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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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चम्पारानी जीजाजी से सटी हुई थी। उनके मर्दाना जिम से निकल रही गंध उसे उत्तेजित कर रहा था। जीजाजी ने उसके सिर पे हाथ फेरा, चूचियां दबाते हुए उसे चूमने लगे। चम्पारानी भी अपनी जीभ को उसके मुँह में घुसेड़ दी। जीजाजी के हाथ अब पीठ पे होता हुआ उसके चूतड़ को सहलाने लगे। चम्पारानी ने जीजाजी की बलों से भरी हुई छाती के ऊपर एक चुम्मी दे दी। दोनों एक-दूसरे से लिपट गये। उसकी दोनों चूचियां जीजाजी की छाती से चिपक गई। उसने महसूस किया की जीजाजी के हाथ उसकी जांघों को सहलाते हुए जांघों के जोड़ों की तरफ बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे उनके हाथ चूत की दोनों फांकों को फैलने लगे और चूत के दानों के ऊपर उंगलियां चलाने लगे। जीजाजी के ऐसा करने से चम्पारानी उत्तेजित होने लगी। वो उनके ऊपर चढ़ गई, और उनके लण्ड को सहलाने लगी। उनका लण्ड एकदम सख्त हो चुका था।

चम्पारानी- हाय भैया, आपका तो मस्त और बड़ा हो गया है। आज तो मेरी फुद्दी की खैर नहीं। आज आप मेरी फुद्दी को फाड़ के ही मानोगे। मेरी तो अभी से फुद्दी गीली हो चुकी है।

चम्पारानी ने झुक करके पहले तो एक चुम्मा दिया और फिर गप्प से अपने मुँह में ले लिया।

जीजाजी के मुँह से एक आहह... सी निकल गई। चम्पारानी ने थोड़ी देर लण्ड को चूसकरके गीला कर दिया। उसने जीजाजी को । आँखों ही आँखों में इशारा किया और पलंग पर लेट गई। जीजाजी ने उसे चूमना शुरू कर दिया। वो सिसकारी मारने लगी। जीजाजी उसकी चूचियां दबाते हुए एक चूची को चूस रहे थे। चम्पारानी उनके सिर को हाथों से पकड़कर नीचे की तरफ धकेल रही थी।

जीजाजी नीचे की तरफ बढ़ने लगे। चम्पारानी के पेट को चूमने लगे। चम्पारानी ने उनके सिर को जब और नीचे धकेला तो उनका मुँह नाभी के पास आ गया। वो नाभि में ही जीभ घुसेड़ने लगे। अब तो चम्पारानी तड़पने लगी। वो उनके सिर को और नीचे धकेलने लगी। अब जीजाजी के चेहरे के आगे चम्पारानी की चूत थी। अब जीजाजी उसे चाटने लगे। चम्पारानी तड़पने लगी। फिर जीजाजी उठे और चूत के ऊपर लण्ड को घिसने लगे। चम्पारानी की चूत पानी छोड़ने लगी।

जीजाजी ने चम्पारानी की चूत की दोनों फांकों को अलग किया और एक अंगूठा अंदर घुसेड़कर अंदर-बाहर करने लगे। ऐसे ही जब दो मिनट तक उन्होंने किया तो नीचे से चम्पारानी अपना चूतड़ उछालने लगी। अब जीजाजी ने अपने लण्ड का सुपाड़ा चूत के अंदर घुसाने लगे। चम्पारानी दर्द से आह्ह... भरने लगी। जीजाजी ने उसके होंठों को अपने होंठों से बंद करके एक धक्का लगाया। दर्द से चम्पारानी ने चीखना चाहा, पर उसके होंठ तो जीजाजी के होंठों से बंद थे। और तीसरे धक्के में पूरा का पूरा लण्ड घुस चुका था। जीजाजी ने अब चम्पारानी के गालों पर, होंठों पर, चूचियों को दबाते हुए चूमने लगे। अब वो चम्पारानी की चूत में अपने लण्ड को अंदर-बाहर करने लगे।

मजे में चम्पारानी अपना चूतड़ उछालने लगी। कुछ देर तक जीजाजी ने चुदाई चालू रखी। पर उन्हें लग रहा था की ज्यादा देर चम्पारानी की कसी हुई चूत को चोदना जारी नहीं रख सकते। उन्होंने एक पूरे धक्के के साथ। अपने लण्ड को चम्पारानी की चूत में अंदर तक घुसेड़ा और बाहर निकाल लिए। अब वो चम्पारानी के पेट के ऊपर बैठ के दोनों चूचियों के बीच में लण्ड सटा के चूचियों को ही चोदने लगे। और फिर कुछ समय बाद ही उनके लण्ड ने पिचकारी छोड़ना चालू कर दिया। पुछ-पुछ करके लण्ड से वीर्य की पिचकारी छोड़ने लगे। अब वो गहरी सांसें लेने लगे। और उसके बगल में ही लेट गये।

 
चम्पारानी उनसे लिपट गई और चूमने लगी। चम्पारानी का पानी अभी नहीं निकला था। जीजाजी समझ चुके थे की अभी चम्पारानी का पानी नहीं निकाला तो साली फिर कभी नहीं चुदवाएगी। वो उसकी फुद्दी में उंगली । डालकर अंदर-बाहर करने लगे, और फिर थोड़ी देर के बाद उसकी चूत से पानी की फुहार छूटने लगी। और जब जीजाजी ने चूत से उंगली निकाली तो चम्पारानी शांत हो चुकी थी। जीजाजी की ऊँगालियां चूत रस से गीली हो चुकी थीं। जीजाजी ने नजर बचाके अपनी ऊँगालियों को चूसने लगे। जब उनकी नजर चम्पारानी के नजरों से मिली तो चम्पारानी ने फट से एक आँख मार दी और... और वो शर्मा गये।

झरना- अरे वाह भैया, इतने सलीके से तो कभी आपने भाभी को भी नहीं चोदा होगा जितने सलीके से आपने आज चम्पारानी को चोदा है क्यों भाभी?

दीदी- हाँ... नहीं तो और क्या? कभी हमें इतने प्यार से नहीं चोदा... कभी आपको नहीं चोदा झरना दीदी। और कभी अपनी अम्मी को भी इतने प्यार से नहीं चोदा होगा, जितने प्यार से चम्पारानी की आज चुदाई हुई है। क्यों चम्पारानी?

चम्पारानी- हाँ... भाभीजी, आज से पहले भी मैंने ना जाने कितनी ही बार भैया से चुदवाया है। पर आज चुदाई एकदम ही अलग और मस्त लगी।

जीजाजी- अरे आप लोग तो खामखाह बात का बतंगड़ बना रही हो। वो आज चम्पारानी ने कितने खूबसूरती के साथ जो कमलावती और सहेली की कहानी सुनाई.. फिर अपनी सुहागरात की कहानी... मूंगफली है ये तो... लण्ड तो मेरे कामरू भाई का है... कहके सुनाई तो अपना भी तो फर्ज बनता है की हम भी इसे चोदन-सुख प्रदान करें।

दीदी- जी, हम भी यही चाहते हैं की आप हम सभी को चोद-चोदकर चोदन-सुख प्रदान करें।

चम्पारानी- हाँ हाँ... सुनो सुनो... सुनो... सभी चूतवालियों अपनी चूत खुजलाते हुए और लण्ड वाले लण्ड सहलाते हुए सुनें। अभी चम्पारानी अपनी चूत खुजलाते हुए प्रस्तुत कर रही हैं... एक और गरमा गरम कहानी।

सभी चम्पारानी की ओर देखने लगे। रामू चम्पा की चूत सहलाने लगे तो चम्पा ने झिड़क दिया।

चम्पा- रामू भाई, अभी-अभी आपके जीजाजी से चुदवाकर हटी हूँ। चूत को थोड़ा आराम चाहिए। आप अम्माजी की चूत को ही खुजलाइए।

झरना- और मैं क्या करूं? ठीक है, कल सुबह हमरे पति आएंगे ना... तो मैं उन्हें किसी को भी चोदने नहीं देंगी।

सासूमाँ- अरे झरना बेटी, अबकी नंबर तेरा ही है। तू चुदवा ले एक बार... पर जमाई राजा के साथ।

झरना- “ठीक है अम्माजी... पर मैं रामू भैया से जमकर चुदवाऊँगी हाँ...”

दीदी- चम्पारानी, तू शुरू हो जा। तेरी नई कहानी शुरू कर।

 


चम्पारानी- हाँ... तो सब लोग सुनो। एक और गरमा-गरम कहानी... मेरी जुबानी।

मेरी नई-नई शादी हुई थी। जैसा की आप लोग जानते ही हैं की मैं एकदम देहात गाँव में शादी हो रखी हूँ। पति पढ़े-लिखे हैं। शादी के बाद वो शहर चले गये। ससुराल में सास, ससुर और मेरा छोटा सा प्यारा सा देवर।

सासूमाँ- तो... तूने अपने देवर को भी नहीं छोड़ा चम्पारानी?

चम्पारानी- तो क्या करती अम्माजी? पति तो शादी के तीसरे दिन ही शहर चले गये। रविवार को आते थे और अपनी मूंगफली को मेरी फुद्दी में घुसेड़कर दो मिनट में ही खल्लास हो जाते थे। तो एक दिन मैंने देखा की मेरा छोटा देवर, जो अभी जवान हो चुका था, पेशाब कर रहा था और मेरी नजर उसके खड़े हुए लण्ड पर पड़ी तो... हाय... मैं सिर से लेकर पाँव तक काँप गई... क्या लण्ड था उसका? बाप रे... उसके आगे तो मेरे कामरू भैया का लण्ड भी कुछ नहीं था। मैंने सोचा की कितनी खुशकिश्मत होगी मेरी देवरानी जिसकी फुद्दी में इतना बड़ा, इतना मोटा, शानदार लौड़ा घुसेगा। उसकी फुद्दी के भाग ही खुल जाएंगे। उसके बाद मैंने सोचा की देवर राजा को ट्रेनिंग देनी चाहिए।

कहीं हड़बड़ा करके जोश में आकर एक बार में ही लौड़ा देवरानी की फुद्दी में घुसेड़ दिया तो गजब हो जाएगा। देवरानी की फुद्दी का तो भुर्ता बन जाएगा। मुझे कुछ ना कुछ करना होगा और शादी से पहले ही देवर को चुदाई की ट्रेनिंग देना होगा। मैंने धीरे-धीरे देवर को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया। उसके कमरे में झाडू लगाने जाती तो जानबूझ करके पल्लू को गिराते हुए उसे अपनी चूचियों के दर्शन कराती। और धीरे-धीरे देवर मेरी ओर झुकने लगा। पर वो कहने से और पहल करने से डर रहा था। और एक रात... हाँ एक रात को मुझे मौका मिल ही गया। सास और ससुर चार धाम की यात्रा पर गये हुए थे। सोमवार था उस दिन। पति अपना मूंगफली वाला लण्ड मेरी फुद्दी में घुसेड़कर उसमें आग लगाकर सुबह-सुबह ही शहर जा चुके थे। अगले रविवार तक के लिए।

मैंने सोचा- आज अगर मैंने देवर को पटा लिया तो घर की इज़्ज़त घर में ही रहेगी और मेरी फुद्दी की प्यास भी बुझ जाएगी, देवर को फ्री में चुदाई की ट्रेनिंग भी मिल जायेगी। बस... यही सोच रही थी मैं की मूसलाधार बरसात होने लगी।

वैसे हमारा घर पक्का है। हम दोनों ही खाना खाकर सोफे पे बैठकरके टीवी देख रहे थे की बिजली चमकी और उसके साथ-साथ मैंने भी मौके को देखते हुए चीख मारी और देवर के साथ बुरी तरह से लिपट गई। मेरी दोनों चूचियां उसकी छाती में दब रही थी। देवर मेरी पीठ पर हाथ फेर रहा था, मुझे समझा रहा था। और मैं उसके साथ चिपक करके उसकी पीठ पर दोनों हाथ फिरा रही थी। उसके हाथ धीरे-धीरे पीठ से नीचे की ओर बढ़ने लगे, और फिर चूतड़ों को साड़ी के ऊपर से ही सहलाने लगे। मेरी फुद्दी के पास मुझे कुछ कड़कपन महसूस हुआ। मैंने समझ लिया की देवर राजा का तंबू का बम्बू अपनी पूरी लंबाई में आ चुका है और अब असल खेल की बारी आ चुकी थी।

मैंने उसकी लुंगी के ऊपर से ही लण्ड को सहलाते हुए पूछा- अरे देवर राजा, ये लुंगी के भीतर क्या छुपा रखा है?

देवर घबराते हुए- अरे, कुछ नहीं है भाभीजी।

मैं- कुछ कैसे नहीं है। बहुत ही कड़ा है। लोहे के सरिये जैसा कठोर है। देवरजी, लुंगी के भीतर ऐसी चीजें ना रखा करो। रात को निकालकर टेबल के ऊपर रख दिया करो। वरना नींद में कहीं लण्ड को आघात ना पहुँचा दे, ये लोहे का सरिया।

देवर शर्माते हुए- अरे भाभीजी, ये लोहे का सरिया नहीं है।

मैं- तो देवरजी... लोहे का नहीं है तो किसी और चीज का होगा। जो भी है चलो निकालकर टेबल के ऊपर रख दो।

देवर- अरे भाभीजी, मैं इसे टेबल के ऊपर नहीं रख सकता।

मैं- क्यों नहीं रख सकते?

देवर- क्यूंकी... क्यूंकी ये कोई चीज नहीं है।

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
मैंने उसके लण्ड को लुंगी के ऊपर से फिर से मुठियाते हुए दबाया- कैसे कोई चीज नहीं है?

देवर- अरे भाभीजी, ये मेरा लण्ड ही है।

मैंने हड़बड़ाने का शानदार नाटक किया- क्या कहा देवरजी तुमने? क्या ये आपका लौड़ा है? लण्ड है?

देवर शर्माते हुए- हाँ भाभी, ये मेरा लण्ड ही है।

मैं- मैं नहीं मानती की इतना कड़क... आपका लण्ड हो सकता है।

देवर- अरे भाभी, आप यकीन मानो कि ये मेरा लण्ड ही है।

मैं- मैं नहीं मानती। चलो दिखाओ तो जरा... मैं भी तो देखू की ये सचमुच आपका लण्ड ही है या आपने कुछ चीज छुपाकरके रखी है।

देवर- नहीं भाभी, मुझे शर्म आती है।

मैं- अरे देवरजी, अपनी भाभी से कैसी शर्म? किसी ने सही कहा है- “जिसने की है शरम, उसके फूटे हैं करम...” इसीलिए देवरजी, आप बिल्कुल भी ना शर्माओ और अपना लण्ड मुझे दिखाओ।

देवर- नहीं भाभी, मैं नहीं।

मैं- “क्या नहीं नहीं लगा रखा है? इतनी भी क्या शर्म? अच्छा चलो मैं अपना ब्लाउज़ खोलकर अपनी चूचियां आपको दिखती हूँ। लो...” और मैंने अपना ब्लाउज़ खोल दिया। लालटेन के उजाले में मैंने देखा की देवरजी की आँखें चमक रही थी।

रामू भैया ने चम्पारानी की चूत को सहलाते हुए पूछा- फिर क्या हुआ? चम्पारानी।

चम्पारानी- फिर क्या हुआ? हम बाद में बताएंगे पहले आप मेरी चूत के ऊपर से हाथ हटाइए। चलिए बहुत हो गया आपका नाटक। चलो अभी झरना दीदी की चूत सहलाओ।

रामू- अरे... पर, इसमें इतना भड़क क्यों रही हो। चूत नहीं देना है नहीं दो, पर भड़को मत।

चम्पारानी- क्या भैया? भड़को मत, भड़को मत कह रहे हो। इधर हमारी झरना दीदी कितनी तड़प रही हैं कुछ खयाल है आप दोनों जीजा साले को? नहीं है... पर हमें तो है।

 
झरना- अच्छा, चम्पारानी... आज तो बड़ी मेहरबान हो रही हैं हम पर। पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ? आज क्या खास बात है?

दीदी- खास बात ये है झरना दीदी की कल आ रहे हैं हमरे जीजाजी... याने की आपके प्यारे पतिदेव और अभी आपके ऊपर ये मेहरबान होगी तभी तो कल आप भी उसके ऊपर मेहरबान होकर अपने पति को कहोगे की- ओ जी तनिक इस बेचारी चम्पारानी की चूत की भी कुछ सेवा कर दीजिए।

चम्पारानी- हाँ नहीं तो और क्या? आप लोग नये-नये लण्ड से चुदवाओ और हम वहाँ किचेन में अकेले अपनी चूत में उंगली करते रहें।

सासूमाँ- हाँ... तो चम्पारानी शुरू हो जा। लेकर एक गरमा-गरम कहानी। जिससे की हमें बिना चोदे ही चोदन-सुख मिले।

चम्पा- हाँ हाँ... अम्माजी... अभी तो आप बोलोगी ही की बिना चोदे ही चोदन-सुख मिले। एक बार रामू भैया से

और एक बार अपने खुद के बेटे से बुर में लौड़ा पेलवा करके बुर की खुजली जो मिटा चुकी हो आप। कहती हैं। बिना चुदाई के चोदन-सुख मिले। अरे बिना चुदाई के चोदन-सुख मिले तो कैसे मिले।

असली लण्ड ही बुझाए चूत की प्यास, गाजर, मूली, बैगन सब कुछ है बकवास।

दीदी- सही कहा चम्पारानी। पर तू भी इनके बेटे के लौड़े का रस अपनी चूत में डलवा के खुजली मिटा चुकी हो। बस अब शुरू हो जाओ, और हमें ये बताओ की तुमरे पति के लौड़े के साथ कैसी हुई तुम्हारी चुदाई।

चम्पा- जैसा की आप सभी जानते हैं कि मैं कम पढ़ी-लिखी थी फिर भी मेरे पति ने मुझे पसंद किया था। शादी के तीसरे ही दिन वो शहर नौकरी जाय्न करने चले गये।

झरना- और तुमरी चूत की खुजली बढ़ती ही गई... बढ़ती ही गई।

चम्पारानी- हाँ... झरना दीदी।

 
दीदी- तो फिर चम्पारानी। तूने अपनी चूत की खुजली मिटाने का बंदोबस्त कैसे किया? क्या अपने कामरू भैया को अपने पास बुला लिया या फिर तुम खुद ही उसके पास चली गई?

चम्पारानी- चाहती तो मैं भी यही थी भाभीजी की मैं दिन रात अपने कामरू भैया के मस्ताना लण्ड को अपनी प्यारी सी मखमली चूत में घुसाए रखें। पर लोक लाज के कारण ऐसा संभव नहीं था। उनके लण्ड का रस चखने का मौका भी मुझे तभी मिलता जब कमलावती भाभी अपने मैके जा रखी हो। तब कामरू भैया मुझे अपने साथ गाँव ले जाते और फिर दिन रात... दिन रात मेरी चूत में ऐसा लण्ड घुसाके पेलते की मेरी सारी खुजली ही दूर हो जाती। जब बहुत दिनों तक ऐसा मौका ना मिलता तो फिर मैं भैया को किसी ना किसी बहाने से अपने पास एक दिन के लिए ही सही, बुला लेती और फिर उस रात को मौका देखकर भैया मेरी चूत के मैदान में अपने लण्ड से चौका छक्का मार ही देते थे। पर ससुराल में मुझे बड़ा डर लगता था कि कहीं पकड़ी गई तो मुफ़्त में बदनामी हो जाएगी- “खाया पिया कुछ नहीं। और गिलास तोड़ा बारा आना” यही कहावत मुझपर लागू होती।

दीदी- फिर तो तुझे अपनी चूत की खुजली मिटने की जगह बढ़ती ही जाती होगी। फिर तूने क्या सहारा लिया? किसी पड़ोसी को अपनी चूत दिखाई... या अपने ससुर को तेल मालिश करते हुए उनके लण्ड की मालिश भी कर ली... और उनके लण्ड से अपनी चूत की मालिश भी करवा ली।

चम्पा- अरे, वाह भाभीजी... आप तो अंधेरे में बढ़िया तीर मार लेती हो।

दीदी- पर ये भी तो बता की मेरा तीर निशाने पर लगा की नहीं?

चम्पारानी- एक तीर निशाने पर नहीं लगा पर दूसरा सटीक लगा है।

दीदी- इसका मतलब?

चम्पारानी- इसका मतलब आई भौजी की मैंने किसी पड़ोसी को घास नहीं डाली। पर हाँ ससुरजी की मालिश जरूर की है।

झरना- वाउ... इसका मतलब अपने ससुरजी के लण्ड को चख ही लिया।

चम्पारानी- नहीं झरना दीदी, ससुरजी एकदम बूढ़े और अपने बाप सरीखे हैं।

दीदी- तो फिर?

चम्पारानी- तो फिर क्या भौजी... आप मेरी बात के बीच में अपनी चूत की झाँट जरूर डाल देते हो।

दीदी- ठीक है चम्पारानी, मैं चूत की झाँट का रोआं तेरी कहानी के आगे नहीं डालूंगी।

झरना- और भाभीजी, आप अगर चाहें तब भी नहीं डाल सकोगी।

दीदी- क्या?

झरना- चम्पारानी की कहानी के बीच में अपनी चूत की झांटों का रोआं।

दीदी- वो कैसे? भला, क्यों नहीं डाल सकती?

झरना- वो ऐसे भाभीजी की आपकी चूत पे तो गिनने के लिए भी एक भी झाँट नहीं है। आपकी चूत का मैदान तो झाँटरहित सफाचट है। क्यों कैसी कही?

दीदी- आप भी ना झरना दीदी... बड़ी वो हैं।

झरना- हमरी चोदो भाभी और चम्पारानी की सुनो... और तुम चम्पारानी, शुरू हो जाओ।

चम्पारानी- तो बात चल रही थी मेरी चूत में मच रही खुजली की जिसे मैं मिटा नहीं पा रही थी। और मेरी चूत की खुजली दिनों दिन बढ़ती ही जा रही थी। मेरे पतिदेव इधर हर रविवार को घर आते थे। रात को खाना खाकर वो कमरे में आते ही मुझे दबोच लेते थे।

 
झरना- और तुमरी चूत में अपना लण्ड पेल देते थे?

चम्पारानी- गलत... एकदम गलत।

दीदी- क्या गलत है इसमें चम्पा? चूत में तो लौड़ा पेलते ही थे तुमरे पति।

चम्पा- झरना दीदी तो गलत बोल ही रही थी पर आप... आप भाभीजी एकदम गलत हो।

झरना- क्या गलत हैं हम दोनों? बता? अरे पति अपनी पत्नी की चूत या बुर में अपना लण्ड या लौड़ा जो भी आप बोलते हो। उसे तो पेलता ही है, और चोदन-सुख देता ही है। इसमें गलत कहाँ हैं हम दोनों? बता... बता... बता। टेल... टेल... टेल।।

चम्पारानी- आपने कहा झरना दीदी की मेरे पति मुझे दबोच के मेरी चूत में लण्ड पेलते हैं। पर उनके पास लण्ड है कहाँ? और भाभीजी, आपने कहा की मेरी चूत में मेरे पति अपना लौड़ा पेलते हैं। पर उनके पास जब लण्ड ही नहीं है तो लौड़ा कहाँ से आई?

दीदी- क्या मतलब? तुमरे पति के पास लण्ड.. मेरा मतलब है कि लौड़ा नहीं है? क्या वो हिजड़े हैं?

चम्पारानी- नहीं भौजी, वो हिजड़े नहीं हैं... पर लण्ड और लौड़ा में फर्क क्या है ये आपको अभी तक नहीं मालूम?

दीदी- अरे चम्पारानी, जैसे तेरी ये फुद्दी है। कोई इसे फुद्दी कहता है, तो कोई चूत, तो कोई बुर कहता है, अँग्रेजी में इसे कंट या वेजाइना कहते हैं। वैसे ही मर्द के लण्ड को कोई लण्ड, तो कोई लिंग, तो कोई लौड़ा, तो कोई इंडा, तो कोई हथौड़ा और अँग्रेजी में इसे पोल, तो कभी पेनिस कहा जाता है।

चम्पारानी- पर भाभीजी, मैं तो एक बात जानती हूँ। जैसा लिंग आपके पति का, झरना दीदी के पति का है। उसे हम लण्ड कहते हैं। और जैसा की मेरे भाई कामरू का है, और इधर रामू भैया का है... उसे मैं लौड़ा कहती हूँ। समझ गई आप?

दीदी- ऊओ... ऊओ... अब समझी... पर तुमरे पति का ना लण्ड है ना लौड़ा तो फिर उनका क्या है?

चम्पारानी- अरे उनका लिंग ना लण्ड है ना लौड़ा। बल्की उनका तो मूंगफली है... मूंगफली। इतने जल्दी भूल गई। आप दोनों।

दीदी, सासूमाँ, जीजाजी, झरना, रामू भैया सब लोग ताली बजाके हँसने लगे।

दीदी- अरे भाई चम्पारानी, तुस्सी ग्रेट हो... छा गई यारा... क्या डायलाग मारा है तूने। मूंगफली है मूंगफली।

 
चम्पारानी- हाँ..भाई। वही तो मैं कह रही थी की मेरे पति हर रविवार को रात को मुझे दबोच लेते थे और मेरी कमसिन जवान बुर में अपनी मूंगफली घुसाके अंदर-बाहर करते थे।

दीदी- ये कह ना चम्पारानी की चूत में मूंगफली डालकर बुर चोदन करते थे।

चम्पारानी- आप फिर गलत हो... चूत में मूंगफली डालकर बुर चोदन नहीं होता है भौजी। केवल अंदर-बाहर, अंदरबाहर होता है। और फिर दो-तीन मिनट में ही वो खल्लास हो जाते थे मेरी चूत के अंदर और मेरी चूत की खुजली थी की मिटने के वजाय और भी बढ़ती ही जाती थी... बढ़ती ही जाती थी।

दीदी- अरे भाई चम्पा, फिर तूने क्या किया?

चम्पा- और मैं कर भी क्या सकती थी भाभी। कुछ दिन तो मैंने सबर किया। जब मैके गई तो कामरू भैया से खुजली पूरी तरह मिटाके ही आई। पर यहाँ ससुराल आते ही फिर वही खुजली।

दीदी- अच्छा... फिर तूने खुजली मिटाने का क्या उपाय सोचा चम्पा?

चम्पा- और फिर एक रात जब उन्होंने अंदर-बाहर, अंदर-बाहर वाला कार्यक्रम समाप्त किया और सोने की तैयारी करने लगे तो मैंने उनका सिर पकड़ा और उनके मुँह को अपनी दोनों जांघों के बीच में दबोच लिया। और फिर मेरे पतिदेव भी मेरी हालत को समझते हुए मेरी फुद्दी में उंगली करते हुए जीभ से चाटने लगे।

फिर मेरा जब पानी निकला तो उनका पूरा का पूरा मुँह उसमें भीग गया, और मैं बिस्तर पर शांत हो गई। और हमें जीने की एक राह मिल गई। अब जब भी रविवार को मेरे पति आते और चूत में अपनी मूंगफली का अंदरबाहर का प्रोग्राम खतम करके चूत चुसाई का कार्यक्रम भी जरूर से बिना नागा पूरा करते थे। और इसी तरह से हमरी जीवन की गाड़ी पटरी पर ठीक से चल ही रही थी की एक दिन।

दीदी- एक दिन? एक दिन क्या हुआ? चम्पारानी, जल्दी बताओ। हमारे दिल की धड़कन बढ़ती ही जा रही है। और चूत में खुजली होती ही जा रही है। बस कहानी को ऐसे बीच में मत चोदो और बताओ की आगे क्या हुआ?

चम्पारानी- बता रही हूँ भाभी। साँस तो लेने दो। हाँ तो... जैसे की मैं कह रही थी की मेरे पति हर रविवार को शहर से गाँव मेरे पास आते थे। चूत में अपनी मूंगफली डालकर अंदर-बाहर करते हुए, मेरी फुद्दी को चाटके मुझे शांत भी कर देते थे। और अगले सट दिन के लिए मुझे तड़पता छोड़कर सोमवार को सुबह-सुबह ही शहर चले। जाते थे। घर में मेरे सास, ससुर और नया-नया जवानी में कदम रखता मेरा छोटा सा प्यारा सा मासूम सा देवर भी था। जो मुझसे पूरा ही हिल मिल गया था।

 
सास-ससुर बाहर वाले कमरे में सोते थे। मैं एक कमरे में और उसके बगल के कमरे में मेरा देवर सोता था। मेरे सास-ससुर चार धाम की यात्रा पर गये हुए थे। सोमवार का दिन था। याने मेरे पति अगले रविवार तक नहीं आने वाले थे। घर में सिर्फ मैं और मेरा छोटा सा देवर थे।

तो बात सोमवार दोपहर की हो रही थी। मैं छत के ऊपर कपड़े सुखा रही थी की तभी मेरी नजर गली में पेशाब कर रहे मेरे देवर के ऊपर पड़ी। और जैसे ही मेरी नजर उसके लौड़े के ऊपर पड़ी... हाय... क्या बताऊँ भौजी... मैं सिर से लेकर पाँव तक काँप गई। हाय... क्या लौड़ा था उसका झरना दीदी। एकदम कड़क... अपने कामरू भैया से भी कुछ बड़ा और मोटा सा था। मेरी चूत में खुजली होने लगी। मैं साड़ी के ऊपर से ही चूत के ऊपर हाथ फेर। कर उसे शांत करने की, समझाने की नाकाम कोशिश करने लगी। पर हाय री चूत की खुजली... जब से देवर का लण्ड देख ली इसमें खुजली बढ़ती ही जा रही है।

हाय राम रे... क्या करूं? क्या ना करूं? कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। मन कह रहा था कि जा देवर से लिपट जा। पर मेरे भीतर से एक और आवाज आई- नहीं नहीं ये गलत है।

फिर से मन ने कहा- अच्छा... देवर से चुदाना गलत है? और जो तू शादी से पहले ही अपनी चूतवा में अपने सगे भाई कामरू का मस्ताना लण्ड पेलवाती रही उसका क्या?

भीतर से फिर से आवाज आई- उसी की कीमत तो अभी चुका रही हैं। अपने पति के मूंगफली से संतुष्ट नहीं हैं। फिर भी आज तक किसी पराए मर्द पर गंदी नजर नहीं डाली।

मन ने कहा- फिर मायके जाकर शादी के बाद भी अपने कामरू भैया से क्यों चुदवाती है?

भीतर से आवाज आई- वो तो मेरे भैया हैं। कोई बाहर वाला थोड़ी है। घर की इज्ज़त घर में ही है।

मन ने फिर कहा- तो ये तेरा प्यारा सा देवर कौन सा बाहर वाला है। ए भी घरवाला ही है। इससे चुदवा लोगी तो ये कौन सा बैंड-बाजा लेकर सारे गाँव में कहता फिरेगा की लो जी मैंने अपनी चम्पा भाभी की चूत में लण्ड घुसाकर कस्स-कस्स के चोद के उसकी चूत के सारे कस-बल ढीले कर दिए।

भीतर से आवाज आई- वो तो है... पर एकदम मासूम है मेरा देवर।

मन ने फिर कहा- हाँ... देख कितना बिशाल है, कितना मोटा है, तेरे कामरू भैया से भी तगड़ा है इसका लण्ड। पहली चुदाई की याद फिर से ताजा हो जाएगी... हाँ नहीं तो... अरे पटा के चुदवा ले, देर ना कर...

दो-तीन साल में इसकी शादी हो जयगी, फिर तुझे ये घास भी नहीं डालेगा। नया-नया जवान हुआ है, इससे पहले की कोई लड़की इसे पताके चुदवा ले... तोड़ दे इसका कुँवारापन्न... कर ले अपनी मुट्ठी में।

भीतर से दिल की आवाज आई- पर किसी को कुछ पता चल गया तो?

मन ने फिर से समझाया- किसी को कैसे पता चलेगा? कौन बताएगा? ये तेरा मासूम सा प्यारा सा देवर तो। किसी को बताने से रहा की मैंने अपनी भाभी चोद दी है। और तू? तू इतनी पागल तो है नहीं की हर किसी के सामने कहती फिरे की लो जी हमने भी चुदवा लिया है अपने देवर के मुस्टंडे लण्ड से। देखो, दर्द के मारे फुद्दी सूज गई है।

 
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