• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
“सोहनलाल।” नानिया कह उठी—“ये मुझे देखकर मुस्कराता है।"

"तेरा भाई है। बहन पर प्यार तो आएगा ही।"

“भाई।" सपन चड्ढा ने लक्ष्मण दास को देखा।

"ठीक ही तो कह रहा है सोहनलाल ।” लक्ष्मण दास ने जल्दी से कहा—“तेरी बहन तो है ये।" ___

“फिर तो तेरी भी होगी।” सपन चड्ढा ने चिढ़कर कहा। ___

“मेरा क्या है। मैं तो संसार को त्यागने की सोच रहा हूं। रिश्तों में मेरा कोई विश्वास नहीं।” ।

___ "त...त... " सपन चड्ढा ने कहना चाहा।

“चुप कर।" लक्ष्मण दास ने कहा फिर जगमोहन-सोहनलाल से बोला—“तुम लोग यहां कैसे?" ___

“हम...हम महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर आ गए थे।" जगमोहन ने सोच-भरे स्वर में कहा— “उस वक्त हम जथूरा के पास जाने के लिए नदी पार कर रहे थे। मगरमच्छों ने हमें अपने जबड़ों में कस लिया। इसके साथ ही हम बेहोश हो गए। उसके बाद

अब होश में आया तो तुम लोगों को सामने पाया।"

“ये जगह कहां पर है?" सोहनलाल ने पूछा।

"हम तो इतना जानते हैं कि ये कालचक्र है। सब जगह एक जैसी है।" सपन चड्ढा ने कहा।

“तुम लोग यहां कैसे आ गए?"

“ये मोमो जिन्न ही हमें चक्कर घिन्नी की की तरह घुमाए जा रहा है। जिधर चाहता है हमारा स्टेयरिंग उधर ही मोड़ देता है। लगता है जब तक हमारी जान नहीं निकलेगी, ये हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा।" लक्ष्मण दास बोला। ___

"लेकिन तुम लोग महाकाली की मायावी पहाड़ी में आए क्यों?"

“बताया तो मोमो जिन्न खींचे जा रहा है हमें। कहता है देवा-मिन्नो को हमारी सहायता की जरूरत पड़ सकती है।” सपन चड्ढा ने लम्बी सांस लेकर कहा—“भला जिन्न से कोई पूछे कि हम देवराज चौहान की सहायता करने के लायक ही कहां हैं।"

"देवराज चौहान कहां है?"

"वो भी इसी तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर है। सब ही भीतर हैं। हम जरा उनके पीछे रह गए। वरना उनके साथ ही होते।"

“मुझे बताओ, क्या हुआ था। देवराज चौहान से अलग हुए मुझे बहुत देर हो गई है।"

"जानता हूं। तुम्हें कालचक्र ने अपने में फंसा लिया था और तुम्हारी जगह मखानी, जगमोहन बन के आ गया।” (ये जानने के लिए पढ़ें राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित अनिल मोहन का उपन्यास 'पोतेबाबा' ।)

“ओह ।” जगमोहन के होंठ भिंच गए। ___

“सब बातें बताओ।” सोहनलाल बोला—“हम इन बातों से अंजान हैं।”

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने सब कुछ बताया। जगमोहन, सोहनलाल जो नहीं जानते, वो अब जान चके थे।

"तो ये हआ देवराज चौहान-मोना चौधरी और बाकी सब के साथ।” जगमोहन सोच-भरे स्वर में कह उठा।

“तुम जानते हो कि जथूरा कहां पर कैद है?" सपन चड्ढा ने पूछा।

"नहीं। हमें इतना ही पता है कि वो पूर्व दिशा में कहीं पर है।"

“वो पक्का नहीं, बूंदी ने बताया था।” सोहनलाल बोला।

"बूंदी?" जगमोहन की नजरें घूमीं—“वो कहां है?" सोहनलाल और नानिया ने भी हर तरफ देखा। परंतु बूंदी कहीं न दिखा।
 
“लगता है, वो हमारे पास नहीं है।” नानिया बोली।

“वो तो कहता था कि हमारे पास ही रहेगा।"

"कौन है बूंदी?" लक्ष्मण दास ने पूछा। जगमोहन ने उन्हें कम शब्दों में बूंदी के बारे में बताया।

"इसका मतलब तुम लोगों के साथ भी मोमो जिन्न की तरह, कोई हरामी चिपका हुआ है।” सपन चड्ढा ने कहा।

नानिया ने मोमो जिन्न को देखते हुए कहा। “ये जिन्न हमारे पास क्यों नहीं आ रहा?"

“ये बोत हरामी है।" लक्ष्मण दास बोला।

"क्या मतलब?"

"दूर रहकर ही, ये मजे से हमारी बातें सुन रहा है। हमारे कानों में सैंसर लगा रखे हैं। हम जो भी बातें करेंगे, सुनेंगे वो इसे भी सुनाई देगी। बोत पौंची हुई चीज है। कहता है मैं झूठ नहीं बोलता, लेकिन पक्का हरामी है, झूठ के अलावा कुछ भी नहीं कहता। हमें यार कहता था और कपड़े उतारकर नंगा घुमाने को कहता है। इसका कोई भरोसा नहीं कि कब क्या कर दे।"

"लेकिन ये हमें नुकसान नहीं पहुंचाएगा।” नानिया कह उठी।

"क्यों?”

“ये जथूरा का सेवक है और हम जथूरा को आजाद कराने ही महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी में आए हैं।” __

“हमसे जथूरा महान है, बुलवाता रहता है। पता नहीं कि कितना महान है जथूरा।" सपन चड्ढा ने कड़वे स्वर में कहा।।

“इस जिन्न से बात करते हैं।” सोहनलाल ने कहा—“जथूरा तक पहुंचने में ये हमारी सहायता कर सकता है।"

“ये कुछ नहीं जानता।" लक्ष्मण दास कह उठा—“हमें बता चुका है ये बात।"

“फिर भी... " तभी नानिया कह उठी।

“वो रहा बूंदी।"

सबकी निगाह उस तरफ घूमी। बूंदी एक पेड़ के नीचे छाया में सुस्त मुद्रा में बैठा हुआ था।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं। “लक्ष्मण। ये बूंदी हमें बाहर जाने का रास्ता बता सकता है।"

"हां। इसे सब रास्तों का पता होंगा।"

"बूंदी की बातों में मत फंसना।” जगमोहन ने कहा। दोनों ने जगमोहन की बात को अनसुना कर दिया। तभी मोमो जिन्न पास आ पहुंचा और दोनों से बोला।

"कहो, जथूरा महान है।"

"फिर आ गया तू... ।” सपन चड्ढा ने कहना चाहा।

“बोलो, वरना मुझे गुस्सा...।"

“जथूरा महान है।” दोनों ने एक साथ कहा।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने एक दूसरे को देखा। आंखों में इशारे हुए फिर बूंदी की तरफ बढ़ गए।

दोनों पेड़ की छाया में बूंदी के पास पहुंचे।

“नमस्कार भैया।” लक्ष्मण दास ने शराफत से कहा।

"अच्छा हुआ जो तुम दोनों मेरे पास आ गए।"

"क्यों?"

"मैं अकेला बेचैन हो रहा था। कोई मेरे से बातें करने वाला नहीं था।" बूंदी ने उदास स्वर में कहा।

“तुम उदास मत होवो। हम हैं न, तुम्हारे पास, क्यों लक्ष्मण।"

“हां-हां, हम तुम्हारे यार हैं।"

"बैठ जाओ खड़े क्यों हो।" बूंदी ने कहा।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा बैठ गए।

"ये कितना अच्छा इंसान है।" लक्ष्मण दास ने सपन चड्ढा से कहा।

"हां, हमें पहली बार इतना अच्छा इंसान मिला है। किस्मत वाले हैं हम।" ___

“मुझे भी तुम दोनों बहुत शरीफ लगे हो।” बूंदी ने कहा।

"देखा सपन, शरीफ-शरीफ को कितनी जल्दी पहचान जाता



___ “सच में मोमो जिन्न ने तो हमें पागल कर दिया था। बूंदी भाई, तुम इस मोमो जिन्न से हमें छुटकारा दिला दो।”

"मैं घटिया जिन्नों से बात नहीं करता।"

“सच में वो बोत घटिया जिन्न है।"

“तुम उससे हमें छुटकारा दिला दो।"

"मैं जिन्न के मामले में नहीं आता और जिन्न मेरे मामले में नहीं आता। हम एक-दूसरे को पसंद नहीं करते।”

“खानदानी दुश्मनी है?"

"महाकाली के सेवकों और जिन्नों के ग्रह नहीं मिलते। महाकाली जिन्नों को जरा भी पसंद नहीं करती।"

"समझदार है महाकाली।” सपन चड्ढा ने सिर हिलाया।

“तुम तो महाकाली की मायावी पहाड़ी के सारे रास्ते जानते हो।"

"हां, सब जानता हूं।"

"हमें बाहर जाने का रास्ता बता दो। हम जिन्न से दूर चले जाना चाहते हैं।”

“बाहर जाने के दो रास्ते बताऊंगा। उसमें एक सही होगा और एक गलत।"

"ये क्या हआ?"

"मैं दो बातें एक साथ ही करता हूं। एक गलत, एक सही, चुनना तुम लोगों ने है।" *

“बताओ तो कैसे हम इस मायावी पहाड़ी से बाहर जा सकते

“सामने जो नदी है उसमें कूद जाओ। या तो तुम दोनों को मगरमच्छ खा लेंगे या तुम दोनों मायावी पहाड़ी से बाहर पहुंच जाओगे।"

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा हड़बड़ा गए।

“नदी में कूद जाएं?"

"मगरमच्छ भी हैं वहां।" बूंदी ने मुस्कराकर दोनों को देखा।

"हमें तो तैरना भी नहीं आता।"

“उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।" बूंदी ने कहा।

"क्यों?"

"हो सकता है तुम दोनों के डूबने से पहले ही, मगरमच्छ ही तुम दोनों को खा लें।”

सपन चड्ढा ने लक्ष्मण दास को देखकर कहा।

“सुना तने। ये हमारा शुभचिंतक है। हमें मायावी पहाड़ी से बाहर जाने का रास्ता बता रहा है।"

"इससे अच्छा तो मोमो जिन्न ही है, जो हमें सीधा मौत का रास्ता तो नहीं बताता।"

दोनों उसी पल उठ खड़े हुए।

“जा रहे हो मुझे अकेला छोड़कर।" बूंदी ने उदास स्वर में कहा।

"तू हमें बाहर जाने का रास्ता नहीं बताता तो हम तेरे पास बैठकर तेरा दिल क्यों बहलाएं।” ___

"तु हमें मायावी पहाड़ी से बाहर निकाल दे, हम तेरी गोद में बैठकर, तेरे साथ खेलेंगे।"

“सच?" बूंदी खुश हो उठा।

“हां, तेरा पूरा खयाल रखेंगे। बता रास्ता?"

“नदी में कूद जाओ। या तो मगरमच्छ खा लेंगे, या नदी तुम दोनों को पहाडी के बाहर पहंचा देगी।"

"चल सपन। इसका चक्का तो जाम हो गया लगता है।" दोनों पलटे और जगमोहन की तरफ बढ़ गए।"

जब लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा, बूंदी की तरफ गए तो जगमोहन, सोहनलाल व नानिया ने मोमो जिन्न को देखा।

मोमो जिन्न मुस्कराया।

"तुम जानते हो हमें?" जगमोहन ने पूछा।

“बहुत अच्छी तरह से। तुम जग्गू हो। ये गुलचंद और ये कालचक्न की रानी साहिबा, यानी कि नानिया।"

"तुम यहां कैसे पहुंचे?"

"मुझे जथूरा के सेवकों ने बताया कि तुम लोग यहां बेहोश हो।"

“जथूरा के सेवक महाकाली की मायावी पहाड़ी के भीतर कैसे देख सकते हैं?" जगमोहन ने पूछा।

"यूं तो वो महाकाली की पहाड़ी के भीतर नहीं देख सकते। परंतु जहां-जहां हम लोगों के कदम पड़ते जाएंगे, सैटलाइट पर उन लोगों को वहां-वहां की तस्वीरें मिलती जाएंगी।” मोमो जिन्न ने कहा।

“ऐसा कैसे सम्भव है?”

"बहुत आसान है जथूरा के सेवकों के लिए ये सब । तुम सब के ग्रहों को प्रोग्राम करके, उस चिप को उन्होंने, सैटलाइट से सीधे वास्ता रखती चिप से कनैक्शन दे दिया। इस तरह सैटलाइट तुम लोगों की खबरें, जथूरा के सेवकों के सामने लगी स्क्रीनों पर दे रहा है।"

"सैटलाइट की पहुंच पहाड़ी के भीतर तो नहीं है।" ___

“सैटलाइट ग्रहों से तुम लोगों की गतिविधियां पकड़कर भेजता है।" मोमो जिन्न ने कहा।
 
__ "सैटलाइट तुम लोगों ने कब बनाया?" सोहनलाल ने पूछा।

“जथूरा महान है।" मोमो जिन्न मुस्करा पड़ा— “उस जैसा दूसरा कोई नहीं।"

" "मैंने कोई सवाल पूछा है।” सोहनलाल की निगाह मोमो जिन्न पर थी। ___

“जथूरा बहुत बड़ा वैज्ञानिक भी है। सैटलाइट जैसी चीज बनाए उसे साठ बरस से ज्यादा हो गए।” ___

“जथूरा जिन्नों का भी मालिक है। तंत्र-मंत्र में भी माहिर है और विज्ञान में भी उस्ताद है।"

"हां।"

"क्या अजीब दुनिया है ये।” ।

"विज्ञान से वास्ता रखती बहुत चीजें बना रखी हैं जथूरा ने। उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। जथूरा अगर कैद में न पड़ गया होता तो अब तक उसने नगरी की सूरत बदल देनी थी। परंतु सोबरा की चाल ने जथूरा को फंसा दिया।"

नानिया देर से मोमो जिन्न को देखे जा रही थी फिर कह उठी।

“तुम कैसे जिन्न हो?"

"क्यों—क्या मैं जिन्न नहीं लगता?"

"नाक में नथनी। कानों में टॉप्स और।"

“ये ही जिन्न की पहचान है।" मोमो जिन्न कह उठा—“हमें सबसे अलग दिखना पड़ता है। हमारी जात सबसे अलग है।"

“अब काम की बात करें?" जगमोहन बोला।

"करो।”

“तुम्हें मालूम होगा जथूरा कहां पर कैद है?"

"नहीं मालूम।"

“तुम्हारा सैटलाइट तो पता लगा सकता है कि जथूरा... "

“जथूरा के ग्रहों को प्रोग्राम करके, सैटलाइट द्वारा उसके बारे में जानने की कई बार चेष्टा की गई, परंतु सैटलाइट उसके ठिकाने को नहीं पकड़ पाया। शायद जथूरा को महाकाली ने बेहद सुरक्षित जगह पर रखा है।” मोमो जिन्न ने कहा।

"तो हम कैसे जथूरा तक पहुंचेंगे?"

“इस बारे में बूंदी बताता है। एक गलत, एक सही। उनमें से एक को चुनना पड़ता है।" जगमोहन ने कहा।

"हम उसकी कही सही बात को चुनने की चेष्टा करेंगे। तुम उससे बात करो।"

"तुम ही उससे क्यों नहीं बात करते।"

“मैं घटिया लोगों से बात नहीं करता। जिन्न हूं मैं।"

"बूंदी घटिया है?"

“हां। वो महाकाली का सेवक है। वो नहीं चाहता कि हम जथूरा तक पहुंचे। मेरे मालिक को उसने कैद कर रखा है। अब तक अपने असल रूप में सामने होता तो, मैं इसे मार चुका होता।" मोमो जिन्न ने कठोर स्वर में कहा।। ___

“तुम्हें कैसे पता कि बूंदी अपनी छाया के रूप में मौजूद है। तुमने तो अभी तक उसे छुआ नहीं।”

"जिन्न ऐसी चीजों को देखकर ही महसूस कर लेते हैं।" तभी लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा वापस आ गए।

"दोस्ती गांठ आए उससे?" मोमो जिन्न ने उन्हें देखते हुए, मुस्कराकर कहा।

“वो तो तुमसे भी बड़ा हरामी है।” सपन चड्ढा ने गहरी सांस ली।

"क्यों?"

"हमने पहाड़ी से बाहर जाने का रास्ता पूछा तो बोला नदी में कूद जाओ। या तो मगरमच्छ खा लेंगे या हम पहाड़ी से बाहर पहुंच जाएंगे।" __

"ऐसे दो-चार से और मिलोगे तो समझ जाओगे कि मोमो जिन्न जैसा शरीफ, दूसरा कोई नहीं।" ___

“हम तो फंस पड़े हैं। कोई टांगें खींचता है तो कोई गर्दन।"

लक्ष्मण दास ने मुंह लटकाकर कहा।

"कोई कुछ नहीं खींच रहा।” मोमो जिन्न मुस्कराया—“तुम दोनों यूं ही वहम में पतले हुए जा रहे हो।"

“सपन हम कितने कमजोर हो गए हैं।” लक्ष्मण दास ने कहा।

“इन हालातों में जिंदा हैं, ये क्या कम है।"

तभी जगमोहन उठता हुआ बोला। “मैं बूंदी से बात करता हूं।"

"वो यहीं आ रहा है।" नानिया कह उठी। सबकी निगाह बूंदी की तरफ उठी। वो पास आ पहुंचा था।

"अकेले में मेरा मन नहीं लग रहा था, सो यहां आ गया।” बूंदी ने मुंह लटकाकर कहा।

मोमो जिन्न ने अकड़ से मुंह दूसरी तरफ फेर लिया।

“मैं तुम्हारे पास ही आने वाला था।" जगमोहन बोला।

“कहो-कहो, मैं तुम्हारे किस काम आ सकता हूं?" बूंदी ने फौरन कहा।

“तुमने हमें बताया नहीं नदी में मगरमच्छ भी हैं।” जगमोहन बोला।

“नदी है तो मगरमच्छ भी होंगे। इसमें बताने की क्या बात है। पूछते तो मैं जरूर बताता।" बूंदी ने कहा।

"तुमने हमारे साथ चालाकी की।"

"ऐसा मत कहो। मैं तो महाकाली का आदेश मानकर तुम लोगों का बहुत खयाल रख रहा हूं।"

जगमोहन ने बूंदी को घूरा। बूंदी मुस्करा पड़ा। उसके पास पहुंचने पर बूंदी ने कहा।

"अब क्या है?”

“मैं दिशा भटक गया हूं।"

"ये मामूली बात है।"

“जथूरा तक पहुंचने के लिए किधर जाना चाहिए मुझे?"

“उत्तर दिशा में चलो यहां से। या तो जथूरा तक पहुंच जाओगे या महाकाली तक।”

“मुझे जथूरा के ही पास जाना है।"

“एक ही बात है। महाकाली तक पहुंचे तो वो तुम्हें जथूरा तक ले जाएगी।

“वो क्यों जथूरा तक ले जाएगी?"

"ये बात महाकाली से पूछना।" जगमोहन ने बूंदी को घूरा। बूंदी मुस्करा पड़ा।

"देवराज चौहान कहां है?"

“वो सब मजे में हैं। कुछ देर पहले ही ब्याह वाले घर में खाना खाया था उन्होंने।"

"क्या मतलब?”

"मैं ज्यादा नहीं बताऊंगा। मेरे लायक कोई सेवा हो तो कहो।"

"उत्तर दिशा किस तरफ है?" जगमोहन ने पूछा।

"उधर।" बूंदी ने एक तरफ इशारा किया—“परंतु वहां का सारा रास्ता मौसमों से भरा पड़ा है। कदम-कदम पर मौसम हैं। उधर । कभी आंधी-तूफान तो कभी तेज गर्मी। कभी सुहाना मौसम और कभी उमस । मौसमों से तुम्हें सावधान रहना होगा।"

"वो कैसे?"

“एक मौसम ऐसा है कि जिसमें कदम आगे बढ़ाओगे तो तुम सबकी दिशा बदल जाएगी। ऐसा मौसम जब आए तो सबको रुकना..."

“कौन-सा मौसम है ऐसा?" ।

“आंधी वाला भी हो सकता है, तूफान या उमस वाला भी हो सकता है। धूप वाला भी हो सकता है।"

"कोई तो होगा ही, मैं पूछ रहा हं कौन-सा है?"

“ये नहीं बताऊंगा।" बूंदी मुस्कराया—“खुद पहचान लेना।”

"मैं नहीं पहचान सकता।"

"तब तो उस मौसम में चलकर तुम्हारी दिशा बदल जाएगी। तुम सब मौत की घाटी में पहुंच जाओगे।" __

“तुम ठीक से पेश नहीं आ रहे।" ___

“जो मैं कर रहा हूं, यही मेरा कर्म है। महाकाली ने मुझे ऐसी ही आज्ञा दी है।”

“तुम जब भी कुछ बताते हो, उलझन में डाल देते हो।"

"मेरा सच जवाब भी, मेरी कही बातों में है। ढूंढ़ लो।" जगमोहन ने होंठ भींच लिए।

“एक शर्त पर मैं तुम्हें सही-सही रास्ता बता सकता हूं।"

“कहो।"

"मोमो जिन्न को अपने से अलग कर दो।"

“उससे तुम्हें क्या समस्या है?"

"अकडू है वो। देखा नहीं, मेरे पहुंचने पर कैसे उसने मेरी तरफ पीठ कर ली थी। मैं उसे पसंद नहीं करता।"

"तुमने उसके मालिक जथूरा को कैद कर रखा है।"

"मैंने नहीं, महाकाली ने।"

“एक ही बात है। तुम उसी के सेवक हो। उसका नाराज होना लाजिमी है।” ____

"मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि उसके हक में बात करो।” बूंदी ने उसे देखा।

"मैंने सच बात कही है।"

“ठीक है, जाओ, मैं नहीं बताता कि कौन-से मौसम में चलने से तुम लोगों की दिशा बदल जाएगी।”

“तुम बहुत घटिया हो।”

“महाकाली का सेवक हूं। सच्चा सेवक। मेरा पूरा परिवार महाकाली की सेवा में है।"

"तो यूं कहो कि सब ही कमीने हो।” बंदी मुस्कराकर उसे देखने लगा। जगमोहन वापस पहुंचा और सारी बात बताई।

"हमें उत्तर दिशा में ही जाना होगा।” जगमोहन ने कहा।

“लेकिन वहां मौसमों का असर... ।” सोहनलाल ने कहना चाहा। तभी मोमो जिन्न कह उठा।

“उसकी फिक्र मत करो। मौसम को पहचानने की ताकत मुझमें है।"

__ "तुम कैसे पहचानोगे?"

"जिन्न बनते समय मुझे मौसमों को पहचानने की शिक्षा दी गई है।"

“ओह।"

लक्षमण दास और सपन चड्ढा की नजरें मिलीं। सपन खिसककर लक्ष्मण के पास आया।

“यार हम तो मौसमों के चक्कर में बे-मौत मारे जाएंगे।” सपन चड्ढा ने कहा।

“कभी कश्ती भागती है तो कभी मौसम खराब हो जाता है। ये तो शुरुआत है, आगे जाने क्या होगा।"

"हमें इनके साथ नहीं जाना चाहिए।"

"हम यहीं रुक जाते हैं।"

“ठीक है।" सपन चड्ढा ने कहा। फिर ऊंचे स्वर में कह उठा—“हमने फैसला किया है कि हम यहीं पर हैं, वापसी पर हमें साथ ले लेना।" ___

“तुम फैसला करने वाले कौन होते हो।” मोमो जिन्न कठोर स्वर

में बोला—“तुम दोनों का मालिक मैं हूं।"

“तुम हमारे मालिक हो तो क्या हुआ, हम अपना फैसला तो ले सकते हैं।"

"मैं अभी तुम दोनों को नंगा...।" ।

"नहीं-नहीं।” लक्ष्मण दास हड़बड़ाकर बोला— “हम चलते हैं साथ में। चल सपन।”

“अब तो चलना ही पड़ेगा।” तभी सामने बैठा बूंदी कह उठा।
 
“तुम दोनों मेरे पास आ जाओ। बहुत खुश रहोगे।" । सपन व लक्ष्मण की नजरें मिली।

"वो ज्यादा खतरनाक है।” लक्ष्मण दास बोला—“अभी तो ये मोमो जिन्न ही ठीक है।

फिर वे सब उत्तर दिशा की तरफ बढ़ गए।

-

जंगल और घना होता जा रहा था। यहां तक कि पेड़ों के पत्ते जमीन को छू रहे थे। टहनियां नीचे तक झूल रही थीं। पेड़ों के ऊपरी हिस्सों पर टहनियां इस तरह फैली थीं कि आसमान नजर नहीं आ रहा था।

गुम जैसा वातावरण था यहां।

उनके कदमों के नीचे सूखी टहनियां आतीं तो चरमराहट की आवाज गूंज उठती। _

“सपन, मेरा तो दिल धड़क रहा है।” लक्ष्मण दास सपन चड्ढा से धीमे स्वर में बोला।।

"मुझे भी घबराहट हो रही है, कैसी भयानक जगह है ये।"

"हमारी दुनिया में तो ऐसी जगहें नहीं होती।"

"होती होंगी। हमने कौन-सा देखा है।"

“अब सोचता हूं कि नदी मे ही कूद जाते। क्या पता मगरमच्छों से बच ही जाते और इस जगह के बाहर पहुंच जाते।” __

"तब तो तेरे को वो बूंदी खतरनाक लगा था।"

“हां, पर अब मोमो जिन्न खतरनाक लग रहा है। ये अगर इंसान होता तो मैं इस पर केस कर देता।”

"जिन्नों पर केस नहीं हो सकता।"

“वो ही तो मैं कह रहा हूं।"

“फंस गए यार। मोमो जिन्न को मैं श्राप दे दूंगा कि अबकी बार वो इंसान बने और मैं जिन्न। तब साले को...।”

"कोई फायदा नहीं। तेरा श्राप कभी भी सफल नहीं होगा। हम साधारण इंसान हैं।”

"मैं हिमालय पर जाऊंगा। वहां तपस्या करते साधु रहते हैं, उनसे श्राप दिलाऊंगा। तब...।" ____

“उनका श्राप भी नहीं चलेगा। उनमें ज्यादातर चोर-उचक्के होते हैं। दो को तो मैं जानता हूं जो कानून से भागे हुए हैं और हिमालय पर जाकर धूनी रमा ली, फिर वहीं से अंडरवर्ल्ड को चलाने लगे।"

-

--

"तेरा मतलब हर तरफ मुसीबत ही मुसीबत है।"

"वो देख, पीछे बूंदी आ रहा है।" लक्ष्मण दास ने चलते-चलते तुरंत पीछे देखा। पीछे फासले पर बूंदी आ रहा था।

"ये तो हमारा पीछा कर रहा है।"

"हमारा क्यों करेगा। हम तो शरीफ लोग हैं।" सपन चड्ढा ने कहा- "मैं मोमो जिन्न को बताता हूं।"

सपन चड्ढा आगे जाते मोमो जिन्न के पास पहुंचकर बोला। "बंदी पीछे आ रहा है।"

“आने दो।" मोमो जिन्न ने पीछे नहीं देखा।

“उसके इरादे ठीक नहीं लगते।” सपन चड्ढा ने पुनः कहा।

"तुम फिक्र मत करो।”

“वो हमें मार देगा।”

"मेरे होते वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मैं जानता हूं कि वो किसी पर हमला नहीं करेगा।"

__ "क्यों?"

“करना होता तो वो बेहोश पड़े जग्गू, गुलचंद और नानिया को ही जिंदा क्यों छोड़ता।"

"वो मुझे और लक्ष्मण को मारेगा। क्योंकि हम उसकी बात मानकर नदी में नहीं कूदे। मुझे डर लग रहा है।"

"मेरे होते हुए डरो मत।" सपन चड्ढा ने गहरी सांस ली। पीछे से लक्ष्मण दास पास पहुंचा।

"क्या कहता है?"

“तसल्लियां दे रहा है।” सपन चड्ढा बोला—“लगता है हमारे साथ बहुत बुरा होने वाला है।"

लक्ष्मण दास ने चलते-चलते पीछे देखा तो कह उठा।

"अब वो पीछे नहीं है।" सपन चड्ढा की नजरें पीछे गईं।

"कोई नया चक्कर चलाने गया होगा। देखना वो हमारी जान ले के रहेगा।"

चलते-चलते उन्हें काफी वक्त बीत गया।

“मैं तो थक गया।" सपन चड्ढा बोला।

"सीधे चलो।" मोमो जिन्न ने कठोर स्वर में कहा—“वरना नंगा करके... "

“ठीक है, ठीक है। चल तो रहे हैं।” सपन चड्ढा उखड़े स्वर में बोला—“दूसरों को नंगा करने का तुम्हें ज्यादा शौक है। तुम्हारे पास तो वो सब सामान है नहीं, जो दूसरों के पास है। इसी कारण तुम हमसे जलते हो।” –

"खामोश हमें उस सामान की जरूरत नहीं पड़ती। हम सिर्फ चूम के ही काम चला लेते हैं।"

"चूम के? किसे चूमते हो तुम?"

"ये नहीं बताऊंगा, ये जिन्न जाति का बेहद व्यक्तिगत रहस्य है।" लक्ष्मण दास सपन चड्ढा के कान में बोला।।

"ये कहीं हमें चूमने का मौका तो नहीं ढूंढ़ रहा?"

“चुप रहो। इंसानों को चूमने का मैंने सोचा भी तो जिन्न बिरादरी मुझे बोतल निकाला दे देगी।"

"बोतल निकाला।

“हां, हम बोतलों में बंद होकर ही आराम करते हैं। वहीं हमें आराम मिलता है। फिर मुझे रहने को कोई बोतल नहीं मिलेगी।”

“बोतल तो तुम्हें हम दे देंगे।"

“वो बोतल नहीं। जिन्नों की बोतल खास होती है। बेहद आरामदेह । चौड़ी, लम्बी, खास खुशबू-भरी रहती है उसमें।” मोमो जिन्न ने कहा—“तुम लोग मुझसे बातें बहुत कर रहे हो, जबकि मुझे बातें करना जरा भी पसंद नहीं।” __

“अब तो नवाब बन गया है तू।" सपन चड्ढा भुनभुनाया।

“खबरदार जो मुझे नवाब कहा। मैं जिन्न हूं। पक्का जिन्न। जिन्न जात है मेरी।

“मान गए यार—मान गए—तुम... "

“खबरदार जो मुझे यार कहा। जिन्न किसी का दोस्त नहीं होता। जिन्न सिर्फ जिन्न होता है।"
 
लक्ष्मण दास ने सपन चड्ढा का हाथ दबाकर कहा।

"चुप कर, क्यों मुसीबत को गले में डालता है।" फिर वो वक्त भी आया जब वो घना जंगल पार हो गया।

वे खुले में निकल आए।

सामने ही तेज बरसात हो रही थी। मूसलाधार बरसात। इतनी तेज कि उसके उस पार देख पाना सम्भव ही नहीं था। मोटी-मोटी बूंदें। आसमान में जैसे पानी की लकीरें बहती नजर आ रही थीं। -

"क्या तूफानी बरसात है सोहनलाल ।” नानिया ने सोहनलाल से कहा— “मुझे बरसात अच्छी लगती है।" ..

सोहनलाल ने मुस्कराकर नानिया को देखा।

“मुझे भी बरसात अच्छी लगती है।” लक्ष्मण दास पीछे से कह उठा। ___

“तेरे से में बात नहीं कर रही। मैं तो अपने सोहनलाल से बात कर रही हूं।” नानिया ने मुंह बनाकर कहा।

“तू क्यों आगे-आगे हो रहा है।" सपन चड्ढा कह उठा—“उसके पास है।"

“क्या है?"

“मर्द । देख उसका हाथ पकड़ा हुआ है।" जगमोहन मोमो जिन्न से बोला।

“सामने बहुत तेज बरसात है।"

“यहां से मौसमों वाला रास्ता शुरू हो रहा है।” मोमो जिन्न ने कहा—“सामने पहला मौसम है बरसात का।" ।

"तो हमें इस मौसम में प्रवेश करना चाहिए कि नहीं?" जगमोहन ने पूछा।

"मैं पहचान कर चुका हूं बरसाती मौसम की। इस मौसम से हमें दिशा भटक जाने का कोई खतरा नहीं है।"

“बहुत खतरा है।" पीछे से बूंदी की आवाज आई। सबने पीछे देखा। बूंदी आंखें नचाता खड़ा था।

"ये भूत की तरह कहां से आ गया?" सपन चड्ढा बोला।

“शुभ-शुभ बोल।" लक्ष्मण दास कह उठा—“कहीं ये सच में भूत न हो।"

"लगता तो नहीं।"

"क्या खतरा है?" नानिया ने बूंदी से पूछा।

"रास्ता भटक जाओगे।” बूंदी मुस्कराकर बोला। जगमोहन ने कठोर नजरों से देखा।

“तुम हमेशा दोगली बातें क्यों करते हो?" सोहनलाल ने कहा।

“महाकाली का ये ही आदेश है। मौसमों वाले रास्ते में प्रवेश कर रहे हो। एक मौसम तो ऐसा है ही, जिसे पार करने की चेष्टा करोगे तो उसी वक्त दिशा बदल जाएगी तुम लोगों की। रास्ता तो भटकोगे ही।" बंदी ने मुस्कराकर कहा—“भटकना ही पड़ेगा। किसी के चक्कर में मत पड़ो। ये तुम्हें बचा नहीं सकेगा।" ___

“मोमो जिन्न की बात कर रहे हो।" जगमोहन बोला।

“नाम क्या लूं किसी का। तुम तो वैसे ही बहुत समझदार हो जग्गू।"

मोमो जिन्न ने बूंदी की तरफ पीठ कर ली।

"मोमो जिन्न साथ हो या न हो, रास्ता तो तब भी हम भटकेंगे ही। क्योंकि तुम हमारी सहायता नहीं कर रहे।" ।

"मैं पूरी तरह तुम लोगों के साथ हूं।"

"तो बताओ रास्ता भटकने से कैसे बचेंगे?"

"बच भी सकते हो और नहीं भी बच सकते। मौसमों के रास्ते पार करके देख लो।" __

“ये क्या नई बात बता रहे हो। एक बात तो होगी ही।” नानिया ने तीखे स्वर में कहा।

“वो ही तो मैंने बताया है।" बूंदी हंसा—“

किसी के चक्कर में मत पड़ो।" तभी मोमो जिन्न कह उठा।

"चलो अब हम आगे चलेंगे। इसके साथ ही मोमो जिन्न चल पड़ा।

बाकी सब उसके पीछे चल पड़े।

"तुम नहीं आओगे?" लक्ष्मण दास बंदी से बोला।

“जाने दे इसे। क्यों पीछे आने को कहता है।” सपन चड्ढा ने कहा।

वे सब बरसात के मौसम में प्रवेश करते चले गए।

बूंदी भी बरसात के मौसम में प्रवेश कर गया। अगले ही पल बरसात की बूंदों से उसकी आकृति छिन्न-भिन्न होने लगी। बरसात की बूंदें उसकी आकृति को मिटाने की चेष्टा कर रही थीं। परंत आकृति पुनः बनने की चेष्टा करती। हर पल जैसे उसकी आकृति खंडित होने को हो रही थी।

बरसात सच में बहुत तेज थी। सिर पर हाथ रखकर वे बूंदों से बचने की चेष्टा कर रहे थे। तभी सपन चड्ढा ने पीछे देखा बूंदी की तरफ।

बूंदी की आकृति को खंडित होते देखकर वो बरसात में ऊंचे स्वर में बोला। ___ "बूंदी को क्या हो रहा है देख तो लक्ष्मण।"

“बरसात ने बुरा हाल कर रखा है। वो क्या छोकरी है जो मैंने उसे देखना है।" लक्ष्मण दास ऊंचे स्वर में कह उठा।

साथ चलते जगमोहन ने बूंदी की तरफ नजर मारी फिर कह उठा।

"इस वक्त वो हमारी तरह के शरीर वाला इंसान नहीं है।"

"क्या मतलब?” सपन ने पूछा- "इंसान नहीं है?"

“वो इंसान के प्रतिरूप में, छाया में हमारे साथ है। वो सिर्फ देखने में इंसान लगता है।"

"ऐसा भी होता है क्या?" __

"होता नहीं है, परंतु महाकाली ने अपनी शक्तियों के दम पर, बूंदी को ऐसा रूप दे रखा है कि वो हमारे साथ रहकर हम पर नजर रख सके, या जो भी वो करना चाहते हैं, वो कर सके। परंतु हम उस पर काबू ना पा सकें।" जगमोहन ने बताया।

"कितनी अजीब बात है।" तेज बरसात में वे सब बुरी तरह भीग रहे थे। चलना दुश्वार हो रहा था। देर तक यही आलम रहा। फिर बरसात का मौसम खत्म हो गया।

उन्होंने खुद को खुली जगह में पाया। तेज सूर्य निकला हुआ था। धूप एकाएक शरीरों को चुभने लगी। आंखें चौंधिया-सी गई थीं सूर्य की रोशनी में।

"कितनी गर्मी है।" नानिया कह उठी।

"बुरा हाल है।” सोहनलाल चेहरे पर हाथ फेरता कह उठा।

जगमोहन ने मोमो जिन्न को देखा, जो कि हर तरफ नजरें घुमा रहा था।

"तेज बरसात के बाद अब तेज धूप हो गई।” सपन चड्ढा बोला—“नर्क जैसा लग रहा है।"

“पीठ पर खुजली हो रही है। तेरे को भी हो रही है क्या?"

“जरूरी है क्या, जो तेरे को हो, वो मेरे को भी हो।" सपन चड्ढा चिढ़ा-सा कह उठा।

तभी मोमो जिन्न पलटा और पीछे खड़े बूंदी को देखा। उसे अपनी तरफ देखते पाकर बूंदी मुस्करा पड़ा। मोमो जिन्न ने चेहरा घुमा लिया। “ये मौसम कैसा है?" जगमोहन ने मोमो जिन्न से पूछा।

"इस मौसम से भी दिशा भटकने का कोई खतरा नहीं है।" मोमो जिन्न ने कहा।

"फिर तो हमें चलना चाहिए।" जगमोहन ने कहा।

"चलो...चलो।” सपन चड्ढा बोला—“मुझे बहुत गमी लग रही है।"

___ “रास्ता भटक जाओगे। किसी पर विश्वास न करो।” पीछे से बूंदी कह उठा।

उसकी बात की परवाह न करके, वो सब आगे चल पड़े।

“सोहनलाल, ये पागल सा बूंदी उल्टा-पुल्टा क्यों बोलता रहता है?" नानिया ने कहा। ____

“वो पागल नहीं है। उसके इस प्रकार से बोलते रहने में भी कोई रहस्य है, जो हम समझ नहीं रहे।"

"ये बात तुमने कैसे कह दी?"

"मेरा मन कहता है।"

गर्मी में चलना मुहाल हो रहा था। परंतु रास्ता तो तय करना ही था।

जगमोहन ने चलते-चलते पलटकर पीछे देखा। बूंदी अब पीछे नहीं था।

गर्मी में सिर के बालों से पसीना, चेहरे से होता पेट और पीठ तक बह रहा था। चेहरे तप से रहे थे। गीले कपड़े सख चके थे। बरसात का मजा तो कब का जा चुका था। धूप सुईंयों की तरह शरीर को चुभ रही थी।

"सपन मैं तो इस गर्मी में मर जाऊंगा।” लक्ष्मण दास बोला।

“मैं सोच रहा हूं, बूंदी की बात मानकर नदी में कूद जाते तो ठीक रहता।"

"तब मगरमच्छ हमें खा जाते।"

“क्या पता हम मायावी पहाड़ी के बाहर पहुंच जाते।”

"अब बात कर लें बूंदी से।” |

“नदी बहुत पीछे छूट गई है। अब क्या फायदा बात करने का?"

चलते-चलते उन्हें थकान होने लगी थी। परंतु किसी ने भी रुकने की बात नहीं की। रुकते भी तो कहां। हर तरफ सूखी, बंजर जमीन नजर आ रही थी। कोई पेड़ नहीं था। कोई छाया नहीं थी।

गर्मी में चेहरे सुर्ख-ले हो रहे थे।

आखिरकार लम्बी परेशानी के बाद वो रास्ता भी पार हो गया। धूप खत्म हो गई। सामने तूफान और आंधी का मौसम था। वे सब ठिठक गए। मोमो जिन्न की निगाहें हर तरफ फिरने लगीं।

"ये मौसम बढ़िया है सपन।"

"हां, अब थोड़ा चैन मिलेगा।" जगमोहन ने मोमो जिन्न से पूछा।

“आंधी-तूफान वाला ये रास्ता कैसा है?"

"इस मौसम वाले रास्ते को समझने में मुझे परेशानी हो रही है।" मोमो जिन्न बोला।

"कैसी परेशानी?"

आंधी-तूफान की रफ्तार तेज है। मेरा दिमाग तूफान के भीतर झांक नहीं पा रहा।"

"कोशिश करो।”

“कर तो रहा हूं।" मोमो जिन्न कुछ उलझन में दिखने लगा था। लक्ष्मण सपन के कान में बोला।

“ये हरामी जिन्न कहता है कि दिमाग काम नहीं कर रहा। इसके पास दिमाग भी है। सुना तुमने।"

"हम जैसे किसी शरीफ आदमी का दिमाग ले लिया होगा, वरना जिन्नों के पास दिमाग होता ही कहां है।"

“सच में नहीं होता?"

"मैंने अलादीन वाली फिल्म देखी थी। फिल्म में वो जिन्न अक्ल से पैदल था।”

"तो क्या ये भी..."

"किसी इंसान का दिमाग अपने सिर में भर रखा है इसने।" तभी मोमो जिन्न कह उठा।

“मेरा दिमाग इस तूफान में झांक नहीं पा रहा। इसकी रफ्तार मेरे दिमाग से ज्यादा तेज है।"

“तो क्या करें?" सोहनलाल बोला।
 
"रुकने की जरूरत नहीं। हम ये रास्ता भी पार कर लेंगे।" जगमोहन ने कहा।

पीछे से बूंदी की आवाज आई उसी पल।

“गलती मत कर देना।" सबकी नजरें बूंदी की तरफ घूमी।

"इस बार तो तुम लोग अवश्य दिशा भटक जाओगे। किसी की बातों में मत आओ।" __

“तो क्या करें?" सपन चड्ढा ने पूछा। ___ “बैठ जाओ। इंतजार करो। कभी तो तूफान थम ही जाएगा। नहीं थमेगा तो कम-से-कम दिशा तो नहीं भटकोगे। यहीं पर बैठे तो रहोगे। मेरी मानो तो इस तूफान में मत प्रवेश करो।"

"तेरी बातों का कोई ईमान-धर्म है?"

"ईमान-धर्म तो मेरा भी नहीं है। लेकिन कह सच रहा हूं। ये तूफान तुम लोगों को कहीं का कहीं पहुंचा देगा।" बंदी के चेहरे पर मुस्कान थी—“ये मौसमों का रास्ता है। इसे समझ पाना आसान नहीं। बरसात का रास्ता तुम लोगों ने पार कर लिया। धूप का रास्ता भी पार कर लिया, परंतु तूफान का रास्ता सबको दिशा भटकाकर, दूसरे रास्ते पर डाल देगा।" * “तुम अगर सच नहीं बोल सकते तो झूठ क्यों बोलते हो?" जगमोहन गुस्से से बोला।

“क्या झूठ बोला है मैंने?" | "तुम्हारी बातों में सच कम और झूठ ज्यादा होता है।"

“मेरी ईमानदारी पर शक मत करो जग्गू। अगर तूफान को पार कर गए तो अगला मौसम तुम लोगों को रास्ता...।"

“चुप रहो तुम।" "ठीक है।” बूंदी ने कहा और खामोश हो गया।

“इसके गुस्से का बुरा मत मानना।” लक्ष्मण दास बंदी से कह उठा_"तम कछ कहना चाहते हो तो मेरे कान में कह दो।" ।

“रहने दे।” सपन ने कहा—“ये तो तेरा कान ही काट लेगा।" जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं। नानिया ने सोहनलाल का हाथ थाम रखा था।

जगमोहन ने मोमो जिन्न से पूछा। “तुम क्या कहते हो मोमो जिन्न कि हमें क्या करना चाहिए?"

"मैं कुछ भी बता पाने में असमर्थ हूं। तुम लोग ही फैसला कर लो।" मोमो जिन्न ने कहा।

"हमें तूफान को पार कर लेना चाहिए।” नानिया कह उठी।

"मैं भी यही सोच रहा हूं।” सोहनलाल ने कहा। जगमोहन ने अपना सोचों में डूबा चेहरा हिलाया।

“यार सपन! हमसे तो कोई राय मांगता ही नहीं।" लक्ष्मण दास कह उठा। __ “जब सबके पास राय खत्म हो जाएगी, तब ये हमसे ही सलाह लेंगे।"

“मतलब कि हम एमरजैंसी के लिए हैं।”

"हां, यही बात है।” तभी जगमोहन कह उठा।

“हम आंधी-तूफान के रास्ते को पार करेंगे। चलो, आगे बढ़ते

उसके बाद वे सब तूफान में प्रवेश करते चले गए।

आंधी और तूफान इतना तेज था कि चंद कदम चलने के बाद वे संभल न सके। तफान अपने संग उन्हें बहाकर ले जाने लगा। उन्होंने बचने की लाख चेष्टा की परंतु वे सफल नहीं हो सके और तूफान के संग बहने-लुढ़कने को मजबूर हो गए। अपने पर उनका बस नहीं चल रहा था। तूफान का शोर ऐसा था कि एक का स्वर दूसरे को सुनाई नहीं दे रहा था। इन हालातों में फंसे कुछ देर तो वे होश में रहे, फिर होश गुम होने लगे उनके।

सिर्फ मोमो जिन्न ही ऐसा था जो कि आसानी से आंधी-तूफान का मुकाबला कर रहा था और सबके लुढ़कते बेहोश शरीरौं के साथ-साथ आगे बढ़ता जा रहा था।

जाने कितनी देर वे आंधी में, तूफान में, बेहोश हुए लुढ़कते रहे। समय का कोई ज्ञान नहीं था। दिशा का भी कोई ज्ञान नहीं था। मोमो जिन्न तूफान में उनके साथ ही आगे बढ़े जा रहा था।

बहुत देर के बाद, तूफान उन सबको अपने साथ एक जगह पर लाया और थम गया। उठते शोर के बाद एकाएक ही खामोशी छा गई थी। सब कुछ जैसे थम गया लगता था।

जगमोहन, नानिया, सोहनलाल, लक्ष्मण दास, सपन चड्ढा सब पास-पास ही बेहोश पड़े थे।

मोमो जिन्न धूल से भरा पास ही मौजूद था। उसने आस-पास देखा।

ये किले जैसी कोई जगह थी।

जैसे कोई पुराना किला, धीरे-धीरे खंडहर में परिवर्तित होता जा रहा हो। ऐसा हाल था उस जगह का। देखकर ऐसा लगता था जैसे बरसों से यहां कोई आया ही न हो। किले के भीतर कच्ची जमीन पर कई पेड़ खड़े थे, परंतु अधिकतर पेड़ सूखे हुए थे। कुछ में पत्ते-टहनियां नजर आ रही थीं, परंतु वे भी आधी-अधूरी थीं। पेड़ों के पत्ते जमीन पर बिखरकर सूख चुके थे। लाल रंग के पत्थरों से वो पुराना किला बना था। साफ-सफाई न होने की वजह से वो पत्थर भी अब मटमैले होने लगे थे।

किले के आंगन में थे वे सब बेहोशी में।
 
मोमो जिन्न ने उन सब पर निगाह मारी। चेहरे पर सोचें दौड़ रही थीं।

एकाएक ही मोमो जिन्न सतर्क हआ। उसने गर्दन जरा-सी टेडी करके आंखें बंद कर ली और हौले-हौले सिर हिलाने लगा । जैसे किसी की बात बहुत ध्यान से सुन रहा हो।

ये सब एक मिनट रहा फिर वो सामान्य हो गया। उसी पल सामने से आता बूंदी दिखाई दिया।

उसे देखते ही मोमो जिन्न के चेहरे पर अकड़ के भाव आ गए। कमर पर हाथ बांधकर वो दूसरी तरफ देखने लगा।

वहां पहुंचकर बूंदी ने हर तरफ नजर मारी। चेहरे पर गम्भीरता थी।

मोमो जिन्न ने उसकी तरफ पीठ कर रखी थी। बूंदी मोमो जिन्न से बोला।

“तुम मुझसे नाराज क्यों हो?" मोमो जिन्न पलटा। बूंदी को घूरा। बूंदी मुस्कराया।

"बोलो। तुम मुझसे नाराज क्यों हो?"

“महाकाली ने मेरे मालिक को कैद कर रखा है। तुम महाकाली के सेवक हो।"

“वो ही तो मैं कहना चाहता हूं कि हम सेवक हैं। मालिक की वजह से हम क्यों आपस में दुश्मनी करें।"

“तुम मुझे अच्छे नहीं लगते।"

“मैंने तो तुम्हारा कोई बुरा नहीं किया।" बूंदी बोला।

“अगर तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो तो मुझे जथूरा तक ले चलो।" मोमो जिन्न बोला।

“महाकाली की आज्ञा के बिना मैं ये काम नहीं कर सकता।"

"फिर मुझसे बात मत करो।” मोमो जिन्न बोला।

“मैं तुम्हें जथूरा तक पहुंचा भी दूं तो तुम उसे आजाद नहीं करा सकते। वो तिलिस्मी कैद है। देवा-मिन्नो के नाम का तिलिस्म बंधा है। वो दोनों ही जथूरा तक, तिलिस्म तोड़कर पहुंच सकते हैं। इस काम में तुम्हारा कोई फायदा नहीं।"

“तुम मुझे जथूरा तक पहुंचा दो। बाकी देखना मेरा काम है।"

“ये मैं नहीं कर सकता।”

"तो फिर मुझसे बात मत करो।"

तभी नानिया के होंठों से कराह निकली। उसे होश आने लगा था।

अगले दस मिनटों में सबको होश आ गया।

"ये तो कोई किला लगता है सोहनलाल।” नानिया कह उठी।

"किला ही है।" मोमो जिन्न बोला—“ये महाकाली का किला है।"

"तुम्हें कैसे पता?”

“कुछ देर पहले मुझे जथूरा के सेवकों ने ये बात बताई थी कि ये महाकाली का किला है।"

"ये तो खंडहर किला है।" लक्ष्मण दास ने कहा।

"लगता है महाकाली यहां नहीं रहती।” जगमोहन ने कहा।

सोहनलाल ने बूंदी को देखकर पूछा।

"ये महाकाली का किला है?"

"हां"

“महाकाली कहां है?"

"मैं नहीं जानता।"

"तुम्हें महाकाली से आदेश कैसे मिलते हैं?"

“महाकाली की परछाई आकर आदेश देती है।"

"हमें यहां क्यों लाए हो?"

“ताकि जथूरा तक पहुंच सको या कभी भी न पहुंच सको।” बूंदी ने कहा।

“इससे हमें कोई भी जवाब ठीक से नहीं मिलने वाला।” सपन चड्ढा ने कहा।

"लेकिन अब करें क्या?"

तभी मोमो जिन्न ने गर्दन टेड़ी कर ली। आंखें बंद हो गईं। वो कुछ सुनते हुए सिर हिलाने लगा।

"इसका टेलीफोन फिर बजने लगा।” लक्ष्मण दास ने कहा।

"जिस दिन इससे पीछा छूटेगा, मंदिर में प्रसाद चढ़ाने जाऊंगा।" सपन चड्ढा ने तीखे स्वर में कहा। __ “मेरी तरफ से भी चढ़ा देना। एडवांस में चढ़ा देते हैं।"

तभी मोमो जिन्न सीधा होते हुए कह उठा।

“जथूरा के सेवकों ने अभी-अभी मुझे बताया है कि जथूरा इसी किले में कैद है।"

"क्या?" सब चौंक पड़े।

“इसी किले में?" मोमो जिन्न ने सहमति में सिर हिलाया।

“जथूरा के सेवकों को ये बात कैसे पता चली?" सोहनलाल ने पूछा।

' “जैसे पहले ही बताया था कि जथूरा के ग्रहों को प्रोग्राम करके सैटलाइट से जोड़ रखा है। सैटलाइट जथूरा को ढूंढ़ने का काम भी कर रहा था परंतु पहले जथूरा के बारे में कोई खबर नहीं मिल रही थी। अब हम लोग यहां पहुंचे हैं तो सैटलाइट सिग्नल भेजने लगा कि जिस किले में हम हैं, जथूरा भी इसी किले में कैद है। तो ये बात मुझे बता दी गई।"

- "फिर तो हमने मैदान मार लिया।" जगमोहन मुस्कराकर कह उठा।
 
"अभी जथूरा को ढूंढ़ना बाकी है।” नानिया बोली।

"ये सब आसान नहीं है।" मोमो जिन्न ने कहा।

“अब क्या समस्या है। अब तो...।" ।

“जथुरा को महाकाली ने तिलिस्म के ताले में कैद कर रखा है।" मोमो जिन्न ने गम्भीर स्वर में कहा— “जब तब देवा-मिन्नो तिलिस्म के उस ताले को नहीं खोलेंगे, तब तक जथूरा की आजादी सम्भव नहीं।" __

“हम नहीं खोल सकते तिलिस्मी ताले को?” सोहनलाल ने पूछा।

“नहीं वो चाबी वाला ताला नहीं है।" जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कहा। ___

"देवराज चौहान और मोना चौधरी कैसे खोलेंगे, तिलिस्मी ताले को?” सोहनलाल ने पूछा।

“उनके छूने भर से रास्ता खुल जाएगा। क्योंकि उनके ग्रहों पर तिलिस्म बांधा गया है।"

“अब क्या पता देवा-मिन्नो कहां पर हैं?" नानिया कह उठी। जगमोहन ने बूंदी को देखा।

“तुम्हें तो पता होगा कि देवराज चौहान और मोना चौधरी कहां

“या तो वो जिंदा हैं या मर गए।” बूंदी ने मुस्कराकर कहा।

"इससे बात करने का कोई फायदा नहीं।” जगमोहन ने मुंह बिगाड़ा।

"हम पता तो लगा लें कि जथूरा कहां पर कैद है।” नानिया बोली।

“हां, हम कम-से-कम ये तो कर ही सकते हैं।” सोहनलाल ने कहा। सब उठकर मिट्टी-धूल वाले कपड़े झाड़ने लगे। जगमोहन ने बूंदी से कहा।

“हमें पता तो चल ही गया है कि जथूरा यहीं कैद है। हम उसे ढूंढ़ ही लेंगे। बेहतर होगा कि तुम ही बता दो। हमें भटकना नहीं पड़ेगा।" ___

“भटकने से फायदा भी हो सकता है। नुकसान भी हो सकता है।" बूंदी ने कहा।

"फायदा हो सकता है?"

"हां"

"किस बात का?"

"भटकोगे तो पता चल जाएगा। फायदे के साथ नुकसान को मत भूलो। मैंने दो बातें कहीं हैं।"

* “छोड़ो इसे। हम खुद ही जथूरा को ढूंढ लेंगे।” नानिया ने तीखे स्वर में कहा।
 
सोहनलाल ने मोमो जिन्न से कहा।

-

“तुम नहीं बता सकते कि इस महल में जथूरा कहां है?"

"मुझे ज्ञान होता तो मैं बता चुका होता।" मोमो जिन्न ने कहा। नजरें बूंदी पर गईं। उससे कहा-“तुम बता दो।”

“नहीं बता सकता। मुझे इसके लिए हुक्म नहीं है।" बूंदी ने कहा।

मोमो जिन्न ने कठोर निगाहों से बंदी को देखा। बूंदी मुस्करा पड़ा। फिर वे सब महल के भीतर की तरफ चल पड़े।

हर तरफ सुनसानी थी। "कभी ये महल कितना सुंदर रहा होगा।” नानिया कह उठी।

“अब भी बहुत बेहतर है।" जगमोहन बोला—“साफ-सफाई की जरूरत है।

धूल-भरी राहदारी में आगे बढ़ते जा रहे थे। उनके कदमों की आवाजें गूंज रही थीं। सामने ही सूखे पेड़ पर झूला लटका रखा था। परंतु झूलने वाला कोई नहीं था। जगह-जगह स्त्री-पुरुषों के बुत नजर आ रहे थे। कोई बुत तो राहदारी में खड़ा था। उन्हें इस तरह मौजूद बुतों का मतलब समझ नहीं आया।

वो किले के भीतर जा पहुंचे थे। धूल-मिट्टी, जालों का ही साम्राज्य था हर तरफ। “सपन।”

“बोल लक्ष्मण।"

“इस किले की साफ-सफाई हो जाए तो ये कितना बढ़िया दिखेगा।"

“यहां की जमीन का भाव क्या होगा?"

"क्यों?"

"मैं किले की कीमत लगाने की सोच रहा हं।"

“ये दुनिया भी बुरी नहीं। यहां रहा जा सकता है। बूंदी से पूर्वी किले की कीमत।”

"अकेले में पूछना। लेकिन वो तो दो-दो कीमतें बताएगा।"

“लालच दे देंगे कि सौदा करा दे, उसे पांच परसेंट दे देंगे। फिर तो सीधे ढंग से बात करेगा ही।"

"ये तूने ठीक कही।” राहदारी के अंतिम छोर पर बने, वे एक हॉल में पहुंचे। बैठक जैसा कमरा था ये।

ऊंची छत। लटकता फानूस । एक तरफ लम्बी-सी मूर्ति खड़ी थी, जिस पर धूल पड़ी थी। बैठने के लिए लकड़ियों की कुर्सियां। कुर्सियों पर गद्दे रखे थे। फर्श पर कालीन था। दीवारों पर छूल से अटी पेंटिंग्स थीं। देखने भर से ही इस बात का एहसास हो रहा था कि साफ-सफाई होने पर ये शानदार दिखेगा। हवा का झोंका भीतर तक आ जाता तो छत पर लटकते जाले सांप की तरह बल खाते दिखाई देते।

“यहां धूल न होती तो आराम करने का मजा आता।” नानिया कह उठी—“सोहनलाल।"

"हां।” "तेरा घर भी ऐसा है?"

“नहीं। वो तो बहुत छोटा है।"

"कोई बात नहीं। मैं छोटे घर में रह लूंगी।"

"अभी घर मत बसाओ। यहां पर जथूरा को ढूंढ़ो। किले में जाने कितने कमरे होंगे। तहखाने होंगे।” जगमोहन बोला— “हमें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। वक्त भी बहुत लगेगा।"

“जथूरा की कोई तस्वीर होगी?" लक्ष्मण दास बोला।

"तस्वीर?"

"वो मिल गया तो उसे पहचानेंगे कैसे?"

“कोई जिंदा इंसान यहां पर मिल जाए तो उसे पकड़ लेना।"

"ठीक है, हमें क्या?” सपन चड्ढा लक्ष्मण के कान में बोला— "हमने कौन-सा जथूरा को ढूंढने में सिर खपाना है।" ।

तभी मोमो जिन्न की गर्दन टेड़ी हो गई। आंखें बंद हो गईं। वो सुनने लगा कुछ।

"आ गया टेलीफोन।" फिर मोमो जिन्न सीधा हुआ और बोला।

“जथूरा के सेवकों ने कहा है कि ये जगह अच्छी तरह साफ करो। हर चीज चमका दो।"

"क्यों?

“इससे हमारे बैठने की जगह भी बन जाएगी और आने वाले वक्त में सफाई हमारे काम आएगी।” मोमो जिन्न ने कहा।

"क्या काम?"

“मैं नहीं जानता। जो मुझे कहा गया। वो मैंने कह दिया।"

“सफाई करना जरूरी है?"

“जरूरी है, तभी तो आदेश मिला है।"

“कर देते हैं सफाई।" नानिया कह उठी—“सोहनलाल तुम भी मेरे साथ सफाई में लग जाना।

“तुम जो कहोगी, मैं वो ही करूंगा।"

जगमोहन ने गहरी सांस ली।

"ये नौबत आ गई लक्ष्मण कि अब झाडू सफाई करनी पड़ रही है।" सपन चड्ढा बोला। __
 
“मोमो जिन्न की वजह से हमारा ये हाल हो रहा है। हम क्या सफाई करने वाले हैं जो... ।”

"मौका मिला तो मोमो जिन्न को नहीं छोड़ेंगे। पीठ की तरफ से छुरा मार देंगे।"

“वो कमीना हमारे पास ही आ रहा है।”

तब तक मोमो जिन्न पास आकर बोला। . “सैंसर लगे होने की वजह से मैं तुम दोनों की बातें सुन रहा

"तो हम कौन-सा छिपकर बातें कर रहे हैं, क्यों सपन।"

"हां-हां, हमें पता है कि तुमने हमारे कानों में कहीं सैंसर लगा रखे हैं।" सपन चड्ढा ने कहा। ____

“तुम दोनों को मेरा कोई डर नहीं?" मोमो जिन्न कठोर स्वर में बोला।

"नहीं।"

"मैं तुम दोनों को अभी नंगा करके... ।”

“सपन थोड़ा तो हमें डरना चाहिए। लक्ष्मण दास जल्दी-से कह उठा।

“हां, थोड़ा तो हम डरते ही हैं।" सपन चड्ढा ने सिर हिलाया। मोमो जिन्न ने दोनों को सख्त नजरों से घूरा।

"मेरी पीठ में छरा मारोगे?"

"वो तो हम मजाक कर रहे थे।” लक्ष्मण दास ने दांत दिखाए।

"चलो सफाई करो।”

"हां-हां, वो ही तो हम करने जा रहे थे।” ।

उसके बाद वे सब उस हॉलनुमा कमरे को साफ करने पर लग गए।

मेहनत वाला और लम्बा काम था।

बूंदी एक तरफ शांत और गम्भीर मुद्रा में खड़ा था। जगमोहन बूंदी से कह उठा।

"इस तरह खड़े तुम किसका अफसोस मना रहे हो?"

“अपने भाई बांदा के बारे में सोच रहा हूं कि कब उससे मिलूंगा।" बूंदी ने लम्बी सांस लेकर कहा।

“इससे बात करके वक्त बर्बाद मत करो।" मोमो जिन्न ने कहा।

“तुम सफाई नहीं कर रहे।” सपन चड्ढा मोमो जिन्न से कह उठा। ___

“मैं सफाई करूंगा। कहते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती। मैं जिन्न हूं। सफाई जैसा काम करके जिन्नों की जात की बेइज्जती कराऊंगा

क्या?"

"तुम लोग गंदगी में ही बैठे रहते हो क्या?"

“खबरदार जो फालतू बात की। जिन्नों को सफाई की जरूरत नहीं पड़ती।"

"तुम नहाते नहीं हो क्या?" ___

“जिन्न सिर्फ तब नहाते हैं जब वे बोतल में आराम करने जाते हैं या फिर बोतल से बाहर निकलते वक्त नहाते हैं। इंसानों की तरह हम रोज-रोज नहाकर वक्त बर्बाद नहीं करते। हमें बहुत काम करने होते हैं।"

"सुना लक्ष्मण।"

"सब सुन रहा हूं। तू चुपचाप काम पे लग जा। नहीं तो ये हमें फिर नंगा करने की धमकी देने लगेगा।"

बांकेलाल राठौर ने खुद को नीचे गिरता महसूस किया। हर पल उसे लग रहा था कि अब जमीन से टकराया तो अब टकराया।

लेकिन नीचे गिरते समय अचानक ही उसकी सांसों से कोई तेज खुशबू टकराई, उसके बाद उसके होश गुम होते चले गए। उसके बाद क्या हुआ, उसे कुछ पता न चल पाया।

फिर उसे होश आया तो उसने खुद को बहती नदी में पाया। पानी के संग आगे को लुढ़कता जा रहा था।

'ये का मुसीबतों में फंसो गयो।' मुंह पानी से निकालकर वो बड़बड़ा उठा।

तभी उसने किनारे पर देवराज चौहान को खड़े पाया। “देवराज चौहानो। म्हारे को बचायो। यो पाणी बोत तेजी दौड़ो हो।"

तब तक देवराज चौहान हाथ आगे बढ़ा चुका था।

बांकेलाल ने अपना हाथ आगे किया, जिसे कि देवराज चौहान ने थामा और बांके को बाहर खींच लिया। ___

“अंम बच गयो।” नदी से बाहर आते ही वो कह उठा—“क्या सबो बचो गयो?"

“हां।” देवराज चौहान मुस्कराया।

“थारे को वो दुल्हनो पसंदो न करो हो।"

"वो धोखा था।” देवराज चौहान ने कहा।

"ईब तो यो बातो म्हारे को भी पतो हौवे।” बांकेलाल राठौर ने अफसोस-भरे स्वर में कहा तभी उसकी निगाह अन्यों पर पड़ी, जो कि कुछ दूर खड़े थे। परंतु सब ही भीगे हुए थे— “म्हारी किस्मतो दगो दे जायो।"

“क्यों?"

"म्हारो ब्याह हो जाणो था, पर यो बांदा और उसो का बाप प्रणाम सिंह बोत हरामी हौवो।"

“मैंने बताया कि वो सब धोखा... "

“पतो हौवे । थारे संग वां पे का हौवे हो?"

“जो तुम्हारे साथ हुआ, वो ही मेरे साथ हुआ।"

"म्हारे संग तो बोत बुरो मजाक हौवो हो। किस्मतो ही फूट गयो हो। ईब अंम किधरो हौवे?"

“पता नहीं। हम सब भी अभी यहां पहुंचे हैं।”

"तन्ने म्हारे को बचा लयो। नेई तो नदी के संगो, जाणो किधरो खिसक जायो अंम।"

देवराज चौहान और बांके अन्यों के पास जा पहुंचे।

"कैसा होईला बाप?” रुस्तम राव मुस्कराकर बोला।

“पूछ मत छोरे। घणों बुरा हो गयो म्हारे संग।"

"ब्याह नेई होईला?"

“नेई म्हारे को वो आसमानी कपड़ों वाली पसंदो हौवे।” बांके ने गहरी सांस ली।

“दुल्हन देखी बाप?" ___

“साड़ी में तो हरामो प्रणाम सिंह बैठो हो। म्हारे को नीचे फेंक दयो। मन्ने तो सोचो कि ब्याह हो ही गयो। पर वो हरामो तो दामोदों की खातिरो खूब पटक-पटक के करो हो।”
 
Back
Top