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वक्त की धूल

चार्लिस एंगलो इंडियन था और उसकी गिनती बेहद खतरनाक इंसानों में की जाती थी । शरीर की बनावट लम्बी-चौड़ी देवकाय- लगभग बीस पच्चीस आदमी उसके नौकर थे– यह सब के सब जरायमपेशा डाकू या कातिल थे । चार्लिस का कारोबार भी काफी फैला हुआ था । तीन जुएखाने चलते थे, इसके अलावा मुजरिमाना जिंदगी के तमाम धंधों से वह निकला हुआ था । बेहद लालची इंसान था– दौलत जिस जरिये से भी आती, उसे प्राप्त करने के लिए वह सभी काम कर सकता था । कई साल पहले भी उसने सोलो के लिए काम किया था लेकिन सोलो पुलिस के शिकंजे में आ गया था फिर शीघ्र ही फरार हो गया था और गिरफ्तारी के दौरान उसने किसी का नाम नहीं लिया था । अतः इस बार भी जब उसने चार्लिस को बुलवाया तो चार्लिस खुशी से उसके लिए काम करने को तैयार हो गया ।

सोलो के इरादे इस बार कुछ अधिक ही खतरनाक थे– इस बार वह किसी देश-विदेश के लिए काम नहीं कर रहा था बल्कि वह इस मुल्क में अपनी जमींदोज सरकार कायम करने आया था । उसकी प्लानिंग भी जबरदस्त थी– वह शुरू में सरकार और पुलिस को ब्लैकमेल करने का खतरनाक इरादा रखता था । उसका कहना था कि दूसरे मुल्कों की अपेक्षा इस देश में यह काम आसानी से हो सकता है । बहुत से असन्तुष्ट नेता उसका साथ देंगे । वह कानून व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करके पहले अपना सिक्का जमाना चाहता था ।

जिस तरह अमेरिका में माफिया काम करती है, ठीक उसी तरह की योजना उसके दिमाग में थी– बेरोजगारी यहाँ बहुत थी, इसलिए ऐसे बेरोजगारों का एक बहुत बड़ा संगठन तैयार करके उन्हें जरायम की जिंदगी में धकेलना आसान काम था । साम्प्रदायिकता की आग बड़ी जल्दी यहाँ भड़काई जा सकती थी और इस तरह के बहुत से नेता यहाँ थे जो इसी की कमाई खाते हैं । वह उन्हीं नेताओं के द्वारा सरकार को ब्लैकमेल करना चाहता था ।

सोलो ने चार्लिस के नाम पर बैंक अकाउंट खुलवा दिया था, जो बीस लाख रुपये से कम नहीं था । चार्लिस की अपनी आवश्यकताओं की समस्या अलग थी– और बीस लाख सिर्फ इसलिए अदा किये थे कि चार्लिस सोलो की आवश्यकतानुसार लोगों को उपलब्ध करने में जितना खर्चा करना चाहे कर ले, और चार्लिस बेहद संतुष्ट था– अब इस बड़ी रकम से चार छः लाख रुपया मार लेना उसके लिए कोई मुश्किल काम नहीं था, लेकिन कुछ और भी परेशानियों की वजह से वह सोलो की साख मजबूत करने के लिए काम करना चाहता था ।
 
अगली बार सोलो ने उसे अपने घटिया से मकान पर बुलाया ।

“बहुत सी बातें करनी हैं तुमसे– बैठ जाओ ।”

“धन्यवाद श्रीमान ! मैं काफी उलझा हुआ हूँ आपके लिए ।”

“क्यों खैरियत ?” सोलो ने पूछा ।

“श्रीमान ! इस मकान में आपके लिए ठहरना आपकी शान के विरुद्ध है । मुझे बेहद दुःख होता है – आपको यहाँ बहुत कष्ट उठाना पड़ता होगा ।”

सोलो मुसकुराने लगा ।

“तुम जैसे आदमी से मैं यह आशा नहीं कर सकता था चार्लिस । स्पष्ट है कि अगर मैं चाहूँ तो यहाँ का सबसे बड़ा होटल खरीद सकता हूँ । कहीं भी ठहर सकता हूँ– लेकिन तुम नहीं समझते– मेरे लिए इससे सुरक्षित जगह फ़िलहाल कोई नहीं । हाँ- अब बताओ तुमने कितने इंसानों को उपलब्ध किया है ?”

“आठ आदमियों से सम्पर्क स्थापित हो गया है– बाहरी प्रांतों के हैं– पर हैं बड़े काम के ।”

“कुल आठ- वह भी बाहर के प्रांतों के ।”

“दरअसल मैं लूले-लफंगों में छटनी न करके चुने हुए लोग आपके लिए जुटाना चाहता हूँ– और इसके लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ रही है ।”

“ऐसा क्यों ? क्या इस शहर के ऐसे काम के आदमी नहीं रहे ?”

“मैं आपसे इसी सम्बन्ध में बात करने वाला था ।” चार्लिस ने कहा – “और तब आपको मालूम होगा कि मैं इस सिलसिले में इतना सतर्क और परेशान क्यों हूँ ?”

“मैं पहेलियों में बात करने का आदी नहीं हूँ– साफ-साफ बताओ ।”

“इस शहर में विक्रांत जैसे काम के आदमी थे– परन्तु वह सब एक के बाद एक गायब होते जा रहे हैं । और डार्लिंग जैसे बदमाश भी हैं– ये जितने भी काम के आदमी यहाँ बचे हुए हैं वह सबके सब हीरा की गुलामी कर रहे हैं और सारी बदमाशी भूलकर सिर्फ वही काम करते हैं जो हीरा उन्हें हुक्म देता है ।”

“हीरा...हीरा...यह कौन है ? यह नाम तो मैं पहली बार सुन रहा हूँ ।”

“कुछ ज्यादा अरसा नहीं हुआ- बस साल भर के अंतराल में यह इंसान एक खतरनाक शख्सियत के रूप में प्रकट हुआ है । बहुत बड़े घर से सम्बन्ध रखता है– शरीफ और सभ्य नागरिक दिखाई देता है– लेकिन हीरा के रूप में उसकी जो शख्सियत अब तक सामने आई है वह बेहद खतरनाक और चालाक मुजरिम की है । जो भी गुंडा या बदमाश उसके विरुद्ध सिर उठाता है वह फिर नजर नहीं आता– छोटे-मोटे बदमाशों पर तो वह खैर हाथ नहीं धरता– परन्तु उसके शिकार हम जैसे लोग हैं । वह किसी की मातहती पसंद नहीं करता और किसी को अपने से अधिक शक्तिशाली देखना भी पसंद नहीं करता । मेरा दावा है कि जब वह आपके नाम का डंका बजता सुनेगा तो उसका रुख आपकी तरफ हो जायेगा । और फिर.... ।” वह कहते-कहते रुक गया ।

“और फिर.... ।” सोलो ने कहा और जोरदार ठहाका लगा दिया ।

“आप इस बात को मजाक में न लें श्रीमान ।”

“नहीं, मैं सीरियस हूँ– और अगर वह सचमुच ऐसी चीज है तो उसे सोलो का जनरल होना चाहिए । सोलो हमेशा ऐसे साथियों की तलाश में रहता है । अगर हीरा के अधीन इतने सारे गुंडे-बदमाश हैं तो हीरा मेरा सबसे पहला टारगेट होना चाहिए । यह तुमने बहुत काम की बात बताई चार्लिस । मुझे अब सबसे पहले इसी आदमी की जरूरत है ।”

“शायद वह आपका जनरल बनना पसन्द न करे ।”

“करेगा....करेगा...उसका बाप भी करेगा ।” सोलो ने खूंखार स्वर में कहा– “अब मुझे हीरा का पूरा विवरण लाकर दो– मैं उसको हर कोण से नाप लेना चाहता हूँ ।”

“टकराव की स्थिति में बहुत खून-खराबा हो सकता है श्रीमान ।”

“यह और भी बेहतर होगा । सोलो ऐसे ही खेल और ऐसे ही आदमी पसंद करता है ।”

चार्लिस सोचने लगा । एक न एक दिन उसे हीरा की गुलामी में आना पड़ सकता है । अभी उसकी नजर उस पर नहीं पड़ी – और इससे पहले कि ऐसा वक्त आये सोलो उसे या तो मिटा देगा या अपने गिरोह में ले लेगा । बहुत दिनों से वह हीरा के खौफ से चिंतित था – अब सोलो ने उसकी चिंता किसी हद तक दूर कर दी थी ।

☐☐☐
 
मिसेज ठाकुर का नाम अब चन्दा था । यह चन्दा अब एक देहाती औरत थी । अपने पति और देवर जी के लिए रोटी लेकर खेतों में आई थी, साथ में ननद भी थी । खेतों से उस पार पहाड़ नजर आते थे और यह सब पहाड़ बस्ती के चारों तरफ ही नजर आते थे ।

मिसेज ठाकुर ने अब सोचना-समझना बन्द कर दिया था । सोचने-समझने की एक सीमा होती है– और जब यह सीमा दिमाग फटने की स्थिति तक फैल जाती है तो इंसान या तो पागल हो जाता है या फिर सोचना छोड़कर अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर देता है ।

कलुवा कहे जोत रहा था । कुछ और लोग भी खेतों में काम कर रहे थे । मिसेज ठाकुर ने रोटी की पोटली एक तरफ रख दी और खेत की मुंडेर पर बैठ गई ।

अचानक उसे अपने करीब ही चीख-पुकार की आवाज सुनाई दी । मिसेज ठाकुर ने चौंककर उसे देखा । चार मुस्टंडे जवान एक देहाती को घसीटते हुए एक खेत में ले जा रहे थे, जहाँ एक जोड़ी बैल जुते खड़े थे ।

“दारू पीकर हल जोतना भी भूल जाता है–चल शुरू हो जा ।” उन मुस्टंडों ने देहाती को हल के पास ले जाकर पलटा ।

“जनाब । आप समझते क्यों नहीं– मेरे बाप दादा ने भी कभी हल नहीं चलाया...क्या मुसीबत है ?” उस देहाती ने चीखते हुए कहा ।

और मिसेज ठाकुर उसकी आवाज सुनते ही उछल पड़ी, वह उसी नौजवान की आवाज थी जिसे वह हीरा के नाम से जानती थी । उसने गौर से देखा तो वही था । मिसेज ठाकुर एकदम से उठ खड़ी हुई ।

“नहीं आता तो आ जायेगा....चल शुरू हो जा... ।” एक नौजवान ने उस पर एक धौल जमाते हुए कहा– “कसम से तूने हमारी बहन को बहुत तंग कर रखा है– आज तो तुझे पूरा खेत ही जोतना पड़ेगा ।”

“ठ...ठहरो...अ...अच्छा....जोतता हूँ ।” नौजवान ने कहा और कराहता हुआ हल पर जा गिरा ।

“ऐसे नहीं– ऐसे ।” एक ने उसे हल पकड़ाते हुए सीधा किया ।

“अरे उधर क्या देख रही है भाभी ।” ननद बोली– “उसका तो रोज का काम है- दारू पीकर सब भूल जाता है- अपनी बीवी तक को नहीं । पहचानता ।”

“कौन है वह ?” मिसेज ठाकुर ने पूछा ।

“फकीरा ।”

“फकीरा ।”

“हाँ – हसीना का शौहर है– बड़ा कामचोर है । तू तो ऐसे पूछ रही है भाभी जैसे कुछ जानती ही न हो ।”

उधर फकीरा उर्फ जय हल जोतने पर आमादा हो गया था । चारों मुस्टंडों में से एक नरम दिल था जो उसे हल चलाना सिखा रहा था । मिसेज ठाकुर उधर ही देख रही थी । कलुवा और फकीरा का खेत बराबर था । कलुवा का भाई जग्गी बीज डाल रहा था ।

मिसेज ठाकुर किसी तरह उस नौजवान से संपर्क स्थापित करना चाहती थी । कुछ ही देर में एक लंबी तगड़ी औरत रोटी लेकर आई और करीब ही एक पेड़ की छाँव में बैठ गई ।

“लो फकीरा की बीवी आ गई ।” ननद ने कहा ।

“फकीरा की बीवी ।” मिसेज ठाकुर का जेहन चकराने लगा ।

उसकी ननद भाइयों के पास खाना लेकर चली गई तो मिसेज ठाकुर को मिसेज फकीरा से बात करने का अवसर मिल गया । वह उसके करीब जा बैठी ।

“तुम कहाँ रहती हो बहन ?” उसने पूछा ।

“कहाँ रहती हो ?” उसने आश्चर्य से मिसेज ठाकुर को घूरा– “अरे चन्दा तू तो ऐसे बात कर रही है जैसे मुझे जानती ही न हो– अरे हमारा ब्याह तो एक ही दिन हुआ था—अब तू मेरे घर का पता पूछ रही है । वाह री– वाह– तुझे क्या हो गया आज ?”

“माफ करना मैं भूल गई थी ।” मिसेज ठाकुर ने बौखलाकर कहा ।

“कोई बात नहीं- और सुना– अब तो कलुवा तेरी ठुकाई नहीं करता ?”

“नहीं – अब सब ठीक है ।”

“अरी सब क्या ठीक है– अपने फकीरे को देखो– दारू पीता है तो मुझे तक भूल जाता है– कामकाज तो इसके बस का नहीं– आज सुबह से ही नाटक कर रहा है– हल चलाना नहीं आता । अब देख चला रहा है न हल ।” हसीना ने कहा – “कलुवा को देखो, दिन-रात काम में लगा रहता है– और एक यह है कि तोबा-तोबा ।”

अचानक जय की निगाह भी मिसेज ठाकुर पर पड़ गई और वह हक्का-बक्का सा रह गया । हल चलाना भूल गया और बैल हल खींचते हुए आगे निकल गए तो जय को झटका सा लगा । वह लड़खड़ा कर खेत में गिर पड़ा ।

अब तो चारों भाई उस पर पिल पड़े ।

जय की चीख-पुकार सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था । और चारों मुस्टंडों से हाथापाई करके वह और भी उलझन में पड़ सकता था । किसी तरह माफी मांगकर वह फिर से हल पर लग गया ।

उधर कलुवा ने कुछ देर बाद काम रोककर हाथ-मुँह धोना शुरू कर दिया । उसने अपनी बीवी को आवाज देकर बुला लिया ।

“हसीना से बातें कर रही थी ।” कलुवा ने पूछा– “तेरी तो पुरानी सहेली है वह... ।”

“जरूर....जरूर...इस फकीरा ने तो नाक ने दम कर रखा है बेचारी का...आ चन्दा बैठकर तू भी कुछ खा-पी ले ।”

“हसीना कह रही थी कि आज मैं उसके घर से होती चलूँ– अगर तुम कहो तो... ।”

अरे क्यों नहीं ? पुरानी सहेलियों के बीच में भला मैं रोकटोक करने वाला कौन होता हूँ ? मगर जरा जल्दी लौट आना, वरना अम्मा की आदत तो तुम जानती ही हो ।”

“मुँह अँधेरे से पहले लौट आऊँगी ।”

मिसेज ठाकुर के दिमाग में अचानक एक योजना ने जन्म ले लिया था । अब वह दुश्मनों की इस बस्ती ने अकेली नहीं थी । खाना खाने के बाद कलुवा फिर से काम पर लग गया और मिसेज ठाकुर हसीना के पास आ बैठी ।

“हसीना– आज तो तेरे घर का हाल देखना चाहती हूँ- ले चलेगी मुझे अपने घर ?”

“अरे क्यों नहीं- वाह- तू साथ चलेगी तो मजा ही आ जायेगा – जरा तू ही इस मुए को कुछ समझा देना ।”

थोड़ी देर बाद जय भी खाना खाने आया– पसीने से लथपथ, हाल से बेहाल वह हसीना के करीब पहुँचा ।

“भूख लग गई होगी तुझे तो फकीरा ।”

“रहम कर– आज तो इतना ही काफी है ।” जय ने कहा – “थककर चूर हो गया हूँ ।”

“रोटी खा ले ।”

जय ने मिसेज ठाकुर की तरफ देखा– दोनों की आँखें चार हुई– मगर कोई कुछ नहीं बोला ।

“हसीना बेगम ! आपकी तारीफ ?” उसने मिसेज ठाकुर की तरफ संकेत किया ।

“हाय अल्ला- फिर दारू पी गया क्या- अरे यह चन्दा है- पहचानता नहीं- मेरी सहेली चन्दा । अरे हमारा ब्याह एक दिन ही हुआ था- याद नहीं आ रहा क्या ?”

“ओहो....हो....हो....चन्दा..है यह तो...कैसी हो चन्दा ?”

“जैसी भी हूँ सब तुम्हारी कृपा है ।”

“मेरी क्या – सब उसकी कृपा है ।” जय ने गहरी साँस लेकर कहा ।

“चन्दा आज हमारे घर चल रही है ।”

“क्यों नहीं...क्यों नहीं...जरूर... ।”

“आ, ले चन्दा- तू भी कुछ खा ले ।”

“नहीं बहन- मैं तो अभी-अभी खाकर निबटी हूँ ।”

मिसेज ठाकुर की युक्ति काम आई । लौटते समय वह हसीना के साथ थी और किसी को संदेह न हो इसलिए जय से उसने कोई ऐसी वैसी बात नहीं की थी । हसीना के चारों लठैत भाई पीछे-पीछे आ रहे थे ।

हसीना के झोपड़े में पहुँचकर चारों भाई रुखसत हो गए और हसीना जय और मिसेज ठाकुर को दालान में छोड़कर झोपड़े के अंदर चौका बर्तन करने चली गई ।

“तुम किस तरह यहाँ आ फंसे ?” मिसेज ठाकुर ने पूछा ।

“जिस तरह तुम... ।”

फिर दोनों ने बताया कि उनके साथ क्या बीती थी और क्या बीत रही है ।

“तुम हीरा नहीं हो सकते । अब मुझे यकीन आ गया कि हीरा वही है – जिसने हमारी यह गत बनाई है ।”

“हाँ – तुम ठीक कहती हो – मैं हीरा नहीं, जय हूँ ।”

“जय !”

“हाँ – मैं सबकुछ तुम्हें बाद में बता दूंगा- पहले दुश्मनों के इस जंगल से निकलने की कोई तरकीब सोचनी चाहिए । मेरा ख्याल है कि उन्ही खेतों के रास्ते हम पहाड़ों की तरफ फरार हो सकते हैं- आगे जैसी भी परिस्थिति होगी हम सामान करेंगे ।”

“क्यों – क्या यहाँ काश्तकारी रास नहीं । आई ?” मिसेज ठाकुर ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में कहा ।

“लानत है- और लानत है इस हथिनी पर- कमबख्त मेरी बीवी बनकर छाती पर मूंग दल रही है ।”

दोनों धीमे स्वर में बातें कर रहे थे । बातें भी अंग्रेजी में हो रही थी ।

“फरारी किस तरह सम्भव है ? और कब ?”

“आज ही... ।” जय बोला- “मुँह अँधेरे तुम यहाँ से घर की तरफ जाओगी तो मैं हसीना से कहूँगा कि तुम्हें घर तक छोड़ आऊँ । इस बस्ती में बिजली नहीं है इसलिये मुँह अँधेरे ही चारों तरफ अंधकार फैल जाता है । हम उसी रास्ते से खेतों तक जा पहुंचेंगे जहाँ आज गए थे- बस आगे जो होगा देखा जायेगा ।”

उसी समय हसीना कॉफी लेकर आ गई ।

और दोनों चुप हो गए ।

☐☐☐
 
बस्ती के चारों तरफ अँधेरा पूरी तरह घिर आया था । रोशनी के छोटे-छोटे बिंदु चमक रहे थे जो उन झोपड़ियों के विस्तार का प्रमाण दे रहे थे ।

वह दोनों बस्ती के बाहर का रुख किये खेतों की तरफ बढ़ रहे थे । दोनों बड़ी सावधानी के साथ बढ़ रहे थे । बस्ती से बाहर निकलकर जब उन्होंने खेतों को पार कर लिया तब कहीं जाकर राहत की साँस ली । उन्होंने वहाँ से एक पगडंडी की राह ली और उस पर बढ़ते चले गए ।

दोनों खामोश थे ।

आकाश पर चंद बादलों के टुकड़े तैर रहे थे– किन्तु सितारों का अमर इतना तो था ही कि वे अपनी राह देख सकते थे । रात चांदनी न थी– किन्तु इसकी उन्हें परवाह भी न थी । वे तो इस बस्ती से अधिकतम दूरी तय करके ही राहत महसूस करते । उनका ख्याल था कि जल्दी ही वे पहाड़ों के दामन में पहुँच जायेंगे । इस बात की सम्भावना भी थी कि वहां जंगल ही जंगल हो – आसपास कोई आबादी न हो । क्या मालूम उन्हें किस परिस्थिति का सामना करना पड़े – इसके बावजूद भी वे बढ़ रहे थे ।

बस्ती अब बहुत पीछे छूट चुकी थी और उनके इर्द-गिर्द अब भी खेतों का सिलसिला फैला हुआ था । यह सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं लेता था । पहाड़ियों के गहरे काले साये तो नजर आते थे परन्तु वे कितनी दूर थे, इसका कुछ पता नहीं चल रहा था ।

चलते-चलते आधी रात गुजर गई– पगडंडी उन्हें कहाँ ले जा रही थी- इसका उन्हें जरा भी आभास नहीं था । चलते-चलते उन्हें कुछ रोशनियाँ टिमटिमाती नजर आईं ।

“शायद हम किसी बस्ती में आ गए हैं ।” जय ने कहा ।

“शुक्र है ईश्वर का ।” मिसेज ठाकुर की हांफती आवाज पीछे से उभरी ।

“चलो जरा जल्दी करो- हम पागलों की बस्ती से निकलकर इंसानों की बस्ती में पहुँच रहे हैं ।”

“लेकिन क्या मालूम- वहाँ इनसे भी अधिक जाहिल लोग रहते हों ।”

“फिर भी हमारे रिश्तेदार तो होंगे नहीं ।”

वे चल रहे थे ।

फिर उन्हें कुछ आवाजें सुनाई दीं । यह आवाजें उसी बस्ती से आ रही थीं । गाने-बजाने की आवाजें थीं । और जहाँ से यह आवाजें आ रही थीं – वहाँ खासी रोशनी भी थी । शायद कोई जश्न मनाया जा रहा था ।

“शादी-ब्याह का जश्न मालूम पड़ता है ।” जय ने कहा ।

फिर दोनों उसी तरफ बढ़ गए ।

उन्हें प्यास भी लग आई थी- उन्होंने सोचा जिस जगह पर जश्न हो रहा है, वहाँ मेहमान लोग भी होंगे- खाने-पीने की व्यवस्था भी होगी- कुछ तो अच्छा खाना मिल जायेगा ।

एक मेहराबी दरवाजे से गुजरकर वे बस्ती में दाखिल हुए और फिर चलते-चलते उस स्थान पर जा पहुँचे जहाँ यह जश्न हो रहा था । यह एक खुला मैदान था– मैदान के बीचोबीच अलाव जल रहा था और उसके ऊपर कोई जानवर लटका हुआ था जिसे चंद नंग-धड़ंग लोग भूनने में लगे थे ।

एक तरफ बहुत सारे लोग जमा थे । दूसरी तरफ एक राजसी कुर्सी रखी थी जिस पर एक खूबसूरत औरत बैठी थी और चंद हिजड़े वहाँ नाच-गा रहे थे ।

“ऐ जी रानी को जन्मदिन मुबारक हो ।”

“हमारी रानी जुग-जुग जिए ।”

इसी तरह की आवाजें उभर रही थी ।

दोनों के बीच चुपचाप भीड़ में जा बैठे ।वहाँ बहुत से जनखे जमा थे । और वे सब बारी-बारी से उठते और नाचते-झूमते रानी को जन्मदिन पर बधाई देते और यह क्रम न जाने कब से चल पड़ा था ।

अचानक अपनी जगह से उठी और कमर को लचका देकर बोली – “ऐ हटो- हम नाचेंगे...हम भी गाएंगे...ऐ अनारकली जरा हमारे पांव में घुंघरू तो बांध दे- फिर हमारी चाल देख ले ।”

रानी की आवाज सुनकर मिसेज ठाकुर चौंक पड़ी । फिर जब रानी को घुंघरू बांधे गए और वह नाचती-गाती भीड़ के सामने से गुजरी तो मिसेज ठाकुर बुरी तरह उछल पड़ी ।

“अ...अमर... ।” वह लरजते स्वर में बोली ।

“क्या बात है ?” जय ने धीमे स्वर से पूछा – “तुम परेशान क्यों हो ?”

“यह....यह....अमर है....यह....रानी.... ।”

“क्या मतलब ?”

“मैं सच कहती हूँ, यह वही हीरा है जिसने हमें इस मुसीबत में धकेल दिया है ।”

हीरा ठुमके लगा रहा था- घूम-घूमकर नाच रहा था । चारों तरफ घी के चिराग जल रहे थे, बीच-बीच में रानी की जय जयकार हो जाती और रानी मस्त होकर नाचे जा रही थी ।

“कहीं तुम्हें कुछ धोखा तो नहीं हुआ है- इसकी शक्ल, इसके हावभाव सब औरतों जैसे हैं- और फिर यह लोग उसे रानी कहकर संबोधित कर रहे हैं ।”

“मैं कहती हूँ यहाँ से भाग चलो जय ! वरना उसने हमें देख लिया तो फिर किसी भारी मुसीबत में फंस जायेंगे ।”

जय को तो जैसे सांप सूंघ गया था – जिंदगी में कभी ऐसे हालात का सामना नहीं किया था । मिसेज ठाकुर तो बिल्कुल ही हताश हो गई थी । उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया था ।

“भाग चलो जय ।”

“भागकर कहाँ जायेंगे ।” जय ने कहा – “जरा सुबह होने दो- जश्न खत्म होने दो । कम से कम इस बस्ती में तो हम कैदी नहीं हैं ।”

जश्न का रंगारंग कार्यक्रम चलता रहा । जब रानी जी नाच गा कर थक गई तो फिर से अपने स्थान पर जा बैठी ।

“चलो री चलो – हो गया जश्न.... ।” अचानक रानी ने कहा- “अब जरा हम बस्ती वालों के मुकदमे तो सुन लें – क्या-क्या हो रहा है यहाँ आजकल- किसने बीवी को मारा और किस बीवी ने पति पर बेलन उठाया – अरी लाजो पेश कर मुकदमे ।”

एक लम्बे चौड़े डील-डौल वाला जनखा हाथ में लम्बी चौड़ी फेहरिस्त थामे खड़ा हो गया ।

“सबसे पहले पेश है छग्गन धोबी का मुकदमा – छग्गन धोबी हाजिर हो... ।”

एक अँधेरे कोने से चंद जनखे एक देवकाय शरीर वाले इंसान को घसीटते हुए रानी के दरबार में ले आये । जय ने देखा- उस तरफ एक बाड़ा सा बना हुआ था – बाड़े का दरवाजा खुला था – छग्गन धोबी को लाया गया, फिर दरवाजा बन्द हो गया- छग्गन धोबी के हाथ पांवों में लोहे की जंजीरे पड़ी थीं ।

“मुकदमा शुरू किया जाये ।” रानी का आदेश हुआ ।

“छग्गन धोबी पर आरोप है कि उसने न सिर्फ कपड़े धोने से इंकार किया बल्कि कपड़ा धुलवाने वालों के साथ मार पिटाई भी की – एक को जान से मार डाला – एक के हाथ पैर तोड़ दिए और फिर चिल्लाकर ऐलान किया कि वह छागो डाकू है- एक एक को भूनकर रख देगा- बस्ती में आग लगा देगा । बस्ती के लोग मारे खौफ के घरों में दुबक गए- फिर बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने इसे पकड़कर गिरफ्तार कर लिया – वरना न जाने छग्गन के पागलपन का दौरा कितनों की जान ले लेता ।”

“हूं.... ।” रानी ने हुंकार भरी – “छग्गन धोबी, तुझे सफाई में कुछ कहना है ?”

“उल्लू के पट्ठों ! मैं छग्गन धोबी नहीं, छागो डाकू हूँ – मैं तुम सबको देख लूँगा – जरा हाथ पांव तो खोलो- फिर बताता हूँ मैं क्या हूँ ?” छग्गन धोबी दहाड़ उठा ।

“छग्गन धोबी को सफाई का पूरा मौका दिया जाये– इसके हाथ-पांव खोल दिए जाएँ ताकि यह साबित कर सके कि यह छग्गन नहीं छागो डाकू है ।”

“जो हुक्म रानी माँ ।” एक हिजड़े ने कहा और तुरन्त छग्गन के हाथ-पांव खोल दिए गए ।
 
छग्गन उर्फ छागो ने अपनी कलाइयों की मालिश करके अपने खून का दौरा दुरुस्त किया – फिर अपनी बड़ी-बड़ी मूँछों पर ताव देता आगे बढ़ा । उसकी निगाह आसपास घूमती हुई रानी पर जाकर ठहर गई । वह धीरे-धीरे चलता हुआ अलाव के करीब पहुँचा जिसके ऊपर अब भी भुना हुआ जानवर लटका हुआ था । फिर उसने बड़ी फुर्ती से एक खूंखरी उठा ली जो मांस काटने के लिए अलाव के करीब ही रखी थी ।

और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता खूंखार चीते की तरह उसने रानी पर छलांग लगा दी ।

“ऐ यह तुम क्या कर रहे हो छागो भैया ।” रानी उछल पड़ी ।

लेकिन छागो ने तब तक रानी को दबोचकर हथियार उसकी गर्दन पर रख दिया और फिर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए बोला– “खबरदार अगर कोई आगे बढ़ा तो अपनी रानी की जान से हाथ धो बैठोगे ।”

लेकिन आगे कोई न बढ़ा – जो जहाँ था वहीं खड़े-खड़े तमाशा देख रहा था ।

“अब तुम्हें मालूम हो गया कि मैं छागो डाकू हूँ – हरामजादों तुमने मुझे इस तिलिस्मी बस्ती में कैद करके धोबी बना डाला, अब तुम्हारी यही रानी मुझे यहाँ से निकालकर ले जायेगी फिर यहाँ से निकलने के बाद मैं अपना गिरोह लेकर आऊँगा और तुम सबको रौंद डालूँगा । ऐसी कई बस्तियों को मैंने आग लगाई है, कत्लेआम किया है– अब तुम सबका काल आ गया है । चलो रानी मुझे इस तिलिस्म से बाहर निकालो- मैंने जब-जब यहाँ से निकल भागने की कोशिश की, घूम-फिरकर इसी बस्ती में लौट आया । चलो आगे बढ़ो ।”

“आय हाय, हम कैसे आगे बढ़ें – हमारे तो पांवों में मेहँदी लगी है ।” रानी ने कहा – “छागो भैया- हमको छोड़ दो- हम मान गए कि तुम छग्गन धोबी नहीं, छागो डाकू हो...हम तुम्हें माफ कर देंगे ।”

“बकवास मत कर ।” छागो ने उसे आगे धक्का देने के लिए झटका दिया । परन्तु रानी को वह टस से मस न कर पाया ।

हमारा गुस्सा बहुत खराब है छागो भैया – कानून को अपने हाथ में म लो –”हथियार फेंक दो ।” रानी ने कहा ।

छागो का गुस्सा तुझसे अधिक खराब है सुअर की बच्ची – जान प्यारी है या नहीं ।”

“अरे हम जी क्या करेंगे- जब दिल ही टूट गया । ऐ छागो इस बात का तो फैसला हो ही जाना चाहिए कि हममें से किसका गुस्सा खराब है- अगर तू जीत गया तो जैसा कहेगा वैसा करूँगी- वरना तुझे छागो नहीं छग्गन धोबी बनना पड़ेगा – ऐ दो दो हाथ कर ले । मुझसे – ले पीट डाल...मार...डाल... वरना चूड़ियाँ पहल डाल ।”

“क्या बकती है ।”

अचानक छागो के पेट पर रानी की कुहनी पड़ी – और यह चोट इतनी जबरदस्त साबित हुई कि छागो की पकड़ ढीली पड़ गई । रानी फुर्ती के साथ उसकी पकड़ से निकल गई ।

“छागो- अगर तू मुझ जैसी नाजनीन से पिट गया तो फिर छागो नहीं छग्गन कहलायेगा- तेरी कलाइयों में लोहे की जंजीरों की बजाय चूड़ियाँ डाल दी जाएँगी- और जीत गया तो तू यहाँ का राजा और मैं तेरी दासी- तेरा ही हुक्म चलेगा यहाँ ।”

छागो विचित्र निगाहों से उसे घूरने लगा ।

“क्या घूर रहा है मुझे...कच्चा खा जायेगा क्या मुझे... हाय मर जाऊँ....मेरी जवानी को घूरे जा रहा है- आ जा आगे- देख रानी का इंसाफ ।”

“कौन हो तुम ?” अचानक छागो ने पूछा ।

“कौन हूँ- ऐ रानी हूँ....रानी राज कंवल हूँ और कौन हूँ ?”

“बकवास – मैंने तुझे कहीं देखा है ।”

“सपने में देखे हैं लोग मुझे ।” उसने लहक कर कहा और कहते-कहते एक लात घुमा दी । लात छागो के पेट पर पड़ी तो वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा ।

“हरामजादी ।” वह उठ खड़ा हुआ और फिर उसने हथियार हाथों में तोलकर रानी पर छलांग लगा दी ।

लेकिन अब वह रानी की परछाई भी नहीं पकड़ पा रहा था – अलबत्ता उस पर लात घूंसे- चप्पलें पड़ रही थीं । उसने हथियार भी फेंक मारा लेकिन वह भी बेकार ही गया । रानी ठुमके लगा-लगाकर उसकी धुनाई कर रही थी ।

अचानक छागो उसकी कमर से जा लिपटा और इस बार दोनों ही गुत्थम-गुत्था हो गए । छागो अब बेहद खौफनाक हो गया था । वह रानी को रगड़ने लगा । वह सिर की टक्करों का इस्तेमाल कर रहा था । हर बार जब वह रानी को पीटता, रानी के मुँह से खुशी की चीख निकलती...एक बार तो उसने हाथ-पांव ढीले ही छोड़ दिए और छागो को भी हाथ-पांव चलाने का अवसर मिल गया । उसने लात-घूंसों की बौछार कर डाली- फिर एक डंडा उसके हाथ में आ गया वह किसी सिद्धहस्त लठैत की तरह डंडा चलाने लगा ।

और रानी– “हाय क्या हाथ है- हाय क्या लात है” कि किलकारियाँ मार रही थी ।

“और मारो मोरे सैंया...मोरे बलमा...दुनिया के सारे मर्द एक जमाने से औरतों पर जुल्म ढाते आये हैं लेकिन मेरी तो तसल्ली ही नहीं होती....छागो पहलवान जरा जोर से.... ।” वह इसी तरह न जाने क्या-क्या चीख पुकार मचाये थी । और छागो भी हिंसक भेदिया बना बैठा था- वह उसकी बोटी-बोटी उड़ा डालना चाहता था ।

फिर अचानक उसके हाथ रुक गए ।

रानी के वस्त्र फट गए थे – और उसका चौड़ा चकला सपाट सीना कई जगह से झलक रहा था । उसके चेहरे का मेकअप भी छूट गया था । वह पिटते समय दीवानी सी अपने बाल नोच रही थी । और लम्बे बालों की विग एक तरफ जा गिरी थी ।

रानी की आँखें बन्द थीं ।

“अरे रुक क्यों गए- आज तो कुछ मजा आया – छागो तो बहुत बड़ा पहलवान था- अरे उठा- उठाकर पटकता क्यों नहीं मुझे – तभी तो समझूँगी तू छागो है ।”

लेकिन छागो को तो जैसे सांप सूंघ गया था ।

“हीरा....हीरा....डाकू....हीरा.... ।” वह बड़बड़ा रहा था ।

तभी तो मैं कहूँ इसकी शक्ल जानी पहचानी क्यों लग रही है । मैंने इसे चम्बल में देखा था ।”

“क्या बक रहा है तू, कम्बल की जरूरत कहाँ से आन पड़ी ।” अचानक रानी ने आँखें खोल दीं । उसकी आँखों में सुर्खी दौड़ रही थी ।

और छागो अचानक छलांग लगाकर वहां से भाग खड़ा हुआ ।

“अरे....रे...कहाँ जाता है । अरे मुझे इस हाल में छोड़कर कहाँ जा रहा है तू... मुझ पर तरस नहीं आता ।” रानी ने चीखकर कहा और फिर छागो के पीछे दौड़ लगा दी ।

कोई भी दर्शक अपनी जगह से नहीं हिला ।

लगभग पंद्रह मिनट तक खामोशी छाई रही । कुछ ही देर में छागो को लादे रानी वहाँ आ गई । छागो का बुरा हाल था । सारे वस्त्र तार-तार हो गए थे, जगह-जगह से खून रिस रहा था और बेहोश हो गया था । रानी को बेहोश छागो को वहाँ पटक दिया ।

बेहोश होने से पहले उसने इकबाल किया था कि वह छागो नहीं छग्गन धोबी है– लिहाजा मुकदमा खत्म हुआ – दूसरा मुकदमा पेश किया जाये ।” रानी ने अपने फटे कपड़ों की परवाह किये बिना सिंहासन संभालते हुए कहा ।

और जय ने सिर को इस प्रकार झटका दिया जैसे अभी तक ख्वाब देख रहा हो ।

जबकि मिसेज ठाकुर मारे खौफ के उसकी गोद में लुढ़ककर बेहोश हो गयीं थी ।

☐☐☐
 
सोलो ने जब देखा कि स्थानीय गुंडे हीरा के विरुद्ध काम करने को तैयार नहीं हैं और हीरा किसी भी कीमत पर उसके आधीन काम नहीं कर सकता तो उसने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए एक विशेष अंदाज इख्तियार कर लिया । एक बार इटली में भी उसने इसी तरह की एक गैंगवार छेड़ी थी– दुश्मन के आर्थिक स्त्रोतों को तबाह करके उसे पंगु बना दिया जाये ।

हीरा के सम्बन्ध में सबसे मुख्य बात यह थी कि वह एक धनवान व्यक्ति का पुत्र था और पीढ़ियों से चली आने वाली रियासती संपत्ति बेहिसाब थी– शायद खुद राजा प्रताप सिंग को नहीं मालूम था कि उनके पास कितनी दौलत है ?

सबसे पहले सोलो ने इस खानदान पर आतंक का सिक्का जमाने की ठान ली और अमर कॉटन मिल्स पर धावा बोल दिया । उस रात वह इलाका बमों के धमाकों से गूंजता रहा– प्रचण्ड अग्नि की लपटों में मिल घिर गयी और उस रात सोलो ने राजा प्रताप सिंग की विशालकाय कोठी में भी बमों के धमाके कर डाले । इन दो घटनाओं में आठ आदमी मारे गए और लाखों की संपत्ति जलकर राख हो गयी ।

सारी रात शहर की सड़कों पर पुलिस पेट्रोल कारें और फायर ब्रिगेड की लारिया दौड़ती रहीं । सोलो की विशेषता थी कि जहाँ वह काम करता था वहां, अपना निशान अवश्य छोड़ देता था ।

राजा प्रताप सिंग की कोठी के दो नौकर मारे गए थे- करीब एक दर्जन आदमी अस्पताल में पहुँच गए थे । खुद राजा प्रताप सिंग बाल-बाल बचे । सोलो की इन हंगामापूर्ण गतिविधियों के कारण हर छोटा-बड़ा व्यापारी, उद्योगपति अपने आपको खतरे में घिरा महसूस करने लगा ।

सोलो का ख्याल था कि उसकी इन हरकतों के कारण हीरा बौखलाकर खुद उसकी तलाश में निकल खड़ा होगा और उसे आसानी से घेरा जा सकेगा । वह जानना चाहता था कि हीरा के विश्वसनीय सहयोगी कौन-कौन हैं ? वह उन सभी लोगों की कमर तोड़ देना चाहता था ।

उधर गुप्तचर विभाग इस नई विपत्ति से परेशान था । सोलो की मौजूदगी उनके लिए दर्देसिर थी । वह इसी तरह का उत्पाती इंसान था – तोड़-फोड़, हिंसा, कत्लोगारत उसका पेशा था । लेकिन इसकी कोई प्रतिक्रिया दो रोज तक नजर नहीं आई, अलबत्ता महानगर के उद्योगपतियों की एक कॉन्फ्रेंस हुई थी और उन्होंने तय किया था कि जब तक सोलो की गिरफ्तारी नहीं होती वे लोग अपने कारोबार बन्द रखेंगे । उनका समर्थन छोटे-मोटे व्यापारियों ने भी किया – और कुछ विपक्षी नेता भी उनसे जा मिले- चुनाचे सरकार को अल्टीमेटम दे दिया गया कि या तो एक सप्ताह के भीतर-भीतर सोलो की गिरफ्तारी की जाये या फिर वे दिल्ली बन्द का आह्वान करेंगे ।

गुप्तचर विभाग ने तुरन्त सोलो की गिरफ्तारी के लिए इंस्पेक्टर पंत को नियुक्त कर डाला– और उसे हर वह सुविधा दी गई जिसकी उसे आवश्यकता पड़ सकती थी । उसे हिदायत दी गई कि वह हीरा का केस रोककर ‘सोलो’ की तलाश जारी कर दे ।

पुलिस-पुलिस ने जगह-जगह छापे भी मारे, परन्तु चंद छोटे-बड़े बदमाशों के अलावा उनके हाथ कुछ न लगा ।

अगली रात सोलो ने एक पुलिस स्टेशन पर बम फिकवा दिया । पुलिस की एक पेट्रोल कार ने उस गाड़ी का पीछा भी किया जो किसी अस्पताल की एम्बुलेंस थी- पर रास्ते में एम्बुलेंस से फिर बम फेंका गया और पेट्रोल कार की धज्जियां उड़ा दी गई ।

सोलो रोज के अखबार पढ़ता, खबरें सुनता और अगले कदम की तैयारी में लग जाता ।

इस घटना के बाद तो पुलिस भी दहल गई थी । सड़क पर चलने वाला हर वाहन चेक किया जा रहा था– सोलो पर भारी इनाम घोषित किये जा रहे थे । कुछ पूंजीपतियों ने भी व्यक्तिगत इनाम घोषित कर डाले । सोलो पर विदेशी मुल्कों के भी इनाम पहले से घोषित थे ।

पंत की रातों की नींद हराम हो गई थी । वह जय की खोज करना भी भूल गया था । अमर को फांसने की सभी योजनाओं को उसने फिलहाल एक तरफ रख दिया था ।

उधर अमर भी न जाने कहाँ गायब हो गया था । राजा प्रताप सिंग अब अपने बेटे की ओर से उदासीन रहने लगे थे ।

अब तो वह हफ़्तों तक भी घर नहीं आता था । इतना बड़ा हादसा हो गया था परन्तु अमर का कहीं अता-पता नहीं था ।

एक सुबह पंत को अचानक अमर का फोन मिला ।

“कौन बोल रहा है ?”

“अरे क्या इतनी जल्दी अपने हीरा को भूल गए इंस्पेक्टर साहब ?”

“ओह ! तुम हो ।”

“हाँ मैं हूँ...और आपकी पुलिस क्या कर रही है ? यह सोलो हमारी जायदाद पर बमबारी क्यों करता फिर रहा है ?”

“यही बात मुझे हैरान कर रही है– ? उसने तुम्हारी संपत्ति को क्यों निशाना बनाया ?”

“अगर कहीं उससे मुलाकात हो गई तो जरूर पूछूँगा लेकिन सुना है आपको उसका केस सौंप दिया गया है ।”

“तुमने सही सुना है । देखो- हीरा तुम्हारे मेरे बीच में जो चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है– वह कुछ दिनों के लिये स्थगित हो जाना चाहिए और मैं चाहता हूँ कि तुम जय और मिसेज ठाकुर को आजाद कर दो ।”

“जहाँ तक जय का सवाल है, वह हीरा बनकर कई दिनों तक मुझे बदनाम करता रहा है । लेकिन वह आदमी मुजरिम नहीं है । इसलिए उसकी सजा शीघ्र ही पूरी हो जायेगी । लेकिन मिसेज ठाकुर– नहीं, वह औरत समाज का एक नासूर है, उसे मैं रिहा नहीं कर सकता ।”

“मैं जानता हूँ मिसेज ठाकुर मुजरिम हैं– और मुजरिमों को गिरफ्तार करना हमारा काम है...उन्हें सजा देना भी कानून का काम है । तुम कानून को अपने हाथ में लेने वाले कौन होते हो ?”

“अपना-अपना शौक है इंस्पेक्टर साहब ।”

“अच्छा- क्या तुम मुझसे मुलाकात कर सकते हो ?”

“क्यों नहीं – अगर आपकी यही हसरत है तो आज शाम हाइलाइट क्लब में आ जाइये । मैं आपको वहीं मिल जाऊँगा ।”

“गुड– तो मैं तुमसे वहीं बात करूँगा ।”

“लेकिन हथकड़ियों का जोड़ा लेकर मत आइयेगा ।” अमर ने कहा और फोन डिस्कनेक्ट कर दिया ।
 
शाम के समय इंस्पेक्टर पंत हाईलाइट क्लब में जा पहुँचा । हमेशा की तरह अमर वहाँ लड़कियों से घिरा बैठा था । इंस्पेक्टर ने उसे तुरन्त ही पहचान लिया । अमर के कई चित्र उसके पास मौजूद थे । वह यहाँ अमर को गिरफ्तार करने नहीं सोलो के सम्बन्ध में बातें करने आया था । इंस्पेक्टर पंत को देखते ही अमर लड़कियों से पीछा छुड़ाकर उठ खड़ा हुआ और इंस्पेक्टर पंत के पास पहुँच गया ।

“हैलो इंस्पेक्टर पंत- मुझे अमर कहते हैं ।”

“बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर ।” पंत ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा ।

दोनों ने हाथ मिलाये ।

“आइये कहीं दूसरी जगह चलकर बातें करेंगे ।”

वे क्लब के लॉन में आकर एकांत में जा बैठे ।

“अच्छा अमर, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इतने बड़े दौलतमंद व्यक्ति की अकेली संतान होते हुए आखिर तुम्हें ऐसी क्या परेशानी है कि तुम हीरा बन बैठे ?”

“आत्मा की पुकार ।”

“आत्मा की पुकार ! मैं समझा नहीं ।”

“आप नहीं समझोगे इंस्पेक्टर ! बस मेरी आत्मा चीख-चीखकर कहती है कि हर खतरनाक और ताकतवर को अपना गुलाम में खुद-ब-खुद यह बात आ जायेगी । मैंने जालिम जागीरदारों के यहाँ डकैतियां डालीं । उनकी लाशों को हवेली में लटका दिया, बहुतों को जिन्दा गाड़ दिया और जो लूट की दौलत हाथ लगी उसे उन सताए लोगों में बाँट दिया जो उनके जुल्मों के शिकार थे । कर सकता है तुम्हारा कानून ऐसा इंसाफ....और इंस्पेक्टर साहब ! जिस दिन मुझे यह आभास हो गया कि मैंने किसी निर्दोष या असहाय को सताया है, मैं उस दिन अपने आपको कानून के हवाले कर दूँगा ।”

“लेकिन तुम कब तक लोगों को इंसाफ दिलाते रहोगे ?”

“जब तक जिन्दा हूँ और जहाँ तक मेरी पहुँच होगी ।” अमर ने मुस्कराकर कहा ।

“यह तो एक पागलपन है ।”

“हाँ है, लेकिन आपकी नजर में, मेरी नजर में नहीं ।”

“जय तो मुजरिम नहीं है । मैं तो मुजरिम नहीं हूँ ?”

“मैं कब कहता हूँ । आप दोनों एक मुजरिम की गिरफ्तारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं । क्योंकि कानून की भाषा में बहरहाल मैं मुजरिम तो हूँ ही ।”

“क्या तुमने जय को कत्ल कर दिया ?”

“पिछले कुछ अरसे से मैंने इंसानों का खून बहाना बन्द कर रखा है । इस तरह मेरे दुश्मनों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी । मेरे नाम का आतंक इतना फैल गया कि मेरा नाम सुनते ही बड़े से बड़े बदमाश का पित्ता पानी हो जाता है । अब मैं उन्हें जिन्दा रखता हूँ और जब जरूरत पड़ती है उनसे दिल बहला लेता हूँ ।”

“बहुत खूब । दिल बहलाने का क्या शानदार तरीका निकाला है आपने मिस्टर अमर । सोलो के सम्बन्ध में क्या ख्याल है ? क्या आप उससे दिल बहलाना पसंद नहीं करेंगे ?” इंस्पेक्टर पंत ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा ।

“दरअसल मैंने इसी सम्बन्ध में आपसे संपर्क स्थापित किया था । मैं आपसे एक सौदा करना चाहता था ।”

“सौदा.... । किस तरह का सौदा ?”

मुझे सोलो को फाइल की फोटो स्टेट कॉपी चाहिए । दरअसल मैं इस विदेशी गुंडे के सम्बन्ध में किसी प्रकार की जानकारी नहीं रखता । इसने सीधे हमारी प्रॉपर्टी पर हमला किया है, इसलिए मेरी दिलचस्पी इसके प्रति स्वाभाविक है । अगर आप मेरा यह काम कर दोगे तो मैं जय को आजाद कर दूंगा । सौदा पसंद हो तो हामी भरिये । अन्यथा हमारी आपकी मुलाकात समाप्त । फिर जो मेरे दिल में आएगा वह करूँगा ।”

“सोलो की फाइल ।” इंस्पेक्टर पंत किसी सोच में पड़ गया । लेकिन तुरन्त ही वह किसी निष्कर्ष पर भी पहुँच गया – ठीक है, मुझे यह सौदा मंजूर है । लेकिन मिसेज ठाकुर का क्या होगा ?”

“मिसेज ठाकुर एक ब्लैकमेलर है इंस्पेक्टर साहब । और मैं ऐसे इंसानों से अपनी गुलामी करवाने का शौक रखता हूँ । जब मेरा दिल भर जायेगा, उसे भी रिहा कर दूँगा ।” इतना कहते हुए अमर उठ खड़ा हुआ । “ अब हमारी मुलाकात खत्म होती है । कल तक आप फाइल मेरे हवाले कर देंगे और परसों तक जय अपने फ्लैट में पहुँच जायेगा ?”

“फाइल कहाँ भिजवाई जाये ?”

“कल शाम इसी जगह- ठीक सात बजे ।”

फिर दोनों की मुलाकात समाप्त हो गयी । दोनों अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए । पंत ने सोचा कि हीरा और सोलो दोनों ही उसके शिकार हैं, और अगर यह दोनों ही एक दूसरे से टकरा जाएँ तो फिर इनमें से एक ही रहेगा । इनके टकराव का वह भरपूर लाभ उठाना चाहता था ।

☐☐☐
 
जय ने फरारी का इरादा तर्क कर दिया था – वह इस बस्ती में रहकर कुछ खोज लगाना चाहता था । यहाँ उसे बहुत से जरायम पेशा लोग नजर आये थे । खुद हीरा बेहद दिलचस्प किरदार था । अगर इस इंसान के ऊपर एक पुस्तक लिखी जाये तो सारी जिंदगी इसकी रॉयल्टी खा सकता था । आखिर यहाँ उसे कुछ खास परेशानी भी नहीं थी । हसीना को यदि सही डील कर गया तो परेशानियां समाप्त हो जाएँगी ।

चूंकि वह घूम-फिरकर उसी बस्ती में पहुँचा था इसलिए अपना झोपड़ा खोजने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई । वह मिसेज ठाकुर को उसके हाल पर छोड़ आया था । वह बेहोश हो गई थी और जय ने वहाँ बैठे चंद लोगों के हवाले करते हुए कहा था । “यह कुलवा की बीवी है । इसकी तबीयत कुछ खराब हो गई है । रानी को जन्मदिन की बधाई देने आई थी– मेहरबानी करके कलुवा को खबर कर दें । या इसे उसके घर पहुँचा दें ।”

और फिर वह खुद वहाँ से उठा, रानी को जन्मदिन की बधाई दी ।

“तेरा नाम क्या है रे ?” रानी ने पूछा ।

“जय...नहीं फकीरा... ।” जय ने कहा ।

“कोई तकलीफ तो नहीं तुझे ?”

“नहीं रानी जी ।”

“हाँ – बस्ती में खुशहाली देखना चाहती हूँ – किसी को कष्ट में नहीं देखना चाहती ।”

हिजड़ों ने रानी की जय जयकार शुरू कर दी । और जय वहाँ से रुखसत हो गया । किसी तरह उसने अपना झोपड़ा तलाश कर ही लिया । और हसीना को खर्राटों में डूबा पाकर वह खामोशी के साथ लेट गया ।

बाद में उसे मालूम हुआ कि एक सप्ताह तक यह जश्न चलेगा । लोग रानी को अपने दुखड़े सुनाएंगे । मुकदमों के फैसले होंगे और हर दिन यह जश्न सारी रात चलता रहेगा । बस्ती के सात खण्ड थे और प्रत्येक खण्ड के लिए अलग अलग दिन चुना गया था । जिस खण्ड में जय था उसका नम्बर अंतिम दिन आना था ।

उसने सोचा जब छागो डाकू तक यहाँ छग्गन धोबी बनने पर मजबूर है तो उसे फकीरा बनने में क्या आपत्ति हो सकती है । बस हल ही तो चलाना पड़ेगा और हसीना के प्रति अगर उसने अपनी थोड़ी सी वफा प्रकट कर दी तो शायद हल भी नहीं चलाना पड़े । कुछ दिन यही जिंदगी सही ।

जय ने अपने आपको मानसिक रूप से तैयार कर लिया । वह इस बस्ती और बस्ती के लोगों के बारे में भरपूर जानकारी एकत्रित करना चाहता था और यह उसकी जिंदगी का एक बेहतरीन अनुभव होगा जो कुछ वह लिखेगा, सारा संसार उससे चकरा जायेगा । बहुत सी भाषाओं में उसका अनुवाद होगा ।

लेकिन यह उसका सपना मात्र बनकर रह गया ।

एक रात वह हसीना के साथ ही सोया था और जब उसकी आँख खुली तो वह अपने बेड पर अपने ही फ्लैट में मौजूद था । वह बुरी तरह बौखला गया और सबसे पहले उसने रोमी को तलब किया ।

“मैं यहाँ कैसे आ गया ?” उसने रोमी से पूछा ।

“रात आप काफी नशे में थे – मैंने तो शराब से तौबा कर ली और आपको कौन सा गम लग गया जो इतनी चढ़ा गए कि खुद ही होश खो बैठे ।”

“क्या बकते हो रोमी ?”

“अगर नशा अब भी न उतरा, तो एक-आध पैग लेकर उतार कर लीजिये ।”

“ओ माई गॉड ।” जय थामकर बैठ गया ।

“आप इतने दिन तक कहाँ रहे जनाब ?” रोमी ने पूछा – “मेरी मानिये तो शादी कर लीजिये सब ठीक हो जायेगा ।”

“बेवकूफ, गधे, मेरे हाथ से लॉटरी निकल गयी और तू है कि अपनी ही गाए जा रहा है ।”

“नाश्ता तैयार करूँ ?”

“दफा हो जा रोमी यहाँ से, मुझे कुछ सोचने दे ।”

रोमी बुरा सा मुँह बनाकर बाहर निकल गया और जय सोचों में गुम हो गया । उसका आश्चर्य यहीं तक सीमित नहीं था । आश्चर्य तो तब और भी बढ़ गया जब उसने सुबह का समाचार पत्र पढ़ा । हंगामा अखबार का स्टे ऑर्डर समाप्त हो गया था और राम बहादुर केशवदास ने कर्ज की राशि अखबार को डोनेट कर दी थी ।

“क्या यह भी हीरा का कारनामा है ?” जय हैरतों के समुद्र में डूब गया था ।
 
अखबार में केशवदास ने अपील की थी कि हंगामा का पूरा स्टाफ अपने काम पर पहुँच जाये । उनका वेतन भत्ता भी वह दे रहे थे । उन्होंने सारा हर्जाना देना स्वीकार कर लिया था । एडिटर महोदय से अपील की गयी कि वे अपना कार्यभार संभाल लें ।

एक पूंजीपति ने इतना बड़ा घाटा कैसे बर्दाश्त कर लिया था ?

जय तैयार होकर ऑफिस की तरफ दौड़ पड़ा ।

ऑफिस खुल चुका था और सारा स्टाफ काम पर लौट आया था, सिर्फ प्रमुख संपादक महोदय और हंगामा के स्वामी अभी तक नहीं आये थे । चूंकि जय उनकी अनुपस्थिति में कार्यभार पुनः सम्भाल लिया ।

अगले ही दिन एक खूबसूरत लड़की अखबार के ऑफिस में प्रविष्ट हुई । वह जय से मुलाकात करने आई थी ।

“आप ही राजन हैं ?” उसने ऑफिस में दाखिल होने के बाद पूछा ।

“जी हाँ, मेरे माँ-बाप ने यही नाम रखा था । तशरीफ रखिये ।”

लड़की बैठ गई ।

“अब अपनी तारीफ भी कर डालिये तो बन्दे को सुकून आ जायेगा ।”

“मेरा नाम डॉली है ।” वह मुस्कराकर बोली – “और मैं रायबहादुर केशवदास की बेटी हूँ ।”

“आ....र....रायबहादुर...क...की बेटी... ।” जय हड़बड़ा गया । अगर आप कर्जा वसूलने आई हैं तो अब तक कहाँ थीं ?

मैं तो आपको कुछ और ही समझ रहा था ।

“मैं कर्जा वसूलने नहीं आई हूँ – दरअसल आपको धन्यवाद देने आई हूँ – आपका मुझ पर एहसान है । आपने मेरी जिंदगी की ऐसी गुत्थी सुलझा दी जिसे शायद मैं अपना सब कुछ खोकर भी न सुलझा पाती । आपने एक अधूरी दास्तान को पूरा कर दिया ।”

“कमाल है....कमाल है....भला मैं इस काबिल कहाँ...मेरी तो अपनी ही कहानी खराब हुई पड़ी है । भला दूसरों की कहानी क्या पूरी करूँगा ।” जय ने चकराए स्वर में कहा ।

“बकिये मत, मुझे सब पता चल गया है ।”

“स....सब पता चल गया....हे भगवान....सब.... ।”

“हाँ...वास्तव में कसूर मेरे डैडी का ही था । उन्हें पैसा कमाने की इतनी हवस है कि बिजनेस में सभी हथकंडे इस्तेमाल करते हैं – घाटा तो सह ही नहीं सकते- राय बहादुर तो जाने कैसे उन्हें लोग कहने लगे, उन्हें तो काइयां सेठ कहना चाहिए था । लेकिन जब हालात मुझे पता लगे तो मैंने भी उनकी सारी हेकड़ी भुला दी, मैं यूँ गरजी, यूँ बरसी कि बस हो गयी छुट्टी ।”

“यानी आपके गरजने बरसने से हालात काबू में आये ।”

“बन रहे हैं आप...आपने ही तो अपने दोस्त अमर का दबाव डाला कि....कि वह मुझसे.... ।” डॉली कुछ शरमाकर बोली मुझसे शादी कर ले...लेकिन आपको किस तरह पता चला कि मैं अमर को इतना चाहती हूँ कि उसके बिना जिन्दा नहीं रह सकती ।”

“हैं...हैं....हैं....” जय अजीब सी हँसी हँसा । उसके तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था, लेकिन फिर वह एकदम से गर्दन अकड़ाकर बोला – “किस तरह पता चला ।”

“यहाँ तो चेहरे देख कर मजमून भांप लेते हैं ।”

“खैर, मुझे भला इससे क्या कि आपको किस तरह पता चला ।”

“आप तो रिपोर्टर के अलावा जासूसी भी कर लेते हैं ।”

“क्यों नहीं – क्यों नहीं– इस शहर में हमसे बड़ा जासूस भला कौन है...लेकिन अमर यानी.... कि राजा प्रताप सिंग... मेरा मतलब इतना बड़ा खानदान... ।”

“जब मियां– बीवी राजी तो क्या करेगा काजी – अमर भी तो अपने माता-पिता की एक ही सन्तान है । राजा साहब से मेरे डैडी ने बात कर ली और अब जल्द ही हमारी शादी हो जायेगी ।”

जय समझ गया कि यह किस अमर की बात हो रही है । लेकिन यह सब गोरख-धंधा क्या है ? अभी बात पूरी तरह उसकी समझ में नहीं आई थी ।

“अमर आपका कितना पुराना दोस्त है ?” डॉली ने पूछा ।

“लंगोटिया यार है अपना- अपनी कोई बात टालता नहीं । अरे हम तो पैदा भी एक साथ हुए थे ।”

“एक साथ पैदा हुए थे ?”

“ओ...हाँ....मेरा मतलब एक ही अस्पताल में । और हुआ यूँ कि नर्स की गलती पकड़ीं गई होती तो आप राजा साहब का राजकुमार अमर मैं होता...और आप...आप...म...मेरा मतलब है आपको यहाँ आने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता ।”

“जी नहीं– फिर तो मैं यहीं आती – क्योंकि आपकी जगह अमर जो यहाँ होता – ।” वह हँसकर बोली ।

और जय भी उसकी हँसी में साथ देने के लिए हँस पड़ा ।

“अमर जरा शर्मीले स्वभाव का है....है न....लड़कियों के मामले में पूरा गधा है....है न ।”

“सो तो मैं ठीक कर लूँगी । दोस्त हो तो आप जैसा- उसने तो मेरी तरफ से आँख ही मूंद ली थी । बाद में पता चला कि वह मेरी तरफ से बेरुखी इसलिए प्रकट कर रहा था क्योंकि उसके दोस्त यानी आपको मेरे डैडी ने खासी परेशानी में डाल दिया था । इसके बावजूद भी आपने अमर को लताड़ा । क्या कमाल की दोस्ती है आपकी । एक मिसाल है । अमर आपके लिए कितना मरता है और आप अमर के लिए... ।”

“अजी छोड़िये- बहुत हो गई तारीफ... शादी कब हो रही आप लोगों की ?”

“अभी डेट क्लियर नहीं है....लेकिन आपके पास तो दो तरफा निमन्त्रण पत्र पहुँचेगा । पता चल ही जायेगा ।”

“मेरी तरफ से पहले ही मुबारकबाद ।”

“धन्यवाद ।” वह मुस्कुराई ।

“मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताइयेगा । अमर तो सेवा करवाने के लिए तैयार ही नहीं होता ।”

“आप भी तो पक्के खुद्दार हैं...आपको अमर जैसा दोस्त मिला है वह चाहें तो आपके लिए खुद एक बड़ा अखबार खुलवा सकता है, लेकिन आपने तो कभी उसका तोहफा भी कबूल नहीं किया ।”

“आदमी पैसे ही से तो सबकुछ नहीं होता ।”

“नहीं, बिल्कुल नहीं, पैसा तो कुछ भी नहीं होता । लेकिन यह बात मेरे डैडी की समझ में नहीं आती । उन्होंने वह रुपया इसलिए छोड़ दिया और साथ में पूरा हर्जाना भी इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी बेटी की शादी एक राजकुमार से हो रही है । मेरी शादी में दस पंद्रह लाख का दहेज तो उन्हें देना ही पड़ता । अपनी लड़की के लिए बिना कुछ लिए अमर जैसा लड़का मिल गया । इससे बड़ी खुशी उनके लिए क्या हो सकती है ?”

एक बार फिर शादी मुबारक और जो कुछ आपने हमारे लिए किया है उसके लिए तो खैर मैं किस मुँह से शुक्रिया अदा करूँ । अचानक जय को ख्याल आया कि डॉली के लिए ठंडा गरम कुछ नहीं मंगाया ।

उसने तुरन्त घण्टी बजाई और कुछ ही देर में अर्दली अंदर प्रविष्ट हो गया ।

☐☐☐
 
डॉली को नहीं मालूम था कि अपनी जिंदगी को किस राह पर डाल दिया है । जब वह हार गयी थी और अमर की तरफ से निराश हो गई थी, तो उसने खुद को घर की चारदीवारी में कैद कर लिया था । उसकी खुशियाँ छिन गई थीं । वह ठीक से खाना भी नहीं खाती थी । उसने अमर को बहुत खोजा । उसके घर कई टेलीफोन किये, परन्तु अमर नहीं मिला । तब इस पराजित मोहब्बत को आखिर अपने पिता के सामने कलई खोलनी ही पड़ी ।

रायबहादुर से अपनी बेटी की हालत छिपी न थी । उसके चेहरे की वीरानी, खोया-खोयापन, ठीक से खाना न खाना, दिन भर अपने कमरे में बन्द रहना और निरंतर चेहरे का रंग उतरना । सबकुछ रायबहादुर नोट करते रहे थे । तब उन्होंने अपनी बेटी से पूछा और बेटी ने घुटने टेक दिए ।

तब रायबहादुर ने खुद प्रताप सिंग से इस सम्बन्ध में मुलाकात की ।

दोनों एक दूसरे से पूर्व परिचित थे । हालाँकि गहरी दोस्ती जैसी बात तो नहीं थी, परन्तु एक दूसरे की हैसियत से अच्छी प्रकार परिचित थे । अगले चुनाव में दोनों ही चेयरमैन सीट के लिये खड़े होने वाले थे । रायबहादुर ने अपनी पगड़ी राजा प्रताप सिंग के कदमों में रख दी । अपनी बेटी का सारा हाल सुनाया ।

“आप मेरा सबकुछ ले लीजिये, पर मेरी बेटी की खुशियाँ लौटा दीजिये– वह अमर के बिना मर जायेगी– मैं जानता हूँ वह कितनी जिद्दी है ।”

“यह बात नहीं केशवदास । आप मेरी मजबूरियां नहीं समझ सकते- और हम आपको बता भी नहीं सकते । हम आपकी बेटी की खुशियों की खातिर ही यह बात कह रहे हैं कि यह शादी न हो तो बेहतर है ।”

“लेकिन क्यों – क्या कमी है मेरी बेटी में ? आप चलकर देख लीजिये ।”

“कोई कमी नहीं ।”

“आखिर आप कभी न कभी अमर की शादी तो करेंगे ही ।”

राजा प्रताप सिंग चुप हो गए थे । परन्तु केशवदास ने भी हार नहीं मानी । राजा प्रताप सिंग हकीकत तो बयान कर ही नहीं सकते थे । आखिर उन्होंने चंद शर्तें रख दी ।

“अगर आप अपनी जिद पर अड़ ही गए हैं तो फिर हमारी भी कुछ शर्तें सुन लीजिये ।”

“मैं आपकी हर शर्त मानने के लिए तैयार हूँ ।”

“तो फिर शादी से पहले लड़की को कुछ दिन के लिए हमारे घर छोड़ना होगा । हम चाहते हैं कि दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझ-बूझ लें ।”

“मंजूर है – जैसा आपका घर, वैसा मेरा घर...मुझे अपनी बेटी पर भरोसा है कि वह हर चीज में खरी उतरेगी ।”

“दोनों एक दूसरे को पसंद करके शादी करने पर रजामंद हो जाते हैं– तो शादी के बाद हमें लड़की के सम्बन्ध में हर फैसला करने का अधिकार होगा । आप किसी भी मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे । वह हमारी बहू और हमारी बेटी होगी । आपका उस पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है । उसके भविष्य के बुरे भले का फैसला करने का अधिकार सिर्फ हमारा होगा ।”

“यह तो समाज की रीति है राजा साहब ।”

“नहीं रायबहादुर ! आप शायद नहीं जानते कि हमारे बेटे को एक ऐसा रोग है कभी भी आपकी बेटी विधवा हो सकती है । हालाँकि हमें यह बताना नहीं चाहिए था, लेकिन जब यह रिश्ता हो ही रहा है तो आपको भ्रम में रखना उचित नहीं समझते ।”

“अगर मेरी बेटी के मुकद्दर में यही लिखा होगा तो उसे कौन टाल सकता है राजा साहब ? लेकिन भगवान न करे ऐसा हो...दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है । आज के वैज्ञानिक युग में कोई ऐसा रोग नहीं जिसका इलाज न हो ।”

“अगर भगवान न करे ऐसा हो गया तो लड़की आपके घर नहीं, हमारे घर हमारी बेटी की तरह रहेगी और उसके भविष्य का हर फैसला हम करेंगे....बोलिये मंजूर है आपको हमारी शर्तें ?”

“सब मंजूर है ।”

“तो फिर अगले सप्ताह तक किसी भी दिन लड़की को हमारे पास भेज दिया जाये ।”

रायबहादुर को भला क्या आपत्ति हो सकती थी । डॉली भी इस समाचार को सुनकर खुश ही हुई थी । जब वह अमर की आलीशान कोठी पर पहुँची तो राजा साहब ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा ।

“बेटी । वह अक्सर घर से बाहर रहता है । अब तुम्हें ही उसे संभालना है । कोशिश करो कि वह घर से बेरुखी छोड़ दे – शायद तुम्हारी वजह से उसका यहाँ रोज आना-जाना शुरू हो जाये ।”

“आप चिन्ता न करें– अमर को अब सीधे रास्ते पर लाना मेरा काम है ।”

अमर एक बार घर पर आया था तो डॉली को देखकर बिदक गया – लेकिन डॉली ने उसे आड़े हाथों लिया । उसे एक पल भी अपने से दूर नहीं रखा और ऐलान किया कि अब वह जहाँ भी जायेगा – वह उसके साथ रहेगी ।

लेकिन अमर रात को फिर फरार हो गया था ।

उसके बाद अमर तभी लौटा जब कोठी में बमबारी हुई थी और राजा साहब भी मामूली चोट खा गए थे । तब डॉली ही राजा साहब की सेवा कर रही थी । उसने अमर को खूब फटकार पिलाई । तब से अमर काफी बदल गया था । वह डॉली के प्रति आकर्षित होता जा रहा था । डॉली के साथ वह चांदनी रात में बाग में टहलता रहा ।

“वादा करो कि अब तुम कहीं नहीं जाओगे – तुम्हें कम से कम राजा साहब का ख्याल तो होना चाहिए ।”

“क्या करूँ डॉली – दुनिया मेरे लिए बेगानी है । बेहतर हो कि तुम किसी अच्छे लड़के को जीवन साथी चुन लो...तुमने सचमुच मेरे लिए अपनी जिंदगी को जोखिम में डाल दिया है ।”

“यह नहीं हो सकता अमर । कभी नहीं हो सकता । अगर तुम्हारे जीवन में कोई और लड़की आई तो वह मेरी लाश पर से गुजरकर आएगी ।”

“ओह डॉली...मुझे न जाने क्या होता जा रहा है । एक लावा है मेरे भीतर...जो इन हालात में फट जायेगा...तुम नहीं जानती मेरे लिए यह दुनिया अँधेरी है जहाँ मेरी पुकार सुनने वाला कोई नहीं ।”

“क्या पुकार है तुम्हारी ? मैं सुनूंगी तुम्हारी पुकार... अगर तुम्हें कोई सदमा है तो मुझे बताओ...तुम्हारे दुखों को बर्दाश्त करने की हिम्मत है मुझमें । एक बार कह के तो देखो अपनी डॉली से ।”

“अभी वह वक्त नहीं आया ।”

“कब आएगा वह वक्त ?”

और अमर एक बार फिर गायब हो गया । फिर जब वह डॉली से मिला तो उसने जय से दोस्ती का हवाला देते हुए डॉली के सामने अपनी मोहब्बत को खोल दिया और डॉली से शादी करने का वादा भी किया । उसे बताया कि रायबहादुर ने किस तरह उसके खुद्दार दोस्तों को बेरोजगार कर दिया है । और यह भी कि वह उस अखबार का पार्टनर भी बनने वाला था ।

इस तरह हंगामा अखबार फिर से शुरू हो गया ।

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