S
StoryPublisher
Guest
"मेरा ख्याल तो यह है बाबूजी कि हमें अपने बारे में सोचना चाहिए ।"
"मतलब ? "
"इस वक्त हम बुरी तरह फंसे हुए हैं,,उस पत्र के रहते पुलिस तो पुलिस हमारा कोई सगे-से-सगा भी हमारी इस बात पर यकीन नहीं करेगा कि हमने भाभी को दहेज के लिए सताया नहीं था-----खुदा-न-खास्ता अगर भाभी को कुछ हो गया तो न केवल हमारी सच्चाई की एकमात्र गबाह खत्म हो जाएगी, बल्कि उनकी हत्या के जुर्म में हम सबके ह्मथों में हथकड़ियां होंगीं ।।"
रेखा और ललिता के तिरपन कांप गए ।
बिशम्बर गुप्ता बोले------" कह तो तुम ठीक रहे ही अमित,,हम बेगुनाह हैं----उस पत्र में जो ,कुछ लिखा है वह झूठ है-----इस सच्चाई पर कानून के साथ-साथ समाज भी सिर्फ तब यकीन करेगा, जब सुचि हमारी स्थिति स्पष्ट करें, अतः सबसे पहले उसे ढूंढ लेना जरूरी है !"
" मगर कहां ढूढें भाभी को ? अमित बोल---" हममें से किसी को इल्म तक नहीं कि इस वक्त बह कहां होगी ?"
" अजीब रहस्य है ?" बिशम्बर गुप्ता ने दात भौंचकर कसमसाते हुए मेज पर धूसा मारा---" अजीब उलझन में फंस गए हैं हम । "
"हमें जल्दी -से -जल्दी कुछ करना चाहिए बाबुजी गनीमत है अभी तक यहीं पुलिस नहीं पहुची है, मगर मेरा ख्याल है कि पुलिस किसी भी क्षण पहुचं सकती है----अगर ऐसा हो गया
तो पहले तो कोई हमारी बात सुनेगा ही नहीं------सुन भी ली तो विश्वास नहीं करेगा, दरअसल सच्चाई पर विश्वास दिलाने के लिए हम लोगों के पास कुछ है ही नहीं ।"
पुलिस के आने हथकड़ियों की कल्पना मात्र से ललिता और रेखा के चेहरे राख राख नजर अाने लगे-रिटायर्ड मजिरट्रेट होते हुए बिशम्बर गुप्ता की टांगे कांप रही थी ।
और ऐसे समय कॉलवेल चीख पड्री।
सभी उछल पडे ।
सिंट्टी पिट्टी गुंम-होशो हवास नदारद ।
"क--कौन हो सकता है ?" रेखा के मुह से निकला !
अमित बड़बड़ा उठा--"शायद पुलिस !"
रोंगटे खडे हो गए ।
"हमें बेवजह नहीं डरना चाहिए ।" बिशम्बर गुप्ता ने विवेक से काम लिया---"यह भी हो सकता है कि फैक्टरी से हेमन्त आया हो ।"
सांस में सांस आई।
कॉलबेल फिर बजी ।
बिशम्बर गुप्ता ने हुक्म दिया"--: ’तुम देखो ललिता, कौन है ?"
" म-----मैं ?" कभी उनका आदेश न टालने बाली ललिता ने हकलाकर कहा-----" न----नहीं-अाप हीं देखिए मुझे डर लग रहा है । "
अगर कोई अन्य वक्त होता तो वे ललितादेवी को हुक्म-उदूली करने की सजा जरुर देते, परं इस वक्त कुछ न कहा----दरअसल वर्तमान झमेले में फंसे होने के कारण इस प्वॉइंट की तरफ उनका ध्यान ही न गया कि उनकी पत्ती ने उनके जनादेश की अवहेलना की है-चुपचाप दरवाजे की तरफ बढ़ गये ।
गैलरी पार करते वक्त उनका दिल बूरी तरह धड़क रहा था !
भरसक चेष्टा के बावजूद जब वे अमित तो क्या उसकी परछाईं को भी न ढूंढ सके तो हांफते हुए मोहल्ले में वापस आ गए----मोहल्ले के लगभग सभी मर्द वहां भीइ लगाए खड्रे थे स्त्रियां ओर बच्चे छज्यों पर !
अमित का पीछा करने वाले दल ने जब यह घोषणा की कि वह भाग निकला है तो मोहल्ले के एक बुजुर्ग ने कहा-----"मैँ तो पहले ही कह रहा था कि उसे मारो--पीटो मत. पकडकर पुलिस के हवाले कर दो, मगर उस वक्त किसी ने सुनी ही नहीं । "
पार्वती दहाड्रे मार--मारकर अभी तक विलाप किए जा रही थी !
दीनदयाल बेचारा इस तरह घूम रहा था, जैसे उसका सब कुछ लूट लिया गया हो । मनोज एक खम्बे में चेहरा छुपाए रहा था, किसी ने सलाह दी---"इस वारदात की खबर फौरन पुलिस को कर देनी चहिए ।"
" यहां की पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर सकेगी । " किसी ऐसे व्यक्ति ने कहा जो खुद को कानूनी मामलों का 'मास्टर मानता था---" यह मैटर बुलंदशहर की पुलिस का है, बल्कि उस इलाके के थाने का जंहा सुचि की ससुराल है ।"
"मगर जो कुछ यहां हुआ उसकी रपट यही के थाने में होगी न? "
" हां , वह हमें कर देनी चाहिए -मुमकिन है कि पुलिस रात रात ही में अमित को तलाश करके गिरफ्तार कर ले-शयद अभी तक इन लोगों ने सुचि को न मारा हो । "
' यह रपट लिखवाने तो बुलंदशहर ही जाना पडेगा कि ये लोग सुचि से दहेज मांगते थे और अब उसकी हत्या कर दी ' है । " वह महाशय अपना ज्ञान बांट रहे थे । "
"सुबह से पहले बुलंदशहर केैसे जाया जा सकता है ? "
सुबह ही सही, मगर जाना तो पड़ेगा ही । उन्होंने दूसरी राय दी-----सुनो दीनदयाल, सुचि के पत्र की दस-बीस फोटो स्टेट कॉपी करां लो---आजकल ऐसे मामलों में 'ओरिजनल' कॉपी पुलिस के हाध में देने का धर्म नहीं है ।"
"इतनी रात में भला फोटोस्टेट कॉपी कहां तैयार हो जाएंगी ?"
एक उत्साही युवक ने आगे बढकर कहा-"मेरी फोटोस्टेट की दुकान है-इस काम के लिए मैं रात के इसी
वक्त दुकान खोलकर काम करने को तैयार हूं ।"
. "रोना-धोना छोड़कर पुलिस कार्यवाही शुरु कर दो दीनदयाल…वेटी तो गई, कहीं ऐसा न हो कि हत्यारे भी फरार हो जाएं, पुलिस... ।
"क्या करेगी पुलिस ?" एकाएक पलटकर मनोज ज्वाला के समान दहाड उठा…"क्या वह मेरी मरी हुई बहन जिदा कर सकेगी ?"
' सभी सन्नाटे मे आगए।
कुछ देर के लिए सनसनी सी फैल गई बहां,, फिर एक अधेड ने कहा----"सुचि को तो अब कोई बापस नहीं ला सकता बेटे, मगर पुलिस उसके हत्यारों को सजा जरूर दिलवा सकती है !"
" कोई सजा नहीं दिलवा सकती चचा-बुलंदशहर की पुलिस कुछ नहीं करेगी----क्योंक्रि इनका चाप रिटायर्ड जज है, बुलंदशहर में उसे देवता माना जाता है-अदालतें और पुलिस उनकी उन्गलियों पर नाचेगी । "
" ऐसा नहीं है बेटे !"
"सुचि ने अपने पत्र में लिखा है, मनोज दहाड उठा…"नही-पुलिस कुछ नहीं केरेगी----पुलिस हमें इन्साफ . . नहीं दिलाएगी, मगर मैं…मैं इंसाफ़ करूंगा, मैं अपनी वहन की मौत का बदला लूंगा ।"
वही महाशय बोल उठे---"कानून को अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए ।"
"श. . .शटअप । " मनोज इतनी जोर से दहाड़ा कि महाशय की पतलून गीली होते होते बची-भावनाओंके भंबर में फंसा मनोज चिल्लाता चला गया-----"कौन सा कानून-किसका कानून-अपना कानून मैं खुद बनाऊंगा----सुचि के एक एक हत्यारे को चीर-फाड़कर न डाल मैं दिया तो मेरा नाम मनोज नहीं---- खून पी जाऊंगा उनका --- बोटी बोटी काटकर चील कौवों के सामने डाल दूंगा---उन्होंने मेरी बहन को मारा है, में उनके घर में लाशों के ढेर लगा दूंगा ।"
सनसनी फैल गई वहां, हर तरफ एक अजीब आतंक ।
सब कुछ सुनने और समझने के बाद हेमन्त भी हक्का--बक्का ऱह गया और यदि यह लिखा जाए तो . अतिशयोक्ति न होगी कि सारा वृतांत सुनने के बाद उसके चेहरे पर खौफ के चिह्न रेखा, ललिता, अनिल और बिशम्बर .गुसा की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही उभर अाए, किंतु शायद अपनी अभिनय क्षमता से उस अधिकता पर उसने जल्दी ही काबू पा लिया, बोला-"बाकी सब बाते तो समझ में अाई, मगर जब अमित रात ग्यारह बजे के करीब ही के मोहल्ले वालों के चंगुल से भाग निकला था तो यहाँ कुछ ही देर पहले क्यों पहुंचा ?"
"उनके चंगुल से मैं बच तो गया, कुछ देर तक गलियों के जाल में भागदौढ़ करके खुली सड़क पर भी पहुंच गया, मगर. अब मैं उन सडकों पर भाग नहीं सकता था, क्योंकि सड़क दूर दूर तक वीरान पडी थी-मेरे भागने से मैं संदिग्ध हो उठता---भागने के स्थान पर तेजी से चलने लगा--कुछ देर बाद मुझे अपने सामने से एक पुलिस जीप अाती नजर आईं-मै घबरा गया, मेरी हालत देखकर पुलिस का ध्यान मुझपर केद्रित हो जाना स्वाभाविक था---लगा कि अगर उन्होंने देख लिया तो हजार सवाल करेंगे और तब पहली बार मेरे दीमाग मेँ यह ख्याल अा्याकि पुलिस मुझ ही को भी तो ढूंढती फिर रही हों सकती है, मुमकिन कि भाभी के घर या मोहल्ले वालों ने पुलिस में रिपोर्ट कर दीं हो----पुलिस के चंगुल में फंसने की कल्पना मात्र से कांप उठा और के नजदीक पहुंचने से पहले ही एक गली में दौड़ लिया, उसके बाद-पुलिस के आतंक से डरा-सहमा मैं एक उजाड़ और . टूटे--फूटे मकान के कोने में दुबका ठिठुरता रहा----तीन और चार बजे के बीच जब सर्दी मुझसे बरदाश्त न हुई तो बहां से निकला'--"पक्के आम के नजदीक फुटपाथ पर बहुत-सी कारें खड़ी थीं, उनमें से एक कार चुराई और बुलंदशहर आया ----- यहां कार मैंने घर से काफी 'दूर इसलिए छोड दी ताकि कार चोर की तलाश मे पुलिस यहाँ तक न पहुंच सके ।"
"सबसे ज्यादा मुसीबतों का सामना तुझे ही करना पडा है अमित ।"
"जो गुजर गया मैं उसके बारे में नहीं सोच रहा हूँ भइया, मैं तो यह सोचकर परेशान हूं कि अब अागे क्या होने वाला है ?"
बात सच थी !
बहां-मोजूद हर शख्स यहीं सोचकर मरा जा रहा था । हेमन्त तो कुछ ज्यादा ही ।
" हमारे ख्याल से सात बजे तक दीनदयाल यहाँ पुलिस के साथ जरूर पहुंच जाएगा । " बिशम्बर गुप्ता ने कहा------तब तक हमें अपने बचाब के लिए कोई न कोइं तर्क या सबूत ढूंढ लेना चाहिए । "
"लेकिन जब हमें मालूम ही नहीं है कि भाभी किस चक्कर मेॉ उलझी हुई थीं तो हम कर क्या सकते हैं, यह भी केसे जान सकते हैं कि इस वक्त वे कहां और किस हाल में हैं ? "
"क्या इसबारे में तुम कुछ जानतेहो हेमन्त ?"
"म...मैं ?"
" मुमकिन है कि सुचि ने तुमसे अपनी किसी परेशानी का कोई जिक्र किया हो ? " बिशम्बर गुुप्ता ने कहा-"हमारा इशारा किसी ऐसी परेशानी की तरफ है जिससे निपटने के लिए-उसे बीस हजार की जरूरत पड़ी हो ? "
''मेरी नजर में तो ऐसी कोई बात नहीं थी । "
"याद करो, मुमकिन है कि उसने स्पष्ट कहने के स्थान पर कभी कुछ कहा हो या कभी तुमने यह महसूस क्रिया हो कि वह कुछ कहना चाहती हो, मगर कब नहीं पाती ---इंसान के साथ ऐसा अक्सर अनेक कारणो से होता है!"
"मैंने ऐसा कभी महसूस नहीं क्रिया ।
"फिर आखिर बात क्या थी ?" बिशम्बर गुप्ता ने अपने दुाएं हाथ का घूंसा बाई हथेली में मारा, बुरी तरह झुझला रहे थे ।
" अगर सुची के पिहर बाले पक्के तौर पर ऐसा समझता है कि हमने उसे मार डाला है तो वह आगे भी हमारे खिलाफ कार्यवाही कर रहे होंगे ?" हेमन्त ने संभावना व्यक्त की ।
"नि: संदेह !"
"क्या कार्यवाही कर सकते हैं ?"
"सुचि' का पत्र उनके पास एक ऐसा ठोस प्रमाण है । जिसे पुलिस तो क्या दुनिया का कोई भी व्यक्ति झूठा नहीं कह सकता--उस पत्र के आधार पर हम पर सुचि कि हत्या का आरोप लगाएंगे । "
"दरअसल मैं उसी आरोप से बचने की तरकीब सोचने पर जोर दे रहा हूं। झुंझलाए हुए अमित ने उनके बीच दखल दिया ।