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वक्त की धूल

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समाचार पत्रों में यह खबर विवरण सहित छपी थी कि सोलो ने एक बैंक में डाका डाला, जिसमें कैशियर की चालाकी से वह पूरी तरह असफल हो गया । सोलो का निशान घटना स्थल पर पाया गया था । ऐसा सिक्का जिस पर सूर्य का निशान था । इस तरह की घटना जौहरी की दुकान पर भी घटी, वहाँ भी सोलो डाकेजनी में असफल रहा । सोलो बेचैन हो उठा । उसने अपने आदमियों को चारों तरफ फैलाकर अब उन लोगों की तलाश में लगा दिया जो उसके नाम को मलियामेट कर रहे थे ।

शहर में घटने वाली इन घटनाओं का पूर्ण विवरण सोलो के पास पहुँच रहा था और जब उसके साथी नाकाम हो गए तो उसने अपने गिरोह के प्रमुखों को तलब किया ।

तमाम महत्वपूर्ण लोग उसके गिर्द जमा थे । आज सोलो बहुत विचलित नजर आ रहा था । उसकी आँखें खून की तरह सुर्ख थीं । और उसके साथी सहमे हुए नजर आ रहे थे ।

“तुम में से कोई ऐसा नहीं जो इस राज पर से पर्दा हटा सके, आखिर वह कौन लोग थे ?” उसने गुर्राती आवाज से कहा ।

“हमें इसका अवसर दें श्रीमान ।” रोमी ने दबी-दबी जुबान में कहा और सोलो उसकी तरफ घूम गया ।

“कितना वक्त चाहते हो ?”

“बस शीघ्रातिशीघ्र । मेरी तो इच्छा है श्रीमान कि तुरन्त ही उन लोगों को पकड़कर आपके सामने पेश कर दूँ, लेकिन ।”

“हाँ – लेकिन क्या ?”

“पता लगाना पड़ेगा ।”

“कहाँ पता लगाओगे जानेमन... ?” सोलो ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा और रोमी बगलें झाँकने लगा ।

“मैं कोशिश करूँगा श्रीमान जी ।”

“और अगर मैं इस सिलसिले में तुम्हारी सहायता कर दूँ तो.... ।” सोलो ने कहा ।

“मैं....मैं नहीं समझा श्रीमान ।”

सोलो के होंठों पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट फैल गई । उसकी आँखों में शैतान नाच रहा था ।

“मैं समझा दूंगा...तुम्हें समझा दूंगा । मैं तुम्हें उस व्यक्ति का नाम बता दूंगा जो मेरे नाम से नाकाम डाकेजनी करके मेरे मुँह पर तमाचे मार रहा है । तो क्या तुम उसे मेरे सामने पेश कर सकते हो ?”

“अगर आप उसके बारे में इस कदर जानते हैं श्रीमान । तो फिर इतना चिंतित होने की क्या आवश्यकता है ? हम सब आपके लिए जान की बाजी लगा देंगे– चाहें उसके लिए हमें कुछ भी क्यों न करना पड़े ।” रोमी ने कहा ।

“सोच लो – फिर सोच लो रोमी ! जो शब्द कह रहे हो, उन्हें निभा पाओगे । यूँ लगता है सोलो इस बार अपनी मौत लेकर इस देश में प्रविष्ट हुआ है । हाँ मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरे तमाम साथी नकारा हो चुके हैं और अब वह सोलो के साथी कहलाने योग्य नहीं...खुद सोलो अपनी पोजीशन से हजारों गुना नीचे गिर चुका है और मैं इस बात को कभी भूल नहीं सकता, अपनी मौत के बाद भी नहीं, समझे तुम लोग, तुम सबने यहाँ आकर मुझे जलील कर दिया है ।”

सोलो बुरी तरह गुर्रा रहा था और उसके तमाम साथी खामोश बैठे थे, लेकिन रोमी की आँखें प्रश्नसूचक चिन्ह लिए थीं ।

जब सोलो खामोश हो गया तो चंद क्षण बाद उसने पूछा–

“श्रीमान जी ! क्या आपको यकीन है कि जिस व्यक्ति का आप नाम सुन चुके हैं, यह काम उसी ने किया है ?”

“हंड्रेड पर्सेंट- हंड्रेड पर्सेंट । जब हम किसी सांप की दुम पर पांव रखते हैं तो वह पलटकर अवश्य डसता है । समझे तुम । लेकिन बात हमारी महारत की होती है, हम दुम की बजाय कमर पर पांव रखना चाहते थे । लेकिन पांव पड़ गया दुम पर, और सांप को पलटने का अवसर मिल गया, जानते हो वह कौन है ?”

“नहीं श्रीमान । मैं नहीं जानता, कृपया आप इस बारे में बताइये ।”

“हीरा...हीरा...हीरा... । वही रहस्यमय नाम जो अब मुझे भूत-प्रेत मालूम होने लगा है । हर व्यक्ति उसकी छाया तक पाने में असफल रहा । उसने हम पर जबरदस्त हमला किया है । सोलो के मुँह पर नाकाम डाकेजनी करके तमाचा मारा है । हीरा कितना ही बड़ा गुंडा है लेकिन क्या यूरोप के मकलारिस, जोड़ी फ्लोरिडा और जॉनसन से अधिक खतरनाक है ? लेकिन वास्तव में उसने उन लोगों के नाक में नकेल डालकर रख दी है । इस शहर क्या, इस मुल्क का कोई गुंडा उसके विरुद्ध सिर उठाने को तैयार नहीं । पुलिस जिसकी परछाई तक तलाश नहीं कर पाई, मुझे मालूम है कि वह किस खानदान का चिराग है ।

लेकिन हैरत की बात है कि पुलिस नहीं जानती । और अगर जानती भी है तो इतने जुर्म करने के बाद भी उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं । वह वांटेड व्यक्ति है । जिसे जिन्दा या मुर्दा गिरफ्तार करने की कीमत लगाई गई है, लेकिन कोई इतने बड़े इनाम की खातिर उसके खिलाफ जाने को तैयार नहीं । और हीरा अब मेरे साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेल रहा है और तुम सब यहाँ मुँह लटकाये खड़े हो । तुम लोग इस एक नाम से इतने भयभीत हो गए कि उसके खिलाफ कुछ करते हुए दहशत से कांपने लगते हो । मुझे अफसोस है कि तुमने भी इस परिस्थिति में मेरा साथ छोड़ दिया ।”

“नहीं श्रीमान । अगर आप हमें हुक्म दे, आप हमें किसी जगह का पता बता दें तो हम आँखें बन्द करके वहाँ घुस जायेंगे और वहाँ जितने इंसान होंगे उन्हें कत्ल कर देंगे । यकीनी तौर पर उनमें हीरा होगा । हमें बताइये कि हम उस गुंडे को किस जगह और कहाँ गोली मार दें । चाहें वह कोई राजपथ हो या पुलिस हैडक्वार्टर और उसके बाद चाहें हमें उसी जगह गोलियों से छलनी कर दिया जाये । हम अपनी वफादारी पर हर्फ नहीं आने देंगे लेकिन हमें बताइये तो सही...हमें हुक्म तो दीजिये ।”

“कुछ नहीं...कुछ नहीं...तुम लोग कुछ नहीं कर सकते, मुझे यकीन है ।” सोलो ने कहा

“आपका यह यकीन गलत भी प्रमाणित हो सकता है श्रीमान ।” रोमी ने कहा ।

“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । तुम लोगों ने अगर कुछ करना होता तो अब तक कम से कम गिरोह का एक आदमी तो जरूर पकड़ लाते... अब मैंने फैसला कर लिया है कि खुद ही उससे निपटूंगा । बल्कि अब मुझे अपनी इस मूर्खता का एहसास हो रहा है कि मैंने तुम सबको यहाँ क्यों जमा किया ?”

“आप हमसे इतने निराश न हों श्रीमान । अतीत से लेकर अब तक हम हमेशा आपके वफादार रहे हैं ।” रोमी ने बुरा मानते हुए कहा ।

“तुम्हारी वफादारी पर मुझे संदेह नहीं है रोमी ! क्या तुमने इस बात पर गौर किया कि उसके पास हमारा निशान, हमारा सिक्का किस तरह पहुँच गया ? उसने हमारे सम्बन्ध में इतनी जानकारियां किस तरह एकत्रित कर लीं । क्या यह इस बात की पुष्टि के लिए काफी नहीं कि उसकी पहुँच हमारे गिरेबान तक हो गई है । और तुम यहाँ के गुंडों की दहशत देख-देखकर खुद भी इस नाम से घबराने लगे हो ।”

“आपका यह ख्याल गलत है श्रीमान । दरअसल हम उससे भयभीत नहीं हैं । हकीकत तो यह है कि हम उसकी हस्ती से अनभिज्ञ हैं ।”

“तो फिर जाओ और अपने तौर पर पता लगाओ कि हीरा कहाँ है, और क्या कर रहा है ? उसे कत्ल कर दो । उसे और उसके पूरे गिरोह को खत्म कर दो अन्यथा तुम सब खत्म हो जाओ और अगर तुम खत्म होने से डरते हो तो सोलो का हुक्म है जहाँ दिल चाहे चले जाना वापिस सोलो के पास नहीं आना – जाओ ।” सोलो ने दहाड़कर कहा और वे सब एक एक करके उठ खड़े हुए ।

सोलो के साथ मुश्किल यह थी कि स्थानीय गुंडे उसका साथ देने को तैयार नहीं हो रहे थे । जब से उन्हें मालूम हुआ कि सोलो और हीरा के बीच गैंगवार छिड़ गई है, तब से उन्होंने सोलो के लिए काम करने से इंकार कर दिया था ।

☐☐☐
 
सोलो का नाम साधारण हैसियत नहीं रखता था । हरचन्द की बैंक में जो डाका डाला गया था वह नाकाम रहा था, लेकिन सोलो का निशान तो वहाँ पुलिस को मिला ही था । यही जौहरी की दुकान पर हुआ था और उसी निशान के कारण दोनों डाके सोलो के नाम लग गए थे ।

पुलिस चारों तरफ चौकन्नी थी । जगह-जगह छापे मारे जा रहे थे । बहुत से ऐसे बदमाश गिरफ्तार कर लिए गए थे जो वास्तव में सोलो के लिए काम कर रहे थे और ऐसे ही एक बदमाश ने जिसका नाम बिल्ला था, पुलिस की मार से स्वीकार कर लिया कि सोलो यहाँ मौजूद है । परन्तु यह डाके उसके इल्म में नहीं । बाकी सारी वारदातें उसने स्वीकार कर लीं थीं

सोलो के लिए काम करने वाले इस गुंडे को गुप्तचर विभाग के हवाले कर दिया गया ।

दूसरी तरफ सोलो के नाम का डंका बाकायदा बज रहा था ।

उस शाम जब एक फर्म का कैशियर एक वैन में अपने चौकीदार के साथ अट्ठारह हजार की रकम ले जा रहा था कि रास्ते में एक लम्बी कार ने उसे टक्कर मारी और वैन उलटते-उलटते बची । वैन में बैठा हुआ गोरखा चौकीदार, जिसके हाथ में भरी हुई बन्दूक थी, नीचे उतर आया । उसी समय कार से तीन आदमी नीचे उतरे जिनमें एक विदेशी था और दो स्थानीय थे । चूंकि वह वैन के बहुत करीब थे, इसलिए चौकीदार निशाना लेकर फायरिंग तो नहीं कर सका, लेकिन उसने बंदूक को लाठी की तरह घुमाना शुरू कर दिया और वह दोनों आदमी उसकी जद में आ गए ।

दोनों आदमी बुरी जख्मी हो गए और तीसरा आदमी जो विदेशी गोरा था, वह वैन में बैठे व्यक्ति से रकम छीनने की कोशिश कर रहा था । चौकीदार ने उसे पीछे से पकड़कर उसका रिवाल्वर छीन लिया जो कि विदेशी था । चौकीदार ने उसकी ठुकाई शुरू की और इस पर भी सब्र नहीं हुआ तो उसके वस्त्र उतार लिए । वह उन्हें पुलिस के हवाले करना चाहता था । लेकिन दुर्भाग्य से बात यह थी कि वह क्षेत्र सूनसान था और दूर-दूर तक किसी का अस्तित्व नहीं था । बहरहाल चौकीदार ने उसे सिर्फ एक अंडरवियर में वापिस जाने दिया, क्योंकि वह जानता था इस वक्त उसे गिरफ्तार करके अपने साथ ले जाना खतरनाक भी हो सकता है । वैन में कैश भी था और उसके दोनों साथी होश में भी आ सकते थे । अतः मजबूरन चौकीदार ने उन्हें जाने दिया । बंदूक के निशाने पर अलबत्ता उसने विदेशी को कुछ करने का अवसर नहीं दिया, सिवाय इसके कि वह अपने दोनों साथियों को अपनी कार में ठूंसे और वहाँ से भाग जाये । सो विदेशी ने ऐसा ही किया ।

चौकीदार और फर्म का कैशियर वहाँ से सीधे पुलिस स्टेशन पहुँचे और उन्होंने पुलिस स्टेशन पर सारे हालात, बयान किये । विदेशी के वस्त्रों में जो चीजें मिलीं उन्हें देखकर पुलिस ऑफिसर की आँखें हैरत से फैल गईं ।

सारी चीजें ऐसी थीं जिनसे प्रमाणित होता था कि विदेशी सोलो था, वह सिक्का, जिस पर सूरज का निशान बन गया था, वह या तो सोलो ही अपने पास रखता था या फिर उसका कोई दायां-बायां हाथ । यह तमाम चीजें गुप्तचर विभाग को भेज दी गयीं ।

दूसरे दिन अखबारों की सुर्खी थी –

एक गोरखा चौकीदार द्वारा सोलो को पीट-पीटकर नंगा कर दिया गया ।

सोलो के लिए यह समाचार इस तरह के थे कि उसे तुरन्त आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी । उसका इस बार कई अखबारों ने भीख मांगते हुए कार्टून तक छापा था । उस पर इस तरह के व्यंग्य किये थे ।

सोलो यह खबरें पढ़-पढ़कर अपने बाल नोचने लगा । लेकिन परिस्थिति ऐसी हो चुकी थी कि अब उसके पागल होने में कोई कसर नहीं रह गयी थी ।

थोड़ी देर बाद उसने पिस्तौल के चेम्बर भरे और उन्हें अपने लिबास में छिपाकर बाहर निकल गया । अब वह हीरा से सीधा टकरा जाना चाहता था । इसके अलावा कोई और चारा नहीं रह गया था । हीरा ने उसकी मिट्टी पलीद कर दी थी और सोलो जानता था यह सारा काम उस व्यक्ति के अलावा किसी का नहीं है । हीरा उसे बदनाम कर रहा था ।

☐☐☐

टोनी और जोनी बेंजो अत्यधिक चिंतित थे । सोलो की दीवानगी ने बदहवास कर डाला था । सोलो को हीरा की तलाश थी । उस जगह पर वह हीरा के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करता फिरता था जहाँ बदमाशों में अड्डे से मिल सकता था । क्योंकि वह अपने घर बहुत कम आता-जाता था । वहाँ भी निगरानी चल रही थी, किन्तु अमर इस तरह गायब हो गया था जैसे गधे के सिर से सींग ।

इस समय भी वह एक ऐसे ही होटल में प्रविष्ट हुआ जिसके बारे में सूचना मिली थी कि हीरा अक्सर यहाँ नजर आता है ।

होटल क्या था, सही देखा जाये तो मादक द्रव्यों का अड्डा था । टोनी और जोनी भी इस समय साथ ही थे । यहाँ सोलो ने होटल के मालिक भीमराज साहनी को पकड़ा और उसे मार मार कर अधमरा कर दिया ।

“बता हीरा कहाँ है ? कहाँ मिलेगा वह ?” सोलो ने टूटी-फूटी हिंदी में कहा ।

भीमराज के होशो-हवास खराब हो चुके थे । उसके बदन पर कई खराशें पड़ चुकी थीं, जहाँ से खून रिस रहा था । उसने सहमे हुए अंदाज में सोलो की सूरत देखते हुए कहा ।

“म...मैं उसके किसी सही अड्डे के बारे में नहीं जानता श्रीमान । लेकिन आप उसे तिलक रोड की कोठी नम्बर पचास में देखें तो शायद वह मिल जाये । मैंने अक्सर उसे वहाँ देखा है ।”

“सच बोलता है तू ?”

“जी हाँ श्रीमान ! अब भी क्या मैं झूठ बोलूँगा ।”

“ठीक है, टोनी तुम यहाँ रुको, यह कहीं जाने न पाये । मैं इसकी बताई हुई जगह को चेक करता हूँ ।” सोलो बोला और टोनी ने गर्दन हिला दी ।

सोलो चला गया । टोनी भीमराज की निगरानी करने लगा ।

“तुम...तुम जानते हो, हीरा तुम्हारा क्या हश्र करेगा ? इसके बावजूद तुमने मेरे साथ यह सलूक किया है ।” भीमराज ने कहा ।

“हम मजबूर थे मिस्टर साहनी । हम खुद मुसीबत में फंस गए हैं ।” टोनी ने कहा ।

“और मैं तुम्हारी तमाम मुसीबतें दूर करने के लिए मौजूद हूँ ।” पीछे से आवाज आई और टोनी चौंककर पलटा ।

हीरा उसके सामने खड़ा था । अपनी वास्तविक शक्लो-सूरत में । टोनी ने उसे एक दो बार हाईलाइट क्लब में देखा था और अमर के नाम से उसे अच्छी तरह पहचानता था । हीरा को अपने करीब पाकर टोनी के शरीर में कँपकँपी दौड़ गयी ।

“उस्ताद हीरा...मैं...मैं... ।”

“कोई बात नहीं टोनी । मैं जानता हूँ कि तुम उस पागल कुत्ते के साथी हो और विवशतावश उसका साथ दे रहे हो । लेकिन तुम्हें इस बात का इल्म होगा कि यहाँ सोलो जैसे आदमी की गुंजाइश नहीं है । फिर तुमने उसका साथी बनना क्यों पसंद किया ?”

“ओह उस्ताद हीरा । बस यूँ समझो कि आज की बात नहीं, मैं बहुत अरसे से उसके चक्कर में फंसा हुआ था । ईश्वर के लिए मुझे क्षमा कर दो ।” टोनी ने भयभीत स्वर में कहा ।

“ठीक है माफ कर दूँगा । लेकिन मेरी भी शर्त होगी टोनी ।”

“मैं हर शर्त मानने के लिए तैयार हूँ उस्ताद । बस मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिला दो । मैं जिंदगी से तंग हूँ ।”

“तो फिर सुनो, सोलो के सही ठिकाने का पता मुझे बताना होगा और यह भी कि वह क्यों आया है और क्या कर रहा है ?”

“ओह ! मिस्टर हीरा ! आप मेरी सुरक्षा की गारन्टी लेते हैं ।” टोनी ने कहा ।

“हंड्रेड पर्सेंट, सोलो तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा ।”

“तो फिर साथ चलिए । सोलो तो आपकी तलाश में इस समय तिलक रोड गया होगा, आप मेरे साथ चलिए । मैं आपको उसके सही निवास स्थान पर ले चलता हूँ । इस समय उसके साथी भी वहाँ मौजूद नहीं होंगे ।”

“हूं, ठीक है, मैं इसका प्रबन्ध किये लेता हूँ । और तिलक रोड की कोठी में भी उसके स्वागत का प्रबन्ध किये देता हूँ । भीमराज को उसने जिस तरह मारा है, इसका उसे हिसाब देना होगा । भीमराज, तुम अगर चाहो तो मैं तुम्हें अस्पताल पहुँचा दूँ ।”

“नहीं श्रीमान जी । मैं ठीक हूँ । यहीं पर मैं ड्रेसिंग करवा लेता हूँ ।” भीमराज ने उत्तर दिया । हीरा टेलीफोन की तरफ बढ़ गया ।

टोनी ने हाथ पांव डाल दिए थे । उसने स्वयं ही अपना रिवाल्वर निकालकर हीरा के सामने फेंक दिया । वास्तव में वह सोलो के पागलपन से तंग आ गया था ।

अमर उर्फ हीरा ने कोठी नम्बर पचास के नम्बर डायल करके वहाँ मौजूद लोगों को कुछ निर्देश दिए और उसके बाद इत्मीनान से टोनी के साथ बाहर निकल गया । थोड़ी देर बाद टोनी उसे लिये मजदूरों की ऐसी बस्ती में प्रविष्ट हुआ जहाँ झोपड़े अपनी तमामतर गंदगी को समेटे हुए फैले थे । वे एक बड़े से झोपड़े के सामने रुक गए ।

“यह तुम मुझे कहाँ ले आये ?” हीरा ने पूछा ।

“यही सोलो का निवास-स्थान है । यहाँ वह एक हिप्पी बन कर रहता है ।” टोनी ने कहा ।

“अगर यह बात झूठ साबित हुई तो तुम जानते हो टोनी, तुम्हारा क्या अंजाम होगा ?”

“मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ उस्ताद ।”

हीरा झोपड़ी में प्रविष्ट हो गया । झोपड़ी खाली पड़ी थी । हालाँकि उसने एक बड़ा जोखिम उठाया था परन्तु जोखिम और खतरों से उसे बहुत प्यार था । वह झोपड़ी की तलाशी लेता रहा – बहुत सी काम की चीजें समेट कर वह बाहर आया । टोनी बाहर ही खड़ा था ।

“चलो....फ़िलहाल तुम्हें उसी होटल में रहकर भीमराज की निगरानी करनी है । मैं तुम्हें वहीं छोड़ देता हूँ, और जब सोलो मेरे जाल में फंस जायेगा तो फिर तुम आजाद हो । अन्यथा जब तक वह मेरे कब्जे में नहीं आता तुम उसके गिरोह में रहकर मेरे लिए काम करोगे ।”

टोनी ने सहमति में सिर हिला दिया ।

☐☐☐
 
सोलो इतना परेशान था कि अच्छे-बुरे की तमीज खो बैठा था । उसकी स्थिति बिल्कुल पागलों जैसी हो गयी थी और उसके दोनों साथी भी परेशान थे । जोनी उसके साथ ही आया था । उसके अलावा चार्लिस भी उसके साथ आया था । वह दोनों ही हीरा के सम्बन्ध में अच्छी तरह जानते थे कि अगर सोलो और वह हीरा के हत्थे चढ़ गए तो फिर उनका जीवन ही दूभर हो जायेगा और वह दोनों ही अब निकल भागने का प्रयास में थे । फिर उन्हें इसका अवसर भी मिल गया ।

तिलक रोड की कोठी नम्बर पचास के सामने सोलो ने उन्हें गाड़ी से नीचे उतारा और सर्द स्वर में बोला –

“तुम में से एक कोठी के सामने रहेगा और दूसरा पीछे की साइड में चला जाये और जब मैं संकेत करूँ तो तुम अंदर घुस आना । इस बीच कोई बाहर से कोठी में घुसने की कोशिश करे तो उसे रोकना । चाहें तुम्हें गोली ही क्यों न चलानी पड़े । या कोई कोठी से निकल भागने की कोशिश करे तब भी रोकना तुम्हारा ही कर्तव्य होगा ।”

“आप निश्चिन्त रहें मिस्टर सोलो ।” दोनों ने एक साथ उत्तर दिया । यह तो ऊपर वाले की कृपा थी जो वह शेर की कछार में जाने से बच गए थे ।

सोलो पिस्तौल लेकर अंदर प्रविष्ट हो गया । उसने पिछली चारदीवारी से कूदना पसंद किया । काफी लंबी-चौड़ी कोठी थी । एक विस्तार से फैला बाग था । उसमें सोलो वृक्ष की आड़ लेता हुआ इमारत की तरफ बढ़ गया । थोड़ी ही देर बाद वह उस पार्श्व के दरवाजे पर था । उसने पार्श्व दरवाजे को धकेलकर देखा और शायद उसका सौभाग्य था कि दरवाजा खुला हुआ था । पिछले दरवाजे से प्रविष्ट होकर वह एक कॉरिडोर में पहुँच गया । कॉरिडोर खाली पड़ा था । वह आगे बढ़ने लगा ।

दोनों तरफ कमरों की कतारें थीं । लेकिन यह सभी कमरे बाहर से बन्द थे । इसका मतलब साफ था अर्थात इन कमरों में कोई नहीं है । कॉरिडोर का अंतिम सिरा एक दरवाजे तक पहुँचता था । सोलो इस दरवाजे तक पहुँच गया । उसने कान लगाकर अंदर की आवाजें सुनीं । लेकिन कोई दरवाजा सुनाई नहीं दे रही थी । संयोग की बात थी कि यह दरवाजा खुला था । सोलो इस दरवाजे में प्रविष्ट हो गया ।

वह एक बहुत बड़ा हॉल था ।अत्यधिक खूबसूरत, फर्श पर सुर्ख रंग का एक कालीन बिछा हुआ था और कालीन के चारों तरफ गांव तकिये लगे हुए थे । गांव तकियों के सामने ही तीन-चार इंस्ट्रूमेंट्स रखे हुए थे जिनमें हारमोनियम, तबला, ढोल और ऐसी ही चीजें थीं ।

सोलो ने उपहासजनक दृष्टि से इन चीजों को देखा और उसी समय पार्श्व में दरवाजा एक जोरदार आवाज के साथ बन्द हो गया । सोलो चौंककर पलटा । उसने लपककर दरवाजे को खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा न खुला । अगले ही क्षण वह दूसरे दरवाजे की तरफ दौड़ पड़ा । लेकिन वह दरवाजा भी बन्द ही था । इस तरह सोलो हॉल में कैद हो गया था ।

उसने भयभीत निगाहों से इधर-उधर देखा, लेकिन उसकी समझ में कोई बात न आ सकी ।

वह इधर-उधर देखता रहा लेकिन उसे कोई दरवाजा या खिड़की खुली नजर नहीं आई । परिस्थिति काफी खतरनाक थी ।

निगाह ऊपर उठी तो छत के पास ही रोशनदान नजर आये । लेकिन इतनी ऊँचाई पर कि वहाँ तक पहुँचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । तब सोलो भयभीत अंदाज में चीख पड़ा – “दरवाजा खोल दो हीरा । दरवाजा खोलो, वरना अच्छा नहीं होगा । मैं तुम्हारी मौत बनकर आया हूँ ।”

लेकिन उसे कोई उत्तर नहीं मिला ।

थोड़ी देर तक सोलो देखता रहा । अजीबोगरीब जगह फंस गया था । अब तो वह अपने आदमियों को भी कोई संकेत नहीं दे सकता था । आवाज देने की कोशिश करता तो स्पष्ट था कि उसकी आवाज भी बाहर नहीं जा सकती थी । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे ?

एकाएक उसे एक रोशनदान के समीप सरसराहट सुनाई दी और फिर एक बदनुमा पक्षी रोशनदान से अंदर प्रविष्ट हो गया । यह एक चील थी । भला इस चील का रोशनदान से क्या रिश्ता है जो कयामत की तरह अंदर हॉल में चकराने लगी थी । और फिर उसने सोलो पर झपट्टा मारा । उसके पंजे काफी नुकीले थे । सोलो के सिर से यह पंजे टकराये और उसके सिर में जलन होने लगी । दूसरे ही क्षण उसने पिस्तौल निकाल लिया और चील का निशाना लेने लगा ।

लेकिन चील पूरे हॉल में उड़ती फिर रही थी । सोलो उसके साथ-साथ नाच रहा था । चील ने एक बार फिर झपट्टा मारा और सोलो ने उस पर फायर कर दिया । गोली छत के समीप लगी थी । चील साफ बच गई । दूसरे ही क्षण उसी रोशनदान से एक और चील आ गई । सोलो ने पागलों के से अंदाज में इस चील पर भी फायर किया लेकिन दूसरी चील भी बच गई । अलबत्ता वह झुकी और उसने सोलो की गर्दन पर एक जोरदार झपट्टा मारा ।

सोलो की गर्दन से खून बहने लगा । सोलो ने फिर निशाना लेकर गोली चलाई और चील नीचे आ पड़ी । लेकिन अभी दूसरी चील बाकी थी और निरन्तर हॉल में चकरा रही थी । फिर जरा देर और गुजरी कि तीसरी चील रौशनदान से अंदर प्रविष्ट हो गयी । सोलो के कण्ठ से दहाड़ें निकल रही थीं । उसका सिर चकराने लगा था । उसने लगातार फायरिंग शुरू कर दी, और चंद क्षणों बाद उसका पिस्तौल खाली हो गया ।पागलपन के आलम में फालतू मैगजीन भी भूल गया था और उसने पिस्तौल ही खींचकर चील पर फेंक मारा । लेकिन पिस्तौल किसी चील पर न लग सका और फिर उनमें से एक चील ने पिस्तौल को पंजों से दबाया फिर एक-एक करके रोशनदान से बाहर निकल गयीं ।

अब सोलो को अचानक ख्याल आया कि वह निहत्था हो गया है । पिस्तौल की मैगजीन उसकी जेबों में पड़ी थी लेकिन पिस्तौल उसके हाथ से निकल चुका था ।

एक मुर्दा चील अब भी जमीन पर पड़ी हुई थी ।

सोलो को यूँ महसूस हो रहा था जैसे उसकी आँखें बन्द हुई जा रही हों । कदाचित चीलों के पंजों में कोई नशीली दवा लगी थी और चूंकि एक चील उसकी गर्दन में पंजा मारने में सफल हो गयी थीं, अतः वह दवा सोलो की रगों में पहुँच गयी थी ।

थोड़ी देर तक वह चकराई हुई आँखों से चारों तरफ देखता रहा, फिर हांफते हुए एक तरफ बैठ गया । उसकी आँखें अब बिल्कुल ही बन्द हो गई थीं और चंद क्षणों बाद वह फर्श पर औंधा लेट गया । लेकिन यह बेहोशी कितनी लम्बी थी, इसका उसे अंदाजा न हो सका । अलबत्ता जब उसे होश आया तो वह एक आरामदेह और खूबसूरत कमरे के एक बेड पर लेटा हुआ था । बेड पर सफेद चादर बिछी हुई थी । एक विचित्र सी सुगन्ध वातावरण में रची हुई थी ।

वह चकराते हुए जेहन से हालत का जायजा लेता रहा और फिर दूसरे ही क्षण वह उठकर बैठ गया । उसने भयभीत दृष्टि से चारों तरफ देखा ।

वह कमरा एक हसीन तरीन आरामगाह था । यहाँ वैभव की बहुत सी चीजें सजी हुई थी । सामने ही एक खूबसूरत ड्रेसिंग टेबल नजर आ रही थी । एक तरफ बाथरूम का दरवाजा था ।

सोलो भयभीत निगाहों से चारों तरफ देखता रहा । धीरे-धीरे सारी घटनाएं उसे याद आती जा रही थीं । उसका हाथ बेअख्तियार अपनी गर्दन पर उस जगह पहुँच गया जहाँ चील ने झपट्टा मारा था । अब वहां टेप चिपका हुआ था । वह कराहता हुआ अपनी जगह से उठा । दिल चाह रहा था कि अपने मुँह पर पानी के छींटे मारे ।

बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए वह ड्रेसिंग टेबल के सामने से गुजरा, लेकिन ड्रेसिंग टेबल के आईने में अपना बिम्ब देखकर चीख पड़ा । उसने पुनः भयभीत निगाहों से अपने चेहरे को देखा, लेकिन वह...वह स्वयं तो न था । उसका लिबास जनाना था– मूँछें साफ कर दी गई थीं । भौंहें पतली कर दी गयीं थीं ।

एक अजीबोगरीब शक्ल उसके सामने थी जिस पर खूब गहरा मेकअप किया हुआ था । होंठों पर लिपस्टिक लगी हुई थी और कानों में टॉप्स पहनाये हुए थे । सोलो ने वहशत के आलम में वह लिबास उतार कर फेंक दिया । अब वह नग्न हो गया था लेकिन कमरे में दूसरा लिबास नहीं था । उसने कमरे में मौजूद एक अलमारी पर झपट्टा मारा । लेकिन अलमारी खाली पड़ी हुई थी । उसमें कपड़ा नाम पर कोई चीज नहीं थी । उसे अपने आप से ही डर लगने लगा ।

फिर वह बाथरूम की तरफ दौड़ पड़ा । बाथरूम एकदम आधुनिक था । उसने अपने चेहरे को रगड़-रगड़कर धोया, मगर यह मेकअप कदाचित प्लास्टिक मेकअप था और अमोनिया के बिना साफ नहीं हो सकता था । लिपस्टिक भी शायद वाटर प्रूफ थी और पानी से साफ नहीं हो रही थी । उसने अपने होंठ रगड़ डाले लेकिन लिपस्टिक न छूटनी थी न छूटी ।

उसे अपना चेहरा बेहद उपहासजनक लग रहा था । लेकिन अब उसे साफ करना उसके बस की बात नहीं थी । उसके कंठ से गुर्राहटें निकलती रहीं । ठंडा पानी उसे अत्यधिक सुकून दे रहा था । वह काफी देर तक ठंडे पानी के नीचे बैठा रहा और जब थक गया तो उसने शॉवर बन्द कर दिए ।

अभी तक निरंतर ऐसी घटनाएं घट रही थीं जिन्होंने सोलो को कुछ सोचने की मोहलत नहीं दी थी । लेकिन कब तक ? उसने अपनी हरकत पर गौर किया । यह सब क्या हो गया ? अब क्या होगा ? उसे यहाँ आये न जाने कितना वक्त गुजर गया । क्या उसके साथी अब भी बाहर उपस्थित होंगे, या वह भी पकड़े गए ?

बड़ी अनोखी परिस्थिति थी । उसने बेखयाली के आलम में बाथरूम का दरवाजा खोला और एकाएक बहुत से कहकहे उसके कानों से टकराये । दूसरे ही क्षण उसने बदहवासी में दरवाजा बन्द कर दिया । उसका चेहरा धुआं हो गया । उसके बदन पर तो लिबास भी नहीं था ।

चंद क्षण इसी बदहवासी के आलम में वह दरवाजे के साथ खड़ा रहा, फिर उसने दरवाजा खोला और गर्दन निकालकर बाहर देखने लगा । लेकिन बाहर जो जीवात्मा उसे नजर आई वह भी हैरतअंगेज थी ।

वह यकीनन मर्द थे, लेकिन जनाने लिबास में थे । चेहरों पर मेकअप किये हुए । लेकिन बड़ा भद्दा मेकअप था, बहुत विचित्र लग रहे थे वे सब ।

“मेरे वस्त्र लाओ ।” सोलो कन्ठ फाड़कर चीखा ।

“ले लो बुआ । खुद ही उतार फेंका था । अब तो यही पहनना पड़ेगा ।” उनमें से एक ने कहा और वही रंगीन बेतुका लिबास सोलो की तरफ बढ़ा दिया ।

सोलो उसकी बात तो नहीं समझ सका, लेकिन उस लिबास को देखकर वह फिर दहाड़ पड़ा । “मेरा अपना लिबास दो ।”

“ऐ लो बुआ । यह तो बड़ी मुश्किल हो गयी । यह विलायती हिजड़ा अंग्रेजी में गाना गायेगा । ऐ बुआ हमारी जुबान में बोलो, हमारी जुबान में ।”

“एक मिनट रुक छमिया, मैं इससे अंग्रेजी में बात करती हूँ ।” दूसरे हिजड़े ने कहा और बाथरूम के पास पहुँचकर अंग्रेजी में बोली ।

“कपड़े क्यों नहीं ले रहे ।”

“मेरे कपड़े कहाँ हैं ?”

“विलायत पहुँच गया अब तू, यही कपड़े पहनने हैं तो पहन लो वरना ऐसे ही रहोगे ।”

“मैं तुम सबको, हीरा को जिन्दा नहीं छोड़ूँगा, मैं...मैं... ।” सोलो गुर्राने लगा । तब हिजड़े ने कमरे में मौजूद हिजड़ों की तरफ रुख कर लिया ।

“चलो री चलो...शुरू हो जाओ...बकरी का बच्चा हाय हाय, न बाप न चच्चा, हाय हाय, लंदन से आया हाय-हाय....कुछ भी न लाया....हाय-हाय ।”

इसके साथ ही ढोल बजने लगा । चंद हिजड़े नाचने के लिए खड़े हो गए और सोलो अपने बाल नोच रहा था । बड़ी खराब पोजीशन थी । बाहर नहीं निकल सकता था, क्योंकि वस्त्र-विहीन था और जो लोग बाहर मौजूद थे उनके बारे में कुछ नहीं जानता था ।
 
बाहर नाच-गाना होता रहा और अंदर सोलो बल खाता रहा, फिर उसने जोर से दरवाजा पीटा और नाच रुक गया ।

“क्या है रे विलायती हिजड़े ? क्यों शोर मचा रहा है ?”

“मुझे वस्त्र दो ।”

“यही वस्त्र हैं– पहनना है तो पहन ले ।”

“लाओ, यही लाओ ।” सोलो ने कहा और एक हिजड़े ने वही बेतुका लिबास सोलो को दे दिया ।

सोलो की आँखें खून की तरह सुर्ख हो रही थीं । उसने लिबास पहना और फिर किसी जख्मी सांड की तरह बाहर निकल आया । सामने ही जो हिजड़ा उसे नजर आया उसने पूरी शक्ति से उस पर आक्रमण कर दिया ।

“अरी मेरी मैया ! ऐ छमिया... ऐ रामकटोरी...सम्भालो इसे ।” मार खाने वाला हिजड़ा चीखा और एक दूसरे हिजड़े ने ढोल उठाकर सोलो के सिर पर दे मारा ।

सोलो एक पल के लिए चकरा गया । लेकिन फिर वह संभला और उसने बाकायदा जंग शुरू कर दी ।

लेकिन जिन लोगों से वह लड़ रहा था । वे शैतान थे, अजीब-अजीब तरह से चीखे जा रहे थे । कूल्हे मटका रहे थे । तालियां बजा रहे थे और सोलो को मार रहे थे । उनकी संख्या अधिक थी इसलिए सोलो की एक न चल रही थी । जरा सी देर में वह मार खा खाकर आधा हो गया ।

तभी दरवाजे पर एक आवाज उभरी, “क्या हो रहा यह ?”

अमर एक शानदार लिबास में दरवाजे पर खड़ा था । उसके चेहरे पर इस समय आत्मसम्मान के भरपूर भाव थे और वह एक हसीन नौजवान नजर आ रहा था ।

सोलो ने उसे देखा और उसकी आँखों में विचित्र से भाव पैदा हो गए । उसने अपनी जगह से उठने की कोशिश की, लेकिन टांगो ने साथ नहीं दिया । तब वह दोबारा अपनी जगह बैठ गया । उसकी हालत सचमुच खराब हो गयी थी ।

“क्या हो रहा है यह सब ?” अमर ने पुनः पूछा ।

“रियाज कर रहे थे हम सब ।” हिजड़ों ने जवाब दिया ।

“हूं....जाओ बाहर जाओ ।” अमर ने कहा और तमाम हिजड़े बाहर चले गए ।

सोलो ने कहा, “तुम...तुम हीरा हो ?”

“मेरे ख्याल में तुम मुझे अच्छी तरह जानते हो मिस्टर सोलो ।”

“मैंने....मैंने तो तुम्हारी बहुत सी तस्वीरें देखी हैं । लेकिन तुम हकीकत में क्या हो ?”

“सच्चाई कुछ नहीं होती । इस चक्कर में मत पड़ो कि मैं हकीकत में क्या हूँ । यह तो मुझे स्वयं भी नहीं मालूम ।”

“लेकिन तुम क्या कर रहे हो । तुम्हारा धंधा क्या है ?”

“कुछ भी नहीं सोलो, मुझे कोई भी धंधा करने की जरूरत नहीं है । मैं एक दौलतमंद इंसान का इकलौता बेटा हूँ जिसकी बूंद भर दौलत पर तुमने हमला किया था । इतनी दौलत है मेरे पास कि मेरी सात पुश्तों के लिए काफी हो सकती है ।” अमर ने उत्तर दिया ।

“फिर तुमने ये सारे झगड़े क्यों पाल रखे हैं ?”

“इस सवाल का जवाब तुम्हारे लिए बेकार होगा ।”

“नहीं, मैं तुम्हारे बारे में जानना चाहता हूँ ।”

“तुम इस इमारत में क्यों प्रविष्ट हुए थे ?”

“तुम्हें कत्ल करने के लिए ।”

“तो अब तुम्हारे सामने मौजूद हूँ, आओ उठो और कत्ल कर दो मुझे ।” अमर ने कहा ।

“यूँ लगता है जैसे यह मेरे लिए सम्भव न हो” सोलो ने फुसफुसी सी आवाज में कहा ।

“क्यों ?”

“तुम बेहद चालाक और खतरनाक नौजवान हो ।”

“यह शब्द तुम कह रहे हो सोलो ।”

“हाँ, यह सच्चाई है ।”

“तुम्हारी तो यूरोप में तूती बोलती है ।”

“जिन हालात से मुझे यहाँ वास्ता पड़ा है उसके बारे में मेरी बुद्धि बेहद हैरान है ।”

“लिखकर दे सकते हो ?”

“क्या... ?”

“यही कि बड़ा मुजरिम मैं हूँ, तुम नहीं, क्या तुम यह लिखित रूप में स्वीकार करोगे ?”

“इसकी क्या आवश्यकता है ?”

“है सोलो – है, मेरी कहानी सुनोगे तो दंग रह जाओगे... मैं जो कुछ भी हूँ, तुम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ।”

सोलो की मानसिक रग भी बहक गई थी, वह उसके बारे में सबकुछ जानने को इच्छुक था । अतः उसने कहा, “क्या तुम मुझे अपने बारे में बताना पसंद करोगे ?”

“हाँ– अगर तुम सबकुछ भूलकर गंभीरता से सुनना पसंद करोगे ।”

“अवश्य...अवश्य....मैं तुम्हारे बारे में जानना चाहता हूँ ।”

“तो सुनो ।” अमर एक कुर्सी पर बैठ गया । उसकी आँखों में गम के बादल उमड़ने लगे... “मैं एक बहुत बड़े बाप का बेटा हूँ । इतने बड़े दौलतमंद बाप का बेटा कि तुम सोच भी नहीं सकते । करोड़ों की जायदाद मेरे नाम है । मैं सारी जिंदगी आराम से गुजार सकता हूँ । लेकिन न जाने कहाँ गलती हो गई । और यह गलती इसलिए हुई कि जब मेरे माँ-बाप बेऔलाद थे और काफी कोशिशों के बावजूद भी उनकी कोई संतान नहीं हुई तो वह निराशा में डूब गए । मेरे पिता दूसरी शादी नहीं करना चाहते थे । वह माँ को बहुत चाहते थे ।औलाद पाने के लिए न जाने उन्होंने क्या कुछ जतन किये । फिर एक दिन एक साधु हमारे घर आया, उस साधु की खूब सेवा की गई तो साधु ने उनसे खुश होकर उनकी इच्छा पूछी । उन्होंने संतान मांगी ।

साधु ने कहा कि मेरे पिता पर पिछले जन्म का एक श्राप है और वह तभी मिट सकता है जब वह दुर्गाम्बा देवी के मन्दिर तक की यात्रा करें । यह मंदिर तिब्बत की एक बर्फीली चोटी पर है और वहाँ पहुँचने के लिए चालीस किलोमीटर की पद यात्रा थी जो बहुत ही मुश्किल काम था । साधु ने कहा, यदि वह मंदिर तक पहुँच गए तो उनकी इच्छा पूर्ण होगी । लेकिन औलाद की ख्वाहिश के लिए पति-पत्नी को वहाँ तक जाना जरूरी था । मेरे पिता मेरी माँ को लेकर चल पड़े और बड़ी मुश्किलें झेलते हुए उस मंदिर तक पहुँच ही गए । और वहाँ देवी के मंदिर में उन्होंने मन्नत मांगी । उनकी मनचाही मुराद पूरी हो गई । और उनकी एक औलाद हुई जो कि मैं था । परन्तु एक गलती हो गई ।
 
माँ ने मन ही मन कन्या मांगी थी और पिता ने पुत्र माँगा था ।भला यह दोनों रूप एक ही औलाद में कैसे आ सकते थे । इसलिए उन्हें एक ऐसी औलाद नसीब हुई जो लड़का भी था और लड़की भी । माँ ने उसका नाम उमा रखा तो बाप ने अमर...और उसका पालन-पोषण बहुत ही गुप्त रूप से हुआ, ताकि किसी को पता न चले कि उनकी संतान लड़का है या लड़की । कोई मुझे सम्पूर्ण मर्द न कह सका और कोई सम्पूर्ण औरत न कह सका ।और माँ सदमे से बीमार रहने लगी । उन्होंने मेरा बहुत इलाज करवाया लेकिन भला देवी का दिया वरदान कैसे तबदील हो सकता था ? लोग मुझे अमर कहते हैं, और मैं स्वयं को हीरा कहता हूँ ।

इसी अंदाज में मैं परवान चढ़ता रहा । मैं लड़की की तरह पला हूँ लेकिन कभी लड़की की शख्सियत मुझ पर हावी हो जाती है । अब तुम खुद सोचो कि इस वक्त यह सबकुछ मैं तुम्हें क्यों सुना रहा हूँ । तुम तो मेरे बेहतरीन दुश्मनों में से हो । मैं तुमसे किसी हमदर्दी की आशा नहीं रख सकता और न ही मुझे हमदर्दी से दिलचस्पी है । हाँ एक झुंझलाहट मेरे मन में अवश्य पैदा हो गयी है । किसी की आत्मा मेरे भीतर से पुकार-पुकार कर मुझे एक जुनूनी इंसान बना देती है । मैं मर्द नहीं हूँ । औरत नहीं हूँ । तो फिर मैं क्या हूँ ? मैंने औरतों का रूप धारकर बहुत से मर्दों को बेवकूफ बनाया और मैंने मर्दों का रूप धरकर अपने आपको एक सम्पूर्ण मर्द की हैसियत से परिचित कराया ।

यहाँ के बड़े से बड़े जरायमपेशा लोग, जिनके नाम से लोगों की सांसे रुकने लगती हैं । वह सब मेरे बेदाम गुलाम हैं । मेरा तो अपना ख्याल था कि यूरोप और अमेरिका की सैर करूँ और वहाँ के बदमाशों से भी अपनी पूजा करवाऊँ । यही मेरी आत्मा की पुकार है । यही जुनून है कि लोग मुझे एक शक्तिशाली सम्पूर्ण मर्द की हैसियत से जानें । समझे तुम मिस्टर सोलो ! और मजाल है किसी की जो मेरे सामने टिक सके । जिसने मेरे सामने आने की कोशिश की, मुँह की खाई और तुम भी उन्हीं में से एक हो मिस्टर सोलो ।”

“कमाल है, क्या तुम जो कुछ कह रहे हो सच है ?”

“हाँ, मैं झूठ नहीं बोलता और फिर तुम जैसे लोगों के सामने झूठ बोलने का कोई उद्देश्य भी नहीं है । क्योंकि तुम मेरे कैदी हो ।”

“ओह ! आश्चर्य की बात है, न जाने क्यों मुझे तुमसे हमदर्दी महसूस हो रही है ।”

“मूर्खता की बातें मत करो मिस्टर सोलो !.... मुझसे हमदर्दी करने की कोई जरूरत नहीं है । मैं हमदर्दी के योग्य नहीं हूँ । मैं सबकुछ हूँ मिस्टर सोलो, मैं सबकुछ हूँ । मुझे बताओ क्या मैं खुद में संपूर्ण नहीं ?”

“नहीं, हीरा की हैसियत से तुम एक बेहद शक्तिशाली और खतरनाक व्यक्ति हो, मैं इसे स्वीकार किये बगैर नहीं रह सकता ।”

“तो अगर तुम मेरी आत्मा की सन्तुष्टि के लिए अपने यह शब्द मुझे लिखकर दे दो तो मैं अत्यधिक खुशी महसूस करूँगा मिस्टर सोलो ।”

“हाँ, मैं तुम्हें लिख कर दे सकता हूँ, लेकिन इस सिलसिले में एक सौदा करना होगा ।” सोलो बोला । वह हीरा की फितरत से अच्छी तरह परिचित हो गया था ।

“कैसी शर्त, मुझे बताओ ?” हीरा ने कहा ।

“हम दोनों दोस्ती की हैसियत से जिंदगी गुजारेंगे, अगर तुम यूरोप या अमेरिका चलना चाहो तो हम साथ-साथ चलेंगे । शायद तुम्हें मेरे बारे में सम्पूर्ण विवरण नहीं मालूम मिस्टर हीरा ! यह सही है कि यहाँ आकर मैं तुम्हारे चंगुल में फंस गया लेकिन यूरोप में मेरे नाम का डंका बजता है । वहां मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ । हरचंद कि वहाँ की पुलिस मेरे पीछे है । लेकिन बड़े-बड़े उच्चाधिकारी मेरे दोस्त हैं और वह उस खतरे का प्रबन्ध स्वयं ही कर लेते हैं जो मुझे पेश आने वाला होता है । इन परिस्थितियों में मैं तुम्हारे लिये जो चाहोगे कर सकूँगा ।”

“यह सब बाद की बातें हैं मिस्टर सोलो । मुझे जवाब दो क्या तुम मुझे यह सर्टिफिकेट देना पसंद करोगे ?”

“हाँ...हाँ....ठीक है, लाओ कागज और कलम मंगवा लो । मैं आपको लिखकर दे देता हूँ ।” सोलो ने जवाब दिया और हीरा ने दरवाजे की तरफ रुख करके हांक लगाई ।

“ओ रामकटोरी....कागज कलम ले आ....जल्दी कर ।”

“लाई उस्ताद !” बाहर से आवाज आई, और थोड़ी देर के बाद उन्हीं मनहूस चेहरों में से एक अंदर प्रविष्ट हुआ, जिन्होंने सोलो का कबाड़ा करके रख दिया था ।

एक खूबसूरत पैड और कलम सोलो के हाथ में दे दिया गया और सोलो ने लिखना शुरू कर दिया ।

“मैं ऑस्टिन सोलो इस बात को स्वीकार करता हूँ कि इस देश में आकर मुझे अत्यधिक मानसिक उलझनों का शिकार होना पड़ा । मैं, जिसने इस देश में प्रविष्ट होते ही एक विदेशी दूतावास को तबाह और बर्बाद करके रख दिया । बेशुमार कत्ल किये । ए.सी.एम. पर बमबारी की, और उसके मालिक राजा प्रताप सिंग के घर हमला किया । लेकिन मेरा यही प्रोग्राम मनहूस साबित हुआ । मैं सोलो स्वीकार करता हूँ कि यहाँ आकर मिस्टर अमर या हीरा के हाथों मेरी वह गत बनी जिसे मैं जिंदगी भर भूल नहीं सकूँगा और मिस्टर हीरा के लिए यह शब्द सनद की हैसियत रखते हैं और मैं होश-ओ-हवास में इस पर हस्ताक्षर करता हूँ ।”

सोलो ने हस्ताक्षर किये और पैड हीरा की तरफ बढ़ा दिया ।

“धन्यवाद मिस्टर सोलो । मैं आपका बेहद शुक्रगुजार हूँ । मैं अपने आपको बड़ा प्रमाणित करने के लिए इस किस्म के कई प्रमाण पत्र एकत्रित कर चुका हूँ । क्या आप उन्हें देखना पसंद करेंगे ?”

“हाँ.....हाँ.....क्यों नहीं....कौन-कौन से लोग हैं जिनसे तुम टकरा चुके हो ?” सोलो ने पूछा ।

“मैं बताता हूँ ।” हीरा बोला और कमरे से बाहर चला गया । दरवाजा बन्द हो गया । सोलो प्रतीक्षा करता रहा । दस मिनट, बीस मिनट, चालीस मिनट, एक घण्टा, दो घण्टे और एकाएक वह चौंककर खड़ा हो गया । उसके रोंगटे खड़े हो गए । उसके पूरे शरीर में सनसनाहट दौड़ने लगी । वह दौड़ता हुआ दरवाजे तक आया और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगा । दरवाजा न खुला, लेकिन एक बहुत छोटी खिड़की छत के समीप खुल गयी ।

और किसी ने अंदर झांककर कहा । “क्या बात है भैया, क्यों फटाफट किये जा रहे हो ? गर्मी लग रही है क्या ? जाओ गुसलखाना समीप है, जाकर नहा लो ।”

“हीरा कहाँ है ?”

“अपने घर होगा ।” जवाब मिला ।

“क्या बकवास है, उसे इधर भेजो ।”

“अरे वाह, कैसे इधर भेजूं, उस्ताद तो चला गया है ।”

“क्या हांक रही हो, कहाँ चला गया वह ?”

“तो भैया ! हांक रहे हैं हम या तुम – वह किसी के नौकर हैं क्या ? जहाँ उनका दिल चाहा चले गए ।”

“मेरे बारे में क्या कह गए ।”

“यही कि नहाये-धोये और आराम करे । कोई कष्ट न होने पाये उन्हें । बड़े अच्छे आदमी मालूम होते हो ।” ऊपर से जवाब मिला और सोलो अपने सिर के बाल नोचने लगा ।

“कमबख्त, एक बार फिर चोट दे गया । जलील इंसान ।” सोलो उसे गलियां देने लगा और अपना सिर पटकने लगा ।

लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था । हीरा ने उसे जीवन में सबसे बड़ी चोट दी थी और सोलो अब गले-गले तक दलदल में फंस चुका था । उसे यकीन हो गया कि इस देश में आकर जिंदगी की शाम होनी थी और यह शाम करीब आ गई है ।

☐☐☐
 
इंस्पेक्टर पंत के घर के टेलीफोन की घण्टी बजी और स्वयं पंत ने रिसीवर उठाया ।

“हैलो, पंत बोल रहा हूँ ।”

“और मैं भगवान की मारी हीरा ।” दूसरी तरफ से आवाज आई । पंत चौंक पड़ा ।

“कौन मिस्टर अमर ?”

“ऐ तेरा सत्यानाश जाये पुलिस वाले, मुझ नसीबों जली को अमर कह रहा है । अरे हीरा हूँ....हीरा....समझा तू.... ।” हीरा ने कहा ।

“मिस्टर अमर...प्लीज ठीक से बात कीजिये, मैं एक जिम्मेदार पुलिस ऑफिसर हूँ । हरचंद कि हम एक दूसरे से खासे परिचित हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप टेलीफोन पर इस अंदाज में बातें करें ।”

“अये...हाय....तू तो भाषण देने बैठ गया – अरे कुछ इज्जत भी बनानी है या यूँ ही काम चलाना है अपना ।”

“मैं नहीं समझा मिस्टर अमर ।”

“फिर वही अमर...मैं कहती हूँ जब तक मुझे हीरा नहीं कहेगा मैं तुझसे दूसरी बात नहीं करूँगी ।”

“क्या बात है मिस्टर हीरा, कृपया बताइये तो सही ।” पंत ने झल्लाए स्वर में कहा ।

“ऐ वारी...ऐ कुर्बान....क्या कर रहा है इस वक्त ?”

“देखिये मैं कहता हूँ... मैं कहता हूँ.... ।”

“ऐ कहा सुनी बाद में.... मिलना है तुमसे, कहाँ मिलेगा जल्दी बोलो ।” हीरा के स्वर में हिजड़ों जैसी स्थिति थी ।

पंत परेशानी से गर्दन खुजाने लगा । वह इस शख्स को अच्छी तरह जानता था और उसका दिल से सम्मान भी करने लगा था इसलिए बर्दाश्त कर रहा था ।

“कोई विशेष बात है ?”

“हाँ...बहुत ही विशेष ।”

“क्या ?”

“फोन पर नहीं बताऊँगी ।”

“फिर ?”

“आजा मेरे पास, तेरा भाग्य खोल रही हूँ मैं ।”

“कहाँ आऊँ ?”

“तो हाईलाइट क्लब ही ठीक रहेगा ।” पंत ने जवाब दिया ।

“ऐ... जहाँ मिल ले तेरी मर्जी, मैं हाजिर हूँ ।” हीरा निरंतर हिजड़ों के से अंदाज में बोल रहा था ।

“बस तो फिर ठीक है । आप हाईलाइट क्लब पहुँच जाएँ ।” पंत ने जवाब दिया ।

“ठीक है आ जा, मैं तेरा इंतजार करती मिलूँगी ।” दूसरी तरफ से आवाज आई और रिसीवर रख दिया गया ।

पंत रिसीवर रखकर मूर्खतापूर्ण अंदाज से उसे घूरने लगा । फिर उसके होंठों पर झेंपी-झेंपी सी मुस्कुराहट फैल गई और उसके बाद वह अपनी जगह से उठ गया ।

तैयार होकर वह सीधा हाईलाइट क्लब पहुँचा ।

क्लब में पहुँचते ही उसे अमर एक जगह बैठा नजर आया ।

साफ-सुथरे लिबास में था । चेहरे पर वही दिलकश मुस्कुराहट थी जो दिलों को मोह लेती थी । लड़कियाँ चोर निगाहों से उसकी तरफ देख-देखकर ठण्डी आहें भरे जा रही थी । पंत मुस्कुराता हुआ उसके पास पहुँच गया ।

“हैलो मिस्टर अमर ।”

“हैलो ।” अमर ने जवाब दिया ।

“शुक्र है कि इस वक्त आप हीरा नहीं हैं ।” पंत ने हँसते हुए कुर्सी घसीटकर बैठ गया ।

“मैं किस समय क्या हूँ मिस्टर पंत, इस सिलसिले में आपको टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं ।” अमर ने गम्भीर स्वर में कहा ।

“अच्छा-अच्छा क्षमा चाहता हूँ । अब आ ही बता दें कि आपको हीरा कहूँ या अमर ?”

“जो दिल चाहे कहिये, मुझे इसकी परवाह नहीं है ।”

हालाँकि चंद मिनट पहले आपकी जिद थी कि आपको अमर नहीं हीरा कहा जाये ।”

“मिस्टर पंत, आपको कोई काम की बात करनी है या नहीं । या दूसरी सूरत में मैं इस जगह से उठ जाता हूँ ।”

“ओह मिस्टर अमर ! आप नाराज न हों, मैं अब काम ही की बात करूँगा । फरमाइए, क्या विशेष बात है ?”

“क्या आप सोलो के बारे में चिंतित नहीं थे मिस्टर पंत ?”

“अवश्य हूँ, और आपसे सहयोग की भी आशा रखता हूँ ।”

“हाँ...मैंने आपसे उसकी फाइल मांगी थी । बदले में जय को छोड़ दिया था । मैं उसी सम्बन्ध में आपसे मुलाकात करने आया हूँ ।”

“ओह, क्या...क्या आपने कुछ सफलता हासिल की है ? यह केस तो अब मेरी नाकामयाबी के बाद सीक्रेट सर्विस को दिया जाने वाला है ।”

“हूं... मुझे अफसोस है कि आप एक अच्छे शानदार ऑफिसर होते हुए भी सोलो के सम्बन्ध में असफल रहे हैं । लेकिन आप चाहें तो उन लोगों को सोलो सहित गिरफ्तार कर सकते हैं ।”

“क...क्या सचमुच ?”

“आपने मेरे साथ बड़ी शराफत से सहयोग किया है इंस्पेक्टर । सोलो की गिरफ्तारी के बाद आपकी उन्नति निश्चित है । आपको वह पुरस्कार भी मिलेंगे जो उस पर घोषित हैं । लेकिन यह सारी रकम आप मुझे देंगे । ऐसा आपको वचन देना पड़ेगा ।”

“मुझे मंजूर है । लेकिन सोलो है कहाँ ?”

“मेरी जेब में ।”

इतना कहकर अमर ने वह सर्टिफिकेट निकालकर इंस्पेक्टर पंत को थमा दिया जो सोलो ने हीरा के लिए लिखा था । इंस्पेक्टर ने उसे पढ़ा तो हैरत से उछल पड़ा ।

“इतनी जल्दी...यह सब... ।”

“मेरे काम इसी तरह के होते हैं इंस्पेक्टर । हालाँकि मैं चाहता तो उसे भी अपना गुलाम बना सकता था । लेकिन आपके बच्चों का ख्याल आ गया । दूसरे इतनी मोटी रकम जो मिलनी थी उसे गिरफ्तार करके । सोलो के लिए यह प्रमाण ही पर्याप्त है । उसने अपने जुर्मों को स्वीकार किया है ।”

“सोलो की हस्तलिपि हमारे रिकॉर्ड में है । और दोनों लिखावटें बिल्कुल समान हैं । ओह मिस्टर अमर ! मैं आपका यह एहसान कभी नहीं भूल सकता । आपने सचमुच मेरी लाज रख ली, लेकिन वह इस वक्त है कहाँ ?”

“मैं उसका पता भी बता देता हूँ । वहाँ वह आराम करता मिलेगा । वह फरारी की कोशिश नहीं करेगा बल्कि आपके कदमों में गिर पड़ेगा । और यही कहेगा कि चाहें मुझे फांसी लगा दो, लेकिन हीरा से बचा लो । रहा उसके साथियों का सवाल, उनकी गिरफ्तारी तो खैर साधारण सा काम है । मैं उनका नाम पता भी बताये देता हूँ । आप नोट कर लीजिये ।”

इंस्पेक्टर ने हीरा द्वारा दिया गया विवरण नोट कर लिया ।

“तिलक रोड कोठी नम्बर पचास में सोलो एक हिजड़े के रूप में मिलेगा ।”

“ह....हिजड़े के....”

“हाँ, हीरा के सामने आएगा तो यही मजे रहेंगे उसके ।” अमर ने कहकहा लगाया ।

“तो फिर जरा मैं अपने डिपार्टमेंट को फोन कर दूँ । और क्या आप वहाँ हमारे साथ चलेंगे ?”’

“हाँ जरूर....लेकिन थोड़ा ठंडा गरम हो जाये, फिर चलेंगे ।”

इंस्पेक्टर फोन करने के लिए काउंटर चला गया और हीरा एक वेटर को कुछ खाने-पीने का ऑर्डर देने लगा ।‘

“लेकिन मिस्टर अमर । अगर यह प्रमाण प्रस्तुत किया गया तो आप भी रोशनी में आ सकते हैं ।”

“वही तो चाहता हूँ मैं, शोहरत, पब्लिसिटी....हीरा का नाम संसार भर के समाचार पत्रों की सुर्खी बनेगा । तुम जय को भी वहाँ बुला लो । हिजड़ों के रूप में सोलो का फोटो उसी के अखबार में छपना चाहिए ।”

“मैंने आपके कहने से पहले से उसे फोन कर दिया है ।”

“लेकिन ख्याल रहे, हीरा के सम्बन्ध में चाहें जो छापा जाये, उसे समझा देना कि अमर को हीरा से अलग रखा जाये ।”

“बहुत बेहतर, ऐसा ही होगा । आप देखिएगा कि किस तरह प्रेस को रिपोर्ट देता हूँ ।”

वेटर उनकी इच्छित सामग्री लेकर आ गया और दोनों खामोश हो गए । फिर दोनों खा-पीकर उठे और क्लब से बाहर निकल गए ।

“इस इमारत के सबंध में कोई विवरण किसी को मालूम नहीं होना चाहिए । आपने मेरी एक इमारत तो पहले ही बदनाम कर दी । सो मुझे दूसरा प्रबन्ध करना पड़ा । तुम यही कहोगे कि सोलो को तुमने उसके निवास स्थल पर ही गिरफ्तार किया ।मैं उसका निवास स्थल भी तुम्हें बता दूँगा ।”

“ओह....क्या यह जरूरी है ?”

“नहीं जरूरी नहीं... अगर उसके निवास स्थल की बात न करो तो किसी दूसरी जगह का नाम ले लेना, लेकिन मेरी इमारत को बचाकर रखना ।”

“बहुत बेहतर मिस्टर अमर । जैसा आप चाहोगे वैसा होगा ।”

“बस अब चुपचाप चलते रहिये ।” अमर ने कहा और फिर दोनों खामोश हो गए ।

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सोलो की गिरफ्तारी का सम्पूर्ण विवरण एवं उसका जनखे वाला चित्र सर्वप्रथम ‘हंगामा’ के पहले इशु में छपकर हाथों-हाथ बिक रहा था । जय ने हीरा के सम्बन्ध में जबरदस्त लेख छापा था । उसने यहाँ तक लिखा था कि हीरा दुनिया के खतरनाक मुजरिमों का बादशाह है । सबसे बड़ा दोस्त है । और उसने आज तक जो भी जुर्म किया, वह उन मुजरिमों के खिलाफ किया जो कानून को अपनी उँगलियों पर नाचते है । उसके शिकार अपराधी रहे हैं और देश के बड़े-बड़े अपराधियों को हीरा ने बेदाम गुलाम बनाकर छोड़ रखा है । वह गरीबों का सहायक है । आज तक एक भी गरीब और निर्दोष व्यक्ति उसका शिकार नहीं हुआ । भले ही उसने बड़े-बड़े जुर्म किये हैं, लेकिन जो राजधानी में मुजरिमों का सफाया नजर आता है वह सब हीरा का कारनामा है ।

हंगामा ने घोषित किया कि रिपोर्टर जय हीरा की जीवनी लिख रहे हैं जो शीघ्र ही किश्तों में प्रकाशित होगी ।

तमाम अखबार में सोलो की गिरफ्तारी के बाद एक होड़ सी लग गयी थी । हीरा के सम्बन्ध में नये-नये समाचार प्रकाशित हो रहे थे । जिस अपराधी को यूरोप की पुलिस न पकड़ सकी, जिसने हिन्दुस्तान में कदम रखते ही एक हंगामा बरपा कर दिया था । जिसे पुलिस और गुप्तचर विभाग भी रोक पाने में असमर्थ हो गए थे । उसे हीरा ने गिरफ्तार करके सबूतों सहित किसी चूहे की तरह फांसकर पुलिस के हवाले कर दिया ।

बहुत से देशी-विदेशी ने जय से संपर्क स्थापित करना शुरू कर दिया था । वे हीरा की जीवनी छापने के लिए लालायित थे और बड़ी मोटी-मोटी रकमें ऑफर कर रहे थे ।

उधर अमर का अधिकांश वक्त घर पर ही कट रहा था । वह एक कमरे में रात दिन कुछ काम कर रहा था । और उसका यह कार्य लेखन सम्बन्धी था । डॉली कोठी में ही मौजूद थी और उसका बेहद ख्याल रखती थी । कभी-कभी जब अमर का मन लिखने से उचाट हो जाता या वह थकान महसूस करता तो कोठी के बाग में आ जाता ।

आधी-आधी रात को चांदनी रात में उसे तन्हा टहलते देखा जा सकता था । कभी-कभी डॉली भी उसके संग होती ।

राजा प्रताप सिंग खुश थे कि उनका बेटा अब आवारागर्दी छोड़कर घर रहने लगा है । और इस चमत्कार की वजह वह डॉली को समझते थे ।

एक दिन अवसर देखकर राजा प्रताप सिंग ने अमर से कहा – “ बेटे ! डॉली तुम्हें पसंद है न ?”

“हाँ डैडी ।” अमर ने सीधा सा उत्तर दिया – “बहुत अच्छी लड़की है । मेरा बेहद ख्याल रखती है ।”

“क्या तुम्हें मालूम है कि वह इस घर में क्यों रह रही है ?”

“मालूम है डैडी ।”

“उसके पिता राय बहादुर केशवदास शादी की तारीख पक्की करना चाहते हैं । क्या तुम उसे जीवन संगिनी के रूप में स्वीकार करोगे ?”

“अगर वह मेरी पत्नी बनकर ही जीवन व्यतीत करना चाहती है, तो मैं क्या कह सकता हूँ ।” अमर के स्वर में उदासी थी ।

“तुम्हारी माँ न्यूयार्क में डायलेसिस पर पड़ी जीवन का आखिरी वक्त काट रही है ।इस खुशी के अवसर पर वह सम्मिलित भी नहीं हो सकती । शादी के तुरन्त बाद तुम लोग अमेरिका चले जाओगे । हम चाहते हैं वह भी अपनी बहू को देख लें । उन्हें बहुत सुकून मिलेगा । और अगर उनकी मौत आनी ही है तो वह चैन से स्वर्ग सिधार सकेंगी ।”

“जैसी आपकी इच्छा ।” अमर ने बुझे-बुझे स्वर में कहा । और राजा प्रताप सिंग ने पंडित से शुभ मुहूर्त निकलवाकर शादी की तारीख निश्चित कर दी । डॉली को जब पता लगा तो खुशी से फूली न समाई, लेकिन अमर अब और भी उदास हो गया था । वह भीतर से टूट-फूट रहा था । उसके होंठों पर मुस्कुराहट न आती थी । वह अधिकतर समय अपने कमरे में बन्द रहता । लोगों से बहुत कम बात करता ।

एक बार पंत उससे मुलाकात के लिए आया और सोलो की गिरफ्तारी के सम्बन्ध में जो पुरस्कार राशि उसे मिली थी वह अमर को दे गया । एक बार जय भी आया । उसने डॉली को बधाई दी । अमर को भी बधाई दी । तब अमर ने जय को अपने कमरे में बुलाया–

“मैं तुम्हारे लिए कुछ काम कर रहा हूँ ।” अमर ने कहा ।

“तुमने घोषणा की थी कि हीरा की जीवनी लिखोगे, तुम्हारे लिए यह काम मैं खुद कर रहा हूँ । लेकिन जय ! आमतौर पर होता यह है कि इंसान जब मर जाता है तभी उसकी जीवनी अमर में आती है । इसलिए तुम्हें एक वादा करना होगा ।”

“कैसा वादा ?”

“जब तक मेरे माता-पिता जीवित हैं, तब तक यह जीवनी नहीं छापी जायेगी । मैं नहीं चाहता कि उन्हें एक और सदमा पहुँचे और उन्हें मालूम हो कि हीरा नामक बदनाम मुजरिम उनका बेटा है । रहा मेरा सवाल, तो मुझे अपनी परवाह नहीं । मैं शादी के बाद डॉली को लेकर कहीं दूर चला जाऊँगा । क्या तुम मुझसे वादा कर सकते हो ?”

“वादा रहा....वादा रहा...जब आप चाहोगे तभी आपके बारे में कुछ छापा जायेगा, अन्यथा नहीं ।”

“तुम्हारा कारोबार कैसा चल रहा है जय ?”

“कारोबार तो बिल्कुल ठीक है मिस्टर अमर, लेकिन कई एक प्रश्न है जो मुझे हैरान किये रहते हैं । और जवाब सिर्फ आपके पास हैं “ जय ने कहा ।

“कौन से सवाल हैं ?”

“वह तिलिस्मी बस्ती, जहाँ मैंने आपको रानी के रूप में देखा और सोलो को आपने किस तरह पकड़ लिया ? बहुत से सवाल हैं ।”

“सोलो की गिरफ्तारी तो जरूर हो गयी थी । इस कमबख्त ने मेरे मुकाबले पर आने की कोशिश की थी ।

लेकिन...लेकिन इस देश में या पूरी पृथ्वी में अपराध की दुनिया में मेरा कोई मुकाबला नहीं कर सकता । बताओ है कोई ऐसा सूरमा ?”

“मेरे ख्याल से नहीं, यह बात मैं आपको खुश करने के लिए नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मैंने आपको करीब से देखा, पहचाना और समझा है ।”

“कुछ नहीं, कुछ नहीं देखा, समझा, तुमने मिस्टर जय ! दरअसल मैं अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्ण करना चाहता हूँ । तुम कुछ नहीं जानते जय । बताओ, क्या इस देश में वह नस्ल, जो न मर्द कहलाती है न औरत उसका काम क्या है ? सड़कों पर ढोल बजाना, नाचना-गाना, उल्टी-सीधी हरकतें करना और फिर रात के गहरे अंधकार में अपनी हालत पर आंसू बहाना । क्या तुमने कभी ऐसे लोगों के बारे में सोचा है जय ?”

“जी, देखा है....ले....लेकिन...उसका इस मामले से क्या वास्ता ?”

“वास्ता है । तुम जानकर भी अंजान बन रहे हो । जब भगवान राम बनवास को जा रहे थे तो सारे अयोध्यावासी उन्हें सरजू के तट तक छोड़ने आये थे । वे उनके साथ-साथ चल रहे थे । तब राम ने उन्हें संबोधित करके कहा । भाइयों और बहनों ! आपका मेरा साथ यहीं तक का है । वापिस लौट जाइये । यह मेरा आपसे निवेदन है । तब वे लोग लौट गए । भगवान राम जब चौदह बरस बाद वापिस लौटे तो उसी जगह एक बस्ती आबाद थी और राम चकित रह गए । यह बस्ती कहाँ से आबाद हो गयी । तब उस बस्ती के लोगों ने राम का स्वागत नाच गाकर करते हुए कहा, आपने भाई बहनों को वापिस जाने के लिए कहा था ।

लेकिन हम न तो किसी के भाई हैं न बहन, हम भी तो आपको छोड़ने आये थे । आपने हमें लौट जाने के लिए नहीं कहा । सो यहीं रुक गए । स्वयं भगवान राम भी यह भूल गए थे कि सृष्टि में ऐसे भी निरीह लोग हैं, जिनका कोई नहीं । हिजड़ों की यह बस्ती आज भी आबाद है । सबसे पुरानी बस्ती है । इन निरीह लोगों का संसार में जीवन भी व्यर्थ होता है । जब कोई हिजड़ा मरता है तो उसे मौत भी ठीक से नसीब नहीं होती । उसकी अर्थी नहीं सजती, उस पर फूल नहीं चढ़ाये जाते । उसे खड़े-खड़े इस तरह ले जाया जाता है जैसे कोई जिन्दा आदमी चल रहा हो । इसी तरह चलते हुए वह उस जगह पर पहुँचता है जहाँ उसे दफनाया जाना है, और रात के अँधेरे में चंद हिजड़े ही उसे इस तरह ले जाते हैं ताकि कहीं कोई देख न ले । कभी किसी हिजड़े की चिता देखी है तुमने, किसी का जनाजा देखा है.... ?”

अमर की आँखों में सुर्खी तैर रही थी । उसकी हालत बड़ी विचित्र सी हो गयी थी ।

“मिस्टर अमर....प्लीज... ।”

“ऐ....हमें अमर न कहो जय भैया.... ।” अचानक उसका स्वर बदल गया ।उसमें हिजड़ा जैसी कैफियत पैदा हो गयी ।

उसकी आवाज में भी तबदीली आ गई । जय ने ऐसा ही कुछ रानी के रूप में उसको देखा था ।

“आपको क्या हो गया मिस्टर अमर ?”

“ऐ हम तो जनखे हैं जनखे....हिजड़े हैं, जन्नत की चिड़िया हैं ।” अमर ने कूल्हे मटकाकर कहा, समझे जय भैया ।”

“क्या....क्या सचुमच...ओ गॉड ।”

“अब बताओ जय....है कोई माई का लाल जो मेरा मुकाबला कर सके ।”

जय का सिर चकराने लगा था । उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ।

“अगर कोई सरकश हो तुम्हारी निगाहों में तो बताओ...मैं उसका सिर झुकाने का भी इच्छुक हूँ ।”

“मैं क्या बता सकता हूँ ?”

“लेकिन मुझे वह लोग चाहिए, जो मुझसे दुश्मनी करें बगावत करें, समझे । मुझे दुश्मन चाहिए दुश्मन । और मिस्टर जय अपने अखबार में मेरा यह चैलेंज छाप दो । है कोई मर्द जो एक हिजड़े से मुकाबला कर सके ।”

एकाएक जय के मन में यह सवाल उठा । अगर अमर सच कह रहा है तो क्या इस सच्चाई का इल्म डॉली को भी है । वह यह सवाल पूछना चाहता था, लेकिन अमर को विचित्र सी स्थिति में देखकर उसने खामोशी बेहतर समझी ।

और अमर कहता जा रहा था –

“और तुम्हारे बाकी सवालों का जवाब बहुत लम्बा है जय ! वह सब मैंने इस पुस्तक में लिख दिया है । जहाँ छागो डाकू छग्गन धोबी बनने पर मजबूर है । जहाँ मिसेज ठाकुर चंदा बनने पर विवश है । और वे सबके सब मेरे गुलाम हैं ।”

जय के चले जाने के बाद अमर देर तक खामोशी से बैठा शून्य में निहारता रहा और फिर उसके कहकहे उबल पड़े ।

☐☐☐
 
शादी की तारीख निश्चित हो गयी थी । लेकिन ज्यों-ज्यों यह दिन करीब आता जा रहा था अमर की मानसिक स्थिति में भारी तनाव के कारण तबदीलियां आती जा रहीं थीं । वह अब किसी से बात भी नहीं करता । डरा-डरा सा, सहमा-सहमा सा रहता । निमंत्रण पत्र छप गए थे ।

डॉली अब अपने घर लौट चुकी थी । और वहाँ भी शादी की सम्पूर्ण तैयारियां हो रही थी ।डॉली अब बेहद खुश थी । कामिनी उसके पास होती तो घण्टों उससे बातें किया करती ।

लेकिन उसे आने वाले तूफान का कोई इल्म नहीं था ।

जय इस शादी में दोनों तरफ से आमंत्रित था ।

और फिर बड़े धूमधाम से अमर की शादी डॉली से हो गयी । डॉली दुल्हन बनकर राजा प्रताप सिंग की विशाल कोठी में आ गयी ।

राजा प्रताप सिंग की खानदानी हवेली सुजानगढ़ में थी । किसी जमाने में सुजानगढ़ उनके पुरखों की रियासत थी ।

उनकी जायदाद अब भी वहाँ फैली थी, जिसकी देखभाल उनके दीवान किया करते थे । अट्ठाईस साल पहले इसी हवेली में अमर का जन्म हुआ था और दीवान प्रभुदास इस राज से वाकिफ थे । इस हवेली में बड़े गोपनीय तरीके से अमर का लालन-पालन हुआ था । उसका बचपन यहीं बीता था । फिर दीवान प्रभुदास उसे लेकर स्विटरजरलैंड चले गए थे । अमर उनकी देखरेख में ही पला था ।

अमर की जिद थी कि वह इसी हवेली में सुहागरात मनायेगा । यहाँ उनका पुराना खानदानी मंदिर भी था ।

राजा प्रताप सिंग को भला क्या आपत्ति हो सकती थी ।

बूढ़े हो चुके दीवान प्रभुदास की देखरेख में उन्हें सुजानगढ़ के लिए रुखसत कर दिया गया । दिल्ली महानगर की भीड़-भाड़ से दूर सुजानगढ़ की पहाड़ियां अपनी अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्ध थीं ।

हवेली काफी विस्तार में फैली हुई थी । हवेली क्या थी एक महल था जो एक ऊँची चारदीवारी से घिरी थी । दीवान प्रभुदास का परिवार भी हवेली के एक हिस्से में रहता था । अमर अक्सर यहाँ आया करता था । इसलिए का एक भाग शुरू से ही उसके इस्तेमाल में काम आता था ।

इसी भाग में सुहागरात का कमरा सजा हुआ था ।

दीवान प्रभुदास परेशान थे । आशंकाओं के घनेरे बादल उनके मन में उमड़-घुमड़ रहे थे । उन्होंने अपने खास कारिंदो को सचेत कर दिया था ।

और फिर वह शाम आ गई... वह रात आ गई....जो डॉली के अरमानों की रात थी । अमर उस कक्ष में प्रविष्ट हुआ जहाँ डॉली दुल्हन बनी बैठी थी और धड़कते दिल से अपने महबूब का इंतजार कर रही थी । घूंघट में चाँद छिपा हुआ था और उधर आकाश का चाँद भी बादलों में जा छिपा था ।

कदमों की चाप धीरे-धीरे उसके निकट आती जा रही थी ।

अमर ने उसके पास आकर उसका घूंघट उलट दिया ।

डॉली ने निगाह उठाई तो देखा अमर के चेहरे पर एक अजीब सी कैफियत थी । उसका शरीर कंपकंपा रहा था । चेहरा जर्द पड़ा हुआ था और आँखों में ऐसी सुर्खी थी कि डॉली कांप गयी ।

“जानती हो, मैं तुम्हें यहाँ क्यों लाया हूँ ?” उसने अजीब से अंदाज में कहा ।

“जानती हूँ ।” वह शरमाकर बोली । लबों पर मुस्कुराहट थी ।

“नहीं...तुम कुछ नहीं जानती डॉली । तुम्हें मैंने दिल से चाहा है...तुम मेरे रोम-रोम में आ बसी थीं । और मैंने तुमसे कहा था कि मेरे भीतर एक आत्मा की पुकार दबी है । मैं तुम्हें वही पुकार सुनाने लाया हूँ यहाँ । मेरे पिता की यही ख्वाहिश थी कि मैं तुमसे शादी कर लूँ । और मैंने शादी कर ली ।

शायद इस खुशखबरी को सुनकर मेरे माँ-बाप की खुशियाँ लौट आएं । यह सब इसीलिए हुआ है । मगर हकीकत यह है कि तुम्हारे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है । खिलवाड़ हुआ है । लेकिन इसमें कसूर उनका ही नहीं था, तुम्हारा भी था और अगर मैं तुम्हें समझाना भी चाहता तो तुम समझ न पाती ।”

“यह आप क्या कह रहे हैं ?”

“सुनती रहो डॉली, मैं आज तुम्हें दिल की पुकार सुनाने यहाँ लाया हूँ । हाँ मैं वही तो सुनाने जा रहा हूँ । सुजानगढ़ हमारे पुरखों की रियासत है । यहाँ के लोग आज भी हमारे खानदान के हर व्यक्ति को देवता समान मानते हैं । और इस हवेली के पीछे शिकारगाहें फैली हैं । दूर पहाड़ी की तराई में एक बस्ती है । किसी जमाने में वहां एक कैदखाना था । एक तिलिस्मी कैदखाना, जो पहले किले की शक्ल में था । और आज एक बस्ती के रूप में है ।

दीवान प्रभुदास मेरे हर राज से वाकिफ हैं । वह हमारे खानदान के सच्चे वफादार रहे हैं । वह जानते हैं । जानते क्या हैं उन्हीं की मदद से मैंने उस बस्ती को अपने शौक पूरे करने के लिए एक नए रंग में ढाला है । वहाँ एक रानी राज करती है । जानती हो वो रानी कौन है ? लेकिन तुम कैसे जान सकती हो । दीवान प्रभुदास जानते हैं कि वह रानी मैं हूँ ।”

“जी....यह आप क्या कह रहे हैं ?”

“तुम्हें याद होगा डॉली....मिसेज ठाकुर के घर मुझ पर एक दौरा पड़ा था । जिसे तुमने मेरा अभिनय समझा होगा । लेकिन मैं बताता हूँ कि वह अभिनय नहीं था । हकीकत थी, और वह मिसेज ठाकुर आज भी इस बस्ती में अपने गुनाहों की सजा भोग रही हैं । हाँ डॉली....मैं न तो मर्द हूँ न औरत....मैं एक ऐसे इंसान की पुकार हूँ जिसे इस संसार में बदतर समझा जाता है । ठहरो, मैं तुम्हें समझाता हूँ । लेकिन एक बात याद रखना, अपने आपको काबू में रखना । तुम मेरी मोहब्बत को जिन्दा रखना । इस बस्ती में ऐसे ही निरीह प्राणियों का शासन चलता है । वे सबके सब दौलतमंद हैं । मेरे बाद तुम वहाँ की रानी होगी । तुम्हें भी उनके साथ वैसा ही सलूक करना होगा, वैसा ही प्यार देना होगा जैसा मेरे रहते होता रहा है । मैंने दीवान प्रभुदास से बात कर ली है । वे तुम्हें सब समझा देंगे....और देखो, यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए उपहार है । यह पैकेट तुम तब खोलना जब मैं तुमसे कहीं दूर चला जाऊँ । हमेशा-हमेशा के लिए चला जाऊँ । देखो मेरी मोहब्बत को जिन्दा रखना । मेरे खानदान की खुशियाँ, उनकी इज्जत अब सब तुम्हारे हाथ में है ।”

डॉली की तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ।

अमर ने उसे एक पैकेट थमा दिया ।

“अभी कुछ मिनट और इंतजार करो – मैं अभी आता हूँ ।”

इतना कहकर अमर दूसरे कमरे में चला गया । उसकी चाल में लड़खड़ाहट थी । डॉली ने उसकी सुर्ख आँखों में आंसू तैरते देखे थे । डॉली का दिल अत्यधिक तेजी से धड़क रहा था । उसके हाथों में वह पैकेट कांप रहा था । वह बेसुधी के आलम में उसी प्रकार बैठी रही ।

समय बीतता रहा – दस मिनट...पंद्रह मिनट...आधा घण्टा....अमर कहाँ चला गया । यह आज उसे क्या हो गया ?

फिर अमर प्रकट हुआ, लेकिन यह वह अमर नहीं था ।

घुंघरुओं की झनकार सुनकर डॉली चौंक पड़ी । डॉली की आँखें हैरत से फैल गयी । अमर ही था लेकिन अजीबोगरीब हुलिए में, रंगीन जनाना लिबास । बेहद खूबसूरत मेकअप, चेहरे पर मुस्कुराहट । लेकिन अजीब वहशियाना मुस्कुराहट...आँखें अंगारों की तरह चमक रही थीं ।

उसने दरवाजा बन्द कर दिया ।

“ऐ दीदी...डॉली ! खुश रहो, सलामत रहो । गलत समझ बैठी थीं हमें, धोखा खा गयीं हमसे....ऐ हम तो, पंख लगाएं फुर्र से उड़ जाएँ...ऐ सदके जाऊँ, तुम्हें भगवान ने लड़की बनाया है....ऐ हमें भूल न जाना.... ।” अमर ने ठुमका लगाया और भद्दी सी आवाज से सेहरा गाकर नाचने लगा ।

सुहाग कक्ष में पति के घुंघरुओं की झंकार फैली हुई थी जो डॉली के कानों के पर्दे फाड़े दे रही थी । डॉली को गश आ रहा था ।

सेहरा गाने वाला हिजड़ा नाचता जा रहा था और नाचते-गाते उस पर न जाने क्या जनून सवार हुआ कि उसने अपने कपड़े नोचने शुरू कर दिए । उसने लात मारकर शीशे के बर्तन तोड़ दिए और बिखरे हुए कांच पर नाचने लगा ।

उसका नाच इतना तेज हो गया कि पांवों के घुंघरू भी टूटने लगे । पांवों के तलुवों से खून बह रहा था । डॉली उसे रोकना चाहती थी परन्तु आवाज उसके कंठ में फंसकर रह गई । उसकी तो जैसे घिग्गी बंध गई थी ।

अमर के वस्त्र तार-तार हो गए । उसने अपना लहंगा तक फाड़ डाला और फिर डॉली के कंठ से एक चीख निकल गई ।

एक वस्त्र विहीन हिजड़ा भयानक अंदाज में उसके सामने नाच रहा था । उसकी बेसुरी आवाज हथौड़े की चोटों की तरह डॉली के कानों में पड़ रही थी । फिर वह बेहोश हो गयी ।

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डार्लिंग का होटल खचाखच भरा हुआ था ।

होटल में एक हिजड़ा प्रविष्ट हुआ और सीधा चलता हुआ डार्लिंग के कमरे में जा घुसा । डार्लिंग वहाँ अपने चंद जुआरी दोस्तों के साथ बैठा था । उस कमरे तक पहुँचने में जिन दो आदमियों ने हिजड़े को रोका था वे अब बेहोश पड़े थे ।

हिजड़े को अपने कक्ष में आते देख डार्लिंग उछल पड़ा ।

“ऐ कौन है तू...यहाँ कैसे घुसा चला आ रहा है ?”

“पहचाना नहीं मुझे....अरे भैया डार्लिंग ! भूल गया अपने हीरा को इतनी जल्दी... अरे हम हैं हीरा उस्ताद ।”

“हीरा....हीरा....उस्ताद....आज....इस रूप में....यहाँ... ?”

“बस तुम्हारा हालचाल पूछने आ गए इधर... ।”

तमाम जुआरी हड़बड़ाकर खड़े हो गए ।

“अरे कमीनों...तुम कहाँ उठ चले ।” हीरा ने एक की कमर पर लात रसीद कर दी.... ।” और डार्लिंग जुएं का अड्डा फिर चालू कर दिया । अरे बुलाओ अपने बदमाशों को, है कोई इस शहर में...ऐ कोई तो मार कुटाई करो हमसे... ।”

वे सब के सब हीरा के पांवों में लोट गए ।

“ऐ कमीनों ! तुम एक जनखे के पैर पकड़ रहे हो । मैं कहती हूँ मुझसे दुश्मनी करो, मुझे मारो...मैं मरना चाहती हूँ.... । जिंदगी बेमकसद है मेरे लिए...व्यर्थ है सब...ऐसी जिंदगी किस काम की जहाँ दोस्त हो न दुश्मन, क्या हूँ मैं, मुझे बताओ....बताओ...मुझे.... ।”

और फिर वह इसी तरह चीखता चिल्लाता सड़कों पर निकल पड़ा । वह शहर के बहुत से अड्डों पर भटकता रहा और हर जगह उसके पांव पकड़े गए ।

तब हीरा घूमता-घामता उस इमारत में पहुँचा जहाँ छमिया राम कटोरी, अनारकली और उसके चंद वफादार हिजड़े साथी रहते थे ।

अब उसके अंदर दीवानगी की कोई कैफियत नहीं थी, बस चेहरे से वह थका-थका नजर आता था ।

चलो री चलो... अब यहाँ क्या रखा है...कोई दुश्मन नहीं कोई दोस्त नहीं....तुम लोग अब आजाद हो... जहाँ दिल चाहे जाओ....सारा पैसा बाँट लेना री....अब मेरा कुछ भरोसा नहीं ।”

“उस्ताद हीरा, हम आपके बिना कहाँ रुकेंगी, कहाँ जियेंगी, हमें फिर से सड़कों पर ढोल पीटने पड़ेंगे ।”

“अगर जमाने का यही दस्तूर है तो हम क्या करें...अच्छा जाते-जाते कुछ तो नाच गाना हो जाये... फिर हम मिलें न मिलें ।”

नाच-गाना होने लगा ।

खुद हीरा भी उसके साथ नाच रहा था ।‘’

शहर में चंद दिन चंद जगह वह इसी तरह दिखाई दिया, फिर उसे किसी ने नहीं देखा कि वह कहाँ गया ।

☐☐☐
 
जय ने डॉली को सुजानगढ़ बुलाया था ।

वह बहुत खोई-खोई थी । जीवन से हार चुकी थी...चंद ही दिनों में उसका रूप जैसे किसी ने निचोड़कर फेंक दिया था ।

“यह सब वह आपके लिये छोड़ गए थे मिस्टर जय ।”

डॉली ने कागजात का एक बण्डल जय को थमाया ।

“इतनी बदल गयी हैं आप....ऐसा भी क्या....जिंदगी से इस तरह हार बैठेंगी, ऐसी तो नहीं थीं आप....”

“मैं सबकुछ पाकर सबकुछ हार गई जय....और...और आपके तो वह बचपन के दोस्त थे, आपने भी कभी नहीं बताया ।”

“मुझे अफसोस है.... ।”

“अब तो सभी को अफसोस होगा । वह अपना प्यार मुझे देकर न जाने कहाँ चला गया । न जाने दुनिया की किस भीड़ में खो गया । यहाँ एक मनहूस बस्ती है । मैंने सोचा शायद वह यहाँ कभी तो लौटकर आएगा । इसलिए उसका इंतजार कर रही हूँ, उस बस्ती में जितने भी मुजरिम हैं, मैंने उन सबको आजाद कर दिया । प्रभुदास जी की मदद से तिलिस्म तोड़ दिया, लेकिन उन्हें देखो वे आज भी इतने भयभीत हैं कि कहीं जाने को तैयार नहीं, वे वहीं परिश्रम करके जीवन व्यतीत करना चाहते हैं । मिसेज ठाकुर भूल गई कि वह कौन थी, वह अब अपने को चंदा कहती है । कलुवा उसका पति है ।”

“उस बस्ती में मेरी भी तो हसीना बेगम थी ।” जय ने मुस्कराकर कहा । “मैं वह बस्ती फिर से देखना चाहता हूँ । और वहीं रहकर मैं यह पुस्तक पूरी करूँगा ।”

दस्तावेजों में एक पांडुलिपि थी जो अमर ने लिखी थी । लेकिन जय ने उसे अपने ढंग से लिखने का फैसला किया ।

और वह डॉली के साथ उस बस्ती में चला गया । डॉली को वे लोग अपनी रानी स्वीकार कर चुके थे, जिसने अमर का स्थान ले लिया था और जय अब इस रानी का अतिथि बनकर उसी घर में रह रहा था जो वहाँ रानी का अतिथि बनकर उसी घर में रह रहा था जो वहाँ रानी का निवास स्थल था ।

अमर ने जो पांडुलिपि लिखी थी उसका शीर्षक था “पुकार” और यह एक ऐसे इंसान की पुकार थी जो न मर्द था न औरत, न किसी का भाई बन सकता था, न किसी का पति हो सकता था न पत्नी, न किसी का बाप हो सकता था न माँ ।

उसने लिखा था –

“हीरा एक ऐसा हिजड़ा था । ढोल पीटने वाला, सड़कों पर नाचने-गाने वाला । वह अपनी प्रॉपर्टी के साथ सुजानगढ़ के महल में आया, मेरी पैदाइश के सम्बन्ध में बधाई गीत गाने जैसी एक परम्परा हमारे समाज में बनी हुई है । और हीरा को न जाने किस तरह मालूम हो गया कि मैं भी एक हिजड़ा हूँ– उसे बधाई नहीं गाने दी गई, बल्कि उसे धक्के मार-मारकर बाहर निकाल दिया गया । तब हीरा ने राजा साहब से निवेदन किया कि बच्चा उसके सुपुर्द कर दिया जाये क्योंकि वह हिजड़ा है । और फिर इस रहस्य को छिपाये रखने के लिए हीरा को कत्ल करवा दिया गया । हीरा की आत्मा तड़पती रही । वह आज भी तड़प रही है । मुझे यह रहस्य किसी तरह मालूम हो गया कि हीरा को क्यों मारा गया था । और मैंने तय किया कि हीरा को फिर जिन्दा करूँगा, इस तरह जिन्दा करूँगा कि सारा संसार दहल उठे ।

और मैंने ऐसा करके दिखाया ।

अमर ने अपनी वसीयत भी लिख दी थी, उसने अपनी आधी जायदाद अपनी पत्नी डॉली के नाम की थी और आधी उस बस्ती के हिजड़ों के नाम ।

उसने लिखा था “अगर डॉली चाहे तो दूसरी शादी कर सकती है । तब भी वह मेरी आधी जायदाद की स्वामिनी होगी और उसके लिए बेहतर यही होगा कि वह मेरी मोहब्बत को एक हादसा समझकर भूल जाये । मैं उसे बहुत चाहता हूँ और इसलिए उसका भविष्य सुरक्षित देखना चाहता हूँ । मैं कहाँ जाऊँगा, मेरा कोई ठिकाना नहीं, मुझे कहीं तलाश न किया जाये ।”

मालूम पड़ता था अमर विक्षिप्त हो गया था और उसने पहले ही यह तय कर लिया था कि शादी के बाद वह डॉली की जिंदगी से दूर चला जायेगा । एक बात अवश्य ऐसी थी जो समझ में नहीं आती थी, उसने यह सब डॉली को पहले क्यों नहीं बता दिया ? क्यों उससे शादी की और फिर क्यों उसका जीवन अंधकारमय बनाकर चला गया ?

अलबत्ता डॉली को उसने वसीयतनामा भी दिया और साथ में एक पत्र भी था । पत्र में उसने अपने प्यार की व्यथा सुनाई थी ।

“डॉली ! मैं तुमसे दूर चला जाऊँगा और फिर कभी तुम्हारे जीवन में लौटकर नहीं आऊँगा । तुम्हारी मोहब्बत को अपने सीने में जिन्दा रखे, मैं जीवन का बोझ ढोता रहूँगा । मुझे तलाश न करना और तुम्हारी भलाई इसी में होगी कि मेरे माता-पिता को सहारा देकर उनका कहा मानना । वे तुम्हें बेटी की तरह रखेंगे, और अगर वे कहें कि तुम विवाह कर लो तो आपत्ति न उठाना । मैंने दीवान प्रभुदास और अपने पिता को भी एक एक पत्र लिख दिया है । मेरी तरफ से तुम्हें दूसरा विवाह करने की खुली इजाजत है ।”

लेकिन डॉली ने फैसला किया कि वह दूसरी शादी नहीं करेगी, बल्कि बचा-खुचा जीवन अमर की याद में गुजार देगी । और उसे तलाश करती रहेगी... वह अमर को बहुत चाहती थी । भले ही अब वह उसके लिए ख्वाब था ।

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