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ज्यों…ज्यों उसने सोचा त्यों त्यों इरादा दृढ होता चला गया----मज़बूरियों की जंजीर से बंधी संभ्रांत परिवार की आदर्श बहू एक जालिम के मर्डर की स्कीम बनाती चली गई ।
जो भी लूज प्वाइंट उसे नजर अाए, उन्हे कसा----अपनी समझ में उसने मकड़ा के मर्डर की ऐसी सुदृढ़ स्कीम बना डाली थी कि जिसके तहत काम करने पर वह कभी पकड़ी जाने वाली नहीं थी ।
दस बजे तक हेमन्त फेक्टरी चला गया, रेखा औंर अमित च कॉलेज ।
घर में रह गए बिशम्बर गुप्ता, ललिता और सुचि---वह विचारों में गुम रही, पता ही न चला कि ग्यारह कब बज बज गए-----घड़ी पर नजर पडते ही वह एक झटके से उठी-----यह विचार दिमाग में अाते ही उसका दिल धाड़थाड़ करके बजने लगा कि अब उसे रिवॉ्ल्वर बरामद करना है ।
विशम्बर गुप्ता का कमरा ग्राउंड फ्लोर पर था !
बह यह सोचती हुई नीचे आई कि रिवॉल्वर क्रिस तरह चुराना है---दरअसल वह कोई निश्चित योजना न बना पा रही थी, क्योंकि बिशम्बर गुप्ता का कोई भी काम नियमित न था ।
कभी कभी वे सारा दिन अपने कमरे मेंही बेठे रहते। कभी सुबह चले जाते, शाम को लोटत्ते-कभी सारा दिन धूप में बैठकर ही गुजार देते-फिलहाल वह यह सोचकर परेशान थी कि अगर आज उनका मूड सारा दिन कमरे में ही जमे रहने का हुआ तो वह क्या करेगी ?
परन्तु नीचे पहुंचते ही उसे खुशी हुई ।
चूड़ीदार पायजामे पर काली अचकन पहनने के बाद अब वे उसके बटन लगा रहे थे, सुचि देखते ही समझ गई कि वे कही जाने की तैयारी में हैं ।
उसने पूछा…"कहीं जा रहे हैं बाबूजी ?"
" हां !"
" कहां ?"
"अरे जाएंगे कहां बहु, रिटायर होने के बाद तो समय गुजारना भारी हो रहा है ।" पैरों में जूते डालते हुए बिशम्बर गुप्ता ने कहा----"जाकर बैठ जाएंगे अपने ही साथ के किसी रिटायर दोस्त के यहां ---- पुरानी बातें याद कर-करके अपने साथ उसका भी समय गुजारेंगें ।"
सुचि के कान उनके शब्दों पर न थे ।
उसका सारा ध्यान सेफ के 'की होल' में फंसी चाबी पर था-छल्ले में पड़ी अन्य दो चाबियां धीरे धीरे झूल रही थी ।
विशम्बर गुप्ता ने अपनी छड़ी उठाई ।
सुचि का दिल बल्लियों उछलने लगा-उसकी मनोकामना बडी आसानी से पूरी होंने जा रहीं थी, लगा कि भाग्य और भगवान एस दुष्ट का संहार करने के लिए उसके साथ हैं ।
"मगर आज तुमने यह क्यों पूछा बहूकि हम कहाँ जा रहे हैं ?"
" य---यूंही । " उन्हें सेफ की तरफ बढते हुए देख सुचि बौखला गई जबकि सेफ में लगी चाबी घुमाते हुए बिशम्बर गुप्ता ने कहा----"हमें आश्चर्य इसलिए हुआा, क्योंकि पहले तुमने हमसे कभी यह नहीं पूछा । "
"द दरअसल मैं तो यह कहना चाहती थी कि खाना खाकर चले जाते !"
"खाना खा लिया है ।" इस छोटे से वाक्य के साथ उन्होंने गुच्छा अचकन की जेब में डाल लिया और सुचि के सारे इरादों पर बिजली गिर पडी ।
उसे लगा कि बिशेम्बर गुप्ता ने उसके सारे सपनों, सारे अरमानों को जेब में डाल लिया है--उस वक्त वह बुरी तरह कसमसा रही थी, जब बिशम्बर गुप्ता ने हैंडल को हिलाकर यह पुष्टि की कि सेफ बंद होगईं है या नहीं ?
छडी संभाले वह दरवाजे की तरफ बढे !
सुचि बुत बनी वहीं खडी रह गई ।
दुनिया जाह्रान का होश न रहा था उसे, दरवाजे पर पहुचकर विशम्बर गुप्ता ठिठके, घूमकर वोले---"क्या हुआ ?"
"क कुछ नहीं ।" सुचि इस तरह उछल, पड़ी जैसे आसपास बम फटा हो ।
" क्या सोचने लगी थी तुम ?"
"क...कुछ भी तो नहीं बाबूजी-अा्पको वहम हुआ है ।"
"'अरे तुम्हारा चेहरा तो एकदम पीला पडा़ हुआ है बहू-----देखो कितने पसीने अा ऱहे हैं तुम्हें----- अरे ललिता, ओ ललिता । उन्होंने ऊंची आवाज में पुकारा ।
" क्या हुअा जी, क्यों चीख रहे हो ?"
" जरा अपनी बहू की सूरत तो देखो सर्दी में इतने पसीने-----इसकी तबीयत तो ठीक है न ? "
"म...मैं बिल्कुल ठीक हूं बाबूजी । " सुचि की जुबान लड़खडा रहीं थी ।
"खाक ठीक है ।" ललिता देबी ने कहा------"कल सुबह भी मैंने इसके चेहरे पर इसी तरह पसीने देखे थे----सर्दी में पसीने अाना कोई अच्छी बात है, हमारी तो यह सुनती नहीं-आने दे हेमन्त को…शाम को तुझे लेकर डाक्टर के यहाँ वही जाएगा !"
"आप भी बेवजह फिक्र करने लगती हैं मांजी ।"
कुछ देर यूंही उस पर प्यार भरी डाट पडती रही…जव छड़ी संभाले विशम्बर गुप्ता ने मुख्यद्वार पार किया तब-सुचि का दिल चाह रहा था कि वह झपटकर उनकी जेब से चाबियों का गुच्छा निकाल ले ।
" मै शर्माजी के यहाँ गीतों में जा रही हूं बहू । ड्राइंगरूम में कदंम रखती हुई ललितादेबी ने कहा---" लक्ष्मी वर्तन साफ करने अाएंगी, उसका ख्याल रखना----आजकल किसी का भरोसा नहीं है !"
"जी । ' ' सुचि इतना ही कह सकी ।
ललितादेवी चली गई ।
अव सारे घर में अकेली सुचि रह गई ।
कितना अच्छा मौका था?
घर में कोई नहीं, अगर बाबूजी सेफ की चाबी छोड़ जाते तो इस वक्त रिवॉल्वर कितनी अासानी से हासिल किया जा सकता था ।
वह मचल उठी ।
लगभग भागती हुई बिशम्बर गुप्ता के कमरे में पहुंची --- अच्छी तरह यह जानने के बावजूद कि सेफ बंद है, उसने हैंडल को दो-तीन झटके दिए ।
झुंझलाहट में सेफ की चादर पर जोर से घूंसा मारा उसने ।
बुरी तरह वह पागलों की तरह कमरे में टहलने लगी----जी चाह रहा था कि हधौडी मारकर ताले को खोल डाले, परंतु ऐसा करने से सारा खेल वक्त से पहले ही बिगड़ सकता था । "
रिवॉल्वर के बेहद नजदीक होते हुए भी वह कितनी दूर थी !
एकाएक जाने उसके जेहन में क्या ख्याल जाया कि दौढ़कर कमरे से बाहर निकलीं-आंगन में तेजी से सीढियां चढ़ी और लगभग भागती हुई अपन कमरे े में पहुंची । एक झटके से उसने सेफ खोली ।