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दुल्हन मांगे दहेज complete

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विभिन्न सवाल कर करके हेमन्त ने चौकीदार से घटना का विस्तार पूछा, यह धारणा धूल में मिल गई कि उसके परिवार से मुसीबत के बादल छट गए हैं ।

" आओ अमित । " उसने क्रिकर्तव्यविमूढ़ से खड़े अमित को झंझोड़ा तो वह चौंका, गुर्राया-"अगर रेखा को कुछ हो गया तो मैं मनोज को जिंदा नहीं छोडूंगा भइया । ”

"होश में आओ अमित, चलो यहाँ से । "

"मैं खून पी जाऊंगा उसका---उस कमीने की हिम्मत कैसे हुई हमारे घर में घुसने की और-रेखा पर तेजाब फेंका उसने-मैं हरामजादे को कच्चा चबा जाऊंगा ।"

" अमित......पागल हो गए हो क्या, चलो ।

हेमन्त ने उसे लगभग जबरदस्ती खींचा ।

चौकीदार ने पूछा----"अब अाप कहां जा रहे हैं शाब ?"

" अस्पताल । " कहने के साथ ही अंमित को खींचता हुआ वह दूर ले गया ।

" 'तुम्हारा' दिमाग खराब हो गया है क्या अमित जों चौकीदार के सामने इतना सब कुछ बकने लगा, होश में रहो वरना हम सब पकडे जाएंगे ।"

"आपको पकडे़ जाने की पड़ी है, भइया-----वह कुत्ता हमारी वहन को… ।"

"सुन लिया, सब कुछ सुन लिया है अमित । हेमन्त गुर्राया--" यह भी कि मनोज ने रेखा को जला दिया है-रेखा तुम्हारी ही नहीं मेरी भी बहन है----------जितना गुस्सा तुम्हें आ रहा, उतना ही मुझे भी, जितना जोश तुम्हे आ रहा उतना ही मुझे भी---होश में होश मत खो मेरे भाई-----ऐसा कुछ मत कर कि हम सब जेल में पड़े हों !"

"क्या मतलब ?"

" मनोज को पुलिस ने पकड़ लिया है, इसलिए फिलहाल हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, मगर जमानत पर या सजा के बाद कभी तो बाहर निकलेगा------हम उसे छोडेंगें नहीं, अपनी बहन पर तेजाब फेंकने का पूरा बदला लेंगे, लेकिन तभी न जब हम सब सुरक्षित रहें, खुद जेल से बाहर रहें' ? "

"हमें क्या होने वाला है ?"

"अगर तुम जोश में रहे और होश से काम न लिया तो वह _ हो जाएगा जिससे बचने के लिए हमने इतने पापड वेले हैं, जरा सोचो-----सामने पडते ही हमसे गोडास्कर का सबसे पहला-सवाल यह होगा कि सारी रात हम कहां रहे, क्या किया ?"

अमित चुप रह गया ।

हेमन्त ने आगे कहा-----"अंगर हम उसे तसल्ली बख्श जवाब न दै सके तो सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा…गोडास्कर को यह समझते देर नहीं लगेगी कि अाज की रात हमने क्या किया है--लाश मिलते ही वह समझ जाएगा कि वहां उसे-हम ही टांगकर अाए हैं । "

"फ...फिर ?"

"मेरे दिमाग में एक तरकीब है !"

" क्या ?"

"पुलिस को यह बयान देंगे कि क्लिनिक से लौटते समय अचानक हमारे दिमाग में यह ख्याल अाया कि कहीं सुचि मामा के पास खुर्जा तो नहीं चली गई है और सुचि की तलाश करने हम उसी समय वस की नाइट सर्विस से खुर्जा चले गए ? "

"मगर जब मामा के बयान लेगी तो !"

" 'तुम बस अड्डे चले जाओ ।" हेमन्त उसे समझाता हुआ बोला---" मेरठ से आगरा के लिए सारी रात गाड्रियां चलती हैं !"

अगर कोई गाड़ी न हो तो इंतजार करना----मेरठ से आगरा जाती जो भी गाड़ी वहां जाकर रुके तुम उसके कंडक्टरं से बुलंदशहर से खुर्जा तक के दो टिकट लेना------------याद रहे, बस में यात्रा नहीं करनी है----सिर्फ टिकट लेने हैं----टिकट लेते ही कहीं गुल हो जाना-कंडक्टर वहां सवारियों की गिनती नहीं करता है रास्ते में कहीं करेगा सो, दो सवारियां कम होने का राज जानने के बावजूद बस को वह वापस बुलंदशहर तो लाने से रहा ।"

"'उसके बाद !"

" इसी तरह आगरे से मेरठ जा रही बस जब बस अड्डे पर रूके तो वहां उतरने वाले यात्रियों से पूछना कि वे कहां से अाए हैं-उसमें से किसी से खुर्जा से बुलंदशहर तक के टिकट लेना--चूंकि वे टिकट उनके लिए बेकार हो चुके होगे, अत: थोड़े से लालच से ही तुम्हें दे देगे----अपने बयान को प्रभावित करने के लिए यह टिकट वहुत जरूरी है अमित---एक बस से काम न बने तो दूसरी का इंतजार करना !"

"मैं-समझा गया !"

''टेलीग्राम देंकर मैं डाकखाने से सीधा बस अड्डे पहुंचूंगा, काम हो या न हो---मुझे वहीं मिलना ।"

"ठीक है !"

इस तरह हेमन्त डाकखाने पहुंचा !

टेलीग्राम का मैटर उसने कुछ इस तरह बनाया----"हमनें सुचि भाभी से एक मजाक किया है मामाजी, अत: अगर अापसे कोई यह पूछे कि मैं और भइया रात को भाभी को पूछने खुर्जां अाए थे या नहीं तो आपको कहना है कि हां.......रात हम दोनों भाभी को पुछने आपके पास अाए थे----आपका भांजा, अमित । "

" य.....यह क्या हो गया बाबूजी, कैेसे हो गया यह सब ?" पलंग पर लेटी रेखा के चेहरे पर नजर पड़ते ही तढ़प कर हैमन्त ने पूछा-----"क्या तेजाब ने-इसके सारे चेहरे को.......?"

साड़ी का पल्लू मुंह मे ठूंसकर ललितादेवी फफक रो पडीं ।

अमित एकटक रेखा की तरफ़ देखता रह गया-----उस रेखा की तरफ जिसका संपूर्ण चेहरा सफेद पट्टियों से ढका हुआ था, सांस लेने के लिए ,केवल मुंह और नाक के छिद्रो को खुला छोडा गया था, अभी तक बेहोश थी !!

बिज्ञाबर गुप्ता ने बड़े ही दयनीय अंदाज में हेमन्ते की तरफ देखा, बोले----"सब कुछ तबाह हो गया बेटे, बरबाद हो गए हम । "

हेमन्त की आंखों में अासूं झिलमिला उठे, बोला----"ऐसा क्या हो गया है बाबूजी,,हमे भी तो कुछ बताइए---------क्या कहते हैं डॉक्टर ?"

"तेजाब रेखा की आंखों में चला गया है, अब यह कभी देख नहीं सकेगी और मेरी वेटी का चेहरा हमेशा के लिए बदसूरत हो गया है-वैसा जैसी चमगादड़ की खाल होती है, काली और चुडचुड़ी़ !"

" न. . .नहीं ।" हेमन्त के हलक से निकलने बाली चीख ने सारे अस्पताल को झंझोड़ डाला…बिशम्बर गुप्ता बिलख बिलखकर रो पडे थे, र्कितु अमित की आंखों से पानी की एक बूंद नहीं-----चेहरे पर वेदना का एक भी लक्ष्य नहीं !

पथराई हुई आँखों में हिंसा !

चेहरा सपाट-----मगर सारा जिस्म गुस्से से कांप रहा था उसका । मुट्ठियां इस कदर कसती चली गई कि उंगलियों के सिरे हथेली में गड़ गए, मुंह से गुर्राहट निकली-----ओर यह सब मनोज ने किया हेै-----मै उस कुत्ते की खाल में भूस भरदूंगा । "

बिशाम्बर गुप्ता ने चौंककर उसकी तरफ देखा---अमित की अवस्था देखकृर चिहुंक उठे वे…लपककर उसके नजदीक पहुंचे, दोनों कंधे पकड़कर जोर से झंझोड़ते हुए चीखे-------"अमित-----होश में आओ बेटे । "

"म...मैं उसका खून पी जाऊंगा बाहूजी । " अमित गुर्राया-----"बोटी----बोटी काटकर चील-कौंबों के सामने डाल दूंगा उसको ।"

"न...नही ।" बिशम्बर गुप्ता कराह उठे------"ये सिलसिला ठीक नहीं हैै बेटे जिन के शिकार इस वक्त तुम हो, -कुछ बैसे ही जज्जात अपनी बहन के लिए मनोज के दिल में भी होंगें------उनका अंजाम ऐसे भयानक रूप में सामने आया हैे ओर अगर तूने खुदको न संभाला तो अंजाम शायद इससे भी ज्यादा भयानक हो ।"

"हमने उसकी बहन को क्या-किया था ?" इसे बार चीखने के साथ ही अमित की रुलाई फूट पडी-----"क-----कुछ भी तो नही बाबूजी----कुछ भी तो नहीं किया हमने ।"

" 'मगर वह यही समझता है बेटे । "

"उसऩे मेरी बहन को बदसूरत बना दिया, अंधी कर दिया-मैं उससे बदला लूंगा बाबूजी, इससे भी भयानक बदलां लूंगा । "

 


"नहीं-तुम ऐसा नहीं का सकते चीखते हुए विशम्बर गुप्ता हेमन्त की तरफ़ घूमे------ "यह पागल हो गया है हेमन्त, तुम ही समझाओ इसे ।"

हेमन्त ने कठोर और प्रभावशाली स्वर में कहा----"उस योजना को मत भ्रूलो अमित, जो हमने बनाई है-----अगर दो-दो भाई होकर भी हम रेखा पर हुए जुल्म का बदला न ले सके तो लानत है हम पर…मगर जो चीख-चीखकर बदला लेने की बात कह देते हैं उनके इरादे पुलिस को पता लग जाते हैं और फिर पुलिस उसे बदला लेने का मौका नहीं देती-----बैसे भी इस वक्त मनोज पुलिस के कब्जे में है, हम उसका कुछ नहीं कर सकते ।"

हेमन्त के शब्द अमित-के भेजे में घुस गए । वह शांति पाता चला गया चौंककर बिशम्बर गुप्ता ने पूछा…"वें कौनसी योजना, कैेसी स्कीम--क्या सोच हो तुम लोग-----क्या तुम भी पागल हो गए हो हेमन्त, बदला लेने क्री क्या स्कीम बनाई है तुमने?"

"वह हम आपको नहीं बता सकते बाबूजी ।" प्रत्यक्ष में ऐसा कहते हुए हेमन्त ने उन्हें संकेत से समझाया कि व्रहां ऐसा सिर्फ अमित को सामन्य करने के लिए कह रहा है-----" वह स्कीम हम दोनों भाईयों में गुप्त रहेगी !"

हेमन्त ने बडी मुश्किल से हालात संभाले ।

ललितादेबी लगातार रोए जा रही थी----काफी देर की गहरी खामोशी के बाद हेमन्त ने विषय परिवर्तन किया-----"यहां से छुट्टी केबारे में डॉक्टर क्या कहत्ते है ?"

रेखा को होश अाते ही छुट्टी मिल जाएगी । "

"अौर जख्स ? "

"उनके लिए डॉक्टर ने दबाएं लिख दी हैं, उनका कहना है कि हम रोज अस्पताल अाकर या घर ही पर किसी कम्पाउंडर से पट्टियों को बदलवा सकते हैं । "

कमरे में पुन: खामोशी छा गई ।

काफी देर तक बिशम्बर गुप्ता ने बताया-------"इंस्पेक्टरं गोडास्कर यहां से कह कर गया था हेमन्त कि जैसे ही तुम लोग आओ उसे इन्फॉंर्म किया जाए । "

" शायद यह यह जानना चाहता है कि हम कहाँ थे ? "

"अपका अनुमान बिलकुल ठीक है मिस्टर हेमन्त ।"

इन शब्दों के साथ कमरे में गोडास्कर प्रविष्ट हुआ ।

चारों सकपका गए ।

गोडास्कर के साथ दो सिपाही थे,"बोला------अस्पतालं के एक कर्मचारी ने फोन द्वारा अापकी वापसी की सूचना दे दी और मैं आपको यह समझाने चला अाया कि जव मिस्टर गुप्ता ने आपको डॉक्टर अस्थाना के यहां से घर भेजा था, अगर तब आप सीधे घर चले जाते तो शायद यह भयानक और शर्मनाक घटना न घटती !"

" हम क्या जानते थे इंस्पेक्टर की ऐसा होने वाला है ?"

"बेशक अाप नहीं जानते थे-वैसे बाई-द-वे, क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि रात पौने बारह बजे से अब तक कहाँ रहे ?"

हेमन्त ने जवाब दिया, सुनकर गोडास्कर की भृकुटि तन गई, बोला…"हालांकि यही बड़ी अटपटी बात है अाप किसी से भी कहे बिना खुर्जा चले गए, मगर क्या मैं यह पूछ सकता हूं अगर यह मान भी लिया जाए कि अचानक अापको यह ख्याल ऐया था कि कहीं सुचि खुर्जा अापके मामा के यहाँ न चली गई हो तब भी, अाप दोंनो ही एक साथ खुर्जा क्यों चले गए-----इस काम के लिए किसी एक का जाना ही काफी था । "

"हम दोनों चले गए, इसमें आपको आपत्ति... ? "

"नो-मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती है ? "' गोडास्कर ने लापरवाही के साथ कंधे उचकाकर कहा----"और फिर आपके पास कार थी अगर गाड़ी हो तो खुर्जा है ही कितनी दूर ?"

"क्या मतलब ?'' हैमन्त का दिमाग नाच उठा ।

"क्या रात जापके पास" कार नहीं थी ?" हेमन्त ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि जो गोडास्कर ने सख्त स्वर में चेतावनी दी----"झूठ मत बोलना मिस्टर हेमन्त, बंसल ने मुझे बताया कि जब वह तुम्हारी रिक्शा के पीछे-पीछे अस्पताल पहुंचा तो इमरजेंसी के बरामदे में खडे़ व्यक्तियों ने उसे बताया कि तुम इमरजेंसी बिजी होने के कारण ललित्तादेबी को कार में डालकर किसी प्राइवेट डॉक्टर के यहीं ले जा चुके हो----वह यह न बता सका किस डॉक्टर के यहाँ अत: वहां से बंसल को अपने घर लौटना पड़ा----रात को जब मैं मनोज को गिरफ्तार करने पहुचा तो मिस्टर गुप्ता ,ने बताया कि अस्पताल से वे डॉक्टर अस्थाना के गए थे---अस्थाना भी मुझे बता चुका है कि अाप लोग पेशेंट को कार ही में लेकर अाए थे ।"

" हमने कब मना कियाकि उस वक्त कार नहीँ थी ?"

"कहां से अा गई कार ?"' गोडास्कर ने व्यंग्य किया---"'क्या पिछली रात की तरह कहीं से चुराई गई थी ? "

घबराकर अमित ने कहा----"न----नहीं ।"

" फिर ?"

"एक कार वाले से थोडी देर के लिए लिफ्ट माँगी थी, उस बेचारे ने मदद की।"

" आपने तो ऐसा कुछ नहीं बताया मिस्टर गुप्ता, अाप तो कहते थे कि आपको पता ही नहीं कि अमित कार कहां से ले अाया?"

बिशम्बर गुप्ता हकलाते रह गए!

जबकि हेमन्त ने कहा----" इन्हे क्या पता, उस वक्त बाबूजी को यह पूछने का होश कहां कि कार कहां से आई----यह तो मुझे भी तब पता लगा जब अस्थाना के क्लिनिक से चलने के बाद अमित ने मदद के लिए कार वाले का शुक्रिया अदा किया-------बहुत ही भला आदमी था कोई जिसने अमित के मिन्नत करने पर हमारी मदद की । "

"मगर बंसल और दूसरे मोहल्ले वालों का कहना तो यह है ललितादेबी को लेकर घर से आप दोनों ही चले थे फिर अमित आपके साथ... । "

"मै'ने बताया तो था इस्पेक्टर, अमित हमें रास्ते में मिला था !" बिशम्बर गुप्ता इस डर से त्रस्त होकर पहले ही बोल उठे कि कहीं उनमें से कोई उनके बयान को काटता हुआ जवाब न दे दे और उनकी इस भावना को अच्छी तरह समझता हुआ गोडास्कर मोहक अंदाज में मुस्कराया,बारी बारी से वह तीनों को देखता हुआ बोला-----"काफी होशियारी से एक दूसरे का बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं अाप लोग !"

तीनों को सांप सूंघ गया ।

अपने हाथ दबे रूल को बड़ी स्टाइल से घुमाते हुए गोडास्कर ने कहा------"मगर येह समझने की भूल मत करना कि इस झूठे बयान से तुम लोग गोडास्कर को धोखा देने में

कामयाब गए हो ? "

"क.. क्या मतलब ?" अमित के हलक में जैसे कुछ अटक गया ।

" मतलब यह मेरे बच्चे कि मेरे जाने के बाद तुम तीनों सिर जोड़कर जरा इस बात पर विचार करना कि मुझे दिया हुआ तुम्हारा बयान कितना अटपटा है ? "

" अ.. .आप गलत समझ रहे हैं । "

मैं अभी साबित कर सकता हूं कि हकीकत वही हेै जो मैं समझ रहा हूं !"

हेमन्त के मुंह से निकला-----" कैसे ?"

"न तो अपने कथित मददगार का नाम ही मालूम होगा न ही उस गाडी का नम्बर जिसमें रात तुमने लिफ्ट ली!"

"न..नाम हमने पूछा था, मगर उसने बताया नहीं कहने लगाकि अगर मैं अपना परिचय दे दूं तो समझूंगा कि मैंने आपकी कोई मदद नहीं की और नम्बर देखने का होश न था । "

"मैं बिलकुल ठीक समझ रहा हूं न ।" गोडस्कर ने बड़े जानदार अंदाज में उन्हे घूरता हुए कहा------"मजे की बात यह है कि अस्पताल के बरामदे में खड़े तीनों व्यक्ति और डाक्टर अस्थाना के बयान भी यह है कि अापके साथ अन्य कोई नहीं था !"

" जब वह कहीं गाड़ी से बाहर ही नहीं निकला तो वे लोग क्या बताते ? "

"चकमा देने की कोशिश मत करों मिस्टर हेमन्त । "

एकाएक गोडास्कर गुर्राया----"मैँ सब समझ रहा हूं कि यह गाड़ी कहां से अाई थी----मिस्टर अमित गाड़ी चुराने के मामले में सिद्धहस्त हो चुके हैं ।"

".य यह झूठ है । " अमित का प्रतिरोध बड़ा कमजोर था !

"गाडी चुराने के जुर्म में अभी तक आप लोगों को सिर्फ इसर्लिए गिरफ्तार नहीं कर रहा हू क्योंकि बुलंदशहर के किसी थाने में अभी तक किसी गाड़ी के चुराए जाने की रपट नहीं लिखवाई गई है, मगर क़ब तक-उसे तो रपट लिख़वानी ही होगी, जिसकी गाड़ी चेरी हुई और ऐसी रपट लिखी जाते ही तुम सब गिरफ्तार कर लिए जाओगे ।"

"जरूर गिरफ्तार करना इंस्पेक्टर ।" अपनी स्कीम पर मन-ही-मन मुस्कराते हुए हेमन्त ने कहा---"मगर तब जब किसी गाडी के चोरी हो जाने की रपट हो ।"

"वैसे बाई द वे, आपके उस मददगार ने आपको कहां छोडा ?"

""बस अड्डे पर!"

" वहा से अाप खुर्जा गए ?"

"जी हां !"

बडी ही मोहक मुस्कान के साथ गोडास्कर ने पुन: कहा---"और दुर्भाग्य से न तो अापके पास यहाँ से खुर्जा जाने के टिकट होंगे न ही खुर्जां से यहां आने के !"

"ये रहे टिकट !"

 
इसं बार गोडास्कर की खोपडी नाचं गई, काफी देर तक वह हेमन्त को घूरता रहा, जबकि मन-ही-मन अपनी सफलता पर बल्लियों उछल रहे हेमन्त ने कहा-----"बडे शर्म की बात है इंस्पेक्टर कि मनोज के इस घिनौने और संगीन जुर्म के बाद भी हमें ही परेशान कर रहे हों----कदम-कदम पर हमारी ही गतिविधियों पर शक क्रिया जा रहा है । "

"मनोज ने जो किया उसके आरोप में उसे गिरफ्तार किया जा चुका है मिस्टर हेमन्त । गोडास्कर का लहजा खराब था---"उसने एक शर्मनाक और जघन्य जुर्म किया है----अदालत से उसके की पूरी-पूरी सजा दिलाने की में पुरजोर कोशिश करूगा !"

"लेकिन ?"

"उसके इस जुर्म से न अापके उस गुनाह में कोई कमी अाती है जो अाप कर चुके हैं और न ही वे गुनाह हल्के पडते हैं जो अभी तक कर रहे हैँ-वादा रहा, मुझम्मल सबूत हाथ लगते ही मैं न सिर्फ अाप सब लोगों को गिरफ्तार का लूंगा बल्कि अदालत से सजा दिलाने के लिए भी उतनी ही पुरजोर कोशिश करूंगा, जितनी मनोज को उसके कुकृत्य की सजा दिलबाने के लिए !"

" तभी न जब सबूत तुम्हे मिलेगे' ?" हेमन्त ने अपने अाप से कहा-'सुचि की लाश मिलते ही सारे पासे पलटने बाले है बच्चु----तुम्हारी खोपडी़ को भी हवा में न घुमा दिया और तुम बाबूजी से माफी मांगने घऱ न आए तो मेरा नाम भी हेमन्त नहीं।"

सब इंस्पेक्टर अब्दुल जिस समय फोर्स के साथ वहाँ पहुचा, तब तक घटनास्थल के चारों तरफ गांव वालों की भीड़ लग चुकी थी, मगर--------------पुलिस को देखते ही भीड़ ने कई की तरह

फट कर रास्ता दे दिया ।

शीघ्र ही अब्दुल को एक वृक्ष को शाख से लटकी लाश नजर आई।

उसे मिली इन्फॉरमेशन के मुताबिक लाश किसी विवाहिता युवती की ही थी----एक पल ठिठककर अब्दुल ने दूर ही से लाश का निरीक्षण किया-----फिर उसी पर नजरें टिकाए धीरे-धीरे अागे बढा ।

लाश के इर्द-गिर्द दुर्गध फैल चुकी थी ।

अब्दुल ने-ईटों के उस देर को है जिस पर ,खडे होकर संभवतया युवती ने आत्महत्या की थी---आधी-अधूरी ईंटों का वह चट्टा लाश के ठीक नीचे था और इतना ऊंचा था कि जिस पर खड़े होकर युवती ने रस्सी का एक सिरा आराम से शाख में बांधां होगा बहुत-सी ईंटे चट्ठे के चारों तरफ लुढकी पड़ी थी !

लाश के पैरों के अंगूठे चट्टे की शेष ईटों से बाल बराबर स्पर्श हो रहे थे ।

पहली नजर में अब्दुल के दिमाग में यह कहानी उभरी कि सबसे पहले युवती ने आत्महत्या के इरादे से, इधर-उधर से आधी अधूरी ईंटें ढूंढकर शाख के नीचे इतना ऊंचा चट्टा _ लगाया जिस पर खड़ी होकर एक सिरा शाख में बांध सके-----उसके बाद रस्सी के दूसरे सिरे पर बने फंदे में अपनी गरदन डालकर चट्टे पर खडी़ हो गई और तब उसने पैरों से चट्टे की ईटे हटानी शुरू की ।

ईंटे हटती गई, फंदा कसता गया ।

क्लाइमेक्स अाने पर ईहलीला खत्म !

अब्दुल को यह मामला शुद्ध आत्महत्या का लगा, किंतु दिमाग में यह विचार जरूर अटककर रह गया था कि युवती कौन है और उसने यहीं आकर आत्महत्या क्यों की ?

कहीं अन्य क्यों नहीँ ?

आत्महत्या बडे परिश्रम और समझंदारी के साथ की गई थी !

अब्दुल यह सोचने के लिए बाध्य था कि क्या आत्महत्या करने वाले के दिमाग में इतनी समझदारी रहती है और क्या वह चुन चुनकर ईंटों का चट्टा बनाने जैसी परिश्रम करने की स्थिति में होता है ?

यह रस्सी इसे कहां से मिली ?

क्या आत्महत्या करने के लिए यह रस्सी अपने साथ लेकर चली थी--अगर हाँ, तो यह बात कितनी स्वाभाविक है-जहां से यह रस्सी लेकर चली थी, वहीं आत्महत्या क्यों

नहीं की-यंहा अाकर क्यो ?

एकाएक उसके दिसठग में विचार उठा कि कहीं यह हत्या तो नंहीं ?

अासपास कदमों के निशान कैं लिए उसने नजर मारी, परंतु वहीं नंगे पैर गांव के इतने निशाने थे कि किसी निष्कर्ष तक पहुंचना असंभव था ।

अब्दुल का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो उठा । अह वह इसे पूरी तरह आत्महत्या नहीं मान रहा था, बल्कि यह सोचकर चल रहा था कि मुमकिन है किसी ने हत्या करके लाश यहीं इस ढंग से लटका दी हो कि आत्महत्या नंजर आए…अंतिम फैसला तो, वह यह पता लगाने पर ही कर सकता था कि युवती कौन हे और यहां केसे पहुंच गई ?

इसकै लिए लाश की तलाशी लेना जरूरी और फोटो आदि से पहले ताश को छेढ़ना उसने मुनासिब नहीं समझा । फिंगर प्रिंटृस विभाग और फोटोग्राफर के यहां आने में अभी समय था, अत: उसने सभी गांव बालों की तरफ देखते हुए ऊंची आवाज में पूछा---"क्या आपमें से कोई इस युवती को जानता है ?"

कहीं से कोंई जवाब नहीं !

कई बार पूछने पर भी जब कोई अागे न आया तों अब्दुल समझ गया कि युबती गांव बालों के लिए नितांत अपरिचित है,

बैसे भी लिबास से युवती शहरी लग रही थी ।

ऊंची आबाज में उसने दूसरा सवाल किया…"सबसे पहले लाश किसने देखी ?"

"मैंने साब ।" एक ग्रामीण ने कहा ।

"क्या तुम इधर से गुजर रहे थे ?" अब्दुल ने पूछा।

"नहीं साब, यह रास्ता तो है नहीं जो गुजर रहा होता ।"

"फिर तुम इधर केैसे आ निकले ?"

"कल रात से मेरी गाय खोई हुई है साब, रात को अच्छी भली छप्पर तले बांधी थी कि सुबह को गायब देखी, सो उस को ढूंढता फिर रहा था कि इधर आ निकला ----- लाश पर नजर पड़ी तो ऊपर का दम उपर रह गया साब-नीचे का नीचे---- चिल्लाता हुआ गांव की तरफ भागा और कुछ ही देरमें हम सब यहां इकट्ठे हो गए फिर आपको खबर देने का फैसला

किया गया । "

अपने अनुभव के आधार पर अब्दुल को लग रहा था कि लाश तीस पैंतीस घंटे पुरानी है, अतः उसने ऊंची आबाज में पूछा----"क्या इससे पहले किसी ने लाश देखी थी ?"

खामोशी ।

"कल रात या कल सारे दिन?"

कोई जवाब नहीं !

अब अब्दुल ने एक और सवाल किया.---"यह बाग 'किसका है ?"

" मेरा है साब ।" ऐक व्यय ग्रामीण आगे अाया ।

"क्या तुम हर रोज अपने बाग की देख-रेख नहीं करते हो ?" अब्दुल ने पूछा !

" लाश बता रही है कि वह परसों रात से यहाँ टंगी है-----कल दिन में तो तुम यहाँ आए होगे-----लाश पर तुम्हारी नजर तो पड़नी ही चाहिए थी ?"

"बाग पर चौबीस घंटे नजर रखनी पढ़ती है साहब मगर तब जबकि पेडों पर फ़ल लगे हों----आप देख ही रहे हैं , कि यह बाग अाम का है, आजकल अाम नहीं लगते सो, इधर अाए एक-एक हफ्ता गुज़र जाता है ।"

फोटोग्राफर और - फिंगर प्रिट्स विभाग के लोगों के जाने तक अब्दुल ग्रामीणों से इसी किस्म के सवाल करतां रहा-कोई खास सूत्र हाथ न लगा जबकि उन लोगों ने जाते ही यंत्रवत अंदाज में अपना काम शुरू का दिया ।

अब्दुल ने कई फोटो अपनी इच्छा के एंगल से खिंचवाए------कई ईटों से फिंगर--प्रिट्स उठवाए और उनका

काम खत्म होने के बाद पुलिस वालों की मदद से उसने खुद लाश उतरवाई-जब उसने लाश एम्बुलेंस के साथ अाए स्ट्रेचर पर रखवाई तब नजर एक कागज पर पडी़ ।

कागज का कोना लाश की छाती से बाहर झांक रहा था । अब्दुल की आंखें चमक उठी----उसे लेगा किं इस कागज से उसे युवती का नाम-पता मिल जाएगा-----कागज निकालकर खोला और पढा !

शंकर,

यह सोचकर मुझे अपने आपसे घृणा हो रही है कि कभी मैंने तुमसे प्यार किया था----वह शायद युवावस्था का जोश ही था, जिसने मुझे तुम्हारी तरफ आकर्षित किया वरना आज सोचती हूकि लड़की के प्यार की तो बात ही दूर, तुम घृणा के लायक भी नहीं हो और 'उन दिनों' अगर जानती की भविष्य में तुम मेरे जीवन के कोढ़ बन जाओगे तो कभी तुमसे प्यार न क्रिया होता, पत्र न लिखे होते ।

 


आज से दो साल पहले तुम मेरा सब कुछ लूटकर हापुड़ से इस तरह गायब हो गए जैसे कभी कहीँ थे ही नही-----उस कमरे पर गई जहां तुम रहते थे, परंतु मकान मालिक से पता लगा कि तुम कमरा छोड़ गए हो और मकान मालिक को भी तुम्हारा पत्ता-ठिकाना मालूम न था-कितना ढूंढा, कितना तलाश किया-मगर तुम न मिले और उन दिनों मुझे अपने अाप पर तरस आ रहा था

तरस आ रहा था----यह सोचकर कि मैंने तुम्हारे बारे में उस किराये के कमरे से अागे कभी जानने की कोशिश ही नहीं की-घर वाले शादी की जिद कर रहे थे, तुम्हारी तलाश थी--एक साल गुजार गया और तब मैंने अपने दिमाग में धोखेवाज करार दिया----वहीं शादी कर ली जहां पापा ने कही !

तुम मेरी जिदगी में दाग थे शंकर और यह दाग में किसी को दिखाना नहीं चाहती थी----संयोग से मुझे अच्छी ससुराल मिली, अच्छा पति और हंसी खुशी मेरे दिन गुजर रहे कि-------------एक बार तुम फिर मेरी जिदगी में आ गये----उस दिन मैं शाम के वक्त हेमन्त के साथ गांधी पार्क में टहल रही थी कि मेरी नजर तुम पर पडी----तुम किसी हिंसक पशु की तरह मुझे घूर रहे थे------उस वक्त मेरी जो हालत हुई उसे मैं बयान नहीं कर सकती-उस दिन के बाद तुम मेरी जिदगी के कोढ बन गए--तुम मेरे पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि ब्लेकमेलर बनकर मिले---सुख चैन और हंसी-खुशी में गुज़र रहीं मेरी जिदगी को तुमने झंझोड़ डाला शंकर-----मेरे पत्र हेमन्त को दिखाने कीं धमकी देकर तुम मुझसे छोटी-मोटी रकम ऐंठने लगे-मैं अपने पत्र वापस के लिए रोई, "गिढ़गिडाई हाथ जोडे, तुम्हारे पैर पकडे मगर तुम न माने----पुरे कमीने हो तुम-कहने लगे कि पत्र तब दे सकते हो जव मैं तुम्हें बीस हजार दूं-----इतनी बडी रकम भला मैं कहां से लाती…जब यही बात तुमसे कही तो तुम ठहाका लगाकर हंस पडे-बताया कि मेरी राइटिंग में तुम एक ऐसा पत्र हापुढ़ डाल चुके हो जिससे बीस हजार का इंतजाम हो जाएगा, मुझे तुम्हारी किसी भी राइटिग की नकल उतार देने की वह स्मरण हो अाई, जिसका प्रदर्शन अाज से दो साल पहले करते थे-----जब तुमने पापा के पास डाले गए पत्र का मजमून बतलाया तो मैं ढंग रह गई-चीख पडी कि मेरे पापा इतने पैसों का इंतजाम नहीं कर सकेंगे मगर तुम वहशिाना अंदाज़ में हंसे---- बोले कि बाप चाहे जितना गरीब हो, मांग यदि लडकी की ससुराल से आए------------दुल्हन ही अपने बाप से मांगे तो उसे इंतजाम करना पड़ता है…मेरे डाले गए पत्र के मुताबिक तुम चार तारीख को वहां जाना, रकम मिल जाएगी ।

मुझे चारों तरफ---से जकड़ लिया था तुमने ।

बिबश होकर सोचा कि जब तुमने पत्र डाल ही दिया है तो क्यों न बीस हजार मुंह पर मारकर अपने पत्र वापस ले लूं----चार तारीख ससुराल वाले रोकते रह गए मगर मैं जिद

करके बुलंदशहर से हापुड़े गई…रकम लाई ।

मुझसे कहा था कि जिस दिन मेरे ससुराल में हापुढ़ से टेलीग्राम मिले उसी रात को मैं तुम्हें बीस-हजार सौंपने और अपने पत्र बापस लेने के लिए गुलावठी अड्डे पर पहुंच जाऊं------रूपये लाने के अगले दिन यानी आज ही हापुड़ से अंजू की शादी का टेलीग्राम पहूँचा, मैं समझ गई तुमने ही डाला है, क्योंकि तुम जानते थे अंजू मेरी सबसे प्यारी सहेली है !

जाने क्यों मुझे यकीन न अा रहा था कि तुम बीस हजार लेकर भी मेरे पत्र लौटा दोगे----यह सोच-सोचकर डर रही थी कि अगर तुमने अब भी पत्र न लौटाए तो क्या करूँगी----इसका हल मैंने बडा भयानक निकाला, इतना तक सोच डाला कि अगर ऐसा हुआ तो तो मैं तुम्हें खत्म कर दूंगी और खुद भी मर जाऊंगी--- यह निश्चय करके मैंने बाबूजी का रिवॉल्वर चुरा

लिया !

मैं ही जानती है कि किन-किन मुसीबतों से गुजरकर आज तुम से गुलाबठी में मिली उन्होंने अमित को मेरे साथ लगा दिया था---बडी मुश्किल से बहाना बनाकर उसे बराल से टाला----तुम मुझे गांव के टूटे-फूटे और कच्चे मकान में ले गये--वही हुआ जिसका मुझे पहले से डर था, तुमने बीस हजार ही नहीं बल्कि मेरे गहने भी ले लिए----कहा ससुराल

और पीहर बालों से कह दूंगी कि अटैची बस में ही गुम हो गई---तुमने कुत्तेपने की हद कर दी थी शंकर अत: उस कहानी का वहीं अंत करने का निश्चय कर लिया । जो सोचकर आई थी----मगर वह भी न हो सका…चालाकी से तुमने मेरा रिवॉल्वर भी छीन लिया और दो घंटे बाद अाने के लिए कहकर तुम मुझे कमरे में केैद करके चले गए हो, जहां बैठी मैं अपना आखिरी पत्र लिख रही हूं !

हां आखिरी पत्र । यह कहकर गए हो कि मेरे पत्र उस दिन लौटाओगे जिस दिन मैं तुम्हें एक लाख दूंगी---मगर मैंं जानती हूं कि पत्र मुझे कभी नहीं मिलेंगें

तुम मेरे दामन के क्रोढ़ बन गए हो वक्त के साथ यह कोढ़ बढ़ता ही जाएगा…जिदगी मेरे लिए नर्क बन गई है…ऐसे ही पत्र डाल ड़ालकर तुम मेरे पापा को भी जीतेजी मार दोगे…ऐसी जिदगी से तो मौत अच्छी-मेरी मौत के साथ ही यह सिलसिला रूकेगा, मगर छप्पर की इस छत में कहीं इतनी जगह भी तो नहीं है, जहाँ मैं आराम से मर सकूं--- मगर वह रस्सी जो इस कमरे में शायद कपड़े टांगने के लिए बंधी थी, मैंने कमर पर अपनी साडी के नीचे लपेट ली हैे---तुन शायद आने ही वाले होगे, भविष्य में है एक लाख देने का वादा करके मैं यहाँ से निकल जाऊंगी और फिर वह भविष्य कभी नहीं आएगा शंकर ।

यह पत्र तुम्हें मेरी ताश के साथ मिलेगा और मेरी लाश वहाँ मिलेगी, जहाँ इस रस्सी पर आराम से मरने की जगह होगी---यह पत्र लिखने का अभिप्राय सिर्फ यह है कि मां पापा, भइया-हेमन्त, अमित रेखा, मांजी और बाबूजी को यह पता लग जाए क्रि मैं उनमें से किसी को मुंह दिखाने के लायक न थी-----सबकी दोषी हूं मुझे माफ कर देना मगर शंकर नाम के राक्षस को कभी माफ न करना हेमन्त, मैं तुम्हारी कसम खाकर कहती हूं मेरे देवता कि मैं गंगा-सी पवित्र नहीं, मगर जब से तुम्हारी हुई तब से तुम्हारी ही हूं और शंकर वह दरिंदा है जो शादी से पहले लड़कियो को फंसाकर उनकी शादी हो जाने देता है ताकि बाद में उन्हें ब्लैकमेल कर सके-बाहर का दरवाजा खुला, शायद वह आ रहा है !

अंतिम शब्द बुरी तरह धसीट मारकर लिखे गए थे ।

पत्र पढते ही लाश के संबंध में अब्दुल के जेहन में जितनी गांठें थी, सब खुलती चली गई----उसकि आंखों के सामने आजका अखबार चकरा उठा ।

एक खबर वड़ी सुर्खियों में थी ।

बुलंदशहर के सम्मानित नमारिक रिटायर्ड मजिस्ट्रेट बिशाम्बर गुप्ता की बहू के गायब होने की खबर----- अब्दुल ने पढा था फि लइकी का ससुराल वालों पर दहेज मांगने का आरोप लगा रहा है-----सारे शहर के साथ-साथ पुलिस का भी यह अनुमान है कि ससुराल बालों ने सुचि की हत्या करके लाश कहीं ठिकाने लगा दी है !

अब्दुल ने महसूस किया कि लाश बरामदगी की सूचना सबसे पहले बुलंदशहर पहुंचनी चाहिए, अत: उसने आदेश दिया--"'लाश को एम्बुलेंस में रखवाओ । "

हापुड़ के दहेज विरोधी संगठनों व्यापारियों और महिला की एक संयुक्त आपात्कालीन बैठक पिछली रात ही हो चुकी थी----उसमें हापुड़ बंद का प्रस्ताव ध्वनि मत से पास हुआ ।

आज हापुड़ बंद था !

हापुड़ के नागरिकों से भरी बसें सुबह से ही बुलंदशहर पहुंचने लगीं ।

सारे शहर का वातावरण गर्म हो उठा ।

बुलंदशहर के नागरिक भी उनके साथ थे------सो आनन-फानन में बुलंदशहर बंद की भी घोषणा कर दी गई।

बुलंदशहर बंद ।

दहेज विरोधी नारे लगाता हुआ विशाल जुलूस निकला-----ज़नसमूह बिशम्बर गुप्ता परिवार के साथ ही पुलिस के विरूद्ध भी नारे लगा रहा था--सुचि का पता लगाने संबंधी सारे नारे लगा रहे थे-----हर तरफ उतेजित भीड़ गर्म नारे !

जालूस थाने के बाहर पहुचां !

लोग कुछ ज्यादा ही जोश में अा गए, नारे और ज्यादा गर्म हो उठे ।

इंस्पेक्टर गोडांस्कर ने भीड़ को शांतकरके कहा------" आप लोग यकीन रखें,, दोषी को सजा जरूर मिलेगी------ सुचि को ढूंढने की पुलिस पुरजोर कोशिश कर रही है-------बिशम्बर गुप्ता उसके परिवार के लोगों को गिरफ्तार करने में कुछ कानूनों पेचीदगियों हैं जो शाम तक राइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट आने पर हो जाएंगी----" मेरा विश्वास है कि आज शाम तक उन लोगों को जरूर गिरफ्तार कर लिया जाएगा । '"

गोडास्कर अभी इतना ही बोल पाया था कि एक कांस्टेबल ने आकर उसके कान में सुचना दी----"गुलावठी से सव इंस्पेक्टर अब्दुल का फोन है, वह आप से बात करना चाहते । "

गोडास्कर अंदर चला गया ।

भीड़ भला कहां संतुष्ट होने बाली थी -- नारे कुछ ज्यादा ही बुंलदी से उछलने लगे और फिर यह जुलूस जिलाधी को ज्ञापन देने चल पडा़ !!!

रेखा को सुबह सात बजे होश अाया !

आठ बजे तक वे हस्पताल से घर आ गए-चीखने चिल्लाने और रोने के बाद विस्तर पर पडी़ रेखा अब तो सो चुकी थी----बाकी लोग भूखे-प्यासे,, डरे सहमे से ड्राइंगरूम मेंं बैठे थे--------सुबह काअखबार पढ चुके थे !

शहर के वातावरण से भी अपरिचित न थे

उन्हें लग रहा था कि उत्तेजित जनसमूह को शांत करने के लिए पुलिस उन्हें किसी भी क्षण गिरफ्तार कर सकती है,, यह बात बिशम्बर गुप्ता ने अभी अभी कही थी !

जबाब में हेमन्त बोला------" अब आपको इतना डरना नहीं चाहिए बाबूजी,, यह हंगामा और शोर-शराबा केवल तभी तक है जब तक सुचि की लाश नहीं मिल जाती----लाश मिलते ही सब कुछ बंद हो जाएगा, उनके मुंह पर ताले लग जाए'गे !"

"मगर पहले पुलिस हमे गिरफ्तार तो कर सकती है ?"

" केवल लोगों को शांत करने के लिए----कानूनी रूप से न पुलिस अभी पुख्ता है, न हो सकेगी क्योंकि एक्सपर्ट की रिपोर्ट हमें फेवर करेगी-----लाश मिलने के बाद तो बाकी कुछ बचेगा ही नहीं--------गिरफ्तार हो भी गए तो पुलिस को तुरन्त छोड़ना पडेगा !"

'"म...मगर एक बज ,गया है, लाश आखिर कब मिलेगी?"

"इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, मुमकिन है आज सारे दिन ही न मिले, क्योंकि लाश को हम ऐसी स्थान पर छोडकर अाए हैं जहां उसे कोई आसानी से देख न सके ।"

बिशम्बर गुप्ता के कुछ कहने से पहले ही कॉंलवैल बज उठी !

सबने सवालिया नजरों से एक-दूसरे की तरफ देखा ,,यह लिखना गलत न होगा कि हैमन्त ने अपने पिता को आदेश दिया----" आप देखिए कौन है ?"

सस्पेंस में फंसे बिशम्बर गुप्ता दरवाजा खोलने चले गए-जब वापस आए तो उनके साथ एक व्यक्ति था और उस व्यक्ति को देखते ही ललितादेबी चीख पडीं ।

" भईया । " वह दौड़कर उस व्यक्ति से जा लिपटी ।

"बात क्या हुई ललिता, यह सब कैेसे और क्यों हो गया ? " कहते हुए उस व्यक्ति ने स्नेहपूर्वक उसके सिर पर हाथ फेरा-----ललितादेबी फफ्क--------फ़फककर रो रही र्थी-------इस कदर कि वह अपने भाई के सवाल का जवाब भी न दे सकी, पीड़ा युक्त स्वर में बिशम्बर गुप्ता ने कहा----" सब तकदीर का खेल है जगदीश-लोग हमे दहेज के, लोभी और हत्यारा कह रहे हैं…हमारे बारे में यह सब सोच रहे हैं जो कभी खुद हमने नहीं सोचा ! "

" लेकिंन हुआ क्या है जीजाजी, मुझें भी तो कुछ वताइए----टेलीग्राम और अाज का अखबार मुझे लगभग साथ ही मिले-----पढ़कर चौंक पड़ा मैं । "

बिशम्बर गुप्ता ने हेमन्त की तरफ देखा…जेसे पूछ रहे हो कि जगदीश को सच किस हद तक बताया जाए, जगदीश बोला-"बेहिचक से सब कुछ बता दीजिए, अगर कोई ऊक-चूक बात भी हो गई तब भी मैं आपके साथ हूं--ऐसा भला कैसे हो सकता है कि बहन मुसीबत में है और भाई साथ न दे !"

जगदीश के शब्द एक धूसां बनकर बिशम्बर गुप्ता के दिल पर लगे कराह से उठे वह------" क्या तुम्हे हमसे और अपनी बहन से भा यह उम्मीद है कि हमने दहेज मांगा होगा-----सुचि की हत्या की होगी ?"

" ऐसी बात नहीं है जीजाजी !"

" फिर तुमने सोच भी कैसे लिया कि कोई ऊक चूक बात हुई होगी ?"

"मैनें तो यूं ही---- शहर में इतना शोर जो मच रहा है, कोई बात तो होगी ही और मैं वही बात जानने के लिए बुरी तरह उत्सुक हूं !"

हेंमन्त ने सब कुछ बता दिया !

सब कुछ !

यह भी कि सुचि की लाश को उन्होनें घर से निकालकर क्यों कैसे और कहां पहुचाया है, सुनकर जगदीश गंभीर होगया,, बोला -----" मेरे ख्याल से आप लोगों ने बस यही ठीक नहीं किया !"

" क्या ?"

" आप तो मुझसे बेहतर जानते हैं जीजाजी क्रि जुर्म को जितनी सख्ती के साथ दबाने का प्रयास क्रिया जाए उतेंनी ही तेजी से उछलकर अोरों के सामने आता है-सुचि की लाश मिलने तक न आपने कोई गुनाह किया था न झूठ बोला था,, मगर उसके बाद जो कुछ किया वह ठीक नहीं था !"

"हमने तो कहा था जगदीश हेमन्त ही न माना । "

"क्यों हेमन्त?"

हेमन्त ने उल्टा सवाल किया-----------"आप हमारी जगह होते तो क्या करते ? "

"लाश मिलते ही पुलिस को सूचित कर देता ।"

"हुंह---कहना अासान् है मामाजी, करनां बहुत मुश्किल । "

"क्या मतलब?"

"पुलिस उसी समय सुचि की हत्या के जुर्म में हमारे हाथों में हथकडी डालकर थाने ले जाती ।"

" लेकिन झूठ-झूठ ही होता है, एक दिन सच्चाई अदालत और लोगों के सामने जरुर आती-मगर अब मुसीबतों का फंदा अपऩे गले तुम खुद डाल चुके हो !"

"सच्चाई सामने कभी नहीं आनी थी मामाजी, क्योकि उसे सामने लाने के लिए हमारे पास कोई सबूत न था-------आप बाबूजी से पूछ सकते है, सुचि के पत्र की रोशनी में हर आदमी को हमारी कहानी इतनी खोखली लगती कि वह व्यंग्य से हंसने लगता था----नक्वी और गोडास्कर उदाहरण हैं । "

"मगर अब ही तुमने क्या कर लिया है-मेरा ख्याल तो यह है कि तुम्हारी स्कीम बुरी तरह फ्लाप होगी---------"यह साबित होने में देर नहीं लगेगी कि लाश को वहां तुमने पहुचाया है ----- उसके बाद तुम लाख कहते रहना कि लाश तुमने पहुंचाई जरूर है मगर हत्या नहीं की-कोई विश्वास नहीं करेगा । "

" आप देखते लेना मामाजी सब बिश्वास करेंगें---- सारी दुनिया को यकीन होगा----

दुनिया को यकीन होगा-----अदालतें उस झूठ को सच, मानती हैं जिसके सबूत हों उस सच को सच नहीं जिसके सबूत न हों !

जगदीश के कुछ कहने से पहले ही कॉलबेल पुन बजी । इस बार दरवाजा खोलने हेमन्त खुद गया वापस आया तो साथ में गोडास्कर था----वह पहली बार बिना किसी पुलिस वांले को साथं लिए अाया था---हेमन्त के चेहरे पर तो हवाइयां उढ़ ही रहीँ थीं-----पुतिस को देखते ही जगदीश 'सहित अन्य ' सभी के चेहरे भी फक्क पड़ गए--बुरी बुरी आशंकाओं है दिल धड़कने लगे ।

गोडास्कर की भूरी आंखें जगदीश पर जम गई और जव जगदीश ने ऐसा महसूस किया तो उसके पेट में गैस का गोता उठकर दिल पर ठोकरें मारने लगा, गोडास्कर ने सीधे उसी से पूछा-----" आपका परिचय ?"

"ज.....जी--मेरा नाम जगदीश है, इन बच्चों का मामा हूं !"

"ओह अच्छा…जिनके यहां कल रात मिस्टर अमित और हेमन्त गए थे ?"

 


जाने क्यों जगदीश की इच्छा उनके झूठ में शामिल होने की न हुई अौर सच शायद बहन के प्यार ने न बोलने दिया ! वह चुप ही रहा----गनीमत्त यह हुईं कि उसकी तरफ़ से किसी किस्म का जवाब मिलने का इंतजार किए बिना गोडास्कर ने हेमन्तं की तरफ घूमकर सवाल किया------" क्या आप किसी शंकर नाम के व्यक्ति को जानते हैं ? "

"हेमन्त का दिल बल्लियों उछल पड़ा !

गोडास्कर के पहले ही सवाल से जाहिर था कि वह न सिर्फ सुचि की लाश, तक पहुच चुका है, बल्कि पत्र भी पढ़ चुका हे-उसका दिल किसी ड्रम की तरह बजने लगा था !

"आपने ज़वाब नहीं दिया मिस्टर हेमन्त ?"

"ज---जी-----कौन शंकर-मैँ किसी शंकर को नहीं जानता ।"

"याद कीजिए, दरअसल यह बहुत जरूरी हेै----दिमाग पर जोर डालकर सोचिए, मुमकिन है कि सुचि ने कभी इस नाम के किसी आदमी का जिक्र किया हो ?"

" स...सुचि ने'?"

"जीहाँ । "

हेमन्त को लगा कि गोडास्कर वही सोच रहा है जो यह सुचबाना चाहता था, कामयाबी की चमक को अपने चेहरे पर उभरने से बड़ी मुश्कि्ल से रोका उसने, बोला…"नहीं-तो, मगर--------यह शंकर कौन है और सुचि को इस आदमी का जिक्र मुझसे क्यों करना चाहिए था । "

उसकी बात का जवाब देने के स्थान पर गोडास्कर ने बिशम्बर गुप्ता ललितादेबी और अमित की तरफ देखते हुए सबाल किया----"' अाप में से किसी ने कभी सुचि के मुंह से यह नाम सुना है ?"

" नहीं !" तीनों का संयुक्त स्वर ।

" मैं फिर कहता हूं कि ठीक से याद कीजिए !" गोडास्कर ने अपने शब्दों पर जोर दिया---" 'दरअसल शंकर नाम का यह अादमी अाप सब लोगों को बेगुनाह साबित कर सकता है ।"

"य.......यह तुम क्या कह रहे हो इंस्पेक्टर?" हेमन्त ने बडी ही खूबसूरत एक्टिंग की…..."क.....कौन है शंकर और यह हमें बेगुनाह कैसे साबित कर सकता है ?"

"वर्योंकि असली गुनाहगार वही है !"

"क. . .क्या मतलब, हम कुछ समझे नहीं-पहेलियां-मत बुझाइए इंसपेक्टर, साफ-साफ बताइए कि बात क्या है-कौन शंकक, क्या किया है उसने और इस केस में अचानक ही यह अजनबी नाम कहां से जुढ़ गया ?“

"सुचि के पत्र से । "

"स...सुचि का पत्र--क्या-पुलिस को मिला है, कहाँ से…प्लीज, जल्दी बताइए इंस्पैक्टर कि सुचि ने पत्र कहाँ से डाला है----कहाँ है वो, कहां है उसका पत्र ? "

"सुचि मर चुकी है !"

"क...क्या ?" योजना के मुताबिक हेमन्त, अमित और बिशम्बर गुप्ता मुंह फाडे़ किसी के स्टेचू के समान खडे़ रह गए और ललितादेबी दहाडें मार-मार रोने लगी…खबर सुनते ही हेमन्त के आदेशानुसार उसे इसी तरह रोना था ।

जगदीश अपनी बहन की खूबसूरत एक्टिंग को देखता रह गया ।

स...सुचि ने'?"

"जीहाँ । "

हेमन्त को लगा कि गोडास्कर वही सोच रहा है जो यह सुचबाना चाहता था, कामयाबी की चमक को अपने चेहरे पर उभरने से बड़ी मुश्कि्ल से रोका उसने, बोला…"नहीं-तो, मगर--------यह शंकर कौन है और सुचि को इस आदमी का जिक्र मुझसे क्यों करना चाहिए था । "

उसकी बात का जवाब देने के स्थान पर गोडास्कर ने बिशम्बर गुप्ता ललितादेबी और अमित की तरफ देखते हुए सबाल किया----"' अाप में से किसी ने कभी सुचि के मुंह से यह नाम सुना है ?"

" नहीं !" तीनों का संयुक्त स्वर ।

" मैं फिर कहता हूं कि ठीक से याद कीजिए !" गोडास्कर ने अपने शब्दों पर जोर दिया---" 'दरअसल शंकर नाम का यह अादमी अाप सब लोगों को बेगुनाह साबित कर सकता है ।"

"य.......यह तुम क्या कह रहे हो इंस्पेक्टर?" हेमन्त ने बडी ही खूबसूरत एक्टिंग की…..."क.....कौन है शंकर और यह हमें बेगुनाह कैसे साबित कर सकता है ?"

"वर्योंकि असली गुनाहगार वही है !"

"क. . .क्या मतलब, हम कुछ समझे नहीं-पहेलियां-मत बुझाइए इंसपेक्टर, साफ-साफ बताइए कि बात क्या है-कौन शंकक, क्या किया है उसने और इस केस में अचानक ही यह अजनबी नाम कहां से जुढ़ गया ?“

"सुचि के पत्र से । "

"स...सुचि का पत्र--क्या-पुलिस को मिला है, कहाँ से…प्लीज, जल्दी बताइए इंस्पैक्टर कि सुचि ने पत्र कहाँ से डाला है----कहाँ है वो, कहां है उसका पत्र ? "

"सुचि मर चुकी है !"

"क...क्या ?" योजना के मुताबिक हेमन्त, अमित और बिशम्बर गुप्ता मुंह फाडे़ किसी के स्टेचू के समान खडे़ रह गए और ललितादेबी दहाडें मार-मार रोने लगी…खबर सुनते ही हेमन्त के आदेशानुसार उसे इसी तरह रोना था ।

जगदीश अपनी बहन की खूबसूरत एक्टिंग को देखता रह गया ।

सबसे पहले नियंत्रित होने का नाटक हेमन्त ने किया, बौला----"क...कैंसे------कहां है वह;-----मेरी सुचि की लाश पुलिस को कहां से मिली थी ?"

जो कुछ उसे अब्दुल से पता लगा था वह सब बताने के बाद गोडास्कर ने सुचि की लाश से बरामद पत्र भी उन्हें पकड़ा दिया-----अकेले हेमन्त ही नहीं, बल्कि उसके उपर खुलकर जगदीश सहित सब लगभग सभी ने पढा और उस पर आंसू टपकाने की खूबसूरत एस्टिंग भी की, जबकि गोडास्कर का बता रहा था----" यह पत्र सुचि के गायब होने और आत्महत्या की सारी कहानी खुद सुना रहा है । "

"क्या पत्र यह नहीं बता रहा इंसपेक्टर कि हमारा बयान अक्षरश: सच था ?” हेमन्त ने जोश में भरकर कहा-----"वह बयान जिसपर यकीन न कर रहे थे ? "

"स......सॉरी हेमन्त, मैंने आपके साथ बडी ज्यादती की है----मगर आप तो जानते है गुप्ता जी----हम पुलिस बाले कर ही क्या सकते हैं----सामने खड़ा व्यक्ति झूठा या सच्चा यह जानने का हम पर एक ही पैमाना होता हेै…सबूत-और आपके खिलाफ सबसे ठोस सबूत वह पत्र था जो अब शंकर का लिखा साबित हो रहा है और शायद इस पत्र की मौजूदगी की वजह से ही आपका बयान भी एकदम , अस्वाभाविक, अटपटा और काल्पनिक लग रहा था---अाई एम रियली वैरी सोंरी गुप्ता जी । "

सारे परिवार का दिल चाह रहा था कि - वे बल्लियों उछलें----खुशियां मनाएं----नाचें, मगर उन जज्बातों को बडी मुश्किल से दबाए ललितादेबी ने कहा---"अब कहाँ है मेरी बहू मुझे उसके पास ले चलो।"

"सॉरी मांजी । " गोडास्कर पहली बार सम्मानपूर्वक बोला-----"अभी ऐसा नही हो सकता, आप लोगों को धैर्य रखना पडेगा । "

"क्यों ?" बिशम्बर गुप्ता के मुह से निकला । " लाश चीरघर में है---- पोस्टमार्टम के बाद आपको मिलेगी !"

"हम चीरधर जा रहे हैं, अपनी बहू कीं लाश को खुद यहां लेकर आएंगे । "

"सॉरी गुप्ताजी, अभी अाप ऐसा नहीं का सकते, पुलिस, कानून और व्यवस्था की मदद करनी होगी । "

"हम समझे नहीं । "

गोडास्कर ने एक सिगरेट सुलगाई, गहरे कश के बाद सारा धुआं गटकता हुआ बोला----"बात दरअसल यह है ,गुप्ताजी कि लाश और यह पत्र मिलने का राज अभी तक गुप्त रखा गया है।"

" क्योंकि लोग अभी इकट्ठा हैं, एक जलुस की शक्ल में हैं और उत्तेजित भी हैँ…वे पूरी तरह यह हैं कि सुचि को दहेज के लिए अाप ही ने मारा है…इस वक्त अगर उन्हें, सच्चाई बता दी जाए तो किसी को प्रिय नहीं लगेगी और इसीलिए वे इस सच्चाई पर यकीन भी नहीं करेंगे बल्कि उल्टे भढ़क उठेंगे----"पुलिस पर आपसे मिलीभगत या रिश्वत का इलजाम लगाएंगे…तोड़-फोढ़ और हिंसा भी भडक सकती है-----इस स्थिति से बचाने के लिए पुलिस के उच्चाधिकारियों ने यह निश्चय किया कि अाज का दिन निकल जाने दिया जाए--जुलूस आदि निकालने के बाद लोग ठंडे पढ़ जाएंगे------अपने-अपने घरों में जाकर सो जाएंगे ।"

"फिर ?"

"कल सुबह जब लोग सोकर उठेंगे तो अखबार में उन्हें सुचि की ताश के फोटो सारी कहानी और यह पत्र भी छपा मिलेगा उस वक्त लोगों को हकीकत जल्दी स्वीकार हो जाएगी !"

"ऐसा क्यों ?" बिशम्बेर गुप्ता ने कहाँ…"आंदोलन, हिंसक वारदातें-तोड़-फोड़ और पुलिस पर इलजाम आदि तो वे कल भी लगा सकंते हैं ?"

"हरगिज नहीं-उत्तेजित भीड़ और एक व्यक्ति की मानसिकता में जो फर्क होता' है उसे आपको समझना चाहिए-----इस वक्त हम एक-एक व्यक्ति को अलग-अलग सच्चाई बता नहीं सकते और भीड़ सुनेगी नहीं, समझेगी नहीं-कल सुबह अलग--अलग, अपने--अपने घरों में जब लोग सच्चाई जानेंगें और समझेंगे भी…ऐसा जाहिर करेंगे जैसे आज के जलूस में वे थे ही नहीं—

कोई सडक पर नहीं अाएगा, भीड नहीं लगेगी तो बलवा भी नहीं होगा-यदि किसी छोटे-मोटे संगठन ने भीड जुटाने की कोशिश भी की तो उसे जासानी से दबाया जा सकता है ।"

"यानी आज हम सारे दिन अपने खिलाफ नारे लगने, दें-गातियां सुनते रहें लोगों का यह सब कहना सहन करते रहे जो हमने नहीं किया ?"

"मजवूरी है गुप्ताजी, इतनी मदद तो कानून की आपकी करनी ही चाहिए और फिर, दूसरे लोगों की तरह अगर हकीकत अभी आपको भी नहीं बताईं जाती तब भी तो यह सब आपको सहन करना ही पडता ?"

'"तो फिर हमे हकीकत बताई ही क्यों गई ? "

" उच्चाधिकारियों की बैठक का नतीजा यह निकला कि , जब सच्चाई यह पत्र है तो गुप्ताजी के बेगुनाह परिवार को बेवजह उस तनाव में क्यों रखा जाए जिसमें रखने का कमसे कम हकीकत खुलने के बाद पुलिस को कोई हक नहीं है, अतः जिस क्षण से यह स्कैंडल उठा है उसी क्षण से अाप लोग जिस तनाव में हैं उससे मुक्त करने के लिम केवल आपको वास्तविकता बताने का निश्चय किया गया । "

" मगर चीरघर तो हम जा सकते है? "

"में एक बार फिर क्षमायाचना के साथ कहूंगा कि नहीं-----शहर के ज्यादातर लोग अापको और अापके परिवार के लोगोंको जानते हैं-यदि आप किसी भीढ़ में धिर गए या 'चीरघर पर आपको किसी ने देख लिया तो स्थिति बिगड सकती है ।"

" मगर मुझे तो हुई नहीं जानता । "

 


जगदीश ने कहा---“में तो चीरघर जा सकता हूं ?" एक पल जाने क्या सोचा गोडास्कर ने, फिर बोता---"अापजा सकते हैं, परंतु याद रखें कल सुबह से पहले न तो आपकी किसी से हकीकत का जिक्र करना ,न ही यह बताना है कि गुप्ता परिवार से अापका क्या संबंध है और यह सब कानून की मदद करने के साथ-साथ आपको अपनी हिफाजत के लिए भी करना है । ' ‘

"जी ! " जगदीश ने सिर्फ इतना ही कहा !

जेब से सुचि के पत्रों का गट्टा निकालकर हेमन्त की तरफ बड़ाते हुए गोडास्कर ने कहा----"' अपनी अमानत संभालिए मिस्टर हेमन्त--------इन्हें पढ़ने के बाद इतना ही कह सकता हूं कि मुझे आपके दाम्पत्य जीबन पर फख्र है-इत्तने मधुर संबंध कम लोगों के होते हैं ।"

"थैक्यू !"कहकर हेमन्त ने पत्र ले लिए !

यह सोचकर उन सबकी बाछे खिल गई थीं कि पत्रों के रूप में उनके विरुद्ध एकमात्र जो सबूत गोडास्कर के कब्जे में था उन्हें भी उसने लौटा दिया है-अपनी खुशी को बडी मुश्किल से दबाए अमित ने पूछा--"क्या उन दोनों पत्रों के संबंध में एक्सपर्ट की रिपोर्ट आ गई है ?"

"जी हां और वह भी आपकी फेवर में है । "

" क्या मतलब ?"

अपनी रिपोर्ट में एक्सपर्ट ने साफ लिखा है कि दोनों पत्र भिन्न व्यक्तियों द्वारा लिखे गये है !"

हेमन्त का दिल-चाहा कि झपटकर गोडस्कर का मुहं चूम ले !

" हा---हा---हा !" हेमन्त गगनभेदी कहकहों के साथ हंस रहा था--खुश सभी थे, मगर हेमन्त तो पागल ही हुआ जा रहा था-गोडस्कर के कुछ देर बाद जगदीश चीरघर चला गया और उसके जाने के बाद तो जैसे वहां दीबाली मनाई गई ।"

हेमन्त निरंतर हंसता चला गया ।

इतनी देर तक कि बिशम्बर गुप्ता चौंक पडे, हेमन्त को झंझोढ़ते हुए चीख पडे़ वह----"हेंमन्त---हेमन्त---संभालो खुद को-खुशी से कहीं पागल ही न हो जाना । "

" हा---हा---हा.......आपने देखा बाबुजी…मैँ कहता था न कि मेरी स्कीम सफल होगी-----मैं कामयाब हो गया------गोडास्कर हार गया बाबूजी--------आपकी पुलिस, आपका कानून हार गया-----वही सोच रहे हैं जो मैंने चाहा. . .हा. . .हा. . .मैंने कहा था न बाबूजी कि पुलिस और कानून उस झूठ को सच मानते हैं जिसके सबूत है. . . .उस सच को झूठ जिसके सवूत नही । "

"मान गए कि-तुम ठीक कहते थे । " बिशम्बर गुप्ता बोले----"' खुद क्रो संभालो बेटे------झूठ को सच साबित करके इतना खुश होने की जरूरत नहों-----खुश उस दिन होना जब सच को सच साबित करो------तुम्हें समय मिला है-----यह जानने का समय कि सुचि किस चक्कर में उलझी हुई थी-------बीस हजार का उसने क्या किया-------अगर वह ब्लैकमेल होरही थी तो , ब्लेकमेलर कौन है-उसने आत्महत्या क्यों कि ?"

"हां । " हेमन्त ने चौंककर एक झटके से कहा----"मैं यह सव पता लगाकर रहूंगा--------ब्लैकमेलर के दुकड़े-दुकड़े कर दूंगा मैं----------अपनी सुचि की मौत का बदला उससे लेकर रहूंगा--अब मुझे मौका मिला है, सुचि के हत्यारे को मैं पाताल से भी खोज निकालूगा ।"

बिशम्बर गुप्ता के चेहरे पर छाया तनाव कम होता चला गया ।

जगदीश रात के आठ बजे चीरघर से लौटा उसने बताया कि पोस्टमार्टम हो चुका है पोस्टमार्टम रिपोर्ट कल पता लगेगी । खुशीसे झूमते हुए बिशम्बर गुप्ता ने कहा-----" पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में होता ही क्या है-डाक्टर सिर्फ यह बताता है कि मुत्यु कब और कैसे हुई-----जाहिर है कि कल रात किसी समय सुचि ने गले में फंदा डालकर आत्महत्या की…रिपोर्ट भी यहीँ बताएगी यह नहीं कि आत्महत्या सुचि ने अपने कमरे में की या उस पेड़ पर लटककर अत: हमें किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है ।

बात बिशम्बरं गुप्ता को जमी ।

सारी रात विना किसी नए हंगामे के आराम से गुजर गई !

सुबह !

पाच बजे !

नियमानुसार बिशम्बर गुप्ता को बिस्तर छोड़ देना चाहिए था परंतु आज ऐसा नहीं हुआ--परिवार के अन्य सदस्यों कीं तरह लिहाफ में दुबके वे अब भी लम्बे-लम्बे खरटि भर रहे थे और ऐसा शायद इसलिए था, क्योंकि पिछली रात इनमें से कोई भी सो नहीं पाया था, बल्कि अमित वेचारा तो दो रात का जगा हुआ था ।

दूसरे !

जब वे सोए, दिमाग चिंतामुक्त भी थे ।

हां-जगदीश की स्थिति जरूर भिन्न थी, सो दूसरी बार~कॉलबेल के चीखने पर उसकी नींद टूटी--जल्दी से उठा । "

"जीजाजी------जीजाजी !" उसने विशम्बर गुप्ता को झंझोडा़ तो वह हड़बड़ाकर उठ बैठे------इसके बाद ललिता, अमित और हेमन्त को भी उसी तरह झंझोड़क़र उठाया गया…यह सोचकर सभी के चेहरों पर आंतक फेल गया कि इतनी सुबह कौन हो-सकता है, जबकि उस आतंक को देखकर हेमन्त ठहाका लगा उठा, बोला------" चेहरों पर बारह क्यों बजा रखे हैं अब हमारे लिए डरने जैसी बात नहीं है !"

कोई कुछ न बोला, कॉलबेल पुन: घनघनाई ।

"मैं खोलता हूं दरवाजा, इंस्पेक्टऱ शायद आज का अखबार लेकर आया है । " कहने के बाद वह दरवाजे की तरफ बढ़ गया। '

जाने क्यों--अज्ञात अांशकाओं से धिरे उनके दिल धाड़-धाड़ करके बज रहे थे----चेहरों पर हवाइयां और मन कुछ बोलने को न कर रहा था !

"क...क्या हुआ बाबूजी---कौन अाया है ?" हाथ दाएं-बाएं फैलाए अपने इर्द--गिर्द टटोलती रेखा ने ड्राइंगरूम में कदमं रखा-तड़पकऱ ललितादेबी उसकी तरफ झपटीं और सहारा देती हुईं बोली----"तु-बिस्तर से क्यों उठ गई बेटी ? "

उधर !

दरवाजा खोलते ही हेमन्त को गोडास्कर के दर्शन हुए है हेमन्त के दिमाग में एक ही बात आई--------------कम्बख्त सोता भी है या नहीं ???

"हैलो मिस्टर हेमन्त ! " गोडास्कर का व्यंग्यात्मक स्बर ।

"हैलो, गुड मार्निंग इंस्पेक्टर । " कहते हुए हेमन्त की नजर उसके साथ आई फोर्स पर पडी़ और इस, क्षण उसका

माथा ठनक गया-इतनी फोर्स के साथ वह पहली बार अाया था-मकान के ठीक सामने दो जीपें और एक पुलिस एम्बेसडर खड़ी थी ।

हेमन्त के मुंह से अभी कोई आबाज निकल पाई थी कि गोडास्कर ने अपनी बगल में खडे़ अफसर का परिचय दिया ---- " इनसे मिलो हेमन्त , यह हमारे एस.पी सिटी आर.एन शुक्ला हैं !"

दिमाग घूम गया हेमन्त का।

असामान्य फोर्स और एस. पी. की मौजूदगी ने उसे हजार शकाओं में घेर लिया, परंतु स्वयं को सामान्य दर्शाते हुए हाथ जोइ दिए । गोडास्कर ने बत्ताया------"इन्हीं की दरियादिली कल सुचि की लाश की बरामदगी की सूचना सिर्फ तुम्हें दी गई थी । "

"ह.....हम आपके एहसानमंद हैं शुक्लाजी ।" हेमन्त बड़ी मुश्किल से कह सका---"दरअसल सुचि के गायब होने से ही क्योकि सारा शहर हम पर शक कर रहा था, इसीलिए हम लोग जबरदस्त टेंशन में थे और अापने हमें उस टेंशन से मुक्त किया !*

मिस्टर शुक्ला कुछ बोले नहीं ।

जिस आज में वे हेमन्त को घूर रहे थे उस अदाजं को देखकर हेमन्त के प्रान खुश्क हुए जा रहे थे , जबकि गोडास्कर ने कहा-----" क्या हम लोंगों को यहीं खड़ा रखेंगे मिस्टर हेमन्त ?"

"ओह सॉरी…अाईए , अंदर अाइए ।"

इस तरह, वे लोग अंदर प्रविष्ट हो गए-हेमन्त को लगा कि कुछ सशस्त्र सिपाही दरबाजे पर रुक गए हैं----उसने महसूस किया कि पुलिस मकान के चारों तरफ घेरा डाल रही हेै----ऐसा महसूस करते ही उसके रोंगटे खड़े हो गए थे कि इस संबंध में लह कुछ पूछ नहीं सकता था !

वे ड्राइंगरूम में पहुंचे ।

बिशम्बर गुप्ता जगदीश ललितादेबी , रेखा और अमित वहां किसी संगतरांश द्वारा तैयार कीं गई मूर्तियों के समान खडे़ थे, एकाएक रेखा ने कहा-----"वया बात है मम्मी…कोई . खतरा तो नहीं हैं ?"

हेमन्त के छक्के छुट गए, यह सोचकर वह कांप उठा कि पुलिस के आगमन से अनंभिज्ञ रेखा कहीं कोई ऐसा वाक्य मुंह से न निकाल दे, जो उनकी सभी कारगुजारियों का पर्दाफाश क़र दे, अत जल्दी से बोला----"बैठिए एसपी साहब, अाप भी बैठिए इंस्पेक्टर ।"

"क....क्या पुलिस अाई है मम्मी ?"

"हां बेटी ?" ललितादेवी ने कहा---"'मगर अब डरने की कोई बात नहीं है, पुलिस बहू की आत्महत्या का असली कारण जान चुकी है !"

शुक्ला या गोडास्कर में से कोई भी बेठा नहीं था, व्यग्र हेमन्त ने सवाल किया-----"आज का अखबार सबके सामने हमारी स्थिति साफ कर देगा न इंस्पेक्टर ? "

"बेशक !" गोडास्कर ने कहा---"'मगर सुबह का नहीं, शायद आज शाम का अखबार सारे शहर के सामने इस केस की असलियत रख देगा !"

" शाम का क्यों, आपने तो कहा था कि अाज सुबह का अखबार ?"

" अभी हम लोगों की इनवेस्टीगेशन पूरी नहीं हो सकी है मिस्टर हेमन्त ! " उसका वाक्य बीच ही में काटकर गोडास्कर ने कहा------"हम लोग आपके मकान की तलाशी लेना चाहते हैं।"

"ह...हमारे मकान की । " हेमन्त उछल पडा---" क....कयों ?"

"इनवेस्टीगेशन पूरी करने के लिए । "

"म. ..मगर । हकलाते हुए बिशम्बर गुप्ता बोले…"हमारे मकान की तलाशी से अब आपकी इंनवेस्टीगेशन का क्या ताल्लुक रह गया हेै…आप लोग तो जान चुके है कि...।"

"बात दरअसल यह है गुप्ताजी कि अभी तक हमे शंकर का कुछ पता नहीं लगा है, मुमकिन है कि सुचि ने मकान में कहीं शंकर के बारे में कुछ लिखकर छोड़ रखा हो ? "

"म.....मगर तलाशी तो तुम कल ही ले चुके हो ? "

"केवल सुधि के सामान और उसके कमरे की ।" गोडास्कर का सपाट लहजा---"'जबकि आज हम आपके पूरे मकान की तलाशी अच्छी तरह लेना चाहते हैं "

"उससे क्या होगा ?"

 


"क्या आपको हमारे तलाशी लेने से कोई आँब्जेक्शन है ? " काफी देर से खामोश खडे़ शुक्ला ने एकाएक पूछा तो हेमन्त बोल उठा----"ब...बिलकुल नहीँ…हमें भला क्या आँब्जेक्शन हो सकता है, परंतु...... . । "

" परंतु ? "

"ब.. .बात कुछ समझ में नहीं अाई अगर शंकर के बारे में सुचि ने कुछ लिखकर छोड़ रखा होता तो उसके कमरे या सामान में ही होता-----"मकान की तलाशी से क्या होगा ?"

"आप इन सवालों पर सोचकर अपना दिमाग खराब न करें !" शुक्ला का स्वर बेहद कठोर था-----"यह सब सोचना पुलिस का काम है अाप सिर्फ यह बताइए कि हमें तलाशी की इजाजत दे रहे हैं या सर्च वारंट की जरूरत है ? ”

"सर्च वारंट का अंड़गा अपने बचाव के लिए अपराधी डालते हैं सर । " गोडास्कर ने कहा---" जो बेगुनाह हो, उन्हें भला पुलिस को सहयोग देने मैं क्या आपत्ति हो सकती है,क्यों मिस्टर हेमन्त--क्या मैं गलत कहरहा हूं ?"

"ब...बिलकुल नहीं । " अपने ही शब्दों के जाल में फंसे हेमन्त को कहना पडा…"हमे भला क्यों आपत्ति होने लगी-अाप शौक से तलाशी लीजिए !"

"काम शुरु करो गोडास्कर ।" शुक्ला ने उसे हुक्म दिया और गोडास्कर ड्राइंग-रूम में मौजूद आधे सिपाहियों को लेकर मकान के भीतरी भाग में चला गया-हेमन्त ने महसूस किया कि जो सिपाही यहां बचे हैं वे परिवार के सभी सदस्यों के चारों तरफ ऐसे अंदाज में फैल गए हैं जैसे घेरे में ले रहे हों !!!!

हेमन्त को आसार अच्छे नहीं लगे !!

पुतिस की कार्यवाही और रवैया इतना संदिग्ध था कि जगदीश सहित सभी के चेहरे खुद-ब-खुद 'फक्क' पड गये-----अमित और ललिलादेबी के चेहरों पर हवाइयां उड़ रहीं थी-------बिशम्बर गुप्ता को काटो तो खुन नहीं !

रेखा बेचारी सस्पैंस में फंसी खड़ी थी !

हेमन्त को लग रहा था कि कहीं-न-कहीं-कुछ-न-कुछ गड़बड़ जरूर होगई है ।

लेकिन कहां ?

क्या ?

उसकी समझ में कुछ न आ सका ।

सारी स्कीम में कहीं भी तो कोई 'लूज प्वॉइंट' नहीं था----योजना पूरी तरह कामयाब थी----कहीं,, किसी गडबड़ की संभावना नहीं ----- फिर, पुलिस के इस बदले हुए रवैये और संदिग्ध कार्यवाही की आखिर वजय क्या है ?

करीब तीस मिनट बाद जब गोडास्कर ने ड्राइंगरूम में कदम रखा तब उसकी भूरी आंखों में गजब की चमक थी, होंठों पर सफलता से लबलंबाई मुस्कान !

शुक्ला ने पूछा-----"कुछ मिला गोडास्कर ?"

"इन्हें ऊपर ले चहिए, सर, मकान की छत पर ।"

" क.....क्या है वहां ?" हेमन्त पागलों की तरह सीख पड़ा ।

गोडास्कर ने बडे शांत स्वर में कहा…" "चलकर अपनी आंखों से देखलें तो बेहतर होगा ।"

इस तरह घर का हर सदस्य अजीब सस्पैस में फंस गया ।

उन्हें ठीक इस तरह छत पर ले जाया गया जैसे वे सब पुलिस की हिरासत में हों---------सूरज शायद उदय होना चाहता था-----पूर्वी गगन लालिमा से ओत प्रोत हो चुका था और वातावरण में फैल चुका था सुरमई प्रकाश ।

" पानी की उस टंकी को चैक करिए सर । ' गोडास्कर ने शुक्ला को टॉर्च देते हुए कहा-----"सारी गुत्थियां खुद-ब खुद सुलझ जाएंगी । "

सस्पेंस की ज्यादती बिशम्बर गुप्ता और हेमन्त आदि को पागल किए दे रही थी----दिल जोर …जोर से पसलियों पर चोट कर रहे था-----यह बात उनकी समझ में न आकर दे रही थी कि पुलिस आखिर चाहती क्या है…एकाएक ही उनकी स्थिति हिरासतियों सी किस बजह से होगई है और पानी की उस टंकी में आखिर है वया़ ?

आवाज़ किसी के मुंह से न निकली । शुक्ला लोहे की सीढी़ पर चढ़ गया--पानी की टंकी का ढक्कन गोडास्कर ने शायद उसी के लिए खुला छोड़ दिया-था--------शुक्ला ने टॉर्च की रोशनी में टंकी का निरीक्षण किया, कुछ देर तक ध्यान से न जाने क्या देखता रहा-----हेमन्त सस्पेंस के कारण मरा जा रहा था, जबकि एकाएक शुक्ला के मुंह से निकला------मार्वलस गोडास्कर-इन चीजोंकी यहां मौजूदगी ने सब कुछ साबित कर दिया ।

" क्या है वहां !" आतंक और दहशत में फसा हेमन्त इस बार चीख ही जो पड़ा--"क्या साबित हो गया है, आप लोग हमें भी तो कुछ बताइए ।"

"अब अनजान बनने की कोशिश से कोई फायदा नहीं मिस्टर हेमन्त ।" शुक्ला सीढ़ी से सीधा छत पर कुदता हुआ बोला----" तुम्हारी चालबाजियां, सारी योजनाएं धरी रह रह गई ।"

"'क्या बक रहे हैं अाप ? " हेमन्त दहाड़ उठा----" कैसी स्कीम ? क्या है टंकी में ?"

"अभी मालुम हो जाता है ।" कहने के बाद शुक्ला ने सिपाहियों को पानी की टंकी में मौजूद सामान निकाल लेने का हुक्म दिया और जब सिपाहियों ने हुक्म का पालन किया तो हेमन्त ही नहीं बल्कि बिशम्बर गुप्ता जादि सभी को लकवा मार गया ।

र्किकर्तंव्यविमूढ़ से खड़े रह गए वे ।

टंकी से सुचि अटैची ही नहीं, बल्कि विशम्बर गुप्ता का लाइसेंसी रिवॉल्वर' भी निकला, हेमन्त हलक फाड़कर चिल्ला उठा--" य.....ये सब यहां, पानी की टंकी में ?"

" जी जीहां, आपकी पानी की टंकी में !"

"य. . .ये सब कैेसे हो गया…ये सारा सामान टंकी में कहाँ से आ गया, हम कुछ नहीं जानते इंस्पेक्टर भगवान कसम इस बारे में हम . . ।"

"श...... शटअप !" शुक्ला इतनी जोर से दहाड़ा कि हेमन्त सकपकाकर रह गया-गुप्ता, ललिता, अमित और रेखा कांप गए-जगदीश हक्का-बक्का !"

"तुम लोगों का खेल खत्म हो चुका है। " शुक्ला कहता चला गया--" अब बेहतरी इसी में है कि हर किस्म का नाटक करना वंद करदो।"

"न-नाटक ?" बिशम्बर गुप्ता कह उठे----" हम कोई नाटक नहीं कंर रहे हैं शुक्ला जी, भगवान कसम खाकर कहते हैं, हम नहीं जानते कि चीजे टंकी में कहां से अा गईं !"

"भगबान की कसम खाकर तो आप यह भी कह सकते है कि आपने सुचि की हत्या नहीं की---- अमित और हेमन्त लाश को पेड़ पर टांग कर नहीं अाए । "'

बिशम्बर गुप्ता स्टेचू में बदल गए ।

सभी के साथ-साथ वहुत जोर से गड़गडाकर बिजली हेमन्त के दिलोदिमाग पर भी गिरी, परंतु उसके मुंह से निकला-----'"क-क्या मतलब ?"

शुक्ला ने कहा-----"इसे मतलब समझाओ गोडास्कर, यह बेवकूफ अब भी यही समझ रहा है कि हम उसी गलतफहमी के शिकार हैं, जो इसने फैलाई थी ।"

गोडास्कर ने कहना शुरू किया----" सचमुच तुम लोगों ने केबल एक स्कीम बनाई मिस्टर हेमन्त बल्कि उस पर ऐसी सफाई से अमल भी किया कि मैं धोखा खा गया-----यह स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं कि लाश मिलने पर मैं तुम्हें निर्दोष समझने लगा-था----जिस धारा में पुलिस को तुम बहाना चाहते थे उसी में बहता हुआ यह समझ बैठा कि सुचि ने शंकर नाम के ब्लेकमेलर से त्रस्त होकर आत्महत्या कर ली है, सैं तुम्हारी कल्पनाओं के घढ़े गए काल्पनिक शंकर की तलाश में जुट गया था, परंतु तभी पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ने सारी कलई खोल दी ?"

'"प…पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ?"

" जी ,हां ।" गोडास्कर का स्वर व्यंग्य में डूब गया----"रिपोर्ट में साफ लिखा था कि सुचि की हत्या दस्ताने युक्त हाथों ने गला घोंटकर की है, ,रस्सी का फंदा जीती-जागती सुचि के गले में नहीं, बल्कि लाश के गले में डाला

गया ।"

"य. . .यह आप क्या कह रहे हैं ?"

"रिपोर्ट पढकर मैं चौंक पड़ा, क्योंकि अगर यह हत्या थी तो सुचि द्वारा लिखा गया इतना लम्बा सुसाइड नोट कहां से आ गया------मैं फोरन पोस्टमार्टम बाले डॉक्टर से मिला---------उसने दुढतापूर्वक अपनी रिपोर्ट का समर्थन करते हुए कहा कि यह केस किसी भी हालत में आत्महत्या का नहीं हैं, क्योंकि यदि पेड़ पर फंदे में झूलने के बाद सुचि ने अपने पैरों से चट्ठे की ऊपरी ईटें हटीई होती तो उसके पैर में कहीं चोट का निशान जरूर होता

जबकि लाश के पैर के अंगूठे पर कहीं हल्की खरोंच तक नहीं है---------डॉक्टर ने दावा किया गला घोंटकर सुचि की हत्या करने के बाद हत्यारे ने लाश के गले में फंदा डालकर पेड़ पर इस मंशा से, इस ढंग से लटका दिया है कि पुलिस इसे आत्महत्या का मामला समझे----------वास्तव में सुचि रस्सी के फंदे से नहीं, बल्कि किन्हीं मजबूत हाथों द्वारा गरदन दंबाए जाने के कारण मरी है ।"

हेमन्त मूर्ति के समान खड़ा रह गया ।

गोडास्कर कहता चला जा रहा था-------डॉक्टर के दावे ने मेरा दिमाग घुमाकर रख दिया, क्योंकि उसकी रिपोर्ट पर संदेह नहीं किया जा सकता और अगर यह आत्महत्या नहीं थी तो सुचि के अंतिम पत्र का क्या मतलब था-----डाँक्टर के यहां से उठकर मैं सीधा राइटिंग एक्सपर्ट के पास गया-अपनी रिपोर्ट में सिर्फ उसने यह लिखा था कि मेरे द्वारा दिए गए दोनों पत्र भिन्न व्यक्तियों ने लिखे हैं…मैंने उससे पूछा कि इनमें से कौंन-सा पत्र "वास्तविक राइटिंग'' में है और कौन-सा नकल की गई राइटिंग में एक्सपर्ट ने तुम्हारा पत्र निकालकर कहा ---कि यह फर्जी है, बस-----फिर क्या था-----मैं ये समझ गया कि तुममे से कोई राइटिंग की नकल मारने में माहिर हेै------चैक करने वाद एक्सपर्ट ने यह भी बता दिया कि लाश से बरामद पत्र उन्हीं हाथों ने लिखा , जिन्होंने तुम्हारा दिया पत्र-----सुचि की वास्तविक राइटिंग को नकली और नकली को वास्तविक साबित करने की तुम्हारी कोशिश की कलई खुल गई-----मेरे सामने शीशे की तरह यह बात साफ थी लाश तुम्ही ने वहां पहुंचाई है और सुसाइड नोट वाला पत्र भी तुम्हीं ने लिखवाकर वहां रखा है और उसका मजमून पुलिस को वास्तविक लाइन से भटकाने वाला, कल्पनाओं का सहारा लेकर बनाया गया । "

खेल--खत्मा !

ये दो शब्द हेमन्त के साथ-साथ बिशम्बर, ललिता, अमित और रेखा के जेहन से टकराए, जबकि गोडास्कर अब भी कहता चला जा रहा था---''मैँ समझ गया कि मुजरिम अाप लोग हैं, ब्लेकमेलिंग की कहानी सिरे से काल्पनिक है, मगर अभी सबूत-जुटाने वाकी थे------मैं बस अड्डे पर गया--------

पुछताश--करने पर पता लगा कि बुलंदशहर से खुर्जें तक के जो टिकट तुमने मुझे दिए वह उस बस के थे, जो सुबह साढ़े चार बजे बुलंदशहर से होती हुई खुर्जा जाती है, उसके कंडक्टर का कहना है कि कल बस में बुलंदशहर से खुर्जा तक की दो सवारियां कम थीं-खुर्जे बुंलदशहर के टिकट तुमने खुर्जें से यहां अाई दो सवारियों से खरीदे थे----इसी तरह एक ऐसे कार मालिक ने जिसके पास गैराज नहीं है, पुलिस में रपट लिखवाई कि रात जब उसने फुटपाथ पर गाडी खड़ी की थी तो मीटर में रीडिंग और थी…सुबह कुछ और अत: उसे शक है कि रात के समये किसी चोर ने फुटपाथ से गाड़ी चुराई, सारी रात इस्तेमाल की और सुबह होने से पहले ही यथास्थान खडी कर दी-----यह गाडी मैंने डॉक्टर अस्थाना को दिखाई, उनका बयान है कि रात पेशेंट को इसी गाड़ी में लाया गया था--इन सब जानकारियों के बाद मेरे दिमाग में बिलकुल स्पष्ट हो गया कि लाश को वहां पहुंचाने के लिए अापने इसी गाडी का इस्तेमाल किया, परंतु तुम्हारी पूरी कार्यप्रणाली अब भी ठीक से नहीं समझ सका था----सुचि की उस अटैची की तलाश थी मुझे, जिसे तुम लोग गायब बता रहे थे-अब से करीब डे़ड़ घंटा पहले एस.पी. साहब की कोठी पर जाकर इनसे मिला-सारी सिच्युएशन बताईं------इन्होने कहा कि अटैची गुप्ता के मकान ही में कहीं होनी चाहिए---सो आपके सामने है।"

 
सबकी टांगें कांप रहीं थी, बोल किसी के मुंह से न फूटा ।

"और अब । " गोडास्कर ने गहरी सांस लेने के बाद कहा-----" मैं इनके द्वारा लाश यहीं से उस पेड़ तक पहुंचाई जाने की सारी वारदात ज्यों---की--त्यों सुना सकता हूं सर ।"

" सुनाओ ।" शुक्ला ने कहा--कम-से-कम इन्हें भी तो पता चले कि सबूत किस हद तक सच बोलते हैं, भरपूर चालाकी के बावजूद गलतियां कहां रब जाती हैं ?"

"मकान की तलाशी में हमे एक स्ट्रैचर जो शायद इनके सामने रहने वाले बंसल का है…तिरपाल, जिसमें से इतना बड़ा कटा हुआ है कि उसे स्ट्रेचर की बाहियों में डालकर आराम से स्ट्रेचर को दोमंजिला बनाया जा सकता है----मिले हैं

ये दोनों चीजें साफ कह रही हैं कि ललितादेवी की बेहोशी के ड्रामे के साथ यहा से सुचि की लाश निकाली गई-पिंछली रात सुचि की हत्या करने बाद इन्होंने.......….... । "

" यह गलत है, झूठ है । " एकाएक अमित चिंल्ला उठा-----"हमऩे भाभी को नहीं मारा-----भगवान कसम हमने भाभी को नहीं मारा ।"

" क्या यह भी झूठ है कि रेखा किसी की भी राइटिंग मारने में एक्सपर्ट है----झूठ मत बोलना मिस्टर अमित-मैं दीनदयाल से मिलकर इस बारे में सवाल का चुका हूं----वह मुझे बता चुके हैं, बातों बातों में एक दिन सुचि ने उन्हेॉ बताया था कि उसकी ननद आश्चर्यजनक रूप से किसी की भी

राइर्टिग की नकल उतार देती हे ।"

"यह सच है । " अमित चिल्लाया----"यंह भी सच है एस.पी. साहब कि कल रात हमी ने भाभी की लाश यहां से पेड़ तक पहुंचाई-रेखा का लिखा हुआ पत्र छोड़ा-पुलिस को भ्रमित करने की कोशिश की…यह सब सच है, मगर'यह गलत है कि हमने भाभी की हत्या की !"

"अपनी इस बकवास का मतलब तो शायद तुम्हारी भी समझ में नहीं आ रहा होगा यंगमेन । " शुकला ने कहा-----"जब कत्ल तुमने नहीं किया तो लाश वहाँ पहुचा, पुलिस को धोखा देने की कोशिश क्यों की--यह अटैची और रिवॉल्वर टंकी में कैेसे बरामद हुए हैं ?"

"हम नहीं जानते, यकीन करो हम कुछ नहीं जानते------भाभी की लाश हमें उनके कमरे में लटकी मिली थी-----जाने किसने उन्हें मारकर बहाँ टांग दिया----जाने किसने उनका सामान इस टंकी में पहुचा दिया, हम कुछ नहीं. . . ।"

"शटअप----बकबास बंद करों । " शुक्ला चिल्ताया-------"इन्हे गिरफ्तार कर तो गोडास्कर, अब समय गंवाने की कोई वजह बाकी नहीं रह गई है-हथकडियां पहनाअो । "

"म-मुझे क्यों ?"' जगदीश मिमिया उठा ।

' "हत्या करते या ताश को टिकाने लगाते समय तुम इनके साथ भले ही न रहे हों, मगर इनके झूठ में जरूर शामिल थे-----तुमने झूठ बोला कि कल रात ये तुम्हारे पास खुर्जा गए ।"

" नो सर----मैंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया ।" बुरी तरह हड़बडाए हुए जगदीश ने कहा;-----"अ...आप इंस्पेक्टर गोडास्कर से पूछ सकते है-----इन्होने मुझसे सवाल किया जरुर था, मगर मैंने ज़वाब नही दिया, मैं चुप रहा था । "

"क्यों इंस्पेक्टर ?"

"यह ठीक कह रहे हैं सर, इन्होंने अपनी जुबान से झूठ नहीं बोला।"

*ठीक है, इन्हें छोड़कर सबको हथकडि़यां पहना दो ! " जगदीश के चेहरे पर राहत फैल गई, जबकि हेमन्त, ललिता और विशम्बर गुप्ता के चेहरे पीले ज़र्द होते चले गए-रेखा की टांगें कांप रहीं थीं और अमित का चेहरा भभक रहा था, बिशम्बरं गुप्ता हारे हुए स्वर में बोले-----"मैं कहता था न हेमन्त कि कानून से टकराने की कोशिश मत करो…जीत उसी की होती है, अब शायद हमारे लिए यह साबित करना , असंभव हो जाएगा कि हमने बहू की हत्या न्हीं की । "

हेंमन्त के होश उड़े हुए थे, जीभ तालू मे जा छुपी !

बिशम्बर गुप्ता, ललितादेबी, रेखा और हेमन्त के बाद गोडास्कर अमित के हाथ में हथकडियां डालने के लिए उसकी तरफ बढ़ा------अमित की स्थिति उन सभी से भिन्न थी----- भय से कांप रहे थे, जबकि अमित गुस्ते की ज्यादती के कारण-उनके चेहरे पीले थे, जबकि अमित का चेहरा-------ज्वालामुखी के समान भभक रहा था----गोडास्कर के नजदीक आते ही उसने ऐसी हरकत की कि --जिसकी यहां मौजूद लोगों में से किसी को ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी------होश तब आया जब गोडास्कर का रिवॉल्वर उसी की कनपटी से सटाए अमित गुर्रा रहा था-----"अगर कोई भी हिला तो मैं इंस्पेक्टर के भेजे के परखच्चे उड़ा दूंगा----खबरदार, कोई अागे न बढे!"

सभी अवाकृ हैं !

हतप्रभ !

शुक्ला तक दंग रह गया ।

अमित ने यह हरकत विजली की-सी गति से की था-इतनी तेजी से कि कई पल तक तो सब हक्के-बक्के रह गए, कोई कुछ समझ ना सका और जब अमित की हरकत समझ में आई तो बिशम्बर चीख पड़े-------ये क्या बेवकूफी है अमित, गोडास्कर को छोड दो ।"

" न-नहीं । अमित चिंल्लाया--"यह बेबकूफी नहीं बाबूजी----अब यहीं होगा, मैं अपनी बहन पर फैंके गए तेजाब और अपने परिवार पर किए गए अपमान का बदला लेकर रहूंगा-----पता लगाकर रहूंगा कि ये राज क्या है ।"

"होश में आओ अमित । चुपचाप हथकड़ी पहन लो । "

"क्यों पहन लूं हथकडी ?" भावावेश में वह दात भौंचकर चीख पड़ा----"क्या किया है मैंने--क्या हमने भाभी को मारा है-अगर नहीं तो क्यों पहन लूं हथकडी-----जब हमने भाभी को नही मारा है तो क्यों-क्यों बाबूजी ?"

" ये लोग हमें मुजरिम…!"

"इनके समझने से क्या होता है और अगर है समझते हैं तो समझते रहे…अमित नहीं डरता-अब यहीं होगा बाबूजी-अमित सचमुच मुजरिम बनेगा----हिलो मत गोडास्कर वरना भूनकर रख दूंगा----लाश बिछा दूंगा!"

''उफ ।" बिशम्बर _गुप्ता तड़प उठे !

'"यह वया होगया है भगवान----अमित को तुम ही समझाओ हेमन्त-पागल हो गया है यह !"

"रुक जाओ अमित ।" हेमन्त ने कहा "रिवॉल्वर फेंक दो ।"

"क्यों रूक जाऊं-क्यों फेंक दूं रिवॉल्वर । " अमित चीखता चला गया-----''जब हमने भाभी को नहीं मारा तो हम लोगों को गिरफ्तार क्योंकर रहे हैं ये------तुम्हा कहो भईया, क्या तुमने मारा है भाभी को-----अगर नहीं तो हथकड़ियां क्यों पहनी हैं-------मैं तुम्हारी तरंह बुजदिल नही भइया-मैं कायर नहीं जो हथकडी पहन लूं ।"

" म.....मगर अब यह हरकत करने से फांयदा क्या है पगले ?"

मैं मनोज से बदला लूँगा-उसे यह बताकर रहूंगा भइया कि रेखा के भाइयों ने हथकडियां नहीं पहन रखीं

कोई मजाक है जो मेरी बहन के चेहरे पर तेजाब फेंक गया ?"

"भ. . .भइया !" रेखा चीख पड़ी ।

त् फिक्र मत कर रेखा-----डरती क्यों है पगली-----" ये भाई उस कुत्ते की लाश तेरे कदमों में डालकर रहेगा !"

"न. . .नही भइया--मुझे कुछ नहीं चाहिए ।"

रेखा चीखती रही मगर जिसके सिर पर जुनून सवार हो, वह भला सुनता कहां है--अपना सारा ध्यान गोडास्कर पर केंद्रित किए वह गुर्राया----आगे बढो इंस्पेक्टर और तुम सुनो एस.पी. साहब-----तुमने या किसी भी पुलिस वाले ने हरकत की तो मुझे मौत का गम नहीं, मुझसे पहले इंस्पेक्टर मरेगा ।"

शुक्ला ने अपने होलस्टर से रिवॉल्वर निकालकर उस पर तान दिया, बोला----"गोडास्कर को छोड़ दो अमित-इस तरह तुम यहां से निकल नहीं सकोगे । "

" "अगर मेरे साथ गोडास्कर की मौत मंजूर हो तो बेहिचक गोली चला देना एस.पी. साहब । " उसे कवर किए अमित जीने की तरफ बढा…"मगर मैं जानता हूं कि अाप ऐसी बेवकूफी नहीं कोंगे । "

"यह तुम्हारा वहम है अमित----मैं तीन तक मिनूंगा, अगर तुमने तब भी खुद को पुलिस के हवाले न किया तो अपनी मौत के जिम्मेदार खुद होगे । "

यह वाक्य गोडास्कर के लिए एस.पी का संकेत था--यह कि 'तीन' पर उसे बचाव करना है !

एस.पी. ने गिनती शुरू की ।

बिशम्बर, हेमन्त, ललिता और रेखा ही नहीं बल्कि जगदीश भी चीख चीखकर अमित को रुक जाने के लिए कह रहा था मगर अमित नहीं रुका-उसे पूरा विश्वास था कि जब तक उसका रिवॉल्वर गोडास्कर की कनपटी पर है तब तक एस.पी. लाख धमकियां देता रहे किंतु गोली नहीं चला सकता…"तीन' तो क्या 'सौ' गिनतियां पूरी होने पर भी वह फायर नहीं करेगा-----यह विश्वास अमित को इसलिए था, क्योंकि बहुत सी फिल्मों में उसने मुजरिम को इसी तरकीब के जरिए पुलिस के घेरे से निकलते देखा था !"

अमित क्या जानता था कि वे केवल फिल्मी बातें होती है !

उस बेचारे को तो स्वप्न में भी गुमान न था कि एस.पी 'कोड' में गोडास्कर को बता चूका है कि हमला कब होगा----- गोडास्कर ने खुद को स्तर्क कर लिया था !

शुक्ला के रिवॉ्ल्वर की नाल अमित की टागों पर थी !

" एक दो के बाद मुंह से तीन निकालते ही शुक्ला ने अपने रिवॉ्ल्वर से ट्रेगर दबा दिया ! उधर ठीक उसी समय गोडास्कर नीचे बैठ गया !

गोली अमित की बाईं पिड़ली में लगी !

झुंझलाकर उसने फायर झोंका परन्तु गोली हबा में गुम होकर रह गई---- इधर अमित के लड़खड़ाते ही गोडास्कर ने उसकी गुद्दी पर कराटे का वार किया !

मुंह से चीख निकालता हुआ अमित जीने में लुढ़कता चला गया !

ये सारे काम मात्र एक पल में हो गये थे------ गोडास्कर जीने में उसके पीछे लपका , मगर नीचे पहुंचने तक अमित लाश में बदल चुका था !

बिशम्बर गुप्ता आदि की चीख से सारा मोहल्ला दहल उठा !

"दहेज के लोभी------हाय हाय !"

" बहू के हत्यारे------हाय हाय !"

"हत्यारे ससुर को-----बाहर निकालो !"

"कातिल पति--हाय हाय । "

"अरे हत्यारी सास को-फांर्सीं दो ।"

थाने के आसपास का इलाका इस किस्म के जाने कितने नारों से थर्रा रहा था-लोग वहुत उत्तेजित थे-जबरदुस्त भीड़ ।

ऐसा महसूस देता था कि जैसे सारा शहर सिर्फ और सिर्फ थाने के बाहर इकट्ठा हो "गया" है--उनकी गिरफ्तारी का समाचार पेट्रोल पर दौड़ने बाली आग के समान सारे शहर में फैल चुका था-साथ ही यह भी कि जब पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची तो हत्यारा देवर भागने के प्रयास में मारा गया ।

सुनकर किसी को हमदर्दी न हुई ।

थाने के अंदर ललितादेवी और रेखा दहाड़ें मार-मारकर रो रही थीं----हथकडि़यों में जकडे़ हाथों से कई बार रेखा ने पागल होकर अपने चेहरे की पट्टियां खोल डालने की असफल कोशिश की !

बिशम्बर गुप्ता आश्चर्यजनक रूप से शांत थे ।

हेमन्त के मुंह से कोई अाबाज न निकल रही थी पर आंखों से उबलते हुए गर्मपार्मं अांसू लगातार बह रहे थे नहीं जानता था कि ये अांसू अमित के लिए हैं या उन नारों की प्रतिक्रिया, जो इऩके कानों तक पहुंचा रहे थे ?

दस बजे तक थाने के बाहर इतनी भीड़ जमा हो गई कि अतिरिक्त फोर्स भी अब उस पर काबू पाने में असमर्थ थी---_---हर तरफ उत्तेजना ।

दहकते हुए नारे ।

गोडास्कर ने फोन पर किसी पुलिस अफसर को रिपोर्ट दी----"भीड़ बेकाबू और हिंसक होती जा रही है सर, अगर इनकी मांगें न मानी गई तो ये लोग थाने पर पथराव कर सकते हैं-----तोड़ फोड़ कर सकते हैं, कुछ भी हो सकता है सर ।"

"क्या मागें इन लोगों की ?"

"कुछ लोग जाने कहां से तीन चार गधे पकड़ लाए हैं सर, भीढ़ उन गधों पर बैठाकर सारे शहर में इनका जुलूस निकालना चाहती है ! "

थोडी देर के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई, फिर कहा गया----"कोर्ट का टाइम हो गया है गोडास्कर----तुम ऐसा करो कि जिस तरह पब्लिक चाहती है यानी इन लोगों को एक जुलुस की शक्ल में लेकर कोर्ट पहुंचों !"

"स.....सर रेंखा ।"

"उसे जुलूस से अलग रखो अौर सुनो, इन लोगों के चारों तरफ सारे रास्ते तुम्हें पुलिस का ऐसा सशक्त घेरा रखना है कि कोई उनमें से किसी ऐसा नुक्सान न पहुंचा सके कि कल पुलिस के लिए कोर्ट के सबालों का जवाब देना मुश्किल हो जाए । "

" वह तो ठीक है सर, लेकिन ।"

" लेकिन ?"

"जुलूस निकालने के लिए मुझे पी.ए.सी की जरूरत पड़ेगी ।"

" हम भेज रहे हैं !" कहने के साथ दूसरी तरफ से रिसीवर रख दिया गया !

गोडास्कर थाने से बाहर निकाला--------भीड़ दुगने जोश के साथ नारे लगाने लगी, वडीं मुश्किल से भीड़ को शांत करके उसने चीखकर घोषणा की कि उनकी मांग मान ली गई है------शोर शराबा उत्तेजना बढ गई-----नारे पुलिस की प्रशंसा में लगने लगे----आबारा लड़के यूं नाचने लगे जैसे उन्हें खजाना मिल गया हो ।

और !

ग्यारह बजे बिशम्बर गुप्ता, ललितादेबी और हेमन्त को थाने से उठाकर बाहर खड़े गधों पर बैठा दिया गया-----जाने किसने उन तीनों के गले में एक--एक पट्टी डाल दी------बिशम्बर गुप्ता के गले में पड़ी पड़ी पट्टी पर बड़े बड़े अक्षर में लिखा था------" मैं सुअर हूं----दहेज का लोभी कुत्ता हूं !"

ललितादेबी के गले में------" मैं सास नहीं चुडैल हूं !"

" मैं पति नहीं हत्यारा हूं ।" यह पट्टी हेमन्त के गले में पडी़ थी !

जलूस चल दिया !

 
गधों को पी.ए.सी के जावनों ने अपने घेरे में ले रखा था !

गोडास्कर इस घेरे का नेतृत्व करता सा अागे-जागे चल रहा था----भीड़ को चीरकर कर्नल जयपाल अागे आ गया----जाने कहां से वह अपने हाथ काले कर लाया था, चीखकर गोडास्कर से बोला--" मुझे कभी रिश्वत न लेने बाले इस मजिस्ट्रेट का मुंह काला करना है इंस्पेक्टर । "

" नहीं , इजाजत नहीं है ।" मगर कर्नल ना माना ।

गोडास्कर से जिद करता ही रहा वह-उसके समर्थन में ढेर सारे लोग जुट गए और विवश गोडास्कर को उसे इजाजत देनी पडी़ गुस्से की ज्यादती के कारण पागल-सा हुआ जा रहा जयपाल अपने काले हाथ लिए, गधे परे बैठे बिशम्बर गुप्ता के सामने जाकर चीखा-----" हकीकत यह है बिशरम्बर----- ये है असली चेहरा !"

कहते हुए उसने बिशम्बर गुप्ता का चेहरा काला कर दिया ।

रास्ते में जाने कितने लोग, कहां से अपने हाथों में स्याही लगा लाए और कुछ ही देर बाद ललिता देवी तथा हेमन्त के चेहरे भी काले नजर आ रहे थे !

उफ !

इतनी जिल्लत-----इतना अपमान !

वह भी उस शख्सियत का जिसके सामने कभी किसी ने आखें उठाकर बात नहीं की ----- बिशम्बर गुप्ता सह न सके ------ कोर्ट पहुचने से पहले ही उनके दिल में दर्द की तीव्र लहर उठी----हथकडियों युक्त हाथों से उन्होंने सीने को भींचा ।

ललितादेवी के अलावा किसी का ध्यान उनकी तरफ न था !

कुछ देर तक वे गधे पर बैठे दर्द के कारण तड़पते रहे और फिर गथे से नीचे गिर गए--पी.ए.सी. के जवान उन्हें उठाने के लिए लपके मगर सड़क पर पडे़ वे जल बिन मछली के समान तड़प रहे थे।

"कोई डॉक्टर को बुलाओ-इन्हे दिल का दौरा पड़ा है शायद ।" पी.ए.सी. के जवान का वाक्य पूरा होते-होते बिशम्बर गुप्ता का जिस्म ठंडा पड़ गया ।

"दहेज के लोभी------हाय हाय !"

" बहू के हत्यारे------हाय हाय !"

"हत्यारे ससुर को-----बाहर निकालो !"

"कातिल पति--हाय हाय । "

"अरे हत्यारी सास को-फांर्सीं दो ।"

थाने के आसपास का इलाका इस किस्म के जाने कितने नारों से थर्रा रहा था-लोग वहुत उत्तेजित थे-जबरदुस्त भीड़ ।

ऐसा महसूस देता था कि जैसे सारा शहर सिर्फ और सिर्फ थाने के बाहर इकट्ठा हो "गया" है--उनकी गिरफ्तारी का समाचार पेट्रोल पर दौड़ने बाली आग के समान सारे शहर में फैल चुका था-साथ ही यह भी कि जब पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची तो हत्यारा देवर भागने के प्रयास में मारा गया ।

सुनकर किसी को हमदर्दी न हुई ।

थाने के अंदर ललितादेवी और रेखा दहाड़ें मार-मारकर रो रही थीं----हथकडि़यों में जकडे़ हाथों से कई बार रेखा ने पागल होकर अपने चेहरे की पट्टियां खोल डालने की असफल कोशिश की !

बिशम्बर गुप्ता आश्चर्यजनक रूप से शांत थे ।

हेमन्त के मुंह से कोई अाबाज न निकल रही थी पर आंखों से उबलते हुए गर्मपार्मं अांसू लगातार बह रहे थे नहीं जानता था कि ये अांसू अमित के लिए हैं या उन नारों की प्रतिक्रिया, जो इऩके कानों तक पहुंचा रहे थे ?

दस बजे तक थाने के बाहर इतनी भीड़ जमा हो गई कि अतिरिक्त फोर्स भी अब उस पर काबू पाने में असमर्थ थी---_---हर तरफ उत्तेजना ।

दहकते हुए नारे ।

गोडास्कर ने फोन पर किसी पुलिस अफसर को रिपोर्ट दी----"भीड़ बेकाबू और हिंसक होती जा रही है सर, अगर इनकी मांगें न मानी गई तो ये लोग थाने पर पथराव कर सकते हैं-----तोड़ फोड़ कर सकते हैं, कुछ भी हो सकता है सर ।"

"क्या मागें इन लोगों की ?"

"कुछ लोग जाने कहां से तीन चार गधे पकड़ लाए हैं सर, भीढ़ उन गधों पर बैठाकर सारे शहर में इनका जुलूस निकालना चाहती है ! "

थोडी देर के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई, फिर कहा गया----"कोर्ट का टाइम हो गया है गोडास्कर----तुम ऐसा करो कि जिस तरह पब्लिक चाहती है यानी इन लोगों को एक जुलुस की शक्ल में लेकर कोर्ट पहुंचों !"

"स.....सर रेंखा ।"

"उसे जुलूस से अलग रखो अौर सुनो, इन लोगों के चारों तरफ सारे रास्ते तुम्हें पुलिस का ऐसा सशक्त घेरा रखना है कि कोई उनमें से किसी ऐसा नुक्सान न पहुंचा सके कि कल पुलिस के लिए कोर्ट के सबालों का जवाब देना मुश्किल हो जाए । "

" वह तो ठीक है सर, लेकिन ।"

" लेकिन ?"

"जुलूस निकालने के लिए मुझे पी.ए.सी की जरूरत पड़ेगी ।"

" हम भेज रहे हैं !" कहने के साथ दूसरी तरफ से रिसीवर रख दिया गया !

गोडास्कर थाने से बाहर निकाला--------भीड़ दुगने जोश के साथ नारे लगाने लगी, वडीं मुश्किल से भीड़ को शांत करके उसने चीखकर घोषणा की कि उनकी मांग मान ली गई है------शोर शराबा उत्तेजना बढ गई-----नारे पुलिस की प्रशंसा में लगने लगे----आबारा लड़के यूं नाचने लगे जैसे उन्हें खजाना मिल गया हो ।

और !

ग्यारह बजे बिशम्बर गुप्ता, ललितादेबी और हेमन्त को थाने से उठाकर बाहर खड़े गधों पर बैठा दिया गया-----जाने किसने उन तीनों के गले में एक--एक पट्टी डाल दी------बिशम्बर गुप्ता के गले में पड़ी पड़ी पट्टी पर बड़े बड़े अक्षर में लिखा था------" मैं सुअर हूं----दहेज का लोभी कुत्ता हूं !"

ललितादेबी के गले में------" मैं सास नहीं चुडैल हूं !"

" मैं पति नहीं हत्यारा हूं ।" यह पट्टी हेमन्त के गले में पडी़ थी !

जलूस चल दिया !

गधों को पी.ए.सी के जावनों ने अपने घेरे में ले रखा था !

गोडास्कर इस घेरे का नेतृत्व करता सा अागे-जागे चल रहा था----भीड़ को चीरकर कर्नल जयपाल अागे आ गया----जाने कहां से वह अपने हाथ काले कर लाया था, चीखकर गोडास्कर से बोला--" मुझे कभी रिश्वत न लेने बाले इस मजिस्ट्रेट का मुंह काला करना है इंस्पेक्टर । "

" नहीं , इजाजत नहीं है ।" मगर कर्नल ना माना ।

गोडास्कर से जिद करता ही रहा वह-उसके समर्थन में ढेर सारे लोग जुट गए और विवश गोडास्कर को उसे इजाजत देनी पडी़ गुस्से की ज्यादती के कारण पागल-सा हुआ जा रहा जयपाल अपने काले हाथ लिए, गधे परे बैठे बिशम्बर गुप्ता के सामने जाकर चीखा-----" हकीकत यह है बिशरम्बर----- ये है असली चेहरा !"

कहते हुए उसने बिशम्बर गुप्ता का चेहरा काला कर दिया ।

रास्ते में जाने कितने लोग, कहां से अपने हाथों में स्याही लगा लाए और कुछ ही देर बाद ललिता देवी तथा हेमन्त के चेहरे भी काले नजर आ रहे थे !

उफ !

इतनी जिल्लत-----इतना अपमान !

वह भी उस शख्सियत का जिसके सामने कभी किसी ने आखें उठाकर बात नहीं की ----- बिशम्बर गुप्ता सह न सके ------ कोर्ट पहुचने से पहले ही उनके दिल में दर्द की तीव्र लहर उठी----हथकडियों युक्त हाथों से उन्होंने सीने को भींचा ।

ललितादेवी के अलावा किसी का ध्यान उनकी तरफ न था !

कुछ देर तक वे गधे पर बैठे दर्द के कारण तड़पते रहे और फिर गथे से नीचे गिर गए--पी.ए.सी. के जवान उन्हें उठाने के लिए लपके मगर सड़क पर पडे़ वे जल बिन मछली के समान तड़प रहे थे।

"कोई डॉक्टर को बुलाओ-इन्हे दिल का दौरा पड़ा है शायद ।" पी.ए.सी. के जवान का वाक्य पूरा होते-होते बिशम्बर गुप्ता का जिस्म ठंडा पड़ गया ।

बिशम्बर गुप्ता की मृत्यु की खबर भीड़ में तेजी से फैल गई और इस खबर से सिर्फ इतना फर्क पड़ा कि नारे लगने बंद हो गए-दहेज के लोभी, बहु-के हत्यारों से सहानुभूति अब भी किसी को न थी ।

करीब तीन बजे उन्हें अदालत में पेश किया गया ।

मजिस्ट्रेट ने सूचना दी----" यह जानकर शायद अाप लोगों को दुख होगा कि श्री बिशम्बर गुप्ता का देहांत हो गया है, डाक्टरी रिपोर्ट के मुताबिक दिल का दौरा पढ़ने से उनकी मृत्यु हुई !"

कटहरे में खड़ी रेखा फूट फूटकर रो पड़ी ।

हेमन्त गर्दन झुकाये चुपचाप आंसू बहा रहा था और कटहरे में खड़ी ललितादेबी पर इस समाचार की भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई----वह आंखें फाड़े, लगातार--पागल की तरह मजिरट्रेट तरफ देखती रही----कुछ ऐसे अंदाज़ में कि एक बार को तो न्यायाधीश महोदय भी सकपका गए!

कुछ देर बाद न्यायाधीश ने उनसे सवाल क्रिया-----" आपने गला घोंटकर अपनी बहूकी हत्या की है ललितादेबी ?"

ललितादेवी हंस पड़ी ।

एक बार उन्होंने हंसना शुरू किया तो फिर हंसती चली गई-----बड़े ही डरावने अंदाज में हंस रही थी वह और समूचा अदालत कक्ष उनकी हंसी से कांप उठा ।

हेमन्त ने चौंककर उनकी तरफ देखा!

उन्हें ध्यान से देखते हुए न्यायाधीश महोदय ने अपना सवाल दोहराया--जवाब दीजिए ललितादेवी-सुचि का गला आपमें से किसने घोंटा ?"

"हा--हा--हा--हा-मैंने घोटा था उसका गला----मैंने मारा है उसे-हा-हा-हा-मुझे दहेज चाहिए----वह हरामजादी दहेज नहीं लाई थी---हा--हा----जो दहेज नहीं लाएगा मैं उसे मार डालूंगी-----मैं तुझे भी मार डालूंगी-------ह्वा-- हा--तूने मुझे दहेज नहीं दिया तो तुझे भी खत्म कर दूंगी----------मैं सास नहीं चुडैल हूं------हा--हा---मैं चुडैल हूं-मुझसे बचकर रहो-----मैं सबको खा जाऊंगी---- हा---हा !"

"मम्मी-मम्मी । " हेमन्त हलक फाढ़कर चिल्लाया ।

ललितादेवी उस चिल्ला उठी----"चिल्लाता क्या है---तेरे चिल्लाने से क्या चुड़ैल डर जाएगी---जिंदा रहना चाहता है तो दहेज लेकर आा-वरना तुझे भी खा जाऊंगी मैं------हा-हा गला घोंटकर खत्म कर दूंगी । "

हेमन्त के जबडें भींच गए, कसमसाकर कटहरे के रैतिंग पर उसने इतनी जोर से मारा कि अदालत कक्ष गूंजकर रह गया, न्यायाधीश ने फैसला सुनाया---"' इस मामले की सुनवाई बिलकुल मुमकिन नहीं हैे----यह सुनबाई बीस तारीख को होगी तब तक के लिए ललितादेवी मेंटल हॉस्पिटल, रेखा को सरकारी अस्पताल और मिस्टर हेमन्त को जेल में रखा जाए--मिस्टर हेमन्त चाहें तो पुलिस की निगरानी में अपने पिता और भाई का अंतिम संस्कार अपने हाथों से कर सकते हैं ।

ललितादेबी के कहकहे अदालत कक्ष मे अब भी गूंजते रहे !"

अगले दिन सुबह !

हाथ में लाठियां लिए पुलिस कर्मियों ने दोनों चिताओं को चारों तरफ से घेर रखा था----कूल्हे पर होलस्टर लटकाए जेलर साहब सादर मुद्रा में एक तरफ खडे़ थे और पुलिस के इसी घेरे के बीच खड़ा हेमन्त देख रहा था अाग की लपलपाती उन लम्बी लम्बी जीभों को जो उसके छोटे भाई और पिता की चिताओं से आकाश की तरफ उठ रही थीं ।

दहकती आग की लपलपाती वे जीभें हेमन्त को मुंह चिड़ाती सी महसूस हो रही र्थी-जब लकडियां चटकतीं तो उसे महसूस होता कि एक-एक करके उसके दिमाग की नसें चटक रही हैं-----निर्दोष पिता और भाई की चिता में अपने हाथों से अग्नि दी थी उसने, मगर अपनी सुचि की लाश के साथ तोऐसा भी नहीं कर सका !

वह लाश दीनदयाल को सौंपी-गई थी ।

चंद पुलिस कर्मियों और जगदीश के अलावा इस वक्त यहां उसका अपना कोई भी तो न था----जिसके अंतिम संस्कार में सारे शहर को शामिल होना चाहिए था उसकी चिता के नजदीक रह गई थी पुलिस-पुलिस का पहरा ।

उसके दिमाग में सवाल उठ रहे थे कि यया मैं अपने पिता की उस प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित कर सकूंगा जिसे "सुचि हत्याकांड'' ने खाक में मिला दिया है--क्या मैं इस शहर के

निवासियों को कभी यकीन दिला सकूंगा कि हमने कभी दहेज नहीं मांगा, सुचि की हत्या नहीं की?

शयद नहीं !

ऐसा करने का कानून मुझे मोका ही कहां देगा ?

अभी हेमंन्त यह सब सोच ही रहा था कि जगदीश ने कहा----"कपाल क्रिया करो बेटे । "

वह चौंका !

एक लाठी लिए आगे बढा ।

महापंडित द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ "कपाल क्रिया" की उसने और अपने छोटे भाई के 'काक' पर लाठी मारते समय दहाड़े मार-मारकर रो पड़ा वह-अग्नि शिखाएं कुछ और भड़ककर उछलने लगी ।

रस्म के मुताबिक चिता के समीप से हटकर वह महापंडित के साथ मंदिर के अंदर गया----जेलर और सिपाही जगदीश सहित बाहर खड़े रहे ।

एक सिपाही के हाथ में वह हथकडी थी जो अतिम संस्कार की रस्में समाप्त होते ही पुन: हेमन्त को पहना दो जाने हैं बाली थी, मगर जब पांच मिनट होग्ए और मंदिर के अंदर से हेमन्त या महापंडित में से कोई भी बाहर नहीं आया तो जेलर का माथा ठनका ।

उसने सवालिया नजरों से इधर-उधर देखा ।

सभी सिपाहियों के चेहरों पर आश्चर्य के चिह्न थे, जब जेलर पर रहा न गया तो उसने जगदीश से पूछा----------"इतनी देर ,क्यों लग रही है !"

‘मैं' भी यही साचकर हैरान हूं !"

जेलर ने ऊंची आवाज में पुकारा-----"हेमन्त !"

कोई जवाब नहीं !

एक सिपाही द्वारा महापडि़त को पुकारा गया ।

सन्नाटा !

"तुम देखो रामकुमार ! " जेलर ने होलस्टर से रिवॉल्वर खींचते हुए हुक्म दिया----"मंदिर के अंदर जाकर देखो कि ये कहां गए ! "

रामकुमार नाम का सिपाही तुरंत जूते उतारकर मंदिर में घुस गया-भीतरी भवन में पहुंचते ही उसके हलक से चीख निकल गई------महापंडित का बेहोश जिस्म शिवलिंग के समीप पड़ा था और मंदिर का पिछला दरवाजा चौपट ।

" ब.....भाग गया है सर !" चीखता हुआ रामकुमार बापस, दौड़ा-------"पंडित को बेहोश कंरके वह पिछले दरबाजे से भाग निकला है!"

"पीछा करों उसका अभी दूर नहीं गया होगा । "

हड़कम्प मच गया ।

भगदड़ ।

मगर हेमन्त श्मशान में कही भी तो न था ।

"अंकल अंकल ।" चीखता हुआ वह कर्नल जयपाल की कोठी के कम्पाउंड में दाखिल हुआ-----बूरी तरह हांफ रहा था वह---वेतहाशा भागता हुआ अंदर दाखिल होना ही चाहता था कि

"मैं यहाँ हूं ।"

हेमन्त की नजर आवाज़ की दिशा में उठ गई----"स्टडी के दरवाजे पर खड़ा कर्नल उसे ही घूर रहा था, हेमन्त -अधीर होकर उनकी तरफ भागा, परंतु अभी वह नजदीक पहुंचा भी न था, कर्नल ने कड़ककर कहा-----''खबरदार हेमन्त, वहीं रुक, जाओ !"

हेमन्त जाम होकर रह गया !

'" कर्नल जयपाल अग्रवाल के घर में मुजरिमों के लिए कोई जगह नहीं है !" उसने हेमन्त को घूरते हुए सख्त स्वर में कहा----" तुम्हें तो इस वक्त जेल में होना चाहिए । "

" मुझे अमित और बाबूजी का अंतिम संस्कार करने की छूट दी थी…किसी तरह वहां से भागकर अापके पास आया हूं !"

" किसलिए ?"

“म. ..मुझे अापसे कुछ बात करनी है अंकल । "

"मुजरिमों से बात करना तो दूर, मैं उनकी परछाईं तक देखना नहीं चहता--यहां अाकर-तुमने बहुत बड़ी भूल की है हेमन्त ।"

" मैं आपकी कसम खाकर कहता हूं अंकल कि हम लोग, निर्दोष हैं…हमने सुचि की हत्या नहीं की--मुसीबत की इस घड़ी में एकमात्र अाप ही मुझे नजर अाते हैं----अाप ही मेरी मदद कर सकते हैं, क्योकि मेरी नजर में अाप ही, सच्चाई के साथी ।"

" हम सच्चाई के साथी हैं, मुजरिमों के नहीं !"

"हम मुजरिम नहीं हैं, एक बार…सिर्फ एक बार मेरी बातें ठंडे दिमाग से सुन लीजिए अंकल । हेमन्त बुरी तरह गिड़मिड़ा उठा…"मुझें यकीन है कि मैं अापको यह यकीन दिलाने में कामयाब हो जाऊंगा कि हम मुजरिम नहीं हैं-----"हमने सुचि की हत्या नहीं की-कोई दहेज नहीं मांगा उससे----------हम किसी षडयंत्र के शिकार हुए हैं-----मैं अापके पैर पकड़ता हूं अंकल-एक-----सिर्फ एक मौका दीजिए, अगर तब भी आपको मुजरिम लगूँ तो बेशक कानून के हवाले का दीजिएगा । "

हेमन्त की गिड़गिड़ाहट में कुछ ऐसा जरूर था, जिससे प्रभावित होकर कर्नल इस बार तुरंत ही दहाड़ा नहीं, वल्कि चेहरे पर कठोरता लिए सिर्फ उसे घूरता रहा…हेमन्त ने पुन: रिक्वेस्ट की तो उसने इतना ही कहा---"आ जाओ ।"

" थ. . .थैक्यू अंकल । कहता हुआ वह उनकी तरफ लपका----वे दरवाजे के बीचोबीच से हट गए----यह हेमन्त को स्टडी में दाखिल हो जाने की इजाजत थी ।

स्टडी के बीचोबीच खड़ा हेमन्त अपनी फूली हुई सांस को नियंत्रित करने की चेष्टा के साथ ही यह भी सोच रहा था कि कर्नल साहब को यकीन दिलाने के लिए उसे बात कहाँ से शुरू करनी चाहिए-----अभी वह निश्चय न कर पाया था कि चटकनी चढ़ाने के बाद जयपाल घूमे, उसे घूरते हुए बोले-----"बैठ जाओ !"

हुक्म का गुलाम-सा वह 'धम्म' से सोफे पर गिर गया ।

उसके नजदीक जाते हुए कर्नल ने पूछा-----"बोलो क्या कहना है तुम्हें ?"

हेमन्त अंजू' के नाम से मिलने वाले टेलीग्राम से शुरु हो गया और फिर ज्यों का त्यों सब कुछ सुनाता चला गया ।

सब कुछ !

यह भी सुचि की लाश घर से निकालकर उन्होंने क्यों और केसे गुलावठी पहुंचाई----भागकर अपने यहाँ अाने तक की पूरी कहानी सुनाने के बाद वह बोला…"सच्चाई यही है अंकल, आपके दिमाग में ऐसे बहुत से सवाल उभर सकते है ! जिनका मेरे पास कोई जवाब नहीं हैं और इसी वजह से आपको लग सकता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं --लेकिन यकीन मानिए अंकल---" उस बच्चे की कसम खाकर कहता हूं, जो मेरी सुचि की कोख में पल रहा था कि सच्चाई यही है----इस सच्चाई को साबित करने के लिए मेरे पास कोई ,सबूत नहीं है, लेकिन आप यकीन कीजिएं-मैनै रत्ती बराबर भी झूठ नहीं बोला है । "

" अगर मान लिया जाए कि तुम सच बोल रहे हो तो मैं इसमेँ क्याकर सकता हूं ?

"अदालत मुझे फांसी या उम्र कैद से कम सजा नहीं देगी---जानता हूं कि वहाँ से मुझें न्याय नहीं मिलेगा, क्योकि जो कुछ अापको बताया उसे साबित नहीं का सकता और अदालत मेरे अंकल की नहीं कि बिना सबूत के मुझ पर यकीन कर ले--- उल्टे ऐसे सबूत हैं कि जिनसे मैं हत्यारा साबित हो जाऊंगा, यदि सच्चाई पूछें अंकल तो यह यह है कि इन तीन-चार दिनों में मैं अपना सब कुछ खो चुका हूं---इत्तना कुछ कि जव अदालत से किसी तरह का न्याय पाने की हसरत भी दिल में नहीं है ।"

"फिर क्या चाहते हो तुम ?"

 
" यह जानना चाहता हूं कि सुचि ने वह झुठा पत्र क्यों लिखा-----वह कौन हैं जिसने सुचि की हत्या करने के बाद लाश हमारे बेडरूम में लटका दी--------ऐसा क्यों किया और सुचि की अटैची, बाबूजी का रिवॉल्वर तथा वीस हजार रुपए पानी की टंकी में कैसे पहुंच गए----अदालत द्वारा दी जाने बाली सजा भोगने से पहले मैं ऐसे ढेर सारे सवालों का जवाब चाहता हुं और इनके जवाब तलाश करने में अाप मेरी मदद कर सकते हैं !

" बेशक मैं तुम्हारी मदद जरूर करूगां !"

" थैंक्यु अंकल----थैक्यु वैरी मच---------मुझे पूरा विश्वास था अाप मेरी मदद जरूर करेगे----जो हो गया उसे बापस नहीं लाया जा सकता-------मैं इस शहर को यह बताना चहता हूं कि जो हुआ वह गलत ही नहीं, अनर्थ हुआ-मरने से पहले मैं इस शहर को बता देना चाहता हूं कि विशम्बर गुप्ता उसी सम्मान----उसी इज्जत के हकदार थे जो सारा शहर 'सुचि स्कैंडल’ से पहले उन्हें देता था---- इस शहर के बच्चे------बच्चे को यह बात समझा देना चाहता हूँ अंकल कि जिन बिशम्बर गुप्ता को अपमानित करके मार डाला गया वे देवता थे है श्रद्धा के पात्र थे----मरने से पहले अपने बाबूजी की खोई हुई प्रतिष्ठा को स्थापित करना ही मेरा लक्ष्य है ।"

''ऐसा तुम नहीं कर सकोगे !" कर्नल साहब का सपाट स्वर ।

" क्यों ?" हेमन्त चोंक पडा----" जब आप मेरी मदद करोगे तो मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकूंगा अंकल ? "

''मैं इसमें तुम्हारी कोई मदद नहीं करूंगा । "

"क्यों अंकल ? "

''मैं सिर्फ उन सवालों के जवाब दे सकता हूं जिनकी तुम्हें तलाश है, लेक्रिन विशम्बर की खोई हुई प्रतिष्ठा को स्थापित करने में तुम्हारी कोई मदद नहीं का सकता । '

"मैं समझा नहीं अंकल ऐसा क्यो ?"

"क्योंकि वह आदमी मैं ही हूं जिसने तुम्हे, तुम्हारे सारे परिवार को इस बदतर हालत तक पहुंचाया !" सपाट स्वर में कर्नल साहब कहते चले गये-----" विशम्बर की प्रतिष्ठा धूल में खुद मैंनें मिलाई हेै । "

"अ.. .अाप झूठ बोल रहे है अकल, मजाक कर रहे हैं !"

'"और यह तमन्ना उसी दिन से मेरे दिल में थी जिस दिन बिशम्बर ने सुरेश को फांसी का हुँक्म सुनाया------कुछ भी हो, इंसान चाहे जितना सिद्धांतबादी हो, मगर जवान बेटे की मौत सारे सिद्धांतों को जलाकर राख कर देती है बेटे-----------बिशम्बर गुप्ता के विरूद्ध उसी दिन से मेरे सीने में इंतकाम की अाग धधक रही थी------ना---ना उठने की कोशिश मत्त करो हेमन्त---अगर तुम हिले भी तो मेरे रिवॉल्वर की गोली वक्त से पहले ही तुम्हे हमेशा के लिए शांत कर देगी !"कठार स्वर में कहने के साथ ही कर्नल जयपाल ने अपनी जेब से रिवॉलबर निकालकर उस पर तान दिया ।

गुस्से की ज्यादती से भन्नाता हुआ हेमन्त ज्यों-का-त्यों रह गया ।

"मैं तुम्हें वेहिचक गोली मार दूंगा, क्योंकि उसके बाद भी कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता । कर्नल जयपाल गुर्राहटधार स्वर में कहता चला गया-"अपनी और मेरी -स्थिति के फर्क को समझो बेटे--- तुम इस बक्त एक फरार मुजरिम हो-मैं सच्चा और सम्मानित नारिक--मेरा केवल इतना ही बयान काफी होगा कि तुम यहाँ मेरे, द्वारा अपने बाप का मुंह काला किए जाने का बदला लेने अाये थें----मैंने पुलिस को फोन करना चाहा+--मगर तुम बदला लेने पर तुले थे और आत्मरक्षा हेतु मुझें गोली चलानी पड़ी !"

हैरत अौर आंतक से घिरा हेमन्त अवाक् अंदाज में कर्नल के उस चेहरे को देखता रह गया जो इस वक्त उसे किसी खूनी भेडिए के चेहरे जैसा नजर आ रहा था ।

उसे कवर किए कर्नल ने कहा----"किसी पर भी अपना राज खोलने का मेरा कोई इरादा नहीं था, लेकिन जिस अवाज

में तुम मेरे सामने गिड़गिड़ाए-रोए----मदद्ग के लिए चिल्लाए उसने मूझे प्रभावित किया-जी चाहा कि तुम्हें उन सवालों का जबाब दूं, जिनकी तुम्हें तलाश है----काफी सोचने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर में तूम पर बना राज खोल दूं तब भी मेरा कुछ बिगढ़ने वाला नहीं है और इसीलिए निश्चय किया कि कम से कम तुम्हारे सवालों का जवाब तो मुझे दे ही देना चाहिए !"

'"क. ..कुत्ते-हरामजादे !" अाये से बाहर होकर हेमन्त चीख पड़ा---'‘मैं ख्वाब में भी नहीं सोच सकता था सूअर की औलाद कि वह तू है…मैंने तो ये. . . ।

"'खामोश ।" कर्नल दांत भीचकर गुर्राया'--"अब अगर एक भी लफ्ज जुबान से निकाला तो हलक गोलियों से भरदूंगा----अहर वक्त से पहले मरना नहीं चाहते, अगर अपने सवालों का जबाब चाहते हो तो मुंह पर ताला लटकाकर सूनो-----तुम्हारे बाप पर मैंने यह कभी जाहिर नहीं क्रिया कि मेरे , सीने में इंतकाम की आग धधक रहीं है-----एक न्यायप्रिय और सिद्धांतवादी जिन्दगी होने का मुखौटा चढ़ाए मैंने उससे पुराने संबंध बनाए रखे-यह तुम्हारे बाप की बेवकूफी थी जो वह यह समझता रहा कि एक बाप कभी अपने जवान बेटे के हत्यारे को माफ कर सकता है-तुम्हारे बाप ने इज्जत और सम्मान के अलावा सारी जिदगी में कुछ भी नहीं कमाया था और उसकी यह कमाई सुरेश जैसे ही चंद मुकदमों की वज़ह से थी-मैंने निश्चय किया कि मौका मिलते ही बिशम्बर के उस सम्मान औक प्रतिष्ठा को धूल में मिता दूंगा, जिसके पाए बेटे की लाश पर टिके हैं-----मैं मौके की ताक में था मगर यह कमीना ऐसा कोई काम करता ही न था जिसका लाभ उठाकर इस शहर के, लोगों की नजरों में गिरा सकुं----तभी एक दिन, जव मैं हापुड़ गया तो दीनदयाल की बेटी को एक युवक के साथ पार्क में घूमते देखा…उसके संबंध समझने में मुझे देर न लगी-------वह पहला क्षण था जब मेरे दिमाग में एक स्कीम नाच उठी----एक लम्बी किंतु सशक्त योजना----जिससे मैं अपना बदला ले सकता था ।

कर्नल सांस लेने के लिए रुका ।

हेमन्त सांस रोके सुन रहा था, उसे एक क्षण की इंतजार थी जब कर्नल एक पल के लिए असावधान हो जबकि वह कहता चला गया-----बच्चा भी जानना है क्रि आज के जमाने में अगर किसी परिवार पर यह आरोप लग जाए क्रि उसने अपनी बहू से दहेज मांगा उसकी हत्या की तो जो बेइज्जती होती है, वह किसी अन्य तरीके से नृहीं हो सकती और . बिशम्बर गुप्ता अपनी बहु, से दहेज मांगने, बाला नहीं था-अत: उस दिन के बाद मैं सुचि और उस लड़के के पीछे साया बनकर पढ़ गया, जिसका नाम संदीप था----मैं उनके ऐसे संवेदनशील क्षणों के फोटो खंचिने में कामयाब हो गया, जिनके बूते पर सुचि को जिस तरह चाहूं नचा सकता था-मेरी योजना थी कि किसी भी स्थिति में सुचि की शादी संदीप से नहीं होने दूंगा-----दीनदयाल को बुरी तरह भड़का दूँगा और इसी सुचि को तुम्हारी दुल्हन, बिशम्बर गृप्ता की बहू बनाकर तुम्हारे घर में पहुंचा दूंगा--------जानता था कि सूचि और संदीप एकदूसरे से इतना ज्यादा प्यार करते हैं कि दीनदयाल को भड़काने के बावजूद अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में मुझे काफी दिक्कत पेश अाएंगी, किन्तु मैं अपने इरादों पर दृढ़ था और तभी, कुदरत ने मेरा साथ दिया-संदीप एक कार एक्सीडेंट में मारा गया-सुचि बेचारी छुपकर रोने के इलाबा कुछ न कर सकी-----अब उसे किसी कों यह बताने से भी कोई लाभ न होने बालां था कि कार एक्सीडेंट में मरने वाला युवक वास्तव में उसका गुप्त पति था-अब मेरा काम आसान हो गया------सुचि को तुम्हारी दुल्हन बना दिया…शादी के दिन के कुछ दिन तक शामोश रहा, धैर्य से काम लिया और 'मकडा' बन गया--कुछ ऐसा भेष बनाकर सुचि से मिला कि यह मुझे पहचान न सके-----मेरी एक ऐसी चाल थी कि ससुराल वाले दहेज न मांगे, तो न सही----दुल्हन खुद ही अपने पिता से दहेज मांगे-----संदीप के साथ उसकी फोटुओं ने सुचि से यह पत्र लिखवाया----बीस हजार ऱूपए मंगवाए और अंत में मैंने उसे एक रात के लिए होटल में वुलाया--वह आई, क्योंकि उसे आना ही था------होटल के उसी कमरे में मैंने गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी-------उसी रात बॉंल्कानी वाले दरवाजे से लाश तुम्हारे बेडरूम में पहुंचाई और वहां उसे इस ढंग से टांगा कि जैसे उसने आत्महत्या की हो-----उसका सारा सामान और

विशम्बर का रिवॉल्वर पानी की टंकी में डाल अाया-

 
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