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आशा ने सही वक्त पर अपनी टांग उसकी टांगों के बीच उलझा दी थी-------जिसके परिणामस्वरूप वह एक चीख के साथ मुह के बल फर्श पर जा गिरी। विजय चीख पडा… "पकड लो इन्हे !"
रैना विगो-किंकर्तव्यविमूढ़-सी खडी थ्री जबकि विजय के आदेश 'पर आशा और अशरफ फर्श पर पड़े चीख रहे अपने-अपने शिकार की तरफ बढे।
अन्दर की तरफ है रघुनाथ पागलों की तरह दरवाजा पीट रहा था ।
अभी आशा या अशरफ अपने शिकार तक पहुचे भी नहीं सके थे कि--"ये यहाँ क्या हो रहा है!"' इसं प्रभावशाली आवाज को सुनकर विजय के रोंगटे खड़े हो गए ।
आशा और अशरफ कांप गये -उनके हाथ में अभी रिवॉल्वर थे-सभी की दृष्टि दरवाजे की तरफ उठ गई-रैना को जाने क्या हुआ कि 'चाचाजी' कहकर वह बुरी तरह रोती हुई तेजी से दरवाजे की तरफ बडी ।
दरवाजे पर ठाकुर साहब खडे थे । .
रैना उनके सोने से जा लिपटी-वह फूट-फूटकर से रहा थी, जबकि ठाकुर साहब सुर्ख आंखों से विजय को घूर रहे थे-तबस्सुम अपने मुंह से खून को साफ़ करती हुई उठ खडी हुई, जबकि उन्हें देखते ही अहमद चीख पड़ा--------"आई.. जी. साहब-अच्छा हुआ जो आप यहां आ गए---ये ही लोग थे, जो सुबह पुलिस वर्दी में हमसे मिलने आए थे--ये गुण्डे है आई. जी. साहब इनके हाथ में रिवॉल्वर आप देख ही रहे हैं-हमे जान से मार डालने की धमकी देकर ये जाने हमें कहां ले जाना चाहते थे।"
ठाकुर साहब ने विजय, से गुर्राहटदार स्वर में पूछा " विजय क्यों ?"
"हां बापू" ----विजय ने की अटपटे ढंग से ऊंट की तरह गर्दन उठाकर कहा ।
"क्या हो रहा है यहां?"
"र...रिहर्सत्ल-हरिश्चन्द्र तारामती के ड्रामे की रिहर्सल ।"
ठाकुर साहब तिलमिलाकर चीख पडे…"दिज़य !"
"जी…जी !"
" रघुनाथ कहां है?"
अन्दर से बन्द कमरे का दरवाजा पीटते हुए-रघुनाथ ने कहा--"मै यहां हूं ठाकुर साहब !"
" व......वहां…रघुनाथ' को वहां बन्द करके क्यों रखा गया है ?"
"मुझे यहाँ से निकालिए ठाकुर साहब-मैँ आपको सव कुछ बताऊंगा ।"
ठाकुर साहव`ने धीरे से रैना को अपने से अलग किया और दरवाजे की तरफ़ बढ गए…इसमैं कोई शक नहीं कि अचानक ही ठाकुर साहव की मौजूदगी ने विजय को इस कदर बौखलाकर रख दिया था कि कई क्षण तक वह अपना अगला कदम निर्धारित नहीं कर सका-मगर अभी ठाकुर साहब दरबाजे तक पहुचे भी नहीं थे कि विजय ने उनका रास्ता रोक लिया !
ठाकुर साहव ठिठक गए ।
इस वक्त संसार भर की मुर्खता सिर्फ विजय के चेहरे पर नाच रही थी------होंठों पर ऐसी मुस्कान थी, जैसे कोई परले दर्जे का पागल मुस्कराने ही चेष्टा कर रहा हो-उसे घूरते हुए ठाकुर साहब गुर्रा उठे…“इस हरकत का क्या मतलब?”
विजय ने से रिवॉल्वर निकालकर उनकी तरफ़ तानते हुए कहा-“इस हरकत्त का मतलब ?"
ठाकुर साहब का सारा चेहरा सुर्ख पढ़ गया…वे तिलमिला उठे असीमित क्रोध के कारण उनका समूचा भारी-भरकम जिस्म कांप उठा .।
वे लगभग चीख ही पड़े----"अपनी सीमा में रहो विज़य !"
"आप वह दरवाजा नहीं खोल सकते ।"
"हम खोलेंगे--तुम हमें रोकने बाले कौन होते हो?”
विजय एकदम किसी झगड़ालू औरत की तरह हाथ नचाकर बोला…"अजी वहुत देखे हैं दरवाजा खोलने वाले…और रही हमारी बात…हम काले चोर होते हैं ।"
"हमारे रास्ते से हटो ।"
“अजी क्यों हटें?"
रैना विगो-किंकर्तव्यविमूढ़-सी खडी थ्री जबकि विजय के आदेश 'पर आशा और अशरफ फर्श पर पड़े चीख रहे अपने-अपने शिकार की तरफ बढे।
अन्दर की तरफ है रघुनाथ पागलों की तरह दरवाजा पीट रहा था ।
अभी आशा या अशरफ अपने शिकार तक पहुचे भी नहीं सके थे कि--"ये यहाँ क्या हो रहा है!"' इसं प्रभावशाली आवाज को सुनकर विजय के रोंगटे खड़े हो गए ।
आशा और अशरफ कांप गये -उनके हाथ में अभी रिवॉल्वर थे-सभी की दृष्टि दरवाजे की तरफ उठ गई-रैना को जाने क्या हुआ कि 'चाचाजी' कहकर वह बुरी तरह रोती हुई तेजी से दरवाजे की तरफ बडी ।
दरवाजे पर ठाकुर साहब खडे थे । .
रैना उनके सोने से जा लिपटी-वह फूट-फूटकर से रहा थी, जबकि ठाकुर साहब सुर्ख आंखों से विजय को घूर रहे थे-तबस्सुम अपने मुंह से खून को साफ़ करती हुई उठ खडी हुई, जबकि उन्हें देखते ही अहमद चीख पड़ा--------"आई.. जी. साहब-अच्छा हुआ जो आप यहां आ गए---ये ही लोग थे, जो सुबह पुलिस वर्दी में हमसे मिलने आए थे--ये गुण्डे है आई. जी. साहब इनके हाथ में रिवॉल्वर आप देख ही रहे हैं-हमे जान से मार डालने की धमकी देकर ये जाने हमें कहां ले जाना चाहते थे।"
ठाकुर साहब ने विजय, से गुर्राहटदार स्वर में पूछा " विजय क्यों ?"
"हां बापू" ----विजय ने की अटपटे ढंग से ऊंट की तरह गर्दन उठाकर कहा ।
"क्या हो रहा है यहां?"
"र...रिहर्सत्ल-हरिश्चन्द्र तारामती के ड्रामे की रिहर्सल ।"
ठाकुर साहब तिलमिलाकर चीख पडे…"दिज़य !"
"जी…जी !"
" रघुनाथ कहां है?"
अन्दर से बन्द कमरे का दरवाजा पीटते हुए-रघुनाथ ने कहा--"मै यहां हूं ठाकुर साहब !"
" व......वहां…रघुनाथ' को वहां बन्द करके क्यों रखा गया है ?"
"मुझे यहाँ से निकालिए ठाकुर साहब-मैँ आपको सव कुछ बताऊंगा ।"
ठाकुर साहव`ने धीरे से रैना को अपने से अलग किया और दरवाजे की तरफ़ बढ गए…इसमैं कोई शक नहीं कि अचानक ही ठाकुर साहव की मौजूदगी ने विजय को इस कदर बौखलाकर रख दिया था कि कई क्षण तक वह अपना अगला कदम निर्धारित नहीं कर सका-मगर अभी ठाकुर साहब दरबाजे तक पहुचे भी नहीं थे कि विजय ने उनका रास्ता रोक लिया !
ठाकुर साहव ठिठक गए ।
इस वक्त संसार भर की मुर्खता सिर्फ विजय के चेहरे पर नाच रही थी------होंठों पर ऐसी मुस्कान थी, जैसे कोई परले दर्जे का पागल मुस्कराने ही चेष्टा कर रहा हो-उसे घूरते हुए ठाकुर साहब गुर्रा उठे…“इस हरकत का क्या मतलब?”
विजय ने से रिवॉल्वर निकालकर उनकी तरफ़ तानते हुए कहा-“इस हरकत्त का मतलब ?"
ठाकुर साहब का सारा चेहरा सुर्ख पढ़ गया…वे तिलमिला उठे असीमित क्रोध के कारण उनका समूचा भारी-भरकम जिस्म कांप उठा .।
वे लगभग चीख ही पड़े----"अपनी सीमा में रहो विज़य !"
"आप वह दरवाजा नहीं खोल सकते ।"
"हम खोलेंगे--तुम हमें रोकने बाले कौन होते हो?”
विजय एकदम किसी झगड़ालू औरत की तरह हाथ नचाकर बोला…"अजी वहुत देखे हैं दरवाजा खोलने वाले…और रही हमारी बात…हम काले चोर होते हैं ।"
"हमारे रास्ते से हटो ।"
“अजी क्यों हटें?"