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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) complete

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जैसे ही हम सड़क पर पहुँचे.. तो दीदी बोली – छोटू ! भाई ऐसे तो हम लोग लेट हो जाएँगे, पहला पीरियड नही मिल पाएगा, वो भी मेरा तो फिज़िक्स का है..

मे – तो क्या करें आप ही बताओ..

वो – एक काम करते हैं, में आगे डंडे पर बैठ जाती हूँ.. कैसा रहेगा.

मे – मुझे कोई प्राब्लम नही है, आप बैठो.. तो वो आगे डंडे पर बैठ गयी और मे फिरसे साइकल चलाने लगा….!!

स्कूल के लिए थोड़ा लेट हो रहा था तो मेने साइकल को तेज चलाने के लिए ज़्यादा ताक़त लगाई जिससे मेरे दोनो घुटने अंदर की तरफ हो जाते और सीना आगे करना पड़ता पेडल पर ज़्यादा दबाब डालने के लिए.

मेरे लेफ्ट पैर का घुटना दीदी के घुटनो में अड़ने लगा तो वो और थोड़ा पीछे को हो गयी, जिससे उनके कूल्हे राइट साइड को ज़यादा निकल आए और उनकी पीठ मेरे पेट से सटने लगी.

मेरी राइट साइड की जाँघ उनके कूल्हे को रब करने लगी और लेफ्ट पैर उनकी टाँगों को..

उनके कूल्हे से मेरी जाँघ के बार-बार टच होने से मेरे शरीर में कुच्छ तनाव सा बढ़ने लगा, और मेरी पॅंट में क़ैद मेरी लुल्ली, जो अब धीरे-2 आकर लेती जा रही थी थी अकड़ने लगी.

दीदी भी अब जान बूझकर अपनी पीठ को मेरे पेट और कमर से रगड़ने लगी, अपना सर उन्होने और थोड़ा पीछे कर लिया और अपना एक गाल मेरे चेहरे से टच करने लगी.

ज़ोर लगाने के लिए मे जब आगे को झुकता तो हम दोनो के गाल एक दूसरे से रगड़ जाते.. और पूरे शरीर में एक सनसनी सी फैलने लगती.

आधे रास्ते पहुँच, दीदी बोली- छोटू थोड़ा और तेज कर ना लेट हो रहे हैं.. तो मेने अपने दोनो हाथ हॅंडल के बीच की ओर लाया जिससे और अच्छे से दम लगा सकूँ..

लेकिन सही से पकड़ नही पा रहा था…. हॅंडल….! क्योंकि दीदी के दोनो बाजू बीच में आ रहे थे. तो उसने आइडिया निकाला और अपने दोनो बाजू मेरे बाजुओं के उपर से लेजाकर हॅंडल के दस्तानों को पकड़ लिया, जहाँ नोर्मली चलाने वाला पकड़ता है.

हॅंडल को बीच की तरफ पकड़कर अब साइकल चलाने में दम तो लग रहा था और साइकल भी अब बहुत तेज-तेज चल रही थी लेकिन अब मेरे लेफ्ट साइड की बाजू दीदी के बूब्स को रगड़ने लगी.

दूसरी ओर मेरी दाई जाँघ दीदी के मुलायम चूतड़ को रगड़ा दे रही थी..

मेरे शरीर का करेंट बढ़ता ही जा रहा था, उधर दीदी की तो आँखें ही बंद हो गयी, वो और ज़्यादा अपने बूब्स को जानबूझ कर मेरे बाजू पर दबाते हुए अपनी जांघों को ज़ोर-ज़ोर्से भींचने लगी.

उत्तेजना के मारे हम दोनो के ही शरीर गरम होने लगे थे.

स्कूल पहुँच दीदी ने साइकल से उतरते ही मेरे गाल पर एक किस कर दिया और थॅंक यू बोलकर भागती हुई अपनी क्लास रूम में चली गयी.

छुट्टी के बाद लौटते वक़्त जब मेने दीदी को पुछा की आपने थॅंक्स क्यो बोला था, तो बोली – अरे यार समय पर स्कूल पहुँचा दिया तूने इसके लिए और क्या..! वैसे तू क्या समझा था..?

मे – कुच्छ नही, मे क्या समझूंगा.., आज पहली बार आपने थॅंक्स बोला इसलिए पुछा. वो नज़र नीची करके स्माइल करने लगी.

घर लौटते वक़्त भी ऐसा ही कुच्छ हमारे साथ हुआ, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर दीदी ने अपनी लेफ्ट बाजू मेरी जाँघ पर ही रखड़ी थी और अपने अल्प-विकसित उभारों को मेरी बाजू से रग़ाद-2 कर खुद भी उत्तेजित होती रही और मुझे भी बहाल कर दिया.

अब ये हमारा रोज़ का ही रूटिन सा बन गया था, दिन में एक बार कम से कम मे भाभी का चुम्मा लेता, बदले में वो भी मेरे गाल काट कर अपने होठों से सहला देती, कभी-2 तो मे अपना सर या गाल या फिर मुँह उनके स्तनों पर रख कर रगड़ देता.

दूसरी तरफ दीदी और मे भी दिनों दिन मस्ती-मज़ाक में बढ़ते ही जा रहे थे, लेकिन सीमा में रह कर.

ऐसे ही मस्ती मज़ाक में दिन गुज़रते चले गये, और ये साल बीत गया, मे अब नयी क्लास में आ गया था, दीदी 12थ में पहुँच गयी, ये साल हम दोनो का ही बोर्ड था, सो शुरू से ही पढ़ाई पर फोकस करना शुरू कर दिया….

उधर बड़े भैया का बी.एड कंप्लीट होने को था, घर में खर्चे भी कंट्रोल में होने शुरू हो गये थे क्योंकि बड़े भैया की पढ़ाई का खर्चा तो अब नही रहा था, और आने वाले कुच्छ महीनो में अब वो भी जॉब करने वाले थे.

हम दोनो भाई-बेहन ने भाभी से जुगाड़ लगा कर एक व्हीकल लेने के लिए पहले भैया के कानो तक बात पहुँचाई और फिर हम सबने मिलकर बाबूजी को भी कन्विन्स कर लिया, जिसमें छोटे भैया का भी सपोर्ट रहा.

अब घर के सभी सदस्यों की बात टालना भी बाबूजी के लिए संभव नही था, ऐसा नही था कि उनको पैसों का कोई प्राब्लम था, लेकिन एक डर था कि मे व्हीकल मॅनेज कर पाउन्गा या नही.

सबके रिक्वेस्ट करने पर वो मान गये और उन्होने एक बिना गियर की टू वीलर दिलवा दी, अब हम दोनो भाई-बेहन टाइम से स्कूल पहुँच जाते थे.

दीदी ने भी चलाना सीख लिया तो कभी मे ले जाता और कभी वो, जब मे चलाता तो वो मेरे से चिपक कर बैठती और अपने नये विकसित हो रहे उरोजो को मेरी पीठ से सहला देती.

जब वो चलती तो जानबूझ कर अपने हिप्स मेरे आगे रगड़ देती, जिससे मेरा पप्पू बेचारा पॅंट में टाइट हो जाता और कुच्छ और ना पता देख मन मसोस कर रह जाता, लेकिन दीदी उसे अच्छे से फील करके गरम हो जाती.

ऐसे ही कुच्छ महीने और निकल गये, इतने में बड़े भैया को भी एक इंटर कॉलेज में लेक्चरर की जॉब मिल गयी, लेकिन शहर में ही जिससे उनके घर आने के रूटिन में कोई तब्दीली नही हुई.

इस बार स्कूल में आन्यूयल स्पोर्ट्स दे मानने का आदेश आया था, रूरल एरिया का स्कूल था सो सभी देहाती टाइप के देशी गेम होने थे, जैसे खो-खो, कबड्डी, लोंग जंप, हाइ जंप…लड़कियों के लिए अंताक्षरी, संगीत, डॅन्स…

मेरी बॉडी अपने क्लास के हिसाब से बहुत अच्छी थी, सो स्पोर्ट्स टीचर ने मेरे बिना पुच्छे ही मेरा नाम स्पोर्ट्स के लिए लिख लिया, और सबसे प्रॅक्टीस कराई, जिसमें

मेरा कबड्डी और लोंग जंप में अच्छा प्रद्र्षन रहा और मे उन दोनो खेलों के लिए सेलेक्ट कर लिया.

सारे दिन खेलते रहने की वजह से शरीर तक के चूर हो रहा था, पहले से कभी कुच्छ खेलता नही था, तो थकान ज़्यादा महसूस हो रही थी.

स्कूल से लौटते ही मेने बॅग एक तरफ को पटका और बिना चेंज किए ही आँगन में पड़ी चारपाई पर पसर गया. सारे कपड़े पसीने और मिट्टी से गंदे हो रखे थे.

थोड़ी ही देर में मेरी झपकी लग गयी, जब भाभी ने आकर मुझे इस हालत में देखा तो वो मेरे बगल में आकर बैठ गयी, और मेरे बालों में उंगलिया फिराते हुए मुझे आवाज़ दी.

मेने आँखें खोल कर उनकी तरफ देखा तो वो बोली – क्या हुआ, आज ऐसे आते ही पड़ गये, ना कपड़े चेंज किए, और देखो तो क्या हालत बना रखी है कपड़ों की.. बॅग भी ऐसे ही उल्टा पड़ा है…

किसी से कुस्ति करके आए हो..? मेने कहा नही भाभी, असल में आज स्कूल में स्पोर्ट्स दे के लिए गेम हुए, और मेरा दो खेलों के लिए सेलेक्षन हो गया है.

सारे दिन खेलते-2 बदन टूट रहा है, कभी खेलता नही हूँ ना.. इसलिए.. प्लीज़ थोड़ी देर सोने दो ना भाभी..

अरे.. ! ये तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन ऐसे में कैसे नींद आ सकती है, शरीर में कीटाणु लगे हुए हैं, चलो उठो ! पहले नहा के फ्रेश हो जाओ, कुच्छ खा पीलो, फिर देखना अपनी भाभी के हाथों का चमत्कार, कैसे शरीर की थकान छुमन्तर करती हूँ.. चलो.. अब उठो..!

और उन्होने जबर्दुस्ति हाथ से पकड़ कर मुझे खड़ा कर दिया, और पीठ पर हाथ रख कर जबर्जस्ति पीछे से धकेलते हुए बाथरूम में भेज दिया….!

 
बीते एक साल में मोहिनी का बदन पहले से भर गया था, उसके बूब्स भी अब ज़्यादा बड़े-2 दिखने लगे थे, कुल्हों का उठान अब साड़ी में साफ-2 दिखता था. कुल मिलकर अब वो एकदम कड़क माल होती जा रही थी.

सनडे के सनडे राम मोहन अपनी प्यारी पत्नी की अच्छे से सर्विस जो कर जाते थे.

फ्रेश होकर मुझे भाभी ने बादाम वाला दूध दिया और साथ में कुच्छ बिस्कट बगैरह दे दिए, मेने कहा भाभी इनसे क्या होगा, मुझे तो खाना खाना है,

तो उन्होने प्यार से झिड़कते हुए कहा – नही आज से इस टाइम तुम खाना नही खाओगे, खाना में स्कूल के लिए रख दिया करूँगी, तो रिसेस में खा लिया करना, घर आकर बस हल्का फूलका और खाना सीधे रात को ही.

अब तुम्हें मे .मेन बना के छोड़ूँगी… मे चाहती हूँ मेरा देवर अपने पूरे परिवार में सबसे ज़्यादा ताक़तवर हो… जब सीना तान कर चले तो लगे मानो कोई शेर आ रहा हो..

मेने हँसते हुए कहा क्यों भाभी खाम्खा मुझे चढ़ा रही हो..

तो वो बोली – तुम इसे मज़ाक समझ रहे हो.. चलो अब छत पर ! तुमहरे बदन की मालिश करनी है फिर देखना कैसा तुम्हारी थकान कोसों दूर खड़ी दिखेगी.

हम दोनो छत पर आ गये, हमारे आधे पोर्षन पर दो-मंज़िला बना हुआ था, वाकई हमारे अलावा आस-पास किसी का इतना उँचा मकान नही था.

गाओं के दूसरे छोर पर सिर्फ़ प्रधान का ही घर हमारे से उँचा था, लेकिन बहुत दूर था वो हमसे.

उपर दो बड़े-2 कमरे और उनके आगे एक वरांडे, इस सबकी एक कंबाइंड छत काफ़ी लंबी चौड़ी थी, जो चारों तरफ 2.5 फीट उँची बाउंड्री से कवर की हुई थी.

भाभी ने एक बिछावन नीचे डाला और मुझे अपनी बनियान उतारकर उसपर लेटने को कहा, नीचे में बस एक टाइट हाफपेंट ही पहने हुए था.

भाभी ने अपनी साड़ी के पल्लू को दुपट्टा की तरह अपने सीने पर कसकर लपेटा और उसे पीठ पर से लाते हुए अपनी कमर में खोंस लिया, कसे हुए ब्लाउस और साड़ी के बाहर से ही उनके सुडौल बूब्स एकदम उभर कर बाहर को निकल आए.

वो मेरे बाजू में उकड़ू बैठ गयी, अपने साथ लाई एक कटोरी जिसमें गुनगुना सरसों का तेल था उसे मेरे सर पास रख दिया, फिर अपने हाथों में ढेर सारा तेल ले कर मेरे सीने और कंधों की मालिश करने लगी.

भाभी के गोरे-2 मुलायम हाथ मेरे शरीर पर उपर-नीचे हो रहे थे, उनकी एक साइड की मांसल जाँघ मेरी कमर से रगड़ रही थी, जब वो उपर को आती तो जाँघ के साथ-2 उनके पेट का हिस्सा भी मेरे शरीर से रगड़ जाता.

मे अपनी आँखें बंद किए हुए ये सब फील कर रहा था, और धीरे-2 एक अजीब सी उत्तेजना मेरे शरीर में भरती जा रही थी.

सीने और कंधों की मालिश के बाद वो थोड़ा नीचे की तरफ हुई और अब उनकी जांघों का एहसास मुझे अपनी जाँघ के निचले भाग पर हुआ, अब वो मेरे पेट और उसके साइड की मालिश करने लगी.

जब उनके हाथ मेरे दूसरी साइड की मालिश करते तो उन्हें ज़्यादा झुकना पड़ता जिससे उनका पेट मेरे कमर से टच होता. ना चाहते हुए भी मेरे हाफपेंट में उभार सा बनाने लगा.

फिर उन्होने मेरे पैरों की तरफ रुख़ किया और पैर के पंजों से शुरू करते हुए वो उपर की तरफ आने लगी, घुटनो के उपर उनके हाथों को फील करते ही मेरी उत्तेजना और बढ़ने लगी और मेरी लुल्ली कड़क हो गयी.

भाभी के हाथ जांघों की मालिश करते हुए उपर और उपर की तरफ आते जा रहे मेने हल्के से अपनी आखें खोलकर देखा तो मालिश करते हुए उनकी नज़र मेरे उभार पर ही टिकी हुई थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी.

अब भाभी ने मुझे पलटने के लिए कहा- तो में अपने पेट के बल लेट गया. उन्होने अपनी साड़ी को घुटनों तक चढ़ाया और मेरे उपर दोनो तरफ को पैर करके अपने घुटनो पर बैठ गयी..

लाख कोशिशों के बबजूद भी जब वो मालिश करते हुए हाथ अपनी तरफ करती तो उनके गद्दे जैसे मुलायम नितंब मेरी कमर से टच हो जाते, फिर वो जैसे-2 नीचे को खिसकती गयी अब उनके मोटे-2 चूतड़ मेरी गांद के उपर थे.

जब वो अपना दबाब मेरे उपर डालती तो मेरी नीचे कड़ी हुई नुन्नि जो छाती से दबी हुई थी और ज़्यादा फूलने लगी, मारे उत्तेजना के मेरे मुँह से सिसकी निकलने लगी..

भाभी मन ही मन हसते हुए बोली – क्या हुआ लल्ला जी.. कोई प्राब्लम है..?

अब मे उनको क्या बताऊ कि मुझे क्या प्राब्लम है.. ? फिर भी मेने उनको कहा – आह.. भाभी ज़ोर्से अपना वजन मत रखो, मुझे छत के फर्श से दुख रहा है..

वो – कहाँ दुख रहा है… ?

मे – अरे समझा करो भाभी आप भी ना ! मेरी कमर में और कहाँ ..

वो – ओह्ह्ह.. तो मालिश बंद कर्दु.. ?

मे – नही ! लेकिन थोड़ा वजन कम रखो ना प्लीज़ … फिर वो थोड़ा नीचे को मेरी जांघों के उपर बैठ गयी तो मुझे कुच्छ राहत मिली,

लेकिन अब उन्हें मेरे कंधों तक पहुँचने में ज़्यादा झुकना पड़ रहा था तो उनकी मुनिया मेरी गांद से रगड़ खाने लगी.

उन्हें अब और ज़्यादा मज़ा आने लगा और मालिश के बहाने और तेज-2 हाथ चलाने लगी, कुच्छ देर बाद ही वो अपनी रामदुलारी को मेरी गांद के उपर चेंप कर हाथों को मेरी पीठ पर टिकाए अकड़ कर बैठ गयी और कुच्छ देर ऐसे ही शांत बैठी रही.

मेने सर घूमाकर पीछे देखने की कोशिश की तो उन्होने अपने हाथों का दबाब मेरी पीठ पर और बढ़ा दिया जिसके कारण में देख नही पाया कि वो ऐसे क्यों शांत बैठी हैं..

मालिश करने के बाद जब वो मेरे उपर से उठ गई, तो मे कुच्छ देर यूँही उल्टा पड़ा रहा, क्योंकि मे अपने उभार को दिखाना नही चाहता था.

वाकाई में मेरे शरीर की अकड़न एक दम चली गयी थी, वो बिना कुच्छ कहे अपने कपड़े ठीक करके नीचे चली गयी और मे वहीं पड़े-2 नींद में डूबता चला गया…

अब भाभी रोज़ सुबह 5 बजे मुझे जगा देती, और फ्रेश होके कसरत करवाती, वोही देशी डंड बैठक.. और कुच्छ देशी एक्सर्साइज़.. उसके बाद नहाना-धोना, स्कूल के रेडी होकर एक लीटर बादाम का दूध पिलाती.

स्कूल में भी रोज़ गेम्स की प्रॅक्टीस होती, फिर शाम को मालिश, भाभी की मस्तियाँ बढ़ती जा रही थी, लेकिन एक अनदेखी दीवार थी जो हम दोनो को रोके हुए थी अपनी हदें पार करने से.

दूसरी ओर रामा दीदी भी मौका निकाल ही लेती मौज मस्ती का. अब उन दोनो के साथ क्या होता था, मुझे नही पता, लेकिन ऐसे मौकों पर मेरा हाल बहाल हो जाता था, और कुच्छ कर भी नही सकता था, क्योंकि यही पता नही था कि करूँ तो क्या..?

स्पोर्ट्स डे तक मेरा शरीर भाभी की मालिश, खेलों की प्रॅक्टीस और कसरतों की वजह से एक दम पत्थर जैसा हो चुका था,

लोंग जंप में, मे अपने स्कूल में सबसे आगे था, और कबड्डी में भी मेरी वजह से हमारी क्लास के आगे 12थ की भी टीम हार जाती थी.

 
फाइनल डे को जो होना था वही हुआ, लास्ट में कुस्ति की प्रतियोगिता भी हुई, जिसमें मेने हिस्सा तो नही लिया था, लेकिन 11थ का एक लड़का जो चॅंपियन हो गया था पास के ही गाओं का, वो घमंड में आगया और उसने पूरे स्कूल के बच्चों में ओपन चॅलेंज कर दिया.

टीचर्स को उसकी ये बात बुरी लगी, तो प्रिन्सिपल ने अपनी तरफ से बड़ा सा इनाम घोसित करके बोले- सभी बच्चो सुनो, तुम लोगों में से जो भी बच्चा इस लड़के को हरा देगा उसे में अपनी तरफ से **** इनाम दूँगा..

जब कोई आगे नही आया तो मेरे क्लास टीचर बोले – क्यों अंकुश तुम भी नही लड़ सकते इससे..?

मे – नही सर ! मुझे कुस्ति लड़ने का कोई आइडिया नही है, और ना ही मे लड़ना चाहता हूँ.. .

वो मेरे पास आए और धीमी आवाज़ में बोले- मे जानता हूँ तुम्हारे अंदर इससे बहुत ज़्यादा ताक़त है, बस इसके पैंट्रों पर नज़र रखना और अपना बचाव करते रहना.

जब ये थकने लगे तभी उठाके पटक देना… देखो ये अपने स्कूल की इज़्ज़त का सवाल है, ये लड़का इतनी बदतमीज़ी से सबको चॅलेंज कर रहा है, और .अब तो अपने प्रिन्सिपल साब की भी इज़्ज़त दाँव पर लग गयी है.

मेने कहा ठीक है सर अगर आप चाहते हैं तो मे कोशिश ज़रूर करूँगा.

उन्होने फिर अपनी तरफ से ही अनाउन्स कर दिया कि इससे अंकुश लड़ेगा.

फिर हम दोनो में कुस्ति हुई, वो दाँव पेच में माहिर था, लेकिन ताक़त में मेरे मुकाबले बहुत कम, तो जैसे मेरे टीचर ने बोला था में कुच्छ देर उसके दाव बचाता रहा, फिर एक बार फुर्ती से में उसके पीछे आया और उसकी कमर में लपेटा मारकर दे मारा ज़मीन पर.

लेकिन साला हवा में ही पलटी खा गया और चीत नही हुआ, अब में उसके उपर सवार था और उसको चीत करने की कोशिश करने लगा. जब उसे लगा कि अब वो ज़्यादा देर तक मेरे सामने नही टिक पाएगा, तो उसने अपनी मुट्ठी में रेत भरकर मेरी आँखों में मार दी.

मे बिल-बिलाकर उसे छोड़ कर अपनी आँखो पर हाथ रख कर चीखने लगा, मौका देख कर वो मेरे पीछे आया और मेरी कमर में लपेटा लगा कर मुझे उठाना चाह रहा था, मॅच रफ्फेरी फाउल की विज़ल बजा रहा था लेकिन उसने उसकी नही सुनी.

जैसे ही उसने मुझे उठाने की कोशिश की मेने अपनी एक टाँग उसकी टाँग में अदा दी और ताक़त के ज़ोर्से मेने उसके हाथों से अपने को आज़ाद किया, और पलट कर एक हाथ उसकी गर्दन में लपेटा,

मेने बंद आँखों से ही उसकी गर्दन को कस दिया.

उसने अपनी गर्दन छुड़ाने की लाख कोशिश की लेकिन टस से मस नही हुई, आख़िरकार उसकी साँसें फूलने लगी और रेफ़री ने आकर उसे मेरी गिरफ़्त से छुड़ा लिया.

कोई मेरे लिए पानी ले आया था तो मेने मिट्टी को धोने के बाद अपनी आँखों में पानी मारा, आँखें खुलने तो लगी लेकिन सुर्ख लाल हो चुकी थी.

जब मेरी नज़र उसपर पड़ी तो अभी भी वो ज़ोर-ज़ोर से साँसें ले रहा था और मुझे खजाने वाली नज़रों से घूर रहा था.

प्रिन्सिपल ने उसकी जीत का इनाम उसे नही दिया, और दोनो इनाम मुझे देने लगे, तो मेने मना कर दिया.. और कहा – सर क़ायदे से तो वो अपना मॅच जीत ही गया था, अब ठीक है घमंड में आकर चॅलेंज दे बैठा.

मेरी बात मान कर उसको उसका इनाम दे दिया गया. मुझे तुरंत डॉक्टर को दिखाया और दवा डलवाकर और अपना इनाम लेकर हम घर लौट आए…!

बाहर चौपाल पर ही बाबूजी बैठे थे, उन्होने मेरी आखें देखकर पुछ लिया तो दीदी ने उन्हें सारी बात बता दी.

उन्होने मुझे शाबासी दी और अपने गले से लगा लिया…

मेरे हाथों में दो-दो ट्रोफी देखकर भाभी फूली नही समाई, और उन्होने मुझे अपने सीने से कस लिया, उनकी आँखें डब-डबा गयी…

मेने कारण पुछा तो वो बोली – आज मे अपनी ज़िम्मेदारियों में पास हो गयी, इससे ज़्यादा मेरे लिए और क्या खुशी की बात हो सकती है, माजी ने जिस विश्वास से तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में सौंपा था उसमें मे कितना सफल हुई हूँ ये मुझे इन ट्रॉफिशन के रूप में दिख रहा है...

बाबूजी दरवाजे के पीछे से ये सारी बातें सुन रहे थे, उनसे भी रहा नही गया और अंदर आते हुए बोले- सच कहा बहू तुमने..

आज तुम्हारे कारण मेरा बेटा ये सब कर पाया है.. शायद विमला भी इतना नही कर पाती जितना तुमने इन बच्चों के लिए किया है..

पिताजी की आवाज़ सुन कर भाभी ने झट से अपने सर पर पल्लू डाला और उनके पैर पड़ गयी…

जुग-जुग जियो मेरी बच्ची… तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे संस्कार कितने महान हैं, इतने कम उमर में तुमने इस घर को इतने अच्छे से संभाला है.

मे हर रोज़ भगवान का कोटि-2 धन्यवाद करता हूँ, कि उन्होने हमें एक दुख के बदले तुम्हारे रूप में इतनी बड़ी सौगात दी है.. जीती रहो बेटा.. और अपने घर को इसी तरह सजाती संवारती रहो.. इतना बोल अपनी भीगी आँखें पोन्छ्ते हुए बाबूजी बाहर चले गये….

ऐसी ही कुच्छ खट्टी-मीठी, यादों के सहारे, आपस में मौज मस्ती करते हुए समय अपनी गति से बढ़ता रहा, और देखते-2 हमारे एग्ज़ॅम की डेट भी आ गई..

हम दोनो बेहन भाई पढ़ाई में जुट गये, हम दोनो देर रात तक जाग-2 कर पढ़ते रहते, बीच-2 में आकर भाभी देखने आ जाती की किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही है.

दोनो बड़े भाई भी बीच-2 में घर आते और हमें अपने एग्ज़ॅम के एक्सपीरियेन्सस शेयर करके एनकरेज करते.

एक दिन पढ़ते-2 मे थक गया, तो पालग पर लंबा होकर पढ़ने लगा, ना जाने कब मेरी आँख लग गयी और अपने सीने पर खुली बुक रखकर गहरी नींद में सो गया.

पढ़ते-2 रामा जब बोर होने लगी, रात काफ़ी हो गयी थी, आँखों में नींद की खुमारी आने लगी थी, अपनी किताबें उसने टेबल पर रखी. जब उसकी नज़र अपने छोटे भाई पर पड़ी, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

कुच्छ देर वो अपने भाई के मासूम चेहरे को देखती रही, जो सोते हुए किसी मासूम से बच्चे की तरह लग रहा था. उसने धीरे से उसके हाथों के बीच से उसकी बुक निकाली और टेबल पर रख दी.

कुच्छ सोच कर एक शरारत उसके चेहरे पर उभरी और लाइट ऑफ करके वो उसीके बगल में लेट गयी.

छोटू पीठ के बल सीधा लेटा हुआ था, उसके दोनो हाथ उसके सीने पर थे, रामा कुच्छ देर दूसरी ओर करवट लिए पड़ी रही फिर उसका मन नही माना तो वो अपने भाई की तरफ पलट गयी.

अपने एक बाजू को वी शेप में मोड़ कर अपने गाल के नीचे टीकाया और अपने सर को उँचा करके उसने छोटू के चेहरे को देखा, वो अभी भी बेसूध सोया हुआ था.

रामा थोड़ी सी उसकी तरफ खिसकी और हल्के से उसने अपने शारीर को अपने भाई से सटा लिया, और अपनी उपर वाली टाँग उठाकर छोटू के ठीक जांघों के जोड़के उपर रख लिया. कुच्छ देर वो योनि पड़ी रही, फिर वो अपनी टाँग को उसके हाफ पॅंट के उपर रगड़ने लगी.

उसकी टाँग की रगड़ से छोटू की लुल्ली जो अब एक मस्त लंड होती जा रही थी, धीरे-2 अपनी औकात में आने लगा. उसके लौडे का साइज़ फूलता देख रामा कुच्छ सहम सी गयी और उसने अपनी टाँग की घिसाई बंद करदी.

लेकिन कुच्छ देर तक भी छोटू के शरीर में कोई हलचल नही हुई, तो उसकी हिम्मत और बढ़ी और उसने उसके हाथ को अपने सीने पर रख लिया और उपर से अपना हाथ रख कर अपने मुलायम कच्चे -2 अमरूदो पर रगड़ने लगी.

छोटू के हाथ को अपने अमरूदो पर फील करके वो अपनी आँखें बंद करके मुँह से हल्की-2 सिसकियाँ लेने लगी. जैसे-2 उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, उसकी झिझक, उसकी शर्म, भाई-बेहन वाला बंधन सब सिसकियों के माध्यम से बाहर होते जा रहे थे.

उसका शरीर अब मन-माने तरीक़े से थिरकने लगा, और अब वो उसके हाथ के साथ-2 अपनी प्यारी दुलारी मुनिया को अपने भाई की जाँघ से सटा कर उपर-नीचे को होने लगी.

छोटू को नींद में किसी दूसरे शरीर की गर्मी का एहसास हुआ तो उसकी नींद खुल गयी, एक बार उसने अपनी बेहन की तरफ देखा और उसने फिर से अपनी आँखें कस्के बंद कर ली और वो भी मज़ा लेने लगा.

रामा की पाजामी अब थोड़ी-2 गीली होने लगी थी, उसके गीलेपन का एहसास उसकी नंगी जाँघ पर हो रहा था.

अब रामा ने उसका हाथ अपनी गीली चूत के उपर रख दिया और उसे मसलवाने लगी. थोड़ी देर तक अपनी बेहन के हाथ के इशारे से ही वो उसकी गीली चूत को सहलाता रहा, फिर अचानक अपनी उंगली मोड़ कर उसकी चूत जो केवल पाजामी में ही थी, के उपर से सी कुरेदने लगा.

रामा उत्तेजना के आवेग में सब कुच्छ भूल गयी और उसे ये भी एहसास नही रहा कि उसके भाई की उंगली उसकी मुनियाँ को कुरेद रही है, वो बस अपनी बंद आँखों से नीची आवाज़ में मोन करने में लगी अपने कमर को तेज़ी से हिलाए जा रही थी.

एक साथ ही उसका पूरा बदन इतनी ज़ोर से आकड़ा और उसने छोटू के हाथ को बुरी तरह से अपनी राजकुंवर के उपर दबा दिया और उससे चिपक गयी…

दो मिनिट तक वो ऐसे ही चिपकी रही, फिर जब उसका ऑरगसम हो गया तब उसे होश आया और वो उससे अलग होकर लेट गयी.

कुच्छ देर पहले हुए आक्षन को जब उसने अपने दिमाग़ में रीवाइंड किया तब उसे ध्यान आया कि कैसे उसके भाई की उंगली उसकी चूत में घुसी जा रही थी. झट से उसके दिमाग़ ने झटका खाया, कि ये सब उसने नींद में नही किया है.

तो क्या वो जाग रहा था..?? उसने डरी-डरी आँखों से एक बार फिर अपने भाई की तरफ देखा, और जब उसे उसी तरह सोता हुआ पाया तो उसने अपने दिमाग़ को झटक दिया..

और मन ही मन फ़ैसला भी सुना दिया कि ऐसा कुच्छ भी नही हुआ, वो तो सो रहा है.. और अपने मन को तसल्ली देकर वो भी अपने बिसतर पर जाकर लेट गयी, और कुच्छ ही देर में नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.….

सुबह में जल्दी उठ गया था, फ्रेश-व्रेश होकर भाभी किचेन में थी, उन्होने मुझे चाइ दी बाबूजी को देने के लिए, मेने बाहर जा कर बाबूजी को चाइ दी,

उन्होने मुझे अपने पास बिठाया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे एग्ज़ॅम की तैयारियों के बारे में पुछा.

फिर उनका खाली कप लेकर किचेन में रखा, और आँगन में आकर चारपाई पर बैठ गया. थोड़ी देर में दीदी भी फ्रेश होकर बाथरूम से निकली, मेने उन्हें गुड मॉर्निंग विश किया.

उन्होने बड़ी बारीकी से मेरे चेहरे को देखा जब मेरे चेहरे पर उन्हें सामान्य से ही भाव दिखे तो मुस्कराते हुए उन्होने मेरे विश का जबाब दिया और मेरे माथे पर एक किस करके मेरे पास बैठ गयी.

हम दोनो ने साथ में नाश्ता किया, कुच्छ देर भाभी के साथ हसी ठिठोली की और फिर बैठ गये पढ़ाई करने…..!

हमारे बोर्ड एग्ज़ॅम ख़तम हो चुके थे और सम्मर वाकेशन चल रहा था.. आगे दीदी का ग्रॅजुयेशन करने का विचार था, लेकिन बाबूजी उन्हें शहर भेजना नही चाहते थे, तो प्राइवेट करने का फ़ैसला लिया.

बड़े भैया शहर में रहकर जॉब कर रहे थे, और हर सॅटर्डे की शाम घर आते, मंडे अर्ली मॉर्निंग निकल जाते. जॉब के साथ-2 बड़े भैया ने पोस्ट ग्रॅजुयेशन भी शुरू कर दिया था, आगे उनका प्लान पीएचडी करके प्रोफेसर बनाने का था.

कभी-2 मनझले भैया भी आ जाते थे और अब वो ग्रॅजुयेशन के फाइनल एअर में आने वाले थे.

जब रामा दीदी के प्राइवेट ग्रॅजुयेशन करने की बात चली, तो मेने भैया को सजेशन दिया कि क्यों ना भाभी को भी फॉर्म भरवा दिया जाए, वो भी ग्रॅजुयेशन कर लेंगी.

बाबूजी समेत सब मेरी तरफ देखने लगे, भाभी तो मेरी ओर बलिहारी नज़रों से देख रही थी.

दोनो भाइयों ने कुच्छ देर बाद मेरी बात का समर्थन किया, अब सिर्फ़ पिताजी के जबाब की प्रतीक्षा थी. सब की नज़रें उनकी ही तरफ थी.

बाबूजी – तुम क्या कहती हो बहू..? क्या तुम आगे पढ़ना चाहती हो..?

भाभी ने घूँघट में से ही अपना सर हां में हिला दिया… तो बाबूजी ने मुझे अपने पास आने का इशारा किया..

मे डरते-2 उनके पास गया.. उन्होने मेरे माथे पर एक किस किया और बोले – मेरा बेटा अब समझदार हो गया है .. है ना बहू.. जुग-जुग जियो मेरे बच्चे.. मे तो चाहता हूँ कि शिक्षा का अधिकार समान रूप से सबको मिले.. यही बात मेने अपने भाइयों को भी समझाने की कोशिश की लेकिन तब उनकी समझ में मेरी बात नही आई,

लेकिन अब वो भी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे.. चलो देर से ही सही शिक्षा का महत्व समझ तो आया उनकी.

भाभी का मन गद-गद हो रहा था, जैसा ही अकेले में उन्हें मौका मिला, अपने सीने से भींच लिया मुझे और मेरे चेहरे पर चुम्मनों की झड़ी लगा दी…

 
मे डरते-2 उनके पास गया.. उन्होने मेरे माथे पर एक किस किया और बोले – मेरा बेटा अब समझदार हो गया है .. है ना बहू.. जुग-जुग जियो मेरे बच्चे.. मे तो चाहता हूँ कि शिक्षा का अधिकार समान रूप से सबको मिले.. यही बात मेने अपने भाइयों को भी समझाने की कोशिश की लेकिन तब उनकी समझ में मेरी बात नही आई,

लेकिन अब वो भी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे.. चलो देर से ही सही शिक्षा का महत्व समझ तो आया उनकी.

भाभी का मन गद-गद हो रहा था, जैसा ही अकेले में उन्हें मौका मिला, अपने सीने से भींच लिया मुझे और मेरे चेहरे पर चुम्मनों की झड़ी लगा दी…

थॅंक यू लल्लाजी, तुमने मेरे दिल की बात सबके सामने कह कर मुझे बिनमोल खरीद लिया. आगे पढ़ने की मेरी कितनी ख्वाइश थी, लेकिन जल्दी शादी होने से मन की मन में ही रह गयी.

उस दिन के बाद भाभी का झुकाव मेरी तरफ और ज़्यादा हो गया, और वो हर संभव मुझे अधिक से अधिक खुशी देने की कोशिश करती.

एक दिन सभी भाई घर पर ही थे, बाबूजी बाहर चौपाल पर बैठे, लोगों के साथ गॅप-सडाके में लगे थे.. कि अचानक भाभी का जी मिचलाने लगा और वो श्रिंक मे जा कर उल्टियाँ करने लगी.

अब घर में और कोई बुजुर्ग महिला होती तो वो उनकी परेशानी को समझती.. आनन फानन में बड़े भैया ने उनको स्कूटी पर बिठाया और कस्बे में डॉक्टर को दिखाने चल दिए.

ना जाने क्या हुआ होगा, ये सोचकर मे भी अपनी साइकल जो काफ़ी दिनो से कम यूज़ हो रही थी, उठाई और उनके पीछे-2 चल पड़ा.

डॉक्टर ने उनका चेक-अप किया और भैया से बोले- बधाई हो राम मोहन, तुम बाप बनाने वाले हो..

भैया की खुशी का ठिकाना नही रहा, फिर डॉक्टर की फीस देकर वो बोले- छोटू तू अपनी भाभी को लेकर घर चल में साइकल से आता हूँ, कुच्छ मिठाई-विठाई लेकर..

रास्ते में मेने भाभी को छेड़ा – क्यों भाभी बधाई हो, अब तो आप माँ बनोगी.. लेकिन अपने बच्चे की खुशी में अपने इस नालयक देवर को मत भूल जाना..

वो मेरी पीठ पर अपना गाल सटा कर मुझसे लिपट गयी और बोली- तुम मेरे बच्चे नही हो..? जो मे भूल जाउन्गी..! हां ! आइन्दा ऐसी बात भी मत करना.. वरना में तुमसे कभी बात नही करूँगी.. समझे…

मे – अरे भाभी ! मे तो मज़ाक कर रहा था.. क्या मुझे पता नही है कि आप मुझसे कितना प्यार करती है..

ऐसी ही बातें करते-2 हम घर आ गये… जब घर पर सबको ये खुशख़बरी सुनाई तो सब खुशी से नाचने लगे..

घर में उत्सव जैसा माहौल बन गया था, भैया ने पूरे गाओं में मिठाई बँटवाई, हमारे पूरे परिवार ने मिलकर हमारी इस खुशी में साथ दिया.

भाभी जा रही थी.... पता नही मेरे मन में दो तरह के भाव क्यों आ रहे थे, बोले तो डबल माइंड.. एक तो इस बात की खुशी थी कि भाभी इतने सालों में अपने घर जा रही थी, दूसरा उनसे इतने सालों बाद बिछड़ना हो रहा था.

सच कहूँ तो मुझे उनकी आदत सी हो गयी थी, तो उनके जाने के समय कुच्छ उदास सा हो गया.. जिसे भाभी ने ताड़ लिया और मुझे अकेले में लेजा कर समझाने लगी..

लल्लाजी क्या हुआ..? मेरे जाने से खुश नही हो..?

मे – नही भाभी ! आपको इतने सालों बाद अपने घर जाने का मौका मिला है, मे भला क्यों खुश नही होऊँगा..?

वो – (मेरे गाल पकड़ते हुए), तो फिर ऐसे मुँह क्यों लटका रखा है..?

मे – पता नही भाभी एक तरफ तो आपके जाने की खुशी भी है कि चलो इतने दिनो बाद आपको अपने घर जाने का मौका मिल रहा है,

दूसरी ओर ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंदर से कोई चीज़ निकल कर आपके साथ जा रही हो, और मे खाली-2 सा होता जा रहा हूँ..

भाभी कुच्छ देर शांत खड़ी मेरे चेहरे को देखती रही.. फिर अचानक उनकी पलकें भीग गयी, और रुँधे स्वर में बोली – ये मेरे प्रति तुम्हारा लगाव है, जो स्वाभाविक है.. और ऐसा नही कि ये स्थिति केवल तुम्हारी ही है… मेरा भी कुच्छ ऐसा ही हाल है.

तुम्हारी भावना तो केवल मेरे लिए ही हैं तब इतना दुख हो रहा है, लेकिन मेरा तो पूरे घर के साथ है तो सोचो मेरा क्या हाल हो रहा होगा…

फिर भी अगर तुम नही चाहते कि मे जौन तो नही जाउन्गि…

मे – नही..नही..! भाभी प्लीज़ आप मेरी वजह से अपनी खुशी कुर्बान मत करिए, दो महीने की ही तो बात है..

भाभी चली गयी और मे अपना जी कड़ा करके उन्हें बस स्टॅंड तक विदा करके आया.

मन्झ्ले भैया का ये फाइनल एअर था, उन्होने डिसाइड किया था कि वो इस साल के पीसीएस के एग्ज़ॅम में बैठेंगे… बड़े भैया की भी यही सलाह थी जिस पर पिताजी को भी कोई आपत्ति नही थी.

हम बेहन भाई की रास्ते की मस्तियाँ बंद हो गयी थी, लेकिन घर में हम एक दूसरे को छेड़ने का मौका निकाल लेते थे, अब इसमें रेखा दीदी भी शामिल हो गयी थी.

एक दिन दीदी मुझे गुदगुदाके भाग गयी, और दूर खड़ी अपनी जीभ निकाल कर चिढ़ा ने लगी तो मे भी उनकी तरफ भागा… लेकिन वो मेरे हाथ नही आ रही थी..

फुर्रर इधर- तो फुर्रर उधर, किसी तितली की तरफ निकल जाती, एक दो बार हाथ आई भी तो झुक कर अपने को छुड़ा लेती और फिर दूर भाग जाती.. यहाँ तक कि हम दोनो की साँसें उखाड़ने लगी.

अब ये मेरे लिए प्रस्टीज़ इश्यू बनता जा रहा था, मे उनको ज़्यादा खुलेतौर पर टीज़ नही करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नही क्या चल रहा था, मे जैसे ही जाने दो सोचके खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती…

मेने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा… इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे..

 
अब ये मेरे लिए प्रस्टीज़ इश्यू बनता जा रहा था, मे उनको ज़्यादा खुलेतौर पर टीज़ नही करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नही क्या चल रहा था, मे जैसे ही जाने दो सोचके खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती…

मेने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा… इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे..

मेने एक लंबी सी छलान्ग लगाई और इससे पहले कि वो संभाल कर भाग पाती मेने पीछे से उनकी कमर में लपेटा मार दिया.

वो नीचे को झुकती चली गयी, मे उनके उपर था.. पीठ मेरे सीने से सटी हुई थी, मेने उनको अपनी बाजुओं में कस कर उठा लिया.. वो खिल-खिला रही थी, और मुझसे छोड़ने के लिए बोलती जा रही थी.

उनके हाथ मेरे हाथों के उपर थे, लेकिन उनसे वो मेरे हाथों पर दबाब डाले थी, उन्हें छुड़ाने का कोई प्रयास नही था.

मेरी हाइट दीदी से कुच्छ ज़्यादा ही थी, उनको उपर उठाते हुए मेरे हाथ उनके पेट से सरक कर थोड़ा उपर को हो गये और उनके अमरूद के निचले हिस्से को टच होने लगे.

दीदी लगातार खिल-खिलाए जा रही थी और अपने हाथों से मेरे हाथों को और उपर को खिसकने की कोशिश कर रही थी, अब उनकी कमर का उपरी हिस्सा मेरे ठीक पप्पू के सामने था जो कमर के दबाब से फूलने लगा था.

दीदी ने अब अपने को छुड़ाने के बहाने अपने को और झुकाया और मेरी बाजुओं पर झूल गयी, अपने दोनो पैर हवा में उठा लिए और उन्हें मेरे घुटनों पर जमा लिया.

उसके बाद उन्होने अपनी कमर को और उपर की ओर उच्छला… अब उनके गोल-मटोल चुतड़ों की दरार ठीक मेरे अकड़ चुके पप्पू के सामने थी, वो लगातार मुझसे छोड़ने के लिए बोल रही थी और साथ ही अपने गांद को मेरे बाबू के उपर रगड़ रही थी.

हम दोनो के ही मुँह लाल पड़ गये थे… अभी कुच्छ और आगे होता उसके पहले बाहर के दरवाजे से एक और खिल-खिलाहट की आवाज़ सुनाई दी…

मेने दीदी को छोड़ दिया और हम दोनो ने ही पीछे मुड़कर देखा, दरवाजे पर आशा दीदी खड़ी ताली बजा-बजा कर हमारा खेल देखते हुए हंस रही थी.

आशा – वाह ! भाई-बेहन अकेले अकेले ही खेल में लगे हो… अरे भाई हमें भी शामिल कर्लो…

रामा – देखो ना दीदी, ये छोटू बहुत तंग करता है मुझे, ऐसा कस कर पकड़ लिया कि छोड़ ही नही रहा था..

मे – अच्छा मेरे गुदगुदी किसने की थी हां ! अब बताओ दीदी को.. खुद शुरू करती है, और दोष मेरे उपर डाल रही है..

आशा – अरे बस करो तुम दोनो और बताओ कोई काम-वाम तो नही है तुम दोनो को..?

दोनो एक साथ – नही ऐसा तो कोई काम नही है..

आशा – तो चलो क्यों ना हम लोग खेतों में चलें, वही बाग़ में बैठ कर खेलते हैं, यहाँ कितनी गर्मी है..

मेने कहा – हां दीदी चलो वहीं चलते हैं…. फिर हम बाबूजी को बता कर तीनों खेतों की तरफ चल दिए, जो बस घर से कोई आधा किमी की दूरी पर ही थे…

हमारी लंबी चौड़ी ज़मीन थी, ज़मीन के लगभग सेंटर में 4 एकर का आम और अमरूद का बाग था, जिसमें और भी आमला, बेर जैसे पेड़ थे, लेकिन मुख्य तौर पर आम और अमरूद ही थे.

बगीचे के चारों तरफ के हिस्से बराबर -2 खेत चारों भाइयों में बँटे हुए थे. गाओं की तरफ का हमारा हिस्सा था, और उसके ठीक ऑपोसिट आशा दीदी के खेत थे, चारों की ज़मीन की सिंचाई हमारे ही टबवेल से होती थी.

ये सीज़न आमों का था, लेकिन कच्चे आम लगे थे, पकने में अभी कम से कम एक महीना और लगनेवाला था.

हम तीनों आम के बगीचे में जहाँ घने पेड़ थे उनके नीचे एक चादर बिछा कर बैठ गये, और कार्ड्स खेलने लगे.

गर्मियों की चिलचिलाती दोपहरी में घर से ज़्यादा यहाँ रहट थी, वैसे तो हवा ज़्यादा नही थी, फिर भी जब भी हवा का झोंका आता, तो बड़ी ठंडक पहुँचती उस तमतमाति गर्मी में.

कार्ड खेलते -2 हमें पूरी दोपहरी निकल गयी, 3 बजे रामा दीदी बोली, यार अब चलो, बोर हो गये खेलते-2…

तभी आशा दीदी बोली चलो ठीक है, लेकिन कुच्छ आम ले लेते हैं, शाम को चटनी बनाने के काम आएँगे..

आशा दीदी बोली – छोटू तू ट्राइ करना कुच्छ आम तोड़ने की.. तो मे उचक कर कुच्छ नीचे की तरफ लटके आमों को तोड़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन काफ़ी कोशिश करने पर भी उन्तक पहुँच नही पाया.

दोनो दीदी मिट्टी के ढेले उठाकर आमों को निशाना लगाकर तोड़ने की कोशिश करने लगी, लेकिन निशाना नही लग पा रहा था और एक-आध लगा भी तो कच्चे आम मिट्टी के ढेलों से नही टूट पाए..

आशा – छोटू यार ! तू घोड़ा बन जाय तो तेरे उपर चढ़ कर मे या रामा पहुँच सकती हैं आमों तक.

मे अपने घुटने टेक कर घोड़ा बन गया, पहले रामा दीदी ने ट्राइ किया लेकिन वो नही पहुँच पाई, फिर आशा दीदी ने भी ट्राइ किया, उनका वजन थोड़ा ज़्यादा था, लेकिन मेने उनको भी सहन कर लिया, लेकिन नतीजा वोही धाक के तीन पात.

आशा दीदी बोली, यार ! ये तो बात नही बन रही, तू पेड़ पर चढ़के नही तोड़ सकता क्या.. अब मे आज तक किसी पेड़ पर नही चढ़ा था, तो मेने मना कर दिया…

फिर वो बोली – तो एक काम कर, मुझे उचका दे… मे तोड़ लूँगी..

मेने रामा दीदी की ओर देखा, तो वो मन ही मन मुस्करा रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में कुच्छ नही बोली, मुझे चुप रहते हुए वो फिर बोली- अरे उचका ना ! बिंदास, सोच क्या रहा है.. तू भी ना… !

मेने आशा दीदी को जैसे ही पीछे से पकड़ने की कोशिश की तो वो पलट गयी और वॉली – आगे से उठा, जिससे तुझे भी दिखे कि और कितना उपर करना है…

मेने थोड़ा झुक कर उनकी जांघों को अपने बाजुओं में लपेटा और उपर को उठाया...इस पोज़िशन में उनका यौनी प्रदेश मेरे कमर से थोड़ा उपर माने पेट पर था और उनके बूब्स मेरे मुँह से थोड़ा सा नीचे थे.

उनकी मोटी-2 मांसल जांघों के एहसास ने मेरे शरीर में झुरजुरी सी दौड़ा दी, भारी-भारी गोल मुलायम चुचियों का उपरी भाग मेरी ठोडी को सहला रहा था.

दो-चार आम तो उनकी हद में आ गये और उन्होने उन्हें तोड़ लिया, लेकिन और भी तोड़ने के लिए अभी भी वो नही पहुँच पा रही थी..

आशा – छोटू ! भाई और थोड़ा उपर कर ना !

मेने उन्हें और 6-8” उपर किया तो मेरा मुँह ठीक उनके बूब्स के बीच में आ गया, मेरे गाल उनकी चुचियों पर थे…

अचानक उनके मुँह से एक हल्की से सिसकी निकल गयी.. ईीीइसस्स्शह…सीईईईईईई.., मेने कहा- क्या हुआ दीदी..? तो वो फ़ौरन बोली – कुच्छ नही तू ऐसे ही पकड़े रह बस मे आम को पकड़ने ही वाली हूँ… अरे हिल मत…ना..!

मेरा मुँह और नाक उनकी मोटी-2 चुचियों में दब रहा था, तो उसको थोड़ा इधर-उधर किया… इससे मेरी नाक उनकी चुचियों पर रगड़ने लगी…

वो तो आम तोड़ना भूल कर अपनी आँखें बंद करके मस्ती में खो गयी…

मेरा भी नीचे तंबू बनता जा रहा था, फिर अचानक रामा दीदी बोली – अरे दीदी ! तोडो ना आम जल्दी उसको प्राब्लम हो रही है, कब तक वो ऐसे उठाए खड़ा रहेगा..?

आशा – अरे तोड़ तो रही हूँ… ! छोटू ! भैया थोडा पीछे को हो ना ! ये चार आम थोड़े तेरे पीछे को हैं..

मे जैसे ही थोड़ा पीछे को हुआ, मुझे पता नही था कि ज़मीन थोड़ा उबड़-खाबड़ है, मेरा पैर एक गड्ढे में चला गया और मे पीछे को गिरने लगा…

छोटूऊऊऊऊऊओ….संभाअल… वो चिल्लाई… लेकिन एक बार बॅलेन्स क्या बिगड़ा कि धडाम से में पीछे को गिर पड़ा… आशा दीदी मेरे उपर… उनकी राम दुलारी मेरे आकड़े हुए पप्पू को किस कर रही थी…

उसके 34” के दोनो उभार मेरे सीने में दबे पड़े थे, उत्तेजना के कारण दीदी के निपल भी कड़े होकर मेरे सीने में चुभन पैदा कर रहे थे.

मेरे दोनो हाथ अभी भी उनकी मस्त गद्देदार गांद पर थे… मुझे पता नही चला कि कही चोट-वोट भी लगी है, मे तो बस उनके मादक शरीर के नीचे पड़ा उनकी आँखों में झाँक रहा था, जिसमें एक निमंत्रण दिखाई दिया…

वो भी ऐसे ही कुच्छ देर मज़े के आलम में खोई रही… रामा दीदी पास में खड़ी खिल-खिला रही थी…

फिर मुझे अपनी पीठ में कुच्छ चुभता सा महसूस हुआ और मेने उनसे कहा- अरे दीदी ! उठो मेरी पीठ टूट गयी..!

वो – तो पहले तू मुझे छोड़ तो सही, तभी तो मे उठुँगी…! तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोनो हाथ उसके चुतड़ों पर कसे हुए हैं.

जब मेने उन्हें छोड़ा, तो अपनी चूत को मेरे पप्पू के उपर ज़ोर से रगड़ा और एक मादक सिसकी भरती हुई वो मेरे उपर से उठ गयी…

मे जैसे ही खड़ा हुआ तब मुझे अपनी पीठ में दर्द का एहसास हुआ.. क्योंकि जहाँ में गिरा था, वहाँ एक छोटा सा ब्रिक (एंट) का टुकड़ा पड़ा हुआ था और उस साले ने मेरी पीठ को चटका दिया था.

मे आहह भरते हुए उठा… तो रामा दीदी बोली – क्या हुआ छोटू..? चोट लग गयी क्या..?

मे – हां दीदी इस पत्थर से मेरी पीठ टूट गई शायद, तो आशा दीडे ने मेरी शर्ट उपर करके अपने हाथ से कुच्छ देर सहलाया और बोली- रामा घर जाकर थोड़ा इयोडीक्स की मालिश कर देना ठीक हो जाएगा..

इसी तरह की चुहल बाज़ियों में समय व्यतीत हो रहा था, मेरी दोनो बहनें मेरे साथ दिनो दिन खुलती जा रही थी.. और मे उनकी हरकतों से बुरी तरह उत्तेजित हो जाता था, लेकिन कुच्छ कर नही पाता…

मेने अभी तक अपने लौडे को हाथ में लेकर सिवाय मुताने के और कोई उसे नही किया था.. मन ही मन सोचता था, कि काश इसके आगे भी कुच्छ कर पाता.. लेकिन क्या ? ये कोई आइडिया नही था..

मेरा कोई ऐसा दोस्त भी नही था जिससे मे इस तरह की बातें शेयर कर पाता.. वो दोनो तो मुझे गरम करके अपना काम निकाल कर अपने रास्ते हो लेती और मे यूँ ही चूतिया बना रह जाता…

 
आख़िरकार छुट्टियों के दिन बीत गये.. और मेने 11थ में अड्मिशन ले लिया.. स्कूल शुरू होने के कुच्छ दिन बाद ही भाभी लौट आई, मतलब बड़े भैया ले आए अपनी ससुराल जाकर…

आख़िर उनके भी तो लौडे में खुजली होती ही होगी…भाभी ने आते ही मेरी क्लास ले ली, और वो जो टाइम टेबल बना कर गयी थी, उसके बारे में पुछा जिसे मे एक अग्यकारी शिष्य की तरह ईमानदारी से पालन कर रहा था.

उन्होने मुझे गले से लगा लिया और मेरा माथा चूम कर मुझे अपनी गोद में लिटाया और बीते दिनो का सारा प्यार उडेल दिया.

मे अकेला स्कूल जाने वाला ही रह गया था, मनझले चाचा के बच्चे तो अपने मामा के यहाँ शहर में रह कर पढ़ रहे थे. और मेरी दीदी समेत वाकी की 12थ तक की पढ़ाई पूरी हो गयी थी.

भाभी की प्रेग्नेन्सी को जैसे -2 दिन बढ़ रहे थे, उनके शरीर में कुच्छ ज़्यादा ही बदलाव दिखने लगे थे, उनके वक्ष और कूल्हे एक दम ऑपोसिट साइड को बाहर निकलते जा रहे थे.

यही नही, वो दिनो दिन बोल्ड भी होती जा रही थी. एक दिन मालिश करते-2 भाभी ने मेरी हालत बहुत खराब कर दी.

ना जाने आज उनको क्या सूझी की अपनी साड़ी उतार कर एक तरफ रख दी, और मात्र ब्लाउस और पेटिकोट में मेरे पप्पू के उपर अपनी उभरी हुई गांद टिका कर मेरे सीने पर मालिश करने लगी.

आगे-पीछे होते हुए उनकी गांद मेरे लंड पर रगड़ा दे रही थी, जिसकी वजह से मेरे लंड महाराज बुरी तरह अकड़ गये, फिर तो उसकी ऐसी रेल बनी कि पुछो मत.

उधर ब्लाउस में कसे उनके उरोज बिल्कुल मेरी आँखों के सामने थे जो झटकों के साथ उच्छल-2 कर बाहर को निकलने पर आमादा दिखाई दे रहे थे.

फिर ना जाने भाभी को क्या सूझी कि वो मेरे उपर ही पसर गयी और उन्होने मेरे होठ अपने होठों में भर लिए, मुझे बड़ा अजीब लगा कि ये कर क्या रही हैं,

जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरे होठों को चूमा था… यही नही, वो अपनी कमर को लगातार ज़ोर-ज़ोर्से मेरे लंड पर घिसने लगी.

15 मिनिट में उन्होने मेरी हालत बैरंग करदी, उनका मुँह लाल भभुका हो गया, बदन भट्टी की तरह तप रहा था, मानो बुखार चढ़ गया हो.

फिर अचानक ही वो शांत पड़ गयी और कुच्छ देर बाद मेरे उपर से उतर कर अपनी साड़ी उठाई और नीचे भाग गयी.

मे बड़ा असमजस में पड़ गया और सोचने लगा कि शायद भाभी को कहीं बुखार तो नही आ गया, जिसकी वजह से वो ऐसी हरकत कर रही थी..

इधर मेरा बुरा हाल था, मेरा मन कर रहा था, कि अपने पप्पू को अंडरवेर से बाहर निकल लूँ और ज़ोर-2 से हिलाऊ, उसे सहलाऊ…. !

आख़िरकार मेने आज पहली बार उसको बाहर निकाल ही लिया और ज़ोर-2 से मसल्ने लगा.

इधर जैसे ही मेरे लंड के टोपे की खाल उपर को खिंची, मुझे बेहद दर्द का भी एहसास हुआ… लेकिन मन करे कि ज़ोर्से इसको रागड़ूं, मसलूं…

अभी मे इसी कस्मकस में था कि क्या और कैसे करूँ कि अचानक भाभी की आवाज़ सुनाई दी….

लल्लाजी !..... ये क्या हो रहा है..?

मेने गर्दन घूमाकर देखा, तो भाभी जीने की सबसे उपरी सीढ़ी पर अपनी कमर पर हाथ रखे खड़ी थी..

मेरी तो गांद ही फट गयी, इधर मेरा पप्पू फुल अकड़ में था… मेने झट से उसे अपने पेट की तरफ लिटाया और अपने शॉर्ट को उपर की तरह खींच कर एलास्टिक छोड़ दी..

चटकककक ! शॉर्ट की टाइट एलास्टिक लंड के ठीक टोपे पर जहाँ उसकी स्किन का जॉइंट था वहाँ पड़ी…..

अरईईई…..मैय्ाआआआआअ………मररर्र्र्र्र्र्र्ररर…..गय्ाआआ……..रीईईईईईईईईईई…

दर्द के मारे मेरी हालत पतली हो गयी और में करवट लेते हुए, अपने घुटनों को पेट पर मोड़ कर लॉट-पॉट होने लगा…!

मुझे दर्द से तड़प्ता देख भाभी दौड़ कर मेरे पास आई, और मेरे सर के पास बैठ, हाथ फेरते हुए बोली – क्या हुआ मेरे राजा मुन्ना को, बताओ मुझे… क्या हुआ..?

मेरे मुँह से कोई शब्द ही नही निकल पा रहे थे… मे लगातार कभी करवट से हो जाता तो कभी पीठ के बल, मेरे घुटने मुड़े ही हुए थे…

मेरी आँखों से पानी निकल आया.. तेज दर्द की लहर मेरी जान ही निकाले दे रही थी.. भाभी मेरे सर को लगातार सहलाए जा रही थी और बार -2 पुछ्ने की कोशिश कर रही थी कि आख़िर मुझे हुआ क्या है..?

जब थोड़ा दर्द में राहत हुई और मेरा चीखना कम हो गया तो उन्होने फिरसे पुछा… देखो लल्लाजी मुझे बताओ…. क्या हुआ है तुम्हें..?

आह्ह्ह्ह…. भाभी मेरे पेट में बहुत तेज दर्द है… मेने बात को छिपाने की कोशिश करते हुए कहा.

मे नही चाहता था कि भाभी को पता चले कि मे क्या कर रहा था..?

वो – देखो झूठ मत बोलो,… पेट दर्द में कोई ऐसा नही बिलबिलाता है… सच-2 बताओ… शरमाओ नही… कहीं कुच्छ बड़ी प्राब्लम हो गयी तो लेने के देने पड़ जाएँगे…

दरअसल उन्होने मुझे वो करते हुए तो देख ही लिया था, तो प्राब्लम भी कोई उसी से रिलेटेड होगी.. इसलिए वो जानना चाहती थी..

मे – नही भाभी सच में मेरे पेट में ही दर्द है.. मेने फिरसे छिपाने की कोशिश की…

वो थोड़ा बनावटी गुस्सा अपने चेहरे पर ला कर बोली – लल्लाजी..! मुझे तुमसे ये उम्मीद नही थी कि मुझसे तुम कोई बात छिपाओगे…!

सच बताओ क्या बात है.. कहीं कुच्छ ज़्यादा प्राब्लम हो गयी तो सब मुझे ही दोष देंगे…, कैसी भाभी है ये..? बिन माँ के बच्चे का ख्याल भी नही रख सकी.. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी भाभी किसी से बात करने लायक ना रहे..?

अब मेरे पास सच बताने के अलावा और कोई चारा नही बचा था… उन्होने एमोशनली मुझे फँसा दिया था..

मेरा दर्द भी अब जा चुका था तो मे उनकी गोद में अपना सर रख कर बोला – भाभी मेरी सू सू मेरे शॉर्ट की एलास्टिक से दब गयी थी.. बस और कुच्छ नही...

वो – लेकिन तुम कर क्या रहे थे सो तुम्हारी वो दब गयी… और इतनी ज़ोर से कैसे दबी कि इतना दर्द हुआ…?

मे – जाने दो ना भाभी.. ! अब सब ठीक है..!

वो – तो तुम मुझे सच-सच नही बताओगे.. हां ! कोई बात नही, आज के बाद मेरे से कभी बात मत करना और उन्होने मेरा सर अपनी गोद से उठा दिया और उठ कर जाने लगी…

मेने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला – मे सब सच बताता हूँ… लेकिन प्लीज़ भाभी मुझसे नाराज़ मत हो.. वरना मे कैसे जी पाउन्गा…?

उन्होने लाद से मुझे अपने सीने में दबा लिया.. उनके मुलायम दूध मेरे मुँह पर दब गये.. कुच्छ देर बाद उन्होने मुझे अलग किया और मेरा माथा चूमकर मेरी ओर देखने लगी…!

मे – भाभी जब आप मालिश कर रही थी, तो आपके चुतड़ों की रगड़ से मेरी सू सू अकड़ने लगी.. मेरे अंदर उत्तेजना बढ़ने लगी… जो निरंतर बढ़ती ही गयी..

जब आप उठकर चली गयी.. तो लाख कोशिश के बाद भी मे अपने आप को रोक ना सका और अपनी लुल्ली को बाहर निकाल कर मसल्ने लगा…

लेकिन आपकी आवाज़ सुन कर मेने जल्दबाज़ी में उसको छुपाना चाहा और झटके से एलास्टिक छूट कर उसके उपर लगी….

भाभी कुच्छ देर चुप रही… और मेरे मासूम चेहरे की ओर देखती रही.. फिर ना जाने क्या सोचकर वो मुस्कराने लगी और मेरे नंगे बदन पर हाथ फेरते हुए बोली – लाओ दिखाओ तो मुझे.. क्या हुआ है वहाँ..?

मेने शर्म से अपने घुटने जोड़ लिए ताकि भाभी कहीं जबर्जस्ती मेरे शॉर्ट को ना खींच दें.. और बोला – नही भाभी ऐसा कुच्छ भी नही हुआ है.. अब दर्द भी नही हो रहा आप रहने दो..!

वो अपनी आँखें तरेर कर बोली – तुम अभी बच्चे हो…, अभी दर्द नही है तो इसका मतलब ये तो नही हुआ कि सब कुच्छ सही है… कही अंदुरूनी चोट हुई तो, बाद में परेशान कर सकती है..

देखो ये शर्म छोड़ो और मुझे देखने दो… फिर उन्होने मुझे लिटा दिया और मेरे शॉर्ट को नीचे करने लगी.. मेने एक लास्ट कोशिश की और उनके हाथ पकड़ लिया..

उन्होने एक हाथ से मेरा हाथ हटा दिया और मेरा शॉर्ट नीचे खिसका कर घुटनो तक कर दिया….

हइई… दैयाआआआअ…….ये क्या है लल्लाआ………? मेरा लंड देखकर उनका मुँह खुला का खुला रह गया और अपने खुले मुँह पर हाथ रख कर वो कुच्छ देर तक.. टक-टॅकी लगाए वो मेरे पप्पू की सुंदर्दता को देखती रह गयी..!

मे – क्यों क्या हुआ भाभी…? ये मेरी लुल्ली ही तो है…!

वो – हे भगवान..! तुम इसे अभी भी लुल्ली ही समझ रहे हो..? ये तो पूरा मस्त हथियार हो गया है..

फिर वो उसकी जड़ को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर इधर-उधर घुमा फिरा कर देखने लगी….

जब उन्होने मेरे टोपे की खाल को पीछे करने की कोशिश की तो वो बस अपना घूँघट की खोल पाया कि मुझे दर्द होने लगा…

अह्ह्ह्ह… भाभी नही … खोलो मत.. दर्द होता है.. जब भाबी ने सुपाडे के पीछे देखा तो मेरी खाल के होल से कोई आधा-पोना इंच नीचे ही जुड़ी हुई थी, जिसे खींचने पर दर्द होने लगता था.

हाए लल्लाजी… तुम्हारा हथियार तो अभी तक कोरा ही है… कभी कुच्छ किया नही इससे..?

मे – हां ! रोज़ ही करता हूँ…. पेसाब..!

वो – खाली पेसाब ?.... और कुच्छ नही..?

मे – नही..! और भी कुच्छ होता है इससे..?

वो – हां लल्लाजी ! और बहुत कुच्छ होता है.. लेकिन ताज्जुब है..! जब तुमने और कुच्छ भी नही किया है अबतक.. तो फिर ये इतना लंबा और मोटा कैसे हो गया…?

मे क्या जानू… ? मेने जबाब दिया तो वो बोली – तो फिर अभी क्यों हिला रहे थे..?

मे – सच कहूँ भाभी.. आप जब भी मालिश करती हो और आपका बदन इससे रगड़ा ख़ाता है… तो मे इतना एक्शिटेड हो जाता हूँ कि कुच्छ पुछो मत…

और जी करने लगता है की इसको मसल डालूं…, कुचल कर रख दूं.. लेकिन दर्द की वजह से कुच्छ कर नही पाता….!

पर आज आपने इसे ज़्यादा ही रगड़ दिया तो मुझसे रहा नही गया और वो करने लगा..

 
मेरा लंड अभी भी ज्यों का त्यों सोता सा एकदम 90 डिग्री पर खड़ा उनकी मुट्ठी में क़ैद था.. उन्होने उसको थोड़ा खोल कर उसके मूतने वाले छेद को अपनी उंगली से सहला दिया.. और बोली – तो अब कैसा लग रहा है..?

सीईईईई…. आहह.. भाभी ये सब मत करो… वरना ये फट जाएगा….

वो – तो इसको शांत कैसे करोगे अब…?

मे – पता नही भाभी इसके पहले ये इतना कभी नही फूला था.. आज तो हद ही हो गयी है.. और अब आपका हाथ लगते ही तो और हालत खराब हो रही है…अह्ह्ह्ह…

प्लीज़ भाभी कुच्छ करो ना ! प्लीज़…… वरना में कुच्छ कर बैठूँगा…!

वो – अच्छा..अच्छा.. शांत रहो.. ! मे कुच्छ करती हूँ, और फिर उसे हिलाने लगी, धीरे-2 बड़े एहतियात से उसको आगे पीछे करने लगी ताकि उसकी स्किन ज़्यादा ना खिंच जाए..

मज़े में मेरे मुँह से आहह….उउउहह…और जल्दीीई.. ऐसी आवाज़ें निकलने लगी… और वो उनकी मुट्ठी में और ज़्यादा फूलने लगा… उसकी नसें उभर आईं.

भाभी की भी एग्ज़ाइट्मेंट बढ़ने लगी, और किसी सम्मोहन सी शक्ति उनके चेहरे को मेरे लंड के नज़दीक और नज़दीक खींचने लगी…..

अब भाभी की गरम साँसें मेरे लंड पर महसूस हो रही थी… उत्तेजना में मेरे कान तक लाल हो गये थे.

आख़िरकार उनके होठों ने मेरे अधखुले सुपाडे को छू ही लिया…

उफफफफफफफफफफफ्फ़………….. मे तो जैसे स्वर्ग में ही उड़ने लगा… उनके होठों के स्पर्श होते ही मुझे एक सुकून सा मिला, और उनके रसीले होठ उसको अपनी क़ैद में लेते चले गये….

देखते-2 उनके होठों ने मेरे पूरे 2” लंबे सुपाडे को जो दहक कर लाल शिमला के सेब जैसा दिख रहा था गडप्प कर लिया….

एक थन्न्न्न्न्न्न्दक्क्क… सी पड़ गयी मेरे लंड में… जैसे किसी गरम चीज़ को एक साथ पानी में डाल दिया हो…

उनकी जीभ मेरे पी होल पर गोल-गोल घूम रही थी… आनंद के मारे मेरी आँखें बंद हो चुकी थी और कमर थर-थराने लगी..

भाभी मेरे पप्पू को अंदर और अंदर अपने मुँह में लेती जेया रही थी, लेकिन खूब कोशिश करके वो उसे करीब आधा ही ले पाई और उतने पर ही अपने होठों से मालिश देने लगी.

भाभी मेरे बगल में ही उकड़ू बैठी थी, लॉड को अंदर-बाहर करते समय उनके मस्त मुलायम बूब्स मेरे पेट और कमर पर रगड़ खा रहे थे.

लंड का जड़ वाला हिस्सा अभी भी भाभी की मुट्ठी में ही था और वो मुँह के साथ-साथ अपने हाथ से भी उसे मसल्ति जा रही थी.

20-25 मिनिट की चुसाई के बाद भी मेरा कुच्छ नही हुआ तो भाभी ने अपना मुँह हटाया और मेरी ओर देख कर बोली – कुच्छ हुआ कि नही..?

मे – बहुत अच्छा लग रहा है भाभी… प्लीज़ रूको मत ऐसे ही करती रहो..!

वो – तुम्हें तो मज़ा आरहा है.. लेकिन मेरा तो मुँह दुखने लगा, और तुम्हारा माल अभी तक नही निकला…

फिर वो मेरी कमर के नीचे की साइड में आकर बैठ गयी और फिरसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगी, अब साथ-2 उनकी उंगलियाँ मेरे टट्टों से खेल रही थी..

मेरा तो मज़ा ही दुगना हो गया और मे अपनी कमर उचका-2 कर उनके मुँह में लंड पेलने की कोशिश करने लगा…

अब भाभी जल्दी से जल्दी मेरा पानी निकालना चाहती थी, क्योंकि उनका मुँह दर्द करने लगा था, बीच बीच में वो अपना एक हाथ अपनी चूत के पास ले जाती.. और उपर से उसकी सहला देती…

अब वो मेरे टट्टों और गांद के होल के बीच की जगह पर नाख़ून से खुरचने लगी…

ऐसा करने से मेरे उस जगह पर करेंट जैसा लगा और मुझे उस जगह से कुच्छ उठता सा महसूस होने लगा.

मेने भाभी के सर पर हाथ रखा और ज़ोर्से अपनी कमर उचका कर अपना ज़्यादा से ज़्यादा लंड उनके मुँह में ठूंस दिया… उनका गला चोक हो गया, में दनादन धक्के मारकर उनके सर को दबाए हुए था.

वो मेरे हाथों को हटाने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी, लेकिन अब में अपने होशो-हवास खो चुका था…,

फिर कुच्छ ऐसा हुआ मानो मेरे टट्टों से कोई बिजली सी दौड़ती हुई मेरे लंड में प्रवेश कर रही हो और मे उनका सर अपने लंड पर कसकर पिचकारी छोड़ने लगा.

मुझे लगा जैसे कोई गरम लावा जैसा मेरे लंड से निकल कर भाभी के मुँह में भर रहा हो.

दो मिनिट तक देदनादन पिचकारी मारने के बाद मेने अपना हाथ उनके सर से हटाया और अपनी कमर को फर्श पर लॅंड करा दिया…..!!

झट से उन्होने अपना सर उपर किया… फल्फला कर ढेर सारी मलाई जैसी उनके मुँह से निकल कर मेरे पेट पर गिरी… उनका मुँह लाल सुर्ख हो रहा था… वो खों-खों करके खांसने लगी, फिर भागते हुए छत पर लगे नल से पानी लेकर मुँह साफ किया..

मे बैठ कर उन्हें ही देख रहा था, मुँह साफ करके वो वापस लौटी और एक प्यार भरी धौल मेरी पीठ पर जमाई और बोली –

जंगली कहीं के… मेरी दम निकालना चाहते थे..? हां ! पता है ! मेरी साँसें बंद होने लगी थी..

मे – सॉरी भाभी वो मे … मुझे… होश ही नही रहा…

भाभी मुस्करा के बोली… मे समझ सकती हूँ.. अच्छा ये बताओ अब कैसा लग रहा है.. कुच्छ हल्का फील हुआ या नही..

मे – हां भाभी ! थॅंक्स.. ! अब मेरी उत्तेजना कुच्छ कम हो गयी है..

भाभी – लेकिन तुम्हारा ये हथियार तो ज्यों का त्यों खड़ा है.. जाओ बाथरूम में जाकर कुच्छ देर इसपर ठंडा पानी डाल लो..

आज पहली बार मुझे पता चला कि लंड से पेसाब के अलावा और भी कुच्छ निकलता है, जो इतना आनंद देता है….

अब तो मे अपने हाथ से भी उस मज़े को लेने की कोशिश करने लगा, लेकिन वो मज़ा नही मिला जो भाभी के चूसने से मिला था.

फिर एक दिन बाथरूम में खड़ा मे अपने लंड को सहला रहा था कि भाभी ने देख लिया और वो डाँट पिलाई कि पुछो मत..

जब मेने कारण पुछा तो वो समझाने लगी – लल्ला देखो ये रोज़-रोज़ की आदत मत लगाओ… ठीक नही है, इससे तुम्हारा शरीर कमजोर होने लगेगा, हो सकता है कोई बीमारी भी लग जाए..

कभी-2 कर लेने में कोई बुराई नही है, पर हाथ से नही… हाथ से करने को मूठ मारना बोलते हैं.. और लिमिट से ज़्यादा मूठ मारने से इसकी (लिंग) नसें कमजोर पड़ जाती हैं..,

यहाँ तक कि आदमी ना मर्द भी हो जाते हैं, और सदी के बाद वो किसी काम के नही रह पाते..

मेने पुछा कि भाभी तो और कॉन कॉन से तरीके हैं उस आनंद को लेने के.. तो वो मुस्काराई… और बोली – लल्ला तुम तो आज ही सब कुच्छ जानना चाहते हो..!

फिर कुच्छ सोच कर वो बोली – उस दिन मेने जिस तरह से तुम्हें रिलीस किया था उसको मुख मैथुन (ब्लोव्जोब) कहते हैं.. असल में तो वो भी सही तरीका नही है..

मे – तो सही क्या है भाभी…?

भाभी – स्त्री-पुरुष के बीच संभोग ही सही तरीका होता है, जो प्राकृतिक माना जाता है.. लेकिन उसके लिए अभी तुम्हारी उमर नही हुई है,

तुम्हारे लिंग की स्किन जो जुड़ी हुई है ना वो भी तभी अलग होगी जब तुम किसी के साथ ये सब करोगे..

लेकिन ग़लती से भी किसी के साथ ऐसे वैसे संबंध बनाने की कोशिश भी मत करना..वरना… ! मुझसे बुरा कोई नही होगा..! जब भी वो समय आएगा, मे खुद तुम्हारी मदद करूँगी…

मेरे उन मेच्यूर दिमाग़ में कुच्छ पल्ले पड़ा कुच्छ नही, पर मे इतना ज़रूर समझ गया, कि भाभी मेरी सब जायज़, नाजायज़ ज़रूरतों का ख्याल रखती हैं, और जब जिस काम की ज़रूरत होगी वो ज़रूर करेंगी..

 
मेरे उन मेच्यूर दिमाग़ में कुच्छ पल्ले पड़ा कुच्छ नही, पर मे इतना ज़रूर समझ गया, कि भाभी मेरी सब जायज़, नाजायज़ ज़रूरतों का ख्याल रखती हैं, और जब जिस काम की ज़रूरत होगी वो ज़रूर करेंगी..

मे अपनी पढ़ाई में जुट गया.. समय निकलता रहा, भाभी की प्रेग्नेन्सी का समय नज़दीक आता जा रहा था, अब उनका पेट काफ़ी बड़ा हो गया था.

मे उनके पेट पर हाथ फेर्कर उनको चिड़ाया करता, कभी उनके पेट पर कान लगाकर बच्चे से बात करता.. छोटी चाची, समय समय पर भाभी की देख भाल कर देती.

आख़िरकार वो समय आ गया और भाभी ने एक प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया.

सभी बहुत खुश थे उस नन्ही परी के आने से जिसका नाम मेने रूचि रखा.

कुच्छ दिनो बाद मेरे एग्ज़ॅम भी हो गये, और अब में एक बार फिर बोर्ड की क्लास में पहुँच गया था.

उधर कृष्णा कांत भैया ने ग्रॅजुयेशन के फाइनल के साथ प्फ्र के एग्ज़ॅम भी दे दिए थे, और उनका सेलेक्षन होना लगभग तय था.

रामा दीदी ने 1स्ट एअर प्राइवेट से क्लियर कर लिया था, लेकिन प्रेग्नेन्सी की वजह से भाभी एग्ज़ॅम नही दे पाई, जिसका उनको मलाल था.

लेकिन वो जिंदगी के आहें एग्ज़ॅम में तो पास हो ही चुकी थी.

कुच्छ दिनो के बाद मनझले भैया का पीसीएस का रिज़ल्ट आ गया, रॅंक के हिसाब से उनको डीएसपी की पोस्ट के लिए सेलेक्ट किया गया था, अब उन्हें कुच्छ महीनो के लिए ट्रैनिंग पर जाना था.

मेरा इस साल बोर्ड था, सभी को मेरे भविश्य की चिंता थी, सो स्कूल के पहले दिन से ही सबका अटेन्षन मेरे उपर ही था.

उस दिन सनडे था, दोनो बड़े भाई भी घर आए हुए थे, कल मंझले भैया को ट्रैनिंग के लिए निकलना था, घर में थोड़ा मिल बैठ कर खाने का प्रोग्राम रखा था.

हमारे परिवार में मेरे यहाँ ही मिक्सर था, जो बड़े भैया की शादी में आया था, और इस समय वो छोटी चाची के यहाँ था, वो किसी काम के लिए ले गयी थी उसे.

वैसे तो चाची को भी हमारे घर ही आना था, लेकिन थोड़ा काम जल्दी हो जाए तो भाभी ने मुझे कहा – लल्लाजी ! छोटी चाची के यहाँ से अपना मिक्सर तो ला दो ज़रा, कुच्छ नारियल वग़ैरह की चटनी भी बना लेंगे..

छोटे चाचा का घर भी बगल में ही था, उन्होने अपने हिस्से में अपनी ज़रूरत के ही हिसाब से दो कमरे और एक छोटा सा किचेन मेन गेट के साथ ही बना रखे थे, वाकई की ज़मीन में उँची सी बाउंड्री से कवर कर रखा था.

बाउंड्री की पीछे की दीवार पर छप्पर डाल कर गाय-भैंस के लिए जगह कर रखी थी उसीके साथ में चारा काटने की मशीन लगा रखी थी जो एक सिंगल फेज़ की मोटर से चल जाती थी.

मे चाची के घर पहुँचा तो उनका मैं गेट अंदर से बंद था, मेने गेट खटखटाया, तो अंदर से चाची की आवाज़ आई… कॉन है…?

मे हूँ चाची… मेने जबाब दिया तो वो बोली – रूको लल्ला .. अभी गेट खोलती हूँ..

थोड़ी देर बाद जैसे ही गेट खुला, सामने चाची को देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी… मुँह खुला का खुला रह गया… और मे फटी आँखों से उन्हें देखता ही रह गया………….

थोड़ी देर बाद जैसे ही गेट खुला, सामने चाची को देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी… मुँह खुला का खुला रह गया… और मे फटी आँखों से उन्हें देखता ही रह गया………….

सामने चाची मात्र एक पेटिकोट में जो उनकी पहाड़ की चोटियों जैसी चुचियों पर सिर्फ़ लपेटा हुआ था और वो उसे एक हाथ से पकड़े हुए थी,

वही पेटिकोट नीचे उनके घुटनों से भी 2-3” उपर तक ही आ रहा था और उनकी गोल-गोल खंबे जैसी मांसल जांघे दिखाई दे रही थी.

गेट खोलते ही वो मुझे देख कर मुस्काराई और बोली – आओ छोटू लल्ला..! और इतना कह कर पलट गयी.. अब उनकी हाहकारी गांद मेरी आँखों के सामने थी.

उनकी गांद पीछे को इतनी उभरी हुई थी कि, कमर के कटाव पर अगर कोई तौलिया रख दिया जाए तो गॅरेंटीड वो गिर नही सकता.

उपर से आगे को खिंचा हुआ पेटिकोट.. लगता था गांद के प्रेशर से कहीं फट ना जाए…

कसे हुए पेटिकोट में उनकी गांद ऐसी लग रही थी मानो दो बड़ेवाले तरबूज फिट हो रहे हों…. दोनो के बीच की दरार तरबूजों की कसावट की वजह से बहुत ही कम दिखाई दी मुझे…

वो अपनी तरबूजों को मटकाते हुए अपने बाथरूम की ओर चल दी जो किचेन के साइड से मात्र 3 फीट की तीन तरफ से ऑट सी लगाकर नहाने-धोने के लिए बना रखा था.

उनके मटकते हुए कूल्हे ऐसे लग रहे थे, मानो एक दूसरे से शर्त लगा रहे हों.. कि मे बड़ा कि तू.…

अब रहने वाले दो ही तो प्राणी थे.., शादी के 10 साल बाद भी इतनी उपजाऊ ज़मीन से भी चाचा कोई फसल नही काट पाए थे.

चाची की इस जान मारु गांद को देख कर मेरा पप्पू फड़कने लगा… अब कुच्छ दिन पहले ऐसा कुच्छ हुआ होता तो शायद मेरे लिए ये नॉर्मल बात होती,

लेकिन अब भाभी ने मेरे नाग से जहर निकाल कर ये जता दिया था, कि नारी का बदन क्या, क्यों और किसलिए होता है..?

वो अपनी लंड फादू गांद को मटकाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ते हुए बोली – और बतो लल्ला.. कैसे आना हुआ..?

मे हड़बड़ा कर बोला – वो चाची… वो..वो.. भाभी ने.. वो मिक्सर लाने के लिए बोला है…

चाची – अच्छा हां ! तुम थोड़ी देर बैठो.. उसके जार को साफ करना है अभी.. मे थोड़ा नहा लेती हूँ.. उसके बाद साफ करके दूँगी..

मे वहीं आँगन में पड़ी चारपाई पर पैर लटका कर बैठ गया, और कनखियों से उनके बाथरूम की तरफ देखने लगा..

 
चाची बैठ कर नहा रही थी, उनके सर के बाल मुझे दिख रहे थे.. वो मुझसे बातें भी करती जा रही थी नहाने के साथ-2.

करीब 10 मिनिट में ही उनका नहाना हो गया और उसी अटॅल पर रखे उनके दूसरे पेटिकोट को उन्होने बैठे-बैठे ही उठाया…

और अपने सर के उपर से अपने शरीर पर डाल लिया, फिर वहीं रखी ब्रा उठाई और उसे पहनने लगी.

में अभी भी चोर नज़रों से उधर ही देख रहा था.. अचानक वो उठ खड़ी हुई, उनका पेटिकोट ठीक वैसे ही था जो नहाने से पहले वाला था.. उनकी कमर से उपर का हिस्सा मुझे दिख रहा था.

उन्होने मुझे आवाज़ दी – अरे छोटू लल्ला ! ज़रा इधर तो आना..,

मे उठकर उनके पास पहुँचा, इस समय उनके गीले बदन से वो पेटिकोट भी जगह-2 गीला होकर उनके बदन से चिपका हुआ था,

गीले कपड़े से उनके शरीर का रंग तक झलक रहा था.

उन्होने पेटिकोट के उपर से ही वो ब्रा जिसकी स्ट्रिप्स अपने कंधों पर चढ़ा कर आगे अपने स्तनों पर पकड़ रखी थी, और उसकी पट्टियाँ जिनको पीछे लेजाकर हुक करते हैं, वो साइड्स से झूल रही थीं.

मे उनके ठीक पीछे जा खड़ा हुआ और बोला – जी चाची .. बताइए क्या काम है..?

वो – अरे लल्ला ! देखो ना ये मेरी अंगिया थोड़ी टाइट हो गयी है, बहुत कोशिश की लेकिन मे अपने हाथ से इसके हुक नही लगा पा रही, थोड़ा तुम लगा दो ना !

मेने उनके दोनो ओर झूल रही पट्टियों को पकड़ा.. तो मेरे हाथ उनके गीले नंगे बगलों से टच हो गये.. मेरे पप्पू ने एक फिर ठुमका मारा...!

फिर उन्होने पेटिकोट को ब्रा के नीचे से निकाल कर हाथों में पकड़ लिया और उसको कमर में बाँधने के लिए अपनी नाभि जो किसी बोरिंग के गड्ढे की तरह दिख रही थी… तक ले गयी,

अब एक हाथ उनका आगे दोनो चोटियों के उपर से ब्रा को थामे था, और दूसरे में पेटिकोट पकड़ा हुआ था….

मेने दोनो तरफ की स्ट्रीप को खींच कर पीछे उनकी पीठ पर लाया.. मेरी दोनो हथेलिया चाची की नंगी पीठ पर धीरे-2 फिसल रही थीं…

ना जाने ये कैसी उत्तेजना थी मेरे शरीर में की मेरे हाथ काँपने लगे….

ब्रा वाकई में कुच्छ ज़्यादा ही टाइट थी, उनके हुक के होल जो धागे के बने हुए थे, उनमें हुक डालने में मुझे बड़ी दिक्कत आ रही थी…

अरे ! खड़े-2 क्या कर रहे हो लल्ला, जल्दी डालो ना.. चाची की आवाज़ सुन कर मेरे हाथ और ज़्यादा काँपने लगे…,

मेने स्ट्रीप को और थोड़ा खींच कर उनके होल के मुँह तक हुक लाकर छोड़ दिए.

चाची को लगा कि अब तो हुक लग ही जाएगा, सो उनका वो हाथ जो ब्रा को आगे से संभाले हुए था, वो भी अब पेटिकोट के नाडे को बाँधने के लिए नीचे कर लिया था...!

जैसे ही मेने हुक को उसके होल में छोड़ा, वो साला होल में जाने की वजाय बाहर से ही स्लिप हो गया… नतीजा… चाची की अंगिया किसी स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह उच्छल कर उनके सामने ज़मीन पर टपक गयी…..

फ़ौरन चाची ने अपना एक हाथ अपनी बड़ी बड़ी चुचियों पर रख लिया…और वो उन्हें ढकने की नाकाम कोशिश करती हुई बोली –

क्या लल्ला… औन्ट हो रहे हो और एक छोटा सा काम नही होता तुमसे…

मेने मरी सी आवाज़ में कहा – मेने पहले कभी डाला नही हैं ना चाची.. तो..

वो – क्या नही डाला अभी तक..?

मे – व.व.उूओ.. हुक कभी होल में नही…. डॅलाया.. सॉरी चाची..

चाची सामने पड़ी ब्रा उठाने के लिए आगे को झुकी, नाडे पर उनके हाथ की पकड़ कम हो गयी और जिस हाथ से उन्होने अपनी चुचियाँ ढक रखी थी उसी हाथ से ब्रा उठाने लगी…

तीन काम एक साथ हुए… गांद पर से उनका पेटिकोट थोड़ा नीचे को सरक गया और उनकी गांद की दरार का उपरी हिस्सा मेरी आँखों के सामने उजागर हो गया,

दूसरा झुकने की वजह से उनकी गांद की दरार ठीक मेरे अकडे हुए लंड पर टिक गयी, और उसकी लंबाई दरार के समानांतर होकर वो एक तरह दरार में सेट हो गया….

तीसरा उनकी नंगी गोल-मटोल बड़ी-2 चुचिया, नीचे को झूल गयी जो मुझे साइड से दिखाई दे रही थी..

मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी…, शरीर जुड़ी के मरीज की तरह काँपने लगा….

लेकिन ना तो मेने पीछे हटने की कोई कोशिश की और ना चाची ने मुझे हटने को कहा.

ब्रा को उठा कर उन्होने अपनी गांद को और थोड़ा पीछे को झटका देकर एक फुल लंबाई का रगड़ा मेरे लंड पर मारा और खड़ी हो गयी…

फिर उन्होने अपनी ब्रा को वैसे ही अपनी चुचियों के उपर रख कर उसी पोज़िशन में रह कर बोली – लल्ला तुम जाओ यहाँ से.. तुम्हारे बस का कुच्छ नही है..वैसे ही पहाड़ हो रहे हो, एक हुक तक नही लगा सकते…

मे – पर चाची वो मिक्सर..

वो – मे अपने साथ लेकर आती हूँ, तुम जाओ.. और हां ! ये बातें किसी से कहना मत.. समझ गये…

मे हां में अपना सर हिलाकर, अपनी गादेन झुकाए वहाँ से लौट आया… लेकिन आँखों में अभी भी वही सीन घूम रहे थे…,

सोच सोच कर मेरा पप्पू अंडरवेर में उच्छल-कूद मचाए हुए था, मे जितना उसको दबाने की कोशिश करता वो उतना ही उच्छलने लगता…

ऐसी हालत में घर जाना मेने उचित नही समझा, और मे खेतों की ओर बढ़ गया…

एक झाड़ी के पीछे जाकर पेसाब की धार मारी, मामला कुच्छ हल्का हुआ.. तो मे घर लौट लिया……!

उस घटना के बाद मेरी हिम्मत नही होती चाची से नज़रें मिलाने की, लेकिन इसके ठीक उलट वो हर संभव प्रयास करती रहती मेरे पास आने का,

मुझे लाड करने के बहाने अपने से चिपका लेती, कभी-2 तो मेरे मुँह को अपने बड़े-2 स्तनों के बीच में डाल कर दबाए रखती…

मे उनकी हरकतों से उत्तेजित होने लगता लेकिन उन्हें अपनी तरफ से टच करने की भी हिम्मत नही जुटा पाता…

कुच्छ दिनो से चाची के मेरे प्रति आए बदलाव को भाभी ने नोटीस किया, लेकिन ये बात उन्होने अपने तक ही रखी…

 
एक दिन सुबह-सुबह की मखमली धूप में छत पर वो अपनी बेटी की मालिश कर रही थी, मे भी उनके पास ही बैठा था,

रूचि के सो जाने के बाद उन्होने मेरे से कहा, चलो लल्लाजी तुम भी अपनी शर्ट उतार दो, लगे हाथ तुम्हारी भी मालिश कर देती हूँ.

अपनी शर्ट उतार कर मे भी वहीं लेट गया, नीचे पाजामा पहना हुआ था, तो भाभी बोली – ये पाजामा पहन कर मालिश कराओगे इसे भी उतारो..

मे – लेकिन भाभी नीचे में खाली फ्रेंची ही पहने हूँ..

भाभी – तो अब मेरे से भी शर्म आ रही है, मे तो तुम्हारा सब कुच्छ देख चुकी हूँ..

मेने हिचकते हुए अपना पाजामा भी निकाल दिया और मात्र फ्रेंची में लेट गया,

भाभी ने कहा – पलट जाओ, पहले पीठ की मालिश करती हूँ, फिर आगे करा लेना.

मे पेट के बल लेट गया, भाभी मेरी पीठ की मालिश अच्छे से रगड़ा लगा कर करने लगी,

जब उन्होने मेरी कमर पर दबाब डालकर मालिश की तो पप्पू भाई को तकलीफ़ होने लगी, और वो घुड़कने लगा.

दरअसल, अकड़ तो वो भाभी के टच करते ही गया था, पर जब कमर पर दबाब पड़ा तो हालत और खराब होने लगी…

जब पीछे की मालिश हो गयी, तो उन्होने मुझे सीधे लेटने को कहा….

वो मेरे सीने की मालिश करने लगी, लेकिन उनकी नज़र मेरे पप्पू पर ही थी, जिसने बेचारी छोटी सी फ्रेंची को ऐसे उठा रखा था, जैसे डब्ल्यूडब्ल्यूई के कोर्ट में बिग शो सामने वाले फाइटर को अपने हाथों पर टाँग लेता है..

लल्लाजी ! रश्मि चाची के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है..? भाभी ने अचानक ये सवाल दागा…नज़रें उनकी अभी भी मेरे अंडरवेर पर ही लगी थी.

मे समझा नही भाभी… किस बारे में ..? मेने उल्टा सवाल किया..

वो – आजकल वो तुम्हें कुच्छ ज़्यादा ही लाड़ करने लगी हैं..

मे – हां ! मेने भी फील किया है… लेकिन इसमें मेरा ख़याल क्यों पुछा आपने..?

भाभी – नही ! मेरा मतलब है… जब वो तुम्हें इस तरह से लिपटा चिपटा कर प्यार जताती हैं, तो तुम्हें क्या फील होता है..? आइ मीन कैसा फील करते हो..?

मे तुरंत ही कोई जबाब नही दे पाया, और चाची के साथ हुई उस दिन वाली घटना मेरे दिमाग़ में घूमने लगी…

जिसका इनस्टिट असर मेरे लंड पर पड़ा और वो भेन्चोद फ्रेंची में फड़-फडाने लगा…

उसकी कुदक्की देख कर भाभी के चेहरे पर एक गहरी स्माइल तैर गयी जिसे मेरे जैसे छोटे दिमाग़ वाले को समझना बस की बात नही थी.

भाभी ने अपना सवाल फिरसे दोहराया… तो मे कुच्छ हड़बड़ा गया और बोला –

म.म.मी..क्या फील करूँगा.. क.क.कुकछ नही … बस यही कि वो मेरी चाची हैं और मुझे प्यार करती हैं..बस… मेने बात संभालने की कोशिश की…

भाभी – लेकिन तुम्हारा… ये पप्पू तो कुच्छ और ही कह रहा है.. ये कहकर भाभी ने मेरे लंड को सहला दिया…!

मे – य.यईी..क्या कह रहा है… मतलब.. आप कहना क्या चाहती हो भाभी..?

भाभी – मेरे प्यारे देवर जी अब तुम इतने भी भोले नही हो कि, जो मे कहना चाहती हूँ, वो तुम नही समझ रहे…

अब सीधी तरह बताते हो या… इसको मे उखाड़ लूँ… और भाभी ने शरारती हसी हँसते हुए मेरे लौडे को ज़ोर से मरोड़ दिया..

आईईईईई…..भाभिईीईई…… क्या करती हो…. दर्द करता है…

तो बताओ… फिर क्या बात है…?

तो मेने उस दिन वाली घटना भाभी को बता दी और कहा- कि उस दिन से ही चाची का बिहेवियर चेंज सा हो गया है…

और सच कहूँ तो भाभी उनकी वो हरकतें मुझे भी अच्छी लगती हैं, लेकिन चाह कर भी अपनी तरफ से कुच्छ करने की हिम्मत नही कर पाता…!

भाभी – वैसे क्या करने का मन करता है तुम्हारा…?

मे इतना एक्शिटेड हो चुका था कि आज किसी तरह अपने नाग का जहर निकालना चाहता था.. जल्दी-2 घर पहुँचा और सीधा बाथरूम की तरफ जा रहा था, कि तभी भाभी सामने आ गई…

वो मेरे चेहरे और लंड की भयंकरता को देखते ही समझ गयी और मुस्कराते हुए बोली… चाची के घर गये थे…?

मे उनको हां बोलकर सीधा बाथरूम में घुस गया.. अभी मेने अपने नाग को पिटारे से बाहर निकालकर हाथ में लेकर हिलाना शुरू किया ही था कि पीछे से भाभी की आवाज़ सुनाई दी…

लल्लाजी ! मेने कितनी बार मना किया है, कि ये हाथ से ज़्यादा मत किया करो.. लेकिन तुम्हारी अकल में ही नही आता है..

मेने फटाफट उसे अंदर किया, और घूम कर बोला – तो मे क्या करूँ भाभी… कैसे शांत करूँ इसे.. आप ही बताइए..?

बभी – अब हुआ क्या है जो इतने उत्तेजित हो रहे हो.. मेने उन्हें अभी-अभी चाची के साथ हुई घटना के बारे में बताया… !

वो मुस्कराते हुए बोली- हूंम्म… तो जैसा मेने सोचा था, वही हुआ..

मे झुँझलाकर बोला – अरे क्या हुआ, और आपने क्या सोचा था ? मेरी तो कुच्छ समझ में नही आ रहा.. ?

भाभी – अभी तुम्हें कुच्छ समझने की ज़रूरत नही है, लाओ इसे मुझे दो मे कुच्छ करती हूँ इसका…!

और उन्होने मेरे लंड को अपने हाथों में लेकर सहलाया, उसके पी होल को अपने नाख़ून से कुरेदने लगी…

मेरी तो सिसकी ही निकल गयी और अपनी आँखे बंद करके आनंद सागर में तैरने लगा… फिर भाभी ने उसे अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू किया…

भाभी ने अपने अंदाज से मेरे लंड को चुस्कर उसका जहर निकाल दिया जिसे उन्होने बड़े चाव से पी लिया… उसके बाद वो बोली ..

अब जाओ और जाकर अपनी पढ़ाई करो.. पता हैं ना इस बार बोर्ड का एग्ज़ॅम है..!

 
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