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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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मैने मीरा और अंजलि दोनो को अपने-2 कपड़े निकालने को बोला और अपने भी निकाल दिए, हम तीनों ही नंगे हो गये. उसकी हल्के बालों से घिरी चूत माल पुआ की तरह फूली हुई थी.

मैने उसके कान में पुछा- क्यों रानी कितने लंड ले चुकी हो अबतक,

तो वो बोली ज़्यादा नही बस एक दो बार ही गया है अभी तक.

मैने मीरा को घोड़ी बना कर उसके उपर आने को कहा और उसको पीठ के बल चारपाई पे लिटा दिया और उसकी रस से लिथडी चूत में अपना मूसल डाल दिया, आधा लंड ही गया होगा कि वो आँखे बंद करके गर्दन उँची करके कराह…

आहह…हह… धीरीई… द.एयेए..र्र…ड्ड.. होता है, मैने मीरा का मुँह दबा के उसकी चुचियों को चूसने के लिए कहा तो वो उसकी चुचियों को पीने लगी मैने अपने दोनो हाथ मीरा की चुचियों पर कस दिए और उसकी चूत को जीभ से चाटने लगा… मीरा के मुँह से भी चुचि छोड़ कर सिसकारी फूटने लगी..

इधर मेरा मूसल उसकी रस से लबालब ओखली की कुटाई में लगा था. बता नही सकता कितना मज़ा किसको आ रहा था. 10 मिनट उसकी चूत चोदने के बाद वो पानी छोड़ गयी.

मैने अपना गीला लंड उसकी पानी छोड़ चुकी चूत से खींचा और मीरा की रस गागर में पेल दिया, मीरा भी रम्भाति हुई हाए-हाए करने लगी और अपनी गान्ड मटका-2 के मेरा लंड लेने लगी.

2 घंटों की धमा चौकड़ी के बाद हम तीनों ही पस्त होकर पड़ गये, कुछ देर के बाद मीरा उठके अपने काम में लग गयी.

मैने अंजलि की गान्ड में उंगली डाल दी, तो वो उछल पड़ी,

मैने कहा चल मज़े ले लिए हों तो जाके उसकी मदद कर, काम जल्दी हो जाएगा वरना बेचारी को डाँट पड़ेगी, तो फिर वो भी उसके साथ काम में हाथ बांटने चली गयी और मे अपने रास्ते हो लिया……!!!

ऐसे ही एक-दो बार और मौका पा कर मैने उस मस्तानी लौंडिया को चोदा, कुछ दिनो में वो अपने गाँव चली गयी.

अब मीरा पूरी तरह से अकेले फुल मज़ा ले रही थी, समय बीतता रहा, सर्दियाँ शुरू हो गयी.

सर्दियों में पिता जी की हालत बिगड़ने लगी एलेर्गिक होने की वजह से और बीते दिनों में ज़रूरत से ज़यादा काम का बोझ और ज़िम्मेदारियों ने उनकी शारीरिक क्षमता को ख़तम ही कर दिया था,

अब वो आए दिन बीमार रहने लगे, जिसकी वजह से मे कहीं जाके अपने जॉब वग़ैरह की सोच भी नही पारहा था, पिता जी को दमा हो गया, और दौरे पड़ने लगे.

श्याम भाई एक-दो बार दिल्ली भी ले गये चेक कराने, लेकिन पिता जी एल्लोपेथिक इलाज़ के फेवर में नही थे सो आयुर्वेद का इलाज़ चलने लगा, जिसकी महीने के महीने दवाएँ दिल्ली से आती, जिसे लेने श्याम भाई जाते एक हफ्ते पहले और इसी बहाने मौज मस्ती कर के लौटते.

खेती का ज़्यादातर काम मेरे ज़िम्मे आ गया, मे मजदूरों को लेके खेती वाडी देखने में लगा रहता.

 
जन्वरी के महीने की शुरुआत ही हुई थी, भयंकर सर्दी, पारा कभी-2 शून्य से भी नीचे चला जाता था, श्याम बिहारी 3 दिन से दिल्ली में पड़े मौज कर रहे थे.

मुझे एक लास्ट खेत मे गेहूँ की बुआई करनी थी, अरहर (टूअर) काट कर खेत तैयार करने में देरी हो गयी थी.

सुबह-2 जब मे खेत बोने घर से चला ही था, पिता जी धूप में बैठे थे मुझे रोक कर बोले थोड़ा जल्दी काम ख़तम करके आना, ना जाने उनको आभास सा हो गया था शायद की अब समय आ चुका है जाने का.

मैने कहा ठीक है दोपहर तक गेहूँ खेत में डालकर ट्रॅक्टर से मिलाने को बोल कर आता हूँ.

मैने खेत में पहुँच कर गेहूँ का बीज़ पूरे खेत में फैलाया, कोई 3-4 एकर का खेत था, इसी काम में 2 घंटे निकल गये, ट्रॅक्टर से मिलने की शुरुआत ही की थी, कि एक पड़ोसी भागते हुए आया और बोला, अरुण जल्दी चल तेरे पिता जी की हालत ज़्यादा खराब हो गयी है.

मे उसको ट्रॅक्टर थमा कर भागा-2 घर पहुँचा, जब उनके पास पहुँचा तो हमारे गाँव के ताउजी जो कि वैद्या भी हैं, वो उनकी नब्ज़ पकड़े हुए थे.

पिता जी ने मेरी ओर देखा, आँखों के कोरों से पानी बह रहा था, मुझसे कुछ बोलना चाहते थे आवाज़ नही निकली, कफ ने गले को जकड रखा था.

बोलने की कोशिश में कुछ घरर-2 सी आवाज़ निकली और उनका मुँह खुला का खुला रह गया.

वैद्य जी ने कहा उनके पैर की नाड़ी को दवा के देखा, मैने उनके पैर में हील के जस्ट उपर की नाड़ी को टटोला एक-दो हल्की सी फड़कन महसूस हुई, और बस….. उनकी आत्मा मुँह के रास्ते वातावरण में विलीन हो गयी..

वैद्य जी ने हाथ छोड़ दिया और बोले- इनको जल्दी चारपाई से नीचे लेलो अब ये नही रहे.

आख़िरकार अपने कमजोर शरीर और बीमारियों से हार कर पिता जी हम दोनो भाइयों को बेसहारा छोड़ कर अंतःपुर को चले गये.

नीचे ज़मीन पर लिटा कर भावशून्य अवस्था में खड़ा होकर मे उनके खुले हुए मुँह को ही ताड़ता रहा कितनी ही देर.

भले ही मैने अकेले रह कर कितने ही ज़िम्मेदारी भरे काम किए थे अपने गुज़रे दिनो में लेकिन ना जाने क्यों आज मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आज मे बिल्कुल अकेला रह गया हूँ, आज मे अपने को अनाथ महसूस कर रहा था.

मेरे चचेरे बड़े भाई प्रेम चन्द जी ने मेरे कंधे पकड़ कर हिलाया और आवाज़ दी- अरुण..अरुण.. कब तक खड़ा रहेगा..? इनका दाह संस्कार भी करना है, तब मेरी आँखों से दो बूँद आसुओं की टपकी लेकिन मुँह से एक हिचकी तक नही निकली.

मैने हड़बड़ा कर कहा- अब क्या होगा भैया..? मे तो अकेला हो गया, अब क्या करूँ..?

वो बोले- अरे तू अकेला कहाँ है, हम सब हैं ना तेरे साथ.. ! तू जो बोलेगा, जैसा कहेगा, हम सब इंतेजाम कर देंगे, तू चिंता ना कर मेरे भाई..!

मे उनके कंधे से लग कर फफक पड़ा… उन्होने मुझे ढाढ़स बँधाया और जैसे-तैसे मुझे चुप कराया.

मेरी माँ और छोटी वाली बेहन जो वहीं थी, वो दहाड़ें मार-2 कर रो रही थी, औरतें उनको चुप करने में लगी थी और साथ-2 खुद भी रो रही थी.

गाँव मोहल्ले के सभी लोगों ने मिलकर दाह संस्कार की विधि को जैसा विधान के हिसाब से होना चाहिए संपन्न कराया और मैने अपने पिता के पार्थिव शरीर को अग्नि के सुपुर्द कर दिया.

सभी भाइयों को प्रेम भैया ने टेलीग्राम कर दिया था, टेलिफोन की सुविधा अभी तक नही थी आस-पास.

तीसरे दिन दोनो बड़े भाई और श्याम बिहारी पधारे तब तक हम सभी मुंडन संस्कार भी कर चुके थे. मैने किसी से कोई सवाल जबाब नही क्या, सबने श्याम को बहुत खरी-खोटी सुनाई, वो मुँह लटकाए सुनते रहे.

तेरहवीं के बाद हम चारों भाई एक साथ बैठे और भविश्य के बारे में सलाह मशविरा किया, जिसमें तय हुआ कि हम चारों में से किसी एक को तो गाँव में रहना ही होगा, अच्छी-ख़ासी ज़मीन जायदाद की देखभाल भी करनी है.

दोनो बड़े तो अपनी-2 नौकरियों पर सेट थे बाल-बच्चे दोनो के हो चुके थे जो पढ़ लिख भी रहे थे, बचे हम दोनो जो अभी तक नौकरी की तलाश मे थे.

मुझे इन्मिच्योर डिक्लेर करते हुए फ़ैसला कर दिया कि श्याम इस सबकी देख भाल करेगा, जब तक उसके बाल-बच्चे अपने पैरों पर खड़े नही हो जाते, कोई भी अपना हिस्सा नही माँगेगा उससे, अरुण की जब तक नौकरी नही लगती है वो घर रह कर मदद करेगा.

उन दोनो के चले जाने के बाद मेरा भी ज़्यादा दिन घर पर मन नही लगा और मे भी एक दिन अपना बॅग उठाए हरियाणा अपने चचेरे भाई यशपाल जी जो मेरे ज़्यादा हितैषी थे पूरे घर में उनके पास चला गया जहाँ बहुत सारी कंपनियाँ थी.

जैसा कि मे पहले उनके बारे में लिख चुका हूँ कि यशपाल भैया वहाँ स्टेट गॉव में अग्रिकल्चर ऑफीसर हैं.

में कुछ दिन उनके पास मुफ़्त की रोटियाँ तोड़ता रहा, और भाग-दौड़ करके जल्दी ही एक लिमिटेड कंपनी में ट्रेनी इंजिनियर के तौर पर लग गया.

एक साल की ट्रैनिंग थी, तो स्टाइ फंड के तौर पर उस समय 1500/- महीना मिलता था. अकेले के लिए ठीक ही थे, वैसे भी भाई साब ने मुझे अलग रहने से मना कर दिया था, क्योंकि कुछ उनको भी सहारा था मुझसे और मेरा उनसे.

उनकी उस समय 3 बड़ी प्यारी बच्चियाँ थी सबसे बड़ी बेटी ने अभी स्कूल जाना शुरू ही किया था, दूसरी उससे ढाई साल छोटी और तीसरी मेरे वहाँ जाने के कुछ महीने पहले ही पैदा हुई थी.

वो एक किराए के मकान में रहते थे, 4 कमरों का मकान दो हिस्सों में बना था, एक हिस्से में उनके ही महकमे के मुछड भाई साब रहते थे नाम था इंद्रमनी शर्मा,

वो भी यूपी से ही थे बड़ी-2 मूँछे, हॅटा-कट्ता शरीर, देखने से ही कोई पोलीस के बड़े अधिकारी लगते थे.

दोनो में घनिष्ट मित्रता थी. उनकी शादी 5 साल पहले ही हुई थी लेकिन अभी तक कोई बच्चा नही था. उनकी वृद्ध माँ और छोटा भाई भी उनके साथ रहता था, जो उन दिनो पोस्ट ग्रॅजुयेशन कर रहा था.

पिता जी की मृत्य के बाद मे कुछ धार्मिक सा हो गया था क्योंकि जब मैने 10 दिनो तक वैदिक रीति से उनका कर्म- कांड कराए थे सारे दिन सिर्फ़ एक चाइ के सहारे सर्दियों में नंगे बदन तर्पण करना शास्त्री जी के साथ बैठ कर.

तो आदत सी पड़ गयी थी शुद्ध और धार्मिक रहने की, हर मगलवार (ट्यूसडे) को व्रत के साथ-2 सुंदरकांड का पाठ भी करता था.

मे सारी बीती हुई घटनाओं को भूल कर अपनी ड्यूटी और अपनी प्यारी-2 भतीजियों के साथ में बिज़ी हो गया, भैया और भाभी दोनो ही बहुत अच्छे थे, मुझे अपने सगे भाइयों से भी ज़्यादा प्यार मिल रहा था उनके साथ....

हम जिस एरिया में रहते थे, वो रहने के हिसाब से बहुत अच्छा था, लेकिन थोड़ा पहाड़ी के नीचे का था जो शाहर के दूसरे हिस्सों से थोड़ा उचाई पर था, जिसकी वजह से कॉर्पोरेशन का पानी वहाँ तक कभी-2 ही पहुँच पाता था. इसलिए हम सभी को रात में ही उठके कुछ नीचे के एरिया से बल्टियों से पानी ढोना पड़ता था.

भैया भाभी की 12 महीने की आदत थी सुबह 3-4 बजे से उठ के ही नहाना-धोना, पानी का इंतेजाम करना, जिसमें मुझे भी उनकी हेल्प करनी होती थी.

इंद्रमनी और उनका परिवार इतना जल्दी नही उठते थे, और उनको हर रोज़ पानी की समस्या से दो-चार होना पड़ता था.

एक दिन मगलवार का दिन था, नहा धोकर मे फॅक्टरी जाने से पहले सुंदरकांड का पाठ कर रहा था, मात्र अंडरवेर और उसके उपर एक तौलिया लपेटे हुए, कोई 52 दोहे हो चुके थे मात्र 7-8 दोहे का पाठ ही शेष था. भाई साब अपने फील्ड के दौरे पर गये हुए थे.

कि भाभी घबराई हुई आई और बोली, भाई साब देखना वो इंद्रमनी भाई साब के साथ कुछ झगड़ा हो गया है नीचे.

मैने रामायण के गुटके को प्रणाम किया और क्षमा माँगी शेष बचे हुए पाठ के लिए और यूँही तौलिए में ही उठके भागा.

जिन लोगों से झगड़ा हो रहा था वो 6 भाई थे और उनकी एक ताड़िका जैसी माँ थी, सबके सब साले हरामखोर, पूरे मोहल्ले को डरा के रखा था. उस दिन पानी लेने इंद्रमनी जी उसके दरवाजे के सामने वाले नाल पर पहुँच गये और खाली देखकर अपनी बाल्टी वहाँ लगा दी,

तभी उनमें से एक भाई आया और उनकी बाल्टी उठाके फेंक दी, जब उन्होने उससे कारण पुछा तो बस हो गया झगड़ा.

जब मे वहाँ पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि वो साले 6 के 6 इंद्रमनी के चारों ओर चिपके हुए थे, वो दो-तीन हो तो टक्कर भी लें अब 6-6 को कैसे संभालते.

उनका छोटा भाई तो उनकी ताड़िका माँ को ही संभालने में नाकाफ़ी था, वो पहाड़ जैसी उसके सामने खड़ी थी, और वो सिर्फ़ बाल्टी घुमाने के अलावा और कुछ नही कर पा रहा था बेचारा.

 
मे भावशून्य अवस्था में था, वहाँ जाकर परिस्थिति को देखा और उन 6 लोगों में से दो के पीछे से गले पकड़े और उनको इंद्रमनी जी से अलग करके दूर धकेल दिया और दोबारा दो को पकड़ा और उन्हें भी अलग छिटक दिया.

मेरे चेहरे पर ना गुससा ना खुशी कोई भाव नही था, अभी भी मे अपने सुंदरकांड पाठ के इंप्रेशन में ही था.

वाकी बचे दो को उन्होने आराम से संभाल लिया, उनमें से एक का गला मेरे हाथ में आ गया सो मैने एक ही हाथ से उसे दो दीवारों के कोने में सटा कर एक ही हाथ पर लटका लिया, उसके भाई उसको छुड़ाने आए, तो किसी को लात से किसी को दूसरे हाथ से दूर छिटकता रहा.

मेरा ध्यान उस पकड़े हुए की तरफ था ही नही, मे दूसरे जो छुड़ाने आ रहे थे उनकी तरफ ही ध्यान लगाए था.

जब इंद्रमनी ने अपने शिकारों पर काबू पा लिया तब उनका ध्यान मेरी तरफ गया, एक पर्मनेंट उपर लटका रखा था, दो नीचे गान्ड के बल पड़े थे, एक और आया उसको भी उल्टे हाथ का पड़ा तो वो भी दूर जाके गिरा.

क्या कर रहा है अरुण छोड़ इसे नही तो ये मर जाएगा- जब ये इंद्रमनी के शब्द मेरे कानों में पड़े तब मेरा ध्यान उसकी तरफ गया.

बहुत देर तक गला दबे रहने के कारण उसका मुँह लाल पड़ गया था जीभ बाहर को निकालने वाली थी, अंडरवेर उसी के पेसाब से गीला हो चुका था.

जैसे ही मैने उसको छोड़ा, अनाज के बोरे की तरह धडाम से वो वहीं ढेर हो गया.

इतने में उनमें से जिसने ये झगड़ा शुरू किया था वो एक चाकू लेके मेरी ओर झपटा, मेरा ध्यान दूसरी तरफ था, लेकिन इंद्रमणि जी ने उसको झपटते हुए देख लिया और चिल्ला कर बोले- अरुण बचो.

जैसे ही मेरी नज़र घूमी, उसका चाकू वाला हाथ मेरी ओर आ ही रहा था कि मैने झट से उसकी कलाई थामी और बाजू से पकड़ कर उसको पीठ पर डाल लिया, चाकू अभी भी उसके हाथ में ही था.

पीठ पर लदे हुए उसको अपने घर के बरामदे में लाके पटक दिया और डंडे से उसके घुटने तोड़ने लगे.

अब हमारा प्लान सबूत के साथ पोलीस केस करने का था, लेकिन कुछ हमारे हितेशियों ने ही आकर उसे छुड़वा दिया कि अब इनके लिए इतना सबक काफ़ी है, नौकरी-पेशा वाले आदमी हो आप लोग कहाँ पोलीस कचहरी के चक्कर में पड़ते हो. बात इन्द्र जी को जम गयी और उसे छुड़वा दिया.

मेरी तौलिया भी ना जाने कब खुल कर गिर गयी थी, किसी दूसरे ने लाकर दी. हम कपड़े वग़ैरह पहन के चुके ही थे कि भाई साब आ गये, उन्होने जैसे ही सुना तो बड़े गुस्सा हुए कि क्यों छोड़ दिया साले को.

उनके एक मित्र भी आ गये, जो ठाकुर थे और उनकी वहाँ के ठाकुरों के साथ संबंध थे, तो तय हुआ कि चौपाल के ठाकुरों को लेके पोलीस केस किया जाए, वरना इनकी हिम्मत और बढ़ जाएगी.

जब हम ठाकुरों की चौपाल पर पहुँचे तो दूर से ही हमें वो सभी छहो भाई वहाँ बैठे दिखाई दिए और जैसे ही उनकी नज़र हम पर पड़ी तो जो अंडरवेर में मूत गया था वो थर-2 काँप उठा और बोला-

ठाकुर साब यही वो लोग हैं, हमें बचा लो प्लीज़.. ये यूपी के डाकू हैं मुझे जान से मार देंगे.

हम अभी चौपाल पर चढ़े ही थे कि ठाकुर साब ने उसकी कमर में एक लात मारी और बोले- हरामखोर, मे तुम लोगों की आदत जानता हूँ, इन लोगों पर ऐसा घिनोना इल्ज़ाम लगा रहा है, अरे सालो ये सरकारी अधिकारी हैं, भले लोग हैं, ज़रूर तुम लोगों ने इनके साथ कोई ग़लत हरकत की होगी, फिर तो उनकी नानी ही मर गयी.

फिर जब हमने सारी बात बताई तब वो ठाकुर बोले- हरामियो इनसे माफी माँगो, और भविष्य में अगर कोई ऐसी वैसी बात सुनाई दी तो समझ लेना ये मारेंगे वो तो अलग, हम तुम्हारी खाल खींच लेंगे.

इस तरह से मामले को सुलझा कर उन्हें घर भेजा और हमसे भी कहा कि आप लोग जाओ अब इन सालों की हिम्मत नही पड़ेगी आप लोगों से उलझने की.

पूरा मोहल्ला हमें बधाई दे रहा था उन बदमाशों को सबक सिखाने के लिए.

इंद्रमनी जी ने मेरी पीठ थपथाइ उनका साथ देने के लिए, और अपने भाई को झिड़का नाकाम होने की वजह से. क्योंकि जो लोग तमाशा देख रहे थे उन्होने ही बोला कि तुम इस लड़के की वजह से बच गये वरना पता नही वो लोग क्या कर डालते तुम्हारा.

खैर एक और मुशिबत टल गयी थी मेरी वजह से और लोगों में मान भी बढ़ा मेरे भाई का.

पर एक जोड़ी आँखें और थी जिनमें मेरे प्रति कृीतग्यता, चाहत और प्रेम की भावना पनप रही थी जिसका मुझे कोई भान नही था……!

इस घटना के कुछ महीने बाद ही श्याम जी की शादी हो गयी, जिसके लिए हम सब गाँव गये, 10-15 दिन गाँव में रहने के बाद फिर आकर वही ड्यूटी और पानी की समस्या.

इंद्रमनी भाई साब की 29 वर्षीया धर्म पत्नी कोमल, जो अपने पति से कोई 7-8 साल छोटी थी, फक्क सफेद हल्का गुलाबी पन लिए उनका रंग,

सुंदर हंसता हुआ गोल चेहरा जिसपर मुख्य आकर्षण का कारण थी उनकी आँखें, जिसे मृगनयनी कहते हैं.

36-30-36 का एक दम साँचे में ढला बदन 5’5” की हाइट, कुलमिलाकर किसी भी व्यक्ति को आकर्षित करने के सारे गुण थे. लंबे घने काले बाल, कमर तक आते थे.

वैसे तो वो हरसंभव खुश ही दिखाई देती थी हर समय, किंतु उनकी आँखों में कुछ तो ऐसा था जो व्यक्त करता था उनके अधूरेपन को.

पर मे ठहरा छोटा भाई, मेरी नज़र चाहे वो मेरी अपनी भाभी हो या वो कभी उनके कमर से उपर ही नही पहुँची थी अभी तक.

दोनो में सग़ी बहनों जैसा प्रेम था, सो जो रेस्पेक्ट मेरी अपनी भाभी के लिए थी वही उनके लिए.

लेकिन कहते हैं ना, कि जो होना होता है, वो हमारे बस में नही होता और जब हो जाता है, तब सोचते हैं कि ये हुआ तो कैसे हुआ ? हमने तो ये सोचा भी नही था.

उस घर के बाहरी पोर्षन में हम रहते थे और अंदर के पोर्षन में इंद्रमनी जी की फॅमिली.

हमारे पोर्षन के सामने एक वरामदा था और उससे हमारे वाले पोर्षन का गेट, मेन गेट से वरामदे में आना होता और सीधे जाओ तो गॅलरी से होते हुए एक आँगन और उसके वाद उनका पोर्षन,

गेलरी के एक साइड में ही हम दोनो के अलग-2 टाय्लेट बात थे. आँगन के दूसरी साइड में बराबर में ही दो किचिन पहले हमारा, फिर उनके साइड में उनका.

इंद्रमनी जी की माताजी बीमारी की वजह से ज़्यादातर पड़ी ही रहती थी, बिना किसी के सपोर्ट के वो चल फिर भी नही पाती थी.

कुछ दिनो के बाद उनका छोटा भाई भी अपने एग्ज़ॅम देने जबलपुर अपने बड़े भाई के पास चला गया.

सनडे का दिन था, भाई साब और इंद्रमनी दोनो कहीं बाहर गये हुए थे, मेरी भाभी अपनी दो छोटी बेटियों को लेके अपनी किसी सहेली के यहाँ गयी हुई थी, मेरी बड़ी भतीजी विजेता और मे ही घर पर थे,

वो टीवी देखने में लगी थी उसके पसंदीदा कार्टून चल रहे थे.

उसे भूख लगी तो मेरे से बोली- अंकल जी मुझे भूख लगी है, मैने कहा दूध पिएगी, तो उसने हाँ करदी.

मे उसके लिए किचेन में जाके दूध ग्लास में डाल रहा था कि तभी कोमल भाभी बाथरूम से निकली मात्र एक पेटिकोट जो उन्होने अपने वक्षों के उपर बाँध रखा था.

अनायास उनकी पायल की आवाज़ सुनकर मेरा ध्यान उनकी ओर चला गया.

 
मेरी नज़र जैसे ही उधर गयी तभी उनकी भी नज़र मुझ पर पड़ गयी, जैसे ही हमारी नज़र चार हुई, वो थोड़ा ठितकी और फिर सर नीचे करके मुस्कराती हुई जल्दी से अपने बेड रूम में घुस गयी.

मैने विजेता को दूध दिया और मे भी टीवी देखने में लग गया पर अब मेरा ध्यान टीवी में नही लग रहा था, बार-2 उनका वो सेक्सी रूप पेटिकोट में जबर्जस्ती से जकड़ा हुआ हुश्न मेरी आँखों के सामने आजाता.

बहुत दिमाग़ हटाने की कोशिश करता पर कुछ देर बाद फिर वही सीन सामने आ जाता.

गीले लंबे बाल जो कुल्हों तक आ रहे थे, शर्म से झुकी मुस्कुराती वो चंचल आँखें जिनकी एक झलक ने ही पता नही मेरे दिल में झंझनाहट सी पैदा करदी थी, सुरहिदार गर्दन,

और उसके नीचे जहाँ वो पेटिकोट खाली उडेसा ही हुआ था.. उफ़फ्फ़… क्या मदभरे कलशो का उठान जो पेटिकोट के अंदर से ही अपनी पुश्टता बयान कर चुके थे.

घुटनों से थोड़ा सा उपर तक पहुँच पाया था वो पेटिकोट, उतने से ही उन केले के तनों का आकर पता लग रहा था कि वो उपर कैसे होंगे.

बार-बार वोही सीन, साला करूँ तो क्या करूँ मैने बहुत कोशिश की उस बारे में ना सोचूँ, लेकिन सोचों को आज तक थम पाया है क्या कोई ???

विश्वामित्र जैसे ऋषि नही रोक पाए तो फिर हम आम इंसानो की क्या बिसात.

मैने थोड़ा बाज़ार में चक्कर लगाने की सोची की शायद कुछ ध्यान बँटेगा लेकिन समस्या विजेता की थी, और अगर उसको भी साथ ले जाता हूँ तो घर में ताला लगाना पड़ेगा.

करूँ तो क्या करूँ अजीब कस-म-कस में फँस गया.

फिर मैने सोचा कि बाहर की साइड से अंदर से बंद करके किचेन साइड से निकल जाता हूँ गॅलरी से होके,

कोमल भाभी को बोल देता हूँ वो ध्यान रखेंगी, क्योंकि किचेन साइड का गेट उनके बेडरूम के सामने ही था.

मैने विजेता से पूछा की मार्केट घूमने चलेगी तो वो तैयार हो गयी, मैने अंदर से बाहर वाला गेट बंद किया और किचेन साइड वाले गेट की कुण्डी लगाई,

विजेता की उंगली पकड़ी और उनको ध्यान रखने के लिए बोलने उनके बेडरूम के गेट पर पहुँचा,

वो तब तक कपड़े पहन कर ड्रेसिंग टेबल के सामने तैयार हो रही थी, मुझे देखते ही खड़ी हो गयी और मेरी ओर देखकर हल्की सी मुस्कराहट के साथ बोली- जी भाई साब कोई काम था.

मे - भाभी जी मे और विजेता बाज़ार की तरफ जा रहे हैं तो आप थोड़ा घर की तरफ ध्यान रखना.

वो - कोई काम है बाज़ार में..?

मे- नही बस ऐसे ही थोड़ा मूड चेंज करने जा रहा था.

वो थोड़ा स्माइल करके बोली- मार्केट में ऐसा क्या है मूड चेंज करने लायक..?

मे भी थोड़ा स्माइल देते हुए - ऐसा वैसा कुछ नही, विजेता को कुछ खिला-पिलाके लाता हूँ जो इसको पसंद आजाए बस और क्या..?

वो- वैसे मे चाइ बनाने वाली थी, अगर आप पीना चाहे तो…!

मे- आपको तो पता ही है मे चाइ कम ही पीता हूँ,

वो बात को थोड़ा बढ़ाने के साथ-2 टीज़ करने के मूड में थी सो बोली- तो दूध पी लीजिए और मुँह थोड़ा दूसरी साइड करके मुस्करा दी..

मे - अरे भाभी छोड़िए मे किसी और के हिस्से का दूध नही पीता हूँ, आपको कम पड़ जाएगा.

वो- अगर किसी के पास एक्सट्रा दूध हो तो.. ? अब मे समझ गया कि इसके आगे अगर मे बढ़ा तो ये खुलने लगेगी और यही मे नही चाहता था,

तो मैने कहा कि नही भाभी अभी मेरी कुछ भी पीने की इच्छा नही है और बिना उसका कोई जबाब सुने मे वहाँ से निकल गया..

जाते समय मैने नोटीस किया कि वो थोड़ा अपसेट सी हो गयी थी.

बाज़ार में भटकने के बाद, भतीजी को कुछ चाँट पड़ाके खिलाए जिसकी वो शौकीन थी, और एक-डेढ़ घंटा बर्बाद करके मे घर लौटा तब तक भैया और भाभी दोनो ही आ चुके थे. मेरा भी थोड़ा मूड चेंज हुआ.

अब तो जब भी मेरा आमना-सामना कोमल भाभी से हो मुझे उनकी आँखों में कुछ अलग से ही भाव दिखें, जैसे मानो उनकी वो आँखें कुछ कहना चाहती हो मुझसे, कुछ अनुनय विनय हो उनमें, कुछ चाहत हो,

अब पिछले कुछ वर्षों में मे औरतों की आँखों की भाषा अच्छे से समझने लगा था.

अब क्या करूँ क्या ना करूँ जितना उन नज़रों से भागना चाहता था वो और उतनी ही मेरी ओर आकर्षित होती लगी मुझे.

एक दिन शाम का समय था लाइट चली गयी थी, थोड़ा गर्मी सी महसूस हो रही थी तो मे बच्चियों को लेके छत पर चला गया और उनके साथ खेलने लगा.

थोड़ी देर बाद वो भी उपर आ गई और हमारे पास आकर बैठ गयी और बच्चों के साथ खेलने लगी.

बच्चियों से खेलने के बहाने वो मुझसे टच करने लगी, एक बार तो विजेता मेरे सामने थी और वो मेरे दोनो बगल से हाथ निकाल कर उसको पकड़ने लगी जिससे उनके दोनो अमृत कलश मेरी पीठ में गढ़ गये.

मैने विजेता का हाथ पकड़ कर उसे उनकी तरफ कर दिया और फिर एक तरफ जाके खड़ा हो गया.

एक दो बार और जब ऐसा ही कुछ करने की उन्होने कोशिश की तो मे नीचे जाने के लिए जीने की ओर बढ़ा, उन्होने झट से मेरी कलाई पकड़ ली, और मेरी आँखों में झाँकते हुए बोली-

क्या मुझ में काँटे हैं अरुण जो मुझसे दूर-2 भाग रहे हो..?

मे - भाभी ! ये आप क्या बोल रहीं हैं..? मे तो बस ऐसे ही नीचे जा ही रहा था..!

वो- लेकिन मे तो आपकी वजह से उपर आई थी… और आप मेरी वजह से नीचे जा रहे हो.. ! ऐसा क्यों..?

मे- सॉरी भाभी ! अगर आपको लगा कि मे आपकी वजह से नीचे जा रहा था तो उसके लिए एक्सट्रीम्ली सॉरी, पर मेरा ऐसा कोई इरादा नही था जिससे आपको कोई ठेस पहुँचे.

वो- मे कई दिनो से देख रही हूँ, आप मुझसे बचने की कोशिश करते रहते हैं, मे आपसे कुछ बातें करना चाहती हूँ और आप इग्नोर करदेटे हैं मुझे, बताओ ऐसा है या नही ?

मे- वैसे तो ऐसा कुछ नही ! अच्छा बोलिए क्या बातें करना चाहती हैं आप मेरे साथ ?

वो- बस ऐसे ही, मन करता है, आपके साथ बैठ कर बातें करूँ कुछ अपनी कहूँ कुछ आपकी सुनू और क्या..?

और ये कहते-2 मेरे दोनो हाथ अपने हाथों में ले लिए.

 
मैने उनकी ओर देखा तो आँखों में वही चिर परिचित भाव दिखाई दिए..

मैने डिसाइड कर लिया था कि अब खुलके बात कर ही लेनी चाहिए आख़िर पता तो चले कि इनके मन में है क्या…??

मैने उनकी ओर देखा तो आँखों में वही चिर परिचित भाव दिखाई दिए..

मैने डिसाइड कर लिया था, कि अब खुलके बात कर ही लेनी चाहिए आख़िर पता तो चले कि इनके मन में है क्या…??

मे- भाभी ना जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे आप मुझसे कुछ कहना चाहती हैं पर कह नही पा रही.

वो कुछ सकपका सी गयी, बहुत देर तक कुछ बोल नही पाई, मेरी नज़र उनके खूबसूरत लेकिन सहमे हुए से चेहरे पर ही टिकी थी.

नज़र नीची किए वो असमंजस की स्थिति में ही खड़ी रही, मेरे सीधे-2 सवाल की उनको आशा नही थी शायद, और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने की हिम्मत भी नही जुटा पा रही थी.

मैने फिर अपना सवाल दोहराया, तो वो मेरी आँखों में झान्कति हुई बोली- जब आपने मेरी नज़रों को पढ़ ही लिया हैं तो ये भी पढ़ा लिया होगा कि मे चाहती क्या हूँ..?

मेरे सवाल के उपर उनका सवाल सुन कर मे हड़वाड़ा गया..! और सोचने लगा कि ये तो अपनी इच्छायें मेरे ही मुँह से कहलवाना चाहती हैं,

मैने मन ही मन कहा - मान गये भाभी काफ़ी तेज हो.. पर चलो कोई नही हम भी किसी से कम नही. अब मुझे भी इस सवाल जबाब के खेल में मज़ा आने लगा था.

मे- क्या भाभी आप भी ! मे कोई जादूगर तो हूँ नही जो आपके अंतर्मन को पढ़ सकूँ..?

वो मेरे हाथों को चूमकर बोली- जादूगर तो तुम हो ही तभी तो मेरा मन तुम्हारी ओर खिंचा चला जा रहा है..?

मे भौंचक्का देखता ही रह गया…! अभी कुछ कहना ही चाहता कि उपरवाले ने मेरी सुन ली और भाभी उपर आ गई, हम दोनो थोड़ा दूर हट कर खड़े हो गये और बच्चों से खेलने लगे.

जान बची और लाख उपाए, लौट के बुद्धू नीचे आए….!!

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हमारी कंपनी का प्रॉडक्ट कुछ ऐसा था कि उसको फाइनल पॅक करने से पहले फिज़िकली चेक करना ज़रूरी था एक-दो बार मॅन्यूयेली ऑपरेट करके, और ये काम क्वालिटी कंट्रोल डिपार्टमेंट के अंडर ही था, इसके लिए मॅनपवर की तो ज़रूरत थी लेकिन टेक्निकल होना ज़रूरी नही था.

एक टेक्निकल सूपरवाइज़र की देख रेख में उस काम के लिए अधिकतर लड़कियों को ही रखा गया था.

मे प्रॉडक्ट इंजिनियरिंग मे था जो फर्स्ट फ्लोर पर था, सेपरेट्ली. हमारे डेप्ट्ट से निकलते ही पर्चेस और उसके पहले अकाउंट्स.

फर्स्ट फ्लोर पर सबसे लास्ट ऑफीस था हमारा.

एक सीनियर ड्रॅफ्ट्स्मन के साथ 3 और लड़के थे मेरे साथ, एक मॅनेजर जिसको मे रिपोर्ट करता था.

अकाउंट्स मे 5-6 लोग थे, जिनमें दो एक्सपीरियेन्स्ड लेडी थी, एक शादी शुदा पंजाबी कुड़ी.

शाम को छुट्टी के बाद सभी लड़कियाँ एक मिनी बस से जाती थी, नीचे टेस्टिंग में काम करने वाली लड़कियों में से एक-दो आधा घंटा पहले उपर आजाती थी अकाउंट्स में उन लॅडीस के साथ बैठने.

दोनो ऑफिसस के बीच में एक ट्रॅन्स्परेंट ग्लास का पार्टाइज़ेन ही था जिसमें से सब कुछ आर-पार दिखता था.

वैसे तो कभी-कभार अकाउंट्स की लॅडीस के साथ हँसी मज़ाक भी होता रहता था, हम सबका.

हमारे मॅनेजर के अंडर में आर&डी भी था तो वो ज़्यादातर शाम के वक़्त नीचे ही होता था.

कुच्छ ही दिनो में मैने ओब्ज़र्व किया कि नीचे से जो लड़कियाँ उपर आकर बैठती थी उनमें से एक लड़की जिसका नाम टीना था, और कंपनी से 15-20 किमी पर उसका गाँव था, जो उस मिनी बस के रूट पर ही पड़ता था, वो हमारे ऑफीस की ओर ही देखती रहती थी.

एक दिन मेरे र्राइव. डीएम (ड्रॅफ्ट्स्मन) रोहीला ने मुझसे कहा कि देखो वो लड़की हमारे ऑफीस की तरफ ही देखती रहती है.

रोहीला शादी शुदा था लेकिन था बड़ा थर्कि टाइप, तो पहले तो खुद ने कोशिश की उसे पटाने की लेकिन जब उस लड़की ने उसे कोई घास नही डाली तब उसने मेरे को बताया.

अगले दिन जब वो उपर आई और हमारी ओर देखने लगी तो रोहीला ने मुझे कुहनी मारकर इशारा किया,

मेरा ध्यान भी बाहर की ओर गया तो वो मेरी ओर ही देख रही थी, कुछ देर तो देखती रही फिर अपनी नज़रें नीची करके मुस्करा दी.

रोहीला ये सब देख रहा था सो फट से बोला- अरे यार ये तो तेरे को ही लाइन दे रही है.

मैने कहा छोड़ ना क्या फालतू कामों में ध्यान रहता है तेरा, अपना काम किया कर वरना मॅनेजर को बोल दूँगा समझा,

भेह्न्चोद शादी-शुदा होके ऐसी बातों में ही लगा रहता है, तो वो कुछ डर गया और अपने काम में लग गया.

थोड़ी देर बाद फिर मैने जब उधर देखा तो पाया कि वो हमारी ओर ही देख रही थी, मे कुछ मिनट तक उसको ही देखता रहा तो वो मुस्करा दी और नज़र नीची करके जाने लगी. जाते-2 भी एक-दो बार चेहरे पर मुस्कराहट लिए मूडी.

अब यहाँ उसके हुश्न का विवरण देना भी बनता है, किसी ने अगर हरियाने की छोरियों को देखा हो तो उनको ज़्यादा एक्सप्लेन करने की ज़रूरत ही नही. उनका रंग रूप एक अलग ही लालिमा लिए होता है,

उपर से उसका साँचे में ढला 32-28-33 का बदन, लंबाई साडे पाँच की, चाल में एक अलग सी थिरकन, जब भी तिर्छि नज़रों से देखती थी, किसी के भी दिल पर च्छूरियाँ चल जायें.

शायद ही कोई सीनियर, जूनियर स्टाफ या वर्कर होगा कंपनी में जो उससे चोदना ना चाहता हो सिवाय एक मेरे ऑफीस के सुरेश को छोड़ कर, वो तो साला पूरा संत ही था.

बस उसे तो अपने शरीर की ही चिंता रहती थी, लाल सुर्ख सांड, चौड़ी छाती, शेर जैसी चाल लेकिन लड़कियों के मामले में एकदम ज़ीरो. पूरा ब्रह्मचारी था वो, औरत जात से 10 फुट दूर ही रहता था.

अपना ऐसा कोई सिद्धांत था नही, अगर कोई वाकई में प्यासी है और वो सामने से गुज़ारिश करे तो दिल पिघल ही जाता था आख़िरकार.

सो उसके कुछ दिनो की कोशिश के बाद पिघल ही गया, उपर से उसका रूप लावण्य ऐसा जान मारु था कि खींच ही लिया उसने अपनी ओर…

अब मेरा भी मन करने लगा उसे देखने का, ना जाने क्यों साडे 4 बजते ही मेरी नज़र उसी ओर चली ही जाती..

जितनी देर वो वहाँ रहती हम दोनो की नज़र एक दूसरे में ही खोई रहती किसी-ना-किसी बहाने. कहते हैं ना की इश्क और मुश्क छिपाये नही च्छुपता.

उन अकाउंट की लेडी’स को पता लग ही गया, और धीरे-2 सारी को में ये बात जाहिर हो गयी, जबकि हमें अभी तक एक दूसरे को टच करने का भी मौका नही मिल पाया था.

इसमें उनमें से एक लड़की ने हमारी मदद की, वो काम का बहाना करके देर तक रुकने लगी, मे तो अपने पर्सनल स्कूटर से ही जाता था सो मुझे तो आने-जाने का कोई प्राब्लम नही था.

पहले दिन वो अकेली ही रुकी और जैसे ही छुट्टी के बाद सब चले गये तो वो मेरे ऑफीस में आई और उसने उसका लेटर मुझे दिया और मुझसे रिप्लाइ देने को कहा.

 
मैने वो लेटर लिया और पढ़ा, ये मेरा पहला अनुभव था जब मे किसी लड़की का लव लेटर पढ़ रहा था क्योंकि अभी तक तो सभी फिज़िकल लव ही हुए थे.

उसके लेटर की भाषा अपनी ज़्यादा पल्ले नही पड़ी, और उसको बोल दिया कि आके सीधे-2 बात करे जो भी करनी हो.

दूसरे दिन उसने उसको भी रोक लिया और छुट्टी के बाद मेरे ऑफीस में भेज दिया, वो शरमाती-सकुचती मेरे पास आई, मैने उसकी ओर मुस्कुरा कर देखा, तो वो भी नीची नज़र करके मुस्कराने लगी.

मे अपनी सीट पर बैठा था वो मेरी बगल में आकर खड़ी थी..मैने उसका हाथ थामा.. तो वो कुछ सिहरति गयी..!

मैने उसका हाथ थामकर पुछा- टीना ! क्या काम था मुझसे..?

वो मेरी ओर सवालिया नज़रों से देखने लगी..! मानो पुच्छ रही हो कि तुम्हें नही पता..?

वो तुमने शीतल को लेटर दिया था ना कल… कोई काम था..? मुझे तो कुछ समझ में आया नही..? मैने उसे परेशान करने की कोशिश की !

वो कुछ नाराज़ सी दिखाई देने लगी…लेकिन कुछ बोली नही…!

मे- कुछ बोलती क्यों नही..? क्या गूंगी हो..?

एकदम मेरी ओर गुस्से से देखा उसने ! और अपना हाथ झटक के जाने लगी. मैने झट से उसे पीछे से पकड़ा और खींच लिया अपनी ओर.

झटके की वजह से वो सीधी मेरी गोद में आ गिरी. मैने उसके कान में कहा- देखो मे सीधी-सादी भाषा ही समझता हूँ, ये लेटर वेटर के चक्कर मेरी समझ से बाहर हैं,

इसलिए जो भी कहना चाहती हो सीधे-2 कह दो.

एम्म…मे कुछ नही कहना चाहती…! छोड़ो मुझे प्लीज़.. वो मेरी गोद में कसमसा कर बोली.

मे- तो यहाँ मेरे पास क्यों आई थी..? और मैने उसके गाल पर एक किस कर दिया.

वो मुझसे छूटने का नाटक करने लगी, लेकिन मन में उसके मेरी गोद में बैठे रहने का ही था.

जब वो फिर भी कुछ नही बोली तो मैने फिर कहा.- क्या तुम मुझे पसंद करती हो..?

उसने अपनी गर्दन झुका ली जैसे कहना चाहती हो की हां.. मे तुम्हें पसंद करती हूँ लेकिन मुँह से कुच्छ नही कहा.

मैने जानबूझकर उसको सताते हुए कहा- ठीक है ! अगर नही पसंद करती तो कोई बात नही, छोड़ो इस बात को यही ख़तम करते हैं....

और मैने उसे अपनी गोद से उठने का इशारा किया तो वो बहुत ही नीची आवाज़ में बोली- क्या आप मुझे पसंद करते हैं..?

मे – मेरी पसंद ना पसंद से क्या होता है ? जब तुम ही मुझे पसंद नही करती तो…!

उसने मेरे पास आने के बाद से पहली बार मेरी आँखों में देखा और बोली- मे अगर ये कहूँ कि आप मुझे बहुत पसंद हैं तो..?

मे- तो..तो…तो ! और मैने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके होंठ चूम लिए… और कहा- तो मेरा जबाब ये है.. ! पसंद आया हो तो तुम भी इसका जबाब दे सकती तो.. !

वो एकदम शरमा गयी, शायद उसे मुझसे ये उम्मीद नही थी या ये उसका पहला किस था जो किसी ने किया हो उसके होठों पर..! और वो उठकर तेज़ी से भागी..

लेकिन ऑफीस के गेट पर पहुँच कर ठितकी और पलट कर आई और झटके से उसने मुझे किस किया और चली गयी… मे मन ही मन मुस्कुराता हुआ थोड़ी देर अपनी सीट पर बैठा रहा.

जब वो दोनो चली गयी, तो मैने भी अपनी दुकान बंद की और घर चला आया.

एक कहावत है…!! घर खीर तो बाहर भी खीर…!!

घर पहुँचा तो ताला लगा पाया, अब ये सब लोग कहाँ चले गये..? लेकिन मेन गेट खुला था सो गॅलरी से होकर अंदर गया और आँगन में से ही इंद्रमनी भाई साब को आवाज़ दी,

कुछ देर में कोमल भाभी अपने बेडरूम से बाहर आई, जब मैने पुछा की बाहर ताला कैसे है, तो उन्होने बताया-

इनके स्टाफ के ठाकुर साब जो दूसरे टाउन में रहते हैं, आज उनकी लड़की की शादी है, उसमें सब लोग गये हैं, माजी की वजह से मुझे यहीं रहना पड़ा है, वरना मे भी जाती.

मैने किचेन साइड का गेट खोल कर अपने घर में गया, फ्रेश होकर कपड़े चेंज किए, बैठा ही था पलंग पर की वो चाइ लेकर आ गयी.

वो- लो चाइ पिओ ! और चाइ मुझे पकड़ा कर वहीं पलंग पर मेरे बाजू में बैठ गयी, फिर मेरी ओर देख कर बोली- खाना कितने बजे खाओगे तो मे उसी हिसाब से आपके लिए खाना बना दूँगी.

मैने उनकी ओर एक नज़र डाली और बोला- जब आप लोग खाओ, उसी टाइम मे भी खा लूँगा इतना कह कर मैने चाइ का एक सीप लिया.

मे गर्दन झुका कर चाइ पी रहा था, उनकी नज़र मेरे उपर ही घड़ी थी. अचानक उनका हाथ मैने अपनी जाँघ पर महसूस किया, तो मेरी नज़र पहले जाँघ पर गयी और फिर उनकी ओर देखने लगा,

वो मुझे ही घुरे जा रही थी जब मैने उनकी ओर देखा तो वो बोली- भाई साब आपने उस दिन की मेरी बात का जबाब अभी तक नही दिया…!

मे- कोन्सि बात भाभिजी…?

वो- वही, कि क्यों मेरा दिल आपकी ओर खिंचता जा रहा है ? क्या आप कोई जादूगर हो..?

मे- अपने दिल को काबू में करिए भाभी जी, आप शादी-सुदा हैं और ये हम दोनो के लिए अच्छा नही है…! किसी को पता चला तो क्या होगा ? ये तो सोचिए...!

वो- बहुत सोचा..! लेकिन कुछ सूझा ही नही, ये दिल आपकी बाहों में आने को मचलता है, अब आप ही बताओ मे क्या करूँ..?

मे- आप बहुत सुंदर हैं भाभी, सच मानिए अगर आप जैसी औरत मुझे तो क्या जिसके भी नसीब में हो वो बहुत भाग्यशाली होगा, लेकिन…..!

वो- लेकिन क्या..? मे तो आपको सामने से आपकी बाहों में सामने को ब्याकुल हूँ फिर क्यों दूर भाग रहे हो…?

मे- पता नही क्यों आपके साथ उस तरह का रिस्ता बनाने को दिल तो कहता है, लेकिन दिमाग़ कहता है कि ये ठीक नही है..!

वो- दिलों की प्यास दिमाग़ से नही बुझती अरुण…! प्लीज़ अपने दिल की मानो और मुझे प्यार दो, मे तुम्हारा प्यार पाने को तरस रही हूँ..

प्लीज़ मुझे प्यार करो, और मेरे गाल पर हाथ रख कर सहला दिया उन्होने.

मैने चाय का खाली प्याला टेबल पर रखा और उनकी कमर में हाथ डाल कर अपने से सटा लिया…!

उनके 34 साइज़ के चुचे मेरे सीने में दब गये.. आहह.. क्या एहसास था.. शरीर से मादक महक फूटकर मेरे नथुनो में समा रही थी, उनकी आँखों में वासना के लाल डोरे तैर रहे थे.

ओह्ह्ह.. अरुण मुझे प्यार करो…! मे प्यासी हूँ..! मे चोंक कर उनकी ओर देख रहा था.. ! वो बोली- ऐसे क्या देख रहे हो..?

मे- क्या भाई साब आपकी प्यास नही बुझा पाते..?

वो- ओह्ह्ह अरुण ऐसे समय उस नामर्द इंसान का नाम लेकर समय बर्बाद मत करो.. आअहह.. मुझे अपनी बाहों में भींच लो, मसल दो मेरे बदन को.. मे बहुत प्यासी हूँ.

 
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