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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

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डॉली मुझे और साले साहब को स्तब्ध, निशब्द मंत्रमुग्ध से उसको नाचते हुए देख कर मुस्कुरायी। पर बिना रुके डॉली ने कई तरह के अलग अलग स्टाइल में धीर ले बढ़ संगीत के साथ एक दक्ष नृत्यकार की तरह कामुक और रोमांचक डांस किये।

इससे पहले मैंने क्लबों में और पार्टियों में कई बार कैबरे नृत्यांगनाओं को डांस करते हुए देखा था। कई बार डॉली होने उपर डाली हुई ओढ़नी कभी ओढ़ती फिर धीरे धीरे अपने बदन से एक के बाद एक अंग को दिखाती हुई मचलती उस अंग के ऊपर से वह ओढ़नी हटा कर अपने अंग का प्रदर्शन करती बड़ी ही कामुक और उत्तेजक लग रही थी।

उसके साथ साथ अपने कूल्हों, जांघें, चूँचियाँ और अपनी चूत को भी कभी मसलना, कभी हिलाना और कभी बड़े ही कामुक अंदाज से सहलाना कर हमारी उत्तेजना का पारा तेजी से बढ़ा रही थी। डॉली ने अपनी बाँहें लम्बी कर मुझे और साले साहब को अपने साथ नाचने के लिए बुलाया। साले साहब ने शायद कभी डिस्को फ्लोर में या शादी में कभी कुछ हाथ पाँव टेढ़े मेढ़े किये होंगे।

उनका तो मुझे पता नहीं पर मैंने तो जिंदगी में कभी भी नाचना तो दूर, नाचने की कोशिश भी नहीं की थी। डॉली संगीत की लय में खोयी हुई एक बैलेरिना की तरह बड़ी ही सरलता से संगीत की लय के साथ अपने खूबसूरत पारदर्शी ओढ़नी से और कामुकता से उजागर हो रहे नग्न बदन को लचकाती लहराती हमारे पास आयी।

डॉली ने हमारे दोनों की जाँघों के बीच में हाथ डालकर हमारे लण्ड पकडे और हमें खिंच कर वह हमें उसके ड्राइंगरूम में ले गयी। अपने थिरकते पाँव के साथ बड़ी ही दक्षता से नृत्य करती डॉली ने हमें भी उसके साथ नाचने पर मजबूर किया। जब हम दोनों के पाँव नाचने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाने लगे तो हँसते हुए डॉली ने हमें छोड़ दिया।

पर फिर डॉली ने वह किया जिसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। डॉली ने थोड़ा सा कूद कर पहले अपनी एक टाँग ऊपर उठाकर मेरी कमर पर रक्खी। फिर मेरी गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बाँहों का बाहुपाश बनाकर और अपने दोनों पाँव से मेरी कमर को सख्ती से जकड़ कर अपना हल्का फुल्का बदन मेरे बदन से चिपका कर वह कूदकर मुझसे इस तरफ लिपटी की उसकी रसीली चूत मेरे चिकनाहट से लथपथ लण्ड के साथ रगड़ने लगी।

नंगी खूबसूरत डॉली मेरी कमर को अपनी टांगों में जकड़े हुए मुझे उसे हवा में मेरे गले से लटक कर मुझे चोदने का आह्वान कर रही थी।

मेरा सख्त लण्ड डॉली की चूत के छूते ही फनफना उठा। मेरे लण्ड की रक्त पेशियों में मेरा वीर्य एक बार फिर दौड़ने लगा। मेरा गोरा चिट्टा चिकनाहट से लथपथ लण्ड डॉली की चूत के संपर्क में आते ही उसे छिन्नविच्छिन्न करने पर जैसे आमादा हो गया।

डॉली ने मेरी गर्दन का बंधन जरासा भी ढीला ना करते हुए एक हाथ से मेरे लण्ड को पकड़ा और उसे अपनी चूत की पंखुड़ियों के निकट ला कर उन से रगड़ा और दो पंखुड़ियों को अलग कर मेरे लण्ड को ऊसके प्यार भरे छिद्र में प्रवेश करने के लिए द्वार खोल दिया।

मैंने अपने पेंडू से ऊपर की और जब एक धक्का मारा तब डॉली ने भी अनायास ही मेरी गर्दन की पकड़ कुछ ढीली कर अपनी चूत को थोड़ी नीची कर मेरे लण्ड को उसकी चूत में प्रवेश करने में सहायता की। मेरे एक ही धक्के में मेरा लण्ड डॉली की चूत में दाखिल हो गया। डॉली के चेहरे की भावभंगिमा देख कर मैं समझ गया की डॉली मेरे लण्ड को अपनी चूत में बड़े ही अच्छी तरीके से महसूस कर रही थी।

डॉली चाहती थी की मैं उसे मेरी कमर पर जकड़े हुए रख कर उसे हवा में ही रखते हुए चोदूँ। शायद डॉली ने इस तरह की चुदाई किसी विदेशी कपल को किसी पोर्न साइट पर करते हुए देखा था और वह चाहती थी की हम दोनों भी डॉली की चुदाई उसी तरह करें।

मैंने इससे पहले कभी की ज्योति या किसी और औरत की चुदाई इस तहा से नहीं की थी ना ही मैंने कभी कल्पना की थी की मैं कभी किसी औरत की चुदाई इस तरह जोरदार तरीके से कर पाउँगा। पर पता नहीं डॉली की चूत में क्या जादू था और उसके सर पर कैसा जूनून सवार था की मैं एक के बाद एक जोरदार धक्के मार कर उस हालात में भी डॉली की चूत को अद्धर हवामें चोदने लगा।

जैसे जैसे मेरा लण्ड डॉली की चूत में घुसता, डॉली “हाय… ओह…. हम्म्म…. चोदो…. वाह……. आह…. ओह… ” कराहती हुई मेरी चुदाई का भरपूर आनंद ले रही थी। जब किसी औरत की मन मर्जी और ख़ुशी से चुदाई होती है तो वह औरत उस चुदाई का भरपूर आनंद लेती है। उस समय उसकी कराहटें और सिसकारियाँ मर्द को भी और जोश से भर देतीं हैं और मर्द का भी चोदने का जोश बढ़ जाता है। डॉली की कराहटें और कामुकता भरी सिसकारियों ने पुरे कमरे को कामुकता भरी आवाजों से भर दिया था।

मैंने डॉली की चूत की ठुकाई करते हुए साले साहब की और देखा तो साले साहब अपने लण्ड को सहलाते हुए उसे शायद आश्वासन दे रहे थे की उसकी भी बारी जल्द ही आएगी जब डॉली उसको भी अपनी चूत में दाखिल हो कर चोदने देगी।

हालांकि मैं कोई सेठी साहब या मेरे साले साहब की तरह कोई अभ्यस्त कसरतबाज तंदुरस्त आदमी नहीं था, पर डॉली की चूत के जादू ने मुझे भी डॉली को उस पोजीशन में चोदने की वह शारीरिक शक्ति दी जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था की मुझ में है। मैंने उस हाल में डॉली को करीब पंद्रह मिनट तक चोदा होगा।

उस हालात में पंद्रह मिनट तक खड़े हो कर इतना वजन उठाते हुए चोदना कोई आसान काम नहीं होता। पर उस रात की उत्तेजना ही कुछ और थी। पर खैर मेरी भी अपनी शारीरिक क्षमता की मर्यादाएं थीं।

मैं कुछ ही देर में डॉली को हवामें उठाकर चोदते हुए थक गया। मेरा सर और पूरा बदन पसीने से तरबतर हो गया। जब डॉली ने यह देखा तो मुझे इशारा किया की मैं उसे नीचे उतार दूँ। उस पोजीशन में चुदवाते हुए डॉली तो कई बार झड़ चुकी थी पर मेरा वीर्य स्खलन होना बाकी था।

डॉली मेरे वीर्य को अपनी चूत में फिर से लेना चाहती थी। डॉली फ़ौरन मेरा और साले साहब का हाथ थाम कर हमें फिर से बैडरूम में ले आयी। डॉली पलंग पर चढ़ कर लेट गयी और उसने मुझे उसके ऊपर चढ़कर उसे चोदने का मुझे इशारा किया।

जैसे ही मैं डॉली के ऊपर सवार हुआ और डॉली की टाँगे चौड़ी कर मेरा लण्ड उसकी चूत में डालने लगा तब डॉली ने मुझे कहा, “अब मुझे खूब चोदो और अपना सारा वीर्य मेरी चूत में उंडेल दो।”

फिर डॉली ने अपनी दोनों चूँचियाँ अपने दोनों हाथों में पकड़ कर ऊँची की और उसे जोर से दबाते हुए मुझे और साले साहब को अपनी चूँचियाँ दबाने, मसलने, चूसने और काटने का इशारा किया। साले साहब भी पलंग पर चढ़ कर डॉली की दूसरी और लेट गए।

मैं डॉली की चुदाई करते हुए डॉली की चूँचियों को मसलने में भी कार्यरत हो गया और साले साहब डॉली की चूचियों पर अपने होँठ चिपका कर उन्हें जोशखरोश के साथ चूसने, चाटने और काटने में लग गए। मेरे लण्ड की नसपेशियों में मेरा गरम वीर्य उफान में था।

जैसे ही मैं डॉली के ऊपर चढ़ कर उसे जोर से धक्के पेल कर चोदने लगा की मेरा वीर्य भी मेरे लण्ड में से बाहर निकल कर डॉली की चूत की सुरंगों में दाखिल होने के लिए जैसे बेताब हो रहा था। डॉली भी मेरे एक के बाद एक तगड़े धक्कों से ऊपर नीचे हिलती हुई “आह….. हाय रे! मार दिया रे! और चोदो रे! क्या चोदते हो! ओह….”

इस तरह कराहटें लगा कर वह खुद आनंद ले रही थी और साथ में मुझे और जोर से चोदने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी। मेरी जांघ के डॉली की जाँघों के बीच में लगते हुए जोरदार थपेड़ों की “फच्च…. फच्च….. और थप्प…. थप्प…..” की आवाज से सारा कमरा गूंज उठा।
 
आखिर में जब एक धमाके साथ मेरे दिमाग को शून्य करता हुआ मेरा वीर्य जब मेरे लण्ड के छिद्र से निकल कर एक गरमागरम फव्वारे की तरह डॉली की चूत की गुफाओं में दाखिल हुआ तो मुझे यह महसूस हुआ की डॉली भी एक साथ ही झड़ने लगी।

डॉली का पूरा बदन भी पलंग पर मचलने लगा और वह भी मुझे अपनी बाँहों में जकड कर “हाय…… क्या चोदा है रे! मजा आ गया…… मर गयी रे!” कहती हुई कराहने लगी। डॉली ने मुझे झड़ते हुए इतनी ताकत से अपनी बाँहों में जकड लिया की डॉली का पूरा बदन जैसे मेरे बदन से चिपक ही गया। उसी समय मैंने साले साहब से वह दोहा सूना जो ज्योति की भाभी ने सेठी साहब से चुदाई के बाद प्यार से ज्योति सेठी साहब से चिपकी हुई थी तब गाया था।

वह दोहा था

“लण्ड जकड़ गयो चूत में छोड़के अपणो माल, कहत कबीर लुगाई के होगो तगड़ो बाल।”

साले साहब ने डॉली के होंठों को चूमते हुए कहा, “डॉली , मैं तुम्हें गारंटी के साथ कहता हूँ की जीजू ने कल नहीं तो आज पक्का तुम्हारे पेट में हमारे छोटे सेठी साहब का बीजरोपण कर ही दिया है। भले ही वह जीजू साहब के वीर्य से बना हो, पर वह कहलायेगा भी और होगा भी तो छोटा सेठी साहब ही।”

डॉली साले साहब की बात सुन मुस्कुराई। खुद झड़ने के बाद हम दोनों अलग हुए। डॉली को साले साहब से भी जिस तरह मैंने डॉली को चोदा था उसी तरह चुदवाने की कामना रही होगी; क्यूंकि मेरे डॉली के ऊपर से हटते ही डॉली उठ खड़ी हुई और पलंग से नीचे उतर कर जैसे मुझसे लिपट गयी थी।

उसी तरह साले साहब की कमर को अपनी टांगों से जकड़ कर साले साहब की गर्दन पर अपनी बाँहों का हार बना कर उनके बदन से सख्ती से लिपट गयी और अपनी चूत को साले साहब के लण्ड से रगड़ कर साले साहब को चोदने के लिए तैयार होने का इशारा किया। साले साहब तो इसी का इंतजार कर रहे थे।

उन्होंने डॉली को एक फूल की तरह अपन बाँहों में उठा लिया और जैसे मैंने डॉली को चोदा था उसी तरह पर शायद मेरे से और जोश के साथ वह डॉली को चोदने लगे। डॉली भी साले साहब के तगड़े लण्ड को पहली बार अपनी चूत में ले रही थी।

साले साहब का लण्ड का आकार कुछ अलग ही था। लंबा और मोटा होने के अलावा वह थोड़ा सा मुड़ा हुआ ऊपर छत की तरफ अपने टोपे को किये हुए बड़ा ही कामुक दिख रहा था। उनका लण्ड उनके पूर्व रस की चिकनाहट से लथपथ चमक रहा था।

उस चिकने चमकते लण्ड को डॉली की चूत में दाखील होते हुए और निकलते हुए देखना एक बड़ा ही अद्भुत एहसास था जो मैंने इसके पहले कभी अनुभव नहीं किया था। साले साहब ने भी डॉली की काफी अच्छी खासी चुदाई की।

जैसे ही साले साहब डॉली की चूत में अपने लण्ड को एक तगड़ा धक्का मार कर घुसाते, डॉली कराह कर “आह…..” कर उठती। जब साले साहब अपना लण्ड तेजी से अंदर बाहर करने लगते, डॉली भी उनके लण्ड की तेज फुर्ती भरी रफ़्तार से मैच करती हुई “आह….. ओह….. ” बोलती हुई कामुक सिसकारियां भरने लगती। साले साहब से डॉली की चुदाई का वह कामुक दृश्य अद्भुत रोमांचक और रोंगटे खड़ा कर देने वाला था।

मैंने उस रात एम.एम.एफ. चुदाई का वह रोमांचक अनुभव किया जो मैंने पहले कभी नहीं किया था। मुझे एम.एम.एफ. चुदाई स्त्रियों के लिए कितनी रोमांचक होती होगी यह भी समझ में आने लगा। जब एक मर्द एक औरत को चोदता है तो मर्द चुदाई में मशगूल और उत्तेजना से भरा होने के कारण उसका लगभग पूरा ध्यान अपने लण्ड और अपनी साथीदार की चूत के बीच में हो रहे घमासान पर ही होता है।

वह उस समय अक्सर औरत के सारे अंगों को न्याय नहीं दे सकता। चुदाई में लीन औरत उसी समय चाहती है की उसे चोदते हुए उसका मर्द साथीदार उसकी चूँचियाँ खूब चूसे और मसले। औरत की बड़ी इच्छा होती है की उसका एक एकअंग जैसे की उसकी गाँड़, उसके होंठ उसका मर्द साथीदार चूमे, चाटे और काटे। यह सब एक साधारण मर्द एक साथ नहीं कर सकता।

दूसरे यह की औरत चाहती है की मर्द उसकी चुदाई लम्बे समय तक करे। पर किसी वैज्ञानिक ने कहा है की एक साधारण मर्द औरत को ज्यादा से ज्यादा सात मिनट तक चोद सकता है। एक औरत को सात मिनट सख्ती से चोदने के बाद वह झड़ जाता है और थक भी जाता है। झड़ने के बाद मर्द में वह शक्ति नहीं रहती की वह औरत को थोड़ी देर तक विश्राम किये बिना चोद सके। साधारणतः मर्द का मन ही भर जाता है और वह बिस्तरे में ही थक कर ढेर हो कर लेट जाता है और अक्सर सो ही जाता है।

इसके विपरीत, एक साधारण औरत मर्द की सख्त चुदाई से कई बार झड़ने पर भी और चुदाई के लिए आतुर रहती है और आसानी से थकती नहीं। कई बार तो मर्द की चुदाई करने के अज्ञान या अनाड़ीपन के कारण औरत को चुदाई के दरम्यान संतुष्टि नहीं होती। वह उतनी उत्तेजित नहीं हो पाती की वह झड़े।

अगर मर्द औरत को नापसंद हो या फिर औरत उस मर्द से उकता गयी हो (जैसे की सालों से चुदने के बाद अक्सर एक औरत अपने पति से उकता जाती है) तो भी औरत को उस चुदाई में आनंद नहीं आता बल्कि वह उसे शारीरक मजदूरी या मजबूरी समझ कर झेल तो लेती है पर झड़ नहीं पाती।

पर जब दो मर्द एक औरत की एम.एम.एफ. वाली चुदाई करते हैं तो फिर औरत की चुदाई भी लम्बे समय तक चलती रहती है, औरत को मर्द को खुश करने के लिए दो लंडों को सम्हालना पड़ता है।

दोनों मर्द बारी बारी से एक औरत को चोदते रहने के कारण मर्दों को तो आराम मिल जाता है पर औरत उस दरम्यान बड़ी ही व्यस्त रहती है और तीसरी बात यह की अगर दो मर्द औरत के आगे और पीछे (मतलब चूत और गाँड़) दोनों छिद्रों में अपना लण्ड एक साथ डालकर उसकी तगड़ी चुदाई करें (जिसे डी.पी. मतलब ड्युअल पेनिट्रेशन अथवा दोनों छिद्रों में एक साथ प्रवेश करना कहते हैं) तब तो औरत त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगती है, हालांकि उसकी तगड़ी चुदाई करवाने की इच्छा तब पूरी तरह फलीभूत होती है।

और सबसे बड़ी बात यह की ऐसी चुदाई कभी कभी ही हो पाती है। इस के कारण औरत और मर्द दोनों चुदाई के पहले, दरम्यान और बाद में भी उत्सुक, उत्तेजक और रोमांचित रहते हैं।
 
दो बार मेरे और साले साहब से चुदने के बाद डॉली भी थकी हुई नजर आ रही थी। शायद साले साहब ने उसे महसूस किया और डॉली की चुदाई रोक कर धीरे से डॉली को नीचे उतारा। नीचे उतरते ही डॉली वापस पलंग पर जा कर कुछ देर लेट गयी। मैं और साले साहब डॉली के पास बैठ गए।

डॉली ने थोड़ी सी पलके खोलीं, हमें देखा और हमें देख मंद मंद मुस्करायी और फिर आँखें बंद कर लेट गयी। मैं यह देखा कर बड़ा ही प्रभावित हुआ की साले साहब घर के काम में भी काफी माहिर लग रहे थे, क्यूंकि वह डॉली के लेट जाने के बाद रसोई घर में गए और थोड़ी ही देर में हम तीनों के लिए गरमागरम चाय बना कर ले आये।

चाय की पियालियों की खटखटाहट सुनने पर डॉली ने धीरे से आँखें खोलीं और अपने सामने चाय का कप रखते हुए साले साहब को देख कर वह सानंदाश्चर्य मुस्कुरायी और बड़ी ही नजाकत भरी अदा से बोली, “अंजू वाकई बड़ी ही तक़दीर वाली है की उसे आप जैसे पति मिले। आप यहां हमारे लिए चाय बना कर ले आये यह दिखाता है की आप अपनी पत्नी के लिए भी कितने संवेदनशील होंगे। भगवान सब पत्नियों को आप जैसा पति दे।”

डॉली की इन कमसिन अदाओं और मधुर बातों से साले साहब और मैं हम दोनों का डॉली जी के प्रति लगाव और प्यार पल दर पल बढ़ता ही जा रहा था। हालांकि हम भी थके हुए थे, पर हमारा मन डॉली की चुदाई करने से भरा नहीं था। कई औरतों में यह काबिलियत होती है की वह अपनी नज़ाकत भरी अदाओं, मीठी बातों और मधुर स्मित से मर्दों का दिल लम्बे समय तक या कई बार जिंदगी भर अपने वश में रख पाती हैं। वाकई में सेठी साहब भी बड़े ही भाग्यशाली थे की उनको भी डॉली जैसी पत्नी मिली थी।

चाय पीते हुए मैं और साले साहब डॉली के इर्दगिर्द बैठ कर कभी उसकी चूँचियों तो कभी उसकी गाँड़ तो कभी उसके काले, घने घुंघराले केश के साथ खेल रहे थे जिससे डॉली बड़ा ही एन्जॉय कर रही थी। डॉली भी चाय की चुस्कियां लेते हुए बीच बीच में हमारे ढीले सोये हुए लण्ड को सेहला कर तो कभी कुछ फुर्ती से हिलाकर उन्हें जगाने की कोशिश कर रही थी।

डॉली के हाथ के जादुई स्पर्श से हमारे लण्ड भी सख्त होने लगे थे। चाय ख़त्म करने के बाद डॉली ने झुक कर पहले मेरा लण्ड मुंह में लिया और एक हाथ से हिलाते हुए वह उसे चाटने लगी। दूसरे हाथ से वह साले साहब का लण्ड हिला रही थी उनके लण्ड की त्वचा को पकड़ कर उसे ऊपर नीचे कर रही थी।

धीरे धीरे डॉली ने हमारे लण्ड को एक के बाद एक चूस कर और अपना मुंह बारी बारी हम दोनों के लण्ड से सांकेतिक रूप से चुदवा कर उन्हें एकदम सख्त तैयार कर दिया। कुछ देर बाद डॉली ने पहले मेरी और और बाद में साले साहब की और शरारत भरी बड़ी ही मादक नज़रों से देखा। डॉली की आँखों के मटकाव और कामुक भरे अंदाज़ से मैं समझ गया की डॉली तब तक पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई थी। वह और ज्यादा चुदना चाहती थी।

डॉली ने मेरी और अपनी नजरों से ही जैसे कुछ कह रही हो ऐसे देखा। मैं डॉली के भाव शायद अच्छी तरह समझ नहीं पाया तब डॉली ने शायद मजबूरी में (शायद डॉली चाहती थी की उसे पहल न करनी पड़े। मैं ही उसके दिल के भाव समझूँ और पहल करूँ। पर मेरे नहीं समझ पाने के कारण डॉली ने पहल की, और) मुझे पलंग पर लिटा दिया और खुद मुझ पर चढ़ गयी।

डॉली अपनी चूत बार बार मेरे लण्ड से रगड़ने लगी। फिर धीरे से आगे पीछे होते हुए डॉली ने मेरे लण्ड को अपनी पंखुड़ियों को हटा कर बीच में रख कर अपनी चूत की सुरंग में घुसने की इजाजत देदी।

मेरे साले साहब मेरे जितने अनाड़ी नहीं थे। जब उन्होंने देखा की डॉली की आज्ञा से मैं डॉली के नीचे सोया था और डॉली मेरे ऊपर चढ़ कर ऊपर सवारी करते हुए मुझे चोदने लगी थी तो वह डॉली को शरारत भरी आँख मार कर मुस्कराये और जैसे जैसे डॉली मेरे ऊपर सवार मुझे चोदने लगी तो धीरे से डॉली के पीछे जा कर मेरी एक टांग को अपनी दोनों टांगों के बीच में रखते हुए अपने घुटनों को हल्का सा टेढ़ा कर घुटनों के बल पर ही आधे खड़े हुए।

डॉली ने पीछे मुड़कर साले साहब की और देखा और मुस्कुरायी। डॉली की आँखों में साले साहब की समझ जाने की क्षमता के कारण एक तरह का आत्मसंतोष झलक रहा था।
 
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