S
StoryPublisher
Guest
भाभी- आ गये मैं खाना लाती हु
मैं- रहने दो भाभी अड्डे पे चाय समोसा खाकर आया हु
वो- ये बढ़िया है खैर
मैं- वो सब जाने दो पर य बताओ माँ क्या बोल रही थी आपको
और भाभी के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी
भाभी- की बाते हो रही थी बस ऐसे ही रोजमर्रा की
मैं- मैंने सब सुन लिया था भाभी वैसे तो ये आपका निजी मामला है पर मुझे माँ की बातो का बुरा लगा
वो- मुझे कुछ काम याद आ गया मैं बाद में मिलती हु
भाभी बाहर चली गयी पता नहीं क्यों मैंने उनको रोका नहीं तो बस गाने सुनते सुनते कब आँख लग गयी पता नहीं चला फिर मैं जब उठा तो बाहर हल्का हल्का अँधेरा हो रहा था मैंने हाथ मुह धोया और निचे गया तो बैठक में गाँव के कुछ लोग और बैठे थे माहौल कुछ गंभीर सा था मैंने सबको रामरमी की और वापिस अन्दर आ गया मैंने भाभी से पूछा तो पता चला की जयसिंह गढ़ से कारिन्दा संदेसा दे गया था की लाल मंदिर पर अगली अमावस को चुनोती स्वीकार हुई है
चूँकि ये चुनौती बस इन दोनों गाँवो के लोग ही दे सकते थे और देव गढ़ की और से कौन चुनोती दे आया वो भी बिना राणाजी को बताये ये चर्चा जरुर हुई होगी मैं सोच रहा था की राणाजी को बता दू या नहीं वैसे देखा जाए तो बताना बहुत जरुरी था क्योंकि जल्दी ही उनको पता चल ही जाना था मुझे डर भी था की पता नहीं वो क्या करेंगे जब उनको पता चलेगा की उनके अपने बेटे ने ये काम किया है
काफी सोच कर मैंने निर्णय लिया की सुबह होते ही मैं उन्हें अवश्य बता दूंगा वैसे भी अब चुनोती से पीछे कदम तो नहीं उठा सकता मैं , अपने पलंग पर बैठे मैं बस लाल मंदिर की चुनोती के उन किस्सों के बारे में सोचने लगा जो गाँव में मैंने बड़े बुजुर्गो से सुने थे की कैसे कैसे लोग थे वो जिन्होंने ये बीड़ा उठाया था और अगली अमावस को मैं भी उन लोगो में शामिल हो जाने वाला था अगर जीता तो
लोगो की नजर में यहाँ दांव पर जीवन लगता था परन्तु मैंने यहाँ पर कोई दांव नहीं लगाया था सच तो ये था की मुझ फ़क़ीर के पास था ही क्या जो मैं दांव पे लगाता मेरे लिए ये चुनोती थी सम्मान की पूजा के सम्मान की मना कोई लाख दबंग हो पर मजलूमों का भी सम्मान होता है हर इन्सान को इस खुली हवा में साँस लेने की आजादी हो चाहे वो जुम्मन हो या पूजा सब अपने ही तो है फिर किस पर ये दबंगई और किस पर ये जोर
और जोर भी कैसा अपने अहंकार का , खैर बड़ी ख़ामोशी से मैंने अपना खाना खाया भाभी से बात करना चाहता था पर वो व्यस्त थी तो हमने भी बस चादर ओढली ख़ामोशी की और कर दिया खुद को हवाले अपनी अधूरी हसरतो के , वो हसरते जो असल में क्या थी मैं नहीं जानता था जैसे एक अधूरापन सा ,दिल में अचानक से उठ गयी एक टीस जैसे की इस पूरी दुनिया से बगावत कर जाऊ कभी कभी तो लगता था की बस सर ही फोड़ लू पत्थरों से आखिर ये कैसा सूनापन था मुझमे जो मुझे तमाम लोगो से अलग कर देता था
पता नहीं कब घर की चहल पहल ख़ामोशी में तब्दील हो गयी सब लोग सो चुके थे मैंने अपने कमरे की बत्ती बुझाई और एक बार जायजा लिया उसके बाद मैं छत की दूसरी तरफ गया और दिवार चढ़ क चाची की छत पर चढ़ गया वहा से लटक के जैसे तैसे उतरा और फिर निचे चला गया पुरे घर में अँधेरा था बस एक ही कमरे में बत्ती जल रही थी तो मैं उधर ही गया और जाके देखा तो बस
देखता ही रह गया चाची क्या लग रही थी जी किया की अभी अपने आगोश में भर लू पर उसने मुझे बैठने का इशारा किया और बोली- कुंदन तूने एक बात सुनी
मैं- क्या चाची
वो- लाल मंदिर की चुनोती स्वीकार हुई है अब बरसो बाद पता नहीं माता के मन में क्या आई अब न जाने किसकी बलि लेगी मैंने सुना अपने गाँव का कोई गया था चुनोती देने पता नहीं कौन है वो बदनसीब जिसने मौत को गले लगाने की सोची क्योंकि हार-जीत तो एक की मौत के बाद ही होगी मैं तो दुआ कर रही हु की राणाजी इस प्रथा को ही बंद कर दे
मैं- मैं चाची अब चुनौती दी है तो अब तो संग्राम होकर ही रहेगा
वो- तुझे नहीं पता कुंदन तूने कभी देखि नहीं पर मैंने देखा है वो विध्वंस पल पल दिल घबराता है कलेजे का साथ छोड़ देती है धड़कने लोग चीखते है चिल्लाते है कुछ बेहोश हो जाते है दो लोग गिरते है उठते है खून बरसता है और किसी एक को प्राण त्यागने पड़ते है
मैं- मैंने सुना बारह साल से किसी ने लाल मंदिर की चुनोती ना दी अगर दी तो सामने वाले ने स्वीकार ना की
चाची- हा सही सुना तूने मेरे तो हाथ पैर ही ठन्डे हो गए ये खबर सुनकर पता नहीं उस बदनसीब के घर वालो पर क्या बीतेगी जब ये बिजली उन पर टूटेगी
मैं- चाची एक बात कहू
वो- हां
मैं- चाची मैंने दी है ये चुनौती
................................................................................... चाची का मुह खुला का खुला रह गया और कमरे में कुछ पलो के लिए गहरा सन्नाटा छा गया
और फिर “तड़क तड़क ” चाची के दो चार तमाचे खीच कर मेरे चेहरे के भूगोल पर पड़े
मैं- रहने दो भाभी अड्डे पे चाय समोसा खाकर आया हु
वो- ये बढ़िया है खैर
मैं- वो सब जाने दो पर य बताओ माँ क्या बोल रही थी आपको
और भाभी के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी
भाभी- की बाते हो रही थी बस ऐसे ही रोजमर्रा की
मैं- मैंने सब सुन लिया था भाभी वैसे तो ये आपका निजी मामला है पर मुझे माँ की बातो का बुरा लगा
वो- मुझे कुछ काम याद आ गया मैं बाद में मिलती हु
भाभी बाहर चली गयी पता नहीं क्यों मैंने उनको रोका नहीं तो बस गाने सुनते सुनते कब आँख लग गयी पता नहीं चला फिर मैं जब उठा तो बाहर हल्का हल्का अँधेरा हो रहा था मैंने हाथ मुह धोया और निचे गया तो बैठक में गाँव के कुछ लोग और बैठे थे माहौल कुछ गंभीर सा था मैंने सबको रामरमी की और वापिस अन्दर आ गया मैंने भाभी से पूछा तो पता चला की जयसिंह गढ़ से कारिन्दा संदेसा दे गया था की लाल मंदिर पर अगली अमावस को चुनोती स्वीकार हुई है
चूँकि ये चुनौती बस इन दोनों गाँवो के लोग ही दे सकते थे और देव गढ़ की और से कौन चुनोती दे आया वो भी बिना राणाजी को बताये ये चर्चा जरुर हुई होगी मैं सोच रहा था की राणाजी को बता दू या नहीं वैसे देखा जाए तो बताना बहुत जरुरी था क्योंकि जल्दी ही उनको पता चल ही जाना था मुझे डर भी था की पता नहीं वो क्या करेंगे जब उनको पता चलेगा की उनके अपने बेटे ने ये काम किया है
काफी सोच कर मैंने निर्णय लिया की सुबह होते ही मैं उन्हें अवश्य बता दूंगा वैसे भी अब चुनोती से पीछे कदम तो नहीं उठा सकता मैं , अपने पलंग पर बैठे मैं बस लाल मंदिर की चुनोती के उन किस्सों के बारे में सोचने लगा जो गाँव में मैंने बड़े बुजुर्गो से सुने थे की कैसे कैसे लोग थे वो जिन्होंने ये बीड़ा उठाया था और अगली अमावस को मैं भी उन लोगो में शामिल हो जाने वाला था अगर जीता तो
लोगो की नजर में यहाँ दांव पर जीवन लगता था परन्तु मैंने यहाँ पर कोई दांव नहीं लगाया था सच तो ये था की मुझ फ़क़ीर के पास था ही क्या जो मैं दांव पे लगाता मेरे लिए ये चुनोती थी सम्मान की पूजा के सम्मान की मना कोई लाख दबंग हो पर मजलूमों का भी सम्मान होता है हर इन्सान को इस खुली हवा में साँस लेने की आजादी हो चाहे वो जुम्मन हो या पूजा सब अपने ही तो है फिर किस पर ये दबंगई और किस पर ये जोर
और जोर भी कैसा अपने अहंकार का , खैर बड़ी ख़ामोशी से मैंने अपना खाना खाया भाभी से बात करना चाहता था पर वो व्यस्त थी तो हमने भी बस चादर ओढली ख़ामोशी की और कर दिया खुद को हवाले अपनी अधूरी हसरतो के , वो हसरते जो असल में क्या थी मैं नहीं जानता था जैसे एक अधूरापन सा ,दिल में अचानक से उठ गयी एक टीस जैसे की इस पूरी दुनिया से बगावत कर जाऊ कभी कभी तो लगता था की बस सर ही फोड़ लू पत्थरों से आखिर ये कैसा सूनापन था मुझमे जो मुझे तमाम लोगो से अलग कर देता था
पता नहीं कब घर की चहल पहल ख़ामोशी में तब्दील हो गयी सब लोग सो चुके थे मैंने अपने कमरे की बत्ती बुझाई और एक बार जायजा लिया उसके बाद मैं छत की दूसरी तरफ गया और दिवार चढ़ क चाची की छत पर चढ़ गया वहा से लटक के जैसे तैसे उतरा और फिर निचे चला गया पुरे घर में अँधेरा था बस एक ही कमरे में बत्ती जल रही थी तो मैं उधर ही गया और जाके देखा तो बस
देखता ही रह गया चाची क्या लग रही थी जी किया की अभी अपने आगोश में भर लू पर उसने मुझे बैठने का इशारा किया और बोली- कुंदन तूने एक बात सुनी
मैं- क्या चाची
वो- लाल मंदिर की चुनोती स्वीकार हुई है अब बरसो बाद पता नहीं माता के मन में क्या आई अब न जाने किसकी बलि लेगी मैंने सुना अपने गाँव का कोई गया था चुनोती देने पता नहीं कौन है वो बदनसीब जिसने मौत को गले लगाने की सोची क्योंकि हार-जीत तो एक की मौत के बाद ही होगी मैं तो दुआ कर रही हु की राणाजी इस प्रथा को ही बंद कर दे
मैं- मैं चाची अब चुनौती दी है तो अब तो संग्राम होकर ही रहेगा
वो- तुझे नहीं पता कुंदन तूने कभी देखि नहीं पर मैंने देखा है वो विध्वंस पल पल दिल घबराता है कलेजे का साथ छोड़ देती है धड़कने लोग चीखते है चिल्लाते है कुछ बेहोश हो जाते है दो लोग गिरते है उठते है खून बरसता है और किसी एक को प्राण त्यागने पड़ते है
मैं- मैंने सुना बारह साल से किसी ने लाल मंदिर की चुनोती ना दी अगर दी तो सामने वाले ने स्वीकार ना की
चाची- हा सही सुना तूने मेरे तो हाथ पैर ही ठन्डे हो गए ये खबर सुनकर पता नहीं उस बदनसीब के घर वालो पर क्या बीतेगी जब ये बिजली उन पर टूटेगी
मैं- चाची एक बात कहू
वो- हां
मैं- चाची मैंने दी है ये चुनौती
................................................................................... चाची का मुह खुला का खुला रह गया और कमरे में कुछ पलो के लिए गहरा सन्नाटा छा गया
और फिर “तड़क तड़क ” चाची के दो चार तमाचे खीच कर मेरे चेहरे के भूगोल पर पड़े