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Guest
मैं अन्दर आया और आते ही माँ सा के हजारो सवालों का सामना करना पड़ा उसके बाद बड़ी मुस्किल से जान छुड़ा कर अपने कमरे में गया और कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोचने लगा दरअसल मैं पूजा और जयसिंह गढ़ के बारे में सोच रहा था की आखिर पूजा ने मुझसे वो वचन क्यों लिया होगा दरअसल मेरे पास सोचने का कारण था और वो कारण ये था की मुझे पता था की पहले दोनों गाँवो में भाई-चारा हुआ करता था और हमारा परिवार गाँव में रसूखदार था तो जो भी बात रही होगी हमारा परिवार उससे जुड़ा अवश्य होगा
पर सवाल तो यही था की पूजा ने मेरे हाथ बांध दिए थे तो मैं वहा जा नहीं सकता था और पता करना बेहद जरुरी था पर तभी भाभी आ गयी तो मेरे ख्याल अधूरे रह गए
भाभी – तो कहा कटी रात तुम्हारी
मैं- कुवे पर था भाभी
वो- झूठ मत बोलो
मैं- आपसे झूट क्यों बोलूँगा
वो- अब जबकि तुमने ताज़ा ताज़ा दुश्मनी मोल ली है जयसिंह गढ़ वालो से अंगार को हरा के कुंदन वो लोग पीठ पीछे वॉर जरुर करेंगे जानते हो पूरी रात बस आँखों आँखों में काटी है हमने और तुम हो की कोई फरक नहीं पड़ता है ऊपर से तबियत ख़राब पर तुम्हे क्या फरक पड़ता है तुम्हे तो बस अपनी दुनिया में जीना है बाकी इस घर के लोगो की फ़िक्र ना पहले थी न अब है तुम्हे
मैं- भाभी, मौसम ख़राब हो गया था तो वही रुकना पड़ा इतनी सी तो बात है
वो- हद हो गयी झूठ की कल तुम कुवे पर नहीं थे हम और माँ सा कल गए थे वहा पर
पता नहीं क्यों भाभी के आगे मेरा एक झूठ नहीं चलता था अब क्या कहते उनको पर क्या ये सही समय था पूजा के बारे में उनको बताने का जबकि जयसिंह गढ़ के नाम से वो वैसे ही चिंतित थी भाभी की कजरारी आँखे गुस्से से दहक रही थी मैं चुप रहा इसके सिवा मैं कर भी तो क्या सकता था फिर कोशिश होने लगी भाभी को मानाने की इस बात के साथ की आगे से बिना बताये कही नहीं जाऊंगा और उनकी हिदायतों का ध्यान रखूँगा
पर पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा था की जैसे कभी ना उतरने वाला बोझ सा उठा लिया है हमने अब मदद की सख्त जरुरत थी पर ऐसा कौन जिस से मदद मिले एक बार सोचा की लाल मंदिर के पुजारी से बात करू पर वो राणाजी को बता सकता था तो आखिर किया जाये स्तिथि बड़ी विचित्र थी और हम थे अंधकार में वैसे कायदे से तो हमे इस पचड़े में पड़ना नहीं चाइये था पर बस आजकल हम मुसीबतों को नहीं मुसीबते हमे गले लगा रही थी
सर दुखने लगा था वो अलग तो मैं भाभी के पास गया
मैं- भाभी सर दुःख रहा है थोडा दबा देंगी
वो- हम्म्म , जरा ये कपडे अलमारी में रख दू आ बैठ जरा
मैं- नए कपडे लिए है
वो- हां कुछ सिलवाये है तू बता कौन सा जंचेगा हम पर
मैं- आप कुछ भी पहनो सुन्दर लगती हो
वो- अच्छा जी, चलो किसी ने तो हमारी तारीफ की वर्ना कान तरस गए थे
मैं- भैया नहीं करते क्या तारीफ
वो-उनको हमारे लिए फुर्सत कहा
मैं- अब आपके बीच में मैं क्या कह सकता हु
वो- क्यों नहीं कह सकते तुम
मैं- भाभी कुछ कहना है मुझे
वो- हां
मैं- कुछ पैसे मिलेंगे
वो- पैसे, जरुर मिलेंगे पर किसलिए चाहिए
मैं- कुछ सामान खरीदना है
वो- क्या
मैं- वो नहीं बता सकता
वो- तो पैसे नहीं है मेरे पास माँ सा से लो
मैं- भाभी आज तक आपसे ही तो लेते आया हु
वो- तो बताओ
मैं- कुछ नहीं जाने दो
वो- मेरे प्यारे देवर जी नाराज हो गए क्या
मैं- आपसे नाराज होकर कहा जाऊंगा भाभी
वो- तो बताओ ना हमे अच्छा लगता है
मैं- जी वो........ मैं सोच रहा था की कुछ कपडे ले लू
वो- पर कुछ दिन पहले ही तो तुमने नए कपडे सिलवाये है ओह! अच्छा अब समझी तोहफा लेना है तुम्हे
मैं- किसके लिए
वो- उसके लिए
मैं- क्या भाभी
भाभी उठी और अपनी अलमारी खोली और एक के बाद एक तरह तरह की ड्रेस का ढेर लगा दिया और बोली- कुंदन, छांट लो जो तुम्हे पसंद आये हमारी तरफ से तुम्हारी उसके लिए छोटी सी भेंट
मैंने भाभी की तरफ देखा तो वो मुस्कुरा पड़ी
वो- शरमाने की जरुरत नहीं इतना तो हमारा भी हक़ है अब तुम्हारे खास हमारे भी तो कुछ हुए ना
कितना समझती थी वो मुझे बिना कहे ही सब जन लिया था उन्होंने
मैं- आप ही छांट दो
भाभी ने एक के बाद एक कई ड्रेस अलग रख दी और फिर अपनी अलमारी से सोने के कंगन निकाले और बोली- ये उसको हमारी तरफ से देना
मैं- इसकी जरुरत नहीं भाभी
वो- हमारी तरफ से देना वो समझ जाएगी
मैं- क्या समझ जाएगी
वो- हमने कहा न वो समझ जाएगी आओ मैं सर दबा देती हु
मैं निचे बैठ गया और भाभी कुर्सी पर बैठे हुए मेरे सर को दबाने लगी तो कुछ आराम सा मिला मैं सोचने लगा की भाभी को उसके बारे में बता दू या नहीं
भाभी- क्या सोच रहे हो
मैं- कुछ नहीं
वो- बताओ ना
मैं- क्या है मेरे पास सोचने को भाभी बस ख्याल आया की लाल मंदिर की तरफ घूम आऊ
वो- क्या जरुरत है वहा जाने की नहीं जाना उस तरफ
मैं- आप कहती है तो नहीं जाता पर एक सवाल है
वो- क्या
मैं- आपके पिताजी राणाजी के मित्र है ना
वो- हाँ
मैं- तो आपको राणाजी के सभी मित्रो के बारे में पता होगा
वो- राणाजी के बहुत कम मित्र है मैं सबको तो नहीं जानती पर कुछ एक के बारे में पता है
मैं- तो ठाकुर अर्जुन सिंह के बारे में भी पता होगा आपको
भाभी के हाथ रुक गए
वो- उठो
मैं- क्या हुआ
वो- क्या खिचड़ी पक रही है तुम्हारे मन में हम अभी इसी वक़्त जानना चाहेंगे
मैं- क्या हुआ भाभी
वो- सुना नहीं हमने क्या पूछा
मैं- मैं बस ठाकुर अर्जुन सिंह के बारे में पूछना चाहता था
वो- कुंदन मेरी आँखों में देखो क्या दीखता है
मैं- समझा नहीं भाभी
वो- जिस राह पर चलने की सोच रहे हो ना वहा पर कदम कदम पर कांटे बिछे है हम सब की एक हद है और हमारा हुक्म है की इस हद को तुम कभी पार नहीं करोगे आज से हमारी मर्ज़ी से बिना तुम इस घर से बाहर नहीं जाओगे तुम्हारी पढाई- लिखाई सब यही होगी हम तुम्हारे मास्टरों से बात कर लेंगे तुम्हे जो चाहिए सब यही मिल जायेगा पर इस घर से तुम्हारे कदम बाहर नहीं जायेंगे
मैंने पहली बार भाभी की आँखों में एक आग दिखी मैं कुछ कहना चाहता था पर भाभी के तेवर देख कर मैं खामोश हो गया भाभी कमरे से बाहर चली गयी थी पर मैं इतना तो जान गया था की हमारा बहुत कुछ लेना देना है पूजा के परिवार से पर क्या बस ये पता करना था ख्यालो ख्यालो में ना जाने कब साँझ घिर आयी मेरी तन्द्रा जब टूटी जब भाई और चाची लौट आये और तब मुझे ख्याल आया की भाई मेरी बात नहीं टालेगा भाई से पूछना पड़ेगा कुछ जुगत लगाके
पर सवाल तो यही था की पूजा ने मेरे हाथ बांध दिए थे तो मैं वहा जा नहीं सकता था और पता करना बेहद जरुरी था पर तभी भाभी आ गयी तो मेरे ख्याल अधूरे रह गए
भाभी – तो कहा कटी रात तुम्हारी
मैं- कुवे पर था भाभी
वो- झूठ मत बोलो
मैं- आपसे झूट क्यों बोलूँगा
वो- अब जबकि तुमने ताज़ा ताज़ा दुश्मनी मोल ली है जयसिंह गढ़ वालो से अंगार को हरा के कुंदन वो लोग पीठ पीछे वॉर जरुर करेंगे जानते हो पूरी रात बस आँखों आँखों में काटी है हमने और तुम हो की कोई फरक नहीं पड़ता है ऊपर से तबियत ख़राब पर तुम्हे क्या फरक पड़ता है तुम्हे तो बस अपनी दुनिया में जीना है बाकी इस घर के लोगो की फ़िक्र ना पहले थी न अब है तुम्हे
मैं- भाभी, मौसम ख़राब हो गया था तो वही रुकना पड़ा इतनी सी तो बात है
वो- हद हो गयी झूठ की कल तुम कुवे पर नहीं थे हम और माँ सा कल गए थे वहा पर
पता नहीं क्यों भाभी के आगे मेरा एक झूठ नहीं चलता था अब क्या कहते उनको पर क्या ये सही समय था पूजा के बारे में उनको बताने का जबकि जयसिंह गढ़ के नाम से वो वैसे ही चिंतित थी भाभी की कजरारी आँखे गुस्से से दहक रही थी मैं चुप रहा इसके सिवा मैं कर भी तो क्या सकता था फिर कोशिश होने लगी भाभी को मानाने की इस बात के साथ की आगे से बिना बताये कही नहीं जाऊंगा और उनकी हिदायतों का ध्यान रखूँगा
पर पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा था की जैसे कभी ना उतरने वाला बोझ सा उठा लिया है हमने अब मदद की सख्त जरुरत थी पर ऐसा कौन जिस से मदद मिले एक बार सोचा की लाल मंदिर के पुजारी से बात करू पर वो राणाजी को बता सकता था तो आखिर किया जाये स्तिथि बड़ी विचित्र थी और हम थे अंधकार में वैसे कायदे से तो हमे इस पचड़े में पड़ना नहीं चाइये था पर बस आजकल हम मुसीबतों को नहीं मुसीबते हमे गले लगा रही थी
सर दुखने लगा था वो अलग तो मैं भाभी के पास गया
मैं- भाभी सर दुःख रहा है थोडा दबा देंगी
वो- हम्म्म , जरा ये कपडे अलमारी में रख दू आ बैठ जरा
मैं- नए कपडे लिए है
वो- हां कुछ सिलवाये है तू बता कौन सा जंचेगा हम पर
मैं- आप कुछ भी पहनो सुन्दर लगती हो
वो- अच्छा जी, चलो किसी ने तो हमारी तारीफ की वर्ना कान तरस गए थे
मैं- भैया नहीं करते क्या तारीफ
वो-उनको हमारे लिए फुर्सत कहा
मैं- अब आपके बीच में मैं क्या कह सकता हु
वो- क्यों नहीं कह सकते तुम
मैं- भाभी कुछ कहना है मुझे
वो- हां
मैं- कुछ पैसे मिलेंगे
वो- पैसे, जरुर मिलेंगे पर किसलिए चाहिए
मैं- कुछ सामान खरीदना है
वो- क्या
मैं- वो नहीं बता सकता
वो- तो पैसे नहीं है मेरे पास माँ सा से लो
मैं- भाभी आज तक आपसे ही तो लेते आया हु
वो- तो बताओ
मैं- कुछ नहीं जाने दो
वो- मेरे प्यारे देवर जी नाराज हो गए क्या
मैं- आपसे नाराज होकर कहा जाऊंगा भाभी
वो- तो बताओ ना हमे अच्छा लगता है
मैं- जी वो........ मैं सोच रहा था की कुछ कपडे ले लू
वो- पर कुछ दिन पहले ही तो तुमने नए कपडे सिलवाये है ओह! अच्छा अब समझी तोहफा लेना है तुम्हे
मैं- किसके लिए
वो- उसके लिए
मैं- क्या भाभी
भाभी उठी और अपनी अलमारी खोली और एक के बाद एक तरह तरह की ड्रेस का ढेर लगा दिया और बोली- कुंदन, छांट लो जो तुम्हे पसंद आये हमारी तरफ से तुम्हारी उसके लिए छोटी सी भेंट
मैंने भाभी की तरफ देखा तो वो मुस्कुरा पड़ी
वो- शरमाने की जरुरत नहीं इतना तो हमारा भी हक़ है अब तुम्हारे खास हमारे भी तो कुछ हुए ना
कितना समझती थी वो मुझे बिना कहे ही सब जन लिया था उन्होंने
मैं- आप ही छांट दो
भाभी ने एक के बाद एक कई ड्रेस अलग रख दी और फिर अपनी अलमारी से सोने के कंगन निकाले और बोली- ये उसको हमारी तरफ से देना
मैं- इसकी जरुरत नहीं भाभी
वो- हमारी तरफ से देना वो समझ जाएगी
मैं- क्या समझ जाएगी
वो- हमने कहा न वो समझ जाएगी आओ मैं सर दबा देती हु
मैं निचे बैठ गया और भाभी कुर्सी पर बैठे हुए मेरे सर को दबाने लगी तो कुछ आराम सा मिला मैं सोचने लगा की भाभी को उसके बारे में बता दू या नहीं
भाभी- क्या सोच रहे हो
मैं- कुछ नहीं
वो- बताओ ना
मैं- क्या है मेरे पास सोचने को भाभी बस ख्याल आया की लाल मंदिर की तरफ घूम आऊ
वो- क्या जरुरत है वहा जाने की नहीं जाना उस तरफ
मैं- आप कहती है तो नहीं जाता पर एक सवाल है
वो- क्या
मैं- आपके पिताजी राणाजी के मित्र है ना
वो- हाँ
मैं- तो आपको राणाजी के सभी मित्रो के बारे में पता होगा
वो- राणाजी के बहुत कम मित्र है मैं सबको तो नहीं जानती पर कुछ एक के बारे में पता है
मैं- तो ठाकुर अर्जुन सिंह के बारे में भी पता होगा आपको
भाभी के हाथ रुक गए
वो- उठो
मैं- क्या हुआ
वो- क्या खिचड़ी पक रही है तुम्हारे मन में हम अभी इसी वक़्त जानना चाहेंगे
मैं- क्या हुआ भाभी
वो- सुना नहीं हमने क्या पूछा
मैं- मैं बस ठाकुर अर्जुन सिंह के बारे में पूछना चाहता था
वो- कुंदन मेरी आँखों में देखो क्या दीखता है
मैं- समझा नहीं भाभी
वो- जिस राह पर चलने की सोच रहे हो ना वहा पर कदम कदम पर कांटे बिछे है हम सब की एक हद है और हमारा हुक्म है की इस हद को तुम कभी पार नहीं करोगे आज से हमारी मर्ज़ी से बिना तुम इस घर से बाहर नहीं जाओगे तुम्हारी पढाई- लिखाई सब यही होगी हम तुम्हारे मास्टरों से बात कर लेंगे तुम्हे जो चाहिए सब यही मिल जायेगा पर इस घर से तुम्हारे कदम बाहर नहीं जायेंगे
मैंने पहली बार भाभी की आँखों में एक आग दिखी मैं कुछ कहना चाहता था पर भाभी के तेवर देख कर मैं खामोश हो गया भाभी कमरे से बाहर चली गयी थी पर मैं इतना तो जान गया था की हमारा बहुत कुछ लेना देना है पूजा के परिवार से पर क्या बस ये पता करना था ख्यालो ख्यालो में ना जाने कब साँझ घिर आयी मेरी तन्द्रा जब टूटी जब भाई और चाची लौट आये और तब मुझे ख्याल आया की भाई मेरी बात नहीं टालेगा भाई से पूछना पड़ेगा कुछ जुगत लगाके