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दुल्हन मांगे दहेज complete

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ज्यों…ज्यों उसने सोचा त्यों त्यों इरादा दृढ होता चला गया----मज़बूरियों की जंजीर से बंधी संभ्रांत परिवार की आदर्श बहू एक जालिम के मर्डर की स्कीम बनाती चली गई ।

जो भी लूज प्वाइंट उसे नजर अाए, उन्हे कसा----अपनी समझ में उसने मकड़ा के मर्डर की ऐसी सुदृढ़ स्कीम बना डाली थी कि जिसके तहत काम करने पर वह कभी पकड़ी जाने वाली नहीं थी ।

दस बजे तक हेमन्त फेक्टरी चला गया, रेखा औंर अमित च कॉलेज ।

घर में रह गए बिशम्बर गुप्ता, ललिता और सुचि---वह विचारों में गुम रही, पता ही न चला कि ग्यारह कब बज बज गए-----घड़ी पर नजर पडते ही वह एक झटके से उठी-----यह विचार दिमाग में अाते ही उसका दिल धाड़थाड़ करके बजने लगा कि अब उसे रिवॉ्ल्वर बरामद करना है ।

विशम्बर गुप्ता का कमरा ग्राउंड फ्लोर पर था !

बह यह सोचती हुई नीचे आई कि रिवॉल्वर क्रिस तरह चुराना है---दरअसल वह कोई निश्चित योजना न बना पा रही थी, क्योंकि बिशम्बर गुप्ता का कोई भी काम नियमित न था ।

कभी कभी वे सारा दिन अपने कमरे मेंही बेठे रहते। कभी सुबह चले जाते, शाम को लोटत्ते-कभी सारा दिन धूप में बैठकर ही गुजार देते-फिलहाल वह यह सोचकर परेशान थी कि अगर आज उनका मूड सारा दिन कमरे में ही जमे रहने का हुआ तो वह क्या करेगी ?

परन्तु नीचे पहुंचते ही उसे खुशी हुई ।

चूड़ीदार पायजामे पर काली अचकन पहनने के बाद अब वे उसके बटन लगा रहे थे, सुचि देखते ही समझ गई कि वे कही जाने की तैयारी में हैं ।

उसने पूछा…"कहीं जा रहे हैं बाबूजी ?"

" हां !"

" कहां ?"

"अरे जाएंगे कहां बहु, रिटायर होने के बाद तो समय गुजारना भारी हो रहा है ।" पैरों में जूते डालते हुए बिशम्बर गुप्ता ने कहा----"जाकर बैठ जाएंगे अपने ही साथ के किसी रिटायर दोस्त के यहां ---- पुरानी बातें याद कर-करके अपने साथ उसका भी समय गुजारेंगें ।"

सुचि के कान उनके शब्दों पर न थे ।

उसका सारा ध्यान सेफ के 'की होल' में फंसी चाबी पर था-छल्ले में पड़ी अन्य दो चाबियां धीरे धीरे झूल रही थी ।

विशम्बर गुप्ता ने अपनी छड़ी उठाई ।

सुचि का दिल बल्लियों उछलने लगा-उसकी मनोकामना बडी आसानी से पूरी होंने जा रहीं थी, लगा कि भाग्य और भगवान एस दुष्ट का संहार करने के लिए उसके साथ हैं ।

"मगर आज तुमने यह क्यों पूछा बहूकि हम कहाँ जा रहे हैं ?"

" य---यूंही । " उन्हें सेफ की तरफ बढते हुए देख सुचि बौखला गई जबकि सेफ में लगी चाबी घुमाते हुए बिशम्बर गुप्ता ने कहा----"हमें आश्चर्य इसलिए हुआा, क्योंकि पहले तुमने हमसे कभी यह नहीं पूछा । "

"द दरअसल मैं तो यह कहना चाहती थी कि खाना खाकर चले जाते !"

"खाना खा लिया है ।" इस छोटे से वाक्य के साथ उन्होंने गुच्छा अचकन की जेब में डाल लिया और सुचि के सारे इरादों पर बिजली गिर पडी ।

उसे लगा कि बिशेम्बर गुप्ता ने उसके सारे सपनों, सारे अरमानों को जेब में डाल लिया है--उस वक्त वह बुरी तरह कसमसा रही थी, जब बिशम्बर गुप्ता ने हैंडल को हिलाकर यह पुष्टि की कि सेफ बंद होगईं है या नहीं ?

छडी संभाले वह दरवाजे की तरफ बढे !

सुचि बुत बनी वहीं खडी रह गई ।

दुनिया जाह्रान का होश न रहा था उसे, दरवाजे पर पहुचकर विशम्बर गुप्ता ठिठके, घूमकर वोले---"क्या हुआ ?"

"क कुछ नहीं ।" सुचि इस तरह उछल, पड़ी जैसे आसपास बम फटा हो ।

" क्या सोचने लगी थी तुम ?"

"क...कुछ भी तो नहीं बाबूजी-अा्पको वहम हुआ है ।"

"'अरे तुम्हारा चेहरा तो एकदम पीला पडा़ हुआ है बहू-----देखो कितने पसीने अा ऱहे हैं तुम्हें----- अरे ललिता, ओ ललिता । उन्होंने ऊंची आवाज में पुकारा ।

" क्या हुअा जी, क्यों चीख रहे हो ?"

" जरा अपनी बहू की सूरत तो देखो सर्दी में इतने पसीने-----इसकी तबीयत तो ठीक है न ? "

"म...मैं बिल्कुल ठीक हूं बाबूजी । " सुचि की जुबान लड़खडा रहीं थी ।

"खाक ठीक है ।" ललिता देबी ने कहा------"कल सुबह भी मैंने इसके चेहरे पर इसी तरह पसीने देखे थे----सर्दी में पसीने अाना कोई अच्छी बात है, हमारी तो यह सुनती नहीं-आने दे हेमन्त को…शाम को तुझे लेकर डाक्टर के यहाँ वही जाएगा !"

"आप भी बेवजह फिक्र करने लगती हैं मांजी ।"

कुछ देर यूंही उस पर प्यार भरी डाट पडती रही…जव छड़ी संभाले विशम्बर गुप्ता ने मुख्यद्वार पार किया तब-सुचि का दिल चाह रहा था कि वह झपटकर उनकी जेब से चाबियों का गुच्छा निकाल ले ।

" मै शर्माजी के यहाँ गीतों में जा रही हूं बहू । ड्राइंगरूम में कदंम रखती हुई ललितादेबी ने कहा---" लक्ष्मी वर्तन साफ करने अाएंगी, उसका ख्याल रखना----आजकल किसी का भरोसा नहीं है !"

"जी । ' ' सुचि इतना ही कह सकी ।

ललितादेवी चली गई ।

अव सारे घर में अकेली सुचि रह गई ।

कितना अच्छा मौका था?

घर में कोई नहीं, अगर बाबूजी सेफ की चाबी छोड़ जाते तो इस वक्त रिवॉल्वर कितनी अासानी से हासिल किया जा सकता था ।

वह मचल उठी ।

लगभग भागती हुई बिशम्बर गुप्ता के कमरे में पहुंची --- अच्छी तरह यह जानने के बावजूद कि सेफ बंद है, उसने हैंडल को दो-तीन झटके दिए ।

झुंझलाहट में सेफ की चादर पर जोर से घूंसा मारा उसने ।

बुरी तरह वह पागलों की तरह कमरे में टहलने लगी----जी चाह रहा था कि हधौडी मारकर ताले को खोल डाले, परंतु ऐसा करने से सारा खेल वक्त से पहले ही बिगड़ सकता था । "

रिवॉल्वर के बेहद नजदीक होते हुए भी वह कितनी दूर थी !

एकाएक जाने उसके जेहन में क्या ख्याल जाया कि दौढ़कर कमरे से बाहर निकलीं-आंगन में तेजी से सीढियां चढ़ी और लगभग भागती हुई अपन कमरे े में पहुंची । एक झटके से उसने सेफ खोली ।

 


लॉकर के ऊपर पडे़ कपडों को पागलों की तरह निकाल-निकालकर सेफ से बाहर फेंकने लगी और कपड़ों के नीचे शीघ्र ही पचासिर्यों जंग खाई चाबियां पड़ी नजर अाई ।

उसने चाबियां मुट्ठी में भर ली ।

इसके बावजूद काफी चाबियां लॉकर पर पड़ी रह गई…उसने तेजी से इधर-उधर नजर घूमाई , शायद वह स्वयं

भी ठीक से यह नहीँ जानती थी कि उसे चीज की तलाश है----हां, जो कपडे उसने सेफ से निकालकर फर्श पर डाले थे, उनके बीच पड़े एक टॉवल पर दृष्टि स्थिर हो गई ।

सुचि ने झपटकर टॉवल उठाया ।

तेजी से लॉकर के ऊपर पड़ी चाबियां मुट्ठी में भर-भरकर टॉवल में रखने लगी और मुश्कि्ल से दो मिनट बाद हाथों में टॉवल की एक पोटली दबाए नीचे-की तरफ भागी । बिशम्बर गुप्ता की सेफ के,नजदीक पहुंचने तक उसकी सांस बुरी तरह से फूली हुई थी-फर्श पर रखकर उसने पोटली खोल ली । एक लम्बी चाबी उठाकर सेफ के "की-होल' में डाली ।

चाबी 'की-होंल' में घूम नहीं रही थी, जबकि सुचि उसे जबरदस्ती घूमाने के लिए जूझने लगी और उसकी इस धींगा-मुश्ती का नतीजा यह निकला की चाबी 'की-होल' में फंस गई---जब उसके जेहन में यह विचार अाया कि इस चाबी से लॉक नहीं खुल रहा है, उसे कोई जन्य चाबी डालनी चाहिए तो उसने चाबी को निकालने का प्रयास क्रिया ।

पहली बार उसके छचके छूट गए । ।

उसकी अपनी मूर्खता से चाबी इस कदर कंस चुकी थी कि टस से मस न हो-रहीँ थी-उत्तेजना के कारण उसका संपूर्ण जिस्म तो पहले ही पसीने से चिपचिपा हो रहा या, अब घबराहट के कारण सारे शरीर पंर चीटियां-सी रेंगने लगी ।

-अचानक उसे यह ख्याल सताने लगा कि अगर यह चाबी न निकली तो क्या होगा--परिवार के सभी सदस्यों को क्या जवाब देगी वह?

इस वक्त उसकी इच्छा दहाडें मार-मारकर रो पड़ने की हुई, परंतु रोने से उसकी किसी समस्या का हल निकलने बाला नहीं था--इस समय दिमाग में केवल एक ही बिचार था-वह चाबी निकलनी चाहिए ।

सेफ खुले न खुले ।

सारी कोशिशों के बाद भी जब चांबी टस से मस न हुई तो बौखलाई हिरनी के समान उसने चारों तरफ देखा, मदद के लिए कहीं कोई न था ।

सारे मकान में सांय-सांय करता सन्नाटा ।

अचानक उसके जेहन मे कोई ख्याल अाया और उसी के वशीभूत भागती हुई कमरे से बाहर चली गई, मुश्कि्ल से एक मिनट बाद जब हांफती हुई लोटी तब उसके हाथ में एक प्लास था । अब वह 'प्लास’ की मदद से चाबी को निकालने का प्रयास करने लगी ।।

थोडी कोशिश के बाद एक झटके से चाबी बाहर निकल आई ।।

चाबी एक तरफ डाली और वहीँ, फर्श पर बैठकर अपनी उखडी हुई सांसों को ही नहीं, भागते हुए दिमाग को भी नियंत्रित काने की चेष्टा करने लगी ।

दिमाग के किसी कोने ने कहा-----अगर तूं इसी तरह बेबकूफियां करती रही सूचि तो अपने इरादों में कभी कामयाब न-हो सकेगी, उल्टे मुसीबत में फंस जायेगी कि निकलना मुश्किल हो जाएगा ।

"तो फिर मैं करू ?"

सबसे अपने दिमाग को नियंत्रित कर, जल्दबाजी को छोड़ और घबराहट से मुक्त हो…जो करना है सोच समझकर विवेक से कर-----होश में रह, दिमाग का इस्तेमाल करके पहले कोई स्कीम बनर-तब सारा काम उसके मुताबिक करेगी तो ना केवल सफल होगी, बल्कि गलतियां भी ना होगीं ।

" आखिर मैं क्या कर सकती हूं ?

जंग लगी चाबियों के इस ढेर से कुछ नहीं होगा----सोच इस सेफ की चाबियों का एक दूसरा व गुच्छा भी है-वह मांर्जी पर रहता है, अगर वह मिल जाए तेरा काम बडी असानी से हो सकता है । दिमाग में यह विचार अाते ही एक झटके से उठ खड़ी हुई और एक बार पुन: बंदूक छुटी गोली की भांति बाहर निकल गई ।

वह सीधी स्टोर रूम मेँ पहुची ।

वहां बड़े-छोटे कईं संदूक रखे थे, सुचि भली-भांति जानती थी कि ललितादेवी का पर्सनल संदूक कौन-सा है----उसमें कोई लॉक न था !

नजदीकी पहुंचकर सुचि ने तेजी से संदूक खोला ।

संदूक की तलाशी लगी वह-दिमाग में तेजी जरूर थी, किंतु इस बात का अब पूरा ख्याल रख रही थी कि संदूक में रखे कपडो की तह न बिगड़े ।

शीघ्र ही उसे सदूक के दाएं कोने में चावियों का एक गुच्छा मिल गया और उसके मिलते ही सुचि का दिल बल्लियों उछलने लगा-ऐसी खुशी हुई उसे जैसे किसी गरीब की लॉटरी का पुरस्कार पाने पर हो सकती है ।

संदूक को खुला छोड़कर वह गुच्छा संभाले पुन: बिशम्बर गुप्ता के कमरे में पहुंची-----सेफ की चाबी 'की-कोल' में डालकर घुमाते ही लॉक खुल गया ।

धाड़-धाड़ करता दिल पसलियों पर चोट करने लगा ।

"अपने ही धर में चोरी करते वक्त उसकी हालत खराब थी, वह जानती थी कि बाबूजी रिवॉल्वर को लॉंकर 'के अंदर रखते हैं, अत्त: उसने इसी गुच्छे की दूसरी चाबी से लॉकर खोला और अभी लॉकर खुला ही था कि-----

कमरे के बाहर गैलरी में पदचाप गुंजी ।

रोंगटे खड़े हो गए सुचि के, नसों में दौड़ता रक्त जैसे पानी बन गया, चेहरे के जर्रे--ज़रें पर आतंक लिए एक झटके से उसने दरवाजे की तरफ देखा-----इस क्षण उसे पहली बार ख्याल अाया कि मुख्य द्वार खुला पड़ा है ।

कौन हो सकता है ?

हेमन्त, अमित, रेखा, मांजी या बाबूजी ?

बेहद डरे हुए अंदाज में वह चीख पड़ी…"क...कौंन है ?"

"मैं हूं बहूरानी, कहां हो तुम ?" लक्ष्मी दरवाजे के सामने अा खडी हुई और सुचि के दिलो-दिमाग को, एक जबरदस्त झटका लगा-उफ-वह तो भूल ही गई थी कि यह बरतन साफ करने आने बाली थी ।

सुचि बुत बनी रह गई !

चंचल लक्ष्मी ने पूछा'--"क्या कर रही हो वहूरानी ?"

अपनी घबराहट छुपाने के लिए वह झुंझलाहट भरे स्वर में गुर्राई---"'देख रहीं हूं धुलने के लिए बाबूजी के कपड़े तो नहीं पडे हैं ?"

"क्या बाबूजी कपडे़ भी सेफ में रख़ते हैं ?"

"तुझे इन बातों से क्या मतलब, किजन में जाकर अपना काम कर३----चुहें से बचाने के लिए धुलने वाले कपड़े भी बाबूजी सेफ में रख देते हैं । "

"कमाल है ? " लक्ष्मी ने हाथ नचाकर कहा------"मैँ भी पिछले एक साल से बरतन साफ करने आरही हूं ---मैनै यहां कभी कोई चुहा नहीं देखा ।"

"तू अपनी ये बेकार की चबढ़-चवड़ करना बंद नहीं करेगी ?"

" हाय दैया । चाबियों के ढेर पर नजर पड़त्ते ही लक्ष्मी ने अपने मुंह पर हाथ रखकर कहा---"'इतनी सारी चाबियां, क्या यह सेफ इतनी सारी चाबियों से खुलती है बहुरानी ?"

"'श...शटअप । " बीखालाहट की ज्यादती के कारण सुचि दहाड़ उठी----"तू किच्चन मे जाकर चुपचाप अपना काम करती है कि नही ?"

"हद है बहूरानी तबीयत ठीक है ?"

"क..क्यों--क्या हुआ मेरी तबीयत को ? "

"आज तो बात--बात पर मुझे खाने को आ रही हो, जबकि पहले हमेशा मुझसे प्यार से बात क्रिया करती थीं ।"

सुचि अवाक् रहगईं !

लक्षमी के साथ उसका व्यवहार सचमुच अन्य दिनों के बिल्कुल विपरीत था और वजह शायद उसकी अपनी असामान्य स्थिति ही थी, बात को संभालने के प्रयास में -वह बीली-----"' तू भी तो बेवजह के सवालात किए जा रही है ?"

" मैँने यही तो पूछा है कि क्या यह सैफ इतनी सारी चावियों से खुलती हैं, क्या यह बेवजह का सवाल हेै ?"

"क्या तुझे दिख नहीं रहा है कि यह सब जंगखाई हुई बेकार चावियां हैं ?"

"तो फिर इन्हे धर मे रख ही क्यों रखा हैं?"

"उनकी लॉक मैन्युफैक्चरिंग की फैक्टरी है, अाम आदमी के लिए चाबियां भले ही बेकार हों, मगर उनके काम की हैं ।"

"तो इसमें इतना गुस्सा होने की क्या बात है ? "

सुचि के दिमाग को झटका लगा…सचमुच इतना उफनने की कोई वजह 'न थी, दरअसल अपने ही मन के चोर-और उत्तेजना के कारण वह लक्षमी के साथ सामान्य व्यवहार न कर सकी थी, अब संभलकर उसने कहा----"अच्छा दिमाग न चाट, किच्चन में जाकर काम कर ।" इस वाक्य के साथ ही उसने स्वयं को सेफ में टंगे कपडों में उलझी दर्शाया।।।

अजीव ढंग से मुहं पिचकाकर लक्षमी वहाँ से चली गई ।

 


सुचि ने जाने कव से रुकी-सांस एक झटके से छोडी ।

अपने जिस्म में दौडती सिहरन उसे अब भी महसूस हो रही थी--- लक्षमी की उपस्थिति और उसके सवालों ने सुचि के प्राण खुश्क करके रख दिए थे ।।

लक्षमी के आतंक से मुक्त होकर उसने हाथ लॉकर के अंदर डाल दिया-----सख्त और ठंडे रिवाल्वर पर हाथ… पड़ते ही वह रोमांचित हो उठी ।

रिवाल्वर बाहर निकाला ।

"यूं बिशम्बर गुप्ता को रिवॉल्वर साफ करते उसने कई बार देखा था तब उसे रिवॉल्वर कोई खास चीज न लगी थी, मगर इस वक्त उसे अपने हाय में देखकर सुचि कांप उठी, दिमाग में विचार उठा कि क्या मैं सचमुच इससे दुष्ट मकड़ा का खात्मा कर सकुंगी-----रोंगटे खडे हो गए उसके ।

सुचि को पहली बार महसूस हुआ कि वह एक खतरनाक करने जा रही है ।।

इस पल अपना इरादा रद्द करने का विचार भी उसके जेहन में उठा किंतु ज्यादा देर तक स्थायी न रह सका, क्योंकि मकडा के जिस जाल में वह फंसी हुई थी उससे निकलने का अन्य कोई रास्ता उसके दिमाग में न आ रहा था ।

कांपते हाथों से चार गोलियां और साइलेंसर भी निकाल लिया ।

शाम के साढ़े पाच बजे !

डाइनिंग टेबल पर बैठा सारा परिवार डिनर ले रहा थाकि हेमन्त ने कहा-------" आज सारी रात मुझे फैक्टरी में रहना पड़ेगा !"

"क्यों?" बिशम्बर गुप्ता ने पूछा !

"अाज सारी रात काम चलेगा, कल सुबह दस बजे तक एक पार्टी का माल अर्जेंट देना है ।"

"यह तुम्हारा दिन-रात काम करना हमें पसंद नहीं है हेमन्त ।"

" क्या करें बीबूजी , नए काम को जमाने के लिए पार्टी की उचित-अनुचित शर्तें भी माननी पडती हैं---- फिर रात को कोई रोज तो काम चलता नहीं है-साल छः महीने में कोई एक बार ऐसा, मौका अा जाता है कि............. "

अचानक बजने बाली कॉलबेल की आवाज ने उसका वाक्य पूरा न होने दिया----सुचि का दिल किसी रबर की गेंद के समान उछलने लगा , जबकि ललितादेवी ने कहा ---" इस वत्त कौन हो सकता है ?"

कालवेल पुनः बजी ।

" मैं देखता हूं ।" कहने के साथ ही अमित उठा और कमरे से बाहर निकल गया । इस बीच ललितादेबी बोली---" यह तो सुन लिया हेमन्त किंतू रात भर फैक्टरी में रहेगा मगर उससे पहले सुचि को जरा डाक्टर के यहां दिखाकर ला । "

"क्यों क्या हुआ सुचि को ?" हेमन्त ने चौंककर पूछा ।

सुचि और लतितादेबी ने एक साथ कुछ कहने के लिए मुंह खोला, परंतु दोनों ही को रुक जाना पड़ा--एक टेलीग्राम को खोलता हुआ अमित कमरे में दाखिल हुआ था ।

बिशम्बर गुप्ता ने पूछा---"क्या है अमित ?"

""टेलीग्राम । "

"कहां से ?"

' "देखता हूं। " कहते हुए अमित ने टेलीग्राम खोल र्लिया-सुचि का दिल उसकी पसलियों पर जोर -जोर से चोट कर रहा था सभी की सवालियां नजरें अमित पर गडी थी, जबकि टेलीग्राफ पर नजरें गडाए अमित ने कहा----" "भाभी के लिए खुशखबरी है । "

" क्या ?"सुचि के साथ साथ सभी के मुह से निकले पड़ा ।

अमित ने चेचल मुस्कान के साथ सुचि की तरफ देखकर कहा---"हापुड़ में अंजू नामक आपकी कोई सहेली है ।

"हां है----- क्या हुआ उसे ?"

"आज रात वह पराई होने जा रही है ।" अमित ने शरारती अंदाज में कहा!

"क्या मतलब ?"

"आज उसकी शादी है, लिखा है कि अगर अाप नहीं पहुंची तो शादीं नहीं कराएगी और यह भी लिखा है कि शादी बडी जल्दी में एरेंज हुई हेै। "

"अ.. .अजू की शादी ?" सुचि उछल पडी…"आज ही ?"

"जी हां ।" कहकर टेलीग्राम अमित ने मेज पर डाल दिया ।

" ओह !" खुशी से लगभग नाचती-सी सुचि बौली----"अंजूकी शादी है और वह भी आज ही----मैं वहां जाना चाहती हूं मांजी ।"

" आज ही भला तुम कैसे जा सकती हो बहू?"

सुचि ने एकदम मुर्झाने का अभिनय क्रिया---- "क्यों नहीं जा सकती ?"

"अब कहीं जाने का समय बचा है ?"

"पांच पैतीस ही तो हुए हैं मांजी, अगर छ : बजे भी निकल जाऊं तो आठ-साढ़े आठ तक वहाँ पहुंच जाऊंगी ।"

"क्यों पागल हुई जा रहीं हो बहू, तुम्हारी तबीयत भी ठीक नहीं है । "

"'क...कुछ भी तो नहीं हुआ है मुझें--अंजू मेरी सबसे पक्की सहेली है मांजी, अगर 'न पहुंची त्तो वह सचमुच फेरों पर नाटक कर सकती है--प्लीज, मुझे जाने की इजाजत दे दीजिए।"

ललितादेवी ने समझाने की भंरसक चेष्टा की, परंतु सुचि को न मानना था, न मानी । अत: अंत में हथियार डालती हुई ललितादेबी ने कहा…"अच्छा ठीक है, तुम बहू के साथ चले जाओ अमित !"

बडी ही जबरदस्त गर्जना के साथ बिजली ठीक सुचि के सिर पर गिरी ।

सारे इरादों पर एक ही झटके में पानी फिर गया----- जी चाहा कि चीख पड़े, कहे के अमित के साथ जाने की भला क्या जरूरत है, वह अकेली चली जाएगी, परंतु ऐसा कह न सकी----बडी मुश्किल से तो यह लोग भेजने के लिए तैयार हुए थे !

अमित के सास चलने का भी विरोध क्रिया तो व्यर्थ ही ,सब लोग संदेह करेंगे और फिर अमित को साथ ले जाने से इनकार करने की कोई तर्क संगत वजह भी तो उसके पास नहीं थी,सुचि कसमसा कर रह गई ।

बडे ही दयनीय भाव से उसने इस उम्मीद से अमित की तरफ देखा कि शायद यह स्वयं ही असमर्थता जाहिर करे, परंतु अमित था कि कह रहा आ-----"चलो, इसी बहाने कम से कम भाभी की उस सहेली के दीदार तो हो जाएंगे, जिसकी शादी में शामिल होने के लिए खबर मिलते ही यह इतनी बेचैन हो उठी है !"

सुचि की आखिरी उम्मीद भी धराशाही हो गई ।

सवारियों से खचाखच भरी प्राइवेट बस जिस रफ्तार से अपने गंतव्य स्थान के नजदीक पहुंचती जा रही थी, उसी रफ्तार से सुचि अपने लक्ष्य से दूर होती जारही थी--मुसीबत में फंसे व्यक्तिका दिमाग चाहे छोटा हो, अपने हक में कुछ-कुछ सोच ही लेता है ।

उसे इस बात से कोई मतलब न था कि जो कुछ वह करने जा रही है,,बाद में उसके परिणाम क्या निकलेंगे, . . हां-तत्कात्तीन मुसीबत से निकलना ही उसका ध्येय था…यह भांपते ही कि बस कुछ देर में बराल नामक स्थान पर पहुंचने वाली है सुचि ने जपने दिमाग में जन्मी योजना को अंतिम रूप दिया और अचानक चौंकती हूई बोली----"अरे ? "

" क्या हुआ भाभी ? उसे चौंकते देखकर अमित का यह पूछना स्वाभाविक था ।"

" गड़बड़ हो गई अमित, जल्दी-जल्दी में मै एक ऐसी भूल कर बैठी हूं कि हमारा अंजूकी शादी में जाना ही बेकार हो जाएगा !"

" कैसी भूल, आखिर हुआ क्या है ?"

" ने सोने के हेयर पिन तो मैं घर ही भ्रूल आई जो मुझे उपहार में अंजू को देने थे !"

"ओह !" अमित के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई !

" हेमन्त ने खुद यह कहते हुए वे हेयरपिन मुझे दिए थे कि मैं उपहार स्वरूप उसे अंजूको दूं कितु मैं फ्रीज पर ही रखा भूल आई हूं !"

अमित चुप रहा ।

यह देखकेर सुचि की बैचेनी बढ़ने लगी कि बस 'बराल' पहुंचने बाली है, अत: बोली--"अब वया करे अमित ?"

" किया ही क्या जा सकता है ? " अमित बोता----"तो अंजू को उपहार में केश ही देना पडेगा ।”'

" न --- नही अमित । " सुचि चीख सी पड़ी ----" मैं उसे केश नहीं दे सकती-----एक वार कॉलेज में हम सभी सहेलियों के बीच यह तय हुआ था कि एक दुसरे की शादी के अवसर पर कोई केश नहीं देगा --- हम सब सहेलियों के बीच प्रेजेंट ही चलते हैं ।"

"ल.. लेकिन अब अाखिर प्रेजेंट दिया कैसे जा सकता है ?"

 


कुछ देर के लिए सुचि शायद जानकर चुप रह गई फिर स्वयं ही इस तरह बोली जैसे अचानक कोई ख्याल दिमाग में अा्या हो----"एक तरकीब है अमित ।"

" क्या ?"

" बराल आने बाला है, तुम इस बस से यही उतर जाओ और तुरंत वापस बुलंदशहर जाने वाली वस पकड़ लो----फ्रिज से हेयर पिन लेकर लौटती बस से हापुड़ आ जाओ ।"

"अौर तुम ?"

" मैं इस बस से हांपुढ़ पहुंच रही हूं ।"

"अकेली ?"

"मजबूरी है अमित और फिर मां और बाबूजी की तरह क्या तुम भी बहमी होते जा रहे हो ----मुझे अकेली देखकर भला इस बस में मुझे कोई खा जाएगा । "

"व.. वह सब तो ठीक है भाभी, मगर... ।"

"मगर क्या ?"

"मैं इस तरह तुम्हे अकेली नहीं छोड़ सकता । "

अपने इरादों को धराशाही होते देख सुचि ने लगभग वैसा ही शस्त्र इस्तेमाल क्रिया, जैसा पंचवटी में सीता ने लक्ष्मण पर किया था बोली---" तुम समझ नहीं रहे हो अमित, अंजू को वे ईयर पिन ही देने कितने जरूरी हैं----अगर यहाँ से बुलंदशहर पहुंचने और वहां से पुन: हापुड़ जाने में तुम्हें कोई दिक्कत है तो यह सब कुछ मुझे करना पडेगा, तुम इस बस से हापुड़ पहुंचो । "

" ऐसा केसे हो सकत्ता है भाभी ?"

. "मजबूरी है , हममें से किसी एक को तो हेयर पिन लाने जाना ही पडे़गा ।"

कुछ देर तक अमित जाने क्या सोचता रहा, फिर-----बोला------" अगर ऐसी मजबूरी है तो फिर क्यों न हम दोनों ही लौटकर बुलंदशहर चलें ?"

ऐसा महसूस करके सुचि तिलमिला उठी कि उसकी यह स्कीम भी नाकामयाब जा रही है, बोली-----"क्या वेबकुफाना बात कर रहे हो अमिता इतने त्नम्बे-चौड़े झमेले की जरूरत क्या है, तुम अकेले जाकर आरम से हेयर पिन ला सकते हो ।"

"ल...लेकिन...!"

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं अमित ।" बराल पर गाडी़ को धीमी होते देख सुचि ने अपने स्वर में आदेश का पुट भर दिया---"तुम जानते हो कि मां और बाबूजी ने मुझे इसी वक्त कितनी मुश्किल से भेजा है, अगर मैं अकेली या तुम्हारे साथ वापस पहुंच गई तो वे मुझे किसी हालत में हापुड़़ नहीं अाने देंगें !"

अमित को जबाब न सूजा, अजीब उलझन में फंस गया था वह ।

बस 'बराल बस स्टैंड' पर रुक गई सवारियां उतरने लगी ! कुछ नई चढ़ गई, सुचि ने विनती करने के से अंदाज में कहा…"प,..प्लीज अमित, मेरा यह काम कर दो----क्या तुम अपनी भाभी की इतनी-सी बात भी नहीं मान सकते ?"

मज़बूर अमित को अनिच्छापूर्वक इस बस से उतर जाना पडा ।

बुलंदशहर बस स्टैंड के टॉयलट में जाकर सुचि ने चारों गोलियों रिवॉ्ल्वर के चेम्बर में डाली, नाल पर साइलेंसर फिट किया---रिवॉल्बर के बारे में इतना सब कुछ वह इसिलिए जान गई थी, क्योंकि अपने ससुर को इसकी स्फाई करते कई बार देखा था, चेम्बर में गोलियों डालते और स्इलेंसर फिट करते भी ।

संतुष्ट होकर उसने रिवॉल्वर अपने पेट और साये के नाड़े के बीच फंसा लिया ----अटैची संभाले वह बाहर निकली------रिक्शा पकड़कर सीधी-होटल शॉर्प-वे ।

काऊंटर पर वह अपनी गोजनानुसार ही पहुंची, नाम राधा बताया और

और रूम नम्बर दो सौ पांचं की वेल दबाते ही दरवाजा खुला ।

सामने उसके शिकार के रूप में मकड़ा खडा था ।

उसे देखते ही वह गुर्राया-" इतनी लेट, टाइम सात बजे का फिक्स हुआ था और अब साढे आठ बज रहे हैं । "

सुचि चुपचाप अंदर दाखिल हो गई ।

कमरे में नाइट बल्ब का मद्धिम प्रकाश था, केवल इतना कि कमरे में मोजूद हर वस्तु को साए के रूप में देखा जा सके-अटैची को फर्श पर टिकाकर शायद यह भांपने हेतु सुचि मकड़ा की तरफ पलटी कि इस सीमित प्रकाश में वह ठीक से मकडा को निशाना वना भी पाएगी या नहीं ?

अफीम के नशे में चूर अपनी आंखो से सुचि को घूरते हुए मकडा ने पूछा----इतनी देर केसे हो गई ?"

"एक औरत की बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा किसी भरे-पूरे परिवार की बहू की मजबूरियों को बयान करने के तो बावजूद तुम जैसा जालिम समझ नहीं सकता । "

"दिमाग खराब हो गया है वया ?" मकजा गुर्रा उठा----"होश में बात करो, यह मत भूलो कि जिस क्षण मैं चादूं तुम्हें तबाह और बरबाद कर सकता हूं !"

सुचि ने दात पीसे ।

'मन-ही मन सोचा कि मैं जिस क्षण चादूं तुझे मौत के घाट उतार सकती हुं---मगर ऐसा उसने कहा नहीं, … बोली---"इसीलिए रात के इस वक्त शहर के सबसे ज्यादा संभ्रात व्यक्ति आदमी की मजबूर बहू्-तुमारे सामने अकेली खड़ी है !"

'मैंने टेलीग्राम बिलकुल सही समय पहुचा दिया था, फिर तुम... ।

"टेलीग्राम पहुचाना जितना आसान था उतना मैरे लिए निकलना नहीं । " अपने क्रोध को दबाए सुचि ने फिलहाल यहीं दर्शाया कि वह उसकी उंगलियों पर नाचने बाली कठपुतली है, बोली-----" हापूड़ के लिए उन्होंने मेरे साथ अमित को लगा दिया ।

"ओह्य फिर ?"

''अमित से छुटकारा पाने की घटना बयान करने के-बाद सुचि ने कहा---- "मैं उस बस से "भुलावटीं" में उतरी-----मेरठ से बुलंदशहर जाने वाली बस पकड़कर यहां अाई हूं !

"सचमुच तुम्हें काफी द्विवकत का सामना करना पड़ा ।"

मजबूरी थी अगर मैं न अाती तो ... ।

सुचि ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ जबकि मकड़ा एक सिगार सुलगाने के बाद चहलकदमी करता हुआ सोफे की तरफ बढ़ा, बोला---" क्या तुमने-यह भी सोचा है कि सुबह लोटने पर उन हालातों से केसे मुक्त होगी, जिनमें तुमने खुद को फ्रंसा लिया हैे ।"

"सब सोच चुकी हूं मैं !"

""ज़रा सुनें तो सही ?" वह सोफे पर वैठ गया ।

".'अमित को फ्रिज पर कोई हेयर पिन नहीं मिलेगी, क्योंकि वह मेरी अटैची में है, रेखा उसे बताएगी कि पिन उसने अटैची में रख दिया था-जब तक शायद वह वापस हापुड़ के लिए रवाना हो चुका होगा------" सीधा हमारे घर पहुंचेगा, मगर मैं उसे बहाँ नहीं मिलूंगी-वह खुद और उसकी बातें सुनकर शायद मेरे मंम्मी-पापा और भी चिंतित हो उठें, पर कर कुच्छ नहीं सकेगे, क्योंकि वह सब यह तो जानते हैं कि अंजू नामक मेरी एक सहेली है, परंतु उसका घर नहीं जानते--- सुवह तक किसी भी समय मैं हापुढ़ अपने घर पहुंच जाऊंगी कहूंगी कि चूंकि मुझे रास्ते ही में यह मालूम हो गया था कि हेयर पिन अटैची में है , इसलिए हापुढ़ बस स्टैंड पर उतरते ही सीधी अंजू के यहीं चली गई, वहां से शादी अटेंड करके सीधी आ रही हूं !"

" काफी तेज लगा है तुम्हारा दिमाग ।" मकड़ा ने सोफे पर लगभग पसरते हुए कहा--"मगर क्या तुम्हें यकीन है कि वे लोग तुम्हारी बातों पर यकीन की लेंगे-क्या अमित यह पता लगाना नहीं चाहेगा कि वास्तव में तुम्हारी सहेली की शादी थी भी या नहीं ?"

सुचि ने मन-हीं-मन सोचा कि इस मुसीबत का सामना तो करना ही पडेगा निर्दयी--मगर उस मुसीबत से मैं…नहीं निपट सकती थी, जो मेरे यहाँ न पहुंचने पर तुम्हारे द्वारा खड़ी की जाती और यहां जाना इसलिए भी जरूरी था कि अगर तू जिंदा रहा तो मुझे हर दिन, हर पल इस किस्म की न जाने कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा ?

" जवाब नहीं दिया तुमने, क्या सोच रहीं हो ?"

सुचि हल्के से चौकी, बोली-----"कोई भी शख्स किसी पर अविश्वास तब करता' है जब उसे सामने वाले के चरित्र पर शक हो और मेरें चरित्र पर न अमित को शक है, न मम्मीन्मापा क्रो…मैं उन्हें आसानी से संतुष्ट कर लूंगी और अमित तो मुझसे , इतना प्यार करता है कि उसे मैं इस बात के लिए भी तैयार कर लूंगी कि बुलंदशहर शहर में वह किसी से यह, न कहे कि खुद वह अंजूकी शादी में शरीक हुआ था । "

" काफी कांफिड़ेंस है तुम्हें खुद पर । मकड़ा ने व्यंग्य-भरी मुस्कान के साथ पूछा----"खेर, यह बताओ कि बॉल्कनी का दरबाजा अंदर से खुला छोड़ कर आ़ई हो कि नहीं ?"

"हाँ ।" सुचि ने गहरी सांस ती----"अब शायद हमे काम की बातें करनी चाहिए ।"

सिगार में एक तगडा कश -लगाने के बाद मकडा ने कहा…"आज की सारी रात अपनी है, काम की बातों की ऐसी क्या जल्दी है-अराम से बैठो ।

"पचास हजार हासिल करने के लिए तुम मुझे कौन…सा रास्ता बताने बाले थे ? " उसकी बात पर ध्यान न देती हुई सुचि ने पूछा और जवाब मकड़ा ने बड़े ही कुटिल अंदाज में दिया-"हेरत की बात है कि तुम एक सुंदर स्त्री होते हुए अभी तक नहीं समझी कि तुममें पचास हजार नहीं लाखों कमाने की क्षमता है ?"

"क्या मतलब ?" सुचि का सारा जिस्म सुलग उठा ।

"एक स्त्री खासर्तोंर से तुम जैसी सुंदर स्त्री अगर रुढीवादी और सड़ी-गली भारतीय परम्पराओं का भूत अपने सिर से उतार दे तो द़रिया-दिल मर्द तुम्हारे वजन के बराबर सौ-सौ-के नोट तोल दें !"

गुस्से की ज्यादती से सुचि का रोम-रोम कांपने लगा । जी चाहा इसी वक्त रिवॉल्वर निकाले और इस कमीने आदमी पर तब तक गोलियां बरसाती रहे, जब तक कि इसके जिस्म में गंदे खून की एक बूंद भी रहे-परंतु सुचि ने ऐसा किया नहीं---उसने नियंत्रित क्रिया खुद को हैं पहले यह पता लगाना जरूरी था कि नेगेटिव इस कमरे में है भी या नहीं । "

अतः कल तक बाली सुचि का अभिनय करती बोली----" नही मकड़ा, मुझ पर इतना जुल्म मत करो-----ऐसा मैं नहीं कर सकतीं, मैं केबल अपने पति की अमानत हूं ।"

"हा-----हा------हा ।" मकड़ा हल्के से ठहाका लगा उठा ।

डरने का खूबसूरत अभिनय क्रिया------ सुचि ने----"त.. .तुम हंस क्यों रहे हो ?"

"हंसी तो खुद -ब खुद अा रही है सुचि डार्लिंग सती… सावित्री होने का ये नाटक अगर तुम क्रिसी और के सामने करती तो शायद वह प्रभावित हो सकता था, मगर मेरा नाम मकडा, है, मेरे पास तुम्हारे करेक्टर को नंगा का देने वाले फोटो ।"

"व.. वहं शादी से पहले की बात है मकड़ा और फिर संदीप को जपना सब कुछ मैंने किसी बाजारू औरत की तरह नहीं सौंपा था…हमने मंदिर में शादी की थी, मैं उसे अपना पति मानती थी----संदीप की मौत के साथ वह अध्याय ही खत्म हो गया--हेमन्त से शादी कर लेने के अलावा मेरे पास रास्ता ही कोई न था, मगर शादी के बाद से मैं अपने तन-मन और आत्मा से पूरी तरह हेमन्त की हूं !"

' ‘और उसी की बनी रहने लिए तुम्हें उन मर्दो' के साथ सोना होगा, जिनके साथ मैं कहूं उस वक्त तक जब तक कि मैं पचास हजार न कमा लूं ।"

"ऐसा जुल्म मत करो मकड़ा-रहम करो-मैँ यह सब नहीं सह सकूंगी ।"

 


"तुम्हें सोना-होगा । " एकाएंक मकडा की गुर्राहट सामान्य से कई गुना ज्यादा कर्कश हो गई----अगर मेरी बात न मानी तो मैं ऐसे हालात बना दूंगा कि तुमेहारे सामने आत्महत्या कर लेने के अलावा कोई दूसरा चारा न होगा और आत्महत्या करने का साहस तुममें है ?"

"मैं तुम्हारे हाथ जोढ़ती हूं मकडा-पैर पकड़ती है तुम्हारे ?"

मकडा ने अपने उसी खास अंदाज में कहा---" तुम जानती होकि इसकिस्म की बातों से मेरे कानों पर जूं तक नही रेगती ।"

मन ही मन वह सोचती हुई कि तेरे कानों पर कुछ दैर बाद रिवॉल्वर की गोली रेगेंगी कुत्ते, सुचि ने हथियार डालते का खूबसूरत अभिनय किया----" क्या जरूरी हैं कि इतना सब कुछ करने पर भी तुम नेगेटिव मुझे दे ही दोगे । मकडा के भद्दे होंठों पर सफलता की मुस्कान नृत्य कर उठी, बोला---"तुम तो जानती हो कि मकड़ा अपने वादे का पक्का है ।"

" यह आश्वासन मेरे लिए काफी नहीं ।"

" फिर क्या चाहती हो ?"

"तुम्हें तय करना होगा कि नेगेटिव कब और किस तरह लौटाओगे ?"

"क्रिसी भी मर्द से मैं तुम्हारी एक रात कीं कीमत ज्यादा से…ज्यादा दो हजार वसूल कर लुंगा, इस तरह तुम्हें अपनी पूरी पच्चीस रातें देनी होगी-मेरे पास पाच फोटो हैं, यानी हर पांचवीं रात के बाद मै एक नेगेटिव तुम्हें देता रहूंगा ।"

" मुझे मंजूर है ।"

" वैरी गुड ! यह हुई न हिम्मत के साथ हालातों का मुकाबला करने बाली बात !"

"मगर मैं पच्चीस राते लगातार, अपने सुसराल से बाहर नहीं रह सकती-अपनी सुविधानुसार तुम्हारे साथ हुए समझौते का पालन करूंगीं ।"

" मैं समझेता हूं कि मुक्त होनेके लिए तुम खुद ही जल्दी से जल्दी पच्चीस रातें मुझें देने की कोशिश करोगी ।"

सुचि चुप रह गई ।

व्रह कोई ऐसा जिक्र छेडने के बारे में सोच रही थी, जिससे पता लग सके कि इस कमरे में नेगेटिव हैं या नहीं, अभी वह कुछ सोच भी न पाई थी कि मकड़ा ने कहा…"जब तुमने हालातों से फैसला कर ही लिया है सुचि डार्लिंग तो अभी तक इस तरह सकुचाई सी क्यों खडी हो, आओ…मेरी यह रात रंगीन करो । "

"क्या मतलब ?"

",फिक्र मत करो मेरे साथ गुजारी गई तुम्हारी यह रात भी हिसाब में जोड़ दी जाएगी सुबह तक मेरे तुम पर

अड़तालिस हजार बाकी रह जाएंगें ।"

"ओह, यह मतलब था तुम्हारा मगर..!"

"मगर ?"

"'यह तो मेरे साथ ज्यादती है मेरी पहली रात भी दो, हजार की ही हो !"

"यानी ?"

"यह पहली रात मैं तुम्हारे साथ इस शर्त पर गुजार सकती हूं कि तुम इस रात को दस हजार की मानो और एक नेगेटिव आज ही मेरे हवाले करो ।"

ठहाका लगाकर हंस पडा मकड़ा, सुचि उसके सोने के दांत को देखती हुई सोच रहीं थी कि इस कमीने से वह उस हर गाली का बदला लेगी; जितनी आज तक उसने दीं है,, जबकि दिल खोलकर हंसने के बाद मकड़ा ने कहा…"अचानक पूरी बिजनेस वूमैन बन गई हो तुम-मगर…ठीक है, तुम भी कहोगी कि किसी रईसे से पाला पडा था-----मंजूर ,सुबह जब तुम यहाँ से जाओगी एक नेगेटिव मैं तुम्हें सौंप दूंगा ।"

"केवल तुम्हारे कह देने भर से मैं यकीन नहीं कर सकती ।"

"फिर ? "

" वह नेगेटिव दिखाओ जो मेरौ इस रात की कीमत होगी ?"

"जरूर । " कहने के साथ ही मकड़ा ने ओवरकोट की दाई जेब में हाथ डाला और इस क्षण सुचि का दिल धाड़-धाड़ करके बजने लगा--आखिर वह क्षण अा ही गया था, जब उसे इस जालिम से मुक्ति पा लेनी थी-उधर मकड़ा का हाथ जेब से बाहर निकला, इधर सुचि का हाथ अपने पेट पर दबे रिवॉल्वर की मुठ पर जम गया ।

वह हाथ नहीं, बल्कि सुचि का समूचा जिस्म कांप रहा था । रोंगटे खुद-ब-खुद खडे हो गए थे और अगले एक या दो मिनट बाद इस कमरे में जो कुछ होने जा रहा था, उसकी कल्पना मात्र से सुचि इतनी ज्यादा उत्तेजित और रोमांचित हो उठी थी की सारा शरीर पसीने से चिपचिपा उठा ।

कनपटियां बुरी तरह भभकने लगी ।

एक दूसरे से जुडे हुए पांच नेगेटिव की छोटी-सी फिल्म को खोलकर मकड़ा ने नाइट बल्ब की सीध में क्रिया और बोला------"आज की रात की कीमत के रूप में तुम इनमें से किसी भी एक नेगेटिव को चुन सकती हो ।"

सुचि के मुंह से केई आबाज न निकली ।।

फिल्म के पार नाईट बल्ब था इसलिए सुचि को नेगेटिव साफ चमके--वह उसके और संदीप के फोटुओं के ही नेगेटिव थे ।

"मकड़ा का पूरा ध्यान फिल्म पर ही केद्रित था । उसे तो शायद स्वप्न में'भी सुचि के उन इरादों की भनक न थी, जो वह करने अाई थी । उधर गुस्से की ज्यादती से पागल हुई जा रही सुचि को लगा कि यहीं बस यही मौका है जब वह हमेशा के लिए इस जल्लाद से मुक्त हो सकती है । अत: उसने एक झटके से रिवॉल्वर उसकी तरफ तान दिया, परंतु मकड़ा की नजर अभी तक उस पर नहीं पड़ी थी, नेगेटिव पर नजरें गडाए वह कह रहा था…"मेरे लिए यह फोटो खींच लेने कितने कारगर साबित हुए हैं ?"

"बस ! " सुचि के मुंह से निकलने वाली आबाज खुद-ब-खुद गुर्राहट वन गई----"तेरां खेल खत्म हो चुका है!"

मकड़ा ने चौंककर नजर फिल्म से हटाई और सुचि के हाथ में दब्रे रिवॉल्वर को देखते ही वह उछल पड़ा!

देवता कूच कर गए उसके ।

"य...यह क्या ?" वह हकला गया ।

" बुरी तरह रोमांचित सुचि गुर्राई------"यह रिवॉल्वर है कुत्ते, दोनों हाथ ऊपर उठा ले, वरना भूनकर रख दूंगी, ट्रैगर दबाना मुझे खूब आता है!"

मकडा ने बौखलाकर हाथ ऊपर उठा दिए, अफीम के नशे से ग्रस्त उसकी सुर्ख आंखों में पहली बार मौत की थरथराहट नजर आ रही थी ।

होश फाख्ता हो गए थे उसके !

सारी चालाकी, दरिंदगी और काफूर बोला---" 'य. . तो क्या बेवकूफी है सुचि ?"

"यह बेवकूफी नहीं, वह अंजाम है जो भोली-भाली लड़कियों को अपनी कठपुतली बनाकर नचाने बाले तुझ जैसे हर जालिम का होना चाहिए -------------मेरे साथ रात गुजारनी चाहता था, मुझें वेश्या बनाने के ख्वाब देख रहा था कमीने---तू शायद

यह भूल गया कि भारतीय संस्कारों का सिर फ्रख से ऊंचा करने बाली नारी केवल पति पर समर्पित होती है, मांग में सिंदूर रहते वह वेश्या नहीं वन सकती-----भले ही कातिल बनना पड़े ।"

"त. . तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है सुचि ।

"हां---हां----दिमाग खराब हो गया है मेरा,,पागल हो गई हूं मैं !" सुचि पागलों की भांति चीख पडी ! उसके

होंठों से झाग निकलने लगे थे-----'"तेरी मौतं ही मेरी मुक्ति है ! ला-नेगेटिव इधर फेंक दे । "

. मकडा़ की सिटी-पिटी गुम थी !

हवामे चकराता हुआ दिमाग साय------साय कर रहा था । यह

सच्चाई है कि यह बडी मुशिकल से कह सका-"म...मुझे मारकर तुम्हें क्या मिलेगा ?"

"सुकून !"

'"यह फिल्म और ऐसा हर सबूत मैं तुम्हे सौंपने के लिए तेयार हूं सुचि, जो तुम्हारे और संदीप के संबंधों को प्रूव कर सके----मगर मुझे वख्श दो, मैं मरना नहीं चाहता ।"

"ताकि किसी दूसरी सुधि को फंसाकर उसे अपनी कठपुतली बना सके-उसकी किसी भूल का फायदा उठाकर वेश्या बना सके उसे ?"

"ह...हरगिज़ नहीं, मैं कसम खाकर कहता हूं सुचि कि ऐसा गंदा काम फिर कभी नहीं करूंगा बस--तुम वख्श दो मुझे !"

"मैं तेरी बातों में अाने बाली नहीं हुं-------मासूम लडकियों की दलाली खाने बाले सूअर-----सारे सबूत तु मुझे क्या सौंपेगा, मैँ खुद हासिल करलूगी !"

मकड़ा की जुबान तालू से जा चिपकी ।

सुचि के भभकते चेहरे पर उसे उसके इरादों की दृढ़ता विल्कुल साफ नजर अा रही थी और इसी वज़ह से उसके होश गुम थे , जबकि ठीक सामने काल की प्रतिमूर्ति बनी खड़ी सुचि ने कहा…"नेगेटिव मेरी तरफ फेंकता है या नहीं ?"

मकड़ा ने फिल्म जल्दी से उसकी तरफ फेक दी । सुचि ने झुककर अपने कदमों में पड़ी फिल्म को उठाने की बेवकूफी नहीं की ---

नजरें मकड़ा ही पर गडाए चतावनी दी… किसी तरह की चालाकी दिखाने की जरूरत न करना, वरना समय से पहले ही काम तमाम कर दूंगी ।"

मकड़ा की रीढ की हड्डी में मौत की सिहरन रह रहकर दौड़ रही थी, बोला----"क--क्या तुम यह समझती हो सुचि कि मुझे मार कर बच सकोगी ?"

" अॉफकोर्स !"

"हरगिज नहीं, हत्यारे को पुलिस पाताल से भी खोज निकालती हेै-अग़र तुम यह सोच रही हो कि मुझे खत्म करके अपनी बाकी जिदगी चेन से गुजारे सकोगी तो यह तुम्हारी भूल है, पुलिस तुम तक पहुंच जाएगी । "

".श......शटअप । " सुचि हलक फाड़कर चिल्ला उछी-----एक लफ्ज भी नहीं बोलोगे तुम-फिलहाल मरने के लिए तैयार हो जाओ-तुम्हारी मौत के बाद जो भी होगा उसे मैं भुगतूंगी, मगर तुम अपनी आखों से नही देख सकोगे !"

इन शब्दों के साथ ही सुचि ने रिवॉल्वर वाला हाथ कुछ ऊपर उठा लिया, उसके चेहरे पर उभर आये हिसक भावों को देखकर मकड़ा को यकीन हो गया कि वह फायर करने वाली है---अगले ही पल होने बाली अपनी मौत की दहशत ने उसे आत्मा तक हिला डाला, बुत वना रह गया वह ।

सुचि ने ज़बड़े भींचे,, ट्रैगर पर उंगली का दबाव बढाया ।।

मकड़ा ने आंखें जोर से भीच लीं ।

 


" क्लिक ! " ट्रैगर दबने पर हल्की सी आवाज।

साइलेंसर के कारण धमाका तो होना ही नहीं चाहिए था, परंतु क्लिक के बाद भी जब मकड़ा ने खुद को जीवित पाया तो चौंका, आवाज भी वैसी नहीं थी, जैसी साइलेसर युक्त रिवॉल्वर से गोली चलने पर होनी चाहिए । अत: एक झटके से उसने आखें खोल दी !

इधर गोली न चलने से सुचि भौचक्की थी !

घबरा भी गई थी वह बौखलाकर पुन: ट्रैगर दबाया !

'क्लिक ! फिर वैसी ही आवाज, गोली नहीं चली !

झुंझलाकर सुचि ने लगातार दो तीन बार ट्रेगर दबाया ---- क्लिक --- क्लिक !

गोली कम्बख्त अब भी न चली , उस वक्त वह चौंक कर रिवॉल्बर की तरफ देख रही थी कि मकड़ा ने किसी गोरिल्ले की तरह उस पर जम्प लगा दी !

"अरे तू इस वक्त यहां अमित---क्या हुआ, बहू कहां है ?" दरवाजा खालते ही बिशम्वर गुप्ता चौंक पड़े ।

"घबराने की कोई बात नहीं बाबूजी, भाभी का वह प्रेजेंट यहीं रह गया था जो वे उपहार स्वरूप अपनी सहेली को देना चाहती थी, उसे लेने अाया हूं !"

" कहां से लोटा है तू ?"

‘"बराल से ।"

"और बहू?"

" वे उसी बस से हापुढ़ चली गई हैं !"

"अकेली ?"

"मैंने बहुत मना क्रिया बाबूजी यह भी कहा कि कैश दे देना, मगर भाभी मानी ही नहीं------जिद पकड़ ली उन्होंने । "

वहां पहुचती हुई ललितादेबी ने कहा----- "जाने क्या हो गया हैे सुचि को बहुत जिद्दी होती जा रही है !"

" पहले तो बहू ऐसी नहीं थी ?"

" कुछ ही दिन से यह परिवर्तन है---------पहले वह कभी जिद नहीं करती थी ।"

' 'इस बार लौटने दो उसे, पहले हम प्यार से पूछेंगे कि इस परिवर्तन की क्या वजह है, फिर चेतावनी देगे कि ऐसी जिद इस घर में नहीं चलेगी ।"

अमित हेमन्त और सुचि के 'कम्बाइंड टु रूम सैट' में पहुंचा, फ्रिज पर नजर पड़ते ही उसके होश उड। गए।

उसे कहीं कोई हेयर पिन नजर नहीं आया ।

यई सोचकर कि शायद इधर-उधर गिर गया हो, फ्रिज के चारों तरफ़ देखने लगा-यहां तक कि सर्दियों के कारण बंद पडे फ्रिज को अंदर तक देख डाला अमित ने !

हेयर पिन न मिले ।

अमित उस वक्त हैरान, परेशान और बुरी तरह झुंझलाया हुआ था जब ललितादेवी के साथ कमरे में प्रविष्ट होते ही बिशम्बर गुप्ता ने सबाल ठोक दिया –

बिशम्बर गुप्ता ने सवाल ठोक दिया----"क्या हुआ, हेयर पिन मिले या नहीं ?"

"नहीं । "

"क्या मतलब ? "

"मुले क्या मालूम, मुझसे तो भाभी ने इतना ही कहा वा कि फ्रिज पर रखे हैं…हेयर पिनों की तो बात ही दूर, उसका बच्चा तक नहीं है यहाँ ।"

"अजीब मजाक हो रहा है !"

ललितादेवी ने कहा…"तुम परेशान मत हो बेटे, जाते समय बहु जल्दी में थी--मुमक्रिन है कि कहीं दूसरी जगह

रखकर भूल गई होगी, यहीं-कहीं-होंगे----तलाश करो । "

अमित ने नहीं, बल्कि ललिता और बिशम्बर गुप्ता ने भी इस टू रूम सैट का चम्पा-चप्पा छान मारा किंतु मिलते तो तभी न जब कहीं होते, निराश होने पर ललितादेवी' बोली------" मैं रेखा को पुछती हूं, बहू का सामान उसी ने लगंवाया था----शायद कुछ मालूम हो ।"

वे कमरे से बाहर चली गई ।

कुछ देर बाद ललिता के साथ कमरे में दाखिल होती हुई रेखा ने बताया-- "हेयर पिन, तो मैंने भाभी की अटैची में ही, डाल दिए थे ।"

"वाह यह भी खूब रही । बिशम्बर गुप्ता व्यंग्य कर उठे ।

अमित ने पूछा क्या तुमने भाभी को बताया नहीं था ? "

"मैने कहा था कि सारे जेवर जेब में रखे हैं । "

वे चारों अजीब …सी तनावपूर्ण सवालियां नजरों से एक …दूसरे को देखते रह गए, सनसनी पैदा करने वाला सन्नाटा खिच गया था । उनके बीच और फिर इस सन्नाटे के गाल पर चांटा ललितादेबी ने मारा----"अब यहां खड़ा-खडा हमारा मुंह क्या देख रहा है , फौरन हापुड़ के लिए निकल जा ।"

कमरे में सुचि की चीख गूंज गई ।

अचानक मकड़ा के अपने ऊपर आ गिरने से सुचि बौखला गई मुंह से चीख निकलती हुई सोफे के साथ उलझी और लढ़खड़ाकर फर्श पर जा गिरी---रिवॉल्वर उसके हाथ से निकल चुका था, जिसे झपटकर मकड़ा ने उठा लिया ।

सुचि फर्श से उठ भी न पाई थी कि रिवॉल्वर के फंसे हुए चैम्बर को बाएं हाथ में घुमाते हुए मकड़ा ने कहा----"'तुमने रिवॉल्वर चुरा तो लिया, अौर साइलेंसर भी फिट कर लिया सुचि डार्लिंग, मगर यह न जान सकीं कि कभी कभी रिवॉल्वर का चैम्बर फंस जाया करता है, अगर एक बार उसे हाथ से घुमाकर चालूकर लिया जाए तो 'डैड' नजर आने वाले

इसी रिवॉ्ल्वर से गोलियां चलने लगती हैं ।"

सुचि को काटो तो खून नही।

पीला जर्द, हक्की-बक्की रह गई थी वह ।

मकड़ा खुलकर हंसा, उसके सोने के दांत को देखकर सुचि सिहर उठी, जबकि मकड़ा ने कहा…"किस्मत मेरे साथ है सुचि डियर, तभी तो ऐन वक्त पर चैम्बर अटक गया--------पासे पलट चुके'है, रिवॉल्वर मेरे हाथ में है-इस भ्रम में न रहना कि अब भी इससे गोली नहीं चलेगी ।

सुचि की जुबान तालू मे जा चिपकी ।

"मै तुम्हे मारूंगा जरूर मगर, इस रिवॉल्वर से नहीं, ठीक उसी ढंग जैसी योजना मैंने तुम्हारे यहाँ अाने से पहले बना रखी थी । "

"योजना । "

"हां डार्लिंग, तुम्हारी रातों के बारे में जो बातें… मैं कर रहा था वे तो सिर्फ यह आजमाने के लिए यों कि तुम कहाँ तक गिर सकती हो---मेरी असल योजना तो कुछ और ही थी-मकड़ा के दिल में न तो खुद ही तुम्हारे साथ कोई रात गुजारने की तमना है, न ही तुम्हारी रातों को बेचकर दलाली खाने की--असल में तो तुम्हे किसी दूसरे ही मकसद से यहां बुलाया था । "

" क--किस मकसद से ?" सुचि के मुंह से स्वतः निकल पड़ा । "

" तुम्हारा कत्ल करने के मकसद से । कहते समय अफीम के नशे में चूर मकड़ा क्री आंखों में हिंसक भाव नजर अाने लगे----"यह मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि ठीक वैसी ही योजना लेकर तुम भी यहाँ आओगी---एक बार को तो तुमने मुझे भोचवका ही नहीं कर दिया,, बल्कि डरा दिया-------मौत के खौफ से थरथराने लगा मैं--------शायद इस वजह से कुछ ज्यादा ही कि तुम्हारे इस पैंतरे की मैं कल्पना तक नहीं कर सका था ।"

सुचि सांस रोके उसे देखती रही ।

"तुम्हारे साथ रात गुजारने और दूसरों के साथ रातें गुजरवाकर उनकी कमाई खाने की बातें तो मैं सिर्फ उस स्थिति तक लाने के लिए कर रहा था, जहाँ मैं तुम्हे आराम से, विना किसी विघ्न बाधा के फांसी लगा सकूं । "

" फांसी !"

"हां । " कहते हुए उसने मेज के नीचे से एक मज़बूत रस्सी निकाली, इस रस्सी के एक सिरे पर फंदा वना हुआ था, बोला----" 'जरा गौर से इस फंदे को देखो, ठीक तुम्हारी गर्दन के नाप का है ।"

सुचि के चेहरे पर मौत के साए नाच रहे थे !

अमित ने तीसरी बार सुचि के मकान की सांकल बजाई, तब कहीं जाकर दरवाजा खुला और इसे खेलने वाला था -_- बूढ़ा दीनदयाल ।

अमित ने पूरे सम्मान के साथ हाथ जोडकर उनसे नमस्कार की।

"अरे, तुम हो अमित ?" दीनदयाल ने कहा-"इस वक्त यहां ?"

"जी ।"

" अाओं । "

 


अमित अंदर दाखिल हो गया--धर का माहोल उसे अजीब लगा था, सारे धर में सन्नाटा-ऐसा कि उसके अाने से पहले जैसे घर के सभी सदस्य सो रहे थे, जबकि उसकीं कल्पनाओं के अनुसार सबको जागे होना चाहिए था, अमित को ऐसा लगा ही नहीं कि इस धर में उसकी भाभी है-----बुरी आशंकाओं से ग्रस्त होकर उसका दिल धडकने लगा और इस संबंध में अभी कुछ पूछने ही वाला था कि सांकल बंद करके पलटते हुए दीनदयाल ने पूछा----"रात के इस वक्त कहाँ से आ रहे बेटे ?"

"बुलंदशहर से, क्या भाभी अभी तक यहां नर्ही पहुंची ?"

बूढा़ दीनदयाल एकदम चौंक पड़ा, उसके चेहरे पर सोचों के साथ ही तनाव के चिह्न ही उभर अाए । मुंह से केवल इतना ही निकला------"क्या मत्तलब ? "

"भाभी मुझसे पहले यंहां के लिए चली हुई हैं ।"

"मगर यहां तो वह नहीं पहुची ।"

जो शंका थी, उसे यूं स्पष्ट सुनते ही अमित के पैरों तले से जमीन खिसक गई, हाथों के तोते उड़ गए---इस भावना से वह बुरी तरह ग्रस्त हो गया कि अगर भाभी को कुछ हो गया तो बाबूजी उस सबका जिम्मेदार मुझे ही ठहराऐंगें !"

उधर, बूढी आंखों में अजीब शंका लिए दीनदयाल उसे घूर रहा था, ब्रोला----"सोच क्या रहे हो, हमें भी तो बताओ आखिर बात क्या है ?"

" अजीब बात है मोसाजी, भाभी को मुझसे दो-छाई घंटे पहले ही यहां पहुंच जाना चाहिए था, मगर अभी-तक नहीं पहुंची, आखिर कहां रह गई वे ?"

" दीनदयाल के सब्र का पैमाना छलक गया । वे हलक फाढ़कर चिल्ला उठे--"क्या बकवास करे रहे हो तुम--कहां है सुचि?"

" य. ..यही तो मैं सोच रहा हूं शायद सीधी अंजू के यहाँ चली गई हों ?"

"अंजू के यहाँ ?"

"जी !"

दीऩदयाल हिस्टिरीयाईं अंदाज में चीख-पड़ा----"कौन अंजू ? "

" उनकी सहेली है, क्या आपको नहीं मालूम-----आज़ उसकी शादी है !"

"हाँ, अजू नामक उसकी एक सहेली है तो सही, मगर , आज उसकी शादी-यह क्या बक रहे हो तुम----कल शाम ही तो वह यहां अाई थी, पूछ रही थी कि सुचि कब आएगी------हमने कह दियाकि कल तो वह गई है !"

" यहां आई थी ?"अमित के होश उड़ गए ।

"'हाँ !"

" अौर तब भी उसेने अपनी शादी का जिक्र नहीं किया ? "

"बिलकुल नहीं और ऐसा हो-नहीं सकता कि उसकी शादी होने बाली हो और वह यहां जिक्र तक न करे ।"

" आश्चर्य की बात है !" अमित का सिर चकरा रहा था----"आज शाम करीब साढे पांच बजे बुलंदशहर में हम लोगों को उसका टेलीग्राम मिला कि आज़ ही उसकी शादी है और उसमें शामिल होने के लिए भाभी को बुलाया गया था ।"

"झ. ..झूठ !" दीनदयाल चीख पड़ा-----"यह एकदम बकवास है, जिसकी अाज शादी है, वह लडकी शाम के वक्त धर आ ही कैेसे सकती है और फिर यह बात तो एकदम असंभव है आज ही होने वाली अपनी शादी का वह जिक्र तक न करे !"

"य........यही सब तो सोचकर मैं हैरान हूं मोसाजी । "

दीनदयाल खुद पर से नियन्त्रण खो बैठा, झपटकर उसने दोनों हाथों से अमित का गिरेबान पकड़ा, हाथ ही नहीं बल्कि सारा जिस्म कांप रहा था वह पागलों की तरह चीखा--------------"साजिश रच रहे हो तुम लोग, कहां है मेरी वेटी ?"

"स. ..साजिश ?" अमित के देवता कूच कर गए । "

" हां साजिश----"बहुत बडा षडृयंत्र रच रहे हो तुम, मेरी बेटी को खुद ही गायब करके उन्हें यहां पूछने चले जाए कि वह कहां है ?"

" अ------अाप केसी बात कर रहे हैं मोसाजी -?"

दीनदयाल के कुछ कहने से पहले ही वहां पार्बती औंर मनोज पहुंच गए । वह शायद बार-बार दीनदयाल के चीखने का परिणाम था---दीनदयाल को अमित पर इस तरह बरसते देख पार्वती जहां हजार शंकाओं से घिर गई---वहीं मनोज हकका--वक्का रह गया, घबराए हुए दोनों ने एक साथ पूछा…"क्या हुआ क्या हुआ ?"

"व----वही हुआ जिसका मुझे डर था ।" कांपता हुआ दीनदयाल हलक फाड़ उठा----"इन दरिंदों ने हमारी वेटी को मार डाला और अब इनकी हिम्मत तो देखो, हम ही से पूछने आया है कि सुचि कहां है ?"

" हाय, लुट गई, बरबाद हो गई-मेरी बेटी को दहेज के भूखे भेडियों, ने मार डालना-----सुचि-;--हाय मेरी बेटी-तुझसे कितना कहा था कि लौटकर उस जल्लाद खाने में मत जा ----तूं नहीं मानी !" इस किस्म के जाने कितने वाक्यों के साथ पार्वती विलाप करने लगी ।

साथ ही, हाथो से अपना माथा पीट रही थी यह ।

अमित अवाक् ।

हतप्रभ !

वुरी तरह बौखला गया वह !

अचानक ऐसी मुसीबत उसके सिर पर टूट पडी थी कि जिसके बारे में वह कुछ भी न समझ सका । उधर, पूरी तरह चकित और बौखलाया हुआ मनोज झपटकर दीनदयाल के पास पहुचा, चीखा-" क्या हुआ पापा, बात क्या हे-मुझे भी तो बताओ, क्या हुआ सुचि को ?"

" बताने के लिए अब बाकी रह क्या गया है बेटे, ये लोग दहेज के भूखे थे------कल ही सुचि को बीस हजार देकर भेजा था, मगर उसमें इनका पेट न भरा होगा, आज इन्होंने उसकी हत्या कर ही !

" यह झूठ है । अमित चिल्ला उठा----"सरासर झूठ !"

"तुम अपनी जुबान बंद रखो । " मनोज ने झपटकर , उसके बाल पकड़ लिऐ । अमित कराह उठा, बूढा दीनदयाल दोनों हाथो से अपना चेहरा छुपाकर फफक पडा ।

पार्वती तो दहाड़ मार-मार कर रो ही रहीँ थी।

मनोज का चेहरा कनपटियों तक भभककर सुर्ख पड़ गया था । गुस्से की ज्यादती के कारण सारा जिस्म कांप रहा था ! उसका और ज़बडों के मसल्स रह रहकर फूल और पिचक रहे थे । आंखो में हिसा । ऐसा लग रहा था कि जैसे अभी अमित को कच्चा चबा जाएगा-उसका यह रौद्र रूप देखकर अमित के छवके छूट गए ।

होश उड़ गए उसके !

" वडी ही दयनीय अवस्था में बोला वह…""म---मेरी बात तो सुनो, तुम पढे़ लिखे हो मनोज-मेरी तरह युवक हो-मेरी बात मौसाजी की समझ में नहीं आ रही है----भगवान कसम, मैं झूठ नहीं बोल रहा हुं, मेरी बात सुनो तो सही ।"

"बक !" मनोज ने उसके बालों को बेरहमी से झटका दिया ।

पीडा़ के कारण बिलबिला उठा अमित----- फिर जल्दी-जल्दी बोला-----"आज शाम हमें अंजू का टेलीग्राम मिला, उसमें लिखा था कि आज उसकी शादी है और उसमें शरीक होने के लिए भाभी को बुलाया था----अकेली न भेजने की वजह से बाबूजी ने उनके साथ मुझे भेजा----------"बराल" पर अाकर भाभी ने कहा कि वह प्रेजेंट बुलंदशहर में रह गया है, जो वे अंजू को देना चाहती थी, अत: यहीं से बुलंदशहर लोट जाऊ और उस प्रेजेट को लेकर यहीं पहुंचूं उसी बस से यहीं पहुंच रही हैं, जिसमें बैठी थी-----वैसा ही किया गया, मैं अब बुलंदशहर से आया हूँ तो भाभी यहीं पहुंचीं नहीं हैं, बस-इतनी-सी ही तो बात है और मोसाजी हमे जाने क्या-क्या कहने लगे------यह भी कि हमने भाभी की हत्या की।"

 


"क्या प्रेजेंट था वह ?"

" सोने का हैयरपिन का पेयर !"

"कहां है वह ?" अमित हकलाकर बौला-"न...नहीं, भाभी को शायद गलतफहमी हो गई थी---सारे घर में ढूढ़ने पर भी पिन नहीं मिले, तब रेखा ने बताया कि पिन तो भाभी की अटैची में रख दिए थे, क्योंकि अटैची उसी ने लगाई थी ।"

मनोज की आंखो में खून उतर आया ।

"ये सब झूठ है, वकबास ।" दीनदयाल चीख पड़ा---" कोई साजिश रच रहे हैं ये, दहेज के इन भूखे भेडियों ने तेरी बहन को मार डाला है मनोज और अब कानून से बचने कि कोई चाल सोच रहे है !"

" इन्हे वहम हुआ है मनोज, ऐसा भी तो हो सकता है कि बाद में उन्हे ध्यान आ गया हो कि पिन उनकी अटैची में ही है और बस अड्डे से वे सीधी अंजू के यहां चली गई हों ?"

"हम जानते हैं आज अंजू की शादी नहीं है ।"

लेकिन अाप हमें दहेज के भेडिए और भाभी का हत्यारा भी केसे कह सकते हैं, क्या आपके पास कोई सबूत है कि हमने कभी दहेज की मांग की ?"

"सबूत ?"

"स…सबूत ?" शब्द के एक-एक अक्षर को चबाया दीनदयाल ने-----"हमसे सबूत की बात करते हो जालिमों, क्या तुमने सुचि से बीस हजार रुपए नहीं मंगाए थे-क्या उन्हें तुम्हारे हलक में ठूंसने के लिए कल ही रुपए नहीं ले गई थी ?"

' 'क्या बात कर हैं अाप, हमने रुपए कब मंगाए ?"

"ओह अब देवता वन रहे हो-----मगर तुम्हारी यह देयताई चलेगी नहीं-----------एक--एक को फांसी फंदे पर पहुंचाकर रहुंगां------सबूत के लिए बालिश्त भर लम्बा पत्र है मेरे

पास-उसमें सुचि ने खुद लिखा है की दहेज के लिए तुम उसे , प्रताड़ित करते हो, एक-एक के बारे में खोलकर लिखा है उसने !"

"प...पत्र ?" अमित का दिमाग नाच गया ।

चौंकते हुए मनोज ने कहा-----"मगर पापा, ऐसे किसी पत्र का जिक्र तो आपने मुझसे नहीं क्रिया और न ही यह बताया कि इनके मंगाने पर कल सुचि बीस हजार रुपए लेकर गई !"

" यही सोचकर नहीं बताया बेटे कि तुम जवान हो, वहन पर होने वाले जुल्म को सुनकर होश गंवा सकते हो----जोश में कुई ऐसा कदम उठा सकते हो, जिससे सुचि को ही नुकसान हो !"

"क्या यह पत्र आपके पास है ?"

" हां ! अभी दिखाता हूं ! " कहने के बाद दीनदयाल लगभग भागता हुआ अंदर चला गया-अमित का दिमाग जाम होकर रह गया । उसकी समझ में कुछ न आरहा था । अभी वह ये सोच ही रहा था कि जब भाभी से कभी किसी ने दहेज मांगा ही नहीं तो उन लोगों के पास उनका पत्र केसे हो सकता है कि-----

पहले से कही ज्यादा बेरहमी के साथ उसके बालों को झंझोड़ते हुए मनोज गुर्राया-"अव तुम्हारी चाल नहीं चलेगी, शराफत से बता दो कि सुचि कहां है?"

बेचारा अमित !

क्या जवाब देता, दर्द से तड़पकर रह गया ।

दीनदयाल, सुचि का पत्र ले अाया, मनोज ने पढ़ा और अन्त तक पहुचते-पहुचते न केवल उसका चेहरा ही पत्थर की तरह सखा होगया, वल्कि भभकते हुए आंसू पलकों से क्रूदकर

गालों पर बहने लगे ।

जज्बात और जोश के भंवर में फंसा पत्र को अमित की आंखों के सामने करके यह गुर्रा उठा---" पडो इसे और जवाब दो कि अगर तुम धर्मात्मा हो तो सुचि ने यह पत्र क्यों लिखा ?"

अजीब चक्रव्यूह में फंसे अमित ने पत्र पड़ना शुरू किया----पढ़ते-पढ़ते न केवल हैरत से आंखे फट पड़ी रोंगटे भी खडे़ हो गए, जबकि एक-एक अक्षर को चबाता मनोज गुर्राया----"चाहे जो षड्रयंत्र रच लो, चाहे साजिश का लो, कोई स्थान नहीं होगी-----सुचि का यह अकेला पत्र तुम सबको फांसी के फंदे पर पहुंचाकर रहेगा-----इसमें तुम्हारे परिवार के एक-एक शख्स के कारनामे लिखे हैं-----जिस शहर में तुम्हारे इज्जतदार होने के डंके बजते हैं, उस शहर के एक-एक शख्स के सामने यह पत्र तुम्हे नंगा कर देगा ।"

खौफ और हैरत के कारण अमित को जैसे लकवा मार गया था ।

मनोज ने पत्र दीनदयाल को पकडाया, बाल छोड़कर दोनों हाथों से अमित का गिरेबान पकड़ा और गुर्राया-"अब बोल, कहां है सुचि ?"

"म--मुझे नंहीं मालूम !" दयनीय अंदाज में इसके अलावा अमित और कह भी क्या सकता था ?

"सीधी तरह बताता है कि नहीं ? “

"म----मैं सच कह रहा मनोज कि मुझे नहीं.. .आह ! "

अमित का वाक्य पुरा होने से पहले ही बिजली को-सी फुर्ती से मनोज ने अपने सिर की टक्कर उसकी नाक पर ऐसे भयानक अंदाज में मारी कि अमित के अागे के शब्द एक लम्बी और करुणापूर्ण चीख में बदल गए । ।

चेहरा लहुहान हो गया ।

मनोज गर्जा---" कहां है मेरी बहन ?"

"म...मैं कसम खाकर कहता हूं कि मुझे.........!"

"हरामजादे !" चीखते हुऐ मनोज ने उसके मुंह पर घूंसा जड़ दिया ----अमित पुन: चीख पड़ा, खुन उसके मुंह से भी बहने लगा था , मगर मनोज ने कोई रहम नहीं किया............

यदि सच लिखा जाए तो वह यह है कि किसी तरह का रहम करने की मानसिक स्थिति में भी नहीं था मनोज------------

जज्बातों के भंवर में फंसकर वह पागल हो गया था ।

बहन के प्यार ने उसे दीवाना और इस कल्पना ने उसे वहशी वना दिया था कि इन्होंने सुचि को मार दिया है ।

तभी तो उसके चीखने में रोने की आवाज मिश्रित थी-----जिन आंखों में खून नजर आ रहा था, उनसे आंसू भी वह रहे थे और खून के आंसू रोने बाला यह नौजवान रोता हुआ ही चीख चीखकर अपनी बहन का पता पुछ रहा था ।

दूसरी तरफ था अमित ।

भोला भाला, मासूम और निर्दोष ।

मनोज उसे मारता ही चला गया !

मनोज के पूछने. पर हर बार वह यहीं कहता था कि "मुझे नहीं मालूम' और इस वाक्य के बाद हर बार उसे मनोज का कहर भरा हमला सहना पड़ता ।

निर्दोष अमित की चीखे वहां गूंजती चली गई ।

मनोज उसे मारता चला गया ।

 


घूंसे, लात, टक्कर और ठोकरे ।

अमित के सारे कपडे उसके अपने खून से सन गए-मकान के बाहर जमा मोहल्ले के की भीड दरवाजा पीटने लगी-अपने बेटे की दीवानगी और दरिंदगी देखकर दीनदयाल भी कांप उठा…एकाएक उसे ख्याल अाया कि अगर अमित को कुछ होगया तो बेटा भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाएगा ।

वह घबरा गया ।

अमित को मनोज से मुक्त कराने केलिए यह लपका, कितु गुस्से से पागल हुए मनोज ने इतना तेज झटका दिया कि बूढा कमजोर दीनदयाल दीवार से जा टकराया, परंतु उस तरफ कोई ध्यान दिए विना अमित के बाल पकडे़ मनोज गुर्राया-----"जब तक तू सुचि का पता नहीं बताएगा, मैं तुझे नहीं छोडूंगा-----जान से मार डालूँगा कमीने, कहां है मेरी बहन ? “

दोनों हाथ जोड़कर लहूहान अमित बड़े ही दयनीय स्वर में गिड़गिड़ा उठा…"म---- मैं ---तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं मनोज, मुझे छोड़ दो----भाभी की ही कसम खाकर कहता हूं कि मुझें कुछ पता नहीं है…मैंने भाभी को उस बस भी . . !"

"आह...आह...बचाओ । "

दीनदयाल को लगा कि मनोज को न रोका गया तो कुछ देर में वह अमित को सचमुच मार डालेगा और रोकना उसके वश में न था…एकाएक उसका ध्यान बुरी तरह भड़भडाए जा रहे दरवाजे की तरफ गया ।

झपटकर उसने दरबाजा खोल दिया ।

" क्या हुअा-क्या हुआ ?" चिल्लाती भीड़ का रेला अंदर दाखिल हो गया, दीनदयाल चिल्लाया---"अमित को

बचाओ, मनोज उसे मार डालेगा-अरे कोई रोको उसे !"

" कौन-अमित ?" किसी ने पूछा ।

"हमारी सुचि का देवर है, कोई बचाओ उसे । "

."मनोज उसे क्यों मार रहा है ?"

" दहेज के भूखे भेडिए हैं वे, उन्होंने हमारी सुचि को मार डाला और यह खबर सुनकर पागल हुआ मनोज अब उसे मारने पर तुलाहै।"

मोहल्ले के कुछ लोगों ने मनोज को पकडा ।

कुछ ने अमित को दबोच लिया ।

भीड़ उसे घर के अंदर से घसीटती हुई सडक पर ले अाई------हुजूम लग गया उसके चारों तरफ-छज्जों पर लटकी महिलाएं उस तमाशे को देख रही थी --- यह सुनते ही भीड में रोष की लहर दौड गई कि अमित और उसके घर वालों ने दहेज के लिए सुचि को मार डाला !"

एक ही पल में खबर मोहल्ले में फैल गई ।

कोई चीखा----" म. . .मारो साले को । "इसे पुलिस के हवाले कर दो । किसी समझदार व्यक्ति ने कहा !

"नहीँ-मारो साले को, दहेज के लोभियों की तो खाल नोच लेनी चाहिए--शरीफ घर की बेटियों का जीना मुहाल कर रखा है इन कुत्तों ने !"

"अरे यह तो पूछ लो कि सुचि की लाश इन्होंने कहां डाली ?"

" क्यो वे ?" लम्बी और धनी काली मूछो वाले पहलवान सरीखे व्यक्ति ने अमित का गिरेबान पकड़कर उसे तिनके की भांति हिलाते हुए कहा---"बता इस मोहल्ले की वेटी की लाश कि लाश कहां डाली-?"

हाथ जोडे अमित गिडगिड़ा उठा---"मेरी बात तो सुनो यह झू ठ हे…भाभी को किसी ने नहीं मारा है, हम दहेज के लोभी नहीं हैं । "

' "यह इस तरह नहीं बताएगा, ठुकाई करो साले की !"

पहलवान सरीखे व्यक्ति ने एक घूंसे से उसे दूसरी तरफ उछाल दिया------उधर से किसी ने ठोकर मारी-उसके बाद यह क्रम जारी हो गया---उत्तेजित भीड़ उसे मारने लगी--बह---हरेक के सामने अपनी जान बख्शी के लिए गिड़गिड़ा रहा था , मगर कौन ध्यान देता है ?

भीड में ऐसे लोग भी थे जो विवेकशील थे, चीख चीखकर वे उसे न मारने की बातें कर भी रहे थे, किंतु उत्तेजित भीड़ कायदे की बात सुनती कब है ?

अमित ने महसूस क्रिया कि अगर उसने कोई विरोध किया तो ये लोग उसे मार ही डालेंगे, पहली बार उसके दिमाग में बचने के लिए प्रयत्न करने की बात अाई ।

और मरता क्या न करता ?

अमित तो वैसे भी अपने कॉलेज का सर्वश्रेष्ठ जम्पर और धावक था--लोगों के हाथ जोड़ना और गिड़गिडा़ना छोड़कर अचानक उसने एक ऊची जम्प लगाई, ऐसा महसुस दिया जैसे -पैरों में स्प्रिंग लगे हो ।

लोग चमत्कृत रह गए थे ।

हवा में लहराता हुआ अमित भीड़ के बीच से निकलकर पार जा गिरा और किसी के कुछ समझने से पहले ही सिर पर पैर रखकर सरपट भागा ।

"अरे, पकडो कोई ।" एक साथ कई व्यक्ति चिल्लाए…"वह भाग रहा है ! "

भीड दौड़ी ।

पर अब वह किसी के हाथ आने वाला न था ।

 
बिशम्बर गुप्ता नियम पूर्वक सुबह के पांच बजे बिस्तर छोड़ दिया करते थे और अभी बिस्तर छोडे मुश्किल से दस मिनट हुए थे कि कॉलबेल बज उठी-पैरों में स्वीपर और तन पर नाइट गाउन डाले वह यह सोचते मुख्य द्वार की तरफ बड़े कि रात भर फैक्टरी में काम करने बाद हेमन्त आया होगा ?

उनके दरवाजे पर पहुंचते पहुंचते कॉलबेल दो बार और बजी !

जैसे दरवाजा खुलबाने के लिए कोंई बहुत बैचेन हो !

नजदीक पहुंचकर उन्होंने चिटकनी गिरा दी ।

दरवाजा तेजी, के साथ दूसरी तरफ से धकेलकर खोला गया ।

"अरे ! " बिशम्बर गुप्ता उछल पड़े-----"यह तुझे क्या हुआ अमित?"

लहुलुहान अमित वेचारा क्या जवाब देता ?

सारा चेहरा खून से पुता होने के बावजूद चेहरे पर उड़ती हुई हबाइयां साफ नजर अा रही र्थी-सांस इस कदर फूली हुई थी कि जैसे मीलों

दूरसे दोड़ कर आ रहा हो जल्दी से अंदर आकर उसने दरवाजा बंदकर लिया ।

"वया हुआ है यह सव ?" अधीर होकर बिशम्बर गुप्ता चीख पंडे----"बस का एक्सीडेंट हो गया था क्या ?"

" नहीं !" मुश्किल से अमित केवल इतना ही कह सका ।

"तो फिर क्या हुआ है यह, खून से लथपथ क्यों है तू ?"

" हम सव फंस गए हैं बाबूजी ।" थूक सटक कर शुष्क पडे गले को तर करने की नाकाम कोशिश के साथ असने, कहा----"शायद एक भी न वचे । "

" मगर हुआ क्या है, क्या ऊट-पटाग बक रहा है तू--बहू कहां और और किस हालत में है-किसी से झगडा करके आया है क्या ?"

"न.. नही-मुश्किल से जान बचाकर आया हूं । "

"क्या मतलव ?"

"अंदर आइए,पूरी बात वहीं बताऊंगा । " कहने के बाद अमित वहां एक पल के लिए नहीं रुका----बिशम्बर गुप्ता असमंजस में फंसे उसके पीछे लपके-ड्राइंगरूम में पहुंचकर वह "धम्म से सोफे पर गिर गया !

"अब तो बताओं अमित-----बात क्या.......?"

बिशम्बर गुप्ता का वाक्य पूरा होने से पहले ही अभी-अभी ड्राइंग-रूम में दाखिल हुई ललितादेवी और रेखा अमित की हालत देखकर चीख पडी़



उनकी चीख सारे मकान मैं गूंज गई ।

" श. . .शी । हैं ‘ अचानक बुरी तरह भयभीत अमित ने होंठों पर उंगली रखकर बडे़ ही रहस्यमय अंदाज में उनसे चुप रहने के लिए कहा ।

उसकी इसं हरकत से सनसनी फैल गई वहां ।

वातावरण रहस्यमय ।

बिशम्बर गुप्ता, रेखा और ललिता हतप्रभ एवं बुत के समान खडी रह गई । चेहरों पर ढेर सारे सवाल, दहशत और आश्चर्य लिए ।

किसी के मुंह से बोल ना फूटा !

"कोई जेर से न बोले ! ” अमित ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा--" अगर हमारी आवाज़ पडोसियों तक पहुंच गई तो गज़ब हो जाएगा । "

बिशम्बर गुप्ता पर रहा न गया, अमित को झंझोड़ते हुए वे चीख ही पड़े--"बताता क्यों नहीं कि हुआ क्या है, किसी का खून कर आया है, क्या कम्बख्त ?"

" नहीं !"

‘"फिर बात क्या है, तेरी यह हालत कैसे हुई ?"

खुद को काफी हद तक नियंत्रित करने के बाद अमित ने कहा---" 'जो हालात हैं, उनके मुताबिक मुझे लगता है कि हम सभी भाभी की हत्या के जुर्म में फंसने बाले हैं ।"

"क...क्या बक रहा तू?"

"चीखों मत बाबुजी, यह आवाजें अगर पडोसियों ने सुन लीं तो हालात और बिगड सकते हैं--कल वे ही हमारे खिलाफ अदालत में गवाही देंगे । "

"मगर यह सब अाखिर तू बक क्या रहा है-दिमाग फिर गया है क्या-----हमलोग भला बहू की हत्या क्यों करने लगे ?"

"फिर भी हम फंसने बाले हैं !"

बुरी तरह आतंकित ललिता ने पुछा-----"क्या सुचि............? "

"कुछ नहीं पता मम्मी, कुछ नहीं पता कि भाभी कहां है-र्जिदा भी हैं या नहीं----मैं कुछ नहीं जानता, मगर उनके मां-बाप और भाई कह रहे हैं कि हमने भाभी को मार दिया है,, दहेज के भूखे भेडिए हैं हम ।"

"हे भगवान, यह मैं क्या सुन रही हूं ? "

पागल से हो गए बिशम्बर गुप्ता चीखे…"यह क्या बकवास कर रहा है तू---पहेलियां मत बुझा, ठीक से बता कि हुआ क्या ?"

अमित एक सांस में वह सब बता गया जो कुछ हापुड़ पहुंचने पर उसके साथ हुआ था, सुनकर रेखा और ललिता की ही नहीं खुद-बिशम्बर गुप्ता की भी बुद्वि कूंद होकर रह गई ।

बडी मुश्किल से स्वयं को नियंत्रित करके पूछ सके---"बहू के हाथ से लिखा हुआ पत्र तुमने अपनी आंखो से देखा था ?"

"हां !"

"क्या तुम्हें यकीन है कि पत्र में वही सब लिखा हुआ था जो तुमने बताया और बहु खुद सुचि की ही हैंडराइटिंग में था ?"

" जी हां ,भाभी की राइटिंग मैं खूब पहचानता हूं । अगर वह पत्र भाभी की राइटिंग में रेखा ने नहीं लिखा था निश्चय ही भाभी ने लिखा था।"

"रेखा से मतलब ? "

"ऐसा केवल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि रेखा किसीकी भी राइटिंग हू--ब--हू उतार देने में एक्सपर्ट है और संभव है कि इसने भाभी से किसी किस्म का मजाक करने के लिए उन के मायके इस मजमून का पत्र लिख दिया हो ?"

"मैं भला ऐसा पत्र क्यों लिखूंगी ?" रेखा हकता उठी-----"पत्र लिखकर भाभी से भला किस किस्म का मजाक किया जा सकता है ?"

एकाएक बिशम्बर गुप्ता ने छोषणा की-----"पत्र तो खुद बहू ने ही लिखा था।"

"खाप ऐसा केसे कह सकते हैं ?" अमित ने चौंककर पूछा ।

"पिछली घुटनाओं और जो कुछ तुमने बताया उससे जाहिर है, पत्र में लिखा था कि चार तारीख को वह उनसे बीस हजार रुपए लेने आ रही है और यह चार ही तारीख थी जब सुचि जिद करके हापुड़ गई, वह अपने पीहर से बीस हजार रुपए लेकर अाई----- पत्र में जो लिखा था, सुचि उस पर अमल का रहीं थी, अत: सिद्ध हो जाता है कि पत्र सुचि ने ही लिखा था ।

"मगर क्यों ?" ललिता चीख पर्डी---------बीस हजार की तो बात ही दूर, यहाँ तो उससे कभी किसी ने एक पैसे की भी मांग नहीं की-----यह बात तो दिमाग में भी कभी नहीं अाई कि सुचि कम दहेज लाई है या अपने पीहर से उसे कुछ लाना चाहिए !"

कई पल के लिए किसी के भी मुंह से बोल न फूटा । अत: तनावपूर्ण खामोशी छा गई वहाँ फिर इस खामोशी को बिशम्बर गुप्ता ने तोड़ा…"मौजूदा हालातों में यह बात एक जबरदस्त रहस्य है कि सुचि ने ऐसा पत्र क्यों लिखा, अगर वह हापुइ से बीस हजार रुपए लाई थी तो वे कहां 'गए----आजकल वह बहुत ज्यादा जिद क्यों करने लगी थी-घटनाओं से साफ जाहिर है कि उसने खुद बहाना करके बराल से तुम्हें बापस भेजा, मतलब यह कि वह अकेली रहना चाहती थी, सवाल उठता है…क्यों--वह निश्चय ही किसी

ऐसे चक्कर में उलझी थी, जिसकी हममें से किसी को जानकारी नहीं है, यह पता लगाना होगा कि सुचि किस चक्चर मे है?"

 
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