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Adultery शीला की वासना की आग

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वैशाली को देखकर शीला खुश हो गई.. उसके आने से ही पूरा घर भरा भरा सा लगने लगा.. २७ साल की फेशनेबल, भरे भरे जिस्म वाली, एकदम गोरी और बॉब कट हेयर स्टाइल वाली वैशाली.. एकदम बातुनी लड़की थी.. वो और शीला दोनों बातें करने लगे.. वैशाली ने अपने पापा के बारे में पूछा और शीला ने उसे उसके पति संजय और ससुराल के बारे में बातें की

बातों ही बातों में वैशाली ने शीला को बताया की वो ससुराल में बिल्कुल भी खुश नहीं थी.. उसका पति संजय अपने काम पर ध्यान ही नहीं देता था और बार बार नौकरियों से निकाल दिया जाता था.. पूरा दिन सिगरेट फूंकता रहता था.. शराब पीता था.. दोस्तों से ब्याज पर पैसे उधार लेता था और जब लौटा न पाएं तब शहर छोड़कर भाग जाता था.. पूरा दिन घर पर कोई न कोई वसूली करने आ पहुंचता था.. वैशाली उसे टोकती तो वो अनाब शनाब बोलकर उसे हड़का देता.. उसके सास-ससुर भी संजय की इस स्थिति के लिए वैशाली को जिम्मेदार ठहराते.. ससुर के पेंशन से घर आराम से चल तो रहा था पर उसकी सास बात पर उसे ताने मारती रहती थी। अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए वैशाली फुट फुट कर रोने लगी.. शीला ने उसकी पीठ पर हाथ सहलाकर उसे शांत किया.. अपनी माँ के साथ दुख बांटकर वह काफी हल्का महसूस करने लगी।

शीला: "तू चिंता मत कर बेटा.. मेरे होते हुए.. मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी"

शीला की बात सुनकर वैशाली के दिल को थोड़ी तसल्ली मिली.. वैशाली का मूड ठीक करने के लिए शीला ने कहा "तू आराम से टीवी देख.. मैं तेरी पसंद का कुछ अच्छा खाने के लिए बना देती हूँ"

शीला किचन में गई और वैशाली पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से टीवी देखने लगी.. मायके में आकर बेटियों को एक अनोखी शांति का एहसास होता है.. दोपहर में माँ बेटी ने खाना खाया और फिर से बातें करने लगी.. शाम के साढ़े पाँच कब बज गए पता ही नहीं चला..

शीला ने फोन करके कविता को घर बुलाया और उसकी पहचान वैशाली से करवाई..

शीला: "कविता, तू और वैशाली एक ही हमउम्र हो.. तू इसे कंपनी देना.. वैशाली, ये कविता है.. अपने अनुमौसी के बेटे पीयूष की पत्नी.. बहोत ही अच्छा स्वभाव है इसका.. तुम दोनों की साथ में अच्छी पटेगी.. "

दोनों लड़कियों की दोस्ती होने में समय नहीं लगा.. एक दिन में तो दोनों एकदम खास सहेलियाँ बन चुकी थी.. दोनों देर रात तक साथ बैठती और बातें करती रहती.. रोज रात को खाना खाने के बाद दोनों वॉक पर जाने लगी.. इन दोनों की दोस्ती से अनुमौसी और पीयूष भी बड़े खुश थे।

रात को वॉक पर जाते वक्त, वैशाली टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहनकर निकलती.. टीशर्ट के अंदर ब्रा भी नहीं होती थी.. चलते चलते हर कदम के साथ उसके उछलते हुए वक्ष देखकर कविता को अपने मायके की याद आ जाती.. लड़की अपने मायके में बिना किसी बंधन के कितने आराम से रहती है !! ससुराल में तो पूरा दिन "ये करो.. ये मत करो.. ऐसे मत बैठो.. ऐसे कपड़े मत पहनो" ऐसी रोकटोक में ही जीवन निकल जाता है..

वैशाली के ठुमकते जोबन को नुक्कड़ पर खड़े लड़के घूर घूरकर ताड़ते रहते.. वैशाली को उन लड़कों की नजर से कोई फरक पड़ता नहीं दिखा.. वो तो गर्व से अपना सीना तानकर उनके बगल से निकल गई.. उन लड़कों की लफंगी नज़रों से कविता शर्म से लाल हो गई

कविता: "यार वैशाली, लोग कैसी गंदी गंदी नज़रों से देख रहे है.. "

वैशाली: "देखने दे.. मुझे घंटा फरक नहीं पड़ता.. "

कविता: "पता नहीं यार.. ये लोग हमेशा हमारे बूब्स को देखकर क्या सोचते होंगे??"

वैशाली: "यहीं की एक बार टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर दबाने मिल जाए तो मज़ा आ जाए.. हा हा हा हा.. "

वैशाली बोलने में एकदम बिंदास लड़की थी.. और स्वभाव से कामुक भी थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी.. कोई हेंडसम लड़का दिख जाएँ तब वो भी उसे ऊपर से नीचे तक स्कैन कर लेती.. वैशाली बार बार कविता को उसकी सेक्स लाइफ के बारे में पूछती रहती.. इतना ही नहीं.. वो पीयूष के बारे में भी अलग अलग प्रश्न पूछती रहती कविता से.. वो सिर्फ पूछती ही नहीं थी.. अपने बारे में बताती भी थी

शुरू शुरू में ऐसी बातें करने में कविता को झिझक होती थी.. जब वैशाली "लंड" "चुत" और "बबलों" जैसे शब्दों का खुलकर उपयोग करती.. धीरे धीरे कविता भी वैशाली के आगे खुलने लगी..

एक बार वैशाली ने कविता से बेधड़क पूछ लिया "तूने कभी शादी से पहले किसी के साथ सेक्स किया था?"

कविता: "नहीं रे नहीं.. मैंने तो सब से पहले पीयूष के साथ ही किया था.. वैशाली तू ने किया था क्या?"

वैशाली: "हाँ किया था.. अब ये मत पूछना की किसके साथ.. क्योंकी वो मैं बता नहीं सकती.. " वैशाली ने कविता को अगला प्रश्न पूछने से रोक लिया

कविता सोचने लगी.. सब कुछ खुलकर बता रही है तो ये बताने में भला क्या हर्ज !!

कविता की ओर देखकर वैशाली ने कहा "तुझ जैसी सुंदर छुईमुई को किसी ने शादी से पहले लाइन न मारी हो ऐसा हो तो नहीं सकता.. पक्का तू मुझसे कुछ छुपा रही है"

कविता: "ऐसा कुछ भी नहीं है.. जब तू मुझे इतना सब खुलकर सब बता रही है तो फिर मुझे बताने में क्या दिक्कत होती !!!" कविता शीला की पक्की शिष्य थी.. अपने राज को कैसे दबाकर रखना वो बखूबी सीख चुकी थी। दूसरे के राज कैसे उगलवाना उसका मंत्र भी उसने शीला से ही सीखा था।

कविता ने धीरे से वैशाली से पूछा "बड़ी होशियार है तू वैशाली.. शादी से पहले ही सेक्स किया तो तुझे तेरे माँ-बाप को पता चल जाने का डर नहीं लगा था? मेरी तो ऊपर ऊपर से करवाने में ही डर के मारे जान निकल गई थी"

वैशाली ने चुटकी बजाते हुए कहा "मतलब तू जब ब्याह कर आई तब थोड़ा बहोत कर ही चुकी थी.. ऊपर ऊपर से मतलब? लंड अंदर नहीं लिया था क्या ??"

कविता: "मेरे मायके में एक लड़का था पिंटू.. मुझे बहोत पसंद था.. अभी भी मैं उसके साथ.. पर शादी से पहले मैंने कुछ नहीं किया था"

वैशाली: "ऐसा कैसे हो सकता है !! कोई भी लड़का तेरे जैसा कोरा माल बिना चोदे कैसे छोड़ देगा भला ??"

कविता: "वही तो.. मैंने काफी बार उसे मुझे चोदने के लिए कहा.. पर उसका कहना था की जब तक शादी न हो जाए तब तक वो कुछ नहीं करेगा"

वैशाली: "बड़ा आया सत्यवादी हरीशचंद्र.. इसका मतलब ये हुआ की पीयूष को सुहागरात पर सील-पेक माल ही मिला था.. पर तुझे सील-पेक माल नहीं मिला.. तुझे क्या पता की पीयूष इससे पहले किसी के साथ कर चुका है या नहीं"

कविता चोंक उठी "सच सच बता वैशाली"

वैशाली ने ठहाका लगाते हुए कहा "अरे यार बीती बातें भूल जा.. पीयूष ने सब से पहली बार मेरे साथ ही किया था.. " कविता के पैरों तले से धरती हिल गई.. चक्कर सा आने लगा उसे.. !!!!

उदास हो गई कविता और उसका चेहरा भी लटक गया.. फिर उसने सोचा की वो भी कहाँ दूध से धुली थी !! प्रत्येक परिणित स्त्री का एक भूतकाल होता ही है.. वैसे वैशाली और पीयूष का भी था.. और पीयूष की बातों ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ की उसे वैशाली की कभी याद भी आई थी

लेकिन स्त्री-सहज ईर्ष्या होना तो स्वाभाविक था.. कविता की असमंजस को वैशाली ने परख लिया

वैशाली: "तू उदास क्यों हो गई?? टेंशन मत ले.. मेरे और पीयूष के बीच जो कुछ भी हुआ था वो पुरानी बात है.. और वह एक भूल ही थी.. जो नादान उम्र के बच्चे अक्सर करते है.. और तेरा भी ऐसा ही भूतकाल पिंटू के साथ भी रहा ही है ना.. !! १७ से २२ की उम्र ही ऐसी होती है.. शरीर विकसित हो जाता है.. अन्तःस्त्राव शुरू हो जाते है.. दिल पंछी की तरह उड़कर अलग अलग डाल पर बैठने लगता है.. विजातीय आकर्षण होने लगता है.. मायके में दिल के अंदर बसे प्रियतम को भूलकर वह अन्य व्यक्ति के साथ अपने जीवन की शुरुआत करते ही सब कुछ भूल जाती है.. "

कविता को वैशाली की बात ठीक लगी.. "सच बॉल रही है तू वैशाली.. मैं भी जवान हुई तभी पिंटू के साथ प्रेम विकसित हुआ था.. मुझे ये बता.. शादी के बाद तुझे किसी के लिए आकर्षण हुआ है कभी??"

वैशाली बोलने में बिंदास थी.. "जिंदगी बिताने के लिए पति और प्रेमी दोनों की आवश्यकता होती है.. वरना जीने में मज़ा ही नहीं आता.. पति जब हमारा दिल दुखाएं तब सहारे के लिए एक कंधा तो चाहिए ना !! अपना दर्द बांटने के लिए कोई होना तो चाहिए.. मेरे तो पर्सनल प्रॉब्लेम इतने है की अगर मेरा प्रेमी नहीं होता तो अब तक पंखे से लटक गई होती"

इंसान जब अपने जीवन के दर्द भरे पन्ने किसी के सामने खोलता है तब दुख और दर्द उसकी इंतहाँ पर होते है.. वैशाली अपनी दास्तां सुनाती गई

"शादी के बाद मम्मी पापा का घर छोड़ा.. उसके साथ ही खुशी और सुख क्या होते है.. मैं तो जैसे भूल ही गई.. पापा के घर मुझे एक भी काम नहीं करना पड़ता था.. पापा अक्सर मुझे टोकते.. कहते की कामकाज सिख ले वरना ससुराल में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.. आज उनकी कही सारी बातें याद आ रही है.. संजय से शादी के पहले पाँच साल तो बड़े ही शानदार तरीके से बीते.. पहला झटका तब लगा जब मुझे संजय के अफेर के बारे में पता चला.. मैं आज तक समझ नहीं पाई.. मैंने उसे हर तरह से खुश रखा था.. ऐसी कौन सी कमी थी मुझ में जो संजय को किसी और के पास जाना पड़ा !!! उसे जो चाहिए था मैंने सब कुछ दिया.. किसी बात के लिए कभी जिद नहीं की.. उसकी हर बात मानती थी मैं.. अरे शुरुआत के दिनों में उसे पूरा दिन सेक्स की चूल मची रहती.. एक रात में चार चार बार.. कभी कभी पाँच बार सेक्स करते.. मैंने कभी मना नहीं किया.. बिना सोये पूरी रात चुदवाने के बावजूद में सुबह जल्दी उठ जाती.. तुझे पता है ना.. की चुदाई के बाद कैसी नींद आती है!! संजय तो हल्का होकर देर तक सोते हुए अपनी थकान उतारता.. पर मैं घर के सारे काम में व्यस्त हो जाती.. दोपहर को जब थोड़ा सा आराम करने बिस्तर पर लेटती.. संजय फिर से तैयार हो जाता.. और कम से कम दो बार सेक्स करने के बाद ही दम लेता.. मैं ये सोचकर सब कुछ बर्दाश्त करती की आखिर पति है वो मेरा.. उसे हक है मेरे शरीर को भोगने का.. पर इतना सब करने के बाद भी जब वो किसी और के साथ मुंह मारने लगा.. " वैशाली आगे बोल नहीं पाई

"कौन थी वो? नाम क्या था उसका? तूने उसे सबक सिखाया की नहीं?" कविता ने पूछा

वैशाली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा "यार.. जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो गैरों को बोलकर क्या फायदा !! संजय कुछ कमाता तो था नहीं. बस दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहता और मौका मिलते ही मेरी टांगें चौड़ी करके मेरे छेद में घुसा देता.. उसे २४ घंटे चुदाई के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं थी.. तंग आ गई थी मैं उस ज़िंदगी से.. जब पति ही ऐसा हो तो कैसे कटेगी पूरी ज़िंदगी उसके साथ !! तभी मैंने दूसरा साथी तलाश लिया.. लाखों में एक है वो कविता.. अपने एरिया में ही रहता ही.. अब तक हम सिर्फ बातें ही करते है.. मेरा ससुराल नजदीक होता तो हम मिल भी पाते.. पर कलकत्ता में रहते हुए ये मुमकिन हो न सका.. तुझे पता है कविता.. एक तरफ मेरा पति है जिसके दिमाग में हर वक्त औरतों को भोगने का जुनून सवार रहता है.. स्त्री को हमेशा एक साधन की तरह ही इस्तेमाल करता है.. जब देखो तब मुझे कहता रहता है "अरे वो देख वो लड़की की गांड कितनी मस्त है.. आह्ह वो वाली की चूचियाँ" मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है.. कभी कभी तो मेरी मम्मी के बारे में भी गंदी गंदी बातें करता है.. दूसरी तरह मेरा प्रेमी.. जो इतने दूर रहकर भी मुझे शब्दों से सहारा देता है.. मेरी हिम्मत बढ़ाता है.. मेरी बात सुनता है.. मेरे दर्द बांटता है.. और इसके बदले उसने कभी मुझसे कुछ भी नहीं मांगा.. हिम्मत है उसका नाम.. आई लव हिम्मत" वैशाली भावुक हो गई

कविता: "ऐसे हरामजादे मर्दों को तो गोली मार देनी चाहिए.."

वैशाली: "नसीब की बलिहारी तो देख कविता.. हिम्मत की पत्नी का चार महीने पहले ही देहांत हो गया.. सिर्फ ८ साल में ही उसका गृहस्थ जीवन समाप्त हो गया.. फिर भी इस नाजुक वक्त पर में उसे सहारा न दे पाई.. "

कविता: "इतनी छोटी उम्र में ही हिम्मत की पत्नी चल बसी?? क्या हुआ था उसे?"

वैशाली: "हिम्मत की बीवी को गर्भाशय का केन्सर था.. अकेला पड़ गया है बेचारा.. अच्छे लोगों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? तू मानेगी नहीं.. हिम्मत अपनी बीवी की मौजूदगी में मुझसे बातें करता.. अब बता.. कोई पत्नी ऐसा बर्दाश्त कर सकती है भला?? पर संध्या ने कभी एतराज नहीं जताया.. बहोत ही अच्छी थी संध्या.. हिम्मत संध्या से कभी कुछ भी छुपाता नहीं था.. कभी कभार संध्या भी मुझसे बात करती और मेरा होसला बढ़ाती.. संजय जब घर पर नहीं होता था तब मैं घंटों हिम्मत से बात करती थी.. सिर्फ उसी की बदौलत मैं अब तक संजय के साथ टीक पाई हूँ.. आज मैं हिम्मत से भी ज्यादा संध्या को मिस कर रही हूँ" वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे

वैशाली ने बात आगे बढ़ाई "शादी से पहले के इस प्यार को हम दोनों ने मेरी शादी के बाद दफना दिया था.. कभी उसने मुझे आई लव यू तक नहीं कहा.. बस दोस्ती का रिश्ता ही रखा था.. संध्या ने एक बार मुझे कहा था की उनकी शादी से पहले ही हिम्मत ने उसे मेरे बारे में बता दिया था। ऐसा ईमानदार इंसान अब कहाँ मिलेगा!! " वैशाली के शब्दों के दर्द ने कविता को भी हिला दिया

कविता: "तू चार दिन से आई है.. फोन किया की नहीं?"

वैशाली: "नहीं यार.. उसकी पत्नी को मरे कुछ ही महीने हुए है.. मैं अकेली उसके घर जाऊँगी तो लोगों को बातें बनाने का मौका मिल जाएगा.. मम्मी को लेकर तो जा नहीं सकती.. कोई साथ हो तो ठीक है.. पर अकेले जाने में लोग तरह तरह की बातें करेंगे और बेकार में हिम्मत परेशान हो जाएगा"

कविता: "तुझे एतराज न हो तो मैं तेरे साथ चलूँ?"

वैशाली: "मुझे क्यों एतराज होगा भला.. और अगर होता तो मैं ये सब बातें तुझे क्यों बताती !! पर सिर्फ हम दो लड़कियां उस अकेले मर्द के घर जाएगी तो अच्छा नहीं लगेगा.. कोई मर्द साथ होता तो फिर किसी के मन में कोई शक ही पैदा नहीं होगा. पर किसे लेकर जाएँ यही प्रॉब्लेम है.. खैर मेरे प्रॉब्लेम तो चलते ही रहेंगे.. तू अपनी बता.. पिंटू के साथ तेरे संबंध कैसे थे?"

कविता ने अथ से इति तक सब कुछ बताया पिंटू के बारे में.. बात करते करते वो शर्म के मारी लाल लाल हो गई

वैशाली: "बड़ी किस्मत वाली है तू.. कम से कम तेरा प्रेमी नजदीक तो है.. जब चाहे उसे देख सकती है तू.. पर ये बता की शादी के बाद तूने उससे संबंध कैसे बनाए रखे?? तेरे घर पर सास ससुर हमेशा रहते है.. तुम लोग कैसे मिलते हो फिर?"

कविता: "यार हम लोग कभी कभार तेरे घर पर ही मिलते है.. तेरी मम्मी को सब कुछ पता है इसके बारे में... "

वैशाली चकित हो गई "मम्मी ऐसी बातों में तुझे सपोर्ट कर रही है ये ताज्जुब की बात है.. वैसे मम्मी बड़ी स्ट्रिक्ट है.. "

कविता: "बहोत दिन हो गए है यार उसे मिले हुए.. अब रहा नहीं जाता "

वैशाली: "मतलब तुम दोनों जब भी मिलते हो तब सेक्स भी करते हो?"

कविता ने जवाब नहीं दिया बस "हाँ" कहते हुए गर्दन हिलाई फिर धीरे से बोली "अकेले में मिलना होता है तब करते है.. बहोत मज़ा आता है उसके साथ.. वैसा मज़ा तो मुझे पीयूष के साथ भी नहीं आता कभी"

वैशाली: "वैसा ही होता है.. घर की मुर्गी दाल बराबर"

कविता: "मुझे एक आइडिया आया है वैशाली"

वैशाली: "तो बता ना.. "

कविता: "तु हिम्मत को मिलने के लिए अपने घर ही बुला ले.. मैं शीला भाभी को २ घंटों के लिए कहीं बाहर ले जाऊँगी"

वैशाली सोच में पड़ गई.. "वो तो ठीक है यार.. पर मुझे डर लगता है"

कविता: "डरने वाली कौन सी बात है? तेरी मम्मी तो मेरे साथ ही होगी"

सुनते ही वैशाली की आँखें चमकने लगी.. संजय से वो इतनी नफरत करती थी की हिम्मत से अकेले में मिलने के खयाल मात्र से उसकी पेन्टी गीली होने लगी.. "यार ऐसा कुछ सेटिंग हो तो मज़ा आ जाएगा.. हिम्मत को और मुझे एकांत की सख्त जरूरत है.. मैं कुछ करती हूँ"

दोनों बातें करते करते घर पहुंचे और अपने अपने घर चले गए। वैशाली जब दरवाजा खोलकर अंदर आ रही थी तब उसने खिड़की से देखा की मम्मी किसी से फोन पर हंस हँसकर बात कर रही थी.. वैशाली को देखते ही उसने फोन काट दिया.. पर यह बात वैशाली के दिमाग मे नोट हो गई थी

"काफी दोस्ती हो गई है तेरी और कविता की.. हैं ना.. !! मैंने कहा था ना तुझे.. बहुत अच्छी लड़की है.. मेरे साथ भी उसकी अच्छी पटती है.. " अपने मोबाइल पर नजर रखे हुए शीला ने कहा

वैशाली: "हाँ मम्मी.. कविता बहोत ही अच्छी लड़की है"

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दूसरे दिन कविता शीला भाभी के घर आई.. और बातों बातों में कहा "भाभी, शहर के उस कोने पर एक बाबा आए है.. मैंने उनकी मन्नत रखी थी... तो मुझे उनके दर्शन करने जाना है.. आप चलोगी मेरे साथ??"

शीला: "हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. पर किस बात की मन्नत रखी थी तूने?कोई गुड न्यूज़ है क्या??" आँख मारकर उसने कहा

कविता: "क्या भाभी आप भी!! ऐसा कुछ नहीं है.. मैंने तो पीयूष की नौकरी के लिए मन्नत रखी थी.. अब नौकरी मिल गई है तो मुझे दर्शन करने जाना है ताकि मन्नत पूरी हो सके। "

शीला: "बहोत बढ़िया.. वैशाली, तू भी चल हमारे साथ दर्शन के लिए"

वैशाली: "नहीं मम्मी.. मेरे पिरियड्स चल रहे है.. " वैशाली ने गोली दी

शीला: "कोई बात नहीं.. तू घर पर आराम कर.. हम दो-तीन घंटों में वापिस लौट आएंगे"

वैशाली: "हाँ.. आप दोनों दर्शन के लिए हो आइए.. और कविता.. जा रही हो तो तुम गुड न्यूज़ वाली मन्नत भी मांग ही लेना बाबा से"

कविता शरमाकर चली गई

दोपहर के तीन बजे चाय पीने के बाद शीला और कविता बाबा के धर्मस्थान पर जाने के लिए निकले..

शीला: "बाप रे.. कितनी गर्मी है!! चल ऑटो ले लेते है"

जाते हुए कविता ने वैशाली को आँखों ही आँखों में इशारा कर दिया.. चालाक शीला ने कनखियों से कविता की इस हरकत को देख ही लिया

कविता: "इतनी धूप भी नहीं है भाभी.. चल कर ही जाते है.. बेकार में ऑटो वाला १०० रुपये ले लेगा" कविता चलकर जाना इसलिए चाहती थी ताकि वैशाली को ज्यादा से ज्यादा वक्त मिले

शीला का शातिर दिमाग ये सोच रहा था की आखिर कविता ने वो इशारा क्यों किया? क्या जान बूझकर वैशाली नहीं आई? घर पर रहने के पीछे क्या कारण होगा वैशाली का?

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कविता और शीला चलते चलते जैसे ही नुक्कड़ से बाहर निकले, वैशाली ने हिम्मत को फोन किया.. और उससे कहा की दो घंटों का वक्त था मिलने के लिए और वो उससे मिलना चाहती थी..

हिम्मत तुरंत ही वैशाली के घर आने के लिए निकला.. उसके घर की गली में घुसते ही पुरानी यादें ताज़ा हो गई.. जब वो कॉलेज में था तब वैशाली की एक झलक पाने के लिए रोज इस गली से गुज़रता था.. वैशाली उसे देखकर बड़ी प्यारी सी मुस्कान देती.. पूरा दिन अच्छा जाता था हिम्मत का.. कितना खुश था वो जब वैशाली ने उसकी मित्रता का स्वीकार किया था.. हिम्मत की मोटरसाइकिल ७० की स्पीड से चल रहा था फिर भी उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वक्त थम सा गया था..

हिम्मत का दिल जोरों से धड़कने लगा था.. अपनी प्रेमीका को ८ साल में पहली बार देखने वाला था.. आठ सालों में ज़िंदगी कितने उतार चढ़ावों से गुजर गई.. वैशाली की शादी के बाद हिम्मत अकेला पड़ गया था..

सुशील और संस्कारी हिम्मत बड़े ही अच्छे स्वभाव का था.. उसके संपर्क में आने के बाद वैशाली उससे बेहद प्रभावित हुई थी.. हमेशा खुशमिजाज में रहने वाला और सकरात्मकता सोच से भरा हुआ हिम्मत वैशाली को बहोत पसंद था.. वो देखने में खास नहीं था और सीधा साधा था इसलिए उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी.. कॉलेज के बाकी लड़कों के मुकाबले हिम्मत कभी भी लड़कियों को इम्प्रेस करने की कोशिश नहीं करता था.. सामान्य दिखावे वाले हिम्मत के साथ खूबसूरत वैशाली को देखकर कॉलेज के लड़के ठंडी आहें भरते रहते थे

घर की डोरबेल दबाते वक्त भी हिम्मत के हाथ कांप रहे थे.. आठ सालों के बाद अपनी प्रेमीका को मिलने और देखने का मौका मिल रहा था.. अपने रुमाल से उसने आँखें पोंछ ली।

हिम्मत को वो दिन याद आ गया जब वैशाली और वो आखिरी बार मिले थे.. फुट फुट कर रो रही थी वैशाली.. उसकी पीठ सहलाते हुए उसने कहा था "मत रो यार.. हमारे यहाँ कोई भी लड़की कभी प्रेमीका नहीं हो सकती.. केवल मजबूर हो सकती है.. सदियों से चलता आया है ये.. कौन सी नई बात है !!"

आखिर हिम्मत ने डोरबेल बजा ही दी.. दरवाजा खुलते ही वैशाली ने उसका स्वागत किया.. पराई पराई सी लग रही थी उसे.. वो नजर भी नहीं मिला पाया

वो यंत्रवत सोफ़े पर बैठ गया और वैशाली उसके लिए पानी का ग्लास लेकर आई.. हिम्मत को देखते ही वैशाली अपनी सुध-बुध खो चुकी थी

"कैसी हो वैशु.. आई मीन.. वैशाली.. ?" पानी का ग्लास लौटाते हुए हिम्मत ने कहा

"अगर तू मुझे औपचारिकता से मिलने आया है तो अभी चला जा यहाँ से.. सालों से कान तरस रहे है मेरे.. तेरे मुंह से "वैशु" सुनने के लिए.. " इतना बोलते बोलते वैशाली थक गई

हिम्मत का ये स्वभाव था की वो गंभीर से गंभीर वातावरण को अपनी हल्की फुलकी बातों से निखार सकता था.. उसकी मृत पत्नी संध्या को ये बात जरा भी पसंद नहीं थी.. वो हमेशा कहती की हिम्मत किसी बात को लेकर सिरियस होता ही नहीं है.. जवाब में हिम्मत ये कहता की ज़िंदगी हल्की फुलकी होनी चाहिए.. वरना जीना मुश्किल हो जाएगा

हिम्मत: "एक बात बता वैशाली"

वैशाली: "नहीं बताऊँगी और जवाब भी नहीं दूँगी जब तक तू मुझे वैशु कहकर नहीं पुकारेगा.. "

हिम्मत: "ठीक है बाबा.. वैशु.. तू कलकत्ता जाकर इतनी बदसूरत कैसे हो गई? मैंने तुझे जब विदा किया था तब गुड़िया जैसी सुंदर थी तू.. मैं तुझे वैशु कहकर इसलिए नहीं पुकार रहा था क्योंकी तू पुरानी वाली वैशु जैसी लग ही नहीं रही है"

हिम्मत की बात का बुरा मानने की बजाए वैशाली को अच्छा लगा

वैशाली: "तुझ से जुड़ा होने के बाद.. जिस्म की तो छोड़.. जिंदगी में भी किसी प्रकार की सुंदरता नहीं बची.. " ग्लास को टेबल पर रखते हुए बोली

हिम्मत वैशाली के गदराए जिस्म को देखता ही रहा.. शादी के बाद लड़की के शरीर में कितने परिवर्तन आ जाते है !!!

हिम्मत: "मोटी हो गई है तू वैशु"

वैशाली: "पराई औरत को इस तरह घूर घूर कर नहीं देखते.. कहाँ गाहे तेरे वो संस्कार??" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा। हालांकि हिम्मत के वही विचारों के कारण वो उससे आकर्षित हुई थी.. इसकी बदौलत ही वो बाकी लड़कों से अलग लगता था.. कॉलेंज में कभी मस्ती मस्ती में वो हिम्मत को ऐसी तैसी जगह पर छु भी ले तो हिम्मत उसे बड़ा लेक्चर सुना देता था.. और तब वैशाली का मन करता था की वो बोलत ही रहे और वो सुनती रहे..

हिम्मत को चिढ़ाने के लिए वो कभी कभार ऐसे बैठती थी की उसके स्तन हिम्मत को छु जाएँ.. तब हिम्मत उसे कहता "तू बात करने आई है या मेरी मर्दानगी की परीक्षा लेने?" हिम्मत उसे टोक कर दूरी बना लेता

पर वो पुराना समय चला गया था.. हिम्मत और वैशाली के जीवन में काफी परिवर्तन आ चुके थे। वैशाली के जीवन को संजय नाम की सूनामी ने तहस नहस कर दिया था और हिम्मत की जीवनसंगिनी की आकस्मिक मृत्यु ने उसके जीवन में भूकंप सा ला दिया था

वैशाली ने हिम्मत को दायें हाथ की हथेली को अपने हाथ में लेकर कहा "मैं अब भी तुम से बहोत प्यार करती हूँ हिम्मत" मौका मिलते ही स्त्री अपने प्रेम का इजहार जरूर करती है.. हिम्मत ने जवाब नहीं दिया

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद हिम्मत ने कहा "वैशाली, मुझे लगता है की मुझे यहाँ ज्यादा देर रुकना नहीं चाहिए"

हिम्मत सोफ़े से खड़ा हो गया..

वैशाली: "क्यों क्या हुआ? यहाँ कोई रिस्क नहीं है.. तू आराम से बैठ"

हिम्मत: "बात दरअसल ऐसी है की.. पिछले दो सालों से मैं शरीरसुख से वंचित रहा हूँ.. संध्या का केन्सर डिटेक्ट होने के बाद से लेकर उसकी मृत्यु तक.. हमारे बीच पति पत्नी वाले जिस्मानी तालुककात नहीं थे ये जाहीर सी बात है.. आज तुझे देखने के बाद मुझे कुछ कुछ होने लगा है.. इससे पहले की मुझसे कोई भूल हो जाएँ.. मुझे चले जाना चाहिए"

वैशाली: "हमारे बीच ऐसा पर्दा कब से आने लगा हिम्मत? मेरे इजहार के बाद.. मेरी हर सांस पर तेरा अधिकार हो गया था.. तूने उसका फायदा नहीं उठाया था वो तेरी सज्जनता थी.. पर अगर कुछ किया भी होता तो गलत नहीं होता.. आज भी मेरे जिस्म पर तेरा उतना ही अधिकार है, हिम्मत.. सच्चाई तो ये है की संजय के साथ सेक्स करते वक्त भी में अपने मन मैं तुझे ही याद करती हूँ.. अगर ऐसा न करती तो मैं संजय का कभी स्वीकार ही नहीं कर पाती.. आ जा हिम्मत.. और स्वीकार कर ले मेरे जिस्म का" एक ही सांस में सारी बात बोलकर वैशाली ने अपनी छाती से दुपट्टा हटाकर फेंक दिया.. उसकी भारी छातियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. देखकर उत्तेजित ना हो ऐसा नामर्द भी नहीं था हिम्मत

उसने वैशाली को बाहों में भर लिया.. और काफी देर तक जकड़ कर लिपटा ही रहा.. वैशाली के भरे भरे स्तन हिम्मत की छाती से दबकर चपटे हो गए.. अपने प्रेमी की पीठ को सहलाते हुए वो उसे उसकी पत्नी संध्या की मृत्यु का आश्वासन दे रही थी.. कंधे पर गरम गरम स्पर्श होने पर वैशाली ने हिम्मत को अपनी बाहों से अलग किया.. और देखा तो वो रो रहा था.. हिम्मत के इस रूप को उसने पहली बार देखा था

वैशाली: "शांत हो जा हिम्मत... जीवन के कठिन से कठिन प्रश्न का चुटकी में हल ढूंढ लेने वाले को रोना शोभा नहीं देता.. " धड़कते दिल के साथ अपने प्रेमी को सांत्वना देने के लिए वैशाली ने अपने होंठ हिम्मत के होंठों पर रख दिए..

दोनों की आँखों से सावन-भादों बरस रहे थे.. हिम्मत वैशाली के होंठ चूसते हुए अपनी उत्तेजना को ज्यादा देर तक छुपा नहीं पाया.. वैशाली को अपनी जांघों के बीच हिम्मत के कड़े लंड के उभार का स्पर्श महसूस होने लगा

वैशाली अपना हाथ नीचे ले गई और पेंट के ऊपर से उसके लंड को सहलाया.. वस्त्र के ऊपर से भी उसे लंड की गर्मी महसूस हो रही थी.. "ओहह वैशाली.. आज क्यों मुझे ऐसा हो रहा है? मैं अपने आप पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पा रहा हूँ?"

वैशाली: "नियंत्रण रखने की कोई जरूरत भी नहीं है.. कुदरत के नियमों को भला कौन नियंत्रित कर पाया है.. !! इस सुख के लिए मैं सालों से तड़प रही हूँ.. आह.. प्लीज हिम्मत.. आज मुझे संतुष्ट कर दे.. तृप्त कर दे.. बहोत तरस रही हूँ मैं.. आज प्लीज अपनी सारी मर्यादा त्याग दे.. और मुझे अपने अंदर समा ले"

तब तक तो वैशाली हिम्मत के पेंट से उसके लंड को बाहर निकाल चुकी थी.. हिम्मत के लंड का कद देखकर वैशाली की उत्तेजना दोगुनी हो गई.. अद्भुत सख्ती वाला लंड वैशाली के हाथों के स्पर्श से और कठोर हो गया.. मुठ्ठी में पकड़कर लंड हिलाते हुए वैशाली हिम्मत के होंठों को चूम रही थी.. हिम्मत भी अब कामदेव के प्रभाव में आ चुका था.. उसने वैशाली के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके गोल मटोल स्तनों को पकड़ लिया.. दोनों एक दूसरे को नग्न कर चोद लेने की जल्दी में थे..

दुनिया से बेखबर ये दोनों प्रेमी.. आठ सालों के बाद एक हुए थे.. वैशाली कपड़े उतारने में थोड़ी सी झिझक रही थी.. पर हिम्मत ने उसकी पेन्टी खींच कर उतार दी और नीचे बैठकर उसकी चुत को चूमने लगा.. आखिर जब उसने चुत की लकीर के बीच अपनी जीभ फेरी तब वैशाली के मुंह से "ओह्ह हिम्मत.. मर गई.. " की आवाज निकल गई..

वैशाली के स्तन उत्तेजना के मारे फूल कर गुब्बारे जैसे बन गई.. उसकी निप्पल सख्त हो गई.. हिम्मत ने वैशाली की चुत के अंदरूनी हिस्सों को चाट चाट कर कामरस से भिगो दिया.. वैशाली हिम्मत का लंड पकड़ना चाहती थी पर हिम्मत उसकी चुत को छोड़ ही नहीं रहा था.. बेहद उत्तेजित होकर वैशाली सोफ़े पर ढल गई.. और गिरते ही वो झड़ गई.. जीवन में पहली बार वो इतनी जल्दी स्खलित हुई थी.. हिम्मत के प्रेम का ऐसा प्रभाव था..

चरमोत्कर्ष पर पहुंचते ही मदमस्त हो उठी वैशाली.. थोड़ी देर तक उसकी साँसे फुली हुई रही.. बाद में वो उठी और हिम्मत को फर्श पर लिटा दिया.. हिम्मत का लंड छत की तरफ तांक रहा था.. उसके भारी अंडकोशों को मुठ्ठी में दबाकर खेलते हुए उसने हिम्मत का लंड मुंह में ले लिया.. वैसे वैशाली को लंड चूसना बिल्कुल भी पसंद नहीं था.. अपने पति से नफरत होने की एक वजह ये भी थी की संजय उससे जबरदस्ती लंड चुसवाता था.. पर हिम्मत के लिए उसके दिल से प्रेम की जो भावना जाग उठी थी उसने उसे लंड चूसने पर मजबूर सा कर दिया.. उसे जैसा मालूम था वैसे चूसने लगी.. चूसने में परफेक्शन भले ही नहीं था पर प्यार बेशुमार था.. वैशाली की चुसाई के कारण हिम्मत पागल सा हो गया..

"ओह्ह वैशु.. प्लीज स्टॉप.. आह्ह आह्ह वैशु.. ज्यादा मत कर.. तेरा मुंह गंदा हो जाएगा.. निकाल दे बाहर.. " पर वैशाली ने अपने प्रेमी का वीर्य स्त्राव अपने मुंह के अंदर ही हो जाने दिया.. प्रेमी के इस प्रसाद को बिना किसी घिन के निगल गई.. इतना विचित्र स्वाद उसने कभी नहीं चखा था पर फिर भी अपनी नापसंद को प्रेम के आगोश में छुपा लिया..

हिम्मत का लंड झड़ने के बाद भी सख्त था.. वैशाली ने बिना एक पल गँवाए.. हिम्मत की दोनों तरफ अपनी टांगें जमाई.. कमर को नीचे लाते हुए अपने गरम गुलाबी सुराख को लंड के टोपे पर रख दिया.. हल्के से अपने जिस्म का वज़न रखते ही.. उसकी चुत हिम्मत का लंड निगल गई

"आह्ह हिम्मत.. फक.. बहुत अच्छा लग रहा है मुझे.. उफ्फ़फफ.. !!" वैशाली ने भारी आवाज में कहा

हिम्मत ने कमर उठाकर एक मजबूत धक्का दिया

"उईई माँ.. जरा धीरे से.. बहोत दिनों से कोरी पड़ी है चुत.. इसलिए तंग हो गई है.. धीरे धीरे धक्के लगा हिम्मत" वैशाली ने कहा

हिम्मत एक पल के लिए रुक गया.. और वैशाली के लटक रहे स्तनों को अपने हाथों से मींजने लगा.. स्तनों का मर्दन होते ही वैशाली की चुत ने गीलापन छोड़ना शुरू कर दिया.. दर्द का एहसास काम हुआ.. वो सिहरने लगी.. अब उसने अपनी कमर हिलाते हुए आगे पीछे होकर हिम्मत के लंड को अपनी चुत में मथना शुरू कर दिया.. वैशाली बेहद उत्तेजित होने लगी.. अपने पति से त्रस्त वैशाली को संजय के साथ सेक्स में कभी मज़ा नहीं आता था.. आज अपने प्रेमी के लंड को चुत के अंदर प्राप्त कर वह धन्य हो गई थी

पूरे कमरे में पक् पक् की आवाज़ें आ रही थी.. साथ ही वैशाली की सिसकियाँ भी गूंज रही थी.. टाइट चुत में हिम्मत का सख्त लंड फंस चुका था.. वैशाली की चुत की दीवारों पर जबरदस्त घर्षण होने लगा.. अपनी चुत को कसकर उसने और सख्ती से लंड को अंदर दबोचे रखा था.. और कमर हिलाते हुए पूरा आनंद ले रही थी

५-६ मिनट की भीषण चुदाई के दरमियान वैशाली की चुत तीन बार झड़ गई.. और उसके बाद हिम्मत ने भी कस कर धक्के लगाना शुरू किया.. वैशाली के बिखरे हुए बालों को हाथ से पकड़कर हिम्मत नीचे से धक्के लगाए जा रहा था.. एक जोरदार धक्का लगाकर हिम्मत ने अपना वीर्य वैशाली की बच्चेदानी के मुख पर छोड़ दिया.. उस गरम गरम प्रवाही का एहसास वैशाली की चुत को बेहद सुकून दे रहा था.. वैशाली निढाल होकर हिम्मत की छाती पर ढल गई..

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बाबा के दर्शन करने के बाद.. शीला और कविता बाहर बनी बैठक पर आराम से बैठे थे। कविता ने देखा की आते जाते सब लोग शीला ने भरे बदन का निरीक्षण करते जा रहे थे.. शीला का गदराया शरीर इतना आकर्षक लग रहा था की देखने वाले की नजर उसके दोनों स्तनों पर.. नीचे चरबीदार पेट और उसके मध्य की गहरी नाभि पर अवश्य थम जाती.. ५५ साल की उम्र में भी शीला का जिस्म इतने लोगों को आकर्षित कर सकता था ये देख कविता अचंभित हो गई

"भाभी.. आप को तो ऊपरवाले ने दोनों हाथों से भर भर कर हुस्न दिया है" कविता ने कहा

"क्यों, क्या हुआ?"

कविता: "सब लोग आप को कैसे घूर रहे है.. " शीला की गोरी कमर पर पड़ते बल को देखकर उसने कहा

शीला: "स्त्री का रूप हमेशा मर्दों के आकर्षण का केंद्र होता है.. खिले हुए सुंदर गुलाब को भला कौन देखना नहीं चाहेगा !!"

कविता: "हाँ वो तो है.. आप हो इतनी हॉट.. !! देखने वाले की क्या गलती!!"

शीला: "कविता.. मेरे दिमाग में एक प्रश्न घूम रहा है.. अगर तू उस प्रश्न का जवाब सच सच देगी तो मैं वादा करती हूँ की तुझे रसिक का मोटा लंड दिखाऊँगी.. ये मेरा प्रोमिस है " शीला ने कविता की दुखती रग पर हाथ रख दिया

कविता: "हाँ पूछिए ना भाभी.. !!"

शीला: "वैशाली का बर्ताव मुझे आज अजीब सा लगा.. मुझे पक्का मालूम है की उसके पिरियड्स नहीं चल रहे है.. फिर उसने हमारे साथ आने से मना क्यों कर दिया?"

कविता सोच में पड़ गई.. की क्या उत्तर दे

कविता: "मुझे क्या पता भाभी.. आप के घर की बात है.. आप ही जानो"

शीला: "मेरे घर की काफी बातें तू जानती है.. रसिक के बारे में भी.. मुझे पक्का यकीन है की तू इसका कारण जानती है"

कविता चुप हो गई.. वो जानती थी की शीला भाभी ने उसे अपने जाल में फंसा लिया था.. अब उसका बचना नामुमकिन था..

शीला: "तू वैशाली की खास सहेली है.. इसलिए तुझे पूछ रही हूँ.. नहीं बताएगी तो भी जानने के मेरे पास और तरीके है.. अभी फोन करके तेरी सास को पूछूँगी तो वो भी देखकर बता देगी की मेरे घर पर अभी क्या चल रहा है.. "

कविता की फट गई.. बाप रे.. अगर शीला ने मेरी सास को अपने घर भेजा तो गजब हो जाएगा.. शीला के सामने वैशाली को आगाह करने का कोई तरीका भी नहीं था.. मेरी सास जाकर देखे और शीला भाभी को बताएं उससे अच्छा मैं ही बता देती हूँ.. रसिक का देखने भी मिल जाएगा

कविता ने वैशाली का पेपर लीक कर दिया

कविता: "भाभी.. वैशाली अपने पति के साथ खुश नहीं है.. वो अपने पुराने दोस्त से अकेले मिलना चाहती थी.. इसलिए मैंने आज दर्शन का बहाना बनाया"

शीला: "कौन है उसका पुराना फ्रेंड?"

झिझकते हुए कविता ने वैशाली के जीवन के निजी पन्नों को खोल तो दिया था पर नाम बताने से घबरा रही थी.. "वो तो मुझे नहीं पता.. " जानते हुए भी अनजान बनी रही कविता

शीला गहरी सोच में पड़ गई.. कौन हो सकता है.. !! राकेश.. विपुल.. अनिकेत.. मनीष.. ??? शीला दिमाग पर जोर डाल रही थी... तभी शीला को अचानक याद आया.. हिम्मत .. !! हाँ वही होना चाहिए.. उस दिन तेज बारिश में वैशाली को नोट्स देने आया था.. पक्का वही होगा

शीला: "कविता.. वैशाली के उस दोस्त को मैं अच्छी तरह जानती हूँ.. हिम्मत नाम है उसका.. कॉलेज के समय उन दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी "

कविता के चेहरे के हाव भाव देखकर शीला को यकीन हो गया था की उसका निशान सही जगह लगा था

शीला: "शादी शुदा लड़की को ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहिए.. संजय को पता चल गया तो.. !!"

कविता: "भाभी.. आप और मैं भी तो ये जोखिम उठा ही रहे है ना.. !!"

कविता ने शीला का मुंह बंद कर दिया..

शीला: "चल अब घर चलते है.. " शीला खड़ी हो गई

कविता: "आप प्लीज वैशाली को इस बारे में कुछ मत बोलना.. उसे पता चल जाएगा की मैंने ही आपको बता दिया.. हमारी दोस्ती टूट जाएगी"

शीला: "पागल है क्या? मैं नहीं बताऊँगी.. तू चिंता मत कर"

कविता का टेंशन कम हुआ.. दोनों चलते चलते अपने घर आए.. वैशाली ने पूरा ड्रॉइंगरूम साफ कर सब ठीक ठाक कर दिया था.. उसे झाड़ू लगाते देख शीला को आश्चर्य हुआ.. वैशाली कभी भी घर के कामों में हाथ नहीं बँटाती थी.. इंसान अपने पाप छुपाने के लिए क्या क्या करता है !!

शीला ने बड़े ध्यान से वैशाली की चाल और उसका चेहरा देखा.. उसकी अनुभवी आँखों ने परख लिया.. संभोग के आनंद के बाद जैसी चमक स्त्री के चेहरे पर होती है.. वही वैशाली के चेहरे पर थी.. जिस तेजी और चपलता से वैशाली घर का काम कर रही थी वो देखकर ही प्रतीत हो रहा था की बेटी ने अपने प्रेमी के संग मजे किए थे

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शीला ने बड़े ध्यान से वैशाली की चाल और उसका चेहरा देखा.. उसकी अनुभवी आँखों ने परख लिया.. संभोग के आनंद के बाद जैसी चमक स्त्री के चेहरे पर होती है.. वही वैशाली के चेहरे पर थी.. जिस तेजी और चपलता से वैशाली घर का काम कर रही थी वो देखकर ही प्रतीत हो रहा था की बेटी ने अपने प्रेमी के संग मजे किए थे

वैशाली: "अरे मम्मी.. आप लोग आ गए? हो गए दर्शन? भीड़ तो नहीं थी ना?" उसने अपनी माँ को पटाना शुरू कर दिया

शीला ने वैशाली के कपड़ों को ध्यान से देखा.. सिलवटें देखकर उसे यकीन हो गया की वैशाली अभी अभी चुदी थी..

शीला: "हाँ बेटा.. आराम से हो गए दर्शन.. भीड़ बिल्कुल नहीं थी..!!"

वैशाली: "अच्छा.. मम्मी.. आज रात को हम डिनर करने होटल चलें?"

शीला: "नहीं बेटा.. मुझे बाहर का खाना राज नहीं आता.. ऐसा करों..तू और कविता चले जाना"

कविता: "हाँ हाँ.. जरूर चलेंगे.. वैसे भी मेरी सास का आज उपवास है और ससुरजी दोस्तों के साथ बाहर गए है.. मैं और पीयूष अकेले ही घर पर खाना खाने वाले थे.. हम तीनों बाहर खाने चलेंगे"

वैशाली ये सुनकर खुश हो गई

कविता अपने घर चली गई और शीला पौधों को पानी देने लगी.. हिम्मत के कामुक स्पर्श और दमदार धक्कों को याद करते हुए वैशाली सोफ़े पर बैठकर टीवी देखने लगी.. कितना मस्त रगड़ा आज हिम्मत ने.. आह्ह.. मज़ा ही आ गया.. जिस तरह उसने ड्रेस में हाथ डाल कर स्तनों को दबाया था.. इशशश.. वैशाली को अपनी दोनों टांगों के बीच गीलापन महसूस होने लगा.. उसने खिड़की से बाहर देखा.. शीला कंपाउंड में बने बगीचे में पानी छिड़क रही थी

वैशाली ने अपनी सलवार के अंदर हाथ डाला और अपनी चुत को सहलाने लगी.. उंगलियों का स्पर्श मिलते ही उसके चुत के होंठ खुल गए.. टीवी पर मस्त सेक्सी गाना चल रहा था.. माहोल सा बन गया.. दो मिनट में ही अपनी क्लिटोरिस को रगड़कर स्खलित हो गई वैशाली.. !! चुत को उंगली करने में व्यस्त वैशाली को ये नहीं पता था की शीला तिरछी नज़रों से उसे देख रही थी.. वैशाली के हाथ और कंधों की हलचल से ये स्पष्ट दिख रहा था की वो अपनी चुत से खेल रही थी.. चेहरे के हावभाव से प्रतीत भी हो गया की वो झड़ रही थी

शीला मन में सोच रही थी की बेटी मेरे ऊपर ही गई है.. इसकी शरीर की भूख भी बड़ी तेज है.. !!

शाम को कविता और पीयूष तैयार होकर डिनर के लिए वैशाली को बुलाने आए.. पीयूष को देखकर वैशाली ने हाई कहा.. कविता टेढ़ी आँख से उन दोनों का निरीक्षण कर रही थी की कहीं पुरानी यादें तो ताज़ा नहीं करने लगे ये दोनों!! पर उसे ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया

दोनों सीटी बस में बैठे.. बस में थोड़ी भीड़ थी.. इसलिए कविता और वैशाली को बैठाकर पीयूष खड़ा रहा.. वैशाली ने पीली टीशर्ट और काला टाइट पेंट पहना था.. खड़े हुए पीयूष को वैशाली के टीशर्ट के अंदर का नजारा साफ दीख रहा था.. वो बार बार उन उछल रहे स्तनों को ताड़ता रहा

पीयूष की नजर के बारे में वैशाली जान चुकी थी.. फिर भी अनदेखा कर वो खिड़की के बाहर ट्राफिक को देखने लगी.. स्टैन्ड आते ही तीनों नीचे उतरे.. उतरते वक्त वैशाली का कंधा पीयूष के कंधे से टकराया.. वह थोड़ी सी असंतुलित हुई.. और बस में चढ़ रहे एक पेसेन्जर के साथ टकरा गई.. उस आदमी की छाती से टकराकर वैशाली के दोनों स्तन चपटे हो गए.. देखकर पीयूष को होश उड़ गए

पीयूष सोच रहा था.. भेनचोद.. जब मैंने इसे चोदा था तब इतने बड़े बड़े होते तो कितना मज़ा आता यार.. !! क्या वैशाली को वो सब पुरानी बातें याद होगी? या भूल चुकी होगी? साली माल लग रही है एकदम.. बबले कितने बड़े बड़े हो गए है.. आखिर अपनी माँ पर ही गई है ये.. पीयूष अब उत्तेजित हो रहा था

पीयूष के इन विचारों से बेखबर कविता और वैशाली एक दूसरे से मज़ाक मस्ती करते हुए आगे चल रहे थे.. पीयूष अपनी पत्नी और वैशाली के थिरकते चूतड़ों को देखते हुए पीछे चला आ रहा था.. अचानक ठोकर लगने से पीयूष का बेलेन्स चला गया.. कविता ने पीछे मुड़कर देखा

कविता: "ध्यान कहाँ है तेरा .. !! जरा देखकर चला कर.. "

पीयूष: "अरे हो जाता है कभी कभी यार.. तू तो ऐसे बात कर रही है जैसे तुझे कभी ठोकर लगी ही नहीं कभी"

कविता: "मुझे भी लगती है.. पर काम करते वक्त.. तेरी तरह नहीं.. जो ना देखने वाली चीजों को ताकने में ठोकर खाते हो!!"

पति पत्नी के इस मीठे झगड़े को देखकर वैशाली हंसने लगी.. वो सोच रही थी.. पीयूष मेरे बॉल को तांक रहा है ये बात कविता ने भी नोटिस तो की होगी.. इसीलिए तो कहीं ताने नहीं मार रही.. !! पक्का ऐसा ही है.. मेरी मटकती गांड को तांकने के चक्कर में उसे ठोकर लग गई.. हा हा हा हा

वो लोग होटल सुरभि के दरवाजे पर पहुंचे तभी पीयूष के मोबाइल पर शीला का फोन आया

पीयूष: "हैलो.. हाँ भाभी.. बताइए!!"

शीला: "पीयूष, तुम तीनों को लौटने में कितना वक्त लगेगा ??

पीयूष: "एक मिनट रुकिए भाभी.. " फिर उसने कविता से पूछा "खाना खाने के बाद कहीं और जाने का प्लान तो नहीं है ना?"

कविता: "खाना खाकर थोड़ी देर गार्डन में बैठेंगे आराम से.. फिर देर से घर जाएंगे.. "

पीयूष ने फोन पर शीला को बताया "भाभी, अभी ८ बज रहे है.. हमे आते आते ११ बज जाएंगे"

शीला: "ठीक है, कोई बात नहीं.. आराम से खाना खाकर आना तुम सब" शीला ने फोन रख दिया

पीयूष, कविता और वैशाली तीनों होटल के टेबल पर बैठे.. वैशाली की पीली टीशर्ट के अंदर ब्रा में कैद बड़े बड़े स्तन टेबल की धार से दबते हुए देख पीयूष का लंड उछलने लगा था.. यार.. वैशाली को पता भी नहीं होगा की मैं उसके बारे में अभी क्या सोच रहा हूँ.. एक बार ये बड़े बड़े पपीते दबाने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाएँ.. कितने बड़े है यार.. इसकी निप्पलें कितनी रसीली होगी.. लंबी लंबी.. गुलाबी गुलाबी

पीयूष का मन खाने में कम और वैशाली के बबलों में ज्यादा था.. ये परखने में वैशाली को देर नहीं लगी। हर स्त्री की छठी इंद्रिय उन्हे मर्द की नज़रों के प्रति सजाग रखती है.. स्वयं की रक्षा के लिए कुदरत की दी हुई शक्ति है ये.. वैशाली को बस कविता की मौजूदगी खटक रही थी अभी.. पीयूष के साथ तो पहले से ही अच्छी पटती थी उसकी..

कविता मन ही मन सोच रही थी.. ऐसे रोमेन्टीक माहोल में अगर पिंटू साथ होता तो कितना मज़ा आता.. !! काश जीवन में एक बार .. अपने प्रेमी पिंटू के हाथ में हाथ डालकर ऐसी ही किसी होटल में खाना खाने जाने का मौका मिल जाएँ.. बस मज़ा ही आ जाएँ.. ख्वाब देखने तक तो ठीक था पर हकीकत में इस बात को मुमकिन बनाना सिर्फ शीला भाभी के बस की बात थी.. उनके अलावा ये काम और कोई नहीं कर सकता

वैशाली आराम से खाना खा रही थी.. अचानक उसे अपने पैर पर किसी चीज का स्पर्श महसूस हुआ.. उसने नीचे देखा तो पीयूष का पैर उसके पैर से टकराया था.. उसने तुरंत अपना पैर पीछे खींच लिया.. पीयूष ने जान बूझकर पैर लगाया था ? वैशाली ही नहीं.. दुनिया के सारी महिलायें ये जानती है की टेबल के नीचे पुरुष का पैर गलती से कभी नहीं टकराता..

वैशाली और पीयूष की नजर एक होते हुए वैशाली ने एक शरारत भारी मुस्कान दी और नजर फेर ली.. दोनों बचपन से लेकर जवानी तक साथ खेलकर बड़े हुए थे.. पर जैसे ही वैशाली की छातियों पर स्तन उभरने लगे.. शीला सावधान हो गई.. वो पीयूष और वैशाली को कभी अकेले में खेलने नहीं देती थी.. फिर भी जो होना था वो तो होकर ही रहा.. वैशाली की पुरानी यादों का सफर.. दोनों के बीच हुए सेक्स पर आकर रुक गया.. क्या पीयूष भी उसी के बारे में सोच रहा होगा !! याद होगा उसे? पक्का याद होगा.. पहला सेक्स तो हर किसी को याद होता है.. उसकी छोटी सी लुल्ली मेरे हाथ में देकर कैसे आगे पीछे करवाता था वो !! वैशाली के पैर के साथ फिर कुछ टकराया.. इस बार उसने नीचे नहीं देखा.. उसे पता था की वो पीयूष का ही पैर था.. वैशाली के पूरे जिस्म में सनसनी सी फैल गई.. खाने का निवाला गले में ही अटक गया... खाँसते हुए उसने पानी का एक घूंट पीया..

दूसरी तरफ पीयूष वैशाली के स्तन देखकर बावरा स हो गया था.. इस बार वैशाली ने अपना पैर नहीं हटाया.. पीयूष के मन में लड्डू फूटने लगे.. उसने वैशाली के पैर के अंगूठे पर अपना अंगूठा दबा दिया.. वैशाली को दर्द हो रहा था पर वो कुछ नहीं बोली.. नहीं तो कविता को भनक लग जाती..

इन सारी बातों से बेखबर कविता ने अपना खाना खतम किया और बाउल में हाथ धोकर खड़ी हो गई और बोली "मज़ा आ गया आज तो.. अच्छा हुआ वैशाली तूने डिनर का आइडीआ दिया.. घर का खाना खा खा कर मैं बोर हो छुकी थी.. क्यों पीयूष.. सही कहा ना मैंने?"

अचानक उछले इस सवाल से पीयूष हड़बड़ा सा गया.. जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो.. उसने हँसते हुए अपनी मुंडी हिलाई..

कविता: "मैं बाथरूम जाकर आती है.. आप दोनों आराम से खाओ "

कविता टेबल से काफी दूर चली गई और उसने पिंटू को फोन लगाया..

इस तरफ वैशाली और पीयूष अब अकेले रह गए.. पत्नी की गैरमौजूदगी में पीयूष की हिम्मत खुल गई.. ये भँवरा अब वैशाली नाम के फुल पर मंडराने लगा था..

पीयूष: "याद है वैशाली.. जब हम छोटे थे तब साथ में कितनी मस्ती किया करते थे??"

वैशाली: "हाँ .. और मैं तुम्हें बहोत मारती थी.. याद है एक बार मैंने तुम्हें क्रिकेट के बेट से मारा था और तुम्हारा हाथ लाल लाल हो गया था.. !!"

पीयूष: "हम्ममम.. तुझे और कुछ भी याद है की नहीं?"

वैशाली शरमा गई "हट्ट साले बदमाश.. "

पीयूष: "बता न यार.. जब से तुझे देखा है मुझे कुछ कुछ हो रहा है.. मैं जानना चाहता हूँ की क्या तुझे भी ऐसा कुछ हो रहा है या नहीं??"

वैशाली: "पीयूष.. वो सब हमने जवानी की नासमझ में किया था.. तब हम नादान थे पर अब हम बड़े हो चुके है.. ये बात तुझे समझनी चाहिए"

पीयूष नाराज होकर बोला "ठीक है, ठीक है यार.. लेक्चर मत दे" पीयूष चुप हो गया

वैशाली: "अरे पीयूष. ये क्या लड़कियों की तरह रूठ गया तू?? हाँ सब कुछ याद है.. पर अभी उस बात को क्यों याद किया?"

पीयूष: "वैशाली.. अगर हम फिर से पहले जैसे ही नासमझ और नादान बन जाएँ तो कैसा रहेगा??"

वैशाली स्तब्ध हो गई.. दिमाग चकरा गया उसका.. पर पीयूष का इस तरह प्रपोज करने का अंदाज उसे बेहद पसंद आया..

वैशाली: "तू भूल रहा है की मैं अब किसी की पत्नी हूँ.. मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती"

पीयूष: "तो मैं भी तुझे कहाँ कुछ गलत करने के लिए बोल रहा हूँ?"

वैशाली को समझ में नहीं आया "तो फिर क्या करना चाहता है तू?"

पीयूष: "मुझे तो बस एक बार.. सिर्फ एक बार.. " बोलते बोलते पीयूष अटक गया पर जिस तरह उसकी ललचाई नजर उसके स्तनों पर चिपकी थी ये देखकर वैशाली समझ गई

वैशाली: "तू खुल कर बता तो कुछ पता चले मुझे"

पर पीयूष चुप रहा

वैशाली: "कविता बाहर हमारा इंतज़ार कर रही होगी.. हमें चलना चाहिए... वरना उसे शक होगा.. बाकी बातें फिर कभी करेंगे.. " वो खड़ी हो गई

पीयूष की नाव किनारा आने से पहले ही डूब गई.. वैशाली के मदमस्त स्तनों को एक बार दबाने की.. छुने की और मौका मिल तो चूसने की इच्छा थी पीयूष की.. अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था उसे.. जब वैशाली ने पूछा तब उसे बता देना चाहिए था.. पर अब पछताए होत क्या.. जब चिड़िया चुद गई खेत में..

दोनों होटल के दरवाजे पर पहुंचे तब उन्हे आते हुए देख कविता ने पिंटू को "बाय" कह कर फोन काट दिया..

........................
 
रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली

"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "

पीयूष स्तब्ध होकर रेणुका के पुष्ट पयोधर स्तनों के सौन्दर्य को देखता ही रहा.. क्या अद्भुत रूप था उन चूचियों का.. आहाहाहा.. स्त्री के स्तनों में ऐसा कौनसा जादू होता है.. जो देखता है बस देखता ही रह जाता है.. "

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"देख क्या रहा है.. जल्दी कर.. मुझे वापिस जाना है"

"भाभी.. आप क्या मस्त लग रही हो.. पर एक ही क्यों खोला? मुझे दोनों स्तन एक साथ नंगे देखने है"

"क्या मुसीबत है यार.. पीयूष तू समझता क्यों नहीं.. अभी तेरी ममी या कविता आ गए तो आफत आ जाएगी.. जिद मत कर.. पूरा भोजन करने की जिद में प्रसाद भी हाथ से जाएगा.. इसलिए बोल रही हूँ.. जल्दी से चूस ले" कहते हुए रेणुका ने अपने स्तन को पीयूष के मुंह के आगे कर दिया..

पीयूष ने पहले अपने हाथ से स्तन को छुआ.. गोरे गोरे मस्त पपीते जैसे.. नरम नरम स्तन.. उसने हल्के से दबाया..

"क्या कर रहा है पागल? ये कोई सुहागरात है जो धीरे धीरे कर रहा है?? जल्दी खतम कर" रेणुका पीयूष से तंग आ गई। उसने पीयूष का सिर पकड़कर अपने बॉल पर दबा दिया.. पीयूष भी असली खिलाड़ी था.. उसने निप्पल को छोड़कर.. आसपास के गोलाकार पर जीभ फेरने लगा.. रेणुका इंतज़ार में थी की कब वो निप्पल को मुंह में लेकर चूसे.. पर ये तो निप्पल के इर्दगिर्द चाटता ही जा रहा था.. निप्पल को नजरअंदाज करते हुए

रेणुका इंतज़ार करते हुए थक गई और ब्लाउस का हुक बंद करने गई.. तब पीयूष ने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया.. जैसे हाथ में अंगारा पकड़ लिया हो वैसे रेणुका ने अपना हाथ झटके से खींच लिया

"दिमाग खराब हो गया है क्या तेरा !! कबसे समझा रही हूँ पर तू समझता ही नहीं है !!" कहते हुए उसने पीयूष को अपने स्तन से दूर किया.. बड़ी मुश्किल से उस टाइट स्तन को ब्लाउस के अंदर दबोचा और हुक बंद कर दिए। पीयूष उसे देखता ही रह गया रेणुका की इस हरकत को

"भाभी.. आपने चूसने ही नहीं दिया.. मैंने अभी ठीक से देखा तक नहीं है.. पता नहीं फिर कब मौका मिले" कहते हुए नाराज होने की एक्टिंग करने लगा पीयूष

रेणुका ने उसे बाहों में भरकर चूम लिया "कितना क्यूट है रे तू!! ऐसे बातें करेगा तो मुझे प्यार हो जाएगा.. चल अब मुझे जाने दे.. बहोत देर हो गई है.. और हाँ कल टाइम पर राजेश की ऑफिस पहुँच जाना.. मैं राजेश से बात कर लूँगी.. ये मेरा मोबाइल नंबर नोट कर ले.. और जब मर्जी आए तब फोन मत करना.. वरना मेरे पति को शक हो गया तो तेरी नौकरी का एबॉर्शन हो जाएगा.. समझा.. !!"

पीयूष ने अपने नंबर से रेणुका को मिसकॉल किया "मेरा नंबर भी सेव कर लेना भाभी"

"हाँ कर लूँगी.. अब चलती हूँ.. बाय" पीयूष उसे जाते हुए देखता ही रहा

रेणुका जब मौसी के घर से बाहर निकल रही थी तभी मौसी अंदर घुस रहे थे.. दोनों की नजरें मिली.. और रेणुका मुस्कुराकर चली गई। मौसी को कुछ शक तो हुआ पर तब तक रेणुका जा चुकी थी। शीला के घर कुछ देर रुक कर वो अपने घर वापिस लौट गई।

रेणुका के जाते ही शीला फिर से अकेली हो गई.. कितनी चंचल थी रेणुका!! उसकी उपस्थिति से पूरा घर जीवंत लगता था.. उसके जाते ही सब सुना सुना लगने लगा.. शीला को अपनी बेटी वैशाली की याद आ गई.. काफी दिनों से उसके साथ बात नहीं हुई थी.. शीला ने मोबाइल उठाकर तुरंत उसे फोन लगाया

"कैसी हो बेटा ?? तू तो कभी फोन ही नहीं करती मुझे? तेरे पापा भी घर नहीं है.. कम से कम मेरा हाल जानने के लिए तो फोन किया कर !! कितना अकेलापन महसूस कर रही हूँ.. पता है तुझे !!" बेटी के आगे शीला ने अपनी भड़ास निकाली

"मम्मी, मैं काफी दिनों से आपको याद कर रही थी.. पर टाइम ही नहीं मिला.. कैसी हो तुम? पता है.. हम अगले हफ्ते आने वाले है तुमसे मिलने.. !!"

"क्या बात है?" शीला उछल पड़ी

"हाँ मम्मी.. उनको ऑफिस का कुछ काम है तो मुझे भी साथ चलने को कहा.. चार पाँच दिन का काम है.. वो अपना काम निपटाएंगे और हम माँ बेटी साथ में ऐश करेंगे.. "

"बहोत अच्छा.. जल्दी जल्दी आ जा.. मैं अकेले अकेल बोर हो रही हूँ.. तेरे पापा थे तब सब दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना होता था.. अब तो सब फोन पर ही हाल चाल पूछ लेते है.. कोई मिलने भी नहीं आता.. "

"बस मम्मी.. अब मैं आ जाऊँगी तो तेरा दिल लगा रहेगा.. अगले हफ्ते आएंगे.. आने से पहले मैं फोन करूंगी"

"ओके बेटा.. अपना खयाल रखना.. और संजय कुमार को मेरी याद देना"

"ठीक है मम्मी.. रखती हूँ"

शीला भावुक हो गई.. बेटी को विदा करने के बाद उनका घर सुना हो गया था.. उस दिन कितना रोए थे मैं और मदन?? मदन तो रात में नींद से जागकर वैशाली को याद करते हुए रोता था..

शीला ने केलेंडर में देखा.. अभी डेढ़ महीने की देरी थी मदन के लौटने में.. अब की बार तो मैं उसे वापिस जाने ही नहीं दूँगी.. क्या रखा है परदेश में? यहाँ पत्नी बिस्तर पर करवटें ले रही हो और पति परदेश में मजदूरी कर रहा हो.. ये भी भला कोई ज़िंदगी है !! शीला को बड़ी ही तीव्रता से मदन की याद आने लगी.. आज रात उसका फोन आना चाहिए.. जल्दी आजाओ मदन..

छत पर खड़े खड़े किसी से फोन पर बातें करते हुए पीयूष को बगल के घर में शीला भाभी अपने कमरे के सोफ़े पर बैठी हुई नजर आ रही थी.. उसकी नजर शीला से मिलते ही दोनों की आँखें चमक उठी.. शीला के उभारों को देखते हुए पीयूष को रेणुका के बबलों की याद आ गई.. शीला भाभी के बॉल बड़े थे पर रेणुका के स्तन कसे हुए थे.. पर अगर शीला भाभी को एक बार भोगने के लीये मिल जाएँ तो मैं रेणुका भाभी की तरफ देखूँ भी नहीं.. आह्ह.. पीयूष के लंड में एक झटका लगा.. यार.. ये शीला भाभी की नाभि कितनी सेक्सी है !! बिल्कुल कयामत सी.. एक बार चांस मिल जाएँ तो उनकी नाभि को चोदना है.. इतनी मस्त गहरी नाभि है की आधा लंड समा जाएँ अंदर..

पीयूष के दिमाग से शीला भाभी हट ही नहीं रही थी.. ज्यादातर रूप और कामुकता एक साथ एक व्यक्ति में कम ही नजर आते है.. शीला भाभी के पास उन दोनों का जादुई मिश्रण था.. कातिल हुस्न.. आलीशान व्यक्तित्व.. और चुंबकीय स्वभाव.. पीयूष दीवाना हो चुका था उनका.. दूसरी तरफ कविता ऐसा महसूस कर रही थी की पीयूष का उसके तरफ ध्यान कम होता जा रहा था.. वो सोच रही थी की शायद मैं पिंटू की तरफ ढलती जा रही हूँ उस वजह से तो शायद ऐसा लग रहा हो.. कविता ये जानती थी की शादी के बाद उसे पिंटू से नाता तोड़ लेना चाहिए था.. पर कमबख्त दिल का क्या करें.. कितनी कोशिशों के बाद भी वह अपने पहले प्रेम को दिल से निकाल नहीं पा रही थी

दूसरे दिन पीयूष फोन करके राजेश की ऑफिस पहुँच गया.. राजेश ने इंटरव्यू लेकर उसे एक हफ्ते के लिए अपॉइन्ट किया.. और उसे अपनी ऑफिस के मेनेजर महेंद्र के नीचे नियुक्त कर दिया.. पीयूष ने बाहर निकलकर सब से पहले रेणुका भाभी को फोन कर ये समाचार दिए.. बाद में कविता को और अंत में शीला भाभी को फोन किया और अपनी नौकरी लगने की खुशखबरी दी.. राजेश ने पीयूष को एक हफ्ते के लिए उसका काम देखकर नौकरी पक्की करने और तनख्वाह तय करने का वादा किया.. अपनी योग्यता और मेहनत पर पीयूष को पूरा भरोसा था. उसने तय किया की वह पूरे दिल से मेहनत करेगा और राजेश को शिकायत का एक भी मौका नहीं देगा..

पीयूष की नौकरी शुरू हो गई.. तीसरे ही दिन.. मेनेजर महेंद्र ने पीयूष के हाथों में एक बंद कवर रखा और कहा की ये कवर वो अपनी पत्नी को दें.. ये पीयूष की पत्नी के लिए था.. पीयूष अचंभित होकर सोचता रहा की कवर में ऐसा क्या था !!

शाम को घर आकार उसने कविता के हाथ में कवर रख दिया

कविता: "क्या है ये?"

पीयूष: "कवर तेरे हाथों में ही.. तू ही खोलकर बता.. मेरी ऑफिस से दिया है.. और कहा है की तेरे लिए है"

कविता: "मुझे भला कोई क्यूँ कवर भेजेगा तेरी ऑफिस से? नौकरी मैं कर रही हूँ या तुम?"

पीयूष: "अरे यार.. तू वो सब छोड़.. और कवर खोल.. मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा"

कविता ने कवर खोला.. एक एग्रीमेन्ट था जिसमें पीयूष की नौकरी को स्थायी कर दिया गया था और साथ ही उसकी तनख्वाह २५००० तय की गई थी.. और साथ में एक चिट्ठी थी जिसमें लिखा था

"प्रिय पीयूष,

तुम्हें मेरी कंपनी में पर्मनन्ट नौकरी देते हुए मुझे खुशी हो रही है.. मेरी कंपनी को तुम्हारे जैसे होनहार कर्मचारी की जरूरत थी। एक हफ्ते के काम को तीन ही दिन में खतम कर तुमने अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है.. मैं अपने स्टाफ को कभी नौकर नहीं समझता.. अपने परिवार का हिस्सा ही समझता हूँ.. इसलिए शनिवार रात को तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को मेरे साथ डिनर पर आने का न्योता दे रहा हूँ.. मेरे परिवार में तुम्हारा स्वागत है.. धन्यवाद और अभिनंदन.. शनिवार शाम को ७:४५ को तुम्हें अपनी पत्नी के साथ होटल मनमन्दिर में आना है.. हमारी ऑफिस का अन्य स्टाफ भी साथ डिनर करेगा.. हर महीने के आखिरी शनिवार को हमारी कंपनी डिनर के लिए मिलते है ताकि पूरा स्टाफ और उनके परिवारजन आपस में मिल सकें.. स्टाफ के साथ पहचान बढ़ाने का तुम्हारे लिए ये अच्छा अवसर रहेगा..

राजेश"
 
पीयूष से बात करके शीला ने जान लिया की वो तीनों ११ बजे से पहले आने वाले नहीं थे.. वो जानती थी की जब तक वैशाली यहाँ थी, तब तक रसिक, जीवा या रघु के साथ कुछ नहीं हो पाएगा.. अब क्या करें? इतने सारे दिन बिना चुदे कैसे रहेगी वो? कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा..

शीला ने रसिक को फोन लगाया..

रसिक: "हाँ भाभी बोलिए"

शीला: "मेरे घर पर मेहमान आए हुए है.. और दूध फट गया है.. अभी दो लीटर दूध चाहिए.. मिलेगा ये फिर मैं बाजार जाकर ले आउ?"

रसिक: "ये भी कोई पूछने की बात है.. अभी दूध लेकर आता हूँ.. वैसे भी मुझे अनुमौसी से दूध के पैसे लेने थे.. अभी आता हूँ"

शीला: "सुन रसिक.. मेरी बेटी वैशाली घर पर आई हुई है.. अभी वो बाहर है और दो घंटों तक आने नहीं वाली.. दूध का तो सिर्फ बहाना है.. तू जल्दी घर आजा मेरे"

रसिक: "मैं अभी निकला और आया.. आप तैयार रहो.. मैं पहुँच रहा हूँ"

शीला ने फोन कट कर दिया

पंद्रह मिनट के बाद रसिक दूध का केन लेकर आ पहुंचा.. शीला उसकी राह देख रही थी.. रसिक को घर के अंदर बुलाकर शीला ने कविता के मोबाइल पर फोन किया.. तब कविता खाना खा रही थी..

शीला ने फोन पर कहा : "तू कुछ भी मत बोलना.. सिर्फ मेरी बात सुन... कोई पूछे किसका फोन था तो बोलना की क्रेडिट कार्ड वालों का फोन था.. देख कविता.. जितनी देर तक हो सके सब को रोक कर रखना.. हो सके उतनी देर से वापीस आना. मैंने रसिक को मेरे घर बुलाया है.. तेरी बात करने के लिए.. और सुन.. घर के लिए निकलो तब मुझे मिसकॉल कर देना ताकि मैं उसे यहाँ से रवाना कर सकु" कविता हैलो बोल पाती उससे पहले ही भाभी ने अपनी बात सुना दी.. और फोन काट दिया.. कितने सेटिंग करने पड़ते है चुत की आग बुझाने के लिए.. !!

दरवाजा बंद करते हुए शीला ने रसिक को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया.. शीला के गोरे गदराए जिस्म का स्पर्श होते ही रसिक के लंड को ४४० वॉल्ट का झटका लगा.. शीला के दोनों स्तनों को उसने अपनी मजबूत हथेलियों में दबोचकर मसल दिया

रसिक: "इतनी भी क्या जल्दी है भाभी? "

शीला: "बहोत दिन हो गए रसिक.. ये वैशाली के आने के बाद, मैं तो जैसे पिंजरे में कैद हो गई हूँ.. तंग आ गई हूँ.. अब बकवास बंद कर और जल्दी अपना हथियार निकाल.. और ठोक मुझे.. " कहते हुए शीला ने अपने ब्लाउस के अंदर से अपना एक स्तन निकाला..

रसिक ने बड़े आराम से उनके खरबूजे जैसे बड़े स्तन को सहलाते हुए उनके घाघरे का नाड़ा खींचने की कोशिश की.. तब शीला ने उसका हाथ पकड़ लिया..

शीला: "रसिक, अगर वो लोग जल्दी आ गए तो कपड़े पहनने का समय नहीं मिलेगा.. तू घाघरा ऊपर कर और घुसा दे अंदर.. " रसिक ने अपनी खुरदरी हथेलियों से शीला की भोस को सहलाना शुरू कर दिया..

शीला: "कितना भारी और खुरदरा है तेरा हाथ.. !! ऐसा सहला रहा है जैसे लकड़ी छील रहा हो.. ओह्ह आह्ह रसिक.. चार दिन हो गई.. तेरा लंड देखे हुए.. जल्दी जल्दी बाहर निकाल.. " रसिक के पाजामे से उसका गधे जैसा लंड बाहर खींच निकाल शीला ने.. हाथ में लेते ही सिहर उठी शीला.. "हाय.. क्या मस्त मोटा है रे तेरा.. आई लव ईट.. !!" शीला ने मुठ्ठी में दबाकर हिलाना शुरू किया

रसिक ने अपनी दो उँगलियाँ शीला की गरम मेंदूवडे जैसी भोस के अंदर घुसेड़ दी और झुककर ब्लाउस के बाहर लटक रहे स्तन की निप्पल को मुंह में लेकर चूसने लगा..

चार दिन की भूखी शीला बेहद उत्तेजित होकर रसिक के फुँकारते हुए लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. देखते ही देखते रसिक के आधे से ज्यादा लंड को अंदर ले लिया.. रसिक से और रहा नहीं गया.. उसने शीला के मुंह से अपना लंड निकाला.. और उसे उठाकर बिस्तर पर पटक दिया.. फिर खुद ऊपर सवार हो गया..

शीला: "आह्ह रसिक.. जल्दी घुसा.. वो लोग आते ही होंगे अभी.. आज अगर मेरी चुत को प्यासी छोड़ेगा तो माँ चोद दूँगी तेरी" अपनी उंगली पर थूक लगाकर खुद ही चुत का दाना रगड़ने लगी शीला.. रसिक तुरंत झुककर शीला के भोसड़े पर पहुँच गया.. दो उंगलियों से चुत की फांक चौड़ी करके उसने अपनी जीभ अंदर घुसा दी.. रसिक की भोस चटाई देखकर शीला को मदन की याद आ गई.. माय गॉड.. मदन कभी कभी एक घंटे तक मेरी चुत चाटता था.. कितना शौकीन था वो.. मेरा प्यार मदन..

रसिक चटखारे लगाते हुए शीला की चुत के अंदरूनी हिस्सों को अपनी जीभ से कुरेद रहा था.. शीला दोनों हाथों से अपने सख्त बबलों को दबा रही थी और मुख मैथुन का मज़ा ले रही थी.. शीला की कामुकता ने रसिक को ओर उत्तेजित कर दिया.. वो अपने रफ हाथों से शीला के कोमल चरबीदार शरीर को सहला रहा था..

काफी देर तक जब रसिक शीला की चुत का रस ही चाटता रहा तब शीला से रहा नहीं गया.. "मैं मर जाऊँगी रसिक.. प्लीज.. अब डाल भी दे अंदर.. बहोत तेज खुजली हो रही है मुझे.. भांप निकल रही है मेरे छेद में से.. " रसिक ने शीला की दोनों जांघों को चौड़ा किया और बीच में बैठ गया.. अपना तगड़ा.. गरम अंगारे जैसा लंड उसने शीला के छेद पर रखा.. लंड का स्वागत करने के लिए शीला का भोसड़ा अविरत रस छोड़ रहा था.. रसिक अपना सुपाड़ा शीला की चुत के होंठों पर रगड़ रहा था.. वासना से तपकर शीला का चेहरा सुर्ख लाल हो गया था.. दोनों स्तन ब्लाउस के बाहर लटक रहे थे.. रसिक अपने सुपाड़े से शीला की चुत को छेड़ता ही रहा... शीला की क्लिटोरिस जामुन जैसी बड़ी हो गई थी.. लंड के रगड़ने से उत्तेजित होकर शीला अपने चूतड़ ऊपर नीचे कर रही थी

शीला से अब रसिक की ये छेड़छाड़ और बर्दाश्त नहीं हुई

शीला: "भेनचोद रसिक.. इतना क्यों तड़पा रहा है मुझे? अगर तू ऊपर ऊपर से रगड़ने में ही झड गया तो तेरी गांड में झाड़ू घुसेड़कर मोर बना दूँगी.. जल्दी डाल अंदर.. मस्त सख्त हो गया है "

शीला की बातों को अनसुनी कर रसिक उसके स्तनों को मसल रहा था

शीला: "अबे चूतिये.. डाल अंदर" रसिक ने एक जोर का धक्का लगाया और उसकी चुत को चीरते हुए पूरा लंड अंदर चला गया

शीला: "मर गई मादरचोद.. ऐसे एकदम से कोई डालता है क्या?? पेट में दर्द होने लगा मुझे.. नाभि तक घुस गया तेरा मूसल"

रसिक: "अरे भाभी.. ऐसे ही चोदने में मजा आता है.. लंड जब अचानक अंदर डालो तब इतना मज़ा आता है मुझे.. " पहाड़ जैसे रसिक की काया शीला के शरीर के ऊपर मंडराने लगी.. उसके मजबूत शरीर से दबकर अजीब सी तृप्ति मिली शीला को..

रसिक के भारी भरकम शरीर के नीचे दबकर मजबूत धक्कों का मज़ा लेती हुई शीला मन ही मन कविता का शुक्रियादा कर रही थी.. उसके कारण ही आज उसकी चुत की भूख मिट रही थी..

शीला: "जोर से धक्के लगा रसिक.. " रसिक शीला के चूतड़ों को अपने नाखूनों से कुरेद रहा था.. उसका काला शरीर, शीला के गोरे बदन पर पटखनिया खा रहा था..

"आह्ह भाभी.. इस उम्र में भी काफी चुस्त है आपके बॉल.. " रसिक जबरदस्त ताकत के साथ शीला की भोस में धक्के लगा रहा था..

"और जोर से रसिक.. जोर लगा.. नाश्ता नहीं किया था क्या.. लगा दम.. आह्ह बहोत मज़ा आ रहा है.. "

रसिक शीला के उरोजों को ब्लाउस के ऊपर से मसलते हुए उसके कोमल सुर्ख होंठों को मस्ती से चूसते हुए धमाधम पेल रहा था.. दोनों ने धक्के लगाने और खाने में अपनी लय हासिल कर ली थी और उत्तेजनावश एक दूसरे के जिस्मों को नोच रहे थे.. रसिक की ऊर्जा देखकर शीला आफ़रीन हो गई.. वाह.. लगा दम.. फाड़ दे मेरी.. रसिक.. वाह क्या लंड है तेरा.. उन लोगों के लौटने से पहले खल्लास कर दे मुझे.. रसिक्ककककक.. !!!
 
शीला बेहद कामुक आवाज में उत्तेजक बातें बोल बोल कर उसे संभोग की पराकाष्ठा तक ले गई.. रसिक अप्रतिम तेजी से शीला को चोदे जा रहा था.. उसके आखिरी दस पन्द्रह धक्के तो ऐसे जोर के लगे के शीला की आँखों में पानी आ गया.. शीला का पूरा शरीर अकड़ गया और वो झटके मारते हुए झड़ने लगी.. रसिक के विकराल लंड का अपनी चुत के पानी से अभिषेक करते हुए शीला की सांसें ऐसे फूल चूकी थी जैसी माउंट एवरेस्ट चढ़कर आई हो.. शीला ने अपनी मंजिल प्राप्त कर ली थी लेकिन रसिक का सफर अभी बाकी था

भोस के झड़ जाने के बाद रसिक के धक्कों से शीला को अब दर्द हो रहा था.. अपने शरीर के ऊपर से रसिक को हटाने के लिए वह धक्के मारने लगी.. "बस कर रसिक... बहुत हुआ.. मेरा हो चुका है.. उतर नीचे.. मेरा दम घुट रहा है.. कितना वज़न है तेरा साले.. मर जाऊँगी मैं.. ऊहह आहह बस कर कमीने.. प्लीज छोड़ दे.. हाथ जोड़ती हूँ मैं तेरे" पर रसिक पर शीला की बातों का कोई असर नहीं हुआ.. उसने अविरत स्पीड से शीला की भोस में अपना मूसल घुसाना जारी रखा.. आखिर शीला की भोस की गहरी खाई में.. रसिक की मर्दानगी सिर पटक पटक कर हार गई.. उसके लंड से छूटी वीर्य की पिचकारी के साथ शीला की आँखें फट गई.. डोरे ऊपर चढ़ गए.. रसिक एक पल के लिए डर गए.. कहीं शीला भाभी सिधार तो नहीं गई.. पर उसकी सांसें चलती देख रसिक की जान में जान आई

शीला ने रसिक को तब तक जकड़े रखा जब तक उसके वीर्य की आखिरी बूंद चुत में चूस न ली.. रसिक ने अपना लंड शीला के भोसड़े से बाहर निकाला.. उसके लंड की दशा ऐसी थी जैसे रस निकल जाने के बाद कोल्हू से गन्ना निकला हो.. अपने ही लंड पर रसिक को दया आ गई..

"मज़ा आ गया भाभी.. जबरदस्त हो आप तो"

"रसिक.. तेरा ये जुल्म तो मैं और रूखी ही बर्दाश्त कर सकते है.. आज कल की जीरो फिगर वाली लड़कियों के ऊपर अगर तू चढ़ें तो एक ही मिनट में उनकी जान निकल जाएँ.. तूने किया है कभी पतली जवान लड़की के साथ?"

"नहीं भाभी.. ऐसी मेरी किस्मत कहाँ !!"

"करना भी मत.. कहीं कोई मरमरा गई तो जैल जाना पड़ेगा"

"भाभी, दिल तो बहोत करता है.. एक बार किसी शहरी फेशनेबल पतली लड़की को जमकर चोदने की.. आप के ध्यान में है कोई? मुझे तो ये पतली कमर वाली.. गॉगल्स पहन कर एक्टिवा चलाती हुई नाजुक परियों को देखकर ही पटककर चोद देने का मन करता है.. उनकी पूत्तियाँ कैसी होगी भाभी.. !! संकरी सी.. छोटी छोटी.. " रसिक अपने मुरझाए लंड को हिलाने लगा

"बहोत हुई बकवास तेरी.. अब निकल यहाँ से इससे पहले की वो लोग आ जाएँ" रसिक के लंड को फिर से उठता देख शीला की गांड फट गई

"भाभी.. मैंने जो कहा वो याद रखना.. आप के ध्यान में अगर ऐसी कोई लड़की आए तो.. " पजामा पहनते हुए रसिक ने कहा

"अगर कोई ध्यान में आए तो बताऊँगी"

"जरूर बताना भाभी.. आधी रात को दौडा चला आऊँगा.. "

"ठीक है.. रूखी को मेरी याद देना.. "

"हाँ भाभी.. वो भी आपको बहोत याद करती है.. आइए कभी मेरे घर !!"

रसिक चला गया.. चुत ठंडी हो जाने पर शीला मस्त होकर बिस्तर पर लेट गई..

..............................
 
इस तरफ कविता, वैशाली और पीयूष वापीस आने के लिए निकले.. कविता को चिंता हो रही थी की कहीं शीला भाभी और रसिक का प्रोग्राम अब भी चल रहा होगा तो??"मैंने मिसकॉल तो किया था पर शायद उन्हों ने न सुना हो !! क्या करू? फिर से मिसकॉल करू? नहीं नहीं.. पीयूष और वैशाली को शक हो जाएगा.. कविता ने पीयूष की ओर देखा.. वैशाई के पीले टीशर्ट से उभरकर दिख रहे सूडोल उरोजों को ताड़ रहे पीयूष को देखकर कविता सोचने लगी..

ये पीयूष को सभी लड़कियों के स्तनों में ही क्यों इतनी दिलचस्पी है!! ये वैशाली भी पक्की चुड़ैल है.. एक तरफ बोलती है की मैं हिम्मत से प्यार करती हूँ.. और दूसरी तरफ मेरे पति के साथ फ्लर्ट कर रही है.. कहीं ये पीयूष से चुदवाने की फिराक में तो नहीं है!! नहीं नहीं.. वैशाली ऐसा नहीं कर सकती..पर कुछ कह नहीं सकते.. वैसे मैं भी कहाँ दूध की धुली हूँ !!

शीला भाभी ने जब रसिक के साथ सेटिंग करने की बात कहीं तब मैं भी कैसे तैयार हो गई थी!! इशशश रसिक की याद आते ही कविता को याद आया की शीला भाभी ने वादा किया था की आज रसिक से उसकी बात करेगी.. तब तो आज भाभी ने बात कर भी ली होगी अब तक.. बाप रे.. कविता.. एक दूधवाले के साथ करेगी?? शर्म भी नहीं आती तुझे? हम्म कोई बात नहीं.. आँखों पर पट्टी बांधकर करवा लूँगी.. पर एक बार मोटे लंड में कैसा मज़ा आता है वो तो अनुभव करना ही है.. बीपी में सब फिरंगी राँडें काले हबसीओ के गधे जैसे लंड से कितनी आराम से चुदती है.. !! शीला भाभी के घर पर ही तो देखा था टीवी पर.. जो होगा देखा जाएगा.. शर्म तो बड़ी आएगी पर मोटे लंड का स्वाद लेने के लिए इतनी शर्म तो निगलनी ही पड़ेगी.. एक बार करवा लेने पर सारी शर्म हवा हो जाएगी

"अब उतरेगी भी या ऑटो वाले के साथ ही जाएगी?? " खयालों में खोई कविता को पीयूष ने टोका.. कविता तंद्रा से बाहर निकली.. "ओह... इतनी देर में घर आ भी गया?"

पीयूष "मैं भी वही सोच रहा था.. इतनी देर में घर आ भी गया?" ऑटो में बैठे तब से पीयूष अपनी कुहनी से वैशाली के स्तनों को छु रहा था... उसने वैशाली की ओर देखा.. उसने शरमाकर नजरें झुका ली.. कविता अपने खयालों में खोई हुई थी इस बात का पीयूष ने पूरा फायदा उठाया था आज

वैशाली अपने घर के दरवाजे पर पहुंची.. पीयूष उसे अंत तक जाते हुए देखता रहा.. उसे आशा थी की वैशाली पलट कर देखेगी जरूर.. उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा..

"तय होती है मोहब्बत पलट कर देखने से ही.. सिर्फ मिलना ही इश्क का सबूत नहीं होता"

पीयूष के मन का मोर तब नाच उठा जब वैशाली ने अंदर जाने से पहले उसे पलट कर देखा और हाथ हिलाकर गुड नाइट भी कहा.. कितनी माहिर होती है ये लड़कियां.. लड़कों को लट्टू बनाने में!!

शीला ने वैशाली से होटल के बारे में पूछा.. वैशाली ने पीयूष की हरकतों को छोड़.. बाकी सारी बातें बताई..

"मम्मी.. तूने खाना खाया की नहीं?"

शीला ने मन में कहा "बेटा मैं कभी भूखी नहीं रहूँगी.. मेरे पास बहोत रास्ते है अपनी भूख मिटाने के.. "

"हाँ बेटा.. खा लिया" मुस्कुरा कर शीला ने कहा.. वैशाली सोचने लगी.. मम्मी आज बेवजह मुस्कुरा क्यों रही है !!

वैशाली को खुश देखकर शीला के दिल को तसल्ली मिली.. अपने वैवाहिक जीवन से त्रस्त वैशाली को कुछ तो खुशी मिली.. ये संजय भी नजर नहीं आया अब तक.. चार दिन हो गए एक बार भी घर पर नहीं आया और वैशाली को फोन भी नहीं किया उसने.. वैशाली ने भी सामने से फोन नहीं किया.. दोनों के बीच की अनबन काफी गंभीर मालूम होती है..

माँ बेटी ने साथ बैठकर टीवी पर "अनुपमा" की ज़िंदगी की तकलीफें देखी और फिर सो गई।

बिस्तर पर लेटे लेटे वैशाली को हिम्मत के संग की चुदाई याद आ गई.. साथ ही साथ पीयूष की हरकतें भी.. शीला रसिक के मूसल को याद करते हुए गीली होने लगी.. पता नहीं क्यों.. बिस्तर पर लेटते ही शीला के दिमाग की सेक्स फैक्ट्री चालू हो जाती थी.. कमरे में अंधेरा था.. शीला ने चादर ओढ़कर अपने गाउन के अंदर हाथ डाल दिया.. वैशाली की चुत में भी खुजली उठी थी.. उसे पीयूष की कही बात याद आ रही थी "क्यों न हम फिर से पहले की तरह नादान और नासमझ बन जाएँ!!"

पीयूष अब भी उस पर फिदा है ये वैशाली जान छुकी थी.. वैशाली ने मुड़कर शीला की विशाल छातियों को देखा.. मम्मी ने इस उम्र में भी खुद को कैसे मैन्टैन कर रखा है !!

वैशाली की नज़रों से बेखबर शीला अपनी चार उँगलियाँ भोसड़े में डालकर अंदर बाहर कर रही थी.. उस तरह की वैशाली को भनक भी न लगे.. पर उसकी सांसें फूल गई थी और वो तेजी से सांस ले रही थी.. आखिर वैशाली भी एक स्त्री थी.. शीला की चुत जिस तरह रस रिस रही थी.. उसकी गंध भी वैशाली के नथुनों तक पहुँच गई थी... माय गॉड.. मम्मी मास्टरबेट कर रही है!! वैशाली शरमा गई.. हाँ.. वही कर रही है मम्मी.. ध्यान से देखने पर उसे शीला के हाथ की हलचल भी नजर आने लगी.. ये देखकर वैशाली से भी रहा न गया.. उसने अपनी चुत पर हाथ फेरा.. गीली हो गई थी उसकी मुनिया..

अचानक शीला ने एक लंबी सांस छोड़ी और पलट कर सो गई.. वैशाली भी पीयूष और हिम्मत को याद करते हुए अपनी भड़कती चुत को सहलाने लगी.. उसका दूसरा हाथ स्तनों को मरोड़ रहा था.. उंगलियों से रगड़ते हुए वो भी झड़ गई.. माँ और बेटी एक ही बिस्तर पर मूठ लगाकर सो गई। करवट लेकर सो रही शीला ने भी वैशाली की आहें सुनी और अंदाजा लगा लिया की उसकी पीठ पीछे वो क्या कर रही थी

रात के तीन बजे शीला पानी पीने के लिए उठी.. किचन में जाकर पानी पीने के बाद जब वह लौटी तब उसने देखा की कमरे की खुली खिड़की से चाँद की किरणे वैशाली पर पड़ रही थी। उसने चादर नहीं ओढ़ राखी थी.. गाउन के ऊपर के तीन बटन भी खुले थे.. रात को सोते समय वो ब्रा निकाल देती थी ये शीला जानती थी.. शीला करीब आकर उसके गाउन के बटन बंद करने लगी.. बटन बंद करते हुए बेटी के उभारों को नरम भाग पर उंगली का स्पर्श होते ही शीला सहम गई.. मन में उठ रहे हलकट विचारों को धकेल कर उसने वैशाली का गाउन ठीक किया और उसके बगल में सो गई।

"ये मुझे आज क्या हो रहा है? जिसे भी देखूँ बस सेक्स के विचार ही आते है.. अच्छा हुआ की वैशाली नींद में थी वरना मेरे बारे में क्या सोचती?" शीला को अपने ही विचारों से भय लगने लगा

सुबह पाँच बजे रसिक दूध देने आया.. वैशाली अंदर के कमरे में सो रही थी फिर भी शीला ने रसिक को अपने स्तन चूसने दिए.. उसका लंड हिलाया.. और उसके गाल और होंठ पर एक जबरदस्त किस भी दी.. उसके बाद ही उसे जाने दिया.. ज्यादा कुछ कर पाना मुमकीन नहीं था.. शीला अपने रोज के कामों में व्यस्त हो गई.. वैशाली को उसने देर तक सोने दिया..

थोड़ी देर बाद वैशाली जाग गई.. अंगड़ाई लेते हुए वो बाहर झूले पर बैठे हुए ब्रश पर टूथपेस्ट लगाने लगी.. शीला किचन में मशरूफ़ थी.. वैशाली ने पीयूष के घर की तरफ देखा.. पर वो नजर नहीं आया.. कल भी वो इसी तरह झूले पर बैठी थी पर तब उसे पीयूष के घर की ओर देखना का खयाल नहीं आया था तो अब क्यों आ रहा था !!! ताज्जुब हुआ वैशाली को.. तभी अनुमौसी बाहर आई

अनुमौसी: "कैसी हो बेटा? लगता है अभी अभी जागी हो"

वैशाली: "हाँ मौसी.. बहोत अच्छी नींद आई तो देर तक सोती रही"

अनुमौसी: "यही तो है मायके का सुख.. ना कोई बंधन ना कोई जिम्मेदारी.. जैसे ही ससुरत लौटो की फिर से जैल में कैद.. ये मेरी कविता को ही देख लो.. पीयूष को जल्दी ऑफिस जाना होता है इसलिए वो बेचारी पाँच बजे उठकर खाना बनाती है.. इससे पहले जो नौकरी थी वो अच्छी थी.. ये वाली ऑफिस जरा दूर है इसलिए पीयूष को जल्दी निकलना पड़ता है.. बेचारा मेरा बेटा रात को वापीस लौटते लौटते थक जाता है..बहुत महेनती है मेरा बेटा"

वैशाली: "हाँ मौसी.. पीयूष बहोत ही अच्छा लड़का है" बोलने के बाद खुद को चाटा मारने का मन किया वैशाली को.. क्या बोलने की जरूरत थी मौसी के आगे !!!

मौसी और कुछ पूछती उससे पहले वैशाली ही वहाँ से उठी और सीधी बाथरूम चली गई.. नहा कर और फ्रेश होकर वो अप-टू-डेट फेशनेबल कपड़े पहनकर तैयार हो गई और शीला के पास आई। उसके छोटे तंग वस्त्रों से आधे से ज्यादा जिस्म बाहर झलक रहा था

शीला: "बेटा, तू छोटी नहीं रही.. ऐसे कपड़े पहनना शोभा नहीं देता.. कुंवारी थी तब तक सब ठीक था.. देख तो सही कितने टाइट कपड़े है!! शादी के बाद ऐसे अधनंगे कपड़े पहनकर मैं तुझे बाहर नहीं जाने दूँगी.. शर्म भी नहीं आती तुझे "

जवाब में वैशाली ने शीला के गालों पर हल्के से किस की और हँसते हँसते बेडरूम में चली गई

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मौसी की बातों से वैशाली को पता चल गया की पीयूष सुबह ७ बजे ऑफिस के लिए निकल जाता है.. पूरा दिन नौकरी पर रहता था तो उसे देख पाना मुमकीन नहीं था.. रात को भी वो देर से घर आता और फिर कविता और वैशाली जब वॉक लेने निकलते तभी उसकी झलक वैशाली देख पाती। दूसरी तरफ पीयूष का भी यही हाल था.. वैशाली के दीदार के लिए वो भी तड़पता रहता था.. पर काफी कोशिशों के बाद भी उसे निराशा ही हाथ लगी। दोनों के मन में "नादान और नासमझ" बनने की बड़ी तीव्र चूल उठ रही थी

एक रात को करीब दस बजे.. रोज की तरह कविता और वैशाली वॉक लेकर लौटे और कविता के घर की छत पर ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। घर के अंदर बैठे पीयूष का बड़ा मन कर रहा था की वो भी ऊपर छत पर उन दोनों के साथ बैठे। पर बिन बुलाए मेहमान की तरह जाना उसे पसंद नहीं था। मन तो वैशाली का भी बहुत था की पीयूष ऊपर उनके पास आए..

कविता और वैशाली की दोस्ती इतनी गाढ़ी हो छुकी थी की वो दोनों एक दूसरे को अपनी सारी बातें बताने से हिचकिचाते नहीं थे.. कविता ने अपने और पिंटू के बारे में सारी कथा सुनाई.. वैशाली ने भी अपने जीवन की कुछ ऐसी बातें बताई जो केवल वो ही जानती थी.. रात को देर तक बैठे बैठे वो दोनों दुनिया भर की बातें करती रहती.. उनकी दोस्ती से शीला भाभी या अनुमौसी को कोई हर्ज नहीं था.. आखिर दोनों लड़कियां थी

एक हफ्ता बीत गया पर ना संजय का फोन आया और ना ही वैशाली ने उसे फोन किया.. ये बात शीला को बहुत परेशान कर रही थी.. शीला को यकीन था की अगर वो वैशाली से इस बारे में पूछेगी तो वो सीधे सीधे जवाब नहीं देगी.. उससे असलियत उगलवाने का कोई तरीका ढूँढने लगी शीला

दूसरी रात जब वैशाली और कविता वॉक लेने गए तब शीला ने ही संजय को फोन लगा दिया.. बियर बार में बैठकर अपनी सहकर्मी प्रेमिला के साथ शराब पीते हुए और उसकी जांघों को सहलाता हुआ संजय, फ्लोर पर नाच रही अधनंगी डांसरों के लटके झटके देखकर ठंडी आहें छोड़ रहा था। सुंदर स्तनों को उछलती हुई एक बार डांसर संजय के करीब आई और झुककर अपनी गहरी गली दिखाकर टिप मिलने की आशा में खड़ी रही.. बियर बार की तमाम रस्मों से वाकिफ प्रमिला से संजय के हाथों में १०० का नोट थमा दिया जिसे संजय ने उस लड़की के दो स्तनों के बीच दबा दिया.. उसी वक्त उसका फोन बजा और स्क्रीन पर सासु माँ का नाम देखकर वो चोंक उठा

"एक्सकयुज मी डार्लिंग.. " प्रमिला का गाल को थपथपाकर संजय फोन पर बात करने के लिए बियर बार के कोलाहल से बाहर निकला और फोन उठाया

"हाँ मम्मी जी, कैसी हो आप?"

"मैं ठीक हूँ.. आप कैसे है? घर पर आपके मम्मी पापा की तबीयत कैसी है?"

"सब ठीक है.. आपकी तबीयत कैसी है? काफी दिन हो गए, व्यस्तता के कारण वैशाली को फोन नहीं कर पाया.. अभी फोन करता हूँ उसे" सिगरेट जलाते हुए संजय ने कहा

शीला: "हाँ हाँ कोई बात नहीं.. वैशाली आपको बहुत याद करती है.. कब आ रहे हो घर? वो तो कह रही थी की बस चार दिन का ही काम था.. अभी तक खतम नहीं हुआ?"

संजय: "अरे नहीं मम्मी जी, काम तो चार दिन का ही था पर जिस पार्टी को मुझे मिलना था वो कहीं बीजी है इसलिए अब तक मिलना नहीं हुआ.. और एक दो दिन लग जाएंगे मुझे "

काफी देर हो गई पर संजय लौटा नहीं इसलिए प्रमिला दरवाजा खोलकर बाहर निकली और पीछे से आवाज लगाई "संजु डार्लिंग, कितनी देर लगा रहे हो !! जल्दी आओ ना !!"

संजय ने चोंक कर पीछे देखा और अपने होंठ पर उंगली रखकर शशशशशश करते हुए प्रमिला को चुप रहने का इशारा किया और फिर शीला से बात करने लगा.. पर शीला ने प्रमिला की आवाज को साफ साफ सुन लिया था.. शीला अनुभवी थी.. उसने संजय से उस लड़की के बारे में कुछ भी नहीं पूछा.. संजय को यही प्रतीत हुआ की सासु माँ ने प्रमिला की आवाज नहीं सुनी होगी वरना वो इस बारे में जरूर पूछती..

शीला जानबूझकर यहाँ वहाँ की बातें कर रही थी.. और बेकग्राउंड की आवाज़ें सुनकर अनुमान लगा रही थी की संजय कहाँ होगा.. तभी संजय ने ये कहकर फोन काट दिया की उसका बॉस उसे बुला रहा था इसलिए उसे फोन काटना पड़ेगा। संजय की इस हरकत से शीला का शक यकीन में बदलने लगी.. कौन होगी वो लड़की जो संजय को डार्लिंग कह कर बुला रही थी?

वैशाली ने शीला को बताया था की संजय पैसे उड़ाता है और कुछ कमाता नहीं है.. सब से उधार लेकर गायब हो जाता है ये भी पता था.. लेकिन वैशाली ने कभी किसी पराई औरत के बारे में कभी कुछ नहीं कहा था.. हालांकि संजय की गंदी नजर का अनुभव तो ऐसे सालों पहले हो ही चुका था.. पर उसने ये सोचकर अपने मन को समझा लिया था की सारे मर्दों की नजर ऐसी ही होती है.. उसके पति की नजर भी वैसी ही थी

शीला दामाद को बेटे समान मानती थी.. फिर जिस तरह संजय उसके स्तनों को भूखी नज़रों से ताकता रहता.. शीला अस्वस्थ हो जाती.. इन मर्दों को बस एक ही बात समझ में आती है.. मौका मिलते ही स्त्री को फुसलाओ और उसकी टांगें खोलकर चोद दो.. मन ही मन में वो दुनिया के सारे मर्दों को गालियां दे रही थी.. कौन होगी वो लड़की जिसने संजय को डार्लिंग कहकर पुकारा था??

वो लड़की जो भी हो.. उस लड़की से उलहकर संजय वैशाली का जीवन बर्बाद करें वो शीला बर्दाश्त करने वाली नहीं थी.. साला समझता क्या है अपने आप को? उसका बस चलता तो संजय को दो चाटे लगाकर उसका दिमाग ठिकाने पर ले आती.. पर बात वैशाली के वैवाहिक जीवन की थी.. और उसे बचाने के लिए झगड़ा करना कोई उपाय नहीं था.. एक विचार ऐसा भी आया की कहीं दोष वैशाली का तो नहीं होगा ना !! ये जांच भी करना आवश्यक था। शीला ने वैशाली की सास को कलकत्ता फोन लगाया.. कैसे भी करके वो इस बात के मूल तक पहुंचना चाहती थी

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दूसरे दिन वैशाली बड़ी जल्दी जाग गई.. ये देख शीला चोंक गई.. वैशाली को देर तक सोना बेहद पसंद था.. तो आज ये जल्दी क्यों उठ गई होगी?

"गुड मॉर्निंग" कहते हुए मुंह में ब्रश डालकर वैशाली सीधे छत पर चली गई... सुबह के साढ़े छह बजे थे.. बाहर कोई खास चहल पहल नहीं थी.. थोड़ी सी ठंड थी और बड़ा आह्लादक वातावरण था.. निप्पल पर ठंडी हवा का स्पर्श होते ही वैशाली को झुरझुरी सी होने लगी.. सामने की छत पर पीयूष गुलाब के पौधों को पानी दे रहा था.. जिस काम के लिए वो जल्दी जागी थी वो मिशन सफल हो गया.. जो जागत है वो पावत है

वैशाली को देखते ही पीयूष के मन का मोर ताताथैया करने लगा.. उसने हाथ से इशारा करके वैशाली को गुड मॉर्निंग कहा.. वैशाली ने भी हाथ से इशारा किया.. वैशाली के नाइट ड्रेस से उभरकर नजर आ रहे बड़े बड़े स्तन देखकर पीयूष के लंड में झटका लगा.. क्या माल लग रही है यार !! पहले तो इतनी सुंदर नहीं थी ये.. शादी के बाद लंड के धक्के खा खा कर इसका रूप ही निखर गया है.. कविता भी चुद चुद कर कैसी खिल गई है.. जिस दिन ना चोदो उस दिन मुरझाई सी रहती है.. स्त्री का सबसे बेस्ट मेकअप है लंड.. रोज लंड मिले तो हर स्त्री सुंदर और खिली खिली ही रहेगी.. पीयूष वैशाली को ऐसे तांक रहा था जैसे वो नंगी खड़ी हो..

इन दोनों का नैन-मटक्का चल रहा था तभी कविता भी छत पर आई.. पीयूष की पतंग आसमान में उड़ने से पहले ही कट गई.. वैशाली भी ऐसे अस्वस्थ हो गई जैसे रंगेहाथों पकड़ी गई हो.. कविता की तरफ देखे बगैर ही वो सीढ़ियाँ उतर गई..

"आज तो बड़ी देर लगा दी तूने.. बहोत पानी पीला दिया क्या पौधों को?" कविता ने एसीपी प्रधयुमन की तरह पूछताछ शुरू की

"मैं.. नहीं वो.. वो तो जरा.. बात दरअसल ये है की.. " पीयूष बॉखला गया "तू समझ रही है ऐसा कुछ भी नहीं है.. मैं तो पौधों को पानी दे रहा था" पीयूष के शब्दों में सिमेन्ट कम और रेत ज्यादा थी..

कविता: "पर मैंने कब कहा की तू वैशाली को देख रहा था???? पर अच्छा हुआ जो तेरे दिल में था वो होंठों पर आ ही गया.. कर ले एक बार वैशाली के साथ.. तुझे भी चैन मिलेगा और वैशाली को भी !!" पीयूष की कमर पर चिमटी काटते हुए हंस रही थी कविता

"क्या सच में? क्या बात कर रही है तू?" पीयूष को समझ नहीं आया की वह क्या बोले.. बोलने के बाद उसे एहसास हुआ की "क्या सच में?" बोलकर उसने कितनी बड़ी गलती कर दी थी.. वो कविता को धमकाने लगा

"क्या तू भी.. कुछ भी बोलती रहती है.. तुझे तो मुझ पर विश्वास ही नहीं है.. जब देखों तब शक करती रहती है" मर्दों का ये हथियार है.. जब भी वो गलत हो तब पत्नी को धमका कर चुप करा देना.. !!

कविता भी कुछ कम नहीं थी.. उसे इस बात का गुस्सा आया की रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद पीयूष उसे धमका रहा था

"अब रहने भी दे पीयूष.. ज्यादा शरीफ मत बन समझा.. सालों पहले तूने और वैशाली ने क्या गुल खिलाए थे मुझे सब पता है"

अरे बाप रे.. पीयूष की गांड ऐसे फटी की सिलवाने के लिए दर्जी भी काम न आए

"क्या कुछ भी बकवास कर रही है.. कोई काम-धाम है नहीं बस पूरे दिन बातें करा लो.. मुझे ऑफिस जाने में देर हो रही है.. टिफिन तैयार किया या नहीं? बड़ी मुश्किल से मिली है ये नौकरी.. तू ये भी छुड़वा देगी " गुस्से से पैर पटकते हुए पीयूष ने कहा.. कविता को लगा की आज के लिए इतना डोज़ काफी था.. पर जाते जाते उसने सिक्सर लगा दी

"हाँ हाँ टिफिन तो कब से तैयार है.. ये तो तुझे आने में इतनी देर हुई इसलिए मैं ऊपर देखने चली आई.. तुम्हें डिस्टर्ब करने का मेरा कोई इरादा नहीं था.. तुम शांति से पौधों को जितना मर्जी पानी पिलाते रहो.. सारे पौधे तृप्त हो जाए बाद में नीचे चले आना" कविता गुस्से से सीढ़ियाँ उतर गई

"ये कविता साली मुझे आराम से देखने भी नहीं देती.. तो चोदने कैसे देगी? भेनचोद ये पत्नीयों को कैसे समझाए? पति थोड़ा बहुत फ्लर्ट करें तो इसमें कौनसा पहाड़ टूट पड़ता है ये समझ नहीं आता.. कोई कदर ही नहीं है कविता को मेरी.. बहोत गुस्सा आया उसे कविता पर.. लेकिन देश के अन्य मर्दों की तरह वो भी अपनी पत्नी के सामने लाचार था.. जीरो पर आउट होकर पेवेलियन में जिस तरह बेट्समेन नीची मुंडी करके लौटता है वैसे ही पीयूष सिर नीचे झुकाकर सीढ़ियाँ उतारने लगा

कविता को आज पीयूष की फिरकी लेने का मस्त मौका मिला था.. और कोई भी पत्नी ऐसे मौके को छोड़ती नहीं है। पीयूष को सीढ़ियाँ उतरते देख कविता ने कहा "नीचे ध्यान से देखकर उतरना.. कहीं गिर गया तो तेरी देखभाल करने कोई पड़ोसन नहीं आएगी.. वो तो मुझे ही करना होगा इतना याद रखना तुम"

पीयूष चुपचाप टिफिन लेकर ऑफिस के लिए रवाना हो गया.. वो गली के नुक्कड़ तक पहुंचा ही था की तभी उसने रिक्शा में बैठी वैशाली को देखा.. रोता हुआ बच्चा चॉकलेट को देखकर जैसे चुप हो जाता है.. वैसे ही वैशाली को देखकर पीयूष के मन का सारा गुस्सा भांप बनकर उड़ गया..वैशाली ने पीयूष को ऑटो में बैठने को कहा और ऑटोवाले से बोली की यहाँ से निकलकर ऑटो को आगे खड़ा करें.. ताकि इस इलाके से बाहर निकालकर आगे की योजना के बारे में सोच सकें।

"अब बता पीयूष.. किस तरफ लेने के लिए कहू?" वैशाली ने सीधे सीधे पूछ लिया.. पीयूष ने अपनी ऑफिस का पता बताया

"ऑफिस की बात नहीं कर रही.. अरे बेवकूफ तुझे नादान और नासमझ नहीं बनना है?? " वैशाली ने आँखें नचाते हुए नटखट आवाज में कहा

पीयूष हक्का बक्का रह गया.. अपनी माँ पर ही गई है ये लड़की.. बात को घुमाये बगैर सीधा सीधा बोलने की आदत दोनों को है.. पीयूष को ऑफिस में आज बेहद जरूरी काम था.. दूसरी तरफ वैशाली नाम का जेकपोट हाथ में आया था उसे भी जाने नहीं दे सकता था.. पीयूष उलझन में पड़ गया

स्किनटाइट जीन्स और व्हाइट केप्रि पहने बैठी वैशाली ने अपना एक हाथ पीयूष के कंधे पर रख दिया.. उसी के साथ वैशाली का एक तरफ के स्तन की झलक पीयूष को दिख गई.. ओह्ह। वैशाली ने एक ही पल में पीयूष के दिमाग को एक ही पल में बंद कर दिया

"अब जल्दी भोंक.. कहाँ जाना है?? ऑटोवाले भैया कब से पूछ रहे है"

"मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है वैशाली.. तू ही बता "

वैशाली को थोड़ा गुस्सा आया.. साथ ही साथ पीयूष के भोलेपन पर हंसी भी आई.. अभी भी ये पहले जैसा ही है.. लड़की को लेकर कहाँ जाते है वो तक पता नहीं है इसे..

"भैया.. अम्बर सिनेमा पर ऑटो ले लीजिए.. " ऑटो उस तरफ चलने लगी

"नहीं नहीं.. वहाँ नहीं.. उस सिनेमा की बिल्कुल बगल में मेरे दोस्त का घर है.. उसने देख लिया तो आफत आ जाएगी.. "

"तो फिर? कहाँ जाएंगे?" वैशाली सोचने लगी

"साहब, अगर आप लोगों को कोई सुमसान जगह की तलाश है तो मैं आपको ले जा सकता हूँ " ऑटो वाले ने कहा

"कहाँ पर?" वैशाली और पीयूष दोनों एक साथ बोले

"शहर के बाहर मेरा घर बन रहा है.. वहाँ कोई नहीं होता.. काम भी बंद है अभी.. मुझे जो ऊपर का खुशी से देना चाहते हो देना.. मेरी बीवी बीमार है.. मेरी भी थोड़ी मदद हो जाएगी.. " ऑटो वाले ने कहा

"ठीक है.. वहीं पर ले लो.. " वैशाली ने तुरंत फैसला सुना दिया..

लगभग पंद्रह मिनट में रिक्शा एक सुमसान खंडहर जैसी जगह पर आकर रुकी.. दीवारें थी पर प्लास्टर बाकी था.. अंदर कोई नहीं था.. आजूबाजू भी दूर दूर तक किसी का नामोनिशान नहीं नजर आ रहा था..

"आप वापिस कैसे जाओगे साहब? यहाँ ऑटो नहीं मिलेगी आपको.. "

"तुम दो घंटे बाद हमें लेने वापिस आना.. " वैशाली ने कहा

"मेरा नंबर सेव कर लीजिए.. फोन करेंगे तो १० मिनट में पहुँच जाऊंगा" ऑटो स्टार्ट कर वो निकल गया

वैशाली और पीयूष खंडहर के अंदर गए.. रेत के एक बड़े से ढेर पर वैशाली बैठ गई.. बिना अपने कपड़ों की परवाह कीये.. थोड़े संकोच के साथ पीयूष भी वैशाली के पास बैठ गया

काफी देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। थक कर आखिर वैशाली ने शुरुआत की

"पीयूष, २० मिनट से ज्यादा गुजर चुके है.. ऐसा ना हो की मुझे तुझ से जबरदस्ती करनी पड़े"

सुनते ही पीयूष ठहाका मारकर हंसने लगा.. "क्या यार वैशाली.. कुछ भी बोलती है... छोटी थी तब भी तू ऐसी ही नटखट थी"

"छोटी थी तब की बात है वो.. अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ पीयूष.. मेरी पसंद.. मेरा टेस्ट अब बदल चुका है"

"मतलब?? " पीयूष को समझ नहीं आया

रेत के ढेर पर बैठे पीयूष को धक्का देकर सुला दिया वैशाली ने.. और उसके होंठों पर अपने होंठ लगाते हुए उसके लंड को पेंट के ऊपर से दबाने लगी और बोली "छोटी थी तब मुझे लोलिपोप चूसना बहुत पसंद था.. अब मुझे ये चूसना पसंद है"

माय गॉड.. वैशाली के इस कामुक रूप को देखकर पीयूष हक्का बक्का रह गया.. ये लड़की तो एटमबॉम्ब से भी ज्यादा स्फोटक है.. !!

इतना कहते ही वैशाली, पीयूष के लाल होंठों को चूमते हुए उसके लंड को मुठ्ठी में मसलने लगी..

"बड़ा भी हुआ है या उतना ही है जितना आखिरी बार देखा था??" कहते हुए वैशाली ने पेंट की चैन खोलकर अन्डरवेर में से लंड पकड़कर बाहर निकाला.. लंड की साइज़ देखकर उसने "वाऊ.. " कहा..

"पीयूष.. अब ज्यादा वक्त बर्बाद मत कर.. ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा.. आज तुझे कलकत्ता का माल मिला है मजे करने के लिए.. ये देख मेरी रत्नागिरी आफुस.." भारी स्तनों वाली छाती को उभारते हुए दिखाकर वैशाली ने पीयूष को पागल बना दिया.. पीयूष बावरा होकर वैशाली के स्तनों को दबाने लगा.. "ओह्ह वैशाली.. पता है उस दिन जब हम होटल गए थे.. ये तेरे बड़े बड़े बबलों में ही मेरी जान अटक कर रह गई थी उस दिन.. जब हमने साथ में पहली बार किया तब तेरे कितने छोटे छोटे थे.. और जब बड़े हुए तब तू चली गई.. तुझे वो सब बातें याद भी है या भूल गई?"
 
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