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Guest
किसी ने मेरी पीठ पर धौल सी जमाई और मैं आगे को गिर पड़ा पीठ में वैसे ही चोट लगी हुई थी तो गुस्सा सा आ गया कुछ कठोर शब्द बोलते हुए मैंने पीछे देखा और पल में ही मेरा गुस्सा गायब सा हो गया मैंने देखा पीछे पूजा मुस्कुरा रही थी
“तुम यहाँ , यहाँ क्या कर रही वो ”
“ढोर चराने निकली थी तो तुमको देखा तुम् बताओ यहाँ कैसे ”
“कुछ नहीं बस ऐसे ही ”
“ऐसे ही कोई कही नहीं जाता और खास कर इन बियाबान में ”
“अब क्या बताऊ पूजा एक आफत सी मोल ले ली है तो उसी सिलसिले में आना पड़ा ” और फिर मैंने पूजा को पूरी बात बता दी
“इस जमीन पर खेती करना तो बहुत ही मुश्किल है कुंदन इसको समतल करने में ही बहुत समय जायेगा तो फसल कब होगी ”
“अब जो भी हो कोशिश तो करूँगा ही वैसे तू कहा चली गयी थी सुबह ”
“काम करने पड़ते है अब तेरी तरह तो हु नहीं ”
“मेरी तरह से क्या मतलब तेरा ”
“कुछ नहीं ”
“तू सारा दिन ऐसे ही घुमती रहती है वो भी अकेले मेरा मतलब ”
“अब कोई है नहीं तो अकेले ही रहूंगी ना और तेरे मतलब की बात ये है की इस इलाके में सब लोग पह्चानते है तो कोई परेशानी नहीं होती और मैं चोधरियो की बेटी हु इतना सामर्थ्य तो है मुझमे ”
“पूजा, पता नहीं क्यों तेरी बातो से ऐसा लगता है की बरसो की पहचान है तुझसे ”
“ऐसा क्यों कुंदन ”
“पता नहीं पर बस लगता है ”
“चल बाते ना बना ढोर दूर चले गए होंगे मैं चलती हु ”
“रुक मैं भी आता हु वैसे भी मुझे अब घर ही जाना है ”
पूजा से बात करते करते हम वहा से चलते चलते उसके घर की तरफ आ गए उसने अपने जानवरों को बाँधा और फिर मैं उसके साथ उस तरफ आ गया जहा पर एक बहुत बड़ा बड का पेड़ था
“कुंदन, ये पेड़ मेरे दादा का लगाया हुआ है ”
“क्या बात कर रहा रही है ”
“सच में ”
“आजा तुझे चाय पिलाती हु ”
मैं और वो घर में उस तरफ आ गए जहा चूल्हा था उसने आग जलाई मैं पास ही बैठ गया थोड़ी देर में ही उसने चाय बना ली एक गिलास में मुझको दी और एक में खुद डाल ली
मैं – पूजा भूख सी लग आई है तो अगर एक रोटी मिल जाती तो
वो- हा, रुक अभी लाती हु
वो एक छाबड़ी सी ली और उसमे से कपडे में लपेटी हुई रोटिया निकाली और एक रोटी मेरे हाथ में रख दी वो रोटी मेरे घर जैसी घी में चुपड़ी हुई नहीं थी पर उसमे जो महक थी वो अलग थी मैंने बस एक निवाला खाया और मैं जान गया की स्वाद किसे कहते है
चाय की चुस्की लेते हुए मेरे होंठो पर एक मुस्कान सी आ गयी थी थोड़ी और बातो के बाद मैंने पूजा से विदा ली और गाँव की तरफ चल पड़ा पर मेरे कंधे झुके हुए थे राणाजी ने अपने बेटे को हराने की तयारी कर ली थी मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी की मैं कैसे उगा पाउँगा फसल इस जमीन पर सोचते विचारते मैं कब घर आ गया पता नहीं चला
मैं चौबारे में जाकर बिस्तर पर लेट गया सांझ ढलने को ही थी मैं सोच विचार में मगन था की भाभी आ गयी हरी सलवार और सफ़ेद सूट में क्या गजब लग रही थी ऊपर से फिटिंग जोरदार होंठो पर लाल सुर्ख लिपस्टिक मांग में सिंदूर हाथो में कई सारी चुडिया जैसे आसमान से कोई सुन्दरी ही उतर आई हो
“आज तो क्या गजब लग रही हो भाभी इतनी भी बिजलिया ना गिराया करो ”
“अच्छा जी मुझे तो कही नहीं दिख रहे झुलसे हुए पता है मैं कब से राह देख रही हु तुम्हारी ”
मैं- क्यों भाभी
भाभी- अरे आज, वो पीर साहब की मजार पर दिया जलाने चलना है तू भूल गया क्या
मैं-ओह आज जुम्में की शाम है क्या
भाभी- तुझे इतना भी याद नहीं क्या
जुम्मे की शाम तभी मुझे कुछ याद आया उसने कहा था की वो जुम्मे की शाम पीर साहब की मजार पर जाती है तो मैं एक दम से उछल सा पड़ा “भाभी एक मिनट रुको मैं अभी आता हु ”
मैंने जल्दी से अपने नए वाले कपडे पहने और बालो में कंघी मार कर भाभी के सामने तैयार था
भाभी- हम मजार पे ही जा रहे है न सजे तो ऐसे हो की तुम्हारे लिए बिन्द्नी देखने जा रहे है
मैं- क्या भाभी आप भी आओ देर हो रही है
चूँकि भाभी साथ थी तो मैंने जीप स्टार्ट की और फिर चल दिए पीर साहब की तरफ जो की गाँव की बनी में थी हम जल्दी ही वहा पहुच गए भाभी दिया जलाने को अन्दर चली गयी मैं रुक गया दरअसल मेरी आँखे बस तलाशने लगी उसको जिससे मिलने की बहुत आस थी और जो दूर से देखा जो उसे दिल झूम सा गया सफ़ेद सूट सलवार में सर पर हमेशा की तरह ओढा हुआ वो सलीकेदार दुपट्टा
होंठ उसके हलके हलके कांप रहे थे जैसे की खुद से बाते कर रही हो मैंने सर पर कपडा बाँधा और उसकी तरफ चल पड़ा फेरी लगा रही थी वो और जल्दी ही आमना सामना हुआ उस से जिसकी एक झलक के लिए हम कुर्बान तक हो जाने को मंजूर थे नजरो को झुका कर सबसे नजरे बचा कर उसने इस्तकबाल किया हमारा तो हमने भी हलके से मुस्कुरा कर जवाब दिया
सुना तो बहुत था की बातो के लिए जुबान का होना जरुरी नहीं पर समझ आज आया था की क्यों फेरी लगाते हुए बार बार आमने सामने आये हम फिर वो बढ़ गयी धागा बाँधने को तो मैं उसके पास खड़ा हो गया पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई वो बहुत धीमे से बोली “”परिंदों के दाना खाने पे “ और उस तरफबढ़ गयी
मैं दो पल रुका और फिर चला तो देखा की वो अकेली ही थी उस तरफ बिखरे दानो को समेट रही थी तो मैं भी समेटने लगा
वो- आज आये क्यों नहीं
मैं- जी वो कुछ कम हो गया था
वो- हम राह देख रहे थे आपकी
मैं- वो क्यों भला
वो- बस उसी तरह जैसे आप आते जाते हमारे छज्जे को तकते है
मैं- वो तो बस ऐसे ही
वो- तो हम भी बस ऐसे ही
और हम दोनों मुस्कुरा पड़े , कसम से उसको ऐसे हँसते देखा तो ऐसे लगा की जैसे दुनिया कही है तो यही है
वो- आप ऐसे बार बार हमारी कक्षा में चक्कर ना लगाया करे हमारी सहेलिया मजाक उड़ा रही थी
मैं- पता नहीं मेरा मन बार बार क्यों ले जाता है उस और
वो- मन तो बावरा है उसकी ना सुना करे
मैं- तो आप ही बता दे किसकी सुनु
वो मेरे पास आई और बोली- किसी की भी नहीं
मैं- एक बात कहू
वो- हां,
मैं- क्या आपको भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है
वो- कैसा जनाब
मैं- जो मुझे महसूस होता है
वो- मैं जैसे जानू, आपको क्या महसूस होता है
मैं- वो मुझे वो मुझे पर . बात अधूरी ही रह गयी
“तो यहाँ हो तुम ....................... ”
“तुम यहाँ , यहाँ क्या कर रही वो ”
“ढोर चराने निकली थी तो तुमको देखा तुम् बताओ यहाँ कैसे ”
“कुछ नहीं बस ऐसे ही ”
“ऐसे ही कोई कही नहीं जाता और खास कर इन बियाबान में ”
“अब क्या बताऊ पूजा एक आफत सी मोल ले ली है तो उसी सिलसिले में आना पड़ा ” और फिर मैंने पूजा को पूरी बात बता दी
“इस जमीन पर खेती करना तो बहुत ही मुश्किल है कुंदन इसको समतल करने में ही बहुत समय जायेगा तो फसल कब होगी ”
“अब जो भी हो कोशिश तो करूँगा ही वैसे तू कहा चली गयी थी सुबह ”
“काम करने पड़ते है अब तेरी तरह तो हु नहीं ”
“मेरी तरह से क्या मतलब तेरा ”
“कुछ नहीं ”
“तू सारा दिन ऐसे ही घुमती रहती है वो भी अकेले मेरा मतलब ”
“अब कोई है नहीं तो अकेले ही रहूंगी ना और तेरे मतलब की बात ये है की इस इलाके में सब लोग पह्चानते है तो कोई परेशानी नहीं होती और मैं चोधरियो की बेटी हु इतना सामर्थ्य तो है मुझमे ”
“पूजा, पता नहीं क्यों तेरी बातो से ऐसा लगता है की बरसो की पहचान है तुझसे ”
“ऐसा क्यों कुंदन ”
“पता नहीं पर बस लगता है ”
“चल बाते ना बना ढोर दूर चले गए होंगे मैं चलती हु ”
“रुक मैं भी आता हु वैसे भी मुझे अब घर ही जाना है ”
पूजा से बात करते करते हम वहा से चलते चलते उसके घर की तरफ आ गए उसने अपने जानवरों को बाँधा और फिर मैं उसके साथ उस तरफ आ गया जहा पर एक बहुत बड़ा बड का पेड़ था
“कुंदन, ये पेड़ मेरे दादा का लगाया हुआ है ”
“क्या बात कर रहा रही है ”
“सच में ”
“आजा तुझे चाय पिलाती हु ”
मैं और वो घर में उस तरफ आ गए जहा चूल्हा था उसने आग जलाई मैं पास ही बैठ गया थोड़ी देर में ही उसने चाय बना ली एक गिलास में मुझको दी और एक में खुद डाल ली
मैं – पूजा भूख सी लग आई है तो अगर एक रोटी मिल जाती तो
वो- हा, रुक अभी लाती हु
वो एक छाबड़ी सी ली और उसमे से कपडे में लपेटी हुई रोटिया निकाली और एक रोटी मेरे हाथ में रख दी वो रोटी मेरे घर जैसी घी में चुपड़ी हुई नहीं थी पर उसमे जो महक थी वो अलग थी मैंने बस एक निवाला खाया और मैं जान गया की स्वाद किसे कहते है
चाय की चुस्की लेते हुए मेरे होंठो पर एक मुस्कान सी आ गयी थी थोड़ी और बातो के बाद मैंने पूजा से विदा ली और गाँव की तरफ चल पड़ा पर मेरे कंधे झुके हुए थे राणाजी ने अपने बेटे को हराने की तयारी कर ली थी मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी की मैं कैसे उगा पाउँगा फसल इस जमीन पर सोचते विचारते मैं कब घर आ गया पता नहीं चला
मैं चौबारे में जाकर बिस्तर पर लेट गया सांझ ढलने को ही थी मैं सोच विचार में मगन था की भाभी आ गयी हरी सलवार और सफ़ेद सूट में क्या गजब लग रही थी ऊपर से फिटिंग जोरदार होंठो पर लाल सुर्ख लिपस्टिक मांग में सिंदूर हाथो में कई सारी चुडिया जैसे आसमान से कोई सुन्दरी ही उतर आई हो
“आज तो क्या गजब लग रही हो भाभी इतनी भी बिजलिया ना गिराया करो ”
“अच्छा जी मुझे तो कही नहीं दिख रहे झुलसे हुए पता है मैं कब से राह देख रही हु तुम्हारी ”
मैं- क्यों भाभी
भाभी- अरे आज, वो पीर साहब की मजार पर दिया जलाने चलना है तू भूल गया क्या
मैं-ओह आज जुम्में की शाम है क्या
भाभी- तुझे इतना भी याद नहीं क्या
जुम्मे की शाम तभी मुझे कुछ याद आया उसने कहा था की वो जुम्मे की शाम पीर साहब की मजार पर जाती है तो मैं एक दम से उछल सा पड़ा “भाभी एक मिनट रुको मैं अभी आता हु ”
मैंने जल्दी से अपने नए वाले कपडे पहने और बालो में कंघी मार कर भाभी के सामने तैयार था
भाभी- हम मजार पे ही जा रहे है न सजे तो ऐसे हो की तुम्हारे लिए बिन्द्नी देखने जा रहे है
मैं- क्या भाभी आप भी आओ देर हो रही है
चूँकि भाभी साथ थी तो मैंने जीप स्टार्ट की और फिर चल दिए पीर साहब की तरफ जो की गाँव की बनी में थी हम जल्दी ही वहा पहुच गए भाभी दिया जलाने को अन्दर चली गयी मैं रुक गया दरअसल मेरी आँखे बस तलाशने लगी उसको जिससे मिलने की बहुत आस थी और जो दूर से देखा जो उसे दिल झूम सा गया सफ़ेद सूट सलवार में सर पर हमेशा की तरह ओढा हुआ वो सलीकेदार दुपट्टा
होंठ उसके हलके हलके कांप रहे थे जैसे की खुद से बाते कर रही हो मैंने सर पर कपडा बाँधा और उसकी तरफ चल पड़ा फेरी लगा रही थी वो और जल्दी ही आमना सामना हुआ उस से जिसकी एक झलक के लिए हम कुर्बान तक हो जाने को मंजूर थे नजरो को झुका कर सबसे नजरे बचा कर उसने इस्तकबाल किया हमारा तो हमने भी हलके से मुस्कुरा कर जवाब दिया
सुना तो बहुत था की बातो के लिए जुबान का होना जरुरी नहीं पर समझ आज आया था की क्यों फेरी लगाते हुए बार बार आमने सामने आये हम फिर वो बढ़ गयी धागा बाँधने को तो मैं उसके पास खड़ा हो गया पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई वो बहुत धीमे से बोली “”परिंदों के दाना खाने पे “ और उस तरफबढ़ गयी
मैं दो पल रुका और फिर चला तो देखा की वो अकेली ही थी उस तरफ बिखरे दानो को समेट रही थी तो मैं भी समेटने लगा
वो- आज आये क्यों नहीं
मैं- जी वो कुछ कम हो गया था
वो- हम राह देख रहे थे आपकी
मैं- वो क्यों भला
वो- बस उसी तरह जैसे आप आते जाते हमारे छज्जे को तकते है
मैं- वो तो बस ऐसे ही
वो- तो हम भी बस ऐसे ही
और हम दोनों मुस्कुरा पड़े , कसम से उसको ऐसे हँसते देखा तो ऐसे लगा की जैसे दुनिया कही है तो यही है
वो- आप ऐसे बार बार हमारी कक्षा में चक्कर ना लगाया करे हमारी सहेलिया मजाक उड़ा रही थी
मैं- पता नहीं मेरा मन बार बार क्यों ले जाता है उस और
वो- मन तो बावरा है उसकी ना सुना करे
मैं- तो आप ही बता दे किसकी सुनु
वो मेरे पास आई और बोली- किसी की भी नहीं
मैं- एक बात कहू
वो- हां,
मैं- क्या आपको भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है
वो- कैसा जनाब
मैं- जो मुझे महसूस होता है
वो- मैं जैसे जानू, आपको क्या महसूस होता है
मैं- वो मुझे वो मुझे पर . बात अधूरी ही रह गयी
“तो यहाँ हो तुम ....................... ”