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जंगल में लाश

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चौथा हादसा

चार बजे शाम को फ़रीदी दिन भर का थका-माँदा घर आया था। आज वह दिन भर ठाकुर दिलबीर सिंह के दोस्तों को टटोलता रहा था। डॉक्टर सतीश के घर की तलाशी तो उसने उसी दिन ले ली थी जिस दिन उसका क़त्ल हुआ था। मामूली नाश्ते के बाद वह अपने कुत्तों की देख-भाल में लग गया। उसके पास एक दर्जन कुत्ते थे और हर कुत्ता अपनी मिसाल था। उसके बहुत सारे शौक़ अजीबो-गरीब थे। उसे अजायब-घर में अलग-अलग क़िस्म के जानवर परिन्दे और कीड़े-मकौड़े जमा करने का भी शौक़ था। उसकी कोठी का एक कमरा दनिया की अजीबो-गरीब चीज़ों के लिए था। उनमें सब से ज़्यादा अजीबो-गरीब चीज़ अलग-अलग क़िस्मों के साँप थे। वह इन साँपों के बीच माहिर सपेरा लगता था। उनमें से कई ऐसे भी थे जिनके ज़हर की थैलियाँ वह ख़ुद निकाल चुका था। उसकी इन हरकतों पर उसके सारे साथी उसका मज़ाक़ उड़ाते थे। उनका ख़याल था कि वह अपनी शोहरत के लिए इस क़िस्म की अजीबो-गरीब हरकतें किया करता है।

कुत्तों को खाना खिलाने के बाद फ़रीदी अपने अजायब-घर की तरफ़ गया। जैसे ही वह दूसरे बरामदे की तरफ़ मुड़ा, उसे सरोज दिखायी दी जो अजायब-घर से निकल रही थी।

“तो आपको भी इसका शौक़ है।” वह मुस्कुरा कर बोली।

“क्यों? क्या हुआ? तुम डरीं तो नहीं। वहाँ कई बहुत ही ख़ौफ़नाक चीजें भी हैं।"

“आख़िर आपने इतने सारे साँप क्यों जमा कर रखे हैं।"

“पता नहीं क्यों मुझे साँपों से इश्क़ है।" फ़रीदी ने कहा।

“लेकिन फ़रीदी भैया, यह शौक़ ख़तरनाक भी है।

___ “लेकिन ये मेरे लिए पालतू कुत्तों की तरह बेजरर हैं।"

“तो फिर आपने इनका ज़हर निकाल दिया होगा।"

“नहीं, ऐसा तो नहीं...इनमें से बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनका ज़हर आज तक निकाला ही नहीं गया।"

"इन्हें खिलाता-पिलाता कौन है?"

“मैं ख़ुद!” फ़रीदी ने कहा। “आओ तुम्हें तमाशा दिखाऊँ।"

दोनों कमरे में दाखिल हुए, फ़रीदी एक अलमारी के क़रीब पहुँच कर खड़ा हो गया। अलमारी के दरवाजों में नीचे की तरफ़ बहुत सारे छोटे-बड़े छेद थे।

फ़रीदी ने एक अलग तर्ज़ की सीटी बजायी। अचानक फुकारों की आवाजें सुनायी दी और अलमारी के छेदों से साँप निकलने लगे। सरोज चीख कर पीछे हट गयी।

“डरो नहीं, ये केंचुओं से भी बदतर हैं, इनमें ज़हर नहीं।"

फ़रीदी ने मेज पर से दूध का बर्तन उठा कर ज़मीन पर रख दिया। सारे साँप उस पर टूट पड़े। फ़रीदी ने दूसरा बर्तन भी उठा कर उसी के क़रीब रख दिया। लेकिन वे सब पहले बर्तन पर पिले । पड़ रहे थे। वह उन्हें हाथ से हटा-हटा कर दूसरे बर्तन के क़रीब लाने लगा। यह देख कर सरोज फिर चीख़ पड़ी।

फ़रीदी हँसने लगा।

__ "डरो नहीं सरोज बहन, ये सब मेरे दोस्त हैं।'

“मुझे यह तमाशा बिलकुल अच्छा नहीं लगा। मैं ड्रॉइंग-रूम में आपका इन्तज़ार । करूँगी।” सरोज यह कह कर बाहर चली गयी।

दोनों बर्तन साफ़ कर लेने के बाद सारे साँप धीरे-धीरे अलमारी के छेदों में वापस चले गये। फ़रीदी ने थोड़ी देर ठहर कर चारों तरफ़ नज़रें दौड़ायीं और कुछ गुनगुनाता हुआ बाहर निकल आया।

सार्जेंट हमीद तेज़ क़दमों से अजायब-घर के कमरे की तरफ़ आ रहा था। फ़रीदी उसे देख कर रुक गया।

“कहो भई, क्या ख़बर है?"

“कोई ख़ास ख़बर नहीं। कोतवाली से आ रहा हूँ। अभी-अभी दिलबीर सिंह का नौकर आपके नाम एक ख़त दे गया है।"
 
फ़रीदी ख़त पढ़ने लगा।

"फ़रीदी साहब,

आदाब!

मुझे अपने कल के रवैये पर सख़्त अफ़सोस है। कल शायद ज़िन्दगी में पहली बार मुझे गुस्सा आया था। सरोज को समझाने की कोशिश कीजिएगा। ख़ुदा करे कि वह मुझे माफ़ कर दे। मैंने उसकी शान में बहुत ही बुरे अलफ़ाज़ इस्तेमाल किये हैं जिसके लिए मेरा ज़मीर मुझे दुत्कार रहा है। जब तक वह यहाँ न आ जायेगी, मुझे सुकून नहीं मिल सकता। ख़ुदा मेरे हाल पर रहम करे।

आपका,

ठाकुर दिलबीर सिंह"

"तो होश आ गया ठाकुर साहब को।" फ़रीदी ने कहा।

“और यह बहुत बुरा हुआ।" हमीद मुस्कुरा कर बोला।

“क्यों ?"

“मैं यह क्या जानें। लेकिन सरोज से इस ख़त के बारे में न बताइएगा।"

“आख़िर क्यों?" फ़रीदी ने ताज्जुब से पूछा।

“अरे, तो क्या वाक़ई आप...!” हमीद अधूरी बात करके चुप हो गया।

“अजीब आदमी हो। साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते। आख़िर बात क्या है?"

"क्या आप सचमुच सरोज को वापस भेज देंगे।"

__“तो इसमें ताज्जुब की क्या बात है।” फ़रीदी ने ड्रॉइंग-रूम की तरफ़ बढ़ते हुए कहा। ___“सुनिए तो सही!” हमीद उसे रोकते हुए बोला। “क्या वाक़ई आप सीरियसली कह रहे हैं।”

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“कहीं मैं तुम्हारी पिटाई न कर दूँ।” फ़रीदी ने हँस कर कहा। “बेकार ही भेजा चाटे जा रहे हो।'

“सिर्फ एक बात और पूछंगा।"

"फ़रमाइए!” फ़रीदी रुकते हुए हँस कर बोला।

“तो वाक़ई क्या आप सरोज..."

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“बकवास बन्द!" फ़रीदी झल्ला कर बोला।

सरोज ड्रॉइंग-रूम से निकल आयी और फ़रीदी कुछ कहते-कहते ख़ामोश हो गया। हमीद खिसियानी हँसी हँसने लगा।

“क्या बात है?” सरोज ने दोनों को ग़ौर से देखते हुए कहा। __

“कोई बात नहीं।” फ़रीदी कहता हुआ अन्दर चला गया। सरोज ने हमीद पर एक उचटती-सी नज़र डाली और वह भी चली गयी। हमीद थोड़ी देर तक खड़ा सिर खुजाता रहा। अचानक उसके होंटों पर शरारती मुस्कुराहट खेलने लगी। उसने इधर-उधर देखा और ज़ोर से चीख़ा। चीख़ की आवाज़ सुन कर फ़रीदी और सरोज बरामदे में निकल आये।

“अरे-अरे, क्या हुआ।” फ़रीदी, हमीद की तरफ़ झपटते हुए बोला।

"हमीद-हमीद...!'' वह उसे झंझोड़ कर पुकारने लगा।

“अभी तो अच्छे-भले थे।” सरोज ने कहा।

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___“न जाने क्या हो गया।” फ़रीदी ने हमीद के चेहरे पर झुकते हुए कहा।

"तो क्या आप वाक़ई सरोज...!" हमीद धीरे से बोला।

फ़रीदी ने झुंझला कर उसका मुँह दबा दिया।



“चुप रहो।” फ़रीदी उसका मुंह दबाये हुए चीख़ा।

“अरे-अरे...!” सरोज कहती हुई आगे बढ़ी। “यह आप क्या कह रहे हैं।'

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"तुम इसे नहीं जानतीं। मालूम नहीं कौन-सा शैतान इसके अन्दर घुस गया है।"

“आपकी तो कोई बात ही मेरी समझ में नहीं आती।” सरोज ने कहा।

“और मेरी बात!” हमीद उठते हुए जल्दी से बोला।

“अरे!” सरोज घबरा कर पीछे हट गयी।

"हमीद, अगर तुम अपनी शरारतों से बाज़ न आये तो अच्छा न होगा।" फ़रीदी ने नाराज़ होते हुए कहा।

“आप बहरहाल मेरे अफ़सर हैं।"

“आख़िर बात क्या है?” सरोज ने कहा।

"कुछ सरकारी मामले हैं।" हमीद मुस्कुरा कर बोला।

फ़रीदी उसे अब तक घूर रहा था।

“आओ चलें, इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है।'' फ़रीदी ने सरोज से कहा। हमीद बाहर खड़ा रहा और वे दोनों चले गये।

“आख़िर बात क्या है?' सरोज ने फिर पूछा। "कुछ नहीं, यूँ ही मुझे तंग कर रहा है।"

“इसीलिए कहा जाता है कि मातहतों को ज़्यादा सिर न चढ़ाना चाहिए।” सरोज ने कहा।

___ “मुश्किल तो यही है कि उसे मैं मातहत समझता ही नहीं और उसकी वजह यह है कि अपने साथियों में सबसे ज़्यादा अक़्लमन्द है। खैर छोड़ो...लो, यह ख़त दिलबीर सिंह ने मुझे भिजवाया है।
 
सरोज ख़त ले कर पढ़ने लगी।

“तो फिर आप क्या कहते हैं?' सरोज ख़त पढ़ कर बोली।

“इस सिलसिले में भला मैं क्या कह सकता

“मैंने तो फैसला कर लिया है कि अब उस घर में क़दम न रखूगी।"

“और मैं आपके फ़ैसले की क़द्र करता हूँ।" हमीद ने कमरे में दाख़िल होते हुए कहा।

____ फ़रीदी ने झल्ला कर मेज़ पर रखा हुआ रूमाल उठा लिया और हमीद सहम जाने की ऐक्टिंग करता हुआ ख़ामोशी से एक तरफ़ बैठ गया।

थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। उसके बाद फ़रीदी और हमीद में केस के सिलसिले में बहसें छिड़ गयीं और सरोज उकता कर बाहर चली गयी।

“यह क्या बेवकूफ़ी थी?” सरोज के चले जाने के बाद फ़रीदी बोला।

“कैसी बेवकूफ़ी?"

“देखो, सरोज मेरी मेहमान है। तुम्हें इस क़िस्म की बातें न करनी चाहिएँ कि उसे दुख पहुँचे।” __

“तो यह कहिए कि आप ग़लत-फ़हमी में हैं। अरे, यह सब कुछ मैं आप ही के लिए कर रहा हूँ

“मैं समझा नहीं।"

"मुहब्बत करने वालों के पास समझ होती कहाँ है।"

“फिर वही बकवास!" फ़रीदी ने झुंझला कर कहा। "मैं तुम्हें आखरी बार समझाता हूँ कि अब तुम इसके बारे में कभी कुछ न कहना। क्या तुम अपनी तरह सबको गधा समझते हो।"

___“जी नहीं, मैं अपने अलावा सबको समझता हूँ

___ “देखो मियाँ हमीद! तुम्हारी बौखलाहटें बहुत ज़्यादा बढ़ गयी हैं। मैं अब तुम्हारे अब्बा हुजूर को लिखने वाला हूँ कि जल्द-से-जल्द तुम्हारा कोई अच्छा रिश्ता कर दें।

“आपको ग़लत-सिलसिले हुई है। मैं पिछले दो माह से बिलकुल आशिक़ नहीं हुआ।"

“अच्छा भई, अब ख़त्म करो यह क़िस्सा।" फ़रीदी ने कहा। "कोई क़ायदे की बात करो।"

“मेरे ख़याल से सिविल मैरिज़ ही ज़्यादा कायदे की बात रहेगी।"



“तुम ज़िन्दगी भर संजीदा नहीं हो सकते।" फ़रीदी ने बुरा-सा मुँह बनाते हुए कहा।

“सचमुच बताइएगा आपका इश्क़ किन मंज़िलों पर है?” हमीद ने मुस्कुरा कर कहा।

“किसी परेशान-हाल औरत को सहारा देना भी सितम हो जाता है। हत्तेरी क़िस्मत की ऐसी की तैसी।"

“आप बेकार में परेशान हैं। मैं आपके लिए जान की बाज़ी लगा दूँगा।” हमीद ने अपने सीने पर हाथ मारते हुए कहा।

“अच्छा मेरे भाई, अब चुप हो जाओ, वरना मैं तुम्हारा गला घोंट दूँगा।” फ़रीदी ने उकता कर कहा।

"तो इस तरह यह इस शहर में चौथा क़त्ल होगा।” हमीद अपने चेहरे पर उदासी पैदा करते हुए बोला।

उसकी मज़ाक़िया सूरत देख कर फ़रीदी को हँसी आ गयी।

इतने में टेलीफ़ोन की घण्टी बजी। फ़रीदी ने रिसीवर उठा लिया।

"हैलो!"

“ओह फ़रीदी साहब! मैं सुधीर बोल रहा हूँ। धर्मपुर के जंगल में फिर एक हादसा हो गया है।"

“क्या कहा? हादसा?"

“जी हाँ... क़त्ल...हम लोग जा रहे हैं। आप और हमीद साहब सीधे वहीं पहुँच जाइए।"

___ “लो भई...चौथा क़त्ल भी आख़िर हो ही गया।' फ़रीदी ने रिसीवर रखते हुए हमीद की तरफ़ मुड़ कर कहा।

“कहाँ?"

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“वहीं...धर्मपुर के जंगल में...जल्दी से तैयार हो जाओ। अरे लो...बातों में अँधेरा हो गया। अपनी टॉर्च ज़रूर ले लेना। जल्दी करो, वरना कहीं ये लोग कुछ गड़बड़ न करें।"

“अब तो जनाब मेरा दिल चाहता है कि आप सचमुच मुझे क़त्ल कर देते तो अच्छा था। यह नौकरी क्या है, आफ़त है!" हमीद ने उठते हुए कहा।

दोनों कमरे के बाहर निकल गये।

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फ़रीदी की नाक

अच्छा-खासा अँधेरा हो गया था। धर्मपुर की अँधेरी और वीरान सड़क पर इन्स्पेक्टर फ़रीदी की कार तेज़ रफ़्तार में चली जा रही थी।

“शायद आज की रात फिर ख़राब हो।" हमीद ने बेदिली से कहा।

"देखा जायेगा। अभी से किस बात की परेशानी है।” फ़रीदी ने धीरे से कहा।

___“परेशानी आपको न होती होगी। यहाँ तो जान निकल कर रह जाती है। समझ में नहीं आता कि यह कौन गधा है जिसने क़त्ल के लिए ऐसी वीरान जगह चुन रखी है। अरे, क़त्ल करना है तो हमारे घर के आस-पास कहीं कर दिया करे।” हमीद ने बेज़ारी से कहा।

___“जी नहीं!” फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला। “यह भी ठीक नहीं। उसे चाहिए कि क़त्ल कर के लाश आपके घर भिजवा दिया करे।"

हमीद हँसने लगा।

“क्या ज़िन्दगी है हमारी भी...न दिन चैन, न रात आराम...इससे बेहतर तो क्ल र्की थी। सुबह दस बजे दफ़्तर गये और शाम को चार बजे शान से घर चले जा रहे हैं। उसके बाद रात अपनी है।" हमीद ने कहा।

“क्या बूढ़ी औरतों की-सी बातें कर रहे हो।

"काश, मैं बूढ़ी औरत ही होता, मगर जासूस न होता। हर वक़्त ज़िन्दगी रिवॉल्वर की नाल पर रखी रहती है। या फिर जासूसी हो अंग्रेज़ी तर्ज़ की कि जासूस ने किसी क़त्ल की ख़बर सुनते ही एक आँख बन्द की, कन्धों को ज़रा-सा हिलाया, दो-चार बार कान हिलाये, एक बार मुँह बिसूरा और अचानक मुस्कुराते हुए क़ातिल का नाम और पता बता कर अपना फ़र्ज़ पूरा किया और चलता बना। एक हम हैं कि दिन-रात भूतों की तरह...!” हमीद रुक कर कुछ सोचने लगा।

“क्या बकवास लगा रखी है।” फ़रीदी ने उकता कर कहा।

“अरे, बाप-रे-बाप। देखिए, कितना अँधेरा है। क्या आप गीदड़ की लाश भूल गये हैं। मैं तो साहब हरगिज़ न जाऊँगा। जहन्नुम में गयी नौकरी...मेरे फेफड़ों में इतना दम नहीं है कि चीख-चीख़ कर क़हक़हे लगाता फिरूँ और फिर बेहोश हो कर गिर पड़ें।"

“तुम भी अजीब आदमी हो।” फ़रीदी ने कहा। "क्या अभी तक तुम्हारे दिल से भूतों का ख़याल नहीं निकला। अरे बेवकूफ़! कितनी बार समझाया कि वह इन बोतलों में भरी हुई गैस का असर था।"

“अगर यह सच है तो उस गीदड़ की लाश का क्या मतलब था। उसके मुँह में दबे हुए पाइप का क्या मतलब था और उस शेर की क्या ज़रूरत थी।"

“इसका मक़सद सिर्फ यही था कि उसे देख कर हँसी आ जाये। और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि अगर वहाँ दूसरे आदमी मौजूद न होते तो हमारे इस बयान पर किसी को यक़ीन न आता। मुजरिमों का मक़सद भी यही था कि हम लोग उनकी इस हरकत को शैतानी काम समझ लें और थक-हार कर बैठ जायें।"

“साहब, आपकी यह बातें मेरे हलक़ से नहीं उतरती।"

"अच्छा, अब ख़ामोश रहिए, वरना मेरा घूसा आपके हलक़ से उतर जायेगा।" ___

“बेबसी की मौत से उसे बेहतर समझंगा। मैं आपसे सच कहता हूँ कि इस वक़्त मज़ाक़ के मूड में नहीं हूँ।" हमीद ने कहा।

“न जाने क्यों मेरा दिल बैठा जा रहा है।"

“और मेरा दिल न जाने क्यों उठ कर टहल रहा है।” फ़रीदी ने हँस कर कहा। "दिल बैठा जा रहा है, बहुत ख़ब। मैं ग़लत नहीं कहता कि तुम्हारे अन्दर किसी बुढ़िया की रूह घुस गयी है। बरखुरदार इस क़िस्म के मुहावरे किसी मर्द पे अच्छे नहीं लगते।”

“आप बरखुरदार...इस क़िस्म के मुहावरे...!'' हमीद जल्दी से बोला।

___ फ़रीदी हँसने लगा। उसके बाद ख़ामोशी छा गयी। मोटर की आवाज़ जंगल के सन्नाटे में गूंज रही थी। कभी-कभी हेड लाइट की रोशनी में सड़क पर एक-आध गीदड़ या जंगली बिल्ली भागती दिखायी दे जाती थी। हवा बन्द थी।

आसमान बादलों से ढंका हुआ था। हमीद ने सिग्रेट सुलगाया और हल्के-हल्के कश लेने लगा।

अचानक फ़रीदी चौंक कर कहने लगा।

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"क्यों हमीद...! टेलेफ़ोन पर बातचीत करने के बाद हम लोग कितनी देर में घर से रवाना हो गये होंगे?"

“मुश्किल से दस मिनट के बाद।"

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"ताज्जुब है कि अभी तक पुलिस की लॉरी दिखायी नहीं दी। आख़िर ये लोग किस रफ़्तार से चले होंगे।"

“हो सकता है कि वे हम लोगों के बाद रवाना हुए हों।”
 
“तब भी अब तक उन्हें पहुँच जाना चाहिए था। सोचने की बात है कि सुधीर जल्दी की वजह से कोतवाली में मेरा इन्तज़ार नहीं कर सकता था, इसलिए उसने सीधे यहीं आने के लिए कहा और अगर वाक़ई इतनी ही जल्दी थी तो इस सुस्त रफ़्तार का क्या मतलब हो सकता है?''

__“तो क्या,” हमीद सीट पर उछलते हुए बोला, "हमें किसी ने धोखा दिया।"

___“हो सकता है।'' फिर वह कुछ सोच कर बोला। “दरअसल मुजरिम मेरी जान लेना चाहता था। डॉक्टर सतीश भी इसी मक़सद से मेरे पीछे लगा था।"

__“लेकिन अगर वह आपको क़त्ल ही करना चाहता था तो ख़ामोशी से क्यों न कर दिया। आख़िर छिपाने की क्या ज़रूरत थी?"

___“जहाँ तक मेरा ख़याल है, वह मुझे एक बूढ़े के भेस में देख कर शक में पड़ गया था। इसलिए शक को ख़त्म करने के लिए उसने यह चाल चली और फिर कुछ देर बाद उसने रिवॉल्वर निकाल लिया था।"

“अच्छा तो क्या वाक़ई आपने उसे पहचान लिया था?"

“बिलकुल नहीं...अलबत्ता अँधेरी रात में काली ऐनक ज़रूर शक के घेरे में डाल रही थी।" फ़रीदी ने कहा।

"अरे, यह क्या!'' हमीद चौंक कर बोला।

“क्या बात है?"

"उधर बायीं तरफ़ की झाड़ियों में कोई था।" हमीद ने अँधेरे में घूरते हुए कहा।

फ़रीदी ने कार की रफ़्तार कम कर दी।

“यह आप क्या कर रहे हैं। रफ़्तार तेज़ रखिए।" हमीद जल्दी से बोला।

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"क्यों, क्या मरने का इरादा है?” फ़रीदी ने कहा। अगर कोई बड़ा पेड़ अचानक कार के सामने आ गिरे तो हम लोग कहाँ होंगे?"

“अरे बाप-रे-बाप।" हमीद के मुँह से अचानक निकल गया।

“अरे, ज़रा होश सँभाल कर बैठो। कोई हादसा होने ही वाला है।” फ़रीदी ने कहा। “रिवॉल्वर लाये या नहीं।"

“अर.. .... रिवॉल्वर...!” हमीद हकलाने लगा।

हमीद को हकलाते देख फ़रीदी हँसने लगा।

“आप हँस...हँस...हँस रहे हैं।"

“तुम भी हँसो न!"

“मुझे खाँसी आ रही है।'' हमीद ने ज़बर्दस्ती खाँसते हुए कहा।

“अरे!” फ़रीदी चौंक कर बोला।

हेड लाइट की रोशनी में दूर सड़क पर एक आदमी पड़ा दिखायी दिया। फ़रीदी ने कार की रफ़्तार धीमी कर दी। कार रुक गयी। फ़रीदी ने कार पीछे की तरफ़ लौटानी शुरू की।

“क्यों, यह क्या!” हमीद जल्दी से बोला।

ख़तरा है, वापस चलेंगे।” फ़रीदी ने धीरे से कहा।

अचानक कार की खिड़की से कोई चीज़ फ़रीदी की कनपटी से लग कर रुक गयी। ऐसा ही कुछ हमीद के साथ भी हुआ और एक गरजदार आवाज़ सुनायी दी, "नीचे उतरो!"

दो राइफलों की नालें फ़रीदी और हमीद की कनपटियों से लगी हुई थीं। दरवाजे खुले और दोनों नीचे उतार लिये गये। पाँच आदमी थे। उनके चेहरे काले नक़ाबों से ढके हुए थे। चार के पास राइफ़लें थीं और पाँचवाँ रिवॉल्वर लिये हुए था।

“ले चलो!” रिवॉल्वर वाले ने कहा।

दोनों को दो-दो आदमियों ने पकड़ लिया और सब झाड़ियों में घुसते चले गये। हमीद और फ़रीदी ख़ामोश थे। रिवॉल्वर वाले नक़ाबपोश के हाथ में टॉर्च थी। वह आगे-आगे रास्ता दिखाता हुआ चल रहा था। अचानक फ़रीदी बैठ गया। जिन आदमियों ने उसे पकड़ रखा था, उन्होंने उसे उठाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया, मगर वह टस-से-मस न हुआ।

__रिवॉल्वर वाला पलट पड़ा। उसने फ़रीदी के चेहरे पर टॉर्च की रोशनी डाली। फ़रीदी मुस्कुरा रहा था।

“क्यों मक्कार! क्या अब कोई नयी हरामज़दगी सूझी।" वह गरज कर बोला।'

“मेरा ख़याल है कि मैं आप लोगों को नहीं जानता। इसलिए तहज़ीब शर्त है।” फ़रीदी मुँह बना कर बोला।

“अगर हम ख़ामोशी के बजाय गाना गाते हुए चलें तो फैसी रहेगी।” हमीद ने मज़ाक़ में कहा।

“चुप रहो, चूहे के बच्चे।” रिवॉल्वर वाला पैर पटकते हुए बोला।

“आप बड़े बदतमीज़ मालूम होते हैं।" हमीद ने ज़मीन पर बैठते हुए कहा। लेकिन उसे उठा दिया गया। मगर अब फ़रीदी ज़मीन पर बैठ गया।

“उठो!” रिवॉल्वर वाले ने फ़रीदी से कहा।

“रुक जाओ भाई, ज़रा सुस्ता लेने दो। अगर इजाज़त हो, तो मैं एक सिगार भी सुलगा लूँ।" फ़रीदी ने इत्मीनान से कहा।

___ “मालूम होता है कि तुम लोगों को यहीं पर ख़त्म कर देना होगा।” रिवॉल्वर वाले ने कहा।

“नेक काम में देर नहीं करनी चाहिए। अगर ख़त्म ही कर देना है तो यहाँ क्या बुराई है।" फ़रीदी ने कहा।

"उठो...!'' रिवॉल्वर वाला फिर चीख़ा।

“नहीं उलूंगा।” फ़रीदी भी उसी अन्दाज़ में चीख़ा।

“अच्छा ठहरो...बताता हूँ तुम्हें...!” उसने रिवॉल्वर जेब में रखते हुए कहा।

“ज़रा हिन्दी में बताना...मुझे अंग्रेज़ी नहीं आती।” हमीद ने चिल्ला कर कहा।

“चुप रहो!'' वह ज़ोर से चीख़ कर फ़रीदी की तरफ़ बढ़ा।

___ फ़रीदी के हाथ अभी तक उन दोनों आदमियों ने जकड़ रखे थे। रिवॉल्वर वाले ने फ़रीदी के बाल पकड़ कर उठाने की कोशिश की, लेकिन वह हिला तक नहीं।

“तुम यूँ नहीं मानोगे।” रिवॉल्वर वाला फ़रीदी की नाक पकड़ कर दबाते हुए बोला।

फ़रीदी के मुँह से चीख निकल गयी। वह उछल कर खड़ा हो गया।
 
यह सब इतनी जल्दी हुआ कि वे लोग, जो फ़रीदी को पकड़े हुए थे, सँभल न सके। फ़रीदी उनकी पकड़ से आज़ाद हो कर उछला और हमीद पर आ गिरा। जिन्होंने हमीद को पकड़ रखा था, वे भी हमीद समेत ज़मीन पर आ रहे। रिवॉल्वर वाला चीख़ने लगा।

"ख़बरदार...ख़बरदार...गोली मार दूंगा।"

अब बिलकुल अँधेरा था। इस कशमकश में रिवॉल्वर वाले के हाथ से टॉर्च गिर गयी थी। रिवॉल्वर वाले ने हवाई फायर करने शुरू कर दिये। शायद उसे डर था कि अँधेरे में उसी के आदमी न ज़ख़्मी हो जायें। तक़रीबन पन्द्रह-बीस मिनट तक अँधेरे में जद्दोजेहद होती रही। रिवॉल्वर वाले की आवाज़ बराबर सुनायी दे रही थी।

फ़रीदी और हमीद एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर पंजों के बल सड़क की तरफ़ भाग रहे थे। कार वहीं खड़ी थी। दोनों कार में बैठ गये। फ़रीदी ने कार स्टार्ट कर दी। झाड़ियों के अन्दर शोर-गुल की आवाजें सुनायी देने लगीं जो धीरे-धीरे क़रीब आती जा रही थीं। फ़रीदी ने कार घुमायी और वे दोनों बहुत ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से शहर की तरफ़ भाग खड़े हुए। फ़ायर अब भी हो रहे थे। जिनकी आवाजें दूर तक सुनायी दे रही थीं।

___ “क्यों मियाँ हमीद...हो गयी न अच्छी-खासी मरम्मत!” फ़रीदी ने कहा। "वह तो कहो उसके हाथ से टॉर्च गिर गयी, वरना इस वक़्त हम कहीं और होते।"

"बस, अब मत बोलिए...ख़ामोशी से चले चलिए।" हमीद ने काँपते हुए कहा।

“अरे वाह मेरे शेर...बस, इतने ही में हाँफने लगा।” फ़रीदी ने कहक़हा लगाया।

“आप ठहरे पहलवान...भला मैं आपका मुक़ाबला कब कर सकता हूँ।" हमीद ने कहा।

“देखिए, मैंने पहले ही कह दिया था कि लौट चलिए।"

__“अगर मैं लौट जाता तो मुझे ज़िन्दगी भर अफ़सोस रहता।” फ़रीदी ने कहा।

“क्यों?

“इसलिए कि यहाँ आने से मुजरिमों का कुछ-कुछ सुराग़ मिल गया।”

“वह कैसे?"

“इसका जवाब यह टॉर्च देगी।"

“टॉर्च!” हमीद ने हैरत से कहा। “वह कब से बोलने लगी।"

“उसी वक़्त से।” फ़रीदी ने हँस कर कहा। "इस वक़्त यह टॉर्च बहुत क़ीमती है।"

“ज़रा देखू तो।”

“हूँ...हूँ, छूना मत उसे।” फ़रीदी ने उसे हटाते हुए कहा। “यह बड़ी मेहनतों से हासिल हुई है। इतनी कुश्ती लड़ने के बावजूद मैंने इसकी काफ़ी हिफ़ाज़त की है।"

“आख़िर क्यों?"

“इस पर मुजरिम की उँगलियों के निशान हैं। इसको मैं अभी फिंगरप्रिंट डिपार्टमेंट में दूँगा।"

हमीद हैरत से फ़रीदी का मुँह देख रहा था।

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गिलास की चोरी

दूसरे दिन सुबह फ़रीदी, हमीद और सरोज ड्रॉइंग-रूम में नाश्ता कर रहे थे। फ़रीदी ने रात वाली बात किसी को नहीं बतायी थी, लेकिन हमीद के पेट में चूहे कूद रहे थे। वह अपनी कारगुज़ारियाँ एक हसीन औरत के सामने दुहराने के लिए बेचैन था। बातचीत के दौरान कई बार उसने इस टॉपिक की तरफ़ आने की कोशिश की, लेकिन फ़रीदी ने हर बार उसे साफ़ उड़ा दिया।

आख़िरकार थोड़ी देर के बाद हमीद भी समझ गया कि फ़रीदी रात वाली बात सरोज के सामने नहीं लाना चाहता। वह अपनी आदत के हिसाब से चहक रहा था। बात-बात पर चुटकुले छेड़ रहा था।

__“वाक़ई हमीद साहब! आप बहुत ज़िन्दादिल इन्सान हैं।” सरोज ने कहा।

"मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि आपके ख़याल की तारीफ़ कर सकूँ।” हमीद ने जवाब दिया।

"लेकिन मुझमें हिम्मत है।” फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला।

“आपकी हिम्मत का क्या कहना...बड़े-बड़े आपका लोहा, ताँबा, पीतल, गिलट यानी कि हर क़िस्म की धातु मानते हैं।"

सरोज हँसने लगी और फ़रीदी सिर्फ मुस्कुरा कर रह गया।

__ इतने में एक नौकर हाथ में एक लिफ़ाफ़ा लिये हुए कमरे में दाखिल हुआ।

__“अभी एक आदमी यह लिफ़ाफ़ा दे गया है।" नौकर ने लिफ़ाफ़ा फ़रीदी की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा। फ़रीदी ख़त निकाल कर पढ़ने लगा। फिर उसने वह काग़ज़ सरोज की तरफ़ बढ़ा दिया।

यह ठाकुर दिलबीर सिंह का ख़त है।

“फ़रीदी साहब,

आदाब,

मैं शाम को आपका इन्तज़ार कर रहा था, लेकिन शायद आप बहुत ज़्यादा बिजी थे या सरोज यहाँ आने पर रज़ामन्द न होती होगी। मुझे बहुत अफ़सोस है। मैं सरोज को अपनी बेटी की तरह मानता हूँ। गुस्से में मैंने उसे वह सब कुछ कह डाला जो मुझे न कहना चाहिए था। अगर सरोज बूढ़े ठाकुर के मुँह पर तमाचा मार कर भी उसकी ग़लती को माफ़ न कर सके तो मुझे कोई एतराज़ न होगा। सरोज को ले कर जल्द आइए, ताकि मैं अपनी ज़िन्दगी में उससे माफ़ी माँग लूँ।

आपका

दिलबीर सिंह"

सरोज की आँखों में आँसू छलक आये। ठाकुर के ख़त ने उसके दिल पर गहरा असर डाला था।

“मैं ज़रूर जाऊँगी फ़रीदी साहब, ठाकुर साहब वाक़ई परेशान होंगे। सचमुच वे मुझे बेटी की तरह मानते हैं।" सरोज ने आँसू पोंछते हुए कहा।

“मुझे क्या एतराज़ हो सकता है। चलिए, मैं आपको पहुँचा आऊँ। मैं ख़ुद आज ठाकुर साहब से मिलने का इरादा कर रहा हूँ, वाक़ई बड़ी खूबियों के बुजुर्ग हैं। उनसे मिल कर मुझे सुकून मिलता है।” फ़रीदी ने सिगार सुलगा कर कश

लेते हुए कहा।

“मेरा ख़याल तो है कि...” हमीद ने कहा, लेकिन फ़रीदी की तेज़ नज़रों से घबरा कर अपनी बात पूरी न कर सका।

___“हाँ, आपका ख़याल क्या है?” सरोज ने हमीद से पूछा।

___“मैं...यानी कि मैं..." हमीद ने फ़रीदी की तरफ़ देखते हुए कहा। “मेरा ख़याल है कि आप ज़रूर जाइए।"

“थोड़ी देर के बाद फ़रीदी, सरोज और हमीद धर्मपुर की तरफ जा रहे थे।

जैसे ही कार सरोज के मकान के फाटक पर आ कर रुकी उसका ग्रेहाउण्ड कुत्ता दुम हिलाता हुआ दौड़ा आया।

___ “जैक, जैक!” सरोज उसके सिर पर हाथ फेर कर बोली।

आवाज़ सुन कर ठाकुर भी छड़ी टेकते हुए बरामदे में निकल आया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। मोटे-मोटे क़तरे...उसका मुहब्बत-भरा दिल उमड़ आया था। सरोज उसके सीने से सिर लगा कर सिसकियाँ लेने लगी। वह उसके सिर पर हाथ फेरता और रोता जा रहा था। कुछ देर तक दोनों रोते रहे, फिर आँसू पोंछ डाले गये और सब ड्रॉइंग-रूम में आ कर बातें करने लगे।

__“भई, बहुत तेज़ गर्मी पड़ रही है। मेरे ख़याल से तो कुछ पीना चाहिए।" ठाकुर ने कहा।

____ “मैं अभी शर्बत बनवा कर लाती हूँ।” सरोज ने उठते हुए कहा और बाहर चली गयी। कुछ देर के बाद नौकर ट्रे में शीशे के ख़ाली गिलास लाया। फ़रीदी ने गिलास हाथ में उठा लिया।

“कितने खूबसूरत गिलास हैं।' फ़रीदी गिलास को अपने रूमाल से साफ़ करते हुए बोला। “अब ऐसी चीजें कहाँ।"

इस पर ठाकुर साहब अपने इन ख़ानदानी गिलासों की पुरानी कहानियाँ सुनाने लगे। फ़रीदी उनकी बातों को दिलचस्पी से सुन रहा था और साथ-ही-साथ उन गिलासों को उठा-उठा कर अपने रूमाल से साफ़ भी करता जा रहा था।
 
___ "बस, जी चाहता है कि इन्हें देखता ही रहूँ।" फ़रीदी ने गिलासों को तारीफ़-भरी नज़रों से देखते हुए कहा।

ठाकुर साहब गिलासों की तारीफ़ सुन कर और ज़्यादा ख़ुश होते जा रहे थे। सरोज जग में शर्बत ले कर आयी और उसने सबके गिलास भर दिये।

शर्बत पीने के दौरान इधर-उधर की बातें होती रहीं। ठाकुर साहब ने धर्मपुर के जंगल के केस के बारे में भी काफ़ी देर तक बातें कीं। उसके बाद फ़रीदी और हमीद वापस जाने के लिए तैयार हो गये। सरोज और ठाकुर उनके साथ फाटक तक आये। फ़रीदी ने कार स्टार्ट कर दी।

“भई हमीद, मुझे वे गिलास बेहद पसन्द आये हैं।” फ़रीदी ने थोड़ी दूर चल कर कार रोकते हुए कहा।

“तो गाड़ी क्यों रोक दी?” हमीद ने हैरत से कहा।

__“मैं इनमें से एक चुराना चाहता हूँ।” फ़रीदी ने कहा और दरवाज़ा खोल कर नीचे उतर गया।

"क्या मतलब!” हमीद ने आँखें फाड़ते हुए कहा।

“मैं अभी आया!” फ़रीदी ने कहा।

हमीद कार में बैठ कर उसका इन्तज़ार करने लगा। उसे हैरत थी कि आख़िर फ़रीदी को हो क्या गया है।

थोड़ी देर बाद फ़रीदी लौट आया। उसके हाथ में एक गिलास था।

“कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। वे लोग गिलास वहीं छोड़ गये थे।' फ़रीदी ने कार में बैठते हुए कहा।

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गोद में साँप

दूसरे दिन सुबह फ़रीदी और हमीद कोतवाली गये। कोतवाली इंचार्ज इन्स्पेक्टर सुधीर उनका इन्तज़ार कर रहा था। उन्हें देखते ही हाथ बढ़ा कर उनकी तरफ़ बढ़ा।

“आइए, इन्स्पेक्टर साहब! मैं आप ही लोगों का इन्तज़ार कर रहा था।” सुधीर ने फ़रीदी से हाथ मिलाते हुए कहा। “कहिए, कोई ख़ास बात।"

“ख़ास बात सिर्फ इतनी है कि आप आठ-दस कॉन्स्टेबल ले कर मेरे साथ चलिए।" फ़रीदी ने कहा।

“खैरियत!'' सुधीर ने हैरत से कहा।

“जल्दी कीजिए!" आपका शिकार मेरे चूहेदान में फँस गया है।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

“इसलिए हम लोग जल्दी में नाश्तेदान भी साथ ही लेते आये हैं।” हमीद फ़ौरन बोल उठा।

“तो यह क्यों नहीं कहते कि अभी तक आप लोगों ने नाश्ता नहीं किया।” सुधीर ने कहा। “कहिए, कुछ मॅगाऊँ।"

___ “नहीं शुक्रिया, इसकी ज़रूरत नहीं।” फ़रीदी ने कहा। “आप जल्दी से अपने आदमियों को तैयार कर लीजिए।”

“मगर जाना कहाँ है?" सुधीर ने कहा।

“जलालपुर!”

“जलालपुर!” सुधीर ने हैरत से कहा। "तो आपने क़ातिलों का पता लगा लिया।"

“क़रीब-क़रीब...!'' फ़रीदी ने कहा और सिगार सुलगाने लगा।

सुधीर ने एक दीवान को बुला कर कुछ कहा और ख़ुद आफ़िस के अन्दर चला गया।

थोड़ी देर के बाद असलहे से लैस आठ कॉन्स्टेबल आ गये।

पुलिस की गाड़ी, जिस पर सुधीर, हमीद, फ़रीदी और आठ कॉन्स्टेबल बैठे थे जलालपुर

की तरफ़ तेज़ी से भागी जा रही थी।

“ज़रा मुझे कुछ पहले से बता दीजिए ताकि मैं उसी के हिसाब से इन्तज़ाम कर सकूँ।” सुधीर ने कहा।

“मेरे ख़याल से कुछ ज़्यादा परेशानी न उठानी पड़ेगी।' फ़रीदी ने जवाब दिया।

“फिर भी!” सुधीर ने कहा।

“बस इतना समझ लीजिए कि क़ातिल का पता चलते ही आपको उसके हाथों में हथकड़ियाँ डाल देनी होंगी।"

“यह तो हो ही जायेगा। यह बताइए कि आख़िर क़ातिल है कौन?” सुधीर ने बेचैनी से कहा।

“घबराइए नहीं, अभी सब कुछ मालूम हो जायेगा।"

“ज़रा होशियारी से रहना।” सुधीर ने अपने सिपाहियों की तरफ़ देख कर कड़ी आवाज़ में कहा।

“हाँ भई...यही वक़्त होशियारी का है।" हमीद ने हँस कर कहा। "और ज़रा हम लोगों का ख़याल रखना।”

“हमीद साहब, किसी वक़्त तो हम ग़रीबों को माफ़ कर दिया कीजिए।” सुधीर ने कहा।

___ “अच्छा, मैं उसी वक़्त उस पर ग़ौर करूँगा।" हमीद ने कहा और ग़ौर से फ़रीदी की जेब की तरफ़ देखने लगा जो ख़ुद-बख़ुद फूल कर पिचक रही थी।

“अरे!" हमीद ने उछल कर कहा। "इन्स्पेक्टर साहब, आपकी जेब...!"

___ फ़रीदी ने हमीद का कन्धा दबा दिया। हमीद ख़ामोश हो गया। इन्स्पेक्टर सुधीर भी चौंक पड़ा।

फ़रीदी ने जल्दी से अपनी हैट इस तरह अपनी टाँग पर रख ली कि जेब छिप गयी।

“क्या बात है?” सुधीर ने हमीद से पूछा।

“कुछ नहीं...यूँ ही ज़रा...!"

“दिमाग़ का एक स्क्रू ढीला होने लगा था।" फ़रीदी ने जुमला पूरा कर दिया।

दिलबीर सिंह की कोठी के सामने पुलिस की लॉरी रुकी, सरोज और दिलबीर सिंह बरामदे ही में बैठे थे। फ़रीदी के साथ इतने बहुत से कॉन्स्टेबल देख कर सरोज ने धीरे से कुछ कहा। दिलबीर सिंह उठ कर खड़ा हो गया। इतने में ये लोग भी बरामदे में पहुँच गये।
 
“कहिए फ़रीदी साहब...कोई ताज़ा मुसीबत...” ठाकुर दिलबीर सिंह ने कहा। __

“कोई ख़ास बात नहीं...इधर से गुज़र रहा था। सोचा, आपसे भी मिलता चलूँ।'

"खूब, खूब!” ठाकुर दिलबीर सिंह ने ख़ुश होते हुए कहा। “मेरी ख़ुशक़िस्मती है कि आप जैसा बड़ा आदमी मुझसे इतनी मुहब्बत रखता है। आप लोग तशरीफ़ रखिए।'' फिर अपने नौकरों को आवाज़ देते हुए कहा। “अरे, कोई है। ज़रा कुर्सियाँ लाना।"



___“गर्मी बहुत शदीद है।" दिलबीर सिंह ने कहा। “मेरे ख़याल में आप लोग कुछ शर्बत पी लीजिए।''

“जी नहीं, शुक्रिया।” फ़रीदी ने कहा।

“कहिए, क्या विमला वाले केस की तहक़ीक़ात के सिलसिले में कहीं जा रहे थे।"

दिलबीर सिंह ने पूछा।

“जी हाँ.कुछ कामयाबी हुई तो है।"

“क्या मैं कुछ मालूम कर सकता हूँ।" दिलबीर सिंह ने ख़ुशी का इज़हार करते हुए

कहा।

“क्यों नहीं!” फ़रीदी अपने अन्दाज़ में बोला। “एक तो यही ख़बर आपके लिए दिलचस्प होगी कि रणधीर, विमला और डॉक्टर सतीश का क़त्ल एक ही आदमी के इशारे पर हुआ है।"

“अच्छा!” दिलबीर सिंह ने हैरत से कहा। “वाक़ई यह ख़बर दिलचस्प और साथ-ही-साथ हैरतअंगेज़ भी है।"

“ठाकुर साहब।” फ़रीदी बोला। “क्या आप मुझे विमला का सही हुलिया बता सकते हैं। मुझे उसकी लाश देखने का मौक़ा भी न मिल सका था।"

“बहुत खूब!” ठाकुर साहब ने क़हक़हा लगा कर कहा। “अगर कोई अन्धा किसी का हुलिया बता सकता हो तो ज़रूर पूछिए।"

"तो क्या वाक़ई अब आपको आँखों से बिलकुल दिखायी नहीं देता।” फ़रीदी ने पूछा।

ठाकर दिलबीर सिंह के माथे पर लकीरें पड़ने लगीं। शायद उसे फ़रीदी का यह सवाल बुरा लगा था।

"फ़रीदी साहब, मेरा ख़याल है कि मैं आपसे उम्र में बहुत बड़ा हूँ।” दिलबीर सिंह ने कड़क लहजे में कहा।

"यक़ीनन!” फ़रीदी ने "हाँ" में सिर हिलाया।

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"तो फिर आपको मुझसे मज़ाक़ नहीं करना चाहिए।” दिलबीर सिंह ने अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करते हुए कहा।

“मेरा ख़याल है कि मैंने कोई गुस्ताख़ी नहीं की।” फ़रीदी ने कहा। “लेकिन अगर आपको इससे तकलीफ़ पहुँची हो तो माफ़ी चाहता हूँ।"

“खैर... खैर!” दिलबीर सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा। “कोई बात नहीं।"

फिर थोड़ी देर के लिए ख़ामोशी छा गयी।

“फ़रीदी भाई! मुजरिमों की गिरफ़्तारी कब तक हो जाने की उम्मीद है।” सरोज ने कहा।

“बहुत जल्द!” फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला।

“ख़ुदा करे ऐसा ही हो...ताकि हम लोगों की तरफ़ से आपका शक ख़त्म हो।” सरोज ने ग़मगीन लहजे में कहा।

“आप लोगों पर शक...अरे! आप भी कैसी बातें कर रही हैं। तौबा-तौबा!” फ़रीदी यह कह कर अपने एक स्टाइल में सीटी बजाने लगा। वह दिलबीर सिंह के सामने बैठा हुआ बाग़ की तरफ़ गर्दन मोड़े कुछ देख रहा था।

“अरे साँप...!” ठाकुर दिलबीर सिंह एकदम से उछल कर बोला।

फ़रीदी की जेब से एक काला साँप निकल कर उसकी गोद में रेंग रहा था। सब लोग हैरान हो गये।

“साँप दिखायी देते हैं, ठाकुर साहब।" फ़रीदी ने रिवॉल्वर निकाल कर ठाकुर दिलबीर सिंह की तरफ़ तानते हुए कहा।

“ख़बरदार अपनी जगह से हिलने की कोशिश न करना।"

ठाकुर दिलबीर सिंह के हाथ से उसकी छड़ी छूट गयी।

“तुमने उठने की कोशिश की और मैंने गोली चलायी।” फ़रीदी ने तेज़ लहजे में कहा। “सुधीर साहब, हथकड़ी।”

ठाकुर दिलबीर सिंह के हाथों में हथकड़ी लगा दी गयी।

“यह आपने क्या किया, फ़रीदी भैया।" सरोज चीख़ पड़ी।

“इनकी आँखों का इलाज बगैर ऑपरेशन...अब उन्हें अँधेरे में रहने की ज़रूरत है।" हमीद ने हँस कर कहा। "इन्स्पेक्टर साहब,

आप आँखों के डॉक्टर भी हैं।"

“अरे-अरे...यह क्या हो रहा है।' सरोज बेबसी से बोली।

“घबराओ नहीं...सरोज बहन, शुक्र करो कि तुम बच गयीं, वरना कुछ दिन बाद तुम भी विमला का साथ देती नज़र आतीं। अगर कुछ और ज़्यादा जानना चाहती हो तो कल शाम को मुझसे मिलना। मैं घर पर ही रहँगा।"

ठाकुर दिलबीर सिंह सिर झुकाये बैठा था। “उठिए सरकार!” सुधीर ने उसे ठोकर लगाते हुए कहा।

दिलबीर सिंह झल्ला कर खड़ा हो गया और हथकड़ी में जकड़े हुए हाथ उठा कर इस ज़ोर से सुधीर के सिर पर मारे कि सुधीर चकरा कर दीवार से टकरा गया। आठों सिपाही दिलबीर सिंह पर टूट पड़े।

सरोज चीख़ने लगी।

ठाकुर दिलबीर सिंह लॉरी में बेसुध पड़ा हुआ था। उसके कपड़े जगह-जगह से फट गये थे

और लॉरी शहर की तरफ़ भागी जा रही थी।

उसी दिन शाम को पुलिस ने दिलबीर सिंह के मकान पर छापा मारा। काफ़ी तलाश के बाद आख़िरकार फ़रीदी उस तहख़ाने का पता लगाने में कामयाब हो ही गया था, जिसमें दिलबीर सिंह ने कोकीन बनाने का कारखाना क़ायम कर रखा था वहाँ से काफ़ी कोकीन बरामद हुई।

- इसके बाद वह और हमीद ड्रॉइंग-रूम में आ बैठे। सरोज पहले ही से उसका इन्तज़ार कर रही थी।

“तुम बहुत ज़्यादा परेशान नज़र आ रही हो।" फ़रीदी ने सरोज से कहा। “हालाँकि तुम्हें खुश होना चाहिए कि तुम इस जाल में फँसने से बच गयीं।" अगर दिलबीर सिंह को कभी तुम पर ज़रा-सा शक भी हो जाता कि तुम उसका राज़ जान गयी हो तो तुम्हारा भी वही अंजाम होता जो विमला का हुआ।"

“लेकिन आपको इन सब बातों का पता कैसे चला?' सरोज बोली।

“जब मुजरिम मेरी गिरफ्त में आ जाता है तो जिस तरह चाहता हूँ, आसानी से सब उगलवा लेता हूँ। सिर्फ़ दिलबीर सिंह ही इस कैद में नहीं, बल्कि उसके बारह साथी भी उसका साथ दे रहे हैं। ये सब शहर के छटे हुए शरीफ़ क़िस्म के बदमाश हैं।"

“आख़िर विमला इन लोगों के जाल में कैसे फँस गयी।” सरोज ने कहा।

“इसी वक़्त सनोगी।'' फ़रीदी ने सिगार सुलगाते हुए कहा। “खैर, सुनो! एक दिन जब तुम घर पर नहीं थीं, विमला ने दिलबीर सिंह को कुछ लिखते देख लिया। उसे हैरत हुई होगी और हैरत की बात भी है कि अन्धे लिखा नहीं करते। दिलबीर सिंह को इसका एहसास हो गया। उस वक़्त उसकी समझ में यही आया कि विमला को ले जा कर तहख़ाने में कैद कर दे। दिलबीर, विमला की तहरीर ले कर उसे तहख़ाने में बन्द करके चला आया। यह फ़ौरी काम उसने इसलिए किया था कि अपने दूसरे साथियों से राय लेने के बाद कोई दूसरी कार्रवाई कर सके। तुम्हारे आने पर उसने विमला का ख़त तुम्हें दे दिया था और तुम मुतमईन हो गयी थीं। क्यों, है ना यही बात। दिलबीर सिंह ने अपने साथियों से राय-मशवरा किया, जिनमें डॉक्टर सतीश भी शामिल था। डॉक्टर सतीश ने जो राय दी, उस पर सब राज़ी हो गये। इसलिए वहीं तहख़ाने में तेज़ रोशनी का इन्तज़ाम करके विमला और सतीश की एक तस्वीर खींची गयी। वह तस्वीर भी मुझे मिल गयी, लेकिन वह ऐसी नहीं कि तुम्हें दिखला सकूँ। बहरहाल विमला से कहा गया कि उसने दिलबीर का राज़ किसी को जाहिर किया तो वह तस्वीर उसके घर वालों और उसके मँगेतर के पास भेज दी जायेगी। इतना कुछ कर लेने के बाद भी उन लोगों को इत्मीनान नहीं हुआ। उसी दौरान उनके हाथ विमला के मँगेतर का एक ख़त लग गया, जिससे ज़ाहिर हुआ कि शायद इन दोनों के माँ-बाप में कुछ झगड़ा हो गया है और वे लोग शादी करने पर रज़ामन्द नहीं। इस ख़त को देखते ही दिलबीर सिंह ने एक स्कीम बनायी।

यह थी कि अगर रणधीर और विमला इस दौरान ग़ायब कर दिये जायें तो उनके माँ-बाप यही समझेंगे के शायद रणधीर, विमला को कहीं भगा ले गया। इस स्कीम को शुरू करने के लिए डॉक्टर सतीश, विमला का हमदर्द बन गया। उसने वह तस्वीर उसी के सामने जला दी और उससे कहा कि तुम रणधीर को एक ख़त लिखो कि वह तुम्हें यहाँ से आ कर निकाल ले जाये। डॉक्टर सतीश ने विमला को अच्छी तरह इत्मीनान दिलाया कि वह उसकी पूरी-पूरी मदद करेगा। रणधीर का जवाब आने पर उन्हें मालूम हो गया कि वह कब आ रहा है। जहाँ तक दोनों को क़त्ल कर देने की स्कीम का सवाल है, इन लोगों ने बड़ी चालाकी से काम लिया, लेकिन और ज़्यादा होशियार बनने के चक्कर में पुलिस को भी उसमें उलझा लेने की स्कीम बना कर धोखा खा गये। हालाँकि उनकी स्कीम थी बड़ी शानदार। उनका ख़याल था कि विमला और रणधीर के इस तरह गायब हो जाने से विमला के माँ-बाप इन दोनों का हुलिया जारी करायेंगे और जब पुलिस को मालूम होगा कि धर्मपुर के जंगल में लाश देखने वाला रणधीर सिंह ही था तो पुलिस और ज़्यादा सरगर्मी से उसकी तलाश शुरू कर देगी और शायद ऐसा होता भी। अगर ठीक वक़्त पर जंगली गीदड़ हमारी मदद न कर बैठते।

मैंने तुम्हें गीदड़ की लाश के बारे में बताया था। वह भी दिलबीर सिंह की हरकत थी। डॉक्टर सतीश कानपुर जा रहा था, रणधीर के घर की तलाशी लेने, ताकि विमला का ख़त ढंढ कर उसे जला सके। रास्ते में मुझसे मुठभेड़ हो गयी। वह गिरफ़्तार हो गया। उसके साथ और आदमी भी थे, जो उसके गिरफ़्तार होने के बाद रास्ते ही से पलट आये। उन्होंने इसकी ख़बर दिलबीर सिंह को दी। दिलबीर सिंह ने सोचा कि अब उसे भी ठिकाने लगा देना चाहिए, वरना हो सकता है कि पुलिस उससे उगलवा ले। फिर दिलबीर सिंह ने मुझ पर और हमीद पर भी हमला किया था, लेकिन तुम अभी तक नहीं जानतीं कि मुझे यह कैसे मालूम हुआ कि दिलबीर सिंह ही मुजरिम है। जिन लोगों ने मुझ पर हमला किया था, उनमें से एक की टॉर्च मेरे हाथ लग गयी। उसकी उँगलियों के निशान इस टॉर्च पर बाक़ी रहे जिन्हें मैंने काग़ज़ पर उतरवा लिया। मुझे दिलबीर सिंह पर शरू ही से शक था। हालाँकि वह एक अन्धे का पार्ट बड़ी सफाई से अंजाम दे रहा था। लेकिन...हाँ, तो जब मैं तुम्हें यहाँ छोड़ने आया था तो तुम्हें याद होगा कि तुमने हम लोगों को शर्बत पिलाया था। मैंने वह गिलास चुरा लिया जिसमें दिलबीर सिंह ने शर्बत पिया था उस पर दिलबीर सिंह की उँगलियों के निशान थे। उस गिलास के निशान और टॉर्च के निशान में कोई फ़र्क न निकला और फिर आपके ठाकुर साहब आख़िरकार धर लिये गये।"

“अच्छा, यह बताइए कि मेरा क्या हश्र होगा?'' सरोज ने परेशान हो कर पूछा।

“कुछ भी नहीं। तुम्हें सिर्फ सरकारी गवाह बनना पड़ेगा। मैं तुमसे पहले ही वादा कर चुका हूँ कि तुम्हें कोई नुक़सान न पहुँचेगा। अब तुम इतनी बड़ी जायदाद की अकेली मालिकन हो। दिलबीर सिंह तो फाँसी से बच नहीं सकता।"

“मैं आपका शक्रिया किस ज़बान से अदा करूँ। अगर मेरा कोई सगा भाई भी होता मेरे लिए इतना न कर सकता।”

“अच्छा तो मुझे सगा भाई नहीं समझतीं।" फ़रीदी ने रूठ जाने वाले अन्दाज़ में कहा।

“मेरा भैया।” सरोज ने कहा और उसकी आँखों में मुहब्बत के आँसू उमड़ आये।

इन भाई-बहन की मुहब्बत देख हमीद भी अपने आँसू रोके बिना न रह सका।

---समाप्त ---
 
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