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चट्टानों में आग ( एक थ्रिलर उपन्यास )

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चट्टानों में आग ( एक थ्रिलर उपन्यास )

कर्नल ज़रग़ाम बेचैनी से कमरे में टहल रहा था।

वह अधेड़ उम्र का, मज़बूत शरीर वाला रोबदार आदमी था। मूंछे घनी और नीचे की तरफ़ को थीं। बार-बार अपने कन्धों को इस तरह हिलाता था जैसे उसे डर हो कि उसका कोट कन्धों से लुढ़क कर नीचे आ जायेगा। यह उसकी बहुत पुरानी आदत थी। वह कम-से-कम हर दो मिनट के बाद अपने कन्धों को ज़रूर हिलाता था। उसने दीवार से लगी हुई घड़ी पर फ़िक्र-भरी नज़रें डालीं और फिर खिड़की के पास खड़ा हो गया।

तीसरे हफ़्ते का चाँद दूर की पहाड़ियों के पीछे से उभर रहा था। मौसम भी खुशगवार था और फ़िज़ा बेहद दिलकश!... मगर कर्नल ज़रग़ाम की बेचैनी!...वह इन दोनों में से किसी से भी आनन्द नहीं उठा सकता था।

अचानक किसी आहट पर चौंक कर वह मुड़ा। दरवाज़े में उसकी जवान लड़की सोफ़िया खड़ी थी।

'ओह डैडी...दस बज गये...लेकिन...!' 'हाँ...आँ!...' ज़रग़ाम कुछ सोचता हुआ बोला, 'शायद गाड़ी लेट है।'

वह खिड़की के बाहर देखने लगा। सोफ़िया आगे बढ़ी और उसने उसके कन्धे पर हाथ रख दिया।

'आप इतने परेशान क्यों हैं?' सोफ़िया आहिस्ता से बोली।

'आफ़फ़ोह!' कर्नल ज़रगाम मुड़ कर बोला, 'मैं कहता हूँ कि आख़िर तुम्हारी नज़रों में इन वाक़यात की कोई अहमियत क्यों नहीं!'

'मैंने यह कभी नहीं कहा!' सोफ़िया बोली, 'मेरा मतलब तो सिर्फ यह है कि बहुत ज़्यादा फ़िक्र करके ज़ेहन को थकाने से क्या फ़ायदा।'

'अब मैं इसका क्या करूँ कि हर पल मेरी उलझनें बढ़ती ही जाती हैं।'

'क्या कोई नयी बात?' सोफ़िया के लहजे में हैरानी थी।

'क्या तुमने कैप्टन फ़ैयाज़ का तार नहीं पढ़ा?'

‘पढ़ा है, और मैं इस वक्त उसी के बारे में गुफ़्तगू करने आयी हूँ।'

'हूँ! तो तुम भी उसकी वजह से उलझन में पड़ गयी हो?'

'जी हाँ!...आख़िर इसका क्या मतलब है? उन्होंने लिखा है कि एक ऐसा आदमी भेज रहा हूँ जिससे आप लोग तंग न आ गये तो काफ़ी फ़ायदा उठा सकेंगे...मैं कहती हूँ ऐसा आदमी भेजा ही क्यों, जिससे हम तंग आ जायें...! और फिर वह कोई सरकारी आदमी भी नहीं है।' ___

'बस यही चीज़ मुझे भी उलझन में डाले हुए है।' कर्नल ने घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा, 'आख़िर वो किस किस्म का आदमी है? हम तंग क्यों आ जायेंगे?'

'उन्होंने अपने ही महकमे का कोई आदमी क्यों नहीं भेजा?' सोफ़िया ने कहा।

'भेजना चाहता तो भेज ही सकता था, लेकिन फ़ैयाज़ बड़ा उसूल का पक्का आदमी है। एक प्राइवेट मामले के लिए उसने सरकारी आदमी भेजना मुनासिब नहीं समझा होगा।

कर्नल ज़रग़ाम के दोनों भतीजे अनवर और आरिफ़ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आने का इन्तज़ार कर रहे थे। गुप्तचर विभाग के सुपरिन्टेंडेण्ट कैप्टन फ़ैयाज़ ने उनके चचा के कहने पर एक आदमी भेजा था जिसे लेने के लिए वे स्टेशन आये थे। गाड़ी एक घण्टा लेट थी।

उन दोनों ने भी कैप्टन फ़ैयाज़ का तार देखा था और आने वाले के बारे में सोच रहे थे।

 
ये दोनों जवान, सुन्दर, स्मार्ट और पढ़े-लिखे थे। अनवर आरिफ़ से सिर्फ दो साल बड़ा था। इसलिए उनमें दोस्तों की-सी बेतकल्लुफ़ी थी और आरिफ़ अनवर को उसके नाम ही से पुकारा करता था।

'कैप्टन फ़ैयाज़ का तार कितना अजीब था!' आरिफ़ ने कहा।

'इस कमबख़्त ट्रेन को भी आज ही लेट होना था!' अनवर बड़बड़ाया।

'आख़िर वो किस किस्म का आदमी होगा!' आरिफ़ ने कहा।

‘उँह, छोड़ो! होगा कोई चिड़चिड़ा, बददिमाग़।' अनवर बोला,

'कर्नल साहब ख़ामख़ा ख़ुद भी बोर होते हैं और दूसरों को भी बोर करते हैं।'

'यह तो तुम्हारी ज़्यादती है।' आरिफ़ ने कहा, 'इन हालात में तुम भी वही करते जो वो कर रहे हैं।'

_ 'अरे छोडो...! कहाँ के हालात और कैसे हालात....सब उनका वहम है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि उन जैसे वहमी आदमी को एक पूरी बटालियन की कमाण्ड कैसे सौंप दी गयी थी...कोई तुक भी है। आखिर घर में बिल्लियाँ रोयेंगी तो ख़ानदान पर कोई-न कोई आफ़त ज़रूर आयेगी। उल्लू की आवाज़ सुन कर दम निकल जायेगा। अगर खाना खाते वक्त किसी ने प्लेट में छुरी और काँटे को क्रास करके रख दिया तो बदशगुनी!...सुबह-ही-सुबह अगर कोई काना आदमी दिखाई दे गया तो मुसीबत!'

'इस मामले में तो मुझे उनसे हमदर्दी है।' आरिफ़ ने कहा।

'मुझे ताव आता है!' अनवर भन्ना कर बोला।

'पुराने आदमियों को माफ़ करना ही पड़ता है।'

'ये पुराने आदमी हैं।'अनवर झल्ला कर कहा, 'मुझे तो उनकी किसी बात में पुरानापन नहीं नज़र आता, सिवा पुराने ख़यालात के।'

'यही सही! बहरहाल, वो पिछले दौर की विरासत है।'

तेज़ किस्म की घण्टी की आवाज़ से वे चौंक पड़े। यह ट्रेन के आने का इशारा था। यह एक छोटा-सा पहाड़ी स्टेशन था। यहाँ मुसाफ़िरों को होशियार करने के लिए घण्टी बजायी जाती थी। पूरे प्लेटफार्म पर आठ या दस आदमी नज़र आ रहे थे। उनमें नीली वर्दी वाले खलासी भी थे जो इतनी शान से अकड़-अकड़ कर चलते थे जैसे वे स्टेशन मास्टर से भी कोई बड़ी चीज़ हों। खाना बेचने वाले ने अपना जालीदार लकड़ी का सन्दक जिसके अन्दर एक लालटेन जल रही थी, मोंढे से उठा कर कन्धे पर रख लिया। पान, बीड़ी, सिगरेट बेचने वाले लड़के ने, जो अभी मुँह से तबला बजा-बजा कर एक अश्लील-सा गीत गा रहा था, अपनी ट्रे उठा कर गर्दन में लटका ली।

ट्रेन आहिस्ता-आहिस्ता रेंगती हुई आ कर प्लेटफ़ार्म से लग गयी।

अनवर और आरिफ़ गेट पर खड़े रहे।

पूरी ट्रेन से सिर्फ तीन आदमी उतरे। दो बूढ़े देहाती और एक जवान आदमी जिसके जिस्म पर ख़ाकी गैबरडीन का सूट था। बायें कन्धे पर ग़िलाफ़ में बन्द की हुई बन्दूक लटक रही थी और दाहिने हाथ में एक बड़ा-सा सूटकेस था।

ज़्यादा मुमकिन यही था कि इसी आदमी के लिए अनवर और आरिफ़ यहाँ आये थे।

वे दोनों उसकी तरफ़ बढ़े। 'क्या आप को कैप्टन फ़ैयाज़ ने भेजा है?' अनवर ने उससे पूछा।

'अगर मैं खुद ही न आना चाहता तो उसके फ़रिश्ते भी नहीं भेज सकते थे।' मुसाफ़िर ने मुस्कुरा कर कहा।

‘जी हाँ! ठीक है।' अनवर जल्दी से बोला।

'क्या ठीक है?' मुसाफ़िर पलकें झपकाने लगा।

अनवर बौखला गया। वही जो आप कह रहे हैं।'

'ओह!' मुसाफ़िर ने इस तरह कहा जैसे वह पहले कुछ और समझा हो।

आरिफ़ और अनवर ने अर्थपूर्ण नज़रों से एक-दूसरे को देखा।

'हम आपको लेने के लिए आये हैं।? आरिफ़ ने कहा।

'तो ले चलिये ना!' मुसाफ़िर ने सूटकेस प्लेटफार्म पर रख कर उस पर बैठते हुए कहा।

 
अनवर ने कुली को आवाज़ दी। __

'क्या!' मुसाफ़िर ने हैरत से कहा, 'यह एक कुली मुझे सूटकेस समेत उठा सकेगा!'

पहले दोनों बौखलाये, फिर हँसने लगे।

‘जी नहीं!' अनवर ने शरारती अन्दाज़ में कहा, 'आप ज़रा खड़े हो जाइए।'

मुसाफ़िर खड़ा हो गया। अनवर ने कुली को सूटकेस उठाने का इशारा करते हुए मुसाफ़िर का हाथ पकड़ लिया, 'यूँ चलिए!' ___

'लाहौल विला कूवत!' मुसाफ़िर गर्दन झटक कर बोला, 'मैं कुछ और समझा था।

उसने अनवर और आरिफ़ को सम्बोधित करके कहा, 'शायद तार का मज़मून तुम्हारी समझ में आ गया होगा?'

आरिफ़ हँसने लगा। लेकिन मुसाफ़िर इतनी संजीदगी से चलता रहा जैसे उसे इस बात से कोई सरोकार ही न हो। वह बाहर आ कर कार में बैठ गये। पिछली सीट पर अनवर मुसाफ़िर के साथ था और आरिफ़ कार ड्राइव कर रहा था।

अनवर ने आरिफ़ को सम्बोधित करके कहा, 'क्या कर्नल साहब और कैप्टन फ़ैयाज़ में कोई मज़ाक़ का रिश्ता भी है।'

आरिफ़ ने फिर कहकहा लगाया। वे दोनों सोच रहे थे कि इस मूर्ख मुसाफ़िर के साथ वक्त अच्छा गुज़रेगा।

'जनाब का इस्मे-शरीफ़,' अचानक अनवर ने मुसाफ़िर से पूछा।

'कलियर शरीफ़।' मुसाफ़िर ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया।

दोनों हँस पड़े।

'हॉय! इसमें हँसने की क्या बात!' मुसाफ़िर बोला।

'मैंने आपका नाम पूछा था।' अनवर ने कहा।

'अली इमरान। एम.एस.सी, पी-एच.डी।'

'एम.एस.सी, पी-एच.डी.,' आरिफ़ हँस पड़ा।

‘आप हँसे क्यों? इमरान ने पूछा?

'ओह...मैं दूसरी बात पर हँसा था।' आरिफ़ जल्दी से बोला।

'अच्छा तो अब मुझे तीसरी बात पर हँसने की इजाज़त दीजिए।' इमरान ने कहा और बेवकूफ़ों की तरह हँसने लगा।

वे दोनों और ज़ोर से हँसे। इमरान ने उनसे भी तेज़ कहकहा लगाया और थोड़ी ही देर बाद अनवर और आरिफ़ ने महसूस किया जैसे वह ख़ुद भी बेवकूफ़ बन गये हैं।

कार पहाड़ी रास्तों में चक्कर काटती आगे बढ़ रही थी। थोड़ी देर के लिए ख़ामोशी हो गयी। इमरान ने उन दोनों के नाम पूछे थे।

 
अनवर सोच रहा था कि ख़ासा मज़ा रहेगा। कर्नल साहब की झल्लाहट देखने लायक होगी। यह बेवकूफ़ आदमी उनका जीना हराम कर देगा और वे पागलों की तरह सिर पीटते फिरेंगे।

बात दोबारा दुहरानी पड़ती तो उसका पारा चढ़ जाता था। उनका इमरान जैसे आदमी के साथ क्या होगा!

आधे घण्टे में कार ने कर्नल की कोठी तक का सफर तय कर लिया। कर्नल अब भी बेचैनी से उसी कमरे में टहल रहा था और सोफ़िया भी वहीं मौजूद थी।

कर्नल ने इमरान को ऊपर से नीचे तक तौलने वाली नज़रों से देखा। फिर मुस्कुरा कर बोला 'कैप्टन फ़ैयाज़ तो अच्छे हैं?'

‘अजी तौबा कीजिए! निहायत नामाकूल आदमी हैं!' इमरान ने सोफे पर बैठते हुए कहा। उसने कन्धे से बन्दूक उतार कर सोफे के हत्थे से लटका दी।

‘क्यों नामाकूल क्यों?' कर्नल ने हैरत से कहा।

'बस यूँही।' इमरान संजीदगी से बोला, 'मेरा ख़याल है कि नामाकूलियत की कोई वजह नहीं होती।'

'खूब!' कर्नल उसे घूरने लगा। 'आपकी तारीफ़?'

‘अजी ही...ही...ही, अब अपने मुँह से अपनी तारीफ़ क्या करूँ।' इमरान शर्मा कर बोला।

अनवर किसी तरह ज़ब्त न कर सका। उसे हँसी आ गयी और उसके फूटते ही आरिफ़ भी हँसने लगा।

'यह क्या बदतमीज़ी है!' कर्नल उनकी तरफ़ मुड़ा।

दोनों यकायक ख़ामोश हो कर बग़लें झाँकने लगे। सोफ़िया अजीब नज़रों से इमरान को देख रही थी।

'मैंने आपका नाम पूछा था।' कर्नल ने खंखार कर कहा।

'कब पूछा था?' इमरान चौंक कर बोला।

'अभी,' कर्नल के मुँह से बेसाख़्ता निकला और वे दोनों भाई अपने मुँह में रूमाल ठूसते हुए बाहर निकल गये।

'इन दोनों की शामत आ गयी है।' कर्नल ने गुस्सायी आवाज़ में कहा और वह भी तेज़ी से कमरे से निकल गया। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे वह उन दोनों को दौड़ कर मारेगा। ___

इमरान बेवकूफ़ों की तरह बैठा रहा। बिलकुल ऐसे ही निर्विकार भाव से जैसे उसने कुछ देखा-सुना ही न हो। सोफ़िया कमरे ही में रह गयी थी और उसकी आँखों में शरारती चमक लहराने लगी थी।

'आपने अपना नाम नहीं बताया।' सोफ़िया बोली।

इस पर इमरान ने अपना नाम डिग्रियों समेत दुहरा दिया। सोफ़िया के अन्दाज़ से ऐसा मालूम हो रहा था जैसे उसे इस पर यकीन न आया हो।

'क्या आपको अपने यहाँ आने का मकसद मालूम है?' सोफ़िया ने पूछा।

'मक़सद?' इमरान चौंक कर बोला, 'जी हाँ, मक़सद मुझे मालूम है, इसीलिए मैं अपनी एयरगन साथ लाया हूँ?'

'एयरगन!' सोफ़िया ने हैरत से दुहराया।

'जी हाँ।' इमरान ने संजीदगी से कहा, 'मैं हाथ से मक्खियाँ नहीं मारता।'

कर्नल, जो पिछले दरवाज़े में खड़ा उनकी गुफ़्तगू सुन रहा था, झल्ला कर आगे बढ़ा।

'मैं नहीं समझ सकता कि फ़ैयाज़ ने बेहदगी क्यों की?' उसने सख्त लहजे में कहा और इमरान को खड़ा घूरता रहा। ___

'देखिए, है न...नामाकूल आदमी! मैंने तो पहले ही कहा था!' इमरान चहक कर बोला।

'आप कल पहली गाड़ी से वापस जायेंगे!' कर्नल ने कहा।

 
'नहीं!' इमरान ने संजीदगी से कहा, 'मैं एक हफ़्ते का प्रोग्राम बना कर आया हूँ।'

‘जी नहीं, शुक्रिया!' कर्नल खिन्न हो कर बोला, 'मैं आधा मुआवज़ा दे कर आपको विदा करने पर तैयार हैं। आधा मआवज़ा कितना होगा?'

'यह तो मक्खियों की तादाद पर है।' इमरान ने सिर हिला कर कहा, 'वैसे एक घण्टे में डेढ़ दर्जन मक्खियाँ मारता हूँ...और...' ___

'बस...बस।' कर्नल हाथ उठा कर बोला, 'मेरे पास बेकार बातों के लिए वक़्त नहीं!'

'डैडी...प्लीज़!' सोफ़िया ने जल्दी से कहा, 'क्या आपको तार का मज़मून याद नहीं।'

'हूँ!' कर्नल कुछ सोचने लगा। उसकी नज़रें इमरान के चेहरे पर थीं जो मूों की तरह बैठा पलकें झपका रहा था।

_ 'हूँ....तुम ठीक कहती हो।' कर्नल बोला। अब उसकी नज़रें इमरान के चेहरे से हट कर उसकी बन्दूक़ पर जम गयीं।

उसने आगे बढ़ कर बन्दूक़ उठा ली और फिर उसे ग़िलाफ़ से निकालते ही बरी तरह बिफर गया।

'क्या बेहूदगी है!' वह हलक फाड़ कर चीख़ा, 'यह तो सचमुच एयरगन है।'

इमरान के इत्मीनान में ज़र्रा बराबर भी फ़र्क नहीं आया। उसने सिर हिला कर कहा, 'मैं कभी झूठ नहीं बोलता।'

कर्नल का पारा इतना चढ़ा कि उसकी लड़की उसे धकेलती हुई कमरे के बाहर निकाल ले गयी। कर्नल सोफ़िया के अलावा और किसी को ख़ातिर में न लाता था। अगर उसकी बजाय किसी दूसरे ने यह हरकत की होती तो वह उसका गला घोंट देता। उनके जाते ही इमरान इस तरह मुस्कुराने लगा जैसे यह बड़ी सुखद घटना हो।

थोड़ी देर बाद सोफ़िया वापस आयी और उसने इमरान से दूसरे कमरे में चलने को कहा।

इमरान ख़ामोशी से उठ कर उसके साथ हो लिया। सोफ़िया ने भी इसके अलावा और कोई बात नहीं थी शायद वह कमरा पहले ही से इमरान के लिए तैयार रखा गया था।

घड़ी ने एक बजाया और इमरान बिस्तर से उठ गया। दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला। चारों तरफ़ सन्नाटा था। लेकिन कोठी के किसी कमरे की भी रोशनी नहीं बुझायी गयी थी।

बरामदे में रुक कर उसने आहट ली। फिर तीर की तरह उस कमरे की तरफ़ बढ़ा जहाँ कर्नल के ख़ानदान वाले इकट्टा थे। सोफ़िया के अलावा हर एक के आगे एक एक राइफ़ल रखी हई थी। अनवर और आरिफ़ बेहद बोर नजर आ रहे थे। सोफ़िया की आँखों नींद की वजह से लाल थीं और कर्नल इस तरह सोफे पर अकड़ा बैठा था जैसे वह कोई बुत हो। उसकी पलकें तक नहीं झपक रही थीं।

इमरान को देख उसके जिस्म में हरकत पैदा हुई। 'क्या बात है? क्यों आये हो?' उसने गरज कर पूछा। 'एक बात समझ में नहीं आ रही है।' इमरान ने कहा। 'क्या?' कर्नल के लहजे की सख़्ती दूर नहीं हुई।

'अगर आप कुछ अजनबी आदमियों से डरे हुए हैं तो पुलिस को इसकी ख़बर क्यों नहीं देते?'

'मैं जानता हूँ कि पुलिस कुछ नहीं कर सकती।'

'क्या वे लोग सचमुच आपके लिए अजनबी हैं।'

'हाँ।' ‘बात समझ में नहीं आयी।'

'क्यों?'

'सीधी-सी बात है। अगर आप उन्हें जानते हैं तो उनसे डरने की क्या वजह हो सकती है।'

कर्नल जवाब देने की बजाय इमरान को घूरता रहा।

‘बैठ जाओ!' उसने थोड़ी देर बाद कहा। इमरान बैठ गया।

'मैं उन्हें जानता हूँ।' कर्नल बोला।।

'तब फिर! पुलिस...

ज़ाहिर-सी बात है।'

'क्या तुम मुझे बेवकूफ़ समझते हो?' कर्नल बिगड़ कर बोला।

'जी हाँ!' इमरान ने संजीदगी से सिर हिला दिया।

'क्या?' कर्नल उछल कर खड़ा हो गया।

'बैठ जाइए।' इमरान ने लापरवाही से हाथ उठा कर कहा, 'मैंने यह बात इसलिए कही थी कि आप लोग किसी वक्त भी उनकी गोलियों का निशाना बन सकते हैं।'

'क्यों?'

'वे किसी वक़्त भी इस इमारत में दाखिल हो सकते हैं।'

'नहीं दाखिल हो सकते। बाहर कई पहाड़ी पहरा दे रहे हैं।'

‘फिर इस तरह राइफ़लें सामने रख कर बैठने का क्या मतलब है!' इमरान सिर हिला कर बोला, 'नहीं कर्नल साहब! अगर आप भी इमरान एम.एस-सी, पी-एच.डी से कोई काम लेना चाहते हैं तो आपको उसे सारे हालात के बारे में बताना पड़ेगा। मैं यहाँ आपके बॉडीगार्ड का काम करने के लिए नहीं आया।'

'डैडी, बता दीजिए न...ठीक ही तो है!' सोफ़िया बोली।

'क्या तुम इस आदमी को भरोसे के काबिल समझती हो?'

'इनकी अभी उम्र ही क्या है,' इमरान ने सोफ़िया की तरफ़ इशारा करके कहा, 'साठ-साठ साल की बूढ़ियाँ भी मुझ पर भरोसा करती हैं।'

 
'क्या तुम इस आदमी को भरोसे के काबिल समझती हो?'

'इनकी अभी उम्र ही क्या है,' इमरान ने सोफ़िया की तरफ़ इशारा करके कहा, 'साठ-साठ साल की बूढ़ियाँ भी मुझ पर भरोसा करती हैं।'

सोफ़िया बौखला कर घूरने लगी। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। अनवर और आरिफ़ हँसने लगे। 'दाँत बन्द करो।' कर्नल ने उन्हें डाँटा और वे दोनों बुरा-सा मुँह बना कर ख़ामोश हो गये।

'आप मुझे उन आदमियों के बारे में बताइए।' इमरान ने कहा।

कर्नल कुछ देर ख़ामोश रहा। फिर बड़बड़ाया, 'मैं नहीं जानता कि क्या बताऊँ। 'क्या आपने इस दौरान उनमें से किसी को देखा है?' 'नहीं।' ‘फिर शायद मैं पागल हो गया हूँ!' इमरान ने कहा।

कर्नल उसे घूरने लगा। वह कुछ देर चुप रहा फिर बोला, मैं उन लोगों के निशान से वाकिफ़ हूँ। इस निशान का मेरी कोठी में पाया जाना इस चीज़ की तरफ़ इशारा करता है कि मैं ख़तरे में हूँ।' ___

'ओह!' इमरान ने सीटी बजाने वाले अन्दाज़ में अपने होंट सिकोड़े फिर आहिस्ता से पूछा, 'वह निशान आपको कब मिला?'

'आज से चार दिन पहले।' 'खूब! क्या मैं उसे देख सकता हूँ?'

'भई, ये तुम्हारे बस का रोग नहीं मालूम होता।' कर्नल उकता कर बोला, 'तुम कल सुबह वापस जाओ!'

'हो सकता है मैं भी रोगी हो जाऊँ। आप मुझे दिखाइए न।'

कर्नल चुपचाप बैठा रहा। फिर उसने बुरा-सा मुंह बनाया और उठ कर एक मेज़ का दराज़ खोला। इमरान उसे ध्यान से और दिलचस्पी से देख रहा था।

कर्नल ने दराज़ से कोई चीज़ निकाली और अपने सोफे पर वापस आ गया। इमरान ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ा दिया। अनवर और आरिफ़ ने अर्थपूर्ण नज़रों से एक दूसरे की तरफ़ इस अन्दाज़ से देखा जैसे वे इमरान से किसी मूर्खतापूर्ण वाक्य की उम्मीद रखते हों।

कर्नल ने वह चीज़ छोटी गोल मेज़ पर रख दी। तीन इंच लम्बा लकड़ी का बन्दर था। इमरान उसे मेज़ से उठा कर उलटने-पलटने लगा। वह उसे थोड़ी देर तक देखता रहा फिर उसी मेज़ पर रख कर कर्नल को घूरने लगा।

'क्या मैं कुछ पूछ सकता हूँ?' इमरान बोला। 'पूछो...बोर मत करो।'

'ठहरिए।' इमरान हाथ उठा कर बोला। फिर सोफ़िया वगैरह की तरफ़ देख कर कहने लगा, 'हो सकता है कि आप इन लोगों के सामने मेरे सवालों का जवाब देना पसन्द न करें।'

'उँह, बोर मत करो!' कर्नल उकताये हुए लहजे में बोला।

'खैर...मैंने एहतियातन यह ख़याल जाहिर किया था।' इमरान ने लापरवाही से कहा। फिर कर्नल को घूरता हुआ बोला, 'क्या कभी आपका ताल्लुक ड्रग्स की तस्करी से भी रहा है।'

कर्नल उछल पड़ा। फिर वह इमरान की तरफ़ इस तरह घूरने लगा जैसे उसने उसे डंक मार दिया हो। फिर वह जल्दी से लड़कों की तरफ़ मुड़ कर बोला, 'जाओ, तुम लोग आराम करो।'

उसके भतीजों के चेहरे खिल उठे, लेकिन सोफ़िया के अन्दाज़ से ऐसा मालम हो रहा था जैसे वह नहीं जाना चाहती।

'तुम भी जाओ।' कर्नल अधीरता से हाथ हिला कर बोला।

'क्या यह ज़रूरी है?' सोफ़िया ने कहा। ‘

जाओ!' कर्नल चीख़ा! वे तीनों कमरे से निकल गये।

'हाँ, तुमने क्या कहा था?' कर्नल ने इमरान से कहा।

इमरान ने फिर अपना वाक्य दुहरा दिया।

'तो क्या तुम उसके बारे में कुछ जानते हो?' कर्नल ने लकड़ी के बन्दर की तरफ़ इशारा किया।

'बहुत कुछ!' इमरान ने लापरवाही से कहा।

'तुम कैसे जानते हो?'

'यह बताना बहुत मुश्किल है।' इमरान मुस्कुरा कर बोला, लेकिन आपने मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं दिया।'

'नहीं, मेरा ताल्लुक ड्रग्स की तिजारत से कभी नहीं रहा।'

'तब फिर!' इमरान कुछ सोचता हुआ बोला, 'आप उन लोगों के बारे में कुछ जानते हैं, वरना यह निशान इस कोठी में क्यों आया।'

'खुदा की क़सम।' कर्नल बेचैनी में अपने हाथ मलता हुआ बोला, 'तुम बहुत काम के आदमी मालूम होते हो।'

'लेकिन मैं कल सुबह वापस जा रहा हूँ।'

'हरगिज़ नहीं....हरगिज़ नहीं।'

 
'अगर मैं कल वापस न गया तो उस मुर्गी को कौन देखेगा जिसे मैं अण्डों पर बिठा आया हूँ।'

'अच्छे लड़के, मज़ाक नहीं!...मैं बहुत परेशान हूँ।'

'आप ली यूका से डरे हुए हैं।' इमरान सिर हिला कर बोला। इस बार फिर कर्नल उसी तरह उछला जैसे इमरान ने डंक मार दिया हो।

'तुम कौन हो?' कर्नल ने ख़ौफ़ज़दा आवाज़ में कहा।

'अली इमरान, एम. एस. सी, पी-एच.डी.।

' 'क्या तुम्हें सचमुच कैप्टन फ़ैयाज़ ने भेजा है?'

'और मैं कल सुबह वापस चला जाऊँगा।'

'नामुमकिन...नामुमकिन...मैं तुम्हें किसी कीमत पर नहीं छोड़ सकता। लेकिन तुम ली यूका के बारे में कैसे जानते हो?'

'यह मैं नहीं बता सकता!' इमरान ने कहा, 'लेकिन ली यूका के बारे में आपको बहुत कुछ बता सकता हूँ! वह एक चाबी है। उसके नाम से ड्रग्स की नाजायज़ तिजारत होती है, लेकिन उसे आज तक किसी ने नहीं देखा।'

'बिलकुल ठीक...लड़के तुम ख़तरनाक मालूम होते हो।'

'मैं दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ़ आदमी हूँ।'

'बकवास है...लेकिन तुम कैसे जानते हो?' कर्नल बड़बड़ाया, 'मगर...कहीं तुम उसी के आदमी न हो।' कर्नल की आवाज़ हलक़ में फँस गयी।

'बेहतर है...मैं कल सुबह...!'

'नहीं, नहीं!' कर्नल हाथ उठा कर चीख़ा।

'अच्छा, यह बताइए कि ये निशान आपके पास क्यों आया?' इमरान ने पूछा।

'मैं नहीं जानता।' कर्नल बोला।

'शायद आप इस बेवकूफ़ आदमी का इम्तहान लेना चाहते हैं।' इमरान से संजीदगी से कहा। 'खैर, तो सुनिए...ली यूका...दो सौ साल पुराना नाम है।'

‘लड़के! तुम्हें ये सारी जानकारी कहाँ से मिली है।' कर्नल उसे प्रशंसात्मक नज़रों से देखता हुआ बोला, 'यह बात ली यूका के गिरोह वालों के अलावा और कोई नहीं जानता।'

'तो मैं यह समझ लूँ कि आपका ताल्लुक भी उसके गिरोह से रह चुका है।' इमरान ने कहा।

'हरगिज़ नहीं...तुम ग़लत समझे।' ___

'फिर यह निशान आपके पास कैसे पहुँचा...? आख़िर वे लोग आपसे किस चीज़ की माँग कर रहे हैं?'

'ओह, तुम यह भी जानते हो!' कर्नल चीख कर बोला और फिर उठ कर कमरे में टहलने लगा। इमरान के होंटों पर शरारती मुस्कुराहट थी।

‘लड़के!' अचानक कर्नल टहलते-टहलते रुक गया। 'तुम्हें साबित करना पड़ेगा कि तुम वही आदमी हो जिसे कैप्टन फ़ैयाज़ ने भेजा है।' ____ '

आप बहुत परेशान हैं।' इमरान हँस पड़ा। ‘मेरे पास फ़ैयाज़ का ख़त मौजूद है, लेकिन अभी से आप इतना क्यों परेशान हैं। यह तो पहली वॉर्निंग है। बन्दर के बाद साँप आयेगा। अगर आपने इस दौरान भी उनकी माँग पूरी न की तो फिर वह मुर्ग भेजेंगे और उसके दूसरे ही दिन आपका सफ़ाया हो जायेगा। आख़िर वह कौन-सी माँग है?'

कर्नल कुछ न बोला! उसका मुँह हैरत से खुला हुआ था और आँखें इमरान के चेहरे पर थीं।

‘लेकिन।' वह आख़िर अपने होंटों पर ज़बान फेर कर बोला, 'इतना कुछ जानने के बाद तुम अब तक कैसे ज़िन्दा हो?'

'सिर्फ कोकाकोला की वजह से।'

'संजीदगी! संजीदगी!' कर्नल ने अधीरता से हाथ उठाया। मुझे फ़ैयाज़ का ख़त दिखाओ।'

इमरान ने जेब से ख़त निकाल कर कर्नल की तरफ़ बढ़ा दिया।

कर्नल काफ़ी देर तक उस पर नज़र जमाये रहा, फिर इमरान को वापस करता हुआ बोला।

'मैं नहीं समझ सकता कि तुम किस किस्म के आदमी हो।'

'मैं हर किस्म का आदमी हूँ। फ़िलहाल आप मेरे बारे में कुछ न सोचिए।' इमरान ने कहा। 'जितनी जल्दी आप मुझे अपने बारे में बता देंगे उतना ही अच्छा होगा।'

कर्नल के चेहरे से हिचकिचाहट ज़ाहिर हो रही थी। वह कुछ न बोला। __

 
'अच्छा ठहरिए!' इमरान ने कुछ देर बाद कहा, 'ली यूका के आदमी सिर्फ एक ही सूरत में इस किस्म की हरकतें करते हैं। वह एक ऐसा गिरोह है जो ड्रग्स की तस्करी करता है। ली यूका कौन है, यह किसी को मालूम नहीं, लेकिन तिजारत का सारा नफ़ा उसको पहुँचता है। कभी उसके कुछ एजेंट बेईमानी पर आमादा हो जाते हैं। वे ली यूका की माँगें पूरी नहीं करते। इस सूरत में उन्हें इस किस्म की वॉर्निंग मिलती हैं। पहली धमकी बन्दर, दसरी धमकी सॉप...और तीसरी धमकी मर्ग। अगर आखिरी धमकी के बाद भी वे माँगें पूरी नहीं करते तो उनका खात्मा कर दिया जाता है।'

_ 'तो क्या तुम यह समझते हो कि मैं ली यूका का एजेंट हूँ।' कर्नल खखार कर बोला।

'ऐसी सूरत में और क्या समझ सकता हूँ।'

'नहीं, यह ग़लत है।'

'फिर?'

'मेरा ख़याल है कि मेरे पास ली यूका का सुराग़ है।' कर्नल बड़बड़ाया।

'सुराग़? वह किस तरह?'

"कुछ ऐसे काग़ज़ात हैं जो किसी तरह ली यूका के लिए शक पैदा करने वाले हो सकते हैं।'

'शक होना और चीज़ है...लेकिन सुराग़!' इमरान नहीं में सिर हिला कर रह गया।

'यह मेरा अपना ख़याल है!...'

'आख़िर आपने किस वजह से यह राय कायम की?' इमरान ने पूछा।

'यह बताना मुश्किल है। वैसे मैं इन काग़ज़ात में से कुछ को बिलकुल ही नहीं समझ सका!'

'लेकिन वे काग़ज़ात आपको मिले कहाँ से?'

'बहुत ही हैरत-अंगेज़ तरीके से!' कर्नल सिगार सुलगाता हुआ बोला, 'पिछली जंग के दौरान मैं हौंगकौंग में था। वहीं ये काग़ज़ात मेरे हाथ लगे। और यह हक़ीक़त है कि जिससे मझे काग़ज़ात मिले, वह मुझे ग़लत समझा था...हआ यह कि एक रात मैं हौंगकौंग के होटल में खाना खा रहा था। एक दुबला-पतला चीनी आ कर मेरे सामने बैठ गया। मैंने महसूस किया कि वह बहुत ज़्यादा ख़ौफ़ज़दा है। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था। उसने जेब से एक बड़ा-सा लिफ़ाफ़ा निकाल कर मेज़ के नीचे से मेरे घुटनों पर रख दिया और आहिस्ता से बोला, मैं ख़तरे में हूँ। इसे बी-फ़ोर्टीन पहुँचा देना। फिर इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वह तेज़ी से बाहर निकल गया। बात हैरत अंगेज़ थी। मैंने चुपचाप लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया। मैंने सोचा, मुमकिन है वो चीनी मिलिट्री सीक्रेट सर्विस का आदमी रहा हो और कुछ अहम काग़ज़ात मेरे ज़रिये किसी ऐसे सेक्शन में पहँचाना चाहता हो जिसका नाम बी-फ़ोर्टीन हो। मैं उस वक़्त अपनी परी वर्दी में था। होटल से वापस आने के बाद मैंने लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला। वह सील किया हुआ था। मैंने उसे उसी हालत में रख दिया। दूसरे दिन मैंने 'बी-फ़ोर्टीन' के बारे में पूछना शुरू की लेकिन मिलिट्री की सीक्रेट सर्विस में इस नाम का कोई इदारा नहीं था। पूरे हौंगकौंग में बी-फ़ोर्टीन का कोई सुराग़ न मिल सका। आखिर मैंने तंग आ कर इस लिफ़ाफ़े को खोल डाला।'

'तो क्या इसमें ली यूका के बारे में पूरी रिपोर्ट थी?' इमरान ने पूछा।

'नहीं...वे तो कुछ तिजारती किस्म के काग़ज़ात हैं। ली यूका का नाम उनमें कई जगह दुहराया गया है। कई काग़ज़ात चीनी और जापानी ज़बानों में भी हैं जिन्हें मैं समझ न सका।

‘फिर आप को ली यूका की हिस्ट्री किस तरह मालूम हुई?'

'ओह! तो फिर मैंने हौंगकौंग में ली यूका के बारे में छान-बीन की थी। मुझे सब कुछ मालूम हो गया था, लेकिन यह न मालूम हो सका कि ली यूका कौन है, और कहाँ है। उसके एजेंट आये दिन गिरफ़्तार होते रहते हैं। लेकिन उनमें से आज तक कोई ली यूका का पता न बता सका। वैसे नाम दो सौ साल से ज़िन्दा नहीं है।'

इमरान थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा फिर बोला, 'ये लोग कब से आपके पीछे लगे हैं?"

'आज की बात नहीं!' कर्नल बुझा हुआ सिगार सुलगा कर बोला, 'काग़ज़ात मिलने के छ: माह बाद ही से वे मेरे पीछे लग गये थे, लेकिन मैंने उन्हें वापस नहीं किये। कई बार वे चोरी-छुपे मेरे घर में भी दाखिल हुए, लेकिन उन्हें काग़ज़ात की हवा भी न लग सथी अब उन्होंने आख़िरी हर्बा इस्तेमाल किया है। यानी मौत के निशान भेजने शुरू किये हैं जिसका यह मतलब है कि अब वे मुझे ज़िन्दा न छोड़ेंगे।'

'अच्छा वो चीनी भी कभी दिखाई दिया था, जिससे काग़ज़ात आपको मिले थे?'

'कभी नहीं...वह कभी नहीं दिखाई पड़ा।'

कुछ देर तक ख़ामोशी रही फिर इमरान बड़बड़ाने लगा।

'आप उसी वक्त तक जिन्दा हैं जब तक काग़ज़ात आपके कब्जे में हैं।' ___

'बिलकुल ठीक!' कर्नल चौंक कर बोला, 'तुम वाकई बहुत ज़हीन हो!...यही वजह है कि मैं इन काग़ज़ात को वापस नहीं करना चाहता, वरना मुझे इनसे ज़र्रा

बराबर भी दिलचस्पी नहीं! बस यह समझ लो कि मैंने साँप का सिर पकड़ रखा है। अगर छोड़ता हूँ तो वो पलट कर यक़ीनन डस लेगा।

 
'क्या मैं उन काग़ज़ात को देख सकता हूँ?' ।

'हरगिज़ नहीं। तुम मुझसे साँप की गिरफ़्त ढीली करने को कह रहे हो।'

इमरान हँसने लगा। फिर उसने कहा, 'आपने कैप्टन फ़ैयाज़ को क्यों बीच में डाला?'

'उसके फ़रिश्तों को भी अस्ल वाक़यात की ख़बर नहीं। वह तो सिर्फ यह जानता है कि मुझे कुछ आदमियों की तरफ़ से ख़तरा है, लेकिन मैं किसी वजह से सीधे पुलिस को इस मामले में दखल देने की दावत नहीं दे सकता!'

'तो आप मुझे भी ये सारी बातें न बताते?' इमरान ने कहा।

‘बिलकुल यही बात है!...लेकिन तुम्हारे अन्दर शैतान की रूह मालूम होती है।'

'इमरान की!' इमरान संजीदगी से सिर हिला कर बोला, 'बहरहाल, आपने मुझे बॉडीगार्ड के तौर पर बुलवाया है।'

'मैं किसी को भी न बुलवाता! यह सब कुछ सोफ़िया ने किया है। उसे हालात का इल्म है।'

'और आपके भतीजे?'

'उन्हें कुछ भी मालूम नहीं!'

'आपने उन्हें कुछ बताया तो होगा ही।'

'सिर्फ इतना कि कुछ दुश्मान मेरी ताक में हैं और बन्दर उनका निशान है।'

'लेकिन इस तरह भरी हुई राइफ़लों के साथ रात भर जगने का क्या मतलब है! क्या आप यह समझते हैं कि वे आप के सामने आ कर हमला करेंगे?'

'मैं यह भी बच्चों को बहलाने के लिए करता हूँ।'

‘खैर, मारिए गोली!' इमरान ने बेपरवाही से कन्धों को हिलाते हुए कहा, 'मैं सुबह की चाय के साथ बताशे और लेमन ड्रॉप्स इस्तेमाल करता हूँ।

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दूसरी सुबह। सोफ़िया की हैरत की कोई सीमा न रही। जब उसने देखा कि कर्नल उस ख़ब्ती आदमी की ज़रूरत से ज़्यादा ख़ातिर-मदारात कर रहा है।

अनवर और आरिफ़ अपने कमरों ही में नाश्ता करते थे। वजह यह थी कि कर्नल को विटामिनों का ख़ब्त था। उसके साथ उन्हें भी नाश्ते में कछ तरकारियाँ और भिगोये हुए चने खाने पड़ते थे। उन्होंने देर से सो कर उठना शुरू कर दिया था। आज कल तो एक अच्छा-खासा बहाना हाथ आया था कि वे काफ़ी रात गये तक राइफ़लें लिये टहला करते थे।

आज नाश्ते की मेज़ पर सिर्फ सोफ़िया, इमरान और कर्नल थे। इमरान कर्नल से भी कुछ ज़्यादा 'विटामिन-ज़दा' नज़र आ रहा था। कर्नल तो भीगे हुए चने ही चबा रहा था, मगर इमरान ने यह हरकत की कि चनों को छील-छील कर छिलके अलग और दाने अलग रखता गया। सोफ़िया उसे हैरत से देख रही थी जब छिलकों की मिकदार ज़्यादा हो गयी तो इमरान ने उन्हें चबाना शुरू कर दिया।

सोफ़िया को हँसी आ गयी। कर्नल ने शायद उधर ध्यान नहीं दिया था। सोफ़िया के हँसने पर वह चौंका और फिर उसके होंटों पर भी हल्की-सी मुस्कुराहट फैल गयी।

इमरान बेवकूफ़ों की तरह बारी-बारी से उन दोनों की ओर देखने लगा, लेकिन उसका छिलके उतार कर खाना अब भी जारी था।

'शायद आप कुछ ग़लत खा रहे हैं।' सूफिया ने हँसी रोकने की कोशिश करते हुए कहा।

'हाय!' इमरान आँखें फाड़ कर बोला, 'ग़लत खा रहा हूँ?'

फिर वह घबरा कर उसी तरह अपने दोनों कान झाड़ने लगा जैसे वह अब तक सारे निवाले कानों ही में रखता रहा हो। सोफ़िया की हँसी तेज़ हो गयी।

'मेरा...मतलब...ये है कि आप छिलके खा रहे हैं।' उसने कहा।

'ओह...अच्छा अच्छा!' इमरान हँस कर सिर हिलाने लगा। फिर उसने संजीदगी से कहा, 'मेरी सेहत रोज़-ब-रोज़ ख़राब होती जा रही है, इसलिए मैं ग़िज़ा का वह हिस्सा मैं सिर्फ छिलके खाता हूँ। आलू का छिलका...प्याज़ का छिलका...गेहूँ की भूसी...वगैरह, वगैरह...'

'तुम शैतान हो!' कर्नल हँसने लगा।

‘मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो!'

इमरान अपना मुँह पीटने लगा। 'अरे तौबा तौबा...यह आप क्या कह रहे हैं।'

कर्नल बदस्तूर हँसता रहा।

सोफ़िया हैरत में पड़ गयी! अगर यह हरकत किसी और ने की होती तो कर्नल शायद झल्लाहट में राइफ़ल निकाल लेता। कभी वह इमरान को घूरती थी और कभी कर्नल को, जो बार-बार तश्तरियाँ इमरान की तरफ़ बढ़ा रहा था।

'क्या वे दोनों गधे अभी सो रहे हैं?' अचानक कर्नल ने पूछा।

'जी हाँ...!'

'मैं तंग आ गया हूँ उनसे, मेरी समझ में नहीं आता कि आगे चल कर उनका क्या बनेगा।'

सोफ़िया कुछ न बोली। कर्नल बड़बड़ाता रहा। नाश्ते से निबट कर इमरान बाहर आ गया।

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पहाड़ियों में धूप फैली हुई थी। इमरान किसी सोच में डूबा हुआ दूर की पहाड़ियों की तरफ़ देख रहा था। सोनागिरी की शादाब पहाड़ियाँ गर्मियों में काफ़ी आबाद हो जाती हैं। नज़दीक और दूर के मैदानी इलाकों की तपिश से घबराये हुए पैसे वाले लोग आम तौर से यहीं पनाह लेते हैं। होटल आबाद हो जाते हैं और स्थानीय लोगों के छोटे छोटे मकान भी जन्नत-सरीखे बन जाते हैं। वे प्राय: गर्मियों में उन्हें किराये पर उठा देते हैं और खुद छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ बना कर रहते हैं। अपने किरायेदारों की ख़िदमत भी करते हैं जिसके बदले में उन्हें अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है और फिर सर्दियों का ज़माना इसी कमाई के बल-बूते पर थोड़े-बहुत आराम के साथ गुज़र जाता है।

कर्नल ज़रग़ाम का स्थायी निवास यहीं था। उसकी गिनती यहाँ के सम्मानित लोगों में होती थी। सोफ़िया उसकी इकलौती लड़की थी। अनवर और आरिफ़ भतीजे थे जो गर्मियाँ अक्सर उसी के साथ गुज़ारते थे।

इमरान ने एक लम्बी अंगड़ाई ली और सामने से नज़रें हटा कर इधर-उधर देखने लगा। शहततों की मीठी-मीठी गन्ध चारों तरफ़ फैली हई थी। इमरान जहाँ खड़ा था, उसे पाईं बाग़ तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन था बाग़ ही। आड़, खूबानी, सेब और शहतूत के दरख़्त इमरान के चारों तरफ़ फैले हुए थे। ज़मीन पर गिरे हुए शहतूत न जाने कब से सड़ रहे थे और उनकी मीठी गन्ध जेहन पर बुरी लगती थी।

इमरान अन्दर जाने के लिए मुड़ा ही था कि सामने से सोफ़िया आती दिखाई दी। अन्दाज़ से मालूम हो रहा था कि वह इमरान ही के पास आ रही है। इमरान रुक गया।

'क्या आप प्राइवेट जासूस हैं?' सोफ़िया ने आते ही सवाल किया।

'जासूस!' इमरान ने हैरत से दुहराया, 'नहीं तो...हमारे मुल्क में तो प्राइवेट जासूस किस्म की कोई चीज़ नहीं पायी जाती।'

‘फिर आप क्या हैं?'

'मैं,' इमरान ने संजीदगी से कहा, 'मैं क्या हूँ...मिर्ज़ा ग़ालिब ने मेरे लिए शे'र कहा

था...

‘हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पी जिगर को मैं मकदूर हो तो साथ रचू नौहागर को मैं!!

'मैं हकीकतन किराये का एक नौहागर (शोक गीत गाने वाला) हूँ! बड़े लोग दिल या जिगर को पिटवाने के लिए मुझे किराये पर हासिल करते हैं। और फिर मैं उन्हें हैरान होने का भी...वो नहीं देता, क्या कहते हैं उसे...हाँ, मौका, मौका...'

सोफ़िया ने नीचे से ऊपर तक उसे घूर कर देखा। इमरान के चेहरे पर बरसने वाली बेवकूफ़ी कुछ और ज़्यादा हो गयी।

'आप दूसरों को उल्ल क्यों समझते हैं?' सोफ़िया भन्ना कर बोली।

'मुझे नहीं याद पड़ता कि मैंने कभी किसी उल्लू को भी उल्लू समझा हो।'

'आप आज जा रहे थे?'

'च्च...च्च...! मुझे अफ़सोस है...कर्नल साहब ने तसल्ली के लिए मेरी ख़िदमात हासिल कर ली हैं...मेरा साइड बिज़नेस तसल्ली और दिलासा देना भी है।'

सोफ़िया कुछ देर ख़ामोश रही फिर उसने कहा, 'तो इसका मतलब यह है कि आपने सारे मामलात समझ लिये हैं।'

'मैं अक्सर कुछ समझे-बझे बगैर भी तसल्लियाँ देता रहता हूँ।' इमरान ने गम्भीर हो कर कहा, 'एक बार का ज़िक्र है कि एक आदमी ने मेरी खिदमात हासिल की...मैं रात भर उसे तसल्लियाँ देता रहा, लेकिन जब सुबह हुई तो मैंने देखा कि उसकी खोपड़ी में दो सूराख़ हैं और वो न दिल को रो सकता है और न जिगर को पीट सकता है।'

'मैं नहीं समझी।'

'इन सूराख़ों से बाद को रिवॉल्वर की गोलियाँ बरामद हुईं थीं...चमत्कार था जनाब, चमत्कार...! सचमुच यह चमत्कारों का ज़माना है। परसों ही अख़बार में मैंने पढ़ा था कि ईरान में एक हाथी ने मुगी के अण्डे दिये हैं।'

'आप बहुत सैडिस्ट मालूम होते हैं।' सोफ़िया मुँह बिगाड़ कर बोली।

'मैं पूछती हूँ, आप डैडी के लिए क्या कर सकेंगे?' सोफ़िया झुंझला गयी।

‘दिलासा दे सकूँगा...'

 
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