आज से दो साल पहले तुम मेरा सब कुछ लूटकर हापुड़ से इस तरह गायब हो गए जैसे कभी कहीँ थे ही नही-----उस कमरे पर गई जहां तुम रहते थे, परंतु मकान मालिक से पता लगा कि तुम कमरा छोड़ गए हो और मकान मालिक को भी तुम्हारा पत्ता-ठिकाना मालूम न था-कितना ढूंढा, कितना तलाश किया-मगर तुम न मिले और उन दिनों मुझे अपने अाप पर तरस आ रहा था
तरस आ रहा था----यह सोचकर कि मैंने तुम्हारे बारे में उस किराये के कमरे से अागे कभी जानने की कोशिश ही नहीं की-घर वाले शादी की जिद कर रहे थे, तुम्हारी तलाश थी--एक साल गुजार गया और तब मैंने अपने दिमाग में धोखेवाज करार दिया----वहीं शादी कर ली जहां पापा ने कही !
तुम मेरी जिदगी में दाग थे शंकर और यह दाग में किसी को दिखाना नहीं चाहती थी----संयोग से मुझे अच्छी ससुराल मिली, अच्छा पति और हंसी खुशी मेरे दिन गुजर रहे कि-------------एक बार तुम फिर मेरी जिदगी में आ गये----उस दिन मैं शाम के वक्त हेमन्त के साथ गांधी पार्क में टहल रही थी कि मेरी नजर तुम पर पडी----तुम किसी हिंसक पशु की तरह मुझे घूर रहे थे------उस वक्त मेरी जो हालत हुई उसे मैं बयान नहीं कर सकती-उस दिन के बाद तुम मेरी जिदगी के कोढ बन गए--तुम मेरे पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि ब्लेकमेलर बनकर मिले---सुख चैन और हंसी-खुशी में गुज़र रहीं मेरी जिदगी को तुमने झंझोड़ डाला शंकर-----मेरे पत्र हेमन्त को दिखाने कीं धमकी देकर तुम मुझसे छोटी-मोटी रकम ऐंठने लगे-मैं अपने पत्र वापस के लिए रोई, "गिढ़गिडाई हाथ जोडे, तुम्हारे पैर पकडे मगर तुम न माने----पुरे कमीने हो तुम-कहने लगे कि पत्र तब दे सकते हो जव मैं तुम्हें बीस हजार दूं-----इतनी बडी रकम भला मैं कहां से लाती…जब यही बात तुमसे कही तो तुम ठहाका लगाकर हंस पडे-बताया कि मेरी राइटिंग में तुम एक ऐसा पत्र हापुढ़ डाल चुके हो जिससे बीस हजार का इंतजाम हो जाएगा, मुझे तुम्हारी किसी भी राइटिग की नकल उतार देने की वह स्मरण हो अाई, जिसका प्रदर्शन अाज से दो साल पहले करते थे-----जब तुमने पापा के पास डाले गए पत्र का मजमून बतलाया तो मैं ढंग रह गई-चीख पडी कि मेरे पापा इतने पैसों का इंतजाम नहीं कर सकेंगे मगर तुम वहशिाना अंदाज़ में हंसे---- बोले कि बाप चाहे जितना गरीब हो, मांग यदि लडकी की ससुराल से आए------------दुल्हन ही अपने बाप से मांगे तो उसे इंतजाम करना पड़ता है…मेरे डाले गए पत्र के मुताबिक तुम चार तारीख को वहां जाना, रकम मिल जाएगी ।
मुझे चारों तरफ---से जकड़ लिया था तुमने ।
बिबश होकर सोचा कि जब तुमने पत्र डाल ही दिया है तो क्यों न बीस हजार मुंह पर मारकर अपने पत्र वापस ले लूं----चार तारीख ससुराल वाले रोकते रह गए मगर मैं जिद
करके बुलंदशहर से हापुड़े गई…रकम लाई ।
मुझसे कहा था कि जिस दिन मेरे ससुराल में हापुढ़ से टेलीग्राम मिले उसी रात को मैं तुम्हें बीस-हजार सौंपने और अपने पत्र बापस लेने के लिए गुलावठी अड्डे पर पहुंच जाऊं------रूपये लाने के अगले दिन यानी आज ही हापुड़ से अंजू की शादी का टेलीग्राम पहूँचा, मैं समझ गई तुमने ही डाला है, क्योंकि तुम जानते थे अंजू मेरी सबसे प्यारी सहेली है !
जाने क्यों मुझे यकीन न अा रहा था कि तुम बीस हजार लेकर भी मेरे पत्र लौटा दोगे----यह सोच-सोचकर डर रही थी कि अगर तुमने अब भी पत्र न लौटाए तो क्या करूँगी----इसका हल मैंने बडा भयानक निकाला, इतना तक सोच डाला कि अगर ऐसा हुआ तो तो मैं तुम्हें खत्म कर दूंगी और खुद भी मर जाऊंगी--- यह निश्चय करके मैंने बाबूजी का रिवॉल्वर चुरा
लिया !
मैं ही जानती है कि किन-किन मुसीबतों से गुजरकर आज तुम से गुलाबठी में मिली उन्होंने अमित को मेरे साथ लगा दिया था---बडी मुश्किल से बहाना बनाकर उसे बराल से टाला----तुम मुझे गांव के टूटे-फूटे और कच्चे मकान में ले गये--वही हुआ जिसका मुझे पहले से डर था, तुमने बीस हजार ही नहीं बल्कि मेरे गहने भी ले लिए----कहा ससुराल
और पीहर बालों से कह दूंगी कि अटैची बस में ही गुम हो गई---तुमने कुत्तेपने की हद कर दी थी शंकर अत: उस कहानी का वहीं अंत करने का निश्चय कर लिया । जो सोचकर आई थी----मगर वह भी न हो सका…चालाकी से तुमने मेरा रिवॉल्वर भी छीन लिया और दो घंटे बाद अाने के लिए कहकर तुम मुझे कमरे में केैद करके चले गए हो, जहां बैठी मैं अपना आखिरी पत्र लिख रही हूं !
हां आखिरी पत्र । यह कहकर गए हो कि मेरे पत्र उस दिन लौटाओगे जिस दिन मैं तुम्हें एक लाख दूंगी---मगर मैंं जानती हूं कि पत्र मुझे कभी नहीं मिलेंगें
तुम मेरे दामन के क्रोढ़ बन गए हो वक्त के साथ यह कोढ़ बढ़ता ही जाएगा…जिदगी मेरे लिए नर्क बन गई है…ऐसे ही पत्र डाल ड़ालकर तुम मेरे पापा को भी जीतेजी मार दोगे…ऐसी जिदगी से तो मौत अच्छी-मेरी मौत के साथ ही यह सिलसिला रूकेगा, मगर छप्पर की इस छत में कहीं इतनी जगह भी तो नहीं है, जहाँ मैं आराम से मर सकूं--- मगर वह रस्सी जो इस कमरे में शायद कपड़े टांगने के लिए बंधी थी, मैंने कमर पर अपनी साडी के नीचे लपेट ली हैे---तुन शायद आने ही वाले होगे, भविष्य में है एक लाख देने का वादा करके मैं यहाँ से निकल जाऊंगी और फिर वह भविष्य कभी नहीं आएगा शंकर ।
यह पत्र तुम्हें मेरी ताश के साथ मिलेगा और मेरी लाश वहाँ मिलेगी, जहाँ इस रस्सी पर आराम से मरने की जगह होगी---यह पत्र लिखने का अभिप्राय सिर्फ यह है कि मां पापा, भइया-हेमन्त, अमित रेखा, मांजी और बाबूजी को यह पता लग जाए क्रि मैं उनमें से किसी को मुंह दिखाने के लायक न थी-----सबकी दोषी हूं मुझे माफ कर देना मगर शंकर नाम के राक्षस को कभी माफ न करना हेमन्त, मैं तुम्हारी कसम खाकर कहती हूं मेरे देवता कि मैं गंगा-सी पवित्र नहीं, मगर जब से तुम्हारी हुई तब से तुम्हारी ही हूं और शंकर वह दरिंदा है जो शादी से पहले लड़कियो को फंसाकर उनकी शादी हो जाने देता है ताकि बाद में उन्हें ब्लैकमेल कर सके-बाहर का दरवाजा खुला, शायद वह आ रहा है !
अंतिम शब्द बुरी तरह धसीट मारकर लिखे गए थे ।
पत्र पढते ही लाश के संबंध में अब्दुल के जेहन में जितनी गांठें थी, सब खुलती चली गई----उसकि आंखों के सामने आजका अखबार चकरा उठा ।
एक खबर वड़ी सुर्खियों में थी ।
बुलंदशहर के सम्मानित नमारिक रिटायर्ड मजिस्ट्रेट बिशाम्बर गुप्ता की बहू के गायब होने की खबर----- अब्दुल ने पढा था फि लइकी का ससुराल वालों पर दहेज मांगने का आरोप लगा रहा है-----सारे शहर के साथ-साथ पुलिस का भी यह अनुमान है कि ससुराल बालों ने सुचि की हत्या करके लाश कहीं ठिकाने लगा दी है !
अब्दुल ने महसूस किया कि लाश बरामदगी की सूचना सबसे पहले बुलंदशहर पहुंचनी चाहिए, अत: उसने आदेश दिया--"'लाश को एम्बुलेंस में रखवाओ । "
हापुड़ के दहेज विरोधी संगठनों व्यापारियों और महिला की एक संयुक्त आपात्कालीन बैठक पिछली रात ही हो चुकी थी----उसमें हापुड़ बंद का प्रस्ताव ध्वनि मत से पास हुआ ।
आज हापुड़ बंद था !
हापुड़ के नागरिकों से भरी बसें सुबह से ही बुलंदशहर पहुंचने लगीं ।
सारे शहर का वातावरण गर्म हो उठा ।
बुलंदशहर के नागरिक भी उनके साथ थे------सो आनन-फानन में बुलंदशहर बंद की भी घोषणा कर दी गई।
बुलंदशहर बंद ।
दहेज विरोधी नारे लगाता हुआ विशाल जुलूस निकला-----ज़नसमूह बिशम्बर गुप्ता परिवार के साथ ही पुलिस के विरूद्ध भी नारे लगा रहा था--सुचि का पता लगाने संबंधी सारे नारे लगा रहे थे-----हर तरफ उतेजित भीड़ गर्म नारे !
जालूस थाने के बाहर पहुचां !
लोग कुछ ज्यादा ही जोश में अा गए, नारे और ज्यादा गर्म हो उठे ।
इंस्पेक्टर गोडांस्कर ने भीड़ को शांतकरके कहा------" आप लोग यकीन रखें,, दोषी को सजा जरूर मिलेगी------ सुचि को ढूंढने की पुलिस पुरजोर कोशिश कर रही है-------बिशम्बर गुप्ता उसके परिवार के लोगों को गिरफ्तार करने में कुछ कानूनों पेचीदगियों हैं जो शाम तक राइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट आने पर हो जाएंगी----" मेरा विश्वास है कि आज शाम तक उन लोगों को जरूर गिरफ्तार कर लिया जाएगा । '"
गोडास्कर अभी इतना ही बोल पाया था कि एक कांस्टेबल ने आकर उसके कान में सुचना दी----"गुलावठी से सव इंस्पेक्टर अब्दुल का फोन है, वह आप से बात करना चाहते । "
गोडास्कर अंदर चला गया ।
भीड़ भला कहां संतुष्ट होने बाली थी -- नारे कुछ ज्यादा ही बुंलदी से उछलने लगे और फिर यह जुलूस जिलाधी को ज्ञापन देने चल पडा़ !!!
रेखा को सुबह सात बजे होश अाया !
आठ बजे तक वे हस्पताल से घर आ गए-चीखने चिल्लाने और रोने के बाद विस्तर पर पडी़ रेखा अब तो सो चुकी थी----बाकी लोग भूखे-प्यासे,, डरे सहमे से ड्राइंगरूम मेंं बैठे थे--------सुबह काअखबार पढ चुके थे !
शहर के वातावरण से भी अपरिचित न थे
उन्हें लग रहा था कि उत्तेजित जनसमूह को शांत करने के लिए पुलिस उन्हें किसी भी क्षण गिरफ्तार कर सकती है,, यह बात बिशम्बर गुप्ता ने अभी अभी कही थी !
जबाब में हेमन्त बोला------" अब आपको इतना डरना नहीं चाहिए बाबूजी,, यह हंगामा और शोर-शराबा केवल तभी तक है जब तक सुचि की लाश नहीं मिल जाती----लाश मिलते ही सब कुछ बंद हो जाएगा, उनके मुंह पर ताले लग जाए'गे !"
"मगर पहले पुलिस हमे गिरफ्तार तो कर सकती है ?"
" केवल लोगों को शांत करने के लिए----कानूनी रूप से न पुलिस अभी पुख्ता है, न हो सकेगी क्योंकि एक्सपर्ट की रिपोर्ट हमें फेवर करेगी-----लाश मिलने के बाद तो बाकी कुछ बचेगा ही नहीं--------गिरफ्तार हो भी गए तो पुलिस को तुरन्त छोड़ना पडेगा !"
'"म...मगर एक बज ,गया है, लाश आखिर कब मिलेगी?"
"इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, मुमकिन है आज सारे दिन ही न मिले, क्योंकि लाश को हम ऐसी स्थान पर छोडकर अाए हैं जहां उसे कोई आसानी से देख न सके ।"
बिशम्बर गुप्ता के कुछ कहने से पहले ही कॉंलवैल बज उठी !
सबने सवालिया नजरों से एक-दूसरे की तरफ देखा ,,यह लिखना गलत न होगा कि हैमन्त ने अपने पिता को आदेश दिया----" आप देखिए कौन है ?"
सस्पेंस में फंसे बिशम्बर गुप्ता दरवाजा खोलने चले गए-जब वापस आए तो उनके साथ एक व्यक्ति था और उस व्यक्ति को देखते ही ललितादेबी चीख पडीं ।
" भईया । " वह दौड़कर उस व्यक्ति से जा लिपटी ।
"बात क्या हुई ललिता, यह सब कैेसे और क्यों हो गया ? " कहते हुए उस व्यक्ति ने स्नेहपूर्वक उसके सिर पर हाथ फेरा-----ललितादेबी फफ्क--------फ़फककर रो रही र्थी-------इस कदर कि वह अपने भाई के सवाल का जवाब भी न दे सकी, पीड़ा युक्त स्वर में बिशम्बर गुप्ता ने कहा----" सब तकदीर का खेल है जगदीश-लोग हमे दहेज के, लोभी और हत्यारा कह रहे हैं…हमारे बारे में यह सब सोच रहे हैं जो कभी खुद हमने नहीं सोचा ! "
" लेकिंन हुआ क्या है जीजाजी, मुझें भी तो कुछ वताइए----टेलीग्राम और अाज का अखबार मुझे लगभग साथ ही मिले-----पढ़कर चौंक पड़ा मैं । "
बिशम्बर गुप्ता ने हेमन्त की तरफ देखा…जेसे पूछ रहे हो कि जगदीश को सच किस हद तक बताया जाए, जगदीश बोला-"बेहिचक से सब कुछ बता दीजिए, अगर कोई ऊक-चूक बात भी हो गई तब भी मैं आपके साथ हूं--ऐसा भला कैसे हो सकता है कि बहन मुसीबत में है और भाई साथ न दे !"
जगदीश के शब्द एक धूसां बनकर बिशम्बर गुप्ता के दिल पर लगे कराह से उठे वह------" क्या तुम्हे हमसे और अपनी बहन से भा यह उम्मीद है कि हमने दहेज मांगा होगा-----सुचि की हत्या की होगी ?"
" ऐसी बात नहीं है जीजाजी !"
" फिर तुमने सोच भी कैसे लिया कि कोई ऊक चूक बात हुई होगी ?"
"मैनें तो यूं ही---- शहर में इतना शोर जो मच रहा है, कोई बात तो होगी ही और मैं वही बात जानने के लिए बुरी तरह उत्सुक हूं !"
हेंमन्त ने सब कुछ बता दिया !
सब कुछ !
यह भी कि सुचि की लाश को उन्होनें घर से निकालकर क्यों कैसे और कहां पहुचाया है, सुनकर जगदीश गंभीर होगया,, बोला -----" मेरे ख्याल से आप लोगों ने बस यही ठीक नहीं किया !"
" क्या ?"
" आप तो मुझसे बेहतर जानते हैं जीजाजी क्रि जुर्म को जितनी सख्ती के साथ दबाने का प्रयास क्रिया जाए उतेंनी ही तेजी से उछलकर अोरों के सामने आता है-सुचि की लाश मिलने तक न आपने कोई गुनाह किया था न झूठ बोला था,, मगर उसके बाद जो कुछ किया वह ठीक नहीं था !"
"हमने तो कहा था जगदीश हेमन्त ही न माना । "
"क्यों हेमन्त?"
हेमन्त ने उल्टा सवाल किया-----------"आप हमारी जगह होते तो क्या करते ? "
"लाश मिलते ही पुलिस को सूचित कर देता ।"
"हुंह---कहना अासान् है मामाजी, करनां बहुत मुश्किल । "
"क्या मतलब?"
"पुलिस उसी समय सुचि की हत्या के जुर्म में हमारे हाथों में हथकडी डालकर थाने ले जाती ।"
" लेकिन झूठ-झूठ ही होता है, एक दिन सच्चाई अदालत और लोगों के सामने जरुर आती-मगर अब मुसीबतों का फंदा अपऩे गले तुम खुद डाल चुके हो !"
"सच्चाई सामने कभी नहीं आनी थी मामाजी, क्योकि उसे सामने लाने के लिए हमारे पास कोई सबूत न था-------आप बाबूजी से पूछ सकते है, सुचि के पत्र की रोशनी में हर आदमी को हमारी कहानी इतनी खोखली लगती कि वह व्यंग्य से हंसने लगता था----नक्वी और गोडास्कर उदाहरण हैं । "
"मगर अब ही तुमने क्या कर लिया है-मेरा ख्याल तो यह है कि तुम्हारी स्कीम बुरी तरह फ्लाप होगी---------"यह साबित होने में देर नहीं लगेगी कि लाश को वहां तुमने पहुचाया है ----- उसके बाद तुम लाख कहते रहना कि लाश तुमने पहुंचाई जरूर है मगर हत्या नहीं की-कोई विश्वास नहीं करेगा । "
" आप देखते लेना मामाजी सब बिश्वास करेंगें---- सारी दुनिया को यकीन होगा----
दुनिया को यकीन होगा-----अदालतें उस झूठ को सच, मानती हैं जिसके सबूत हों उस सच को सच नहीं जिसके सबूत न हों !
जगदीश के कुछ कहने से पहले ही कॉलबेल पुन बजी । इस बार दरवाजा खोलने हेमन्त खुद गया वापस आया तो साथ में गोडास्कर था----वह पहली बार बिना किसी पुलिस वांले को साथं लिए अाया था---हेमन्त के चेहरे पर तो हवाइयां उढ़ ही रहीँ थीं-----पुतिस को देखते ही जगदीश 'सहित अन्य ' सभी के चेहरे भी फक्क पड़ गए--बुरी बुरी आशंकाओं है दिल धड़कने लगे ।
गोडास्कर की भूरी आंखें जगदीश पर जम गई और जव जगदीश ने ऐसा महसूस किया तो उसके पेट में गैस का गोता उठकर दिल पर ठोकरें मारने लगा, गोडास्कर ने सीधे उसी से पूछा-----" आपका परिचय ?"
"ज.....जी--मेरा नाम जगदीश है, इन बच्चों का मामा हूं !"
"ओह अच्छा…जिनके यहां कल रात मिस्टर अमित और हेमन्त गए थे ?"