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तवायफ़ की प्रेम कहानी complete

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काजल के दिल मे टीस उठ रही थी.......दिल की बगिया मुहब्बत से महक गयी थी...उसके डर पर आज मुहब्बत के समुंदर हिलोरे ले रहा था ,..लेकिन वाह री किस्मत !!, काजल को तन्हाई का अंधेरा ही रास आ रहा था....चाह कर भी वो कुछ कह नहीं पा रही थी...ना आलोक को मुहब्बत का भरोसा दे सकती थी, ना मुहब्बत होने से इनकार कर पा रही थी..करती भी कैसे, नज़रों ने तो पहले ही गुस्ताख़ी कर दी थी...एकरार तो नज़रों ने कर ही लिया था, लफ़ज़ो की ज़रूरत कहाँ थी ?

आलोक उठकर खड़ा हो गया, काजल बुत बनी रही...क्या करे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.आलोक मानो उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था और हर बीत’ते पल के साथ उसके दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी..अब जब हर हाल मे उसने काजल को अपना लिया था तो काजल को उसकी मुहब्बत पर ऐतबार क्यू नहीं आ रहा था, अब क्यू परेसान थी काजल, आलोक समझ नहीं पा रहा था.

“हम आपके साथ नहीं आ सकते आलोक..हम आपके लायक नहीं हैं.....”काजल ने बड़ी मुश्किल से पत्थर का कलेजा करके बस इतना ही कहा और आलोक के हाथो से अपना हाथ छुड़ा लिया..

“ये फ़ैसला करने का हक़ सिर्फ़ मुझे है...तुम्हे कोई हक़ नहीं ये कहने का ...समझी..चलो मेरे साथ ..”आलोक ने फिर से उसका हाथ पकड़ लिया.

“छोड़िए !!...प्लीज़ आलोक...हम ...हम नहीं आ सकते आपके साथ........”

“नहीं आ सकती??...क्यू???क्यू ही आ सकती?...क्यू कर रही हो ऐसा...कुछ बताती भी नहीं,कुछ मानती भी नहीं..क्या करू मैं बताओ....क्यू कसूर है मेरा काजल........”आलोक बहुत बेबस हो गया था और उस से भी कही ज़्यादा बेबस खुद को काजल महसूस कर रही थी.

दोनो ही चुप थे,दोनो ही मजबूर थे....दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक के साथ ऋुना चली आई........

“काजल, जा आलोक बाबू के साथ...चली जा बेटा...किस्मत फिर कभी ऐसा मौका नहीं देगी....निकल जा इस दलदल से...सदा बाबू कब पहुच जाएँ कुछ नहीं पता..और एक बार वो आ गये तो...........”ऋुना ने शायद उनकी बाते सुन ली थी, और काजल को समझाने की पूरी कोसिस कर रही थी...वहीं आलोक अपने बाप का नाम सुनकर चौंक गया.

“पापा,यहाँ आ रहे हैं ?...नहीं नहीं...उनकी कोई रॅली है आज तो....वो यहाँ कैसे...”

“आलोक बाबू ! आप कुछ नहीं जानते अपने पापा के बारे मे...लेकिन उसके लिए शायद फिर कभी मौका मिल जाए...अभी आप प्लीज़ जाइए यहाँ से.........वक़्त ज़्यादा नहीं है..”जुंमन ने अंदर आते हुए कहा.

“आप लोगो का अहसान रहेगा......बहुत बहुत शुक्रिया.....इस अहसान को मैं जान देकर भी नहीं चुका पाउन्गा.......आइए चले....चलो काजल......”आलोक की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि एक बार फिर से गाड़ी के टाइयरो की चर्राहट से फ़िज़ा गूँज उठी.

एक तवायफ़ की बदक़िस्मती इतनी आसानी से उसका पिछा नहीं छ्चोड़ने वाली थी.जुंमन के चेहरे पर परेशानी के भाव थे, ऋुना के चेहरे पर डर के ,आलोक के चेहरे पर गुस्से के और काजल के चेहरे पर दर्द के.....शायद अभी और तमाशा बन’ना था उसका.

गाडियो की आवाज़ पर सबका ध्यान बाहर की ओर चला गया...ऋुना के चेहरे पर मायूसी की रेखाए सॉफ झलक रही थी जबकि काजल का चेहरा बिल्कुल शांत था..शायद मुहब्बत की शिकस्त मान ली थी उसने.....आलोक ने एक बार उसकी आँखो मे देखा और बाहर निकल गया, जुंमन पहले ही बाहर पहुच चुका था...काजल ऋुना के पास खड़ी रही....सबकुछ उसकी वजह से हो रहा था , यही उसे लग रहा था..एक बाप बेटे का टकराव होने जा रहा था...लेकिन आज वो इसे रोक नहीं सकती थी.

तीन गाड़ियाँ थी..एक मे से सदानंद बाहर निकले अपने बॉडीगार्ड के साथ, दूसरे मे से लैला और 2-3 गुंडे सी शकल वाले आदमी...तीसरी गाड़ी मे से कोई 4-5 लोग निकले सबके हाथ मे गन. सदानंद के चेहरे से ही लग रहा था कि वो कितने गुस्से मे हैं..लेकिन जैसे ही सामने खड़े आलोक पर नज़र पड़ी सारा गुस्सा मानो झाग की तरह बैठ गया ...कम से कम चेहरे से तो यही लग रहा था.

"आलोक तुम यहाँ???....ओह तो आख़िर तुम पहुच ही गये....कोई बात नहीं.....आओ... ..यहाँ आओ मेरे पास...मैं सब जानता हू बेटा, लेकिन तुम बहुत बड़े धोखे मे हो.....वो ..वो लड़की....वो ...मैं कैसे समझाऊ तुम्हे...अरे ...अरे..बाज़ारु है वो..."

" बसस्स पापा !!!, मेरे सब्र का इम्तेहान मत लीजिए...मैने आपसे पहले भी कहा था कि मैं अपनी काजल के बारे मे एक शब्द बर्दाश्त नहीं करूँगा....और आप !.......क्यू आए हैं आप यहाँ....??...बताइए.....क्यू??" आलोक ज़ोर से दहाडा.....

सब लोग चुप थे....जुंमन एक ओर खड़ा था ,हाथ मे एक मोटा सा लट्ठ था...लैला एक टक उसे घूर रही थी और वो लैला को, जबकि सदानंद के साथ आए आदमी कुछ दूरी पर ही रुक गये थे.आलोक को देख सदानंद सकते मे थे, शायद डर था कि आज उनके काले कारनामो का चिट्ठा उनकी अपनी औलाद के सामने ना खुल जाए.

आलोक किसी ज़ख्मी शेर की तरह अपने ही बाप को घूर रहा था...

"बोलिए, कैसे जानते हैं आप काजल को....और क्यू आए हैं आप यहाँ......"

"तेरे लिए आया हूँ बेटा, मुझे पता था कि ये कोठी वाली....मेरा मतलब.. ये....ये लड़की तुझे फाँसने के चक्कर मे है... इधर आया था रॅली मे तो इसे हिदायत देने आ गया.....पुछ लेता हूँ कितने पैसे लेगी....." सदाननद की आवाज़ फिर से हलक मे ही रह गयी.....

"बंद कीजिए ये नाटक......चुप हो जाइए....!!!!!!...सच सच बताइए......? कैसे जानते हैं आप काजल को??.......पहले से जानते हैं आप???...पापा, काजल मेरी ज़िंदगी है, एक बार खो कर बड़ी मुश्किल से पाया है.....अब दुनिया की कोई ताक़त मुझे उस से जुदा नहीं कर सकती.....आपके हाथ जोड़ता हूँ, मुझे काजल से फिर से जुदा मत कीजिए, ....बेहतर होगा आप लौट जाइए.. ....." सीधा साधा सा आलोक आज अपने ही बाप से बग़ावत कर गया था.सदाननद हक्का बक्का उसे देखते रह गये.

उन्हे समझ मे आ गया था कि जबतक आलोक बीच मे है वो काजल तक नहीं पहुच पाएँगे......और अब उनके दिमाग़ मे राजनीति का कीड़ा कुलबुलाने लगा....चाल चलने की सोची............

 


"एक बार ऋुना से बात करने दो फिर मैं चला जाउन्गा."इस बार सदानंद ने जुंमन की ओर देखते हुए कहा.

जुंमन ने एक पल को कुछ सोचा, फिर आलोक की ओर देखा और फिर चुपचाप दरवाज़े की ओर बढ़ गया...सदानंद उसके पिछे , आलोक भी पिछे पिछे आने लगा.

इस खेल की सबसे बड़ी खिलाड़ी लैला चुपचाप सारा तमाशा देख रही थी...वो अभी शायद हालात का जायज़ा ले रही थी......अपनी बारी का इंतज़ार ,उसके ख्याल से तो उसके पास तुरुप का इक्का था, बस इस्तेमाल ऐसा सोच समझकर करना था कि फ़ायदा ज़्यादा से ज़्यादा हो सके.वो सबको जाता देख बस मुस्कुरा कर रह गयी.

इधर शेरा , अंजलि और सोफी, दो बार रास्ता भटक चुके थे...

"शेरा भाई, जल्दी चलिए कही देर ना हो जाए..." अंजलि की आँखो मे आँसू थे जबकि शेरा के चेहरे पर परेशानी और झल्लाहट के भाव, वो तो बेचारा बिना किसी वजह के ही इन सब लफडो मे फँस गया था...लेकिन शेरा का दिल भी आज ज़िंदगी मे पहली बार कुछ अच्छा करके सुकून महसूस कर रहा था...जो कहानी उसे अंजलि ने सुनाई थी वो सुनकर तो एक बार को पत्थर भी पिघल जाए,वो तो फिर भी इंसान था.......उसने अपनी आँखे रगड़ डाली और गाड़ी को एक बार फिर से फुल स्पीड के साथ सड़क पर दौड़ा दिया.

आलोक ,ऋुना ,जुंमन, काजल और सदानंद ....कमरे मे 5 लोग थे इस समय....लैला बाहर थी..और उसने शायद सदानंद को उतना ही बताया था जितने की उन्हे ज़रूरत थी....अपने सारे पत्ते कैसे खोल देती.......आख़िर उसे भी तो अपने "मुनाफ़े" का ख्याल करना था...उसका तो "कोहिनूर" दाव पर लग गया था ..भला ऐसे कैसेमुफ्त मे जाने देती.

सदानंद ने एक नज़र घूर कर काजल को देखा..उन नफ़रत भरी निगहो की तपिश से सहम कर वो मासूम फिर से ऋुना के पिछे सिमट गयी............उसे तो कोई ऐतराज़ ही नहीं था अपनी उसी तवायफ़ वाली दुनिया मे लौट जाने पर,क्यूकी उसने इसे ही अपनी किस्मत मान लिया था, लेकिन आज ये फ़ैसला वो अकेले नहीं ले सकती थी....क्यूकी बात आज मुहब्बत की थी, सिर्फ़ किस्मत की नहीं......और आज उसका "प्यार"चट्टान की तरह उसके और उसके मुक़द्दर के बीच आ खड़ा हुआ था.......

डरी-डरी ,सहमी सी काजल हर बीत'ते पल के साथ अपने रब को याद कर रही थी...उसका तो सबकुछ दाव पर लगा था...बरसो पहले दी गयी वो मुहब्बत की कुर्बानी भी..!!!...क्या आज फिर से किस्मत उसे मात देने वाली थी ??

"ऋुना, मैं तुमसे कुछ अकेले मे बात करना चाहता हू......" सदानंद एक एक शब्द को चबाते हुए बोले..........अपने खून के हाथो मजबूर आज वो ऋुना से इस ढंग से बात करने को मजबूर थे, नहीं तो फ़ैसला कब का बंदूक की नाल के ज़ोर पर हो चुका होता.

"नहीं !!!...मुझे मंजूर नहीं आपकी ये शर्त..........मेरी काजल से जुड़े किसी फ़ैसले का हक़ मुझे है या काजल को...... तो अब जो कुछ होगा मेरे सामने होगा...." आलोक ऋुना से पहले ही बोल पड़ा...उसे डर था कि आज फिर से एक "राइश" मजबूर कर देगा, एक "ग़रीब" मजबूर हो जाएगा . आलोक के रहते तो आज तक किसी गैर के साथ ऐसा नहीं हुआ था, तो फिर अपनी मुहब्बत के साथ वो कैसे ये हो जाने देता.

आलोक की बात पर सदानंद ने खीझ कर उसकी ओर देखा...ज़िंदगी मे आजतक किसी का बर्दाश्त नहीं किया था उन्होने...लेकिन आज चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था...सदानंद का चेहरा कठोर हो गया...ऋुना की ओर देखा उन्होने...ऋुना जानती थी सदानंद अपनी झूठी शान बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है......

"आलोक बाबू, भरोसा रखिए हम पर....आपकी काजल की किस्मत का फ़ैसला हम या कोई और नहीं कर सकेगा...आप और आपकी काजल करेंगे......" ऋुना ने बड़े मान के साथ आलोक को देखा.......उसी पर तो दाव लगाया था ऋुना ने और आज गर्व हो रहा था उसे इन मुहब्बत वालो को देखकर............

आलोक ने एक बार काजल की ओर देखा , उसे आँखो ही आँखो मे अपने होने का भरोसा दिलाया और घर से बाहर निकल आया.जुंमन भी पिछे पिछे चला आया, काजल को ऋुना ने रोक लिया...

"कहिए सदा बाबू, आज कौन सा सौदा करना चाहते हैं...."ऋुना ने बड़ी सर्द आवाज़ मे कहा.

"तुम बोलो ऋुना बाई !,आज किस्मत ने तुम्हे भी मौका दिया है.....माँगो क्या मांगती हो "इसे" आलोक की ज़िंदगी से दूर ले जाने का......." सदानंद ने काजल की ओर घूरते हुए कहा.

"छोड़िए सदा बाबू, मैं जो माँगूंगी ,आप दे नहीं पाएँगे...तो अच्छा यही रहेगा कि सौदा ही करले......जो आप खादी वाले अक्सर करते हैं......" ऋुना ने दिल के दर्द को सीने मे ही दबा लिया था,

"बोलो !"

"सदा बाबू, जानते हैं ये कौन है.....??"

"हां, एक तवायफ़ ..एक बाज़ारु....." सदानंद ने बड़े भद्दे लहजे मे गाली दी काजल को.

"हां, आप जैसे के लिए हमारी यही पहचान होती है........लेकिन एक और पहचान है इसकी...जान'ना चाहेंगे........"

"??"

"??"

सदानंद के चेहरे पर हर पल गुस्सा बढ़ता जा रहा था, और काजल के चेहरे पर दर्द.

 


"मोहिनी याद है सदाबाबू ?.......उसी मोहिनी की बेटी है ये काजल जिसके जिस्म को सीढ़ी बनाकर आप अपनी ताजपोशी की गद्दी तक पहुचे.........उसी मोहिनी की बेटी.." ऋुना की बात सुनकर सदानंद एक पल को चौंक गया...लेकिन था वो भी शातिर खिलाड़ी , अगले ही पल खुद को संभाल लिया.

"हां तो ठीक ही है , एक तवायफ़ की बेटी तवायफ़ है...इसमे आस्चर्य की कोई बात नहीं है....सौदा बोलो अपना ...मेरे पास फालतू बातो का वक़्त नहीं है........." सदानंद के चेहरे पर सिर्फ़ नफ़रत थी.

"जितना सोचा था उससे ज़्यादा घटिया निकले आप सदा बाबू....खैर, तो मेरा सौदा ये है कि आप काजल और आलोक को यहाँ से जाने दे...इस देश से दूर......हमेशा हमेशा के लिए...वरना......"

"वरना???...वरना क्या........तू दो कौड़ी की रंडी मुझे धमकी दे रही है...अपनी औकात भूल गयी साली...... एक मिनिट मे तेरा वो हाल...." ऋुना की बात सख़्त नागवार गुज़री थी सदाननद को.

"गुस्से से नहीं होश से काम लो एमएलए सदानंद चौहान.......अगर एक रंडी अपनी पे आ गयी तो फिर बहुत कुछ कर जाएगी.............मैं खुद तुम्हारी पार्टी मे ये खुलासा करूँगी कि किस तरह से तुमने मोहिनी के साथ मिलकर अपनी ही पार्टी के नेताओ का खून किया था.......कैसे सत्ता के लालच मे आकर तुमने हर उस शख्स के खून से होली खेली जो तुम्हारी राह मे रोड़ा था.......और फिर पार्टी को और जनता को जवाब तुम देना सदानंद चौहान....और हां , इसे धमकी मत समझना.....ये सौदा है..वरना हर जुर्म का सबूत मेरे पास मौजूद है...........जो मुझे मोहिनी देकर गयी थी...."

ऋुना ने अंधेरे मे तीर चलाया था लेकिन लगा बिल्कुल निशाने पर था.

"ओह्ह्ह...तो ये बात है....लेकिन मैं क्यू मान लूँ कि ये सच है....अगर ऐसा होता तो बहुत पहले तुम मुझे बर्बाद कर चुकी होती....! " सदानंद के माथे पर शिकन की लकीरे आ गयी थी.

" हां ज़रूर कर देती..........लेकिन तब मुझे पता नहीं था कि जो खेल तुमने माँ के साथ खेला वही बेटी के साथ भी खेल रहे हो..........एक और वजह थी............क्यूकी मुझे लगता था कि मोहिनी के साथ तुमने जिन लोगो को मारा वो मोहिनी की मुहब्बत के हत्यारे थे.........इसीलिए उनके लिए वो सज़ा थी....और मुझे तुम इतने बुरे नहीं लगे....इसलिए मैं अब तक चुप थी.....लेकिन आज नहीं.....मैं मोहिनी को ना बचा सकी...लेकिन काजल को कुछ नहीं होने दूँगी...और ये रहा पहला सबूत मेरी बात का." ऋुना ने वो तस्वीर सदानंद की ओर बढ़ा दी जिसमे वो और मोहिनी एक साथ बैठे थे.

ऋुना की बातों से और वो तस्वीर देख कर सदानंद को यकीन हो चला था कि ऋुना सच मुच बहुत कुछ जानती है, और पार्टी तो दूर, क़ानून की शिकंजे भी उसकी गर्दन पर कस सकते थे.....फिर अपोजीशन वालो का हंगामा........पूरा पोलिटिकल करियर दाव पर लगा नज़र आ रहा था सदानंद को.

अब उसे समझ आ रहा था कि ऋुना ने वाकाई "सौदा" बराबरी का किया था........एक क्षण को तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया....ऋुना से अपनी शिकस्त उसे बर्दाश्त नही थी...और आलोक और काजल को जाने देना तो ज़िंदगी की सबसे बड़ी शिकस्त होती......अब सदानंद के पास एक ही रास्ता था, वो रास्ता जो उसके जैसे बाहुबली अपने राजनीति मे अक्सर इस्तेमाल करते थे.

"ऋुना बाई, मान'ना पड़ेगा ,.....सौदा तो वाकाई बराबरी का किया है तुमने....लेकिन मुझे मंजूर नहीं..." सदानंद के होंठो पर एक ज़हरीली मुस्कान फैल गयी..उसने तस्वीर को एक कोने मे फेंक दिया.

बाहर खड़ा आलोक बेचैन हुए जा रहा था , उसकी मुहब्बत पर इतने पहरे क्यूँ..??..क्यू हर बार ग्रहण लग जाता था उसके प्यार को...??....लेकिन उन आँखो मे एक जुनून था, वो आँखे बोल रही थी....”दुनिया इधर से उधर हो जाए, तुम्हे जाने नहीं दूँगा”...किस्मत और मुहब्बत की जंग मे एक “तवायफ़” की ज़िंदगी का क्या खूब खेल हो रहा था.

सदानंद की बात सुनकर ऋुना का चेहरा एकदम से गंभीर हो गया...उसका दाव बेकार होने वाला था और अब वो कुछ नहीं कर पा रही थी....सदानंद ने एक लंबी साँस ली और बोलना सुरू किया.......

"तो ऋुना बाई, बेसिकली अब बात ये है कि मुझे ये सौदा बड़ा महँगा पड़ रहा है और इतनी कीमत तो मैं चुका नहीं सकता...अब एक ही रास्ता है मेरे पास......"

"तुम सबको यही मार कर दफ़न कर दूं और अपने बेटे को लेकर जाउ यहाँ से.." अपने जेब से सिगार निकाल कर सुलगाते हुए सदानंद ने बड़े आम से लहजे मे कहा....जैसे मानो कोई बड़ी मामूली बात कह रहा हो.

" सदानंद बाबू, ये मुहब्बत भी बड़ी कमीनी चीज़ है,जिसको हो जाए पंगा ही कर देती है...........आलोक की आँखो मे मुहब्बत की जो तड़प है ,आपने शायद देखी नहीं....उस मुहब्बत को झुकाने की कोसिस मत करो, हार जाओगे.... " ऋुना कुछ ज़्यादा कह नहीं पाई, इस बार जवाब दिल से दिया उसने.

"ऋुना बाई, इश्क़ -मुहब्बत सब किताबी बातें हैं....तुम मुझे जानती नहीं अभी...पहले बात सिर्फ़ मेरी इज़्ज़त की थी..मैं नहीं चाहता था कि मेरा बेटा किसी तवायफ़ को मेरे घर की बहू बनाए, लेकिन अब बात ज़िद की है, अब बात मेरे गुरूर की है.....और उसके लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हू...या यूँ कह लो गिर सकता हू.." सदानंद ने अपने इरादे जाहिर कर दिए.

"ठीक है सदानंद बाबू , तो फिर पहले अपने बेटे को मार दो...क्यूकी मुझे नहीं लगता कि उसके रहते आप कोहिनूर को छु भी पाओगे "ऋुना ने भी उसी अंदाज मे जवाब दिया.

"मेरा बेटा मेरे साथ जाएगा.....अब तुमने मेरे पास कोई रास्ता नहीं छोड़ा...तुम मेरे लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा हो और अब मैं तुम्हे छोड़ नहीं सकता...." सदानंद सिगार फूंकता हुआ बाहर निकला, बाहर आलोक खड़ा था कुछ दूर पर..सदानंद ने एक नज़र उस पर डाली और अपने आदमियो की ओर बढ़ गया.

 


ऋुना काजल को लेकर बाहर आ गयी..आलोक जल्दी से उनके पास पहुचा......ऋुना के चेहरे पर मायूसी थी और काजल की आँखो मे आँसू.

"क्या हुआ ऋुना जी...काजल क्या हुआ...क्या कहा पापा ने..? रो क्यूँ रही हो काजल...मैं हूँ ना...कुछ नहीं होने दूँगा तुम्हे..." आलोक ने काजल के कंधे पर हाथ रखा ....काजल ने सूनी सूनी आँखो से उसकी ओर देखा.....आज भी वही लाचारी और बेबसी थी उन सूनी आँखो मे.

"सदाबाबू, !" लैला जो बहुत देर से ये तमाशा देख रही थी अब और चुप ना रह सकी....उसे लगा अब सही टाइम आ गया है अपना दाव लगाने का.....उसकी आवाज़ पर सदानंद ने मुड़कर उसे देखा...लैला जल्दी से उनके पास पहुचि.

"मैं दो मिनट आपसे बात कर सकती हू क्या...." लैला ने कहा.....सदानंद ने खीझ कर उसे देखा ,

"अब तुझे क्या बात करनी है..."

"कुछ बात बनी ???, वो मान गयी आने को....?? "

"नहीं"

"नहीं मानी !!...अच्छा वो..बस...2 मिनट..आप अकेले मे...??"

"यही बोल ! जल्दी टाइम नहीं है मेरे पास......."

"वो...वो...काजल को कैसे वापस लाना है मेरे को पता है...मैं उस से बोलेगी तो वो आएगी....मैं जानती हूँ , वो कही नहीं जा सकती...बस वो ...वो ...कीमत थोड़ी......कुछ और.." लैला को अभी कुछ पता नहीं था ,लेकिन सदानंद के तेवर देखकर ये समझ चुकी थी कि सदानंद का सौदा ऋुना के साथ हो नहीं पाया था...और वैसे भी उसे ये पता ही था कि सदानंद दौलत का जाल ही बिच्छाएँगे और ऋुना को दौलत से मोह कभी नहीं रहा .

"लैला बाई, यहाँ से अब लाशे उठने वाली हैं, बोल तो तेरी भी उठवा दूं....."सदानंद ने घूर कर उसे देखा, लैला की हालत खराब हो गयी.

"लाशें... ?? किसकी लाशें...औक्क.....मैने क्या किया सदा बाबू...मैं तो यू ही....माफ़ कर दीजिए..." लैला जो करोड़ो के सपने देख रही थी अपने "हीरे" से ,बेचारी को मौत नज़र आने लगी.

"तो चली जा यहाँ से....मैने सौदा करना चाहा सिर्फ़ अपने बेटे से उस लड़की को अलग करने का !...अपनी मौत का सौदा नहीं कर सकता...मैं अपने सर पर नंगी तलवार लटकती नहीं छोड़ सकता...अब दफ़ा हो यहाँ से...और कुछ बोली तो....." सदानंद कुछ बातें मानो खुद से कह रहे हो, आख़िरी बात ही लैला की समझ मे आई और उतना ही काफ़ी था.

"ज्ज्ज..जी..मैं अभी चली जाती हू......"

"नहीं अभी नहीं जा सकती...जा..जाकर गाड़ी मे बैठ...."

"ज्ज्ज..जी..." लैला पल भर मे सर अपने घुटने के बीच छुपाए, अपनी कार मे बैठी हुई नज़र आई...

सदानंद ने अपने आदमियो को पास बुलाया और कुछ कहा...सब भी उनके पिछे आने लगे, सबके पास ही गन थी...दो आदमी बाहर की ओर खड़े थे ताकि कोई और बाहर से ना आ पाए इस ओर...और बाकी आदमियो ने और खड़ी गाडियो ने एक घेरा सा बना लिया था चारो ओर से.......

आलोक सब देख रहा था और ऋुना ने भी कुछ कहा था उस से....उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका अपना बाप इतना गिर सकता है कि उसके सामने उसकी मुहब्बत का खून करने वाला है...आलोक के आँखे अंगारे सी दहक रही थी,उसकी जबड़े भिन्च गये और नथुने फूलने लगे..

सदानंद आलोक की ओर बढ़ा...उन्हे खुद भी समझ मे नहीं आ रहा था कि आलोक से कैसे कहे और क्या कहे... वो खुद भी जानते थे कि आलोक का जवाब क्या होगा..और ये भी पता था कि आज आलोक यहा से काजल को लेकर निकल गया तो फिर कभी उनके पास लौटकर नहीं आएगा....और कही ऋुना ने उनकी असलियत बता दी तो...आलोक ने पोलीस को बता दिया तो...?????.....बेटा तो हाथ से जाएगा ही इज़्ज़त और शोहरत भी जाएगी, और कौन जाने बुढ़ापा जैल की चक्की पीसते बीते.....सदानंद ने सोच लिया था कि किसी भी हाल मे वो ऋुना और काजल को यहा से नहीं जाने दे सकते.

"आलोक बेटा, देखो मेरी बात सुनो...तुम इन दोनो को छोड़कर गाड़ी मे चलकर बैठो...बल्कि तुम जाओ यहा से चले जाओ......मैं इन्हे सब समझा दूँगा..."सदानंद खुद से ही नज़रे चुरा रहे थे, आलोक की आँखो की दीवानगी बहुत कुछ कह रही थी और सदा को पता था आलोक मानेगा नहीं, लेकिन किसी भी तरह से आलोक को वहाँ से हटाना ही था और इसके लिए कुछ सोचा था उन्होने.

 


आलोक ने कुछ नहीं कहा बस सवालिया नज़रो से उन्हे घूरता रहा........मानो पुछ रहा हो, सच मे ?? आपको लगता है की मैं ऐसा करूँगा???....

"देखो बेटा........

"बसस्स , एक और बार भी मुझे बेटा मत कहिएगा...!!!!!...कितना बदनसीब हूँ मैं कि आप मेरे बाप हो........नफ़रत हो रही है मुझे अपने वजूद से ,काश मैं अनाथ होता.....काश आप मेरे बाप ना होते..." आलोक की बात मे बहुत दर्द था ,लेकिन आँखो मे उस से कही ज़्यादा नफ़रत.

"आलोक??" सदानंद के अहम को ठेस लगी.

"चिल्लाइए मत मिस्टर सदानंद चौहान.....!!....नहीं तो बाप-बेटे का ये रिश्ता नफ़रत की इसी आग मे भस्म कर दूँगा.....अपनी मुहब्बत की कसम है मुझे अगर काजल को किसी ने हाथ लगा दिया तो वो हाथ उखाड़ दूँगा मैं.......घिंन आ रही है आपसे....कभी सोचा नहीं था कि आप इतना गिर जाएँगे..... !! ..कैसे सोच लिया आपने कि आप मेरी काजल को...मेरी काजल को जान से...."आलोक की आँखे छलक पड़ी, बुरी तरह से अपनी आँखे रगड़ डाली उसने और काजल को अपने सीने मे भींच लिया..आज उसे किसी की परवाह नहीं थी.

नफ़रत से अपने बाप को घूरा, सदानंद को कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा.

" मेरे जीते जी मेरी काजल को कोई छु नहीं सकता......खेलिए खून की होली आप ,लेकिन वो खून आपका अपना होगा....आपकी बंदूक से निकली गोली पहले मेरे सीने को छल्नी करेगी फिर मेरी काजल को छु पाएगी...चलाइए गोली....."आलोक अपने बाप के ठीक सामने खड़ा हो गया था....मानो कह रहा हो कि दिखा दो आज अपने नफ़रत की इंतेहा और देख लो आज मेरी मुहब्बत की इंतेहाँ.

आलोक की आँखो से दीवानगी बरस रही थी , चेहरा गुस्से और नफ़रत से सख़्त हो गया था...सारे जमाने का दर्द उसकी उन दो आँखो मे सिमट गया था....उसका अपना बाप आज उसकी मुहब्बत का दुश्मन बन गया था.

 


"आलोक, मुझे मजबूर मत करो......कि मैं......" सदानंद ने अपनी गन आलोक पर तान दी...एक दीवाने को डराने चले थे..नादान !

"आप कब से मजबूर होने लगे .....किस बात का इंतजार है आपको......चलाइए गोली..."

आलोक दहाड़ता हुआ बोला.....सदानंद के माथे पर पसीना छलक आया....हाथो मे पकड़ी हुई रेवोल्वेर काँप गयी.

"नहीं आलोक,प्लीज़..आप ऐसा मत कीजिए.....आपको कुछ हो गया तो मैं जी के ही क्या करूँगी.....सदानंद बाबू , मुझे मंजूर है....आपकी हर बात मंजूर है.....मैं चलूंगी आपके साथ......आलोक से फिर कभी नहीं मिलूंगी.......माफ़ कर दीजिए.....प्लीज़......ऋुना बाजी ,बोलो ना आप...प्लीज़ ऋुना बाजी...मेरे आलोक को कुछ हुआ तो....." काजल ये सब देख कर बहुत डर गयी थी, वो फूट फूट कर रोने लगी...इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद को मान रही थी.........उसने ये तो कभी नहीं चाहा था....ऋुना खामोश थी, हर बार कुर्बानी काजल ने दी थी, आज आलोक की बारी थी, ऋुना खामोश ही रही.

कुछ दूरी पर खड़े जुंमन से ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था...एक आदमी गन के साथ ठीक उसके पिछे खड़ा था....आज कितना बेबस महसूस कर रहा था वो..उसका अपना घर अपना गाओं...लेकिन वो कुछ कर नहीं पा रहा था...काश उसे पता रहा होता कि ये हालत होंगे तो वो भी "तैयार" होकर आया होता मुंबई से ही. ....

उसे पूरा यकीन था कि एक मिनिट को अगर आलोक बीच से हट गया तो काजल और ऋुना की जान लेने मे सदानंद को एक पल नहीं लगेगा....आलोक भले नादान था,जुंमन ने ये सब बहुत देखा था और यही वजह थी कि वो बहुत बेचैन हो रहा था.

"आलोक, देखो.." सदानंद कुछ कहने के अंदाज़ मे आगे बढ़े, और जैसे ही आलोक का ध्यान हटा पिछे से उसके सर पर वार हुआ, इस से पहले वो सम्भल पता उसके पास खड़े 3-4 आदमियो ने उसे दबोच लिया.

उसी पल फुर्ती से जुंमन ने अपने पास खड़े आदमी के हाथ से एक झटके मे गन छीनी और सदानंद की ओर दौड़ लगा दी.........सदानंद ने झपट कर नीचे गिरी गन उठाई और जुंमन की ओर फाइयर कर दिया......

"ढाएँ !!! " एक साथ दो दो गोलियों की आवाज़ें गूँजी और उस तेज आवज़ के बीच एक दर्दनाक चीख दब कर रह गयी.

दनदनाते हुए और गाडियो के बीच रास्ता बनाते हुए सफ़ारी घुसी चली आई और उसके बाहर लटकता हुआ शेरा...हाथ मे गन ताने , जिसके निशाने पर थे सदानंद चौहान....उसकी गन से चली पहली गोली सदानंद के हाथ पर लगी थी और गन छूटकर दूर जा गिरी थी ...उनका पूरा हाथ लाहुलुहान हो गया था....सदानंद की गन से चली गोली जुंमन की राइट थाइ मे लगी थी और वो कुछ दूर पड़ा कराह रहा था.

अपने हाथ को पकड़े सदानंद उन बिन बुलाए मेहमानो को घूर रहे थे.....उसके निशाने पर सदानंद थे और सदानंद के सारे आदमियो की बंदूक उसपर तन गयी थी.....एक दो गोलिया भी चली लेकिन अभी सफ़ारी रुकी नहीं थी ,शायद इसीलिए किसी को लगी नहीं...

जैसे ही सफारी रुकी सबकी नज़र गाड़ी मे बैठे बाकी लोगो पर गयी....गाड़ी के अंदर अंजलि पर नज़र पड़ते ही सदानंद चीख उठे "कोई गोली नहीं चलाएगा....."

सफ़ारी के रुकते ही शेरा नीचे कूदा और वैसे ही अपनी गन ताने सदानंद की ओर बढ़ गया..

 


"ऐसे क्यू घूर रहे हो बे नेता जी, शेरा नाम है अपुन का , निशाना बहुत अच्छा है अपुन का...देखा ना तू...........शुक्र मनाओ कि अभी मेरा मूड थोड़ा खराब है इसलिए गोली तेरी गन पर चलाई, अच्छे मूड मे होता तो अब तक सर ना रहता तेरे कंधे पर...अबे तुम सब गन नीचे करो नहीं तो गये तुम लोगो के ये नेता जी...अबे समझ नहीं रहे हो क्या..." शेरा ने धमकी दी , पर असर ना हुआ........सदानंद एक टक उसे घूर रहे थे जबकि वही थोड़ी दूरी पर पड़ा जुंमन कराह रहा था और शुक्रिया भरी नज़रो से शेरा को देख रहा था.

"क्या जुंमन मियाँ, अकेले चले थे क़िला फ़तह करने...फट गयी ना....बोला था ना कि तुझे तो मैं ही मारूँगा....चल अपना हिसाब होता रहेगा....अबे जुंमन! ये सब मेरे कू बहुत हल्के मे ले रहे हैं...दिखाऊ क्या जलवा...."शेरा अब धीरे धीरे मूड मे आने लगा था और उसे देख जुंमन के चेहरे की चमक भी लौट रही थी....क्या खूब दुश्मनी निभाई था शेरा ने.

इधर आलोक और काजल दोनो सकते की हालत मे थे.......इन सबके बीच उन तीनो आदमियो ने भी अपनी गन शेरा पर तान दी थी जिन्होने अब तक आलोक को पकड़ रखा था..आलोक ने फुर्ती से सदानंद के हाथ से छितकी हुई गन उठा ली और सदानंद पर तान दी...,सदानंद सन्न हो गये ये देखकर.....वही हाल गाड़ी से बाहर निकलती अंजलि का भी थी.

कुछ पल के लिए मानो वक़्त रुक सा गया था....सब एकदुसरे की ओर सवालिया नज़रो से देख रहे थे. सबके ही चेहरे पर हैरानी थी...सदानंद हैरान थे कि आलोक ने उनपर गन तान दी...आलोक हैरान था अंजलि को यहाँ देखकर और अंजलि हैरान थी कि उसके भाई और बाप आज एकदुसरे की जान लेने को तैयार हो गये थे.सोफी बिचारी काजल की तरह ही डर गयी थी...गाड़ी के कोने मे सर नीचे झुकाए दुब्कि थी..

इस से पहले की अंजलि आलोक को कुछ कहती उसकी नज़र आलोक के पास खड़ी काजल पर पड़ी....अंजलि की आँखो से आँसू निकल गये.....आज कितने दिनो बाद वो काजल को देख रही थी...और वो भी किस हाल मे....काजल ने भी अंजलि की ओर देखा, आँखो ने चन्द बूँद मोती उसके स्वागत मे भी चढ़ा दी.

सब हैरान थे , लेकिन सबसे ज़्यादा हैरान थी काजल..जैसे ही उसकी नज़र उस शख्स पर पड़ी जो अंजलि के साथ आया था....मानो हज़ार वॉल्ट का करेंट लगा उसे......काजल को कुछ कुछ याद आ रहा था....पहले तो नहीं पहचान पाई लेकिन अब धीरे धीरे पहचान गयी थी.... कैसे भूल सकती थी उसे !!! सब चुप थे आलोक की गर्जना ने सबकी तंद्रा तोड़ी....

"बहुत तमाशा बना लिया आपने , अब बोल दीजिए अपने आदमियो को, एक मिनिट के अंदर सब यहाँ से चले जाएँ, नहीं तो मैं आपको गोली मार दूँगा....."

आलोक की बात पर सब लोग जैसे सदमे की हालत से बाहर आ गये...सदानंद का सर शर्म से झुक गया था...ऋुना के चेहरे पर गर्व था...जिस मुहब्बत के लिए वो लड़ रही थी आज उसने सारी हदें तोड़ कर उसे सही साबित कर दिया था....काजल भी सन्न थी...

अंजलि को विश्वास नहीं हुआ अपने कानो पर...वो भाई जिसने कभी अपने पापा की एक बात नहीं टाली थी, जिसके लिए उसके पापा भगवान से पहले आते थे, आज उस भाई ने कहा था कि मैं आपको गोली मार दूँगा...एक पल को दहल गयी अंजलि आलोक का ये रूप देखकर,.... चीख पड़ी....

"भाई, पापा हैं वो अपने..."अंजलि की आँखे डबडबा गयी थी...कैसे कोई बेटी ये बात बर्दाश्त करती, लेकिन इसका ज़िम्मेदार कौन था?? काश अंजलि को पता होता.

आलोक ने भी नम आँखो से अंजलि की ओर देखा..............और एक बेहद सर्द लहजे मे बोल पड़ा....

"पापा हैं बेहन ??....हां पापा तो हैं.....तो पुछ ना पापा से,क्यू जान ले लेना चाहते हैं इस मासूम का...पुछ पापा से क्यू छीन लेना चाहते हैं मेरे जिस्म से मेरी रूह...पुछ पापा से क्या ग़लती है मेरी काजल की.......और पुछ पापा से , किसने थमा दी मेरे हाथ मे ये बंदूक..."आलोक बहुत दर्द मे था और एक बहन से ज़्यादा उसके भाई का दर्द कौन समझता....

अंजलि की आँखे तो पहले से ही नम थी, आलोक की बात पर आँसू बह निकले...नज़रे सदानंद की ओर उठ गयी...जवाब माँग रही थी शायद..सदानंद के पास जवाब था ही कहाँ..??

 
"अंजलि तू तो जानती है ना अपनी काजल को !!...बता ,कैसे छोड़ देता मैं इसे...जान बस्ती है मेरी इसमे...देख मुझसे अलग होकर ये क्या हो गयी...एक बार शायद किस्मत ने हमें जुदा कर दिया...फिर मिले तो अपने पापा ने हमेशा के लिए इसे मुझ से छीन लेना चाहा..........क्या करता मैं अंजलि...लड़ गया अपनी मुहब्बत के लिए....और मैं पिछे नहीं हट सकता..."

"तुझे तेरा भाई ग़लत लगे तो ले...उतार दे मेरे सीने मे एक गोली...क्यूकी मेरे जीते जी तो काजल को कोई च्छू नहीं सकता...फिर चाहे वो कोई भी हो........" आलोक टूट गया था और शायद उस से भी ज़्यादा दर्द मे थी अंजलि.

अंजलि लगातार अपने पापा को देख रही थी...उनकी तो लाडली थी...लेकिन आज उसके पापा उस से नज़रे चुरा रहे थे...

"पापा, कुछ तो बोलिए..."

"हां....हां..किया मैने इसे मारने का प्रयास......और मुझे कोई पछतावा नहीं....कोई भी शख्स एक तवायफ़ को अपने घर की बहू नहीं बनाएगा.........तू नहीं जानती बेटा...इसकी माँ भी तवायफ़ थी.......इसका खानदानी पेशा....... "

"बसस्सस्स पपाा........."अंजलि बुरी तरह से चीख उठी.....

" शर्म नहीं आती किसी की मजबूरी को पेशा कहते हुए आपको !!! ....तवायफ़ होना कोई धंधा नहीं, कोई पेशा नहीं, सिर्फ़ एक लाचारी है...एक ऐसा दलदल है जिसमे मजबूरी की बेड़ियाँ पहनी एक औरत धसती चली जाती है,और दुनिया के लिए “धन्धेवाली” बन जाती है."

"पापा,ये तो आपने देख लिया कि वो एक तवायफ़ है,लेकिन कभी सोचा क्यूँ है वो तवायफ़......सोचा इतनी सी उम्र मे क्यू पैरो मे घुंघरू बाँध कर वो नाच रही है....क्यू वो आँखे इतनी सूनी सी हैं...क्यू उन आँखो मे सपने नहीं हैं...क्यू आपको उन आँखो की वीरानी नहीं दिखती और क्यू इस काजल मे आपको आपकी अंजलि नहीं दिखती......." अंजलि आँसुओ के बीच बोलती चली जा रही थी और वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखे नम थी..........सदानंद को आज आईना दिखा दिया था उनकी बेटी ने.

"पापा ,वो तवायफ़ बन गयी आपकी बेटी के लिए....सिर्फ़ इसलिए कि आपकी बेटी किसी कोठे की तवायफ़ बन ने को मजबूर ना हो जाए...... इस पागल ने अपने हिस्से की ख़ुसीया भी मेरी झोली मे डाल दी....... वो तवायफ़ बनी आपके घर की इज़्ज़त के लिए......आपकी इज़्ज़त के लिए पापा... " अंजलि फुट फुट कर रोने लगी...आलोक एकदम सन्न था......सदानंद का भी वी हाल था...काजल,ऋुना और जुंमन की आँखो से आँसू निकल रहे थे.

आलोक नज़रो ही नज़रो मे अपनी मुहब्बत के सदके किए जा रहा था....उफफफ्फ़! ! कितना दर्द था उस पगली की आँखो मे.

"पापा ! कसूर मेरा है और अगर तवायफ़ होने की सज़ा मौत है , तो सबसे पहले वो सज़ा मुझे मिलनी चाहिए, क्यूकी इस मासूम के तवायफ़ बनने की वजह मैं हूँ" अंजलि ने अपने आँसू पोन्छ लिए, उसके चेहरे पर एक सख्ती थी. सदानंद की आँखो मे देखते हुए बोली.

अंजलि का चेहरा सख़्त हो गया था..आलोक और सदानंद उसे ही देखे जा रहे थे...और काजल...वो पगली एक बार फिर से रो रही थी.काजल को कोठेवाली, धन्धेवाली और रंडी की गालियों से नवाज़ने वाले सदनद बाबू आज बेबस खड़े थे...उनकी अपनी बेटी ने उन्हे एक तवायफ़ का असली चेहरा दिखा दिया था.

सदानंद ज़्यादा कुछ कह पाने की हालत मे नहीं लग रहे थे...

"तुम सब जाओ यहाँ से...इसे ले जाओ पास के किसी हॉस्पिटल मे अड्मिट करवा दो..." सदानंद ने जुंमन की तरफ इशारा करते हुए अपने आदमियो से कहा..आज जब अपनी खुद की बेटी की इज़्ज़त सर-ए बाज़ार आ गयी थी अहसास हो रहा था कि कितना दर्द होता है जब किसी की बेटी भरी महफ़िल मे रुसवा होती है तो.

किसी ने कुछ नहीं कहा, सदानंद के चेहरे पर एक मायूसी का रंग था और अब वो रंग गुस्से मे बदल रहा था. उनके सारे आदमी गाडियो मे सवार हो गये.... कुछ ने जुंमन को पकड़ के उठाया और धीरे धीरे गाड़ी की ओर ले चले ....

काजल ने बड़ी शुक्रगुज़ार नज़रो से जुंमन की ओर देखा और हाथ जोड़ दिए...जुंमन की आँखो मे एक चमक थी....जो करना चाहा था वो कर दिया था उसने...काजल आलोक के पास थी उसकी ज़िम्मेदारी पूरी हो गयी थी... काजल को देख मुस्कुराया और एक आदमी का कंधा पकड़े हुए धीरे धीरे गाड़ी मे बैठने लगा.

"शुक्रिया शेरा...तेरा अहसान रहेगा मुझपर...कभी मौका मिला तो इस अहसान का बदला जुंमन जान देकर भी चुकाएगा.." जुंमन ने शेरा से कहा, जवाब मे शेरा ने घूर कर उसे देखा..फिर थोड़ा सा मुस्कुराया..

"शुक्रिया जुंमन " ऋुना की आँखो मे आँसू थे, कभी सोचा नहीं था उसने कि जुंमन इतना कर जाएगा किसी पराए के लिए...काजल से भला उसका रिश्ता ही क्या था...आलोक की आँखे भी नम थी...और वो भी जुंमन को उसी अपने पन से देख रहा था...आगे बढ़ा और जुंमन के हाथ पकड़ लिए...

"जुंमन भाई, आपका अहसान कभी चुका नहीं पाउन्गा....लेकिन कभी कोई ज़रूरत पड़ जाए तो आज़मा ज़रूर लेना..."

 


"काजल को कभी छोड़ना मत आलोक बाबू, बस ...फिर मिलूँगा.." जुंमन ने कहा और गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया .सब गाडिया एक एक करके चली गयी...लैला अपनी कार से बाहर निकली लेकिन वही खड़ी रही....

सदानंद ने शायद इसीलिए सबको भेज दिया था क्यूकी अब शायद जो खुलासा होने वाला था वो उन्हे बहुत नागवार गुजरता...ऐसी आशंका उन्हे हो गयी थी.

काजल, ऋुना,आलोक, अंजलि और उसके साथ आया वो लड़का, सोफी, सदानंद , लैला और शेरा,...बस इतने लोग ही रह गये थे...

काजल बेगुनाह होते हुए भी सबसे नज़रें चुरा रही थी...आलोक से भी दूर दूर ही थी..ऋुना के पिछे इस तरह से छुपि थी मानो कोई पाप कर दिया हो उसने.

सदानंद जिनको भेज सकते थे भेज चुके थे...अब जो वहाँ मौजूद थे या तो उनका इन सबसे वास्ता था या फिर वो सदानंद की बात माने को मजबूर नहीं थे...अब शेरा को कहते जाने को तो कौन सा वो मान जाता.

"ये सब क्या है अंजलि...बताओ मुझे....क्या मज़ाक लगा रखा है......और तुम कैसे वजह हो इसके कोठे पर पहुचने की..." सदानंद अब गुस्से मे थे.

"माफ़ कर दीजिए पापा, और ना कर सके तो सज़ा दे दीजिए जो चाहे......लेकिन अब खामोश नहीं रह सकती......"अंजलि ने कहा और काजल की ओर बढ़ गयी उसका हाथ पकड़ा और खींच कर अपने सामने किया.

काजल सर झुकाए थी और आँखो से आँसू बहकर उसके प्यारे गुलाबी गालो को भिगो रहे थे.....अंजलि ने अपने हाथो से पकड़कर उसका चेहरा उपर उठाया....काजल ने उसकी आँखो मे देखा और उसके गले लग गयी और फूट फूट कर रोने लगी....काजल का हर आँसू आलोक के दिल मे एक तीर की तरह चुभ रहा था...कुछ भी तो नहीं कर पाया था वो अपनी मुहब्बत के लिए....अंजलि भी उसके गले लगी ज़ोर ज़ोर से रोने लगी.

"काजल...ये काजल...मत रो...प्लीज़ अब मत रो काजल...बहुत रो लिया तूने...माफ़ कर दे अपनी इस दोस्त को,...माफ़ कर्दे मेरी बहन....."अंजलि काजल को चुप करा रही थी और खुद भी रो रही थी.सदानंद कुछ बोल नहीं पा रहे थे.

"अंजलि, आप क्यू आ गयी यहाँ...क्यू आ गयी आप...देखो आपकी काजल क्या से क्या हो गयी....मौत ने भी गले नहीं लगाया ,लेकिन मौत से भी बड़ी सज़ा मिली मुझे....जाने क्या गुनाह किया था मैने....." काजल के आँसू नहीं थम रहे थे, बरसो से दबा दर्द आज फूट पड़ा था.आलोक ने आगे बढ़कर काजल के सर पर हाथ रखा...काजल ने एक पल को भीगी नज़रों से उसे देखा और फिर आलोक से लिपटकर रोने लगी.

ऋुना को तो सब पता ही था और कुदरत के इस चमत्कार को देखकर बार बार उसकी आँखे भी नम हो रही थी.

"काजल, तुमने जो मेरे लिए किया है वो कभी कोई अपने किसी सगे के लिए भी नहीं कर सकता....तुमने तो ऐसी कुर्बानी दी है जो सिर्फ़ क़िस्सो कहानियो मे सुन'ने को मिलती है,...काजल, तुम्हारा इम्तहान अब ख़त्म हो गया है....तुम्हारे इस प्यारे से दिल की पुकार उस रब तक पहुच ही गयी.....काजल, मेरी ओर देखो..प्लीज़." अंजलि ने कहा.

काजल ने सर उठाकर अंजलि को देखा...

"इसे पहचान रही हो....."अंजलि ने साथ आए लड़के की ओर इशारा किया....

काजल ने धीरे से हां मे सर हिलाया...वो लड़का चुपचाप सर झुकाए खड़ा था.

 


"ये सब क्या हो रहा है...सॉफ सॉफ क्यू नहीं बताती.." सदानंद का सब्र जवाब दे रहा था,गुस्से मे बोले.

"प्लीज़..!!" आलोक उनसे भी तेज चीख पड़ा.

अंजलि ने सदानंद की ओर देखा, फिर काजल से बोली.

"काजल, ये मुझे यू.के. मे मिला...मुझे सबकुछ बताया इसने....सबकुछ काजल...लेकिन आज वो सबकुछ एक बार तुमसे सुन'ना चाहती हू......प्लीज़ ...बस एक बार.......क्यू किया तुमने ऐसा...बताओ क्यू किया तुमने ये......??"

काजल के आँसू आज रुक नहीं रहे थे...उसने कभी सोचा नहीं था कि उसे ये मौका भी मिलेगा...किस्मत और कुदरत दोनो ने ही उस'से मूह मोड़ लिया था ,लेकिन आज भी दुनिया मे चमत्कार होता है...काजल को यकीन हो चला था.

"बताओ काजल, क्या हुआ था...प्लीज़ बताओ...." आलोक ने उसके रेशमी बालो मे प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

क्जेलाल ने एक नज़र ऋुना पर डाली, ऋुना की आँखे भी नम थी और लब मुस्कुरा रहे थे,,आज उसने वो कर दिखाया था जो उसके लिए किसी ने नहीं किया...एक सुकून था ऋुना के दिल मे...काजल ने लैला की ओर देखा, वो भी एकदम चुप थी और बहुत गुस्से मे भी लग रही थी....काजल ने एक बार सदानंद की ओर देखा...और सहम गयी...सवालिया नज़रों से फिर से आलोक की ओर देखने लगी.

"डरो मत काजल...यकीन रखो मुझपर जान ,आज इस दुनिया की कोई ताक़त तुम्हे मुझसे जुदा नहीं कर सकती......सबसे टकरा जाएगा तुम्हारा आलोक....मेरी कसम है तुम्हे...बताओ...सब कुछ बताओ...."आलोक ने उसका हाथ अपने हाथो मे लेते हुए यकीन दिलाया उसे....

शेरा वही थोड़ी दूर पर एक खाट खिचकर आराम से बैठ हुआ था.....शायद सदानंद पर अभी भी यकीन उसे नहीं था.

अंजलि ने काजल के कंधे पर धीरे से हाथ रखा ....काजल ने उसकी ओर देखा और आलोक का हाथ मजबूती से पकड़ लिया.

"आलोक जिस दिन आप यू.एस.ए चले गये ,मुझे आपके घर बुलाया गया....आपके पापा से ही मुझे पता चला था कि मेरी माँ एक तवायफ़ है......और ये भी अहसास हुआ कि एक तवायफ़ की बेटी होना ही एक सज़ा थी......मुझे आपसे दूर रहने का फरमान सुनाया गया.......आपसे हमेशा हमेशा के लिए दूर जाने का फरमान...."काजल ने ज़बरदस्ती बह आए आँसू की बूँदो को सॉफ किया और बोलती चली गयी.

"मुझे अपनी माँ से नफ़रत होने लगी थी.....लेकिन एक बार अपनी माँ से मिलना चाहती थी...पुच्छना चाहती थी कि ऐसा क्यू किया उन्होने....मुंबई गयी मैं लेकिन मेरी माँ इस दुनिया से जा चुकी थी !!...मेरी माँ बुरी नहीं थी आलोक !!!...मेरी माँ बहुत अच्छी थी......बहुत अच्छी थी मेरी माँ..." काजल ने एक नज़र ऋुना पर डाली और फिर सदानंद पर...सदानंद ने नज़रे झुका ली...

काजल की आँखे फिर से छलक आई.... ये दास्तान कह पाना बहुत मुश्किल हो रहा था उसके लिए, लेकिन तवायफ़ थी, दर्द की आदत हो चली थी, फिर से बोलने लगी.......

काजल बोलती चली गयी...बीती हुई दर्दनाक यादें उसी आज भी कल की हुई बात की तरह याद थी...

“मैं मुंबई मे अपनी माँ से मिलने गयी थी,लेकिन उनके गुजर जाने की खबर से बहुत टूट गयी थी....कैसी भी थी मेरी माँ थी.”

“आप तो पहले ही मेरे पास नहीं थे आलोक अब आपके साथ की उम्मीद भी ना रही.....मेरी माँ भी चली गयी थी मुझे छोड़कर.....इस पूरी दुनिया मे कोई मेरा ना था...मैने सोच लिया था कि मैं कोलकाता हमेशा के लिए छोड़ दूँगी.......कहाँ जाउन्गी, क्या करूँगी,कुछ पता नहीं था, लेकिन कोलकाता हमेशा के लिए छोड़ देना था, क्यूकी वहाँ रहकर आपसे दूर रहना मेरे बस मे ना था" काजल की सूनी आँखे आलोक के चेहरे पर जम गयी.

काजल आगे बताने लगी...

"मुंबई से कोलकाता वापस मैं अपने हॉस्टिल पहुचि, कुछ ऐसी कीमती चीज़ें थी जिन्हे लेने वापस आना पड़ा.....अपने रूम मे मैं आपसे जुड़ी कुछ यादें , कुछ तस्वीरें और आपकी चन्द निशानिया समेट रही थी की ज़ोर ज़ोर से किसी ने दरवाज़ा खटखटाया...मैने दरवाज़ा खोला , अंजलि थी."

काजल ने कहा और चुप हो गयी..........अंजलि समझ गयी उसकी मजबूरी.

एक लंबी साँस ली अंजलि ने और अब उसने कहानी आगे बढ़ाई..

"कॉलेज के दिनो मे ही मेरा राजन के साथ....मतलब हम दोनो एक दूसरे से प्यार करते थे.....या यू कहूँ कि मुझे ये ग़लतफहमी हुई थी."अंजलि ने एक दर्द भरी निगाह साथ खड़े उस लड़के पर डाली........

"एक दिन काजल ने हमें देख भी लिया था साथ मे, लेकिन मैने इसे नहीं बताया, काश बता देती...एक शाम हम...हम..दोनो बहक..बहक गये......"अंजलि ने बड़ी मुश्किल से ये अल्फ़ाज़ कहे थे...अपने भाई और पापा के सामने ऐसी बातें कैसे कर सकती थी कोई लड़की ,लेकिन आज वो मजबूर थी.

"राजन ने मुझ से शादी का वादा किया था...लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि मेरे साथ धोखा हो रहा है......"अंजलि ने उस लड़के की ओर फिर नफ़रत से देखा.

 
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