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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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झरना दीदी ने उन्हें क्रीम पकड़ाते हुए कहा- “ये लो भैया...” फिर बोली- “भाभी, ये दोनों तो मम्मी के आगे-पीछे लग गये। लगता है किसी एक को नहीं हम दोनों को ही अपनी-अपनी बुर में उंगली डाल के सोना पड़ेगा। अच्छा भाभी मैं किचेन में देखकर आऊँ क्या? कल बाजार से जो लंबा बैगन आया था उसमें से एक को मैंने छुपा के रखा है..."

दीदी- “अरे... उसे तो अपनी नौकरानी चम्पा ले गई...”

झरना- चम्पा ले गई? हे भगवान्... कितनी मुश्किल से लंबा सा बैगन बाजार से लेकर आई थी, अपनी बुर में घुसाने के लिए और आपने सब्जी बनाने के लिए चम्पा को दे दिया।

दीदी- “सब्जी बनाने के लिए नहीं पगली...”

झरना- और क्या भाभी, उसका वो अचार बनायेगी?

दीदी- “अरे... तू जैसे अपनी बुर की खुजली मिटाती है ना, कभी बैगन, कभी गाजर, कभी मूली से, उसी तरह वो भी..."

झरना- क्या? वो भी?

इधर हम दोनों जीजा साले लगे हुए थे सासूमाँ के ऊपर। सासूमाँ की गाण्ड और बुर दोनों में ही लण्ड अटके पड़े थे।

दीदी- हाँ... चम्पा भी आखिर औरत है, उसकी भी कुछ चाहत है। जब से उसका मर्द उसे छोड़ के गया है। बेचारी और क्या करे?

झरना दीदी ने कहा- “हाँ, अब तो भैया भी नहीं चोदते उसे...”

दीदी- क्या तुम्हारे भैया उसे भी चोदते थे?

झरना- हाँ... क्या आपको भैया ने कभी नहीं बताया?

दीदी- नहीं तो... तेरे भैया भी ना। एक नंबर के... छोड़... फिर चोदना क्यों बंद कर दिया?

झरना- “अरे, तुम्हारी शादी से पहले की बात है। उसके मर्द को गये साल भर हो चुका था। चम्पा गाभिन हो। गई... बड़ी मुश्किल से मम्मी ने दवाई दिलवाई, और भैया को पता भी ना चलने दिया। पर चम्पा को खबरदार कर दिया गया की भैया की तरफ आँख उठाकर भी ना देखे। उस दिन का दिन और आज का दिन... चम्पा पूरी तरह से सुधर गई है।

तभी जीजाजी ने अपनी मम्मी की गाण्ड में धक्का लगाते हुए कहा- तभी मैं सोचू साली इतना भाव क्यों खा रही है

 
सासूमाँ गाण्ड उछालते हुए बोली- और नहीं तो क्या? बेटे, चुदाई का इतना ही शौक है तो अपनी बीवी की चुदाई कर ना... इधर-उधर मुँह मारने की क्या जरूरत है? और तेरी बीवी तो तुझे कभी मना भी नहीं करती।

दीदी- हाँ मम्मीजी, ये सही कहा आपने। मैं चुदाई के लिए कभी मना नहीं करती। चाहे कभी भी, कहीं भी, कोई भी मेरा मतलब है इनसे याने आपके बेटे से चुदवाने के लिए मैं हमेशा तैयार रहती हूँ... क्यों जी?

जीजाजी ने कहा- “ये बात सही है मम्मी। पर बदलाव के लिए कभी-कभी दूसरी चूत...”

मम्मी- “अरे बेटा उसके लिए मैं हूँ... और जब तक झरना यहां है उसकी भी ले सकता है। झरना ने तो कभी मना नहीं किया...”

झरना- हाँ भैया, बोलो कब मैंने आपको मना किया?

जीजाजी- “क्यों? उस दिन मना किया तो था। जिस दिन आई थी...”

झरना- अरे भैया आपको बता तो दिया था की उस दिन मेरा तीसरा दिन था तो कैसे चुदवाती बोलो? और भैया, आप मम्मी की गाण्ड में धक्के लगाते हुए सुनो- “तो मैं कह रही थी की मैंने आपको क्यों मना किया? और फिर उसके दूसरे दिन मैंने आपसे तीन बार चुदवाया तो था...”

जीजाजी- “अरे.. तो मैं तीन दिन से प्यासा भी तो था.. तेरी भाभी मायके गई थी.. मेरी सेक्रेटरी की फुददी भी लाल पानी फेंक रही थी...”

मेरी दीदी- “अरे.. आप उस बूढ़ी सेक्रेटरी को भी नहीं छोड़े?

जीजाजी- क्या करता रानी? लण्ड को कैसे समझाता?

दीदी- “चोदो-चोदो, अभी तो अपनी माँ की गाण्ड के मजे लो...”

मैं उनकी बातों को केवल सुन रहा था, कुछ बोल नहीं रहा था... नीचे से हुमच-हुमच कर धक्का लगा रहा था। मेरा लण्ड सासूमाँ की बुर में अंदर-बाहर हो रहा था। जब मैं नीचे से धक्का लगाता तो जीजाजी रुक जाते। मैं लण्ड को बाहर निकाल लेता तो जीजाजी पीछे से धक्का लगाते, इस तरह से हमारी चुदाई चल रही थी।

मैंने दीदी से कहा- “दीदी आप एक कम करो कि सासूमाँ के पास आ जाओ...”

दीदी सासूमाँ के पास आ गई।

मैंने कहा- “दीदी सासूमाँ के मुँह के पास अपनी बुर को फैलाओ...”

दीदी- “क्यों? क्या सासूमाँ के मुँह के पास बुर रखने से सासूमाँ के मुँह से कोई लण्ड प्रगट हो जाएगा और मेरी बुर में घुसेगा? बात करते हो भैया... तड़पाओ तड़पाओ अपनी दीदी को खूब तड़पाओ। और तुम? तुम भी लगे रहो। अपनी मम्मी के गाण्ड में..."

जीजाजी- “अरे रानी, मैं तो वही कर रहा हूँ जो तेरे भाई ने कहा है...”

दीदी- “भाई ने कहा है? अरे भाई तो मजे लूट रहा है। आने के टाइम बस में अपनी बहन को नहीं छोड़ा। वो। अलग बात है की मैं भी अपने सगे भाई दमऊ से चुदवा रखी हूँ। और जब-जब मायके जाती हूँ जमके चुदवाती हूँ... पर मैंने इस रामू भैया से चुदवाने का सपने में भी नहीं सोचा था की इनसे चुदवा सकेंगी। क्योंकी ये मुझे उस नजर से देखते ही नहीं थे...”

मैं उसे अपनी बहन ही मानता... था हर साल रखी भी बांधता था। और इस साल मैंने रखी बंधवाने का फर्ज़ भी निभा दिया था

दीदी- “हाँ तो... जी, मैं ये कह रही थी की आप मेरे इस रामू भैया की बातों पे आकर अपनी माँ की गाण्ड में लण्ड डाल बैठे। मेरे भाई रामू की तो पाँचो उंगलियां घी में है और इनका सिर कड़ाही में..."

 
तभी झरना ने अपनी भाभी की चूत को सहलाते हुए कहा- “सही बोल रही हो भाभी आप... पहले इसने आपको चोदा... फिर मुझको याने झरना को। फिर उसने मेरी मम्मी को चोदा। फिर इसने अपने भाई को भी नहीं छोड़ा...”

दीदी- भाई को भी नहीं छोड़ा? क्या मतलब है झरना?

झरना- “तुमने देखा नहीं भाभी? भैया कैसे मजे ले लेकर रामू भैया का लण्ड चूस रहे थे, और अभी फिर से मम्मी की बुर में लण्ड पेले जा रहे हैं... पेले जा रहे हैं."

उधर सासूमाँ मजे ले लेकर चुदवा रही थीं- “हाँ हाँ बेटे इसी तरह चोदते रहो... लगे रहो। एक आगे एक पीछे... गाण्ड मराये दुनियां सारी... भर दो मेरी चूत में लण्ड और फाड़ दो गाण्ड हमारी। बस बेटे और सहन नहीं हो रहा। हाँ मेरा पानी निकलने ही वाला है... हाँ हाँ...”

तभी सासूमाँ का पानी छूटा और वो चिल्लाने लगी- बस करो मरदूदों... क्या मुझे मार ही डालोगे क्या?

दीदी- नहीं और चुदवा लो सासूमाँ। अभी तो रात बाकी है... अभी तो बात बाकी है। अभी तो आपके बेटे ने आपकी गाण्ड मारी है और भैया ने चूत फाड़ी हैअभी एक काम करो अपने बेटे से चूत फड़वा लो और... मेरे भाई के लण्ड से गाण्ड फड़वा लो।

सासूमाँ- “बस कर बेटी। अभी मेरी बारी गई, अभी तेरी बारी आई है। इन्होने वियाग्रा खाया है। सोच लो हम तीनों की बुर की शामत आई है...”

झरना- क्या सच में माँ?

सासूमाँ- “हाँ बेटी, हाँ...”

मैं- “पर सासूमाँ, हमने तो वियाग्रा नहीं खाया है...”

सासूमाँ- “खाया है बेटे... तुम दोनों के खाने में मैंने वियाग्रा की गोली मिला दी थी...”

झरना- लेकिन मम्मी, आपके पास कहाँ से आई गोली?

सासूमाँ- “अरे, मैं अभी-अभी मायके से आ रही हैं। तेरे नानाजी का इसके बगैर काम नहीं चलता और मेरा उनके लण्ड के बगैर काम नहीं चलता तो रखनी पड़ती है बेटी। समझा कर..."

झरना- “ठीक है मम्मी... अबकी मैं नानाजी के यहां जाऊँगी तो साथ में लेकर जाऊँगी...”

सासूमाँ- ये हुई ना समझदारी वाली बात? अब मेरी बेटी रामू से चुदवाएगी और मेरा बेटा अपनी बीवी को चोदेगा।

दीदी- क्यों मम्मी? मैं तो अपने भाई से चुदवाऊँगी।

 
सासूमॉ- अरे तुम ही तो सुबह कह रही थी की मैं आज रात भर अपने सैंया से चुदवाऊँगी।

दीदी- हाँ... पर आपको कैसे पता चला?

सासूमाँ- भूल गई, मेरी जासूस वहाँ मौजूद थी।

झरना- हाँ... मैंने मम्मी को बता दिया था।

दीदी- बदमाश... खैर एक बार चुदवा ले। मैं भी इतना अपने सैंया से चुदवाती हूँ। सासूमाँ, तब तक आप क्या करेंगी?

सासूमाँ- मैं थोड़ा आराम कर लेती हूँ। थक गई हूँ। आज पहली बार मेरे दोनों छेद एक साथ चुदे हैं।

मैंने झरना की बुर में अपना लण्ड पेल दिया तो जीजाजी ने दीदी की बुर में। कमरे में केवल धक्कों की आवाजें ही नहीं आ रही थीं... उसके साथ में आह्ह... उन्ह... फछ... फछ... की आवाजें भी आ रही थीं। लग रहा था की जीजाजी और मुझमें चुदाई की प्रतियोगिता हो रही थी। दोनों ही हुमच-हुमच कर धक्के लगा रहे थे। हमारी दोनों पार्टनर भी चूतड़ उछाल-उछालकर हम लोगों का साथ दे रही थीं।

मैं- जीजाजी, क्या सोच रहे हो?

जीजाजी दीदी की बुर में लण्ड पेलते हुए- बस साले साहब तुम्हें मेरी दीदी को चोदते देखकर कुछ जलन सी हो। रही है।

मैं- जीजाजी, जलन हो रही है? आप भी तो मेरी दीदी को चोद रहे हो। मैं तो जल नहीं रहा हूँ।

जीजजी- “अरे साले साहब, वो तेरी बहन के साथ-साथ मेरी बीवी भी तो है। और बीवी की चूत चुदाई नहीं करूँ तो क्या इससे राखी बंधवा हूँ और ये गाना गाये... भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना...”

मैं- “तो आपकी बहन होती तो भी आप कहाँ छोड़ने वाले थे। अपनी सगी बहन को तो अपने छोड़ा नहीं। शादी से पहले ही चूत का बाजा बजा दिया। उनके पति को चुदी चुदाई चूत चोदने को मिली। मेरी दीदी अगर आपकी बहन होती तो गाना गातीभैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, रात को सबके सोने के बाद आ जाना। अपने लौड़े को चूत में घुसाना, मेरी चूत की खुजली को मिटाना। अपने रस को फुद्दी में भर जाना, भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना।

झरना नीचे से अपना चूतड़ उछालती हुई बोली- “वो रामू भैया, इससे कहते हैं असली भाई बहन का असली प्यार... दुनियां खाए आम अचार... हम तो भैया से चुदवायेंगे मेरे यार... तुम मना कर लो चाहे एक हजार... हम चुदवायेंगे बार-बार...”

मैं- एक काम करते है जीजाजी?

जीजाजी- क्या बोलो साले साहब?

मैं- अपन जोड़ी बदल लेते हैं।

जीजाजी कुछ कहते इससे पहले दीदी ने ऐसा चूतड़ उछाला की जीजाजी एक तरफ हो गये।

दीदी बोली- "ये हुई ना अकलमंदी की बात मैं अपने भाई से चुदवा के खुश, झरना अपने भाई से चुदवा के खुश। आप अपनी दीदी को चोदकर खुश तो मेरे ये बलमा अपनी बहन की फुद्दी में अपना लण्ड डालकर खुश। क्यों बलमा, सही कहा ना मैंने?

 
मैं- “हाँ मेरी रानी... तुम कभी गलत हो ही नहीं सकती। आखिर सत्यवादी राजा हरीशचंद्र के खानदान से जो हो...”

झरना- हाँ भैया बहुत मजा आएगा.. एक ही चुदाई में दो-दो लण्ड से चुदवाना... बड़ा अच्छा लगता है।

मैं- बड़ा अच्छा लगता है। इसका मतलब? झरना, तुम्हारे साथ पहले भी ऐसी नौबत आ चुकी है?

झरना- आ चुकी है का क्या मतलब है भैया? मेरे ये... याने तुम्हारे जीजाजी और मेरे देवर अपनी शादी होने तक रोज रात को मेरे कमरे में बारी-बारी से चोदते थे। पहले तेरे जीजाजी चोदते थे। फिर उनके सोने के बाद मेरे देवर पहुँच जाते थे। बगल में पति सोए रहते और मैं चूतड़ उछाल-उछालकर अपने देवर से चुदवाती थी।

मैं- पर झरना, जीजाजी को पता नहीं चलता था?

झरना- “अरे वो सोने का नाटक करते थे। देवर के जाने के बाद फिर से एक बार मेरी चुदाई करते थे तब जाकर उन्हें असली नींद आती थी। देवर की शादी के बाद ये सिलसिला टूट गया...”

जीजाजी- क्यों?

झरना- “अरे उसकी बीवी साली महा चालू है। मेरे पति के साथ तो मस्ती ले लेती है। पर मैं जब देवर के साथ चुदवाना चाहूं तो नखरा दिखाने लगती है... साली लण्डखोर...”

जीजाजी- फिर तुम कैसे करती हो?

इन्हीं सब बातों के बीच में दीदी मेरे लण्ड को अपनी चूत में समेट चुकी थी और मैंने धक्का लगाना चालू कर दिया। इधर जीजाजी ने भी अपनी बहन की बुर में अपना लौड़ा घुसाकर धक्का मारना चालू कर दिया।

जीजाजी- हाँ तो झरना, तुम कैसे करती हो?

झरना- “करना क्या है भैया? अपने पति का लण्ड तो है ही ना.. और उस साली के सोने के बाद देवरजी आ जाते हैं मुझसे मजा लेने...”

जीजाजी- तो बात क्या रही फिर?

झरना- तुम समझे नहीं भैया? अभी जैसे आप मुझे चोद रहे हो, रामू भैया दीदी को चोद रहे है। थोड़ी देर पहले तो उल्टा था ना... मैं उनसे चुदवा रही थी और आप भाभी की बुर में लौड़ा पेल रहे थे। वैसे ही मैं चाहती थी की एक ही कमरे में मैं... तेरे जीजा... देवर और देवरानी एक साथ चुदाई का दौर चलायें और जोड़ी बदलते रहें। पर देवरानी साली तो मानती ही नहीं है... पर रामू भैया के आने से मेरा ये सपना पूरा हुआ... मैं दिल से दुआकरती हूँ। कि रामू भैया को नई-नई चूत मिले चुदाई करने को। भैया का लण्ड भी तो जैसे गधे का उखाड़ कर लगा लिया ऐसा है। जो लड़की एक बार चुदवा ले, उसे और किसी दूसरे लण्ड में मजा ही नहीं आएगा...”

 
जीजाजी- क्यों झरना, मेरे लण्ड से मजा नहीं आ रहा है?

झरना- “ऐसी बात नहीं है भैया... आपसे मुझे भरपूर मजा आ रहा है। पर रामू भैया का लण्ड तो भरपूर से कहीं ज्यादा है और हद से ज्यादा मजा देता है...”

जीजाजी- हाँ... वो तो सच में गजब का है। साले के लण्ड का स्वाद भी गजब का है।

दीदी- “अच्छा... रामू भैया, पानी को अंदर मत गिराना, मुझे आपका रस पीना है। मैं भी तो देखें कि कितना स्वादिष्ट है? और कहते हैं की हर चुदाई के बाद कुछ नमकीन हो जाए। वैसे भी कहते हैं कि वीर्य में सब विटामिन होती हैं। अस्सी बूंद खून से एक बूंद वीर्य का बनता है...”

झरना- क्या सचमुच भाभी? वैसे भी बीच में डाक्टर ने कहा था कि मुझमें खून की कमी है। आज तो मैं भी भैया के रस की एक बूंद को भी जाया नहीं करूंगी। भैया, चलो जोर लगाओ... उधर देख नहीं रहे कि भैया कैसे पेल रहे हैं... रेलगाड़ी के पिस्टन की तरह भाभी की बुर में पेले जा रहे हैं... पेले जा रहे हैं...”

जीजाजी- “अरे पेल रहा हूँ, बहना पेल रहा हूँ। साले इस रामू का लण्ड खाकर तू भी ना... महा-चुदक्कड़ बन गई है। पहले मेरे लण्ड की दीवानी थी अब उसकी हो गई है...”

झरना- “दीवानी तो आपके लण्ड की अब भी हूँ भैया। और रामू भैया के लण्ड की महा-दीवानी। बस-बस, धक्का लगाते रहो। मैं भी तो नीचे से चूतड़ उछाल-उछालकर हर धक्के का जवाब दे रही हूँ...”

इधर दीदी भी मेरे हर धक्के का माकूल जवाब दे रही थी। पलंग चूऊँ-चूऊँ करके चरमराने लगा।

सासूमाँ को हम भूल गये थे। आवाज से उनकी नींद खुल गई। सासूमाँ चिल्लाई- “अरे बचाओ-बचाओ... भूकंप आ गया, भूकंप आ गया...”

दीदी- “अरे माताजी जी, भूकंप नहीं है। ये तो रामू भैया मेरी फुद्दी में लण्ड पेल रहे हैं। और ये... ये आपके सुपुत्र को देखो तो शर्म नहीं आ रही है... अपनी सगी बहन की बुर में लण्ड पेल रहे हैं, किसी भुक्खड़ की तरह... जैसे महीनों बाद चूत चोदने को मिली हो। इसी वजह से पलंग चरमरा के चूऊँ-चूऊँ की आवाजें निकाल रहा है...”

सासूमॉ- “अच्छा अच्छा... मैं अपने कमरे में सोने जा रही हूँ। तुम लोगों से कल सुबह मिलूंगी... हे राम... रे... साले दोनों ने जमकर गाण्ड और चूत में अपना-अपना लण्ड पेला है। कल सुबह चम्पा से तेल लगवा करके गरम सेंक लगवाऊँगी, तब जाकर आराम मिलेगा...”

दीदी- “और उस चम्पा से बुर भी चटवा लेना...”

सासूमाँ- अरे, तुझे ये राज भी पता चल गया?

दीदी- और नहीं तो क्या? जिस दिन ये नहीं रहते थे तो आपकी बुर चाटने के बाद, आपकी वो चम्पा-कली सीधे मेरे कमरे में आती थी... और रात भर हम दोनों एक-दूसरे की बुर में जीभ घुसेड़-घुसेड़ के मजा लेते थे।

 
सासूमाँ- “तभी मैं सोचूँ, साली एक बार चूत चाटकर थक गई करके कमरे से निकलकर आ जाती थी। आज पता चला..."

जीजाजी- “अरे झरना, मेरा निकलने वाला है."

झरना- खबरदार... मेरे अंदर में नहीं डालना भैया... मैं पीना चाहती हूँ।

सासूमाँ- पी ले, पी ले बेटी... लौड़ामृत भाग्यवान लड़कियों को ही नसीब होता है।

जीजाजी ने अपना लौड़ा झरना के मुँह में ढूंस दिया और अगले ही पल जीजाजी सिसके- “हाँ हाँ झरना... पी ले, पी ले... सारा रस निचोड़ ले। हाँ.. तेरी माँ को चोदूं, तेरी सास को चोदूं, तेरी ननद को चोदूं, तेरी देवरानी को चोदू...”

दीदी- क्या बक-बक कर रहे हो जी?

झरना- “ये बक-बक नहीं है भाभी? ये मेरी सास, मेरी ननद, मेरी उस छिनाल देवरानी की बुर में अपना लण्ड पेल चुके हैं. इसीलिए...”

दीदी- हाँ... आप तो बड़े छुपे रुस्तम निकले.. और एक मैं थी, जो पहली बार अपने नंदोईजी से चुदवाकर कितना रोई थी।

जीजाजी- अच्छा रानी नंदोईजी के साथ पहली चुदाई के बाद क्या बोलकर रोई थी?

दीदी- मैंने उनसे कहा था... हाय... नंदोईजी आपने मुझे चोद के अच्छा नहीं किया? ये आयेंगे तो मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊँगी, दो-दो बार आपसे चुदवाकर?

फिर मेरे नंदोईजी ने आश्चर्य के साथ कहा था- दो-दो बार? पर भाभीजी मैंने तो अभी-अभी आपको सिर्फ एक बार ही चोदा है?

मैंने कहा था- “मेरे बुद्धू नंदोईजी... अभी रात बाकी है। एक बार और भी तो चोदोगे ना आप? और सच बोलू झरना तो तेरे पति ने उस रात मुझे तीन बार चोदा था...”

इधर मेरा भी पानी छूटने को था। मैंने दीदी से कहा- दीदी, मेरा भी छूटने वाला है?

दीदी- तो मेरे प्यारे भैया, मेरे मुँह में डाल दो। या ऐसा करो कि मेरे ऊपर आ जाओ, और मेरे मुँह को चोदो।

मैंने उनकी चूचियों के ऊपर बैठकरके उनके मुँह में लौड़ा घुसाके आगे-पीछे करना चालू किया। मुझे इस पोजीशन में अति आनंद आ रहा था। और थोड़े ही देर में मेरा फौव्वारा निकला... दीदी ने पूरा का पूरा पानी अपने गले में उड़ेल लिया।

 
दीदी और झरना दोनों की ही आँखें परम तृप्ति से बंद थी। दोनों ही दूध पीने के बाद बिल्ली जैसे होंठों पे जीभ चलाती है... वैसे ही अपने होंठों के ऊपर जीभ फिरा रही थीं। इसके बाद दीदी नंगी ही बाथरूम चली गई।

बाथरूम से आने के बाद झरना ने उनकी चूची दबाते हुए कहा- “हाँ... तो भाभीजी अब आप शुरू हो जाओ...”

दीदी- नहीं झरना दीदी, मेरी प्यारी ननद और मुझमें हिम्मत नहीं है. फिर से शुरू होने की।

झरना- अरे भाभीजी मैं बुर चटाई की बात नहीं कर रही हूँ?

दीदी- फिर क्या, अपनी अम्मा की चुदाई के बारे में बोल रही है?

झरना- दीदी की बुर में उंगली पेल देती है।

दीदी- प्लीज झरना दीदी... कल रात भर भैया ने कस-कस के बुर में लण्ड पेला है। आज पहले तुमरे भैया ने और बाद में मेरे भैया ने बाकी रही सही कसर भी पूरी कर दी है। साली मेरी बुर का तो बैंड ही बज गया है। अभी रहने दे मेरी प्यारी ननद।

मैंने देखा कि जीजाजी बड़े प्यार से अपनी बहन और बीवी को देख रहे है।

झरना- अरे नहीं भाभी... मैं चुदाई की बातें नहीं कर रही हूँ। अरे मैं तो मजेदार वाकया की बातें सुनना चाहती हूँ आपसे।

जीजाजी- हाँ हाँ मेरी प्यारी रानी। अब तुम्हारी बारी है। सुनाओ... तुम पहले किससे चुदवाई थी?

दीदी- आपको जरा भी शर्म नहीं आ रही है। अपनी बीवी से पूछ रहे हैं की उसने पहली चुदाई किससे करवाई थी?

जीजाजी- इसमें शर्म की क्या बात है मेरी प्यारी रानी। अब जब की सबका राज खुल चुका है।

अब हमें ये पता है की अपनी प्यारी मम्मी, अपने खुद के पति के अलावा, अपने खुदके ससुर से, अपने सगे भाई से, अपने सगे पिता से तो चुदवा ही रखी है।

इधर मैंने भी अपनी चुदाई का पिटारा सबके सामने खोल ही दिया की कैसे मैंने अपना कुँवारापन मंजरी बुआ और कजरी दीदी के संग खोया था। मैं अपनी खुद की दीदी और मम्मी को चोद चुका हूँ। आफिस में सेक्रेटरी और बास की बीवी की बुर में भी अपना मुँह लगा चुका हूँ।

इधर झरना दीदी भी कहीं कम नहीं हैं। वो भी मुझसे याने की अपने सगे भाई से, ससुराल में अपने पति के अलावा... अपने देवर से और नंदोई से चुदवा चुकी हैं।

 
इधर आज तुम्हारा राज भी तो खुल चुका है की तुम कल रात भर अपने भाई से बुर पेलवाकरके आई हो।

झरना- और यहाँ पे आपके अलावा, मेरे पति के लण्ड पे भी सावर हो चुकी है भाभी।

जीजाजी- हाँ... मेरे जीजाजी को तो भूल ही गया था। उनके काले लण्ड से भी तुम मजा ले चुकी हो।

दीदी- “पर आपको कैसे पता चला की उनका लण्ड काला है? कहीं आप.. हे राम राम राम... क्या जमाना आ । गया है। आपने अपने जीजा के लण्ड को भी चूस लिया...”

जीजाजी- “खाली चूसा ही नहीं रानी अपनी गाण्ड में पेलवा भी रखा है...”

दीदी- हे भगवान्... आपकी गाण्ड गाण्ड है या झुमरी तलैया का गहरा तालाब... लण्ड पे लण्ड लील रही है।

जीजाजी- हाँ... वो तो है। पर यहाँ बात हो रही है आपकी पहली चुदाई की?

दीदी- “आपको शर्म आनी चाहिए। सुहागरात को देखा नहीं कि मेरी चूत से कितना खून निकला था। पूरी चद्दर लाल हो गई थी, और मैं कितना चिल्लाई थी...”

जीजाजी- अरे हाँ रे... मुझे माफ कर दे रानी... तू तो शादी से पहले अनचुदी थी। पूरा माल सील बंद... पहले रस को मैंने ही चखा था।

असल में दीदी ने सुहागरात को नजर बचाकर लाल रंग अपनी बुर में लगा दिया था... ये सब दीदी ने मुझे बाद में बताया।

झरना- ओहो... यानी शादी से पहले आपको कोई लौड़ा मिला ही नहीं। अरे अपने भाई दमऊ से ही चुदवा लेती। या रामू भैया के इस विशाल लण्ड को ही अपनी बुर में पेलवा लेती?

दीदी- रामू भैया के लण्ड से पेलवा लेती, तो सुहागरात को तुमरे भैया मेरी चूत में पूरे घुस जाते तो भी मुझे पता नहीं चलता।

जीजाजी- हाँ हाँ.. हाँ... सही बात है।

दीदी- सही बात? क्या सही बात है? ऐसा कहीं होता है भला। अरे ये सब किस्से कहानियों में कथा को मजेदार बनाने के लिए ऐसे ही लिखी जाती है। कोई ऐसे ही थोड़े घुस जाता है किसी की बुर में। अरे बुर की बनावट ही ऐसी होती है की पतले से पतला लण्ड भी मजे ले-लेकर चुदाई कर सके है.. तो मोटे से मोटे लण्ड को भी बुर चुदाई के टाइम फैलकर जगह बना ही लेती है। हाँ शुरू-शुरू में थोड़ी सी तकलीफ होती है पर... मजा भी दोगुना मिलता है। क्यों झरना? मेरे प्यारे रामू के गधे जैसे लण्ड से चुदवाकर क्या तेरी फुद्दी पूरी फट गई है। आज भैया से दिन में दमदार चुदाई हुई है तेरी बुर की। अभी-अभी मेरे चुदवाने से पहले तेरी फुद्दी में ही तो था मेरे प्यारे भाई का लण्ड... बता उसके बाद अपने सगे भाई से चुदवाने में क्या तुझे मजा नहीं आया? बता की क्या तेरे भाई लण्ड समेत तेरी फुद्दी में घुस गये पूरे के पुरे?

 
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