S
StoryPublisher
Guest
चौथा हादसा
चार बजे शाम को फ़रीदी दिन भर का थका-माँदा घर आया था। आज वह दिन भर ठाकुर दिलबीर सिंह के दोस्तों को टटोलता रहा था। डॉक्टर सतीश के घर की तलाशी तो उसने उसी दिन ले ली थी जिस दिन उसका क़त्ल हुआ था। मामूली नाश्ते के बाद वह अपने कुत्तों की देख-भाल में लग गया। उसके पास एक दर्जन कुत्ते थे और हर कुत्ता अपनी मिसाल था। उसके बहुत सारे शौक़ अजीबो-गरीब थे। उसे अजायब-घर में अलग-अलग क़िस्म के जानवर परिन्दे और कीड़े-मकौड़े जमा करने का भी शौक़ था। उसकी कोठी का एक कमरा दनिया की अजीबो-गरीब चीज़ों के लिए था। उनमें सब से ज़्यादा अजीबो-गरीब चीज़ अलग-अलग क़िस्मों के साँप थे। वह इन साँपों के बीच माहिर सपेरा लगता था। उनमें से कई ऐसे भी थे जिनके ज़हर की थैलियाँ वह ख़ुद निकाल चुका था। उसकी इन हरकतों पर उसके सारे साथी उसका मज़ाक़ उड़ाते थे। उनका ख़याल था कि वह अपनी शोहरत के लिए इस क़िस्म की अजीबो-गरीब हरकतें किया करता है।
कुत्तों को खाना खिलाने के बाद फ़रीदी अपने अजायब-घर की तरफ़ गया। जैसे ही वह दूसरे बरामदे की तरफ़ मुड़ा, उसे सरोज दिखायी दी जो अजायब-घर से निकल रही थी।
“तो आपको भी इसका शौक़ है।” वह मुस्कुरा कर बोली।
“क्यों? क्या हुआ? तुम डरीं तो नहीं। वहाँ कई बहुत ही ख़ौफ़नाक चीजें भी हैं।"
“आख़िर आपने इतने सारे साँप क्यों जमा कर रखे हैं।"
“पता नहीं क्यों मुझे साँपों से इश्क़ है।" फ़रीदी ने कहा।
“लेकिन फ़रीदी भैया, यह शौक़ ख़तरनाक भी है।
___ “लेकिन ये मेरे लिए पालतू कुत्तों की तरह बेजरर हैं।"
“तो फिर आपने इनका ज़हर निकाल दिया होगा।"
“नहीं, ऐसा तो नहीं...इनमें से बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनका ज़हर आज तक निकाला ही नहीं गया।"
"इन्हें खिलाता-पिलाता कौन है?"
“मैं ख़ुद!” फ़रीदी ने कहा। “आओ तुम्हें तमाशा दिखाऊँ।"
दोनों कमरे में दाखिल हुए, फ़रीदी एक अलमारी के क़रीब पहुँच कर खड़ा हो गया। अलमारी के दरवाजों में नीचे की तरफ़ बहुत सारे छोटे-बड़े छेद थे।
फ़रीदी ने एक अलग तर्ज़ की सीटी बजायी। अचानक फुकारों की आवाजें सुनायी दी और अलमारी के छेदों से साँप निकलने लगे। सरोज चीख कर पीछे हट गयी।
“डरो नहीं, ये केंचुओं से भी बदतर हैं, इनमें ज़हर नहीं।"
फ़रीदी ने मेज पर से दूध का बर्तन उठा कर ज़मीन पर रख दिया। सारे साँप उस पर टूट पड़े। फ़रीदी ने दूसरा बर्तन भी उठा कर उसी के क़रीब रख दिया। लेकिन वे सब पहले बर्तन पर पिले । पड़ रहे थे। वह उन्हें हाथ से हटा-हटा कर दूसरे बर्तन के क़रीब लाने लगा। यह देख कर सरोज फिर चीख़ पड़ी।
फ़रीदी हँसने लगा।
__ "डरो नहीं सरोज बहन, ये सब मेरे दोस्त हैं।'
“मुझे यह तमाशा बिलकुल अच्छा नहीं लगा। मैं ड्रॉइंग-रूम में आपका इन्तज़ार । करूँगी।” सरोज यह कह कर बाहर चली गयी।
दोनों बर्तन साफ़ कर लेने के बाद सारे साँप धीरे-धीरे अलमारी के छेदों में वापस चले गये। फ़रीदी ने थोड़ी देर ठहर कर चारों तरफ़ नज़रें दौड़ायीं और कुछ गुनगुनाता हुआ बाहर निकल आया।
सार्जेंट हमीद तेज़ क़दमों से अजायब-घर के कमरे की तरफ़ आ रहा था। फ़रीदी उसे देख कर रुक गया।
“कहो भई, क्या ख़बर है?"
“कोई ख़ास ख़बर नहीं। कोतवाली से आ रहा हूँ। अभी-अभी दिलबीर सिंह का नौकर आपके नाम एक ख़त दे गया है।"
चार बजे शाम को फ़रीदी दिन भर का थका-माँदा घर आया था। आज वह दिन भर ठाकुर दिलबीर सिंह के दोस्तों को टटोलता रहा था। डॉक्टर सतीश के घर की तलाशी तो उसने उसी दिन ले ली थी जिस दिन उसका क़त्ल हुआ था। मामूली नाश्ते के बाद वह अपने कुत्तों की देख-भाल में लग गया। उसके पास एक दर्जन कुत्ते थे और हर कुत्ता अपनी मिसाल था। उसके बहुत सारे शौक़ अजीबो-गरीब थे। उसे अजायब-घर में अलग-अलग क़िस्म के जानवर परिन्दे और कीड़े-मकौड़े जमा करने का भी शौक़ था। उसकी कोठी का एक कमरा दनिया की अजीबो-गरीब चीज़ों के लिए था। उनमें सब से ज़्यादा अजीबो-गरीब चीज़ अलग-अलग क़िस्मों के साँप थे। वह इन साँपों के बीच माहिर सपेरा लगता था। उनमें से कई ऐसे भी थे जिनके ज़हर की थैलियाँ वह ख़ुद निकाल चुका था। उसकी इन हरकतों पर उसके सारे साथी उसका मज़ाक़ उड़ाते थे। उनका ख़याल था कि वह अपनी शोहरत के लिए इस क़िस्म की अजीबो-गरीब हरकतें किया करता है।
कुत्तों को खाना खिलाने के बाद फ़रीदी अपने अजायब-घर की तरफ़ गया। जैसे ही वह दूसरे बरामदे की तरफ़ मुड़ा, उसे सरोज दिखायी दी जो अजायब-घर से निकल रही थी।
“तो आपको भी इसका शौक़ है।” वह मुस्कुरा कर बोली।
“क्यों? क्या हुआ? तुम डरीं तो नहीं। वहाँ कई बहुत ही ख़ौफ़नाक चीजें भी हैं।"
“आख़िर आपने इतने सारे साँप क्यों जमा कर रखे हैं।"
“पता नहीं क्यों मुझे साँपों से इश्क़ है।" फ़रीदी ने कहा।
“लेकिन फ़रीदी भैया, यह शौक़ ख़तरनाक भी है।
___ “लेकिन ये मेरे लिए पालतू कुत्तों की तरह बेजरर हैं।"
“तो फिर आपने इनका ज़हर निकाल दिया होगा।"
“नहीं, ऐसा तो नहीं...इनमें से बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनका ज़हर आज तक निकाला ही नहीं गया।"
"इन्हें खिलाता-पिलाता कौन है?"
“मैं ख़ुद!” फ़रीदी ने कहा। “आओ तुम्हें तमाशा दिखाऊँ।"
दोनों कमरे में दाखिल हुए, फ़रीदी एक अलमारी के क़रीब पहुँच कर खड़ा हो गया। अलमारी के दरवाजों में नीचे की तरफ़ बहुत सारे छोटे-बड़े छेद थे।
फ़रीदी ने एक अलग तर्ज़ की सीटी बजायी। अचानक फुकारों की आवाजें सुनायी दी और अलमारी के छेदों से साँप निकलने लगे। सरोज चीख कर पीछे हट गयी।
“डरो नहीं, ये केंचुओं से भी बदतर हैं, इनमें ज़हर नहीं।"
फ़रीदी ने मेज पर से दूध का बर्तन उठा कर ज़मीन पर रख दिया। सारे साँप उस पर टूट पड़े। फ़रीदी ने दूसरा बर्तन भी उठा कर उसी के क़रीब रख दिया। लेकिन वे सब पहले बर्तन पर पिले । पड़ रहे थे। वह उन्हें हाथ से हटा-हटा कर दूसरे बर्तन के क़रीब लाने लगा। यह देख कर सरोज फिर चीख़ पड़ी।
फ़रीदी हँसने लगा।
__ "डरो नहीं सरोज बहन, ये सब मेरे दोस्त हैं।'
“मुझे यह तमाशा बिलकुल अच्छा नहीं लगा। मैं ड्रॉइंग-रूम में आपका इन्तज़ार । करूँगी।” सरोज यह कह कर बाहर चली गयी।
दोनों बर्तन साफ़ कर लेने के बाद सारे साँप धीरे-धीरे अलमारी के छेदों में वापस चले गये। फ़रीदी ने थोड़ी देर ठहर कर चारों तरफ़ नज़रें दौड़ायीं और कुछ गुनगुनाता हुआ बाहर निकल आया।
सार्जेंट हमीद तेज़ क़दमों से अजायब-घर के कमरे की तरफ़ आ रहा था। फ़रीदी उसे देख कर रुक गया।
“कहो भई, क्या ख़बर है?"
“कोई ख़ास ख़बर नहीं। कोतवाली से आ रहा हूँ। अभी-अभी दिलबीर सिंह का नौकर आपके नाम एक ख़त दे गया है।"