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सहेली- हाँ... जीजाजी। मैं भी तो अपने कामरू जीजाजी से पहली बार ही चुदवा रही हूँ। क्यों जीजाजी?
कामरू- “हाँ... साली हाँ...”
सहेली- पर एक बात बताओ जीजाजी?
कामरू- बोलो।
सहेली- अगर हम आपकी साली हैं और आपके साथ चुदवा रहे हैं... तो आपकी बीवी कहाँ है? वो तो आपके दोस्त के साथ चुदवा रही है। क्यों जीजाजी?
कामरू- क्या बक-बक कर रही हो कमला?
सहेली- कमला नहीं जीजाजी... सहेली बोलो... सहेली। हम आपकी साली और... और आप हमरे जीजाजी। बस आप अपनी साली को चोदो, उसकी नई चूत का मजा लो... पर संभाल के... उसकी चूत आपके बड़े लण्ड की आदी नहीं है। संभाल के धीरे-धीरे चोदना कहीं फाड़ ना देना.. ऐसा फैला ना देना की उसकी चूत आपके दोस्त के पतले लण्ड के काबिल ही ना रहे।
कामरू- मैं तो यही चाहता हूँ साली। यही मैं चाहता हूँ कि ऐसा चोदू तुझे की तेरी फुद्दी ऐसी फैले की भादरू चोदे तो तुझे मजा ही ना आवे, और हर रात तू दौड़ी-दौड़ी मेरे लण्ड से चुदवाने को आए।
सहेली- फिर आपकी बीवी कमलावती... वो क्या करेगी?
कामरू- अरे उसे दिन में चोद दूंगा। या तू कहे तो दिन में घूमने आ जाना तो दिन में तुझे निपटा दूंगा। रात को बीवी है ही।
सहेली- तो जीजाजी... कैसी हैं आपकी साली की चूचियां?
कामरू- बहुत ही मस्त-मस्त चूचियां हैं। मैं तो पहले चुसँगा इनको।
सहेली- “तो चूसो ना जीजाजी। मना किसने किया?
कामरू- पर साली डर लगता है।
सहेली- “कैसा इर जीजाजी?"
कामरू- अरे भूल गई कमला... ओहो साली... सुहागरात के बाद में दिन में हुई पहली चुदाई के बाद उसी दिन रात को हुई चुदाई को। चीख-चीख कर सारे घर को इकट्ठा कर दिया था तुमने। फुद्दी ने लाल पानी फेंकना शुरू कर दिया था। बुर फूल के पावरोटी बन गई थी। हमरी अम्मा ने हल्दी डाल के गरम पानी से सेंक दिया तब जाकर तुम्हारी फुद्दी को थोड़ा सा आराम मिला था। फिर तुम लण्ड देखते ही थर-थर काँपने लग जाती थी। और बड़ी मुश्किल से ही तीन चार दिन बाद में चुदवाने के लिए राजी हुई। हमें ये कशम खानी पड़ी थी की मैं एक दिन में दो बार चुदाई नहीं करूँगा। जियो मेरी कमलावती।
सहेली- ना... ना... ना... जीजाजी कमलावती नहीं.. साली कहो साली... तभी मजा लूट पाओगे। अपनी बीवी को तो एकबार से ज्यादा चोद ना पाओगे। सली की फुद्दी की ही हिम्मत है जो लण्ड खड़ा होते ही इसे जांघ फैलाए हुए स्वागत में मुश्कुराते हुए पाओगे। अरे जीजाजी... उन बातों को साल भर हो गये। अभी मेरी फुद्दी आपके लण्ड के कबील हो गई है। अब दो बार तो चुदाई करवा चुकी हैं तीसरी बार घुसवाने को फुद्दी में चींटियां रेंगने लगी हैं।
कामरू- अरे, वाह साली वाह... आज तो मौजे ही मौजे हैं।
सहेली- अच्छा जीजाजी, मोजे ही मोजे हैं तो जूते कहाँ गये? आपकी अम्मा की बुर में।
कामरू- साली... मेरी अम्मा की झांटदार बुर तक आ गई... ये ले।
सहेली- जरा रुकिये जीजाजी... मैंने अम्मा की बुर कहा... और आपने अम्मा की झांटदार बुर कहा। इसका मतलब... जहाँ तक मैं समझती हूँ कि आप अपनी अम्मा को भी?
कामरू- अरे नहीं भगवान, नहीं... वो एक दिन अम्मा गर्मी में दोपहर को सोई हुई थी, और नींद में साड़ी ऊपर खिसक गई तो मुझे दर्शन हो गये थे और कुछ नहीं।
सहेली- अच्छा अच्छा... मैं तो समझी थी की आप अपनी अम्मा की बुर में अपना मस्ताना लण्ड पेल चुके हो।
कामरू- “अरे उस दिन मन तो बहुत कर रहा था पर डर के मारे हिम्मत नहीं हुई.. और..."
सहेली- और... मूठ मार के रह गया।
कामरू- हाँ... पर साली, तुम्हें कैसे मालूम?
सहेली- और नहीं तो क्या? हम तो थे नहीं... वरना हमरी चूत में बजा देते। कोई चूत नहीं मिलने पर जैसे हम औरतें अपनी फुद्दी में गाजर, मूली, बैगन घुसा लेते हैं। वैसे ही मर्द लोग मूठ मारके शांत होते हैं।
कामरू- हाँ... साली, अब खाट-कबड्डी चालू करें।
सहेली- नहीं जी.. अभी तो कीर्तन है, जगराता करेंगे।
कामरू- “साली, तेरी मजाक करने की आदत गई नहीं। ल... ये गया मेरे लण्ड का सुपाड़ा तेरी मखमली फुद्दी के
अंदर।
सहेली- और... ये उछाला मैंने नीचे से अपना चूतड़।
सहेली- अरे सचमुच सैंया जी, आपका लौड़ा तो पूरा का पूरा घुस गया और हमें तो मालूम ही नहीं पड़ा। आज तो बहुत मजा आ रहा है।
कामरू- पूरा का पूरा घुस गया है। सपना देख रही है क्या साली? अभी तो मेरा केवल सुपाड़ा ही घुसा है। असल घुसाई तो अब होगी... ये ले।
सहेली- अरे बाप रे... क्या बाड़ दिया मेरी फुदी में सैंया जी... बस हो गया ना?
कामरू- ये मारा मैंने तीसरा धाक्का और घुस गया है आधा लौड़ा।
कामरू- “हाँ... साली हाँ...”
सहेली- पर एक बात बताओ जीजाजी?
कामरू- बोलो।
सहेली- अगर हम आपकी साली हैं और आपके साथ चुदवा रहे हैं... तो आपकी बीवी कहाँ है? वो तो आपके दोस्त के साथ चुदवा रही है। क्यों जीजाजी?
कामरू- क्या बक-बक कर रही हो कमला?
सहेली- कमला नहीं जीजाजी... सहेली बोलो... सहेली। हम आपकी साली और... और आप हमरे जीजाजी। बस आप अपनी साली को चोदो, उसकी नई चूत का मजा लो... पर संभाल के... उसकी चूत आपके बड़े लण्ड की आदी नहीं है। संभाल के धीरे-धीरे चोदना कहीं फाड़ ना देना.. ऐसा फैला ना देना की उसकी चूत आपके दोस्त के पतले लण्ड के काबिल ही ना रहे।
कामरू- मैं तो यही चाहता हूँ साली। यही मैं चाहता हूँ कि ऐसा चोदू तुझे की तेरी फुद्दी ऐसी फैले की भादरू चोदे तो तुझे मजा ही ना आवे, और हर रात तू दौड़ी-दौड़ी मेरे लण्ड से चुदवाने को आए।
सहेली- फिर आपकी बीवी कमलावती... वो क्या करेगी?
कामरू- अरे उसे दिन में चोद दूंगा। या तू कहे तो दिन में घूमने आ जाना तो दिन में तुझे निपटा दूंगा। रात को बीवी है ही।
सहेली- तो जीजाजी... कैसी हैं आपकी साली की चूचियां?
कामरू- बहुत ही मस्त-मस्त चूचियां हैं। मैं तो पहले चुसँगा इनको।
सहेली- “तो चूसो ना जीजाजी। मना किसने किया?
कामरू- पर साली डर लगता है।
सहेली- “कैसा इर जीजाजी?"
कामरू- अरे भूल गई कमला... ओहो साली... सुहागरात के बाद में दिन में हुई पहली चुदाई के बाद उसी दिन रात को हुई चुदाई को। चीख-चीख कर सारे घर को इकट्ठा कर दिया था तुमने। फुद्दी ने लाल पानी फेंकना शुरू कर दिया था। बुर फूल के पावरोटी बन गई थी। हमरी अम्मा ने हल्दी डाल के गरम पानी से सेंक दिया तब जाकर तुम्हारी फुद्दी को थोड़ा सा आराम मिला था। फिर तुम लण्ड देखते ही थर-थर काँपने लग जाती थी। और बड़ी मुश्किल से ही तीन चार दिन बाद में चुदवाने के लिए राजी हुई। हमें ये कशम खानी पड़ी थी की मैं एक दिन में दो बार चुदाई नहीं करूँगा। जियो मेरी कमलावती।
सहेली- ना... ना... ना... जीजाजी कमलावती नहीं.. साली कहो साली... तभी मजा लूट पाओगे। अपनी बीवी को तो एकबार से ज्यादा चोद ना पाओगे। सली की फुद्दी की ही हिम्मत है जो लण्ड खड़ा होते ही इसे जांघ फैलाए हुए स्वागत में मुश्कुराते हुए पाओगे। अरे जीजाजी... उन बातों को साल भर हो गये। अभी मेरी फुद्दी आपके लण्ड के कबील हो गई है। अब दो बार तो चुदाई करवा चुकी हैं तीसरी बार घुसवाने को फुद्दी में चींटियां रेंगने लगी हैं।
कामरू- अरे, वाह साली वाह... आज तो मौजे ही मौजे हैं।
सहेली- अच्छा जीजाजी, मोजे ही मोजे हैं तो जूते कहाँ गये? आपकी अम्मा की बुर में।
कामरू- साली... मेरी अम्मा की झांटदार बुर तक आ गई... ये ले।
सहेली- जरा रुकिये जीजाजी... मैंने अम्मा की बुर कहा... और आपने अम्मा की झांटदार बुर कहा। इसका मतलब... जहाँ तक मैं समझती हूँ कि आप अपनी अम्मा को भी?
कामरू- अरे नहीं भगवान, नहीं... वो एक दिन अम्मा गर्मी में दोपहर को सोई हुई थी, और नींद में साड़ी ऊपर खिसक गई तो मुझे दर्शन हो गये थे और कुछ नहीं।
सहेली- अच्छा अच्छा... मैं तो समझी थी की आप अपनी अम्मा की बुर में अपना मस्ताना लण्ड पेल चुके हो।
कामरू- “अरे उस दिन मन तो बहुत कर रहा था पर डर के मारे हिम्मत नहीं हुई.. और..."
सहेली- और... मूठ मार के रह गया।
कामरू- हाँ... पर साली, तुम्हें कैसे मालूम?
सहेली- और नहीं तो क्या? हम तो थे नहीं... वरना हमरी चूत में बजा देते। कोई चूत नहीं मिलने पर जैसे हम औरतें अपनी फुद्दी में गाजर, मूली, बैगन घुसा लेते हैं। वैसे ही मर्द लोग मूठ मारके शांत होते हैं।
कामरू- हाँ... साली, अब खाट-कबड्डी चालू करें।
सहेली- नहीं जी.. अभी तो कीर्तन है, जगराता करेंगे।
कामरू- “साली, तेरी मजाक करने की आदत गई नहीं। ल... ये गया मेरे लण्ड का सुपाड़ा तेरी मखमली फुद्दी के
अंदर।
सहेली- और... ये उछाला मैंने नीचे से अपना चूतड़।
सहेली- अरे सचमुच सैंया जी, आपका लौड़ा तो पूरा का पूरा घुस गया और हमें तो मालूम ही नहीं पड़ा। आज तो बहुत मजा आ रहा है।
कामरू- पूरा का पूरा घुस गया है। सपना देख रही है क्या साली? अभी तो मेरा केवल सुपाड़ा ही घुसा है। असल घुसाई तो अब होगी... ये ले।
सहेली- अरे बाप रे... क्या बाड़ दिया मेरी फुदी में सैंया जी... बस हो गया ना?
कामरू- ये मारा मैंने तीसरा धाक्का और घुस गया है आधा लौड़ा।