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बेगुनाह ( एक थ्रिलर उपन्यास )

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"आई सी । ठीक है, तुम जा सकते हो ।” वह चेहरे पर हैरानी और अविश्वास के भाव लिए वहां से विदा हो गया।

"आप जूही चावला को जानती हैं" - मैंने कमला से पूछा।

"जानती हूं। यहां की पार्टियों में वह अक्सर आया करती है और हमेशा मेरे साथ बड़े अदब से पेश आती है। लेकिन यह मुझे कभी नहीं सूझा था कि मेरे हसबैंड की उसके साथ आशनाई हो सकती थी।"

"ऐसा कोई संकेत तो अभी भी हासिल नहीं ।"

"कैसे हासिल नहीं ? अपना ऑफिस छोड़कर उसके घर पर चावला साहब और किसलिए जाते ? जरूर उस कुतिया की वजह से ही वे मुझसे तलाक चाहते थे । मुझे इस बात का अन्देशा तो था कि मेरे मर्द की किसी गैर औरत से आशनाई थी लेकिन वह औरत जूही चावला थी, यह मुझे कभी नहीं सूझा था । हरामजादी मुझे आंटी कहा करती थी जबकि वो मुश्किल से दो या तीन साल छोटी होगी मुझसे ।"

"तलाक तो आप भी चाहती थीं अपने पति से ?"

"कोई भी गैरतमंद औरत अपने बेवफा पति से तलाक चाह सकती है। लेकिन मेरे तलाक चाहने में और मेरे पति के तलाक चाहने में फर्क है ?"

"क्या फर्क है ?"

"मेरा पति फोकट में मुझसे पीछा छुड़ाना चाहता था ।"

"जबकि आप जायदाद में हिस्से की और हर्जे-खर्चे की ख्वाहिशमंद थीं ?"

"हां ।"

"आप चाहती थीं कि इससे पहले आपका पति किसी बहाने आपको दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर करें,

आप उसकी किसी गैर औरत से आशनाई साबित कर सकें और उस बिना पर हर्जे-खचे के साथ उससे तलाक हासिल कर सकें । इसीलिये आपको एक प्राइवेट डिटेक्टिव की सेवाओं की जरूरत थी ?"

"हां ।"

" "मेरा नाम कैसे सूझा आपको ?"

"किसी ने सुझाया था।"

"किसने ?"

"बलराज सोनी ने ।"

"आई सी ।" - मैं गंभीरता से बोला ।

“ड्रिंक और हो जाए ।" - मेरा खाली गिलास देखकर वह बोली ।

"हो जाये !" - मैं बोला - क्या हर्ज है !"

मेरा और अपना गिलास लेकर वह बार पर गई । हैनेसी के नये जाम तैयार करके वह वापिस लौटी। हम दोनों एक सोफे पर अगल-बगल बैठ गए । बड़े अफसोस की बात थी कि हम दोनों के बीच एक निहायत इज्जतदार फासला था

 
"आपकी और आपके पति की उम्र में बहुत फर्क है।" - मैं बोला- "ऐसा क्यों ?"

"क्योंकि" - वह बोली - "उसकी मां ने उसे मेरी मां के मुझे पैदा करने से बहुत पहले पैदा किया था।"

"आप बात को मजाक में ले रही हैं। मैंने यह सवाल गंभीरता से किया था ।"

"मैं चावला साहब की दूसरी बीवी हूं।"

"पहली को क्या हुआ ?"

"परलोक सिधार गई ।"

"कोई औलाद ?"

"कोई नहीं ।”

"आप पर नजरेइनायत कैसे हुई साहब की ?" वह हिचकिचाई।

"क्लायंट और प्राइवेट डिटेक्टिव का रिश्ता मरीज और डॉक्टर जैसा होता है। जैसे मरीज को डॉक्टर से कुछ नहीं छुपाना चाहिये, वैसे ही क्लायंट को भी प्राइवेट डिटेक्टिव से कुछ नहीं छुपाना चाहिये ।"

"मैं राजदूत में कैब्रे डांसर थी ।" - वह बोली - "चावला साहब वहां अक्सर आते थे । मुझ पर फिदा हो गए । शादी

की ख्वाहिश जाहिर करने लगे जो कि मैंने कबूल कर ली ।"

"उनसे या उनकी दौलत से ?"

"अक्लमंद को इशारा काफी होता है।"

"जब आपकी और उनकी रिश्तेदारी की बुनियाद मुहब्बत नहीं थी तो आपको उनके किसी गैर-औरत से ताल्लुकात से क्या फर्क पड़ता था ?"

"ताल्लुकात से फर्क नहीं पड़ता था लेकिन मेरा पत्ता काटकर किसी और से शादी कर लेने के उनके खतरनाक इरादे

से फर्क पड़ता था।"

"औरतों के बहुत रसिया थे चावला साहब ?"

"हां । बहुत ज्यादा ।"

जूही चावला ने उनका कत्ल किया हो सकता है ?"

"वो किसलिए ?"

 
"शायद आपके पति ने उसे न बताया हो कि वे शादीशुदा थे और उसे शादी का झांसा देकर खराब किया हो !"

"मिस्टर !"

"फरमाइए।"

तुम्हें नशा हो गया है।"

"कैसे जाना ?"

"तुम्हारी अक्ल तुम्हारा साथ नहीं दे रही । मैं अभी तो कहकर हटी हूं कि यहां आया करती थी और मुझे आंटी कहा करती थी।"

"ओह, सॉरी ।" मैंने रेड एंड वाइट का अपना पैकेट निकालकर एक सिगरेट सुलगा लिया। मैंने महसूस किया, मेरा दिमाग वाकई हवा में उड़ने लगा था । सिगरेट ने मुझे थोड़ी राहत पहुंचाई। "मैं मिलूंगा उस लड़की से ।"- मैंने घोषणा की।

"जरूर मिलना लेकिन सावधान रहना ।"

"किस बात से ?"

"उसकी खूबसूरती से । बहुत खूबसूरत है वो ।"

"आपसे ज्यादा ?"

“हां । मुझसे ज्यादा ।”

"पहली बार किसी खूबसूरत औरत को किसी दूसरी खूबसूरत औरत को अपने से ज्यादा खूबसूरत तसलीम करते देख रहा हूं।"

"हकीकत हकीकत है।

" "मैं तो नहीं मान सकता ।"

"क्या ?"

"कि दुनिया में कोई औरत आपसे भी ज्यादा खूबसूरत हो सकती है ।”

वह खुश हो गई लेकिन प्रत्यक्षतः वह बोली - "अरे, मैं कुछ नहीं हूं।"

"अपनी निगाहों में । मेरी निगाहों में नहीं । मैडम, हीरे की कद्र सिर्फ जौहरी को होती है।"

"तुम जौहरी हो ?"

वह हंसी । हंसी तो फंसी ।

मैंने अपना गिलास खाली कर के सामने के मेज पर रख दिया और उसकी तरफ सरका । वह उठकर खड़ी हो गई। मैंने उसकी नंगी बांहें थाम लीं । उसने बांहें छुड़ाने का उपक्रम न दिया। मैंने उसको तनिक अपनी तरफ खींचा तो वह मेरी गोद में आकर गिरी । उसके हाथ में थमे गिलास में से ब्रांडी छलकी और उसके छींटें उसके चेहरे पर जाकर पड़े। मैंने बड़ी नफासत से उसके गुलाब-से-गालों पर से हैनेसी की बूंदें चाटी । फिर उसने गिलास हाथ से फिसलकर नीचे कालीन पर गिर जाने दिया और अपनी लम्बी सुडौल बांहें मेरे गले में डाल दीं । उसका कठोर उन्नत वक्ष मेरे चेहरे से टकराने लगा। मैंने उसे कसकर, अपने साथ चिपटा लिया और अपना मुंह उसके उरोजों में धंसा दिया। उसके नौजवान जिस्म में से भड़की हुई आग जैसी तपिश पैदा होने लगी । उसने आंखें बन्द कर ली और निढाल होकर मेरी गोद में पसरी जाने लगी। इमारत में कहीं टेलीफोन की घण्टी बजने लगी । तुरन्त उसके जिस्म से मेरी पकड़ ढीली पड़ गई।

बजने दो।" - वह मेरे कान में फुसफुसाई ।

"नहीं । फोन सुनकर आओ।"

"लेकिन..."

"इसे इंटरवल समझो । इतनी रात गए कोई खामखाह फोन नहीं कर रहा होगा। फोन कॉल का कोई रिश्ता तुम्हारे पति की मौत से हो सकता है।"

"अच्छा !"

बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से वह मेरी गोद में से उठी । अपने कपड़े और बाल व्यवस्थित करती हुई वह गलियारे दरवाजे के रास्ते से वहां से बाहर निकल गई ।

 
मैं सोचने लगा, टेलीफोन तो स्टडी में भी हो सकता था। इतनी बड़ी कोठी में तो कई टेलीफोन मुमकिन थे। मुझे लगा कि घंटी स्टडी में भी बजी थी।

मैं उठ खड़ा हुआ।

स्टडी का दरवाजा खोलकर मैं भीतर दाखिल हुआ। भीतर बत्ती नहीं जल रही थी लेकिन बाहर की जो थोड़ी-बहुत रोशनी वहां प्रतिबिम्ब हो रही थी, उसमें मुझे परे एक मेज पर पड़ा टेलीफोन दिखाई दिया। मैंने आगे बढ़कर उसका रिसीवर उठाकर अपने कान से लगा लिया।

मेरे कानों में एक जनाना आवाज पड़ी लेकिन मुझे गारण्टी थी कि वह आवाज कमला की नहीं थी।

तभी मेरी खोपड़ी पर जैसे कोई बम छूटा । फोन मेरे हाथ से छूट गया और मेरे घुटने मुड़ गए । मेरी आंखों के आगे लाल-पीले सितारे नाचने लगे । अंधेरे में मैंने अपने हाथ सामने को झपटाये तो वे किसी के जिस्म से टकराये । तभी एक और डंडा मेरी खोपड़ी की तरफ आया ।। मैंने पूरी शक्ति से डंडा पकड़कर अपनी तरफ खेंचा डंडे वाला आदमी नीचे आकर गिरा मैं उसकेऊपर सवार हो गया। अंधेरे में मैंने अपने दोनों से अपने नीचे दबे आदमी पर घूँसे बरसाने शुरूकर दिए । मुझे नहीं पता था कि मैं उस पर कितने घूँसे बरसा रहा था पर बदले में कम-से-कम मुझ पर कोई प्रहार नहीं हो रहा था। फिर पता नही कैसे वह मुझे अपने ऊपर से परे धकेलने में कामयाब हो गया ।

नीम अंधेरे में बड़ा मुझे अपने चेहरे की तरफ लहराता जाता दिखाई दिया। मैंने तुरन्त करवट बदली । डण्डा । - जोर से फर्श से टकराया। वह आदमी उठकर दरवाजे की तरफ भागा। मैंने फर्श पर पड़े-पड़े ही जम्प लगाई ।

मेरी दोनों बांहें उसकी कमर से लिपट गई । हम दोनों धड़ाम से नीचे गिरे । मैं उससे पहले उछलकर अपने पैरों पर खड़ा हो गया। मैंने अपने जूते की एक भरपूर ठोकर उसकी पसलियों में जमाई । वह गेंद की तरह परे उछला और फिर जहां जाकर गिरा, वहां से दोबारा न हिला । में हांफता हुआ उसके सिर पर जा खड़ा हुआ और उसके शरीर में कोई हरकत होने की प्रतीक्षा करने लगा।

तभी लगभग भागती हुई कमला स्टडी रूम में दाखिल हुई। "राज !" - वह आतंकित भाव से बोली - "क्या हुआ ?"

"मुझे नहीं मालूम कि यहां की बिजली का स्विच कहां है !" - मैं बोला - "बत्ती जलाओ, फिर देखते हैं, क्या हुआ ।" .

उसने बत्ती जलाई तो मैंने देखा कि मेरे सामने नीचे फर्श पर जो आदमी पड़ा था, मेरे अधिकतर घूसे, लगता था, उसके चेहरे पर ही पड़े थे। उसकी नाक में से खून बह रहा था, ऊपर का होठ कट गया था, सामने के दो दांत टूट गए थे और चेहरा यूं लगता था जैसे स्टीम रोलर से टकराया था। उस वक्त उसकी चेतना लुप्त थी।

खुद मेरी कनपटी और खोपड़ी पर दो गूमड़ सिर उठाने लगे थे और मेरी खोपड़ी में यूं सांय-सांय हो रही थी जैसे जैसे भीतर कोई बम विस्कोट होने वाला था । मेरा दिल धाड़-धाड़ मेरी पसलियों से टकरा रहा था।

"कौन है यह ?" - कमला बदहवास भाव से बोली।

"तुम नहीं जानती ?" - मैंने पूछा। -

"इसकी सूरत आज से पहले मैंने कभी नहीं देखी ।"

"इसे होश में लाते हैं । फिर यह खुद ही बताएगा कि यह कौन है ! तुम थोड़ा पानी लेकर आओ ।”

वह वहां से चली गई। मैंने उस आदमी की बगलों में हाथ डालकर उसे उठाया और उसे एक कुर्सी पर डाल दिया। वह चालीसेक साल का काफी लम्बा-चौड़ा आदमी था । वह एक सूट पहने था जिसको टटोलकर मैंने उसके कोट की भीतरी जेब से एक रिवॉल्वर बरामद की । जिस डण्डे से दो बार मेरी खोपड़ी पर प्रहार किया गया था, वह परे लुढ़क गया था और गनीमत थी कि वह लकड़ी का था । लोहे का होता तो उसके पहले ही वार से मेरी खोपड़ी तरबूज बन चुकी होती ।। कमला पानी का एक जग लेकर वापिस लौटी। मैंने जग खुद थाम लिया और उसके मुंह पर पानी के छीटें मारने लगा। उसे होश आया। अपने सामने का नजारा देखते ही उसका हाथ अपने कोट की भीतरी जेब की तरफ झपटा।

"इसे ढूंढ रहे हो ?" - मैंने उसकी रिवॉल्वर उसकी तरफ तानी ।

“साले !" - वह खून थूकता हुआ कहर भरे स्वर में बोला - "खून पी जाऊंगा । जान से मार डालूंगा।"

"अच्छा ! कैसे करोगे इतने सारे काम ?"

उसने फिर गाली बकी तो अपने बायें हाथ में अभी भी थमे जग का सारा पानी मैंने उस पर पलट दिया।

"कौन हो तुम ?" - मैं बोला ।

 
उसने जवाब न दिया । वह बड़े निडर भाव से अपलक मुझे देखता रहा। मैंने आगे बढ़कर रिवॉल्वर को नाल से उसकी पहले से लहुलुहान नाक पर दस्तक दी। वह पीड़ा से बुरी तरह बिलबिलाया ।

"हरामजादे !" - मैं कहरभरे स्वर में बोला - "मैंने तेरे से एक सवाल पूछा है।"

वह परे देखने लगा।

प्रहार के लिए मैंने फिर हाथ उठाया तो कमला बड़े व्याकुल भाव से बोल पड़ी - "इतनी मार-पीट मत करो। इसकी तलाशी लो। इसकी जेब में से ऐसा कुछ तो निकलेगा जिससे मालूम हो सकेगा कि यह कौन है।"

"तुम्हें इस पर तरस आ रहा है ?"

"हां।"

"यह जानते हुए कि यह एक चोर है और इतने अभी मुझ पर कातिलाना हमला किया था ? ऐसा हमला यह तुम पर

भी कर सकता था ?"

वह खामोश रही ।

"मेरे ख्याल से यह तब भी यहां था जब तुम मेरे लिए चैक बनाने और इण्टरकॉम इस्तेमाल करने यहां आई थीं । यह हमारे यहां पहुंचने से पहले से यहां था ।"

"इसने मुझ पर हमला नहीं किया था।"

"क्योंकि तुम औरत हो । तुमसे यह निपट सकता था। तब यह यहां कहीं छुप गया होगा । मुझसे निपटना इसे मुहाल लगा होगा इसलिए इसने छुपकर मुझ पर हमला कर दिया था।"

वह खामोश रही ।

कुछ क्षण मैं भी खामोश रहा, फिर मैंने उसे रिवॉल्वर थमाई और बोला - "इसे इस पर तानकर रखना, मैं तलाशी लेता हूं इसकी ।"

उसने सहमति में सिर हिलाया।

मैंने उसकी तलाशी ली ।

मैंने उसकी जब से एक ड्राइविंग लाइसेंस बरामद किया जिस पर उसकी तस्वीर लगी हुई थी और नाम की जगह आर पी चौधरी लिखा था। उसके बटुवे में कम-से-कम पांच हजार रुपये के नोट थे और कुछ विजिटिंग कार्ड थे जिन पर उसके नाम के नीचे पते के स्थान पर लिखा था जान पी एलेग्जैण्डर एण्टरप्राइसिज विक्रम टावर, राजेंद्रा प्लेस, नई दिल्ली -110060 ।। तो वह एलैग्जैण्डर का आदमी था। मैंने उसका सब सामान उसके कोट की जेब में वापिस डाल दिया और कमला से रिवॉल्वर वापिस ले ली । “कहीं से रस्सी तलाश करके लाओ।" - मैं बोला - "इसके हाथ-पांव बांधने होंगे।"

"वो किसलिए ?"

"ताकि पुलिस के यहां आने तक हमें रखवाली के लिए इसके सिर पर न खड़ा रहना पड़े।"

"तुम इसे पुलिस के हवाले करोगे ?"

"और क्या करना चाहिए मुझे ? इसकी करतूत के लिए इसे शाबाशी देकर इसे घर भेज देना चाहिए ?

 
" वह बिना उत्तर दिए रस्सी की तलाश में वहां से निकल गई। मैंने 100 डायल किया और यादव के बारे में पूछा । मालूम हुआ कि यादव वहां से विदा होने ही वाला था। मैंने उसे । चोर के बारे में बताया।

"चोर !" - वह बोला - "कहां पकड़ा चोर ?"

"चावला की कोठी पर ।" - मैंने उत्तर दिया।

"चावला की कोठी पर ! इतनी रात गए, वहां क्या कर रहे हो तुम ?"

"कुछ नहीं कर रहा। अफसोस है।"

"कौन है चोर ?"

"नाम आर पी चौधरी है । एलैग्जैण्डर का आदमी है।"

"कौन एलेग्जैण्डर ?"

दिल्ली शहर में एक ही एलेग्जैण्डर है जिक्र के काबिल ।"

"जान पी ?"

"वही ।"

"वो वहां क्या चुराने आया था ?"

"मालूम नहीं । मुझसे बात करके राजी नहीं ।”

"हम राजी कर लेंगे उसे बात करने के लिए ।” |

"गुड । तो आ रहे हो ?"

"पागल हुए हो ! चौदह घण्टे हो गए मुझे ड्यूटी भरते हुए । मैं घर जा रहा हूं। किसी और को भेजता हूं वहां ।” मैंने फोन रख दिया और चौधरी की तरफ घूमा। "सरकारी सवारी आ रही है तुम्हारे लिए ।"

वह खामोश रहा।

तभी कमला रस्सी लेकर लौटी। मैंने चौधरी को कुर्सी के साथ मजबूती से बांध दिया जिस पर कि वह बैठा था । उसने कोई विरोध नहीं किया लेकिन वह घूरता मुझे यूं रहा जैसे निगाहों से ही मेरा कत्ल कर देना चाहता हो ।

"कुछ पता लगा, कौन है यह ?" - कमला ने उत्सुक भाव से पूछा ।

"तुम किसी जान पी एलैग्जैण्डर से वाकिफ हो ?"

"हां । वह यहां अक्सर आया करता है।"

"यानी कि चावला साहब भी वाकिफ थे उससे ?"

"हां ।"

"इसका" - मैंने चौधरी की तरफ इशारा किया - "नाम चौधरी है। यह उसी एलैग्जैण्डर का आदमी है।"

"लेकिन एलैग्जैण्डर का किसी चोर से क्या वास्ता ?"

"वही जो चोरों के सरताज का किसी चोर से होता है।"

“मतलब ?"

 
"लगता है, तुम एलैग्जैण्डर के नाम से ही वाकिफ हो यह नहीं जानती हो कि वह क्या करता-धरता है !"

"वह एक बिजनेसमैन है।"

"वह एक गैंगस्टर है। दादा है। बड़ा दादा ।" |

"अच्छा ! मुझे नहीं मालूम था ।"

"जाहिर है । चावला साहब की एलैग्जैण्डर से कभी कोई अदावत, कोई झक-झक, कोई तकरार हुई थी ?"

"मेरे सामने तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन आज सुबह मेरे पति ने एक बात की थी जिससे लगता था कि उनकी एलेग्जेण्डर से कोई अदावत थी जिसकी वजह से वे उससे सावधान रहना जरूरी समझते थे।"

"क्या किया था उन्होंने ?"

"आज सुबह वे दो सशक्त बॉडीगार्डों के साथ घर से निकले थे। उनमें से एक आदमी के चेहरे पर चेचक के दाग थे।

अगर तुम चेचक के दागों वाले आदमी को चितकबरा कहते हो तो वे जरूर वही आदमी थे जिनका जिक्र कदमसिंह ने किया था। मैंने उन आदमियों के बारे में अपने पति से सवाल किया था तो उसने बड़ी खोखली हंसी हंसते हुए कहा

था कि वे एलैग्जैण्डर के खिलाफ इंश्योरेंस थे।"

"यानी कि चावला साहब को एलैग्जैन्डर से खतरा था ?"

"लगता तो यही था।" - वह एक क्षण ठिठकी और फिर बोली - "क्या उनके कत्ल में एलैग्जैन्डर का हाथ हो सकता है ?"

"कत्ल अगर तुमने नहीं किया तो क्यों नहीं हो सकता ?"

"तुम अभी भी मुझ पर शक कर रहे हो ?" - वह आहत भाव से बोली।

"छोड़ो । मैंने तो महज एक बात कही थी।"

"महज एक बात नहीं, दिल दुखाने वाली बात ।"

"क्या यह हैरानी की बात नहीं" - मैंने उसके दुखते दिल की परवाह नहीं की - "कि तुम्हारा पति सारा दिन तो सशस्त्र बॉडीगार्डों के साथ घूमता रहा और जब छतरपुर जैसी उजाड़, तनहा और शहर से दूर जगह पर जाने की बारी आई। तो बॉडीगार्डी को उसने रुखसत कर दिया ।"

"है तो सही हैरानी की बात !" “यह इस बात की तरफ इशारा है कि फार्म पर चावला अकेला नहीं गया था। उसके साथ उसका कोई विश्वासपात्र व्यक्ति था।"

"कौन ?"

"जैसे तुम ?"

उसने फिर आहत भाव से मेरी तरफ देखा।

"या कोई और।" - उसे तसल्ली देने के तौर पर मैंने जल्दी से कहा। वह खामोश रही। तुम्हारी जानकारी के लिए तुम्हारा पति राजेंद्रा प्लेस एलैग्जैण्डर से ही मिलने गया था।"

"अच्छा !"

"अब सवाल यह पैदा होता है कि यहां तुम्हारे पति की स्टडी में इस आदमी को किस चीज की तलाश थी ? जो भी चीज वह थी, यह तो जाहिर है कि वह इसे अभी हासिल नहीं हुई है । हुई होती तो वह इसके पास से बरामद होती ।। लेकिन वह चीज निश्चय ही एलैग्जैण्डर के लिए महत्वपूर्ण थी और उसी वजह से ही शायद उसकी तुम्हारे पति से ठन गई थी। ऐसी चीज क्या हो सकती है?"

उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।

 
मैंने स्टडी में चारों तरफ निगाह दौड़ाई ।।

"अपनी कोई महत्त्वपूर्ण चीज अगर चावला साहब कहीं रखते तो कहां रखते ?"

"मेज की दराज में ।"

तब मुझे ध्यान आया कि अंधेरे में जब मैं टेलीफोन सुन रहा था तो चौधरी मेज के पास ही कहीं था । दरवाजे तक वह

मेरे करीब से गुजरे बिना नहीं पहुंच सकता था, इसीलिए उसने मुझ पर आक्रमण किया था। मैं मेज की तरफ बढ़ा तो मेरी तवज्जो दीवार में जड़ी एक वाल-सेफ की तरफ गई ।

"इस सेफ में" - मैंने पूछा - "क्या रखते थे चावला साहब ?"

"कुछ भी नहीं" - वह बोली - "इसमें सिर्फ मेरे जेवरात हैं।"

"आई सी ।"

मैंने मेज का मुआयना किया तो उसका ताला टूटा पाया। "चौधरी कोई मामूली चोर नहीं" - मैं बोला - "यह बात इससे भी साबित होती है कि इसने इस सेफ की तरफ तवज्जो नहीं दी जिसमें से इस जरूर लाखों का माल हासिल हो सकता था। इसका मेज का ताला तोड़ना साबित करता है। " कि जिस चीज की इसे तलाश थी, उसके मेज में होने की इसे ज्यादा उम्मीद थी ।" - मैं चौधरी की तरफ घूमा - "तुम तो बताओगे नहीं कि तुम्हें किस चीज की तलाश थी ?"

उसने मजबूती से दांत भींच लिए। मैं मेज के पीछे बैठ गया। मैंने उसका पहला दराज खोला और बारीकी से उसमें मौजूद सामान टटोलना आरम्भ किया।

"फोन किसका था ?" - एकाएक मैंने बीच में सिर उठाकर पूछा ।। तब शायद उसे पहली बार सूझा कि उसने मुझे बाहर ड्राइंगरूम में नहीं भीतर स्टडी में पाया था।

"ओह !" - वह तनिक तिरस्कारपूर्ण स्वर में बोली - "तो स्टडी में तुम्हारे कदम इसलिये पड़े थे।"

"किसलिए पड़े थे ?"

“यहां लगे पैरेलल टेलीफोन पर होता वार्तालाप सुनने के लिए।

" मैं खामोश रहा।

"जब तुम फोन सुन ही रहे थे तो मुझसे क्या पूछते हो फोन के बारे में?"

"बहरहाल मेरी उस हरकत का अंजाम तो अच्छा ही निकला । मैं स्टडी में न आता तो मुझे इस शख्स की खबर न लगती । फिर शायद यह वह चीज चुराने में कामयाब भी हो जाता जिसे चुराने के लिए वह यहां आया था । और फिर मैं फोन पर कोई अहम बात सुनने में कामयाब भी नहीं हो सका था । मैने तो अभी रिसीवर थामा ही था कि इस आदमी ने मुझ पर हमला कर दिया था । किसका फोन था ?"

"कोई औरत थी ।

अपना नाम नहीं बताया था उसने ।" "क्या कह रही थी ?"

"चावला साहब को पूछ रही थी। मैंने कहा था वे कोठी पर नहीं है तो पूछने लगी, कब लौटेंगे। मैंने पूछा, वह कौन थी तो कहने लगी कि वह चावला साहब की सेक्रेटरी थी जो कि सफेद झूठ था । मैंने उसे ऐसा जताया तो उसने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।"

"तुम्हारा कोई अंदाजा कि हकीकत वह कौन थी ?"

"अंदाजा है। किसी बुनियाद पर अंदाजा है। मुझे वह आवाज पहचानी हुई लगी थी।"

"जूही चावला की ?"

"हो ।”

"इतनी रात गए क्यों फोन किया होगा उसने चावला साहब के लिये ?"

"क्या पता क्यों किया था ! मुमकिन है" - वह विषभरे स्वर में बोली - "उसे नींद न आ रही हो और वह उन्हें आकर साथ सोने के लिए बुला रही हो या फोन पर लोरी सुनना चाहती हो !"

 
पहले दराज में मुझे कोई दिलचस्पी के काबिल चीज न मिली तो मैंने दूसरा, बीच का दराज खोला और उसका पोस्टमार्टम आरम्भ किया। "चावला साहब" - एकाएक मैंने पूछा - "अपनी रिवॉल्वर कहां रखा करते थे ?"

"इसी मेज के किसी दराज में।”

"कौन से दराज में ?"

"यह मुझे नहीं मालूम ।"

"यहां से रिवॉल्वर निकालते वक्त तो मालूम हो गया होगा ?"

"फिर आ गए एक आने वाली जगह पर । मिस्टर, इस मेज को हमेशा ताला लगा होता था और इसकी चाबी मेरे पति के पास, सिर्फ मेरे पति के पास, होती थी ।" मैं खामोश रहा । मैंने सबसे नीचे का दराज खोला।। उसमें से वह चीज बरामद हुई जिसकी निश्चित ही चौधरी को तलाश थी।

वह एक लाल जिल्द वाली, डायरी के आकार की, लैजर थी जिस पर जान पी एलैग्जैण्डर एण्टरप्राइसिज छपा हुआ था । उसका मुआयना करने पर मुझे लगा कि वह लैजर ही गैंगस्टर सम्राट की कम्पनी की थी। उस पर लिखा । हिसाब-खाता बहुत प्राइवेट था । तारीखों के साथ उसमें केवल आमदनी की प्रविष्टियां थी, खर्चे के कालम उसमें तमाम के तमाम खाली थे।" निश्चय ही वह एलैग्जैण्डर का कोई बहुत खुफिया हिसाब खाता था जो पता नहीं कैसे चावला के हाथ लग गया था

मैंने उसके कुछह पन्ने पलटे । एक स्थान पर एक प्रविष्टि के गिर्द मुझे एक लाल दायरा खिंचा दिखाई दिया। उसी दायरे में एक नाम था और एक रकम थी । नाम शैली भटनागर था और रकम बीस हजार रूपये की थी। मुझे उस लैजर में ब्लैकमेलिंग की बू आने लगी ।

और चावला शायद ब्लैकमेलर को ब्लैकमेल कर रहा था। मैंने लैजर अपने कोट की जेब में डाल ली। चौधरी बहुत गौर से मेरी हर हरकत का मुआयना कर रहा था।

"यह क्या है?" - कमला संदिग्ध भाव से बोली।

"कोई खास चीज नहीं ।" - मैं लापरवाही से बोला - "मामूली लैजर बुक है । मैं घर जाकर बारीकी से इसका मुआयना करूगा ।"

"लेकिन..."

"तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं ? इतनी मामूली चीज का भरोसा नहीं ?"

वह खामोश हो गई।

"तुम अपने के किसी भटनागर नाम के वाकिफकार को जानती हो ?"

"एक शैली भटनागर को मैं जानती हूं।"

"कौन है वो ?"

"पब्लिसिस्ट है । नगर की बहुत बड़ी एडवर्टाइजिंग एजेंसी का मालिक है । मूवी एन्ड फिल्म उसकी स्पेशलिटी है।"

"तुम कैसे जानती हो उसे ?"

"अपने पति की वजह से ही । वह यहां अक्सर होने वाली पार्टियों में जो लोग अक्सर आते थे, उनमें एक शैली, भटनागर भी था।"

"चावला साहब की अच्छी यारी थी उससे ?"

"हां । अच्छी यारी थी। दोनों घुड़दौड़ के शौकीन थे। एक घोड़ी में" - उसके स्वर में विष घुल गया - "खास तौर से उन दोनों की दिलचस्पी थी।"

"कोई खास घोड़ी है वो ?"

"हां । बहुत खास ।

” "कौन ?"

"जूही चावला ।"

"ओह !"

तभी कॉल बैल बजी ।

“पुलिस आई होगी" - मैं बोला - "जाकर दरवाजा खोलो।"

वह चली गई ।

मैंने अपने ताबूत की एक नई कील सुलगाई और सोचने लगा। अब मुझे गारंटी थी कि चौधरी वह लैजर बुक चुराने के लिए ही वहां भेजा गया था। इसका मतलब था कि एलेग्जैण्डर को मालूम था कि चावला मर चुका था। इतनी जल्दी इस बात की खबर उसे कैसे हो सकती थी ? तभी हो सकती थी जबकि उसने कत्ल खुद किया हो या करवाया हो। लेकिन कत्ल का ढंग एलेग्जैण्डर जैसे गैंगस्टर की फितरत से मेल नहीं खाता था । अगर चावला की लाश गोलियों से छिदी किसी गली में पड़ी पाई गई होती या उसका क्षत-विक्षत शरीर यमुना में से निकाला गया होता या वह हिट एंड रन का शिकार हुआ होता तो उसकी मौत में एलैग्जैण्डर का हाथ होना समझ में आ सकता था। हत्या यूं करना, कि वह मोटे तौर पर आत्महत्या लगे, एलेग्जेंडर की फितरत से मेल नहीं खाता था।

 
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