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घुड़दौड़ ( कायाकल्प ) complete

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मैं इस सोच पर मुस्कुराई... एक हाथ अनायास ही मेरे स्तन पर चला गया। ‘ये दोनों जल्दी ही बड़े हो जाएँ!’ मन में एक विचार कौंधा। कैसा हास्यास्पद विचार है यह... कुछ दिनों पहले तक ही मैं सोचती थी की बड़े स्तन कितने तकलीफदेय हो सकते हैं... लेकिन जिस प्रकार से रूद्र मेरे दोनों स्तनों का भोग प्रयोग करते हैं.. यदि, ये थोड़े बड़े होते तो उनको और आनंद आता। और यदि ये दोनों मीठे मीठे दूध से भर जाएँ, और रूद्र जीवन भर उनका पान कर सकें! आह!

मेरे मन में एक शरारत उठी। मैंने रूद्र से सट कर, चद्दर के अंदर हाथ बढ़ा कर उनके लिंग पर धीरे से हाथ फिराया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसको मेरी छुवन का ही इंतज़ार था – मेरा हाथ लगते ही तुरत-फुरत उसका आकार अपने पूर्ण रूप में बढ़ गया।

‘ऐसा पुष्ट अंग! हाथ में ठीक से आता ही नहीं..! कितना सख्त हो गया है!’

मैंने पूरे हाथ को उनके लिंग पर कई बार फिराया और फिर उसको पकड़ कर हिलाने लगी। कुछ ही देर में उनका लिंग मेरी योनि में जाने के लायक एकदम खड़ा और सख्त हो गया।

दुर्भाग्य से मेरी योनि इस समय थकी हुई थी, और हमने सावधानी बरतने का प्रण भी किया था, इसलिए मैंने सोचा की क्यूँ न हाथ से ही इनको निवृत्त कर दिया जाय! मैंने रूद्र के लिंग को थोड़ा मजबूती से पकड़ कर अपनी मुट्ठी को उसकी पूरी लम्बाई पर आगे-पीछे चलाना आरम्भ कर दिया। सोते हुए भी रूद्र के गले से कामुक आहें निकलने लगीं! फिर मुझे याद आया की उनका वीर्य निकलेगा तो बिस्तर को ही खराब करेगा, अतः मैं घुटनों और कोहनी के बल इस प्रकार बैठ गई जिससे उनका लिंग मेरे मुंह के सामने रहे। कुछ देर और उनके लिंग को पकड़ कर आगे पीछे करने के बाद मैंने उसके सामने वाले हिस्से को अपने मुंह में भर लिया। अब हाथ की ही ले में मेरा मुंह भी उनके लिंग पर आगे पीछे हो रहा था। मैंने अपनी जीभ से उनके लिंग के आगे वाले चिकने हिस्से पर कई बार फिराया।

रूद्र ‘आऊ आऊ’ करते हुये मेरे सिर को अपने हाथ से सहला रहे थे। ‘हो गया सोना!’

"यस बेबी! यस!!" उन्होंने बुदबुदाते हुए मेरा हौसला बढाया।

मैंने उत्साह में आकर उनके लिंग को अपने मुंह के और भीतर जाने दिया – एक बार तो उबकी सी आ गई, लेकिन मैंने गहरी सांस भर कर उसको चूसना जारी रखा। उधर रूद्र भी उत्तेजना में आकर लेटे हुए नीचे से धक्के लगाने लगे – वो तो अच्छा हुआ की मैं अभी भी उसकी गति और भेदन नियंत्रित कर रही थी, नहीं तो मेरा दम घुट जाता। खैर, कुछ ही देर में मैं अपने मुंह में उनके लिंग की उपस्थिति और चाल की अभ्यस्त हो गई और अब मुझे इस प्रकार मैथुन करना अच्छा लगने लगा। मुझको यह क्रिया आरम्भ किये कोई चार-पांच मिनट तो हो ही गए थे.... अतः कुछ और झटके मारने के बाद वो स्खलित हो गये और मेरा मुख उनके गरम गरम वीर्य से भर गया, जिसको मैंने तुरंत ही पी लिया। कुछ ज्यादा नहीं निकला... संभवतः आज कुछ ज्यादा ही खर्च हो गया। एक अजीब स्वाद! हो सकता है की कुछ और बार ऐसे करने के बाद मैं उसकी भी अभ्यस्त हो जाऊं! रूद्र भी स्खलित होने के बाद निढाल से लेटे रहे।

‘पता नहीं उनको क्या लगा होगा! सपना या हकीकत! हा हा!’

मैं कुछ देर तक उनका सिकुड़ता हुआ लिंग मुंह में लिए ऐसे ही लेटी रही, और फिर अलग हट कर सिरहाने की छोटी मेज पर रखी बोतल से पानी पीने लगी। और फिर उनके चेहरे पर नज़र डाली... वो मुस्कुरा रहे थे। क्या ये जाग गए हैं और उनको मेरी इस हरकत का पता चल गया? या वो इसको एक सपना ही सोच कर मगन हो रहे हैं! क्या पता!

'आज की रात क्यों अनोखी हो भला?' यह सोचते हुए मैंने अपने सारे कपड़े उतारे, और अपने पिया से चिपक कर लेट गई.. रात में कब नींद आई, कुछ भी याद नहीं।

आज सुबह से ही बदली वाला मौसम था – सूरज बादलो के साथ लुका-छिपी खेल रहा था। हल्की बयार और ढले हुए तापमान से मौसम अत्यंत सुहाना हो गया। मन में आया की क्यों न अगर ऐसे ही मौसम रहे, तो आज दिन भर बीच पर ही आराम किया जाय? आखिर आये तो आराम करने ही है! मैंने रश्मि को यह बात बताई तो उसको बहुत पसंद आई – वैसे भी हिमालय की हाड़ कंपाने वाली ठंडक से छुटकारा मिलने से वह वैसे भी बहुत खुश थी। रश्मि ने भी कहा की आज बस आराम ही करने का मन है... खायेंगे, सोयेंगे और हो सका तो रात में फिल्म देखेंगे, इत्यादि... मेरे लिए आज का यह प्लान एकदम ओके था।

हमने जल्दी जल्दी फ्रेश होने, और ब्रश करने का उपक्रम किया। ब्रेकफास्ट के लिए आज मैंने रिसोर्ट के सार्वजानिक क्षेत्र में जाने का निर्णय लिया – कम से कम कुछ और लोगों से बातचीत करने को मिलेगा। नाश्ते पर हमारे साथ एक तमिल जोड़ा बैठा। हमारी ही तरह उनकी भी अभी अभी ही शादी हुई थी और वे हनीमून के लिए आये थे। उनसे बात करते हुए पता चला की दोनों ही बंगलौर में काम करते हैं! लड़का लड़की दोनों की उम्र पच्चीस से सत्ताईस साल रही होगी। खैर, हमने अपने फ़ोन नंबर का आदान प्रदान किया और मैंने शिष्टाचार दिखाते हुए उन दोनों को अपने घर आने का न्योता दिया। नाश्ता कर के हम होटल के रिसेप्शन पर चले गए और उनसे प्लान के बारे में पूछा।

वहां पर रिसेप्शनिस्ट ने बताया की बहुत से लोग आज यही प्लान कर रहे हैं.. उसने हमको काला-पत्थर बीच जाने को कहा.. एक तो वहां बहुत भीड़ भी नहीं रहेगी और दूसरा वह रिसोर्ट से आरामदायक दूरी पर था। आईडिया अच्छा था। फिर मेरे मन में एक ख़याल आया – मैंने रिसेप्शनिस्ट से पूछा की दो साइकिल का इन्तेजाम हो सकता है? क्यों न कुछ साइकिलिंग की जाय – वैसे भी इतने दिनों से किसी भी तरह का व्यायाम नहीं हुआ था.. बस आराम! खाओ, पियो, सोवो, और सेक्स करो! ऐसे तो कुछ ही दिन में तोन्दूमल हो जायेंगे हम दोनों।

रिसेप्शनिस्ट ने कहा की है और कुछ ही देर में हमारे सामने दो साइकिल (एक लेडीज और एक जेंट्स) मौजूद थीं। बहुत बढ़िया! रश्मि को पूछा की उसको साइकिल चलाना आता है? उसने बताया की आता है.. उसने छुप छुपा कर सीखी है। भला ऐसा क्यों? पूछने पर रश्मि ने कहा की पहले तो माँ, और फिर पापा दोनों ही उसको मना करते थे। माँ कहती थीं की लड़कियों की साइकिल नहीं चलानी चाहिए... उससे ‘वहाँ’ पर चोट लग जाती है। कैसी कैसी सोच! न जाने क्यों हम लोग अपनी ही बच्चियों को जाने-अनजाने ही, दकियानूसी पाबंदियों में बाँध देते हैं!

खैर, साइकिल चलाने और चलाना सीखने का मेरा खुद का भी ढेर सारा आनंददायक अनुभव रहा है। जब मैं छोटा था, उस समय मेरठ में वैसे भी साइकिल से स्कूल जाने का रिवाज था। स्कूल ही क्या, लोग तो काम पर भी साइकिल चलाते हुए जाते थे उस समय तक! लड़का हो या लड़की... ज्यादातर बच्चे साइकिल से ही स्कूल जाते थे। पांचवीं में था, और उस समय मैंने साइकिल चलाना सीखी।

शुरू शुरू में मोहल्ले के कई सारे मुंहबोले भइया और दीदी मुझे साइकिल चलाना सिखाने लगे - कैसे पैडल पर पैर रखकर कैंची चलते है... कैसे सीट पर बैठते है... कैसे साइकिल का हैंडल सीधा रखते हैं... इत्यादि इत्यादि! शुरू शुरू में कोई न कोई पीछे से कैरियर पकड़ कर गाइड करता रहता... साईकिल चलाते समय यह विश्वास रहता की अगर बैलेंस बिगड़ेगा तो कोई न कोई मुझे गिरने से बचा ही लेगा। ऐसे में न जाने कब बड़े आराम से अपने मोहल्ले मे साइकिल चलाना सीख लिया... पता ही नहीं चला।

एक वह दिन था और एक आज! न जाने कितने बरसों के बाद आज साइकिल चलाने का मौका मिलेगा! कभी कभी कितनी छोटी छोटी बातें भी कितने मज़ेदार हो जाती हैं! मैंने हाफ-पैन्ट्स और टी-शर्ट पहनी, चप्पलें पहनी और एक बैग रखा.. जिसमें फ़ोन, सन-स्क्रीन लोशन, कैमरा, किताब, मेरा आई-पोड, पानी की बोतलें, चादर और खाने का सामान था। रश्मि ने हलके आसमानी रंग का घुटने तक लम्बा काफ्तान जैसा पहना हुआ था और उसके अन्दर नारंगी रंग की ब्रा और चड्ढी पहनी हुई थी.. क्या बला की खूबसूरत लग रही थी! बालों को उसने पोनीटेल में बंद लिया था – उसकी मुखाकृति और रूप लावण्य अपने पूरे शबाब पर था।

कोई पंद्रह बीस मिनट की साइकिलिंग थी.. तो मैंने सोचा की रस्ते में इसको चुटकुले सुनाते चलूँ...

हरयाणवी जाट का बच्चा साइकिल चलाते-चलाते एक लड़की से टकरा गया। लड़की बोली: क्यों बे! घंटी नहीं मार सकता क्या? जाट का बच्चा कहता है: री छोरी, बावली है के? पूरी साइकिल मार दी इब घंटी के अलग ते मारुं के?

रश्मि: “हा हा! ये तो बहुत मज़ेदार जोक था! .... आप तो सुधर गए!”

मैं: “सुधर गया मतलब? अरे मैं बिगड़ा ही कब था?”

रश्मि: “आपके ‘वो’ वाले जोक्स की केटेगरी में तो नहीं आता यह!”

मैं: “अच्छा! तो आपको ‘वो’ जोक सुनना है? तो ये लो...

रश्मि: “नहीं नहीं बाबा! आप रहने ही दीजिये!”

मैं: “अरे आपकी फरमाइश है..! अब तो सुनना ही पड़ेगा.. शादी के फेरे लेने के बाद लड़की ने झुक कर पंडित जी के पैर छुए और कहा "पंडित जी कोई ज्ञान की बात बता दीजिए।" पंडित जी ने उत्तर दिया "बेटी, ब्रा अवश्य पहना करो.. क्योंकि जब तुम झुकती हो तो ज्ञान और ध्यान, दोनों ही भंग हो जाते हैं।“”

“हा हा हा!”

“हा हा हा हा हा!”

ऐसे ही हंसी मज़ाक करते हुए कुछ देर बाद हम दोनों काला पत्थर बीच पर पहुँच जाते हैं। वहाँ पर हमारे अलावा कोई चार पांच जोड़े और मौजूद थे.. लेकिन सभी अपने अपने आनंद में लिप्त थे।
 
एक साफ़ सुथरा (वैसे तो सारे का सारा बीच ही साफ़ सुथरा था) स्थान देख कर अपना चद्दर बिछाया और बैग रख कर मैं कैमरा सेट करने लगा। उसके बाद रश्मि की ढेर सारी तस्वीरे उतारीं.. मैं उसको सिर्फ ब्रा-पैंटीज में कुछ पोज़ बनाने को बोला, तो वह लगभग तुरंत ही मान गई। किसी मॉडल की भांति सुनहरी रेत और फिरोज़ी पानी की पृष्ठभूमि में मैंने उसकी कई सुन्दर तस्वीरे उतारी। उसके बाद मैंने भी सिर्फ अपनी अंडरवियर में रश्मि के साथ कुछ युगल तस्वीरे एक और पर्यटक से कह कर उतरवाई।

यह सब करते करते कोई एक घंटा हो गया हमको बीच पर रहते हुए.. बादल कुछ कुछ हटने लगे थे, इसलिए मैंने रश्मि को कहा की मैं उसके शरीर पर सनस्क्रीन लोशन लगा देता हूँ.. नहीं तो वो झुलस कर काली हो जायेगी। मैंने रश्मि को पानी की एक बोतल पकड़ाई और वह चद्दर पर आ कर लेट गई। सूरज इस समय तक ऊर्ध्व हो गया था। उसमें तपिश तो थी, लेकिन फिर भी, समुद्री हवा, और लहरों का गर्जन बहुत ही सुखकारी प्रतीत हो रहे थे। हम दोनों चुप-चाप इस अनुभव का आनंद लेते रहे, और कुछ ही देर में मैंने रश्मि और अपने के पूरे शरीर पर सनस्क्रीन लगा लिया।

कुछ देर ऐसे ही लेटे लेटे रश्मि बोली, “आप ग़ज़ल पसंद करते हैं?”

“ग़ज़ल!? हा हा! हाँ... जब भी कभी बहुत डिप्रेस्ड होता हूँ तब!”

“डिप्रेस्ड? ऐसी सुन्दर चीज़ आप डिप्रेस्ड होने पर पसंद करते हैं?”

“सुन्दर? अरे, वो कैसे?”

“अच्छा, आप बताइए, ग़ज़ल का मतलब क्या है?”

“ग़ज़ल का मतलब? ह्म्म्म... हाँ! वो जो ग़मगीन आवाज़ में धीरे धीरे गाया जाय?”

“ह्म्म्म अच्छा! तो आप जगजीत सिंह वाली ग़ज़ल की बात कर रहे हैं? फिर तो भई शाल भी ओढ़ ही ली जाय!”

हम दोनों इस बात पर खूब देर तक हँसे... और फिर रश्मि ने आगे कहना शुरू किया,

“एक बहुत बड़े आदमी हुए थे कभी... रघुपति सहाय साहब! जिनको फिराक गोरखपुरी भी कहा जाता है! खैर, उन्होंने ग़ज़ल को ऐसे समझाया है – मानो कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करे, और हिरन भागते-भागते किसी झाडी में फंस जाए और वहां से निकल नहीं पाए, तो वह डर के मारे एक दर्द भरी आवाज़ निकालता है। तो उसी करूण कातर आवाज़ को ग़ज़ल कहते हैं। समझिये की विवशता और करुणा ही ग़ज़ल का आदर्श हैं।“

“हम्म... इंटरेस्टिंग! कौन थे ये बड़े मियां फ़िराक?”

“उनकी क्वालिफिकेशन ससुनना चाहते हैं आप? मेरिटोक्रेटिक लोगो में यही कमी है! अपने सामने किसी को भी नहीं मानते! अच्छा.. तो रघुपति सहाय जी अंग्रेजों के ज़माने में आई सी एस (इंडियन सिविल सर्विसेज) थे, लेकिन स्वतंत्रता की लड़ाई में महात्मा गाँधी के साथ हो लिए। उनको बाद में पद्म भूषण का सम्मान भी मिला है। समझे मेरे नासमझ साजन?”

“सॉरी बाबा! लेकिन वाकई जो आप बता रही हैं बहुत ही रोचक है! आपको बहुत मालूम है इसके बारे में! और बताइए!”

“ओके! ग़ज़ल का असल मायने है ‘औरतों से बातें’! अब औरतों से आदमी लोग क्या ही बातें करते हैं? बस उनकी बढाई में कसीदे गढ़ते हैं! शुरू शुरू में ग़ज़लें ऐसी ही लिखते थे...

‘नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये, पंखडी एक गुलाब की सी हैं।‘”

“किस गधे ने लिखी है यह! आपकी तो दो-दो गुलाब की पंखुड़ियाँ हैं!”

“हा हा हा! वेरी फनी! इसीलिए पुराने सीरियस शायर ग़ज़ल लिखना पसंद नहीं करते थे। इसको अश्लील या बेहूदी शायरी कहते थे। लेकिन जैसे जैसे वक्त आगे बढ़ा, और इस पर और काम हुआ, जीवन के हर पहलू पर ग़ज़लें लिखी गयी।“

“अच्छा – क्या आपको मालूम है की उर्दू दरअसल भारतीय भाषा है?”

आज तो मेरा ज्ञान वर्धन होने का दिन था! मैं इस ज़रा सी लड़की के ज्ञान को देख कर विस्मित हो रहा था! क्या क्या मालूम है इसको?

“न.. हीं..! उसके बारे में भी बताइए?”

“बिलकुल! जब मुस्लिम लोग भारत आये, तब यहाँ – ख़ास कर उत्तर भारत में खड़ी-बोली या प्राकृत भाषा बोलते थे.. और वो लोग फ़ारसी या अरबी! साथ में मिलने से एक नई ही भाषा बनने लगी, जिसको हिन्दवी या फिर देहलवी कहने लगे। और धीरे धीरे उसी को आम भाषा में प्रयोग करने लगे। उस समय तक यह भाषा फ़ारसी में ही लिखी जाती थी – दायें से बाएँ! लेकिन जब इसको देवनागरी में लिखा जाने लगा, तो इसको हिंदी कहने लगे। लेकिन इसमें भी खूब सारी पॉलिटिक्स हुई – उस शुरु की हिंदी से संस्कृत बहुल शब्द हटाए गए तो वह भाषा उर्दू बनती चली गयी, और जब फारसी और अरबी शब्द हटाए गए तो आज की हिंदी भाषा बनती चली गयी। लेकिन देखें तो कोई लम्बा चौड़ा अंतर नहीं है।“

“क्या बात है! लेकिन आप ग़ज़ल की बात कर रही थी?”

“हाँ! तो उर्दू की बात मैंने इसलिए छेड़ी क्योंकि ग़ज़ल सुनने सुनाने का असली मज़ा तो बस उर्दू में ही हैं!”

“आप लिखती है?”

“नहीं! पापा लिखते हैं!”

“क्या सच? वाह! क्या बात है!! तो अब समझ आया आपका शौक कहाँ से आया!” रश्मि मुस्कुराई!

“आप क्या करती हैं? बस पापा से सुनती हैं?”

“हाँ!”

“लेकिन आपको गाना भी तो इतना अच्छा आता है! कुछ सुनाइये न?”

“फिर कभी?”

“नहीं! आपने इतना इंटरेस्ट जगा दिया, अब तो आपको कुछ सुनाना ही पड़ेगा!”

“ह्म्म्म! ओके.. यह मेरी एक पसंदीदा ग़ज़ल है ... मीर तकी मीर ने लिखी थी – कोई दो-ढाई सौ साल पहले! आप तो तब पैदा भी नहीं हुए होंगे! हा हा हा हा!”

रश्मि को ऐसे खुल कर बातें करते और हँसते देख कर, और सुन कर मुझे बहुत मज़ा आ रहा था!

“हा हा! न बाबा! उस समय नहीं पैदा हुआ था! बूढ़ा हूँ, लेकिन उतना भी नहीं...”

“आई लव यू! एक फिल्म आई थी – बाज़ार? याद है? आप तब शायद पैदा हो चुके होंगे? उस फिल्म में इस ग़ज़ल को लता जी ने बहुत प्यार से गाया है!”

“बाज़ार? हाँ सुना तो है! एक मिनट – आप भी कुछ देर पहले कह रही थीं की ग़ज़ल औरतों की बढाई के लिए होती है.. और अभी कह रही हैं की लता जी ने गाया?”

“अरे बाबा! लेकिन लिखी तो मीर ने थी न?”

“हाँ! ओह! याद आया! ओके ओके ... प्लीज कंटिन्यू!”

“तो जनाब! पेशे-ख़िदमत है, यह ग़ज़ल...” कह कर रश्मि ने गला खंखार कर साफ़ किया और फिर अपनी मधुर आवाज़ में गाना शुरू किया,

“दिखाई दिए यूं, के बेखुद किया... दिखाई दिए यूं, के बेखुद किया,

हमे आप से भी जुदा कर चले... दिखाई दिए यूं....”

रश्मि के गाने का तो मैं उस रात से ही दीवाना हूँ! लेकिन इस ग़ज़ल में एक ख़ास बात थी – वाकई, करुणा और प्रेम से भीगी आवाज़, और साथ में उसकी मुस्कुराती आँखें! मैं इस रसीली कविता ओह! माफ़ करिए, ग़ज़ल में डूबने लगा!

“जबीं सजदा करते ही करते गई... जबीं सजदा करते ही करते गई,

हक़-ए-बंदगी हम अदा कर चले... दिखाई दिए यूं....

परस्तिश कि या तक के ऐ बुत तुझे... परस्तिश कि या तक के ऐ बुत तुझे,

नजर में सबो की खुदा कर चले... दिखाई दिए यूं....”

रश्मि गाते गाते खुद भी इतनी भाव-विभोर हो गयी, की उसकी आँखों से आंसू बहने लगे ... उसकी आवाज़ शनैः शनैः भर्राने लगी, लेकिन फिर भी मिठास में कोई कमी नहीं आई... मैंने उसके कंधे पर हाथ रख अपनी तरफ समेट लिया।

“बहोत आरजू थी गली की तेरी... बहोत आरजू थी गली की तेरी...

सो या से लहू में नहा कर चले... दिखाई दिए यूं....

दिखाई दिए यूं, के बेखुद किया... दिखाई दिए यूं, के बेखुद किया,

हमे आप से भी जुदा कर चले... दिखाई दिए यूं....”

ग़ज़ल समाप्त हो गयी थी, लेकिन मेरे दिल में एक खालीपन सा छोड़ कर चली गयी।

“आई लव यू!” रश्मि बोली – लेकिन इतनी शिद्दत के साथ की यह तीन शब्द, तीन तीर के जैसे मेरे दिल में घुस गए... “आई लव यू सो मच!” उसकी आवाज़ में रोने का आभास हो रहा था, “मुझे आपके साथ रहना है... हमेशा! आपके बिना तो मैं मर ही जाऊंगी!”

रश्मि ने मेरे मुँह की बात छीन ली। उसकी बात सुन कर मेरी खुद की आँख से आंसू की बूँद टपक पड़ी। हाँ! मर्द को दर्द भी होता है, और मर्द रोते भी हैं.. प्यार कुछ भी कर सकता है। मैं कुछ बोल नहीं पाया – कुछ बोलता तो बस रो पड़ता। मैंने रश्मि को जोर से अपने में भींच लिया। जो उसका डर था, वही मेरा भी डर था। इतनी उम्र निकल जाने के बाद, मेरे साथ पहली बार कुछ ठीक हो रहा था।

आप कहेंगे की ‘अरे भई, अच्छी पढाई लिखाई हुई, अच्छी नौकरी है, अच्छा कमा रहे हो – घर है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है! फिर भी कैसे गधे जैसी बात कर रहे हो! यह सब अच्छी बाते नहीं हुई?’

तो मैं कहूँगा की ‘बिलकुल! यह सब अच्छी बाते हैं! लेकिन यह सब मैं इसलिए कर पाया की मेरे मन में एक प्रतिशोध की भावना थी! जिनके कारण मेरा बाल्यकाल उजड़ गया, उनको नीचा दिखाना मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन गया। भोगवादी परिमाणों और मापदंडो पर ही मेरा जीवन टिका हुआ था! एक अजीब तरह का चक्रव्यूह या कहिये भंवर! जिसमें मैं खुद ही घुस गया, और न जाने कितने अन्दर तक चला गया था। लेकिन रश्मि ने आते ही मुझे ऐसा अनोखा एहसास कराया की मानो पल भर में उस भंवर से बाहर निकल आया।‘
 
‘अब समझ आया इस खालीपन का रहस्य! मैं अब तक बिना वजह का बोझ, जो अपने सर पर लिए फिर रहा था, वह न जाने कहाँ मेरे सर से उतर गया था। मुझे रश्मि और उसके परिवार के रूप में एक अपना परिवार मिल गया था, जिसको मैं किसी भी कीमत पर सहेज कर रखना चाहता था।‘

“आई ऍम सॉरी जानू! मैं आपको रुलाना नहीं चाहती थी। ... मैं भी कितनी गधी हूँ .. इतने अच्छे मूड का सत्यानाश कर दिया।“

“नहीं जानू! सॉरी मत बोलो! और ऐसा कुछ भी नहीं है। बस, आपके आने से यह समझ आ गया की मैं क्या मिस कर रहा था मेरी लाइफ में! यू आर वेरी प्रेशियस फॉर मी! और मुझे भी आपके ही साथ रहना है।“

कह कर मैंने रश्मि को और जोर से अपने में दुबका लिया। मुझे मेरे जीवन में साफ़ उजाला दिख रहा था।

हम दोनों काला पत्थर बीच पर कम से कम छः घंटे तो रहे ही होंगे.. उस समय तो पता नहीं चला, लेकिन वापस रिसोर्ट आने पर जब आँखें थोड़ी अभ्यस्त हुईं, तो साफ़ दिख रहा था की रश्मि और मैं, सूरज की तपन से पूरी तरह से गहरे रंग के हो गए। वैसे भी भारतीय लोगों की त्वचा धूप को बढ़िया सोखती है, लिहाजा हम दोनों काले कलूटे बन गए थे। लेकिन एक अपवाद था... रश्मि ने टू-पीस बिकिनी पहनी हुई थी, इसलिए जो हिस्सा (दोनों स्तन, जघन क्षेत्र और नितम्बो का ऊपरी हिस्सा) ढका हुआ था, वह अभी भी अपने मूल, हलके रंग का था। इसको बिकिनी टेन कहते हैं। रश्मि ने कपड़े उतारे तो यह बात समझ आ गई। लेकिन शायद रश्मि ने देखा न हो, इसलिए उसने किसी भी तरह का विस्मय नहीं दिखाया। खैर नहा-धोकर हमने पकौड़े और चाय मंगाया, और खा-पीकर दोपहर में एक छोटी सी नींद सो गए।

जब मैं उठा तो देखा की सामने रश्मि कमर पर अपने हाथ टिका कर, और कूल्हा एक तरफ निकाल कर बड़ी अदा से खड़ी हुई थी। उसने कोका-कोला रंग का काफी पारदर्शक नाइटी (जिसको टेडी भी कहते हैं) पहना हुआ था। कमर से बस कुछ अंगुल ही नीचे तक पहुंचेगा लम्बाई में। स्तनों के ऊपर से जाने वाले स्ट्रैप बहुत पतले थे। स्तन पर बस यही कपड़ा था, इसलिए उसके अन्दर से चमकदार निप्पल साफ़ दिख रहे थे... और नाभि भी। उसने टेडी के नीचे चड्ढी पहनी हुई थी... एक बहुत ही सेक्सी ड्रेस!

“ओहो! हू इस अ बिग गर्ल नाउ? कम हियर!”

रश्मि मुस्कुराते हुए मेरे पास आई।

“न्यू ड्रेस?” मैंने रश्मि की ड्रेस को छूते हुए कहा।

“यस! प्रीटी न्यू! ओनली फॉर यू!”

“ह्म्म्म... आई लाइक दिस वन!” और फिर हँसते हुए मैंने कहा, “... एंड आई सी दैट यू आर वेअरिंग सम प्रीटी पैंटीज अंडरनीथ इट!”

“यस! वांट टू सी इट?”

मैंने सर हिला कर हामी भरी।

रश्मि ने हँसते हुए टेडी का निचला किनारा पकड़ कर ऊपर उठा दिया। उसकी गहरे कोका कोला रंग की चड्ढी साफ़ दिखने लगी। उसकी चमक और बनावट देख कर मुझे लगा की शायद सिल्क की बनी होगी। सिल्क! एक अत्यंत अन्तरंग कपड़ा! पुरुष, सिल्क पहनी हुई स्त्रियों को छूने की परिकल्पना करते रहते हैं। एक तरीके का सेक्स-सिंबल! प्लेबॉय जैसी मगज़ीनों में सिल्क पहनी हुई लड़कियों को देख कर अनगिनत लडको और आदमियों में हस्त-मैथुन किया होगा! वही सिल्क! वही परिकल्पना!

“ओह! दे आर रियली प्रीटी पैंटीज!” मेरी आँखों में एक इच्छा जाग गई, “विल यू माइंड, अगर मैं इसको छू कर देख लूं?”

“ओके!” कह कर रश्मि ने अपनी ड्रेस को कुछ और ऊपर उठा दिया.. चड्ढी का पूरा हिस्सा दिखने लगा। मैंने उंगली से चड्ढी के ऊपर से ही रश्मि की योनि का आगे वाला हिस्सा छुआ, और दूसरे हाथ से उसके नितम्बो के ऊपर से।

“फील्स गुड?” रश्मि ने पूछा।

“ओह! दे फील अमेजिंग! सो नाइस! सो स्मूद.. सो सेक्सी!” मैंने हँसते हुए पूछा, “डू दे मेक यू फील सेक्सी, हनी?”

“सेक्सी? ओह यस! दे डू!”

“आई ऍम श्योर! इट इस सो स्मूद! हम्म्म्म!” अपनी उंगली को रश्मि के पैरों के बीच में दबाते हुए मैंने कहा, “ज़रा अपने पैर फैलाइये.. देखूं तो ‘वहां’ पर छूने पर यह कैसी लगती हैं!”

“ओके!” कहते हुए रश्मि ने अपने पैर थोड़ा और खोले। और मैं बढाई करते हुए उंगली से योनि के ऊपर से उसकी चड्ढी का मखमली एहसास महसूस करने लगा।

“डोंट दे फील सो नाइस?” रश्मि ने अपनी आवाज़ थोड़ी कामुक बना कर पूछा।

“दे श्योर डू! नॉट ओन्ली नाइस, बट आल्सो अमेजिंग!” कहते हुए मैंने रश्मि की योनि की झिर्री के ऊपर से अपनी उंगली रगड़ कर फिरानी शुरू की। “आई रियली लाइक हाउ योर पैंटीज फील हियर, डार्लिंग!”

रश्मि खिलखिला कर हंसने लगी.. और साथ ही साथ मेरी उंगली की हरकतों को भी देखती रही। मैंने कुछ देर आहिस्ता आहिस्ता सहलाने के बाद अपनी उंगली की लम्बाई को उसकी योनि की पूरी दरार के अन्दर फिरानी शुरू कर दी।

“आह्ह्ह! आई रियली लाइक हाउ इट फील्स व्हेन आई रब योर पैंटीज हियर, हनी! दिस इस वेयर दे फील बेस्ट टू मी। तुझे अच्छा लगता है?“

“हा हा... हाँ! उम्म्म्म!!” कहते हुए उसने अपने नितंब मटकाए, जिससे मेरी उंगली ठीक से उसकी दरार में फिट हो जाय।

“आई कैन नॉट स्टॉप फीलिंग यू! इस दैट ओके?”

रश्मि हंसी।

“यू कैन फील अस मच अस यू वांट!”

“थैंक्स डिअर!” कह कर मैंने कुछ और दृढ़ता से योनि के ऊपर से दबाना और सहलाना आरम्भ कर दिया।

और फिर, “विल यू लेट मी सी हाउ दिस थिंग अंडर योर पैंटीज फील?” कह कर बिना किसी उत्तर का इंतज़ार किए, मैंने रश्मि की चड्ढी के अन्दर हाथ डाल कर, उसकी योनि की दरार की पूरी लम्बाई पर अपनी उंगली सटा कर थोड़ा बल लगाया। योनि के दोनों होंठ खुल गए और उनके बीच मेरी उंगली स्थापित हो गई।

“आह! दिस फील्स सो वार्म... एंड नाइस! डस इट फील गुड टू यू टू?” मैंने पूछा।

रश्मि खिलखिला कर हंस पड़ी, “यू आर अ नॉटी बॉय!”

“आई ऍम श्योर दैट इट फील्स गुड एंड सेक्सी बोथ..! आई बेट इट डस!”

“सेक्सी? हाउ?” रश्मि भी इस खेल में शामिल हो गई थी।

“हियर! लेट मी चेक..!” कह कर मैंने अपनी उंगली उसकी योनि के अन्दर प्रविष्ट कर दी।
 
इतनी देर तक सहलाने रगड़ने के बाद अंततः उसकी योनि से रस निकलने ही लग गया था। मैंने अपनी गीली उंगली उसकी योनि से बाहर निकाल कर उसको दिखाया, “सी! हाउ वेट दिस इस? डू यू नो व्हाट इट मीन्स?”

“व्हाट?” रश्मि ने अनभिज्ञता दर्शाते हुए पूरे भोलेपन से पूछा।

“इट मीन्स दैट यू फील सेक्सी इनसाइड, यू नॉटी गर्ल!” कह कर मैंने रश्मि को नितंब से पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और उसकी कमर के गिर्द अपनी बाहें लपेट लीं। रश्मि ने भी खड़े खड़े मेरे गर्दन के गिर्द अपनी बाहें लपेट लीं।

“आर यू हविंग फन?” मैंने अपना हाथ वापस रश्मि की नम और गर्म गहराई में डालते हुए पूछा।

“यस! हा हा! यू आर फनी!” मेरी किसी हरकत से उसको गुदगुदी हुई होगी..

मैंने कुछ देर सहलाने के बाद उसकी चड्ढी को दोनों तरफ से पकड़ कर धीरे धीरे नीचे की तरफ खींचना शुरू किया, “आई विल टेक दीस क्यूट पैंटीज... अदरवाइज, दे विल गेट वेट! ... इस दैट ओके?”

“ओके” रश्मि के ओके कहते कहते उसकी चड्ढी उतर चुकी थी।

मैंने रश्मि को अपनी जांघो के आखिरी सिरे पर बैठाया जिससे उसका योनि निरिक्षण किया जा सके। उस तरह बैठने से वैसे ही उसकी जांघे फ़ैल गई थीं, लिहाजा उसका योनि मुख कुछ खुल सा गया और उससे रिसते रस के कारण चमक भी रहा था।

“नाउ लुक अट दैट!” मैंने प्रशंसा करते हुए कहा, “सच अ क्यूट पुसी यू हैव!”

“पुसी? आप इसको बिल्ली कह रहे हैं?” रश्मि इस शब्द के नए प्रयोग को समझ नहीं सकी।

“पुसी मीन्स चूत, जानेमन! तेरी चूत बहुत क्यूट है!” मैंने बहुत ही नंगई से यह बात फिर से दोहराई। एक बात तो है, अंग्रेजी में ‘डर्टी-टॉक’ करना बहुत मज़ेदार होता है... न जाने क्यों हिंदी में वही बातें बोलने पर अभद्र सा लगता है! खैर!

“देखो न! कैसे हाईलाइट हो रही है...” दिन भर धुप सेंकने के कारण चड्ढी से ढंका हुआ हिस्सा अभी भी गोरा था, और ऊपर नीचे का बाकी हिस्सा साँवला हो गया था.. इसलिए ऐसा लग रहा था की जैसे अलग से उसकी योनि पर लाइट डाली जा रही हो! मैंने अपने दोनों अंगूठे से उसके होंठों को कुछ और फैलाया और अपनी उंगली को अन्दर के भाग पर फिराया.. और फिर अपनी उंगली को चाट लिया।

“ह्म्म्म... सो वैरी टेस्टी!”

“स्टॉप टीसिंग मी!” रश्मि कुनमुनाई।

“यू डोंट बिलीव मी? हियर यू आल्सो टेस्ट योर ओन जूसेस...” कह कर मैंने उसके रिश्ते हुए रस का एक और अंश अपनी उंगली पर लगाया और उसके होंठों के सामने रख दिया, “डोंट बी शाई! लिक इट!”

बहुत पहले मैंने एक फिल्म देखी थी... “अ फ्यू गुड मेन”... उसमें जैक निकोल्सन का किरदार एक डायलॉग बोलता है... “There is nothing on this earth sexier, believe me, gentlemen, than a woman you have to salute in the morning. Promote 'em all, I say, 'cause this is true: if you haven't gotten a blowjob from a superior officer, well, you're just letting the best in life pass you by.”

वैसे तो यह एक लैंगिकवादी सोच है, लेकिन पुरुष वर्ग इस बात की सच्चाई से इनकार नहीं कर सकता। जब स्त्री रति संभोग क्रिया में पहल करती है, तो पुरुष अत्यधिक उत्तेजना प्राप्त करने में समय नहीं लगाता। यही हाल मेरा भी इस समय था.. रश्मि ने इस खेल की पहल करी थी। यह उसका एक नया ही रूप था... मुझे पहले लगता था की उस पर मेरा किसी प्रकार का दबाव हो सकता है, और इसीलिए वह मेरी बातें मान रही हो। लेकिन, जब वह अपनी स्वेच्छा से ऐसी कामुक ड्रेस पहन कर मुझे सम्भोग के लिए ऐसे लुभा रही है, तो इसका मतलब कुछ तो बदला है! और उसका यह बदला हुआ रूप मुझे बहुत लुभा रहा था।

रश्मि ने मुंह नहीं खोला तो मैंने ही उसके दोनों गालो को दबा कर उसके होंठ खोल दिए और अपनी उंगली उसके मुंह में डाल दी। मरता क्या न करता! रश्मि ने पहले तो बेमन से, और फिर उत्सुक स्वेच्छा से मेरी उंगली चाट कर साफ़ कर दी।

“क्यों? मज़ा आया? है न स्वादिष्ट तुम्हारा ‘चूत-रस’?” मेरे इस तरह कहने से रश्मि के गाल शर्म से सुर्ख हो गए।

“तुम बोलो या नहीं.. है तो स्वादिष्ट!” कह कर मैंने वही उंगली अपने मुंह में डाल कर कुछ देर चूसा।

इंटिमेसी / अंतरंगता / निजता.. इन सबके मायने हमारे लिए बहुत बदल गए थे, इन कुछ ही दिनों में!

मैं बिना कुछ पहने ही सो गया था। और इस समय मेरे लिंग का बुरा हाल था, और स्पष्ट दिख भी रहा था। वह इस समय एकदम सख्त स्तम्भन की स्थिति में था। रश्मि ने अब तक मेरी उत्तेजना महसूस कर ली होगी, इसलिए उसका हाथ मेरे लिंग की पूरी लम्बाई पर चल-फिर और दौड़ रहा था। कभी वह यह करती, तो कभी मेरे वृषणों के साथ खेलती।

“यू हैव अ वैरी नाइस पुसी डिअर!” मैंने वापस अपनी उंगली को उसकी योनि पर फिराया, “... इट इस सो हॉट... एंड वेट! यू आर सो रेडी टू फ़क!”

कह कर मैंने अपनी मध्यमा उंगली को उसकी योनि के अन्दर तक ठेल दिया और एक पम्पिंग एक्शन से उसको अन्दर बाहर करने लगा... इसमें एक ख़ास बात यह थी की एक तरफ तो मेरी मध्यमा उसकी योनि के अन्दर बाहर हो रही थी, वहीँ दूसरी तरफ बाकी उंगलियाँ रह रह कर उसके भगनासे को सहला रही थीं।

दोहरी मार! रश्मि की साँसे इसके कारण भारी हो गई, और रुक रुक कर चलने लगीं। उसका चेहरा उत्तेजना से तमतमा गया। कभी वह मुंह खोल कर सांस भारती, तो कभी अपने सूखे होंठों को जीभ से चाटती.. उसका सीना भारी भारी साँसों के कारण ऊपर नीचे हो रहा था।

“कैसा लग रहा है, जानू?” मैंने पूछा।

“आह! सोओओ गुड! उम्म्म्मम...!” वह बस इतना ही कह पाई।

“ह्म्म्म... सो द लिटिल गर्ल इस ग्रोन नाउ! लुक अट हर पुसी... आल जूसी एंड हॉट!” मैं रह रह कर अपनी उंगली की गति कभी धीमी, तो कभी तेज़ कर देता। रश्मि कभी सिसियती तो कभी रिरियाती। कुछ ही देर में रति-निष्पत्ति के चरम पर पहुँच कर उसका शरीर कांपने लगा। उसकी बाहें मेरी गर्दन पर कस गईं और उसका माथा मेरे माथे पर आकर टिक गया। इस पूरे प्रकरण में पहली बार मैंने रश्मि के होंठ चूमे!

“मज़ा आया हनी?”

रश्मि उन्माद के आकाश में तैरते हुए मुस्कुराई।

“देखो न.. तुमने मेरी क्या हालत कर दी है! कितना कड़ा हो गया है मेरा लंड!” कह कर मैंने रश्मि का एक हाथ अपने लिंग पर लाकर रख दिया। रश्मि की उंगलियाँ स्वतः ही उस पर लिपट गईं। उधर मैं रश्मि के टेडी के ऊपर से ही उसके निप्पल को बारी बारी से चूमने और चूसने लगा। फिर दिमाग में एक आईडिया आया।

रश्मि को पकड़े पकड़े ही मैं बिस्तर पर लेट गया और रश्मि को अपने लिंग पर कुछ इस तरह से स्थापित किया की उसकी योनि मेरे लिंग की पूरी लम्बाई पर सिर्फ चले, लेकिन उसको अन्दर न ले। रश्मि भी इस इशारे को समझ गई, उसने अपनी ड्रेस काफी ऊपर उठा दी – अब उसके स्तन भी दिख रहे थे, और पूरे उत्साह के साथ मेरे लिंग को अपनी योनि-रस से भिगाते हुए सम्भोग करने लगी। बहुत ही अलग अनुभव था यह.. लिंग को योनि की कोमलता और गरमी तो मिल ही रही थी, साथ ही साथ कमरे की ठंडी हवा भी। योनि का कसाव और पकड़ नदारद थी, लेकिन दो शरीरों के बीच में पिसने का आनंद भी मौजूद था।

रश्मि के लिए भी उन्मादक अनुभव था – इस प्रकार के मैथुन से उसके जननांगों के सभी कोमल, संवेदनशील और उत्तेजक भाग एक साथ प्रेरित हो रहे थे। साथ ही साथ, मेरे ऊपर आकर मैथुन क्रिया को नियंत्रित करना उसके लिए भी एक अलग अनुभव रहा होगा... पिछली बार तो वह शर्मा रही थी, लेकिन इस बार वह एक अभिलाषा, एक प्रयोजन के साथ मैथुन कर रही थी। यह क्रिया अगले कोई पांच-छः मिनट तो चली ही होगी.. मेरे अन्दर का लावा बस निकलने को व्याकुल हो गया। मेरा शरीर अब कांपने लग गया था।

“जानू.. निकलने वाला है!”
 
मेरे बस इतना ही बोलने की देर थी की रश्मि ने अपनी बाहें मेरी गर्दन पर कस लीं और मेरे होंठों को मुँह में भर कर जोर से चूमने चूसने लगी। उसके ऐसा करते ही एक विस्फोट के साथ वीर्य का पहला खेप स्खलित हो गया और फिर उसके बाद ही ताबड़ तोड़ चार पांच बड़ी गोलिकाएं और निकलीं। रश्मि ने इस क्रिया के दौरान अपने कूल्हे चलाने जारी रखा। और मेरे स्खलन के कुछ ही देर बाद रश्मि का शरीर भी कुछ अकड़ा और एक बार फिर झटके खाते हुए वो भी शांत पड़ने लगी और मुझ पर निढाल होकर गिर गई। मेरा शरीर अभी भी उत्तेजना में कांप रहा था.. मैंने रश्मि को अपने में जोर से भींच लिया – कभी उसके होंठ चूमता, तो कभी गाल, तो कभी माथा! मेरी हरकतों पर मीठी मीठी सिसकियाँ निकल जातीं। इस अनोखे सम्भोग की संतुष्टि उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।

जब हमारी उत्तेजना का ज्वार कुछ थमा, तो मैंने कहा, “देखो न.. मैंने कहा था न की साँवली लड़कियाँ सेक्स में बहुत तेज़ होती हैं... और... गोरी लड़कियों को सिखाना पड़ता है! याद है?”

 रश्मि को पहले कुछ समझ नहीं आया, लेकिन फिर मेरा इशारा समझ कर मुस्कुरा दी। उसके गाल सेब के जैसे लाल हो गए।

प्रिय पाठकों, अगर आप मेरी माने, तो वैवाहिक जीवन का सुख तो यही है – हर पल बढ़ता पारस्परिक प्रेम और सामंजस्य, अपने जीवन की अंतरंगता को किसी और से ता-उम्र बांटना, सुखमय जीवन के सपने साथ में संजोना.. और संतुष्टि प्रदान करने वाली यौन क्रीड़ा! भला विवाह में इससे अधिक किसी को और क्या चाहिए? लोग-बाग़ दहेज़ मांगते हैं, खानदान मांगते हैं, होने वाले रिश्तेदारों में रुतबा मांगते हैं.. भला यह कोई शादी है? यह तो, आज कल वो कहते हैं न, सिर्फ और सिर्फ एक ‘अलायन्स’ है। अलायन्स... अरे हम लोग कोई राजे-रजवाड़े हैं क्या, जो राजनीतिक दृष्टि से सम्बन्ध बनाएँ? अलायन्स तो यही हुआ न? खैर... मेरी तो बस यही समझ है की शादी तो बस स्वयं के लिए करनी चाहिए!

लेकिन लोग बाग़ तो अपने माँ बाप का हवाला देते हैं.. मानों उनके लिए शादी कर रहे हैं। वह भाई! शादी के लड्डू खुद खाओ, और नाम माँ बाप का लगाओ! एक बार मैंने किसी लड़के के मुंह से सुना... वो लड़की वालो को कह रहा था, “जी मैं तो शादी अपनी माँ के लिए कर रहा हूँ... कोई ऐसी मिले जो उनका ख़याल रख सके! बहुत बीमार रहती हैं! कोई उनको अपना मान कर उनकी सेवा कर सके! बस! मेरी तो बस यही उम्मीद है लड़की से!”

मेरा उस लड़के से बस इतना ही कहना है की भाई, अगर अपनी माँ की सेवा करनी है तो तेरे खुद के हाथ-पैर टूट गए हैं क्या? कर भाई सेवा! बहुत पुण्य कमाएगा। माँ बाप की सेवा तो सबसे भला काम है जीवन का! लेकिन तू उस काम को करने के लिए किसी और की मदद क्यों चाहता है? खुद क्यों नहीं कर लेता? एक आया रख ले, किसी जानी मानी अच्छी एजेंसी से.. या फिर एक नर्स! फुल-टाइम के लिए! या फिर दोनों! यह उम्मीद करना की बीवी आकर तेरी अम्मा की सेवा करने लगेगी, न केवल गलत है, बल्कि मैं तो कहता हूँ की एक तरह का अत्याचार है! जो काम तू खुद नहीं कर पा रहा है, वो तू दूसरे से क्यों उम्मीद करता है?

पति पत्नी का साथ उम्र भर का होता है.. लेकिन वह उम्र भर तभी चलता है जब उन दोनों में एक दूसरे के लिए सम्मान, और प्रेम हो। सामंजस्य बैठाया जा सकता है.. लेकिन अगर यह दोनों सामग्री विवाह में न हो तो चाहे कितने भी मन्त्र फूंक लो, चाहे कितनी ही कुंडली का मिलान कर लो, और चाहे कितने ही ग्रह शांत करा लो, प्रलय तो निश्चित ही है!

ओह मैं भावनाओं की रौ में बह गया! माफ़ करना!!

सम्भोग की निवृत्ति के बाद हम दोनों ने जल्दी जल्दी अपनी सफाई करी और फिर कपड़े बदल कर अपनी साइकिल उठा कर द्वीप के पश्चिम दिशा की तरफ चल दिए.. जिससे सूर्यास्त के दर्शन हो सकें। रश्मि ने मुझे बताया था की सूर्यास्त ऐसा सुन्दर हो सकता है, उसको मालूम ही नहीं था। पहाड़ों पर क्या सूर्योदय और क्या सूर्यास्त! सब एक जैसा ही दिखता है। हम दोनों जल्दी ही एक साफ़ सुथरे निर्जन बीच पर पहुँच गए.. ऐसा कोई निर्जन भी नहीं था.. कोई पांच छः जोड़े वही बैठे हुए थे, सूर्यास्त के इंतज़ार में।

रश्मि और मैं बाहों में बाहें डाल कर सुनहरी रेत वाले इस बीच के एक तरफ बैठ गए।

“जानू, मैं आपसे एक बात कहूं?”

“हाँ.. पूछो मत, बस कह डालो” मैंने रोमांटिक अंदाज़ में कहा।

“मैं आपके साथ ही रहना चाहती हूँ.... हनीमून के बाद भी।“

“हयं! तो और कहाँ रहने वाली थी? अरे भई, हम लोग हस्बैंड-वाइफ हैं.. साथ ही तो रहेंगे?”

“नहीं वो बात नहीं... बोर्ड एक्साम्स के लिए पढना भी तो है। इतने दिनों से कॉलेज नहीं गई हूँ.. और जो भी कुछ पढ़ा लिखा था, वो सब गायब है! हा हा!”

“हा हा! अच्छा, कब हैं एक्साम्स?”

“मार्च – अप्रैल के महीने में ही होंगे.. लेकिन आप कुछ न कुछ कर के मुझे अपने साथ रखिए न, प्लीज!”

“अरे! यह भी कोई कहने वाली बात है? एग्जाम तो वही जा कर देने होंगे... लेकिन उसके पहले के लिए एक काम तो कर ही सकते हैं.. आपके प्रिंसिपल से पूछ के ‘होम-स्कूल’ की अनुमति ले सकते हैं.. वो अलाऊ कर दें, तो फिर बस एग्जाम देने के लिए आपको मार्च में वापस जाना होगा... उतना तो ठीक है न? उसके बाद फिर से यहाँ? ओके?”

“हाँ... ठीक तो है... लेकिन हो जाएगा न?”

“अरे क्यों नहीं? मुझसे ज्यादा पढ़े लिखे लोग हैं क्या वहां? मैं कन्विंस कर लूँगा आपके प्रिंसिपल को! और जहाँ तक पढाई की बात है, हमारे पड़ोसी बहुत ही क्वालिफाइड हैं.. उनसे कह कर दिन में आपकी पढाई का इंतज़ाम कर दूंगा... कुछ कोर्स तो मैं ही पढ़ा सकता हूँ.. मुझे नहीं लगता कोई प्रॉब्लम होगी। क्या पता आप टापर हो जाएँ! हा हा!”

रश्मि मुस्कुराई।

“वैसे आप आगे क्या करना चाहती हैं? मेरा मतलब कैरियर के बारे में कुछ सोचा है? आप कह रही थी न.. हमारी सुहागरात को, की आप कुछ करना चाहती हैं.. कुछ बनना चाहती हैं?”

“करना तो चाहती हू, लेकिन क्या करूंगी.. कुछ मालूम नहीं..!”

“अच्छा, मैं आपसे कुछ सवाल पूछूंगा... आप सोच कर उसमें जो पसंद है बताइयेगा.. ओके?”

“ओके..”

“खूब पैसे चाहिए, की रुतबा?”

“उम्म्म्म...” रश्मि ने कुछ देर तक सोचा और फिर कहा, “..आप!”

मैं मुस्कुराया, “खूब मेहनत या फिर आराम?”

“मेहनत.. लेकिन आपका साथ चाहिए।“

“ओके! नौकर, या अपना खुद का बॉस?”

“अपना खुद का..”

“नौकरी या बिजनेस...”
 
“नौकरी या बिजनेस...”

“पता नहीं...”

“हम्म.. मेरे मन में यह बकवास करते करते एक ख्याल आया। क्यूँ न आप अपना खुद का बिजनेस शुरू करो? साथ में ग्रेजुएशन की पढाई करते रहना? अगर दिमाग में बढ़िया आईडिया हो, तो बिजनेस ज़रूर करना चाहिए। पैसे की जो ज़रुरत होगी, वो मैं करूंगा... मेरे बहुत से दोस्त भी है, अगर वो आपके बिजनेस आईडिया से सहमत हों, तो वो भी पैसे लगा सकते हैं। बैंगलोर वैसे भी उद्यमियों का शहर है! प्रोफेशनल हेल्प मिल जाएगी। सोचना... कोई जल्दी नहीं है! ओके?”

“बाप रे! आप मुझ पर इतना भरोसा करते हैं?”

“देखो, जानू, भरोसा तो मुझे आप पर है.. लेकिन जब तक आईडिया सॉलिड नहीं होगा, मैं पैसे नहीं लगाऊँगा!” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

“लेकिन... मुझे तो अभी तक कुछ मालूम ही नहीं! क्या करना है, क्या नहीं..”

“तो क्या हुआ.. अभी कोई जल्दी नहीं है.. अपना टाइम लीजिये.. जब समझ आयें तभी कुछ करेंगे! ओके?”

मैंने रश्मि के बालों में अपने हाथ से सहलाया.. और फिर आगे कहा, “देखो, यह बात सच है की कम उम्र में शादी करने से बहुत सी समस्याएँ खड़ी हो जाती है। लेकिन मैं आपसे आज कुछ वायदे करता हूँ। पहला तो यह की आपको अपने व्यक्तितत्व के विकास के लिए पूरा समय, और सहयोग दूंगा। आपको जो भी कुछ करना है, जो भी कुछ बनना है, उसमें मैं पूरी मदद करूंगा। आप पर किसी भी तरह की पारिवारिक जिम्मे*दारी तब तक नहीं आने दूंगा, जब तक आप उसके लिए पूरी तरह से तैयार न हों – मतलब पढाई लिखाई पूरी करनी होगी, और उसके बाद आपका अगर मन हो तो आप अपना पूरा ध्यान कैरियर पर लगाइए। और बच्चा तभी जब आप तैयार हों।“

अब तक आसमान में जीवंत और चटक गुलाबी, लाल, नारंगी और पीले रंगों की छटा छा गई। सूरज का लाल गोला धीरे धीरे बादलों के पीछे से नीचे आ रहा था।

रश्मि ने मेरी तरफ उचक कर मेरे होंठों को चूम लिया।

“थैंक यू!” उसने कहा।

मैंने उसकी आँखों में देखा और फिर मुस्कुराते हुए कहा, “नो! थैंक यू!”

मैंने उसकी आँखों में ध्यान से देखा – आंसू से रश्मि की आँखें डबडबा गईं थीं। रश्मि कोशिश कर रही थी की आंसू न निकालें, लेकिन फिर भी एक-एक बूँद आँखों से निकल कर उसके गालों पर ढलक ही गई। मैंने बिना कुछ कहे रश्मि का हाथ थाम लिया... निशब्द भाषा में बस यह कहने के लिए की मैं उसके साथ हूँ... जीवन की कड़वी सच्चाईयाँ अभी दूर थीं... जो इस समय हमारे पास था वह था हम दोनों का साथ और यह सुन्दर सूर्यास्त!

“आई लव यू!” कहते हुए रश्मि का गला भर आया। उसने बड़े प्रयत्न से अपना गला साफ़ किया और स्वयं पर नियंत्रण किया।

“पता है आप मेरे कौन है?” भावुक माहौल था.. नहीं तो किसी न किसी तरह की चुहलबाजी ज़रूर करता।

“आप मेरे कृष्ण है! मेरे सम्पूर्ण पुरुष! जब ज़रुरत हुई तब प्रेमी, जब ज़रुरत हुई तब सारथी, और जब ज़रुरत हुई तब सखा! मैंने सच में कोई बहुत पुण्य के काम किए होंगे, जिसके कारण मुझे आप मिले।“

“बाप रे!”

“सच में!”

“आई लव यू!”

“आई लव यू टू!!”

मैंने रश्मि को अपनी बाहों के घेरे में कस कर दुबका लिया – जैसे मेरा आलिंगन उसके लिए सबसे सुरक्षित स्थान बन जाय.. हम दोनों वैसे ही काफी देर तक सूर्यास्त का अद्भुत् नज़ारा देखते रहे। सूरज ढलने के साथ साथ ही धीरे धीरे सांझ का धुंधलका बढ़ने लगा, और उसके साथ ही आसमान में गहरे लाल, काले नीले इत्यादि रंग उभरने लगे। कई लोग अब जाने की तैयारी कर रहे थे और जो लोग रुके हुए थे, उनकी भी बस पार्श्व आकृति ही दिख रही थी।

“अभी कैसी हो जानू?” मैंने पूछा।

“मैं ठीक हूँ!”

“घर बात करना है?”

“मेरा घर तो आप हैं!”

“ओहो! मेरा मतलब माँ से? या सुमन से? ... बात करनी है वहाँ? वहां कॉल किए दो दिन हो गए शायद?”

“हाँ! मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा! आपके संग तो मैं सब कुछ भूल गई हूँ!”

“अच्छी बात है... ये लो फ़ोन.. बात कर लो!”

“आप नहीं करेंगे?”

“अरे.. कॉल मैं ही लगा कर आपको दे दूंगा.. ओके?”

मैंने उत्तराँचल कॉल लगाया। चूँकि फ़ोन तो भंवर सिंह जी के ही पास रहता है, इसलिए उनको ही उठाना था।

“हल्लो!” मैंने कहा..

“हल्लो रूद्र.. कैसे हैं आप बेटा?”

‘बेटा!’ रिश्ते में तो हम बाप-बेटा ही तो हैं! वो अलग बात है की उम्र में कोई खास अंतर नहीं है।

“जी.. पापा..” मैंने हिचकिचाते हुए कहा, “हम दोनों ठीक हैं..”

“स्वास्थ्य ठीक है आप दोनों का? मौसम कैसा है वहाँ?”

“स्वास्थ्य एकदम ठीक है... मुझे लगा था की ठन्डे गरम के कारण कहीं जुकाम न हो जाय, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यहाँ का मौसम तो गरम ही है.. चारों ओर समुद्र से घिरा है, इसलिए बारहों मास ऐसे ही रहता है यहाँ। .. और आप कैसे हैं? माता जी कैसी हैं?”

“हम सब ठीक हैं बेटा.. आप लोगो की बहुत याद आती है। बस और क्या!”

मैं इसके उत्तर में क्या ही बोलता! “लीजिये, रश्मि से बात कर लीजिए..” कह कर मैंने रश्मि को फ़ोन थमा दिया।

लाडली बेटी का फ़ोन आते ही वहां पर सब लोग आह्लादित हो गए होंगे – मैंने सोचा।
 
रश्मि का परिप्रेक्ष्य

कैसे सब कुछ इतनी जल्दी बदल जाता है! हफ्ता भर पहले ही मैं माँ पापा को छोड़ कर कहीं जाने की सोच भी नहीं सकती थी.. और आज का दिन यह है की उनकी याद भी नहीं आई! क्या जादू है! सहेलियों की बातों, कहानियों और फिल्मों में देखा सुना तो था की प्यार ऐसा होता है, प्यार वैसा होता है.. लेकिन, अब समझ में आया की प्यार कैसा होता है! प्यार का एहसास तो हमेशा ही नया रहता है - हमेशा ताज़ा!

पापा से कुछ देर बात करने के बाद माँ फ़ोन पर आई.. उनसे बात करनी शुरू ही की थी की ‘इनका’ हाथ मेरे स्तनों पर आ टिका! ‘हाय’ मेरे मुंह से अनायास ही निकल पड़ा। उधर से माँ ने पूछा की क्या हुआ.. अब उनको क्या बताती? मैं जैसे तैसे उनसे बात करने की कोशिश कर रही थी, और उधर मेरे पतिदेव मेरे स्तनों से खेल रहे थे – वो बड़े इत्मीनान से मेरे स्तन दबा और धीरे धीरे सहला रहे थे। चाहे कुछ भी हो, ऐसा करने से स्त्रियों के चूचक कड़े होने ही लगते हैं। मेरे भी होने लगे। शरीर में जानी पहचानी गुदगुदी होने लगी। मैं अन्यमनस्क सी होकर बाते कर रही थी, लेकिन सारा ध्यान उनके इस खेल पर ही लगा हुआ था। वे कभी मुझे चूमते, तो कभी मेरे बालों को सहलाते, तो मेरे स्तनों से खेलते! अंततः उनका हाथ मेरी पैंट के अन्दर और उनकी उंगली मेरी योनि की दरार पहुँच गई। उनके टटोलने से मैं बेबस होने लग गई.. माँ क्या कह रही थी और फिर कब सुमन फ़ोन पर आ गई, मुझे कुछ याद नहीं! मदहोशी छाने लगी। सच में मैं रूद्र की दासी हूँ.. अगर वो उस समय मुझे नग्न होने को कहते तो मैं तुरंत हो जाती... बिना यह सोचे की वहां पर और लोग भी उपस्थित थे। इतना तो तय है की मैं उनकी किसी बात का विरोध कर ही नहीं सकती!

खैर, ऐसा कुछ नहीं हुआ.. सुमन ने अपने जीजू से बात करने को कहा तो मैंने फ़ोन इनको दे दिया।

“मेरी एंजेल कैसी है?” इन्होने प्रेम और वात्सल्य भरी बात कही.. एक बात तो है, ये जो कहते हैं, उनकी आँखे भी वही कहती हैं। न कोई लाग लपेट, और न कोई फरेब! सच्चा इन्सान!

उधर से सुमन ने कुछ बात कही होगी, तो ये मुस्कुरा रहे थे.. बहुत देर तक मुस्कुरा कर सुनने के बाद इन्होने कहा, “अरे तो फिर हमारे पास आ जाओ! दो से भले तीन! है न?”

फिर उधर से सुमन ने कुछ कहा होगा, जिसके उत्तर में इन्होने ‘आई लव यू टू’ कहा, और बाय कर के फ़ोन काट दिया।

“क्या बाते हो रही थीं जीजा साली में? रोमांटिक रोमांटिक... ईलू ईलू वाली!” मैंने ठिठोली करी।

“हा हा हा! अरे जो भी हो रही हो... आपको इससे क्या? हमारी आपस की बात है! हा हा!” फिर कुछ देर रुक कर, “.. जानू, क्यों न एग्जाम के बाद वहां से सभी लोग यहीं बैंगलोर में रहें? सुमन की पढाई भी अच्छी जगह हो जायेगी.. और माँ पापा भी आराम से रह लेंगे! क्या कहती हो?”

“आप को लगता है की माँ पापा आयेंगे यहाँ?”

“क्यों! क्या प्रॉब्लम है?”

“वो लोग बहुत पुराने खयालो वाले हैं, जानू! बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते!”

“हंय! इसका मतलब वो लोग यहाँ आयेंगे तो कहीं और से पानी लाना पड़ेगा?”

“आप भी हमेशा मजाक करते रहते हैं! आप ट्राई कर लीजिए.. आ जाते हैं तो इससे अच्छा क्या?” मैंने कहा, और आगे जोड़ा, “... और अभी आप क्या कर रहे थे, बदमाश! माँ और सुमन ने क्या कहा, कुछ याद नहीं!”

***************

बीच से मैंने सीधा मेडिकल शॉप का रुख लिया। रश्मि के पूछने पर उसको बताया की उसके लिए सेनेटरी नैपकिन लेने जा रहे हैं। मुझे यह जान कर घोर आश्चर्य हुआ की उसको नैपकिन के बारे में हाँलाकि मालूम तो था, लेकिन उसका प्रयोग रश्मि ने कभी नहीं किया था। कुछ देर तक उससे प्रश्नोत्तर करने के बाद सब कुछ समझ में आ गया। एक तो छोटा सा क़स्बा, और उसमें निम्न मध्यम वर्गीय और रूढ़िवादी परिवार! पुराने रूढ़िवादी विचार, रीति-रिवाज और अंध-विश्वासों को मानने के कारण उसकी माँ ने भी रश्मि को वही सब सिखाया था।

बाद में और पढने पर मुझे समझ आया की यह हालत खली एक रश्मि की ही नहीं है... देश की कम से कम सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ, और महिलाएं सेनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं करती हैं – या तो खर्च वहन नहीं कर सकने के कारण, और या तो अपने रूढ़िवादी विचारों के कारण! हालत यह है की भारत की अनगिनत महिलाएं और लड़कियाँ आज भी पीरियड के दौरान गंदे कप़ड़े का उपयोग करती हैं, जिसके कारण वे संक्रमण की चपेट में आ जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की एक बहुत ब़ड़ी वजह यौनांग की साफ-सफाई न होना है।

जहाँ तक रश्मि का प्रश्न है, पीरियड्स के दौरान उसके और सुमन के साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है। दोनों लडकियां पूजाघर और रसोई से दूर रहती हैं। रक्त-स्त्राव रोकने के लिए रद्दी कप़ड़ों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। इस कारण से हर महीने तीन चार दिन पढने भी नहीं जा पाती। ऐसा नहीं है की रश्मि के परिवार वाले उसके लिए सेनेटरी पैड खरीद नहीं सकते थे – सस्ते उत्पाद तो मौजूद ही हैं। लेकिन पुरानी परम्पराओं को जैसे का तैसा निभाना, और यह सोचना की दूकान पर जाकर पैड खरीदने से परिवार की प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा.. यह दोनों सबसे बड़े कारण बने – न खरीदने के।

खैर, यहाँ पर जब हम मेडिकल शॉप पहुंचे, तो दुकानदार ने नैपकिन के पैकेट को अखबार में लपेटकर, काली पोलीथिन बैग में डाल कर दिया.. जैसे वह मुझे दारू बेच रहा हो! सच में! देश की महिलाओं को क्या कुछ सहना पड़ता है! दुकानदार से क्या बहस करता? बस, सामान लेकर वापस रिसोर्ट आ गए।

वापस आकर देखा तो रिसेप्शन पर मौरीन और आना खड़े थे... वहां पर उनसे कुछ देर बात चीत की। मौरीन ने मुझे आँख के इशारे से कुछ न कहने को कहा था, इसलिए मैंने किसी भी तरह से आना को यह अहसास नहीं होने दिया की मौरीन और हमारे बीच में कुछ भी हुआ था। वैसे भी यह कोई ऐसी बात नहीं थी जिसको मैं याद रखना चाहता।

रात में ऐसा कुछ उल्लेखनीय नहीं घटा। बस खाया पिया, और आराम से सो गए।

सवेरे उठा, तो अपने ऊपर एक अतिरिक्त भार महसूस हुआ। आँखें खुलीं तो देखा की रश्मि मुझसे पूरी तरह चिपकी सो रही थी – करवट के कारण उसका बायाँ पाँव मेरे जांघों के ऊपर आराम कर रहा था। मैंने उस पर प्यार से हाथ फिराया तो समझ आया की वह पूर्ण-रूप से निर्वस्त्र है।

मैं मुस्कुराया, ‘बढ़िया!’

और उसको अपने आलिंगन में समेट कर उसके माथे पर जोरदार चुम्बन दिया। मेरी इस हरकत से उसकी नींद भी खुल गई। मैंने अपनी घड़ी में देखा.. सवेरे के सात बज रहे थे।

“उठो जानू! आज का प्रोग्राम क्या है?” मैंने रश्मि के दोनों नितम्बों के बीच में अपना हाथ फिराते हुए पूछा। पांव मेरे ऊपर इस प्रकार रखने के कारण उसका योनि द्वार थोड़ा खुल गया था, इसलिए मेरी तर्जनी उंगली अनायास ही उसके योनि के अन्दर दो-तीन मिलीमीटर चली गई।

“उई अम्मा!” रश्मि चिहुंक गई, “धत्त! आप भी न.. जब देखो तब इसी में घुसना चाहते हैं..” अपनी उनींदी आवाज़ में रश्मि ने कहा।

“जानेमन, जब इसके जैसी नरमी, इसके जैसी गरमी और इसके जैसा स्वाद मिले, तो मैं कहीं और क्यों घुसूँ? यहीं न घुसूँ?” (मैंने ‘आपकी पारखी नज़र और निरमा सुपर’ वाले प्रचार की तर्ज पर अपना जुमला ठोंक दिया।)

“धत्त...!” वह शर्मा कर मेरे सीने में छुप गई।

“मेरी जान, मेरी ऐसी हरकतों में मेरी कोई गलती नहीं। तुम्हारी चूत वाकई बहुत खूबसूरत है!” मैंने सफाई पेश करी। उसने कोई उत्तर नहीं दिया... बस मेरे सीने में सर छुपा कर हंसने लगी।

“अच्छा, एक बात बताइए... आपको शेविंग करनी आती है?” मैंने पूछा।

“शेविंग करना? नहीं.... क्यों? मुझे क्या ज़रुरत है, शेविंग करने की? मुझे दाढ़ी थोड़े न आती है!”

“दाढ़ी नहीं... ये तो आती है न?” कह कर मैंने उसके योनि पर उगे बालों को उंगली से पकड़ कर खींचा – ऐसे नहीं की रश्मि को दर्द हो, बस इतना जिससे रश्मि को उनका एहसास हो जाय।

“हाय राम! इसकी शेविंग?”

“हाँ! और क्या? आपको अच्छे लगते है क्या ये बाल?”

“नहीं, ऐसे कोई अच्छे तो नहीं लगते!”

“तो फिर इनको साफ़ क्यों नहीं करती?”

“मैं कैसे साफ़ करूँ?”

“अरे! रेज़र से.. या फिर कैंची से!”

“बाप रे!”

“बाप रे?”

“और क्या? कहीं कट गया तो?”

“हम्म... तो ठीक है... चलो, मैं ही काट देता हूँ। क्या कहती हो?” मैं हंसने लगा।

“नहीं जी, रहने दीजिये! जैसा है, उसी से काम चलाइए!” रश्मि ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा।
 
“जानू, प्लीज! मैं इनको साफ़ कर देता हूँ। मैं शेविंग करने में एक्सपर्ट हूँ। साफ़ हो जायेगी तो फिर आप ही बोलोगी, की कितनी ख़ूबसूरत चूत है मेरी!”

“धत्त! न बाबा! मुझे शर्म आती है!”

“अरे भाड़ में गई शर्म! तो फिर तय रहा... नाश्ते के बाद आज मैं तुमको नहलाता हूँ... ओके? ठीक से! चलो उठो... जल्दी से नाश्ता करने चलते हैं...” कह कर मैं बिस्तर से उठा, और रश्मि को भी उठाया। मैंने उठ कर कमरे की खिड़कियाँ खोल दीं और वातानुकूलन बंद कर दिया। आज भी मौसम अच्छा था – बढ़िया हवा चल रही थी। परदे खींच दिए, जिससे कोई कमरे के अन्दर यूँ ही आनायास न देख सके...

फ्रेश हो कर और ब्रश करने के बाद नाश्ता समाप्त किया और जल्दी से अपने कमरे में चले आए।

मैंने अपने बैग से शेविंग किट निकाली – रिसेप्शन वाले दिन से मैंने अब तक शेविंग नहीं बनाई थी, इसलिए चेहरे पर कड़े बाल की ठूंठ निकल आई थी। मैंने जल्दी से अपनी शेविंग ख़तम करी – वैसे भी मुझे अपनी दाढ़ी बनाना बहुत ही ऊबाऊ काम लगता है। समय की बर्बादी! फिर रेजर में नए ब्लेड-कार्टरिज लगा कर रश्मि को पुकारा,

“आओ.. मैंने तुमको नहलाता हूँ।“

रश्मि ने सर हामी में हिलाया, और पहनने के लिए कपड़े तह कर के बाथरूम के अन्दर आई।

“ये क्या? नहाने के बाद कपड़े पहनने का इरादा है क्या?”

“क्यूँ जी? नहलाने के बाद बच्ची को नंगी रखने का इरादा है क्या आपका?”

“जानेमन शेविंग और नहाने के बाद ऐसी चिकनी हो जाओगी, तो खुद ब खुद नंगी होने का मन करेगा।“ मेरी बात सुन कर रश्मि का चेहरा शर्म से सुर्ख लाल हो गया।

रश्मि का परिप्रेक्ष्य

जघन क्षेत्र की शेविंग जैसा तो मैंने अपने पूरे जीवन में कभी नहीं सुना। ये भी न जाने क्या क्या आईडिया लाते हैं... नित नए प्रयोग, नित नए अनुभव! बाप रे! क्या दिमाग है इनके पास!

बाथरूम में वैसे कोई स्टूल या कुर्सी तो थी नहीं, इसलिए मैं खुद ही टॉयलेट के कमोड की सीट पर कवर रख कर के उसी पर बैठ गई। कपड़े उतारने का काम मेरे श्रीमान ने ही कर दिया। इस समय मैं नितांत नग्न थी, और मन ही मन सोच रही थी की कैसा अनुभव होगा! न जाने कैसे दिल में हमारे प्रथम मिलन के पहले होने वाला अनजान भय घर कर गया। फिर मैंने सोचा की ये हैं, तो फिर क्या डर? मैंने अपने पांव यथा-संभव खोल दिए, जिससे इनको मेरी योनि के सारे हिस्से में अभिगमन करने में आसानी हो। उन्होंने मुझको ऐसे ही बैठे रहने को कहा, और फिर अपनी शेविंग क्रीम और ब्रश की सहायता से मेरी योनि पर देर तक ढेर सारा झाग बनाया। उन्होंने समझाया की वह इसलिए ऐसा कर रहे हैं जिससे मेरे बाल पूरी तरह से मुलायम हो जाएँ। वो सब तो ठीक है, लेकिन समस्या यह थी की इनके शेविंग ब्रश की मेरी योनि पर मीठी मीठी रगड़ाई और ठन्डे ठन्डे पानी के स्पर्श से मेरा मन बेबस हुआ जा रहा था। ‘बैजर हेयर’ हाँ... शायद यही बताया था... किसी जानवर के बाल से बना हुआ था ब्रश! मुलायम! अनजाने ही मेरी टाँगे और खुलती चली गईं...

“वेल,” उन्होंने मेरी उत्तेजना ज़रूर कह्सूस करी होगी.. लेकिन फिर भी बिना किसी भाव के कहा, “थैंक यू! इससे शेव करने में ज्यादा आसानी होगी!”

फिर उन्होंने रेजर की मदद से सावधानीपूर्वक धीरे धीरे मेरी योनि पर से बाल की परत हटाने का उपक्रम आरम्भ किया। कभी वे त्वचा को इधर खींचते तो कभी उधर, कभी फैलाते, तो कभी दबाते, तो कभी योनि के दोनों होंठों को उँगलियों से फैलाते। उनके लिए यह शायद सिर्फ शेविंग करना हो, लेकिन उत्तेजना के मारे मेरी हालत खराब हुई जा रही थी। बहुत ज्यादा बाल नहीं थे, इसलिए कोई पांच मिनट के बाद उन्होंने अपना काम समाप्त कर दिया... कमरे की हवा का स्पर्श मेरी योनि ठंडा ठंडा महसूस हो रहा था, इसलिए मुझे समझ आया की मेरी योनि पूरी तरह बाल-विहीन हो गई है। लेकिन उन्होंने मुझे इसको देखने से मना कर दिया – कहने लगे की जब मैं कहूं, तभी देखना। ठीक है! इंतज़ार और सही!

उन्होंने काम होने के बाद एक छोटे तौलिये से मेरी योनि पोंछी और कहा, “अरे वाह जानेमन! हाय! मैं मर जावां!”

इनकी इस निर्लज्ज उद्घोषणा से मैं बहुत शर्मा गई... लेकिन फिर भी उत्सुकतावश मैंने नीचे देखने की कोशिश करी। लेकिन उन्होंने फिर से मना कर दिया और कहा की अब मैं तुमको नहलाऊँगा। उन्होंने मेरी कलाई पकड़ कर मुझे कमोड से उठाया और फिर बाथरूम के नहाने वाले स्थान पर ले गए। उन्होंने पानी का फौव्वरा चलाया और खुद भी निर्वस्त्र होकर मेरे साथ शामिल हो गए। हम नहाने के लिए रिसोर्ट के साबुन का प्रयोग नहीं कर रहे थे – ये ही न जाने कौन सा बेहद सुगन्धित साबुन लाये थे।

खैर, रूद्र ने बड़े इत्मीनान से मेरे पूरे शरीर पर साबुन रगड़ा – ख़ास तौर पर मेरे बगल में, मेरे स्तनों पर और मेरी योनि और नितम्बों के बीच के हिस्से पर!

“ज़रा अपने पैर खोल कर सीधी खड़ी हो जाना तो.. तुम्हारी चूत और गांड की सफाई कर देता हूँ।“ मुझे उनकी गन्दी भाषा सुन के बुरा तो लगता है, लेकिन एक तरह की उत्तेजना भी आती है। अब इस विरोधाभास की व्याख्या कैसे करूँ, समझ नहीं आता।खैर, उनके आदेश का पालन करते हुए मैं अपनी टाँगे खोल कर सीधी खड़ी हो गई.. और उनकी उंगलियाँ निर्बाध रूप से मेरी योनि, उसके भीतर और मेरी गुदा के भीतर सफाई के बहाने सेंध लगाने लगीं।

“आह! क्या कर रहे हैं..!?”

“चुप!” उन्होंने मीठी झिड़की लगाई।

इस क्रिया के दौरान उनका खुद का लिंग खड़ा हो गया.. मैंने हाथ बढ़ा कर उसको पकड़ने की कोशिश करी।

“नहीं.. अभी नहीं..” कह कर उन्होंने मुझे रोक दिया।

उन्होंने खुद पर भी साबुन लगाया और फिर हम दोनों साथ में फौव्वारे के नीचे नहाने लगे। उसमे ज्यादा समय नहीं लगा। उन्होंने एक बड़ी तौलिया उठाई और पहले मेरा और फिर अपना शरीर पोंछ कर मुझे वापस बेडरूम में ले आये, और मुझे बड़े शीशे के सामने खड़ा कर बोले,

“अब देखो..!”

शीशे के सामने खड़े हुए मैं अपने को निहारती हूँ - मेरा स्वयं का अनावृत्त शरीर! एक पल को मैं खुद को पहचान ही नहीं पाती हूँ... कब देखा है मैंने खुद को इस तरह? इतने इत्मीनान से? न तो एकांत मिलता है और न ही इस प्रकार के संसाधन! ऐसा लगा की आईने में दिखने वाली लड़की मैं नहीं हूँ। यह एक कमसिन और बाल-रहित योनि वाली लड़की थी - जैसे कोई छोटी बच्ची!

हे भगवान्! मेरी योनि के होंठों के सिलवटें साफ़ साफ़ दिख रही थीं। ऐसे तो मैंने इनको कभी नहीं देखा था। ऐसे लग रहा था की जैसे उनकी नुमाइश लगा दी गई हो। बाप रे! अपने आपको इतनी नंगी मैंने कभी नहीं महसूस किया। मैंने शर्मा कर अपनी योनि को अपने हाथों से छुपा लिया और कहा, “मुझे बहुत शरम आ रही है।“

युवा वक्ष, छोटे कंधे, गोलाकार नितंब, और केशों से टपकती पानी की बूंदें...! मैं खुद पर मुग्ध हुई जाती हूँ... खुद के शरीर पर! इतनी खूबसूरत हूँ क्या मैं... सचमुच? क्या सचमुच रूद्र रोज़ निर्बाध इसी सौन्दर्य का पान करते हैं? मैंने कनखियों से उनकी तरफ देखा... उनकी आंखों में मेरे लिए कामना थी - उद्दीप्त कामना! एक चाहत थी - उद्दाम चाहत...!

“मज़ा आया, जानेमन?”

उत्तर में मैं सिर्फ मुस्कुराई...

“अब बताओ... इस बच्ची को नंगा नहीं, तो फिर कैसे रखा जाए?” उनकी आवाज़ एक परिचित रूप से कर्कश हो गई थी... इस कर्कशता की मैं पहचानती हूँ.. वो खुद भी उत्तेजित थे – मुझमें आसक्त!

“आओ इधर और बिस्तर पर लेट जाओ।“ उन्होंने अगला आदेश दिया।

मैं बिस्तर की तरफ जाते हुए देखती हूँ की रूद्र अपने बैग से किसी प्रकार की बोतल निकाल रहे थे। मैं लेट जाती हूँ और वे मेरे पास आकर कहते हैं, “तुम्हारी स्किन ड्राई हो गई होगी। मैं क्रीम लगा देता हूँ.. अच्छा लगेगा!”

मैं मूर्खों के जैसे पूछती हूँ, “आप मेरे पूरे बदन पर क्रीम लगायेंगे?”

“बस देखती जाओ...”

रूद्र मेरे सर के नीचे दूसरी सूखी तौलिया रख देते हैं, जिससे बिस्तर गीला न हो और फिर अपनी हथेली में ढेर सारी क्रीम लेकर मेरे स्तनों, हाथों और पेट पर धीरे धीरे रगड़ देते हैं। अगला राउंड मेरी जांघों और पैरों का था। फिर उन्होंने मेरी योनि को निशाना बनाया – क्रीम लगते ही हलकी सी चुनचुनाहट हुई। शायद शेविंग करने में कहीं कुछ कट गया होगा। मेरी सिसकियाँ निकल गई, लेकिन मैं उनको रोका नहीं।

उन्होंने तीन चार मिनट तक अपनी उँगलियों से मेरी योनि पर अच्छी तरह से क्रीम लगाया.. इतनी अच्छी तरह की मैं उसी बीच एक बार परम सुख भी पा गई। उन्होंने मुझे कुछ देर सुस्ताने दिया और फिर कहा,

“अभी पेट के बल लेट जाओ..”

मैं उनकी आज्ञापालन करते हुए पलट गई। उन्होंने पहले पीठ पर क्रीम लगाई और फिर पैर और जाँघों के पिछले हिस्से पर लगाई। माँ के बाद मुझे इतने अन्तरंग तरह से शायद ही किसी ने मालिश की हो... और मुझे वो तो याद भी नहीं! शरीर भर में सिहरन दौड़ गई। उसके बाद उन्होंने एक तकिया उठाकर मेरे जघन क्षेत्र के नीचे लगा दी। इससे यह हुआ की मेरे नितंब काफी उठ से गए।

‘क्या करने वाले हैं ये?’ मैंने सोचा।

“जानू, मेंढ़क के जैसे हो जाओ..”

मुझे समझ नहीं आया..., “मतलब? कैसे?”

रूद्र ने पीछे से ही मेरे पैर ऊपर की तरफ उठा दिए, इस प्रकार जैसे मेरे घुटने मेरे पेट के बराबर हो जाएँ, और हाथ को मेरे सर (मस्तक) के नीचे रख दिया। बहुत बेढब सी अवस्था थी... घुटने पेट के बराबर, पैर फैले हुए – मेरी योनि और ... गुदा दोनों ने खुल कर निर्लज्ज प्रदर्शनी लगा रखी थी इस समय।

“आप क्या करने वाले हो?” मैं बच्चे जैसे रिरियाई।

“श्श्श्हह्ह... कुछ देर शांत रहो.. अगर मज़ा न आए, तब कहना। ओके?”
 
मज़ा क्या आएगा? मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है। एक तो जिस तरह से रूद्र ने रोज़ रोज़ मेरे अंग-प्रत्यंग की जाँच करी है, और जिस तरह का परिचय उनका मेरे गुप्तांगों से है, वैसा तो मुझे भी नहीं है। उन पर विश्वास करने के अतिरिक्त मेरे पास कोई चारा नहीं था। उनके ही निर्देशों पर मैंने अपनी टाँगे और चौड़ी खोल दीं...

‘क्या देखना चाहते हैं ये? भला ‘वो’ भी कोई देखने की चीज़ है?!’

रूद्र इस समय मेरे नितम्बों पर क्रीम लगा रहे थे.. कभी हथेली से, तो कभी उंगली से। मुझे कुछ कुछ संशय हो रहा था, उनके इरादों पर। लेकिन फिर भी मैंने सोचा की साथ देती हूँ, जब तक हो पाता है तब तक! जल्दी ही उनकी क्रीम से भरी उंगली मेरी गुदा-द्वार पर फिरने लगी और फिर अन्दर जाने लगी। हर बार जैसे ही उंगली अन्दर आती, स्वप्रतिक्रिया में मेरी गुदा का द्वार बंद हो जाता।

‘मेरी गुदा को भी भंग करना चाहते हैं क्या?’ मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा।

“क्या करना चाहते हो?” मैंने याचना भरी आवाज़ में कहा, और साथ ही साथ पीछे की तरफ मुड़ी। उनका तना हुआ प्रबल लिंग इस तरह से उठा हुआ था की मानो मेरी गुदा को ही देख रहा हो।

“जानू, थोड़ा वेट तो करो!”

उन्होंने कुछ और क्रीम उंगली पर लेकर मेरी गुदा में प्रविष्ट कराया और देर तक भीतर ही चलाते रहे। कुछ देर में मुझे गुदा पर अभूतपूर्व फैलाव महसूस हुआ... तुरंत समझ में आ गया की इस बार उंगली नहीं, उनका लिंग अन्दर जाने की कोशिश कर रहा है!

“न न नहीं..! प्लीज! वहां पर नहीं! प्लीज! मैं मर जाऊंगी!”

“जानू! एक बार ट्राई तो करते हैं?”

“नहीं! आगे से आपका मन भर गया क्या, जो आप पीछे डालना चाहते हैं? प्लीज प्लीज! मैं आपकी हर बात मानूंगी, लेकिन ये नहीं! मैं मर जाऊंगी सच में! आप उंगली ही डाल रहे हैं और उसी में मेरी जान निकल रही है।“ मैं बुरी तरह गिड़गिड़ा रही थी। इनका जो भी प्लान था, मैं उसमे भाग नहीं लेना चाहती थी।

“अच्छा ठीक है... ठीक है! मैं कुछ नहीं करूंगा! भरोसा रखो। सॉरी! तुमको दर्द देकर मुझे कोई मज़ा थोड़े ही मिलेगा!” उन्होंने मेरे नितंब सहलाते हुए भरोसा दिलाया। लेकिन मन में डर बैठ गया...

इतना सब होते हुए भी मैंने जो मेंढकी वाला आसन लगाया था, वह अभी तक लगा हुआ था। रूद्र मेरे पीछे आकर मुझ्ह्से चिपक गए और पीछे से ही मेरे स्तनों को पकड़ कर भींचने लगे। साथ ही साथ वह अपने कमर को कुछ इस तरह से चक्कर में घुमा रहे थे जिससे उनके लिंग का अग्रिम भाग मेरी योनि और कभी कभी गुदा पर छू जाता। जैसे ही मेरी योनि को उनका लिंग छूता, मेरा मन होता की एक झटके से उनके लिंग को अन्दर ले लूं.. लेकिन स्त्रियोचित संकोच और लज्जा मुझे रोक लेती। इसी पूर्वानुमान में मेरी योनि से रस निकलने लगा।

उन्होंने बहुत देर तक मुझे ऐसे ही सताया... और इस पूरे घटनाक्रम में मैं सोच रही थी और उम्मीद लगाए बैठी थी की कभी तो इनका धैर्य छूटेगा, और कभी तो वो मेरे अन्दर प्रविष्ट होंगे। यही सब सोचते हुए मैंने इतने में ही एक बार और चरमोत्कर्ष प्राप्त कर लिया।

‘क्या स्टैमिना है इनमें! लगता है एक जबरदस्त सम्भोग होने वाला है! एक तगड़ी चुदाई..!’ मन में कैसे कामुक विचार! अजीब सी मस्ती छाने लगी... इस समय मेरा अंग-अंग थरथरा रहा था, घुटनों में सम्हलने की ताकत ही नहीं बची थी.. इन्होने पीछे से मुझको थाम रखा था, इसलिए मैं अभी भी उसी अवस्था में टिकी थी.. नहीं तो अब तक गिर चुकी होती।

उनको मेरे चरमोत्कर्ष का पता अवश्य चला होगा, क्योंकि अब वो मेरी योनी को चाट रहे थे। उत्तेजना के वशीभूत होकर मैं अपने नितम्ब जोर जोर से हिलाने लगी। मेरी हालत बहुत बुरी थी। एकदम छंछा जैसी हरकतें! इस समय रूद्र मेरी योनि के भगोष्ठों को खोलकर जीभ से अन्दर तक कुरेद और चाट रहे थे। न चाहते हुए भी मेरे गले से कामुक सिस्कारियां छूट गईं। उधर उन्होंने चूसना जारी रखा। कुछ ही देर में मैं दूसरी बार चरम आनंद को प्राप्त कर कांपने, और आहें भरने लगी। मेरे होशो-हवास सब गायब हो गए - उनका इस तरह चाटना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। इस बार रूद्र ने मुझे छोड़ दिया, तो मैं निढाल होकर बिस्तर पर गिर गई – इतनी भी ताकत नहीं बची की ठीक से लेट जाऊं.. बस उसी अवस्था में लेटी रही।

मैंने देखा की रूद्र बैग में से कुछ और भी निकाल रहे थे... कोई शीशी! वापस आकर उन्होंने मुझे बिस्तर पर चित्त लेटा दिया और मेरी जांघे थोड़ा और फैला दीं। मैं तो निढाल पड़ी थी, उन्ही के रहमो करम पर! ऐसे नीचे से देखने पर रूद्र का तना हुआ लिंग दिख पड़ रहा था। ऐसा भयावह वह पहले दीं भी नहीं दिखा। निःसंदेह उसकी लम्बाई और मोटाई कुछ ज्यादा ही लग रही थी। उसकी नसें भी फूल कर मोटी हो रही थी, और उसका आगे का चमकदार गुलाबी भाग भी दिख रहा था। अपनी ताकत बटोर कर मैंने उस माँसल अस्त्र को पकड़ लिया। इतना गर्म! बहुत अद्भुत सी बात थी – नहाने के बाद संभवतः कमरे के वातानुकूलन के कारण उनके वृषण सिकुड़ कर उनके जघन क्षेत्र के काफी अन्दर छुप गए से मालूम हो रहे थे, लेकिन लिंग की अलग ही बात थी! इतना गर्म, और सामान्य उत्तेजना से भी अधिक उत्तेजित!

उन्होंने मुझे कुछ देर अपना लिंग पकड़ने दिया और फिर अलग होकर अपने काम के अगले हिस्से को अंजाम देने लगे। शीशी खोलकर उन्होंने मेरी योनी पर उड़ेल दिया।

“क्या ... है.. यह?” मैंने टूटी फूटी कामुक आवाज़ में पूछा!

“हनी... यह हनी है!”

एक और प्रयोग! योनि एक स्वादिष्ट भोज्य भी बनायीं जा सकती है! उन्होंने उंगली से शहद को मेरी पूरी योनी पर फैलाया और फिर जीभ की नोक से धीरे धीरे चाटने लगे।

“आहह…!” अभी अगर मैं इस समय मर भी जाऊं, तो कोई दुःख न होगा! ऐसा सुखद एहसास! “हम्*म्*म्*म*” उनका मेरी योनि का यूँ भोग लगाना मुझे पागल किए जा रहा था। मन में इच्छा जागी की वो लगातार ऐसे ही चाटते रहें। अनायास ही मैं अपनी बची खुची ताकत लगा कर अपने नितम्बो को उठा उठा कर योनि को उनके मुंह में और पहुँचाने की कोशिश कर रही थी। इसी बीच मैंने देखा की वो अपने लिंग पर भी शहद लगा रहे थे। शहद लगाने के बाद वह मेरे ऊपर उल्टा होकर लेट गए.. लेट नहीं गए... लेकिन कुछ ऐसे की उनका लिंग मेरे मुँह की तरफ रहे, और उनका मुँह मेरी योनि के ऊपर! मैंने भी बिना किसी पूर्वाग्रह के उनका लिंग अपने मुँह में भर लिया।

‘स्वादिष्ट!’ मैं उनके शहद से चिपुड़े लिंग पर जीभ फेर फेर कर स्वाद ले रही थी, और रूद्र मेरी योनि का!

इतना मजा जीवन में कभी नहीं आया – मानों मैं स्वर्ग की सैर कर रही हूँ! मुझे तो किसी भी चीज़ का आभास नहीं था – बस यह की योनि के रास्ते से आनंद का उन्माद मेरे पूरे शरीर में फ़ैल रहा था। तीसरी बार मेरी योनि में जबरदस्त चिंगारी पनपी – इस बार मुझे वहां से द्रव छलकता महसूस हुआ... मेरा पूरा शरीर अकड़ने लगा। मैंने दोनों हाथों को बिस्तर पर पटक रही थी, और हांफ रही थी! बेबस... लाचार! लेकिन संतुष्ट!

रूद्र खुद भी न जाने कब से मुझे भोगने को तैयार थे, लेकिन सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिए अभी तक खुद को जब्त किए हुए थे। लेकिन अब बस! वो मेरे ऊपर से उतरकर, मेरी दोनो टांगों को चौड़ा करके, और एक तकिये को उठाकर मेरे नितम्बों के नीचे लगा कर उनके बीच में बैठ गए। अपने लिंग को उन्होंने मेरी योनि पर सटाया, और दोनों हाथों से मेरी कमर थाम कर अपने लिंग को अनादर की तरफ धकेला।

“आहहह...” अन्दर इतनी चिकनाई हो गई थी की पहले ही वार में उनका ज्यादातर लिंग मेरी योनि में समां गया। उन्होंने फिर मेरे होंठों को चूमते हुए, पहले तो धीरे धीरे, और बाद में तेज़ गति से मुझे भोगना आरम्भ कर दिया। एक के बाद एक तीव्र रति-निष्पत्ति के बाद मेरी दशा निर्जीव जैसी हो गई थी। लेकिन उनके सम्भोग के तरीके में कुछ ख़ास बात थी, की कुछ ही देर में मैं भी अब कुछ होश में आकर अपने नितम्बों को उन्ही की गति से, धीरे धीरे ही सही, गति मिलाने लगी। कोई तीन मिनट के बाद अचानक ही उन्होंने सम्भोग की गति बढ़ा दी। मुझे भी अपने अन्दर एक और लावा बनता हुआ महसूस होने लगा! घोर आश्चर्य! ये चौथा होगा.. और इनका पहला!

मुझे एक और बार चरम सुख मिल गया। लेकिन ये नहीं रुके। निष्पत्ति के सुख के बाद मेरी सांसे अभी तक सम्भल भी नहीं पाई थी कि इन्होने मुझे अपने आलिंगन में भर लिया और बहुत तेज गति से धक्के चलाने लगे। ऐसे तो उन्होंने कभी नहीं किया। तीन चार बार तो मुझे चोट भी लग गई! फिर अचानक ही ये भी स्खलित हो गए – मुझे मेरे अन्दर बेहद गरम द्रव गिरता हुआ महसूस हुआ! गहरी साँसे भरते हुए रूद्र निढाल हो कर मेरे ही ऊपर गिर गए। हम दोनों देर तक अपनी साँसे नियंत्रित करते रहे। मुझे मूत्र की तीव्र इच्छा हो रही थी, लेकिन थकावट इतनी ज्यादा थी की हिलने का भी मन नहीं कर रहा था।

लेकिन रूकती भी तो कितनी देर! कुछ तो बात है – यौन संसर्ग के बाद न जाने क्यों मुझे मूत्र की तीव्र इच्छा होने लगती है। मैं कुनमुनाई। इनको जैसे तुरंत समझ आ गया।

“टॉयलेट जाना है?” इन्होने पूछा।

“हाँ.. जल्दी!” कहते हुए मैं मुस्कुराई। कितना कुछ बदल गया इतने ही दिनों में! अब कोई संकोच नहीं लगता!

“आओ मेरे साथ..” कह कर ये उठे और मुझे भी हाथ पकड़ कर बिस्तर से उठा लिया।

‘फिर कोई नया खेल क्या? बाप रे!’

मैं ठीक से चल नहीं पा रही थी – एक तो मेरे पाँव अभी तक कांप रहे थे, और ऊपर से बहुत ज्यादा थकावट! इसलिए रूद्र ने मुझे सहारा देकर बाथरूम तक पहुँचाया। बाथरूम तक, लेकिन कमोड तक नहीं। वो मुझे नहाने वाले स्थान पर लेकर गए... मुझे कुछ समझ नहीं आया। मैंने उनकी तरफ देखा, लेकिन जब उन्होंने कुछ नहीं कहा तो मैं बैठने लगी।

“रुको..” इनकी आँखों में एक बार फिर से एक शैतानी चमक जाग गई। मैं समझ गई की अब मैं फिर से मरने वाली हूँ!

रूद्र वहीँ बाथरूम की फ़र्श पर लेट गए, और मुझे इशारे से अपने ऊपर बैठने को कहने लगे।

“छी! आप भी न! न जाने क्या क्या करवाते हैं मुझसे!”

"अरे यार! क्या छी? एक बार मेरा कहा मानो.. मज़ा न आये तो फिर शिकायत करना!" उनकी बात सुन कर मुझे हंसी आ गए! बच्चों जैसी जिज्ञासा, उन्ही के जैसी शैतानी, उन्ही के जैसी मासूमियत! उन्होंने मुझे हाथ से पकड़ कर अपने जघन क्षेत्र पर बैठाने में मेरी मदद करी। मैं क्या ही करती? मैं भी जैसे तैसे उनपर उकडूं बैठ गई – बहुत ही बेढब तरीका था.. लेकिन अब समझ आया की रूद्र क्या चाहते थे। एक तो मेरे उनके ऊपर इस तरह बैठने से मेरी योनि पूरी तरह से प्रदर्शित होती, और मूत्र उन्ही के ऊपर ही गिरता!

"जानू! आप श्योर हैं? मुझे बहुत जोर से आ रही है।"

उन्होंने सर हिला कर हामी भरी, “बिलकुल श्योर! शुरू करो।"

उन्होंने दोनों हाथ से मैंरे दोनों टखने पकड़ लिए और मैंने अपने दोनों हाथ उनके सीने पर टिका दिए – सहारे के लिए। दिक्कत यह है की कुछ देर अगर मूत्र को रोक लिया जाए, तो फिर तुरंत ही नहीं हो पाता – कुछ देर इंतज़ार करना पड़ता है। मैंने कुछ देर तक अपनी साँसे नियंत्रित करीं, और अपनी मांस-पेशियाँ कुछ शिथिल करीं।

मैं अपनी आँखें मूँद लीं, और मूत्र करने पर ध्यान लगाया।
 

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