख़ास दोस्त भी है, लेकिन मुझे उससे प्रेम नहीं है! मेरा मतलब, ‘उस’ प्रकार का।

दूसरी तरफ सुमन है, जो मुझे चाहती है – आज अगर जीवित हूँ, तो सब उसी की दुआओं, प्रार्थनाओं और प्रेम के कारण ही है। लोगो ने मुझे कहा था की कैसे उसने देवी सावित्री के समान ही मेरे प्राण, मानो यमराज से वापस मांग लिए! कभी कभी सोचता हूँ कि उसके मन और ह्रदय पर क्या बीत रही होगी उस समय? क्या उसने भी देवी सावित्री के ही समान यमराज से सौ पुत्रों का वरदान माँगा था? क्या क्या सोच रहा हूँ मैं? मैं दिन में अपने कमरे में ही रहा। बाहर जाने जैसी हिम्मत नहीं हुई – अगर सुमन से आँखें मिल गईं तो? क्या कहूँगा मैं उससे?

सुमन से आँखें मिलाने के लिए मुझे कमरे से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं थी। वो खुद ही आ गई – एक मंद मुस्कान लिए!

‘ओह भगवान! कितनी प्यारी है ये लड़की!’

“आपको यूँ कमरे के अन्दर बैठे रहने की कोई ज़रुरत नहीं! आइए, लंच कर लेते हैं?”

कह कर उसने बिना मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये, मेरे हाथ पकड़ कर मुझे बिस्तर से उठाने लगी। मैं भी एक अच्छे बच्चे की तरह उठ गया, और न जाने कितने दिनों के बाद डाइनिंग टेबल पर उसके साथ बैठ कर खाना खाया। कभी कभी छोटी छोटी बातें भी कितनी सुन्दर लगती हैं! दिमाग में रश्मि के साथ वाले सुख भरे दिनों का दृश्य घूम गया। होनी कितनी प्रबल है! उसको कौन टाल सकता है?

अगली सुबह जब फरहत घर आई, तो सुमन को वहां उपस्थित देख कर थोड़ा अचरज में आ गई .. फिर उसको तुरंत समझ में आ गया।

“फरहत! आओ! आज हम सभी साथ में नाश्ता करेंगे?” उसको बताने से ज्यादा, मैं पूछ रहा था।

उसको लग गया की अब फैसले की घड़ी है, तो उसने भी कोई न नुकुर न करते हुए हमारे साथ होने में भलाई समझी। लेकिन, मैं कुछ कहता, उससे पहले ही फरहत ने सुमन से पूछा,

“नीलू, तुमने इनको बता दिया?”

सुमन शरमाते हुए मुस्कुराई, और साथ ही उसने हाँ में सर हिलाया।

“ओह नीलू!” कहते हुए उसने सुमन को अपने गले से लगा लिया!

“आई ऍम सो हैप्पी फॉर यू!”

“थैंक यू, फरहत!” सुमन बस इतना ही कह सकी।

“रूद्र,” फरहत ने मेरी तरफ मुखातिब होते हुए कहा, “आपको कुछ कहने की ज़रुरत नहीं है.. बस इतना बता दीजिए, कि आप सुमन से शादी करेंगे?”

अचानक ही मेरा लम्बा चौड़ा भाषण देने का प्लान चौपट हो गया! मेरी बोलती कुछ क्षणों के लिए बंद हो गयी।

“अरे कुछ बोलिए भी!”

“फरहत...”

“हाँ, या ना?”

“ह्ह्हान!” मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल गया।

फरहत मुस्कुरा दी.. उसकी आँखों से आंसू भी निकल आये! भरे हुए गले से उसने मुझे बधाई दी ...

“वैरी गुड चॉइस! सच में! अगर तुम नीलू से शादी न करते, तो मुझसे बुरा कोई न होता! हूहूहू..” वो रोने लगी, “कम, गिव मी अ हग!”

सुमन तुरंत ही फरहत से लिपट कर रोने लगी! मैं भी संकोच करते हुए उससे लिपट गया।

“मेरे सामने नंगा होने में शर्म नहीं आती, लेकिन मुझे हग करने में शर्म आती है? कम... हग मी प्रोपरली..” फरहत ने रोते हुए हिचकियों के बीच में मुझे झाड़ लगाई।

अब तक मेरे भी आँसू निकलने लगे। हम तीनो न जाने कितनी देर तक यूँ ही आपस में लिपट कर रोते रहे, फिर अलग हो कर हमने साथ में नाश्ता किया।

नाश्ते के बाद सुमन ने फरहत का हाथ थाम कर उससे कहा,

“फरहत, चाहे कुछ भी हो, ये घर आपका भी है!”

फरहत ने बीच में कुछ कहना चाह तो सुमन ने कहा, “मुझे बोल लेने दीजिए, प्लीज! मेरे लिए आपका दर्जा मेरी दीदी के जैसा है! इस घर में आपकी इज्ज़त उन्ही के जैसे होगी। मेरी एक विनती है आपसे – आप यहीं पर रहिए!”

फरहत फिर से रोने लगी, “न बाबा! तुम दोनों जब साथ में आहें भरोगे, तो मेरा क्या होगा?” बेचारी, इस बुरी हालत में भी वो मज़ाक करने से नहीं चूक रही थी।

सुमन ने कहा, “तो फिर ठीक है! हम दोनों तब तक शादी नहीं करेंगे, जब तक आपके आहें भरने का परमानेंट इंतजाम न कर दें! क्यों ठीक है न?” ये आखिरी वाला मेरे लिए था!

“क्या मतलब?” मुझे वाकई नहीं समझ आया।

“आप दीदी के लिए कोई अच्छा सा लड़का ढूंढिए न! जब तक इनकी शादी नहीं होगी, मैं भी नहीं करूंगी!” सुमन ने फैसला सुनाया।

ऐसा नाटकीय दिन शायद ही किसी के जीवन में हुआ हो!

अब अच्छा सा लड़का यूँ ही तो नही मिलता है! देखना पड़ता है, लड़के की पृष्ठभूमि की जांच करनी होती है, फिर दोनों एक दूसरे को पसंद भी करने चाहिए! अगर प्रेम के अंकुर निकल पड़ें, तो और भी अच्छा! इसको एक अद्भुत संयोग ही मानिए कि कोई दो महीने बाद, मेरी मुलाकात मेरे अभियांत्रिकी की पढाई के दिनों के एक मित्र से हुई। उसका नाम अमर है। वो मुझसे मिलने मेरे घर आया था – मैं अभी भी ऑफिस नहीं जा रहा था, और घर से ही काम करता था। वो एक महीने के लिए भारत आया हुआ था – वैसे अभी लक्समबर्ग में रहता था, और वहीं पर उसने अपना बिजनेस जमा लिया था। उसको मेरी दुर्घटनाओं के बारे में मालूम पड़ा तो मिलने चला आया – वैसे उसका घर दिल्ली में था। उसने अभी तक विवाह नहीं किया था।

मिलने आया तो उसकी हम सभी से मुलाक़ात हुई। मुझे तुरंत ही समझ आ गया की उसको फरहत में दिलचस्पी है। मैंने उसको पूछा की वो कहाँ ठहरा हुआ है, तो उसने होटल का नाम बताया। मैंने जिद से वहां की बुकिंग कैंसिल कर दी, और हज़ारों कसमें दे कर उसको यहीं मेरे घर पर रहने को कहा। इससे एक लाभ यह था की मेरे पुराने मित्र से मैं देर तक बातें कर पाऊँगा, और दूसरा यह की फरहत और अमर को एक दूसरे से बातें करने का भी अवसर मिलेगा।

हमारी बातों में मैंने जान बूझ कर फरहत का कई बार ज़िक्र किया, जिससे वो उसके बारे में और प्रश्न पूछे, और उसके बारे में ठीक से जान जाय। बाकी सब तो प्रभु की इच्छा! एक और बात थी – वो मैंने किसी को नहीं बताई थी, और वो यह, की अमर का लिंग मेरे लिंग से बड़ा था। लम्बाई में भी, और मोटाई में भी। मुझे कैसे मालूम? अरे दोस्तों, बी टेक का हाल अब न ही पूछिए! भाई को एक बार दारू पीना का शौक चर्राया था। न जाने कितनी ही बार मद में लड़खड़ाते हुए अमर को मैंने टॉयलेट में ले जा कर मुताया था। पैन्ट्स में से उसका लंड बाहर निकालने पर कई बार खड़ा हुआ भी रहता था। ऐसे में मुताने के लिए.... अब छोडिये भी!

अगर इन दोनों की शादी हो जाय, तो वाकई, फरहत की आहें भरने का परमानेंट इंतजाम हो जाए! और सबसे बड़ी बात यह, की अमर एक बहुत अच्छा लड़का, मेरा मतलब आदमी, भी है। वो इस समय अपने करियर और जीवन के उस मुकाम पर है, जहाँ पर उसको एक साथी की आवश्यकता थी। उसके वापस दिल्ली जाने के दो दिनों बाद जब फरहत के लिए उसका फोन आया, तो मुझे जैसे मन मांगी मुराद मिल गयी! उसके एक सप्ताह के बाद, फरहत ने शादी के लिए उससे हाँ कर दी! भले ही उन दोनों को एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ न मालूम हो, लेकिन मुझे यकीन था की लड़की वाकई, बहुत खुश रहेगी! और अमर भी!

अमर और फरहत की शादी जैसे आंधी तूफ़ान की तरह हुई! दोनों ने कोर्ट में जा कर शादी करी थी – फरहत के अब्बू ने फ़िज़ूल की न नुकुर तो करी, लेकिन अमर के लायक न होने का कोई कारण न ढूंढ सके। अब बस हिन्दू मुसलमान के फर्क के कारण ऐसी शादी तो कोई नहीं छोड़ सकता है न? लिहाजा, दोनों की शादी आराम से हो गयी। वैसे भी अमर दिखावे के सख्त खिलाफ है – इसलिए शादी में सुमन, मैं, फरहत के अब्बू, और पांच और मित्रों के अतिरिक्त और कोई नहीं आमंत्रित था। शादी दिल्ली में हुई, और वहीँ पर रजिस्टर भी। वैसे तो काफी सारा प्रपंच करना पड़ता है कोर्ट की शादी में, लेकिन उसने कुछ दे दिला कर हफ्ते भर में ही दिन निकलवा लिया। किसी को उनकी शादी पर भला क्या आपत्ति हो सकती थी।

हम सभी ने बहुत मज़े किये। शादी के बाद, एक पांच सितारा होटल में खाना पीना हुआ, नृत्य भी – हम चारों ने एक दूसरे के साथ डांस भी किया। सुमन भी पूरा समय अमर को जीजू जीजू कह कर छेड़ती रही। फिर हम सबने विदा ली, और उनको अकेला छोड़ दिया। वापसी की फ्लाइट में सुमन ने पूछा,

“अब हमारी बारी? है न? कब?”
 
सुमन का परिप्रेक्ष्य

मैं कमरे में रखे हुए आईने में अपने प्रतिबिम्ब को निहार रही थी। जो दिखा बहुत ही आश्चर्यचकित करने वाला था। वैसे भी जब कोई लड़की दुल्हन का परिधान धारण करती है, तो वो बिलकुल अलग सी ही लगने लगती है। और, मेरी सबसे प्रिय सहेली भानु ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी मुझको सजाने में... भानु की ही जिद थी कि मैं लहँगा-चोली पहनूँ। रंग भी उसी ने पसंद किया। वैसे तो मैं सब कुछ रूद्र की ही पसंद का पहनना चाहती थी, लेकिन रूद्र चाहते थे कि मैं अपनी ही पसंद का पहनूँ! अब ऐसे में कोई रास्ता कैसे निकलता? इस मतभेद के कारण न तो मेरी, और न ही रूद्र की चली... और मैं अब भानु की पसंद का ही पहन रही थी, और यह हम दोनों को ही आसान लगा।

मैंने रस्ट (जंग लगे लाल) रंग का लहंगा चोली पहना हुआ था – भानु के कहने पर चोली इस प्रकार सिली गयी थी जिसमे से पीठ का लगभग सारा हिस्सा एक गोल से दिखता था। ऐसे में मैं उसके अन्दर कुछ नहीं पहन सकती थी। इसलिए आगे की तरफ स्तनों को संबल देने के लिए पैडिंग लगाई गयी थी।चोली को पीछे की तरफ से बाँधने के लिए ऊपर नीचे डोरी की जोड़ी थी। नंगी पीठ को ढंकने के लिए सर पर उसी रंग की चुनरी थी। लहंगा कुछ कुछ अनारकली टाइप का था। पूरे परिधान पर कुंदन की कारीगरी की गई थी.. इस समय मैं वाकई किसी राजकुमारी जैसी लग रही थी।

ओह! एक मिनट! कहानी एकदम बीच से शुरू हो गयी! शुरू से बताती हूँ... अमर और फरहत की देखा देखी, हमने भी कोर्ट में शादी करने का फैसला किया। रूद्र चाहते थे की कुछ तो धूम धाम होनी चाहिए – दरअसल उनको मन में था की मेरे भी अपनी शादी को लेकर कई सारे अरमान होंगे। लेकिन उस उल्लू को यह नहीं समझ आया की जिस लड़की का अपने अरमानो के रजा के साथ विवाह हो, उसको किसी दिखावे की क्या आवश्यकता? हमने किसी को कुछ घूस इत्यादि नहीं दी – और एक महीने के बाद हमारी भी शादी हो गयी। शादी में मेरे प्रिंसिपल, सारे टीचर, मेरे कई दोस्त, भानु (वो तो मेरी सबसे ख़ास है), रूद्र के ऑफिस के कुछ मित्र, और श्रीमति देवरामनी आमंत्रित और उपस्थित थे। हमने एक दूसरे को वरमाला पहनाई! कोर्ट कचहरी की मारा मारी थी, इसलिए मैंने शलवार कुरता, और रूद्र ने टी-शर्ट और जीन्स पहनी हुई थी। यहाँ से वापस घर जा कर अपने राग रंग वाले परिधाना पहनने का प्लान था।

पिताजी धर्म परायण व संस्कारी व्यक्ति थे। जात, बिरादरी, गाँव, घर, धर्म-कर्म में उनकी गहरी रुचि थी। हमेशा से ही उनके लिए धर्म और रीति-रिवाजों की पालना करना परम कर्तव्य था। यदि वो आज जीवित होते तो क्या सोचते? क्या वो मुझे रूद्र के साथ शादी करने देते? शायद! या शायद नहीं! कुछ कहा नहीं जा सकता! एक ही आदमी को अपनी दोनों बेटियां क्या कोई सौंप सकता है? संभव भी हो सकता है – यदि पिता को मालूम हो की वो आदमी हर तरह से अच्छा है, और उनकी पुत्रियों को प्रेम कर सकता है! मुझे आज उनकी, माँ की, और दीदी की – सबकी रह रह कर याद आती रही। बस, दिल में यह सोच कर दिलासा कर लिया की वो सभी मुझे वहीँ ऊपर, स्वर्ग से आशीर्वाद दे रहे होंगे!

हम सबने एक पांच सितारा होटल में साथ में लंच किया। काफी देर तक गप्पे लड़ाई, और फिर घर आ गए।

सुहागरात आ ही गई। मेरी दूसरी सुहागरात! अपनी बीवी की छोटी बहन के साथ! मन में अजीब सा लग रहा था – एक अजीब सी बेचैनी! एक होता है प्रेम करना – बिना किसी तर्क के, बिना किसी वाद प्रतिवाद के, बिना किसी लाभ हानि के हिसाब के! रश्मि के साथ मैंने प्रेम किया था। सुमन से भी मुझे प्रेम था, लेकिन एक प्रेमी के जैसा नहीं! अभी तक नहीं। वो अभी भी मुझे रश्मि की छोटी बहन ही लगती – वो ही छोटी सी लड़की जो मुझे ‘दाजू’ कह कर बुलाती थी, और फिर जीजू कह कर! अब वही लड़की मुझे पति कह कर बुलाएगी? पति बना हूँ, तो पति धर्म भी निभाना पड़ेगा। रश्मि के साथ मुझे बहुत आत्म-विश्वास था, लेकिन सुमन के बारे में सोच सोच कर ही नर्वस होता जा रहा हूँ!

मुझे नहीं मालूम था की सुमन को सेक्स के बारे में कितना मालूम था। मैंने और रश्मि ने एक बार उसको कर के दिखाया था : उस दिन तो वो बहुत अधिक डर गई थी। उसने हमको कहा भी था, कि वो किसी के साथ भी ऐसे नहीं कर सकेगी! न करे तो ही ठीक है! अपनी से चौदह साल छोटी लड़की के साथ कोई कैसे सेक्स करे भला? लेकिन कुछ भी हो – एक लड़की का संग मिलने का सोच कर एक प्रकार का आनंद तो आ ही रहा था। साथ ही साथ मेरे मन में कई प्रका के सवाल भी उठ रहे थे – अगर सेक्स करने तक बात पहुंची, तो क्या सुमन मेरा लंड ले सकेगी? उसकी योनि कैसी होगी? उसे कितना दर्द होगा? इत्यादि! खैर, इन सब प्रश्नों का उत्तर तो रात के अंक (आलिंगन / आगोश) में समाहित थे – जैसे जैसे रात आगे बढ़ेगी, उत्तर आते जायेंगे!

खैर, अंततः मैं ‘हमारे’ कमरे में दाखिल हुआ। हमारा कमरा भानु, सुमन की दो अन्य सहेलियों – अनन्या और ऋतु, और श्रीमति देवरामनी के निर्देशन में सजाया गया था। कमरा क्या, एक तरह का पुष्प कुटीर लग रहा था! हर तरफ बस फूल ही फूल! दरवाज़ा खुलते ही पुष्पों की प्राकृतिक महक से मन हल्का हो गया। मन में जो सब अपराध बोध सा हो रहा था, अब जाता रहा। फर्श पर फूल, दीवारों पर फूल, बिस्तर पर फूल, खिडकियों पर फूल! पुष्पों की ऐसी बर्बादी देख कर मुझे थोड़ा निराशा तो हुई, लेकिन अच्छा भी लगा। गुलाब, गेंदे, रजनीगंधा, रात रानी और चंपा के पुष्प! मादक सुगंध! बिस्तर के बगल रखी नाईट टेबल पर पानी की बोतल और मिठाई का डब्बा रखा हुआ था। बिस्तर पर सुमन बैठी हुई थी, और अपनी सहेलियों के साथ गुप चुप बातें कर रही थीं!

मुझे देखते ही भानु चहकते हुए बोली, “जीजू मेरे, आइये आइये! आपका खज़ाना आपके इंतज़ार में कब से व्याकुल है!” फिर मेरे एकदम पास आ कर मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोली, “ज़रा सम्हाल के चोदियेगा! बेचारी की चूत एकदम कोरी है!”

भानु को ऐसे नंगेपन औए बेशर्मी से बात करते देख कर मुझे हल्का सा गुस्सा आया। कैसी कैसी लड़कियों से दोस्ती है सुमन की?

“तुझे इतनी फिकर है तो आ, पहले तुझे ही निबटा दूं?”

लेकिन मुझे उसकी बेशर्मी का ज्ञान नहीं था। मेरी बात सुनते ही वो तपाक से बोली, “आय हाय जीजा जी, आपकी बीवी बिस्तर पर बैठी है, और आप उसकी सहेली की मारना चाहते हैं! वैरी बैड!! पहले उसकी सील तो खोल दीजिए... जब आप बाहर निकलेंगे, तो मैं भी ‘खोल’ कर रखूंगी! ही ही ही!”

भानु की गन्दी बातों से मूड ऑफ हो गया!

“कैसी बेहया लड़की है तू?”

“जीजू! आपकी साली हूँ! हमारे रिश्ते में छेड़खानी करने का बनता है न?” मेरी डांट के डर से उसका चहकना कुछ कम तो हुआ। मुझे भी लगा की आज के दिन किसी को डांटना नहीं चाहिए।

“सॉरी!” मैं बस इतना ही कह पाया।

“सॉरी से काम नहीं चलेगा! सुमन की हम सब रखवाली हैं.. रोकड़ा निकालिए, रोकड़ा... तब अन्दर जाने को मिलेगा! ऐसा थोड़े ही है की कोर्ट में शादी कर लोगे, तो हमको हमारी नेग नहीं मिलेगी! क्यों लड़कियों?”

अन्दर से सभी लड़कियों ने एक स्वर में भानु की इस बात का समर्थन किया। मैंने कुछ देर तक उन सबको छेड़ा और विरोध किया – लेकिन फिर उन तीनो को हज़ार हज़ार रुपए पकड़ाए और,

“चल .. दफा हो!” कह कर मैंने उनको कमरे से बाहर निकाल दिया।

"हाँ हाँ! जाइए जाइए.. अपने कबाब को खाइए.. हमारी क्या वैल्यू!!" कह कर वो ठुनकते हुए बाहर चली गयी। बाकी दोनों भी उसके पीछे पीछे मुस्कुराते हुए हो ली। मैं कुछ करता, उसके पहले ही मेरे पीछे उन दोनों में से किसी ने दरवाज़ा बंद कर लिया। मैं धीरे धीरे चलते हुआ जब बिस्तर के निकट, सुमन के पास पहुंचा, तो उसने बिस्तर से उठ कर मेरे पैर छूने की कोशिश करी। मैंने उसको कंधे से पकड़ कर रोक लिया,

“नीलू, हम दोनों पति पत्नी हैं – मतलब दोनों बराबर हैं!”

“लेकिन आप तो मुझसे बड़े हैं न...”

“शादी में दोनों बराबर होते हैं!”

“लेकिन आप तो..”

“अगर तुम मुझसे बड़ी होती, तो क्या मुझे भी तुम्हारे पैर छूने पड़ते?”

उसने तुरंत न में सर हिलाया।

“इसी लिए कह रहा हूँ, कि हम दोनों बराबर हैं! तुम्हारी जगह मेरे दिल में है! आओ इधर..”

कह कर मैंने उसको अपने गले से लगा लिया। उसको इस तरह से गले से लगाने से मुझे पहली बार उसके स्तनों का आभास हुआ – कैसे ठोस गोलार्द्ध! अचानक ही मन की इच्छाएँ जागृत हो गईं!

मैंने उसको वापस बिस्तर पर बैठाया, और उसके पास ही बैठ गया।

“देखने दो मेरी छोटी सी दुल्हनिया को!”

मेरी बात पर सुमन मुस्कुराई। सचमुच सुमन बेहद सुन्दर लग रही थी। साधारण सा मेकअप किया गया था – लेकिन उसका परिणाम जबरदस्त था! उसकी सुन्दर लाल रंग की, बूते लगी लहंगा चोली, माथे पर बेंदी, नाक में नथ, कानो में मैचिंग बालियाँ, और गले में स्वर्ण-माला! माथे पर छोटी सी लाल रंग की बिंदी, और होंठों पर उसी रंग की लाली! कुल मिला कर एक बहुत की सुन्दर कन्या! उसके कजरारे बड़े बड़े नयन! और मुस्कुराता हुआ चेहरा.. जैसा मैंने पहले भी कहा है, भारतीय दुल्हनें, साक्षात रति का रूप होती हैं! न जाने कैसे मुझे ऐसी दो दो रतियों का साथ मिला! ऐसी लड़की पर तो स्वयं कामदेव का भी दिल आ जाय!!

उसका एक हाथ देख कर मैंने कहा,

“अरे वाह! ये मेहंदी तो बहुत सुन्दर रची है...”

“आपको अच्छी लगी?”

“बहुत!” कह कर मैंने कुछ देर ध्यान से उसकी मेहंदी की डिज़ाइन देखी... जैसे की अक्सर होता है, दुल्हनो की मेहंदी में पति का नाम भी लिखते हैं.. कुछ देर की मशक्कत के बाद मुझे अपना नाम लिखा हुआ दिख गया!

“अरे वाह! यहाँ तो मेरा नाम भी लिखा हुआ है!”

सुमन हौले से मुस्कुराई।

“और भी कहीं लगवाई है मेहंदी?”

“हाँ! पांव पर भी..” कह कर उसने अपना पांव आगे बढ़ाया। पांव और आधी टांग पर मेहंदी सजी हुई थी। कुछ देर वहां की डिज़ाइन का निरीक्षण करने के बाद मुझे लगा कि अब चांस लेना चाहिए।

“यहाँ नहीं लगवाया?” मैंने उसके स्तनों की तरफ इशारा किया। पति पत्नी के बीच तो ऐसे न जाने कितने ही अनगिनत छेड़खानियाँ होती हैं, लेकिन मुझे ऐसे बोलते हुए कुछ अप्राकृतिक सा लगा।

मेरी बात पर सुमन बुरी तरह शर्मा गयी, और न में सर हिलाया।

“ऐसे कैसे मान लूं? आओ.. देखूं तो ज़रा..” कह कर मैंने उसके सर से चुनरी अलग कर दी। चोली के कोमल कपडे से ढके उसके युवा स्तनों का आकार दिखने लगा।

“यह ब्लाउज का कपड़ा बहुत कोमल है.. लेकिन, यहाँ (उसके स्तनों की तरफ इशारा करते हुए) से अधिक यह यहाँ (बिस्तर के किनारे की तरफ इशारा करते हुए) ज्यादा अच्छा लगेगा!”

वो शर्म से मुस्कुराई।

“आपको एक बात मालूम है?” उसने अचानक ही कहा।

“क्या?”

“ब्लाउज उतारने से पहले, बीवी को कुछ पहनाना भी होता है?”

अरे हाँ! वो मुँह-दिखाई की रस्में! कैसे भूल गया! मुझे तो एक्सपीरियंस भी है!

“ओह हाँ! याद आया.. एक मिनट!”

कह कर मैं उठा, और अलमारी की तरफ जा कर, सेफ के अन्दर से एक जड़ाऊ हीरों का हार निकाला। यह हार ऐसा बना हुआ था जैसे की दो मोर पक्षी अपनी गर्दनों से आपस में छू रहे थे, और उनके पंख विपरीत दिशा में दूर तक फैले हुए थे। मोर के ही रंग की मीनाकारी की गई थी। यह मैंने स्पेशल आर्डर दे कर सुमन के लिए बनवाया था। मेरे हिसाब से एक नायाब उपहार था। उम्मीद थी, की उसको यह ज़रूर पसंद आएगा।

मैं मुस्कुराते हुए सुमन के पास आया, और उसके सामने एकदम नाटकीय तरीके से वो हार प्रस्तुत किया,

“टेन टेना!”

उसको देख कर सुमन की आँखें विस्मय से फ़ैल गईं।

“ये क्या है?? बाप रे!”

“ये है.. आपको पहनाने के लिए.. पहना दूं?”

“ल्ल्लेकिन.. मेरा ये मतलब नहीं था...”

“मतलब? मैं समझा नहीं..”

“आपने अभी तक सिन्दूर नहीं डाला! और मंगलसूत्र...” उसकी आँखें कुछ नम सी हो गईं।

हे देव! ये तो गुनाहे अज़ीम हो गया मुझसे! एकदम से मेरी भी बोलती बंद हो गई। मैंने जल्दी से इधर उधर देखा – सिन्दूर दान तो बगल टेबल पर दिख गया। मैंने उसको उठाया। वो सौ ग्राम का डब्बा कितना भारी प्रतीत हो रहा था उस समय, मैं यह बयां नहीं कर सकता। कोर्ट में एक दूसरे को वरमाला पहनाना, और यहाँ पर उसकी मांग में सिन्दूर डालना – दो बिलकुल भिन्न बातें थीं। सुमन की मांग को भरते समय मुझे अचानक ही नई जिम्मेदारी का भान होने लगा। ऐसा नहीं की कोर्ट की शादी का कोई कम मायने है.. लेकिन सिन्दूर जैसी परम्पराएँ बहुत गंभीर होती हैं। मैंने देखा की सुमन के होंठ भावनाओं के आवेश में कांप रहे थे।

“मंगल...” उसने इशारा कर के टेबल की दराज खोलने को कहा। बात पूरी नहीं निकली। लेकिन मैं समझ गया।

मैंने दराज खिसकाई तो उसमें छोटे छोटे काले मोतियों से सजा सोने का मंगलसूत्र दिखा। सच कहूं, यह मेरे लाये गए हार से कहीं अधिक सुन्दर था। सरल, सादी चीज़ों का अपना अलग ही आकर्षण होता है। मेरे खुद के हाथ अब तक हलके से कांपने लग गए थे। मैंने सुमन को मंगलसूत्र भी पहना दिया – हाँ, अब हो गयी वो पूरी तरह से मेरी पत्नी!

“अब आपको जो मन करे, उतार लीजिए!” उसने आँखें नीची किये हुआ कहा।

मुझे यकीन नहीं हुआ जब उसने ऐसा कहा।

“सच में?”

अब वो बेचारी क्या कहती? मैं भी क्या ही करता? ऐसी सुन्दर, अप्सरा जैसी पत्नी अगर मिल जाय, तो कोई कैसे खुद पर काबू रखे? इतना तो समझ आ रहा था कि उसकी चोली पीछे से खुलेगी। लेकिन मैं अपना नाटक कुछ देर और करना चाहता था। और मैंने बटन ढूँढने के बहाने उसकी चोली के सामने की तरफ कुछ देर तक पकड़म पकड़ाई करी। वैसे, सुमन को इस प्रकार से छेड़ने में मुझे अभी भी सहजता नहीं आई!! फरहत के साथ तो आराम से हो गया था.... फिर अभी क्यों..?

उधर, सुमन की हालत देख कर लग रहा था की उसका इतने में ही दम निकल जाएगा। उसने न जाने कैसे कहा,

“प प प्प्पीछे से...”

हाँ! पीछे से ही डोरी खुलनी थी। चोली की डोर पीछे से चोलने के दो तरीके हैं – या तो लड़की की पीठ को अपने सामने कर दो, या फिर लड़की के सामने से चिपका कर! मैंने दूसरा रास्ता ठीक समझा, और सुमन से चिपक कर उसकी चोली की डोर खोलने का उपक्रम शुरू किया। दो गांठें खोलने में कितना ही समय लगता है? झट-पट सुमन की पीठ नंगी हो गई। लेकिन मैंने आगे जो किया, उससे सुमन भी आश्चर्यचकित हो गई होगी – मैं पहले ही उससे चिपका हुआ था, और फिर उसी अवस्था में मैंने सुमन को जोर से अपने सीने से लगाया। ऐसा करते ही अचानक ही मेरे अन्दर प्रेम की भावना बलवती हो गई – मैंने कहा प्रेम की, न की भोग की! मैंने सुमन को दिल से धन्यवाद किया – हर काम के लिए, जो उसने मेरे लिए किया था।
 
मैंने उससे यह भी कहा कि यह सब मेरे लिए बहुत नया था। न केवल वो मुझसे काफी छोटी थी, बल्कि मेरे मन में उसकी जो तस्वीर थी, वो अभी भी एक छोटी लड़की के जैसे ही थी। सुमन संभवतः कुछ प्रतिवाद करना चाहती थी, लेकिन जब मैंने कहा कि अगर वो मुझे कुछ समय दे, और कुछ धैर्य से काम ले तो वो संयत हो गयी – कुछ निराश सी, लेकिन संयत। मुझे साफ़ लग रहा था की वो कुछ निराश तो है। इसलिए मैंने उससे कहा,

“नीलू, प्लीज तुम बुरा मत मानो! न जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है जैसे रश्मि अभी यहाँ दरवाज़े पर आ खड़ी होगी। न जाने क्यों ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों उसकी पीठ पीछे चोरी कर रहे हैं..”

सुमन को मेरी बात और मेरी चिंता का सबब समझ में आ गया। उसने कहा,

“आपको ऐसा क्यों लग रहा है? ... मेरी तरफ देखिए... मुझे भी आज दिन में कोर्ट में ऐसे ही लग रहा था .. जैसे माँ, पापा और दीदी हमको वहां ऊपर से देख रहे हों! लेकिन, मुझे ऐसे नहीं लगा की वो हमारी शादी पर बुरा मानेंगे! हम दोनों ने एक दूसरे से शादी करी है। चोरी नहीं! दीदी के जाने के बाद आपने जो दुःख झेले हैं, वो मुझसे छुपे हैं क्या? मुझे यकीन है, की दीदी का, और माँ पापा का आशीर्वाद हमको ज़रूर मिलेगा!”

कह कर उसने मुझे जोर से अपने गले से लगा लिया। कुछ देर मुझसे ऐसे ही चिपके रहने के बाद, मुझे पकडे हुए ही उसने कहा,

“आप मुझे किस नहीं करेंगे?”

ओह भगवान! क्यों नहीं! मैंने सुमन की नथ उतारी, और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ रखे - सुमन के होंठ बहुत ही नरम थे, और सच मानिए, गुलाब के फूल की तरह ही महक रहे थे। मैंने उसके होंठों पर एक एक एक एक कर के कई सारे चुम्बन जड़ दिए, और फिर उनको चूसना भी शुरू किया। कुछ ही देर में उसके होंठों की लाली, मेरे होंठों पर भी लग गयी। सुमन तो बिलकुल अनाड़ी थी, लेकिन अपनी तरफ से कोशिश कर रही थी। उसके चुम्बन पर मुझे बहुत आनंद आ रहा था। कुछ ही देर में हमारा चुम्बन, एक आत्म-चुम्बन (या फ्रेंच किस कह लीजिए) में तब्दील हो गया – हमारी जिह्वाएं आपस में मल्ल-युद्ध लड़ने लगीं। मुझे बहुत मज़ा आ रहा था – और मूड भी बनने लगा था।

मैंने चोली के ऊपर से ही अपने हाथ को उसके सीने पर फिराया, और फिर उसके एक स्तन को पकड़ कर दबाने लगा। उसका चूचक पहले से ही मुस्तैद खड़ा हुआ था। याद रहे, मैंने सुमन की चोली उतारी नहीं थी, बस, उसकी पीछे की दोनों डोरियाँ खोल दी थीं – इससे चोली के सामने के कप ढीले हो गए थे। एक तरह से सुमन के स्तन अब स्वतंत्र हो गए थे।

मैंने कुछ देर के लिए सुमन को चूमना छोड़ा, और कहा,

“बिल्वस्तनी, कोमलिता, सुशीला, सुगंध युक्ता ललिता च गौरी... ना श्लेषिता येन च कण्ठदेशे, वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम्।“

कुछ क्षणों तक सुमन ने मुझे कौतूहल भरी दृष्टि से देखा – उसको कुछ समझ नहीं आया।

उसने कहा, “अब इसका मतलब भी बता दीजिए?”

“हा हा! देवलोक की अप्सरा रम्भा के बारे में तो सुना ही होगा?”

सुमन ने मुस्कुराते हुए हर हिलाया।

“तो रम्भा, और शुकदेव, महर्षि वेदव्यास के पुत्र थे.. एक बार की बात है... दोनों के बीच एक लम्भी चौड़ी बहस होने लगी की किसके जीवन का तरीका श्रेष्ठ है। दोनों ही अपने तरीके को श्रेष्ठ, और दूसरे के जीवन को व्यर्थ बता रहे थे! रम्भा, क्योंकि अप्सरा है, इसलिए कहती है की भोग के बगैर जीवन व्यर्थ है! शुकदेव कहते हैं कि योग और वैराग्य बिना जीवन व्यर्थ है! एक वैरागी क्या जाने नारी के सान्निध्य का बल? वो काफी देर तक कुतर्क तो करते हैं, लेकिन रम्भा के तर्क कहीं भारी पड़ते हैं। वो कहती है, की नारी के सहयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं है! समस्त तपों का आधार स्वयं नारी ही है। विवाद का हल तो कुछ निकला नहीं, लेकिन अंत में शुकदेव नारी को पत्नी के रूप में रखने की अनुमति दे देते हैं!”

“इंटरेस्टिंग! .. लेकिन उसका – जो आपने कहा – का मतलब क्या था?”

“हां! वो तो बताना ही भूल गया – रम्भा कहती है की बेल के फलों के समान कठोर स्तनों वाली, लेकिन अत्यंत कोमल शरीर वाली, सुशील स्वभाव वाली, महकते केशों वाली, और जिसको देखने से लालच आ जाय – ऐसी सुन्दर स्त्री का जिसने आलिंगन नहीं किया, उसका जीवन तो बिलकुल बेकार है!”

सुमन शर्माते हुए मुस्कुराई,

“तो..? आपका जीवन बेकार है, या...”

“ये तो इन बेलों की कठोरता पर डिपेंड करता है.. है न?”

मैंने आँख मारते हुए कहा, “जाँचा जाए?”

उसने कोई उत्तर नहीं दिया, तो मैंने चोली के ऊपर से ही उसके दोनों स्तनों को थाम लिया। सुमन की स्वतः प्रतिक्रिया पीछे हटने की थी, लेकिन उसने स्वयं को रोका। लेकिन, आज पहली बार मेरे हाथों के स्पर्श को अपने स्तनों पर महसूस करके उसको भी अच्छा लग रहा था। मैंने मन ही मन उसके और रश्मि के स्तनों की तुलना करी – सुमन के स्तन रश्मि के स्तनों से बस कुछ ही बड़े थे। छूने से समझ आया कि वाकई दोनों एकदम गोल और ठोस थे! मन तो उसके स्तनों की बनावट, तापमान और छुवन को अपने हाथों में महसूस करने का था, इसलिए कपड़े के ऊपर से मज़ा कम आ रहा था।

“नीलू, ये तो बढ़िया साइज़ के हो गए हैं!”

“आपको पसंद आये?” उसने धीमे से, शर्माते हुए पूछा।

“बहुत ज्यादा! अब खोल के दिखा दो न?”

“मैंने आपको कब रोका? मेरा सब कुछ आपका है..”

उसका इशारा पा कर मैंने उसकी चोली के सिरे को दोनों कंधे से पकड़ कर सामने की तरफ खींचा – स्तन तुरंत स्वतंत्र हो गए! जैसा सोचा था, ये दोनों वो उससे भी कई कई गुना सुन्दर निकले! बिलकुल युवा, गोल और ठोस स्तन – गुरुत्व के प्रभाव से पूरी तरह अछूते! गोरे गोरे चिकने गोलार्द्ध।

आपने कभी लाल गुड़हल की कली देखी है? खिले से कोई दो घंटा पहले वो कली एक इंच के आस पास लम्बी होती है, और बेलनाकार होती है। इसी समय कली के बीच में से योनि-छत्र (पुष्प का मादा भाग) निकल रहा होता है। ठीक इसी प्रकार के चूचक थे मेरी नीलू के!

उत्तेजनावश कोई पौना इंच तक लम्बे हो गए थे। उनका रंग लाल-भूरा था – रश्मि के समान ही! अरेओला और चूचक के रंग में कोई ख़ास फर्क नहीं था। अरेओला पर छोटे छोटे दाने जैसे उठे हुए थे – ठीक वैसे ही जैसे गुड़हल के फूल का योनि-छत्र!

“ओह गॉड!” मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल गया, “कहाँ छुपा कर रखा था तुमने इनको अभी तक?”

मेरी बात पर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं! उसके होंठो पर एक मद्धिम मुस्कान थी। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने दोनों ही स्तनों पर बारी बारी से (बिना हाथ लगाए) कई सारे चुम्बन जड़ने शुरू कर दिए। कोई दो तीन मिनट तक उसको ऐसे ही छेड़ता रहा। लेकिन मैं कब तक यह करता? मजबूर हो कर मैंने एक निप्पल को अपने मुँह में भर लिया, और तन्मय हो कर चूसने लगा। उसको मन भर कर चूसा, चुभलाया, काटा, और चबाया! मेरी हरकतों पर सुमन उह और सी सी जैसी आवाजें निकालने लगी। फिर मैंने दूसरे के साथ भी यही किया।

इसी समय मेरे साथ वो हुआ, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं करी थी – मेरे लिंग से वीर्य निकल पड़ा! मुझे घोर आश्चर्य हुआ! ऐसा कैसे हो गया? मैं तो खुद को लम्बी रेस का घोड़ा मानता था, जो कभी रुकता ही नहीं था! खैर, वीर्य निकलने पर भी लिंग का कड़ापन कम नहीं हुआ – यह अच्छी बात थी। न जाने सुमन का क्या हाल होगा?

स्तनों को छोड़ कर मैंने कुछ देर तक उसके पेट और नाभि को चूमा और जीभ की नोक से चाटा। साथ ही साथ मैंने उसके लहँगे का नाड़ा भी चुपके से खोल दिया।

“नीलू रानी!” मैंने कामुक और फटी हुई आवाज़ में कहा, “अब अपने पति को अपना दिव्य रूप दिखाने का समय हो गया है!”

मेरी इस बात पर वो अचानक ही गंभीर हो गई – यह वह समय था, जिसकी वो अभी तक बस कल्पना ही कर रही थी। उसने अपने होंठों पर बेचैनी से जीभ फिराई और फिर अपने लहँगे को कमर पर पकड़े हुए बिस्तर से नीचे उतर गई। कैसी नासमझ है ये लड़की? ‘दिव्य रूप’ दिखाने को बोला था न! फिर भी लहँगा पकडे हुए है! लगता है ये चीर हरण भी मुझे ही करना पड़ेगा!

कुछ भी हो, मैंने जल्दबाज़ी बिलकुल भी नहीं करी। उससे भला क्या लाभ? बीवी तो अपनी ही है – कहीं भागी थोड़े ही जा रही है!! मैंने उसकी कमर को पकड़ कर अपने नजदीक बुलाया, और उसके अर्धनग्न शरीर का अपनी आँखों से आस्वादन करने लगा। सुमन ने देख की मैं क्या कर रहा हूँ – इस पर वो शरमा कर नीचे की तरह देखने लगी। मैंने कुछ देर खेलने और छेड़ने की सोची। उसका जूड़ा बंधा हुआ था – सामान्य सा था – कोई बहुत जटिल बंदोबस्त नहीं था। मैंने उसमे से गजरा निकाला, और उसके बालों को खोल कर बिखेर दिया। अब उसकी मूरत देखते बन रही थी – एक अत्यंत सुन्दर, अप्सरा जैसी कमसिन लड़की, अपना लहँगा पकडे मेरे सामने अर्धनग्न खड़ी हुई थी – उसकी साँसे तेजी से चल रही थीं, और उनके साथ ही उसके उन्नत स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे, बाल खुल कर आवारा हो रहे थे... शरीर का रंग ऐसा जैसे किसी ने संगमरमर में मूंगे का रंग मिला दिया हो! जैसे दूध में केसर मिल गया हो!

वह एक अतिसुन्दर प्रतिमा जैसी लग रही थी। और मुझे ऐसे लुभा रही थी, की जैसे मुझे बुला रही हो!

अब मुझे खुद पर वाकई संयम नहीं रहा। मैं उसको कमर से पकड़ कर धीरे धीरे अपनी तरफ खींचा, और उसके दोनों हाथों को उसके लहँगे से हटाने का प्रयास करने लगा। उसके हाथ ठन्डे हो गए थे। यह सब होना तो आज की रात अवश्यम्भावी था – यह उसको भी मालूम था, और मुझे भी! लेकिन इस संज्ञान में भी सब कुछ नया था। मैं तो खेला खाया दुरुस्त हूँ, फिर भी सब कुछ नया सा लग रहा था। एकदम से उसका हाथ अपने लहँगे के सिरे से हट गया। मुझे उम्मीद थी कि गुरुत्वाकर्षण स्वयं ही उसको नीचे सरका देगा – लेकिन हो सकता है की उसका नाड़ा पूरी तरह से ढीला नहीं हुआ था, या यह की लहंगा उसकी कमर के बल पर अटक गया हो!

मैंने खुद ही लहँगे को नीचे खिसकाना शुरू किया – लेकिन ऐसे नहीं की सुमन तुरंत नंगी हो जाए। मैं उसको अभी कुछ देर और छेड़ना चाहता था। मैंने लहँगे को थामे हुए ही सुमन को घुमा कर उसकी पीठ को अपने सामने कर दिया। उसकी पीठ भी उसके शरीर के बाकी हिस्से के समान ही सुन्दर, और निर्दोष थी! नितम्बों के ऊपर मेरु के दोनों तरफ छोटे छोटे डिंपल थे, जिनको अंग्रेजी में डिंपल ऑफ़ वीनस कहते हैं। और नीचे की तरफ उसके गोरे, चिकने नितम्बों का ऊपरी हिस्सा और उनके बीच की अँधेरी दरार दिख रही थी।
 
मैंने धीरे से उसके नितम्बों पर चूम लिया, और अपनी जीभ को उसकी दरार पर फिराया। मजा आया और रोमांच भी! सुमन सच में एक जवान कली थी, और उस पर अभी जवानी का पूरा रंग चढ़ना बाकी था। लेकिन फिर भी उसके शरीर में रस भरा हुआ था – जैसे फूलों में सार भरा हुआ होता है! वैसा ही! उस रस का मद मुझ पर चढ़ गया था – मेरे हाथ से उसका लहँगा छूट गया।

सुमन ने नीचे भी कुछ नहीं पहना हुआ था – कोई अधोवस्त्र नहीं! सच में! क्यों झंझट करना? एकदम से उसके सुडौल, विकसित, गोर गोर गोल नितम्ब मेरी आँखों के सामने प्रस्तुत हो गए। सच में मुझसे रहा नहीं गया! मैंने अपने पूरे मुँह और चेहरे का प्रयोग करते हुए उसके नितम्बों का भोग लगाना आरम्भ कर दिया! उनका चुम्बन, चूषण और लेहन करते समय कब वो घूम कर मेरी तरफ हो गई, उसका ध्यान नहीं रहा। लेकिन जब मांसल गुम्बजों के बजाय मेरे सामने दो मीठे मालपुए आ गए तब समझ आया की सुमन अब मेरी तरफ मुखातिब है।

सुमन की योनि के दोनों होंठ फूले हुए थे – जैसा मैंने पहले भी कहा, मीठे मीठे मालपुओं के समान (जो ऊपर नीचे रखे हुए थे)! उन होंठों पर कोई बाल नहीं था – एकदम चिकनी। और उनमें से रस तो जैसे बाँध छोड़ कर निकल रहा था। सच में, अब तो बस एक ही काम बाकी था। मैं भी उस काम में अब देर नहीं लगाना चाहता था।

मैंने सुमन की योनि के दोनों फूले हुए पटों के बीच एक जोरदार चुम्बन जड़ा, और उसको चूमने लग गया। कुछ देर चूमने के बाद मैंने उसके पटों को उँगलियों की मदद से कुछ फैलाया, और जीभ डाल कर चूसने लगा। मीठा रस! सच में! जैसे किसी ने उसकी योनि रस में हल्का सा शहद मिला दिया हो!

“कठोर पीनस्तन भारनम्रा सुमध्यमा चंचल खंजनाक्षी, हेमन्तकाले रमिता न येन, वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम्..”

सुमन अभी मुझसे इस श्लोक का अर्थ पूछने की हालत में नहीं थी, इसलिए मैंने खुद ही बताना शुरू कर दिया, “हेमंत ऋतु में, ठोस और भरे हुए स्तनों के भार से झुकी हुई, पतली कमर वाली, चंचल और धारदार चाकू जैसी नैनों वाली स्त्री से जिस किसी पुरुष ने संभोग नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ ही चला गया..”

“त..तो करिए न...”

मैं मुस्कुराया। मैंने सुमन को बिस्तर पर लिटाया। सिर्फ आभूषण, चूड़ियाँ, पायल इत्यादि पहने हुए वो बहुत प्यारी लग रही थी। कोई भी स्त्री लगेगी! सच में। मेरी बात का यकीन न हो, तो अपनी पत्नियों या प्रेमिकाओं को पूर्णतया नग्न होने को कहिए, लेकिन वो अपने गहने इत्यादि पहने रहें! फिर बताइयेगा!

जब वो लेट गई, तब मैंने अपने कपड़े भी उतारने शुरू किए – एक मिनट के अंदर ही मैं भी तैयार था। सुमन एक टक मेरे लिंग को ताक रही थी।

“नीलू रानी, सिर्फ देखो ही नहीं, इसको छू भी सकती हो! इसके साथ खेल भी सकती हो! अब से यह तुम्हारा है.. और सिर्फ तुम्हारी ही सेवा करेगा!” मैंने उसको छेड़ा, “.. लाओ अपना हाथ.. इसे महसूस करो..”

कह कर मैंने उसके हाथ में अपना लिंग पकड़ा दिया। रक्तचाप के कारण लिंग पूरी तरह से तना हुआ था, और तप रहा था। वो तो जैस जड़ हो गई – बस लिंग को हाथ में पकडे हुए हतप्रभ सी देख रही थी। मैंने उसके हाथ को अपने लिंग पर पीछे की तरफ सरकाया। ऐसा करने से उसकी चमड़ी पीछे की तरफ खिंच गयी, और लाल गुलाबी सुपाड़ा भी उसको दिखने लगा। जो वीर्य निकला हुआ था, उसका कुछ शेष अभी भी बूंदों के रूप में बाहर निकल रहा था।

“कुछ बोलो भी...”

“अभी.. तो... बस...”

“हाँ हाँ.. बोलो न?”

“बस.. सेवा कीजिए..” उसने शरमाते हुए कहा।

“जो आज्ञा देवी!” कह कर मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। सुमन मुस्कुरा दी। पति-पत्नी में सबसे पहला महत्वपूर्ण कार्य है उन दोनों का संयोग! दोनों का मिलन! अब हम दोनों के मन की यही इच्छा थी।

मैंने उसको बिस्तर से उठाया, आयर अपनी गोद में ले कर बिस्तर पर बैठ गया। सुमन मेरी गोद में ही अपनी टाँगे दोनों तरफ लिए बैठी हुई थी। रक्त-चाप के कारण मेरा लिंग बार बार झटके लेता, और उसकी योनि का चुम्बन लेता! मैंने उसको अपनी बाहों में ले कर एक गहरा सा चुम्बन लिया। सुमन कामुकता की सीमा पर खड़ी हुई थी। उसके रस भरे, और महकते हुए होंठों का स्वाद स्वयं को भुला देने वाला था। सुमन भी मुझसे पूरी तरह से लिपट गयी थी – उसके दहकते स्तन मेरे सीने पर चुभ रहे थे।

अब हम दोनों ही अपने काबू में नहीं थे। ऐसे आलिंगन में बंधे हुए हम दोनों को एक दूसरे के शरीर का पूरी तरह से संज्ञान हो रहा था। हम दोनों ही अब तैयार थे। मैंने सुमन की गर्दन पर चुम्बन लिया – जैसे ही मैंने उसकी गर्दन पर जीभ फिराई, वो तड़पने लगी। स्त्री का शरीर पूरी तरह से काम से भरा हुआ होता है। कहीं भी छू लो, कहीं भी चूम लो.. लगभग एक जैसा ही परिणाम आता है। कुछ देर उसकी ग्रीवा चूमने के बाद मैंने जैसे ही उसकी कानों की लोलकी को अपने मुँह में लिया, वह अपने काबू में नहीं रही। उसका हाथ अनायास ही मेरे लिंग पर आ गया, और उसे सहलाने लगा।

इतना इशारा काफी था। हम दोनों ही कुछ देर में पागलों की तरह एक दूसरे के शरीर के अंगों को सहला, छू और मसल रहे थे। मैंने पुनः अपनी जीभ उसके एक स्तन के चूचक पर फिराया – सुमन अब निर्लज्ज हो कर जोरों से सीत्कार करने लगी। अगर बाहर कोई जाग रहा होगा, तो उसको सुमन की कामोत्तेजक आवाजें सुनाई दे रही होंगी! वैसे इससे क्या फर्क पड़ता है? अगर यह सब आज नहीं, तो कब होगा? उसने मेरा लिंग पकड़ लिया, और उसको सहलाने लगी।

मैं भी एक चंचल बच्चे की भांति कभी तो उसका बाएँ स्तन का भोग लगाता, तो कभी दाएँ स्तन का! हम सब पुरुष, और काफी सारी स्त्रियाँ भी, इस बात से सहमत होंगे की एक युवा स्त्री के स्तन, इस पूरे संसार के सबसे स्वादिष्ट, सबसे मीठे फल होते हैं! भले ही आम को फलों का राजा माने, लेकिन एक स्त्री के उन्नत आमों के सामने उनका स्वाद फीका ही है! मैं पुनः सुमन के स्तन रुपी आमों का रसास्वादन करने लगा। इतने में सुमन पुनः स्खलित हो गयी।

मुझे समझ आया की उसके साथ क्या हो रहा है – ऐसे में मैं उसको अपनी गोद में ही लिए चूमता रहा, जब तक वो अपने काम के ज्वार से नीचे नहीं उतर गयी। कुछ देर सुस्ताने के बाद मैंने उसको वापस नीचे, बिस्तर पर लिटाया। सुमन की साँसे अभी भी गहरी गहरी चल रही थीं। मैं उसको लिटा कर नीचे की तरफ खिसक आया।

मैंने उसकी टाँगे कुछ फैलाईं जिससे उसकी योनि का अभिगम कुछ आसान हो सके। उसकी योनि तो अब तक न जाने कितना सारा रस निकाल चुकी थी – वहां का गीलापन साफ़ दिख रहा था। इसके बाद मैं उसकी मालपुए के सामान मीठी, रसीली और मुलायम योनि का रसास्वादन करने लगा। मैंने अपनी जीभ उसकी नर्म गर्म योनि में प्रवेश कराया – सुमन किसी जानवर की तरह भर्राती गुर्राती हुई कराह निकालने लगी। मैंने अपनी जीभ को उसमें जल्दी जल्दी अंदर बाहर कर के उसके आगे आने वाले प्रोग्राम के बारे में अवगत कराया। सुमन तो आज जैसे वासना रुपी परमाणु बम के भण्डार पर बैठी हुई थी – एक के बाद एक चरमोत्कर्ष प्राप्त कर रही थी। कुछ ही देर में अनवरत जिह्वा-मैथुन के बाद, सुमन पुनः कांपते, कराहते आहें भरने लगी। मुझे अपने मुँह में पुनः गर्म द्रव का अनुभव हुआ। मैं समझ गया कि सुमन फिर से स्खलित हो गई है।

उसको मैंने कुछ देर आराम करने दिया। मुझे खुद पर भी नियंत्रण नहीं था। इतना देर भला कब तक चलता? मेरे अन्दर का लावा भी ब्नाहर निकलने को उद्धत था। मैं अंततः उसके ऊपर आ गया। मैंने लिंग को उसकी योनि मुझ पर टिकाया और एक धक्के से उसकी योनि में प्रवेश करा दिया। सुमन की कोरी, कुँवारी योनि बहुत छोटी भी थी। धक्के के कारण मेरा करीब दो इंच लिंग उसकी योनि में प्रवेश कर गया – लेकिन उधर उसकी चीख निकल पड़ी। गलती यह हुई की मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ नहीं रखे। अब तक तो सभी को मालूम हो गया होगा, की सुमन अब लड़की नहीं रही!

मैंने उसको दो तीन चुम्बन दिए, और उसके गालों को सहलाते हुए बोला, “शाबाश नीलू! बस.. अब हो गया! वेलकम टू वुमनहुड! बस.. कुछ ही देर में सब ठीक हो जाएगा! ओके हनी? अभी मज़ा आने लगेगा! बाकी अन्दर जाने दो! डोंट रेसिस्ट! अब और तकलीफ़ नहीं होगी। ठीक है?”

सुमन ने सर हिला कर जवाब दिया।

मैंने आगे कहा, “अगर दर्द हो, तो बता देना! ओके हनी?”

उसने फिर से सर हिलाया। मैंने हल्का सा बाहर निकाल कर पुनः अन्दर की तरफ धक्का लगाया – उसको पुनः दर्द हुआ, लेकिन उसने किसी तरह से दर्द को ज़ब्त कर लिया। इस धक्के का परिणाम यह हुआ की अब बस एक डेढ़ इंच ही बाहर निकला हुआ था। मैंने नीचे की तरफ देखा, और फिर वापस सुमन को बोला,

“देख नीलू... सब अन्दर हो गया.. देख न?”

सुमन ने बड़ी कठिनाई से नीचे भौंचक्क रह गई।

“ब्ब्ब्बाप रे! अआआपने इसकी शकल बिगाड़ दी! उफ़...” मैंने लिंग को बाहर खींचा।
 

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