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जिस्म की प्यास compleet

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डॉली अब राज से लड़ नही रही थी... राज ने अपना दूसरा हाथ डॉली की पीठ की तरफ बढ़ाया और उसकी ब्रा

का हुक एक झटके में खोल दिया और डॉली की सफेद ब्रा राज के पेट पे जा गिरी.... डॉली अब उपर से पूरी नंगी हो चुकी थी... पंखे की हवा उसकी चुचियो पे लग कर उन्हे सख़्त बना रही थी... राज ने डॉली के हाथो को आज़ाद किया और डॉली

ने उसको बाँहो में ले लिया... डॉली के स्तन राज की छाती से चिपके पड़े थे और राज के हाथ डॉली की नंगी

पीठ को सहला रहे थे... दोनो एक दूसरे को चूमने लगे और राज ने डॉली की जीन्स की तरफ जब हाथ बढ़ाया तब डॉली

ने उसे रोकते हुए कहा "अभी नही.. ललिता है घर पर"

राज भी डॉली के कहने पे रुक गया और दोनो ने फिर एक दूसरे को आधे मिनट के लिए चूमा और फिर डॉली ने अपने

कपड़े वापस पहेन लिए... 2 बजने को आए थे और राज घर से निकलने ही वाला था... डॉली और राज ललिता

के कमरे में उससे मिलने के लिए मगर वो बिस्तर पड़ी सो रही थी.... राज और डॉली ने हसके कहा "और हम इससे डर रहे थे"

स्कूल में नारायण ने अपनी घड़ी में समय देखा तो उसे लगा कि अब घर के लिए निकलना चाहिए...

दोपहर के ढाई बज गये थे और नारायण अपना समान अपने बक्से में डालने लगा था.... वो अपनी कुर्सी से उठा और

दरवाज़ा की तरफ जैसे ही बढ़ा तो दरवाज़ा अपने आप खुल गया और उसके सामने रश्मि खड़ी हो गयी....

रश्मि ने एक काले नीले रंग की जीन्स के उपर लाल रंग का स्लीव्ले टॉप पहेन रखा था... नारायण को समझ नही

आ रहा था कि ये लड़की इस वक़्त उसके कॅबिन में क्या करने के लिए आई है.... नारायण को हल्का सा धक्का देकर वो कॅबिन

के अंदर गयी तो उसके पीछे पीछे रीत भी कमरे में आई स्कूल की यूनिफॉर्म में और उसके साथ वोई पीयान मोती लाल था.... रश्मि कुर्सी पे अपनी एक टाँग के उपर दूसरी टाँग रखके रानिओ की तरह बैठ गयी....

नारायण ने अपनी नज़रे घुमाई तो वो मोती लाल रीत के बदन जोकि स्कूल के कपड़ो से ढका हुआ था उसपे हाथ फेरने लगा...

रीत की आँखो में शरम सॉफ झलक रही थी जिसको देख कर नारायण ने रश्मि से बोला "ये क्या हो रहा है यहाँ??"

रश्मि बोली " दिख नहीं रहा क्या प्रिनिसिपल सर??"

नारायण बोला " देखो जो करना है करो बस स्कूल में ना करो"

रश्मि बोली " अर्रे गुस्सा क्यूँ हो रहे हो प्रिनिसिपल सर हमे तो खुद रीत ने कहा कि मेरेको प्रिनिसिपल सर के सामने

चुद्ना है तो बस हम उसकी चाहत को पूरा कर रहे है"

मोती लाल अपनी मस्ती में लगा हुआ था उसने रीत को गौद में उठाया और उसको नारायण की टेबल पे बिठा दिया....

नारायण को पता था कि उसके हाथ में कुच्छ नही है तो वो वहाँ से जाने लगा...

"एक मिनट" रश्मि ने नारायण को रोकते हुए कहा.. वो बोली "आपके बगैर तो मूवी बन ही नही सकती नारायण सर"

ये सुनके नारायण पीछे मुड़ा तो रश्मि ने अपने पर्स में हॅंडीकॅम निकाला और मोती लाल को पकड़ा दिया...

मोटी लाल ने कॅमरा शुरू करते हुए ही रीत को कहा "चल छमिया शुरू हो जा... और इस बार कोई गड़बड़ नही होनी चाहिए"

सहमी हुई रीत ने अपने खुले बालो को अपने कानो के पीछे करा ताकि उसका चेहरा कमेरे में ढंग से दिखे और

अपने चेहरे पे मुस्कान लाकर वो आहिस्ते से बोलने लगी "हाई मेरा नाम नवरीत कौर है और मेरा काम है आपको

खुश करना.... वैसे में एक स्कूल गर्ल हूँ मगर पढ़ाई से ज़्यादा मुझे चुदाई में मज़े आते है"

ये कहते कहते वो एक एक करकर अपनी सफेद शर्ट के बटन्स को खोलने लगी....

रीत ने फिर कहा " आज मैं अपने प्रिन्सिपल सर के कमरे में आई हुई हूँ जो मुझे सारे एग्ज़ॅम्स में फैल होने के लिए

डाटेंगे मगर मैं इनको अपने जिस्म के जादू में इतना डुबोदूँगी कि वो ये सब कुच्छ भूल जाएँगे"

ये कहते ही रीत अपने कंधे को हिलाते हुए अपनी सफेद स्कूल की शर्ट को उतारकर बैठ गयी.... उसके बाद मोती लाल ने

कॅमरा पॉज़ कर दिया और रश्मि बोली "प्रिनिसिपल सर आज आपको अपनी प्यारी स्टूडेंट रीत की वीडियो बनानी है तो हर

एक मजेदार सीन रेकॉर्ड होना चाहिए नहीं तो आप जानते है क्या होगा"

क्रमशः…………………..

 


जिस्म की प्यास--27

गतान्क से आगे……………………………………

नारायण चलता हुआ रश्मि के पास आया और रश्मि ने उसे कॅमरा पकड़ाया... मोती लाल हस्ता हुआ टेबल के नीचे बैठ गया और रश्मि ने रीत को वापस अपनी शर्ट पहेन्ने को कहा और फिर वो कॅबिन के दरवाज़े के पास चली गयी....

नारायण ने कॅमरा पॉज़ से हटाया और रीत कॅबिन के दरवाज़े से चलती हुई आई और इधर उधर देखने लगी....

"सर.... सर" रीत ने अपने मुँह को खोलते हुए दो बारी प्रिंसिपल को आवाज़ दी मगर जवाब कोई नही आया...

रीत प्रिंसिपल का वेट करने लगी तो धक कर कुर्सी पे बैठ गयी.... उसकी नज़र टेबल पे पड़े कुच्छ पेपर्स पे पड़ी जिसको

देख कर उसने कहा 'ओह्ह तो ये है मेरे सारे एग्ज़ॅम पेपर्स... सर तो है नही तो मैं इन्हे चुराके ही भाग जाती हूँ

तो किसिको पता नही चलेगा.... उसने पेपर्स को उठाया और शर्ट के अंदर डालके वहाँ से जाने लगी...

तभी वहाँ से आवाज़ आई "हॅंड्ज़ अप"

तो मोती लाल टेबल के नीचे से उछलता हुआ बाहर आया "ज़्यादा स्यानी बन रही हो... अभी सर को आने दो तुम्हारी खैर नहीं लड़की..."

"तुम कौन हो" रीत ने पूछा

"हम पीयान मोती लाल है" मोटी लाल ने गर्व से कहा... रश्मि नारायण के साथ खड़े होकर ये सब सुन रही थी और इस डाइलॉग पे उसकी हँसी छूट गयी...

रीत ने घबरा रश्मि को देखा और उसके गुस्से वाले चेहरे को देख कर वो मोतीलाल को देख कर शरारती अंदाज़ में बोली

"ओह्ह तो आप मोती लाल है... वो तो मैं बस ऐसी ही पेपर्स देख रही थी"

मोती लाल टेबल से चलता हुआ रीत के पास खड़ा हो गया और बोला "पेपर निकाल और टेबल पे रख"

रीत ने फिरसे अपनी शर्ट के बटन्स खोले और मोतीलाल का गला सूख गया.... दो बटन्स खोलने के बाद रीत ने पूछा "और देखोगे" तो मोती लाल एक प्यासे की तरह पानी देख कर बोला "हां हां"

रीत ने अपनी शर्ट के सारे बटन्स खोलदीए और मोती लाल को वो पेपर पढ़ाए... मोतीलाल उन्हे पकड़ के सूँगने लगा...

रीत ने मोती लाल के सीधे हाथ को पकड़ा और अपने एक स्तन पे रक्ख दिया जो कि सफेद ब्रा से ढका हुआ था...

एक स्कूल की लड़की के स्तन को दबाकर मोती लाल को मुँह से लार टपकने लगी और खुश होकर उसने दूसरा हाथ भी बढ़ाया और रीत के मम्मो को दबाने लगा.... रीत अपने मुँह से आहह ओह्ह की आवाज़ें निकालने लगी जैसे कि कोई भी चुदाई की मूवी में होती है.... मोती लाल अब बेकाबू हो चुका था और उसने रीत को अपनी बाँहों में भर लिया और उसकी शर्ट को उतारकर उसके उपरी जिस्म को चूमने और कभी कबार काटने लगा....

फिर उसके उठाकर टेबल पे बिठाया और उसकी ब्रा को चीर दिया... रीत के मम्मे मोती लाल की आँखों में घूमने लगे और

उसकी चुचियो को वो चूसने लगा... एक स्तन पे उसकी ज़ुबान चल रही थी तो दूसरे पे उसके हाथ...

फिर उसने रीत की स्कर्ट को उपर उठा दिया और उसकी सफेद पैंटी को नीचे कर दिया... उसकी चूत को देख कर पीयान मोती लाल बोला

'छोरि एक बाल भी नही है तेरी चूत पे... वाह देख कर मज़ा आ गया.. अब उसे कुत्ते की तरह चाटूँगा मैं"

रीत को टेबल पे लिटाकर वो अपनी ज़ुबान रीत की चूत पे लेगया और चाटने लगा..

नारायण को विश्वास नही हो रहा था रीत की चूत को देख कर जोकि पूरी तरह से गीली हो चुकी थी....

मगर जो हाल रीत की चूत का हो रहा था वो उसके लंड का भी था जो की आहिस्ते आहिस्ते खड़ा होने लगा था...

मोती रीत को चूत को चाटने में लगा और रीत मज़े में सिसकियाँ ले रही थी... कुच्छ देर बाद मोती बोला

"चल छोरि अब मुझे खुश कर..." ये कहकर उसने अपनी शर्ट को उतारा और उसका काला जपतला बदन सामने आया और

अपनी पॅंट को उतारकर उसने अपना लंड रीत के सामने रख दिया.... नारायण मोती लाल के लंड को देख कर दंग रह गया

क्यूंकी वो उसके लंड से काफ़ी शक्तिशाली लग रहा था... रीत टेबल से उतरी और उस महा लंड को चूमते हुए चूसने लगी.... मोती का लंड बालो से ढका हुआ था जिसके अंदर से अजीब सी बदबू कमरे में फेल गयी थी पर शायद अब तक

रीत उस बदबू में खुश्बू ढूँढ चुकी थी.... मोती लाल ने एक पल के लिए नारायण को देखा और हँसने लगा...

नारायण की पॅंट में से उसका लंड कूदने को आ चुका था मगर वो ऐसा कर नही सकता था...

अपना लंड चुस्वकार मोती लाल बोला "चल अब मैं तुझे खुश करता हूँ... आजा टेबल पे अपनी टाँगें चौड़ी करके बैठ जा... रीत मोती लाल से मदद लेती हुई टेबल पे बैठी और अपनी टाँगें चौड़ी करली... उसकी चूत का पानी टेबल से

बहता हुआ ज़मीन पे टपक रहा था... मोती लाल आगे बढ़ा और अपना लंड उसकी चूत में डालकर ठोकने लगा....

नारायण ने हाथ बढ़ा कर अपने लंड को ठीक करा और चलता हुआ रीत के पास जाने लगा ताकि वो उसको रेकॉर्ड कर सके

लेकिन रश्मि ने उसे वही रोक दिया....मोती लाल की पीठ की वजह से वो कुच्छ रेकॉर्ड नही कर पा रहा था और वो घबरा

गया था कि कहीं इस बात का फ़ायदा रश्मि ना उठा ले मगर वो चौक गया जब उसके साथ में खड़ी रश्मि के हाथ ने उसके

लंड को च्छुआ और उसकी पॅंट की ज़िप को खोलकर उस जागे हुए लंड को आज़ाद कर दिया...

नारायण ने रश्मि को देखका जोकि नारायण की तरफ देख नही रही थी मगर फिर भी उसका हाथ खुशी खुशी नारायण के

लंड पे चल रहा था... इतने समय के बाद ये खुशी महसूस करके नारायण अपने सारे गम भूल गया था....

जहा मोती लाल और रीत चुदाई की आवाज़ पूरे कमरे में घूम रही थी वही नारायण चुप चाप खड़ा रश्मि के हाथो

मज़े ले रहा था.... चोदता चोद्ता मोती लाल ने अपना सारा वीर्य रश्मि के चेहरे पे छिरक दिया और नारायण ने सारा

ज़मीन पे डाल दिया... कुच्छ वीर्य रश्मि के हाथो पे रह गया जिसको उसने ख़ुसी खुशी चाट लिया...

मोती लाल खुश होता हुआ अपने कपड़े पहनने लगा और जाते जाते रश्मि ने नारायण को कहा "कमरे में पहले से ही 4 कमेरे लगा रखे है हमने तुम्हे तो बस ऐसी ही खड़ा करवा रखा था हम ने..."

रीत भी अपने कपड़े पेहेन्के वहाँ से चली गयी.. मगर नारायण को यकीन नही हुआ कि इन लोगो ने मेरे कमरे में

हिडन कॅमरा लगा रखे है और मेरा इस तरह इस्तेमाल भी कर लिया... मगर एक ओर नारायण को ये भी समझ नही आया कि इन बातो में रश्मि ने उसके लंड को क्यूँ खुश करा..??

 


उधर दिल्ली में चेतन अपनी मा को घर में चोद चोद कर थोड़ा बोर होने लगा था मगर शन्नो दिन रात

अपने बेटे से चुद्ने के लिए तैयार रहती थी... नज़ाने ऐसा क्या जादू कर रखा था चेतन के लंड ने अपनी मा की चूत पर.... चेतन का मन किसी दूसरी औरत को चोद्ने को कर रहा था.... उसने अपनी मासी आकांक्षा को कॉल भी करने की

कोशिश करी मगर जब उसने उसे कॉल करा तो आकांक्षा ने उसका फोन नही उठाया और बादमें मैसेज करके कह दिया कि

वो अब देहरादून में है और उसे बात नहीं करना चाहती... आज की रात भी उसकी मा की चूत में खुजली हो

रही थी नज़ाने कितनी बारी उसने चेतन को ललचाने की कोशिश करी मगर शन्नो नाक़ामयाब रही.....

अगली सुबह घंटी बजते ही शन्नो की आँख खुली.... अपने बिस्तर से वो आँख मलते वे उठी उसका बेटा उसी बिस्तर के दूसरे

कोने में सोया पड़ा था... वैसे हमेशा चेतन शन्नो से चिपक के सोते था मगर आज ऐसा नहीं हुआ था...

वो देख कर शन्नो को एहसास हुआ कि कल की रात कितनी खाली थी... खैर बिस्तर से उठ कर उसने देखा कि उसने अभी भी वोई

बड़ी टी-शर्ट पहेन रखी थी जो चेतन ने उसको पहले पहनने को दी थी.... कल रात वो पेहेन्कर उसने चेतन को

अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करी थी मगर काम नहीं बना था.... उसे बाकी कपड़े ज़मीन पे ही पड़े थे और

जब उसने उन्हे उठाया तब उसे एक गंदा आइडिया आया और उसने अपने कपड़े वही ज़मीन पे ही छोड़ दिए....

उसी लंबी टी-शर्ट में जोकि उसकी जाँघो को आधा भी मुश्किल से ढक पाती थी उसमें धीमे धीमे चलके वो

दरवाज़ा खोलने के लिए बढ़ी... शन्नो को याद था कि चेतन उसको ये करते हुए देखना चाहता था....

दरवाज़े की तरफ पहूचकर उसने एक लंबी साँस ली और दरवाज़े की कुण्डी खोली... दरवाज़ा आवाज़ करते हुए खुला और

सामने दूधवाले के आँखें ज़मीन की तरफ देख रही थी.... शन्नो के पाओ को देख कर जोकि रेक्सोना की चप्पलो में

थे दूधवाले की आँखें बढ़ती हुई शन्नो की टाँगो पे पड़ी... धीरे धीरे वो शन्नो की मलाईदार टाँगो को

देखता गया ताकि अगर ये सपना हो तो जल्दी टूट ना जाए..... उसकी नज़रे जब शन्नो की जाँघो तक आई तो उसका पूरा गलासूख गया.... शन्नो के चेहरे पे शरम थी और उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़के जा रहा था....

शन्नो ने हिम्मत दिखाते हुए कहा "ये लो पतीला 1 किल्लो दूध ही देना आज"

दूधवाले ने नज़रे शन्नो की नज़रो से मिलाई तो उसकी आखो में खो गया... शन्नो की नींद सी भरी आँखों में

इतना नशा था कि शन्नो को फिर दूधवाले को पतीला लेने के लिए कहना पड़ा.... दूधवाला अपनी टाइट पॅंट को उपर

खीचता हुआ ज़मीन पे बैठके अपने बड़े से डेक्चे में से दूध निकालने लगा.....

उसकी निगाहें शन्नो की जाँघो की तरफ थी वो देखने की दिल से दुआ कर रहा था कि मुझे इस खूबसूरत बाला की चूत

के दर्शन हो जाए मगर शन्नो की टाँगें एक दूसरे से जुड़ी होने के कारण कुच्छ दिखना मुश्किल था....

शन्नो को समझ आ गया था कि दूधवाला क्या देखना चाह रहा और वो अपने को रोक नहीं पाई और अपनी

टाँगो को थोड़ा चौड़ा कर दी... दूधवाले की आँखें शन्नो की गंदी पुरानी सफेद रंग पैंटी पे पड़ी और वो हिल गया...

इस कारण दूध शन्नो के पतीले में डालने के बजाए उसने फर्श पे गिरा दिया.... फर्श पे दूध की आवाज़ पड़ते ही

शन्नो ने अपनी टाँगो को वापस जोड़ लिया और दूधवाले ने भी अपनी नज़रे फेर दी... शन्नो के पतीले में दूध

डालकर वो अपने पॅंट के अंदर जागे हुए लंड को ठीक करता हुआ वो उठा.... शन्नो की उंगलिओ को छूता हुआ उसने वो

पातीला शन्नो को पकड़ाया और शन्नो ने दरवाज़ा बंद कर दिया..... दरवाज़े से टिक्क कर करीबन 1 मिनट

शन्नो लंबी लंबी साँसें लेती रही.... उसकी चूत ने उसकी पैंटी को नम कर दिया था.... उसने जल्दी से पतीले को किचन

में रखा और टाय्लेट जाके मूतने लगी.... टाय्लेट की सीट पे बैठकर वो उस दूधवाले के हावभाव को देख कर हँसने लगी... "बिचारा पागल हो गया होगा मुझे ऐसा देख कर" शन्नो ने हस्ते हुए कहा...

टाय्लेट से निकल कर जब शन्नो वापस अपने बिस्तर पे लेटी तो उसके बेटे चेतन ने उससे चिपकते हुए कहा "मज़ा आया ना??"

ये सुनके शन्नो चौक गयी कि चेतन को कैसे पता चला?? वो तो सो रहा था?? अपनी धीमी आवाज़ मे शन्नो ने "हां"

कहा और आँखें बंद करके सो गयी...

उधर दूसरी ओर ललिता की आँख कुच्छ लघ्हबघ सुबह के 11 बजे के करीब खुली.... अपनी आँखो को मलते हुए और ज़ोर

से उबासी लेते हुए वो बिस्तर से उठी... चलकर वो अपनी बहन डॉली के कमरे में गयी मगर वहाँ कोई नहीं था....

हर कमरे को देखने के बाद जब उसे डॉली नहीं दिखाई दी तो उसने डॉली को कॉल करा.. डॉली ने ललिता को

बताया कि वो राज के साथ गयी हुई है और थोड़ा समय लग जाएगा आने में तो तू नाश्ता कर लिओ...

ललिता को इतनी खुशी हुई कि वो मज़े में नाचने लग गयी.... नज़ाने कितने दिनो के बाद ललिता को एक दिन अकेले घर पे रहने को मिला था... वो अपने रात के कपड़ो में थी जोकि गुलाबी रंग का पाजामा और काला रंग का नूडल स्ट्रॅप

गुलाबी ब्रा के साथ पहना हुआ था...उसका फिलहाल नहाने का मन नहीं था तो वो टीवी ऑन करके गाने सुनने के लिए...

जब उसने टीवी ऑन करा तो केबल नहीं आ रहा था... उसको इतना गुस्सा आया उस वजह से और उसने डॉली से केबल वालो का

नंबर. माँगा ताकि वो उनको ठीक करने के लिए बुला सके.. फिर उसने केबल वालो को कॉल करा तो किसी प्रकाश ने फोन उठाया... ललिता ने बड़ी बदतमीज़ी से उससे बात करी और उसको तुरंत घर बुलाया केबल ठीक करने के लिए..

अब उसे ये अकेलापन काटने लगा था.... ललिता के दिमाग़ में घंटी बजी और तेज़ी से भागकर अपने कमरे में गयी और अलमारी खोलकर वो पालिका बाज़ार से खरीदी हुई सीडी निकाल ली..... अपने चेहरे पे गंदी सी हँसी लेकर वो टीवी की तरफ

बढ़ी और सीडी प्लेयर में उसने 'प्रेम का रस' नाम की अडल्ट पिक्चर लगा दी..... सोफे पर आल्ति पालती मारकर ललिता टीवी को

घूर के देखने लगी... कुच्छ 20 सेकेंड हो गये थे और तब तक टीवी पर काली स्क्रीन ही थी... ललिता ने सीडी प्लेयर के

रिमोट से पिक्चर आगे बढ़ानी चाही मगर वो वही रुक गयी.... गुस्से में उठकर ललिता ने दूसरी सीडी डाली और

वो भी नहीं चली... ललिता को अपनी किस्मत पर इतना गुस्सा आया कि उसने डिस्क को तोड़ दिया....

एक तो इतने दिनो के बाद पॉर्न देखने का मौका मिला था उसका भी फ़ायदा नहीं उठा पाई ललिता.... अकेले बैठकर वो केबल वालोइंतजार करती रही... उसने फिर गीज़र भी ऑन कर दिया ताकि जब केबल का काम हो जाए तब वो नहाने चली जाएगी....

आधा घंटे के बाद पूरा घंटा हो गया और कोई भी नहीं आया.. जब ललिता ने उनको वापस फोन मिलाया तो

नंबर. बीच में ही कटे जा रहा... ललिता का दिमाग़ खराब हो रहा था उसने सोचा नहा ही लेती हूँ नहीं तो फिर दीदी आजएँगी और 3-4 बातें सुनाएँगी.. ललिता ने अपने कमरे में से लाल रंग का तौलिया लिया और जाके डॉली के कमरे के

टाय्लेट में नहाने चली गयी क्यूंकी उसके कमरे में टाय्लेट नहीं था... ललिता ने एक के बाद एक धरधार अपने

कपड़े उतारे और शवर के नीचे खड़ी हो गई... इतना आनंद मिल रहा था उसको जब उसके बदन पे गरम पानी गिर रहा था... अच्छे ख़ासे 20 मिनट वो अंदर रही और इस दौरान अपने बदन को हाथ फेरती रही.... नज़ाने नहाते नहाते उसको

बड़ी ज़ोर से पेशाब आई तो वो शवर से हॅट कर टाय्लेट की सीट की तरफ भागी मगर एक दम से उसने अपने कदम रोक दिए.... अपने कदम वापस शवर के तरफ बढ़ा दिया और अपनी टाँगें थोड़ी सी खोलके वो नहाती रही....

उसके अंदर एक दम से मीठा दर्द उठा और उसने नलके को पकड़ लिया... उसकी चूत के पानी कीधार फर्श पे गिराने लगी था...
 


ललिता अपनी आँखों से अपनी चूत का पानी बहते हुए देखने लगी... फिर उसने अपने बदन को साबुन से धोया और अपने

बदन को पौछ्कर टाय्लेट के बाहर निकली..

उसने दो-तीन बारी ज़ोर से बोला "डॉली दीदी....... दीदी...... दीदी" मगर कोई जवाब नहीं आया....

अपने हल्के नम बदन पे लिपटा हुआ लाल तौलिया उसने दो उंगलिओ से खोल दिया और नंगी खड़ी हो गयी....

इस घर की सबसे अच्छी बात ये थी कि इसके आस पास कोई और घर नहीं था तो कोई भी घर के अंदर ताका झाकी नहीं

कर सकता था.. ललिता ने वो तौलिया अपने बालो पे बाँध दिया और चलकर अपने कमरे में जाने लगी....

जैसी ही वो डॉली के कमरे के बाहर निकली तभी घर का दरवाज़ा किसीने खोल दिया..... ललिता को नज़ाने क्यूँ लगा की वो

उसकी बहन नहीं कोई और है.... और अगले ही सेकेंड उसका ये वेहम हक़ीकत बन गया.... दरवाज़े के सामने खड़ा एक

सावला लंबा पतला आदमी सिर पर हल्के हल्के बाल और चेहरे पे हैरत लिए खड़ा था.... वो आदमी वही खड़ा

ललिता के नंगे बदन को देख कर जा रहा था.... ललिता ने जल्द से जल्द अपने सिर से तौलिया निकाला और अपने बदन

पे बाँध लिया.... इश्स दौरान ललिता के मम्मे ज़ोर से हिले जिनको देख कर उस आदमी का लंड हिल गया....

ललिता को घबराया देख उस आदमी ने भी अपनी आँख घुमा ली.....

ललिता उस आदमी की वजह से जल्दी से अपने कमरे में भाग गयी और दरवाज़ा लॉक कर दिया.... अपने बिस्तर पे बैठके

वो सोचने लगी कि ये आदमी कौन था और ऐसी ही घर में कैसे घुस गया?? कहीं चोर तो नहीं था क्यूंकी उसके हाथ में

एर बॅग भी तो था... ललिता दबे पाओ से दरवाज़े की तरफ बढ़ी और तभी उसने अपने कमरे के बाहर से एक आवाज़ सुनी...

"देखो बेटा तुम शायद ललिता होगी मैं तुम्हारी मम्मी का भाई यानी तुम्हारा विजय मामा हूँ...."

ललिता वहीं खड़े खड़े उस आदमी की बात सुनती रही... उस आदमी ने फिर से कहा "वो हुआ ऐसा कि मैने घर की बेल

बजाई तो वो बजी नहीं.. और काफ़ी देर खटखटाया भी मगर किसीने नहीं खोला... मुझे डॉली ने बताया था कि तुम घर पर ही होगी तो मैने दरवाज़े की नॉब को घुमाया तो वो अपने आप खुल गया... सॉरी अगर तुमको मेरी वजह शर्मिंदगी हुई हो"

ये सुनते ही ललिता बोली 'नहीं ऐसी कोई बात नहीं है... आप बैठिए मैं अभी बाहर आती हूँ"

ललिता ने जल्दी से एक हरी सफेद सलवार कुरती निकाली और सैफीड ब्रा पैंटी के साथ पहेन ली....

अपने बालो को कंघी करके अच्छे से बाँध कर एक लंबी साँस लेके उसने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला...

सोफे के पास बैठे उसने अपने मामा को कहा "नमस्ते मामा... आप पानी पीएँगे??" ये कहकर ललिता को बड़ी

झिझक हुई और विजय को ललिता को धकि हुई देखकर काफ़ी राहत मिली.... पानी देते वक़्त ललिता विजय के साथ वाले

सोफे पे बैठ गयी और जहा उसका मोबाइल पड़ा था... उसने मोबाइल पे देखा तो डॉली के मीसड कॉल आए हुए थे

और मैसेज पे भी लिखा था कि विजय मामा आएँगे घर तो पहले ही नहा लेना"....

ये पढ़कर ललिता बोली 'डॉली दीदी ने मैसेज भी करा था कि आप आने वाले है मगर मैने देखा ही नहीं था...'

विजय ने कहा "कोई बात नहीं बेटी... हो जाता है ऐसा कभी कभी"

विजय को शांत देख कर ललिता भी उस बात भूलने की कोशिश करती रही... विजय ने बताया कि वो सिर्फ़ आज रात के लिएइन्दोर से यहाँ आया कुच्छ बिज़्नेस के काम से और कल सुबह की ट्रेन से वापस रवाना हो जाएगा... उसने अपनी पत्नी और

अपने 2 बच्चो के बारे में भी बताया जिन्होने ललिता और उसकी बहन को बहुत प्यार भेजा है....

फिर कुच्छ देर के लिए ललिता विजय मामू के साथ बैठी रही और उसके बाद डॉली घर आ गयी...

डॉली विजय मामू को जानती थी क्यूंकी जब वो उनसे आखरी बारी मिली थी तो उसकी उम्र कुच्छ 14 साल थी...

विजय अपनी दोनो भाँजियो को देखकर काफ़ी खुश हुआ और दोनो को एक बड़ी डेरी मिल्क का डिब्बा भी दिया....

कुच्छ देर बाद जब विजय आराम करने के लिए नारायण के कमरे में चले गया तब ललिता ने डॉली को बोला

"आप क्या डोर लॉक नहीं कर सकते थे"

डॉली ने कहा "अर्रे तेरेको जगाके बोला तो था कि दरवाज़ा बंद करले और तूने हां भी कहा था कि करलूंगी..

अब मुझे क्या पता तू नींद में ही हां कह रही थी..... और वैसे तंग ना कर मेरा मूड ऑफ है"

ललिता ने चिड़ाते हुए पूछा "क्यूँ क्या कर दिया आपके आशिक़ ने ऐसा जो आपका मूड ऑफ हो गया"

डॉली ललिता को हल्के से मारके बोली "चल हॅट... अपना काम कर"

क्रमशः…………………..

 
जिस्म की प्यास--28

गतान्क से आगे……………………………………

उधर दिल्ली में कुच्छ 12 बजे चेतन अभी भी शन्नो के साथ बिस्तर पर चिपक कर लेटे हुआ था.... शन्नो ने चेतन का हाथ अपने पेट से हटाना चाहा मगर चेतन नहीं माना और अपनी मा को जकड़े रखा..... फिर शन्नो ने कहा "हटो ना मुझे नहाने जाना है... फिर बुआ के घर भी जाना है आज"

चेतन अपनी नींद में बोलता"अब उनके घर क्यूँ जाना" शन्नो अपने आपको छुड़ा बिस्तर से उठ गयी...

उसने चेतन से पूछा "तुम चलोगे ना मेरे साथ?? मैं अकेले बोर हो जाती हूँ" चेतन ने जाने से इनकार कर दिया

और शन्नो मायूस होकर अपने कपड़े निकालने लगी.... अपना तौलिया लेकर जब वो टाय्लेट में गयी तभी चेतन भी

अपने बिस्तर से उठ कर शन्नो के साथ टाय्लेट में घुस गया.... टाय्लेट की ट्यूब लाइट ऑन करके चेतन को शन्नो अपनी

बाँहों में भरके उसको शवर के नीचे ले गया और पानी ऑन कर दिया... दोनो के बदन कपड़ो के समैत भीग रहे थे... चेतन शन्नो को चूमे जा रहा था और शन्नो को काफ़ी माज़ा आने लगा था.... चेतन ने शन्नो के होंठो को

चूम लिया और उसके दोनो हाथ शन्नो के नितंबो पर चाँते बरसाने लगे.... शन्नो को अपने बदन में मीठा दर्द

महसूस होने लगा.... शन्नो ने चेतन के निकर में हाथ डालकर उसके लंड को पकड़ लिया और चेतन को समझ

में आ गया कि उसकी मा क्या चाहती है... शन्नो के सिर पे हाथ रख के चेतन ने उसे फर्श पे बिठाया और अपनी

निकर को नीचे कर के उसके हाथ में अपना लंड पकड़ा दिया.... शन्नो की गरम पीठ पर ठंडा ठंडा

पानी बरस रहा था और उसके हाथ में गरम जागा हुआ लंड था..... अपने बेटे के लंड को उसने चूसना शुरू

करा और चेतन अपनी पैर की उंगलिओ से उसकी चूत को रगड़ने लगा.... शन्नो की चूत काफ़ी गीली हो चुकी थी और चेतन

उसे और तडपा रहा था..... शन्नो का दूसरा हाथ चेतन के आंडो से खेल रहा था और उसका मुँह

रॅंडियो की तरह चले जा रहा था..... शन्नो नहीं चाहती कि उसके बेटे का लंड ऐसे ही झाड़ जाए और उसने लंड को

छोड़ दिया और अपनी पैंटी उतारके वो चेतन के लंड की दुआ करने लगी.... चेतन ने उसकी चूत के अंदर झट से दो

उंगलिया डाल दी और शन्नो की चीख निकल गयी.... चेतन बोला "अब ये लंड सिर्फ़ इनाम में ही मिलेगा..."

ये कहकर चेतन ने शन्नो के नितंब पर एक और चाँटा लगाया और टाय्लेट से चला गया.....

पूरे समय नहाते हुए शन्नो अपनी गीली चूत को तसल्ली देती रही.... वो सोचने लगी कि कैसे चेतन के लंड को जीत सकु.... नाहकार जब वो तौलिया अपने मम्मो पर लपेट कर बाहर निकली तब चेतन बिस्तर पे तैयार बैठा था....

शन्नो उसको तैयार देख बहुत खुश हो गयी और अपने बदन को वहीं तौलिए से आज़ाद कर दिया....

उस तौलिए से वो अपने गीले बालो को सुखाने लगी... सफेद रंग की ब्रा और पैंटी को पहनने के बाद उसने अपनी टाँगो

को थोड़ा थोड़ा उठाकर उसने पेटिकोट पहना और नाडे को कस्के बाँध दिया.... उसके जोड़ी दार आधे बाजू वाला

सफेद ब्लाउस को भी पहेन लिया जिसके सामने की तरफ हुक्स थे....... फिर वो हरे रंग की सिल्क की सारी जिसपर

सफेद रंग के फूल पत्ते थे वो बाँधने लगी और बाँधने के बाद उसने पिन से पल्लू को ब्लाउस के साथ जोड़ दिया....

अपने बालो को कंघी करके और एक हरी रंग की गोल बिंदी को लगाके वो तैयार हो गयी....

चेतन की नज़रे पूरी वक़्त उसके मा पर जमी थी और जब वो पूरी तरह से तैयार हो गयी तब उसे देख कर चेतन

के पसीने छूट गये.... घर के कपड़ो में भले ही वो बात ना आती हो मगर सारी में उसकी मम्मी एक दम

बॉम्ब लग रही थी.... सॅंडल पहनते वक़्त चेतन उसकी मम्मी को बड़ी हील वाली सॅंडल पहनने को बोला तो शन्नो ने एक काली बड़ी हील वाली सॅंडल पहेन ली.... घर को ताला लगाकर दोनो मा बेटे बुआ के घर जाने के लिए रवाना हो गये...

शन्नो ने चेतन की वजह आज ऑटो में जाने का सोचा और तकरीबन 10 मिनट के इंतजार के बाद एक ऑटोवाला रुका....

जब शन्नो उसमें बैठने लगी तब चेतन ने उस ऑटो वाले की तरफ देखा जिसकी नज़रे शन्नो की बड़ी गान्ड को घूरे

जा रही रही थी.... पूरी दुनिया ही थर्कि है ये सोचके चेतन मुस्कुराता हुआ ऑटो में बैठा.....

सब कुच्छ साधारण तरीके से बीतता रहा और वो दोनो बुआ के घर पे उतर गये.... ऑटो वाले को पैसे देके

उन्होने कुच्छ घंटे बुआ के घर पे बिताए और चेतन अच्छे बच्चे की तरह अपनी मम्मी से शराफ़त से पेश आ रहा था....

जब बुआ उन दोनो के सामने भी नहीं होती तब भी चेतन के दिमाग़ में कोई गंदी बात नहीं आई...

ये देख कर शन्नो को खुशी हुई कि उसके बेटे को किस जगह कैसे बर्ताव करना चाहिए इसकी समझ है और फिर सुबह

के बारे में सोचने लगी जब उसने दूधवाले के साथ इतनी गंदी हरकत करी थी.... खैर कुच्छ शाम के 6:00 बजे तक

शन्नो और चेतन बुआ के घर से निकले और हल्का अंधेरा आसमान में छाने लगा था...

दोनो मा बेटा साथ में चलने लगे और मैं रोड पे खड़े होकर वो ऑटो का इंतजार करने लगे....

काफ़ी देर तक कोई ऑटो नहीं रुका और फिर चेतन ने कहा "ऐसा करते हैं बस में ही चल लेते है पैसे भी कम जाएँगे"

उसकी मा ये सुनके बहुत खुश हो गयी और दोनो अगली ही बस में धक्के खाते हुए घुसे....

ये बात बताने की नहीं है कि दिल्ली की बसो में कितनी भीड़ होती है तो बैठना तो दोनो के नसीब में नहीं था.....

बस में हल्की रोशनी थी क्यूंकी सिर्फ़ दो ही लाइट जल रही थी जोकि एक सबसे आगे की तरफ थी और एक सबसे पीछे की तरफ.....

चेतन जोकि शन्नो के ठीक पीछे ही खड़ा था अपना मुँह शन्नो के कान के पास लाते हुए बोला

"मैने कहा था ना मेरा लंड अब सिर्फ़ इनाम में ही मिलेगा... अब खेल शुरू होता है"

ये कहते ही चेतन ने अपनी मा की सारी के अंदर हाथ घुसाते हुए शन्नो के गरम पेट को महसूस करने लगा....

हाथ को फेरते हुए हुए फिर वो शन्नो के हल्के बाहर निकले हुए पेट को लगातार नौचने लगा और शन्नो चुप चाप वही

खड़ी रही.... जब भी बस हिलती तो चेतन शन्नो की कमर को कस के जाकड़ लेता और शन्नो शर्मिंदा होकर अपनी सीधी तरफ की सीट को कस्के पकड़ लेती... उसकी उंगलिओ के निशान भी शन्नो की कमर पे छप चुके थे....

चेतन की उंगलिओ की हर अदा पे शन्नो का जिस्म मचले जा रहा था... चेतन की गहरी गरम साँसें शन्नो अपनी गरदन

पे महसूस कर रही थी और उसका उगता हुआ लंड कयि बारी उसकी गान्ड को छुए जा रहा था....

शन्नो की सीधे कान की तरफ चेतन कयि बारी धीरे धीरे पुच्छे जा रहा "मज़ा आ रहा है... मज़ा आ रहा है.

." जिसका जवाब शन्नो अपने बदन के कप कपाहट से दे रही थी.... मगर फिर चेतन के हाथ चलने बंद हो गये और

शन्नो ने अपनी नज़रो को पीछे करते हुए उसकी तरफ लाचार होकर देखा.... उसकी आँखों से सॉफ झलक

रहा था कि वो अपने बेटे से भीग माँग रही थी कि वो उसके बदन को छुए उसकी जिस्म की प्यास को संतुष्ट करें....

फिर चेतन ने शन्नो के हाथ को प्यार से पकड़ा... अपनी उंगलिओ को उसकी उंगलिओ पर चलता हुआ वो शन्नो के हाथ को

अपनी तरफ ले गया और शन्नो समझ गयी कि वो क्या चाहता है... शन्नो अपने बेटे को खुश करने के लिए अपना सीधा

उसके लंड की तरफ ले गयी और हल्के से उसपे रख दिया... आहिस्ते आहिस्ते उसकी जीन्स पर हाथ उपर नीचे उपर नीचे करती रही....

अब शन्नो के नितंब चेतन के लंड को पूरी तरह महसूस कर रहे थे क्यूंकी दोनो के बदन में कोई अंतर नहीं रह गया था... शन्नो को अगले ही जीन्स की ज़िप खुली मिली और बिना झिझक के उसने अपना हाथ अपने बेटे की जीन्स के अंदर डाल दिया...

शन्नो के लंबे नाख़ून चेतन के लंड पे जब भी चुभते वो बुर्री तरह पागल हुए जा रहा....

अब शन्नो की कमर चेतन के हाथो का जादू फिर से महसूस करने लगी.... शन्नो की गोरी चमड़ी को वो बेदर्दी से

मसले जा रहा और शन्नो अपने मन में सिसकियाँ लिए जा रही थी..... चेतन अपने शन्नो के मोटे मम्मो की तरफ ले

गया और ब्लाउस के उपर से दबाने लगा....
 
शन्नो ने किसी तरह चेतन के कच्छे के अंदर हाथ घुसा लिया और

अब मस्ती में चेतन के तन्नाए हुए लंड को दबाने लगी.... चेतन का जुनून अब बेकाबू होने लगा था वो शन्नो के

ब्लाउस को ज़ोर ज़ोर से हिलाने लगा ताकि वो एक दो हुक खोल सके... शन्नो ने बड़ी आसानी से अपने उल्टा हाथ से

ब्लाउस के नीचे के दो हुक्स को खोल दिया...ब्लाउस के हुक्स खोलते ही चेतन के हाथ शन्नो की ब्रा के अंदर घुस

गये और उन तरबूज़ो पे चींटी मारने लगे... शन्नो दर्द और मस्ती के मारे पागल हुई जा रही थी...

अब हाल ऐसा आ गया था कि बस के रुकने के वक़्त भी दोनो के हाथ चले जा रहे थे....

फिर शन्नो के कानो में आवाज़ आई " कहीं बाहर उतरते है... कितना लेगी तू??"

शन्नो एक दम से ठंडी पड़ गयी.... मगर उस बंदे के हाथ नहीं रुके... शन्नो ने घबराकर अपनी गर्दन

घुमाई तो देखा उसके पीछे एक 45-50 साल का आदमी खड़ा था और चेतन का कुच्छ पता नहीं था....

शन्नो के चेहरे का रंग उतर गया और उसने झट से अपना हाथ उस आदमी के लंड से हटाया और उस आदमी के गंदे हाथो को अपने जिस्म से हटा दिया.... घबराती हुई शन्नो भीड़ को चीरती हुई आगे बढ़ती रही और सबसे आगे जाके खड़ी हो गई...... उसने पीछे मूड के देखा तो उस आदमी और चेतन का कोई पता नहीं था...

उसका जब स्टॉप आया तो वो झिझकते हुए उतर गयी और पीछे वाले दरवाज़े से चेतन को उतरते देख उसकी बेचैनि दूर हो गयी.... चेतन उसकी तरफ गया और उसके कंधे पे हाथ डालकर सड़क पर चलने लगा...

शन्नो के दिमाग़ में केयी सारे सवाल घूम रहे थे जिसको पुछ्ने में उसको काफ़ी झिझक हो रही थी....

उसी ओर चेतन बिल्कुल बिंदास होकर सड़क पर चल रहा था.... चेतन ने एक ऑटो को रोका घर जाने के लिए और इस बारी जब शन्नो ऑटो के अंदर बैठने लगी तो उसने उस ऑटो वाले के सामने ही शन्नो की गान्डपर हल्के चॅटा मारा जिसको

ऑटो वाले ने आँखें फाड़ कर देखा...

ऑटो में चेतन का हाथ अभी भी शन्नो के कंधे पे था जैसे कि वो ये जताना चाहता था कि वो उसकी मा नहीं बल्कि

उसकी कोई प्रॉपर्टी है..... चेतन ने बिना ऑटो वाले का ध्यान करें बोला " बस में क्या चल रहा था??"

शन्नो ने चेतन की आँखों में देखा और फिर अपनी नज़रे नीचे करदी... फिर वो आहिस्ते से बोली "मुझे लगा था कि तुम हो'

चेतन बोला " झूठ मत बोलो.. देख रहा था कितने मज़े से आगे पीछे हो रहे थे तुम्हारे हाथ"

ये सुनके शन्नो ने चेतन को इशारे में चुप होने के लिए कहा.... चेतन ने शन्नो का उल्टा हाथ अपनी जीन्स के उपर रख दिया और उसे उपर नीचे करने को कहा उसके साथ ही चेतन ने शन्नो के पल्लू पे लगी पिन को खोल दिया जिसका शन्नो को एहसास नहीं हुआ.... शन्नो अपनी नज़रे झुकाए चेतन की जीन्स के नीचे जागते हुए लंड को सहलाए जा रही और चेतन राजा की तरह ऑटो पे बैठा रहा...

ऑटो वाले ने ऑटो को चेतन शन्नो के घर की गली के बाहर रोक दिया क्यूंकी अंदर ले जाने में दिक्कत आती....

दोनो मा बेटे उसमें उतरे और चेतन ने पूछा "कितना हुआ"

ऑटो वाले ने चेतन को देख के कहा कि "30 रुपय हो गये है..." ये कहकर उसने नज़र शन्नो की तरफ घुमाई जोकि ज़मीन

की तरफ नज़रे झुकाए हुई थी...

चेतन के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आई और वो बोला "हमारे पास पैसे तो नहीं है मगर किसी और तरीके से पैसे भर दे तो.."

ऑटो वाले ने चेतन को देख कर बोला "क्या मतलब??"

चेतन ने शन्नो की तरफ नज़र घुमाई और बड़ी चालाकी से उसकी सारी का पल्लू उसके कंधे से गिरा दिया....

शन्नो ने पल्लू संभालने की कोशिश करी चेतन ने उसका हाथ पकड़ लिया.... चेतन बोला "अगर चाहो तो पैसे के बदले तुम

इन बड़े मोटे मम्मो को अभी देख सकते हो "

जितनी हैरानी ये सुनके शन्नो को हुई उतनी हैरानी उस ऑटो वाले को भी हुई.... उसे समझ नहीं आया कि वो क्या बोले

बस उसने सिर हिलाते हुए हां कह दिया.... चेतन ने शन्नो के हाथ को आज़ाद किया मगर अपना हाथ उसके नितंब पे

ले गया और प्यार से सहलाने लग गया.... वो चाहता था कि शन्नो अपने आप ही अपनी नुमाइश करें और वैसे ही हुआ... शन्नो ने जल्दी से अपने ब्लाउस के नीचे के हुक्स को खोला और अपनी सफेद ब्रा को उपर करके खुल्ले में उस ऑटो वाले को अपने स्तनो को दिखा दिया.... उन तरबूज़ो को देख कर उस ऑटो वाले का गला सूख गया.... ऑटो वाले की ज़ुबान बड़ी मुश्क़िलो से चली और उसने कहा 'क्या मैं एक बारी इन्हे च्छू सकता हूँ"

चेतन ने शन्नो को वापस अपनी ब्रा उठाने को कहा और ऑटो वाले का काँपता हुआ हाथ शन्नो के सीधे स्तन को

दबाने लगा.... आख़िर में उसकी चुचि को छुता हुआ ऑटो वाले ने अपना हाथ शन्नो के मम्मे से हटा दिया और

शुक्रिया कहता हुआ वहाँ से चला गया.... शन्नो ने झट से अपने ब्लाउस के बटन लगाए और पल्लू ठीक करा.....

ये सब करके शन्नो के अंदर एक आग जागने लगी थी... सुबह से जीतने भी लोगो ने उसकी खूबसूरती को देखा था या फिर उसके हसीन बदन को छुआ था उसका हर एक एहसास उसके बदन में ज्वाला बनके जाग रहा था जिस बात का एहसास चेतन को भी था...

घर पहुचने के बाद शन्नो ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और चेतन के सामने नंगी खड़ी होकर अपनी चूत

चुदवाने की इच्छा जताई मगर चेतन ने उसके मुँह पर उसको मना कर दिया और टीवी देखने लगा...

चेतन के मना करने पर शन्नो नहीं मानी और सोफे पे बैठके चेतन की गर्दन को चूमने लगी और अपना हाथ

चेतन की छाती पर चलाने लगी मगर चेतन ने उसे धक्का दे दिया और जाके अपने कमरे को लॉक करके बैठ गया....

भोपाल में शाम को डॉली के मोबाइल पर राज का कॉल आने लगा... डॉली अभी भी राज से गुस्सा होने

का नाटक कर रही थी और इसलिए हर बारी राज का फोन काटने लगी... मगर फिर राज ने मैसेज किया

"ठीक है बात नहीं करनी मुझे कोई और मिल गया ना... बाइ" ये पढ़के डॉली जल्दी से घर के बाहर गयी

और राज को फोन लगाया... राज ने काफ़ी रूठने का नाटक किया मगर फिर डॉली ने उसे मना ही लिया...

राज ने बोला "मैं कुच्छ नहीं जानता कल रात हम दोनो को एक पार्टी में जाना है"

डॉली ने पूछा "कौनसी पार्टी"

राज ने बोला "हैं एक हाउस पार्टी मेरे दोस्त के बर्तडे की तो हमे वहाँ जाना है.."

डॉली बोली "पागल हो गये हो पापा के रहते हुए मैं कैसे निकल सकती हूँ घर के बाहर??"

राज गुस्से में बोला "वो मैं नहीं जानता.. सब लड़के अपनी गर्ल फ्रेंड्स के साथ आ रहे है और मैं अकेला जाउन्गा

नहीं तो तुझे तो आना ही पड़ेगा"

इससे पहले डॉली राज को समझाती राज ने फोन काट दिया और फिर राज ने मैसेज करके उसको कहा

"मैं 9 बजे तक लेने आउन्गा तैयार रहना और नहीं आई तो मैं बात नहीं करूँगा

डॉली के सिर पे अब ये नयी परेशानी आ गयी थी... वो राज का दिल नहीं दुखानी चाहती और पापा से

क्या बहाना मारेगी ये उसको सूझ नहीं रहा था... रात को खाना खाने के बाद डॉली ने नारायण से

झिझकते हुए कहा "पापा मेरी एक सहेली है नाज़िया यही पे रहती है तो उसका निक़ाह होने जा रहा है कुच्छ

दिन में तो उसने अपनी सारी सहेलिओ को कल अपने घर पे बुलाया है एक पार्टी के लिए... और उसने मुझे

स्पेशली बोला है कि मैं आउ और सुबह ही घर वापस जाउ" नारायण ने बिना सोचे समझे झट से डॉली

को हां कह दिया.. शायद डॉली के उपर नारायण का भरोसा बोल रहा था और वो चाहता भी था कि उसके

बच्चे बाहर निकले और भोपाल में और अच्छे दोस्त बने... डॉली इतना खुश हो गयी और उसने

नारायण को गले लगा लिया मगर वो राज को और तरसना चाहती थी इसलिए उसे हां नहीं कहा...

क्रमशः…………………..

 
जिस्म की प्यास--29

गतान्क से आगे……………………………………

अगले दिन चेतन ने अपनी मम्मी को खुद कह दिया कि अब भोपाल का टिकेट कार्वालो जिससे सुनके शन्नो के दिल में बहुत दर्द हुआ... अब उसका उसकी परिवारिक ज़िंदगी में लौटना असंभव था और वो यहीं चेतन के साथ अपनी ज़िंदगी

गुज़ारना चाहती थी... इतने दिनो में नारायण ने शन्नो से बात तक भी नहीं करी थी जिससे शन्नो को सॉफ

एहसास होने लगा था कि नारायण को उसकी कोई ज़रूरत नहीं है और वो अपनी ज़िंदगी में बहुत ही ज़्यादा खुश है....

शन्नो अब उसके पास वापस नही जाना चाहती थी बल्कि अपने बेटे की बाँहों में रहना चाहती थी....

सुबह से दोपहर शन्नो इसी बात को लेकर चिंतित रही... उसे समझ नही आया था कि चेतन ने उसे ये क्यूँ कहा??

क्या वो मुझसे बोर हो चुका है

पूरी दोपहर शन्नो अपने ही ख़यालो में खो चुकी थी... वो अपने टाय्लेट में गयी और उसने

दरवाज़ा बंद कर दिया... अपनी नाइटी के अंदर हाथ घुसाकर उसने अपनी चूत में एक उंगली डाली और

वो पानी बिन मछली की तरह तड़प उठी.... आहिस्ते आहिस्ते अंदर बाहर अंदर बाहर शन्नो की उंगली उसकी

चूत में होती रही... उसकी नज़र वॉशिंग मशीन पे पड़ी तो उसने झट से उसे खोला और वहाँ पड़े चेतन के कच्छे को देख कर उसकी आँखें बड़ी हो गयी... उस अंडरवेर को उसने उठाके देखा तो उसपे अभी

उसके बेटे के वीर्य के धब्बे मौजूद थे..... शन्नो वॉशिंग मशीन से टिक के ज़मीन पे बैठ गयी...

अपनी टाँगें चौड़ी करके उसने अपनी कच्छि को उतारा और अपनी चूत से खेलने लगी....

चेतन के हरे अंडरवेर को अपनी नाक से सूंघ सूंघ कर वो और भी ज़्यादा तड़प गयी थी....

उसकी चूत का पानी फर्श पे बहने लगा था मगर उसकी उंगली रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी...

जब चेतन के वीर्य की सुगंध उसकी नाक में भर गयी तो अपनी ज़बान से वो उन धब्बो को चाटने लगी...

उसका जिस्म पूरी तरह मचल उठा था... देखते देखते उसकी चूत ने वहीं पानी छोड़ दिया और उसकी

उंगली पे लगा पानी उसने अपने होंठो पे लगाके के चाट लिया.... अपने आपको खुश करने के बाद भी वो

अभी खुश नहीं थी... हार मानकर वो टाय्लेट से निकली और बिस्तर पे बैठके अपनी हालत पे आँसू टपकाने लगी...

कुच्छ देर तक सोने के बाद शन्नो जब अपने बिस्तर से उठी तो वो पूरे घर में चेतन को आवाज़

देकर ढूँढती रही मगर वहाँ कोई नहीं मिला.... शन्नो को लगा अगर वो थोड़ी देर घर के सन्नाटे से बाहर

रहेगी तो शायद उसका मन हल्का हो जाएगा.... वो सफेद सलवार कुर्ता पहेन के घर से निकल गयी और

चाबी फुट्मॅट के नीचे छुपाके रख दी जहाँ अकसर वो चाबी रखा करते थे... घर से थोड़ी ही दूर

एक पार्क था शन्नो उधर जाके बैठ गयी और जो भी ग़लत काम उसने करा है वो उसे याद करने लगी...

उस काले सच की शुरुआत होने पर ही अगर वो सम्भल जाती तो शायद ऐसा नहीं होता उसके साथ....

जब हल्का अंधेरा छाने लगा आसमान पे तब शन्नो वापस घर जाने लगी.....

जब वो घर पहुच गई तो फुट्मॅट के नीचे अभी भी चाबी थी और एक लंबी साँस लेकर उसने दरवाज़ा

खोला और उसे बंद करके अपने कमरे की तरफ बढ़ी.... कमरे के अंदर जाते हुए एक आवाज़ आने पर

उसके कदम रुक गये... वो दबे पाओ चेतन के कमरे की तरफ बढ़ी और दीवार से सतकर कर खड़ी हो गयी....

दरवाज़ा खुला हुआ था और चेतन के साथ उसे एक लड़की की आवाज़ आ रही थी और वो आवाज़ उसी की

बेहन आकांक्षा की थी.... शन्नो के आँखो में आँसू झलक उठे जब उसे एहसास हुआ कि उसने चेतन के लिए

इतना सब किया और उसे ऐसा सिला मिल रहा है....

शन्नो गुस्सी में कमरे में गयी जिसे देखकर आकांक्षा और चेतन एक दम से चौक गये...

शन्नो ने आकांक्षा के बाल पकड़े और उसके गाल पर चाँते बरसाने लगी... आकांक्षा भी पिछे नहीं हटी

और उसने अपनी बड़ी बेहन का कुर्ता फाड़ दिया और उसके बदन पे घूसे मारने लगी....

चेतन को समझ नहीं आया वो क्या करे मगर उसने दोनो को एक दूसरे से अलग करने की कोशिश करी....

आकांक्षा ने चेतन को धक्का दिया और उसका सिर दीवार पे जाके लगा और ज़मीन पे गिर गया....

चेतन को ज़मीन पे गिरा देख आकांक्षा ने शन्नो को धक्का दे के अपने आप से दूर करा और चेतन को

देखने लग गयी और तभी उसके सिर के पीछे एक भयंकर दर्द महसूस हुआ... उसने अपने हाथ से उसे

महसूस किया तो सिर से खून टपकने लगा था... आकांक्षा ने पीछे मूड कर देखा तो शन्नो के हाथ में

एक विकेट थी.... शन्नो के सामने उसके बेटे और उसकी बहन की मौत हो गयी थी... वो वही खड़ी रही चुप चाप..

कुच्छ समय के लिए समय रुक सा गया था... फिर धीरे धीरे चलती हुई शन्नो किचन की तरफ गयी..

. एक ड्रॉयर खोलके उसने एक छुरि निकाली और 7-8 बारी अपने जिस्म पे वार कर दिया.... उसके बदन में से खून ज़मीन पे बहने लगा और उसकी आँखें वही बंद हो गयी...

तीनो की लाश उसी कमरे में पड़ी रही और इस बात का पूरे मौहल्ले में किसी को भी अंदाज़ा नहीं था...

(आकांक्षा देहरादून नहीं गयी थी.. वो अभी भी दिल्ली में थी बस चेतन से दूर रहने के लिए उसने चेतन से मिलने से इनकार कर दिया था.... आज सुबह ही चेतन उसके दिल्ली वाले फ्लॅट में गया और उसको अपने से चुदवाने के लिए मजबूर कर दिया... तभी आकांक्षा चेतन के साथ उसके घर आई और ये अनहोनी घटी)

उधर भोपाल में डॉली का समय रात का इंतजार करने में ही निकल गया और जैसी ही शाम आई वो

नहा के तैयार हो गई उसने सलवार कुरती पहेन लिया और अपने बाल अच्छे से बना लिए...

उसने एक बॅग लिया और उसमें एक ड्रेस रख लिया ताकि वो पार्टी में जाने के लिए वो पहेनले और घरवालो

को पता ना चले.. जब डॉली बाहर जाने लगी तो नारायण ने उसे बॅग के बारे में पूछा तो डॉली ने कह दिया

"ये रात को सोने के लिए कपड़े है"

जब डॉली बाहर निकली तो राज गाड़ी लेके आया हुआ था... डॉली जाके उसके साथ बैठ गयी..

राज ने देख कर ही उसको कहा "क्या यह पहनके पार्टी में आओगी?? डॉली बोली "अर्रे नहीं नहीं बॅग

में लाई हूँ ना कपड़े.. ये तो घरवालो के सामने दिखावा करने के लिए" फिर राज ने पूछा

"अच्छा तो फिर क्या पहनोगी..??" डॉली ने बोला "जीन्स और टॉप लाई हूँ" राज ने वही गाड़ी रोकी और बोला

"यार कोई ड्रेस ले आती ज़्यादा तर ड्रेस में ही होते है यार.." आज नज़ाने राज इतने नखरे क्यूँ कर रहा था..

शायद पहली बारी उसके दोस्त उसकी गर्ल फ्रेंड को देखेंगे तो उनको ये ना लगे कि बहनजी है डॉली के दिमाग़ में

ये चल रहा था.... फिर राज बोला चलो मैं तुम्हे अपनी दोस्त के घर ले जा रहा हूँ तो वहीं चेंज कर लेना...

कुच्छ दूर जाके राज ने गाड़ी रोकी और वो अपनी दोस्त कश्मीरा के घर लेके गया डॉली को...

हाई हेलो करने के बाद जब डॉली कश्मीरा के टाय्लेट में कपड़े बदलने जा ही रही थी तभी राज ने कश्मीरा

से कहा "यार ऐसा हो सकता कि तू अपना कोई ड्रेस देदे डॉली को पहनने के लिए... मैं तुझे कल वापस कर्दुन्गा" कश्मीरा ने तुरंत हां कह दिया और डॉली को एक ड्रेस दिया जोकि उपर सफेद था नीचे से काला...

राज का दिल रखने के लिए डॉली उस ड्रेस को पहेन ने के लिए राज़ी हो गई.. कश्मीरा कुच्छ ज़्यादा पतली सी

थी तो जब डॉली ने वो ड्रेस पहना तो उसको वो काफ़ी टाइट आ रहा था... पीछे हाथ बढ़ा कर वो अपने

ड्रेस की चैन भी बंद नहीं कर पा रही थी... वो ड्रेस उसकी जाँघो को आधा ही धक पा रही थी...

काफ़ी देर चैन बंद करने की कोशिश करने के बाद उसने राज को अंदर बुलाया चैन चढ़ाने के लिए तो

राज को डॉली की ब्लॅक ब्रा के हुक दिखे... मज़ाक मज़ाक में उसने उन्हे खोल दिया...

डॉली को जैसे ही इस बात का एहसास हुआ तो वो गुस्सा करने लगी.... डॉली का मूड ना खराब हो इसलिए राज

ने वापस हुक लगा दिए और ड्रेस की चैन भी खीच दी.. डॉली अपने कपड़े बॅग में रखके वापस गाड़ी में ले गयी और फिर दोनो फार्म हाउस जाने लगे जोकि भोपाल के किनारो में था...

घर में ललिता अकेले बिस्तर पे बैठी बहुत ज़्यादा बोर हो रही थी... उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे...

उसे एक बात से चिढ़ मच रही थी कि उसकी बहन डॉली को इतनी आसानी से रात में बाहर जाने के लिए हां

कह दी गयी जबकि वो झूठ बोलके अपने बॉय फ्रेंड के साथ गयी है.... ललिता को पूरा यकीन था कि आज उसकी बेहन

चुदाई का मज़ा लेगी वो अभी अपने बॉय फ्रेंड के साथ.... उसके दिमाग़ में डॉली एक दम नंगी हुई बिस्तर पे राज के

लंड से खेलती हुई दिख रही थी.... उसे अपनी बहन से जलन मचने लगी थी.... ललिता इन सब बातोको अपने दिमाग़ से

निकालने के लिए सोने लग गयी तो उसे लगा कि एक आखरी बारी टाय्लेट हो आती हूँ कि कहीं रात में ना उठना पड़े....

ललिता बिना कुच्छ आवाज़ करें डॉली के कमरे की ओर बढ़ी क्यूंकी उसके विजय मामा वहाँ सो रहे थे और

वो उन्हे जगाना नहीं चाहती थी... जब उसने कमरे का दरवाज़ा खोला तो एक कम रोशनी वाला बल्ब जला हुआ था और

उसके मामा कमरे में नहीं थे.... ललिता को लगा कि वो टाय्लेट में होंगे तो वो वही खड़ी इंतजार करने लगी...

फिर उसने वहाँ लॅपटॉप पड़ा हुआ देखा जिसका मुँह दीवार की तरफ था... उसके दिल में देखने की चाह जागी कि

विजय मामा इतनी देर रात लॅपटॉप पे कर क्या रहे होंगे तो वो तुर्रत भागती हुई बिस्तर पे लॅपटॉप की तरफ गयी और

उसने वहाँ देखा की उधर एक फोल्डर खुला हुआ है जिसमे ढेर सारी पॉर्न डाली हुई है....

उनमें से एक पॉज़ हुई भी रखी थी... ललिता जल्दी से कमरे में से निकली ताकि उसके मामा को उसपे शक़ ना हो...

अपने कमरे में पहूचकर उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गयी और उसके दिमाग़ में गंदा ख़याल

आया विजय मामा के अंदर जिस्म की प्यास पैदा करने का..

कुच्छ देर बाद वो एक दम अंजान बनकर फिर से कमरे में गयी और विजय अभी लॅपटॉप ऑन किए हुए बिस्तर पे बैठा था... दरवाज़ा खुलने पर वो ज़रा सा भी घबराया नहीं और ललिता को देख कर हल्का सा मुस्कुराया....

ललिता चुप चाप टाय्लेट के अंदर गयी और कुच्छ देर वक़्त गुज़ारने के बाद उसने अपनी पैंटी को उतारकर हॅंडल

पे टाँग दिया ताकि जब विजय मामा टाय्लेट जाएँगे तो उसे देख कर मचल उठेंगे...

अपना काम करकर ललिता अंजान बनकर वहाँ से चली गयी और अपने दिमाग़ में गंदे गंदे ख़याल सोच कर

अपने आपको संतुष्ट करने लगी मगर ऐसा कुच्छ भी नहीं हुआ और कुच्छ देर के बाद वो सो भी गयी...

उधर गाड़ी में डॉली अपने ड्रेस को बारे में सोच रही थी जोकि उसने पहेन रखा था...

उस ड्रेस की अच्छी बात ये थी कि उसके स्ट्रॅप्स थोड़े बड़े थे जिनमे ब्रा का स्ट्रॅप आराम से छुप रहा था और

ड्रेस भारी भी तो ब्रा और पैंटी की लाइन्स नहीं बन रही थी...घर के बाहर काफ़ी लाइट्स लगी हुई थी और जैसी ही घर

के पास पहुच रहे थे तो गानो की भी आवाज़ आ राई थी.. राज ने डॉली को बाल खोलने को कहा और डॉली

ने उसकी बात मान ली... जब दोनो अंदर घुसे तो म्यूज़िक और तेज़ हो गया और राज डॉली को लेके अपने दोस्तो के पास लेगया... राज ने डॉली को सबसे मिलवाया...

एक लड़के का नाम निकेश था, दूसरे का रवि और जिसका बर्थ'डे था वो सरदार था उसका नाम सुखजिंदर था सब

उसे सुखी बुलाते थे... फिर बारी बारी डॉली बाकी लोगो से भी मिली और फिर राज और डॉली डॅन्स करने लगे...

कयि लड़किया बीच बीच में राज के पास आई मगर डॉली ने उन सबको भगा दिया और राज के बिल्कुल पास

खड़ी होकर नाचने लगी.... कुच्छ घंटे बाद डॉली और राज दोनो थक कर बैठ गये...

दोनो को बैठा देख सुखी उनके पास गया राज को उसने बियर पकड़ाई और डॉली को कोक देदि...

डॉली को देख कर सुखी ने बोला "मैं कोक लाया हूँ मेरे ख़याल मे आप ड्रिंक नहीं करती होंगी"

डॉली को ये जानके खुशी हुई और उसने कोक पीनी शुरू की... जब डॉली का ग्लास ख़तम हो गया तो सुखी ने डॉली

को उसके साथ नाचने के लिए कहा उसका बर्थ'डे था तो डॉली ने भी इनकार नही किया और दोनो नाचने लग गये...

राज अकेला बैठा हुआ था और डॉली को अपने दोस्त के साथ नाचता हुए देख रहा था... डॉली को पता था कि

उसके बॉय फ्रेंड की नज़रे उसपर ही थी और उसे थोड़ा जलाने के लिए डॉली ने सुखी के कंधो पे हाथ रख दिए और सुखी ने भी डॉली की कमर पे हाथ रख दिया... दोनो बड़ा झूम के नाचने लग गये...

राज के पास रवि और निकेश आए और डॉली की तारीफ करने लगे... राज चुपचाप बियर पीते हुए दोनो की

बात सुनता रहा... फिर निकेश बोला "मुझे इसको चोद्ने का मन" राज निकेश को देखने लग गया...

रवि भी बोला " वैसे मन तो मेरा भी कर रहा है... ये हमारे प्रिन्सिपल की बेटी है ना...

क्या माल लग रही है इस ड्रेस में कसम से लोग हज़ारो रुपय दे देंगे इसके साथ एक रात गुज़ारने के लिए...

तूने तो काई बारी काम कर दिया होगा ज़रा हमे भी तो दर्शन करा दे??" राज ने कुच्छ नही बोला और अपनी बियर

पीने में लग गया... निकेश बोला "साले बता ना बहुत गंदा मन कर रहा है.. देख कैसे सुखी के साथ नाच

रही है और सुखी भी उसकी कमर पे अपना हाथ चला रहा है.." राज दोनो ने को मना कर दिया...

और वहाँ से चला गया... काफ़ी देर नाचने के बाद डॉली डॅन्स फ्लोर से दूर जाके बैठ गयी और निकेश और

रवि उसके पास जाके बैठ गये.. राज जब वॉशरूम गया तो सुखी ने उसको बोला

"साले तूने निकेश और रवि की बात सुनी?? नाटक क्यूँ कर रहा है.. मेरा बर्तडे है यार...

तेरेको भी तो मैने कितनी लड़कियों को चोद्ने का मौका दिया है और उनमें से एक तो मेरी कज़िन थी"

राज रुक के बोला "अबे बॉय फ्रेंड हूँ उसका नाटक तो करूँगा ही दिखावा करने के लिए." ये बोलके दोनो हँसने लग गये..

फिर राज बोला "इंतज़ाम है भी कुच्छ या बलात्कार करने वाले हो मेरी गर्ल फ्रेंड का??"

सुखी बोला "अर्रे टेन्षन ना ले.. अभी उसकी कोक में तो टॅब्लेट्स डालके पिलाई थी ताकि उसको कुच्छ याद ना रहे और अब

बस तू उसको वोड्का पिला ताकि हमारी भाभी झूम पड़े"

क्रमशः…………………..

 
जिस्म की प्यास--30

गतान्क से आगे……………………………………

राज जब डॉली के पास गया तो कोक में वोड्का मिलाके लाया और डॉली को पीने के लिए बोला...

धीरे धीरे करके डॉली ने वो ग्लास पी लिया और उसके बाद निकेश रवि सुखी उसे डॅन्स करने के लिए ले गये....

बारी बारी तीनो उसके साथ नाचने लग गये... नशा डॉली के दिमाग़ में चढ़ रहा था और रवि निकेश सुखी

तीनो बारी बारी उसका फ़ायदा उठा रहे थे... कोई उसकी गर्दन को छुता तो कोई कमर को और सुखी तो एक दम

आगे बढ़ कर उसकी गान्ड को छुने लग गया... राज बियर पीता हुआ इन सबको देख कर मज़े ले रहा...

फिर कुच्छ 3 बजे पार्टी ख़तम होने लगी और एक के बाद के सब चले गये... पूरे फार्म हाउस में राज, निकेश, रवि, सुखी और एक नशे में डूबी हुई डॉली रह गये...

फार्म हाउस की बाहर की लाइट्स बंद करदी और अंदर डिम करदी और फिर चारो घेरा बनाके डॉली के साथ नाचने लगे...

अभी भी डॉली के इन चारो का हाथ अपना बदन से हटाने की कोशिश कर रही थी तो राज ने एक ग्लास में

वोड्का डाली और डॉली को पीने पर मजबूर कर दिया... धीरे धीरे डॉली ने वोड्का का ग्लास ख़तम कर

दिया और वो नशे में धुत हो गयी... नशे में झूमि हुई डॉली कभी सुखी के उपर गिरती तो कभी सचिन के उपर.....

नाचते नाचते डॉली की ब्रा का हुक खुल गया और उसका स्ट्रॅप कंधे से हटके नीचे गिरने लगा..

डॉली ने उसको उठाने की कोशिश करी मगर वो फिर से गिरे जा रहा था ..

सुखी ने इस बात का फ़ायदा उठाकर डॉली को बोला "डॉली तुम्हारी ब्रा का हुक शायद खुल गया है.. मैं लगा दू??"

सब चौक गये जब डॉली ने सुखी को ये करने की इजाज़त देदि... सबको पता चल गया था कि अब प्रिन्सिपल की बेटी

पूरी तरह काबू में आ गयी है... सुखी ने डॉली की ड्रेस की चैन पीछे से खोली और उसकी नंगी पीठ

को देख कर उसका लंड एक दम खड़ा हो गया... उसी दौरान सचिन ने म्यूज़िक ऑफ कर दिया और पूरे फार्महाउस पे शांति फेल गयी.. सुखी डॉली की कोमल पीठ पे अपनी उंगलिया चलाने लगा... "क्या कर रहे हो सुखी? हुक लगाओ ना' डॉली ने

नशे में कहा मगर सुखी ने कुच्छ जवाब नहीं दिया..

डॉली को नशे में देख कर बारी बारी सबने अपनी टी-शर्ट को उतार दिया जिसे देख कर डॉली ने पूछा

"अर्रे तुम लोग अपने कपड़े क्यूँ उतार रहे हो" सचिन बोला "वो हम खेल खेल रहे है.. तुम खेलोगी??"

डॉली अभी भी झूमते हुए बोली "पर मैने तो टी-शर्ट पहनी ही नहीं है" तो रवि बोला " पर ड्रेस तो पहनी है" राज ने भी कहा "अब ऐसे अच्छा थोड़ी ना होता है कि सिर्फ़ एक ही इंसान ने कपड़े पहेन रखे हो.. चलो डॉली तुम भी अपना ड्रेस उतारो"

सारे लड़के डॉली डॉली डॉली डॉली करके चिल्लाने लगे

डॉली बोली "एक शर्त पर... तुम सब अपनी आँखें बंद करो और 5 तक गिनने के बाद खोलो"

सबने शर्त मंज़ूर करली और आँखें बंद करके गिनना शुरू हुआ... 1..........2.........3....

हर एक सेकेंड बोलने पर 4रो लड़को का लंड मचले जा रहा था.... 4.......5. जैसी आँख खोली तो डॉली वहाँ

से भाग गयी.... डॉली को कुच्छ होश नहीं था कि वो क्या कर रही है.. चारो लड़के उसके पैरो

की आवाज़ सुनके उसका पीछा करने लगे... फिर दरवाज़ा खुलने के आवाज़ आई सब उसी दरवाज़े के पास पहुच गये....

डॉली की काली रंग की पैंटी उसके घुटनो के नीचे हुई पड़ी थी... उसके काले ड्रेस के स्ट्रॅप्स कंधो से नीचे

गिरे हुए थे..... ड्रेस नीचे से कमर तक उठा हुआ डॉली की जाँघो को दर्शाता हुआ...

डॉली की चूत में से पानी निकलते हुए पॉट पे लगता हुआ आवाज़ करने लगा और सब लड़को की आँखें बड़ी हो गयी...

डॉली काफ़ी शर्मिंदा हो गयी जब 3 अंजान लड़को ने और उसके प्रेमी ने उसे सूसू करते हुए पॉट पे बैठा पाया....

राज डॉली के पास गया और उसकी जाँघो को नीचे से पकड़ा और डॉली को हवा में उठा दिया....

अब उसकी चूत सुखी, रवि और सचिन के ठीक सामने पानी फर्श पे बरसा रही थी....

डॉली धीमी आवाज़ में राज को उसे छोड़ने के लिए बोलती रही पर राज ने एक नहीं सुनी...

चूत का पानी ख़तम होते ही डॉली को 2 सेकेंड के लिए राहत मिली और उसके बाद उसने अपने आपको पानी से भरे हुए

बाथ टब में पाया.... चारो लड़के पागल कुत्तो की तरह हँसने लगे जब डॉली का बदन उस ठंडे पानी से

गीला हो गया था.... डॉली को राज की इस हरकत पे बहुत गुस्सा आया और वो हिम्मत करके उठने लगी मगर फिर

से टब में गिर गयी... चारो लड़को ने डॉली को हाथ और पाव से पकड़ा और हवा में उठाते हुए

उसे बाथरूम के बाहर लेके बिस्तर पे ले गये..... उसके कपड़े को खीच तान कर उतार दिए और एक दम नंगा खड़ा कर दिया....

पूरे वक़्त डॉली ने चाहा कि वो अपने आपको इन लोगो से बचा सके मगर उसके जिस्म में लगबघ

सारी ताक़त जा चुकी थी.... अगले ही पल उसे बिस्तर पे धक्का दे दिया और 8 हाथ उसके जिस्म को नौचने लगे...

डॉली जब एक हाथ हटाने की कोशिश करती तो उसके मम्मो पर ज़ोर से चॅटा लगाया जाता...

हर एक चॅटा एक मीठा दर्द लाता.... एक एक करके चारो लड़के पूरे नंगे हो गये... सबका लंड डॉली की

आँखो के सामने तना हुआ खड़ा था... उसी दौरान राज ने एक सफेद पाउडर अपने हाथ में लिया और

उसे डॉली की चूत में जल्दी से मल दिया..... कुच्छ ही सेकेंड में डॉली की चूत हद से ज़्यादा पानी छोड़ने लगी....

कमरे की धीमी रोशनी में डॉली की ज़िंदगी अंधकार से भर गयी थी.... सुखी और और रवि ने बारी बारी

डॉली की चूत को चाटना शुरू करा और सचिन और राज डॉली के मम्मो को चाटने और चूसने लगे...

डॉली का जिस्म अब उसकी नहीं सुन रहा था और हवस के अंदर पूरी तरह से डूब चुका था....

डॉली को फर्श पे घुटने के बल बिठाया और बारी बारी उसको लंड चूसने को दिया गया.... सबका लंड लोहे की तरह

मज़बूत पतले और लंबे थे और डॉली के मुँह की वजह से गीले और गरम हुए पड़े थे....

डॉली के मम्मो पर अभी भी हाथ चले जा रहे थे और उसकी चूत फर्श पे पानी बहाए जा रही थी....

पाउडर की वजह से डॉली की चूत में खुजली होने लगी और अपने सीधे हाथ की उंगलिओ से वो अपनी चूत की खुजली

मिटाने की कोशिश करने लगी... जितना वो खुजाति उतनी खुजली बढ़ती और उतनी ही गीली हो जाती उसकी चूत...

सुखी से अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था और वो ज़ोर से बोला "यारो अब बहुत हुआ मुझे इसकी चूत चोद्नि है...

" रवि बोला "बारी बारी चोदेन्गे क्या??" राज बोला "सालो एक एक करके चोदोगे ना जब तक तुम्हारा लंड भी मर

जाएगा और साली भी बेहोश हो जाएगी..." ये कहकर ही राज डॉली को अपनी गोद में उठाकर बिस्तर पे लेट गया और

डॉली की गान्ड में धीरे से अपना लंड घुसाने लगा... जैसी ही लंड घुस गया राज ने बोला "सचिन आजा तू रंडी की चूत चोद"

सचिन जल्दी से बिस्तर पे कुदा और अपना लंड डॉली की गीली चूत में घुसके चोद्ने लगा....

सुखी और रवि भी रुके और डॉली के मम्मो को चाटने लगा और डॉली के मुँह में भी लंड डाल दिए.....

डॉली की सिसकियाँ और उन चारो लड़को की खुशी पूरे कमरे मे फेल गयी थी.... राज डॉली की गान्ड मारते रहा

और साथ में कभी सुखी कभी सचिन तो कभी रवि उसकी गर्ल फ्रेंड की चूत चोद्ते गये.... जब राज थक गया तो

सबने डॉली को कुतिया की तरह बिठाया और फिर उसके सारे छेद को अपने लंड से भर दिया....

सुखी खड़ा होके उसकी गान्ड मार रहा था रवि उसके नीचे लेटके उसकी चूत मार रहा और राज का लंड

डॉली के मुँह में था.... राज ने अपना मोबाइल फोन निकाला और डॉली की चुदाई की फिल्म बनाने लग गया....

उसने पूरा ख़याल रखा कि किसी लड़के की शक़्ल ना आए बस डॉली बुर्री तरह 3 लंड से चुद्ति हुई नज़र आई....

उस पॉवडर का चूत पे लगने की वजह से चुदाई का नशा डॉली के सिर चढ़ गया था....

वो एक रंडी की तरह अपना जिस्म हिला रही और सुखी जब उसके नितंब पे चॅटा लगाता वो और भी ज़्यादा मचल उठती...

सुखी ना चाहते हुए भी एक दम से झाड़ गया और सारा वीर्य डॉली की गान्ड में डाल दिया...

राज ने सुखी को कॅमरा दिया और वो जाके अब डॉली की गान्ड मारने लगा.... देखते ही देखते राज भी झाड़ गया

और सारा वीर्य डॉली के डॉली के मुँह में डाल दिया.... अब सचिन डॉली के मुँह की तरफ बढ़ा और राज

डॉली की चूत चोद्ने लगा और बाकी दो लड़के डॉली के मम्मो को दबाने लगे.... इतनी चुदाई की वजह डॉली

से रुका नहीं गया और उसका पानी वही गंगा की तरह बहने लगा और चारो लड़के हँसने लगे....

राज फिर भी नहीं रुका और वापस अपना लंड डॉली की चूत में डाल दिया....

कुच्छ देर बाद सब के सब झाड़ गये और डॉली के जिस्म पे बस वीर्य ही नज़र आ रहा था....

चुदाई के बाद सुखी, रवि और सचिन फिर टाय्लेट जाने लगे मूतने के लिए और राज ने कहा

"सालो जब टाय्लेट तुम्हारे पास चलके आएगा तो तुम्हे जाने की क्या ज़रूरत है.... डॉली को कुतिया की तरह चलते

हुए राज रवि के पास लेगया और उसके बाल खीचके मुँह खुलवाया और रवि ने अपना सारा पेशाब डॉली

के मुँह में डाल दिया... रवि ने उसकी गान्ड पे एक लात मारी और डॉली सचिन के पास घुटनो के बल गयी....

ऐसी करते करते सबने डॉली के मुँह में पेशाब करा और उसको वहीं फर्श पे छोड़ कर सोने चले गये...

सुबह के कुच्छ 7 बजे डॉली की आँख खुली.. अपने आपको फर्श पे लेता देख उसको अजीब सा लगा..

बड़ी मुश्किल से फर्श पे बैठी क्यूंकी कल रात जो उसके बदन ने सहा था उसका दर्द अभी भी था...

जैसी ही बैठी उसके उपर जो चादर थी वो नीचे गिर गयी... अपने आप को नंगा पाकर वो घबरा गयी..

उसको पता चला कि अभी वो फार्म हाउस में ही है... वो अपने दिमाग़ पे ज़ोर डालके वो ध्यान देने लगी कि कल रात

को क्या हुआ उसके साथ... एक समय के लिए उसको लगा शायद उसने और राज ने रात में सेक्स करा होगा मगर

फिर भी वो बिना कपड़ो के फर्श पे क्या कर रही है ये सवाल उसे खाए जा रहा था......

दीवार का सहारा लेकर वो खड़ी होने लगी तो उसे अपने जिस्म से अजीब सी बदबू आ रही थी.. उसने अपने जिस्म पर

चादर लपेटी और राज को ढूँढने लगी... हर एक कमरे में जाके वो देखने लगी मगर राज का कोई पता नहीं था...

जैसी ही आखरी कमरे की तरफ बढ़ी तो उसने देखा राज बिस्तर पे सोया पड़ा है... मगर उस कमरे में वो अकेला

नहीं है बल्कि उसके तीन दोस्त भी सोए पड़े है ... उनकी शक़ल को देख कर उसको कल रात का भयानक हादसा याद आने लगा....

इन चारो ने कल रात मेरे साथ ज़बरदस्ती करी थी ये ख़याल डॉली के दिमाग़ में बैठ गया...

जब उसने गौर से देखा तो उसकी पैंटी और ब्रा बिस्तर के पास पड़ी हुई थी और उसका वेहेम सच बनके उसके सामने आ गया... डॉली एक पल भी नहीं रुकी उस कमरे में और अपनी ब्रा और पैंटी उठाके ड्रॉयिंग रूम की तरफ चली गयी...

उसकी आँखों में आँसू बहते हुए चेहरे से टपकते हुए ज़मीन पर गिरने लगे...

डॉली को उन्न चारो पे उतना गुस्सा नहीं आया जितना कि अपने आपसे नफ़रत होने लगी कि कैसे उसने इतना सब होने दिया..

उसके सामने एक ग्लास रखा था जिसपे लिपस्टिक का निशान था ये देख कर उसका अपने आप से भरोसा उठ गया क्यूंकी

उस ग्लास में बहुत ज़्यादा शराब की बदबू आ रही थी...उसको आपने आपसे घिन होने लगी....

उसके आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे... उसे अपने परिवार के बारे में ख़याल आया कि वो उसका घर पे

इंतजार कर रहे होंगे मगर इस हाल में वो नज़ाने कैसे उनके सामने आ पाएगी....

फिर उसको अपने फोन का ध्यान आया और वो उसको आस पास ढूँढने लग गयी... उसके अपना फोन आस पास कहीं नहीं मिला....

वो ज़मीन पे बैठके रोने लगी मगर उसका दर्द उसकी चीख महसूस करने वाले कोई नहीं था...

अपने आँसुओ को पौछ्कर और एक लंबी साँस लेकर वो ज़मीन से उठी और वहाँ पड़े काँच के ग्लास को दीवार

पर तोड़ते हुए एक आखरी बारी साँस लेकर उसने अपने पेट उस टूटे हुए ग्लास से वार कर दिया...

फर्श पे गिरकर उसकी आँखें बंद होने लगी और वही उसकी मौत हो गई....

अगली सुबह नारायण स्कूल के रवाना होने लगा और उसके साथ साथ विजय भी इन्दोर के लिए निकल गया....

नारायण का कुच्छ स्कूल के बाहर काम था तो उसने पहले विजय को बस स्टॉप पे छोड़ना ठीक समझा और फिर अपना काम ख़तम करके स्कूल जाना... नारायण ने घर के दरवाज़े पे ताला लगा दिया और दोनो गाड़ी में बैठके चले गये.....

ललिता अभी भी बिस्तर पे पड़ी सो रही थी... गर्मी के कारण उसका बदन खुला बिना किसी चादर से ढका हुआ था....

बिस्तर पे पेट के बल लेटी हुई अपनी टाँगें चौड़ी करी हुई और हाथ एक उल्टे हाथ की तरफ था और एक सीधे हाथ

की तरफ जा रहा था.... उसकी सफेद रंग की घुटनो से लंबी स्कर्ट उसके घुटने के उपर हुई पड़ी थी और

उसके उपर एक पतली हल्की गुलाबी रंग का टॉप थोड़ा उपर हुआ वह उसकी कमर की नुमाइश कर रहा था....

उसका चेहरा उसके खूबसूरत काले बालो से ढका हुआ था... अचानक से उसकी गहरी नींद टूट जाती है और

अब वो बिल्कुल सीधी बिस्तर पे लेट जाती है.... उसके टॉप भी थोड़ी कमर दिखता हुआ मगर बिककूल सीधे उसके घुटनो

को छुपा रही है..... कुच्छ मिनट बाद वो फिर से हिलती है और फिर से पहले की तरह बिस्तर पे लेट जाती है बस

इस बारी उसका उल्टा हाथ उसके सिर को ढक रहा है.....

अपनी आँखें धीरे से हल्की सी खोलकर वो देखती है के उसके बिस्तर से चुपका हुआ ज़मीन पर बैठा हुआ एक

आदमी है जोकि कोई और नहीं उसी का मामा है.... विजय उपर से बिल्कुल नंगा अपनी चौड़ी छाती और उसपर ढेर

सारे बाल दिखाता हुआ बिना किसी डर के अपनी भांजी के बिस्तर के पास बैठा हुआ है....

मामू की हिम्मत देख कर ललिता को पता चल गया था कि उसकी बहन अब तक घर नहीं आई है और उसके पापा घर

से चले गये है जिसका मतलब सिर्फ़ उन दोनो के अलावा घर पे कोई नहीं है.... उसके अगले ही पल ललिता को उसके

मामा का हाथ उसकी टाँग पे महसूस होता है... वो हाथ आहिस्ते आहिस्ते उसकी टाँग पे हिल रहा है और ललिता

बस उसके उपर जाने का इंतजार कर रही है.... कुच्छ सेकेंड बाद वो हाथ उपर बढ़ता है और

ललिता के घुटनो को छूता है... विजय का चेहरा ललिता को उसका हाल दर्शा रहा है... कभी उसके चेहरे पे

मुस्कान च्छा जाती तो कभी गंभीरता मगर वो रुकने का नाम नहीं ले रहा है और उसके साथ ही ललिता बिल्कुल एक

पुतले की तरह बिस्तर पे लेटी हुई है...

धीरे धीरे ललिता उस हाथ को अपनी सफेद स्कर्ट के अंदर घुसता हुआ पाती है और उसकी उल्टी जाँघ

की तरफ बढ़ जाता है..... विजय का हाथ ललिता के घुटनो के पीछे वाले हिस्से को महसूस करता है

जिसपे गर्मी के कारण पसीना होता है....अपने मुँह में भरे पानी को निगलते हुए वो ललिता की जानगञ को छूता

है जोकि मास से फूली हुई है... उसका इतना मन कर रहा है कि वो किसी तरह उसकी जाँघ को अपने हाथ में जाकड़

ले मगर वो ज़रा सी भी बेवकूफी नहीं दिखाना चाहता...

मगर ललिता उससे कयि कदम आगे निकली और एक ही पल में वो सीधी होके लेट गयी और विजय का हाल बुरा हो

गया क्यूंकी उसका हाथ अब ललिता की दोनो जाँघो के बीच में फसा हुआ था... ललिता ने भी अपने

टाँगें जोड़ रखी थी मज़ा लेने के लिए... ललिता की जाँघो की गरमाहट से विजय के हाथ में पसीने आने

लगे थे.... बड़ी सावधानी से वो चढ़ के बिस्तर पे बैठ गया और अपना उल्टा हाथ ललिता के स्तनो की तरफ ले गया...

उसके उल्टे स्तन को छुते ही उसकी उंगलिया कापने लगी... मगर हिम्मत दिखाकर वो अपनी उंगलिया स्तन पे चलाने लगा और

उसे यकीन हो गया कि उसकी भांजी ने अंदर कुच्छ नहीं पहेन रखा था.... उसकी शांत पड़ी चूची को

भी उसने महसूस कर लिया और अपनी उंगली से वो उसे जगाने लगा.... विजय से अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था...

उसने अपनी पॅंट की ज़िप खोलके अपना काला लंड बाहर निकाला और अपनी सोई हुई भांजी के हाथ पे हिलाने लगा....

हाथ को छुते ही विजय का लंड जागने लगा.... उधर ललिता की चड्डी उसकी गीली चूत की वजह से नम हो रही थी...

अब उसने इस पूरे मौहौल को ही बदल दिया अपनी आँखें खोलकर.... इससे पहले ललिता कुच्छ बोलती उसके मामा

ने अपने उल्टे हाथ से उसका मुँह ढक दिया और उसे गुस्से से देखते हुए बोला

" देख अगर तू चाहती है कि तेरा बलात्कार ना हो तो चुपचाप मेरा कहना मान ले क्यूंकी मुझे तेरा बलात्कार करने में

कोई दिक्कत नहीं होगी बट तेरी तो मैं जान ही लेलुँगा.....

क्रमशः…………………..

 
जिस्म की प्यास--31

गतान्क से आगे……………………………………

ललिता के दिमाग़ में ये चलने लगा कि अगर मैं इससे चुदवाने की इच्च्छा जगाती हूँ तो मेरी ही बदनामी होगी और

अगर मैं ना चाहते हुए भी इससे चुद्वा लेती हूँ तो ना मेरी बदनामी होगी और मुझे चुदाई का मज़ा

भी मिल जाएगा..... ललिता ने अपनी आँखों के उपर नीचे कर इशारे में विजय मामा की बात मान ली...

विजय ने आराम से ललिता के मुँह से अपना हाथ हटाया और उसका दूसरा हाथ भी हड़बड़ी में ललिता की स्कर्ट से बाहर आ चुका था...

"कभी चुदाई का मज़ा लिया है " विजय ने ललिता टाँग को पकड़ते हुए कहा मगर ललिता ने कुच्छ नहीं बोला

विजय ने कस के ललिता की टाँग को पकड़ लिया और बोला "साली जवाब दे.. कभी चुदि है किसी"

ललिता ने झिझकते हुए कहा "ना....हीं"

"क्या नहीं?? मामा हूँ ना तेरा बोल नहीं मामा जी"

"नहीं मामा जी" ललिता ने आहिस्ते से कहा

विजय बोला "चल खड़ी हो जा मेरे सामने तेरा बदन तो ढंग से देखलू"

ललिता चुप चाप बिस्तर से खड़ी हो जाती है और विजय जी भर के उसके बदन को निहारकर बोलता है "चल मुदके दिखा"

ललिता धीरे से घूमती है और विजय उसके नितंब पे चॅटा मारकर हस्स पड़ता है....

उस चान्टे से ललिता की चूत और गरम हो जाती है मगर वो अभी एक बकरी की तरह अपने काटने का इंतजार कर रही है....

विजय ललिता को निहारते हुए बोला "ये दिल्ली वाले अपनी लड़कियों को कौनसी चक्की का आटा खिलाते है...

काफ़ी वज़नदार लग रही है तू... तेरी मामी तो काटे की तरह पतली है तो चुदाई तो दूर कुच्छ देखने में भी

मज़ा नहीं आता"

ललिता दिखावे के लिए बोलती है "मामा जी आप प्लीज़ हमारे रिश्ते की इज़्ज़त करिए"

"चुप कर छिनाल... जब बोलू बोलने के लिएकहु तब अपना मुँह खोलिओ" विजय गुर्राते हुए बोला.. और फिर उसने कहा चल अपना

ये गुलाबी टॉप उतार और अंदर अपना माल दिखा"

ललिता उपरी नाटक करते हुए अपना टॉप धीरे धीरे उतार देती है और ज़मीन पे गिरा देती है...

ललिता के मोटे बड़े स्तन उसके मामा के सामने होते है.... विजय अपना हाथ बढ़ाकर ललिता के स्तन को दबाता

है और फिर उसे बोलता है चल अपने स्तन को चाटके दिखा" ललिता अपनी ज़ुबान निकालकर अपने उल्टे स्तन को उपर

उठाती हुई उसे चाट्ती है मगर अपनी चुचि तक नहीं पहुच पाती....

विजय फिर बोला "चल बहुत हो गया अब ज़रा नीचे से नंगी हो"

ललिता दिखावा करते हुए बोली "मामा जी प्लीज़ मैं आपकी बहन की बेटी हूँ... प्लीज़ ऐसी हरकते ना करवाईए मुझसे"

ये सुनके विजय हंस पड़ता है और बोलता है "साली तुझे क्या पता कि तेरी बहन को मैने कितनी बारी छुप छुप के

नहाते हुए देखा है... नज़ाने कितनी बारी उसके बदन को छुआ है अंजान बन कर.... तू बिल्कुल अपनी मम्मी की तरह ही

दिखती है एक दम सेम बदन है तुम्हारा... उसको नहीं चोद पाया तो क्या हुआ उसकी बेटी तो है"

ललिता ये सुनके आश्चर्यचकित हो जाती है और अपनी स्कर्ट को दोनो कोने से पकड़ती हुई नीचे खीच देती है......

विजय का इशारा समझते हुए वो अपनी पैंटी भी उतार देती है "रुक रुक अपनी कच्ची मुझे पकड़ा दे...

कल रात वाली तो मैं पूरी रात तक अपनी नाक पे लगाके लेटा रहा.... उससे मेरेको तेरा नशा चढ़ गया"

विजय के ये कहते हुए ललिता उसे अपनी पैंटी फैंकते हुए देती है और वो कुत्ते की तरह उसे सूँगने लगता है...

ललिता को वही चुप चाप खड़ी हुई देख विजय बोलता है "चल अब उपर नीचे कूदना शुरू कर.. और ज़ोर ज़ोर से गिनती गिनिओ"

ललिता उसका ये आदेश सुनकर मन ही मन सोचती है कि ये साला कुच्छ करेगा भी या ऐसे ही समय बर्बाद कर रहा है....

उसने कूदना शुरू करा तो उसके मम्मे बेदर्दी से हिलने लग गये जिन्हे देख कर विजय और भी ज़्यादा मचल गया....

ललिता गुज़ारिश करते हुए बोलती है "मामा जी दीदी आती ही होंगी... " इससे पहले वो कुच्छ और बोलती विजय बोलता

"अच्छा चुदाई की इतनी जल्दी है... इधर आ रांड़"

ललिता ये सुनके चौंक जाती है कि उसके मामा कैसे कैसे नाम से उसे बुला रहे है... वो चलकर विजय के

पास जाती है तो विजय उसे खीच कर उसे अपने घुटनो पे पेट के बल लिटा देता है.... विजय मचलते हुए ललिता

के नितंब पे एक चाँटा लगाता है और बोलता है "अँग्रेज़ी पिक्चरो में देखता था मैं और सोचता था

कि मैं किसके साथ करूँगा" ये कहते हुए वो एक और ज़ोर दार चाँटा नितंब पर जड़ देता है और ललिता दर्द

के मारे चिल्लाति है... विजय उसकी चीख से और उतावला होकर चांतो की बरसात करने लगता है और ललिता की

आँखो में सच्ची में आँसू टपक पड़ते है.. उन चॅटो की वजह से ललिता की गान्ड एक दम लाल

पड़ जाती है और विजय उसे ज़मीन पे बिठाकर बोलता है चल मेरे लंड को खुश कर्दे...

ललिता अपने मामा के लंड को पकड़ती है और धीरे धीरे उसे चूसना शुरू करती है....

विजय का लंड मोटा काला और लंबा था जैसा क़ि ललिता को पसंद था.... मुँह में जाकर ही ललिता के मुँह के

स्वाद नमकीन हो गया.... विजय ललिता के सिर को पकड़ते हुए आगे पीछे करने लगा और उसका लंड ललिता

के गले पे लगने लगा.... ललिता इतनी रफ़्तार और दर्द को झेल नहीं पाई और ख़ासने लगी मगर विजय ने

फिर से अपना लंड ललिता के मुँह में डाल दिया....

"आह कितना गरम मुँह है तेरा भांजी... मज़े आ गये" विजय खुश होके कहता है

फिर वो ललिता के मुँह को आज़ाद करके बोलता है "चल अब मैं तुझे घोड़े की सवारी कराता हूँ..

पहले दर्द होगा मगर जब तू पूरी तरह सवार हो जाएगी तब मज़े आने लगेंगे" ये कहकर उसने ललिता को अपने

पेट पर बिठा दिया... फिर उसे उठाकर अपना लंड उसकी गीली चूत में डाल दिया.... "आआआययययीी मा" ललिता ज़ोर से चीखी

विजय बोला "कुँवारियों का शिकार करने में यही तो मज़ा है..." उसने ललिता के दोनो हाथ को जाकड़ लिया ताकि वो

भाग ना पाए और अपना लंड उसकी चूत में मारने लगा.... ललिता दर्द के मारे ऊओ आहह आईईई आवाज़

करने लगी और इससे विजय का जुनून बढ़ता गया... थकने के बाद वो ललिता को लंड पर कूदने के

लिए कहता है और वो बिना इनकार करें उसपे उच्छलने लगती है.... ललिता की खुशी का अहसास उसकी चूत अपना पानी

बहते हुए दिखा रही थी...

फिर विजय ललिता को रोक कर बिस्तर से उठता है और बोलता है "तुझे पता है यहाँ की औरते अपनी गान्ड नहीं मरवाती

मगर दिल्ली की लड़किया कुच्छ ज़्यादा है मॉडर्न है और तेरी गान्ड भी बड़ी बड़ी है... तो तू कुतिया की तरह

बिस्तर पे बैठ आज तेरी गान्ड भी चुदेगि"

विजय ज़बरदस्ती ललिता को कुतिया की तरह बिठाता है और उसकी गान्ड पे दो-तीन बारी थुक्ते हुए अपना लंड

उसपे हिलाने लगता है और फिर एक ही झटके में अपना लंड उसमें डाल देता है....

"साली कुतिया कितनी टाइट है तेरी गान्ड मज़ा आ गया" ये कहकर वो अपना लंड अंदर बाहर अंदर बाहर अंदर

बाहर करने लगता है.... ललिता को हद्द से ज़्यादा दर्द होने लगता है मगर अगले ही पल वो दर्द मज़े

में बदल जाता है... विजय उसके दोनो हाथो को अपने हाथो में ले लेता है और बिना सहारे उसकी गान्ड

मारने लगता है..... कुच्छ देर बाद उसे आज़ाद करके वो उसे बिस्तर पे लिटा देता है... ललिता की सीधी

टाँग को हवा में उठाकर विजय अपना लंड उसकी चूत में डाल देता है.... ललिता के सीधे पैर की उंगलिओ

को चूस्कर विजय उसकी चूत को ठोकने लगता है..... ललिता का दिमाग़ चुदाई के नशे में झूलने लगता है..

उसे अब किसी और बात की चिंता नहीं थी... वो बस अपने मामा के काले भैंसे से चुद्ना चाहती है.....

चुद चुद करकर ललिता बेहोश होने का नाटक करती है और बिस्तर पर ही अपनी आँखें बंद कर लेती...

विजय तब भी अपनी रफ़्तार कम नहीं करता और अपना सारा वीर्य अपनी भांजी की चूत में डाल देता है....

नोट:

(विजय गया तो ज़रूर था नारायण के साथ मगर उसने घर की एक और चाबी अपने पास रख ली थी... वो बस स्टॅंड से

सीधा घर की तरफ बढ़ गया था और उसके दिमाग़ में सिर्फ़ ललिता का नंगा जिस्म था जिसको वो किसी भी तरह चोद्ना चाहता था)

जब नारायण स्कूल के दरवाज़े पे पहुचा तो वहाँ 1 पोलीस की गाड़ी खड़ी थी और एक इनस्पेक्टर

डंडा लिए खड़ा था.... नारायण ने गाड़ी स्कूल के मैन दरवाज़े के पास ही खड़ी करी और इनस्पेक्टर उसके

पास चलकर आया.... नारायण के कुच्छ बोलने से पहले ही उस पोलीस इनस्पेक्टर ने कहा

"यू आर अंडर अरेस्ट मिस्टर. नारायण"

नारायण के पसीने छूट गये और उसने घबराते हुए पूछा "किस...किस जुर्म में"

इनस्पेक्टर ने बोला "अब ये भी बताना पड़ेगा आपको?? एक मासूम लड़की का कयि बारी बलात्कार और हत्या के

जुर्म में"

नारायण बोला "ये क्या बकवास कर रहे है आप... मैने किसी की हत्या नहीं करी"

इनस्पेक्टर बोला " सच की जानकारी करना हमारा काम है आप हमारे साथ थाने चलिए"

दो हवलदारो ने नारायण के बाजुओ का पकड़ा और उसे सीधा पोलीस जीप में बिठा दिया और गाड़ी पोलीस थाने ले गये..

पहली बारी ज़िंदगी में नारायण को जैल की चार दीवारी में आना पड़ा था वो भी उस जुर्म के लिए जिसका

उसे कोई अंदाज़ा भी नहीं था.... इनस्पेक्टर राजीव हाथ में पोलीस का डंडा लिए नारायण के पास आया और बोला

"अब सीधे सीधे कबूल करोगे या फिर हम दूसरे हथकंडे अपनाए जिससे आपको ही तकलीफ़ होगी"

"सर मुझे कुच्छ समझ नहीं आ रहा है आप मेरा जुर्म तो बताइए" नारायण इस बारी थोड़े गुस्से में बोला

इनस्पेक्टर राजीव ने नारायण के चेहरे पे एक तस्वीर फेकि और बोला "देखो इसमे इस लड़की को... देखो और बताओ अब कुच्छ याद आया?"

नारायण ने उस तस्वीर को उठाके देखा तो वो तस्वीर नवरीत की थी...

इनस्पेक्टर राजीव ने कहा "हमारे पास कयि सारे सबूत है जिससे ये सॉफ ज़ाहिर होता है कि हत्या तुमने ही करी है...

जैसे ये शूसाइड नोट जोकि नवरीत के कमरे से मिला जिसमें सॉफ तुम्हारा नाम लिखा हुआ है या फिर

तुम्हारे कमरे में लगे हिडन कमेरे जिसमें नवरीत के साथ बलात्कार हो रहा है"

नारायण इनस्पेक्टर की बात सुनके एक दम घबरा उठा और बोला "इनस्पेक्टर साहब ये साज़िश है मेरे खिलाफ..

अब मेरा यकीन मानिए"

इनस्पेक्टर बोला "अच्च्छा कौन कर रहा है साज़िश.. मरी हुई नवरीत?"

नारायण कुच्छ देर रुक के बोला "मैं आपको पूरा सच नहीं बता सकता मगर ये सच है कि ना मैने रीत का बलात्कार करा है और ना मैने उसकी हत्या करी है"

"राजीव सर" एक छोटे पद का इनस्पेक्टर राजीव को बुलाता है

राजीव उस इनस्पेक्टर के साथ बाहर चले जाता है.... नारायण अपना पसीना पौछ कर लंबी साँस लेता है...

शायद ये कोई ग़लत फ़हमी है तभी वो छोटा इनस्पेक्टर राजीव को यहाँ से लेके गया है ऐसा सोचके

राजीव अपने आपको सांतावना दे रहा है

कुच्छ देर बाद राजीव गुस्से में आता है और नारायण की कुर्सी पे ज़ोर से लात मारता है और नारायण ज़मीन पे

गिर पड़ता है..... राजीव गुस्से में बोलता "साले हमारे शहर मे आके गंदगी फैलाता है...

इन दिल्ली वालो का यहीं काम है... साले हरामी अपनी बेटी का भी तूने बलात्कार करके गॅला घोंट के मार दिया.... "

ये सुनके नारायण चौक कर बोलता है "क्या??? किसने मार दिया मेरी बेटी को... मैं सुबह ही तो घर से निकला था"

राजीव नारायण का कॉलर पकड़के बोलता है "उसका बलात्कार भी सुबह ही हुआ है... और उसकी लाश अभी भी तेरे घर

में पड़ी हुई है"

नारायण बोला "सर मैं ताला लगाके सुबह निकल गया था... मुझे उसके बाद का कुच्छ नहीं पता है"

राजीव बोला "घर का दरवाज़ा नहीं टूटा हुआ, ना खिड़की टूटी या खुली थी तो किसने आके तेरी बेटी को मार डाला?? किसने???"

नारायण पूरा बौखलाया हुआ बोला "सर सर मेरी एक और.. मेरी एक और बेटी है डॉली वो अपनी सहेली नाज़िया की पार्टी

में गयी थी और उसे इस समय तक घर आजना चाहिए था तो आप उससे पुच्छ सकते है कि मैं

अपनी छोटी बेटी के बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकता हूँ"

राजीव बोला "और नवरीत?? वो तेरी बेटी नहीं थी तो उसके बारे में सोच सकता है"

नारायण दो मिनट शांत होकर बोला "सर मैं आपको सब सच सच बताता हूँ"

क्रमशः…………………..

 
जिस्म की प्यास--32

गतान्क से आगे……………………………………

नारायण ने रश्मि और रीत के साथ वो चुदाई की शाम के बारे में पूरी बात बताई और किस तरह से

रश्मि ने रीत और उसे ब्लॅकमेल करा वो सारी बात भी बताई... उसने ये भी बताया कि कमरे में कॅमरा

रश्मि ने लगाए थे.....

"रश्मि?? वो तुम्हारी स्कूल की स्क्रेटरी?? उसने ये सारा जुर्म कबूल कर लिया है और तभी हमने तुम्हे पकड़ा है...

अब वो इस केस में सरकारी गवाह बनेगी" राजीव ने नारायण से कहा

कुच्छ देर के लिए राजीव नारायण को उसके हाल पे छोड़के चला गया.... नारायण अभी भी ज़मीन पे बैठा हुआ

सोच में पड़ गया कि ये उसकी ज़िंदगी में कैसा सैलाब आ गया है?? उसके कुच्छ समझ में नहीं आ रहा था...

पूरी दोपहर बीत गयी थी और इनस्पेक्टर राजीव का कोई पता नहीं था.... नारायण से किसी ने खाना या पानी

के लिए भी नहीं पुछा था.... एक मोटा सा हवलदार जोकि नारायण के सेल के बाहर ही घूम रहा था

नारायण को इशारा करके बुलाने लगा.... नारायण जल्दी से जैल की सलाखो की तरफ आया उस

हवलदार की बात सुनने के लिए.. हवलदार ने नारायण के कान में कहा " उस लड़की का बलात्कार करने में

ज़्यादा मज़ा आया था या फिर अपनी बेटी का" ये बोलके वो हँसने लगा और नारायण ने उस हवलदार का कॉलर

पकड़ लिया.... किसी तरह वो हवलदार नारायण की गिरफ़्त से छूटा और वहाँ से चला गया...

नारायण ज़मीन पर अपना माथा पकड़ के बैठा हुआ था तब इनस्पेक्टर राजीव वाहा आया और नारायण के सेल को

खोलकर अंदर गया... नारायण उसे देख कर खड़ा हुआ और बोला "इनस्पेक्टर साहब कुच्छ पता चला आपको"

इनस्पेक्टर बोला "तुम्हारी बेटी जोकि अपनी सहेली के घर गयी थी अभी तक वापस नहीं लौटी है..

उसके मोबाइल पर कॉल करने की कोशिश करी है मगर वो मिल नहीं रहा है.. मोबाइल को ट्रेस करने की कोशिश

करी है और वो भी नहीं हो रहा है तो शायद उसके मोबाइल को बॅटरी के साथ नष्ट कर दिया है...

तुमने कहा था कि तुम्हारी कल रात को गयी थी तो उसके बाद तुमने उसको कॉल करा था?"

नारायण बोला "नहीं सर मैने नहीं करा मगर आप प्लीज़ मेरी बेटी का पता करिए"

राजीव बोला "वो तो हम कर ही रहे है"

फिर एक और इनस्पेक्टर सेल में घुसकर राजीव के कानो में कुच्छ बोलता है जिससे देख कर नारायण घबराकर

पुछ्ता है "क्या हुआ?? मुझे भी बताइए क्या खबर है मेरी बेटी के बार एमें"

राजीव बोलता "तुम्हारी बेटी का कुच्छ नहीं पता चला मगर तुम्हारी बीवी,साली और बेटे की लाश मिली है तुम्हारे

दिल्ली वाले घर में" ये सुनकर नारायण रोने लगता है... ना जाने किसकी बुर्री नज़र लगी है उसके परिवार

को सब इस तरह नष्ट हो रहा है... राजीव को नारायण की हालत देख तरस आता है मगर वो अपने अंदर

के इंसान को बाहर आने नहीं देता और सेल से चले जाता है"

नारायण के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे कि उसके कानो ने एक ऐसा सच सुन लिया जिसका वो यकीन ही नही कर पाया... दो हवलदरो को उसने बात करते हुए सुना कि चेतन के आकांक्षा (उसकी साली) और शन्नो (उसकी बीवी)

के साथ नाजायज़ संबंध थे.... वो हवलदार नारायण के कुच्छ ही कदम दूर बैठा हुए उसके परिवार के बारे

में घटिया बातें कर रहे थे और नारायण कुच्छ नही कह पा रहा था....

वो रात नारायण ही जानता है कि उसने कैसे काटी थी.... अगली सुबह हवलदार ने उसे उठाके कहा कि कुच्छ

ही देर में तुम्हे कोर्ट लेके जाएँगे.. पैशी है.... नारायण ने उस बात का कोई जवाब नहीं दिया और ज़मीन

पर ही बैठा रहा... कुच्छ देर बाद इनस्पेक्टर राजीव नारायण को कोर्ट जाने के लिए उठने को कहता है मगर

वो अपने आप खड़ा नहीं होता... राजीव के कहने पर दो हवलदार अंदर गये नारायण को उठाने के

लिए और उसको सेल के बाहर लेकर आए... जैसी ही नारायण राजीव के पास पहुचता है वो उसकी जैंब में रखी

पिस्टल को निकालकर अपने को दो गोलिया मार देता है और कुच्छ ही सेकेंड में वही मर जाता है...

रीत की आत्म हत्या के बाद सुधीर के कहने पर रश्मि ने पोलीस वालो को आधा सच बता दिया था...

वो सरकारी गवाह इसलिए बन गयी थी ताकि उसके प्यार सुधीर पर कोई आच ना आए... ये सारा खेल सुधीर का ही

रचाया हुआ था क्यूंकी उसे स्कूल का प्रिंसिपल बनना था जिसमें उसे सफलता भी मिल गयी

डॉली की लाश के बारे में किसी को पता नहीं चलता है क्यूंकी राज और उसके दोस्तो ने उसको उसी फार्म हाउस में दफ़ना दिया था...

विजय ने ललिता का गला घोंट के हत्या करदी थी क्यूंकी उसे डर था कि वो पोलीस के पास ना चली जाए....

ललिता के हवस के खेल ने ही उसकी जान लेली

जिस्म की प्यास की वजह से एक हस्ता खेलता परिवार जुर्म और मौत के अंधकार में डूब गया....

किसीने ये नहीं सोचा था कि कुच्छ घंटो के फास्लो में एक पूरे परिवार की मौत हो जाएगी मगर ज़िंदगी का कुच्छ कहा नहीं जा सकता तो दोस्तो इस तरह इस कहानी का अंत इतना भयानक होगा ऐसा किसी ने सोचा भी नही होगा इसीलिए तो कहा है वासना को इतना ज़्यादा मत बढ़ाओ कि वो परिवार की बरबादी का कारण बने !!!

दा एंड
 
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