सिम्मी ने फ्राइंग पैन को सिन्क मे खाली करते हुए एक ठंडी साँस ली. आज फिर उसने एक गंदा अंडा तोड़ दिया था.......साथ साथ उस से पहले के तोड़े हुए अंडे भी खराब हो गये थे. बे-ख़याली उसके लिए नयी बात नहीं थी. वो बचपन ही से खोई खोई रहती थी..........और इस प्रकार के नुकसान उसके लिए नये नहीं थे. आए दिन होते ही रहते थे.
इस समय फ्राइंग पैन खाली करते हुए उसका ठंडी साँस लेना इसलिए नहीं था की नुकसान के कारण उसे तकलीफ़ हुई थी. बल्कि उस ठंडी साँस का कारण नौकरों के वो मैले कुचैले बच्चे थे जो एक दूसरे पर धूल उड़ा कर चीखते हुए इधर उधर दौड़ते फिर रहे थे.
सिम्मी जवान थी. लेकिन उसे इस तरह का बचपन गुज़ारने की लालसा ही रह गयी थी. उसके पापा ने उसे कभी 'जानवर' नहीं बनने दिया था. उनका कहना था की आदमी को किसी भी स्टेज मे 'आदमीयत' की सीमा से नहीं निकलना चाहिए. आदमी का बच्चा भी अगर चीखं-धाड़ मचाए तो फिर उसमे और एक कुत्ते के पिल्ले मे अंतर ही क्या रह गया.
मगर जब सिम्मी कुत्ते के पिल्ले वाले स्टेज मे थी तो उसे इसका सलीका भी नहीं था की आदमी और कुत्ते मे क्या अंतर होता है. उसे ज़बरदस्ती 'आदमी' बनाया गया था. इसलिए आज वो कुत्ते के पिल्लों को शोर मचाते, दौड़ते और धूल उड़ाते देख कर ठंडी आहें भर रही थी.
उसने फ्राइंग पैन धोकर दोबारा चूल्*हे पर रख दिया......और अपने पापा के बारे मे सोचने लगी. सोचने केलिए पापा के अलावा और था भी कौन. मम्मी तो उसी समय मर गयी थी जब वो अपने मुंह से मम्मी शब्द भी बोलने लायक नहीं थी. पापा ही ने उसकी परवरिश की थी.......और वो उसे बेहद चाहते थे.
मगर ना जाने क्यों उन्होने उसकी शिक्षा दीक्षा घर पर ही की थी. किसी स्कूल या कॉलेज मे पढ़ने केलिए कभी नहीं भेजा था. इसका कारण उन्होने आज तक नहीं बताया था. वो कोई साधारण आदमी भी नहीं थे.......की नैरो माइंड या नासमझ समझा जा सकता. वो देश के सब से बड़े साइंटिस्ट डा. दावर थे. वो डा. दावर जो देश की सब से बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला के मालिक और अटॉमिक रिसर्च के हेड थे.
सरकार से उन्हें अनुदान मिलती थी......और ये अनुदान वास्तव मे समुद्र से अटॉमिक एनर्जी प्राप्त करने की संभावना पर रिसर्च करने केलिए मिलती थी. डा. दावर इस संबंध मे नित नये नये परीक्षण करते रहते थे. उनका प्रयोगशाला समुद्र तट पर ही अवस्थित था......और इस से जुड़े हुए बिल्डिंग्स का फैलाओ ४ किलोमीटर के क्षेत्र मे था.
यहीं उनका आवास(रेसिडेन्स) भी था......जहाँ वो सिम्मी और कुछ नौकरों के साथ रहते थे. सादा जीवन बिताने के आदि थे.इसलिए रहन सहन मे चमक दमक और दिखावा नहीं था. अक्सर सिम्मी को भी ये निर्देश देते की वो अपने काम खुद अपने ही हाथों से करने की कोशिश किया करे.
हालाकि सिम्मी ने स्कूल या कॉलेज क मुह नहीं देखी थी लेकिन वो पर्दे मे नहीं रहती थी. डा. दावर उसे अलग थलक रखने की नीति भी नहीं अपनाए थे.
लॅबोरेटरी से संबंध रखने वाले दर्ज़नों व्यक्तियों से सिम्मी का मिलना जुलना रहता था. डा दावर ने कभी इस पर आपत्ति प्रकट नहीं किया था.
अक्सर वो अकेली साहिल पर टहलती हुई दूर निकल जाती और काफ़ी देर से घर वापस आती. लेकिन ये बात भी डा दावर केलिए चिंता की बात नहीं थी. वो तो वास्तव मे उसे 'जानवर' बनते देखना नहीं चाहते थे. अगर वो कभी ज़ोर ज़ोर से हँसना शुरू कर देती तो ये उन्हें बुरा लगता था. अगर वो कभी उँची आवाज़ मे बातें करती तो उन्हें अपने संस्कार के महल ढहते हुए दिखाई देते.
मगर वो दिल खोल कर ठहाके लगाना चाहती थी. बच्चों की तरह छलांगे मार कर दौड़ना चाहती थी. चीख चीख कर बातें करना चाहती थी.....वो चाहती थी की उस पर किसी प्रकार की पाबंदी ना रहे.
पश्चिम क्षितिज मे सूरज ढल रहा था. वो अपने पापा के बारे मे सोचती रही. मगर उसे उन पर कभी गुस्सा नहीं आता था. वो उनके उपदेश ठंडे दिल से सुनती थी और उनका पालन करने की चेष्टा करती थी. लेकिन ठंडी आहों पर तो उसका नियंत्रण नहीं था. वो तो निकल ही जाती थीं. उसके सपने भी बड़े विचित्र होते थे. अक्सर वो देखती की वो हवा मे उड़ती फिर रही है. बिल्कुल पक्षियों की तरह. कभी देखती की उसके सामने सैकड़ों मील तक हरे भरे जंगल फैले हुए हैं.......और वो हिरणियों की तरह छलांगें लगाती फिर रही है. कभी उसे नन्हे नन्हे मैले कुचैले बच्चों की फौज दिखाई देती और और वो उनके बीच खड़ी चीख रही है.......हलक फाड़ फाड़ कर गा रही है......और उसका अस्तित्व स्वयं लंबा ठहाका सा बनता हुआ दिखाई देता. कभी कभी वो जागते हुए भी ऐसे ही सपने देखती.
वो फ्राइंग पैन एक तरफ रख कर बे-ख़याली मे फिर खिड़की के समीप आ गयी. ये इमारत समुद्रा तट के निकट एक उँचे टीकरे(टीले) पर बनी हुई थी. टीले के नीचे नरकूलों की झाड़ियाँ थीं......जिनका सिलसिला साहिल तक चला गया था.
उसे समुद्र की सतह पर अस्त होते सूरज की लाली बहुत भली लगती थी. वो अक्सर उन्हें देर तक देखती रहती थी. और उसे ऐसा महसूस होता जैसे वो उस मचलती हुई चमकदार पगडंडी पर छलांगे लगाती सूरज की तरफ दौड़ रही हो.
कुछ देर बाद चौंक कर वो फिर अपने काम की तरफ आकृष्ट हुई. उस ने कुछ अंडे फ्राइंग पैन मे डाले और उनके सॅंडविच बनाने लगी.
आज डा. दावर बहुत अधिक व्यस्त थे. इसलिए उन्होने डिन्नर लबोरेटॉरी मे ही मँगवाया था. प्रायः ऐसा भी होता था की उनकी रातें लैब मे ही गुज़रती. सिम्मी ने जल्दी जल्दी टिफिन बॉक्स तैयार करके नौकर को दिया और ड्रेस चेंज कर के बाहर निकल आई.
वो केवल मछुवारों के घाट तक जाना चाहती थी. क्योंकि उसने सुना था की आज वहाँ मछुवारे कोई जश्न मनाने वाले हैं. इस से पहले भी वो अक्सर उनके जश्न से आनंद उठा चुकी थी. औरत मर्द सब साथ मिल कर नाचते थे. उन मे अक्सर तरह तरह के रूप और भेष बदल कर स्वांग भी रचते और सिम्मी हंसते हंसते बेहाल हो जाती. फिर उसे अपनी मूर्खता पर खेद होता. वो सोचती की वो भी कितना घटिया शौक रखती है. स्वांग भरने वालों के लीचर और भद्दे शब्द सुन कर हँसना कम से कम उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है. मगर वो करती भी क्या. वो तो ऐसे अवसरों पर इस बुरी तरह बेसूध हो जाती की खुद को भी इसी लेवेल की एक व्यक्ति मानने लगती. अर्थात वो शारीरिक रूप से पूरी तरह उनका साथ नहीं दे सकती थी लेकिन उसकी आत्मा उनके साथ नृत्य करती थी. चीखती थी......गाती थी. और जब वो दिल खोल कर हंसते थे तब उनका साथ ज़रूर देती थी.
वो जानती थी की काफ़ी रात गये वापसी होगी. इसलिए वो अपनी टॉर्च साथ लाना नहीं भूली थी. घाट पर पहुच कर उसे पता चला की जश्न की खबर ग़लत थी. उसे बड़ी निराशा हुई......और एक अनाम सी चुभन उसके दिलो दिमाग़ मे कचोके लगाने लगी.
फिर अंधेरा फैल गया.......और पानी की सतह पर नावों की रौशनियों की छाया देखती रही. वैसे उसकी कल्पना मे मछुवारों का जश्न ज़ोर शोर से हो रहा था. वो उन्हें एक बहुत बड़े आलाव के निकट नाचते देख रही थी. वो गा रहे थे. हंस रहे थे. स्वांग भर रहे थे.......और सिम्मी खोई हुई थी.
तभी एक मोटर लांच उसके समीप आ कर रुकी और वो चौंक पड़ी. उस लॉंच पर शायद नेवी का गश्ती दस्ता था. उसने सोचा अब वापस चलना चाहिए. उसे अंधेरे से डर नहीं लगता था. वो एक निडर लड़की थी. हलाकि बचपन से ही उसे 'आदमी' बनने के संबंध मे जो ट्रैनिंग दी गयी थी उसके कारण उसे सचेत और डरपोक हो जाना चाहिए था. लेकिन ना जाने क्यों ऐसा नहीं हुआ.
वो अपने बंगला की तरफ चल पड़ी. उसे उस जगह से निश्चित रूप से गुज़रना पड़ता जहाँ से नरकुल की झाड़ियों का क्रम शुरू हुआ था. लेकिन वो अब तक हज़ारों बार अंधेरे मे उस तरफ से गुज़र चुकी थी. वैसे कई मर्दों की हिम्मत नहीं पड़ती थी की वो अधिक रात गये उधर से गुज़रें.
सिम्मी अपने विचारों मे खोई हुई रास्ता तय कर रही थी. रास्ता उसका सैकड़ों बार का देखा हुआ था......इसलिए उसने अब तक टॉर्च जलाने की ज़रूरत महसूस नहीं की थी.
नरकुल की झाड़ियों के समीप पहुंच कर अचानक वो रुक गयी. उस ने किसी प्रकार की असाधारण सी आवाज़ सुनी थी......जो नरकूलों मे पैदा होने वाली सरसराहट से बहुत भिन्न थी.
आवाज़ फिर आई. और उसकी आँखें हैरत से फैल गयीं. करीब ही कहीं कोई दबी दबी आवाज़ मे रो रहा था. आवाज़ निश्चित किसी लड़की की थी. सिम्मी ने टॉर्च जला ली. रोने वाली सामने ही थी. सिम्मी झपट कर उसके निकट पहुची.
वो घुटनों मे सर दिए बैठी थी......और उसके सुनहरे बाल नीचे ढलक आए थे. सिम्मी उसे हैरत से देखती रही. उसके शरीर पर नीले रंग का लिबास था.....और उसपर गोलडेन कशीदाकारी थी. दोनों हाथ कंधों तक खुले थे. सिम्मी की हैरत का सब से बड़ा कारण उसके हाथ ही थे. क्योंकि उनका रंग भी सुनहरा था. वो सिम्मी की उपस्थिति से बेख़बर उसी तरह घुटनों मे सर दिए सिसकियाँ लेती रही.
"ए.......तुम क्यों रो रही हो......इधर...मेरी तरफ देखो...." सिम्मी ने बचकाना ढंग से कहा. वो अचानक चौंक पड़ी. उसने सर उठा कर सिम्मी की तरफ देखा. लेकिन टॉर्च की रौशनी मे उसकी आँखें चौन्धिया गयीं. और दूसरी तरफ सिम्मी के हाथ से टॉर्च भी गिर गयी क्योंकि वो तो सोने की औरत थी.......और उसके होन्ट बिकुल सुर्ख थे. उसकी आँखें हीरे जवाहरात की तरह जगमगा रही थीं.
सिम्मी दंग रह गयी. लेकिन सिसकियाँ वो अब भी सुन रही थी. उसने कुछ ही पलों मे बहुत कुछ सोच डाला. वो चुडैलों और भूतों को नहीं मानती थी.......लेकिन इस समय उसे भूतों और चुडैलों की वो सारी कहानियाँ याद आने लगी थिं जो उसने बचपन मे सुनी थी.
लेकिन जब वो केवल सिसकियाँ ही सुनती रही और उस अवधि मे उसे कोई हानि नहीं पहुची तो उसने दिल कड़ा कर के फिर टॉर्च उठाई और उसे जलाया. सुनहरी लड़की ने फिर अपना सर घुटनों पर रख लिया और लगातार रोए जेया रही थी.
सिम्मी उसके निकट बैठ गयी.
"तुम कौन हो........मुझे बताओ. क्यों रो रही हो?" उसने कपकापाती हुई आवाज़ मे पूछा.
लड़की ने फिर सर उठाया. लेकिन उसने जो कुछ भी कहा सिम्मी की समझ मे नहीं आ सका. वैसे उसकी आवाज़ क्या थी.......घंटियाँ सी बज उठी थिं. सिम्मी के कान उसकी आवाज़ की मिठास मे खो गये.
तभी लड़की ने अपना लबादा(लंबा सा ड्रेस) उपर सरका कर उसे अपनी दाहिनी पिंडली दिखाई जिस से खून बह रहा था. वो लड़की तो सर से पैर तक गोल्डेन थी लेकिन खून लाल ही था जैसा सब का होता है.
"ठहरो......ठहरो......शायद तुम ज़ख़्मी हो..." सिम्मी ने कहा और घुटनों के बाल बैठ कर दुपट्टे के आँचल से ज़ख़्म सॉफ करती हुई बोली....."तुम मेरे घर चलो मैं इसकी ड्रेसिंग कर दूँगी."
लेकिन लड़की कुछ ना बोली.
"चलो...." सिम्मी ने फिर कहा.
"लड़की ने भी कुछ कहा लेकिन सिम्मी समझ ना सकी. पता नहीं वो कौन सी भाषा बोल रही थी. सिम्मी ने सोचा......अँग्रेज़ी, फ्रेंच और जर्मन भाषा मे भी ट्राई की जाए. ये तीनो भाषाएँ सिम्मी अच्छी तरह बोल और समझ सकती थी. हालाकी उसकी शिक्षा घर पर ही हुई थी लेकिन ठोस हुई थी.
उसने तीनों भाषाओं मे बारी बारी से अपनी बात समझाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रही. क्योंकि ये तीनों भाषा भी शायद उसके लिए नयी ही थी.
अंत मे तक हार कर सिम्मी ने इशारों का सहारा लेना चाहा और उस से कहा की उसके साथ घर चले.......जहाँ वो उसके ज़ख़्मों की ड्रेसिंग कर देगी.
सुनहरी लड़की की आँखों से डर झाँकने लगा. उसने इनकार मे सर हिला दिया. अंत मे सिम्मी ने अपना दुपट्टा फाड़ कर वहीं ज़ख़्म की ड्रेसिंग शुरू कर दी. जब वो ड्रेसिंग शुरू कर दी तो लड़की ने उसके हाथों को चूमा और उसे अपने सर पर रख लिया. फिर झाड़ियों की तरफ कुछ ऐसे इशारे किए जैसे कह रही हो की टॉर्च लेकर उधर चलो.
सिम्मी का डर भाग चुका था.......और वो उस लड़की केलिए अपने दिल की गहराइयों मे प्यार महसूस करने लगी थी. इसलिए वो टॉर्च जला कर उसके साथ चलने लगी. लड़की लंगड़ाती हुई चल रही थी. सिम्मी ने सहारे केलिए अपना बाज़ू पेश किया जो स्वीकार कर लिया गया.
लड़की उसे एक ऐसी जगह लाई जहाँ झाड़ियों के बीच थोड़ी सी सॉफ जगह थी. यहाँ सिम्मी को एक बहुत बड़ा गोला दिखाई दिया......जो किसी मेटल का बना हुआ था. उसका रेडियस ९-१० फीट से किसी तरह कम नहीं रहा होगा. उसमे चारों तरफ खिड़कियाँ सी दिखाई दे रही तीन. लड़की ने उसे इशारे से बताया की वो उसी तरह टॉर्च जला कर खड़ी रहे. सिम्मी हैरत से उस गोले को देख रही थी. सुनहरी लड़की ने गोले पर एक जगह हाथ रखा और अचानक एक हल्की सी आवाज़ के साथ उस का उपरी भाग खुल गया. फिर लड़की ने सिम्मी के हाथ से टॉर्च लेकर पैदा होने वाली स्पेस मे रौशनी डाली. उसके भीतर निश्चित कोई मेकॅनिज्म थी लड़की के इशारे पर उसने टॉर्च अपने हाथ मे ले लिया.......और उसे रौशनी दिखती रही.......और वो उसी गैप मे दोनों हाथ डाले हुए मशीन के पुरज़ों को शायद ठीक करती रही. कुछ ही देर मे वो मशीन हल्की आवाज़ के साथ चल पड़ी.
ये आवाज़ इतनी हल्की थी की जितनी किसी बिजली के पंखे की हो सकती है.
इसके बाद उसने सिम्मी को अपने गले से लगा कर उके माथे पर चुंबन दिया और फिर उसी गोले के भीतर जा बैठी. सिम्मी की टॉर्च अब भी जल रही थी.
सुनहरी लड़की अब काग़ज़ के एक टुकड़े पर सोने की एक पतली सी छड से कुच्छ लिख रही थी. लेकिन वो कैसा सोना था जिसका सुनहरा रंग काग़ज़ पर भी उतर सकता था. सिम्मी को सुनहरी लिखावट दिखाई दी. लेकिन दूरी अधिक होने के कारण वो उसे पढ़ ना सकी. सुनहरी लड़की ने काग़ज़ उसके हाथ मे थमा दिया और दूर हट जाने का इशारा करते हुए गोले की वो खिड़की बंद कर ली जिस से वो घुसी थी.
सिम्मी बड़ी तेज़ी से पीछे हटी........और टॉर्च की रौशनी गोले के साथ ही उपर उठती चली गयी. जब गोले ने ज़मीन छोड़ी थी तब हवा का इतना ज़बरदस्त झोंका सिम्मी के शरीर से टकराया था की उसे अपने कदम जमाना कठिन हो गया था.
वो हैरत से मुंह फाडे उन आडी तिरछी सुनहरी लकीरों को देखती रही. फिर अगर पानी मे कुछ गिरने की आवाज़ से ना चौंकती तो ना जाने कब तक उसकी ये बेसुधी बनी ही रहती.
अब वो बहुत तेज़ी से घर की तरफ जा रही थी. घर पहुंच कर वो सीधी अपने बेडरूम मे चली गयी. और फिर लगभग आधे घंटे तक उसकी चेतना सामान्य नहीं हुई. वो अपने बेड पर पड़ी हाँफ रही थी. साँस इतनी तेज़ी से चल रही थी जैसे मीलो का सफ़र लगातार दौड़ती हुई तय की हो.
धीरे धीरे उड़की हालत सामान्य होती गयी. कुछ देर बाद उसने फिर उस काग़ज़ के टुकड़े पर निगाह दौड़ाई. लेकिन अब वो बिल्कुल साफ था. सुनहरी लकीरें गायब थीं. उसने टेबल लैम्प ऑफ कर दिया......इस आशा में की शायद फॉस्फोरस की तरह अंधेरे ही मे वो साफ दिखाई दें. लेकिन इस बार अंधेरा भी उन्हें नहीं चमका सका. काग़ज़ एकदम साफ था.
इमरान ने बेड पर पड़े ही पड़े एक लंबी अंगड़ाई ली और फिर भर्रायी हुई आवाज़ मे चीखा...."अबे ओ सुलेमान के बच्चे.....अख़बार....?"
सुलेमान किचेन मे था.....इसलिए ज़रूरी नहीं था की पहली ही आवाज़ मे दौड़ा चला आता. दूसरी या तीसरी आवाज़ पर उसके कान पर जूं रेंगी......और वो हाथ झुलाता हुआ कमरे मे प्रवेश किया.
"हांएँ......अबे मैने अख़बार माँगा था....." इमरान आँखें निकाल कर दहाड़ा.
"जी हां.....मेरे विचार से आप ने अख़बार ही माँगा था." उसने बड़े आराम से उत्तर दिया.
"फिर कहाँ है अख़बार..."
"स्टोर मे तेल नहीं था.....कोएला जलाने पड़े.....और कोयला खुद से तो सुलगता नहीं...."
"क्या मतलब...?"
"अख़बार जला कर कोयला सुलगाया......और अब चाय तैयार है."
"अबे.....आज का भी जला दिया?"
"आज और कल से क्या अंतर पड़ता है साहब? अख़बार तो अख़बार है....."
"होश मा है या नहीं?"
"इस समय तो मैं होश मे हूँ.....लेकिन पिछली रात मैने मार्टिनी पी थी......और आप का नीला सूट पहन कर गया था."
"अबे ओ उल्लू के भतीजे.......मैं तेरी गर्दन तोड़ दूँगा. तुझे इतने पैसे कहाँ से मिले थे की तू मार्टिनी पिया था?"
"उपर वाला देता है साहब......आप की जेब से एक हज़ार के नोट मिले थे....."
"अर्रे सत्यानाश हो.....मैं तुझे डिसमिस कर दूँगा."
"सोचा था की निकाल लूँ और मार्टिनी पियूं लेकिन आप के नीले सूट पर आयरन नहीं था......इसलिए केवल सपने देख कर रह गया."
"बहुत अच्छा किया तू ने." इमरान एका-एक खुश होकर कहा. "वरना तुम्हारे कंठ मे खराश पड जाती. पीना ही है तो शैम्पीयन पिया कर...." फिर कुछ याद आने पर चीखा..."अर्रे अख़बार...."
"मेरी समझ से वो सुरक्षित है." सुलेमान ने कुछ सोचते हुए कहा.
"अबे आज कल तू शरीफ आदमियों की तरह बातें क्यों करने लगा है?"
"मजबूरी है साहब......आज कल शराफ़त ही का ज़माना है."
"अख़बार..."
सुलेमान चला गया......और इमरान ने आँखें बंद कर के एक जमहाई ली और फिर मुंह चलाने लगा.
अख़बार आ गया. उसने लेटे ही लेटे पहले पेज पर निगाह डाली......और फिर इस तरह बौखला कर उठ बैठा जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो.
वो हेडिन्ग ही बौखला देने वाली थी.
"इंटेलिजेन्स ब्यूरो के डायरेक्टर जेनेरल पर जानलेवा हमला...."
इंटेलिजेन्स ब्यूरो के डायरेक्टर जेनेरल खुद इमरान के डैडी थे. इमरान ने बड़ी तेज़ी से खबर पढ़ डाली.....
१४ सितम्बर. रात के पिछले हिस्से मे कुछ अग्यात व्यक्ति मि. रहमान साहब की कोठी मे घुसे. उन्होने सब से पहले दोनो पहरेदारों को बेबस कर दिया. कोठी के कम्पाउन्ड मे दो रखवाली के कुत्ते थे. पता नहीं उन्हें किस प्रकार ख़तम कर दिया गया.....की आस पास वालों या कोठी के निवासियों ने उसका शोर नहीं सुना. रहमान साहब अपने बेडरूम मे सो रहे थे. अचानक उनकी आँखें खुल गयीं. उन्हें चार नकाब पोश दिखाई दिए........उन मे से एक रहमान साहब की तरफ रिवॉल्वर ताने खड़ा था.....और उसके साथी कमरे की चीज़ें उलट पलट कर रहे थे. रहमान साहब से कहा गया की खामोशी से पड़े रहें.....वरना उनकी हत्या कर दी जाएगी. रहमान साहब कुछ देर तो खामोशी से सिचुयेशन को समझते रहे. फिर अचानक उन्होने खुद को बेड से नीचे गिरा दिया. उनकी निगरानी करने वाला शायद गाफिल हो गया था......या उनके इस तरह गिरने के कारण कुछ गाफिल हुआ......रहमान साहब ने लेटे लेटे ही उस पर छलाँग लगाई और उसे गिरा दिया और पलक झपकते उसका रिवॉल्वर छीन लिया. और फिर उस कमरे मे फायरों की आवाज़ें गूंजने लगीं.
आग्यत व्यक्तियों को भागना पडा......क्यों्कि कोठी के अन्य लोग भी जाग चुके थे.
यहाँ कोठी मे इमरान के आने की खबर फैल चुकी थी. वो पूरे एक साल बाद कोठी मे कदम रखने वाला था. वैसे तो अक्सर वो मेन गेट ही पर रुक कर चौकीदार से सब की हाल चाल मालूम कर लिया करता था. क्योंकि रहमान साहब के आदेश के अनुसार वो कम्पाउंड मे भी कदम नहीं रख सकता था.
लेकिन आज जबकि रहमान साहब की तरफ से अनुमति मिल चुकी थी और इमरान आ रहा था. उसकी कज़िन सिस्टर्स बाहरी फाटक पर ही उसकी प्रतीक्षा कर रही थीं. उन मे उसकी सग़ी बहन लड़ाकी सुरैया भी थी.....और उसने कुछ देर पहले ही अपने तेवर मे तीखापन पैदा करना शुरू कर दिया था. उसकी कज़िन सिस्टर्स उसे समझा रही थीं कि वो आज कोई झगड़े वाली बात ना करे.
वैसे इस समय स्वाभाविक ढंग से कोठी का वातावरण शांत ही होनी चाहिए थी.....क्योंकि पिछली रात ही रहमान साहब पर जानलेवा हमला हुआ था......और वो बाल बाल बचे थे.
लेकिन वो ठहरे इमरान के बाप. अर्थात इमरान उन्हीं का बेटा था जिसकी निगाह मे ज़िंदगी और मौत की कोई वैल्यू ही नहीं थी. उनका कठोरतम आदेश था की कोठी के वातावरण पर मातमी दशा ना दिखाई देने पाए. अगर किसी के भी चेहरे पर चिंता के भाव देखे गये तो उसकी अच्छी तरह खबर ली जाएगी.
यही कारण है की वो सब अगर खुशी और उल्लास से उछल कूद नहीं रहे थे तब भी ये प्रकट करने का प्रयास कर रहे थे की उन्होने रहमान साहब के आदेश को दिल से स्वीकार किया है.
जैसे ही इमरान की कार गेट पर पहुं्चि उसकी बहनें सामने आ गयीं......और इमरान के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं......क्योंकि उनमे से कोई भी चिंंतित या शोकाकुल नहीं दिखाई दे रही थीं.
सुरैया के चेहरे पर वही पुराना तीखापन दिखाई दे रहा था.
कज़िन सिस्टर्स ने उसे उपर से नीचे तक टटोलना शुरू कर दिया......जैसे देख रही हों की टूट फूट कर तो घर वापस नहीं आया.
"ऐ.....नहीं लाए अपनी दोगली जोरू को?" सुरैया ने चटकते हुए अंदाज़ मे पुछा.
"जोगली दोरू......" इमरान ने मूर्खों की तरह आँखें फाड़ कर दुहराया.
"हां.....वही सफेद परकटी." सुरैया आँखें चमका कर बोली. "जो अम्मा बी के सीने पर मूँग डालेगी...."
"अर्रे वो सफेद परकटी नहीं है.....उड सकती है........शेराजी की मादा...."
"रूशी के बारे मे कह रही है भाईजान." उसकी चचेरी बहन फ़रज़ाना उसकी टाई की गिरह ठीक करती हुई बोली.
"हाएँ....उसकी बात हो रही? लेकिन देखो........मैं अभी तुम सब से बातें करूँगा. पहले मुझे डैडी के पास जाने दो."
"आप वहाँ नहीं जा सकते..." सुरैया आँखें निकाल कर बोली. "उस से पहले आप को अम्मा बी की जूटियाँ खानी पड़ेंगी."
"ओह्ह...." इमरान एक लंबी साँस लेकर पेट पर हाथ फेरता हुआ बोला. अच्छा ही हुआ की मैं नाश्ता कर के नहीं आया......मगर सुरैया तुम अभी तक बूढ़ी नहीं हुई....मुझे हैरत है."
उसकी कज़िन्स हँसने लगीं. और वो उन्हें हटाता हुआ आगे बढ़ता चला गया. अम्मा बी बरामदे मे ही बैठी मिल गयीं.
"क्यों रे.....कम्बख़्त.....क्यों आया है?" वो फूट पड़ीं. उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और मुह से जली कटी बातें निकल रही थीं.
इमरान उनके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया......और उनकी जूतियाँ पैरों से निकाल कर अपने सर पर रख ली.
"अम्मा बी....! मैं कैसे आता. आज भी डैडी की अनुमति लिए बिना नहीं आया."
"तुम दोनों एक जैसे हो...." अम्मा बी बोलीं..."दोनों संगदिल मेरे ही हिस्से मे आए थे."
इसी तरह वो दिल का गुबार निकालती रहीं और इमरान गिडगिडाता रहा. सुरैया को शायद उसकी कज़िन सिस्टर्स ने कम्पाउन्ड मे ही रोक लिया था. वरना ये सिलसिला लंबी अवधि तक जारी रहता.
किसी ना किसी तरह इमरान रहमान साहब तक पहुचा. वो अपने बेडरूम में टहल रहे थे......और उनके चेहरे पर चिंता के भाव बिल्कुल नहीं थे. वो किसी गहती सोच मे ज़रूर थे. इमरान को देख कर रुक गये....और फिर सुरैया की तरह ही उनके चेहरे पर भी तीखापन के भाव दिखाई देने लगे.
"तुम क्यों आए हो?" उन्होने गुर्रा कर पूछा.
"मम....मैं आपकी अनुमति......स...से...."
"ठीक हैं लेकिन क्यों आए हो?"
"मम....मैने सुबह अख़बार देखा था...."
"आवश्य देखा होगा.....फिर?"
"वो.....आप पर हमला...."
"हुं....मुझ पर हमला हुआ था....मगर मैं ज़िंदा हूँ."
"मैं आप को बधाई देने आया हूँ. " इमरान जल कर बोला.
"नहीं....तुम इसलिए आए हो की हमले का कारण मालूम कर सको.....वरना तुम्हें मुझ से कोई हमदर्दी नहीं है."
"अब इश्स मामले मे तो मैं बिल्कुल मजबूर हूँ डैडी...क्योंकि मेरे रागों मे आप ही का खून है."
"बॅस....जाओ...." रहमान साहब हाथ उठा कर बोले.
"मैं कारण जाने बिना नहीं जाउंगा डैडी..."
रहमान साहब ने बेल की तरफ हाथ बढ़ाया.
"रुकिये...." इमरान जल्दी से बोला. "मैं जा रहा हूँ. लेकिन कारण पता कर लूँगा..."
रहमान साहब कुच्छ ना बोले. इमरान बाहर आ गया. अम्मा बी अब भी उसकी प्रतीक्षा मे बरामदे मे ही बैठी थीं.
"अर्रे बॅस....क्या वापस जा रहा है?"
"हां अम्मा बी....उन्होने केवल मुझे अपमानित करने के लिए बुलाया था."
"तो मुझे अपने साथ ले चल.....मैं अब यहाँ नहीं रहूंगी..."
"मैं गले मे फंदा लगा कर मर जाउंगी अम्मा बी अगर आप इनके साथ गयीं." सुरैया बोल पड़ी.
"अरे कम्बख़्तो....! फिर मुझे ही ज़हर दे दो..."
"अम्मा बी...." इमरान उनके कंधे पर हाथ रख कर बोला. "आप बिल्कुल चिंता मत करें. मैं इश्स सुरैया की बच्ची को भी अपने साथ ले चलूँगा..."
"अर्रे.....ज़ुबान संभाल कर...." सुरैया चिढ़ कर बोली.
"बस अम्मा बी....अब इजाज़त दीजिए. मैं अब आता रहूँगा. क्योंकि डैडी ने ये नहीं कहा है की मैं अब दुबारा यहाँ ना आऊं. मैं आता रहूँगा तब तक जब तक मना नहीं कर दें."
वो अम्मा बी को सिसकता हुआ छ्चोड़ कर गेट की तरफ बढ़ गया.
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दूसरी रात भी डा. दावर को लैब मे ही गुज़ारनी थी. सिम्मी दिन ही मे उन से मिल आई थी. लेकिन उसने उस सुनहरी लड़की वाली बात उन से नहीं की थी. अगर वो चमकीली लिखावट काग़ज़ पर मौजूद होतीं तो वो निश्चित रूप से चर्चा करती.
अब चूँकि उसके पास कोई प्रूफ नहीं रह गया था. इसलिए वो रहस्सयमयी घटना की चर्चा कर के अपना मज़ाक नहीं उड़ाना चाहती थी. किसी को विश्वास नहीं होता. क्योंकि सभी उसे 'एक सपनों मे रहने वाली लड़की' समझते थे.
इस समय रात के आठ बजे थे.....और सिम्मी अब भी किचन ही मे मौजूद थी. क्योंकि यहाँ की खिड़की से वो जगह सॉफ दिखाई देती थी जहाँ पिछली रात उसने उस सुनहरी लड़की को बैठे देखा था.
उसका वो गर्मजोशी भरा चुंबन उसे अब भी याद आता था और जब भी वो उसको याद करती उसकी पेशानी गर्म हो जाती थी. उसने उसे कितने प्यार से भींचा था. मगर वो कौन थी? कहाँ से आई थी.......और वो उड़ने वाली मशीन............!!!|
उसने रॉकेट भी देखे थे......और उडनतश्तरियों के नमूने भी उसकी निगाहों से गुज़रे थे. लेकिन उसे अभी तक पता नहीं था की उड़ने वाली मशीन मे कोई नया आविष्कार भी हो चुका है.......लेकिन वो लड़की........वो उस से कितनी अलग थी......उसके शरीर का रंग कितना असाधारण था. अगर उसके बाज़ुओं पर पंख भी लगे होते तो वो बिना किसी बहस के उसे परी मान लेती. और यही सोचती की वो इंद्र सभा की कहानियों वाली कोई सुनहरी परी है. नीलम परी, याक़ूत परी इत्यादि की तरह.
फिर उसे ग्रहों(प्लननेट्स) का ख़याल आया. उन मे सो कोई कोई आबाद भी तो हैं. तो क्या वो किसी दूसरे ग्रह से आई थी? वो खिड़की पर खड़ी उसके बारे मे सोचती रही. उसे आशा थी की शायद वो आज फिर वहाँ दिखाई दे.
और उसकी उम्मीद सच मुच पूरी हो गयी. उसे ठीक उसी जगह एक गतिमान सी छाया दिखाई दी जहाँ उसने उसे पिछली रात देखा था.
लेकिन सं्भव है वो कोई और हो. उसने एक बार फिर खिड़की से हटना चाहा फिर रुक गयी. ये भी एक मूर्खतापूर्ण सोच थी की वो कल वाली सुनहरी लड़की होगी.
अचानक उस छाया के इर्द गिर्द हल्की सी रौशनी फैल गयी और उसे उसका नीला लबादा सॉफ दिखाई दिया. वो वहीं खड़ी थी जहाँ उसने उसे पिच्छली रात रोते देखा था.
सिम्मी दरवाज़े की तरफ भागी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके पैरों मे पंख लग गये हों.....और वो अब कभी ज़मीन पर नहीं पड़ेंगे.
वो बे-तहाशा दौड़ती हुई बंगले से निकली. ये भी संयोग ही था की किसी नौकर ने उसे इस तरह दौड़ते नहीं देखा. वरना सारे ही नौकर उसके पीछे भागने लगते.
वो टीले की ढलान मे उतरती चली गयी. वो छाया नज़दीक होती जा रही थी. उसके दोनों हाथ फैले हुए थे.
फिर उसने खुद को उसकी बाहों की जकड़ मे महसूस किया. वो उसे भींच भींच कर प्यार कर रही थी.
सिम्मी कह रही थी...."मैं तुम्हें दुबारा पा कर कितनी खुश हुई हूँ. मैं आज पूरा दिन तुम्हारे बारे मे सोचती रही. और इस समय किचन की खिड़की मे तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी. तुम बहुत अच्छी हो. तुम्हारे प्यार मे बड़ी मिठास होती है. मुझे आज तक किसी ने इस तरह प्यार नहीं किया."
फिर वो भी उसे वैसे ही बेतहाशा प्यार करने लगी.
कुच्छ देर बाद सुनहरी लड़की उस का हाथ थामे उसे झाड़ियों की तरफ ले जा रही थी. सिम्मी उसकी दाहिनी हथेली से एक विचित्र प्रकार की रौशनी फूटते देख रही थी.
यही धीमी रौशनी उसके चारों तरफ भी फैली हुई थी......और उसी रौशनी मे वो रास्ता तय कर रही थी.
सिम्मी को समझ मे नहीं आया की वो किस रंग की रौशनी थी.
उसने एक बार फिर खुद को उसी उडने वाले गोले के निकट पाया......जिसका अनुभव उसे पिछली रात हो चुका था.
यहाँ आकर सुनहरी लड़की की हथेली से फूटने वाली रौशनी पहले से कुछ तेज़ हो गयी. लड़की ने गोले की एक खिड़की खोली और सिम्मी को भीतर चलने का इशारा किया.
"क्यों...? नहीं....मैं तुम्हारे साथ कहीं जा नहीं सकूँगी. मेरे पापा परेशान होंगे."
सुनहरी लड़की शायद उसके चेहरे के भावों से उसकी बात का मतलब समझ गयी थी. इसलिए वो इशारे से समझने लगी की वो कुछ देर इसमे बैठेंगी......और वो उसे कहीं नहीं ले जाएगी.
सिम्मी हिचकिचाहट के साथ गोले मे प्रवेश की. लेकिन उसे ये देख कर बड़ी हैरत हुई की उसका भीतरी भाग चौकोर था.......और उसमे दो सोफे पड़े हुए थे. उसकी उपरी सतह इतनी उँची थी की सिम्मी को उस से टकरा जाने के डर से झुकना नहीं पड़ा था. वो उसके सर से लगभग दो फीट उँची थी. एक तरफ दीवार मे एक प्रकाशित लकीर सी दिखाई दे रही थी......और उसी लकीर की तेज़ लेकिन ठंडी रौशनी चारों तरफ फैली हुई थी.
सुनहरी लड़की भी अंदर आई......और फिर उसने वो दरवाज़ा बंद कर दी. अब ये एक बहुत बड़े घन के आकर का संदूक लग रहा था. लेकिन सिम्मी को उसमे थोड़ी सी भी घुटन महसूस नहीं हुई. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो एक विशाल और हवादार कमरे मे बैठी हुई हो.
सुनहरी लड़की उसे प्यार भारी नज़रों से देख रही थी......और उसके होंटों पर मनमोहक मुस्कान थी. तभी उसने एक छ्होटा सा लेदर बैग खोला और उसमे से कुछ चीज़ें निकाली.
ये दो टोपियाँ थीं जिनके रंग डीप ब्राउन सी थी. एक छोटा सा बॉक्स था जिसका एक बटन दबा देने पर उसके सामने लगा एक छोटा सा बल्ब जलने लगा. उसने एक टोपी अपने सर पर मंढ ली और दूसरी सिम्मी के सर पर मंढने लगी. सिम्मी का दिल बड़ी तेज़ी से धड़क रहा था......और बार बार अपने सूख रहे होटों पर ज़ुबान फेर रही थी.
टोपी उसके सर पर मंढ दी गयी......और उसके कानों मे अजीब ढंग की आवाज़ें गूंजने लगीं. टोपी के दोनों तरफ दो गोल सी पट्टी लटक रही थी जिसके सिरे पर छ्होटे छ्होटे गोले लगे हुए थे.......जिससे उसके दोनों कानो मे फिक्स कर दिए गये. एक तार उसकी और सुनहरी लड़की की टोपी को जोड़ती थी. उस तार के बीच से जुड़ा एक दूसरा तार उस बॉक्स से जुड़ा हुआ था जिस पर छोटा सा बल्ब जल रहा था.
इधर सिम्मी बडबडाई...."पता नहीं तुम क्या करने जा रही हो?"
"इस तरह हम एक दूसरे को समझ सकेंगे...." लड़की ने उत्तर दिया. सिम्मी का मुहह हैरत से खुल गया क्योंकि ये उत्तर हिन्दी मे था.....हलाकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई आदमी नहीं बोला हो बल्कि किसी मशीन से निकली हो. ऐसे जैसे कोई मुर्गा "कुकड़ू कू" बोलते बोलते हिन्दी बोलने लगा हो.
आवाज़ मे वो लोच.....वो मिठास नहीं थी जो सिम्मी ने पिछली रात महसूस किया था.
"तुम्हें हैरत है...?" सुनहरी लड़की फिर बोली. "मैं तुम्हारी भाषा नहीं बोल सकती थी लेकिन ये यंत्र मुझे ना केवल तुम्हारी सोच से अवगत कराता है बल्कि मेरी सोच तुम्हारी ही भाषा मे तुम्हारे कानों तक पहुचता है."
"मैं समझी नहीं."
"तुम जो कुछ भी कह रही हो वो इस यंत्र के द्वारा मेरी भाषा मे मेरे कानों तक पहुच रही है और जो कुछ मैं अपनी भाषा मे कह रही हूँ वो तुम्हारी भाषा मे तुम तक पहुच रही है. अर्थात तुम जो कुछ सोचती हो उसे मैं समझ लेती हूँ और जो कुछ मैं सोचती हूँ उस से तुम अवगत हो जाती हो."
"तत....तब तो ये जादू है." सिम्मी बोली.
"नहीं.....ये साइन्स है. हम स्पार्सिया के निवासी बहुत विकसित हैं. लेकिन ये तो बताओ ये कौन सा ग्रह है?"
"पृथ्वी...." सिम्मी ने कहा. उसका दिल फिर धड़कने लगा था.
"पृथ्वी....!!!" सुनहरी लड़की ने हैरत से दुहराया. "मैं ये नाम पहली बार सुन रही हूँ. मैं तो समझी थी की मैं रयामी मे पहुच गयी हूँ."
"ओहो....ये रयामी भी कोई ग्रह है?" सिम्मी ने भी हैरत प्रकट किया. "मैं भी ये नाम पहली बार सुन रही हूँ. हमारे सौरमंडल मे इस नाम का कोई ग्रह नहीं है."
"रूको.....मैं बताती हूँ की हमारा ग्रह स्पार्सिया कौन सा है." उसने स्विच बोर्ड के एक बटन पर उंगली रखी......और गोले की छत खुल गयी. सिम्मी को तारों भरा आकाश दिखाई देने लगा.
"वो देखो.." सुनहरी लड़की ने एक तरफ उंगली उठाई..."वो सब से चमकीला ग्रह....सब से बड़ा ग्रह....वही स्परसिया है..."
"अर्रे.....वो तो शुक्र ग्रह है.....उसे इंग्लीश मे वीनस कहते हैं."
"बिल्कुल नया नाम जो मैने कभी नहीं सुना. वो स्पार्सिया है अच्छी लड़की.....मैं वहीं से आई हूँ."
"अच्छा चलो स्पार्सिया ही सही..." सिम्मी ने हंस कर कहा.....लेकिन वो तो वीरान है....उस मे जीवन के लक्षण नहीं पाए जाते..."
"तब तो निश्चित रूप से तुम लोग हम से कम से कम ५०० साल पीछे हो. स्पार्सिया के वैग्यानिक ५०० वर्ष पहले यही कहते थे की रियामी अर्थात तुम्हारा ग्रह निर्जन है. लेकिन अब यही देख लो की मैं रियामी मे मौजूद हूँ. तुम्हारे टेलिस्कोप अपूर्ण होंगे. हमारा ग्रह तो लाखों सालों से आबाद है."
शुक्र ग्रह के बारे मे ये एकदन नयी खोज थी. सिम्मी ने सोचा की अब वो अपने पापा के ग्यान को चैलें्ज कर सकेगी....
"मुझे घोर आश्चर्य है..." सिम्मी बोली.
"नहीं.....तुम्हें हैरत नहीं होनी चाहिए....क्या तुम ने कभी किसी दूसरे ग्रह की यात्रा की है?"
"अभी हम कोई ऐसा रॉकेट नहीं बना सके जिन के द्वारा ऐसी यात्रा संभव हो...."
"बस तो तुम स्पार्सिया से १००० वर्ष पीछे हो. हजार वर्ष पहले स्पार्सिया मे भी ऐसे फेग्राज़ बनाने की समस्सया सामने थी जो दूसरे ग्रहों तक जा सकें."
"फेग्राज़ क्या...??"
"यही.....जिसमे हम अभी बैठे हैं...."
"ओह्ह.....तो ये उड़ने वाली मशीन तुम्हारे स्पार्सिया मे फेग्राज़ कहलाती हैं....."
"हां....अब से ५०० वर्ष पहले इसका रूप कुछ और था. उस समय ये फे-पोफ्फ कहलाती थी. लेकिन उस समय वो केवल स्पार्सिया के आक्साश मे उड सकती थी. उस मे इतनी शक्ति नहीं थी की वो स्पार्सिया की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की सीमा को पार कर सके......और आज हम इससे उन सीमाओं से आगे ले जा सकते हैं जहाँ से दूसरे ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव इस पर पड सकता हो........लेकिन मेरा फेग्राज़..."
सुनहरी लड़की के चेहरे पर चिंता के लक्षण दिखाई देने लगे थे.
"क्यों.....क्या बात है?" सिम्मी ने पुछा.
"मैं ये सोच रही हूँ की मेरे फेग्राज़ज़ मे ये खराबी कैसे पैदा हो गयी..."
"कैसी खराबी...?"
"ये रयामी के गुरुत्वाकर्षण मे कैसे प्रवेश कर गया और क्यों प्रभावित हो गया......जबकि ये विशेष रूप से देवलांडो के लिए बनाया गया था. मैं इश्स फेग्राज़ज़ से सैकड़ों बार देवलांडो की यात्रा कर चुकी हूँ. लेकिन अब ऐसा होता है की स्परसिया के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की सीमा से निकलते ही इसकी दिशा रयामी की तरफ हो जाती है."
"देवलांडो क्या है?"
"वो स्परसिया से सब से निकटतम ग्रह है. पता नहीं तुम लोग उसे क्या कहते हो..."
सिम्मी कुच्छ सोच रही थी. फिर उसने पुचछा...."तुम्हारा नाम क्या है?"
"नाम......नाम से तुम्हारा क्या अभिप्राय है?"
"तुम्हें क्या कह कर बुलाते हैं?"
"ओह्ह.....मैं समझ गयी....लोग मुझे पाँच लाख पचपन हज़ार तीन सौ सोलह कहते हैं."
"ये तो नंबर हुआ...." सिम्मी ने हैरत से कहा.
"हां....ये नंबर ही है. मैं समझ गयी कि नाम से तुम्हारा क्या मतलब है. आज से एक हज़ार साल पहले जीवन पद्धति दूसरी थी. उस समय नाम रखे जाते थे. लेकिन उसमे एक झंझट थी. नाम के साथ बाप का नाम आवश्यक होता था. अब उसकी ज़रूरत नहीं. पहले एक ही नाम के दर्ज़नों बाप और बेटे मिल जाया करते थे. इस के कारण व्यवस्था मे कठिनाई होती थी. उस ज़माने मे स्परसिया की समाज़ी ज़िंदगी पाबंदियों से भरी हुई थी. एक मर्द और एक औरत जीवन भर के लिए एक दूसरे के पाबंद होते थे. इसलिए वो अपनी संतानों को अपनी संपत्ति समझ कर उन्हें विशेष नाम दिया करते थे......ताकि मा-बाप के नामों से जुड़े रहें. लेकिन अब उसकी आवश्यकता ही ना रही. शादी ब्याह का रस्म अब स्परसिया मे नहीं पाई जाती. इसलिए नामों की जगह नंबर चल रहे हैं. ये अधिक साइंटिफिक सिस्टम है...."
"घोर शर्म की बात है..." सिम्मी ने क्रोधित स्वर मे कहा.
"बहुत बैक वॉर्ड लगती हो...." सुनहरी लड़की हंस पड़ी. "स्परसिया मे अब से एक हज़ार साल पहले इस प्रकार के बेकार सिस्टम पाए जाते थे. जब तक स्परसिया मे शादी ब्याह की दकियानूसी सिस्टम चलती रही तब तक स्परसिया विकास के क्षेत्र मे आगे नहीं बढ़ सका."
"भला शादी के रस्म और साइंटिफिक डेवेलपमेंट मे क्या संबंध?" सिम्मी का लहज़ा अब भी क्रोध भरा था.
"अफ....सोस....मुझे बेकार ही तुम से मुहब्बत हो गयी है......वरना तुम्हारा मानसिक स्तर मेरे मानसिक स्तर से बहुत नीचे है."
"हुहह.......तुम तो बड़ी बुद्धिमान हो..." सिम्मी चिढ़ गयी.
"तुम से हज़ार गुना अधिक प्यारी लड़की...."
"मेरे पापा बहुत बड़े साइंटिस्ट हैं......मैं उन्हीं की बेटी हूँ...."
"साइंटिस्ट......बहुत बड़े.....हाहा..." सुनहरी लड़की मज़ाक उड़ाने वाले ढंग से हंस पड़ी.
"तुम मुझे अकारण गुस्सा दिला रही हो..."
"अच्छा अब नहीं दिलाऊँगी..." सुनहरी लड़की अचानक गंभीर हो गयी. "तुम मुझे बहुत प्यारी सी गुड़िया लगती हो......और पिछली रात तुम ने मुझ पर एहसान किया था...."
"नहीं.....वो सोच कर तुम खामोश मत हो जाओ....साबित करो की तुम मुझ से अधिक बुद्धिमान हो...."
"जिस तरह कहो साबित कर दूं..."
"यही समझा दो की शादी ब्याह का सिस्टम वैग्यानिक विकास मे किस प्रकार बाधक है...?"
"इस प्रकार बेहतरीन दिमाग़ पैदा नहीं सकते प्यारी लड़की.....लेकिन मुझे ये बात पूरी बहस के बाद कहनी चाहिए थी." सुनहरी लड़की बोल कर चुप हो गयी. फिर कुछ देर बाद बोली...."हाँ मुझे ज़रा ये बताओ....की तुम ने अपने दोनों कानों मे क्या लटका रखे हैं?"
"अर्रे ये तो झुमके हैं....."
"क्या ये तुम्हारे ग्रह पर सभी लटकाते हैं?"
"हाँ....हाँ.....तुम्हें इस पर हैरत क्यों है? क्या तुम्हारे ग्रह पर ज्वेल्लेरी नहीं पहने जाते?"
"नहीं......पर ये बताओ.....की सारे झुमके ऐसे ही होते हैं जैसे तुम लटकाई हुई हो.....?"
"नहीं....ये सैकड़ों डिज़ाइन के बनते हैं...."
"लेकिन तुम ने विशेष रूप से इसी डिज़ाइन के क्यों लटकाए हैं?"
"अरे मुझे यही पसंद हैं..."
"तुम इन से संतुष्ट हो...?"
"संतुष्ट ना होती तो लेती क्यों?"
"अच्छा.....अगर ऐसे झुमके तुम्हारे कान मे लटका दिए जाएँ जो तुम्हारी च्वायस के अनुसार बदसूरत हों......तो?"
"मैं उन्हें उतार कर फेंक दूँगी..."
"लेकिन क्यों?"
"इसलिए की वो मेरी पसंद के अनुसार नहीं होंगे."
"तो इस से तुम्हारा क्या नुकसान होगा?"
"होगा क्यों नहीं.....मैं उनको लेकर एक टेन्शन मे पड़ी रहूंगी.....शायद उनके कारण किसी दूसरे के मुकाबले मे मुझे हीन भावना भी होने लगे...."
"इस हीन भावना से ही तुम्हारा क्या नुकसान होगा?"
"बहुत बड़ा नुकसान.....मेरे व्यक्तित्व को चौपट कर देगी..."
"ओके.....और जब तुम्हारा व्यक्तित्व बर्बाद हो चुका होगा तब तुम्हारी संतान कैसी होंगी?"
"लीव इट...." सिम्मी झेंप कर बोली...."मैं कुछ नहीं सुनना चाहती अगर तुम इस तरह की बातें करोगी तो मैं चली जऊँगी..."
सुनहरी लड़की हँसने लगी. फिर बोली..."अगर तुम अपने हज़्बेंड के मामले मे किसी प्रकार के टेनशन से ग्रसित रहोगी . विश्वास करो की उस टेनशन या उस मानसिक कुंठा की छाया तुम्हारे बच्चों के व्यक्तित्व पर अवश्य पड़ेगी. अगर तुम एक दूसरे से संतुष्ट नहीं हो तो तुम्हारे बच्चे असंतुलित व्यक्तित्व वाले होंगे........और इस तरह विकास रुक सकता है."
"फिर वही.....मैं कहती हूँ चुप हो जाओ...." सिम्मी शर्म से लाल हो गयी.
"तुम मुझ से हज़ारों साल पीछे हो." सुनहरी लड़की मुस्कुराई.."ओके अब हम इस चर्चा को विराम दें तो अच्छा है. वरना हो सकता है की हम दोनों एक दूसरे से बेज़ार हो जाएँ."
"तुम्हारी रंगत सुनहरी क्यों है?" सिम्मी ने टॉपिक बदलते हुए कहा.
"बस हम ऐसे ही होते हैं...हाँ देखो....मैने अपने ग्रह मे किसी से भी इसकी चर्चा नहीं किया है कि मेरा फेग्राज़ मुझे देवलांडो के बजाए रयामी मे ले जाता है......तुम भी मेरा ज़िक्र किसी से मत करना."
"वाहह...." सिम्मी हंस कर बोली..."मैं तो तुम्हें अपने पापा से मिलाना चाहती थी."
"कदापि नहीं.....बिल्कुल नहीं....इसके लिए मुझे कभी मजबूर मत करना.....वरना हमारी दोस्ती सिरे से समाप्त हो जाएगी...और अगर मैने स्पारसिया मे किसी को बताया तो मुझे अपने फेग्राज़ से भी हाथ धोना होगा."
"क्यों?"
"इस पर सरकार क़ब्ज़ा कर लेगी.....और ये पता करने केलिए इसके टुकड़े टुकड़े कर देंगे की ये देवलांडो की बजाए रयामी क्यों पहुँच जाता है."
"हाँ.....मुझे भी बताओ की ऐसा क्यों होता है?"
"मैं नहीं जानती..."
"अच्छा ये तो बताओ की तुम आज भी ठीक उसी जगह कैसे पहुँच गयी जहाँ कल पहुँची थी. जाहिर बात है की अपने ग्रह के गुरुत्वाकर्षण सीमा से निकालने के बाद तुम्हारा ये फेग्राज़ तुम्हारे नियंत्रण से बाहर हो जाता होगा. अर्थात इसकी गति इसकी मेकॅनिकल सिस्टम के अधीन नहीं रह जाती होगी. इसलिए ठीक इसी जगह तुम ने इसे कैसे उतारा?"
"ये इतना आश्चर्या-जनक नहीं है.....प्यारी लड़की जितना की इसका देवलांडो की जगह रयामी पहुँचना. कल मैं समय देख कर चली थी. हमेशा इसी तरह चलना पड़ता है. अतः आज भी ठीक उसी समय रवाना हुई जिस समय कल हुई थी. इस प्रकार मैं ठीक उसी स्थान पर पहुँच गयी जहाँ कल इसी समय पहुँची थी."
"लेकिन क्या ये ज़रूरी है की आज भी तुम्हें यहाँ तक आने मे उतना ही समय लगा हो.......चलो....खैर मैं इसे भी मान लेती हूँ कि दोनों ग्रह एक ही गति से अपनी धूरी पर चक्कर काट'ती हैं. लेकिन क्या उनकी सुर्य की परिक्रमा वाली गति तुम्हारे प्रस्थान करने और पहुचने के स्थानों मे परिवर्तन का कारण नहीं बन सकती थी?"
"यही तो मैं भी सोचती हूँ.....लेकिन ये समस्या अभी तक हल नहीं कर पाई.....अच्छी लड़की अगर मैं संयोग से मिली इस नयी खोज की घोषणा स्परसिया मे कर दूं तो जानती हो....मेरी क्या पोज़ीशन हो जाएगी?"
"तुम्हारी गिनती वहाँ की बड़ी बड़ी हस्तियों मे होने लगेगी."
"लेकिन मैं ऐसा नहीं करूँगी."
"क्यों?"
"केवल तुम्हारे कारण मुझे रयामी के निवासियों से हमदर्दी हो गयी है. अगर स्परसिया वालों को इसका पता चल जाए तो वो देवलांडो की तरह ही रयामी को भी तबाह कर दें. तुम लोग स्परसिया वालों का मुकाबला नहीं कर सकोगे. स्परसिया के केवल 10 आदमी और एक फेग्राज़ पूरे रयामी को उलट पलट कर दे सकते हैं. और तुम मे से जो ज़िंदा बचेंगे वो स्परसिया वालों के गुलाम कहलाएँगे."
"ओह्ह...." सिम्मी की आँखें हैरत और भय से फैल गयीं.
"और अगर तुम ने यहाँ किसी से मेरी चर्चा कर दी तब भी मेरा फेग्राज़ ख़तरे मे पड़ जाएगा. और फिर मैं कभी स्परसिया भी वापस ना जा पाउन्गी."
"हाँ.....तुम मुसीबत मे पड़ सकती हो." सिम्मी चिंतित स्वर मे बोली.
"बस अगर तुम चाहती हो की हम एक दूसरे से मिलते रहें तो मेरे बारे मे किसी को भी ना बताना. अपने पापा को भी नहीं. तुम ने अभी बताया की वो साइंटिस्ट हैं. इसलिए वो भी मेरे फेग्राज़ के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं. देखो मैं फिर कहती हूँ.....अगर तुम ने किसी से भी कुछ कहा तो मेरी मौत की ज़िम्मेदार होगी."
"नहीं.....मैं किसी से भी नहीं कहूँगी. चलो मेरे साथ मेरे घर चलो."
"फिर कभी. अब मुझे वापस जाना चाहिए. वरना मैं स्परसिया के किसी वीरान भाग मे जा पहुँचुँगी और फिर मुझे बहुत देर तक इधर उधर भटकना पड़ेगा."
"अच्छा मुझे उस रौशनी के बारे मे भी बताओ जो तुम्हारे हाथ से निकलती है."
"हाथ से नहीं निकलती बल्कि ये एक प्रकार का टॉर्च है जो स्परसिया के अंतरिक्ष यात्री इस्तेमाल करते हैं......ये देखो..." सुनहरी लड़की ने दाईं हथेली सिम्मी के सामने कर दी.....और अब सिम्मी ने देखा की उसके हाथ नंगे नहीं थे बल्कि उन पर ग्लव्स थे और उन ग्लव्स का रंग भी सुनहरा ही था. लेकिन हथेली के बराबर हरे रंग का सर्किल दिखाई दे रहा था. तभी लड़की ने फेग्राज़ के भीतर की लाइट ऑफ कर दी. सिम्मी ने देखा की उसकी दाहिनी हथेली के हरे गोले से रौशनी फूटने लगी है. धीरे धीरे फेग्राज़ मे उतनी ही तेज़ रौशनी फैल गयी जितनी कुछ देर पहले फेग्राज़ की लाइट थी.
"कल मुझ पर मुसीबतें टूट पड़ी थीं." सुनहरी लड़की ने कहा. "फेग्राज़ की मशीन खराब हो गयी थी......इस टॉर्च के ग्लो-बॅज़्म्स ठंडे पद गये थे.....और मैं अंधेरे में ठोकर खा कर गिर पड़ी थी. अगर तुम ना होती तो मुझे यहीं आत्महत्या कर लेनी पड़ती. क्योंकि किसी शरारती व्यक्ति की नज़र मुझ पर पड़ जाती तो मैं क्या करती. तुम खुद सोचो की क्या मैं ये फेग्राज़ उसके हाथ लगने देती......और ना वो मुझ पर ही काबू पा सकता."
"लेकिन तुम इसे कैसे बर्बाद कर देती?"
"इसमे चार तोपें भी हैं और काफ़ी मॅगज़ीन्स हर समय उपलब्ध रहते हैं. हलाकी तोपें दूसरे उद्देश्यों केलिए हैं लेकिन इन्हीं से इसे तबाह भी किया जा सकता है. केवल ऑपरेट करते समय कुच्छ चेंज करना पड़ता है. उसके बाद फेग्राज़ज़ का एक टुकड़ा भी किसी के हाथ ना आ सकेगा."
"अब केवल दो बातें और बता दो.....पहली बात ये की ग्लो बॅज़म्स क्या है जो अभी टॉर्च के बारे मे बताते हुए तुम ने कहा था."
"अब पता नहीं तुम लोग उन चमकदार कणों को क्या कहते हो......हम स्परसिया वाले उसे ग्लो-बॅज़म्स कहते हैं. ये गंधक और पारे से बनाए जाते हैं. फिर उन्हें एक रेडियो-एक्टिव पदार्थ से चार्ज किया जाता है. चलो दूसरी बात जल्दी पूछो...मुझे ठीक सातवें मिनट में यहाँ से चल देना है."
"फेग्राज़ मे तोपों की मौजूदगी का मतलब? क्या तुम उन्हें किसी के खिलाफ इस्तेमाल करती हो?"
"नहीं....ये युद्ध केलिए नहीं हैं.....बल्कि उन पर ही अंतरिक्ष की यात्रा डिपेंड करती है. अक्सर हमारे फेग्राज़ ऐसी पोज़ीशन मे पहुँच जाता है जहाँ विभिन्न ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति इस पर प्रभाव डालने लगती हैं. वहाँ फेग्राज़ या एकदम रुक जाता है. न आगे बढ़ सकता है ना पीछे. ऐसे अवसरों पर इन तोपों के धमाकों से फेग्राज़ को आगे बढ़ाते हैं. जैसे ही फेग्राज़ उन शून्य गुरुत्वाकर्षण से की सीमा से निकलता है......किसी एक ग्रह की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उस पर सक्रिय(एक्टिव) हो जाती है और वो उसी तरफ खिंचा चला जाता है.
अच्छा बस......मैं फिर आउंगी. तुम्हारे लिए मैं भी बेचैनी महसूस करती हूँ. तुम बहुत प्यारी हो.....काश स्परसिया मे होतीं...."
सुनहरी लड़की ने अपने सर से चमड़े का कवर निकाला और फिर सिम्मी के सर से भी उतार लिया. अगले ही पल वो उसे खूब भींच भींच कर प्यार कर रही थी. इस बार सिम्मी ने भी वैसी ही गर्मजोशी प्रकट किया था.
फिर सिम्मी फेग्राज़ से बाहर आ गयी......और पिछली ही रात की तरह एक बार फिर उसे हवा के ज़ोरदार झोंके का अनुभव हुआ और फेग्राज़ हवा मे बुलंद हो चुका था.
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इमरान ने जूलियाना फिट्ज़वॉटर के नंबर डायल किए लेकिन दूसरी तरफ से कोई रिप्लाइ नहीं मिला. उसने सर को हल्के से झटका जैसे वो इसपर संतुष्ट हो.
फिर दूसरे ही पल उसके निजी फोन की घंटी बजी और वो बेडरूम की तरफ बढ़ा. दूसरी तरफ ब्लैक ज़ीरो था.
"सर रहमान साहब ऑफिस से निकले थे..." ब्लैक ज़ीरो कह रहा था...."लेकिन उनकी गाड़ी खराब हो गयी.....इसलिए उन्हें घर वापस जाने केलिए टेक्सी मंगवानी पड़ी. कैप्टन खावीर उस टॅक्सी का पीछा कर रहा है......और उस से ट्रांसमीटर पर बराबर रिपोर्ट मिल रही हैं. टॅक्सी बहुत तेज़ रफ़्तार से चीथम रोड पर जा रही है......मम....मतलब आप समझ ही गये होंगे....."
"खावीर से कहो की अब वो थ्री फाइव के सेट पर सूचना दे. पाँच मिनट बाद.....जल्दी करो....शायद वो अपनी ही गाड़ी मे होगा...."
"जी हाँ..."
"तब वो थ्री फाइव के सेट पर आसानी से सूचना दे सकेगा....ओके....हरी अप." इमरान रिसीवर रखा और बड़ी तेज़ी से कपड़े चेंज किए और फ्लॅट से बाहर आ कर कार मे बैठा. डैश बोर्ड पर लेफ्ट साइड के एक स्विच दबाने से एक छोटा सा बॉक्स सामने दिखाई देने लगा जिसके उपरी भाग मे जाली लगी हुई थी.....निचला भाग माइक्रोफोन के स्पीकर की तरह था.
कार चल पड़ी. इमरान की निगाह घड़ी पर थी. ठीक 5 मिनट बाद डैश बोर्ड पर प्रकट होने वाले बॉक्स से आवाज़ आई....."हेलो....हेलो....थ्री फाइव पर कौन है?"
"अली इमरान अली इमरान एम एस सी, पी एच डी ओक्सान....."