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"उफ बस करो-----चुप हो जाओ कर्नल !" दर्द से तड़पते हुए बिशम्बर गुप्ता हाथ जोड़कर गिड़गिडा उठे--------"हमसे और सहन नहीं होगा-सारे शहर की नजरों से गिर जाना और बात थी, तुम्हारी नफ़रत-तुम्हारी गलियों और तुम्हारा यह अविश्वास हमसे सहन नहीं होगा-जीते-जी मर गए हैं हम ।"
"तो फिर अपनी स्तिथि स्पष्ट करो !"
"न------नहीं कर सकता-कह्रने के लिए मेरे पास बहुत कुछ है मगर साबित करने के लिए कुछ भी नहीं और बिना साबित किए दूसरों की तरह तुम भी नहीं मानोगे कर्नल कि उस पत्र में लिखी एक एक बात झूठ है, सफेद झूठ ।"
कर्नल जयपाल का चेहरों बुरी तरह भभक रहा था, आंखें दहककर अंगारा हो रही र्थी-----गिड़गिड़ाते बिशम्बर गुप्ता को बुरी तरह घूरते हुए उसने कहा---"ये सब एक्टिग है, खुद को बेगुनाह दीन-हीन दिखाने की नाकाम कोशिश-----सारी जिदंगी सबूत मांगने बाला बिशम्बर सबूत पेश करने की बजाय अगर रोने लगे तो मैं यहीं कहूंगा कि तुम अपने चेहरे पर उसी मुखौटे को चढ़ाने की नाकाम् कोशिश कर रहे हो जिसे तुम्हारी मैं बहू के एक पत्र ने नोचकर फेंक दिया है । "
"बस कीजिए भाई साहब, बस कीजिए । ललितादेबी चीख पडीं--"क्या आपका इरादा इन्हे मार ही डालने का है, रहम कीजिए इन पर ।"
"इस पर रहम करूं---हुंह----इस पर ?" कर्नल के चीखने में रोने की आवाज झलकने लगी----" इस पाजी को माफ का दूं जिसने मेरे दिल में बसी सूरत को खंडखंड करके रख दिया…मैं इसे सच्चाई, ईमानदारी और सिद्धातप्रियता की सबसे पक्की मुर्ती समझता था----वह खंडित हो गई------"क्या तुम्हें मेरे दुख, मेरे तड़प का अहसास है भाभी ?"
"भ...भाईसाहब ।"
" बिशम्बर अपने सिद्धांतों से गिर सकता है मगर जयपाल नहीं-जयपाल एक मिलिट्रीमैन है और अाखिरी सांस तक सिर्फ सच्चाई का साथ देगा----फिर सामने भले ही यह बिशम्बर क्यों न हो -औंर दीनदयाल ठीक ही कहता था कि उसकी बेटी को मैंने जल्लादों के हवाले कर दिया, मगर अब मैं उसके साथ हूं----उसे न्याय दिलाकर रहूंगा--तुम सुन रहे हो न बिशम्वर---दीनादयाल को मैं न्याय रहुंगा-----तुम अपने शब्दों पर कायम नहीं रहे मगर कर्नल को देखना,कर्नल तुम्हे भी वहीं सजा दिलवाएगा जो इस जुर्म में किसी को भी मिल सकती है ।"
विशम्बर गुप्ता फफक-फफककर रो पड़े !
कर्नल जयपाल चला गया ।
उसके जाने के पंद्रह मिन्ट बाद ललितादेबी, हेमन्त, अमित और रेखा संयुक्त प्रयासों से बिशम्बर गुप्ता को सामान्य हालत में ला सके, मगर अभी तक भी वह अपनी मुट्ठी से दिल को पकडे हुए थे । ललिता ने पूछा…"दर्द है क्या ? "
"हां ललिता, लगता है कि अंतिम घड़ी अा पहुंची है ।"
"ए...ऐसा मत कहिए ।" ललितादेवी तड़प उठी । "
" दिल में वहुत जोर से दर्द उठा था, अब तो कम है मगर बहुत तेज दर्द था ललिता-----ऐसा लगा कि जैसे फट पड़ेगा-उफ्फ--हम बहुत थक गए है ललिता ।"
"य...यह अंकल क्या कुछ कम बककर गए हैं ? " भावुक हो उठी रेखा ने नफरत-भरे स्वर में कहा------" ऐसी कोई बात उन्होंने नहीं छोड़ी जो कह सकते थे और न कहीं हो । उनसे अच्छे तो वही हैं जो हम पर पड़ी मुसीबत के बारे में सुनकर भी यहां नहीं......!"
"न........नही बेटी ।" बिशम्बरं गुप्ता ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया-----"ऐसा नहीं कहते-----अभी हमारे और कर्नल के संबंधों को ठीक से नहीं जानती-----हम एक-दूसरे के अादर्श हैं-अब अपने आदर्श को कोई पतित होता महसूस करे तो वह इसी तरह भड़क उठता है----यह हमारी और हम उसकी जगह होते तो वह सब कहते जो वह कहकर गया है ।"
'"म...मगर बाबूजी, यह सब आपको बेवजह सहना पड़ा । अमित कह उठा----"आपने या हममें से किसी ने भी थोड़े ऐसा कुछ नहीं किया है जिसके लिए हमें शर्मिदा होना पड़े ।"
"जब तक हमारे पास कोई सबूत नहीं है तब तक कोई भी हमारे कथन को सच नहीं मान सकता और फिर कर्नल के भड़कने में कुछ अंश तो इस बात के भी होंगे कि उसे दीनदयाल की बातें भी सहनी पडीं।"
" बाबूजी ।" हेमन्त ने कहा--"जब अंकल आपको यह सब कह थे तब जाने क्यों मेरा दिल उन्हें सब कुछ विस्तार से बता देने के लिए करने लगा--पता नहीं मुझे ऐसा , लगने लगा कि अगर सब कुछ खुलासा करके उन्हें बताया जाए तो वह न केवल हमारी विषमता को समझ लेंगे बल्कि इस सारे मामले में कुछ मदद भी कर सकते हैं ।
" ऐसा हो तो सकता है बेटे- क्योकि कर्नल हमारी तऱह सिद्धांत और न्यायप्रिय आदमी है-'सच्चे‘ को इंसाफ दिलाने के लिए वह जान तक की बाजी लगा सकता है, मगर . . . ।"
"मगर ? "
" डर केवल यह लगता है कि अगर नकवी की तरह सब कुछ सुनने के बाद भी उसे यकीन न आया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी-वह केवल बेइज्जती करके---चुप बैठ जाने बाला नहीं है बल्कि सुनते ही यहां पुलिस को बुलाकर लाश बरामद करा देगा ।"
"ऐसे खतरनाक आदमी से जिक्र करने का मतलब ही क्या है?" अमित जल्दी से कह उठा------"हम उनकी मदद के बिना भी खुद को बेगुनाह साबित कर सकते हैं ।"
खामोशी छा गई वहां ।
इस खामोशी को बिशम्बर गुप्ता ने तोड़ा-----"तुम अपनी योजना बता रहे थे हेमन्त । "
" अब अाप बिलकुल ठीक हैं न!"
"ठीक बिलकुल ठीक तो उस दिन कह सकेंगे, जिस दिन अपने सम्मान की चादर पर विधि द्वारा लगाए गए दाग को धोने में कामयाब हो सकेगे ।"
"तिरपाल का यह टुकडा असली स्ट्रैचर पर चढा़कर हम स्टेचर को दो मंजिला बनाकर एक ही स्ट्रेचर से दो रुट्रेचर का काम ले सकते हैं ।"
"हम समझे नहीं। "
"रात के ठीक दस बजे अमित घर से निकल जाएगा ।"
" किसलिए ?" अमितनेपूछा ।
''कल रात की तरह एक कार चुराने ।
" उससे क्या होगा ?"
"सुनते रहो , रात ग्यारह बजे हमारे घर से एक ऐसा शोर उठेगा जिसे सारा मोहल्ला सुन सके और यह शोर मम्मी के बेहोश होने का होगा । "
"म----मेरे बेहोश होने का ?"
"अाप वास्तव में बेहोश नहीं होगी बल्कि सिर्फ बेहोशी में होने का नाटक करोगे । मैं, रेखा और बाबूजी इस कदर शोर मचाएगे कि सारे मोहल्ले को अापके बेहोश होने की खबर लग जाए, तब मैं यहाँ से निकलकर सामने वाले अंकल के घर जांऊगा-शायद आपको याद होगा कि वह होमगार्ड में "चीफ वार्डन' हैं अोर उनके यहां एक स्ट्रेचर है, मैं वह स्टेचर मांगने उनके पास जाऊंगा । "
बिशम्बर गुप्ता ने धड़कते दिल से पुछा--" फिर ?"
"हालांकि मोहल्ले के व्यक्तियों की तरह वे हमारी किसी भी तरह की मदद में इंट्रस्टीड न होंगे किंतु चूंकि सारे मोहल्ले को पता है कि उनके पास स्ट्रेचर है और जव मैं उसे मांगने उनके दरवाजे पर ही जाऊंगा तो इनकार करने के लिए उन्हें कोई बहाना नहीं मिलेगा ! अत: देना ही पड़ेगा ।"
"मुमकिन है कि बंसल स्पष्ट इंकार कर दे ?"
" हालांकि मैं ऐसा नहीं समझता क्योंकि सामने बाला भले ही आपसे चाहे जितनी नफरत करता हो मगर मुसीबत के समय वह चीज देने से इनकार नहीं कर सकता जो उसके पास हो और फिर, यह काम मेरा हेै------आप चिंतित न हो, मैं उनसे रुट्रेचर लेकर ही अाऊंगा, भले ही इसके लिए मुझे उसके पैर , पकड़ने पडे़ं । "
ललितादेबी ने कहा…"मगर ऐसा कोई काम हम करें ही क्यों जिसमें होने न होने की शंका वनी रहे----अगर हमें स्द्रेचर ही चाहिए तो शाम तक बाजार से खरीदकर ला सकते है या घर में भी तेैयार होसकता है।"
"मोहल्ले और शहर में हमारे विरुद्ध जो हालात हैं उनमें किसी की नजरों से बचाकर स्ट्रेचर लाना नामुमकिन है और घऱ में तैयार करना भी ठीक नहीं है क्योंकि आमतौर से साधारण घर में स्ट्रेचर होता नहीं है और इन हालातों में हमारी तरफ से उसी चीज का प्रदर्शन करना निश्चय ही हमें, संदिग्ध वना देगा ।"
"हम तुम्हारे पवॉइंट की गहराई को समझ रहे हैं ।" बिशम्बर बोले----" "स्ट्रेचर बंसल के यहां से मांगकर लाना ही ठीक रहेगा--मान लिया कि तुम स्ट्रैचर ले अाए, उसके बाद ?"
" जो हालात है उनमें मदद के लिए क्रिसी मोहल्ले वाले का घर के अंदर अाने का सवाल ही नहीं उठता अतः मैं स्ट्रैचर लाकर आपको दे दूंगा और खुद रिक्शा लेने चला जाऊंगा । इस बीच अाप तैयार की गई तिरपाल को स्ट्रेचर की वाहियों में डालकर उसे दो मंजिला वना लेंगे ---- पहली मंजिल यानी अपनी तिरपाल पर तुम्हें किसी कपडे़ में लपेटकर सुचि की लाश डाल देनी है और ऊपर की मंजिल यानी स्ट्रेचर की असली तिरपाल पर मम्मी आपको लेट जाना है।"
" म--मुझे ?" ललितादेबी का सारा चेहरा पसीने से नहा उठा----"सुचि की ल----लाश के ऊपर---हे भगवान-----न ना बाबा, यह मुझसे नहीं होगा ।"
"'मजबूरी है मम्मी, करना तो पडे़गा ही. । "
ललितादेबी गुमसुम-सी उसे देखती रहीं ।
विशम्बर गुप्ता ने पूछा-----"इसके बाद ? "
" मैं मुश्किल से दस मिनट में रिक्शा ले आऊगा, तब तक अाप लोगों को स्ट्रेचर की निचली संजिल पर लाश डाल लेनी है-पहली मंजिल पर मम्मी पर एक कम्बल हम स्टेचर पर इस तरह डाल देंगे कि देखने वालो को , मम्मी का र्चेहरा तो दीखे मग़र यह नहीं कि स्ट्रेचर दो मजिला है !"
"स्कीम तुमने अच्छी बनाई है भइया । " अमित कह उठा ।
बिशम्बर गुप्ता की तरफ देखते हुए हेमन्त ने अागे कहा…"मैं और आप स्ट्रैचर को उठाकर रिक्शे तक ले जाएंगे…रिक्शे बाले को अस्पताल चलने के लिए कहकर स्ट्रेचर के साथ ही उसमें बैठ जाएंगे और इस तरह सारे मोहल्ले के देखते-ही-देखते-सबकी-आखों के सामने हम सुचि की लाश को घर से वाहर निकाल लेंगे ।"
"उसे लेकर कहां जाएंगे ?"
"रिक्शे को अस्पताल---इमरजेंसी के बाहर प्रांगण में स्ट्रैचर उतार लेंगे, रिक्शा वाले का पेमेंट करके मैं उसे विदा कर दूंगा-रात की डयूटी पर रहने वाले बार्डस और नर्स उस वक्त 'स्टाफ रूम' में बैठी हीटर पर हाथ ताप रही होंगी-इमरजेसीं के नजदीक मुश्किल से एकाध वार्डन या नर्स होगी----------डॉक्टर को इंफॉर्म करने के बहाने वहां से टरका देंगे ।"