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Guest
मैने मीरा और अंजलि दोनो को अपने-2 कपड़े निकालने को बोला और अपने भी निकाल दिए, हम तीनों ही नंगे हो गये. उसकी हल्के बालों से घिरी चूत माल पुआ की तरह फूली हुई थी.
मैने उसके कान में पुछा- क्यों रानी कितने लंड ले चुकी हो अबतक,
तो वो बोली ज़्यादा नही बस एक दो बार ही गया है अभी तक.
मैने मीरा को घोड़ी बना कर उसके उपर आने को कहा और उसको पीठ के बल चारपाई पे लिटा दिया और उसकी रस से लिथडी चूत में अपना मूसल डाल दिया, आधा लंड ही गया होगा कि वो आँखे बंद करके गर्दन उँची करके कराह…
आहह…हह… धीरीई… द.एयेए..र्र…ड्ड.. होता है, मैने मीरा का मुँह दबा के उसकी चुचियों को चूसने के लिए कहा तो वो उसकी चुचियों को पीने लगी मैने अपने दोनो हाथ मीरा की चुचियों पर कस दिए और उसकी चूत को जीभ से चाटने लगा… मीरा के मुँह से भी चुचि छोड़ कर सिसकारी फूटने लगी..
इधर मेरा मूसल उसकी रस से लबालब ओखली की कुटाई में लगा था. बता नही सकता कितना मज़ा किसको आ रहा था. 10 मिनट उसकी चूत चोदने के बाद वो पानी छोड़ गयी.
मैने अपना गीला लंड उसकी पानी छोड़ चुकी चूत से खींचा और मीरा की रस गागर में पेल दिया, मीरा भी रम्भाति हुई हाए-हाए करने लगी और अपनी गान्ड मटका-2 के मेरा लंड लेने लगी.
2 घंटों की धमा चौकड़ी के बाद हम तीनों ही पस्त होकर पड़ गये, कुछ देर के बाद मीरा उठके अपने काम में लग गयी.
मैने अंजलि की गान्ड में उंगली डाल दी, तो वो उछल पड़ी,
मैने कहा चल मज़े ले लिए हों तो जाके उसकी मदद कर, काम जल्दी हो जाएगा वरना बेचारी को डाँट पड़ेगी, तो फिर वो भी उसके साथ काम में हाथ बांटने चली गयी और मे अपने रास्ते हो लिया……!!!
ऐसे ही एक-दो बार और मौका पा कर मैने उस मस्तानी लौंडिया को चोदा, कुछ दिनो में वो अपने गाँव चली गयी.
अब मीरा पूरी तरह से अकेले फुल मज़ा ले रही थी, समय बीतता रहा, सर्दियाँ शुरू हो गयी.
सर्दियों में पिता जी की हालत बिगड़ने लगी एलेर्गिक होने की वजह से और बीते दिनों में ज़रूरत से ज़यादा काम का बोझ और ज़िम्मेदारियों ने उनकी शारीरिक क्षमता को ख़तम ही कर दिया था,
अब वो आए दिन बीमार रहने लगे, जिसकी वजह से मे कहीं जाके अपने जॉब वग़ैरह की सोच भी नही पारहा था, पिता जी को दमा हो गया, और दौरे पड़ने लगे.
श्याम भाई एक-दो बार दिल्ली भी ले गये चेक कराने, लेकिन पिता जी एल्लोपेथिक इलाज़ के फेवर में नही थे सो आयुर्वेद का इलाज़ चलने लगा, जिसकी महीने के महीने दवाएँ दिल्ली से आती, जिसे लेने श्याम भाई जाते एक हफ्ते पहले और इसी बहाने मौज मस्ती कर के लौटते.
खेती का ज़्यादातर काम मेरे ज़िम्मे आ गया, मे मजदूरों को लेके खेती वाडी देखने में लगा रहता.
मैने उसके कान में पुछा- क्यों रानी कितने लंड ले चुकी हो अबतक,
तो वो बोली ज़्यादा नही बस एक दो बार ही गया है अभी तक.
मैने मीरा को घोड़ी बना कर उसके उपर आने को कहा और उसको पीठ के बल चारपाई पे लिटा दिया और उसकी रस से लिथडी चूत में अपना मूसल डाल दिया, आधा लंड ही गया होगा कि वो आँखे बंद करके गर्दन उँची करके कराह…
आहह…हह… धीरीई… द.एयेए..र्र…ड्ड.. होता है, मैने मीरा का मुँह दबा के उसकी चुचियों को चूसने के लिए कहा तो वो उसकी चुचियों को पीने लगी मैने अपने दोनो हाथ मीरा की चुचियों पर कस दिए और उसकी चूत को जीभ से चाटने लगा… मीरा के मुँह से भी चुचि छोड़ कर सिसकारी फूटने लगी..
इधर मेरा मूसल उसकी रस से लबालब ओखली की कुटाई में लगा था. बता नही सकता कितना मज़ा किसको आ रहा था. 10 मिनट उसकी चूत चोदने के बाद वो पानी छोड़ गयी.
मैने अपना गीला लंड उसकी पानी छोड़ चुकी चूत से खींचा और मीरा की रस गागर में पेल दिया, मीरा भी रम्भाति हुई हाए-हाए करने लगी और अपनी गान्ड मटका-2 के मेरा लंड लेने लगी.
2 घंटों की धमा चौकड़ी के बाद हम तीनों ही पस्त होकर पड़ गये, कुछ देर के बाद मीरा उठके अपने काम में लग गयी.
मैने अंजलि की गान्ड में उंगली डाल दी, तो वो उछल पड़ी,
मैने कहा चल मज़े ले लिए हों तो जाके उसकी मदद कर, काम जल्दी हो जाएगा वरना बेचारी को डाँट पड़ेगी, तो फिर वो भी उसके साथ काम में हाथ बांटने चली गयी और मे अपने रास्ते हो लिया……!!!
ऐसे ही एक-दो बार और मौका पा कर मैने उस मस्तानी लौंडिया को चोदा, कुछ दिनो में वो अपने गाँव चली गयी.
अब मीरा पूरी तरह से अकेले फुल मज़ा ले रही थी, समय बीतता रहा, सर्दियाँ शुरू हो गयी.
सर्दियों में पिता जी की हालत बिगड़ने लगी एलेर्गिक होने की वजह से और बीते दिनों में ज़रूरत से ज़यादा काम का बोझ और ज़िम्मेदारियों ने उनकी शारीरिक क्षमता को ख़तम ही कर दिया था,
अब वो आए दिन बीमार रहने लगे, जिसकी वजह से मे कहीं जाके अपने जॉब वग़ैरह की सोच भी नही पारहा था, पिता जी को दमा हो गया, और दौरे पड़ने लगे.
श्याम भाई एक-दो बार दिल्ली भी ले गये चेक कराने, लेकिन पिता जी एल्लोपेथिक इलाज़ के फेवर में नही थे सो आयुर्वेद का इलाज़ चलने लगा, जिसकी महीने के महीने दवाएँ दिल्ली से आती, जिसे लेने श्याम भाई जाते एक हफ्ते पहले और इसी बहाने मौज मस्ती कर के लौटते.
खेती का ज़्यादातर काम मेरे ज़िम्मे आ गया, मे मजदूरों को लेके खेती वाडी देखने में लगा रहता.