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नए पड़ोसी complete

पर शायद उनकी चुदाई भी काफी देर से चल रही थी इसीलिए 5 मिनट के अन्दर ही रश्मि दीदी कहने लगी "और जोर से मयंक मैं बस झड़ने वाली हूँ. हाँ जोर से हाम्म्म आःह्ह्ह." मयंक ने भी चुदाई की स्पीड बढ़ा दी और अब उसका लंड दीदी की चूत से ऐसे अन्दर बाहर हो रहा था जैसे की किसी इंजन का पिस्टन और एक मिनट के अन्दर ही दोनों साथ साथ झड गए. मयंक ने दीदी की चूत से अपना लंड निकाला तो पक्क की आवाज आई और दीदी की चूत से मयंक का वीर्य बह कर बाहर आने लगा. मयंक दीदी के साथ की सोफे पर बैठ गया. दीदी के पानी से भीगा मयंक का लंड हाल की रौशनी में चमक रहा था.

दो मिनट बाद मयंक उठा और अपने कपडे पेहनने लगा और बोला "रश्मि आज तो सच में तुमने कमाल ही कर दिया. इतना मजा तो आज तक मुझे नहीं आया. इतनी पोजीशन तो मुझे भी नहीं आती है जो तुमने सिखा दी." दीदी बोली "अब तुम जा रहे हो तो इतना तो बनता था की ये वाली चुदाई तुमको हमेशा याद रहे और वैसे भी आज मनीष और रुची भी नहीं थे तो खुल के मस्ती की जा सकती थी."

"देखो मैं तो परसों चला जाऊँगा तो अभी बता दो की तुम्हारी क्या चॉइस है." मनीष ने दीदी से कहा. "मनीष वाली बात तो नहीं हो सकती हाँ तुमने जो दूसरी बात कही है मुझे लगता है की आगे के लिए वो ही ठीक रहेगा. उसमे कोई रिस्क भी नहीं है." दीदी ने मयंक को जवाब दिया. "तो ठीक है यही तय रहा फिर. चलो मैं चलता हूँ. बाकी सब तो फिक्स है ही." मयंक ने दीदी को गले लगाकर किस किया और चला गया. दीदी भी दरवाजा बंद करके बाथरूम में घुस गयी और मैं अपने कमरे में चला गया. मैं ये तो समझ गया था की मयंक ने दीदी को मुझसे चुदवाने के लिए कहा होगा जो दीदी ने मना कर दिया पर ये दूसरी बात इसने दीदी से क्या कही है जिसके लिए दीदी तैयार है. थोड़ी देर बाद दीदी नहा कर निकली तो मैं भी अपने रूम से निकल आया. दीदी अभी भी पूरी नंगी थी. मुझे घर में देख कर दीदी चौंक गयी और वापस बाथरूम में घुस गयी.

वो बाथरूम के अन्दर से ही बोली "तू कब आया और अन्दर कैसे आया." मैंने झूठ बोल दिया "अभी अभी आया हूँ. दरवाजा खुला था तो बेल नहीं बजाई." "पर दरवाजा तो मैंने बंद किया था खुला कैसे रह गया. अच्छा जरा मेरे रूम से मेरे कपडे तो देना." दीदी बोली. "ओफ्फो दीदी. देख तो लिया है मैंने तुम्हे बगैर कपड़ो के तो फिर क्यों ड्रामा कर रही हो." मैंने थोडा चिढ़ते हुए बोला. "तो क्या हुआ? जो गलती से हुआ वो जान बूझ कर करूं. फिर से याद दिला रही हूँ की हम भाई बेहेन है. जा कपडे ले कर आ." दीदी गुस्से से बोली.
 
मेरी सारी आशाओं पर पानी फिर गया. "कौन से कपडे पहनोगी." मैंने दीदी से पुछा. "ब्लू स्कर्ट और सफ़ेद टी शर्ट ले आ." दीदी ने जवाब दिया. "और ब्रा पैंटी कौन से रंग की लाऊँ?" मैंने फिर पुछा. मेरे ये पूछने पर दीदी और गुस्सा हो गयी. चिल्ला कर बोली "तू अपने कमरे में चला जा. मैं अपने आप कपडे ले लूंगी." अब मेरा मूड भी ख़राब हो गया और मैंने भी चिल्ला कर कहा "नहीं जाता. क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ?"

मुझे उम्मीद नहीं थी जो इसके बाद हुआ. दीदी ने बाथरूम का दरवाजा खोला और पूरी नंगी बाहर आकर मुझे घूरती हुई दौड़ कर अपने कमरे में चली गयी और कमरे का दरवाजा भड़ाम से बंद कर लिया. दीदी का गीला नंगा बदन देख कर मेरा मूड फिर से ठीक हो गया और मैं मयंक के पास ये पूछने चल पड़ा की दीदी के साथ उसकी क्या बात हुई है. मयंक मुझे घर के बाहर ही मिल गया. वो ओम की दुकान पर खड़ा कोल्ड ड्रिंक पी रहा था. मुझे देख कर ओम बोला "आओ आओ मनीष बाबु लो तुम भी कोल्ड ड्रिंक पीओ". "किस ख़ुशी में कोल्ड ड्रिंक पिला रहे हो ओम भाई" मैंने पुछा. "अरे पिला रहे है तो कोई तो ख़ुशी की बात होगी ही. लो पीओ". ओम ने के थम्सअप मेरे हाथ में भी थमा दी.

कोल्ड ड्रिंक पी कर हम दोनों थोडा अलग हट गए और मयंक बोला "यार कहा चले गए थे तुम". मैंने कहा "वो सब छोड़ो ये बताओ की दीदी ने क्या कहा." मयंक बोला "यार रश्मि ने तुमसे चुदवाने से साफ़ मना कर दिया.अब क्या कहूँ तुम्हारी किस्मत ही ख़राब है वरना आज तो तुम्हारी बेहन ऐसी मस्ती कर रही थी की मुझे लगा मान जाएगी. आज तो उसने कामसूत्र के आसनों में चुदवाया मुझसे. बहुत मस्त मूड में थी रश्मि आज पर लास्ट में मैंने जब पुछा तो बोली की मनीष के साथ तो कभी नहीं करवा सकती."

"ओह तो फिर तुम्हारे जाने के बाद क्या करेगी वो." मैंने जानना चाहता था की वो दूसरी बात क्या है जिसके लिए रश्मि ने हामी भरी है. "वो बोली की जब जब मैं छुट्टियों में वापस आऊँगा तब हम कर लिया करेंगे. इसमें कोई रिस्क भी नही रहेगा." मयंक ने बताया. मुझे याद आया की दीदी भी मयंक से कह रही थी की इसमें कोई रिस्क नहीं रहेगा. मैंने सोचा की अगर मुझसे चुदवा लेगी तो तो बिलकुल भी रिस्क नहीं रहेगा. चलो शायद मयंक के जाने के बाद दीदी मान जाये. मैंने मयंक से बोला "कोई बात नहीं भाई. चलो अब तो तुम जल्दी मिलोगे नहीं." मैंने मयंक को गले लगाया और वापस घर चला आया. रश्मि दीदी डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाना खा रही थी. मैं भी वही बैठ गया और खाना लेकर खाने लगा. दीदी बोली "अब कालेज में आ गया है. सिर्फ एक ही चीज में दिमाग मत लगा. थोडा पढाई पर भी ध्यान दे वरना फर्स्ट इयर में ही लटक जायेगा. समझा?" दीदी के ताने को सुन कर मैंने हाँ में सर हिलाया और सोचा की जब मयंक जा रहा है तो इनको पढाई याद आ रही है वरना तो सिर्फ चुदाई की ही याद रहती थी.

 
अगले दिन नाश्ता करने के बाद दीदी तैयार हुई और बोली "मैं कुछ काम से अपनी फ्रेंड के पास जा रही हूँ. शाम को आऊँगी." ये बोल कर दीदी बाहर चली गयी और मैं टीवी देखने लगा. करीब १५ मिनट बाद बेल बजी और जब मैंने दरवाजा खोल कर देखा तो रुची थी. मैंने उससे पुछा "अरे तुम नहीं गयी अंकल आंटी के साथ गाँव?" "नहीं मेरा मन नहीं था. मैंने सोचा की कॉलेज खुलने से पहले एक बार खुल कर तुम्हारे साथ चुदवा कर मजे लूं." मैंने सोचा वाह आज मैं भी रुची को पूरे घर में दौड़ा दौड़ा कर चोदुंगा. मैंने कहा "सही किया जो नहीं गयी. आज तो घर में रश्मि दीदी भी नहीं है तो मजा दोगुना हो जायेगा."

"पता है इसीलिए तो आई हूँ. अब क्या बातें ही करते रहोगे." रुची टी शर्ट उतारते हुए बोली. उसकी काली ब्रा में कैद चुंचिया कमाल लग रही थी. मैंने रुची को गोद में उठाया और अपने रूम में लाकर बेड पर पटक दिया. और मैं उसके ऊपर आ गया और उसको चूमना शुरु कर दिया. ५ मिनट तक मैं उसको चूमता रहा. उसके बाद मैं ने उसकी ब्रा भी खोल दी. जैसे ही मैं ने ब्रा खोली तो उसकी चुंचिया उछल के बाहर आ गये मैं उसे देखकर उसको दबाने लगा. कितने दिनो के बाद इसके पूरे के पूरे बूब्स देखने को और दबाने को मिले फिर मैं ने उसकी निप्पल को मुंह मे रख दिया और चूसने लगा वो आआहहाआआहह्हहाहह कर रही थी. मैं उसे चूसता ही रहा थोड़ी देर बाद मैंने उसकी जींस खोल दी.

उसकी चूत हमेशा की तरह बहुत गरम हो रही थी तो उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी. मैंने रुची की पैंटी को निकाल दिया और उसकी चूत को फैला के चाटने लगा. वो सिसकारी भर रही थी. अहाआआ अस्सशहस आआअहहस्स स्सशाआ आआहस्सह्हस्सस अहह ह्हह्हह हस्साआ आअह्ह ह्हहा हहाआ हहाहह… फिर रुची ने मेरे लंड को हाथ में लिया और खींच कर कस कर दबाने लगी और मेरे तने हुए लंड को अपनी जांघो के बीच लेकर रगड़ने लगी. वो मेरी तरफ़ करवट लेकर लेट गयी ताकि मेरे लंड को ठीक तरह से पकड़ सके. उसकी चूची मेरे मुंह के बिल्कुल पास थी और मैं उन्हे कस कस कर दबा रहा था.

अचानक उसने अपनी एक चूची मेरे मुंह मे ठेलते हुए कहा " मनीष आज अपनी सारी तमन्नाये पूरी कर लो. जी भर कर दबाओ. चूसो और मज़े लो. मैं तो आज पूरी की पूरी तुम्हारी हूं जैसा चाहे वैसा ही करो. चूसो इनको मुंह में लेकर." फिर क्या था मैंने रुची की लेफ़्ट चूची मुंह में भर ली और जोर जोर से चूसने लगा.
 
मेरी जीभ उसके कड़े निप्पल को महसूस कर रही थी. मैंने अपनी जीभ को रुची के उठे हुए कड़े निप्पल पर घुमाया. मैं उसके दोनो अनारों को कस के पकड़े हुए था और बारी बारी से उन्हें चूस रहा था. मैं ऐसे कस कर चूचियों को दबा रहा था जैसे कि उनका पूरा का पूरा रस निचोड़ लुंगा. रुची भी पूरा साथ दे रही थी. उसके मुंह से ओह! ओह! अह! सी, सी! की आवाज निकल रही थी. मुझसे पूरी तरह से सटे हुए वो मेरे लंड को बुरी तरह से मसल रही थी और मरोड़ रही थी. उसने अपनी लेफ़्ट टांग को मेरे कंधे के उपर चढ़ा दिया और मेरे लंड को अपनी जांघो के बीच रख लिया. मुझे उसकी जांघो के बीच उसकी चूत का मुलायम रेशमी एहसास हुआ. मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी हलकी हलकी झांटों मे घूम रहा था. मेरा सब्र का बांध टूट रहा था. रुची भी बोली "आह मनीष, मुझे चोदो, फाड़ डालो मेरी चूत को."

पर मैं चुपचाप उसके चेहरे को देखते हुए चूची मसलता रहा. उसने अपना मुंह मेरे मुंह से बिल्कुल सटा दिया और फिर से फुसफुसा कर बोली "अपनी रुची को चोदो न. अब और मत तडपाओ." रुची ने अपने हाथ से मेरे लंड को अपनी चूत के मुहाने पर रख कर रास्ता दिखा दिया. रास्ता मिलते ही मैंने एक ही धक्के में लंड का सुपाड़ा अंदर कर दिया.. फिर मैंने दूसरा धक्का लगाया और पूरा का पूरा लंड मक्खन जैसी चूत की जन्नत में दाखिल हो गया. रुची के मुह से एक सुख की सीत्कार निकली "आआःआह उईई ईईइ ईईइ माआआ हुहुहह ओह बड़ा जालिम है तुम्हारा लंड"

रुची की चूत फड़क रही थी और अंदर ही अंदर मेरे लौड़े को मसल रही थी. उसकी उठी उठी चूचियां काफ़ी तेज़ी से ऊपर नीचे हो रही थी. मैं ने हाथ बढ़ा कर दोनो चूची को पकड़ लिया और मुंह में लेकर चूसने लगा. रुची ने अब मस्ती में अपनी कमर हिलानी शुरु कर दी. और मैंने भी अपनी स्पीड बढ़ा दी और तेज़ी से लंड अंदर-बाहर करने लगा. रुची को पूरी मस्ती आ रही थी और वो नीचे से कमर उठा उठा कर हर शोट का जवाब देने लगी. अपनी रसीली चूची मेरी छाती पर रगड़ते हुए उसने गुलाबी होंठ मेरे होंठ पर रख दिये और मेरे मुंह में जीभ ठेल दिया.

उसकी चूत में मेरा लंड तेज़ी से ऊपर नीचे हो रहा था. मुझे लग रहा था कि मैं जन्नत पहुंच गया हूं. जैसे जैसे वो झड़ने के करीब आ रही थी उसकी रफ़्तार बढ़ती जा रही थी. कमरे में फच फच की आवाज गूंज रही थी मैं रुची के ऊपर लेट कर दनादन शोट लगाने लगा. रुची ने अपनी टांग को मेरी कमर पर रख कर मुझे जकड़ लिया और जोर जोर से चूतड़ उठा उठा कर चुदाई में साथ देने लगी. मैं भी अब रुची की चूची को मसलते हुए ठका ठक शोट लगा रहा था. रुची अपनी कमर हिला कर चूतड़ उठा उठा कर चुदा रही थी और बोले जा रही थी "अह्हह आअहह उनहह ऊओहह ऊऊहह हाआआन हाआऐ मीईरे रज्जज्जजा, माआआअर गयययययये रीईए, लल्लल्लल्ला चूऊओद रे चूऊओद. उईई मीईईरीईइ माआअ, फाआआअत गाआआयीई रीईई शुरु करो, चोदो मुझे. लेलो मज़ा जवानी का मेरे ज्जज्जा" और अपनी गांड हिलाने लगी.

मैने काफी देर तक उसे चोदा. मैं भी बोल रहा था "लीईए मेरीईइ रानीई, लीई लीईए मेरा लौड़ा अपनीईइ ओखलीईए मीईए. लीईए लीई, लीई मेरीईइ रुचीआअ ये लंड अब्बब्बब तेराआ हीई है. अहह्ह! उहह क्या जन्नत का मज़ाआअ सिखाया तुने . मैं तो तेरीईईइ गुलाम हूऊऊ गयीईए." रुची गांड उछाल उछाल कर मेरा लंड चूत में ले रही थी और मैं भी पूरे जोश के साथ उसकी चूचियों को मसल मसल कर अपनी रुची को चोदे जा रहा था. रुची मुझसे कह रही थी "लगाओ शोट" और मैं जवाब देता "ये ले मेरी रानी, ले ले अपनी चूत में". "जरा और जोर से सरकाओ अपना लंड मेरी चूत में मनीष". " ये ले मेरी रानी, ये लंड तो तेरे लिये ही है." देखो मेरी चूत तो तेरे लंड की दिवानी हो गयी और जोर से और जोर से आआईईए. मैं गयीईईए रीई" कहते हुए रुची ने मुझको कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसकी चूत के ज्वालामुखी का लावा छोड़ दिया. अब तक मेरा भी लंड पानी छोड़ने वाला था और मैं बोला "मैं भी अयाआआ मेरी जाआअन" और मैने भी अपने लंड का पनी छोड़ दिया और मैं हांफ़ते हुए उसकी चूची पर सिर रख कर कस के चिपक कर लेट गया.
 
मैं लेटे लेटे सोच रहा था की मुझे मयंक की जगह रुची से भी बात करनी चाहिए थी. वो पक्का रश्मि दीदी को मेरे साथ चुदने के लिए राजी कर लेती क्योंकि उसकी दीदी से अच्छी पटती थी और वो खुद भी अपने सगे भाई से चुदवाती थी. मैं यही सोच रहा था की अचानक रुची बोली "आज सच में बहुत मजा आया. अच्छा अब हटो." मैंने पुछा "क्या हुआ, ऐसी भी क्या जल्दी है. एक राउंड और लगा लेते है". वो बोली "जल्दी तो कुछ नहीं है पर तुम जो अपना सर मेरी चूंची पर रखे हो वो तो हटाओ, दर्द हो रहा है."

मैंने अपना सर उसकी चूंची से हटाया और अपना हाथ उसकी चूंची पर रख कर सहलाने लगा. रुची के निप्पल फिर उत्तेजना से कड़े होने लगे. मैंने रुची से कहा "रुची आज हम दोनों को इतना मजा आया लेकिन सोचो अगर रश्मि दीदी भी हमारे साथ होती तो कितना मज़ा आता." रुची हँसते हुए बोली "भाई थ्रीसम की तो मैं भी बहुत बड़ी फैन हूँ पर क्या करूं तेरी बहन मानती ही नहीं." मैंने बोला "इसीलिए तो तुमसे कह रहा हूँ तुम मनाओ न दीदी को".

वो बोली "तेरी बहन बड़ी दकियानूसी है वो नहीं मानने वाली."

"यार कोशिश तो करो और वैसे भी अब मयंक जाने वाला है तो दीदी के जिस्म की प्यास जब भड़केगी तब वो क्या करेगी? कब तक ऊँगली से काम चलाएगी. तुम उसको समझाओ की घर में ही उसकी प्यास बुझाने का इंतज़ाम हो जायेगा." मैंने रुची से रिक्वेस्ट की.

मेरी बात सुन कर रुची हँसने लगी और बोली "साला अपनी बहन चोदने के लिए मरा जा रहा है. मतलब तुमको पता ही नहीं की तेरी बेहेन ने पहले ही अपना इन्तेजाम कर लिया है."

"इन्तेजाम कर लिया है क्या मतलब?" मैंने रुची से पुछा.

"अजीब भाई बहन हो आपस में बातें छुपाते हो." रुची ने कहा.

"साफ़ साफ़ बताओ न क्या बात है." मैंने थोडा नाराज़ होते हुए पुछा.

 
"अरे नाराज मत हो. मेरी बात सुनो. देखो ओम को पता चल गया था की मयंक रश्मि को चोदता है तो उसने मयंक को बोला था की उसको भी रश्मि की दिलवा दे. अब जब मयंक बाहर जा रहा है तो ओम उसके पीछे ही पड़ गया. मयंक ने ये बात रश्मि को बताई भी थी. जब मयंक ने तुमसे चुदवाने के लिए रश्मि को बोला तो रश्मि ने साफ़ मना कर दिया और बोला की वो ओम से चुदवा लेगी इसमें कोई रिस्क नहीं रहेगा." रुची ने बोला.

ये सुन कर मुझे काफी शाक लगा की दीदी ओम से चुदवाने को तैयार हो गयी और मुझसे नहीं. मैंने रुची को बोला "उसको कैसे पता चला. जरूर मयंक ने ही बताया होगा. सुनो हम दोनों को मिल कर दीदी को समझाना होगा की ओम कितना हरामी आदमी है. उससे सेक्स करके दीदी बड़ी मुसीबत में फंस सकती है. मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूँ. मयंक को ये बात मुझसे बतानी चाहिए थी."

रुची बोली "अरे ओम कोई हरामी आदमी नहीं है बस चूत का भूत है पर वो तो हर आदमी होता है."

"अरे तुम्हे पता भी है की वो तुम्हारी माँ को भी चोदता है" मेरे मुह से न चाहते हुए भी निकल गया.

"पहले तो हमें सिर्फ शक था लेकिन फिर एक दिन मयंक और मैंने अपनी आँखों से देख लिया तो कन्फर्म भी हो गया की वो मम्मी को भी चोदता है. वैसे एक बात तो है की वो बहुत अच्छे से चुदाई करता है. मजा आ जाता है." रुची ने ये कह कर मुझ पर बम फोड़ दिया.

"क्या? तुम्हे पता भी है फिर भी..." मेरी बात रुची ने पूरी कर दी. "फिर भी क्या? अरे जैसे मेरा चुदवाने का मन होता है वैसे ही मम्मी का भी तो होता होगा तो मुझे तो कोई फरक नहीं पड़ा. हां मयंक थोडा नाराज हुआ था पर ओम ने मयंक की मोहल्ले की २-३ मस्त मालों से सेटिंग करवा दी जिनको ओम पहले से ही चोद रहा था तो मयंक भी शांत हो गया "

मैं समझ गया की ये दोनों भाई बहन ओम से मिले हुए है और इन्होने ही दीदी को उससे चुदवाने के लिए कहा होगा. बड़ी बात नहीं की रुची भी ओम से मरवाती होगी तभी तो कह रही है की ओम बहुत अच्छी चुदाई करता है. ये सोच कर मेरा गुस्सा और भड़क गया. मैं बोला "देखो मेरी बहन उस हरामखोर ओम के साथ सेक्स नहीं कर सकती. आने दो दीदी को मैं उसे ये नहीं करने दूंगा."

"अब कुछ नहीं हो सकता क्योंकि जब मैं घर से चली थी तब तेरी दीदी पूरी नंगी होकर ओम की गोद में बैठी थी. तो अब तक तो ओम ने आगे पीछे दोनों तरफ से तेरी बहन को बजा डाला होगा." रुची ने कहा.

"क्या? दीदी तुम्हारे घर पर है.मुझे तो बोल कर गयी की अपने फ्रेंड के यहाँ जा रही है है." मैंने फौरन कपडे पहनने शुरू किये.

"हाँ तो मेरा घर उसकी फ्रेंड का घर ही तो है. रश्मि और मयंक ने कल ही ये प्रोग्राम फिक्स कर लिया था. इसीलिए तो आज मयंक भी पेट दर्द का बहाना बना कर गाँव नहीं गया और मुझे भी अपनी देखभाल करने के लिए रोक लिया. रश्मि ने ओम से चुदने के लिए हाँ कर दी इसी ख़ुशी में तो तुम्हे कोल्डड्रिंक पिला रहा था ओम."

रुची की बाते सुनकर मेरा दिमाग भन्ना गया था. मैं कपडे पहन चूका था और तेज़ी से दौड़ते हुए छत के रस्ते मयंक के घर पहुच गया पर कोई फायदा नहीं हुआ. रुची सही कह रही थी. मयंक के कमरे से दीदी की मस्ती भरी आवाजे आ रही थी. दरवाजा खुला हुआ था. मैंने धीरे से झांक कर देखा की अन्दर बेड पर रश्मि दीदी मयंक और ओम के बीच में सैंडविच बनी हुई थी. मयंक ने दीदी की चूत में अपना लंड डाल रखा था और ओम ने गांड में. दोनों पूरी रफ़्तार से दीदी की चुदाई कर रहे थे और रश्मि दीदी मस्ती में चीख रही थी. "आआह्ह्ह्ह हाया ओम्म्म उफ्फ्फफ्फ्फ़ अराआअम्म्म सेईईईइ गांडद्द्दद्द्द फत्त्तत्त्त्त गैईईईईईईईई उफ्फ्फफ्फ्फ़ मायांक्क्क्कक धीरीईईईईए अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह"

 
वैसे तो ये नजारा बहुत बेहतरीन था पर इस वक़्त मेरा मूड बहुत ख़राब था. मेरा मन कर रहा था की कोई डंडा मिल जाये तो ओम और मयंक का सर फोड़ दूं. पर तब तक मेरे पीछे पीछे रुची भी वहां आ गयी और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने कमरे में ले गयी और धीरे से बोली "देखो यार मनीष, अब तुम ड्रामा मत करो. रश्मि कोई कुवारीं बच्ची तो है नहीं. कई बार मयंक से चुदवा चुकी है. अब उसका जिसके साथ मन वो सेक्स करे क्यों भड़कते हो."

मैंने कहा "देखो मयंक की बात और थी और मैं तुम्हारे और मयंक की तरह नहीं सोच सकता. मुझे तुम लोगो पर बहुत गुस्सा आ रहा है."

"मयंक की बात इसलिए अलग थी की बदले में वो तुम्हे अपनी बहन की चूत भी दिलवा रहा था. है न? तो सुनो ओम भी तुमको कई चूतें और दिलवा देगा बल्कि वो कह भी रहा था की अगर तुम चाहो तो नीलम आंटी को तो तुमसे एक दो दिन के अन्दर ही चुदवा देगा." रुची ने कहा.

मैं समझ गया की मयंक और रुची ने पूरा प्लान बना कर दीदी की चुदाई ओम से करवाई है. इन लोगो ने पहले ही सोच लिया था की अगर मैं नहीं माना तो ये मुझे कैसे मनायेगे. नीलम अरोरा जैसे मस्त माल को चोदने का मन तो मेरा भी बहुत था पर वो तो ओम ने मुझे पहले ही कहा था की वो उनको मुझसे चुदवा देगा तो ये मुझे कुछ नया तो नहीं दे रहे.

मुझे सोच में पड़ा देख कर रुची फिर से बोली "देखो, वैसे भी ओम ने रश्मि को चोद ही लिया है तो अब तुम्हारे हल्ला करने से कुछ होने वाला तो है नहीं और आखिर चूत रश्मि की है वो जिससे चाहे चुदवाये. अगर तुम नाराज होगे तो वो तुमसे छिप कर ये काम करेगी और तुम कुछ नहीं कर पाओगे तो मेरी मानो ओम से मिल कर रहो. तुम्हारा बहुत फायदा होगा."

मुझे पता था की अब मैं कुछ नहीं कर सकता. रुची की बात सही भी थी की दीदी का जिससे मन होगा वो चुद्वायेगी. मुझे लगा फिलहाल ओम से सुलह करने में ही फायदा है और रही बात रश्मि दीदी की को तो अब मैं उनको किसी भी कीमत पर चोद कर ही रहूँगा चाहे मुझे जो भी करना पड़े. रुची फिर से बोली "अभी तुम चुपचाप अपने घर जाओ और जब रश्मि घर पर वापस आ जाये तो तुम यहाँ आ जाना. मैं ओम से तुम्हारी सारी बात करवा दूँगी."

मैं चुपचाप कमरे से बाहर आया. मयंक के कमरे से दीदी की आवाजे आभी भी आ रही थी. रुची और मैं धीरे से छत पर आ गए. मैंने रुची से पुछा "एक बात सच सच बताना. क्या तुम भी ओम से चुद्वाती हो."

रुची ने वापस पुछा "ऐसा क्यों पूँछ रहे हो?".

"तुम ओम की इतनी तरफदारी जो कर रही हो इसलिए. बताओ न" मैंने जवाब दिया.

"क्या फरक पड़ता है. तुमको तो बस अपना फायदा देखना चाहिए और देखना ओम तुम्हारा कितना फायदा करवाता है." रुची ने मुस्कुरा कर जवाब दिया और वापस नीचे चली गई. मैं भी घर आ गया. करीब 2 घंटे बाद रश्मि दीदी वापस आ गयी. उनके चेहरे को देख कर कोई नहीं कह सकता था की वो सुबह से ताबड़तोड़ चुदाई करवा रही थी.

"बड़ी देर कर दी" मैंने पुछा.

"हाँ लौटते हुए रिक्शा नहीं मिल रहा था." दीदी ने सफ़ेद झूठ बोल दिया.

"मुझे कुछ काम से जाना है. तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था. दरवाजा बंद कर लो." ये कहते हुए मैं बाहर निकल गया.

"कितनी देर में आयेगा. बाहर बहुत गर्मी थी तो मुझे नहाना भी है." दीदी ने मुझसे पुछा.

"हां जाओ. मुझे एक घंटा लग जायेगा." मैं बोला और मयंक के घर चल दिया. दरवाजा खुला ही हुआ था. मैं सीधा अन्दर पहुच कर मयंक के कमरे में चला गया. ओम ने कपडे पहन लिए थे पर मयंक अभी भी केवल अंडरवियर पहने बेड पर लेटा था. रुची दोनों से कुछ कह रही थी और दोनों ध्यान से सुन रहे थे. मेरे पहुचते ही रुची खामोश हो गयी और ओम बोला "आओ आओ मनीष भाई आओ.'

 
मेरी शकल पर गुस्सा साफ़ झलक रहा था. मयंक ने मुस्कुराते हुए कहा "अब यार ये गुस्सा वुस्सा छोड़ो. आकर बैठो. यार रश्मि ने मुझे मना किया था ओम के बारे में तुमसे कुछ भी कहने को. अब उसने मुझे इतनी बार चुदाई का मजा दिया है तो उसकी इतनी बात तो मुझे माननी ही थी."

मुझे और गुस्सा आ गया "हाँ हाँ उसकी बात माननी थी पर मेरे साथ तो तुम्हारी दुश्मनी है न तो मेरी क्यों सुनोगे. भूल गए की मैंने अगर तुम्हारा साथ न दिया होता तो तुम दीदी के साथ इतने मजे नहीं ले पाते पर तुमने तो रश्मि दीदी की चूत को मुफ्त का चन्दन समझ लिया है जो खुद तो घिसे जा रहे हो और अब इस ओम से भी दीदी को चुदवा डाला."

मयंक बोला "यार मैं अपनी गलती मानता हूँ की मैने तुम्हे पहले नहीं बताया की रश्मि ओम से चुदवाने वाली है पर मैंने ही रुची को बोला था की वो तुम्हे बता दे. सोचो अगर वो तुम्हे बाद में भी न बताती तो तुम्हे कैसे पता चलता." मैं कुछ नहीं बोला. जाकर कमरे में रखी कुर्सी पर बैठ गया.

"तुम चिंता मत करो मनीष भाई. हम तुम्हारी दीदी की चूत की पूरी कीमत चूका देंगे. कल तुम हमारे साथ चलना. बदले में नीलम भौजी की दिलवा देंगे तुमको." ओम ने बात को आगे बढ़ाया.

"वो तो तुमने पहले ही कहा था तो उसमे नया क्या है." मैंने कहा.

"अरे कहा तो हमने बहुतों से बहुत कुछ है लेकिन इस बार सच में करवाने का टाइम आ गया है. नीलम भौजी के अलावा कामिनी भौजी की भी दिलवा दूंगा. अब तो खुश हो जाओ यार" ओम ने मुझे और लालच देते हुए कहा.

"खुश तो मैं तब होऊंगा जब दीदी की चूत में मेरा लंड जायेगा. मुझे बस हर हाल में रश्मि दीदी को चोदना है" मैंने बोला.

"यार तुम समझ नहीं रहे रश्मि तुम्हे नहीं देगी" मयंक ने कहा.

तभी ओम ने मयंक की बात काट दी "चलो ठीक है. तुमसे वादा करता हूँ की मेरे अगले बर्थडे से पहले तुम्हारी रश्मि दीदी को तुमसे न चुदवाया तो मेरा नाम बदल देना."

"पर ओम" रुची ने कुछ कहना चाहा पर ओम ने उसे भी टोक दिया. "देखो अब हमने कह दिया तो बस कर के भी दिखा देंगे"

"पर तुम्हारा बर्थडे है कब." मैंने ओम से पुछा.

"बस 2 महीने बाद." ओम ने कहा.

 
"2 महीने! तो इतने दिन मैं क्या करूंगा." मैं बोला.

"इंतज़ार का फल बहुत मीठा होता है मनीष भाई और ये 2 महीने तो यूं निकल जायेंगे. तब तक कामिनी और नीलम से तुम्हारा जुगाड़ करवा देते है. पर हाँ मेरी भी एक शर्त है की आज के बाद तुम मेरा पूरा साथ देना और मैं जैसा कहूँ करते रहना..."

"क्या करना है मुझे." मैंने पुछा.

"सबसे पहले तो तुम एक काम करना की अपने बाथरूम का लॉक आज रात को ख़राब कर देना और कल जब रश्मि नहाने जाए तो मुझे बुला लेना." ओम ने कहा.

"उससे क्या होगा." मैंने पुछा.

"यार रश्मि तुमसे शरमाती है तो उसकी शर्म दूर करना बहुत जरूरी है. अब ज्यादा सवाल जवाब मत करो और जो मैं कह रहा हूँ वो करो..."

"ठीक है तो तुम ठीक १०.३० बजे घर आ जाना क्योंकि दीदी उसी समय नहाने जाती है और लॉक मैं आज रात को ख़राब कर दूंगा." मैंने कहा.

"तो ठीक है. १२ तो तुम्हारे यहाँ ही बज जायेगा फिर तुम मेरे साथ नीलम भौजी के यहाँ चलना तो तुम्हारा काम भी करवा देंगे. चलो आज हमारी दोस्ती भी पक्की हो गयी है. आओ गले मिल जाओ भाई." ओम ने कहा.

मैं उठ कर ओम के गले लगा और मयंक और रुची ने ताली बजाई. मैंने कहा "तो ठीक है मैं चलूँ. कल मिलते है."

"अरे अभी कहाँ जा रहे हो. आज रश्मि को तो बहुत मजा दिया है पर रुची का भी तो कुछ हक बनता है. आज रुची हम तीनो से एक साथ चुद्वायेगी क्यों मयंक". ओम बोला.

"नहीं नहीं मैं तीनो से एक साथ नहीं चुद्वाऊंगी. वैसे ही दो ही लोग मेरी हालत ख़राब कर देते है." रुची ने डरते हुए कहा.

मयंक ने रुची की बिस्तर पर खीचते हुए कहा "अरे अब तुम नखरे मत करो यार. कल मैं चला ही जाऊँगा. अपने भाई के फेयरवेल में कम से कम इतना तो तुमको करना ही पड़ेगा. आ जाओ मनीष."

 
मैंने और ओम ने अब तक अपने कपडे उतार भी दिए थे. मैंने आज ओम का लंड काफी पास से देखा था. वो मेरे और मयंक दोनों के लंडो से बड़ा और मोटा था. अब तक मयंक ने रुची का टॉप उतर दिया था और ओम ने आगे बढ़ कर रुची की ब्रा फाड़ दी. रुची वैसे ही बिदक रही थी पर ओम की इस हरकत से एकदम भड़क गयी.

वो ओम को धक्का देते हुए चिल्लाई "ये क्या बदतमीजी है. कपडे क्यों फाड़ रहा है गांडू. अब हाथ भी नहीं लगाने दूँगी. दूर हट."

मयंक ने रुची को फिर से पकड़ लिया और ओम ने हँसते हुए रुची की स्कर्ट भी उतार दी और मुझसे बोला "अब आयेगा असली मजा. फाड़ से इसकी पैंटी मनीष."

मैं समझ गया की ये लोग रोल प्ले करने वाले है और मैंने आगे बढ़ कर रुची की पैंटी फाड़ कर उतार दी. वैसे तो रुची को मैं कितनी ही बार चोद चूका था पर आज कुछ ज्यादा ही उत्तेजना हो रही थी क्योंकि एक तो रुची डरने का नाटक कर रही थी और दूसरा पहली बार मैं और दो लोगो के साथ मिल कर उसको चोदने वाला था. मेरे पैंटी फाड़ते ही रुची ने मुझे पैर से धक्का दिया पर ओम ने उसका पैर पकड़ कर चूम लिया. अब ओम ने रुची के दोनों पैर फैलाते हुए सीधे अपनी जबान से उसकी चूत पर हमला बोल दिया. मयंक भी अब रुची के ऊपर आ गया था और बारी बारी से अपनी बहन की चुचिया मसल रहा था. मैंने भी मौका देख कर अपना तना हुआ लंड रुची में मुह में घुसेड दिया. अब हम तीनो ही रुची को अलग अलग तरीके से मजा दे रहे थे.

 
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