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घुड़दौड़ ( कायाकल्प ) complete

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सरप्राइज! हा हा! रूद्र के साथ तो हर पल ही सरप्राइज है! एक घंटा? हम्म.. बस इतना समय है की नहा कर, कपड़े बदले जा सकें। नहा कर मैं अपने कमरे में आई, और सोचने लगी की क्या पहना जाय! मेरे जन्मदिन पर रूद्र ने एक लाल रंग की ड्रेस मुझे गिफ्ट करी थी, वो घुटने से बस ठीक नीचे तक जाती थी.. अभी तक पहनने का मौका नहीं मिला था, तो सोचा की आज तो एकदम सही समय है। मैं ड्रेस पहनी, अपने बालों को एक पोनीटेल में बाँधा, गले में एक छोटे छोटे मोतियों की माला पहनी और तैयार हो गयी।

मैं कभी यह नहीं सोचती की मैं कैसी दिखती हूँ – मेरे पति मुझे आकर्षक पाते हैं, मेरे लिए इतना ही काफी है। लेकिन ख़ास मौकों पर सजने सँवरने में क्या बुराई है.. ख़ास तौर पर उसके लिए जिसको मैं बेहद प्यार करती हूँ? हम लोग अक्सर बाहर का खाना नहीं खाते (स्वास्थय के लिए ठीक नहीं होता न!), कभी कभी ही खाते हैं (या फिर तब जब हम यात्रा कर रहे होते हैं).. बाहर जाने से याद आया, की मुझे आज उनके प्लान के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था। सरप्राइज का तो मज़ा ही इसी में है! मैं लिफ्ट से नीचे की तरफ उतर कर भवन के प्रांगन में अभी आई ही थी, की गेट से मुझे रूद्र कार में आते हुए दिखे।

ऐसा नहीं है की हम लोग घूमने फिरने कहीं जाते नहीं – रूद्र और मैं कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के जंगल गए। कान्हा शब्द कनहार से बना है जिसका स्थानीय भाषा में अर्थ चिकनी मिट्टी है। यहां पाई जाने वाली मिट्टी के नाम से ही इस स्थान का नाम कान्हा पड़ा। रूडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध पुस्तक “जंगल बुक” की प्रेरणा इसी स्थान से ली गई थी। यहाँ हमने भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ, बारहसिंघा, हिरण, मोर, भेड़िये इत्यादि जीव देखे। इसके अलावा हमने राजस्थान राज्य की भी यात्रा करी, जहाँ हमने जयपुर, जोधपुर (दोनों जगहें अपनी स्थापत्य और शिल्पकला के लिए और साथ ही साथ हत्कला के लिए प्रसिद्द हैं), जैसलमेर (थार रेगिस्तान) और रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान (फिर से, बाघ, हिरण, सांभर हिरण!) की सैर करी। मेरे लिए यह दोनों जगहें बुल्कुल अद्भुत थीं! एक तरफ तो अंत्यंत घना जंगल, तो दूसरी तरफ कठिन रेगिस्तान! लेकिन अपने देश के इन अद्भुत स्थानों को देख कर न केवल मेरा दृष्टिकोण ही विकसित हुआ, बल्कि भारतवासी होने पर गौरव भी महसूस हुआ। बंगलोर के आस पास भी हम लोग यूँ ही लम्बी ड्राइव पर जाते हैं... मुझे यहाँ का खाना बहुत पसंद है (कभी सोचा नहीं था की दक्षिण भारतीय खाना मुझे इतना पसंद आएगा!)।

रूद्र ने मुस्कुराते हुए मेरे पास गाडी रोकी; मैंने उनके बगल वाली सीट वाला दरवाज़ा खोला और कार में बैठ गयी। उनको मुस्कुराता देख कर मैं भी मुस्कुराने लगी (कुछ तो चल रहा है इनके दिमाग में)! उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरे होंठों पर एक चुम्बन जड़ा और फिर कार वापस सड़क पर घुमा दी। ह्म्म्म.. अभी तक तो सभी कुछ पूर्वानुमेय है – हम एक रेस्त्राँ जा कर रुके, जहाँ हमने मुगलई भोजन किया। आज रूद्र ने कॉकटेल नहीं ली (वो अक्सर लेते हैं, लेकिन आज कह रहे थे की ड्राइव करना है, इसलिए नहीं लेंगे..), लेकिन उन्होंने मुझे दो गिलास पिला ही दी। बाहर आते आते मुझ पर नशा छाने लगा। लेकिन इतना तो होश था ही की समझ आ सके की हम लोग वापस घर की तरफ नहीं जा रहे थे। मैंने जब पूछा की कहाँ जा रहे हैं, तो उन्होंने कहा की यही तो सरप्राइज है..! हम्म्म्म... लॉन्ग ड्राइव! रात के अंधियारे में, जगमगाती सड़कों और उन पर सरपट दौड़ती गाड़ियों को देखते देखते कब मेरी आँख लग गयी, कुछ याद नहीं।

जब आँख खुली तो मैंने देखा की गाडी रुकी हुई है (शायद इसी कारण से आँख खुली), सुबह का मद्धिम, लालिमामय उजाला फैला हुआ है, हवा में ताज़ी ताज़ी सुगंध और मेरे चहुँओर छोटी छोटी हरी भरी पहाड़ियाँ थीं। मुझे रूद्र की आवाज़ सुनाई दे रही थी – वो आस पास ही कहीं थे, और किसी से बातें कर रहे थे। मैंने चार पांच गहरी गहरी सांसें लीं – मन और शरीर दोनों में ताजगी आ गयी। नशा काफूर हो गया। मैंने सीट पर बैठे बैठे अंगड़ाई ली और फिर से गहरी सांसें लीं, और फिर कार से बाहर निकल आई और आवाज़ की दिशा में बढ़ दी।

“जानू.. जाग गई?” रूद्र ने मुझे देखा, और मेरे पास आते आते मुझे आंशिक आलिंगन में भरा। उन्होंने फिर हमारे मेज़बान से मुझे मिलवाया।

“हम लोग कहाँ हैं?” मैंने पूछा।

“डार्लिंग, हम लोग कूर्ग में हैं..”

‘कूर्ग?’

उनसे मिलते मिलते सूर्योदय हो गया – सूर्य की किरणें पहाडियों के असंख्य श्रृंखलाओं पर लगे वृक्षों से छन छन कर आती हुई दिखाई पड़ रही थी। जादुई समां!

ओह! आपको कूर्ग के बारे में बताना ही भूल गई... कूर्ग कर्णाटक राज्य के पश्चिमी घाट पर है। सब्ज़ घाटियों, भव्य पहाड़ों और सागौन की लकड़ी जंगलों के बीच स्थित देश के सबसे खूबसूरत हिल स्टेशनों में से एक है। इन पहाड़ियों से होती हुई कावेरी नदी बहती है। यह जगह पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है – शहरों में रहने वाले, खास तौर पर बैंगलोर और मैसूर से अनेक पर्यटक यहाँ आते हैं। शुद्ध ताज़ा हवा और चहुँओर बिखरी हरियाली लोगों के चित्त को प्रसन्न कर देती है। इसके अतिरिक्त, यह स्थान कॉफी, चाय, और इलायची के बागानों के लिए भी जाना जाता है। यह भारत का ‘स्कॉटलैंड’ भी कहा जाता है... अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण! लगभग 100 साल पहले ब्रिटिश लोगों ने इस स्थान पर भी रिहाइशी बंदोबस्त किए थे।

जिस जगह पर हम रुके थे, वह एक होम-स्टे था। रूद्र का प्लान था की किसी होटल में नहीं, बल्कि प्रकृति के बीच एक शांत जगह पर रहेंगे। यह एक अच्छी बात थी – पहला इसलिए क्योंकि यहाँ कोई भीड़ भड़क्का नहीं था। हमारे मेजबान का घर और होम-स्टे उनके कॉफ़ी और केले के बगान में ही थे। यह एक बहुत ही वृहद् (करीब सौ एकड़) बगान था – इसमें इनके अलावा इलाइची भी पैदा की जाती है। और तो और, हमारे खाने पीने का इंतजाम भी हमारे मेजबानो ने कर दिया था – सवेरे का नाश्ता तैयार था, तो हमने फ्रेश होकर उनके साथ ही बैठ कर स्थानीय नाश्ता किया और कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ देर तक बात चीत करी।

मैंने रूद्र से शिकायत करी की अगर वो पहले बताते तो कम से कम कुछ पहनने को पैक कर लेती। कितनी देर तक इसी कपड़े में रहूंगी? इसके उत्तर में उन्होंने गाड़ी की पिछली सीट पर बहुत ही तरीके से छुपाया हुआ एक पैक निकाला – उसमे मेरे पहनने के लिए जीन्स और टी-शर्ट था। रूद्र के लिए शॉर्ट्स और टी-शर्ट था। क्या बात है!

इस जगह की सैर पर जब हम निकले, तब समझ आया की यह वाकई एक अलग ही प्रकार का हिल स्टेशन है। उतना व्यवसायीकरण नहीं हुआ है अभी तक! साथ ही साथ इस जगह पर अपनी एक मज़बूत संस्कृति, और इतिहास है। सबसे अच्छी बात यहाँ की साफ-सुथरी हवा, लगातार आती पंछियों की चहचहाहट और गुनगुनी धूप! एकदम ताजगी का एहसास! दिन भर में हमने वहाँ के खास खास पर्यटन स्थल (ओमकारेश्वर मंदिर, राजा की सीट, एब्बे झरना) देख डाले। झरने के बगल वाले एस्टेट में कॉफी के साथ साथ काली-मिर्च, और इलायची और अन्य पेड़-पौधे देखने को मिले।

एक बात मैंने वहाँ घूमते फिरते और देखी – यहाँ के लोग बहुत ही ख़ुशमिजाज़ किस्म के हैं। देखने भालने में आकर्षक और बढ़िया क़द-काठी के हैं। ख़ासतौर पर कूर्ग की महिलाएं बहुत सुन्दर हैं। हमने अपने लिए कॉफी, और शुद्ध शहद ख़रीदा (याद है?)। एक और ख़ास बात है यहाँ की, और वह यह की भारतीय सेनाओं में बहुत से जवान और अधिकारी कूर्ग से हैं। यहाँ के लोगो की वीरता के कारण इनको आग्नेयास्त्र (रूद्र वाला नहीं, बंदूक वाला) रखने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है।

शाम होते होते हम दोनों घूम फिर कर वापस होमस्टे आ गए, और अपने मेजबानो के साथ देर तक गप्पें लड़ाई, खाना खाया और बॉन-फायर का मज़ा लिया। आज रात यही रुक कर कल सवेरे वापस निकलने का प्रोग्राम था। लेकिन मन हो रहा था की यही पर रुक जाया जाय! घर की याद हो आई – वहाँ भी सब कुछ ऐसा ही था। मिलनसार लोग, शुद्ध वातावरण, पहाड़ी और शांत इलाका! मैं बालकनी में आकर बैठ गयी – एकांत था, दूर दूर तक शांति, न कोई लोग और न कोई आवाज़! रात में पहनने को कुछ नहीं था, इसलिए कमरे की बत्ती बुझा कर, बिना कपड़ों के ही कुर्सी पर बैठी कहे आकाश को देर तक देख रही थी। कम प्रदूषण वातावरण में होने के नाते, रात्रि आकाश असंख्य सितारों जगमगाते हुए दिख रहे थे! शानदार था!

यहाँ प्राकृतिक दृश्यों की भरमार थी... मिटटी से मानो एक जादुई खुशबू निकल रही थी। पेड़ पौधों का अपना निराला अंदाज़, चारों ओर जैसे बस सुगंध ही सुगंध! ऐसे मनभावन वातावरण में किसी भी प्रकार का क्लेश कैसे हो सकता है? लेकिन फिर भी मन आशान्त था! घर की याद हो आई.. एक एक बात! माँ बाप का साथ कितना सुकून देता है! उनकी याद आते ही मन हुआ की जैसे पंख लगाकर पल भर में ही उनके पास पहुँच जाऊँ। पापा तो कितना दुलारते हैं! घर जाने पर मैं आराम से उनके ऊपर पैर पसारकर देर तक बैठी रहती हूँ। माँ कभी एक कप चाय का पकड़ा देती हैं, तो कभी रक प्लेट गरम पकोड़े!

“क्या सोच रही हो?” रूद्र ने मेरे कंधे पर मालिश करते हुए पूछा। न जाने कैसे, अगर मेरे मन में कुछ भी उल्टा पुल्टा होता है तो उनको ज़रूर मालूम पड़ जाता है। एक बार उन्होंने मुझे कहा था की मैं बिलकुल पारदर्शी हूँ...

“कुछ भी नहीं, बस यूं ही मन उदास है।” मैंने सहज होते हुए कहा।

“अरे! ऐसा क्यों? मेरा सरप्राइज पसंद नहीं आया क्या, जो ऐसे जाने कहां खोई हो?”

मैंने संभलते हुए कहा, “कुछ भी तो नहीं हुआ?”

“नहीं... कुछ तो गड़बड़ है... वरना तुम इस तरह उदास और बुझी हुई कभी नहीं रहती।” इनकी पारखी आंखों ने ताड़ ही लिया... और ताड़े भी क्यों न? हम अब तक एक-दूसरे की रग-रग से वाकिफ हो गए थे, और एक-दूसरे की परेशानी की चिंता-रेखाओं को पकड़ लेते हैं। दो साल का अन्तरंग साथ है। चेहरा देख कर तो क्या, अब तो बिना देखे हुए ही मन के भाव समझ जाते हैं। उन्होंने मुझे पीछे से आलिंगन में भरते हुए पूछा, “ए जानू! बोलो न क्या हुआ? कुछ तो बताओ!”

मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए कहा, “यूं ही आज रह-रहकर घर की याद आ रही हैं।“

“अरे! बस इतनी सी बात.. अरे भई, कॉल कर लो!”

“ह्म्म्म.. देखा.. लेकिन सिग्नल नहीं हैं..”

“कोई बात नहीं, कल सवेरे कर लेना, जैसे ही नेटवर्क आता है.. ओके?”

मैंने कुछ नहीं कहा... बस डबडबाई हुई आंखों को चुपके से पोंछ लिया। चाहे मैंने कितनी ही चोरी छुपे यह किया हो, वो देख ही लेते हैं।

“ओये, तुम चॉकलेट खाओगी?” मुझे चॉकलेट बहुत पसंद हैं... इसीलिए वो अक्सर अपने साथ दो तीन पैक ज़रूर रखते हैं। मैं मुस्कुराई! मेरी हर परेशानी का इलाज रहता है इनके पास।

“हाँ! बिलकुल! चॉकलेट के लिए मैंने कब मना किया?”

“हा हा! चलो यार! कम से कम तुम कुछ मुस्कुराई तो!” उन्होंने मुझे चॉकलेट पकड़ाते हुए कहा, “... यू नो! तुम्हारे चेहरे के लिए मुस्कुराहट ही ठीक है.. उदास होना, या गुस्सा होना... तुम्हारे लिए नहीं डिज़ाइन किया गया है..।“

“अच्छा जी, तो फिर किसके लिए?”

“मेरे लिए! मुझे देखो न.. अगर इस चेहरे पर एक बार गुस्सा आ जाय, तो सामने वाले की...”

मैंने बीच में ही काटते हुए कहा, “जी हाँ.. समझ आ गया!” फिर कुछ देर रुक कर, “जानू, आप भी कभी गुस्सा या उदास मत होइएगा। आप पर भी सूट नहीं करता!”

“मैं भला क्यों होऊंगा? मेरे साथ तो तुम हो! मेरे पास गुस्सा या उदास होने का कोई रीज़न ही नहीं है!” इन्होने मुझे दुलारते हुए कहा। मैं मुस्करा उठी। इनके स्नेह भरे साथ ने मुझे कितना बदल दिया है!

“यू किस मी...”, मैंने एक बिंदास लड़की के जैसे वर्तमान अन्तरंग क्षणों का भरपूर लुत्*फ उठाने के लिए रूद्र का चेहरा अपने चेहरे पर खींच लिया। पिछले एक हफ्ते से हम लोग बहुत ही व्यस्त हो गए थे, और जाहिर सी बात है की इस कारण से सबसे पहले हमारे यौन समागम की बलि चढ़ी। मुझे तो लगता है की जब किसी को सेक्स की नियमित खुराक की आदत पड़ जाती है तो किसी भी प्रकार का व्यवधान शरीर और मन पर असर करने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे किसी की नींद गड़बड़ होने से पूरे मानसिक और शारीरिक व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। मेरा शरीर किसी कसे हुये वीणा की तरह हुआ जा रहा था। मन बेचैन होने लगा था।

हमारे आलिंगन बद्ध शरीरों में जैव रसायनों और संवेदनाओं के समरस प्रभाव से अब तीव्र उत्तेजना प्रवाहित होने लगी थी। ऐसे खुले प्राकृतिक वातावरण में यह यौनजन्*य प्रक्रिया अब अपना असर दिखाने लगी थी – मेरी योनि से वही जाना पहचाना स्राव होने लगा था, और रूद्र का लिंगोत्थान होने लगा। कुछ देर ढंग से चूमने के बाद, रूद्र मुझे अपनी गोद में उठाकर हमारे सुसज्*जित शयनकक्ष में आए। मैं बिस्तर पर बैठ कर चादर की सिलवटें ठीक करने लगी, लेकिन अब तक रूद्र कामासक्त होकर शरारत के मूड में आ गए थे। हमने इन दो सालों में कितनी ही बार अनवरत सेक्स किया था, लेकिन आज भी जब भी वो मुझे अपनी बाहों में लेटे हैं तो उनके मनोभाव समझते ही शर्म की लाली मेरे गालों और आँखों में उभर जाती है। मुझे बिस्तर पर लिटा कर जब रूद्र मुझमे प्रविष्ट हुए तब तक मेरा सारा तनाव और उदासी समाप्त हो गयी थी। ताज़ी हवा, चहुँओर फैली शांति और प्रबल साहचर्य की ऊर्जा ने हमारे शरीरों में हार्मोंस की गति इतनी बढ़ा दी कि उत्तेजना की कांति त्*वचा से रिसने लगी। यौन संसर्ग सचमुच मानसिक चेतना को सुकून और शरीर को पौष्*टिकता देती है। देखो न, कैसे उनके पौरुष रसायनों की आपूर्ति से मेरी देह गदरा गयी है! साहचर्य में मैं मदमस्*त होकर रूद्र को अपनी छातियों में समेटे ले रही थी – और देर तक हमारी कामजनित इच्छाओं को मूर्त रूप देते रहे।

सवेरे हम लोग देर से उठे, और जब तक तैयार होकर बाहर आये, तब तक हमारे मेजबानों ने एक बेहतरीन ब्रेकफास्ट बना दिया था। हमने खाना खाया, कॉफ़ी पी, और फिर भुगतान वगैरह करके वापस की यात्रा आरम्भ करी। रास्ते में रूद्र ने कहा की चलो, तुम्हे तिब्बत की सैर कराता हूँ!

तिब्बत! यहाँ कहाँ तिब्बत! फिर कोई एक घंटे में उनका मतलब समझ आया। हम लोग ब्यलाकुप्पे तिब्बती मठ पहुंचे। यह एक बेहद सुन्दर जगह है... अचानक ही इतने सारे तिब्बती चेहरों को देख कर लगता है की भारत में नहीं, बल्कि वाकई तिब्बत पहुँच गए हैं! प्राचीन परम्पराओं को लिए, और आधुनिक सुविधाओं के साथ यह जगह एक बहुत सुन्दर गाँव जैसे है। वैसे भी यह जगह देखने के लिए आज एकदम सही दिन था – गुनगुनी धुप बिखरी हुई थी। परिसर के अन्दर बगीचों का रख रखाव अच्छे से किया गया था। हर भवन के ऊपर रंग-बिरंगी झंडे फहरते दिख रहे थे। आते जाते भगवा वस्त्रों में बौद्ध भिक्षु दिख रहे थे। एक तरफ तिब्बती बच्चे आइसक्रीम का आनंद ले रहे थे। हम लोग वाकई यह भूल गए की हम लोग कर्नाटक में हैं। मठ इतनी अच्छी तरह से सुव्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से सजाया गया था की यहाँ आ कर मेरे मन में अनंत शांति और ऊर्जा का संचार होने लगा।

मठ के अन्दर एक मंदिर है, जिसको स्वर्ण मंदिर कहते हैं। उसमें बहुत सुन्दर तीन मूर्तियाँ हैं - भगवान बुद्ध (केंद्र पर), गुरु पद्मसंभव, और बुद्ध अमितायुस। ये मूर्तियाँ तांबे की बनी हैं, और उन पर सोना चढ़ा हुआ है। मंदिर के अंदरूनी और वाह्य दीवारों पर बारीक डिजाइन और भित्ति-चित्र बनाए गए थे। दीवारों पर बने रंगीन भित्ति चित्र अनेक प्रकार की कहानियां सुना रहे थे। एक तरफ भिक्षु लोग प्रार्थना कर रहे थे और उनकी प्रार्थना से उत्पादित गहरी गुंजार... मानो हम खो गए थे। यहाँ पर बहुत देर रहा जा सकता है, लेकिन काम को कैसे दरकिनार किया जा सकता है? शाम से पहले बैंगलोर पहुंचने के लिए हमको अभी ही शुरू करना चाहिए था, तो इसलिए हमने भगवान बुद्ध को विदाई दी और बाहर आ गए। दोपहर का भोजन हमने वहीँ किया – तिब्बती भोजन! वहाँ ज्यादातर घरों को कैफे और रेस्तरां भोजनालय में बदल दिया गया है। खाने के बाद हमने कुछ हस्तशिल्प सामान खरीदा और वापसी का रुख किया।



*******

रूद्र की खजुराहो वाली उपमा मेरे दिमाग में हमेशा बनी रही। इन्टरनेट और अन्य जगहों से उसके बारे में मैंने बहुत सी जानकारी इकट्ठी कर ली थी.. इसिये जैसे ही रूद्र ने दिसम्बर की छुट्टियाँ मनाने के लिए जगह चुनने की पेशकश करी, मैंने तुरंत ही खजुराहो का नाम ले लिया। रूद्र ने आँख मारते हुए पूछा भी था की ‘जानेमन, क्या चाहती हो? अब क्या सीखना बाकी है?’ उनका इशारा सेक्स की तरफ था, यह मुझे मालूम है.. लेकिन मैंने उनकी सारे तर्क वितर्क को क्षीण कर के अंततः खजुराहो जाने के लिए मना ही लिया। लेकिन रूद्र भी कम चालाक नहीं हैं, उन्होंने चुपके से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान को भी हमारी यात्रा में शामिल कर लिया।

खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का सुन्दर और उत्कृष्ट मिसाल हैं! मंदिरों की दीवारों पर उकेरी विभिन्न मुद्राओं को दिखाती मनोहारी प्रतिमाएँ दुलर्भ शिल्पकारी का उदाहरण हैं। खजुराहो मध्यप्रदेश राज्य में स्थित एक छोटा सा गाँव है। मध्यकाल में उत्तरी भारत के सीमांत प्रदेश पर मुसलमानी आक्रांताओं के अनवरत आक्रमण के कारण बड़गुज्जर राजपूतों ने पूर्व दिशा का रुख किया, और मध्यभारत अपना राज्य स्थापित किया। ये राजपूत महादेव शिव के उपासक थे। उन्हीं शासकों द्वारा नवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच खजुराहो के मंदिरों का निर्माण कराया गया। कहते हैं इन मंदिरों की कुल संख्या पच्चासी थी, जिन्हें आठ द्वारों का एक विशाल परकोटा घेरता था और हर द्वार खजूर के विशाल वृक्ष लगे हुए थे। इसी कारण इस जगह को खजुराहो कहते थे। आज उतनी संख्या में मंदिर नहीं बचे हैं। मुस्लिम आक्रमणकारियों की धर्मान्धता और समय का शिकार हो कर अधिकांश मंदिर नष्ट हो गए हैं। आज केवल बीस-पच्चीस मंदिर ही बचे हैं। हर साल लाखों की संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक खजुराहों आते हैं व यहाँ की खूबसूरती को अपनी स्मृति में कैद कर ले जाते हैं।

खजुराहो के मंदिरों को ‘प्रेम के मंदिर’ भी कहते हैं। कहिये तो इन मंदिरों का इतना प्रचार यहाँ की काम-मुद्रा में मग्न देवी-देवताओं प्रतिमाओं के कारण हुआ है। ध्यान से देखें तो इन मूर्तियों में अश्लीलता नहीं, बल्कि प्रेम, सौंदर्य और सामंजस्य का प्रदर्शन है। खजुराहो के मंदिरों को आम तौर पर कामसूत्र मंदिरों की संज्ञा दी जाती है, लेकिन केवल दस प्रतिशत शिल्पाकृतियाँ ही रतिक्रीड़ा से संबंधित हैं। प्रतिवर्ष कई नव विवाहित जोड़े परिणय सूत्र में बँधकर अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत यही से करते हैं। लेकिन सच तो यह है की न ही कामसूत्र में वर्णित आसनों अथवा वात्स्यायन की काम-संबंधी मान्यताओं और उनके कामदर्शन से इनका कोई संबंध है।

खजुराहो मंदिर तीन दिशाओं में बने हुए हैं - पश्चिम, पूर्व और दक्षिण दिशा में। ज्यादातर मंदिर बलुहा पत्थर के बने हैं। इन पर आकृतियाँ उकेरना कठिन कार्य है, क्योंकि अगर सावधानी से छेनी हथोडी न चलाई जाय, तो यह पत्थर टूट जाते हैं। खजुराहो का प्रमुख एवं सबसे आकर्षक मंदिर है कंदारिया महादेव मंदिर। आकार में तो यह सबसे विशाल है ही, स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से भी सबसे भव्य है। समृद्ध हिन्दू निर्माण-कला एवं बारीक शिल्पकारी का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है यह भव्य मंदिर। बाहरी दीवारों की सतह का एक-एक इंच हिस्सा शिल्पाकृतियों से ढंका पड़ा है। कंदरिया’ - कंदर्प का अपभ्रंश! कंदर्प यानी कामदेव! सचमुच इन मूर्तियों में काम और ईश्वर दोनों की तन्मयता की चरम सीमा देखी जा सकती है... भावाभिभूत करने वाली कलात्मकता! सुचित्रित तोरण-द्वार पर नाना प्रकार के देवी-देवताओं, संगीत-वादकों, आलिंगन-बद्ध युग्म आकृतियों, युद्ध एवं नृत्य, राग-विराग की विविध मुद्राओं का अंकन हुआ है। अन्दर की तरफ मंडपों की सुंदरता मन मोह लेती है। बालाओं की कमनीय देह की हर भंगिमा, और हर भाव का मनोरम अंकन हुआ है। उनके शरीर पर सजे एक-एक आभूषण की स्पष्ट आकृति शिल्पकला के कौशल को दर्शाती है। स्पंदन, गति, स्फूर्ति सब जैसे गतिमान और जीवंत से लगते हैं! मैं एकटक उन मूर्तियों को देखती रही!

मंदिर के गर्भगृह में संगमरमर का शिवलिंग स्थापित है, और उसकी दीवारों पर परिक्रमा करने वाले पथ पर मनोरम शिल्पाकृतियाँ बनी हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर चारों दिशाओं में देवी-देवताओं, देवदूतों, यक्ष-गंधर्वों, अप्सराओं, किन्नरों आदि का चित्रण किया गया है। सीढ़ी सादी भाषा में कहें तो खजुराहो मंदिर, ख़ास तौर पर कंदरिया महादेव मंदिर हिन्दू शिल्प और स्थापत्य कला का संग्रहालय है। शिल्प की दृष्टि से देश के अन्य सारे निर्माण बौने हैं! मैं इन मंदिर को देखते हुए मैं बार-बार अभिभूत हो रही थी। मंत्रमुग्ध सी निहार रही थी!

विशालता और शिल्प-वैभव में कंदरिया महादेव का मुकाबला करते लक्ष्मण मंदिर है। इसके प्रांगन में चारों कोनों पर बने उपमंदिर आज भी हैं। इस मंदिर के प्रवेश-द्वार के शीर्ष पर भगवती महालक्ष्मी की प्रतिमा है। उसके बाएँ स्तम्भ पर ब्रह्मा एवं दाहिने पर शिव की मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह में भगवान विष्णु की लगभग चार फुट ऊँची प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में आप नरसिंह और वाराह अवतारों का रूप देख सकते हैं। मंदिर की दीवारों पर विष्णु के दशावतारों, अप्सराओं, आदि की आकृतियों के साथ-साथ प्रेमालाप, आखेट, नृत्य, मल्लयुद्ध एवं अन्य क्रीड़ाओं का अंकन किया गया है।

दिन भर इन मंदिरों का भ्रमण करने, थोड़ी बहुत खरीददारी करने और रात का साउंड एंड लाइट शो देखने के बाद जब हम वापस आये तो बहुत थक गए थे! सच कहूं, तो यहाँ आने को लेकर रूद्र मेरी अपेक्षा कम उत्साहित थे। हमने कमरे में ही माँगा लिया और खाना खा पीकर जब हम बिस्तर पर लेटे तो दिमाग में इस जगह के शासकों – चंदेल राजपूतों की उत्पत्ति की कहानी याद आने लगी। चंदेल राजा स्वयं को चन्द्रमा की संतान कहते थे। कहानी कुछ ऐसी है - बनारस के राजपुरोहित की विधवा बेटी हेमवती बहुत सुंदर थी.... अनुपम रूपवती! एक रात जब वह एक झील में नहा रही थी तो उसकी सुंदरता से मुग्ध होकर चन्द्रमा धरती पर उतर आया और हेमवती के साथ संसर्ग किया। हेमवती और चंद्रमा के इस अद्भुत मिलन से जो संतान उत्पन्न हुई उसका नाम चन्द्रवर्मन रखा गया, जो चंदेलों के प्रथम राजा थे।

कहानी अच्छी है, और प्रेरणादायी भी! प्रेरणा किस बात की? अरे, क्या अब यह भी बताना पड़ेगा?

“जानू?”

“ह्म्म्म?”

“हेमवती और चन्द्रमा वाला खेल खेलें?”

“नेकी और पूछ पूछ! लेकिन सेटअप सही होना चाहिए!”

“अच्छा जी! मैंने तो मजाक किया था, लेकिन आप तो सीरियस हो गए!” मैंने ठिठोली करी।

रूद्र ने खिड़की खोल दी। चांदनी रात तो खैर नहीं थी, लेकिन चांदनी की कमी भी नहीं थी। उसके साथ साथ ठंडी हवा भी अन्दर आ रही थी। लेकिन, अगर शरीर में गर्मी हो, तो इससे क्या फर्क पड़ता है? सोते समय मैंने शिफॉन की नाइटी पहनी हुई थी – इसका सामने (मेरे स्तनों पर) वाला हिस्सा जालीदार था। उसकी छुवन और ठंडी हवा से मेरे निप्पल लगभग तुरंत ही तीखे नोकों में परिवर्तित हो गए। रूद्र के कहने पर मैं खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गई - क्षण भर को मुझे जाने क्यों लगा की मैं वाकई हेमवती हूँ, वाराणसी के उसी ब्राह्मण पंडित की पुत्री! खुली खिड़कियों से आती हुई चांदनी हमारे कमरे को मानो सरोवर में तब्दील किये जा रही थी और मैं चंद्रमा की किरणों में नहा रही थी, अंग-अंग डूबी हुई। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं!

‘न जाने कितनी स्त्रियों को यह अनुभव हुआ हो!’

मैंने मुड़ कर रूद्र को देखा – वो भी तल्लीन होकर चांदनी में नहाए मेरे रूप का अनवरत अवलोकन कर रहे थे।

‘बॉडी लाइक खजुराहो इडोल्स!’

मैं धीरे धीरे खजुराहो की सपनीली दुनिया की नायिका बनती जा रही थी। राग-रंग से भरी हुई... आत्मलीन नायिका! मुझे लगा जैसे की मेरा शरीर किसी कसे हुये वीणा की तरह हो गया हो – उंगली से छेड़ते ही न जाने कितने राग निकल पड़ेंगे! मन अनुरागी होने लगा। क्या यह बेचैनी खजुराहो की थी? लगता तो नहीं! रूद्र तो हमेशा साथ ही रहते हैं, लेकिन आज वाली प्यास तो बहुत भिन्न है! न जाने कैसे, रूद्र के लिये मानो मेरी आत्मा तड़पती है, शरीर कम्पन करता है... अब यह सब सिवाय प्यार के और क्या है?

“कब तक यूँ ही देखेंगे?”

“पता नहीं कब तक! तुम वाकई खजुराहो की देवी लग रही हो! ये गोल, कसे और उभरे हुए स्तन, पतली कमर, उन्नत नितंब! ...बिलकुल सपने में आने वाली एक परी जैसी!”

“अच्छा... आपके सपने में परियां आती हैं?” तब तक रूद्र ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया।

वो मुझे बहुत प्यार से देख रहे थे – आँखों में वासना तो थी, लेकिन प्यार से कम! उनकी आँखों में मेरा अक्स! उनकी आँखों के प्रेम में नहाया हुआ मेरा शरीर! सचमुच, मैं हेमवती ही तो थी!

रूद्र ने क्या कहा मुझे सुनाई नहीं दिया – बस उनके होंठ जब मेरे होंठों से मिले, तो जैसे शरीर में बिजली सी दौड़ गई! मैं चुपचाप देखती हूँ की वो कैसे मेरे हर अंग को अनावृत करते जाते हैं, और चूमते जाते हैं। बस कुछ ही पलों में मैं अपने सपनों के अधिष्ठाता के साथ एक होने वाली थी।

‘बस कुछ ही पलों में....’

रूद्र मेरे निप्पलों को बारी बारी मुंह में भर कर चूस, चबा, मसल और काट रहे थे। मेरी साँसे तेजी से चलने लगीं। मेरा पूरा शरीर कसमसाने लगा। आज रूद्र कुछ अधिक ही बल से मेरे स्तन दबा रहे थे – ऐसा कोई असह्य नहीं, लेकिन हल्का हल्का दर्द होने लगा।

“अआह्ह्ह! आराम से...”

"हँ?" रूद्र जैसे किसी तन्द्रा से जागे!

“आराम से जानू... आह!”

“आराम से? तू इतनी सेक्सी लग रही है... आज तो इनमें से दूध निचोड़ लूँगा!” कह कर उन्होंने बेरहमी से एक बार फिर मसला।

"आऊ! अगर... इनमें... दूध होता... तो आपको... मज़ा... आआह्ह्ह्ह! आता?" मैंने जैसे तैसे कराहते हुए अपनी बात पूरी करी। मैं अन्यमनस्क हो कर उनके बालों में अपनी उँगलियाँ फिरा रही थी।

उन्होंने एक निप्पल को मुंह में भर कर चूसते हुए हामी में सर हिलाया। कुछ देर और स्तन मर्दन के बाद मेरी दर्द और कामुकता भरी सिसकियाँ निकलने लगी। लोहा गरम हो चला था... लेकिन रूद्र फोरप्ले में बिजी हैं!

“अब... बस...! आह! अब अपना ... ओह! लंड.. डाल दो! प्लीज़! आऊ! अब न... अआह्ह्ह! सताओ...!”
 
रूद्र जैसे बहरे हो गए थे। अब वो धीरे-धीरे चूमता हुए मेरे पेट की तरफ आ कर मेरी नाभि को चूमने, चूसने और जीभ की नोक से छेड़ने लगे, दूसरे हाथ से वो मेरी योनि का जायजा लेने लगे। और फिर अचानक ही, उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठाया और लाकर बिस्तर पर पटक दिया। कपड़े मेरे तो न जाने कब उतर चुके थे... रूद्र के कहने पर मैंने अपनी योनि पर से बाल हटवा लिए थे – स्थाई रूप से! रूद्र अभी पूरी तन्मयता के साथ बेतहाशा मेरी योनि को पागलों की तरह चूस रहे थे। अपनी जीभ यथासंभव अन्दर घुसा घुसा कर मेरा रस पी रहे थे। मैं बेचारी क्या करती? मैं आनन्द के मारे आँखें बंद करके मजा ले रही थी, और इस बात पर कुढ़ भी रही थी की अभी तक उन्होंने लिंग क्यों नहीं घुसाया। अब मुझसे सहन नहीं हो पा रहा था।

जैसे रूद्र ने मेरे मन की बात सुन ली हो – उन्होंने योनि चूसना छोड़ कर एक बार मेरे होंठों पर एक चुम्बन लिया और फिर खुद भी निर्वस्त्र हो कर मुख्य कार्य के लिए तैयार हो गए। रूद्र ने एक झटके के साथ ही पूरा का पूरा मूसल मेरे अन्दर ठेल दिया – मेरी उत्तेजना चरम पर थी, इसलिए आसानी से सरकते हुए अन्दर चला गया। उत्तेजना जैसे मेरे वश में ही नहीं थी - मैंने नीचे देखा – मेरी योनि की मांसपेशियों ने लिंग-स्तम्भ को बहुत जोर से जकड़ रखा था। रूद्र ने हल्के-हल्के धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। और मैं मुँह भींचे, उनके लिंग की चोटों को झेल रही थी।

मैंने कहा, “आप तेज-तेज करो... जितनी तेज कर पाओ.. आह!”

रूद्र ने अपनी गति बढ़ा दी और तेज़-तेज़ झटके मारने लगे। जाहिर सी बात है, इतनी तेज गति से सेक्स करने पर हमेशा जैसा मैराथन संभव नहीं था। उनकी गति और भी तेज हो गयी थी, क्योंकि मैं भी अपनी कमर हिला-हिला कर उनका साथ दे रही थी। आख़िरकार एक झटके के साथ रूद्र का ढेर सारा वीर्य मेरे अन्दर भर गया। जब वो पूरी तरह से निवृत्त हो गए तो हम दोनों लिपट गए।

मैंने उनको चूमते हुए कहा, “बाहर मत निकलना!”

रूद्र उसी तरह मुझे अपने से लपेटे लेटे रहे और बातें करते रहे। अंततः, उनका लिंग पूरी तरह से सिकुड़ कर बाहर निकल गया। मैं उठा कर बाथरूम गयी, और साफ़ सफाई कर के रूद्र के साथ रजाई के अन्दर घुस गयी।

“मैं आपसे एक बात कहूं? ... उम्म्म एक नहीं, दो बातें?”

“अरे, अब आपको अपनी बात कहने से पहले पूछना पड़ेगा?”

“नहीं.. वो बात नहीं है.. लेकिन बात ही कुछ ऐसी है!”

“ऐसा क्या? बताओ!”

“आपने एक बार मुझे कहा था न.. की अगर मेरे पास कोई बिज़नस आईडिया होगा, तो आप मेरी हेल्प करेंगे?”

“हाँ.. और यह भी कहा था की आईडिया दमदार होना चाहिए... कुछ है क्या दिमाग में?”

“है तो... आप सुन कर बताइए की बढ़िया है या नहीं?”

“मैं सुन रहा हूँ...”

“एक फैशन हाउस, जिसमे ट्रेडिशनल से इंस्पायर हो कर कंटेम्पररी जेवेलरी मिलें? खजुराहो ओर्नामेंट्स! कैसा लगा नाम? पुरानी मूर्तियों, और चित्रों से प्रेरणा लेकर नए प्रकार के गहने? मेटल, वुड, स्टोन, और बोंस – इन सबसे बना हुआ? क्या कहते हैं? कॉम्प्लिमेंटरी एक्सेसोरीस, जैसे स्टोल, बेल्ट्स, और बैग्स भी रख सकते हैं!”

“ह्म्म्म... इंटरेस्टिंग!” रूद्र ने रूचि लेटे हुए कहा... “अच्छा आईडिया तो लग रहा है.. इस पर कुछ रिसर्च करते हैं। एक स्टोर के साथ साथ इन्टरनेट पर भी बेच सकते हैं... ठीक है... मुझे और पता करने दो, और इस बीच में अपने इस आईडिया को और आगे बढाओ... ओके? हाँ, अब दूसरी बात?”

“दूसरी बात... उम्म्म.. कैसे कहूं आपसे..!”

“अरे! मुझसे नहीं, तो फिर किससे कहोगी?” रूद्र ने प्यार से चूमते हुए कहा।

मैं मुस्कुराई, “मुझे इनमें,” कहते हुए मैंने रूद्र का हाथ अपने एक स्तन पर रखा, “दूध चाहिए...”

“हैं? वो कैसे होगा?”

“अरे बुद्धू... मैं माँ बनना चाहती हूँ...”

“माँ बनना चाहती हो? वाकई? ...आई मीन, इस इट फॉर रियल?” मुझे उसकी बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था। रश्मि अभी तक अपनी पढाई लिखाई में इतनी मशगूल थी, की इस बात को पचाना ही मुश्किल हो रहा था।

“हाँ! क्यों? आप ऐसे क्यों कह रहे हैं?” रश्मि का स्वर अभी भी उतना ही संयत और शांत था, जितना की यह बात करने से पहले... सम्भोग की संतृप्ति की उत्तरदीप्ति का असर होगा? ... नहीं.. ये तो सीरियस लग रही है!

“नहीं.. मेरा मतलब.. तुम अभी कितनी छोटी हो!”

“आपका मतलब, आपसे शादी करने के टाइम से भी छोटी?”

“नहीं... ओह गॉड! एक मिनट... जरा ठन्डे दिमाग से सोचते हैं.. माँ बनना एक बात है, लेकिन बच्चे की परवरिश, उसकी देखभाल करना एक बिलकुल अलग बात है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ की तुम हमारे बच्चे का ख्याल नहीं रख पाओगी.. लेकिन उसकी फुल टाइम ज़िम्मेदारी? मुझे नहीं लगता की तुम.. और मैं भी अभी तैयार हैं। अभी तुम्हारी उम्र इन चक्करों में पड़ने की नहीं है... हम ज़रूर बच्चे करेंगे! लेकिन, अभी नहीं। यह समझदारी नहीं है... अभी अपने करियर के बारे में सोचो – बच्चे तो कभी भी कर सकते हैं!”

“जानू.. माना की मैं अभी पढ़ रही हूँ... लेकिन, वो मेरे लिए बहुत आवश्यक नहीं है! पढाई मैं जारी भी रख सकती हूँ.. है की नहीं? वैसे भी मैंने अभी आपको अपना करियर प्लान बताया न? हम लोग एक अच्छी गवर्नेस रख सकते हैं.. मेरी हेल्प के लिए!”

उसने रुक कर मुझे कुछ देर देखा... मैंने कुछ नहीं कहा। तो उसी ने आगे कहना जारी रखा,

“जानू.. पिछले कई दिनों से मुझे माँ बनने की बहुत तीव्र इच्छा हो रही है। और इसमें परेशानी ही क्या है?

यहाँ, हमारी कॉलोनी में ही देख लीजिये.. कितनी सारी महिलाएं माँ बनी, और फिर उसके बाद अपने करियर पर भी काम कर रही हैं.. मेरा सेकंड इयर ख़तम होने ही वाला है.. अगर हेल्थ ठीक रहे और कोई कॉम्प्लिकेशन न हो, तो थर्ड इयर की क्लासेज तो आराम से की जा सकती हैं! ...वैसे... अगर आप पापा बनने को अभी रेडी नहीं है, तो कोई बात नहीं! हम वेट कर लेंगे!”

पापा! और मैं? ऐसे तो मैंने कभी सोचा ही नहीं!

“वेट कर लेंगे? अरे यार! अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है?”

“आपको नहीं मालूम?”

“मालूम है.. बस बीस की हुई हो पिछले महीने! एकदम कच्ची कली हो तुम! अभी ही बच्चा जनना ज़रूरी है?”

“कच्ची कली.. ही ही ही...! इस कली को आपने महकता हुआ फूल बना दिया है, मेरे जानू!” हँसते हुए रश्मि ने मेरे गले में गलबहियाँ डाल दीं और मेरे चेहरे को अपने स्तनों की तरफ झुकाते हुए बिस्तर पर लेट गयी।

इशारा साफ़ था – सच में, मेरा भी कितना मन होता था की अगर इसके स्तनों में दूध उतर आये तो कितना मज़ा आये! लेकिन इतनी सी बात के लिए उसको माँ बनाना! ये तो वही बात हुई, खाया पिया कुछ नहीं और गिलास तोड़े बारह आने!

मुझे नहीं मालूम था की रश्मि इस बात का ठीकरा मेरे सर पर, और वो भी इस तरह फोड़ेगी। रात में नींद नहीं आई, और पूरी रात सोचता रहा – क्या बच्चा लाने की बात से मैं डर गया हूँ? रश्मि तो तैयार लग रही है, लेकिन क्या मैं तैयार हूँ? आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक दृष्टि से तो अभी तो उत्तम स्थिति है.. लेकिन भावनात्मक रूप से? क्या मैं एक नन्ही सी जान इस संसार में लाने और उसको लाड़-प्यार देने और पाल-पोस कर बड़ा करने के लिए तैयार हूँ? अभी तक तो जब जो जी में आया वो किया वाली हालत है.. लेकिन बच्चा आने पर वो सब कुछ बदल जाएगा! अपनी स्वतंत्रता छोड़ सकता हूँ क्या? उम्र का बहाना तो बना ही नहीं सकता.. मेरी उम्र के कई सहकर्मी बाप बन चुके हैं.. एक नहीं बल्कि दो दो बच्चों के! क्या यह डर मेरा रश्मि पर अपने एकाधिकार के कारण है? बच्चा आने पर वो तो उसी में लगी रहेगी.. फिर... मेरा क्या होगा? अब यह चाहे मेरा डर हो, या फिर रश्मि पर मेरा एकाधिकार, और या फिर उसके लिए मेरी चिंता... मैं उसको सीधे-सीधे मना नहीं करना चाह रहा था, पर इशारों में समझाया कि अभी बच्चे के चक्कर में मत पड़ो! पहले पढ़ाई ख़तम करो, और फिर बच्चे।

माँ बाप बनना कोई मुश्किल काम तो है नहीं... बस निर्बाध रूप से सम्भोग करते रहें, और क्या? मैं और रश्मि कभी भी इस मामले में पीछे नहीं रहते हैं, और जल्दी ही रश्मि के आग्रह पर क्रिया के दौरान हमने किसी भी प्रकार की सुरक्षा रखना बंद कर दिया। बच्चे के विषय में और ज्यादा बात करने से मैं भी कुछ दिनों में मन ही मन पिता बनने को तैयार हो गया। मार्च का महीना था, और आख़िरी हफ्ता चल रहा था। रश्मि उस रात अपने एक्साम की तैयारी कर रही थी, और हमेशा की तरह मैं उसके साथ उसके विषय पर चर्चा कर रहा था। मैंने एक बात ज़रूर देखी – रश्मि आज रोज़ से ज्यादा मुस्कुरा रही थी... रह रह कर वो हंस भी रही थी! ये सब मेरा भ्रम था क्या? उसके गाल थोड़ा और गुलाबी लग रहे थे! ये लड़की तो परी है परी! हर रोज़ और ज्यादा सुन्दर होती जा रही है!! दस बजते बजते उसने कहा की तैयारी हो गयी है। साल भर पढ़ने का लाभ यही है की आखिरी रात ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। किताबों को बगल की टेबल पर रख कर रश्मि मेरा हाथ पकड़ कर मुझे मुस्कुराते हुए देखने लगी।

“क्या बात है जानू? बहुत खुश लग रही हो आज!”

“हाँ.. आज खुश तो बहुत हूँ मैं!”

“अरे वाह! भई, हमें भी तो मालूम पड़े आपकी ख़ुशी का राज़!”

उत्तर में रश्मि ने मेरे हाथ को अपने एक स्तन पर रख कर कहा, “इनमें... दूध... आने वाला है!”

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।

रश्मि ने मुझे समझाते हुए कहा, “जानू.. आप पापा बनने वाले हैं!”

“व्हाट! क्या ये सच है जानू?”

रश्मि खिलखिला कर हंस पड़ी, और देर तक हंसने के बाद उसने सर हिला कर हामी भरी।

“ओओ माय गॉड! वाव! आर यू श्योर?”

“मुझे आज सवेरे मालूम पड़ा.. मिस्ड माय पीरियड्स फॉर सेकंड मंथ.. इसलिए आज होम प्रेगनेंसी किट ला कर टेस्ट किया। रिजल्ट पॉजिटिव है!”

मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था, “वाव!” मैंने धीरे से कहा.. और फिर तेज़ से, “वाव्व्व! ओह गॉड! हनी, आई ऍम सो हैप्पी! अमेजिंग!!” कहते हुए मैंने रश्मि के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और अपने दोनों हाथों से उसके गालों को पकड़ कर देर तक चूमता रहा। मेरी बीवी गर्भवती है! अद्भुत! मुझे उसका शरीर देखने की तीव्र इच्छा होने लगी (मेरी मूर्खता देखिए, अभी दो दिनों पहले ही तो हमने सेक्स किया था), और मैंने उसकी टी-शर्ट उठा दी... और उसके पेट पर प्यार से हाथ फिराया।

‘इसमें मेरा बच्चा है!’ मैं इस ख़याल से हैरान था। मेरा मन उत्साह से भर गया। मैंने बिना कोई देर किए उसके पेट पर एक चुम्बन दिया – रश्मि मेरी इस हरकत से सिहर उठी और हलके से हंसने लगी।

“आई लव यू सो मच हनी! आज तुमने मुझे कितनी सारी ख़ुशी दी है, तुमको मालूम नहीं!”

“आई लव यू टू.. सबसे ज्यादा! आप मेरे हीरो हैं.. हमारा बच्चा बहुत लकी है की उसको आपके जैसा पापा मिलेगा!”

“नहीं जानू.. मैं लकी हूँ.. की मुझे तुम मिली.. पहले तुमने मुझे पूरा किया, और अब मेरे पूरे जीवन को! थैंक यू!”

पूरी रात मुझे नींद नहीं आई... मुझे क्या, रश्मि को भी रह रह कर नींद आई। मुझे डर लग रहा था की कहीं नींद की कमी से उसका अगले दिन का एक्साम न गड़बड़ हो जाय.. लेकिन रश्मि ने मुझे दिलासा दिया की वो भी ख़ुशी के कारण नहीं सो पा रही है। और इससे एक्साम पर असर नहीं पड़ेगा। मैंने अगले दिन से ही रश्मि का और ज्यादा ख़याल रखना शुरू कर दिया – बढ़िया डॉक्टर से सलाह-मशविरा, खाना पीना, व्यायाम, और ज्यादा आराम इत्यादि! डॉक्टर रश्मि की शारीरिक हालत देख कर बहुत खुश थी, और उसने रश्मि को अपनी दिनचर्या बरकरार रखने को कहा – बस इस बात की हिदायद दी की वो कोई ऐसा श्रमसाध्य काम या व्यायाम न करे, जिसमे बहुत थकावट हो जाय। उन्होंने मुझे कहा की मैं रश्मि को ज्यादा से ज्यादा खुश रखूँ। उन्होंने यह भी बताया की क्योंकि रश्मि की सेहत बढ़िया है, इसलिए सेक्स करना ठीक है, लेकिन सावधानी रखें जिससे गर्भ पर अनचाहा चोट न लगे। उन्होंने यह भी कहा की इस दौरान रश्मि बहुत ‘मूडी’ हो सकती है, इसलिए उसको हर तरह से खुश रखना ज़रूरी है। मुझे यह डॉक्टर बहुत अच्छी लगी, क्योंकि उन्होंने हमको बिना वजह डराया नहीं और न कोई दवाई इत्यादि लिखी। गर्भधारण एक सहज प्राकृतिक क्रिया है, कोई रोग नहीं। बस उन्होंने समय समय पर जांच करने और कुछ सावधानियां लेने की सलाह दी।
 
हमने जब उसके घर में यह इत्तला दी, तो वहाँ भी सभी बहुत प्रसन्न हुए। उसकी माँ रश्मि को मायके बुलाना चाहती थीं, लेकिन रश्मि ने उनको कहा की मैं उसका खूब ख़याल रखता हूँ, और बैंगलोर में देखभाल अच्छी है। इसलिए वो यहीं रहेगी, लेकिन हाँ, वो बीच में एक बार मेरे साथ उत्तराँचल आएगी। सुमन यह खबर सुन कर बहुत ही अधिक उत्साहित थी। इसलिए रश्मि ने उसको अपनी गर्मी की छुट्टियाँ बैंगलोर में मनाने को कहा। सुमन का अप्रैल के अंत में बैंगलोर आना तय हो गया। मुझे इसी बीच तीन हफ़्तों के लिए यूरोप जाना पड़ा – मन तो बिलकुल नहीं था, लेकिन बॉस ने कहा की अभी जाना ठीक है, बाद में कोई ट्रेवल नहीं होगा। यह बात एक तरह से ठीक थी, लेकिन मन मान नहीं रहा था। खैर, मैंने जाने से पहले रश्मि की देखभाल के सारे इंतजाम कर दिए थे और देवरामनी दंपत्ति से विनती करी थी की वो ज़रुरत होने पर रश्मि की मदद कर दें। इसके उत्तर में मुझे लम्बा चौड़ा भाषण सुनना पड़ा की रश्मि उनकी भी बेटी है, और मैंने यह कैसे सोच लिया की मुझे उनको उसकी देखभाल करने के लिए कहना पड़ेगा। रश्मि के एक्साम अप्रैल के मध्य में ख़तम हो गए, और अप्रैल ख़तम होते होते मैं भी बैंगलोर वापस आ गया।

जब घर का दरवाज़ा खुला तो मुझे लगा की जैसे मेरे सामने कोई अप्सरा खड़ी हुई है! मैं एक पल को उसे पहचान ही नहीं पाया।

"रश्मि! आज तुम कितनी सुन्दर लग रही हो।"

"आप भी ना..." रश्मि ने शर्माते हुए कहा।

रश्मि तो हमेशा से ही सुन्दर थी, लेकिन गर्भावस्था के इन महीनों में उसका शरीर कुछ ऐसे बदल गया जैसे किसी सिद्धहस्थ मूर्तिकार ने फुर्सत से उसे तराशा हो। बिलकुल जैसे कोई अति सुन्दर खजुराहो की मूरत! सुन्दर, लावण्य से परिपूरित मुखड़ा, गुलाबी रसीले होंठ, मादक स्तन (स्पष्ट रूप से उनका आकार बढ़ गया था), सुडौल-गोल नितंब, और पेट के सामने सौम्य उभार! हमारा बच्चा! और इन सबके ऊपर, एक प्यारी-भोली सी सूरत। आज वह वाकई रति का अवतार लग रही थी। और हलके गुलाबी साड़ी-ब्लाउज में वह एकदम क़यामत ढा रही थी। मैंने भाग कर बिना कोई देर किये अपना कैमरा निकला और रश्मि की ना-नुकुर के बावजूद उसकी कई सारी तस्वीरें उतार लीं। मैंने मन ही मन निर्णय लिया की अब से गर्भावस्था के हर महीने की नग्न तस्वीरें लूँगा... बुढापे में साथ में याद करेंगे!

तीन हफ्ते हाथ से काम चलाने के बाद मैं भी रश्मि के साथ के लिए व्याकुल था। मैंने रश्मि के मुख को अपने हाथों में ले कर उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए। रश्मि तुरंत ही मेरा साथ देने लगती है : मैं मस्त होकर उसके मीठे होंठ और रस-भरे मुख को चूसने लगता हूँ। ऐसे ही चूमते हुए मैं उसकी साड़ी उठाने लगता हूँ। रश्मि भी उत्तेजित हो गयी थी - उसकी सांसे अब काफी तेज चल रही थीं। उन्माद में आकर उसने मुझे अपनी बाहों में जकड लिया। चूमते हुए उसकी सांसो की कामुक सिसकियां मुझे अपने चेहरे पर महसूस होने लगीं। मै इस समय अपने एक हाथ से उसकी नंगी जांघ सहला रहा था। इस पर रश्मि ने चुम्बन तोड़ कर कहा,

“जानू, बेड पर चलते हैं?”

मैंने इस बात पर उसको अपनी दोनों बाहों में उठा लिया और उसको चूमते हुए बेडरूम तक ले जाकर, पूरी सावधानी से बिस्तर पर लिटा दिया। अब मैं आराम से उसके बगल लेट कर उसको चूम रहा था – अत्यधिक घर्षण, चुम्बन और चूषण से उसके होंठ सुर्ख लाल रंग के हो गए थे। हम दोनों के मुँह अब तक काफी गरम हो गए थे, और मुँह ही क्या, हमारे शरीर भी!

मैंने रश्मि की साड़ी पूरी उठा दी – आश्चर्य, उसने नीचे चड्ढी नहीं पहनी हुई थी। मैंने उसको छेड़ने के लिए उसकी योनि के आस-पास की जगह को देर तक सहलाता रहा – कुछ ही देर में वो अपनी कमर को तड़प कर हिलाने लगी। वह कह तो कुछ भी नहीं रही थी, लेकिन उसके भाव पूरी तरह से स्पष्ट थे – “मेरी योनि को कब छेड़ोगे?”

पर मैं उसकी योनि के आस पास ही सहला रहा था, साथ ही साथ उसको चूम रहा था। रश्मि की योनि में अंतर दिख रहा था – रक्त से अतिपूरित हो चले उसके योनि के दोनों होंठ कुछ बड़े लग रहे थे। संभव है की वो बहुत संवेदनशील भी हों! उसका योनि द्वार बंद था, लेकिन आकार बड़ा लग रहा था। अंततः मैंने अपनी जीभ को उसकी योनि से सटाया और जैसे ही अपनी जीभ से उसे कुरेदा, तो उसकी योनि के पट तुरंत खुल गए। अंदर का सामान्यतः गुलाबी हिस्सा कुछ और गुलाबी हो गया था। यह ऐसे तो कोई नई क्रिया नहीं थी – मुख मैथुन हमारे लिए एक तरह से सेक्स के दौरान होने वाला ज़रूरी दस्तूर हो गया था.. लेकिन गर्भवती योनि पर मौखिक क्रिया काफी रोचक लग रही थी। कुछ देर रश्मि की योनि को चूमने चाटने के बाद,

“जानू, तेरी चूत तो क्या मस्त लग रही है... देखो, फूल कर कैसी कुप्पा हो गयी है!”

“आह्ह्ह! छी! कैसे गन्दी बात बोल रहे हैं! बच्चा सुनेगा तो क्या सीखेगा? जो करना है चुपचाप करिए!” मीठी झिड़की!

“गन्दी बात क्या है? चूत का मतलब है आम! ये भी तो आम जैसी रसीली हो गयी है..”

“हाँ जी हाँ! सब मालूम है मुझे आपका.. आप अपनी शब्दावली अपने पास रखिए.. ऊह्ह्ह!” मैंने जोर से उसके भगनासे को छेड़ा।

साड़ी का कपड़ा हस्तक्षेप कर रहा था, इसलिए मैंने उठ कर रश्मि का निचला हिस्सा निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में उसकी साड़ी और पेटीकोट दोनों ही उसके शरीर से अलग हो गए।

“इतनी देर तक, इतनी मेहनत करने के बाद मैंने साड़ी पहनी थी... एक घंटा भी शरीर पर नहीं रही..” रश्मि ने झूठा गुस्सा दिखाया।

“अच्छा जी, मुझे लगा की तुमको नंगी रहना अच्छा लगता है!”

“मुझे नहीं... वो आपको अच्छा लगता है!”

“हाँ... वो बात तो है!” कह कर मैंने उसकी ब्लाउज के बटन खोलने का उपक्रम किया। कुछ ही पलों में ब्लाउज रश्मि की छाती से अलग हो गयी। रश्मि ने नीचे ब्रा नहीं पहनी थी। मैंने एक पल रुक कर उसके बदले हुए स्तनों को देखा – रश्मि की नज़र मेरे चेहरे पर थी, मानो वो मेरे हाव भाव देखना चाहती हो। गर्भाधान के पहले रश्मि के स्तनाग्र गहरे भूरे रंग के थे, और बेहद प्यारे लगते थे। इस समय उनमें हल्का सा कालापन आ गया था – आबनूस जैसा रंग! और areola का आकार भी कुछ बढ़ गया था। सच कहता हूँ, किसी और समय ऐसा होता तो निराशा लगती, लेकिन इस समय उसके स्तन मुझे अत्यंत आकर्षक लग रहे थे। प्यारे प्यारे स्तन!

“ब्यूटीफुल!” कह कर मैंने अपने मुँह से लपक कर उसके एक निप्पल को दबोच लिया और उत्साह से उसको पीने लगा। रश्मि आह-आह कर के तड़पने लगी और मेरे बालों को कस के पकड़ने लगी।

“आह.. जानू जानू.. इस्स्स्स! दर्द होता है.. धीरे आह्ह... धीरे!” वो बड़बड़ा रही थी।

“स्स्स्स धीरे धीरे कैसे करूँ? कितनी सुन्दर चून्चियां हैं तेरी..” कह कर मैंने उसके स्तनाग्र बारी बारी से दाँतों के बीच लेकर काटने लगा।

“मैं तो इनमें से दूध की एक एक बूँद चूस लूँगा!”

“जानू! सच में.. आह! दर्द होता है.. कुछ रहम करो.. उफ़!”

रश्मि ने ऐसी प्रतिक्रिया कभी नहीं दी.. सचमुच उसको दर्द हो रहा होगा। मैंने उसके स्तनों को इस हमले से राहत दी। रश्मि दोनों हाथों से अपने एक एक स्तन थाम कर राहत की सांसे भरने लगी, और कुछ देर बाद बोली,

“अब आप इन पर सेंधमारी करना बंद कीजिए.. हमारे होने वाले बच्चे की डेयरी है यहाँ!”

“हैं? क्या मतलब? मेरा पत्ता साफ़? इतना बड़ा धोखा!!”

“ही ही ही...” रश्मि खिलखिला कर हंस पड़ी, “अरे बाबा! नहीं.. ऐसा मैंने कब कहा? सब कुछ आप का ही तो है... लेकिन एक साल तक आप दूसरे नंबर पर हैं... आप भी दूध पीना.. लेकिन हमारे बच्चे के बाद! समझे मेरे साजन?” कह कर उसने दुलार से मेरे बालों में हाथ फिराया।

“बस.. एक ही साल तक पिलाओगी?”

“हाँ.. उसको बस एक साल... लेकिन उसके पापा को, पूरी उम्र!”

“हम्म... तो अब मुझे जूनियर की जूठन खानी पड़ेगी..”

“न बाबा... खाना नहीं.. बस पीना...”

रश्मि की बात पर हम दोनों खुल कर हंसने लगे।

“ठीक है... मम्मी की चून्चियां नहीं तो चूत ही सही..” कह कर मैंने रश्मि की योनि पर हमला किया।

“जानू...!” रश्मि चिहुंक उठी, “लैंग्वेज! ... बिलकुल बेशरम हो!”

मैंने नए अंदाज़ में रश्मि की योनि चाटनी शुरू की – जैसे बाघ पानी पीता है न? लपलपा कर! ठीक उसी प्रकार मेरी जीभ भी रश्मि की योनि से खेल रही थी... रश्मि की सांसें प्रतिक्रिया स्वरुप तेजी से चलने लगी.. उत्तेजना में वो कसमसा मुझे प्रोत्साहन देने लगी.. वह उत्तेजना के चरम पर जल्दी जल्दी पहुँच रही थी, और इस कारण उसका शरीर पीछे की ओर तन गया था – धनुष समान! उसके हाथ मेरे सर पर दबाव डाल रहे थे। मैने उसके हाथों को अपने सर से हटा कर, उसकी उँगलियों को बारी बारी से अपने मुंह में ले कर चूसने चाटने लगा। रश्मि उन्माद में कराह उठी – उसकी कमर हिलाने लगी... ठीक वैसे ही जैसे सम्भोग के दौरान करती है। उसके हाथों को छोड़ कर मैंने जैसे ही उसकी योनि पर वापस जीभ लगाई उसकी योनि से सिरप जैसा द्रव बहने लगा, और उसके बदन में कंपकंपी आने लगी। मै धीरे धीरे, स्वाद ले लेकर उस द्रव को चाट रहा था। बढ़िया स्वाद! नमकीन, खट्टा, और कुछ अनजाने स्वाद – सबका मिला-जुला।

रश्मि मुँह से अंग्रेजी का ओ बनाए हुए तेजी से साँसे ले रही थी – इस कारण हलकी सीटी सी बजती सुनाई दी। मैंने सर उठा कर उसकी तरफ देखा – रश्मि ने आंखे कस कर मूंदी हुई थी, और कांप रही थी। मैने वापस उसकी योनि का मांस अपने होठों के बीच लिया और होंठों की मदद से दबाने, और चाटने लगा। इस नए आक्रमण से वो पूरी तरह से तड़प उठी। मैंने विभिन्न गतियों और तरीकों से उसकी योनि के दोनों होंठों और भगनासे को चाट रहा था। उसी लय में लय मिलाते हुए रश्मि भी अपनी कमर को आगे-पीछे हिला रही थी। रश्मि दोबारा अपने चरम के निकट पहुँच गई। लेकिन उसको प्राप्त करवाने के लिए मुझे एक आखिरी हमला करना था – मैंने उसकी योनि मुख को अपनी तर्जनी और अंगूठे की सहायता से फैलाया, और अपने मुँह को अन्दर दे मारा। जितना संभव था, मैंने अपनी जीभ को उसकी योनि के भीतर तक ठेल दिया – उसकी योनि की अंदरूनी दीवारें मानो भूचाल उत्पन्न कर रही थीं – तेजी से संकुचन और फैलाव हो रहा था। शीघ्र ही उसकी योनि के भीतर का ज्वालामुखी फट पड़ा। मुझे पुनः नवपरिचित नमकीन-खट्टा स्वाद एक गरम द्रव के साथ अपनी जीभ पर महसूस हुआ। मै अपनी जीभ को यथासंभव उसकी योनि के अंदर तक डाल देता हूँ।

“आआह्ह्ह्ह!” रश्मि चीख उठती है। उत्तेजनावश वो अपने पैरों से मेरी गरदन को जकड़ लेती है और कमर को मेरे मुंह ठेलने की कोशिश कर रही थी। मैं अपनी जीभ को अंदर-बाहर अंदर-बाहर करना बंद नहीं करता। उसका रिसता हुआ योनि-रस मैं पूरी तरह से पी लेता हूँ। रश्मि का शरीर एकदम अकड़ जाता है; रति-निष्पत्ति के बाद भी उसका शरीर रह रह कर झटके खा रहा होता है। जब उत्तेजना कुछ कम हुई तो रश्मि की सिसकारी छूट गई, “स्स्स्स...सीईइइ हम्म्म्म”

अंततः मैं उसको छोड़ता हूँ, और मुस्कुराते हुए देखता हूँ। रश्मि संतुष्टि और प्रसन्नता भरी निगाहों मुझे देखती है। मैंने ऊपर जा कर उसको एक बार फिर से चूमा, और उसके सर पर हाथ फिराते हुए बोला,

“जानू.. लंड ले सकोगी?”

रश्मि ने सर हिला कर हामी भरी और फिर कुछ रुक कर कहा, “जानू... बच्चा सुनता है!”
 
मैं सिर्फ मुस्कुराया। इतनी देर तक यह सब क्रियाएँ करने के कारण, मेरा लिंग अपने अधिकतम फैलाव और उत्थान पर था। मुझे मालूम था की बस दो तीन मिनट की ही बात है.. मैं बिस्तर से उठा और रश्मि को उसके नितम्ब पकड़ कर बिस्तर के सिरे की ओर खिसकाया। कुछ इस तरह जिससे उसके पैर घुटने के नीचे से लटक रहे हों, और योनि बिस्तर के किनारे के ऊपर रहे, और ऊपर का पूरा शरीर बिस्तर पर चित लेटा रहे। मैं रश्मि को घुटने के बल खड़ा हो कर भोगने वाला था। यह एक सुरक्षित आसन था – रश्मि के पेट पर मेरा रत्ती भर भार भी नहीं पड़ता।

सामने घुटने के बल बैठ कर, मैंने रश्मि की टांगों को मेरी कमर के गिर्द घेर लिया और एक जांघ को कस कर पकड़ लिया। दूसरे हाथ से मैंने अपने लिंग को रश्मि की योनि-द्वार पर टिकाया और धीरे धीरे अन्दर तक घुसा दिया। लिंग इतना उत्तेजित था की वो रश्मि की योनि में ऐसे घुस गया जैसे की मक्खन में गरम छुरी! इस समय हम दोनों के जघन क्षेत्र आपस में चिपक गए थे – मतलब मेरे लिंग की पूरी लम्बाई इस समय रश्मि के अन्दर थी। जैसे तलवार के लिए सबसे सुरक्षित स्थान उसका म्यान होती है, ठीक उसी तरह एक उत्तेजित लिंग के लिए सबसे सुरक्षित स्थान एक उतनी ही उत्तेजित योनि होती है – उतनी ही उत्तेजित... गरम गीलापन और फिसलन लिए! काफी देर से उत्तेजित मेरे लिंग को जब रश्मि की योनि ने प्यार से जकड़ा तो मुझे, और मेरे लिंग को को बहुत सकून मिला। हम दोनों प्रेमालिंगन में बांध गए।

इस अवस्था में मुझे बदमाशी सूझी।

मैंने रश्मि के पेट पर हाथ फिराते हुए कहा, “मेरे बच्चे, मैं आपका पापा बोल रहा हूँ! आपकी मम्मी और मैं, आपको खूब प्यार करते हैं... मैं आपकी मम्मी को भी खूब प्यार करता हूँ... उसी प्यार के कारण आप बन रहे हो!”

रश्मि मेरी बातों पर मुस्कुरा रही थी.. मैंने कहना जारी रखा, “जब आप मम्मी के अन्दर से बाहर आ जाओगे, तो हम ठीक से शेक-हैण्ड करेंगे... फिलहाल मैं आपको अपने लिंग से छू रहा हूँ.. इसे पहचान लो.. जब तक आप बाहर नहीं आओगे तब तक आपका अपने पापा का यही परिचय है..”

रश्मि ने प्यार से मेरे हाथ पर एक चपत लगाई, “बोला न, आप चुप-चाप अपना काम करिए!”

“देखा बच्चे.. आपकी माँ मेरा लंड लेने के लिए कितना ललायित रहती है?”

“चुप बेशरम..”

मैंने ज्यादा छेड़ छाड़ न करते हुए सीधा मुद्दे पर आने की सोची – मैं सम्हाल कर धीरे धीरे रश्मि को भोग रहा था। हलके झटके, नया आसन, और रश्मि की नई अवस्था! रह रह कर चूमते हुए मैं रश्मि के साथ सम्भोग कर रहा था। रश्मि ने इससे कहीं अधिक प्रबल सम्भोग किया है, लेकिन इस मृदुल और सौम्य सम्भोग पर भी वो सुख भरी सिस्कारियां ले रही थी... कमाल है! वो हर झटके पर सिस्कारियां या आहें भर रही थी!

‘अच्छा है! मुझे बहुत कुछ नया नहीं सोचना पड़ेगा!’

मैंने नीचे से लिंग की क्रिया के साथ साथ, रश्मि के मुख, गालों, और गर्दन पर चुम्बन, चूषण और कतरन जारी रखी। और हाथों से उसके मांसल स्तनों का मर्दन भी! चौतरफा हमला! अभी केवल तीन चार मिनट ही हुए थे, और जैसे मैंने सोचा था, मैं रश्मि के अन्दर ही स्खलित हो गया। कोई उल्लेखनीय तरीके से मैंने आज सम्भोग नहीं किया था, लेकिन आज मुझे बहुत ही सुखद अहसास हुआ! रश्मि ने मुझे अपने आलिंगन में कैद कर लिया... और मैंने उसे अपनी बाँहों में कस कर भींच लिया।

“जानू हमरे...” कुछ देर सुस्ताने के बाद रश्मि ने कहा, “... आज वाला.. द बेस्ट था..” और कह कर उसने मुझे होंठों पर चूम लिया।

मैंने उसको छेड़ा, “आज वाला क्या?”

“यही..”

“यही क्या?”

“से...क्स...”

“नहीं.. हिन्दी में कहो?”

“चलो हटो जी.. आपको तो हमेशा मजाक सूझता है..” रश्मि शरमाई।

“मज़ाक! अरे वाह! ये तो वही बात हुई.. गुड़ खाए, और गुलगुले से परहेज़! चलो बताओ.. हमने अभी क्या किया?”

“प्लीज़ जानू...”

“अरे बोल न..”

“आप नहीं मानोगे?”

“बिलकुल नहीं...”

“ठीक है बाबा... चुदाई.. बस! अब खुश?”

“हाँ..! लेकिन... अब पूरा बोलो...”

“जानू मेरे, आज की चुदाई ‘द बेस्ट’ थी!”

“वैरी गुड! आई ऍम सो हैप्पी!”

“मालूम था.. हमारा बच्चा अगर बिगड़ा न.. तो आपकी जिम्मेदारी है। ... और अगर इससे आपका पेट भर गया हो तो खाना खा लें?“

सुमन इस घटना के एक सप्ताह बाद बैंगलोर आई। अकेले नहीं आई थी, साथ में मेरे सास और ससुर भी थे। एक बड़ी ही लम्बी चौड़ी रेल यात्रा करी थी उन लोगों ने! सुमन के लिए तो एकदम अनोखा अनुभव था! खैर, गनीमत यह थी की उनकी ट्रेन सवेरे ही आ गई, और छुट्टी के दिन आई, इसलिए उनको वहाँ से आगे कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा! रेलवे स्टेशन पर मैं ही गया था सभी को रिसीव करने... रश्मि घर पर ही रह कर नाश्ता बनाने का काम कर रही थी।

घर आने पर हम लोग ठीक से मिले। अब चूंकि वो दोनों पहली बार अपनी बेटी के ससुराल (या की घर कह लीजिए) आये थे, इसलिए उन्होंने अपने साथ कोई न कोई भेंट लाना ज़रूरी समझा। न जाने कैसी परम्परा या पद्धति निभा रहे थे... भई, जो परम्पराएँ धन का अपव्यय करें, उनको न ही निभाया जाए, उसी में हमारी भलाई है। वो रश्मि के लिए कुछ जेवर और मेरे लिए रुपए और कपड़ों की भेंट लाये थे। घर की माली हालत तो मुझे मालूम ही थी, इसलिए मैं खूब बिगड़ा, और उनसे आइन्दा फिजूलखर्ची न करने की कसमें दिलवायीं। इतने दिनों बाद मिले, और बिना वजह की बात पर बहस हो गयी। खैर! ससुर जी ने कहा की इस बार फसल अच्छी हुई है, और कमाई भी.. इसलिए देन व्यवहार तो करने का बनता है.. और वैसे भी उनका जो कुछ भी है, वो दोनों बेटियों के लिए ही तो है! अपने साथ थोड़े न ले जायेंगे! रुढ़िवादी लोग और उनकी सोच!

सुमन अब एक अत्यंत खूबसूरत तरुणी के रूप में विकसित हो गयी थी.. इतने दिनों के बाद देख भी तो रहा हूँ उसको! वो मुझे मुस्कुराते हुए देख रही थी।

मैंने आगे बढ़कर उसकी एक हथेली को अपने हाथ में ले लिया, “अरे वाह! कितनी सुन्दर लग रही है मेरी गुड़िया... तुम तो खूब प्यारी हो गई हो..!” कह कर मैंने उसको अपने गले से लगा लिया। सुमन शरमाते हुए मेरे सीने में अपना मुँह छुपाए दुबक गई। लेकिन मैंने उसको छेड़ना बंद नहीं किया,

“मैं तुम्हारे गालों का सेब खा लूँ?”

“नहीईई.. ही ही ही..” कह कर हँसते हुए वो मेरे आलिंगन से बाहर निकलने के लिए कसमसाने लगी..

“अरे! क्यों भई, मुझे पप्पी नहीं दोगी?”

सुमन शर्म से लाल हो गई, और बोली, “जीजू, अब मैं बड़ी हो गयी हूँ।“

“हंय? बड़ी हो गयी हो? कब? और कहाँ से? मुझे तो नहीं दिखा!” साफ़ झूठ! दिख तो सब रहा था, लेकिन फिर भी, मैंने उसको छेड़ा! लेकिन मेरे लिए सुमन अभी भी बच्ची ही थी।

“उम्म्म... मुझे नहीं पता। लेकिन मम्मी मुझे अब फ्रॉक पहनने नहीं देती... कहती है की तू बड़ी हो गयी है...”

“मम्मी ऐसा कहती है? चलो, उनके साथ झगड़ा करते हैं! ... लेकिन उससे पहले...” कहते हुए मैंने उसकी ठुड्डी को ऊपर उठाते हुए उसके दोनों गालों पर एक-एक पप्पी ले ही ली। शर्म से उसके गाल और लाल हो गए और वो मुझसे छूट कर भाग खड़ी हुई।

रश्मि इस समय सबके आकर्षण का केंद्र थी, इसलिए मैंने कुछ काम के बहाने वहाँ से छुट्टी ली, और बाहर निकल गया। सारे काम निबटाते और वापस आते आते दोपहर हो गई.. और कोई डेढ़ बज गए! सासु माँ के आने का एक लाभ होता है (मेरे सभी विवाहित मित्र इस बात से सहमत होंगे) – और वह है समय पर स्वादिष्ट भोजन! वापस आया तो देखा की सभी मेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं। खैर, मैंने जल्दी जल्दी नहाया, और फिर स्वादिष्ट गढ़वाली व्यंजनों का भोग लगाया। और फिर सुखभरी नींद सो गए।

शाम को चाय पर मैंने सुमन से उसके संभावित रिजल्ट के बारे में पूछा। उसको पूरी उम्मीद थी की अच्छा रिजल्ट आएगा। मैंने ससुर जी और सुमन से विधिवत सुमन की आगे की पढाई के बारे में चर्चा करी। स्कूल और एक्साम की बातें करते करते मुझे अपना बचपन और उससे जुडी बातें याद आने लगीं। पढाई वाला समय तो जैसे तैसे ही बीतता था, लेकिन परीक्षा के दिनों में अलग ही प्रकार की मस्ती होती थी। दिन भर क्लास में बैठने के झंझट से पूरी तरह मुक्ति और एक्साम के बाद पूरा दिन मस्ती और खेल कूद! मजे की बात यह की न तो टीचर की फटकार पड़ती और न ही माँ की डांट! बेटा एक्साम दे कर जो आया है! पूरा दिन स्कूल में रहना भी नहीं पड़ता। और बच्चे तो एक्साम से बहुत डरते, लेकिन मैं साल भर परीक्षा के समय का ही इंतज़ार करता था – सोचिये न, पूरे साल में यही वो समय होता था जब भारी-भरकम बस्ते के बोझ से छुटकारा मिलता था। एक्साम के लिए मैं एक पोलीबैग में writing pad, पेंसिल, कलम, रबर, इत्यादि लेकर लेकर पहुँच जाता। उसके पहले नाश्ते में माँ मुझे सब्जी-परांठे और फिर दही-चीनी खिलाती ताकि मेरे साल भर के पाप धुल जायें, और मुझ पर माँ सरस्वती की कृपा हो! पुरानी यादें ताज़ा हो गईं!

खैर, जैसा की मैंने पहले लिखा है, मैंने सुमन और ससुर जी को यहाँ की पढाई की गुणवत्ता, और इस कारण, सीखने और करियर बनाने के अनेक अवसरों के बारे में समझाया। उनको यह भी समझाया की आज कल तो अनगिनत राहें हैं, जिन पर चल कर बढ़िया करियर बनाया जा सकता है। बातें तो उनको समझ आईं, लेकिन वो काफी देर तक परम्परा और लोग क्या कहेंगे (अगर लड़की अपनी दीदी जीजा के यहाँ रहेगी तो..) का राग आलापते रहे।

मैंने और रश्मि ने समझाया की लोगों के कहने से क्या फर्क पड़ता है? अच्छा पढ़ लिख लेगी, तो अपने पैरों पर खाड़ी हो सकेगी.. और फिर, शादी ढूँढने में भी तो कितनी आसानी हो जायेगी! हमारे इस तर्क से वो अंततः चुप हो गए। सुमन को भी मैंने काफी सारा ज्ञान दिया, जो यहाँ सब कुछ लिखना ज़रूरी नहीं है.. लेकिन अंततः यह तय हो गया की सुमन अपनी आगे की पढाई यहीं हमारे साथ रह कर करेगी। सासु माँ ने बीच में एक टिप्पणी दी की दोनों बच्चे उनसे दूर हो जाएँगे.. जिस पर मैंने कहा की आपकी तो दोनों ही बेटियाँ है.. कभी न कभी तो उन्हें आपसे दूर जाना ही है.. और यह तो सुमन के भले के लिए हैं.. और अगर उनको इतना ही दुःख है, तो क्यों न वो दोनों भी हमारे साथ ही रहें? (मेरी नज़र में इस बात में कोई बुराई नहीं थी) लेकिन उन्होंने मेरी इस बात बार तौबा कर ली और बात वहीँ ख़तम हो गयी।

शाम को हमने पड़ोसियों से भी मुलाकात करी – देवरामनी दम्पत्ति सुमन को देख कर इतने खुश हुए की बस उसको गोद लेने की ही कसर रह गयी थी! सुमन वाकई गुड़िया जैसी थी!

मेरे सास ससुर बस तीन दिन ही यहाँ रहने वाले थे, इसलिए मैंने रात को बाहर जा कर खाने का प्रोग्राम बनाया – जिससे किसी को काम न करना पड़े और ज्यादा समय बात चीत करने में व्यतीत हो। सुमन ख़ास तौर पर उत्साहित थी – उसको देख कर मुझे रश्मि की याद हो आती, जब वो पहली बार बैंगलोर आई थी। सब कुछ नया नया, सम्मोहक! जो लोग यहाँ रहते हैं उनको समझ आता है की बिना वजह का नाटक है शहर में रहना! अगर रोजगार और व्यवसाय के साधन हों, तो छोटी जगह ही ठीक है.. कम प्रदूषण, कम लोग, और ज्यादा संसाधन! जीवन जीने की गुणवत्ता तो ऐसे ही माहौल में होती है। एक और बात मालूम हुई की अगले दिन सुमन का जन्मदिन भी था! बहुत बढ़िया! (मुझे बिना बताये हुए रश्मि ने सुमन के जन्मदिन के लिए प्लानिंग पहले ही कर रखी थी)।

खैर, खा पीकर हम लोग देर रात घर वापस आये। मेरे सास ससुर यात्रा से काफी थक भी गए थे, और उनको इतनी देर तक जागने का ख़ास अनुभव भी नहीं था। इसलिए हमने उनको दूसरा वाला कमरा सोने के लिए दे दिया और सुमन को हमारे साथ ही सोने को कह दिया। उन्होंने ज्यादा हील हुज्जत नहीं करी (क्योंकि हम तीनों पहले भी एक साथ सो चुके हैं) और सो गए।

“भई, आज तो मैं बीच में सोऊँगा!” मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करते हुए कहा।

“वह क्यूँ भला??” रश्मि ने पूछा!

“अरे यार! इतनी सुन्दर दो-दो लड़कियों के साथ सोने का मौका बार बार थोड़े न मिलता है!”

“अच्छा जी! साली आई, तो साहब का दिल डोल गया?”

“अरे मैं क्या चीज़ हूँ! ऐसी सुंदरियों को देख कर तो ऋषियों का मन भी डोल जाएगा! हा हा!”

“नहीं बाबा! दीदी, तुम ही बीच में लेटो! नहीं तो जीजू मेरे सेब खायेंगे!” सुमन ने भोलेपन से कहा। मैं

और रश्मि दो पल एकदम से चुप हो गए, और फिर एक दूसरे की तरफ देख कर ठहाके मार कर हंसने लगे (सुमन का मतलब गालों के सेब से था.. और हमने कुछ और ही सोच लिया)।

“मेरी प्यारी बहना! तू निरी बुद्धू है!”

कहते हुए रश्मि ने सुमन के दोनों गालों को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों पर एक चुम्बन दे दिया।

“आई लव यू!”

“आई लव यू टू, दीदी!” कह कर सुमन रश्मि से लिपट गयी।

“हम्म.. भारत मिलाप संपन्न हो गया हो तो अब सोने का उपक्रम करें?”

“कोई चिढ़ गया है लगता है...” रश्मि ने मेरी खिंचाई करी।

“हाँ दीदी! जलने की गंध भी आ रही है... ही ही!”

“और नहीं तो क्या! अच्छा खासा बीच में सोने वाला था! मेरा पत्ता साफ़ कर दिया!”

“हा हा!”

“हा हा!”

“अच्छा... चल नीलू, सोने की तैयारी करते हैं। तू चेंज करने के कपड़े लाई है?”

“हैं? नहीं!”

“कोई बात नहीं.. मैं तुमको नाईटी देती हूँ.. वो पहन कर सो जाना। ओके?” कह कर रश्मि ने अलमारी से ढूंढ कर एक नाईटी निकाली – मैंने पहचानी, वो हमारे हनीमून के दौरान की थी! अभी तक सम्हाल कर रखी है इसने!

सुमन ने उसको देखा – उसकी आँखें शर्म से चौड़ी हो गईं, “दीदी, मैं इसको कैसे पहनूंगी? इसमें तो सब दिखता है!”

“अरे रात में तुमको कौन देख रहा है.. अभी पहन लो, कल हम तुमको शौपिंग करने ले चलेंगे! ठीक है?”

“ठीक है..” सुमन ने अनिश्चय से कहा, और नाईटी लेकर बाथरूम में घुस गयी। इसी बीच रश्मि ने अपने कपड़े उतार कर एक कीमोनो स्टाइल की नाईटी पहन ली (यह सामने से खुलती है, और उसमें गिन कर सिर्फ दो बटन थे। और सपोर्ट के लिए बीच में एक फीता लगा हुआ था, जिसको सामने बाँधा जा सकता था – ठीक नहाने वाले रोब जैसा), और मैंने भी रश्मि से ही मिलता जुलता रोब पहना हुआ था (बस, सुमन के कारण अंडरवियर अभी भी पहना हुआ था, जिसको मैं रात में बत्तियां बुझने पर उतार देने के मूड में था)। खैर, कोई पांच मिनट बाद सुमन वापस कमरे के अन्दर आई।

सुमन का परिप्रेक्ष्य

जीजू बिस्तर के सिरहाने पर एक तकिया के सहारे पीठ टिकाये हुए एक किताब पढ़ रहे थे। दूसरी तरफ दीदी अपने ड्रेसिंग टेबल के सामने एक स्टूल पर बैठ कर अपने बालों में कंघी कर रही थी।

‘दीदी के स्तन कितने बड़े हो गए हैं पिछली बार से!’ मैंने सोचा। बालों में कंघी करते समय कभी कभी वो बालों के सिरे पर उलझ जाती, और उसको सुलझाने के चक्कर में दीदी को ज्यादा झटके लगाने पड़ते.. और हर झटके पर उसके स्तन कैसे झूल जाते! हाँ! उसके स्तनों को निश्चित रूप से पिछली बार से कहीं ज्यादा बड़े लग रहे थे। उसके पेट पर उभार होने के कारण थोड़ा मोटा लग रहा था, और उसके कूल्हे कुछ और व्यापक हो गए थे। कुल-मिला कर दीदी अभी और भी खूबसूरत लग रही थी। मैं मन्त्र मुग्ध हो कर उसे देख रही थी : अचानक मैंने देखा की दीदी ने आईने से मुझे देखते हुए देख लिया... प्रतिक्रिया में उसके होंठों पर वही परिचित मीठी मुस्कान आ गई।

“आ गई? चल.. अभी सो जाते हैं.. जानू.. बस.. अब पढ़ने का बहाना करना बंद करो! हे हे हे!” दीदी ने जीजू को छेड़ा।

यह बिस्तर हमारे घर में सभी पलंगों से बड़ा था। इस पर तीन लोग तो बहुत ही आराम से लेट सकते थे। जीजू ने कुछ तो कहा, अभी याद नहीं है, और बिस्तर के एक किनारे पर लेट गए, बीच में दीदी चित हो कर लेटी, और मैं दूसरे किनारे पर! मैं दीदी से कुछ दूरी पर लेटी हुई थी, लेकिन दीदी ने मुझे खींच कर अपने बिलकुल बगल में लिटा लिया। कमरे में बढ़िया आरामदायक ठंडक थी (वातानुकूलन चल रहा था), इसलिए हमने ऊपर से चद्दर ओढ़ी हुई थी। कमरे की बत्तियों की स्विच जीजू की तरफ थी, जो उन्होंने हमारे लेटते ही बुझा दी।
 
मेरा परिप्रेक्ष्य

मैंने अपने बाईं तरफ करवट लेकर रश्मि को अपनी बाँह के घेरे में ले कर चुम्बन लिया और ‘गुड नाईट’ कहा – लेकिन मैंने अपना हाथ उसके स्तन ही रहने दिया। रश्मि को मेरी किसी हरकत से अब आश्चर्य नहीं होता था, और वो मुझे अपनी मनमानी करने देती थी। उसको मालूम था की उसके हर विरोध का कोई न कोई काट मेरे पास अवश्य होगा। लेकिन सुमन की अनवरत चलने वाली बातें हमें सोने नहीं दे रही थीं।

बैंगलोर कैसा है? लोग कैसे हैं? यहाँ ये कैसे करते हो, वो कैसे करते हो..? कॉलेज कैसा होता है? बाद में पता चला की वह पूरी यात्रा के दौरान सोती रही थी.. इसीलिए इतनी ऊर्जा थी! अब चूंकि मेरे दिमाग में शैतान का वास है, इसलिए मैंने सोचा की क्यों न कुछ मज़ा किया जाय।

सुमन के प्रश्नों का उत्तर देते हुए मैंने रश्मि के दाएँ स्तन को धीरे धीरे दबाना शुरू कर दिया (मैं रश्मि के दाहिनी तरफ था)। मेरी इस हरकत से रश्मि हतप्रभ हो गयी और मूक विरोध दर्शाते हुए उसने अपने दाहिने हाथ से मेरे हाथ को जोर से पकड़ लिया। लेकिन मुझे रोकने के लिए उतना बल अपर्याप्त था, इसलिए कुछ देर कोशिश करने के बाद, उसने हथियार डाल दिए। सुमन ने करवट ले कर रश्मि के बाएँ हाथ पर अपना हाथ रखा हुआ था, इसलिए रश्मि वह हाथ नहीं हटाना चाहती थी। अब मेरा हाथ निर्विघ्न हो कर अपनी मनमानी कर सकता था। कुछ देर कपड़े के ऊपर से ही उसका स्तन-मर्दन करने के बाद मैंने उसकी कीमोनो का सबसे ऊपर वाला बटन खोल दिया। रश्मि को लज्जा तो आ रही थी, लेकिन इस परिस्थिति में रोमांच भी भरा हुआ था। इसलिए उसने इस क्रिया की धारा के साथ बहना उचित समझा।

जब उसने कोई हील हुज्जत नहीं दिखाई, मैंने नीचे वाला बटन भी खोल कर सामने बंधा फीता भी ढीला कर दिया। कीमोनो वैसे भी साटन के कपड़े का था – बिना किसी बंधन के, उसके कीमोनो के दोनों पट अपने आप खुल गए। सुमन को वैसे तो देर सबेर मालूम पड़ ही जाता की उसकी दीदी के शरीर का ऊपरी हिस्सा निर्वस्त्र हो चला है, लेकिन जब उसने अपने हाथ पर रश्मि की नाईटी का कपड़ा महसूस किया तो उसको उत्सुकता हुई। उसने बिना किसी प्रकार की विशेष प्रतिक्रिया दिखाते हुए अपनी बाईं हथेली से रश्मि के बाएँ स्तन को ढक लिया।

रश्मि इस अलग सी छुवन को महसूस कर चिहुँक गयी, 'अरे! सुमन का हाथ मेरे स्तन पर!'

रश्मि आश्चर्यचकित थी, लेकिन वह यह भी समझ रही थी की सुमन उसके स्तन को सिर्फ ढके हुए थी, और कुछ भी नहीं। साथ ही साथ वह अपने जीजू से बातें भी कर रही थी – और उधर उसके जीजू का हाथ रश्मि के दाहिने स्तन का मर्दन कर रहा था। लेकिन चाहे कुछ भी हो – अगर किसी स्त्री को इतने अन्तरंग तरीके से छुआ जाय, तो उसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक ही है। रश्मि ने अनायास अपने स्तन को आगे की ओर ठेल दिया, जिसके कारण उसके स्तन का पर्याप्त हिस्सा मेरे और सुमन दोनों के ही हाथ में आ गया। संभव है की रश्मि की इस हरकत से सुमन को किसी प्रकार की स्वतः-प्रेरणा मिली हो – उसने भी रश्मि के स्तन को धीरे-धीरे दबाना और मसलना शुरू कर दिया। रश्मि के चूचक शीघ्र ही उत्तेजित हो कर उर्ध्व हो गए।

इस समय हम तीनों का मन कहीं और था। हम तीनों ही कुछ देर के लिए चुप हो गए। यह चुप्पी सुमन ने तोड़ी –

“जीजू – दीदी! मैं आपसे कुछ माँगूं तो देंगे?”

“हाँ हाँ! बोलो न?” मैंने कहा।

“उस दिन आप दोनों लोग बुग्यल पर जो कर रहे थे, मेरे सामने करेंगे?”

‘बुग्याल पर? .. ओह गॉड! ये तो सेक्स की बात कर रही है!’

रश्मि: “क्या? पागल हो गयी है?”

मैं: “एक मिनट! सुमन, हम लोग बुग्यल पर सेक्स कर रहे थे। सेक्स किसी को दिखाने के लिए नहीं किया जाता। बल्कि इसलिए किया जाता है, क्योंकि दो लोग - जो प्यार करते हैं – उनको एक दूसरे से और इंटिमेसी, मेरा मतलब है की ऐसा कुछ मिले जो वो और किसी के साथ शेयर नहीं करते। जब तुम्हारी शादी हो जायेगी, तो तुम भी अपने हस्बैंड के साथ खूब सेक्स करना।“

सुमन: “तो फिर आपने मेरे यहाँ रहने के बावजूद दीदी का ब्लाउज क्यों खोला?”

मेरा हाथ उसकी यह बात सुन कर झट से रश्मि के बाएँ स्तन पर चला गया, जिस पर सुमन का हाथ पहले से ही उपस्थित था।

मैं: “व्व्वो.. मैं... तुम्हारी दीदी का दूध पीता हूँ न, इसलिए!”

रश्मि: “धत्त बेशर्म! कुछ भी कहते रहते हो!”

सुमन: “क्या जीजू.. आप तो इतने बड़े हो गए हैं.. फिर भी दूध पीते हैं?”

मैं: “अरे! तो क्या हो गया? तेरी दीदी के दूध देखे हैं न तुमने? कितने मुलायम हैं! हैं न?”

सुमन: “हाँ.. हैं तो!”

मैं: “तो.. बिना इनको पिए मन मानता ही नहीं.. और फिर दूध तो पौष्टिक होता है!”

सुमन: “लेकिन दीदी को तो अभी दूध तो आता ही नहीं..”

मैं: “अरे भई! नहीं आता तो आ जायेगा! पहले से ही प्रैक्टिस कर लेनी चाहिए न!”

रश्मि: “तुम कितने बेशर्म हो! देख न नीलू, तुम ही बताओ अब मैं क्या करूँ? अगर न पिलाऊँ, तो तुम्हारे जीजू ऐसे ही उधम मचाने लगते हैं। वैसे तुझे पता है की वो ऐसे क्यों करते हैं?

सुमन: “बताओ..”

रश्मि: “अरे तुम्हारे जीजू अपनी माँ जी का दूध भी काफी बड़े होने तक पीते रहे। उन्होंने बहुत प्रयास किया, लेकिन ये जनाब! मजाल है जो ये अपनी मां की छाती छोड़ दें!”

सुमन: “तब?”

रश्मि: “तब क्या? माँ ने थक कर ने अपने निप्पल्स पर मिर्ची या नीम वगैरह रगड़ लिया। और जब भी ये जनाब दूध पीने की जिद करते तो तीखा लगने के कारण धीरे धीरे खुद ही माँ का दूध पीना छोड़ते गए।“

सुमन: “लेकिन अभी क्यों करते हैं?”

रश्मि: “आदतें ऐसे थोड़े ही जाती हैं!”

मैं: “अरे यार! कम से कम तुम तो मिर्ची का लेप मत लगाने लगना।“

मेरी इस बात पर रश्मि और सुमन खिलखिला कर हंस पड़ीं!

रश्मि: “नहीं मेरे जानू.. मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगी! आप मन भर कर पीजिये! मेरा सब कुछ आपका ही है..”

मैं: “सुना नीलू..” कहते हुए मैंने रश्मि के एक निप्पल को थोड़ा जोर से दबाया, जिससे उसकी सिसकी निकल गयी। सुमन को वैसे तो मालूम ही है की उसके दीदी जीजू कहीं भी अपने प्यार का इजहार करने में शर्म महसूस नहीं करते... फिर जगह चाहे कोई भी हो!

सुमन (हमारी छेड़खानी को अनसुना और अनदेखा करते हुए): “जीजू दीदी.. मैं आप दोनों को खूब प्यार करती हूँ। उस दिन जब मैंने आप दोनों को.... सेक्स... (यह शब्द बोलते हुए वह थोडा सा हिचकिचा गयी) करते हुए दूर से देखा था। मैं बस इतना कह रही हूँ की आज मुझे आप पास से कर के दिखा दो! यह मेरे लिए सबसे बड़ा गिफ्ट होगा।”

रश्मि: “लेकिन नीलू, तेरे सामने करते हुए मुझे शरम आएगी।“ हम सभी जानते थे की यह पूरी तरह सच नहीं है।

सुमन: “प्लीज!”

रश्मि: “लेकिन तू अभी बहुत छोटी है, इन सब बातों को समझने के लिए!”

सुमन: “मैं कोई छोटी वोटी नहीं हूँ! और तुम भी मुझसे बहुत बड़ी नहीं हो। मैं अभी उतनी बड़ी हूँ, जिस उम्र में तुमने जीजू से शादी कर ली थी! और जीजू, अगर आप दीदी के बजाय मुझे पसंद करते तो?”

मैं (मन में): ‘हे भगवान्! छोटी उम्र का विमोह!’

मैं (प्रक्तक्ष्य): “अगर मैं तुमको पसंद करता तो मैं इंतज़ार करता – तुम्हारे बड़े होने का!”

सुमन: “जीजू! मैं बड़ी हूँ... और... और... मैं सिर्फ देखना चाहती हूँ – करना नहीं। आप दोनों लोग उस दिन बहुत सुन्दर लग रहे थे। प्लीज़, एक बार फिर से कर लो!”

मैं: “जानती हो, अगर किसी को मालूम पड़ा, तो मैं और तुम्हारी दीदी, हम दोनों ही जेल के अन्दर होंगे!”

सुमन: “जेल के अन्दर क्यों होंगे? मैं अब बड़ी हो गयी हूँ... वैसे भी, मैं किसी को क्यों कहूँगी? अगर आप लोग यह करेंगे तो मेरे लिए। किसी और के लिए थोड़े ही!“

मैं: “अब कैसे समझाऊँ तुझे!”

मैं (रश्मि से): “आप क्या कहती हैं जानू?”

रश्मि (शर्माते हुए): “आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? बिना कपड़ो के तो मैं पड़ी हूँ!”

ऐसे खुलेपन से सेक्स की दावत! मेरा मन तो बन गया! वैसे भी, नींद तो कोसों दूर है.. मैं रजामंदी से मुस्कुराया।

सुमन (रश्मि से): “दीदी, तुम मुझे एक बात करने दोगी?”

रश्मि: “क्या?”

सुमन ने रश्मि के ऊपर से चद्दर हटाते हुए उसके निप्पल को अपने मुँह में भर कर चूसना आरम्भ कर दिया। सुमन के मुँह की छुवन और कमरे की ठंडक ने रश्मि के शरीर में एक बिलकुल अनूठा एहसास उभार दिया। उसके दोनों निप्पल लगभग तुरंत ही इस प्रकार कड़े हो गए मानो की वो रक्त संचार की प्रबलता से चटक जायेंगे! उसकी योनि में नमी भी एक भयावह अनुपात में बढ़ गयी। अपने ही पति के सामने उसके शरीर का इस प्रकार से अन्तरंग अतिक्रमण होना, रश्मि के इस एहसास का एक कारण हो सकता है। रश्मि वाकई यह यकीन ही नहीं कर पा रही थी की वह अपनी ही बहन के कारण इस कदर कामोत्तेजित हो रही थी। उसकी आँखें बंद थी। कामोद्दीपन से अभिभूत रश्मि, सुमन को रोकने में असमर्थ थी – इसलिए वह उसको स्तनपान करने से रोक नहीं पाई।

लेकिन जिस तरह से अप्रत्याशित रूप से सुमन ने यह हरकत आरम्भ करी थी, उसी अप्रत्याशित तरीके से उसने रोक भी दी। सुमन ने रश्मि को देखते हुए कहा,

“आई ऍम सॉरी, दीदी! पता नहीं मेरे सर में न जाने क्या घुस गया! सॉरी? माफ़ कर दो मुझे!”

रश्मि की चेतना कुछ कुछ वापस आई, और वह उठ कर बैठ गयी। इस नए अनुभव से वह अभी भी अभिप्लुत थी। रश्मि और सुमन दोनों ही काफी करीब थीं – लेकिन इस प्रकार की अंतरंगता तो उनके बीच कभी नहीं आई। रश्मि को यह अनुभव अच्छा लगा – अपने स्तानाग्रों का चूषण, और इस क्रिया के दौरान दोनों बहनों के बीच की निकटता। रश्मि ने आगे बढ़ कर सुमन को अपने गले लगा लिया – उसने भी सुमन के कठोर हो चले निप्पल को अपने सीने पर महसूस किया ... ‘ये लड़की कब बड़ी हो गई!’

रश्मि: “नीलू!”

सुमन (झिझकते हुए): “हाँ?”

रश्मि: “प्लीज़, सॉरी मत कहो!”

सुमन: “नहीं दीदी! तुम मुझे इतना प्यार करती हो न... एक दम माँ जैसी! इसलिए इन्हें पीने का मन हुआ..। सॉरी दीदी!“

“तू माँ का दुद्धू अभी भी पीती है? उनको भी मिर्ची वाला आईडिया दूं क्या?” रश्मि ने सुमन को छेड़ा।

सुमन (शरमाते हुए): “नहीं पागल... धत्त! ...लेकिन जीजू भी तो तुम्हारा दूध पीते हैं, और तुम माँ बनने वाली हो न, इसलिए मेरा मन किया। ... लेकिन इनमे तो दूध नहीं है.. प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो!”

रश्मि: “हम्म.. नीलू... अब बस! सॉरी शब्द दोबारा मत बोलना मुझसे! ठीक है?”

सुमन ने सर हिला के हामी भरी।

रश्मि: “गुड! अब ले... जी भर के पी ले..”

सुमन: “क्या... मतलब?”

रश्मि: “अरे पागल! ये बता, क्या तुमको इसे पीना अच्छा लगा?”

सुमन ने नज़र उठा कर रश्मि की तरफ देखा और कहा, “हाँ दीदी, बहुत अच्छा लगा!”

रश्मि: “फिर तो! लो, अब आराम से इसे दबा कर देखो और बेफिक्र होकर पियो! मुझे भी अच्छा लगेगा!” रश्मि ने अपने निप्पल की तरफ इशारा किया।

“क्या सचमुच? मुझे लगा की तुमको अच्छा नहीं लगा! ..और... मुझे लगा की तुम मुझसे गुस्सा हो!”

“पगली, मैं तुमसे कभी भी गुस्सा नहीं हो सकती!” कहते हुए रश्मि ने अपना कीमोनो पूरी तरह से उतार दिया, और मेरी तरह मुखातिब हो कर बोली, “ये दूसरा वाला आपके लिए है...”

पता नहीं क्यों, सुमन इस बार कुछ हिचकिचा गई। जब कुछ देर तक उसने कुछ नहीं किया, तो रश्मि ने खुद ही उसका हाथ पकड़ कर खुद ही अपने स्तन पर रख दिया। स्वतः प्रेरणा से उसने धीरे धीरे से चार पांच बार उसके स्तन को दबाया, और फिर अपना मुँह आगे बढ़ा कर उसका एक निप्पल मुंह में लेकर चूसने लगी। मैंने भी रश्मि का दूसरा स्तन भोगना आरम्भ कर दिया। उधर रश्मि का हाथ मेरे पाजामे के ऊपर से मेरे लिंग पर फिरने लगा – वो तो पहले से ही पूरी तरह से उन्नत था।
 
कमरे में अभी भी कुछ संभ्रम था - इतना तो तय है की मुझे यह सब कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन अब मुझे और हमको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। इतना तो तय था की रश्मि को सुमन के साथ अपनी निजता को बांटना बहुत अच्छा लग रहा था। रश्मि के स्तन इस तरह से अनावृत हो जाने से सुमन के मन में एक और चाहत जाग गयी – वह बिस्तर से उठी और जा कर एक बत्ती जला आई। पूरी रौशनी से नहाये हुए रश्मि के नग्न स्तनों को आज वह खूब करीब से देखना चाहती थी।

“दीदी, तुम कितनी सुन्दर हो!”

रश्मि को अपने पेट में एक मीठी सी गुदगुदी जैसी महसूस हुई – यहाँ दो लोग, जिनको वो बहुत प्रेम करती है, और जो उसको बहुत प्रेम करते हैं, एक साथ बैठ कर उसके रूप का इस अन्तरंग तरह से आस्वादन कर रहे हैं। उसने बड़े प्रेम से एक एक हाथ से सुमन और मेरे गले में गलबाहें डालीं, और हमको अपने स्तनों की तरफ खींचा। सुमन उसके निप्पल को मुँह में भर कर चूसने लग गई; मैंने पहले उसके निप्पल के चहुँओर पहले तो मन भर कर चाटा, और फिर इत्मीनान से उसको चूसना आरम्भ किया। कुछ ही मिनटों के स्तनपान के बाद, रश्मि का शरीर अचानक ही एक कमानी के जैसे हो गया और वह बिस्तर पर निढाल हो कर गिर गई और हांफने लगी..

“दीदी, क्या हुआ?” सुमन ने चिंता और सहानुभूति से पूछा।

रश्मि कुछ बोली नहीं, बस हाँफते हाँफते मुस्कुराई। मुझे मालूम था की क्या हुआ.. इसलिए मैंने मैदान नहीं छोड़ा। मेरा हाथ उसकी कमर को टटोल रहा था। अगले पांच सेकंड में मेरी उंगलियाँ उसकी योनि रस से गीली हो चली चड्ढी के ऊपर से उसकी योनि का मर्दन कर रही थीं। मेरी इस हरकत से उसकी योनि से और ज्यादा रस निकलने लगा।

सुमन को सेक्स का कोई बहुत ज्ञान तो था नहीं – उसको बस उतना ही पता था जितना की उसने हमको करते हुए देखा था। और कोई कितनी देर तक सिर्फ स्तनपान कर सकता है? कुछ देर में सुमन थक गयी (या बोर हो गई) और रश्मि से अलग हो गयी। इतनी देर में मेरा लिंग भी अपने निर्धारित कार्य के लिए तैयार हो चला था – सुमन से यह बात छुपी नहीं।

“जीजू, अब आप दीदी के साथ ‘सेक्स’ करिए न?”

किसी के सामने निर्वस्त्र वैसे भी आसान नहीं होता। और यहाँ पर स्थिति थोड़ा भिन्न थी – यहाँ पर एक जिज्ञासु लड़की मुझे अपनी पत्नी के साथ उसके सामने सेक्स करने को कह रही थी। खैर, रश्मि को लगभग नग्न देख कर मेरी खुद की अभिज्ञता कुछ कम हो गई थी – लिहाज़ा, मैंने भी अपने कपड़े उतारे, और साथ ही साथ यह आलोकन भी किया की हम तीनों में सिर्फ सुमन ही है जिसने सारे कपड़े पहन रखे हैं।

“नीलू, यह तो बहुत बेढंगा लगता है की हम दोनों के कपड़े उतर रहे हैं, और तुमने सब कुछ पहना हुआ है। तुम भी तो उतारो!”

“जीजू... ये भी क्या पहना है मैंने! सब कुछ तो दिख रहा है!” मैंने आगे कोई जिद नहीं करी। लेकिन जो कुछ सुमन ने आगे किया, उसको देख कर हम दोनों ही मुस्कुरा उठे। उसने जल्दी से अपनी नाईटी उतार फेंकी और अपने जन्मदिन वाले सूट (अर्थात पूर्णतः नग्न) में हमारे सामने बिस्तर पर बैठ गयी। आज पहली बार सुमन का वयस्क रूप मैंने और रश्मि ने देखा था। सुमन की छाती पर अब संतरे के आकार के दो स्तन बिलकुल तन कर खड़े हो गए थे, और उसके शरीर पर बहुत ही शोभन लग रहे थे। उसके निप्पल गहरे भूरे रंग के थे, और उनके बगल हलके भूरे रंग का कोई डेढ़ इंच व्यास का areola विकसित हो गया था।

“अब करिए..?” सुमन कितनी उतावली हो रही थी हमको सेक्स करते देखने के लिए!

मेरे मन में द्वंद्व छिड़ गया - क्या यह ठीक होगा? कहीं इसके दिमाग पर बुरा असर न पड़े! बुरा असर क्यों होगा? आखिर यह शिक्षा तो सभी को चाहिए ही न! ऐसी कोई छोटी भी तो नहीं है! जल्दी ही इसकी शादी भी इसके परिवार वाले ढूँढने लग जायेंगे! उसके पहले इसको सेक्स के बारे में मालूम हो जाय तो अच्छा है।

अब कहानी आगे बढ़ने से पहले एक सवाल का जवाब आप ही लोग दीजिए : अगर कोई सुन्दर सी लड़की अगर इस तरह अन्तरंग तरीके से आपके सामने निर्वस्त्र हो जाय, तो उसका कुछ तो आदर होना चाहिए की नहीं? मैंने आगे बढ़ कर उसके दोनों चूचुकों पर एक एक चुम्बन ले लिया। सुमन सिहर उठी। मुझे मालूम था की रश्मि नीचे लेटी हुई है.. लेकिन सुमन को कुछ तो यादगार व्यक्तिगत अनुभव होना ही चाहिए! मैंने सुमन की कमर पकड़ कर अपनी तरफ खींचा, और फिर इत्मीनान से उसके स्तनों को बारी बारी से अपने मुंह में भर कर चूसने लगा। कमरे में सुमन की हाय तौबा गूंजने लगी। उसको नज़रंदाज़ कर के मैं साथ ही साथ उसके दोनों नितम्बों को मसल भी रहा था।

“जीजू... बस्स्स्स! आह! म्म्मेरे साथ.. न्न्न्हीं.. दी..दी.. के साथ..” वो उन्माद में न जाने क्या क्या बड़बड़ा रही थी। लेकिन मैंने बिना रुके तबियत से उसके स्तनों को कोई दस मिनट तक चूमा और चूसा। उत्तेजनावश उसके स्तन इस समय साइज़ में कोई बड़े लग रहे थे, और और दोनों चूचक वैसे तन कर खड़े हो गए जैसे रबर-वाली पेंसिल के रबर! एकदम सावधान! खैर अंततः मैंने सुमन को छोड़ा – वो बुरी तरह से हांफ रही थी। दोनों निप्पल इस कदर चूसे जाने से लाल हो गए थे, और उसके शरीर पर, ख़ास तौर पर स्तनों, पेट और नितम्बों पर लाल निशान पड़ गए थे।

“हैप्पी बर्थडे!” मैंने मुस्कुराते हुए बस इतना ही कहा। सुमन उत्तर में शर्मा गयी।

“ह्म्म्म... तो जीजा और साली आपस में ही बर्थडे बर्थडे खेले ले रहे हैं? अपनी दीदी को ट्रीट नहीं दोगी?” रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा।

“ट्रीट?”

रश्मि भी लगता है अपने स्तन पिए जाने का हिसाब बराबर करना चाहती थी। वह उठ कर अपना हाथ सुमन के स्तनों पर रख कर उनको धीरे धीरे सहलाने लगी। सुमन के स्तन छोटे छोटे तो थे, लेकिन रश्मि के स्तनों जैसे प्यारे से थे। सुमन की सिसकियाँ निकल पड़ीं। रश्मि को अभी ठीक से आईडिया नहीं था – उसने सुमन के एक निप्पल को जोश में आकर कुछ ज्यादा ही जोर से मसल दिया।

सुमन: “सीईईई... क्या कर रही हो दीदी! आराम से करो न! जीजू ने वैसे ही मेरी जान निकाल दी है।”

रश्मि यह इशारा पा कर अब खुल कर सुमन के स्तनों से खेलने लग गई। कुछ तो मेरे सिखाई विद्या, और कुछ उसकी खुद की जिज्ञासा... कभी सुमन के प्रोत्साहन से रश्मि भी स्तन-रस-पान करने लगी। सुमन के चूचुक को प्यार से रगड़ने के बाद उसके स्तनों को चूसना शुरू कर दिया, तो वो एकदम गरम हो गई थी। मैं क्या करता? मैंने रश्मि के पेट और नाभि के आस पास चूमना और चाटना शुरू कर दिया। कमरे में नग्न पड़े तीन जिस्म अब सुलग उठे थे। कुछ ही पलों के बाद सुमन अपने जीवन की प्रथम रति-निष्पत्ति का अनुभव कर के गहरी गहरी साँसे भरने लगी। उसकी योनि के स्राव से निकलती नमकीन सी खुशबू हम दोनों ने महसूस करी। सुमन इन सबसे बेखबर, अपनी आँखें बंद किये मानो जैसे सपनो की दुनिया में खोई हुई थी - उसकी साँसे तेजी से चल रही थीं, और होंठ कांप रहे थे। वो अभी अभी अनुभव किये नए आनंद के सागर के तल तक गोते लगा रही थी।

“वैरी हैप्पी बर्थडे नीलू!” कहते हुए रश्मि ने सुमन को होंठों पर चूम लिया, और आगे कहा, “... कैसा लगा?”

“आअह्ह्ह्ह दीदी! एकदम अनोखा!” सुमन ने गहरी सांस भरी। “... अब आप लोग करो न प्लीज!”

हम लोग तो तैयार थे – बस दर्शक (सुमन) के रेडी होने की बात जोह रहे थे। रश्मि के हरी झंडी दिखाते ही मैंने उसको छेड़ना शुरू कर दिया। गर्भधारण करने से स्त्रियों के शरीर में कई सारे परिवर्तन होने लगते हैं। उनमें से एक है - एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन रसायनों के स्तर में वृद्धि! ये दोनों रसायन स्त्रियों के शरीर को कुछ इस तरह से बदल देते हैं की उनमें गर्भावस्था के दौरान कामेच्छा काफी बढ़ जाती है। इनके कारण गर्भाशय में रक्त का प्रवाह और प्राकृतिक चिकनाई बढ़ जाती है, और स्तनों और निपल्स में संवेदनशीलता भी बढ़ जाती है। कहना गलत न होगा, की बहुत सी स्त्रियाँ (जिनका स्वास्थ्य इत्यादि ठीक हो) गर्भधारण के उपरान्त यौन संसर्ग का और अधिक आनंद उठाती हैं! लिहाजा, रश्मि जो पहले से ही रति का अवतार है, अब और भी कामुक हो गयी थी।

रश्मि : “उफ़.. आप क्या कर रहे हैं?”

मैं : “अरे भई! मौके का सही फायदा उठा रहा हूँ। तुम्हारी बहन के लिए अच्छा सा गिफ्ट ला रहा हूँ...” कहते हुए मैंने रश्मि को टांगों से खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया, और उसके स्तन दबाने लगा। रश्मि ने अपनी आंखें बंद कर रखी थी। वैसे भी उसके स्तन उत्तेजनावश पहले ही सख्त हो चुके थे।

रश्मि बोली, “हाय! क्या करते हो? आराम से! आपका हाथ बहुत कड़क पड़ता है! ‘ये’ बहुत सेंसिटिव हो गए हैं अब! पहले ही तुम दोनों ने चूस चूस कर इनका हाल बुरा कर दिया है.. अब बस...”

मैंने कहा, “अरे! लेकिन ये सब नहीं करूंगा तो सुमन क्या सीखेगी?” कह कर मैं फिर उसके स्तनों का मर्दन करने लगा।

रश्मि बोली, “प्लीज़ जानू ! दर्द होता है! अब आप सीधा मेन काम करिए.. मैं पूरी तरह से तैयार हूँ..”

तैयार तो थी! मैंने रश्मि को अपनी बाँहो में भर लिया, और उसके नरम-नरम होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसने लगा। कुछ देर तक ऐसे ही उसके पूरे शरीर को चूमा। अब रश्मि पूरी तरह से तैयार थी। उसके लिए ये फोरप्ले कुछ ज्यादा ही हो गया था।

मैं उसके पेट पर हाथ फिराते हुए उसकी चड्ढी के अन्दर ले गया। उसकी योनि उत्तेजनावश जैसे पाव रोटी की तरह सूजी हुई थी। मैंने चड्ढी के अन्दर से उसकी योनि को सहलाने लगा। रश्मि ने अपनी आंखें बंद कर लीं। कुछ देर ऐसे ही छेड़खानी करने के बाद मैंने उसकी चड्ढी भी उतार दी और अपनी तर्जनी और अंगूठे की मदद से उसकी योनि के होंठों को खोलने और बन्द करने लगा, और साथ ही साथ उसके भगशिश्न को भी छेड़ने लगा। रश्मि के मुँह से कामुक कराहें निकलने लगी, और वो मस्त होकर मेरे लिंग को अपने हाथ में पकड़ कर दबाने और सहलाने लगी।

“बोलो रश्मि रानी! चुदने का मन हो रहा है या नहीं?”

“छी! जानू.. आप बहुत गंदे हो!”

“अरे बोल न! ऐसे क्यों शर्मा रही है? बोल न... चुदने का मन हो रहा है?” रश्मि समझ गयी की बिना ‘डर्टी-टॉक’ किये मैं कुछ नहीं करूंगा.. इसलिए उसने पीछा छुडाने के लिए कहा,

“हाँ जानू.. बहुत मन हो रहा है।“

अब आप लोग ही सोचिए – एक लड़की पूरी तरह से नंगी दो लोगों के सामने भोगे जाने हेतु पड़ी हुई है, लेकिन फिर भी माकूल या मुनासिब व्यवहार नहीं छोड़ रही है! भारतीय लड़कियाँ वाकई कमाल होती हैं। मुझे मालूम था की इससे अधिक वो और कुछ नहीं कहेगी। मैंने रश्मि को सावधानी पूर्वक बिस्तर पर वापस लिटाया और अपने लिंग को उसकी योनि की दरार पर कई बार फिरा कर गीला कर लिया। उसकी योनि से कामरस मानों बह रहा था। जब वो अच्छी तरह से गीला हो गया, तब मैंने अपने लिंग को पकड़ कर उसकी योनि के भीतर धीरे से ठेल दिया। मेरे लिंग का सुपाड़ा उसकी योनि में भीतर तक घुस गया – इतनी चिकनाई थी अन्दर। रश्मि के मुँह से आह निकल पड़ी।

आगे हम एक दूसरे को चूमते हुए वही पुरानी आदि-कालीन क्रिया करने लगे। पहले धीरे धीरे और फिर बाद में तेजी से मैं अपने लिंग को रश्मि की योनि के अन्दर-बाहर करने लगा। कुछ देर बाद रश्मि ने अपनी टांगें ऊपर की तरफ मोड़ ली और मेरी कमर के दोनों तरफ लपेट ली। अब मेरा लिंग रश्मि की योनि में तेजी से अन्दर-बाहर हो रहा था – इस गति में आयाम कम, लेकिन आवृत्ति बहुत ही अधिक थी। मैं अब तेज-तेज धक्के मार रहा था। काम का नशा अब हमारे सर चढ़ गया था। रश्मि भी आनंद लेते हुए मेरे हर धक्के का स्वाद ले रही थी।

रश्मि ने मेरे नितम्बों को अपने हाथों में थाम रखा था और उनको पकड़े हुए ही वो भी नीचे से मेरे धक्कों के साथ-साथ अपने नितम्ब की ताल दे रही थी। योनि सुरंग में पहले से ही काम-रस की बाढ़ आई हुई थी, और इतने मर्दन के बाद अब मेरा लिंग बिना रुके हुए आराम से अन्दर बाहर फिसल रहा था। इस सम्भोग का आनंद रश्मि महसूस करके, और सुमन अवलोकन करके ले रहे थे। इस नए परिवेश में मैंने भी रश्मि को किसी पागल की भांति भोग रहा था।

मैंने पूछा, “जानेमन, अच्छा लग रहा है?”

रश्मि बोली, “हमेशा ही लगता है! आपका लंड इतना तगड़ा है, और आपके चुदाई का तरीका इतना शानदार! बहुत अच्छा लग रहा है। बस आप तेज-तेज करते रहो।”

गन्दी बात! वाह! उसके मुंह से यह बात सुन कर मैंने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। मैं वाकई उसको ‘चोदने’ लग गया। मेरा लिंग सटासट उसकी योनि में तेजी से अन्दर बाहर हो रहा था। रश्मि मस्ती में ‘आअह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह’ करती रही। कोई पांच मिनट चले इस घमासान के बीच अचानक ही रश्मि ने मुझे कस कर अपनी बाँहो में भर लिया। मैं समझ गया की इसका काम तो हो गया। और अगले ही पल उसने एक जोर से आह भरी और आखिरी बार अपने नितम्ब को मेरे लिंग पर ठेला, और फिर बिस्तर पर अपने पैर पसार कर ढेर हो गयी। मैंने भी जल्दी जल्दी धक्के लगाए और आखिरी क्षण में लिंग को उसकी योनि से बाहर निकाल कर उसके पेट पर अपनी वीर्य की कई सारी धाराएँ छोड़ दीं।
 
फिर मैं गहरी साँसे भरता हुआ रश्मि के बगल लेट गया और कुछ देर तक सांसों को संयत करता रहा। रश्मि भी मेरे बगल अपनी आँखें बंद करके लेटी हुई थी। इस पूरे वाकए को सुमन खामोशी से (और विस्मय के साथ भी) देखती रही। मैंने उसकी तरफ मुखातिब हो कर कहा,

“नीलू, ज़रा क्लोसेट से मेरी एक रूमाल निकाल कर देना तो!”

वो तो जैसे किसी सम्मोहन से जागी। फिर मेरी अलमारी से उसने एक रूमाल निकाल कर मुझे सौंप दिया। मैंने रूमाल से रश्मि के पेट पर गिरा वीर्य और अपना लिंग साफ़ किया और उठ कर बाथरूम के अन्दर फेंक दिया। वापस आकर मैं फिर से उसकी बगल में लेट गया, और उसके स्तनों पर हाथ फेरने लगा।

रश्मि : “हो गई तुम्हारे मन की?” यह प्रश्न सुमन के लिए था।

सुमन ने कुछ नहीं कहा।

“बोल न? गिफ्ट कैसा लगा?”

“दीदी! मैं नहीं करूंगी यह सब कभी भी..” सुमन ने रुआंसी आवाज़ में कहा, “... बाप रे! मैं तो मर जाऊंगी!”

“नीलू बेटा!” मैंने कहा, “जब तुम्हारे हस्बैंड का लंड तुम्हारे अन्दर जाएगा न, तब तुम यह कहना भूल जाओगी!”

कह कर मैंने रश्मि को अपनी बाँहो में भर लिया, और कुछ देर तक ऐसे ही सुमन को समझाते रहे। फिर रश्मि ने कहा, “मैं तो थक गयी हूँ... चलो अब सो जाते हैं!” और कह कर अगले कुछ ही पलों में वो सो गयी। सुमन भी रश्मि के बगल चुपचाप पड़ी रही। मैं कब सोया कुछ याद नहीं।

अगली सुबह नाश्ते पर ससुर जी ने मुझसे कहा की उनके परिवार की भगवान केदारनाथ धाम में बड़ी अगाध श्रद्धा है। और हर शुभ-कार्य अथवा पर्व-प्रयोजन में वो सभी वहाँ जाते रहते हैं। उनका पूरा परिवार कई पीढ़ियों से शुभ प्रयोजनों में यह यात्रा करता रहा है। उनके अनुसार, अब चूंकि रश्मि गर्भवती है, तो यदि संभव हो, तो हम सभी एक बार केदारनाथ जी के दर्शन कर आएँ? इस बात पर सबसे पहले तो मुझे राहत की सांस आई – कल रात की धमाचौकड़ी इन लोगो ने कैसे नहीं सुनी, वही एक अचरज की बात है। अच्छा है.. सवेरे सवेरे धर्म कर्म की बाते हो रही थीं।

“जी पिताजी, एक बार हम रश्मि की डॉक्टर से बात कर लेते हैं। अगर उनकी सलाह हुई, तो ज़रूर चलेंगे। अभी जाना है क्या? मेरा मतलब, कोई मुहूर्त जैसा कुछ है?”

“नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है बेटा। जब आप लोगों को सही लगे, आ जाइए। भगवान् के दर्शनों के लिए कैसा मुहूर्त! बस हम सभी एक बार सपरिवार केदारनाथ जी के दर्शन कर लें.. हमारी बहुत दिनों से बड़ी इच्छा है।“

“जी, बिलकुल! मैं अभी कुछ ही देर में डॉक्टर को पूछता हूँ..”

खाने पीने के बाद कोई दस बजे मैंने डॉक्टर को फ़ोन लगाया। उन्होंने कहा की अगले महीने रश्मि यात्रा कर सकती है। तब तक उसका पाँचवाँ महीना शुरू हो जाएगा, और वह सुरक्षित समय है। बस समुचित सावधानी रखी जाय। मैं उन रास्तों पर गया हुआ हूँ पहले भी, और मुझे मालूम है की कुछ स्थानों को छोड़ दिया जाय, तो वहाँ की सड़कें अच्छी हालत में हैं। इसलिए कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। वहाँ ऊपर जा कर पालकी इत्यादि की व्यवस्था तो हो ही जाती है... अतः डरने या घबराने वाली कोई बात नहीं थी।

दो दिन और बैंगलोर में रहने के बाद मेरे सास ससुर दोनों वापस उत्तराँचल को लौट गए। मैंने बहुत कहा की यही रुक जाएँ, लेकिन उनको वहाँ कई कार्य निबटाने थे, इसलिए हमारी बहुत मनुहार के बाद भी उनको जाना पड़ा। खैर, उनके जाते ही मैंने सबसे पहले देहरादून का हवाई टिकट हम तीनों के लिए बुक कर लिया। इस एक महीने में हमने बहुत सारे काम यहाँ पर भी निबटाए – सबसे पहले सुमन के दाखिले के लिए उसके संभावित कॉलेज के प्रिंसिपल से मिले, और उन्होंने भरोसा दिलाया की उसको दाखिला मिल जाएगा अगर बारहवीं में अंक अच्छे आयेंगे! उन्होंने काफी समय निकाल कर उसकी काउंसलिंग भी करी – वो क्या करना चाहती है, क्या पढना चाहती है, कौन से कोर्स वहाँ पढाए जा रहे हैं इत्यादि! मुझे भी काम के सिलसिले में दो हफ्ते घर से बाहर जाना पड़ा, और इस बीच दोनों लड़कियों ने ढेर सारी खरीददारी भी कर ली.. जैसे जैसे रश्मि के शरीर में वृद्धि हो रही थी, उसको नए कपड़ो की आवश्यकता हो रही थी; सुमन को भी नए परिवेश के हिसाब से परिधान खरीदने की ज़रुरत थी। खैर, अच्छा ही है.. इसी बहाने उसको नई जगह को देखने और समझने का मौका मिल रहा था।

दोनों ही लड़कियों से रोज़ बात होती थी.. एक बार रश्मि ने कहा की जिस तरह से उसका शरीर बढ़ रहा है, उसको लगता है की नए कपड़े लेने से बेहतर है की वो नंगी ही रहे। इस पर मैंने सहमति जताई, और कहा की यह ख़याल बहुत उम्दा है। रश्मि ने कहा की ख़याल तो उम्दा है, लेकिन आज कल उसकी बहन रोज़ ही उससे चिपकी सी रहती है.. ऐसा नहीं है की रश्मि को सुमन का संग बुरा लगता है। बस यह की एक वयस्क लड़की के लिए ऐसा व्यवहार थोड़ा अजीब है। मेरे पूछने पर उसने बताया की सुमन अक्सर उसके स्तनों और शरीर के अन्य हिस्सों को छूती टटोलती रहती है। कहती है की उसको रश्मि बहुत सुन्दर लगती है, और उससे रहा नहीं जाता बिना उसको छुए। रश्मि ने ही बताया की,

एक दिन सुमन ने रश्मि को कहा, “दीदी, तुम्हारा बच्चा कितना लकी है न! हमें तो बस गिलास से ही...”

“क्या मतलब?” रश्मि समझ तो रही थी.. फिर भी पूछा।

“मेरा मतलब दीदी, हर किसी को तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की का ... पीने .. को.. नहीं मिलता है न!”

गर्भावस्था के दौरान लड़कियाँ स्वयं को फूली हुई महसूस करती हैं, इसलिए उनकी तारीफ़ इत्यादि करने से उनको ख़ुशी मिलती है। रश्मि भी अपनी तारीफ़ सुन कर मुस्कुराई।

“दीदी, मैं तुमको चूम लूँ?”

“क्या नीलू! तू भी! तू अपने लिए एक लड़का ढूंढ ले.. तेरे भाव स्पष्ट नहीं लग रहे हैं मुझे.. हा हा हा!”

“तो ढूंढ दो न तुम ही.. जीजू जैसा कोई! तब तक यही भाव रहेंगे मेरे..”

कहते हुए सुमन ने अपना चेहरा रश्मि के चेहरे के पास लाया। रश्मि की आँखें सुमन के होंठो पर लगी हुई थीं। रश्मि ने कभी नहीं सोचा था की उसके साथ ऐसा भी कुछ होगा। क्या उसकी ही अपनी, छोटी बहन उसकी तरफ यौन आकर्षण रखती है! ऐसा नहीं है की उसको बुरा लग रहा हो... शादी के बाद के कई अनुभवों के बाद उसकी खुद की अनगिनत वर्जनाएँ समाप्त हो गयी थीं, लेकिन फिर भी, यह सब कुछ बहुत ही अलग था.. अनोखा! अनोखा, और बहुत ही रोचक। सुमन ने झुक कर अपने होंठ रश्मि के होंठो से सटा दिए...

“ओह! कितने सॉफ्ट हैं!” एक छोटा सा चुम्बन ले कर उसने कहा।

सुमन रश्मि के होंठों पर बहुत ही हलके हलके कई सारे चुम्बन दे रही थी। दे रही थी, या ले रही थी? जो भी है! जब उसने देखा की रश्मि उसकी इस हरकत का कोई बुरा नहीं मान रही है, और साथ ही साथ उसकी इस हरकत के प्रतिउत्तर में वो खुद भी वापस चुम्बन दे रही है, तो उसने कुछ नया करने का सोचा। उसने चुम्बन में कुछ तेज़ी और जोश लाई, और साथ ही रश्मि को अपने आलिंगन में बांध लिया। कुछ तो हुआ दोनों के बीच – दोनों लड़कियाँ अब पूरी तन्मयता के साथ एक दूसरे का चुम्बन ले रही थीं। रश्मि ने भी अपने अनुभव का प्रयोग करते हुए सुमन के दोनों गाल अपने हाथों से थोड़ा दबा दिए, जिसके कारण सुमन का मुँह खुल गया। और इसी क्षण रश्मि ने अपनी जीभ सुमन के मुँह के अन्दर डाल कर चूसना शुरू कर दिया।

उधर, सुमन रश्मि की शर्ट के ऊपर से उसके स्तनों को बारी बारी छूने लगी। रश्मि के लिए यह कोई नई बात तो नहीं थी, लेकिन फिर भी सुने आँख खोल कर देखा - सुमन तो अपनी आँखें बंद किये इस काम में पूरी तरह मगन थी। एक सहज प्रतिक्रिया में रश्मि ने पुनः अपने स्तन को आगे की ओर ठेल दिया, जिसके कारण उसके स्तन सुमन के हाथ में आ गए। सुमन ने तुरंत ही खुश होकर उसके स्तन को मसलना चालू कर दिया।

चुम्बन की प्रबलता अब तीव्र हो चली थी और दोनों लड़कियों की साँसे भी। सुमन के दोनों हाथ अब रश्मि के शर्ट के अन्दर जा कर उसके स्तनों का मर्दन कर रहे थे। रश्मि के निप्पल गर्भावस्था की संवेदनशीलता के कारण उसके मर्दन से असहज महसूस कर रहे थे। लेकिन वो सुमन का मन रखना चाहती थी।

रश्मि ने सुमन को अपने से कुछ दूर किया, और फिर अपनी शर्ट के बटन खोल कर उसके पट खोल दिए। वो शर्ट को उतार पाती, उससे पहले ही सुमन वापस उससे जा चिपकी और उसको पुनः चूमने लग गई। रश्मि के स्वतंत्र स्तनों को वो बारी बारी से अपने मुंह में भर कर चूसना आरम्भ कर दिया। पहले के मर्दन के कारण उसके निप्पल पहले ही कड़े हो गए थे, और अब इस चूषण के बाद वो और भी कड़े हो गए।

“मैं भी लकी हूँ! ... उह्म्म्म उह्म्म्म (चूसते हुए) ओह दीदी..! आप प्लीज मुझको भी इनसे दूध पिलाना! आह! इतने सुन्दर हैं!” इतना कह कर वह पुनः चूसने में लग गयी।

“हा हा! ये लो... अब एक और दावेदार आ गई! गाँव बसा नहीं, और लुटेरे आ गए!”

सुमन ने उसकी बात को जैसे अनसुना कर दिया। उसके हाथ रश्मि के सारे शरीर पर चलने फिरने लगे। कभी वो उसके स्तन दबाती, तो कभी उसके नितम्ब, तो कभी उसकी पीठ! आगे वो उसकी स्कर्ट को नीचे की तरफ सरकाने लगी।

“अरे! ये क्या कर रही है? मुझे पूरा नंगा करने का मूड है क्या?” रश्मि ने मुस्कुराते हुए पूछा।

"हाँ! मैं तुमको पूरा नंगा भी देखूँगी, और आपके साथ वह सब करूंगी जो जीजू करते हैं।“ कहते हुए सुमन रश्मि की स्कर्ट और चड्ढी दोनों एक साथ ही नीचे सरकाने लगी।

“नहीं नीलू.. ऐसे मत कर.. बस, इनको पीने की इजाज़त है.. ये तेरे जीजू के लिए है!”

रश्मि सुमन के सामने नग्न पड़ी हुई थी, और अपने शरीर का कोई हिस्सा छुपाने का यत्न नहीं कर रही थी। कदाचित, वह यह चाहती थी की सुमन उसकी सुन्दरता के रसभरे दृश्य से सराबोर हो जाए। लेकिन, सुमन को बस इतनी ही अनुमति थी। उसने एकदम आसक्त हो कर अपनी तर्जनी को रश्मि की सूजी हुई योनि की दरार पर फिराया और फिर बहुत ही अनिच्छा से अपना हाथ वापस खींच लिया। रश्मि मुस्कुराई।

सुमन ने वापस आकर रश्मि के स्तनों पर अपना मोर्चा सम्हाला, और पुनः उनको चूसना शुरू कर दिया। कुछ देर चूसने के बाद,

“अरे दीदी! ये क्या..?”

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रश्मि की बात सुन कर मुझे बहुत रोचक लगा! और मैं खुद भी काफी उत्तेजित हो गया!! बात तो सही है.. रश्मि है ही इतनी सुन्दर! और अब जब वो माँ बनने वाली है, तो उसकी सुन्दरता और भी निखर आई है! ज्यादातर स्त्रियाँ गर्भ-धारण करने के बाद अतिपक्व दिखने लगती है, और उनके शरीर पर गर्भ का बोझ दिखने लगता है। कहने का मतलब, वे स्थूल, थकी हुई और निस्तेज हो जाती है। लेकिन, कुछ स्त्रियाँ ऐसी होती है, जो पुष्प की तरह खिल जाती हैं.. उनके चेहरे पर उनके अन्दर पनप रहे जीवन का तेज दिखने लगता है। रश्मि इस दूसरी श्रेणी में थी। उसका चेहरा जीवन की आशा से दीप्तिमान होता जा रहा था, और उसका छरहरा शरीर स्थूल तो हो रहा था, परंतु साथ ही साथ अत्यंत आकर्षक भी होता जा रहा था। पहले ही वो रति का स्वरुप लगती थी, अब तो ऐसा लगता है की उसमें कम से कम सौ रतियों का वास हो! कोई भी ऐसी स्त्री को आकर्षक पायेगा ही! इसके लिए सुमन से मुझे कोई भी गिला-शिकवा नहीं था।

वापस आने के एक दिन पहले रश्मि ने मुझे फ़ोन पर कहा की वापस आने पर मेरे लिए एक सरप्राइज है! मेरे लाख पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया की क्या! खैर, बता देती तो कैसा सरप्राइज! घर आने पर मेरा स्वागत एक बेहद झीने नाईटी पहने हुए रश्मि ने एक गर्म कामुक फ्रेंच चुम्बन के साथ किया। दरवाज़े को भी ठीक से बंद नहीं पर पाया मैं। स्पष्ट था की इतने दिनों में रश्मि की यौनरुचि कई गुना बढ़ गयी थी। मुझे भी इस तराशी हुई सुंदरी को नंगा देखने की तीव्र इच्छा हो रही थी, इसलिए तुरत-फुरत मैंने उसकी नाईटी उतार फेंकी। मेरी नज़रों के सामने भरे हुए स्तन और उनके सामने सुशोभित स्थूल चूचक, जैसे किसी पूर्वज्ञान के कारण खड़े हुए, उपस्थित थे। मैंने आँख उठाई, तो मेरी आँखें रश्मि की आँखों से मिलीं। उसकी आँखों में एक संतुष्ट चमक थी – उसको मालूम है की मैं उसके स्तनों की सुन्दरता का दीवाना हूँ। फिर भी वो एक शिकायत भरे लहजे में कहती है,

“बहुत बड़े हो गए न?” और कहते हुए अपने स्तनों के नीचे हथेलियाँ लगा कर उठाती है। उसके इस हरकत में किसी भी प्रकार की लज्जा नहीं है.. वस्तुतः, मुझे ऐसा लगा जैसे वो मुझे अपने स्तनों का चढ़ावा दे रही हो। ऐसे चढ़ावे का भोग तो मैं कभी भी, और कहीं भी लगा सकता हूँ।

मैंने ‘न’ में सर हिलाया, “आई लव देम... आई लव यू!”

“तुम पागल हो..” कह कर रश्मि खिलखिलाते हुए हंसी.. और फिर उसने आगे जो किया उसने मेरे दिमाग और शरीर के सारे तार झनझना दिए। उसने अपने स्तनों को हलके से दबा दिया, और ऐसा करने से दोनों चूचकों में हलके पीले से रंग के दूध की बूँदें निकल आईं। ज़रा सोचिये, उसके प्यारे प्यारे रसभरे स्तनों में से अमृत उतर रहा था, और मैं उसको पीने जा रहा था! यह मेरा दावा है की धरती के प्रत्येक पुरुष के मन की फंतासी होगी की वो अपनी प्रेमिका या पत्नी के स्तनों से दूध पिए! कम से कम मेरी तो थी! और आज यह स्वप्न पूरा होने वाला था। इस दृश्य को देखते ही मेरा लिंग अपने पूरे तनाव पर खड़ा हो गया।

“मेला बच्चा भूखा है?” रश्मि ने मुझे प्यार से छेड़ा।

मैं मंत्रमुग्ध सा इस दृश्य को देख रहा था.. लिहाजा, मैं सिर्फ सर हिला कर हामी भर पाया।

“अले मेला बेटू... इत्ती देर शे उसे कुछ खाने को नहीं मिला... है न? मेला दूधू पिएगा..?”

रश्मि ने दुलराते हुए मुझसे पूछा। मेरे फिर से ‘हाँ’ में सर हिलाने पर रश्मि वहीँ सोफे पर बैठ गई, और उसने मुझे अपनी गोदी में आने का इशारा किया। मैंने उसकी गोदी में सावधानीपूर्वक व्यवस्थित हो जाने के बाद उसके होंठों को कोमलता से चूम लिया और उसके होंठों के अन्दर से होते हुए अपनी जीभ से उसकी जीभ चाट ली।

रश्मि फिर से खिलखिलाई, और बोली, “नीचे और भी टेस्टी चीज़ है...”

और यह कहते हुए उसने मेरे सर को अपने स्तनों की तरफ निर्देशित किया। मैंने उसके निप्पल और areola का पूरा हिस्सा मुँह में भर लिया और जोर से चूसा। कोई पांच छः बार कोशिश करने के बाद मुझे अपने मुंह में एक स्वादरहित द्रव रिसता हुआ महसूस हुआ। और इसी के साथ ही मुझे रश्मि के मुंह से संतुष्टि भरी आह भी सुनाई दी।

“आह्ह्ह मेरे राजा! ऐसे ही चूसते रहो.. आह.. बहुत अच्छा लग रहा है..।“

रश्मि मेरे चूषण से प्रसन्न तो थी – उसकी विभिन्न प्रकार की आहें और उम्म्म आह्ह्ह.. इत्यादि इसका सबसे बड़ा प्रमाण थीं। कुछ देर में द्रव/दूध निकलना बंद हो गय, लेकिन फिर भी मैंने उसके बाद भी एक दो मिनट तक उसके उस स्तन को चूसा। उसके बाद आई दूसरे स्तन की बारी.. मुझे अनुभव तो हो ही गया था.. या यह कह लीजिये की शेर को खून... (ओह! माफ करियेगा), दूध का स्वाद पता चल गया था।

इधर मैं उसका दूध पी रहा था, और उधर रश्मि मेरी पैंट की ज़िप के अन्दर से मेरे तने हुए लिंग के साथ खिलवाड़ कर रही थी। मैंने यह महसूस किया की जब वो मेरे लिंग को दबाती है, तो मेरा चूषण और बढ़ जाता है। खैर, यह खेल कब तक चलता.. अंततः उसके दोनों स्तनों में दूध समाप्त हो गया, तो मैं उसके पेट पर चुम्बन लेकर सोफे से ज़मीन पर उतर आया।

“कैसा लगा सरप्राइज?”

“बहुत ही बड़ा सरप्राइज था! मज़ा आ गया..”

“कब से बचा के रखा था.. आपका मन भरा?”

“मन कैसे भरेगा इससे मेरी जान! इतना न्यूट्रीशियश, इतना मजेदार! मैंने तो रोज़ पियूँगा!”

ऐसी बातें करते हुए शरीर पर जो प्रभाव होना होता है, वो होने लगा।

“अले ले ले! ये क्या.. मेले बेटू का छुन्नू तो ल्ल्ल्लंड बन गया है.. कितना बड़ा वाला ल्ल्ल्लंड..” उसने मुझे चिढ़ाया।

“मम्मी है ही इतनी सेक्सी!”

“ह्म्म्म? मम्मी इसको जल्दी से वापस छुन्नू बना दे? ठीक है न?”

“ख़याल बहुत ही उम्दा है!”

“मेला बेटू अपनी मम्मी की चुदाई करना चाहता है?” आज रश्मि को क्या हो गया है! अगर ऐसे ही होता रहा तो उसकी बातें सुन कर ही मैं स्खलित हो जाऊंगा!

“हां.. मम्मी की ज़ोरदार चुदाई करनी है..”

“स्स्स्सीईई! गन्दा बच्चा! अपनी मम्मी को चोदेगा!”

मैं ज़मीन पर लेट गया और जल्दी से अपने लिंग को ज़िप के अन्दर से आज़ाद कर दिया।

“मेरे लंड को अन्दर ले लो और अपनी दोनों टाँगें मेरी दोनों ओर करके बैठ जाओ! आज मम्मी मेरी घुड़सवारी करेगी!”

“इस तरह?”

वह मेरी गोद पर चढ़ते ही पूछती है। वह अपनी दोनों टाँगें मेरी दोनों ओर करके बैठ गयी है, लेकिन अभी भी ज़मीन पर अपने घुटनों के बल टिकी हुई है। उसके चूतड़ मेरी जांघों पर टिके हुए थे, और मेरा लिंग अभी भी बाहर था। मैंने अपने दोनों हाथों से उसके नितम्ब थाम लिए।

“इतना बड़ा लंड!”

रश्मि पर मानो आज किसी भूत का साया पड़ गया था। ऐसे खुलेपन से उसने गन्दी-बातें कभी नहीं करीं थी। उसने मेरे लिंग को पकड़ कर अपने योनि के चीरे पर से ऊपर-नीचे कई बार फिराया। उसकी योनि में से तेजी से स्राव हो रहा था। फिर उसने धीरे से मेरे लिंग के सुपाड़े को अपने चीरे में लगाया और धीरे धीरे उस पर बैठने लगी। उसका योनि द्वार तुरंत खुल गया, और मेरा लिंग अपनी नियत जगह में आराम से जाने लगा – जैसे गरम चाकू, मक्खन के अन्दर जाता है। आधा लिंग अन्दर जाने तक वह नीचे की तरफ बैठती है, और साथ में हाँफते हुए यह भी कहती जाती है की “यह बहुत बड़ा है”। कहने के लिए शिकायत है, लेकिन उसकी मुस्कान से पता चलता है की वह खुद अपने झूठ से आनंदित है। फिर वह मेरे लिंग पर ऊपर और नीचे होना शुरू कर देती है।

एक मिनट भी नहीं हुआ होता है की मैं अपना वीर्य छोड़ देता हूँ। हैं! यह क्या!! एक मिनट भी नही! मुझे थोड़ी लज्जा आई.. इतने वर्षों के सम्भोग क्रीड़ा में मैंने कभी भी इतनी जल्दी मैदान नहीं छोड़ा! आज क्या हुआ! फिर मैंने अपने लिंग पर रश्मि के खुद के सम्भोग निष्पत्ति का स्पंदन महसूस किया।

‘अरे! ये भी आ गई क्या!’

हम दोनों ने कुछ देर तक अपनी साँसे संयत करीं, और फिर रश्मि ने ही कहा, “बेटू मेरा... अपनी माँ को ऐसे आसानी से छोड़ देगा, क्या?” न जाने क्यों उसके इस तरह चिढ़ाने से या फिर यह कह लीजिये की इस स्वांग से मैं जल्दी ही फिर से उत्तेजित हो गया।

“ऐसे सस्ते में जाने देगा? हम्म्म? ऐसे चोदो न, जैसे अपनी बीवी को चोदते हो... हर रोज़..” मेरा लिंग वापस अपने पूर्ण तनाव पर आ गया। और पूर्ण तनाव आते ही,

“जानू...”

‘हैं! इसकी तो भाषा ही बदल गई..!’

“आज एक नया आसान ट्राई करते हैं? कुछ ही दिनों में मेरा पेट फूल कर बहुत बड़ा हो जाएगा। लेकिन, मुझे आपना लिंग अपने अन्दर हमेशा चाहिए... मगर, आपको ठीक लगे तो ही!”

“जानू मेरी! मैं तो बस जो तुम चाहती हो, मुझे बताओ, और मैं वैसे ही कोशिश करूंगा। अगर तुमको अच्छा लगता है तो मैं किसी भी आसन में तुमको चोदने को तैयार हूँ।“

तब रश्मि ने मुझे श्वान-सम्भोग आसन (दरअसल इसको कामसूत्र में ‘धेनुका’ कहा जाता है, लेकिन सामान्य भाषा में डॉगी स्टाइल कहते हैं) लगाने का निर्देश दिया। वो स्वयं अपने हाथों और सर को सोफे पर टिका कर और अपने नितम्बों को बाहर की तरफ निकाल कर घुटने के बल लेट/बैठ गई। जब मैं उसके पीछे जा कर अपना स्थान व्यवस्थित कर रहा था तो उसने बस इतना ही कहा, “जानू, आप सही छेद में ही करना..”

कहने सुनने में हास्यास्पद बात लगती है, लेकिन यह एक गंभीर चेतावनी थी। भगवान् के दिए दोनों छेद इतने करीब होते हैं, की इस आसन में अगर ध्यान नहीं दिया तो एक दर्दनाक और शर्मनाक गलती होने के पूरे आसार होते हैं। वैसे भी रश्मि को मैं आज तक गुदा-मैथुन के लिए मना नहीं पाया था।

मैंने अपने लिंग को रश्मि की योनि से रिसते रस (जो रश्मि के और मेरे रसों का मिश्रण था) से अच्छी तरह भिगोया और उसके पीछे से योनि द्वार पर टिकाया। रश्मि ने अपनी उँगलियों से अपनी योनि की दरार को कुछ फैलाया, जिससे मुझे उचित छेद खोजने में कोई कोई परेशानी न हो। अन्दर इतनी ज्यादा चिकनाई थी की ज़रा सी हरकत से मैं अन्दर तक समां गया।
 
रश्मि ने एक कामुक किलकारी भरी, “उईई माँ! आप तो पूरा अन्दर तक घुस गए! आह्ह्ह!”

इस कथन में किसी भी तरह की शिकायत, या दर्द जैसा कुछ नहीं था, इसलिए मैंने इसको सम्भोग आरम्भ करने की अनुमति के रूप में लिया, और उसकी सूजी हुई योनि की कुटाई आरंभ कर दी। रश्मि ने मेरे लिंग के घर्षण के साथ ही अपना आनंद भरा विलाप करना आरम्भ कर दिया। उधर मैंने पीछे से ही उसके स्तनों को दबाना, मसलना चालू कर दिया, और आराम से धक्के लगाने लगा। पीछे से सम्भोग करने से नितम्बों की पूरी संरचना स्पष्ट दिखाई देती है.. कमाल की बात यह है की इतने सारे आसन और पोजीशन ट्राई करने के बाद भी यह वाला बचा रह गया! रश्मि के नितम्ब! मैंने उंगली से उसकी गुदा को छुआ और फिर उसके छेद पर अपनी अंगुली फिराने लगा। कुछ प्रतिक्रिया न देखने पर मैंने धीरे से अपनी उंगली अंदर डाली। रश्मि चिहुंक गई, “ओउईई! म्म्मत क्क़करो..”

मैं रुक गया और कुछ और जोर से धक्के लगाने लगा। पहले स्खलन के बाद मेरा स्टैमिना काफी बढ़ गया था। इस नए काम युद्ध को करते हुए कोई दस-बारह मिनट के ऊपर तो हो ही गए होंगे। और अब मुझे भी लग रहा था की मंजिल निकट ही है। इस बीच में रश्मि एक बार निवृत्त हो चुकी थी। मैं अब ज़ोर का धक्का लगाने लगा – रश्मि भी अपनी तरफ से अपने नितम्ब आगे पीछे कर रही थी। कुछ ही देर में मेरे अन्दर का लावा फ़ूट पड़ा। स्खलन के उन्माद में मैंने अपनी कमर को कस कर रश्मि के नितम्बो से पूरी तरह चिपका लिया।

सम्भोग का नशा उतरा तो याद आया की सुमन भी घर पर होगी! लेकिन रश्मि ने बताया की वो अभी बाहर गयी हुई है किसी काम से। मैंने राहत की साँस ली – कमाल है! सोचा भी नहीं की घर में हमारे अलावा एक और प्राणी रहता है। आगे से सजग रहना होगा।

यात्रा वाले दिन:

रश्मि : “जानू, आप भी साथ आते तो मज़ा आता।“

सुमन : “हाँ जीजू! आप भी न.. मौके पर धोखा देते हैं!”

मैं : “मौके पर धोखा! हा हा हा!”

सुमन : “और क्या! अब बताइए.. ये सारा लगेज हम दो बेचारी लड़कियों को खुद ही ढोना पड़ेगा..”

मैं : “अच्छा जी.. तो मैं तुम दोनों का कुली हूँ?”

सुमन : “नहीं नहीं.. आप तो मेरी दीदी के ‘जाआआनू’ हैं.. (सुमन ने मुझे चिढ़ाया) और मेरे प्याआआरे जीजू! लेकिन.. सामान उठाने वाला भी तो कोई चाहिए! ही ही ही!!!”

मैं : “देख रही हो जानेमन.. इस लड़की को सामान उठाने वाला चाहिए.. लगता है की इसके लिए लड़का ढूंढना शुरू कर देना चाहिए..”

सुमन : “धत्त जीजू! आपके होते हुए मुझे कोई और क्यों चाहिए?” उफ्फ्फ़! इस लड़की से जीतना मुश्किल है!

मैं (सुमन की बात को नज़रंदाज़ करते हुए): “क्या बताऊँ जानू.. मेरा भी तो कितना मन है आपके साथ आने का! लेकिन यह मीटिंग्स! ये तो अच्छा है की मेरा काम दिल्ली में है.. बस, काम जल्दी से निबटा कर तुरंत आ जाऊँगा। बस यही तीन चार दिन की ही तो बात है... आप लोग एक दो दिन एक्स्ट्रा रह लेना वहाँ.. या एक दो दिन बाद चली जाना। मैं वहीँ सबको मिलूंगा! ओके?“

रश्मि मुस्कुराई, और फिर मेरे पास आ कर दबी आवाज़ में बोली, “वो तो ठीक है.. लेकिन, ये दूध कौन पिएगा?”

सुमन : “हाँ हाँ.. सुनाई दे रहा है मुझे!” सुमन अँधेरे में तीर मार रही थी।

मैं : “क्या सुन रही है तू?”

सुमन : “आप दोनों मेरे खिलाफ कोई साजिश कर रहे हैं..”

रश्मि : “तेरे कॉलेज में कहूँगी की रोज़ तेरे कान उमेठें जाएँ.. सारी चबड़ चबड़ निकल जायेगी!”

सुमन : “ठीक है! ठीक है! कर लो आप दोनों पर्सनल बातें! मैं क्यूँ कबाब में हड्डी बनूँ?” कहते हुए सुमन कमरे से बाहर निकल गयी।

मैं (मुस्कुराते हुए) : “इसको सम्हाल कर रखिएगा... मैं इत्मीनान से पियूँगा, जब आपसे मिलूंगा!”

रश्मि (खिलवाड़ करते हुए), “गन्दा बच्चा...!” और फिर अचानक गंभीर हो कर, “... जानू.. आपके बिना मेरा मन कहीं नहीं लगता! आप रहते हैं तो ज़िन्दगी में मज़ा रहता है!”

मैं : “क्या जानू.. बस तीन चार ही दिनों की तो बात है! मैं आ जाऊँगा! .. और फिर, मुझे ये डेयरी भी तो खाली करनी है! न्यूट्रीशन!! हेह हेह!”

रश्मि : “मेरा तो बस यही मन रहता है की इनमें लबालब दूध भरा रहे.. जिससे मैं आपको जब मन करे, दूध पिला सकूं!”

केदारनाथ की चढ़ाई काफी कठिन है। करीब सात हज़ार फुट की चढ़ाई चढ़ कर केदारनाथ मन्दिर तक पहुंचते हैं। केदारनाथ जाने की प्रबल इच्छा क्यों थी इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मुझे वैसे तो किसी तीर्थ पर जाने में कोई ख़ास रुचि नहीं है। लेकिन, इन लोगो की आस्था, और उनके परिवार की एक प्रकार की परम्परा के कारण मैंने कोई विरोध नहीं किया। वैसे भी रश्मि की डॉक्टर ने बताया था की इस यात्रा में कोई दिक्कत नहीं है, अगर बस कुछ ख़ास सावधानियाँ बरती जाएँ! मैंने यह सख्त निर्देश दिए थे, की रश्मि को चढ़ाई चढ़ने न दिया जाय – पालकी कर ली जाय, जिससे आसानी रहेगी। यह भी निर्देश दिया की रश्मि लगातार मुझसे बात करती रहे, जिससे मुझे वहाँ की परिस्थिति का मालूम होता रहे। इस पर रश्मि ने कहा की वो दिन में पांच छः बार मुझसे फ़ोन पर बात ज़रूर करेगी।

दोनों लड़कियों को मैंने बैंगलोर विमानपत्तन तक छोड़ा, और वापस काम पर चला गया। दो दिन बाद मुझे दिल्ली के लिए निकलना था, और वहाँ चार ज़रूरी मीटिंग्स कर के देहरादून, और वहाँ से केदारनाथ की यात्रा करनी थी। रश्मि, सुमन के जाने के बाद घर खाली खाली सा लगने लगा तो मेरा ज्यादातर समय ऑफिस में ही बीत रहा था। रश्मि मुझे हर समय फ़ोन या एस ऍम एस पर अपनी जानकारी देती रहती। दिल्ली में मीटिंग्स वगैरह करते हुए मुझे रश्मि ने बताया की केदार घाटी में काफी बारिश हो रही है। मैंने उसको सावधानी बरतने को कहा, और जल्दी मिलने का वायदा करके फोन काट दिया। देहरादून के लिए अगले दिन सवेरे की फ्लाइट थी।

रात में सोने से पहले मैंने रश्मि का नंबर लगाने की कोशिश करी – कई बार कोशिश किया, लेकिन नम्बर नहीं मिला। फिर उसके पापा और होटल का भी नंबर लगाया.. कहीं भी फ़ोन नहीं लग रहा था। निराश हो कर मैं सोने चला गया – रात भर ठीक से नींद नहीं आई। अजीब अजीब सपने आते रहे, और सवेरे उठने के बाद बुरे बुरे ख़याल आते रहे। उठते ही मैंने फिर से फ़ोन लगाने की कोशिश करी, लेकिन अभी भी फ़ोन नहीं लग रहा था। ऐसे ही बुरे मूड में मैं दिल्ली विमानपत्तन पहुंचा और वहाँ जा कर मालूम हुआ की केदारनाथ में भीषण बाढ़ आई हुई है। मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई – पेट में जैसे गाँठ पड़ गयी! मन अज्ञात आशंकाओं से घिर गया।

मन में अनजाने डर, और ह्रदय में ढेर सारी प्रार्थनाएँ लिए पूरी यात्रा बीती। लेकिन देहरादून विमानपत्तन पर पहुँचते ही सारे के सारे डर हकीकत में बदल गए। वहाँ मैंने टैक्सी करने की कोशिश करी, तो लोगों ने बताया की केदारनाथ में किसी भी ड्राईवर से उनका संपर्क नहीं हो पा रहा है। पूछने पर उसने आगे जाने से मना कर दिया, यह कह कर की ले तो जा सकता है, लेकिन सड़क की क्या हाल है, और बारिश में न जाने क्या क्या हो सकता है कुछ नहीं मालूम! आज का दिन यूँ ही निकल गया – एक एक मिनट.. एक एक पल ऐसा लग रहा है जैसे की एक एक सदी बीत रही हो! बॉस का भी दिन में कई बार कॉल आ चूका – वो रश्मि के बारे में पूछते हैं! मैं क्या जवाब दूं! एक बार तो मेरी आंखों में आंसू छलक पड़े! मेरी चुप्पी और खामोश रुदन उन्होंने शायद सुन लिया हो! फ़ोन पर मुझे धाड़स बंधाते हुए उन्होंने कहा की उम्मीद मत छोड़ना, और मेरी हर तरह से मदद करने का आश्वासन किया। मुझे इतना तो मालूम पड़ गया की उन्होंने उत्तराखंड आपदा कंट्रोल रूम और अधिकारियों से संपर्क करने की हर संभव कोशिश की है।

एक दिन।

दो दिन।

तीन दिन।

चार दिन।

हर एक दिन गुजरने के बाद मुझे मेरे परिवार के लौटने की आशा भी धूमिल होती नजर आ रही थी। एक एक पल इंतजार की करना मुश्किल होता जा रहा था। न तो भोजन का कोई कौर गले के अन्दर जा पाता, और न ही हलक से पानी की एक बूँद! न जाने उन लोगों ने कुछ खाया पिया होगा या नहीं, बस यही सोच कर कुछ खाने पीने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी।

ज्यादातर टैक्सी वाले अब मुझे पहचानने लग गए। मुझे देखते ही वह कहते हैं, “साहब, ऊपर के इलाकों में सड़कें ख़त्म हो चुकी हैं... और गाँव के गाँव साफ़ हो गए हैं। हमारे किसी भी साथी की कोई खोज खबर नहीं है। अब तो बस भगवान्, और सेना का ही सहारा है। आप बस प्रार्थना करिए की आपका परिवार सही सलामत आपको मिल जाय।“

रात में होटल वाले ने जबरदस्ती एक रोटी मुझे खिला दी। दिन भर आपदा कार्यालय के चक्कर लगाता, फ़ोन की घंटी बजने का इत्नाजार करता, और समाचार में मृतकों की बढ़ती हुई संख्या देख कर मन ही मन मनाता की मेरा कोई अपना न हो! इतनी बेबसी मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं महसूस करी। इतनी बेबसी, और इतनी खुदगर्जी!

इस आपदा में हुई और हो रही जान-माल की क्षति का आंकड़ा विकराल रूप से बढ़ता ही जा रहा है! मन में बस अब एक ही ख़याल आता है की अब बस! अब ये गिनती ख़त्म करो भगवान्! इतने दिन हो गए, और किसी से कोई संपर्क ही नहीं हो पाया है!

'काश! ये लोग ठीक हों! ओह रश्मि! प्लीज प्लीज! काश! तुम ज़िंदा हो..!'

छठा दिन:

राहत और बचाव कार्य बाधित हो रहा है, क्योंकि घाटी में फिर से तेज बारिश हो रही है, और धुंध छाई हुई है। सेना के हेलिकॉप्टर उड़ान ही नहीं भर पा रहे हैं! खबर आई थी की एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया! बचने गए वीर युवक, खुद ही पहाड़ों की भेंट चढ़ गए! एक अफसर से बात हुई, उन्होंने मुझे साफगोई से कह दिया,

“साहब, यह तो एक तरह से 'रेस अगेन्स्ट टाइम' है... मौसम खराब है, हर तरह के जोखिम हैं और अब तो महामारी का खतरा भी पैदा हो गया है... लोग अब बीमारी और भूख–प्यास से मर रहे हैं! कितनी मौतें हुईं, कितने लापता हुए और कितने लोग सुरक्षित निकाले गए - इस पर अब कोई भी बात बेमानी लग रही है, क्योंकि यहाँ कोई समन्वय नज़र नहीं आ रहा है, और न ही कोई एक सूची है। सच्चाई यह भी है कि खुद प्रशासन का कितना नुकसान हुआ है, इसका अंदाजा ठीक-ठीक अभी उन्हें भी नहीं है। इसके शिकार हुए लोगों का पता लगाना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन गयी है। हज़ारों की तादाद में लोग मदद की आस लगाए बैठे हैं। आप भी उम्मीद न छोडिए.. कुछ भी हो सकता है!”

सातवाँ दिन:

अब तो कोई उम्मीद ही नहीं बची है.. बस यंत्रवत रोज़ रोज़ राहत शिविर के दफ्तर पहुँच जाता हूँ। वहाँ लोगों से कई बार प्रार्थना भी करी है की मुझे भी सेवा का अवसर दें.. लेकिन वहाँ किसी के पास समय नहीं है। कई सारे लोग बचाए भी जा चुके हैं, लेकिन इन लोगों का कोई नामोनिशान ही नहीं है!

‘अरे! फ़ोन बज रहा है..’

कोई अनजाना नंबर था। स्थानीय! दिल धाड़ धाड़ कर के धड़कने लगा।

“हेल्लो?” मैंने बहुत उम्मीद से बोला।

“जीजू..?” यह तो सुमन की आवाज़ थी।

“सुमन?”

“जीजू... हू हू हू..” वो बेचारी रोने लगी!

‘हे भगवान्!’

“नीलू.. तुम ठीक तो हो न?”

“जीजू.. प्लीज आप मुझे ले चलो.. हू हू हू..” रोते हुए उसकी हिचकियाँ बांध गईं।

“हाँ नीलू.. बताओ कहाँ हो? बाकी लोग कैसे हैं?”

उत्तर में सुमन सिर्फ रोती रही।

“साहब, आप फलां फलां जगह पहुँच जाइए.. एक्सट्रैक्शन वही हो रहा है..”

“जी हाँ.. जी.. ठीक है.. मैं आ रहा हूँ..”

“ओह भगवान्! तेरा लाख लाख शुक्र है!”

कह कर मैं बिलख बिलख कर रोने लगा। कोई देखे या नहीं.. मुझे कोई परवाह नहीं! जब सब उम्मीदें छूट गईं, तब देखिए! कैसे खुशखबरी आई! कोई तीन घंटे की मशक्कत के बाद मैं राहत शिविर / एक्सट्रैक्शन कैंप में पहुंचा। वहाँ की हालत तो और भी दयनीय थी। बचाए गए सभी लोगों की आँखों में राहत और आस की नमी थी। साफ़ दिख रहा था की वो सभी बेहद भूखे और बेबस थे, और अब उनके अन्दर किसी भी तरह की शक्ति नहीं बची हुई थी। वाजिब भी है - इन लोगों को एक हफ्ता हो गया, कुछ भी खाने को नहीं मिला था.. और पीने के लिए भी सिर्फ गन्दा पानी ही नसीब हुआ होगा। ज़मीन पर एक व्यक्ति लेटा हुआ था... उसकी हालत देखकर मुझे नहीं लगा की उसके बचने की कोई उम्मीद होगी। सभी के कपड़े फटे हुए और मैले-कुचैले हो गए थे... या तो वो खड़े थे, या फिर लेटे हुए थे।

एक वृद्ध मुझे देखते ही बोला, “हे बबुआ, हम हाथ जोड़ित है.. हमका हियाँ से ले चला।”

बेचारे को लगा होगा की मैं उसका पुत्र या कोई सगा सम्बन्धी हूँगा! एक तरफ कुछ लोग उल्टियाँ कर रहे थे।

‘ये लोग दिख क्यूँ नहीं रहे हैं?’ अचानक मेरी नज़र एक तरफ ज़मीन पर लेटी हुई लड़की पर पड़ी.. ‘सुमन!’

“सुमन?” ‘हे भगवान्! क्या हालत हो गयी है इसकी! इतनी प्यारी बच्ची.. और ये दशा?’ उसके कपड़े बुरी तरह से फटे हुए थे। बुरी तरह से मैली कुचैली, ज़ख़्मी, बेदम!

“जीजू? ओह जीजू!” कहते हुए वो मुझसे लिपट गयी।

“तुम ठीक तो हो नीलू?”

उसने सर हिला कर हामी भरी।

“बाकी लोग कहाँ हैं?”
 

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