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नजर का खोट complete

किसी ने मेरी पीठ पर धौल सी जमाई और मैं आगे को गिर पड़ा पीठ में वैसे ही चोट लगी हुई थी तो गुस्सा सा आ गया कुछ कठोर शब्द बोलते हुए मैंने पीछे देखा और पल में ही मेरा गुस्सा गायब सा हो गया मैंने देखा पीछे पूजा मुस्कुरा रही थी

“तुम यहाँ , यहाँ क्या कर रही वो ”

“ढोर चराने निकली थी तो तुमको देखा तुम् बताओ यहाँ कैसे ”

“कुछ नहीं बस ऐसे ही ”

“ऐसे ही कोई कही नहीं जाता और खास कर इन बियाबान में ”

“अब क्या बताऊ पूजा एक आफत सी मोल ले ली है तो उसी सिलसिले में आना पड़ा ” और फिर मैंने पूजा को पूरी बात बता दी

“इस जमीन पर खेती करना तो बहुत ही मुश्किल है कुंदन इसको समतल करने में ही बहुत समय जायेगा तो फसल कब होगी ”

“अब जो भी हो कोशिश तो करूँगा ही वैसे तू कहा चली गयी थी सुबह ”

“काम करने पड़ते है अब तेरी तरह तो हु नहीं ”

“मेरी तरह से क्या मतलब तेरा ”

“कुछ नहीं ”

“तू सारा दिन ऐसे ही घुमती रहती है वो भी अकेले मेरा मतलब ”

“अब कोई है नहीं तो अकेले ही रहूंगी ना और तेरे मतलब की बात ये है की इस इलाके में सब लोग पह्चानते है तो कोई परेशानी नहीं होती और मैं चोधरियो की बेटी हु इतना सामर्थ्य तो है मुझमे ”

“पूजा, पता नहीं क्यों तेरी बातो से ऐसा लगता है की बरसो की पहचान है तुझसे ”

“ऐसा क्यों कुंदन ”

“पता नहीं पर बस लगता है ”

“चल बाते ना बना ढोर दूर चले गए होंगे मैं चलती हु ”

“रुक मैं भी आता हु वैसे भी मुझे अब घर ही जाना है ”

पूजा से बात करते करते हम वहा से चलते चलते उसके घर की तरफ आ गए उसने अपने जानवरों को बाँधा और फिर मैं उसके साथ उस तरफ आ गया जहा पर एक बहुत बड़ा बड का पेड़ था

“कुंदन, ये पेड़ मेरे दादा का लगाया हुआ है ”

“क्या बात कर रहा रही है ”

“सच में ”

“आजा तुझे चाय पिलाती हु ”

मैं और वो घर में उस तरफ आ गए जहा चूल्हा था उसने आग जलाई मैं पास ही बैठ गया थोड़ी देर में ही उसने चाय बना ली एक गिलास में मुझको दी और एक में खुद डाल ली

मैं – पूजा भूख सी लग आई है तो अगर एक रोटी मिल जाती तो

वो- हा, रुक अभी लाती हु

वो एक छाबड़ी सी ली और उसमे से कपडे में लपेटी हुई रोटिया निकाली और एक रोटी मेरे हाथ में रख दी वो रोटी मेरे घर जैसी घी में चुपड़ी हुई नहीं थी पर उसमे जो महक थी वो अलग थी मैंने बस एक निवाला खाया और मैं जान गया की स्वाद किसे कहते है

चाय की चुस्की लेते हुए मेरे होंठो पर एक मुस्कान सी आ गयी थी थोड़ी और बातो के बाद मैंने पूजा से विदा ली और गाँव की तरफ चल पड़ा पर मेरे कंधे झुके हुए थे राणाजी ने अपने बेटे को हराने की तयारी कर ली थी मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी की मैं कैसे उगा पाउँगा फसल इस जमीन पर सोचते विचारते मैं कब घर आ गया पता नहीं चला

मैं चौबारे में जाकर बिस्तर पर लेट गया सांझ ढलने को ही थी मैं सोच विचार में मगन था की भाभी आ गयी हरी सलवार और सफ़ेद सूट में क्या गजब लग रही थी ऊपर से फिटिंग जोरदार होंठो पर लाल सुर्ख लिपस्टिक मांग में सिंदूर हाथो में कई सारी चुडिया जैसे आसमान से कोई सुन्दरी ही उतर आई हो

“आज तो क्या गजब लग रही हो भाभी इतनी भी बिजलिया ना गिराया करो ”

“अच्छा जी मुझे तो कही नहीं दिख रहे झुलसे हुए पता है मैं कब से राह देख रही हु तुम्हारी ”

मैं- क्यों भाभी

भाभी- अरे आज, वो पीर साहब की मजार पर दिया जलाने चलना है तू भूल गया क्या

मैं-ओह आज जुम्में की शाम है क्या

भाभी- तुझे इतना भी याद नहीं क्या

जुम्मे की शाम तभी मुझे कुछ याद आया उसने कहा था की वो जुम्मे की शाम पीर साहब की मजार पर जाती है तो मैं एक दम से उछल सा पड़ा “भाभी एक मिनट रुको मैं अभी आता हु ”

मैंने जल्दी से अपने नए वाले कपडे पहने और बालो में कंघी मार कर भाभी के सामने तैयार था

भाभी- हम मजार पे ही जा रहे है न सजे तो ऐसे हो की तुम्हारे लिए बिन्द्नी देखने जा रहे है

मैं- क्या भाभी आप भी आओ देर हो रही है

चूँकि भाभी साथ थी तो मैंने जीप स्टार्ट की और फिर चल दिए पीर साहब की तरफ जो की गाँव की बनी में थी हम जल्दी ही वहा पहुच गए भाभी दिया जलाने को अन्दर चली गयी मैं रुक गया दरअसल मेरी आँखे बस तलाशने लगी उसको जिससे मिलने की बहुत आस थी और जो दूर से देखा जो उसे दिल झूम सा गया सफ़ेद सूट सलवार में सर पर हमेशा की तरह ओढा हुआ वो सलीकेदार दुपट्टा

होंठ उसके हलके हलके कांप रहे थे जैसे की खुद से बाते कर रही हो मैंने सर पर कपडा बाँधा और उसकी तरफ चल पड़ा फेरी लगा रही थी वो और जल्दी ही आमना सामना हुआ उस से जिसकी एक झलक के लिए हम कुर्बान तक हो जाने को मंजूर थे नजरो को झुका कर सबसे नजरे बचा कर उसने इस्तकबाल किया हमारा तो हमने भी हलके से मुस्कुरा कर जवाब दिया

सुना तो बहुत था की बातो के लिए जुबान का होना जरुरी नहीं पर समझ आज आया था की क्यों फेरी लगाते हुए बार बार आमने सामने आये हम फिर वो बढ़ गयी धागा बाँधने को तो मैं उसके पास खड़ा हो गया पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई वो बहुत धीमे से बोली “”परिंदों के दाना खाने पे “ और उस तरफबढ़ गयी

मैं दो पल रुका और फिर चला तो देखा की वो अकेली ही थी उस तरफ बिखरे दानो को समेट रही थी तो मैं भी समेटने लगा

वो- आज आये क्यों नहीं

मैं- जी वो कुछ कम हो गया था

वो- हम राह देख रहे थे आपकी

मैं- वो क्यों भला

वो- बस उसी तरह जैसे आप आते जाते हमारे छज्जे को तकते है

मैं- वो तो बस ऐसे ही

वो- तो हम भी बस ऐसे ही

और हम दोनों मुस्कुरा पड़े , कसम से उसको ऐसे हँसते देखा तो ऐसे लगा की जैसे दुनिया कही है तो यही है

वो- आप ऐसे बार बार हमारी कक्षा में चक्कर ना लगाया करे हमारी सहेलिया मजाक उड़ा रही थी

मैं- पता नहीं मेरा मन बार बार क्यों ले जाता है उस और

वो- मन तो बावरा है उसकी ना सुना करे

मैं- तो आप ही बता दे किसकी सुनु

वो मेरे पास आई और बोली- किसी की भी नहीं

मैं- एक बात कहू

वो- हां,

मैं- क्या आपको भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है

वो- कैसा जनाब

मैं- जो मुझे महसूस होता है

वो- मैं जैसे जानू, आपको क्या महसूस होता है

मैं- वो मुझे वो मुझे पर . बात अधूरी ही रह गयी

“तो यहाँ हो तुम ....................... ”

 
लगभग एक ही समय हम दोनों ने उस आवाज की तरफ देखा तो वहा पर एक लड़की थी जो शायद उसे बुला रही थी तो बिना देखे वो उसकी तरफ बढ़ गयी और एक बार फिर स बात शुरू होने से पहले ही ख़तम हो गयी अपनी किस्मत को जमकर कोसा मैंने पर दिल में कही न कही इतनी तसल्ली भी थी की उसके दिल में भी कुछ तो है तो बात बनेगी जरुर

उसके बाद मैंने भी माथा नवाजा और बाहर आया मौसम बदलने लगा था आसमान में बादल घिरने लगे थे मेरी नजरे बस उसको ही तलाश कर रही थी और वो दिखी भी फेरी वाले से खरीद रही थी कुछ वो पर सिवाय देखने के और क्या कर सकता था मैं इतनी भीड़ में थोड़ी ना कुछ कह सकता था

“तो जनाब यहाँ है मैं अंदर तलाश कर रही थी ” भाभी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा

मैं- आ गयी भाभी कुछ लेना है तो ले लो नहीं तो फिर चलते है

भाभी- नहीं कुछ नहीं लेना आओ चलते है

मैंने जीप स्टार्ट की और हम वापिस हुए पर दिल में एक बेचैनी सी थी जिसे भाभी ने भी मह्सुस कर लिया था

भाभी- वैसे कुंदन इतनी शिद्दत से किसको देख रहे थे तुम

मैं – किसी को तो नहीं भाभी

भाभी- भाभी हु तुम्हारे, तुमसे ज्यादा मैं जानती हु तुमको और मैं ही क्या कोई और होता तो वो भी समझ जाता

मैं- क्या समझ जाता भाभी

भाभी- वोही जो तुम मुझसे छुपा रहे हो

मैं- भाभी ऐसा कुछ भी नहीं है

वो- चलो कब तक .. कभी ना कभी तो पता लग ही जाना है वैसे वो जमीन देखने गए थे क्या हुआ उसका

मैंने भाभी को पूरी बात बता दी तो वो गंभीर हो गयी मैंने भाभी के चेहरे पर चिंता देखि पूरी बात सुनने के बाद वो बोली “कुंदन, ठाकुरों का अहंकार उनकी रगों में खून के साथ दौड़ता है राणाजी का मकसद बस अपने उसी अहंकार को जिताना है और मैं भी चाह कर भी तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊँगी क्योंकि मैं भी इसी घर में रहती हु और तुम्हे तो सब पता ही है ना वैसे मैं चाहती नहीं थी की ये सब हो पर अब जो है वो है ”

मैं- भाभी मैं क्या गलत हु

भाभी- मैंने कहा न, सही गलत की बात ही नहीं है अगर सही गलत की बात होती तो ये होता नहीं तुम्हारा इरादा नेक है पर राह उतनी ही मुश्किल मैं बस इतना चाहती हु की इसकी वजह से बाप-बेटे के रिश्ते में कोई दरार नहीं आये ये घर जैसा है वैसे ही रहे

मैं बस मुस्कुरा दिया भाभी की चिंता सही थी आखिर मेरी रगों में भी राणाजी का खून ही जोर मार रहा था मुझे हर हाल में वहा पर फसल उगा कर दिखानी थी वर्ना क्या बात रहती ये अब मूंछो की लड़ाई हो गयी थी खैर हम घर आये उसके बाद कुछ समय मैंने अपने चौबारे में ही बिताया कुछ देर किताबो पर नजर मारी जरुरी काम निपटाए आसमान मी घटाए छा चुकी थी बारिश पड़ेगी ऐसी पूरी सम्भावना थी रोटी पानी करके मैं चाची के घर गया तो वहा पर ताला लगा था मतलब वो खेत पर निकल गयी थी शायद होने वाली बारिश का अंदेशा करके पर मुझे वो काम आज पूरा करके ही दम लेना था जो बार बार अधुरा रह जाता था मैंने अपनी साइकिल उठाई और पैडल मारते हुए चल दिए कुवे की और

आधे रस्ते में ही टिप टिप शुरू हो गयी तो मैंने रफ़्तार तेज कर दी पर फिर भी पहुचते पहुचते तकरीबन भीग ही गया था मैंने अपनी साइकिल खड़ी की और खुद को पोंछा बिजिली आ रही थी तो राहत की बात थी मैंने किवाड़ खडकाया तो चाची ने अंदर से पूछा कौन है मैंने बताया तो दरवाजा खोला

“तू ”

“मुझे तो आना ही था ”मैंने मुस्कुराते हुए कहा

मैंने दरवाजा बंद किया और अपने गीले कपडे उतार कर तार पर डाल दिए बस एक कच्छे में ही था चाची मेरी तरफ ही देख रही थी

मैं- आज अकेली आ गयी

वो- मैंने सोचा तू नहीं आएगा

मैं- क्यों नहीं आऊंगा

वो- दोपहर को भी भाग गया था

मैं- उसी काम को पूरा करने आया हु और आज पूरा करके ही रहूँगा

चाची- तू रहने दे हर बार ऐसा ही बोलता है और फिर भाग जाता है मुझे परेशां करके

मैं- आज परेशान नहीं करूँगा

मैंने चाची को अपनी बाहों में जकड लिया और चुपचाप अपने होंठ उसके होंठो पर रख दिए सुर्ख लिपस्टिक में रंगे उसके होंठ इतनी चिकने थी की लगा की घी की धेली मेरे मुह में घुल रही हो चाची ने अपनी पकड़ मुझ पर मजबूत सी कर दी और मैं धीरे धीरे उसके होंठो का मीठा सा रस चूसने लगा

मेरे हाथ अपने आप उसकी पीठ को सहलाने लगे थे मैंने बादलो के गरजने की आवाज सुनी जो बता रही थी बाहर बरसात और तेज हो गयी है मैंने चाची को और कस लिया अपनी बाहों में और चूमने लगा उसके होंठो को जो मय के प्याले से कम नहीं थे जबतक सांसे टूटने को ना हो गयी मैं चाची के लबो को पीता रहा फिर हम अलग हुए मैंने चाची की आँखों में एक अलग सी चमक देखि उसकी छातिया मेरे सीने में समा जाने को पूरी तरह से आतुर थी

मैंने उसकी चोली को उतार दिया चाची ने एक पल को भी विरोध नहीं किया बल्कि वो तो खुद ये चाहती थी मैं उसकी चुचियो को दबाने लगा जो पहले ही फुल चुकी थी चाची आहे भरने लगी उसने कच्छे के ऊपर से मेरे लंड को पकड़ लिया

“अन्दर हाथ डाल चाची ” मैं बोला

और चाची ने मेरे कच्छे में अपना हाथ डाल दिया उसके गर्म हाथ को महसूस करते ही मेरा लंड झटके पे झटके खाने लगा जब चाची ने उसे अपनी मुट्ठी में लिया तो मुझे इतना मजा आया की मैं बता नहीं सकता मैंने चाची को बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी घाघरी को भी उतार दिया और खुद भी पूरा नंगा हो गया लट्टू की रौशनी में हम दोंनो नंगे थे चाची बेहद ही खुबसुरत थी उसकी मांसल टाँगे थोड़े मोटे से चुतड माध्यम आकर की छातिया और टांगो के बीच हलके बालो में कैद वो चीज़ जिसका हर कोई दीवाना है

मैं उसके पास ही लेट गया और एक बार फिर से उसके होंठ चूसते हुए उसके नितम्बो को सहलाने लगा चाची मेरे लंड को मुठिया ने लगी मेरा रोम रोम मजे में डूबने लगा था और फिर धीरे धीरे मैं चाची के ऊपर लेट गया और चूची को पिने लगा चाची बहुत गरम हो गयी थी और बहुत तेजी से उसका हाथ मेरे लंड पर चल रहा था

“मुझे ऊपर से निचे तक चूम कुंदन aaahhhhh आःह्ह ” चाची सिसकारी लेते हुए बोली

मैं- हां चाची

मैं उत्तेजना से बुरी तरह कांप रहा था

“दोपहर की तरह ही झुक जा चाची ”

मैंने कांपते हुए कहा

तो चाची बिस्तर पर घोड़ी बन गयी और एक बार फिर से उसकी उभरी हुई गांड मेरी आँखों के सामने थी मैंने अपने होंठो पर जीभ फेरी और उसके चूतडो को सहलाया चाची ने आह भरते हुए अपनी गांड को सहलाया रुई से भी ज्यादा कोमल चुतड थे उसके मैं आहिस्ता आहिस्ता हाथ फेरने लगा चाची ने अपने आगे वाले हिस्से को थोडा सा और निचे झुकाया जिस से चुतड और ऊपर की और उभर गए

मैंने अपने दोनों हाथो को चाची की गांड की दरार पर लगाया और बड़े ही प्यार से उसको फैलाया उफफ्फ्फ्फ़ क्या नजारा था चाची की गांड का वो भूरा सा छेद जो हिलने की वजह से बार बार खुलता और बंद होता नजर आ रहा था और इंच पर निचे ही माध्यम आकार के काले बालो से ढकी हुई चाची की मस्तानी लाल रंग की चूत जो मुझे बस निमंत्रण दे रही थी की आ और समा जा मुझमे

चाची का गदराया हुस्न बहुत ही कमाल का था मैंने अपने होंठ उसके चूतडो पर रख दिए और जैसे किसी फल को काट रहा हु इस प्रकार मैं वहा पर बटके भरने लगा तो चाची जोर जोर से आहे भरने लगी मैं अपनी जीभ से चाची के नरम मांस को चाटने लगा चाची जोर जोर से अपनी गाँनड हिलाने लगी हम दोनों का ही हाल बुरा हो रहा था चाची की गीली होती चूत को महसूस कर रहा था मैं उसमे से एक ऐसी खुशबु आ रही थी की क्या बताऊ बस मेह्सुस ही कर पा रहा था मेरा लंड इतना ऐंठ गया था उत्तेजना से की उसके नसे उभर आई थी मैंने अपनी उंगलियों से चाची की चूत के नरम मांस को छुआ तो वो सिसक पड़ी “आह aaahhhhhhhhhhhh ” वो जगह किसी गर्म भट्टी की तरह ताप रही थी और अचानक से मेरी पूरी ऊँगली चाची की चूत में घुस गयी

“आह आई ”कसमसाते हुए चाची ने पानी दोनों जांघो को कस के भीच लिया और आहे भरने लगी “कुंदन क्या कर रहा है आःह ”

“कुछ भी तो नहीं चाची ” मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया

मैंने अपनी वापिस पीछे ली और फिर से आगे को सरका दी और तभी चाची औंधी हो गयी लेट गयी और मैं भी उसके ऊपर आ गिरा चाची के गरम बदन पर लेट कर उस बरसाती मौसम में बहुत सुकून सा मिला था चाची का बदन झटके पे झटके खा रहा था मैं चाची के सेब से गालो को खाने लगा उसके ऊपर से लेटे लेटे ही गजब का मजा आ रहा था इतना मजा की शब्द कम पड़ जाये अगर लिखा जाये तो मैंने चाची की चूत के रस से लिपटी हुई ऊँगली उसके होंठो पर फेरनी चालू की तो उसने अपना मुह खोल दिया और उस ऊँगली को चूसने लगी उसके लिजलिजी जीभ मेरी ऊँगली पर रेंगने लगी

 
मैं अपने हमउम्र दो नोजवानो की माँ के साथ ये खेल खेल रहा था हम दोनों की आंहे पुरे कमरे में गूंज रही थी मैंने अब चाची को पलट दिया और उसकी टांगो के बीच आत हुए लेट गया चाची के रस से भरे होंठ एक बार फिर मेरे होंठो से रगड खाने लगी और तभी चाची अपना हाथ निचे ले लगी और मेरे लंड को अपनी चूत पर रगड़ने लगी उफ्फ्फ्फ़ उसकी चूत इतनी गरम थी की मुझे लगा मेरे लंड का उपरी हिस्सा जल ही जाएगा चाची ने अपने खुले पैरो को कुछ ऊँचा सा उठा लिया ताकि वो अच्छे से रगड़ाई कर सके

मेरा सुपाडा लगातार चाची के छेद पर रगड खा रहा था मेरे तन-बदन में मस्ती बिजली बन कर दौड़ रही थी खुद पे काबू रखना पल पल भारी होता जा रहा था और काबू रखे भी तो कोई कैसे जब पल पल आप इस सुख को पाने के लिए खींचे जा रहे हो मैंने अंपनी कमर को थोडा सा उचकाया तो मेरा गरम सुपाडा चूत की उन नरम फांको को फैलाते हुए आगे धंसने लगा ऐसे लग रहा था की जैसे सुपाडा किसी गरम भट्टी में जा रहा हो

“आह ” चाची के होंठो से एक मस्ती भरी आह फुट पड़ी और उसके हाथ मेरी पीठ पर रेंगने लगे उसके पैर और ऊपर होने लगे अंग्रेजी के ऍम अक्षर की तरह उसने निचे से अपने चुतड उचकाये और मैं चाची पर झुकता गया मेरा लंड धीरे धीरे उस चिकनी चूत में आगे को सरकने लगा चाची की आहे मुझे पागल करने लगी थी

“पूरा अन्दर डाल ” वो मस्ती में डूबती हुई बोली

लंड अभी आधा ही अन्दर गया था की मैंने उसको वापिस पीछे की और खींचा और इर झटके से पूरा लंड चाची की चूत में सरका दिया चाची आह भरते हुए मुझसे चिपक गयी दो जिस्म एक हो गये थे उसने बुरी तरह मुझसे अपने आप में जकड लिया कुछ देर हम ऐसे ही लेटे रहे फिर वो बोली धीरे धीरे लंड को आगे पीछे कर तो मैं वैसा ही करने लगा और कसम से इतना मजा आ रहा था की क्या बताऊ मेरा लंड चाची की गहरी चूत में बार बार अन्दर बाहर हो रहा था और उस घर्षण से चाची को असीम मजा आ रहा था

“ओह कुंदन बहुत बढ़िया रे आहा बस ऐसे ही aaahhhhh ”

बीच बीच हम एक दुसरे के होंठ पीते मैं उसके सेब से गालो पर चुम्बन अंकित करता जब मैं रुकता तो चाची अपनी कमर उचकती हुए धक्के लगाती कमरे में गर्मी अत्याप्र्त्याषित रूप से बढ़ गयी थी चाची का पूरा चेहरा मेरे थूक से सना हुआ था आह आह की आवाज ही थी जो उस कमरे की ख़ामोशी में गूंज रही थी और तभी चाची ने मुझे अपने ऊपर से हटा दिया

मैंने चाची की तरफ देखा तो वो मुस्कुराते हुए उठी और मुझे लिटा दिया चाची अब मेरे ऊपर आ गयी और मेरे लंड को चूत पर घिसने लगी चूत के गाढे रस में सना हुआ मेरा लंड जब चूत की काली फांको से रगड खाते हुए अंदर के लाल हिस्से पर जाता तो बहुत मजा आता धीरे धीरे चाची मेरे लंड पर बैठने लगी और उसके गद्देदार चुतड मेरी गोलियों से आ टकराए पूरा लंड एक बार फिर से चाची की चूत में जा चूका था वो थोड़ी सी आगे को हुई जिसे से उसकी झूलती चुचिया मेरे चेहरे पर आ गयी

चाची ने अपनी गांड को थोडा सा ऊपर उठाया और फिर से निचे बैठ गयी जैसे मैं धक्के लगा रहा था वैसे ही वो धक्के लगा रही थी मेरे हाथ अपने आप उसके नितम्बो पर आ पहुचे थे जिनको मैं बड़े प्यार से सहला रहा था उफ्फ्फ कितना मजा आ रहा था धीरे धीरे चाची ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी ठप्प थप्प की आवाज आ रही थी उसके चुतड पटकने से तभी चाची ने अपनी चूची को हाथ से पकड़ा और मेरे मुह में दे दिया मैं एक बार फिर से चूची पिने लगा कसम से कितना मजा आ रहा था चाची का बदन अकड़ने लगा था

धीरे धीरे मेरी पकड़ उसके चूतडो पर मजबूत होती जा रही थी और चाची पूरी तरह मुझ पर झुक चुकी थी लंड और चूत के मिलन में ऐसी मस्ती मची थी की बस अब क्या कहे पल पल हम दोनों के बदन में एक तरंग सी दौड़ रही थी बार बार उसका बदन अकड़ रहा था और फिर मुझे ऐसे लगा की जिस्म का सबकुछ जैसे निचुड़ रहा हो मेरे लंड की नसे फूल गयी और उसमे से कुछ निकल कर चूत में गिरने लगा गर्म सा

और मेरी आँखे मस्ती के मारे बंद हो गयी बदन झटके खाने लगा और तभी चाची ने कस लिया मुझे अपनी बाहों में चूत को भींच लिया दोनों टांगो के बीच में जैसे की मेरे लंड को कैद ही करना चाहती हो लम्बी लम्बी साँस लेते हुए वो मेरे ऊपर ही लेट सी गयी हम दोनों की साँस बुरी तरह से उफन आई थी कुछ पल हम दोनों सांसो को सँभालते रहे और फिर वो उठी और पास पड़ी चादर लपेट कर कमरे से बाहर चली गयी मैं उसके पीछे गया तो देखा वो मूत रही थी मुझे भी मुतने की इच्छा हुई

बाहर अभी भी हलकी हलकी बारिश हो रही थी मैं भी वही खड़ा होकर मुतने लगा चाची ने मुतने के बाद अपनी चूत को साफ़ किया और फिर कमरे में आ गयी मैंने भी लंड को पानी से धोया और किवाड़ बंद करके चाची के पास लेट गया कुछ देर हम दोनों में से कुछ नहीं बोला कोई भी फिर मैंने चाची की कमर में हाथ डाला और उसे अपनी और खीच लिया

चाची ने अपना हाथ मेरे सीने पर रख दिया हम दोनों पता नहीं क्यों आपस में बात नहीं कर रहे थे बस हाथ से एक दुसरे के बदन को सहला रहे थे अभी अभी हुए सम्भोग ने हमारे रिश्ते को एक नया मोड़ जो दे दिया था

 
मैं कुछ देर चाची की पीठ को सहलाता रहा फिर मैंने चाची का हाथ अपने लंड पर रख दिया उसने हाथ हटाया नहीं और धीरे धीरे उसे अपनी मुठी में लेके सहलाने लगी उसके छूने से ही मेरा बुरा हाल होने लगा था एक बार फिर मुरझाये लंड में तनाव होने लगा था उसने अब मेरी गोलियों को भी सहलाना शुरू कर दिया था जल्दी ही मेरा लंड पूर्ण रूप से उत्तेजित होकर चाची के हाथ में झूल रहा था

“तू बहुत सुन्दर है चाची” मैं बोला और साथ ही चाची के चूतडो पर हाथ फेरने लगा

“तेरे चुतड बहुत ही शानदार है चाची जी करता है इनको चूमता रहू तेरे बदन की ये महक मुझे पागल कर रही है जी चाहता है की पूरी रात तुझे ऐसे ही प्यार करू ”

चाची कुछ नहीं बोली बस धीरे धीरे मेरे लंड से खेलती रही मुझे गरम करती रही मैं उसके होंठो पर टूट पड़ा और एक बार फिर से चाची की जीभ मेरे मुह में गोल गोल घूम रही थी उत्तेजना फिर से हमे कह रही थी की आओ और एक बार फिर से एक दुसरे में समा जाऊ चाची अब टेढ़ी हो गयी थी हमारे पैर आपस में उलझे थे उसको चुमते चुमते मेरी उंगलिया उसकी गांड की दरार पर रेंगने लगी थी

और तभी मेरी बीच वाली ऊँगली ने उसकी गांड के छेद को छुआ तो चाची के बदन में बिजली दौड़ गयी “क्या कर रहा है चुदाई के बाद वो पहली बार बोली ”

“प्यार कर रहा हु और क्या कर रहा हु ” कहते हुए मैंने गांड के छेद को थोडा सा कुरेदा तो चाची ने मेरे लंड को अपनी मुठी पर भींच लिया और आँखों को बंद कर लिया “पुच पुच ” मैंने उसके गाल को चूमा और उसे अपने ऊपर खीच लिया चाची की गांड के छेद को सहलाते हुए मैंने उसे अपने ऊपर लिटाया हुआ था मेरा लंड एक बार फिर से उसकी चूत में जाने को फनफनाया हुआ था आज जी भर के मैं चाची की चूत मारना चाहता था

“कुंदन एक काम करेगा ”

“दो करूँगा बोलो तो सही ”

“मेरी इसको प्यार कर न ”

“किसको चाची ”

“मेरी छु............ चूत को ” चाची बेहद लरजते हुए बोली

“कर तो रहा हु ”

“ऐसे नहीं ”

“तो कैसे ”

“सबकुछ मुझसे ही कहलवाए गा नालायक ” इस बार वो थोडा तुनकते हुए बोली

“अब बताओगी नहीं तो क्या समझूंगा मैं ”

“मेरी चूत को प्यार कर नालायक जैसे मेरे होंठो को कर रहा है ”चाची थोड़े गुस्से से बोली

ओह! अब समझा चाची चाहती थी मैं उसकी चूत की पप्पी लू मैंने उसे अपने ऊपर से उतारा और पेट के बल लिटा दिया उसकी चिकनी जांघो को फैलाया और मैं खुद बीच में आ गया अपने चहरे को उसकी जांघो के जोड़ में घुसा दिया मेरी नाक उसकी चूत के बिलकुल पास थी चाची की चूत की काली पंखुड़िया बार बार खुल और बंद हो रही थी

जैसे ही मैंने साँस छोड़ी गारम हवा चाची की चूत से जा टकराई तो चाची बस आह भर कर ही रह गयी मैंने अपना मुह थोडा और पास किया उस जन्नत के दरवाजे के जिसके लिए लोग पता नहीं क्या क्या कर जाते है चाची थोड़ी देर पहले ही मूत कर आई थी तो मुझे मूत की लपट आई पर उसमे भी एक नशा था जो मुझे बहुत पागल कर गया

माध्यम आकर के झांटो से भरी चाची की कोमल चूत बहुत ही सुन्दर लग रही थी ऊपर से जब उसकी चूत की वो पंखुड़िया जो बार बार खुल और बंद हो रही थी उत्तेजना के मारे मैंने चाची के पैरो को पूरी तरह से विपरीत दिशाओ में खोल दिया था ताकि अगर मेरे सामने कुछ रहे तो बस उसकी चूत , वो चूत जो लपलपाते हुए मुझे अपनी और बुला रही थी की आओ और समा जाओ मुझमे

अपने होंठो पर जीभ फेर कर मैंने उन्हें गीला किया और अगले पल अपने होंठो को चाची की चूत पर रख दिया आह मेरा निचला होंठ जैसे जल ही गया इतनी गरम चूत थी वो और जैसे ही मैंने अपने होंठो से चूत को छुआ चाची तड़प उठी अचानक से “पुच ” मैंने चूत की एक पुप्पी ली कसम से मजा ही आ गया और अगली ही पल चूत से कुछ खारा सा रिस कर मेरे मुह में आ गया जैसे हल्का सा नमक चख लिया हो

कुछ देर मैं अपने होंठ वहा पर रगड़ता रहा चाची अपने हाथ पैर पटकने लगी थी तो मैं समझ गया की जितना इसकी चूत को ऐसे करूँगा उतना ही चाची को मजा आएगा मैंने अपनी उंगलियों से चूत की फानको को अलग किया और फिर अपने मुह में भर लिया “आह कुंदन मार इया रे आह आः रे जालिम ” चाची ने पुरे कमरे को अपने सर पर उठा लिया उसकी चूत से रिश्ते उस खारे पानी से मेरा चेहरा ठोड़ी की तरफ से पूरा सन गया था पर चाची का क्या हाल था ये आप खुद समझ सकते है

कुछ देर बस मैंने उन फांको को अपने मुह में लिए रखा चाची अपनी कमर को उचकने लगी थी खुद मेरा लंड ऐंठा हुआ था तभी चाची ने मुझे अपने ऊपर इस तरफ से आने को कहा की मेरा मुह उसकी चूत पर और टांगे उसकी मुह की तरफ थी इस तरह से होते ही मैं एक बार फिर से उसकी चूत टूट पड़ा मैं इस कदर उसकी चूत को चूस रहा था की दुनिया का सबसे स्वादिष्ट पदार्थ वो ही

सूप सूप मेरी जीभ चाची की चूत में अन्दर बाहर हो रही थी पर क़यामत जब हो गयी जब मैंने अपने लंड पर कुछ गीला लिज्लिसा सा महसूस किया चाची ने भी मेरे लंड को अपने मुह में भर लिया था उफ्फ्फ्फ़ ये हो क्या रहा था एक पल में ही मैं इस कदर मस्त हो गया की मामला हद से ज्यादा गरम हो गया चाची की गरम जीभ मेरे सुपाडे पर घूम रही थी और उसकी मुट्ठी में मेरी गोलिया कैद थी

काम्ग्नी में जलते हुए हम दोनों एक दुसरे के अंगो को चाट रहे थे चूस रहे थे जब चाची ने तेजी से मेरे लंड पर अपना मुह चलाना चालू किया तो मस्ती में चूर मैंने धीरे से उसकी गांड के छेद को चूम लिया चाची ऊपर से निचे तक कांप गयी जिस अदा से वो मेरे लंड को चूस रही थी मैं तो कायल हो गया था उसका मैंने फिर से उसकी चूत को अपने मुह में भर लिया और उसने मेरे लंड को

 


हमारी आहे तो कही दब ही गयी थी अगर कुछ था तो बस पुच पुच की अवजे जो हम दोनों के मुह से आ रही थी बहुत देर तक मैं चाची की चूत और गांड दोनों को चाटता रहा फिर मुझे ऐसा लगा की एक बार फिर मेरे लंड में कुछ सुगबुगाहट होने लगी है और एक बार फिर उसमे से कुछ निकल कर चाची के मुह में गिरने लगा और ठीक उसी पल चाची ने अपने चुतड ऊपर उठाये और मेरे मुह में अपना गाढ़ा रस छोड़ते हुए निढाल हो गयी

उस रात उसके बाद कुछ नहीं हुआ थकान में चूर हम दोनों एक दुसरे की बाहों में कब सो गए कुछ खबर ही नहीं थी सुबह मैं जागा तो चाची बाहर ही थी मुझे देख कर वो हंसी तो मैं भी हंस पड़ा पर उस हंसी में जो बात थी वो बस हम दोनों ही समझ पा रहे थे चाची थोड़ी देर में आने वाली थी पर मुझे जल्दी थी मैंने साइकिल उठाई और हो लिया घर की और

एक नजर घडी पर डाली और फिर अपनी वर्दी उठा कर मैं सीधा बाथरूम में गुस गया पर यही पर साली कयामत ही हो गयी जैसे ही मैं बाथरूम में घुसा तो मैंने पाया की वहा पर मैं अकेला नहीं था भाभी पहले से ही वहा पर मोजूद थी सर से लेकर पांव तक पानी की बुँदे टपक रही थी भाभी के बदन से काली कच्छी ही उस समय उसके बदन पर थी ये सब ऐसे अचानक हुआ भाभी भी घबरा गयी उसने पास पड़ा तौलिया उठाया पर उसके पहले ही मैं बाथरूम से बाहर आ गया पर मेरे दिमाग को हिला डाला था इस घटना ने सुबह सुबह

जैसे तैसे आँगन के नलके के निचे नाहा कर मैं तैयार हुआ और जब मैं सीढिया उतरते हुए निचे आ रहा था जाने के लिए तो मेरी नजरे भाभी से मिली पर मैंने सर झुका लिया और बाहर भाग गया कक्षा में ऐसा व्यस्त हुआ की समय कब गुजर गया कुछ पता नहीं चला मास्टर जी से बहाना करके एक बार उसकी कक्षा का चक्कर भी लगा दिया पर वो दिखी नहीं तो हताशा सी हुई पर कुछ चीजों पर अपना बस कहा चलता है

खैर छुट्टी हुई और मैं घर के लिए निकल ही रहा था की उसी कैसेट वाले ने आवाज देकर रोका मुझे

मैं- भाई बाद में मिलता हु थोड़ी जल्दी है

वो- सुन तो सही

मैं- जल्दी बोल

वो- वो गाने भरने को दे गयी है मैंने शाम पांच बजे का टाइम दिया है तू आया रहियो

मैं-पक्का भाई

और मैं घर के लिए बढ़ गया घर आते ही भाभी के दर्शन हुए मुझे तो मैं सर झुका कर ऊपर चला गया तभी उन्होंने पुकारा “कुंदन रसोई में आना जरा ”

मैं गया

भाभी- सुबह नाश्ता किये बिना निकल गए तुम ऐसे बार बार करना ठीक नहीं है

मैं- भाभी जल्दी थी मुझे

वो- कोई बात नहीं, खाना लगाती हु खा लो

भाभी ने खाना लगाया मैं खाने बैठ गया वो भी पास बैठ गयी सुबह जो घटना बाथरूम में हुई थी उसके बाद मुझे अजीब सा लग रहा था मैंने निवाला लिया ही था की खांसी उठ गयी

भाभी- आराम से खाओ कोई जल्दी है क्या

मैं चुपचाप खाने लगा तो भाभी बोली- मेरी गलती थी मुझे कुण्डी लगानी चाहिए थी पर कई बार ऐसा होता है कुंदन तो अपराध बोध इ बाहर आओ कुंदन जल्दी खाना ख़तम करो मुनीम जी आते ही होंगे वो किसी काम से सरहद की तरफ जा रहे है तो राणाजी का हुकुम है की तुम्हे जो भी औजार चाहिए मुनीम जी जीप में वहा छोड़ आयेंगे

मैं- आप बहुत अच्छी है भाभी

भाभी बस मुस्कुरा दी और मेरे सर पर हाथ फेरा हलके से मैंने खाना ख़तम किया और बहुत से औज़ारो के साथ गाड़ी में बैठ कर जमीन की और चल पड़ा करीब आधे घंटे बाद मैं वहा अकेला था तो ये थी मेरी कर्मभूमि अब जो कुछ करना था यही करना था दोपहर के करीब चार बजे थे आसमान में धुप सी थी पर हवा में ठंडक भी थी रात की बरसात से मिटटी में नमी थी मैंने बस इतना सोचा की पहले अगर यहाँ खेती होती थी तो अब भी होगी

मैंने पथरीली जगह को गैंती से खोद कर जायजा लिया तो करीब आठ इंच के बाद निचे नरम जमीन थी भूद वाले हिस्से को तो मिटटी मिलाकर समतल किया जा सकता था पर इस पथरीली जमीन की परत हटाना टेढ़ी खीर थी पर कोशिश करनी थी अगर टेक्टर होता तो बात बन जाती पर राणाजी की वजह से कोई मदद भी नहीं करता मेरी मुझे आदमियों की जरुरत थी पर फिर भी मैंने खोदना शुरू किया शुरू में तकलीफ हुई पर मेहनत रंग लायी थोड़ी ही सही पर कुछ तो शुरुआत हुई

करीब तीन घंटे मैंने वहा बिताये और इन तीन घंटो ने मेरा दम चूस लिया मैंने खुद को कोसा की साइकिल भी रख लेता तो वापिस जाने में दिक्कत नहीं होती सांझ तो हो ही गयी थी तो मैं टहलते हुए गाँव की और आने लगा रस्ते में पूजा का घर आया तो मेरे कदम अपने आप उस तरफ बढ़ गए घर के बाहर ही वो मुझे मिल गयी

वो- तू यहाँ

मैं- वो जमीन वही से आ रहा हु

वो- तो तूने ठान ही लिया

मैं- क्या कर सकता हु अब

वो- अच्छा है मेहनत करेगा तो मिटटी का मोल जान जायेगा तू

मैं- कैसी है तू

वो- मुझे क्या होगा भली चंगी हु

मैं- थोडा पानी पिलाएगी प्यास लगी है

वो- पानी क्या चाय भी पिला दूंगी तू कह तो सही

मैं- फिर तो मजा आ जायेगा

वो- आजा फिर

मैंने ये बात देखि की पूजा बहुत फुर्ती से काम करती थी बस कुछ ही देर में चाय का कप मेरे हाथ में था और उसकी चाय में भी कुछ बात थी मैं हौले हौले चुस्की ले रहा था

मैं – अब कब जाएगी जादू करने

वो- तुझे क्या है

मैं- बस ऐसे ही पूछा

वो- आएगा साथ मेरे

मैं- ले चलेगी

वो- ऊँगली पकड़ के ले चलूंगी क्या आना है तो आ जाना

मैं- कब जायेगी

वो- परसों

मैं- जादू होगा

वो- होगा तो पता चल ही जायेगा वैसे मजा बहुत आता है

मैं- ठीक है मिलता हु परसों फिर अभी चलता हु देर हो गयी है

वो- आराम से जाना

पता नहीं क्यों बहुत अपनापन सा लगा खैर पूजा के बारे में सोचते सोचते ही मैं घर आया तो देखा की माँ सा कही जा रही है और चाची भी साथ है अब ये कहा चले

मैं- कहा जा रहे है

माँ सा- पड़ोस के गाँव में राणाजी के मित्र की पुत्री का विवाह है तो वही जा रहे है

मैं- मैं भी चलू

माँ सा- घर पे जस्सी अकेली है तो तुम यही रहो हमे आते आते सुबह हो जाएगी

मैंने चाची की तरफ देखा तो वो बस मुस्कुरा दी खैर अब जिसे जाना जाए मैं क्या कर सकता हु मैंने किवाड़ बंद किया और अन्दर आ गया मैंने देखा भाभी रसोई में थी

भाभी- खाना लगा दू

मैं- अभी नहीं भाभी कितना काम करोगे आओ बैठते है बाते करेंगे

वो- क्या बात है आज बड़ी याद आ गयी भाभी की बाते करेंगे

मैं- क्या इतना भी हक़ नहीं भाभी

वो- हक़ तो कही ज्यादा है

भाभी और मैं छत पर आकार बैठ गए

भाभी- कितने दिन हुए तेरे भैया का तार या चिट्ठी कुछ नहीं आया

मैं- आपको याद आती है उनकी

वो- याद तो आएगी ना

मैं- समझता हु पर उनको भी थोडा सोचना चाहिए वैसे बोला तो था पिछली चिट्ठी में की सितम्बर तक आऊंगा

वो- बस बोलते है अपनी मर्ज़ी के मालिक जो ठहरे

मैं- अब मैं क्या कहू भाभी

वो- तू भी अपने भैया जैसा है पहले तो भाभी बिना एक मिनट नहीं रुकता था और आजकल बस अपने आप में खोया हुआ है

मैं – ऐसा कुछ नहीं है भाभी पर अभी बस उलझ गया हु अपने आप में और आपसे क्या छुपा है अभी आप भी ऐसा बोलोगे तो कैसे चलेगा

वो- चल जाने दे क्या हुआ तेरी उस आयत का

मैं- क्या भाभी मेरा उस से क्या लेना

वो- अच्छा जी तो फिर वो कैसेट पर उसका नाम क्यों

मैं- वो तो बस यु ही लिख दिया

वो- यु ही कभी मेरा नाम तो नहीं लिखा तुमने

मैं- भाभी ...

वो हंसने लगी

भाभी- कुंदन पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है की तुम मुझसे कही दूर जा रहे हो शायद ये बड़े होने का असर है इस उम्र में इन्सान को अकेलापन चाहिए होता है मैं समझती हु पर जितना मैं जानती हु तुमको अपनी भाभी से बाते नहीं छुपाओगे ना

 
मैं- भाभी पर कोई ऐसी बात है ही नहीं जो मैं तुमसे छुपाऊ मैं नहीं जानता की आपको ऐसा क्यों लगता है शायद इसलिए की पिछले कुछ दिनों से हम साथ में पहले की तरह बाते नहीं कर पाते पर भाभी आपको तो सब पता ही है मैं किस तरह से उलझ गया हु समय रेत की तरह मेरी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है और मुझ कोई राह सूझ नहीं रही है अब कौन बेटा अपने ही पिता की बात काटेगा पर ये नालायकी मेरे माथे आन पड़ी नजरे नहीं मिला पाता हु मैं उनसे पर क्या कर अब

भाभी- पुरुषार्थ करो तुम्हारे साथ कितने लोगो का भाग जुडा है कुंदन जो इस सहकारी इस जमींदारी के कोल्हू में पिस रहे है जुम्मन से मदद मांगो माना की राणाजी ने मना किया है पर अगर चोरी छिपे कुछ थोडा बहुत हो जाए तो कोई बुराई नहीं और फिर मैं तो हु ही सामने से नहीं नहीं तो पीछे से मैं तुम्हारी मदद करुँगी हाथ पैरो से नहीं तो पैसो से तुम्हे जितने पैसे चाहिए मैं दूंगी तुम्हे तुम्हे गाँव में कोई ट्रेक्टर ना देगा तो आस पास किसी को देखो पैसे दो वो मदद करेगा तुम्हारी

मैं- भाभी पर राणाजी का सिक्का है आस पास से भी कोई नहीं आएगा

भाभी- प्रयास तो करो तुम मुझे तुम पर जो विश्वास है उसका मान रखोगे ना

मैंने भाभी के पैरो को हाथ लगाया और मैने अपने सर पर वो स्पर्श पाया जो शायद माँ ने कभी नहीं दिया था फिर हमने खाना खाया फिर भाभी ने मेरे कमरे में ही डेरा डाल दिया मुझे नींद नहीं आ रही थी बस भाभी के खुबसूरत चेहरे को ही देखता रहा पता नहीं कब तक

“सो जाओ देवर जी अब ऐसे एकटक निहारोगे तो नजर लग जाएगी मुझे ” भाभी ने करवट बदलते हुए कहा

मैं- आप जाग रही है भाभी

वो- हा, पर तुम्हे कैसी है ये बेचैनी

मैं- सच कहू तो पता नहीं भाभी

वो-वो ही तो मैंने बार बार पूछा तुमसे की जो भी है दिल में बता सकते हो इतना तो हक़ है मुझे

भाभी ने ऐसे बात बोल दी थी दिल को छू गयी थी मैंने भाभी की आँखों में ठीक वैसा ही देखा जैसे मुझे उस लडकी में दीखता था पर मैं उसको क्या बताता कुछ था ही नहीं बताने को क्योंकि बात बस ठीक से शुरू भी तो नहीं हुई थी मैं उठकर भाभी के बिस्तर पर बैठ गया और उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया वो मुस्कुराती रही पता नहीं कब भाभी नींद के आगोश में चली गयी पर मैं बैठा रहा

अगले दिन मैं प्रधानाचार्य जी से मिला और पुरे एक हफ्ते की छुट्टी के लिए आवेदन किया कुछ सवाल जवाब के बाद उन्होंने इस हिदायत के साथ की पढाई पर कोई आसर ना हो छुट्टी दे दी उसके बाद मैं कैसेट वाले से मिला थोड़ी देर बैठा आयत को न देख पाने का मलाल बहुत हुआ पर कल मैं आही नहीं सका था तो अपने दिल की हसरत दिल में लिए मैं वहा से वापिस हुआ घर आया तो देखा की राणाजी घर पर ही थे मैंने पता नहीं क्या सोच कर उनसे बात करने को सोचा

मैं- आपसे कुछ कहना था

वो- हम्म्म

मैं- जी मुझे ना एक कार चाहिए

राणाजी ने मुझे ऊपर से निचे तक देखा और फिर थोड़े व्यंग्य से बोले- अभी तुम लायक नहीं जब हो जाओगे तो सोचेंगे

मैं- पर भाई सा के पास भी है जो बस खड़ी ही रहती है मैं नयी नहीं मांग रहा वो खटारा जीप भी चलेगी

राणाजी-भाई सा की तरह काबिल बन छोरे हसरते तो सबकी होती है पर उनसे कुछ ना होता चल भीतर जा

मैं जुम्मन से मिला पर बात बनी नहीं क्योंकि राणाजी का हुकुम गांव में कोई नहीं टाल सकता था तो वो भी चाह कर मदद नहीं कर पाया पर उसने फिर भी भरोसा दिया की चोरी छिपे उससे जितना बन पड़ेगा वो करेगा मैंने एक नजर घडी पर डाली दस बज रहे थे दिन के मैंने साइकिल ली और सीधा उस उजाड़ जमीन की तरफ हो लिया पूजा के घर पर बड़ा सा ताला टंगा हुआ था पुराने ज़माने का

खैर, मैं पंहुचा वहा तो देखा की मेरे औजार ऐसे ही पड़े थे आसमान को देख का लग रहा था की बरसात पड़ेगी और मैं भी वैसा ही चाहता था

खैर खोदना शुरू किया पर जो काम ट्रेक्टर की गोडी से होता मैं अकेला भला क्या कर पाता पर फिर भी कोशिश तो करनी थी ही तक़रीबन तीन घंटे मैंने बहुत मेहनत की फिर बरसात होने लगी आस पास सर छुपाने की जगह भी नहीं थी पर मुझे काम भी करना था और थकान भी थी तो मैं उस पुराने कुंवे के पास जो पत्थरों का चबूतरा बना था वही पर लेट गया बारिश की बूंदों के बीच

लेटे लेटे ही मैंने देखा की अपनी बकरियों को हांकते हुए पूजा भीगती हुई मेरी तरफ ही आ रही थी मैंने देखा वो बार बार अपने चेहरे पर आ गयी बालो की लटो को हटाती वो ऊपर से लेकर निचे तक भीगी हुई थी जब वो थोडा मेरे पास आई तो मैंने उसे आवाज दी तो उसका ध्यान मेरी तरफ आया और वो तेजी से मेरी और आने लगी

वो- यहाँ क्या कर रहा है बारिश में

मैं- बस भीग रहा हु

उसने अपने पशुओ को बरसात से बचने के लिए पेड़ो की ओट में किया और फिर मेरे पास ही आकार बैठ गयी और जैसे ही उसने अपने बालो को पीछे की और किया कसम स दिल की धड्कने बढ़ सी गयी उसके पुरे चेहरे से पानी टपक रहा था बल्कि यु कहू की उसके गालो को उसक होंठो को चूम चूम कर जा रहा हो बेहद खुबसुरत लग रही थी उसने पकड़ लिया मेरी नजरो को और कंपकपाते हुए बोली- क्या देख रहा है कुंदन

तुम्हे “ बस इतना ही कह सका मैं

पता नही वो मेरा वहम था या फिर कुछ और पर मैंने उसकी आँखों में एक हया सी देखि और फिर उसने नजरे दूसरी तरफ घुमा ली

पूजा- तुम्हे भीगना पसंद है

मैं- बहुत

वो- मुझे भी

मैं- हमारी आदते बहुत मिलती हैं ना

वो—पता नहीं

वो उठी और फिर सामने जो बरगद का पेड़ था उसकी तारफ चल पड़ी अपने चेहरे पर पड़ते पानी को पोंछते हुए मैं बस उसको देखता रहा दरअसल ऐसे भीगते हुए उसको देखना आँखों को बहुत सुकून दे रहा था वो पेड़ के निचे जाकर बैठ गयी मैं चबूतरे पर बैठे हुए उसको देखता रहा और वो मुझे बरसात पता नहीं क्यों बहुत प्यारी सी लगने लगी थी

 
फिर उसने मुझे इशारा किया तो मैं जैसे दौड़ते हुए उसके पास ही गया उसने मुझे बैठने का इशारा किया तो मैं उसके पास बैठ गया तो वो बोली- कुंदन बरसात के शोर की ख़ामोशी कभी महसूस की है तुमने

मैं- मैंने तो धडकनों की ख़ामोशी भी सुनी है पूजा

उसने मेरे हाथ को हाथ को थाम लिया उसके होंठ एक पल कुछ कहने को हुए पर फिर वो चुप कर गयी पर मैंने समझ लिया था दर्द उसके चेहरे पर अपनी दस्तक देकर चला गया था जिसे बड़ी सादगी से उसने छुप्पा लिया था

पूजा- और बताओ

मैं- बस थोड़ी परेशानी है की इस जमीन पर कैसे कुछ होगा , अगर ट्रेक्टर होता तो गोडी मरवा लेता दो तीन बार में जमीन समतल हो जाती तो फिर प्रयास कर सकता था

वो- बस इतनी सी बात फिकर मत कर काम हो जायेगा

मैं- मुश्किल है पूजा

वो- मुश्किल कुछ नहीं होता कुंदन बस हम कदम उठाने से डरते है

मैं- तुम इतनी सुलझी हुई कैसे हो

वो- बस समय और तक़दीर की बात है

मैं- वो तो है , पूजा क्या मैं तुमसे कुछ पूछ सकता हु

वो- हां,

मैं- तुम्हे क्या लगता है मैं यहाँ फसल उगा पाउँगा

वो- मेहनत करोगे तो अवश्य , उसने एक नजर आसमान पर डाली और बोली काश बरसात थोडा पहले रुक जाये तो मुझे जयसिंह गढ़ जाना था कुछ काम से

मैं- मैं चलू तुम्हारे साथ मेरे पास साइकिल भी है तो ले चलूँगा

उसने मुझे देखा और बोली- तू क्या करेगा

मैं- कुछ नहीं कभी गया नहीं हु उधर तो बस ऐसे ही

वो- ठीक है पर मेरी एक शर्त है

मैं- क्या

वो- तुम मुझसे कोई सवाल नहीं करोगे

मैं- किस बारे में

वो- किसी बारे में नहीं

मैं- ठीक है

ऐसे ही बाते करते करते करीब घंटा भर हम बतियाते रहे तब तक बरसात भी मंद होने लगी थी तो उसने अपने पशुओ को हांका और मैं उसके साथ उसके घर आ गया उसने अपने कपडे बदले पर मेरे पास तो थे नहीं दुसरे वाले मैं उन्ही भीगे कपड़ो में रह गया उसको बिठाया और साइकिल चाप दी जयसिंह गढ़ की तरफ जो हमारे गाँव से थोड़ी दूर था दरअसल हमारे गाँव और जयसिंह गढ़ की बरसो से दुश्मनी चली आ रही थी और ऐसा शायद ही दोनों गाँवो के लोग कभी आवाजाही करते थे

साइकिल की घंटी को टन टन बजाते पिछली सीट पर पूजा को बिठा कर मैं चले जा रहा था जयसिंह गढ़ की और पूजा मुझे बताती रही की किधर जाना है करीब आधे घंटे बाद हम गाँव के बाज़ार में पहुचे जहा बहुत सी दुकाने थी वो साइकिल से उतर गयी तो मैं भी पैदल हो लिया उसने अपने चेहरे पर दुपट्टा लपेट लिया और माता के मंदिर की और बढ़ने लगी

मैं भी उसके साथ अन्दर जाना चाहता था पर उसने मुझे सीढियों पर ही रुकने को कहा और अंदर चली गयी मैं इंतजार करते रहा बहुत देर तक वोवापिस नहीं आई तो मुझे कोफ़्त सी होंने लगी मैं टहलने लगा इधर उधर मंदिर के बाहर कुछ लोग चीज़े बेच रहे थे मैं ऐसे ही देख रहा था तो एक काकी ने पूछा- बेटा मेरा आज सारा सामान बिक गया बस एक जोड़ी पायल बची है लोगे क्या

मैं- काकी मेरा क्या काम पायल का

वो- अरे बेटा, आज नहीं तो कल होगा है लेलो अब इस एक जोड़ी के लिए कब तक मैं बैठूंगी

मैं- ठीक है काकी पर दुआ करना की पायल पहनने वाली जल्दी ही मिले

काकी- बेटा जिसे तू ये पायल देगा वो ही तेरी हमसफर बनेगी मेरी दुआ है मातारानी इस दुआ को जरुर पूरा करेगी

मैंने हस्ते हुए वो पायल ले ली और वापिस सीढियों के पास बैठ कर पूजा का इंतजार करने लगा पर पता नहीं वो अन्दर क्या कर रही थी और उसने मुझे मना किया था तो मेरे पास और कुछ रास्ता भी नहीं था सिवाय इंतजार के तभी बादल जोर जोर से गरजने लगे तो मैं समझ गया की अभी इनका मन नहीं भरा है पर बरसात मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर सकती थी

जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था मेरी बेचैनी बढ़ रही थी पर पूजा ............. खैर घंटे भर बाद वो आई तो उसके हाथ में एक बड़ा सा झोला था उसने मुझे एक पर्ची दी और एक नोटों की गड्डी और बोली- कुंदन आगे एक दुकान है वहा से ये सामान ले आओ मैं तुम्हे यहाँ से दो गली पार करके एक पुराना डाकघर आएगा उसके पास एक जोहड़ है वहा मिलूंगी

मैंने सर हिलाया और दुकान की और बढ़ गया उस नोटों की गड्डी को देखते हुए सामान ज्यादातर घर का ही था जिसे लेने में करीब आधा घंटा लग गया उसके बाद मैं पैदल ही साइकिल लेकर उस और चला जहा उसने बताया था तो मैं उस ईमारत के पास पंहुचा जहा डाकघर की एक जंग खायी तख्ती लटक रही थी ईमारत जर्जर थी और साफ पता चलता था की किसी ज़माने में होता होगा पर आज नहीं है

 
कुछ देर मैं वही खड़ा रहा पर पूजा दिखी नहीं ऊपर से आसमान काला होने लगा था जो साफ़ बता रहा था मेह पड़ेगा तगड़े वाला मैंने आसपास का जायजा लिया ये अलग सी जगह थी इस तरफ घर वगैरह नहीं थे आसपास ये डाकखाना था और एक दो तिबारे से थे बाकि रास्ता सामने की और जा रहा था शायद ये गाँव का छोर था कुछ सोच कर मैं आगे को बढ़ गया

मैंने कलाई में बंधी घडी पर एक नजर देखा शाम के साढ़े चार हो रहे थे पर मोसम की वजह से लग रहा था की सांझ जल्दी ढल गयी है तो वो रास्ता गाँव से बाहर की तरफ जाता था मैं साइकिल लियी थोड़ी दूर गया तो देखा की पूजा सड़क के एक किनारे खड़ी सामने की तरफ देख रही थी मैंने उसकी नजरो का पीछा किया तो समझ गया वो क्या देख रही थी और मुझे समझ नहीं आया की मैं क्या कहू

जहा वो खड़ी थी वहा से करीब ढाई-तीन सो मीटर दूर एक हवेली थी जो रही होगी किसी ज़माने में बहुत शानदार पर आज भी अपने दम पर खड़ी इठला रही थी आसपास के बाकि इलाके में बस खेत खलिहान से ही थे पर कुछ तो बात थी उसको देखने पर ऐसे लगता था की जैसे नजर हटाये ही ना

जैसे किसी चकोर की निगाह बस चंद्रमा पर रहती है वैसे ही पूजा बस उस हवेली को देख रही थी मेरे मन में था कुछ कहने को पर उसने पहले ही कहा था की मैं कुछ न पुछु तो मैं वापिस उलटे कदम आकर डाकघर के पास ही खड़ा हो गया ऊपर मेघो ने तैयारी कर ली थी की बस अब न्रत्य शुरू करेंगे और दो- चार मिनट में हलकी हलकी बुँदे पड़ने लगी

मैंने अपने बालो में हाथ फेरा और उस रस्ते की और देखा कर भी क्या सकता था सिवाय इंतजार के खैर, कुछ देर बाद पूजा तेज तेज कदमो से चलती हुई आई और मुझे चलने का इशारा किया ख़ामोशी से हम दोनों वापिस चलने लगे

मैं- बैठ जा

वो- गाँव से बाहर निकलते ही

हम अभी उस बाज़ार की तरफ आये थे की तभी एक जीप हमारे पास से आई और उसमे से किसी ने कहा- हाय क्या चाल है

दूसरा –सही कहा भाई, माल तो चोखा है और गाड़ी से उतरने लगे

मेरा दिमाग पल भर में ही घूम गया मैंने साइकिल स्टैंड पर लगायी पर पूजा ने मेरा हाथ कस के पकड़ लिया

मैं- हाथ छोड़

पर वो पकडे रही , तभी एक छोरा मेरे बिलकुल पास आया और बोला- इतना क्यों तमक गया अब माल की तारीफ तो करनी ही पड़ती है उसने पान थूकते हुए कहा

मैं-दुबारा अगर एक शब्द भी तेरे मुह से निकला तो ठीक नहीं होगा

दुसरे ने मेरा कालर पकड़ लिया और बोला- जाने है किसके सामने जुबान खोल रहा है ये अंगार ठाकुर है

मैंने उसका हाथ अपने कालर सी हटाते हुए कहाः- बुझा दूंगा अंगार को दो मिनट में अगर अपनी सीमा लांघी तो

बरसात कुछ तेज सी पड़ने लगी थी और साथ मेरा गुस्सा भी पता नहीं वो दोनों हसने लगे फिर वो अंगार बोला- छोरे खून घना गरम हो रहा हो तो ठंडा कर दू मेरे ही गाँव में मुझसे ऊँची आवाज में बात करेगा तू

मैं- और तू किसीको भी ऐसे गंदे शब्द बोलेगा

वो- तू कहे तो उठा लू वैसे भी आज मोसम मस्ताना हो रहा है

उसकी बात मेरे सीने को ही चीर सी गयी जैसे और मैंने अपना हाथ उठाया ही था उसको मारने को पर पूजा की आवाज ने मुझे रोक लिया “नहीं रुक जाओ ” पूजा आगे बढ़ी और अंगार के सामने खड़ी हो गयी बरसात के बावजूद बाज़ार में भीड़ सी इकठ्ठा होने लगी थी

पूजा ने अपने हाथ जोड़े और बोली- इस से गलती हो गयी हुकुम, माफ़ कर दीजिये आप बड़े लोग है

अंगार पान की पीक थूकते हुए- माफ़ तो कर दूंगा जानेमन पर इसको बोल की मेरे जूते पर सर रखे

उसकी ये बात सुनते ही मेरे खून में जो अहंकार दौड़ रहा था वो जोर मारने लगा खून उबलने लगा मैं गुस्से से चिल्लाया-कुंदन तेरे जूते पे सर रखेगा उस से पहले मैं तेरा सर................

पर मेरी बात अधूरी ही रह गयी थी पूजा ने अपना हाथ मेरे मेरे मुह पर रखा और बोली – कुंदन तुझे मेरी कसम चुप रह बस

पता नहीं क्यों उसकी बात मान ली मैंने पर दिल कर रहा था की अभी इसकी गांड तोड़ दू बारिश बहुत तेज पड़ने लगी थी

पूजा- मैं आपसे फिर माफ़ी मांगती हु हुकुम माफ़ कर दीजिये

पर उस अंगारे को पता नहीं क्या गुमान था वो बेशर्मी से फिर बोला- माफ़ कर दूंगा जानेमन पर अगर तू एक बार अपना हसीं चेहरा दिखा दे तो जितनी तू पीछे से मस्त है चेहरा भी उतना ही मस्त है या नहीं

मुझे हद से ज्यादा शर्मिंदगी महसूस हो रही थी जी कर रहा था की अभी मर जाऊ या मार दू पर पूजा ने मेरे पैरो में अपनी कसम की बेडिया डाल दी थी अंगार की वो हसी मेरे कलेजे को चीर रही थी पूजा बस शांत खड़ी थी उसने अपना हाथ पूजा के चेहरे पर लिपटे दुपट्टे की और किआ मैं बीच में आ गया

मैं- अंगार मैं तुझे चुनोती देता हु लाल मंदिर में बलि चढाने की और तू चुनोती पार कर गया तो ये तुझे अपना चेहरा जरुर दिखाएगी

अंगार के हाथ अपने आप रुक गए उसने घुर के मुझे देखा और बोला- कौन है तू

मैं- अगर तुझे चुनोती दी है तो तू समझ जा

अंगार- लाल मंदिर की चुनोती नहीं देनी थी छोरे पर तूने मेरी दिलचस्पी जगा दी क्योंकि बरसो से बलि नहीं दी गयी और जयसिंह गढ़ में आके ठाकुर अंगार चंद को चुनोती देने वाला कोई आम इन्सान ना हो सके वैसे भी मन्ने तुझे गाँव में नहीं देखा कभी पहले कहा का है तू अब तो पता करना पड़ेगा

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी की तभी वहा पर एक के बाद एक कई गाड़िया आकार रुकी और उस सफ़ेद गाड़ी से जो रोबीला इन्सान उतरा तो आसपास सभी ने हाथ जोड़ लिए अंगार ने भी एक आदमी ने फ़ौरन छतरी तान दी उसके चेहरे पर वैसा ही रौब था जैसा की मैंने राणाजी के चेहरे पर देखा था

“क्या हो रहा है यहाँ ” उसकी आवाज में जैसे एक गर्जना सी थी

मैंने भी अपने हाथ जोड़े और उसको पूरी बात बता दी की कैसे हम जा रहे थे और कैसे अंगार ने पूजा के बारे में क्या कहा तो उस रोबीले इन्सान ने वही पर अंगार को फटकारा और उसे पूजा से माफ़ी मांगने को कहा पर तभी अंगार बोल पड़ा- ठाकुर साब इसने मुझे लाल मंदिर में बलि चढाने की चुनोती दी है

और उस ठाकुर की आँखे आश्चर्य में फैलती चली गयी

बारिश अब बहुत तेज पड़ने लगी थी उस ठाकुर ने मुझे बुरी तरह से घुरा और बोला – लाल मंदिर में बलि की चुनोती

मैं खड़ा रहा

ठाकुर- छोरे मेरा नाम ठाकुर जगन सिंह है ये जो तूने लाल मंदिर की चुनोती दी है के सोच के दी बता जरा

मैं- इसने जो बात बोली बोली ठाकुर साहब आग लगा गयी ये इसे उठा लेगा दबंग है तो किसी को भी उठा लेगा के सच कहू तो चैन ना मिल रहा सोचु हु की धरती फट जाये और मैं समा जाऊ शर्मिंदी इस बात की है की मेरे रहते ये इतना बोल गया कैसे

ठाकुर- क्या लगती है छोरी तेरी

मैं- सबकुछ लगती है पता नहीं कैसे मेरे मुह से निकल गया और ना भी कुछ लगती ना तो भी मेरे सामने कोई किसी औरत लड़की को ऐसे भद्दे शब्द बोलता तो मैं ये ही करता

ठाकुर- तेरी बात सही है छोरे पर जवान खून है जोर मार जाता है कभी कभी , पर तू खुद को देख और अंगार को देख क्या सोच के चुनोती दी तूने जान गयी समझ तेरी

मैं- जान तो कभी ना कभी जानी है ठाकुर साब, आज मेरे हाथ बंधे है पर उस दिन नहीं होंगे छटी का दूध याद न दिला दू तो नाम बदल देना

मैंने ठाकुर की आँखों में गुस्सा देखा शायद उसे मेरी बात चुभ गयी थी

 
मैंने ठाकुर की आँखों में गुस्सा देखा शायद उसे मेरी बात चुभ गयी थी

ठाकुर- पर तू भूल गया की बलि या तो जयसिंह गढ़ का कोई चढ़ा सके है या देव गढ़ का और देव गढ़ में कहा शूरवीर जो चुनोती दे सके अब परम्परा थोड़ी ना तोड़ी जा सके है

मैं- चुनोती तो दी गयी और अंगार ने मंजूर की अब ये पीछे हटे तो थू है इसकी मर्दानगी पर और सौगंध है मुझे जहा जहा हाथ लगाने को कहा था इसने उसके वो अंग बदन से अलग कर दूंगा

तभी जोरो से बिजली कडकी मैंने पूजा का हाथ थामा और दुसरे हाथ से साइकिल ली और आगे बढ़ गया किसी ने भी रोकने की कोशिश नहीं की पल पल बरसात बढती जा रही थी और मेरे कलेजे की आग जो धधक रही थी बरसात भी उसे भिगो नहीं सकती थी पुरे रस्ते मैंने और पूजा ने कोई बात नहीं की उसके घर आने के बाद अमिने उसका सामान रखा और वापिस मुड गया तो उसने आवाज लगायी

पूजा- कहा जा रहा कुंदन

मैं- घर

वो- मोसम खराब है अन्दर आजा

मैं- फिर कभी

वो- कुंदन मैंने कहा अन्दर आ जा

मुझे बहुत तेज गुस्सा आ रहा था मैं कुछ देर खड़ा रहा फिर अन्दर गया पूजा ने मुझे तौलिया दिया और बोली- तुम बहुत भीगे हुए हो पोंछ लो

मैं चुप रहा वो मेरे पास ही बैठ गयी और बोली- मेरी गलती है मुझे तुझे ले जाना ही नहीं चाहिए था

मैं कुछ नहीं बोला

वो- और क्या जरुरत थी इतना हंगामा करने की वो तुझे कुछ बोला था क्या

मैं- पर तुझे तो बोला था न

वो- तो तेरा क्या लेना था मैं चल पड़ी थी न चुप चाप

मैं- पर उठा लेगा क्या

वो- इतना मत सोच कुंदन लडकियों को ये सब तो झलना ही पड़ता है न, और फिर आदत सी हो जाती है

मैं- आदत बदल ले मेरे रहते कोई ऐसा कर जाये कुंदन प थू है फिर तो

वो- तुझे मेरी जिंदगी में आये ही कितने दिन हुए है तेरे बगैर भी तो मैं जीती थी ना अकेले और अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है कुंदन ये डर हमेशा रहेगा पर तुझे पंगा लेने की क्या जरुरत थी आखिर तू मेरा है ही कौन

मैं- कोई ना हु तेरा पर वो उठा लेगा क्या

वो- तुझे कोई फरक नहीं पड़ना चाहिए

मैं- फरक पड़ता है और अनहि पड़ता तो क्यों कसम दी तूने उस वक़्त वर्ना वही उसकी छाती चीर देता

वो- जान बचा रही थी तेरी, मुर्ख, जयसिंह गढ़ से तेरी लाश ही आती फिर

मैं- मर जाने देती ऐसी शर्मिंदी तो ना होती न

वो- तूने क्या सोच कर बलि की चुनोती दी तुझे पता भी है

मैं- पता है और कुंदन का वादा है तुझसे की अंगार के खून से तेरे पैर अगर नहीं धोये ना तो कुंदन तुझे कभी अपनी शकल नहीं दिखायेगा पूजा माना मैं तेरा कोई नहीं लगता पर मेरे सामने कोई तुझे ऐसे बोले पूजा मैं तो मर ही गया मैंने रोते हुए उसके आगे हाथ जोड़ दिए

बाहर बारिश का तेज शोर था पर अन्दर कमरे में ख़ामोशी थी फिर उस ख़ामोशी को तोड़ते हुए वो बोली- कुंदन तुझे चुनोती नहीं देनी चाहिए थी जबकि तुझे पता है एक के मरने पर ही दूसरा बली देगा

मैं- तो मरने दे आखिर मैं हु ही कौन

पूजा ने उसी पल मुझे अपनी बाहों में भर लिया और मेरे कान में बोली- सबकुछ

उसकी आँखों से गर्म आंसू टपक कर मेरे गालो पर गिरने लगे एक दुसरे की बाहों म बस हम दोनों पता नहीं कितनी देर तक रोते रहे कुछ ख्याल आया तो वो मुझसे अलग हुई उअर बोली- ठाकुर, जगन सिंह मेरे चाचा है कुंदन

मैं- तो फिर तू जब चुप क्यों रही तूने उनको बताया क्यों नहीं की अंगार ने उनकी बेटी के साथ बदतमीजी की

वो- बेटी होती तो यहाँ थोड़ी ना होती मैं

मैं- एक दिन आएगा जब तू उसी हवेली में रहेगी पूजा आज तू बड़ी हसरत से उस हवेली को देख रही थी पर एक दिन आएगा जब वो हवेली पलके बिछाए तेरा इंतजार करेगी

वो- छोड़ इन बातो को बारिश पता नहीं कब रुकेगी मैं खाना बनाती हु बता क्या खायेगा

मैं- जो तेरा दिल करे

 
वो बस मुस्कुरा दी और खाना बनाने लगी मैं उसके पास चूल्हे की दूसरी तरफ बैठ गया

वो- क्या देख रहा है

मैं- तुझे

वो- क्यों

मैं- बस ऐसे ही

वो- ऐसे ही मत देख

मैं- एक बात पुछु

वो- नहीं मैंने पहले ही मना किया था तुझे

मैं- मैं बस इतना पूछना चाहता था की तूने चेहरे पे दुपट्टा क्यों डाला था वहा पे

वो- बस यु ही

मैं- सो जाऊ थोड़ी देर

वो- रोटी खाके सोना

मैं- थोडा थक गया हु पता है मेरे घर में मेरी कोई इज्जत नहीं है बस मेरी भाभी है मुझे समझती है बाकि बस एक नौकर जैसा हु मैं

वो- पर तेरे अपने तेरे पास तो है ना

मैं- काश मैं ऐसा कह सकता

वो- कुंदन जो है ठीक है पर तूने मेरे दिल पर बोझ कर दिया है

मैं-कैसा बोझ

वो- मुझे फिकर हो रही है अगर तुझे कुछ हो गया तो

मैं- हो भी जाये तो क्या हुआ हम कौन से तुम्हारे अपने है राह का पत्थर समझ कर भूल जाना

वो- अब ऐसा मत बोल

मैं- क्या फर्क पड़ता है पूजा छोड़ इन सब बातो को ला रोटी डाल थाली में भूख लगी है जोरो से

वो- हां, बाबा

उसके हाथो में सच जादू सा ही था पूरी पांच रोटिया खा चूका था पर फिर भी मन नहीं भरा था बाहर सावन ने जैसे आज कसम ही खा ली थी की सारा पानी का भंडार आज ही खाली करके मानेगा खाने- पीने के बाद अं बस सो जाना चाहता था पर मेरी मज़बूरी थी की कपडे मेरे गीले थे और उनको पहने पहने मैं सोता कैसे

और कपडे ना उतारता तो तबियत ख़राब होनी थी पक्की तो मैंने सोचा की बरामदे में अलाव जला कर बैठ जाता हु उससे गर्मी भी मिलेगी और पूजा के आगे शर्मिंदा भी नहीं होना पड़ेगा बाकि नींद का क्या तो मैंने आग जला ली और उसके पास बैठ गया थोड़ी देर में वो आई

पूजा- अरे यहाँ अलाव क्यों जलाया सोना नहीं है क्या

मैंने उसी अपनी मज़बूरी बताई

वो- बस इतनी सी बात एक काम कर कपडे उतार के सीधा कम्बल में घुस जा फिर मैं तेरे कपडे सूखने के लिए डाल दूंगी तब तक तू तौलिया से काम चला

मैं- रहने दे

वो- क्या रहने दे वैसे ही भीगा हुआ है और ठण्ड लगी तो बुखार हो जाना है पर पहले ये गरम दूध पी ले

मैंने गिलास अपने हाथ में लिया और बोला- पर पूजा

वो- पर वर कुछ नहीं मैं भी थोडा थक सी गयी हु आज तो बस बिस्तर पकड़ना चाहती हु

तो फिर दूध पीने के बाद मैंने कपडे उसको दिए और तौलिए में ही बिस्तर में घुस गया उसने अपनी चारपाई मेरे पास ही बिछा ली और किवाड़ कर दिया बंद गर्म कम्बल बदन को बहुत सुकून दे रहा था ऊपर से थकन तो पता नहीं कब नींद आ गयी रात को पता नहीं क्या समय हुआ था पेशाब की वजह से मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की पूजा अपनी चारपाई पर नहीं थी

कम्बल लपेटे मैं बाहर आया तो मेह अभी भी बरस रहा था मैंने देखा दूर दूर तक बरसात के शोर के अलावा अगर कुछ था तो बस अँधेरा घना अँधेरा मैं मूत कर आया तो देखा वो बिस्तर पर थी मैं सोचा पानी- पेशाब गयी होगी तो मैं भी फिर सो गया सुबह उठने में थोड़ी दे सी हो गयी थी तो देखा की दूसरी चारपाई पर मेरे कपडे रखे थे एकदम सूखे मैं पहन कर बाहर आया

बरसात थम गयी थी पर हर जगह कीच हो रखा था मैंने पूजा को देखा पर वो थी नहीं और ना उसके पशु तो मैंने सोचा की वो चराने या उनको पानी पिलाने गयी होगी मैं क नजर घडी पर डाली 9 से ऊपर हो रहे थे कुछ देर उसका इंतजार किया और जब वो नहीं आई तो मैं अपनी साइकिल लेके गाँव की तरफ हो लिया आधे घंटे बाद मैं अपने कमरे में जा रहा था की मैंने माँ सा और भाभी की बाते सुनी

माँ- जस्सी, चार साल हो गए तेरे ब्याह को पर अभी तक पोते का मुह नहीं देख पाई हु मैं माना की तेरा पति फौजी है पर फौजियों के भी औलादे तो होती हैं ना

भाभी- माँ, जब भी वो आते है हम कोशिश करते है

माँ- तो फिर होता क्यों नहीं देख मेरी बात सुन ले कान खोल कर तू भी और आने दे इन्दर को मैं उसको भी समझती हु मुझे जल्दी से जल्दी खुशखबरी चाहिए

भाभी- जी माँ

तभी माँ की नजर मुझ पर पड़ी तो उन्होंने ताना मारा- आ गए लाटसाहब अगर आवारगी से फुर्सत मिल गयी हो तो जरा भैंसों के लिए खल की बोरिया ले आना याद से और कुछ घर के काम है वो भी आज के आज ही निपटा देना

मैं- जी माँ सा

मैं- भाभी भूख लगी है मेरा खाना चौबारे में ही ले आओ ना

माँ- काम कुछ होता नहीं भूख दिन में चार टाइम लगती है साहब को अरे हमारी नहीं तो खाने की ही इज्जत करो जितना खाते हो उतना काम तो किया करो

माँ की बाते सुनके मन खट्टा हो गया

मैं- भाभी रहने दो पेट भर गया मैं काम निपटा के आता हु

माँ- नखरे देखो तो सही दो बात नहीं सुनेंगे अरे इतना ही नखरा है तो दो पैसे कमा के दिखा पहले पेट भर गया

मैंने अपना माथा पीट लिया यार जब घर वाले ऐसे है तो दुश्मन बाहर ढूंढने की क्या जरुरत है सोचते सोचते मैं घर से बाहर निकल गया तो चंदा चाची घर के बाहर ही थी

मैं- क्या बात है चाची दुरी सी बना ली

वो- कहा रे, तू ही रमता जोगी बना फिर रहा है कल रात कहा था

मैं- रात की जाने दो कहो तो वो काम दिन में कर दू

चाची – चुप बदमाश

मैं- ठीक है रात को मिलते है फिर

वो- आज मैं कुवे पर ना जाउंगी

मैं- कोई बात न मैं छत से आ जाऊंगा पर अभी भी हो सकता है आप कहो तो

वो- नहीं तेरी माँ आने वाली है अभी लाल मिर्चे पीसनी है आज

मैं- रात को तैयार रहना

ये कहकर मैंने चाची को आँख मारी और फिर आगे बढ़ गया करीब दो घंटे बाद मैं सारे काम जो की गैर जरुरी थे वो निपटा कर आया तो माँ सा घर पर नहीं थी भाभी मेरे कमरे में ही थी गाने सुन रही थी

 
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