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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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“इतनी जल्दी भूल गए। मैंने कुछ पहले ही तुम लोगों को भर पेट खाना खिलाया है।” बूंदी बोला।

"चलो हम नदी पार कर लें।” जगमोहन ने कहा।

"इतना आसान भी नहीं है नदी पार करना।” बूंदी कह उठा।

"क्यों?" जगमोहन बोला—“ये नदी पचास फुट चौड़ी है। आसानी से तैरकर..."

“नदी में मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी।” बूंदी ने कहा।

तीनों की निगाह नदी के बहते पानी पर जा टिकी।

स्वच्छ पानी तेजी से बह रहा था। पानी इतना साफ था कि नीचे तक स्पष्ट देखा जा सकता था।

परंतु पानी में मगरमच्छ तो क्या मछली तक न दिखी।

“तुम।” जगमोहन ने तीखी निगाहों से बूंदी को देखा— “हमें भटका रहे हो।" ____

“नहीं मैं सच कह रहा हूं। नदी में मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी। मगरमच्छ तुम तीनों की उम्र लम्बी भी कर सकते हैं और छोटी भी। तुम लोग मर भी सकते हो और जिंदा भी रह सकते हो।" ____

“इसकी बात पर हमें ध्यान देना चाहिए।” सोहनलाल ने कहा—“ये हर बात दोनों तरफ की कर रहा है।"

“पानी साफ है। मगरमच्छ नहीं है नदी में।"

"मैंने तो पहले ही कहा है कि मगरमच्छ हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते।” बूंदी पुनः बोला।

"चलो हम नदी पार करें।” जगमोहन बोला। सोहनलाल ने नानिया से पूछा।

“तुम सच में ठीक से तैर लोगी?"

"हां सोहनलाल, मुझ पर भरोसा रखो।" तीनों नदी में कूदने को तैयार हो गए। पीछे खड़ा बूंदी कह उठा।

"अब हम दोबारा मिल भी सकते हैं और नहीं भी मिल सकते।" जगमोहन ने गर्दन घुमाकर बूंदी को देखा और कह उठा।।

"तुम्हारी गर्दन पकड़ने का मुझे कभी मौका मिल भी सकता है और नहीं भी मिल सकता।"

“ये मौका तुम्हें कभी नहीं मिलेगा जग्गू।” बूंदी ने मुस्कराकर कहा।

"इसके मुंह मत लगो।” नानिया ने उखड़े स्वर में कहा। फिर जगमोहन, सोहनलाल और नानिया नदी में कूदते चले गए। ___

पानी का बहाव तेज था। तैरकर आगे बढ़ने में उन्हें थोड़ी-बहुत

परेशानी हो रही थी।

सोहनलाल ने पानी से मुंह निकालकर नानिया को देखा और बोला।

"तुम ठीक हो नानिया?"

“हां-हां।” नानिया का मुंह पानी से बाहर था—“मेरी फिक्र मत करो।"

जगमोहन उनसे पांच फुट आगे जा चुका था।

अभी उन्होंने आधी नदी पार की थी कि सोहनलाल और नानिया चिहुंक पड़े।

एक तरफ से जगमोहन के पास उन्होंने मगरमच्छ को आते देखा।
 
मोटा-सेहतमंद दस फुट लम्बा मगरमच्छ। उसके जबड़े कैंची की तरह खुले हुए थे। लम्बे-नुकीले दांत चमक रहे थे। मोटी खुरदरी चमड़ी जैसे मन में डर पैदा कर रही थी।

“जगमोहन।” सोहनलाल गला फाड़कर चीखा—“मगरमच्छ।"

परंतु शायद जगमोहन नदी के बहने के शोर में आवाज सुन नहीं पाया।

___ सुन भी लेता तो तब भी अपने बचाव में कुछ नहीं कर सकता था।

उसके देखते ही देखते मगरमच्छ ने अपने खुले जबड़ों में जगमोहन के शरीर को फंसाया और पानी के बीच गुम होता चला गया। ये सब दो पलों में ही हो गया। __ सोहनलाल और नगीना हक्के-बक्के से, तैरना भूलकर पानी में ही ठहर चुके थे जैसे।

“सोहनलाल तुम्हारा दोस्त मर गया।" नानिया चीखी।

"अभी नहीं मरा।" सोहनलाल बदहवास-सा था।

“मगरमच्छ उसे खा जाएगा।"

“यहां मत रुको। जल्दी से किनारे की तरफ बढ़ो।” कहकर सोहनलाल ने होंठ भींचे तैरना शुरू कर दिया।

नानिया भी जल्दी से तैरने लगी।

अभी वे दोनों थोड़ा ही आगे गए होंगे कि एकाएक नानिया सिहर उठी।

उसकी टांगों से कोई चीज छुई।

"सोहनलाल " नानिया चीखी—“कोई है।" तैरता सोहनलाल उसी पल ठिठका और पलटकर पीछे देखा।

अगले ही पल सोहनलाल की आंखें भय से फटकर फैलती चली गईं।

उसने नानिया के पास बहुत बड़े मगरमच्छ को देखा। जो कि अपने जबड़ों में नानिया को भींचने जा रहा था और देखते ही देखते नानिया को अपने जबड़ों में भींचा और पानी में गुम होता चला गया।

इससे पहले कि सोहनलाल कुछ सोच पाता कि क्या किया जाए, तभी उसकी टांगों से किसी चीज के टकराने का एहसास हुआ। ठंडी सिहरन सोहनलाल के शरीर में दौड़ती चली गई।

अगले ही पल उसे अपने बेहद करीब जबड़े खोले मगरमच्छ दिखा।

उसके गले तक का नजारा, सोहनलाल ने स्पष्ट देखा। मौत नाच उठी आंखों के सामने कि तभी मगरमच्छ का खुला जबड़ा पेट की तरफ से, उसके शरीर के जबड़ों में फंसाया और पानी के भीतर गुम होता चला गया।

चंद पलों में ही पानी की हलचल थम गई। सब कुछ सामान्य नजर आने लगा। लगा जैसे कुछ हुआ ही न हो। किनारे पर खड़े बूंदी के चेहरे पर मुस्कान थिरक उठी। नजरें बहती नदी पर थीं।

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देवराज चौहान, मोना चौधरी, नगीना, बांके-रुस्तम, पारसनाथ, महाजन, मखानी, कमला रानी, तवेरा और रातला महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के पास पहुंच चुके थे। शाम ढल रही थी। कुछ ही देर में अंधेरा हो जाना था। सबके चेहरों पर थकान के भाव थे। देवराज चौहान रातला के पास पहुंचा। __

“अब क्या करना है। अंधेरा होने वाला है।” देवराज चौहान ने कहा।

"रुककर वक्त बर्बाद करने का कोई फायदा नहीं।” रातुला ने कहा।

“ठीक है। रास्ता किधर से है, पहाड़ी के भीतर जाने का?" देवराज चौहान ने पूछा।

“ऊपर से। पहाड़ी के ठीक ऊपर जथूरा के चेहरे का बुत लेटा हुआ है।" रातुला बोला—“उस बुत के नथुने गुफा जैसे हैं, उन्हीं में

से भीतर जाना है।” __

“तुम्हें ये बात कैसे पता?"

“दो बार हम पहाड़ी पर चढ़ाई कर चुके हैं। वहां तक पहुंच चुके हैं। परंतु जितने भी लोग भीतर गए, वो बाहर नहीं आए।"

“पहाड़ी पर चढ़ते हुए परेशानी नहीं आई कोई?" __

“आई। महाकाली रुकावटें डालती है।" रातुला ने कहा—“हमारे आधे लोग तो पहाड़ी चढ़ने के दौरान ही जान गंवा बैठे।”

“फिर तो हमें भी खतरा है।"

“हां।" रातुला ने गम्भीरता से सिर हिलाया—“परंतु चिंता की खास बात नहीं है। तवेरा हमारे साथ है, वो मुकाबला कर लेगी, पहाड़ी पर मौजूद महाकाली की ताकतों से।” ।

देवराज चौहान ने कुछ दूर मौजूद तवेरा पर निगाह मारकर कहा।

“तुम नीलकंठ को भूल रहे हो।”

“ओह । सच में...उसे तो मैं भूल ही गया था।"

“जरूरत पड़ने पर नीलकंठ मोना चौधरी में प्रवेश करके हमारी सहायता करेगा।” देवराज चौहान ने कहा—“मोना चौधरी को मुसीबत में देखते ही नीलकंठ आ जाएगा।" ।

" “फिर तो हमें जरा भी चिंता नहीं करनी चाहिए।” रातुला ने कहा- "हम अभी पहाड़ी पर चढ़ेंगे।"

देवराज चौहान तवेरा के पास पहुंचा।

“हम अभी पहाड़ी पर जाने का फैसला कर चुके हैं।"

“मैं तैयार हूं।"

“पहाड़ी पर महाकाली के बिछाए खतरे आ सकते हैं।”

“मैं उन खतरों को दूर कर दूंगी देवा।” तवेरा ने गम्भीर स्वर में कहा।

उसके बाद सबने घोड़ों पर से अपना सामान उतारा और अपनी पीठ पर लाद लिया।

आधे घंटे में ही पहाड़ी पर चढ़ने की तैयारियां पूरी हो गईं।

अब तक अंधेरा घिर आया था। कुछ भी स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था।

तवेरा ने अपने सामान में से अंडे के आकार की कांच की गोली निकाली और होंठों-ही-होंठों में मंत्र बुदबुदाकर ऊपर की तरफ उछाल दी। एकाएक वो गोली चमक उठी और बीस फुट ऊपर हवा में जा ठहरी। उसमें से प्रकाश की तीव्र किरणें निकलकर आस-पास की जगह में फैल गईं।

अंधेरे से भरी जगह रोशन हो उठी। अब उन्हें सारा रास्ता स्पष्ट नजर आ रहा था। पारसनाथ मोना चौधरी के पास पहुंचकर बोला।

“मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास, सपन चड्ढा तो अभी पहुंचे नहीं। वो पीछे आ रहे हैं।"

पास में मौजूद रातुला कह उठा।

"मोमो जिन्न की फिक्र मत करो। उसे जथूरा के सेवकों की तरफ से आदेश मिल जाएगा।"

उसके बाद वे सब पहाड़ी पर चढ़ने लगे।

चलते-चलते मखानी कमला रानी के पास आ पहुंचा।

"कैसी है तू कमला रानी?" मखानी ने बेहद प्यार से पूछा।

“मुझे क्या होना है।” कमला रानी ने लापरवाही से कहा।

"तेरे बिना दिल नहीं लगता।"

“मेरा भी कहां लगता है।”

"दिल चाहता हैं हर वक्त तेरे को गोद में लेकर बैठा रहूं।"

"हर वक्त।” कमला रानी के चेहरे पर तीखे भाव उभरे।

“हां, हर वक्त।"

"कोई और काम नहीं है तेरे को?"

“ये क्या कम काम है। सुन...।"

"बोल ।”

“यहां मौका भी है, वक्त भी है। कुछ हो जाए।” मखानी ने दांत फाड़े—“देख, मना मत करना। बहुत मन है।"

कमला रानी ने गहरी सांस ली।

“क्या हुआ?"

"तू क्या समझता है कि मेरा मन नहीं होता।"

"फिर तू कहती क्यों नहीं कि... "

"तेरे को बताया है न कि औरत की चुप में ही हां है। तू समझता क्यों नहीं।"

"विश्वास नहीं होता इस बात का।"

"क्यों?"

"जब मैं अपनी पत्नी से कहा करता था कि आ, तो वो चुप रहती थी, जब मैं पास पहुंचता तो वो भडक उठती थी।” ।

"वो बाहर से खाकर आती होगी। पेट भरा रहता होगा उसका।"

"तेरे पेट का क्या हाल है?"

"खाली ही रहता है।"
 
"तो इस भीड़ से कुछ पीछे हो जा।" मखानी धीमे से बोला— "हम प्यार कर लेते हैं।"

"अभी नहीं।"

“कर दी ना।"

"ये मना नहीं है—ये तो...।"

"कमला रानी।" भौरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी— “इन बातों की तरफ ध्यान मत दो।"

“मखानी कह रहा है।"

“तू उसकी बात की परवाह मत कर।"

"ठीक है।” तभी मखानी कह उठा।

“क्या हुआ?"

"भौरी कहती है कि ये वक्त इन बातों का नहीं है।"

“इन बातों के लिए तो कोई भी वक्त हो सकता है।" मखानी ने मुंह बनाया—“तू भौरी की बात की परवाह मत कर।”

"वो डांटती है।” ____

“डांटने दे। तू धीमे हो जा। इन सबसे पीछे होकर, हम जल्दी से प्यार कर..." ____

“मखानी।" शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी—“तू काम के वक्त में, उल्टी बातें क्यों करता है।" ___

“मेरी बातें तेरे को हमेशा ही उल्टी लगती हैं। कभी पूरी की तूने मेरी बात।"

"इस वक्त तू काम करेगा या ये सब..."

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"दोनों बातें कर लूंगा।” मखानी ने बच्चों जैसी जिद की।

“मत भूल तू इस वक्त महाकाली की पहाड़ी चढ़ रहा है। यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। अगर तू काम के वक्त इसी तरह की बातें करता रहा तो, मैं तेरे को कालचक्र से अलग कर दूंगा।"

“कमला रानी को भी अलग कर।"

"उसे नहीं, वो काम के प्रति गम्भीर है।"

"फिर मैं अलग क्यों होऊं, मैंने कमला रानी के साथ ही..." ।

तभी आगे की तरफ से चीख गूंजी।

“क्या हुआ?" मखानी के होंठों से निकला।

“आगे कुछ हुआ है मखानी।” कमला रानी जल्दी से कह उठी—“आ, देखें।”

रातुला सबसे आगे था। उसके साथ तवेरा थी। बाकी सब पीछे थे। __ऊपर हवा में तैरती उस छोटी-सी गोली से निकलती तीव्र रोशनी से, वहां की सारी जगह रोशन हो रही थी। आगे बढ़ने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हो रही थी।

अभी वे लोग पहाड़ी पर सौ-डेढ़ सौ कदम ही आगे बढ़े होंगे कि एकाएक पहाड़ी की आगे की जमीन किसी खाई की तरह फटती चली गई। ये सब अचानक हुआ।

रातुला भीतर गिरा। उसके होंठों से चीख निकली। सबका ध्यान रातुला की तरफ हुआ। तब तक रातुला ने फुर्ती से खाई के किनारे का हिस्सा थाम लिया था। अब वो नीचे लटकने लगा था। सब ठिठक चुके थे। तवेरा सबसे आगे थी। उसने खाई के भीतर झांका।

तवेरा के होंठ भिंच गए।

खाई में सांप-बिच्छू भरे हुए थे। जो कि भीतर लटकते रातुला तक पहुंचने की चेष्टा कर रहे थे। उनमें ज्यादा फासला नहीं बचा था।

“मझे बचाओ तवेरा।” रातला फंसी आवाज में कह उठा।।

तभी महाजन पास आ पहुंचा और झुकते हुए नीचे बैठते कह उठा।

"लाओ, मुझे अपना हाथ दो।"

"रहने दो नीलसिंह।” तवेरा कह उठी—“इसे मैं निकालती हूं।"

"लेकिन..." तब तक तवेरा ने अपनी कमर पर लटके लबादे से छोटी-सी डंडी निकाली और उसे खाई की तरफ करके कुछ होंठों ही होंठों में बुदबुदाई। जाने क्या मंत्र था वो जो कि समझ में नहीं आया।

परंतु उसके खामोश होते ही एकाएक सिरों पर चमगादड़ जैसा पक्षी नजर आने लगा। इसके साथ ही उस पक्षी ने खाई में झपट्टा मारा और दूसरे ही पल उसके पंजों में रातुला की टांगें दबी थीं। वो हवा में रातला को खाई से बाहर लाया और पास ही जमीन पर रखकर खुद आकाश के अंधेरे में कहीं गायब हो गया।

रातुला जमीन पर पड़ा, गहरी-गहरी सांसें लेने लगा।

हवा में ऊपर मंडराती गोली से निकलता प्रकाश पास में हर तरफ चमक रहा था। चंद पलों के लिए वहां खामोशी उभर आई थी।

देवराज चौहान रातुला की तरफ लपका।

बांकेलाल राठौर तवेरा के पास पहुंचा। तवेरा ने अभी भी छडी थाम रखी थी। तवेरा ने बांके को देखा और गहरी सांस लेकर अपने चेहरे पर छाया तनाव कम करने लगी। बांकेलाल राठौर का हाथ अपनी मंछ पर पहंचा और बोला।

"तुम तो घणो जादूगरनी हौवे तवेरो।"

तवेरा ने छड़ी को अपने कंधे पर लटके झोले में रख लिया।

"म्हारो को एक बातो बतायो तुमो।"

"बोल भंवर सिंह।" तवेरा ने उसे देखा।

“यो जादूगरी किधरो से सीखो हो तुम?"

“क्यों?" तवेरा मुस्कराई—“तुम्हें भी सीखनी है क्या?"

“हां, अंम भी सीखो हो, तंम सिखाओ म्हारे को?"

"ये आसान नहीं है सीखना।”

"कोणो बातो नेई। अंम मुश्किल से सीखो लयो।"

"इसके लिए वक्त चाहिए। बहुत ज्यादा वक्त।"

“म्हारे पासो बोत वक्तो हौवे । तुम राजी हौवो म्हारे को सिखाणो वास्ते?"
 
“तुमने तो वापस अपनी दुनिया में जाना है। ये दुनिया तुम्हारी नहीं है भंवर सिंह ।”

“अंम रुक जायो। थारे से सबो कुछ सीखो के ही वापस जायो।"

“तुम नहीं सीख सकते।"

"काये को?"

"ये बहुत मेहनत और लम्बी तपस्या का काम है। हर कोई सीख सकता तो आज सब ही मेरी तरह निपुण होते।” । ____

“तंम म्हारे को सिखायो। अंम तपस्यो करो हो।” बांकेलाल राठौर ने जिद-भरे स्वर में कहा।

“ठीक है, मैं सिखाऊंगी तुम्हें, अगर तुम सीख सके तो।"

"ठीको। ईब एको बात म्हारे को और बतायो।"

"क्या?"

“वो आसमानो से का आयो जो रातुलो को बाहर खींच के फेंक गयो।"

तवेरा ने मुस्कराकर बांके को देखा। बांके की निगाह तवेरा पर थी।

“तुमने ये विद्या मुझसे सीखनी है न?"

“पक्को ।"

"तो उस वक्त का इंतजार करो। जब तुम सीखोगे तब सब कुछ जान जाओगे।"

"ठीको। बढ़ियो।” बांकेलाल राठौर गर्दन हिलाता कह उठा—“पर ईक बातो तो म्हारे को जरूर बता दयो।"

तवेरा ने पुनः बांके को देखा।

“यो आसमानो में का चमको हो, जो रोशनी करो हो।"

"ये रोशनी वाली गोली है। मामूली करतब है ये।"

“ये मामूलो हौवे?"

"हां"

"अंम थारे से सबो कुछ सीखो हो। यो रोशनी वालो गोली भी। म्हारो घरो में बिजली का बिलो बोत मोटो आये हो। अंम अपणो घरो के भीतरो इसो गोली से रोशनी करो हो।” बांकेलाल राठौर ने गर्दन हिलाकर कहा।

"रोशनी वाली गोली को अपने किसी स्वार्थ के लिए, रोशन करना मना है।"

"कौणो रोको म्हारे को?"

“ये विद्या का नियम है।"

“समझो।"

“बेहद खास जरूरत के वक्त ही इस विद्या का इस्तेमाल किया जाता है। अगर अपने स्वार्थ की वजह से बार-बार इस विद्या का इस्तेमाल किया जाए तो ये विद्या भूलनी आरम्भ हो जाती

___ “समझ गयो। कोणों बातें नेई। अंम वां ये बिजली का बिलो मोटो दे दयो। पर यो विद्यो जरूरो सीखो।"

देवराज चौहान ने रातुला को संभाला। “तुम ठीक हो रातुला?"

“हां ।” रातुला स्वयं ही बैठता कह उठा।

“तुम बुरे बचे हो।” मोना चौधरी ने कहा और नजरें खाई की तरफ उठ गईं।

“उसमें सांप-बिच्छू भरे हैं।” महाजन ने कहा।

“महाकाली हमें रोकने की पूरी चेष्टा करेगी।” मोना चौधरी ने होंठ भींचे कहा।

रातुला उठ खड़ा हुआ। उसने तवेरा को देखकर कहा।

“तुमने मुझे बचा लिया तवेरा।"

तवेरा ने जवाब में कुछ नहीं कहा। नजरें हर तरफ घूमती रहीं।

“हम आगे कैसे बढ़ेंगे।” नगीना बोली—“आगे तो खाई है, जो कि दोनों तरफ से दूर तक जा रही है।" । ___

“महाकाली मानने वाली नहीं।” तवेरा बोली-“वो अभी और कुछ भी करेगी।"

“क्या?" ___

"मैं नहीं जानती। लेकिन वो करेगी कुछ। वो हमें मंजिल तक नहीं पहुंचने देगी। ये ही उसकी कोशिश होगी।” तवेरा के होंठों में खिंचाव आ गया—“इस खाई को तो मैं अभी बंद करती हूं।" कहने के साथ ही तवेरा ने अपने झोले से ऐसी छड़ी निकाली जिसमें कांटे लगे हुए थे। उसने छड़ी को खाई की तरफ करके ऊचे स्वर में कुछ मंत्र पढ़े और छड़ी को खाई के भीतर फेंक दिया। ऐसा लगा जैसे खाई के भीतर कुछ हलचल हुई हो।

अगले ही पल वो खाई बंद होने लगी। फट चुकी जमीन के कोने एक-दूसरे की तरफ बढ़ने लगे।

“यो तो कमाल हो गयो तवेरो।” बांके खुशी से भरे स्वर में कह उठा।

चंद मिनट लगे कि वो खाई बंद हो गई। जमीन के दोनों किनारे आपस में मिलकर जमीन एकसार हो गई थी। पहाड़ी सामान्य नजर आने लगी थी।

"तंम म्हारे को यो विद्यो जरूर सिखायो।" मखानी ने पास आकर कमला रानी को कोहनी मारी।

“क्या है?" कमला रानी मुंह बनाकर अपनी कोहनी को साफ करती कह उठी।

"उधर अंधेरे में आ-जा।”

“तू नहीं सुधरेगा।” कमला रानी ने कहा और दो कदम आगे बढ़ गई। ___

“हो गए नखरे शुरू। हाथ भी नहीं रखा अभी और बिदकने लगी।” मखानी गुस्से में झुंझलाया।

तभी तवेरा की आवाज सबको सुनाई दी।

"चलो। महाकाली की इन बातों से हमें डरना नहीं है। सावधान रहो। वो और भी हरकतें करेगी।"

फिर वे सब आगे बढ़ने लगे।

रोशनी की गोली ठीक उनके सिरों पर मंडराती उन्हें रास्ता दिखा रही थी। __
 
चलते-चलते बांके और कमला रानी बराबर साथ हुए तो कमला रानी कह उठी।

"क्यों मुच्छड़। मजे हो रहे हैं।"

“मुच्छड़ो। तंम म्हारे को मुच्छड़ो कहो हो।" ।

"तेरी मूंछे हैं तो मुच्छड़ ही कहूंगी। कटवा दे इन्हें, तब नहीं कहूंगी।"

"म्हारे को मूंछों से बोत प्यारो हौवे।" __

“तभी मूंछों पर लगाने के लिए मलाई ढूंढता फिर रहा है।” कमला रानी ने आंखें नचाईं।

बांकेलाल राठौर ने दांत फाड़े। उसे देखा फिर कहा। "तंम म्हारो को थोड़ी मलाईयो दे दयो।"

"थोड़ी क्यों मेरे मुच्छड़। मैं तो पूरी दे देती।”

"मखानो थारे को रोके हो।"

"मेरे को कोई नहीं रोक सकता।"

"फिरो का बात हौवे?"

"तुम मेरे को भाई से लगते हो।"

बांकेलाल राठौर ने ऐसे मुंह बनाया जैसे कड़वी दवा निगल ली हो।

"तंम म्हारे को दूसरो बारो भायो बोल्लो हो।” बांके ने जैसे शिकायत की।

"तेरे को बुरा लगा?"

“बोत बुरो लागे हो। म्हारे मन को हो कि अंम सबो को 'वड' दयो।”

"ठीक है। अब तेरे को भाई नहीं बोलूंगी।"

“पक्को वादो?"

“पक्का वादा।” कमला रानी मुस्कराई।

“मलाई मिलेगी मूंछों पे लगाने वास्ते?" बांकेलाल राठौर जल्दी से बोला।

"वो तो मैंने मखानी के लिए संभालकर रखी है।"

"म्हारी वैल्यू मखानी से ज्यादो हौवे।"

"मखानी नाराज हो जाएगा अगर तेरी मूंछों पे मलाई लगा दी तो।" ____

“मखानो को पतो ही न चल्लो हो कि अंम थारी मलाईयो खायो हो।” बांके ने धीमे स्वर में कहा।

“वो बड़ा कमीना है, सूंघकर बता देगा कि मैंने किसी को मलाई खिलाई है या नहीं।" ___

"तंम तो कांपो हो उसो से। अम मखानो को 'वड' दयो। वो म्हारे को मलाई न खाणो दयो, अंम... "

यही वो पल थे कि एकाएक उनके सिरों के ऊपर अंधेरे से भरे आसमान में पीले रंग का चमकता हुआ छल्ला नजर आने लगा। उसमें से हीरे की भांति रोशनी चमक रही थी। कुछ ऊपर था वो, जो कि धीरे-धीरे नीचे आने लगा। इसके साथ ही उसका आकार बड़ा होता जा रहा था। चमक बढ़ती जा रही थी।

सब ठिठक चुके थे। नजरें आसमान पर नजर आते उसी छल्ले पर थीं।।

“यो तो म्हारे को दूसरो ग्रहो से आयो लागे हो।" बांके चीखा—“परो यो हौवो का?"

"ये महाकाली की कोई नई चाल है।" तवेरा ने ऊंचे स्वर में कहा। सबकी नजरें उस छल्ले पर थीं। जो कि अब काफी नीचे, उनके करीब आ चुका था। छल्ले की पीली रोशनी ने वहां की जगह और रोशन कर दी थी।
 
फिर वो कुछ और फैलकर नीचे आया और सबको अपने घेरे में ले लिया।

जमीन से पांच फुट ऊपर रहा।

इसी पल देवराज चौहान ने महसूस किया कि उसके कदम नहीं उठ रहे हैं।

दूसरों ने भी ऐसा ही महसूस किया।

"ये कैसा छल्ला है।" महाजन चीखा—"मैं पांव नहीं उठा पा रहा।"

“महाकाली ने अपनी ताकत से हमारे पैरों को बांध दिया है।" तवेरा ने कहा।

"अंम महाकाली को 'वड' दयो।"

"तुम कुछ करो तवेरा।” नगीना कह उठी।

इसी पल मोना चौधरी के चेहरे के भाव बदले और उसके होंठों से नीलकंठ की मर्दानी आवाज निकली।

“घबराओ मत। मैं सब ठीक कर दूंगा।"

"नीलकंठ।” नगीना की निगाह मोना चौधरी की तरफ उठी।

अन्यों ने भी मोना चौधरी को देखा। नीलकंठ मोना चौधरी में आ चुका था।

मोना चौधरी ने हाथ ऊपर उठाया और हवा में घुमाया। होंठों से सीटी जैसी आवाज निकली।

इसके साथ ही वो पीला घेरा गायब हो गया। सबने खुद को सामान्य पाया।

“अब ठीक है।" पारसनाथ बोला।

"मिन्नो पर जब भी कोई मुसीबत आएगी। मैं आ जाऊंगा।" मोना चौधरी के होंठों से नीलकंठ की आवाज निकली।
 
"तुम्हें सिर्फ मिन्नो की परवाह है?" तवेरा बोली।

"हां।"

"तुम्हें सबकी चिंता करनी चाहिए नीलकंठ।"

"मुझे सिर्फ मिन्नो की परवाह है। मैंने कभी मन-ही-मन मिन्नो से प्यार किया...।"

तभी महाकाली का स्वर वहां गूंजा। “ये तूने ठीक नहीं किया नीलकंठ।"

“आ गई महाकाली।" नीलकंठ का व्यंग-भरा स्वर, मोना चौधरी के होंठों से निकला।

"तू मेरे काम खराब कर रहा है।” महाकाली की आवाज में गुस्सा था।

"मैं सिर्फ मिन्नो की रखवाली कर रहा हूं।"

“मान जा नीलकंठ। मेरे कामों में अड़चन मत डाल।"

"मैं सिर्फ मिन्नो के लिए हूं।”

“तो तू नहीं मानेगा।” महाकाली की आवाज में गुर्राहट आ गई।

“नहीं।"

“तू मेरे से जीत नहीं सकेगा। हार जाएगा तू।"

"ये तो आने वाला वक्त बताएगा महाकाली।” नीलकंठ का स्वर शांत था—“तु मिन्नो को तकलीफ दे, ये मुझे पसंद नहीं।"

"मैं तेरे से झगड़ा नहीं करना चाहती। हम गुरुभाई हैं।"

“मुझे बातों में न फंसा। मैं अपने इरादे से पीछे हटने वाला नहीं।

तभी तवेरा कह उठी।

"तू बेईमान है महाकाली। तूने ही देवा-मिन्नो के नाम से तिलिस्म बांधा मेरे पिता पर। और जब देवा-मिन्नो तिलिस्म तोड़ने आ गए हैं तो तू इन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए, हर सम्भव प्रयास कर रही है।"

दो पलों की खामोशी के बाद महाकाली की आवाज आई। "ये करना मेरी मजबूरी है।"

“मजबूरी नहीं, चालाकी है। अगर तेरा मन साफ होता तो तू मेरे पिता को आजाद कर देती।" ।

महाकाली की आवाज नहीं आई।

“तू रुकावटें डालनी बंद कर दे।” नीलकंठ कह उठा।

"मैं अपने कर्म से पीछे नहीं हट सकती।"

“पछताएगी तू।"

“तुम सब तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश करना चाहते हो। ठीक है, आ जाओ। मैं नहीं रोकती। परंतु तुम लोग वहां बिछाए मेरे जाल से बच नहीं सकते। मैं भी देखूगी नीलकंठ कि तू कब तक मिन्नो को बचाता है।"

“बहुत पछताएगी तू महाकाली।”

परंतु महाकाली की आवाज नहीं आई।

"चलो।” नीलकंठ की आवाज निकली, मोना चौधरी के होंठों से—“अब महाकाली रुकावट नहीं डालेगी।"

वे सब पुनः आगे बढ़ने लगे। अगले कुछ पलों में मोना चौधरी सामान्य हो गई।

“तुम्हें मालूम है, तुम में नीलकंठ आया था।” महाजन ने कहा।

“हाँ।” मोना चौधरी गम्भीर स्वर में बोली—“मैंने सब सुना।"

“वो तुझे नुकसान नहीं होने देगा।” महाजन मुस्कराया।

मोना चौधरी खामोश रही।।

"अगर वो सबकी चिंता करता तो ज्यादा अच्छा होता।"

"नीलकंठ जिद्दी है।" मोना चौधरी बोली—“वो किसी की बात नहीं मानेगा। वो सिर्फ मेरी चिंता करेगा।"

“तुम उसे कहो कि वो सबकी चिंता करे।"

“नहीं मानेगा। मेरी बात भी नहीं मानेगा।” मोना चौधरी ने इंकार में सिर हिलाया।

एक घंटे के पश्चात वे सब पहाड़ी के ऊपर जा पहुंचे। उनके सिरों पर रोशनी जगमगा रही थी।

"रातुला उन सबको पहाड़ी के उस हिस्से पर ले आया, जहां जथूरा के चेहरे का बुत लेटा हुआ आसमान की तरफ जैसे देख रहा था। वो चेहरा इतना बड़ा था कि एकाएक उसे समझ पाना आसान नहीं था। वहां दो गुफाएं दिखाई दीं। जो कि बुत के नाक के छेद थे।

"ये गुफाएं भीतर जाने का रास्ता है।” रातुला बोला।

“दो रास्ते हैं ये।” देवराज चौहान बोला—"किस रास्ते से भीतर जाया जाए।"

मोना चौधरी ने तवेरा से कहा। “तुम बताओ।"

“ये बात तो मैं भी नहीं बता सकती।” तवेरा कह उठी—“नीलकंठ से पूछो।”

तभी मोना चौधरी ने होंठों से नीलकंठ की आवाज निकली। "इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता।"
 
"मेरे खयाल में यहां से हमें आधे-आधे बंटकर दोनों रास्तों में प्रवेश कर जाना चाहिए।” रातला ने कहा।

__ "हम जहां भी जाएंगे एक साथ ही जाएंगे।” देवराज चौहान ने कहा।

“यो बातों हौवे तो किसो रास्ते भी चल पड़ो।”

बांकेलाल राठौर कह उठा। ___ “ठीक कहेला बाप।”

“आओ।” मोना चौधरी ने कहा और एक गुफा में प्रवेश करती चली गई। ___ उसके भीतर पांव रखने की देर थी कि भीतर की जगह रोशन हो उठी।

सब मोना चौधरी के पीछे चल पड़े।

तवेरा ने अपना हाथ ऊपर किया और होंठों-ही-होंठों में कुछ बुदबुदाई तो हवा में लहराती, प्रकाश देती रोशनी की गोली बुझ गई

और उसके हाथ में आ गई। तवेरा ने गोली को कंधे पर लटकते झोले में डाला और गुफा में प्रवेश कर गई।

बांकेलाल राठौर तवेरा के साथ चलने लगा। “थारे को यादो हौवे कि म्हारे को जादू सिखाणों है।"

“याद है।” तवेरा कह उठी—“परंतु पहले पिताजी को आजाद कराना है।"

"वो अंम करा दयो।" सब आगे बढ़ते जा रहे थे। मोना चौधरी और रातुला सबसे आगे थे। रास्ता सीधा और साफ था। भरपूर रोशनी थी हर तरफ। कुछ आगे जाकर रास्ता ढलान लेने लगा। सब सतर्क थे। कभी भी खतरा सामने आ सकता था। दस मिनट इसी प्रकार चलते रहने के बाद वे एक कमरे में जा पहुंचे। कमरे की दीवारों में छः रास्ते नजर आ रहे थे। किसी रास्ते के पार बरसात हो रही थी तो किसी के पार तेज धूप खिली हुई थी। किसी दरवाजे के पार आग जल रही थी तो किसी के पार गहरा अंधेरा था। दो रास्ते ऐसे थे जिनके पार कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।

कमरे में एक तरफ बांदा बैठ था उदास-सा। सबकी निगाह उस पर जा टिकी।

“स्वागत है आप सबका।” बांदा ने उत्साहहीन स्वर में कहा—"यूं ही आये इधर।"

“तुम कौन हो?"

“बांदा हूं मैं। यहां आने वालों की सेवा करना मेरा काम है।" बांदा ने कहा।

"तंम तो म्हारे को बीमारो दिखो हो।" ___

“मैं उदास हूं।" बांदा ने कहा- "इस मायावी पहाड़ी के भीतर जाने के दो रास्ते हैं। ये रास्ता आगे वाला है, दूसरा रास्ता पीछे वाला है। पीछे वाले रास्ते पर मेरा भाई बूंदी सेवा में रहता है। मैं उससे मिलना चाहता हूं, परंतु महाकाली मिलने नहीं देती। क्या तुम लोग मुझे बंदी से मिला सकते हो?"

“जरूर मिलाएंगे।” तवेरा ने तीखे स्वर में कहा—"लेकिन तू बेईमान है।"

"ऐसा क्या कह दिया मैंने?" बांदा ने तवेरा को देखा।

"तू महाकाली का सेवक है। उसने हमारे लिए तेरे को यहां बैठा रखा है कि तु हमसे चालाकी करे।” । ___

“मैंने तो कोई चालाकी नहीं की।"

“तुम अपने भाई से मिलना चाहते हो। महाकाली मिलने नहीं देती। ये चालाकी ही तो की तुमने झूठ बोलकर।"

"मेरी बात को कोई सच नहीं मानता।" बांदा ने मुंह बनाकर कहा।

"यहां जो लोग पहले आए थे वो कहां गए?" तवेरा ने पूछा।

"इन्हीं रास्तों में प्रवेश कर गए।"

“उसके बाद वो कहां गए?"

“मुझे क्या पता।"

"मेरे पिता कहां हैं?"

“महाकाली ने जथूरा पर तिलिस्म बांध रखा है। वो कैदी हैं।"

"किधर हैं मेरे पिता?"

"भीतर चले आओ। मिल जाएंगे।” बांदा बोला।

देवराज चौहान उन छः रास्तों को ध्यानपूर्वक देख रहा था।

"इन अलग-अलग रास्तों का क्या मतलब है?" देवराज चौहान ने पूछा। __

“हर रास्ते में रहस्य है। जिस रास्ते पर जाओगे, वो अपना फल देगा।” ___

“अंम फलो न खावे। लस्सी पिओ हो, मक्खनो का गोला डालो के।

“तुम बताओ कि किस रास्ते का क्या असर है?" रातुला ने कहा।

“क्या फायदा।"

"क्यों?" पारसनाथ के होंठों से निकला।

"तुम लोग मेरी बात का भरोसा तो करोगे नहीं।"

“तम हमें बताओ।" नगीना कह उठी—“भरोसा करना या न करना, बाद की बात है।" ___

"मैं तो कहूंगा कि उस रास्ते में प्रवेश कर जाओ, जहां आग लगी है। ऐसा करते ही तुम सब जथूरा के उस कमरे के बाहर जा पहुंचोगे, जिसके भीतर वो बंद है।” बांदा मुस्कराकर कह उठा।

“तुम सच कह रहे हो?" पारसनाथ बोला।। ___

"मैं कभी भी झठ नहीं बोलता। वैसे उस रास्ते में भी जा सकते हो, जहां बरसात हो रही है। जग्ग से मिलना है तो..." ____
 
“जगमोहन ।” देवराज चौहान के होंठों से निकला—“वो तो सोबरा की तरफ गया है।" ___

“जरूर गया था, परंतु सोबरा ने महाकाली से कहकर, जग्गू को इसी मायावी पहाड़ी में प्रवेश करा दिया।" ।

"तुम्हारा मतलब जगमोहन इसी पहाड़ी में है।" __

“हां। उसके साथ गुलचंद और नानिया भी है।” बांदा बराबर मुस्करा रहा था।

" “बरसात वाले रास्ते में जाएं तो जगमोहन हमें मिल जाएगा?" नगीना ने पूछा।

"हां।”

“और आग वाले रास्ते पर जाएं तो जथूरा के पास पहुंच जाएंगे?” रातुला कह उठा।

“हां।” बांदा ने बैठे-बैठे सिर हिलाया। ____

“इसकी बात का भरोसा मत करो।” तवेरा बोल पड़ी—“ये हमें कभी भी सही बात नहीं बताएगा।"

“तवेरा भी ठीक कहती है।” बांदा बोला।

“तो तुम हमें गलत बता रहे थे?” देवराज चौहान ने उसे घूरा।

* “महाकाली का सेवक हूं। जो महाकाली कहेगी, वो ही करूंगा। वो ही कहूंगा।”

"तुम यहां पर क्यों हो?"

"तुम लोगों को भटकाने के लिए।"

“इसका मतलब हमें तुम्हारी किसी बात का विश्वास नहीं करना चाहिए।” महाजन ने कहा।

"ऐसी बात भी नहीं है। बातें मेरी सच हैं, परंतु कौन-सी बात कहां फिट बैठती है ये नहीं बता रहा। जैसे कि इन छः रास्तों में एक रास्ता ऐसा है, जिसके भीतर प्रवेश करते ही जथूरा के करीब पहुंच जाओगे। एक रास्ता ऐसा भी है कि जग्गू के पास पहुंच जाओगे। एक रास्ता ऐसा भी है कि मौत की घाटी में पहुंच जाओगे। यानी कि हर रास्ते का अलग मतलब है। देखना तो ये है कि तुम लोग कौन-सा रास्ता चुनते हो।" ___

“तुम इस बारे में हमें ठीक नहीं बताओगे?"

"मैं सही क्यों बताऊंगा। मेरा तो काम ही तुम लोगों को भटकाना

तभी बांकेलाल राठौर आगे बढ़ा और बांदा के पास जा पहुंचा।

"कैसे हो भंवर सिंह?" बांदा मुस्कराया।

"तंम पैचानो म्हारे को?"

“अच्छी तरह।”

"ये भी जाणो हो कि अंमने बोतो को 'वडा' है।"

बांदा मुस्कराता रहा।

"अंम थारे को भी 'वड' दयो बांदो।”

"तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।"

“छोरे सुनो तमने... । यो म्हारे को उकसायो।"

"करंट चालू करेला बाप।"

“छोरा म्हारे को हरी झंडी दिखा दयो। तंम म्हारे को जथूरो तको पोंचने का रास्ता ठीको-ठीको बता दयो।"

बांदा मुस्कराता रहा।

“यो न मानो हो सीधो तरहो।” बांकेलाल ने खतरनाक स्वर में कहा और उसकी गर्दन पकड़ ली।

अगले ही पल बांके के मस्तिष्क को झटका लगा। बाकी सब भी चौंके। बांदा की आकृति गले और छाती से थोड़ी-सी खंडित हुई। बांके का हाथ पीछे की दीवार से जा टकराया। उसने हड़बड़ाकर हाथ पीछे किया तो बांदा की मानवीय आकृति पुनः स्पष्ट हो उठी।

सब हैरानी से बांदा को देख रहे थे।

“छोरे यो का हो गयो। अंम तो लुट गयो।”

“बाप, ये धोखा है। इंसान नेई होईला।" __

"बांदे।" बांकेलाल राठौर उसे देखता बोला—“थारे में का जादू हौवे?"

"मैं यहां हूं ही नहीं। मैं तो अपने कमरे में हूं। महाकाली ने यहां मेरी आकृति भेजी है, जो कि ठीक इंसान की तरह है।" ___

"तम्भी तमो म्हारे से अकड़ो हो।” बांके ने समझने वाले ढंग में सिर हिलाया—“एको बात थारे काणों में भी डालो दूं कि अंम भी जल्दो जादू सीखो हो, तब थारे को नजारो दिखाइयो।"

जवाब में बांदा मुस्कराया।

“थारी महाकाली को तो फूंको से उड़ा दयो तबो।”

“महाकाली से पार पाना आसान नहीं है।" तवेरा गम्भीर स्वर में कह उठी—“ये तो शुरुआत भर है। उसने हमारे लिए

कदम-कदम पर मौत के जाल बिछा रखे होंगे।"

मोना चौधरी की निगाह उन छः रास्तों पर जा रही थी।

"फैसला करो कि हमें किस रास्ते पर जाना है।" पारसनाथ बोला—“या हम अकेले-अकेले छ: के छः रास्तों में... " । ___

"मैं पहले भी कह चुका हूं कि हम जहां भी जाएंगे, एक साथ ही जाएंगे।” देवराज चौहान बोला। ___

“जैसी तुम्हारी मर्जी।” महाजन ने कहा और मोना चौधरी के पास पहुंचा— “अब क्या करना है बेबी।"

“एक रास्ता चुनना है।"

"कौन-सा?"

"ये ही समझ नहीं आ रहा।" महाजन ने देवराज चौहान को देखा। “तुमने कोई रास्ता पसंद किया?"

"नहीं। मेरे लिए सब रास्ते ही एक जैसे हैं।” देवराज चौहान ने कहा। ____ "लेकिन मेरी नजर में तो सब रास्ते अलग-अलग मंजिलों तक पहुंचते हैं।”

बांदा कह उठा—“दिमाग लगाओ। रास्तों को पहचानो। पहचानने के निशान, समझ सको तो समझ लो।"
 
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