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जंगल में लाश

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“यही कि इसका वज़न दो-ढाई मन से किसी तरह कम न होगा।” हमीद ने जल्दी से कहा।

“आप तो तिलस्मी बातें कर रहे हैं।" वह हँसते हुए बोली।

"ये सार्जेंट हमीद हैं।' फ़रीदी ने हमीद की तरफ़ इशारा करते हुए कहा। “बहुत दिलचस्प आदमी हैं। आप इनकी बातों का कुछ ख़याल न कीजिएगा।"

“ओह, कोई बात नहीं।” औरत मुस्कुरा कर बोली।

फ़रीदी को अपनी बेवकूफ़ी पर अफ़सोस हो रहा था कि उसने चिड़िया का राज़ इतनी जल्दी क्यों उगल दिया। अपनी ग़लती का एहसास होते ही वह फ़ौरन सँभल कर बोला।

___ “मोहतरमा, बात दरअसल यह है कि हम लोग आप ही के मामले की छानबीन कर रहे हैं। अभी-अभी हमें मालूम हुआ है कि यहाँ से तीन मील के फ़ासले पर किसी गड्ढे से एक लाश बरामद हुई है। लेकिन वह किसी मर्द की है; आप परेशान न हों।"

“आपकी तो कोई बात ही समझ में नहीं आ रही है। अभी तो आप चिड़िया...!"

“ठीक है...ठीक है..." वह उसकी बात काटता हुआ बोला। हम जासूसों के काम करने का तरीक़ा जनता की समझ में नहीं आ सकता। बहरहाल, अगर तकलीफ़ न हो तो पहले हमें थोड़ा-सा पानी पिलाइए। आप देखती हैं कितनी सख़्त धूप है।

“ज़रूर...ज़रूर...अन्दर आ जाइए।" वह बरामदे की तरफ़ मुड़ती हुई बोली।

बरामदे में पहुँच कर दोनों ने अपने कोट उतार कर कुर्सियों पर डाल दिये और रूमाल से चेहरों का पसीना पोंछते हुए आराम से कुर्सियों पर गिर गये।

“यहाँ भी काफ़ी गर्मी है।" औरत बोली। “मेरे ख़याल से अन्दर ठीक रहेगा।"

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लाश की पहचान

ड्रॉइंग-रूम में पहुँच कर वे सोफे पर बैठ गये।

औरत ने नौकर को बुला कर पानी लाने को कहा। ड्रॉइंग-रूम को बहुत ही बेहतरीन तरीके से सजाया गया था। फ़र्श पर भारी और क़ीमती कालीन बिछा हुआ था। सोफे पर फूलदार रेशमी कपड़े के गिलाफ़ चढ़े हुए थे। दीवारों पर बड़े फ्रेमों में आर्ट के बेहतरीन नमूने नज़र आ रहे थे। फ़रीदी इस देहाती इलाके में यह शानो-शौकत देख कर हैरान था। थोड़ी देर के बाद नौकर शीशे के जग में ठण्डा पानी लाया।

“मेरे ख़याल से कुछ खा भी लीजिए।" औरत बोली।

___“जी नहीं, शुक्रिया।” फ़रीदी ने पानी के लिए हाथ बढ़ाते हुए कहा।

दोनों ने जी भर कर पानी पिया। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं।

“वाक़ई विमला देवी का इस तरह ग़ायब हो जाना हैरतअंगेज़ है।” फ़रीदी बोला।

हमीद चौंक कर उसकी तरफ़ देखने लगा। उसे हैरत हो रही थी कि फ़रीदी चिड़िया से विमला देवी तक क्यों कर जा पहुँचे।

“क्या बताऊँ, इन्स्पेक्टर साहब, कि मुझे कितनी परेशानी है।

“कुदरती बात है।” फ़रीदी सिर हिला कर बोला।

___ “अब मेरी समझ में नहीं आता कि उसके माँ-बाप को क्या जवाब दूंगी?"

“क्या आपने उन्हें इसकी कोई ख़बर दी।"

“अब तक तो नहीं...समझ में नहीं आता कि उन्हें क्या लिखू।"

“तो क्या वह कहीं दूर रहते हैं?'' फ़रीदी ने कहा।

“जी हाँ...कानपुर में...उसके पिता वहाँ रूई के बहुत बड़े व्यापारी हैं। शायद आपने नाम सुना होगा। सेठ करमचन्द।"

“ओह अच्छा ...तो वे यहाँ अपने शौहर से लड़ कर आयी थीं।” फ़रीदी बोला।

“नहीं...अभी उसकी शादी नहीं हुई। वह मेरी क्लास-फ़ेलो रह चुकी है। यूँ ही घूमने के लिए यहाँ आयी थी। तक़रीबन एक महीने की बात है।"

“अभी एक महीना और रहने का इरादा था।"

“जी हाँ।"

“क्या यह नहीं हो सकता कि वह किसी वजह से आपको ख़बर दिये बगैर कानपुर चली गयी हों।"

“ऐसी तो कोई वजह नहीं हो सकती कि वह नंगे पैर, बगैर सामान लिए यहाँ से चली जाये।"

“नंगे पैर...क्या मतलब?"

“जी हाँ...सारे सैंडिल उसके कमरे में मौजूद हैं और वह सारा सामान भी जो वह अपने साथ लायी थी।"

“हैरत की बात है।” फ़रीदी हमीद की तरफ़ देखते हुए बोला। “अच्छा, यह बताइए इस दौरान उनके पास बाहर से कुछ ख़त भी आये थे।"

“जी हाँ...वे ज़्यादातर उनके माँ-बाप या मँगेतर के होते थे।"

“हूँ...!” फ़रीदी ने कुछ सोचते हुए कहा। “क्या आपको इन ख़तों के देखने का भी इत्तफ़ाक़ हुआ।"

“जी नहीं।"

“उनके मँगेतर का क्या नाम है?"

“रणधीर सिंह।"

“रणधीर सिंह...!' फ़रीदी तक़रीबन उछलते हुए बोला। “क्या आपने उसे देखा भी है?"

“कई बार...!'

“क्या वह कभी यहाँ आया था।"

“नहीं, मैं उससे कानपुर में मिल चुकी हूँ।"

“तब आपको मेरे साथ कोतवाली तक चलने की ज़हमत करनी पड़ेगी।"

“क्यों...?” औरत ने हैरान हो कर पूछा।

“आज जिस शख्स की लाश धर्मपुर के जंगल में मिली है उसने भी अपना नाम रणधीर सिंह ही बताया था।"

“अरे...तो क्या...तो क्या।" औरत काँपने लगी।

“घबराने की कोई बात नहीं।” फ़रीदी उठते हुए बोला। “जल्दी कीजिए।"

अचानक दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ सुनायी दी और एक अधेड़ उम्र का मज़बूत आदमी कमरे में आ कर खड़ा हो गया।

उसने पतलून-कमीज़ पहन रखी थी। बड़े-से लम्बूतरे चेहरे पर उसकी बड़ी-बड़ी वीरान आँखें बहुत ही ख़ौफ़नाक मालूम हो रही थीं। दहाना काफ़ी फैला हुआ था और दोनों कानों पर घने बालों की लकीरें थीं। चेहरा इस तरह साफ़ था जैसे उसने अभी-अभी शेव की हो। साँस के साथ-साथ इसकी फूली हुई नाक के नथने फूल-पचक रहे थे। बाजुओं की उभरी मछलियाँ आस्तीन के ऊपर से साफ़ ज़ाहिर हो रही थीं।

“यह कौन है?' वह गरज कर बोला।

घबरा कर खड़ी हो गयी।
 
“जी, ये डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के इन्स्पेक्टर फ़रीदी साहब हैं। विमला वाले केस की तहक़ीक़ात के सिलसिले में आये हैं।' वह बोली।

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“अच्छा...!” वह छड़ी से ज़मीन टटोलते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ कर एक सोफे पर बैठते हुए बोला। “कहिए इन्स्पेक्टर साहब, कुछ पता चला?”

“अभी तक तो कुछ नहीं मालूम हो सका।" फ़रीदी ने कहा।

“ये मुझे अपने साथ कोतवाली ले जाना चाहते हैं।” औरत बोली।

“क्यों...?" उसने तेज़ आवाज़ में कहा।

“यहाँ कहीं कोई क़त्ल हो गया है।"

“तो फिर इस क़त्ल से तुम्हें क्या लेना-देना।" बूढ़े के लहजे में हैरत थी।

“मेरा ख़याल है कि मरने वाला विमला देवी का मँगेतर है।” फ़रीदी ने कहा।

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"चलिए, एक न सही, दो सही।" वह झुंझला कर बोला। “अभी विमला ही ने नाक में दम कर रखा था। अब उनके मँगेतर भी अल्लाह के प्यारे हो गये...जाओ भई, जाओ...जल्दी लौट आना। लेकिन ख़बरदार! अब तुम्हारी कोई मनहूस सहेली इस घर में क़दम न रखने पाये।"

वे तीनों उठ कर बाहर आये। औरत ने ड्राइवर से कार लाने को कहा और तीनों शहर

की तरफ़ रवाना हो गये।

“मोहतरमा! एक बात पूछ सकता हूँ।" फ़रीदी ने कहा। "ये कौन साहब थे?"

“ठाकुर दिलबीर सिंह...मेरे मरहम शौहर के बड़े भाई।"

"तो क्या यह अन्धे हैं?"

“जी हाँ...दो बरस हुए इनकी आँखों की रोशनी ख़त्म हो गयी।

“अगर कुछ हर्ज न हो तो अपने ख़ानदान के बारे में भी कुछ बता दीजिए।' फ़रीदी ने कहा।

“मैं आपका मतलब नहीं समझी।" औरत फ़रीदी को घूरते हुए बोली।

“मैं आपके ख़ानदानी हालात मालूम करना चाहता हूँ।"

“ओह...क्या आपने मशहूर साइन्सदाँ प्रकाश बाबू का नाम नहीं सुना। वे मेरे शौहर थे, तीन साल हुए उनका इन्तक़ाल हो गया।"

“प्रकाश बाबू!” फ़रीदी ने धीरे से दोहराया। “वही तो नहीं जो झील में डूब गये थे।"

“जी हाँ वही। उनके बाद से उनके बड़े भाई ठाकुर दिलबीर सिंह मेरी देख-भाल करते हैं। उन्होंने मुझे पिताजी के घर नहीं जाने दिया। मेरे पिता एक खुले दिमाग़ के आदमी हैं। वे मेरी दूसरी शादी करना चाहते थे, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। मगर मैं यह सब कुछ क्यों कह रही हूँ। आपको मेरे ख़ानदानी हालात से क्या सरोकार...?"

“अगर इससे आपको कोई तकलीफ़ पहुँची हो तो माफ़ी चाहता हूँ।” _

_“कोई बात नहीं...यह बयान मेरे लिए बहुत ही दर्दनाक होता है।"

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कोतवाली पहुँच कर इन्स्पेक्टर फ़रीदी उसे लाश वाले कमरे में ले गया। लाश को देख कर औरत बुरी तरह काँपने लगी। वह सचमुच विमला के मँगेतर ही की लाश थी। इस नये खुलासे पर कोतवाली में हलचल मच गयी। रणधीर सिंह और विमला के माँ-बाप को सरकारी तौर पर तार दिये गये, औरत बुरी तरह नाराज़ थी। अफ़सरों की बातचीत से उसने यह अन्दाज़ा लगाया कि शायद उसे हिरासत में ले लिया जाये।

“फ़रीदी साहब! मैं तो बड़ी परेशानी में फँस गयी।” औरत परेशान लहजे में बोली।

“घबराइए नहीं! चलिए, मैं आपके घर छोड़ आऊँ।”

फ़रीदी, हमीद को कोतवाली में छोड़ कर ख़ुद उस औरत के साथ चल दिया।

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दूसरी लाश

फ़रीदी जब उस औरत को पहुँचा कर वापस आया तो कोतवाली में सार्जेंट हमीद को अपना इन्तज़ार करता पाया। हमीद उसे बुरी तरह घूर-घूर कर देख रहा था।

“क्यों भई...इस तरह क्यों घर रहे हो?" फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला।

___ “मैं आपके होंटों पर लिपस्टिक के धब्बे तलाश कर रहा था।" हमीद ने सादगी से कहा।

"बड़े गन्दे ख़याल हैं तुम्हारे।” फ़रीदी मुँह सिकोड़ कर बोला।

“जी नहीं...मैं साफ़ ख़याल का आदमी हूँ। तभी तो मैं यहाँ अकेला छोड़ दिया गया था।"

"ओह...! तो यह कहो। तुम अच्छे-खासे गधे हो। अगर तुम मेरे साथ होते तो मैं कभी इतने काम की बातें न मालूम कर सकता।"

“जी हाँ...ऐसे मौके पर यही होता है।" हमीद उसी तरह मुँह चलाते हुए बोला।

“भई, ख़ुदा के लिए अब तुम जल्दी से शादी कर डालो, वरना अपने साथ मुझे भी ले डूबोगे।" फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला।

“नहीं साहब! आप इत्मीनान रखिए। मैं अकेला ही डूबूंगा।” ___

“अच्छा, बस, चुग़दपना ख़त्म करो। मुझे अभी बहुत कुछ करना है। अभी तक रात का खाना भी नहीं खाया। चलो, अब घर चलें। वहीं बातें होंगी। तुम्हें एक दिलचस्प ख़बर सुनाऊँगा। मैं उस अजीबो-गरीब चिड़िया की टाँगें काट लाया हूँ।"

हमीद हैरत से उसका मुँह देख रहा था।

घर पहुँच कर दोनों ने खाना खाया और एक-एक सिगार सुलगा कर आराम-कुर्सियों पर गिर गये। फ़रीदी दो-तीन लम्बे लम्बे कश लेने के बाद बोला “भई, वह औरत..."

“काफ़ी खूबसूरत है।" हमीद ने उसकी बात बीच में ही काट कर कहा।

“फिर वही बेवकूफ़ी की बातें।"

“आख़िर आप इस टॉपिक से भागते क्यों हैं?” हमीद ने मुस्कुरा कर पूछा।

“इसलिए कि मेरी आदत औरत के बजाय ख़तरों से खेलने की पड़ी है।” फ़रीदी ने जवाब दिया।

“यह सब फ़लसफ़ा है...या फिर मुमकिन है कि अल्लाह ने आपको किसी ख़ास मूड में बनाया हो।" हमीद ने हँस कर कहा।

“खैर, भई ये बातें फिर होंगी। मैं यह बताने जा रहा था कि उस औरत का नाम सरोज है। वह अपने शौहर के बड़े भाई के साथ उसी मकान में रहती है। मुझे वह अन्धा ठाकुर दिलबीर सिंह सन्दिग्ध मालूम होता है। सरोज के पति के बारे में बहुत-सी बातें मालूम हुईं। यह तो तुम जानते ही हो कि वह एक वैज्ञानिक था। आज मैंने उसकी लैब भी देखी जो अब बहुत ख़राब हालत में है। उसे अजीबो-गरीब चीजें जमा करने का भी शौक़ था। मैंने उसके बनाये हए अजायब-घर की भी सैर की। दुनिया भर की अजीबो-गरीब चीजें देखने में आयीं। विमला के कमरे की तलाशी ली; वहाँ कोई ख़ास चीज़ नहीं मिल सकी। उसके पास जो ख़त आये थे, उन्हें भी देखा; लेकिन कोई काम की बात न मालूम हो सकी। सरोज और दिलबीर सिंह पर सवालों की बौछार की, लेकिन कोई नतीजा न निकला। दिलबीर सिंह बहुत ज़िद्दी और चिड़चिड़ा आदमी था। उसने किसी बात का भी जवाब शराफ़त से न दिया। मेरा ख़याल है कि ये लोग काफ़ी दौलतमन्द हैं और उनकी आमदनी का ज़रिया जायदाद है। उनके रिश्तेदार ज़्यादा नहीं हैं। दो-तीन आदमी अकसर उनके यहाँ आ कर ठहरा करते हैं और बस...उनमें से एक डॉक्टर है, एक व्यापारी और एक वकील। ये सब यहीं शहर में रहते हैं। इनमें से एक आदमी का कैरेक्टेर बहुत ही ज़्यादा ख़राब है और वह है डॉक्टर सतीश। लेकिन यह मेरा अपना ख़याल है। शहर वाले तो उसे इज़्ज़त की निगाह से देखते हैं। वैसे वह मेरी ब्लैकलिस्ट पर है और शायद मेरे अलावा कोई और उसके कारनामे जानता भी न हो।"

“अभी तक तो इन बातों में मुझे कोई काम की बात नज़र नहीं आयी।" हमीद ने कहा। “सरोज के बारे में आपका क्या ख़याल है।"

“कोई बुरा ख़याल तो अभी तक नहीं है।'
 
“ठीक-ठाक तो मुझे भी नहीं लगती थी।" हमीद ने कहा।

“ठीक-ठाक तो उसे मैं भी नहीं समझता था। लेकिन अब यह ख़याल बदल देना पड़ा, क्योंकि इस चिड़िया की तलाश में उसी ने मेरी मदद की थी।"

"हाँ...वह चिड़िया की टाँगों का क़िस्सा क्या है।"

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“किस्सा कुछ नहीं। जो ख़याल मैंने पहले क़ायम किया था वह सच निकला। मैंने बातचीत के दौरान सरोज से चिड़िया के पंजों का ज़िक्र किया। सब कुछ सुन कर वह कुछ सोचने लगी, फिर अचानक चौंक पड़ी। मैंने उसे वे निशान दिखाये भी। उसका चेहरा उतर गया। वह मुझे अपने शौहर के अजायब-घर में ले गयी और कहने लगी मुझे ताज्जुब है कि इन्हें किसने इस्तेमाल किया। एक जूते के तले में लोहे के बने हुए चिड़िया के पंजे जड़े हुए थे, उसने मुझे बताया कि उसके शौहर ने वे जूते किसी विदेशी से ख़रीदे थे और उन्हें अपने अजायब-घर में रख दिया था। वह बहुत परेशान थी। बार-बार यही कहती थी कि आख़िर इन जूतों को किसने इस्तेमाल किया। मैं उन जूतों को अपने साथ लेता आया था और उन्हें फिंगरप्रिंट डिपार्टमेंट के हवाले कर आया हूँ। अगर मुजरिम ने मोज़े भी पहने होंगे तो उसमें उसके पैरों की उँगलियों के निशान होने ज़रूरी हैं।” फ़रीदी ख़ामोश हो गया। ___ हमीद हैरत से मुँह फाड़े सुन रहा था। फ़रीदी के ख़ामोश होते ही बोला, “लेकिन इस बात का क्या सुबूत है कि वाक़ई वह औरत जूतों के इस्तेमाल करने वाले को नहीं जानती।"

“अगर ऐसा होता तो वह मुझे जूते दिखाने की बजाय उन्हें छुपा देती।"

“ऐसा भी हो सकता है कि आपकी नज़रों में चिड़िया के पंजों की इतनी अहमियत देख कर उसने यही ठीक समझा कि जूते आपके हवाले करके आपका शक उस मकान में रहने वालों की तरफ़ से दूर कर दे, क्योंकि चिड़िया के पंजों के निशान उसके कम्पाउण्ड में भी पाये गये थे।"

“बहरहाल, इससे उसकी बेगुनाही तो साबित हो ही गयी। रह गये उस घर के दूसरे लोग या वहाँ आने जाने वाले, तो उनके अलावा और कौन उन जूतों को पहन सकता है।"

__ “कुछ भी हो...मामला बहुत उलझा हुआ है। मेरे ख़याल से तो इस घर भर के लोगों को हिरासत में ले लेना चाहिए।

“लेकिन मैं इसे ठीक नहीं समझता। मैंने सरोज को समझा दिया है कि वह उन जूतों के बारे में किसी से बात न करे और दिलबीर सिंह को भी यह बात न मालूम होने पाये। इन लोगों पर शक ज़ाहिर करने से क़ातिल बहुत ज़्यादा होशियार हो जायेगा।

“खैर, अब आपने क्या सोचा है?” हमीद ने जम्हाई लेते हुए कहा। ___

“मैं ग्यारह बजे की गाड़ी से कानपुर जा रहा

__ “क्यों...वहाँ जाने की क्या ज़रूरत है। विमला और रणधीर के माँ-बाप को तार दे दिये गये हैं।"

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“मुझे उनके माँ-बाप से कोई मतलब नहीं है। मैं तो जानना चाहता हूँ कि रणधीर यहाँ आया क्यों था। बहरहाल, मैं कल रात तक यहाँ वापस आ जाऊँगा। सरोज के मकान की निगरानी के लिए बता चुका हूँ और तुम ख़ास तौर पर सरोज पर नज़र रखना।"

“अजीब मामला है।” हमीद उकता कर बोला। “कभी आप कहते हैं कि मेरा शक उस पर नहीं है और कभी उसकी निगरानी का हुक्म फ़रमाते हैं।"

___“अगर इतना ही समझते होते तो मेरी जगह पर होते।” फ़रीदी ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

“बहरहाल, जो मैं कहता हूँ उस पर अमल करना और हाँ, निगरानी से मेरा यह मतलब नहीं कि आप उससे इश्क़ शुरू कर दें। आपको तो बस मौक़ा मिलना चाहिए।"

“आप परेशान न हों। मैं परायी बहू-बेटियों को अपना ही समझता हूँ।" हमीद ने मुस्कुरा कर कहा।

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“बेहतर है कि आप उन्हें परायी ही रहने दें। खैर, मज़ाक़ छोड़ो। हाँ, इस बात का ख़ास ख़याल रखना कि किसी पर यह ज़ाहिर न होने पाये कि मकान की निगरानी हो रही है। निगरानी के लिए मैंने अनवर, कुमार और वहीद को भेज दिया है और तुम उनके इंचार्ज हो। उनसे जो ख़बरें मिलें, उनका रिकॉर्ड रखना और हाँ. डॉक्टर सतीश की डिस्पेंसरी के पास एक फ़क़ीर बैठा है। उससे तुम्हें डॉक्टर सतीश के बारे में ख़बरें मिलेंगी। उसका भी ध्यान रखना।"

__ फ़रीदी ख़ामोश हो गया। उसके सिगार का धुआँ फ़िज़ा में छल्ले बना रहा था। थोड़ी देर तक वह चुप रहा फिर धीरे से बोला, “अभी तक फिंगरप्रिंट डिपार्टमेंट से कोई ख़बर नहीं आयी। मुझे तो उम्मीद नहीं कि जूते में किसी क़िस्म के निशान मिलेंगे। क़ातिल बहुत चालाक है। उसने ऐसी बेवकूफ़ी न की होगी।"

"हो सकता है।" हमीद ने कहा। “उसके फ़रिश्तों के जेहन में भी यह बात नहीं आ सकती कि आपका हाथ उन जूतों तक पहुँच जायेगा।"

“बहरहाल, अभी थोड़ी देर में मालूम हो जायेगा।"

फिर ख़ामोशी छा गयी।

थोड़ी देर बाद बरामदे में क़दमों की आहट सुनायी दी। एक आदमी अन्दर दाखिल हुआ और फ़रीदी के हाथ में काग़ज़ दे कर ख़ामोशी से एक तरफ़ खड़ा हो गया।

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“लो देखो, रिपोर्ट आ गयी।” फ़रीदी ने काग़ज़ हमीद की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा। “किसी क़िस्म के निशान नहीं मिल सके। हालाँकि निशान होने चाहिएँ थे। क्योंकि आजकल गर्मियों में आम तौर पर सब के पैर कुछ-न-कुछ ज़रूर पसीजते हैं। खैर, देखा जायेगा।"

वह थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा, फिर आने वाले की तरफ़ देख कर बोला, “अब तुम जा सकते हो।"

उस आदमी के जाने के बाद फ़रीदी हमीद की तरफ़ मुड़ा। “अच्छा भई, अब मैं जाने की तैयारी करूँ,” वह बोला, “देखो, बहुत ज़्यादा होशियार रहने की ज़रूरत है। ज़रा भी चूके नहीं कि काम बिगड़ा।"

“आप इत्मीनान रखिए। अब मैं पूरा-पूरा एहतियात बरलूँगा।” हमीद ने उठते हुए कहा।

“इस वक़्त नौ बजे हैं, लाश की शिनाख्त के वक़्त से ले कर ग्यारह बजे तक के बीच में एक के अलावा और कोई ट्रेन कानपुर न जायेगी।"

“मैं आपका मतलब समझ गया, लेकिन दसरा कोई कार से भी जा सकता है।" हमीद ने मुड़ कर कहा।

“हो सकता है कि ऐसा हो भी गया हो, लेकिन बेकार। रणधीर सिंह के मकान के क़रीब परिन्दा भी पर न मार सकेगा। मैंने इसकी तैयारी पहले ही कर दी है। लाश की शिनाख्त के बाद ही मैंने कानपुर के डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन को तार के ज़रिये ख़बर कर दी थी। इस वक़्त रणधीर सिंह के मकान के एक-एक कमरे में पुलिस के आदमी तैनात होंगे।"

“तो फिर अब आपके जाने की क्या ज़रूरत है?" हमीद ने कहा।

____“भई, हर एक के काम करने का तरीक़ा अलग होता है। अच्छा, अब मैं ज़रा अपना सामान दुरुस्त कर लूँ।'' फ़रीदी ने यह कह कर मुड़ने का इरादा ही किया था कि एक आदमी कमरे में दाखिल हुआ।

“वहीद...” फ़रीदी ने चौंक कर कहा, “क्या बात है?"

वहीद की साँस फूली हुई थी। वह रुक कर दम लेने लगा। फिर रुक-रुक कर बोला, “एक...लाश...और...!"

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"क्या मतलब...” हमीद जल्दी से बोला।

“मैं इन्स्पेक्टर साहब की हिदायत के मुताबिक़ उस मकान की निगरानी के लिए जा रहा था। जब मैं उस जगह पर पहुँचा जहाँ से रणधीर की लाश बरामद हुई थी तो मुझे सख़्त बदबू महसूस हुई। अँधेरा फैल चुका था। मैंने टॉर्च की रोशनी में एक औरत की लाश देखी। ऐसा मालूम होता था जैसे वह कहीं से खोद कर निकाली गयी हो।"

"तो फिर तुमने क्या किया।” फ़रीदी ने जल्दी से कहा।



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“मैं क़रीब के देहात से चार-पाँच आदमियों का इन्तज़ाम करके लाश कोतवाली उठवा कर लाया हूँ।"

“यह तुमने बहत अच्छा किया। हमीद, मेरा जाना नहीं रुक सकता। यह लाश दरअसल मुझे रोकने के लिए ही निकाली गयी है। अच्छा बताओ, वह लाश किसकी हो सकती है।'

___ “भला मैं क्या बता सकता हूँ।" हमीद ने कहा।

“यह उसी औरत की लाश है जिसका बयान रनधीर ने कोतवाली इंचार्ज से किया था, यानी विमला की लाश।”

"अरे...!" हमीद ने चौंक कर पीछे हटते हुए कहा। "लेकिन आप दावे के साथ किस तरह कह सकते हैं?”
 
“अभी तुम्हें यक़ीन आ जायेगा। तुम सीधे सरोज के यहाँ चले जाओ और उसे ले कर कोतवाली आओ। दिलबीर सिंह अगर उसे अकेले न आने दे तो उसे भी लेते आना, और हाँ, देखो, सब काम एहतियात से करना। मुमकिन है कि वापसी में मुझसे मुलाक़ात न हो सके। इसलिए गुड नाइट!” फ़रीदी यह कहते हुए कमरे में चला गया।

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दिलचस्प सफ़र

दिल्ली एक्सप्रेस पूरी रफ़्तार से चीखती-चिंघाड़ती भाग रही थी। इन्स्पेक्टर फ़रीदी एक बूढ़े आदमी के भेस में फ़र्स्ट क्लास में सफर कर रहा था। गर्मी की वजह से उसे नींद नहीं आ रही थी और अगर शायद उस वक़्त नींद आती भी तो न सोता, क्योंकि सामने वाली बर्थ पर लेटे हुए सिख पर उसने नज़र रखी हुई थी।

___ वह दो-तीन स्टेशन के बाद सवार हुआ था

और इस वक़्त अख़बार पढ़ रहा था। सबसे ज़्यादा दिलचस्प चीज़ यह थी कि उसने इस वक़्त भी काली ऐनक पहन रखी थी। फ़रीदी सोचने लगा कि अगर उसकी आँखें ख़राब होती तो इस वक़्त अख़बार न पढ़ता और अगर आँखें ख़राब नहीं तो रात के वक़्त काली ऐनक लगा कर पढ़ना किसी होशमन्द आदमी के लिए नामुमकिन है तो फिर इसका मतलब यह हुआ कि वह या तो पागल है या फिर... अभी वह सोच ही रहा था कि सिख ने उसकी तरफ़ रूख़ किया और मुस्कुराने लगा।

“क्यों साहब, कानपुर किस वक़्त आयेगा।" उसने जम्हाई लेते हुए कहा।

“कानपुर नहीं आयेगा, बल्कि हम लोग चार बजे कानपुर पहुंचेंगे।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

“एक ही बात है।'' उसने हँस कर कहा और फिर चौंक कर उठ बैठा। लेकिन दूसरे ही पल सँभल कर अपना जूता तलाश करने लगा।

जब वह बाथरूम से लौटा तो फ़रीदी के सामने खड़ा हो गया।

“फ़रीदी साहब, आदाब अर्ज़ है।'' उसने मुस्कुरा कर झुकते हुए कहा।

अगर फ़रीदी की जगह पर कोई और होता तो इस अचानक जुमले पर ज़रूर बौखला जाता लेकिन फ़रीदी पर इस बात का कोई असर न हुआ। सिख ने शायद यह समझा था कि अचानक पहचान लिये जाने पर फ़रीदी ज़रूर परेशान हो जायेगा। लेकिन जब उसने यह देखा कि फ़रीदी के इत्मीनान में किसी क़िस्म का फ़र्क नहीं आया तो वह ख़ुद बुरी तरह बौखला गया।

“आदाब अर्ज़।'' फ़रीदी ने लेटे-ही-लेटे कहा और फिर किसी ख़याल में डूब कर सिगार के कश लेने लगा जैसे कोई बात ही न हो।

सिख शायद उलझन में पड़ गया था कि अब क्या कहे। उसकी हालत बिलकुल उस बच्चे जैसी हो रही थी जिसकी शरारत से अचानक कोडे कार स्टार्ट हो जाये और वह बौखला कर यह सोचने लगे कि अब मशीन किस तरह बन्द की जाय। वह घुटी-घुटी आवाज़ में खाँसने लगा। फ़रीदी का अन्दाज़ ऐसा था जैसे उसके अलावा कम्पार्टमेंट में कोई और न हो।

"फ़रीदी साहब, कहिए कैसे पहचाना।" वह दोबारा झेंपी हुई हँसी के साथ बोला।

“ऊँ!' फ़रीदी चौंक कर बोला, “लेकिन मेरी शराफ़त की भी दाद दीजिए कि मैंने आपको पहचान कर भी पहचानने की ज़रूरत नहीं समझी।"

“आप भला मुझे क्या जानें।” वह घबरा कर एक क़दम पीछे हटते हुए बोला।

“क्यों सरदार जी! क्या अब भी यह बताने की ज़रूरत रह जाती है कि आपकी दाढ़ी और केश दोनों नकली हैं।'' फ़रीदी ने लेटे-ही-लेटे छत की तरफ़ देखते हुए कहा।

सिख चुपचाप अपनी बर्थ की तरफ़ लौट गया। फ़रीदी बदस्तूर उसी तरह लेटा छत की तरफ़ देख रहा था। हालाँकि चलती हुई ट्रेन के अन्दर हवा के झोंके आ रहे थे और पंखा चल रहा था, लेकिन फिर भी सिख के माथे पर पसीने की बूंदें साफ़ नज़र आ रही थीं। उसने सरहाने रखी हुई छोटी-सी अटैची से रिवॉल्वर निकाला और फ़रीदी की तरफ़ तान कर कहने लगा।

“बस, ख़बरदार, उठने की कोशिश न करना।”

“अजीब बेवकूफ़ हो।” फ़रीदी ने हँस कर उसकी तरफ़ देखते हुए कहा। “तुम्हारे दिल में यह ख़याल कैसे पैदा हुआ कि मैं उठने की कोशिश करूँगा?"

“बको मत!” सिख गरज कर बोला।

“देखो भई, बातचीत के दौरान तहज़ीब शर्त है। वरना मुझे कहीं सचमुच न उठना पड़े।" फ़रीदी ने संजीदगी से कहा। “तुम आख़िर चाहते क्या हो? सबसे पहले तुमने मुझे फ़रीदी कह कर पुकारा। हालाँकि लोग मुझे मेजर सरदार ख़ाँ कहते हैं, लेकिन मैंने बुरा न माना। फिर तुमने मेरा मज़ाक़ उड़ाने की ग़रज़ से यह कहा कि मैं तुम्हें पहचान गया। लेकिन मैं फिर भी टाल गया, हालाँकि मैंने चोरी नहीं की, डाका नहीं डाला कि तुम इस तरह से कहते कि कैसा पहचाना। मैं तो तुम्हारे मज़ाक़ पर कुछ न बोला। लेकिन मैंने ज़रा यह कह दिया कि तुम्हारी दाढ़ी और केश नक़ली हैं तो तुमने रिवॉल्वर निकाल लिया। अजीब आदमी हो। तुम्हें इस अँधेरे में काला चश्मा लगा कर पढ़ते देख कर पहले ही ख़याल हुआ था कि ज़रूर तुम्हारा दिमाग़ ख़राब है। पता नहीं लोग ऐसे आदमियों को अकेले क्यों सफर करने देते हैं। माना कि तुम किसी ऊँचे ख़ानदान से ताल्लक रखते हो। मगर ऐसा भी क्या कि मज़ाक़ की बातों पर रिवॉल्वर निकाल लो और फिर छेड़ पहले तुम्हारी ही तरफ़ से हुई थी। तुम मुझसे उम्र में छोटे हो, इसलिए नसीहत के तौर पर यह ज़रूर कहूँगा कि अपने ऊपर क़ाबू रखना सीखो और हाँ, रिवॉल्वर का रोब हर एक पर नहीं पड़ा करता। मैं सन १९६५ की जंग में हज़ारो को मौत के घाट उतार चुका हूँ। यह छै इंच का रिवॉल्वर मेरा क्या बिगाड़ लेगा। मुझे मेजर सरदार ख़ाँ कहते हैं, सरदार जी।"

सिख का रिवॉल्वर वाला हाथ बुरी तरह काँप रहा था। धीरे-धीरे उसका हाथ झुक गया। उसका चेहरा पसीने से तर था। थोड़ी देर तक वह चुप रहा फिर खंखार कर कहने लगा।

“माफ़ कीजिएगा मेजर साहब, मुझे धोखा हुआ है। अब आपसे क्या पर्दा। आप भी सरकारी आदमी हैं। मैं दरअसल सी.आई.डी. का इन्स्पेक्टर हूँ। आज कई दिन से मैं बहुत बड़े बदमाश के चक्कर में हूँ। मुझे दरअसल बड़ा धोखा हुआ है। क्या किया जाये कि आपकी आँखें उस कमबख़्त की आँखों से बहुत मिलती-जुलती हैं। मैं एक बार फिर माफ़ी चाहता हूँ जनाब मेजर साहब।”

___ “कोई बात नहीं।” फ़रीदी ने हँस कर कहा। “अक्सर धोखा हो ही जाता है। कहाँ जा रहे हैं

आप?"

“कानपुर!"

"चलिए, सफ़र मजे में कटेगा। मैं भी कानपुर जा रहा हूँ।”

“बड़ी ख़ुशी हुई।”

“आप आजकल कहाँ तैनात हैं?" फ़रीदी ने पूछा।

“इलाहाबाद में!”

"तब तो आप बड़े मज़े में होंगे।” फ़रीदी ने हँस कर कहा।

“क्यों मज़े में क्यों?” सिख ने हैरत से कहा।

“खूब अमरूद खाते होंगे।” फ़रीदी ने कह कर एक भद्दासा क़हक़हा लगाया। सिख भी हँसने लगा।

“आप सिगार पीते हैं?” फ़रीदी ने सिगार केस बढ़ाते हुए कहा।

“जी नहीं, शुक्रिया।"

“तो फिर कुछ बातें कीजिए, ताकि रास्ता कटे। अब तो नींद आने से दूर रही। रिवॉल्वर देखते ही रफूचक्कर हो गयी।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

“जी, मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ।'' सिख ने हँस कर दाँत निकाल दिये।

“कोई बात नहीं, कोई बात नहीं।” फ़रीदी ने कहा।

थोड़ी देर तक ख़ामोशी रही, फिर सिख बोला। “देखिए, वह बदमाश कब तक हाथ आता है।"

“कौन बदमाश?'' फ़रीदी चौंक कर बोला।

“वही फ़रीदी!” सिख ने कहा, “जिसके धोखे में आपको परेशान किया।"

“देखिए, अगर आप इसी तरह धोखा खाते रहे तो मुश्किल ही से उस पर हाथ पड़ सकेगा।" फ़रीदी ने हँस कर कहा। “हाँ, यह तो आपने बताया ही नहीं कि उसका जुर्म क्या है।"

“अरे साहब, मामूली जुर्म नहीं है।" सिख बोला। “आपने इलाहाबाद के कनाडा बैंक की चोरी का हाल ज़रूर सुना होगा। इस चोरी में उसी का हाथ था। उसके साथियों ने एक चौकीदार को भी जान से मार डाला।"

“तब तो वह बड़ा ख़तरनाक आदमी मालूम होता है।” फ़रीदी ने कहा। "और आप उसे अकेले गिरफ़्तार करने निकले हैं?"

“जी नहीं, हम कई हैं।"
 
“अच्छा!” फ़रीदी ने कहा।

"मुझे उम्मीद है कि वह जल्द ही गिरफ़्तार हो जायेगा।" सिख ने अपना चश्मा उतारने की तैयारी करते हुए कहा।

फ़रीदी उसकी आँखें देखते ही चौंक पड़ा और फिर दिल-ही-दिल में हँसने लगा।

“अच्छा भई मेजर साहब, अब तो नींद आ रही है। नमस्कार!” सिख ने जम्हाई लेते हुए

कहा।

“अच्छा साहब, गुड नाइट।” फ़रीदी ने जला हुआ सिगार खिड़की से बाहर फेंकते हुए कहा।

रात के तक़रीबन तीन बज रहे होंगे, सिख ख़र्राटे ले रहा था। फ़रीदी धीरे-धीरे उठा और अचानक सोये हुए सिख पर टूट पड़ा। सिख ने घबरा कर उठने की कोशिश की, लेकिन वह फ़रीदी की गिरफ़्त में बुरी तरह जकड़ा हुआ था।

कुछ नींद का खुमार, कुछ इस अचानक हमले की बौखलाहट। इन सब चीज़ों ने मिल कर उसमें मुक़ाबला करने की ताक़त न रहने दी। फ़रीदी ने उसकी टाई से उसके दोनों हाथ उसकी पीठ पर जकड़ दिये। अब वह बर्थ पर बेबस पड़ा हुआ गालियाँ बक रहा था। फ़रीदी खड़ा मुस्कुराता रहा। वह हमेशा ऐसे मौके पर अपने शिकार की फड़फड़ाहट से काफ़ी ख़ुश हुआ करता था।

“अब मैं अपने प्यारे सी.आई.डी. इन्स्पेक्टर के दर्शन करना चाहता हूँ।” फ़रीदी ने झुक कर सिख की दाढ़ी नोचते हुए कहा। मुट्ठी में बहुत-से बाल उखड़ आये और उसकी मुंडी हुई साफ़ ठोड़ी दिखायी देने लगी। फ़रीदी ने दाढ़ी के बाल नोच लिये और उसकी पगड़ी उतार दी।

__ “ओ हो! डॉक्टर सतीश! तुमसे इतनी जल्दी मिलने की उम्मीद न थी।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर

कहा।

वह बराबर गालियाँ बके जा रहा था।

“शोर मत मचाओ सतीश!” फ़रीदी गरज कर बोला। “आज ही तो तुम मेरी गिरफ्त में आये हो। देखता हूँ, अब कैसे बच निकलते हो। काफ़ी दिनों से मेरी निगाहें तुम पर थीं। मैं तुम्हारी करतूतों से वाकिफ़ था, लेकिन तुम क़ानून की गिरफ़्त से हमेशा बच निकलते थे।

“देखा जायेगा...इस वक़्त तुमने कौन-से क़ानून के तहत मुझे बाँध रखा है। तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते।" सतीश तेज़ी से बोला।

__“भेस बदल कर लोगों को धोखा देना।" फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। “कम-से-कम छै महीने के लिए तो ज़रूर जाओगे।"

“तुम मुझे खोल दो, वरना अच्छा न होगा।" डॉक्टर सतीश ने चीख़ कर कहा।

“और तुम्हें खोल ही देने पर क्या अच्छा होगा।” फ़रीदी ने हँस कर कहा। “तुम्हें खोल दूँ ताकि तुम मुझे अपने बिना लायसेंस के रिवॉल्वर का निशाना बना लो। क्यों, है न यही बात?"

"देखो, मैं फिर कहता हूँ कि मुझे खोल दो, वरना कहीं तुम्हें अपनी नौकरी से न हाथ धोने पढ़ें।"

___ “मैं पानी से हाथ धोने का आदी हूँ। उसकी आप फ़िक्र न करें।"

“तो तुम नहीं खोलोगे?"

"हरगिज़ नहीं!"

“अच्छा, देख लूँगा?"

“जी भर कर देख लेना, कहीं बाद में पछताना न पड़े। बहुत हो सकता है कि विमला और रणधीर भी अपना ज़ोर लगा कर तुम्हें ज़्यादा दिनों के लिए भिजवा दें।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

विमला और रणधीर का नाम सुन कर डॉक्टर सतीश के मुँह पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। वह फ़रीदी को हैरान आँखों से घूर रहा था।

"क्यों, चुप हो गये।” फ़रीदी ने अपना कन्धा उचकाते हुए कहा। "क्या ग़लत कह रहा हूँ? सचमुच बताना डॉक्टर, आख़िर इस भेस में तुम कहाँ और क्या करने जा रहे थे?"

“फ़र्ज़ करो मैं यह न बताऊँ तो?" डॉक्टर सतीश ने तेज़ी से कहा।

“तुम्हारी मर्जी...मैं किसी को किसी बात पर मजबूर करने का आदी नहीं, लेकिन उस वक़्त से डरो जब सिविल पुलिस के रंगरूट तुम्हारी पोज़ीशन का ख़याल किये बिना तुमसे सारी बातें उगलवाना शुरू कर देंगे। अगर सीधे-सीधे मुझे बता दोगे तो इस अजाब से तुम्हें छुटकारा मिल जायेगा...वरना!"

फ़रीदी थोड़ी देर तक रुक कर डॉक्टर सतीश के चेहरे के उतार-चढ़ाव को गौर से देखता रहा फिर अचानक बोला। “शाम वाली लाश विमला ही की थी ना?"

"हाँ-आँ, क्या मतलब!” डॉक्टर सतीश चौंक कर बोला। “तुम न जाने क्या उल्टी-सीधी हाँक रहे हो।”

“खैर, मेरा मक़सद हल हो गया और मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम आसानी से यह सब कुछ न बताआगे। खैर, फिर सही। अच्छा, इतना तो बता ही दो कि जब तुम मुझे पहचान गये थे तो मुझे छेड़ने की ज़रूरत ही क्या थी।"

डॉक्टर सतीश मुस्कुराने लगा। अचानक उसकी आँखें चमकने लगीं, उसने हँस कर कहा, “वाह फ़रीदी साहब, आप कैसे जासूस हैं कि । इतना भी नहीं समझे। भई, आपको दस बजे रात स्टेशन की तरफ़ आते देखा तो मुझे मज़ाक़ सूझा। मैंने सोचा कि क्यों न आपसे इसी तरह पहचान करायी जाये। मैंने सिख का भेस बदला और कार में बैठ कर फ़ौरन अगले स्टेशनों की तरफ़ रवाना हो गया। वहाँ से इत्तफ़ाक़न मुझे उसी डिब्बे में आना पड़ा जहाँ आप थे। यह इत्तफ़ाक़ नहीं तो और क्या है।" डॉक्टर सतीश हँसने लगा।

“बहुत अच्छे!'' फ़रीदी ने हँस कर कहा। “मेरी छुरी से मुझे ही मार रहे हो। डॉक्टर मेरे लिए तुम्हारी ये बातें किसी छै महीने के बच्चे की गाँ-गाँ से ज़्यादा मानी नहीं रखतीं। ज़रा यह तो बताओ कि तुम्हें इस बात का यक़ीन कैसे हो गया था कि मैं कानपुर ही की तरफ़ सफ़र करूँगा, जबकि ग्यारह बजे दूसरी तीन गाड़ियाँ अलग-अलग तरफ़ जाती हैं।"

डॉक्टर सतीश ख़ामोश हो गया। उसके चेहरे पर परेशानी साफ़ झलक रही थी।

“खैर, तो तुम यह भी नहीं बताना चाहते कि तुमने मुझे क्यों छेड़ा था।” फ़रीदी ने सिगार सुलगाते हुए कहा।

“देखो, मैं फिर कहता हूँ कि मेरे हाथ खोल दो।” डॉक्टर सतीश ने गुस्से में कहा।

___“और मैं तुमसे हाथ जोड़ कर कहता हूँ कि बार-बार तुम यही एक जुमला दुहराते जाओ।" फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

“तुम अजीब गधे के बच्चे हो।” डॉक्टर सतीश ने चीख़ कर कहा।

“ज़रा इस बात को साफ़ कर दो कि मैं गधे का बच्चा होने की वजह से अजीब हूँ या अजीब होने की वजह से गधे का बच्चा हूँ...या...फिर...!" फ़रीदी ने संजीदगी से कहा।

"तुम्हारा सिर!" डॉक्टर ज़ोर से चीख़ा।

“हाँ-हाँ, मेरा सिर!" फ़रीदी ने घबराहट में अपना सिर टटोलते हुए कहा। “क्या हुआ मेरे सिर को...मौजूद तो है।"

“चुप रहो, उल्लू के पट्टे!” डॉक्टर सतीश परेशान हो कर ज़ोर से चीख़ा।

“अच्छा, चुप हो गया उल्ल का पट्टा!” फ़रीदी ने उसी अन्दाज़ में चीख़ कर कहा और छत की तरफ़ देखने लगा।

डॉक्टर सतीश ने झुंझलाहट में अपना सिर दीवार से टकराया।
 
__“अरे-अरे, यह क्या कर रहे हो भई। अपने साथ मुझे भी फँसवाओगे क्या? अगर दीवार टूट गयी तो...” फ़रीदी ने उसकी तरफ़ झुकते हुए कहा।

डॉक्टर सतीश ने झुंझलाहट में उसके मुँह पर थूक दिया।

“यह तरीक़ा ठीक है।” फ़रीदी ने रूमाल से अपना मुँह साफ़ करते हुए कहा।

___“ख़ुदा के लिए मेरा पीछा छोड़ दो।” सतीश ने तंग आ कर कहा।

“लेकिन ख़ुदा ही का हुक्म है कि मैं तुम्हारा पीछा न छोडूं।" ___

“ओ यू ब्रूट!” डॉक्टर सतीश इस बुरी तरह चीख़ा कि उसकी आवाज़ भरी गयी और वह बेतहाशा हँसने लगा।

फ़रीदी ने भी क़हक़हा लगाया।

“खूब दिल खोल कर हँस लो, लेकिन इतना याद रखो कि मैं तुम्हें ज़िन्दा न छोडूंगा।” सतीश ने गुस्से से हाँफते हुए कहा।

“क्या करूँ डॉक्टर, जब से उस बोतल वाली गैस का असर दिमाग़ पर हुआ है, कभी-कभी बेवजह भी हँसी आने लगती है।” फ़रीदी ने संजीदगी से कहा।

डॉक्टर सतीश का मुँह फिर उतर गया। वह फ़रीदी को गौर से देख रहा था।

"डॉक्टर, सचमुच बताना वह किसका एक्सपेरिमेंट है। तुमसे तो उसकी उम्मीद नहीं...तुम ठहरे घामड़ आदमी।"

___ “तुम मुझे क्या समझे हो?” डॉक्टर सतीश सँभल कर बोला, “तुम न जाने क्या बक रहे हो। कैसी गैस, कैसा एक्सपेरिमेंट... घामड़ तुम ख़ुद होगे।"

“खैर, यह तो तुम्हारा दिल ही जानता होगा कि मैं कितना घामड़ हूँ।"

डॉक्टर सतीश ख़ामोश हो गया। इतनी देर तक चीखते रहने से वह निढाल-सा हो गया था। एक हारे हुए नाउम्मीद जुआरी की तरह उसने हाथ-पैर डाल दिये।

___ फ़रीदी अब भी उसे छेड़ रहा था, लेकिन वह बिलकुल ख़ामोश था। न जाने वह क्या सोच रहा था। फ़रीदी ने घड़ी देखी। गाड़ी पन्द्रह मिनट के बाद कानपुर पहुँचने वाली थी।

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तीसरा शिकार

दूसरे दिन फ़रीदी कानपुर से लौट आया। उसके साथ डॉक्टर सतीश भी था जिसकी निगरानी के लिए कानपुर के दो कॉन्स्टेबल साथ आये थे। हमीद, फ़रीदी को लेने के लिए स्टेशन आया था। वह डॉक्टर सतीश को इस हाल में देख कर हैरान था।

“ये हज़रत कहाँ ?” उसने फ़रीदी से कहा। “मैं यहाँ परेशान हो रहा था कि आख़िर ये कहाँ लापता हो गये।"

___“भई, मैं ऐसे दोस्तों को अपने साथ ही रखता हूँ।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

डॉक्टर सतीश उसे क़हर-भरी नज़रों से घूरने लगा।

वे लोग स्टेशन से निकल कर बाहर आये। हमीद, फ़रीदी की कार ले कर आया था। फ़रीदी ने डॉक्टर सतीश से कार में बैठने के लिए कहा, लेकिन वह खड़ा रहा। फिर नौबत यहाँ तक पहुँची कि कॉन्स्टेबलों ने उसे ज़बर्दस्ती कार में बिठाना चाहा। तभी एक फ़ायर हुआ और डॉक्टर सतीश चीख़ कर ज़मीन पर गिर पड़ा। गोली सिर की हड्डियाँ तोड़ती हुई माथे से निकल गयी थी। फ़रीदी और हमीद उस तरफ़ झपटे जिधर से फ़ायर हुआ था। लोग इधर-उधर भागने लगे। देखते-ही-देखते ऐसी भगदड़ मची मानो बमबारी होने वाली हो। फ़रीदी बुरी तरह झल्लाया हुआ था।

“बिलकुल बेकार है, हमीद...इन कमबख़्तों की बदहवासी की वजह से शिकार हाथ से निकल गया।" उसने रुक कर माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।

“यह आख़िर हुआ क्या?" हमीद ने पूछा।

“बहुत बुरा हुआ।” अब नये सिरे से काम करना पडेगा। सारी मेहनत पर पानी फिर गया।" फ़रीदी ने हाथ मलते हुए कहा। डॉक्टर सतीश की लाश कोतवाली लायी गयी। थोड़ी देर बाद इस हादसे की ख़बर सारे शहर में मशहूर हो गयी। फ़रीदी से बयान लिया गया। उसने सतीश की गिरफ़्तारी से ले कर मौत तक की सारी कहानी बता दी, लेकिन उसने अपने इस शक का ख़ुलासा न किया कि डॉक्टर सतीश का सम्बन्ध रणधीर वाले केस से भी है।

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कोतवाली से फुर्सत पा कर जब दोनों घर आये तो फ़रीदी ने हमीद से पूछा।

“हाँ भई, यह तो बताओ कि वह लाश विमला ही की थी न।"

“जी हाँ, विमला की थी!" हमीद ने कहा। “और सरोज हवालात में है।"

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"क्या मतलब?” फ़रीदी ने चौंक कर कहा।

“आपके जाने के बाद मैं सरोज को कोतवाली लाया। हालाँकि लाश ख़राब हो चुकी थी, उसका चेहरा बिगड़ गया था, लेकिन सरोज ने उसे पहचान लिया। उसका बयान दोबारा लिया गया। दिलबीर सिंह की ज़मानत हो गयी, लेकिन सरोज अभी तक हवालात ही में है।

_ “यह तो बहुत बुरा हुआ। इन गधों को कभी अक़्ल न आयेगी। सारा बना-बनाया खेल बिगाड़ दिया कमबख़्तों ने। तुमने उन्हें ऐसा करने से रोका क्यों नहीं?"

“मैंने चीफ इन्स्पेक्टर से कह कर रुकवाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने भी कोई ध्यान नहीं दिया।"

“खैर, और कोई ख़बर?"

"डॉक्टर सतीश यहाँ से ग़ायब ही हो गया था। दिलबीर सिंह और सरोज की गिरफ़्तारी के बाद मकान की निगरानी का कोई सवाल ही नहीं रह गया।"

"हमीद, तुम इतने बेवकूफ़ क्यों होते जा रहे हो।” फ़रीदी ने अपनी रान पर हाथ मारते हुए कहा। “तुम्हें यह कैसे सूझी कि यही दोनों मुजरिम हैं। इस क़िस्म के काम अकेले नहीं किये जाते हैं। शुरू ही से चीख़ता आ रहा हूँ कि इसमें किसी गिरोह का हाथ है। फिर भी तुमने ऐसी बेवकूफ़ी कर डाली, अफ़सोस!"

“अब क्या बताऊँ! हो गयी, तो हो गयी ग़लती।”

“बस, क़िस्सा ख़त्म, उल्ल कहीं के।"

“कानपुर में क्या रहा?" हमीद थोड़ी देर ख़ामोश रहने के बाद बोला।

“कानपुर में मैंने यह राय क़ायम की थी कि डॉक्टर सतीश ही इस गिरोह का सरगना है। लेकिन यह ख़याल ग़लत साबित हुआ। अगर ऐसा होता तो उसकी मौत इस तरह न होती। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि वह उस गिरोह के एक मामूली मेम्बर की हैसियत से काम कर रहा था। ख़ुद उसने किसी क़िस्म का बयान नहीं दिया, लेकिन मैंने अपने तरीकों से इस बात का पता लगा लिया था कि वह इस गिरोह से जुड़ा ज़रूर है। एक बात साफ़ न हो सकी कि वह उस वक़्त भेस बदल कर कानपुर क्यों जा रहा था। अगर उसका मक़सद रणधीर सिंह के घर की तलाशी लेना था तो उसने मुझे ट्रेन में छेड़ा क्यों था? चुपचाप निकल क्यों न गया?

"हाँ, वाक़ई यह चीज़ अजीबो-ग़रीब है।" हमीद कुछ सोचते हुए बोला।

“मैं एक नतीजे पर और पहुँचा हूँ; वह यह कि जिस वक़्त विमला के गोली लगी, वह रणधीर की मोटर साइकिल के कैरियर पर बैठी थी। रणधीर सिंह ने यह बयान ग़लत दिया था कि वह अकेला जलालपुर से आ रहा था और उसने धर्मपुर के जंगल में एक औरत की लाश देखी थी। गोली लगते ही विमला गिर गयी थी। उसके गिरने के बाद रणधीर यहाँ कुछ देर रुका भी

था।"

“यह आप किस तरह कह सकते हैं?" हमीद ने कहा।

“यह देखो, यह ख़त मुझे कानपुर में रणधीर के कमरे की तलाशी लेते वक़्त मिला था।" फ़रीदी ने जेब से ख़त निकाल कर हमीद की तरफ़ बढ़ा दिया।
 
हमीद ख़त पढ़ने लगा।

“रणधीर,

मैं एक बहुत बड़ी मुश्किल में फँस गयी हूँ। मुझे आ कर बचाओ। किसी तरह यहाँ आ कर मुझे ख़ामोशी से निकाल ले जाओ। देखो, यह बात किसी पर ज़ाहिर न होने पाये, वरना मेरी जान ख़तरे में पड़ जायेगी। मुझे लिखो कि तुम कब आ रहे हो, लेकिन इस तरह आना कि किसी को कानों-कान ख़बर न होने पाये। यह मेरी ज़िन्दगी का सवाल है। इस ख़त को पढ़ कर जला देना!

विमला"

“लेकिन इस ख़त से आपने उन सब बातों का अन्दाज़ा कैसे लगा लिया।

“बहुत आसानी से।'' फ़रीदी ने कहा। “अगर मुझे यह ख़त न मिलता तो मुझे न जाने कितना और भटकना पड़ता।"

“मैं आपका मतलब नहीं समझा।"

“यह कोई नयी बात नहीं।' फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। “तुम कभी मतलब नहीं समझते। खैर, सनो। जब यह ख़त रणधीर को मिला होगा तो उसने उसके जवाब में विमला को लिखा होगा कि वह उसे निकाल ले जाने के लिए आ रहा है और उसने उससे तमाम सवाल भी पूछे होंगे। हो सकता है कि यह ख़त उन लोगों के । हाथ लग गया हो, जिनके चंगुल से वह निकल जाने की कोशिश कर रही थी। उन्होंने यही ठीक समझा हो कि रणधीर को यहाँ आने दिया जाये और इस तरह विमला और रणधीर दोनों को। ख़त्म कर दिया जाये कि किसी को कानों-कान ख़बर तक न हो। रणधीर यहाँ आया, उसने मोटर साइकिल हासिल की और विमला को उस पर सवार करके ले भागा। क़ातिलों ने अपना प्लान पहले ही से तैयार कर रखा था। पहले उन्होंने विमला को ख़त्म किया। जब रणधीर यहाँ से पुलिस ले गया तो उन्होंने गोलियाँ चला कर पुलिस वालों को तो भगा दिया और रणधीर को वहीं ढेर करके दफ़्न कर दिया। इस तरह उन्होंने रणधीर को पुलिस की निगाहों में मुजरिम बना कर विमला के ग़ायब हो जाने का ज़िम्मेदार भी बना दिया।'

“लेकिन जब उन्होंने रणधीर को दफ़्न कर दिया था तो इस बात का कैसे पता चलता कि वह, यानी रणधीर, विमला का मॅगेतर था। आख़िर इसका इज़हार भी तो ज़रूरी था, वरना विमला की फ़रारी की ज़िम्मेदारी उस पर क्यों लग गयी होती।" हमीद ने कहा।

“बहुत आसानी से...विमला ने रणधीर को लिख दिया था कि वह किसी से इस बात का ज़िक्र न करे। इसलिए उसकी रवानगी की ख़बर किसी को न हो सकी। यह ज़रूरी बात है कि रणधीर के अचानक इस तरह गायब हो जाने से लोगों को यही ख़याल होता कि वे दोनों कहीं फ़रार हो गये हैं, जबकि लोग पहले से जानते ही थे कि दोनों एक-दूसरे के मँगेतर हैं।'

“हँ!” हमीद ने सोचते हुए कहा। “फिर मोटर साइकिल का नम्बर मिटाने की क्या ज़रूरत थी?"

___ “यह तो मामूली-सी बात है। अगर मोटर साइकिल का नम्बर न मिटाया जाता तो उसके मालिक का पता बहुत आसानी से चल जाता और रणधीर की लाश दफ़्न कर देने का मतलब ही यह था कि पुलिस इधर-उधर अँधेरे में सिर फोड़ती रहे। वह तो दुआ दो गीदड़ों को कि रणधीर की लाश बरामद हो गयी...वरना अभी पहला दिन होता।"

“अब आपने क्या सोचा है।" हमीद ने कहा।

"अभी कुछ नहीं सोचा। अभी तो फ़िलहाल मुझे सरोज को रिहा कराके जलालपुर पहुँचाना है।"

“है-है...इश्क़े-अव्वल दर्दे-दिल...ले लिया!" हमीद ने क़व्वाली की तर्ज पर झूमते हुए कहा।

“क्या बकते हो!” फ़रीदी बेचैन हो कर बोला।



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“अरे, क्या पूछते हैं हुजूर...बस यह समझ लीजिए कि पुराने लेखकों के शब्दों में वह कहते हैं न हसीना, नाज़नीना, मलायक फ़रेब, परी, महजबीं, ज़ोहरा जबीं, सरापा खाँसी-ओ-बुख़ार की घड़ियाँ कभी गिनती होगी और कभी रख देती होगी...ओ हो.. ओ...हो।"

“बस-बस, बकवास बन्द...वरना!"

“वरना आप मेरा हक़ भी मार लेंगे। बहुत-बहुत शुक्रिया।" हमीद ने हँस कर कहा।

“तुम हो अच्छे-खासे गधे।” फ़रीदी ने उकता कर कहा और आँखें बन्द कर के आराम-कुर्सी पर टेक लगा कर बैठ गया।

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ख़ानदानी पागल फ़रीदी हवालात में सरोज से मिला। वह उसे देख कर रोने लगी। उसकी रिहाई का इन्तज़ाम उसने पहले ही कर लिया था। वह उसे दिलासा देता हुआ जलालपुर ले आया। ठाकुर दिलबीर सिंह सरोज के आने की ख़बर सुन कर आपे से बाहर हो गया। उसकी आँखों में खून उतर आया। भवें तन गयीं और वह चीख़ कर बोला, “अब यहाँ क्या करने आयी हो? ख़ानदान की इज़्ज़त मिला दी ख़ाक में।"

“भैया जी, आख़िर इसमें मेरी क्या ग़लती है।' सरोज रोती हुई बोली।

“क्यों बुलाया था तुमने विमला को। खुद जान से गयी और हमारी गर्दन नाली में रगड़ गयी।" अन्धे दिलबीर सिंह ने चीख़ कर कहा। “अब यहाँ तम्हारा कोई काम नहीं। ठाकर अमर सिंह के ख़ानदान की बहू और जेल में जाये। तू भी प्रकाश ही के साथ क्यों न मर गयी।"

“ठाकुर साहब, भला इसमें इनकी क्या ग़लती है।' फ़रीदी ने नर्म लहजे में कहा।

“आप चुप रहिए जनाब। ये मेरे घरेलू मामले हैं।'' दिलबीर सिंह चीख़ कर बोला।

“ठाकुर साहब, मुझे शर्मिन्दगी है कि आप लोगों को तकलीफ़ उठानी पड़ी। अगर मैं यहाँ होता तो इसकी नौबत न आने पाती।” फ़रीदी फिर उसी अन्दाज़ में बोला।

__“तकलीफ़ न उठानी पड़ती।" दिलबीर सिंह झल्ला कर बोला। “आप क्या जानिए कि ख़ानदान की इज़्ज़त क्या चीज़ होती है।"

“मैं जानता हूँ, लेकिन अब जो हुआ, सो हुआ। इन्हें माफ़ कर दीजिए।” फ़रीदी ने कहा।

“अच्छा, तो आप सिफ़ारिश करने के लिए आये हैं। क्यों सरोज, इतनी जल्दी इतने जॉनिसार पैदा कर लिये।” उसने तीखे शब्दों में कहा।

सरोज रोने लगी।

“ठाकुर साहब, ऐसे बुजुर्ग पर ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं।” फ़रीदी ने नाख़ुशगवार लहजे में कहा।

“आप यहाँ से तशरीफ़ ले जाइए, और सरोज, तुम भी...तुम्हारा इस घर में अब कोई काम नहीं।"

सरोज ने दिलबीर के पाँव पकड़ लिये, लेकिन उसने उसे बेदर्दी से हटा दिया।

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“अब इस घर से मेरी लाश ही निकलेगी भैया जी।” सरोज रोती हुई बोली।

“तम यहाँ से चली जाओ, वरना सचमुच तुम्हारी लाश ही निकलेगी।” दिलबीर सिंह चीख़ कर बोला।

“ठाकुर साहब, आप सरोज को धमकी दे रहे हैं। इसलिए अब पुलिस को उन्हें अपनी हिफ़ाज़त में लेना पड़ेगा।"

“पुलिस!” दिलबीर सिंह ज़हरीली हँसी के साथ बोला, “पुलिस की हिफ़ाज़त में तो यह दो रातें रही है। क्या अभी तुम लोगों का जी इससे नहीं भरा!"

“क्या बक रहे हो ठाकुर, होश में आओ। तुम फ़रीदी से बात कर रहे हो।” फ़रीदी ने तेज़ी से कहा।

“ठाकुर, मैं तुम्हारा मुँह नोच लूँगी।'' सरोज अचानक बिफर कर बोली। “मैं राजपूतनी हूँ।"

“अच्छा, राजपूतनी की बच्ची! तुम जल्दी से यहाँ से अपना मुँह काला करो। ख़बरदार, कभी इस घर की तरफ़ आँख उठा कर भी न देखना।" दिलबीर सिंह गुस्से में काँपते हुए बोला।।

___ फ़रीदी सरोज को ले कर मकान के बाहर चला आया। अब वह फिर शहर की तरफ़ जा रहा था।

“मुझे बहुत शर्मिन्दगी है, सरोज बहन।”

"लेकिन आपने क्या किया है।' सरोज सैंधी हुई आवाज़ में बोली।

“मैंने तुम्हें पहले ही क्यों न अच्छी तरह महफूज़ कर दिया।"

“क़िस्मत का लिखा पूरा हो कर रहता है।" सरोज सिसकियाँ लेती हुई बोली। “अब मैं कहाँ जाऊँ। पिताजी से जा कर कहँगी क्या...शायद वे लोग भी मुझे घर में जगह देने से इनकार कर दें।"

“तुम इसकी फ़िक्र न करो। जब तक मैं ज़िन्दा हूँ, तुम्हें किसी तरह परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।” फ़रीदी ने कहा।

“मैं किसी के लिए भार बनना नहीं चाहती। मैं मेहनत-मजदूरी करके पेट पाल लूँगी।"

“क्या तुम एक भाई की गुज़ारिश ठुकरा दोगी। इन्सान होने के नाते मैं तुमसे गुज़ारिश करूँगा कि जब तक तुम्हारा कोई ठीक-ठाक इन्तज़ाम न हो जाये तब तक तुम मेरे घर पर रहो। मैं एक भाई की तरह तुम्हारी हिफ़ाज़त करूँगा।"
 
सरोज ख़ामोश हो गयी। उसकी पलकें ज़्यादा रोने की वजह से सूज आयी थीं उसने कार की खिड़की पर सिर रख कर अपना मुँह छिपा लिया।

“यह डॉक्टर सतीश के क़त्ल की क्या कहानी है?" थोड़ी देर बाद सरोज ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा। ___ फ़रीदी ने उसे पूरी कहानी बता दी। वह बड़े गौर से सुनती रही।

__“मेरी समझ में नहीं आता कि आख़िर यह सब क्या हो रहा है।” सरोज कार की सीट पर टेक लगाती हुई बोली।

“तो क्या तुम डॉक्टर सतीश को अच्छी तरह जानती थीं?"

“जी हाँ! वह तक़रीबन हर हफ़्ते हमारे यहाँ मेहमान रहते थे।"

“क्या दिलबीर सिंह से उसकी दोस्ती थी।"

“नहीं, वह दरअसल मेरे शौहर के दोस्त थे। उनकी मौत के बाद बड़े ठाकुर से उनकी गहरी छनने लगी।"

“विमला से वे बेतकल्लुफ़ थे या नहीं?"

"क़तई नहीं!"

“कभी विमला उनके साथ बाहर भी जाती थी या नहीं?"

"कभी नहीं!"

“क्या तुम यह बता सकती हो कि दिलबीर सिंह से उनकी दोस्ती क्यों थी?"

“यह बात मेरी समझ में नहीं आयी।"

__“अच्छा, तुम्हारे शौहर प्रकाश बाबू से उनकी दोस्ती क्यों थी?"

“मेरे पति एक मशहूर वैज्ञानिक थे। वे आये दिन नये प्रयोग किया करते थे। डॉक्टर सतीश को भी इससे दिलचस्पी थी। मेरा ख़याल है कि दोनों की दोस्ती का कारण यही था।"

“तुम्हारे शौहर किस क़िस्म के प्रयोग किया करते थे। उनका कोई-न-कोई टॉपिक ज़रूर होगा।'

“उन्हें गैसों के प्रयोग का ज़्यादा शौक़ था। इस सिलसिले में वे कई बार बहुत बीमार भी पड़े थे।"

“बीमार कैसे पड़े थे।” फ़रीदी ने दिलचस्पी ज़ाहिर करते हुए कहा।

“एक बार तो बहुत ही अजीबो-गरीब बात हो गयी थी। प्रकाश बाबू अपनी लेबोरेटरी में किसी गैस पर प्रयोग कर रहे थे कि अचानक उन पर हँसी का दौरा पड़ा। मैं उनकी हँसी सुन कर जब उधर जा पहुँची, तो पहले तो मैं समझी कि किसी बात पर हँस रहे होंगे। इसलिए उन्हें हँसते देख कर मैं भी यूँ ही हँसने लगी और मैंने उनसे हँसी का सबब पूछा, लेकिन जवाब नदारद। वे बराबर हँसते ही जा रहे थे। थोड़ी देर के बाद उनकी आँखें लाल होने लगी और मुँह से झाग निकलने लगा। दो-तीन मिनट तक ऐसे ही रहा फिर अचानक वे बेहोश हो कर गिर गये।"

“अच्छा, फिर होश में आने के बाद तुमने इसका सबब उनसे पूछा था।"

“मैंने कई बार मालूम करने की कोशिश की, लेकिन वे हमेशा टालते रहे।"

“उस क़िस्से को तुम्हारे अलावा कोई और भी जानता था।" __“जी हाँ, बड़े ठाकुर साहब भी वहाँ आ गये थे। उस वक़्त उनकी आँखें ठीक थीं और डॉक्टर सतीश को भी मालूम था। जहाँ तक मेरा अन्दाज़ा है इन दोनों और घर के नौकरों के अलावा और किसी को भी इस क़िस्से की ख़बर नहीं हुई थी।"

____ “तुम यह दावे के साथ कैसे कह सकती हो।"

“दावे के साथ तो नहीं कह सकती। अलबत्ता, यह मेरा अन्दाज़ा है, क्योंकि प्रकाश बाबू ने इन सब को मना कर दिया था कि वे इसके बारे में किसी से कुछ न कहें।"

__“हँ!” फ़रीदी कुछ सोचते हुए बोला। "अच्छा, यह बताओ कि तुम्हारे ख़याल में चिड़िया के पंजों वाले उन जूतों को कोई और इस्तेमाल कर सकता है?"

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उस कमरे में, जहाँ वह अजायब-घर है, हमेशा ताला लगा रहता है और उसकी कुंजी या तो मेरे पास रहती है या ठाकुर साहब के पास।" __“खैर!” फ़रीदी ने खाँसते हुए कहा। “मगर भई, तुम्हारे ये ठाकुर साहब बड़े ज़ालिम आदमी मालूम होते हैं।"

“नहीं, ऐसी बात नहीं। मैंने पहली बार उन्हें इस कदर गुस्से में देखा है। इनकी नर्म दिली सारे इलाके में मशहूर है। वे भंगियों तक को बेटा कह कर पुकारते हैं। मेरी याददाश्त में उन्होंने कभी किसी से बदतमीज़ी नहीं की। आज उनकी ज़बान से ऐसे अलफ़ाज़ निकले हैं कि मुझे अपने कानों पर यक़ीन नहीं आता।'

फ़रीदी कुछ सोच रहा था। उसकी आँखें अपने अन्दाज़ में घूम रही थीं। अचानक उनमें अजीब क़िस्म की वहशियाना चमक पैदा हो गयी।

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