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काजल के दिल मे टीस उठ रही थी.......दिल की बगिया मुहब्बत से महक गयी थी...उसके डर पर आज मुहब्बत के समुंदर हिलोरे ले रहा था ,..लेकिन वाह री किस्मत !!, काजल को तन्हाई का अंधेरा ही रास आ रहा था....चाह कर भी वो कुछ कह नहीं पा रही थी...ना आलोक को मुहब्बत का भरोसा दे सकती थी, ना मुहब्बत होने से इनकार कर पा रही थी..करती भी कैसे, नज़रों ने तो पहले ही गुस्ताख़ी कर दी थी...एकरार तो नज़रों ने कर ही लिया था, लफ़ज़ो की ज़रूरत कहाँ थी ?
आलोक उठकर खड़ा हो गया, काजल बुत बनी रही...क्या करे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.आलोक मानो उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था और हर बीत’ते पल के साथ उसके दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी..अब जब हर हाल मे उसने काजल को अपना लिया था तो काजल को उसकी मुहब्बत पर ऐतबार क्यू नहीं आ रहा था, अब क्यू परेसान थी काजल, आलोक समझ नहीं पा रहा था.
“हम आपके साथ नहीं आ सकते आलोक..हम आपके लायक नहीं हैं.....”काजल ने बड़ी मुश्किल से पत्थर का कलेजा करके बस इतना ही कहा और आलोक के हाथो से अपना हाथ छुड़ा लिया..
“ये फ़ैसला करने का हक़ सिर्फ़ मुझे है...तुम्हे कोई हक़ नहीं ये कहने का ...समझी..चलो मेरे साथ ..”आलोक ने फिर से उसका हाथ पकड़ लिया.
“छोड़िए !!...प्लीज़ आलोक...हम ...हम नहीं आ सकते आपके साथ........”
“नहीं आ सकती??...क्यू???क्यू ही आ सकती?...क्यू कर रही हो ऐसा...कुछ बताती भी नहीं,कुछ मानती भी नहीं..क्या करू मैं बताओ....क्यू कसूर है मेरा काजल........”आलोक बहुत बेबस हो गया था और उस से भी कही ज़्यादा बेबस खुद को काजल महसूस कर रही थी.
दोनो ही चुप थे,दोनो ही मजबूर थे....दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक के साथ ऋुना चली आई........
“काजल, जा आलोक बाबू के साथ...चली जा बेटा...किस्मत फिर कभी ऐसा मौका नहीं देगी....निकल जा इस दलदल से...सदा बाबू कब पहुच जाएँ कुछ नहीं पता..और एक बार वो आ गये तो...........”ऋुना ने शायद उनकी बाते सुन ली थी, और काजल को समझाने की पूरी कोसिस कर रही थी...वहीं आलोक अपने बाप का नाम सुनकर चौंक गया.
“पापा,यहाँ आ रहे हैं ?...नहीं नहीं...उनकी कोई रॅली है आज तो....वो यहाँ कैसे...”
“आलोक बाबू ! आप कुछ नहीं जानते अपने पापा के बारे मे...लेकिन उसके लिए शायद फिर कभी मौका मिल जाए...अभी आप प्लीज़ जाइए यहाँ से.........वक़्त ज़्यादा नहीं है..”जुंमन ने अंदर आते हुए कहा.
“आप लोगो का अहसान रहेगा......बहुत बहुत शुक्रिया.....इस अहसान को मैं जान देकर भी नहीं चुका पाउन्गा.......आइए चले....चलो काजल......”आलोक की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि एक बार फिर से गाड़ी के टाइयरो की चर्राहट से फ़िज़ा गूँज उठी.
एक तवायफ़ की बदक़िस्मती इतनी आसानी से उसका पिछा नहीं छ्चोड़ने वाली थी.जुंमन के चेहरे पर परेशानी के भाव थे, ऋुना के चेहरे पर डर के ,आलोक के चेहरे पर गुस्से के और काजल के चेहरे पर दर्द के.....शायद अभी और तमाशा बन’ना था उसका.
गाडियो की आवाज़ पर सबका ध्यान बाहर की ओर चला गया...ऋुना के चेहरे पर मायूसी की रेखाए सॉफ झलक रही थी जबकि काजल का चेहरा बिल्कुल शांत था..शायद मुहब्बत की शिकस्त मान ली थी उसने.....आलोक ने एक बार उसकी आँखो मे देखा और बाहर निकल गया, जुंमन पहले ही बाहर पहुच चुका था...काजल ऋुना के पास खड़ी रही....सबकुछ उसकी वजह से हो रहा था , यही उसे लग रहा था..एक बाप बेटे का टकराव होने जा रहा था...लेकिन आज वो इसे रोक नहीं सकती थी.
तीन गाड़ियाँ थी..एक मे से सदानंद बाहर निकले अपने बॉडीगार्ड के साथ, दूसरे मे से लैला और 2-3 गुंडे सी शकल वाले आदमी...तीसरी गाड़ी मे से कोई 4-5 लोग निकले सबके हाथ मे गन. सदानंद के चेहरे से ही लग रहा था कि वो कितने गुस्से मे हैं..लेकिन जैसे ही सामने खड़े आलोक पर नज़र पड़ी सारा गुस्सा मानो झाग की तरह बैठ गया ...कम से कम चेहरे से तो यही लग रहा था.
"आलोक तुम यहाँ???....ओह तो आख़िर तुम पहुच ही गये....कोई बात नहीं.....आओ... ..यहाँ आओ मेरे पास...मैं सब जानता हू बेटा, लेकिन तुम बहुत बड़े धोखे मे हो.....वो ..वो लड़की....वो ...मैं कैसे समझाऊ तुम्हे...अरे ...अरे..बाज़ारु है वो..."
" बसस्स पापा !!!, मेरे सब्र का इम्तेहान मत लीजिए...मैने आपसे पहले भी कहा था कि मैं अपनी काजल के बारे मे एक शब्द बर्दाश्त नहीं करूँगा....और आप !.......क्यू आए हैं आप यहाँ....??...बताइए.....क्यू??" आलोक ज़ोर से दहाडा.....
सब लोग चुप थे....जुंमन एक ओर खड़ा था ,हाथ मे एक मोटा सा लट्ठ था...लैला एक टक उसे घूर रही थी और वो लैला को, जबकि सदानंद के साथ आए आदमी कुछ दूरी पर ही रुक गये थे.आलोक को देख सदानंद सकते मे थे, शायद डर था कि आज उनके काले कारनामो का चिट्ठा उनकी अपनी औलाद के सामने ना खुल जाए.
आलोक किसी ज़ख्मी शेर की तरह अपने ही बाप को घूर रहा था...
"बोलिए, कैसे जानते हैं आप काजल को....और क्यू आए हैं आप यहाँ......"
"तेरे लिए आया हूँ बेटा, मुझे पता था कि ये कोठी वाली....मेरा मतलब.. ये....ये लड़की तुझे फाँसने के चक्कर मे है... इधर आया था रॅली मे तो इसे हिदायत देने आ गया.....पुछ लेता हूँ कितने पैसे लेगी....." सदाननद की आवाज़ फिर से हलक मे ही रह गयी.....
"बंद कीजिए ये नाटक......चुप हो जाइए....!!!!!!...सच सच बताइए......? कैसे जानते हैं आप काजल को??.......पहले से जानते हैं आप???...पापा, काजल मेरी ज़िंदगी है, एक बार खो कर बड़ी मुश्किल से पाया है.....अब दुनिया की कोई ताक़त मुझे उस से जुदा नहीं कर सकती.....आपके हाथ जोड़ता हूँ, मुझे काजल से फिर से जुदा मत कीजिए, ....बेहतर होगा आप लौट जाइए.. ....." सीधा साधा सा आलोक आज अपने ही बाप से बग़ावत कर गया था.सदाननद हक्का बक्का उसे देखते रह गये.
उन्हे समझ मे आ गया था कि जबतक आलोक बीच मे है वो काजल तक नहीं पहुच पाएँगे......और अब उनके दिमाग़ मे राजनीति का कीड़ा कुलबुलाने लगा....चाल चलने की सोची............