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“इतनी जल्दी भूल गए। मैंने कुछ पहले ही तुम लोगों को भर पेट खाना खिलाया है।” बूंदी बोला।
"चलो हम नदी पार कर लें।” जगमोहन ने कहा।
"इतना आसान भी नहीं है नदी पार करना।” बूंदी कह उठा।
"क्यों?" जगमोहन बोला—“ये नदी पचास फुट चौड़ी है। आसानी से तैरकर..."
“नदी में मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी।” बूंदी ने कहा।
तीनों की निगाह नदी के बहते पानी पर जा टिकी।
स्वच्छ पानी तेजी से बह रहा था। पानी इतना साफ था कि नीचे तक स्पष्ट देखा जा सकता था।
परंतु पानी में मगरमच्छ तो क्या मछली तक न दिखी।
“तुम।” जगमोहन ने तीखी निगाहों से बूंदी को देखा— “हमें भटका रहे हो।" ____
“नहीं मैं सच कह रहा हूं। नदी में मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी। मगरमच्छ तुम तीनों की उम्र लम्बी भी कर सकते हैं और छोटी भी। तुम लोग मर भी सकते हो और जिंदा भी रह सकते हो।" ____
“इसकी बात पर हमें ध्यान देना चाहिए।” सोहनलाल ने कहा—“ये हर बात दोनों तरफ की कर रहा है।"
“पानी साफ है। मगरमच्छ नहीं है नदी में।"
"मैंने तो पहले ही कहा है कि मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते।” बूंदी पुनः बोला।
"चलो हम नदी पार करें।” जगमोहन बोला। सोहनलाल ने नानिया से पूछा।
“तुम सच में ठीक से तैर लोगी?"
"हां सोहनलाल, मुझ पर भरोसा रखो।" तीनों नदी में कूदने को तैयार हो गए। पीछे खड़ा बूंदी कह उठा।
"अब हम दोबारा मिल भी सकते हैं और नहीं भी मिल सकते।" जगमोहन ने गर्दन घुमाकर बूंदी को देखा और कह उठा।।
"तुम्हारी गर्दन पकड़ने का मुझे कभी मौका मिल भी सकता है और नहीं भी मिल सकता।"
“ये मौका तुम्हें कभी नहीं मिलेगा जग्गू।” बूंदी ने मुस्कराकर कहा।
"इसके मुंह मत लगो।” नानिया ने उखड़े स्वर में कहा। फिर जगमोहन, सोहनलाल और नानिया नदी में कूदते चले गए। ___
पानी का बहाव तेज था। तैरकर आगे बढ़ने में उन्हें थोड़ी-बहुत
परेशानी हो रही थी।
सोहनलाल ने पानी से मुंह निकालकर नानिया को देखा और बोला।
"तुम ठीक हो नानिया?"
“हां-हां।” नानिया का मुंह पानी से बाहर था—“मेरी फिक्र मत करो।"
जगमोहन उनसे पांच फुट आगे जा चुका था।
अभी उन्होंने आधी नदी पार की थी कि सोहनलाल और नानिया चिहुंक पड़े।
एक तरफ से जगमोहन के पास उन्होंने मगरमच्छ को आते देखा।
"चलो हम नदी पार कर लें।” जगमोहन ने कहा।
"इतना आसान भी नहीं है नदी पार करना।” बूंदी कह उठा।
"क्यों?" जगमोहन बोला—“ये नदी पचास फुट चौड़ी है। आसानी से तैरकर..."
“नदी में मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी।” बूंदी ने कहा।
तीनों की निगाह नदी के बहते पानी पर जा टिकी।
स्वच्छ पानी तेजी से बह रहा था। पानी इतना साफ था कि नीचे तक स्पष्ट देखा जा सकता था।
परंतु पानी में मगरमच्छ तो क्या मछली तक न दिखी।
“तुम।” जगमोहन ने तीखी निगाहों से बूंदी को देखा— “हमें भटका रहे हो।" ____
“नहीं मैं सच कह रहा हूं। नदी में मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी। मगरमच्छ तुम तीनों की उम्र लम्बी भी कर सकते हैं और छोटी भी। तुम लोग मर भी सकते हो और जिंदा भी रह सकते हो।" ____
“इसकी बात पर हमें ध्यान देना चाहिए।” सोहनलाल ने कहा—“ये हर बात दोनों तरफ की कर रहा है।"
“पानी साफ है। मगरमच्छ नहीं है नदी में।"
"मैंने तो पहले ही कहा है कि मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते।” बूंदी पुनः बोला।
"चलो हम नदी पार करें।” जगमोहन बोला। सोहनलाल ने नानिया से पूछा।
“तुम सच में ठीक से तैर लोगी?"
"हां सोहनलाल, मुझ पर भरोसा रखो।" तीनों नदी में कूदने को तैयार हो गए। पीछे खड़ा बूंदी कह उठा।
"अब हम दोबारा मिल भी सकते हैं और नहीं भी मिल सकते।" जगमोहन ने गर्दन घुमाकर बूंदी को देखा और कह उठा।।
"तुम्हारी गर्दन पकड़ने का मुझे कभी मौका मिल भी सकता है और नहीं भी मिल सकता।"
“ये मौका तुम्हें कभी नहीं मिलेगा जग्गू।” बूंदी ने मुस्कराकर कहा।
"इसके मुंह मत लगो।” नानिया ने उखड़े स्वर में कहा। फिर जगमोहन, सोहनलाल और नानिया नदी में कूदते चले गए। ___
पानी का बहाव तेज था। तैरकर आगे बढ़ने में उन्हें थोड़ी-बहुत
परेशानी हो रही थी।
सोहनलाल ने पानी से मुंह निकालकर नानिया को देखा और बोला।
"तुम ठीक हो नानिया?"
“हां-हां।” नानिया का मुंह पानी से बाहर था—“मेरी फिक्र मत करो।"
जगमोहन उनसे पांच फुट आगे जा चुका था।
अभी उन्होंने आधी नदी पार की थी कि सोहनलाल और नानिया चिहुंक पड़े।
एक तरफ से जगमोहन के पास उन्होंने मगरमच्छ को आते देखा।