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वह हसीन रात

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Guest
प्रिय मित्रो..

आप सब मेरी कहानी पढ़ते हो, सराहते हो, जो मेरे लिए किसी टॉनिक की तरह काम करता है और मैं फिर से अपनी जिंदगी का एक और आनन्दित करने वाला किस्सा लेकर आपके सामने आ जाता हूँ। आज मैं एक ऐसा ही किस्सा आपको बताने जा रहा हूँ।

दोस्तो, मेरी कहानी की हर घटना सत्य होती हैं बस आप लोगो का अधिक से अधिक मनोरंजन करने के लिए मैं उसमे थोड़ा सा मसालेदार तडका लगा कर आपके सामने लाता हूँ। हर कहानी के बाद मेरे पास बहुत से मेल आते हैं जिनमें यही पूछते हैं कि क्या यह कहानी सच्ची है?

यहाँ मैं आपको बताना चाहता हूँ कि सभी कहानियाँ सत्य घटनाओं पर ही हैं। बस पात्र-चित्रण आपके मनोरंजन के लिए थोड़े बहुत बदले गए हैं।

आज की कहानी भी एक सत्य घटना है जिसने मुझे वो आनन्द दिया कि मुझे घूमने फिरने का शौक लग गया।

आज से करीब सात साल पहले की बात है। तब मैं कुछ दिनों के लिए अपने एक पेंटर दोस्त के साथ एक काम का ठेका लेकर निकला था। हमारा काम होता था दीवारों पर विज्ञापन लिखना।

मैं और मेरा दोस्त पवन दोनों एक ही उम्र के कुँवारे लड़के थे। मस्ती करना हमारा सबसे पहला शौक था।

हमें एक जिले के कुछ गाँवों में जाकर वॉल-पेन्टिंग करनी थी। सो हम दोनों हर सुबह अपनी गाड़ी उठा कर निकल पड़ते और पेन्टिंग के लिए दीवारें ढूंढते। जब मिलती तो उस पर पेन्टिंग की और फिर आगे चल देते।

ऐसे ही काम के दौरान हम दोनों एक गाँव में पहुँचे। पूरा गाँव घूमने के बाद भी कोई दीवार हमें पेन्टिंग के मतलब की नहीं मिली। और जो मिली वो पहले से ही किसी न किसी कम्पनी ने बुक की हुई थी।

दोपहर तक ऐसे ही घूमने के बाद हमें अपने मतलब की एक दीवार दिखाई दी पर दरवाज़े पर ताला लगा था। पहले तो कुछ निराश हुए पर फिर सोचा कि खाना खा लेते हैं तब तक अगर कोई आ गया तो ठीक, नहीं तो कल फिर आयेंगे।

हमने उस घर के पास ही एक पेड़ की छाँव में अपनी गाड़ी खड़ी की और गाड़ी में ही बैठ कर खाना खाने लगे। तभी एक सुन्दर सी औरत ने उस घर का ताला खोला और अंदर चली गई। उसकी तरफ देखते देखते अचानक मेरा हाथ पानी की बोतल से टकरा गया और सारा पानी गिर गया।

मैंने पवन को सामने घर में से पानी लाने को कहा पर वो बोला- तूने गिराया है तो लेकर भी तू ही आ।

मैंने बोतल उठाई और उस घर की तरफ चल दिया। जैसे ही मैं दरवाज़े पर पहुँचा मेरा दिल धक धक करने लगा। दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था।

मैंने बाहर से ही आवाज़ दी- कोई है घर पर?’

तभी अंदर से वही खूबसूरत अजंता की मूर्त जैसी हसीना दरवाज़े पर आई और बोली- क्या चाहिए आपको?’

मुझे पानी चाहिए था तो मैंने बोतल आगे कर दी और बोला- थोड़ा पीने का पानी दे दो।

वो बोतल लेकर अंदर चली गई और मैं बाहर खड़ा उसका इंतज़ार करने लगा।

यार सच में वो एक अजंता की मूर्त ही थी- गोरा रंग, सुन्दर नयन-नक्श, छाती पर दो बड़े बड़े खरबूजे के आकार की मस्त गोल गोल चूचियाँ, मस्त बड़ी सी गाण्ड!

मैं तो देखता ही रह गया यार!

करीब दस मिनट गुज़र गए पर वो पानी लेकर नहीं आई।

मैंने एक बार फिर से उसको आवाज़ दी पर अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। मैं दरवाज़े के थोड़ा अंदर गया।

तभी वो एक कमरे से बाहर आई और पानी की बोतल मुझे देते हुए बोली- बाहर इन्तजार करो ना! अंदर क्यों घुसे आ रहे हो?

मैं भौचक्का रह गया।

उसने अपनी साड़ी उतार दी थी और वो सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी। ऊपर से उसने दुपट्टा डाल रखा था। उसके इस हसीन रूप को देख कर मेरा लण्ड तो मेरी पैंट फाड़ कर बाहर आने को हो गया था। आपको तो मालूम ही है कि मैं चूत का कितना रसिया हूँ। उसका गोरा गोरा पेट देख कर तो हालत खराब हो रही थी मेरी।

‘ऐसे क्या देख रहे हो..?’

उसने गुस्से में कहा तो मैं चुप चाप बोतल लेकर बाहर आ गया।

बाहर आकर मैंने पवन को उसके बारे में बताया तो वो भी तड़प उठा उसकी झलक पाने के लिए। पर वो कर तो कुछ सकता नहीं था। बहुत डरपोक जो था।

हमने खाना खाया और फिर दीवार पेन्टिंग की अनुमति लेने के लिए फिर से उस हसीना के पास जाने की बारी थी। मैंने पवन को जाने के लिए बोला तो वो डर के मारे बोला- भई, तू ही जा!

मैं तो पहले से ही उसके पास जाने का बहाना चाहता था।

मैं उसके दरवाजे पर पहुँचा और दरवाज़ा खटखटाया। वो बाहर आई। उसने अब सूट-सलवार पहन रखी थी। इस ड्रेस में भी वो बला की खूबसूरत और सेक्सी लग रही थी। उसने दुपट्टा भी नहीं लिया था। बड़े से गले में से उसके खरबूजे बाहर आने को बेताब से लग रहे थे। लण्ड फिर से पैंट के अंदर करवट लेने लगा था।

‘क्या चाहिए..?’

‘जी…वो…वो हम वॉल-पेंटिंग करते हैं।’

‘तो…?’ उसने बेहद रूखे लहजे में जवाब दिया।

‘आपके घर की यह दीवार पर हम लोग अपनी कम्पनी की पेंटिंग करना चाहते है अगर आपकी इजाज़त हो तो..?’

मैंने उसको समझाते हुए पूछा। वो सोच में पड़ गई। फिर अंदर चली गई बिना कोई जवाब दिए।

मैं दरवाज़े पर ही खड़ा रह गया।

 
वो कुछ देर में फिर से वापिस आई और बोली- मेरे ससुर घर पर नहीं हैं, वो शाम तक आयेंगे तो उनसे पूछना पड़ेगा।

‘पर शाम तक तो हम इन्तजार नहीं कर सकते…’

वो फिर से सोच में पड़ गई। कुछ देर सोच कर उसने हाँ कर दी।

हम भी खुश हुए कि चलो काम बन गया। मैं थोड़ा ज्यादा खुश था कि कुछ देर तो इस हसीना के आस-पास रहने मौका मिलेगा। हमने अपना काम शुरू कर दिया। मैं साइड की दीवार पर सीढ़ी लगा कर काम कर रहा था। मैंने सीढ़ी पर थोड़ा ऊपर चढ़ कर देखा तो उसके घर के अंदर का आँगन नज़र आ रहा था। पर वो वहाँ नहीं थी।

मैं कुछ देर देखता रहा पर वो नहीं आई। पवन नीचे काम कर रहा था। जब वो नहीं आई तो मैं नीचे आने लगा ही था कि अचानक वो आ गई। वो सलवार कमीज में ही थी और उसने दुपट्टा भी नहीं लिया हुआ था। वो अपना काम कर रही थी और मैं एक टक उसको देखे जा रहा था।

तभी उसकी नज़र मेरी तरफ उठी। मैं हड़बड़ा सा गया। हड़बड़ाहट में मेरा ब्रुश आँगन की तरफ गिर गया।

मैंने क्षमा मांगी और ब्रुश पकड़ाने को कहा।

उसकी हँसी छूट गई।

उसकी हँसी सीधे मेरे दिल को चीरती हुई चली गई। मैंने उसको पटाने की कोशिश करने का मन बना लिया।

वो उठी और मेरा ब्रुश उठा कर मुझे पकड़ाने लगी। ऊपर से उसकी चूचियों का नज़ारा देख कर मेरा लण्ड मेरे कच्छे को फाड़ कर आने को मचलने लगा। वो थोड़ा ऊपर की ओर उचक कर ब्रुश पकड़ाने लगी तो ब्रुश पर लगा रंग बिल्कुल उसकी चूचियों के बीच में टपक गया।

उसकी फिर से हँसी छूट गई।

वो ब्रुश पकड़ा नहीं पा रही थी तो मैंने कहा- मैं दरवाज़े से आकर ले लेता हूँ!

और मैं जल्दी से उतर कर उसके दरवाजे पर पहुँच गया।

उसने दरवाजा खोला और मुझे बोली- अब यह रंग कैसे छूटेगा जी?

‘अभी जल्दी से किसी कपड़े से साफ़ कर लीजिए, नहीं तो फिर तेल से छुड़वाना पड़ेगा।’

वो मेरे सामने ही एक कपड़ा लेकर अपनी चूचियों पर पड़ा रंग साफ़ करने लगी। कुछ रंग अंदर तक चला गया था तो वो अपनी कमीज़ के गले को हाथ से थोड़ा खोल कर अंदर से साफ़ करने लगी। उसकी उफन कर बाहर को आती चूचियाँ देख कर मेरा दिल किया कि अभी उन दूध के मदमस्त प्यालों को अपने हाथ में लेकर मसल डालूँ।

रंग साफ़ नहीं हो रहा था तो वो थोड़ा नाराज होते हुए बोली- देखो तो तुमने क्या कर दिया, अब इस रंग को कौन छुड़वायेगा?

‘आप कोशिश करें! अगर साफ़ नहीं होगा तो मेरे पास एक तेल है, मैं दे दूँगा, आप उस से साफ़ कर लेना।’

‘ठीक है..’ कहकर उसने मेरा ब्रुश मेरे हाथ में थमाया और अंदर चली गई। एक पल के लिए तो मैं उस बंद दरवाजे की तरफ देखता रह गया जहाँ कुछ देर पहले वो अप्सरा खड़ी थी।

मैं वापिस आकर फिर से अपनी दीवार पर काम करने लगा। अब मेरी निगाहें उस पर से हट ही नहीं रही थी और मैंने देखा कि वो भी बार बार मेरी तरफ देख रही थी। मुझे कुछ कुछ एहसास हुआ कि आग शायद उधर भी है।

मैंने कुछ सोचा और नीचे उतर कर पवन को ऊपर चढ़ा दिया और खुद नीचे का काम करने लगा।

दस-पन्द्रह मिनट के बाद वो बाहर आई। उसके हाथ में दो चाय के कप थे। उसने हमें चाय पीने को दी और बोली- चाय पीकर कप अंदर दे देना।

वो मुड़ कर अंदर जाने लगी पर तभी वो घूमी और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दी।

मुझे मामला कुछ पटता हुआ लग रहा था। हमने जल्दी से चाय पी और मैंने पवन को हाथ थोड़ा जल्दी चलाने को कहा- पवन बेटा, हाथ थोड़ा जल्दी चला नहीं तो यहीं पर रात काली करनी पड़ेगी… तुम्हारे पास तो कपड़े तक नहीं है रात को ओढ़ने-बिछाने के लिए..!

पवन मजाक में बोला- ओढ़ने-बिछाने की क्या जरूरत है, आंटी के पहलू में सो जायेंगे दोनों! एक तरफ तुम और एक तरफ मैं..!

यह कह कर वो हँस पड़ा और मैं खाली कप उठा कर अंदर देने चल दिया।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया तो कुछ ही देर में उसने दरवाज़ा खोला। दुपट्टा उसने इस बार भी नहीं लिया था।

मेरे से कप लेकर वो बोली- चाय कैसी लगी?

‘बहुत अच्छी थी!’ मैंने भी तारीफ करते हुए कहा।

‘रहने दो! झूठी तारीफ तुम शहर वालों को बहुत आती है।’

‘नहीं…! सच में बहुत अच्छी थी।’

‘ऐसा क्या था इसमें जो इतनी तारीफ़ कर रहे हो?’

‘आपने अपने हाथों से जो बनाई थी, अच्छी तो होनी ही थी?’

‘मतलब?’

‘मतलब…आप जैसी खूबसूरत औरत के हाथों की चाय तो अच्छी होनी ही थी ना?’

वो हँस पड़ी और मेरे दिल पर फिर से एक बार उसकी हँसी के साथ हिलती चूचियों देखकर छुरियाँ चल गई।

‘कितनी देर का काम है तुम्हारा?’

‘आधा आज करेंगे और बाकी का कल आकर.. तब तक आज वाला पेंट सूख जाएगा।’

‘रात को वापिस जाओगे?’

‘देखते हैं… यह तो शाम को काम के बाद पता चलेगा।’

और फिर मैं वापिस आ गया और फिर से अपने काम पर लग गया। उस अप्सरा की आवाज मेरे कानो में मिश्री सी घोलती महसूस हुई थी मुझे। अब मेरा दिल काम में नहीं लग रहा था। मैंने पवन को फिर से नीचे उतारा और खुद फिर से ऊपर की दिवार पर काम करने लगा। मेरा ध्यान बार बार आँगन में घूमती हुई उस अप्सरा पर ही था जो अब बार बारआँगन में घूमती हुई उस अप्सरा पर ही था जो अब बार बार मुझे देख देख कर मुस्कुरा रही थी।

मैंने दिल ही दिल तय कर लिया कि जैसे भी हो, आज रात को यही रुकना है। मैंने काम की रफ़्तार कम कर दी। फिर कुछ सोच कर गाड़ी के पास गया और गाड़ी की एक तार निकाल दी ताकि वो जब स्टार्ट करने लगे तो स्टार्ट ना हो।

ऐसे ही काम करते करते शाम के सात बज गए और अँधेरा भी हो गया। मैं पानी लेने के बहाने से फिर उसके घर के दरवाजे पर पहुँच गया। मैंने उससे पीने के लिए पानी माँगा तो उसने मुझे अंदर आने के लिए कहा। मैं उसके पीछे पीछे आँगन में चला गया।

मैंने उससे पूछा- तुम घर पर अकेली हो? बाकी घर के लोग कहाँ गए हुए हैं?

तो वो बोली- मेरे सास-ससुर एक रिश्तेदार की शादी में गए हुए हैं और मेरे पति आर्मी में हैं और वो अपनी ड्यूटी पर गए हुए हैं।’

‘मतलब आज रात तुम अकेली हो?’

‘हाँ…’ उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

कहानी जारी रहेगी!

 
मैंने उससे पूछा- तुम घर पर अकेली हो? बाकी घर के लोग कहाँ गए हुए हैं?

तो वो बोली- मेरे सास-ससुर एक रिश्तेदार की शादी में गए हुए हैं और मेरे पति आर्मी में हैं और वो अपनी ड्यूटी पर गए हुए हैं।’

‘मतलब आज रात तुम अकेली हो?’

‘हाँ…’ उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

अब तो सारी ढील मेरी तरफ से थी उसने तो साफ़ रास्ता दे दिया था।

रात को सामन समेट कर मैंने और पवन ने सामान गाड़ी में रखा। वो अपने दरवाजे पर खड़ी हमें देख रही थी। पवन गाड़ी स्टार्ट करने लगा और मैं बगल में बैठ गया। पर गाड़ी में तो मैं पहले ही अपने हाथ चला चुका था तो भला कैसे स्टार्ट होती। पवन कोशिश करता रहा पर गाड़ी स्टार्ट तो होनी ही नहीं थी।

मैं गाड़ी से उतर गया और पवन को बोला- भई, गाड़ी तो खराब हो गई लगती हैं। लगता है आज यहीं रुकना पड़ेगा।

मैंने यह बात उस अप्सरा को सुनाते हुए कही थी। मेरी बात से उसके मुरझाते चेहरे पर फिर से मुस्कराहट चमक उठी।

मैं उसके पास गया और बोला- लगता है हमारी गाड़ी खराब हो गई है। क्या हम आज रात आपके घर पर रुक सकते हैं?

वो कुछ नहीं बोली और मुस्कुरा कर अंदर चली गई।

उस अप्सरा का नाम ममता था। यह हमें वहाँ रात को रुकने पर पता लगा।

तभी ममता की आवाज आई और उसने मुझे अंदर बुलाया, वो बोली- तुम दोनों खाना खा लो, फिर मैं तुम्हारे सोने का इंतजाम कर देती हूँ।

मैंने पवन को आवाज लगाई। पवन के आने के बाद हम दोनों ने खाना खाया। हल्की गर्मी के दिन थे तो पवन बोला- गाड़ी में सामान पड़ा है, मैं तो गाड़ी में ही सो जाऊँगा।

मैं तो खुद भी यही चाहता था।

ममता ने पवन को ओढ़ने के लिए कम्बल दिया और पवन उसे लेकर गाड़ी में सोने चला गया। आप में से जो लोग गाँव से हैं उन्हें पता होगा कि गाँव की रात बहुत जल्दी शुरू हो जाती है।

फिर उसने मेरे लिए बाहर आँगन में बिस्तर लगा दिया। करीब एक घंटे के बाद वो हाथ में दूध का गिलास लेकर आई। उसने अब एक ढीला सा सलवार कमीज पहन रखा था। नीचे ब्रा जैसे कोई चीज़ नहीं थी। इसका एहसास उसकी हिलती हुई चूचियों से हो रहा था।

गिलास मुझे देकर वो मेरी चारपाई पर ही बैठ गई। फिर हम दोनों इधर उधर की बातें करने लगे।

मैंने उससे उसके परिवार के बारे में पूछा और उसने मुझ से मेरे।

बातें करते करते उसके पति के बारे में बात होने लगी और फिर बात सेक्सी होती चली गई।

‘तुम कैसे रहती हो अपने पति के बिना?’

‘बस काटनी पड़ती है राज… नहीं तो अलग कौन रहना चाहता है!’

‘तुम्हारा दिल नहीं करता?’

‘दिल किस लिए???’

‘सेक्स के लिए?’

वो थोड़ा शरमाई फिर धीरे से बोली- दिल तो सबका ही करता है, मैं कोई अलग थोड़े ही हूँ।’

मैंने मौके का फायदा उठाते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखा तो वो थोड़ा कांप सी गई।

पर उसने हाथ हटाया नहीं था। मैं उसका हाथ धीरे धीरे सहलाने लगा। वो गर्दन को झुकाए मेरे थोड़ा सा और करीब आ गई। अब मेरे हिम्मत करने की बारी थी और मैंने हिम्मत करते हुए अपने हाथ से उसकी ठुड्डी को ऊपर करते हुए उसकी आँखों में देखा तो उसने आँखें बंद की हुई थी।

मैंने उसका चेहरा पकड़ कर थोड़ा अपनी तरफ खींचा तो महसूस हुआ कि उसकी साँसें बहुत तेज तेज चल रही थी। मैंने अपने होंठ उसके कांपते हुए होंठों पर रख दिए। होंठ छूते ही वो एकदम से खड़ी हो कर अंदर भाग गई और उसने दरवाज़ा बंद कर लिया।

मैं उसके पीछे पीछे गया और उससे दरवाज़ा खोलने की गुज़ारिश की- प्लीज ममता…दरवाज़ा खोलो ना, मुझे मालूम है कि तुम्हें मेरी जरूरत है..

‘नहीं राज… मैंने आज तक अपने पति को धोखा नहीं दिया है… मुझे अपने पत्नी धर्म से मत डगमगाने दो…!’

‘प्लीज़ ममता…’
 
मैंने दरवाजा थोड़ा सा अंदर धकेला तो अंदर से कुण्डी नहीं लगी थी। मैं दरवाजा धकेल कर अंदर चला गया। अंदर बिस्तर पर ममता बैठी थी। मैंने ममता के कंधों पर हाथ रखा और उसको अपनी तरफ घुमाया। वो एकदम से मुझ से लिपट गई। मैंने एक बार फिर उसका चेहरा ऊपर किया और अपने होंठ ममता के रसीले होंठों पर रख दिए।

इस बार ममता ने मुझे नहीं हटाया बल्कि वो चूमा-चाटी करने में मेरा पूरा साथ देने लगी। मैंने अब उसको खड़ा कर लिया था। ममता उम्र में मुझे से बड़ी थी। होंठ चूसते चूसते मैंने अपना एक हाथ ममता के बड़े खरबूजे के आकार की चूची पर रख दिया और सहलाने लगा।

ममता की चूची एकदम मक्खन के जैसे मुलायम थी। मैंने एक हाथ से ममता का कमीज ऊपर उठाया और उसकी चूची को बाहर निकाला। चूचियों पर भूरे रंग का एक रूपये के सिक्के जितना बड़ा एरोला और छोटे छोटे चुचूक! ममता के चुचूक तन कर खड़े हो गए थे।

मैं उसकी चूची को मुँह में भर कर चूसने लगा।चूची पर होंठ लगते ही ममता की दबी हुई आग भड़क उठी और उसने मेरा सिर अपनी मुलायम मुलायम चूची पर दबा दिया। मैं अब ममता को ज्यादा देर तड़पाना नहीं चाहता था इसलिए मैंने अगले ही पल एक एक करके ममता के सारे कपड़े उतार दिए। उसने सलवार कमीज के नीचे कुछ भी नहीं पहना था।

सलवार उतार कर जब मैंने ममता की चूत पर हाथ रखा तो वो पूरी गीली और चिकनी थी। शायद ममता ने आज दिन में ही चूत साफ़ की थी।

‘मुझे तो नंगा कर दिया? अब अपने कपड़े भी तो उतारो!’

ममता के कहने के बाद मैंने बिना देर किये अपने सारे कपड़े उतार कर एक तरफ़ रख दिए। मेरा फनफनाता लण्ड अब ममता की आँखों के सामने था।

‘अरे बाप रे… तुम्हारा तो बहुत बड़ा और मोटा है…?’ ममता ने हैरान होते हुए कहा।

‘क्यों फौजी का मेरे से छोटा है क्या??’

‘नहीं… लण्ड तो फौजी का भी बहुत बड़ा है पर तुम से थोड़ा तो छोटा जरूर होगा। तुम्हारा तो बहुत डरावना लग रहा है।’

अब ममता थोड़ा खुलने लगी थी। मैं भी अब ममता के साथ बिस्तर पर लेट गया। ममता अपना सिर मेरे सीने पर रख कर मेरी छाती पर हाथ फेरने लगी और बोली- राज, आज जब तुम आये थे तो ना जाने क्यों तुम्हे देख कर मेरा दिल बेचैन हो रहा था। मुझे क्या पता था कि आज की रात मैं तुम्हारी बाहों में बिताऊँगी।

बातें बहुत हो चुकी थी और अब बारी कुछ करने की थी। मैंने ममता को बिस्तर पर सीधा लेटाया और उसके होंठो से शुरू करते हुए उसके बदन के एक एक हिस्से को चूमने लगा। पहले मैंने उसके होंठ चूमे फिर उसकी गर्दन और कंधों को चूमा। फिर मैंने ममता की दोनों चूचियों को बारी बारी से चूमा, फिर ममता की नाभि की चूमा।

मेरे चुम्बन से ममता गर्म हो रही थी और सीत्कारें भर रही थी। ममता की सिसकारियाँ कमरे में गूंजने लगी थी। मेरे होंठ लगातार नीचे की तरफ बढ़ते जा रहे थे। नाभि के बाद अगला नम्बर ममता की चिकनी जांघों का था। मैं जीभ से चाटते और चूमते हुए नीचे बढ़ रहा था। मैंने ममता की टांगों को थोड़ा फैलाया और अपने होंठ ममता के निचले होंठ यानी ममता की योनि पर रख दिए। चूत पर होंठो को महसूस करते ही ममता चिहुँक उठी और मेरे सिर को अपनी चूत पर दबा लिया जैसे मेरे सिर को ही अपनी चूत में घुसा लेना चाहती हो।

ममता की चूत बहुत पानी छोड़ रही थी। ममता ने दिन में ही अपनी चूत के बाल साफ़ किये थे। जिस कारण चूत एक दम नई नवेली कुंवारी लड़की की चूत जैसी दिख रही थी।

मैं मस्त होकर ममता की चूत चाटने लगा। बहुत रसीली चूत थी उसकी। वो भी अब मेरे लण्ड को पकड़ कर सहला रही थी और मस्ती के मारे लण्ड को पकड़ पकड़ कर खींच रही थी अपनी तरफ। मैंने घूम कर अपना लण्ड ममता के मुँह के पास कर दिया और उसने भी बिना देर किये झट से मेरा लण्ड अपने होंठो में दबा लिया और लोलीपॉप की तरफ चूसने लगी। अब सीत्कार निकलने की बारी मेरी थी। ममता पूरी तरह से मस्त होकर लण्ड चूस रही थी और मैं भी उसकी चूत को चाट रहा था। मस्ती कुछ ज्यादा ही हावी हो गई और ममता मेरे मुँह पर ही झड़ गई। उसकी चूत से ढेर सारा अमृत निकल कर मेरे मुँह पर फैल गया। मैं उसका सारा पानी चाट गया।
 
तभी मेरे लण्ड में भी हलचल होने लगी। मैंने ममता को लण्ड छोड़ने को कहा- आह्ह्ह…ममता… मेरा निकलने वाला है।

पर ममता ने लण्ड नहीं छोड़ा और मेरे लण्ड में ममता के मुँह में ही पिचकारी मार दी। ममता मेरे वीर्य का कतरा कतरा चाट गई। एक बूंद भी नीचे नहीं गिरने दी।

हम दोनों झड़ने के बाद थोड़ा ढीले पड़ गए और एक दूसरे की बाहों में लेट गए। कुछ देर बातें करने के बाद फिर से हम दोनों के जिस्म में गर्मी आने लगी थी। अब मैं ममता की चूचियों को चूस रहा था और ममता मेरे लण्ड को सहला रही थी जो कि अब फिर सर तान कर खड़ा हो चुका था। ममता एक बार फिर से नीचे हुई और लण्ड को चूसने लगी। मैंने भी ममता की चूत को अपने थूक से गीला किया और दो ऊँगलियाँ उसकी चूत में डाल दी और अंदर-बाहर करने लगा।

कुछ देर के बाद ममता बोली- राज, जल्दी से कुछ कर… अब और बर्दाश्त नहीं होता।

मैं भी अब और ज्यादा देर नहीं करना चाहता था। मैंने ममता की केले के तने जैसी चिकनी चिकनी टाँगें अपने कंधे पर रख कर लण्ड को ममता की चूत पर टिकाया और एक जोरदार धक्का लगा दिया। ममता की चीख निकल गई। चूत बहुत कसी थी, लण्ड मुश्किल से एक दो इंच ही घुस पाया था। मैंने बिस्तर के सिरहाने रखी तेल की बोतल से थोड़ा सा तेल लण्ड और चूत के संगम पर टपकाया और एक और धक्का ममता की टाँगे कस कर पकड़ते हुए लगा दिया। लण्ड आधा ममता की चूत में घुस गया था। ममता के चेहरे पर दर्द की लकीरें नजर आने लगी थी। पर मैं तो इतनी मस्त और कसी चूत पाकर फ़ूला नहीं समा रहा था। मैंने दो तीन धक्के और लगाए और पूरा लण्ड ममता की चूत में पिरो दिया।

जैसे ही मेरा पूरा लण्ड ममता की चूत में घुस कर ममता की बच्चेदानी से टकराया, ममता ने मुझे कस कर अपने से लिपटा लिया। ममता दर्द और मस्ती के संगम में गोते लगा रही थी।

मैं कुछ देर के लिए रुका और ममता के होंठ चूमने लगा और ममता की चूचियों को सहलाने और मसलने लगा। कुछ ही देर में ममता का दर्द कुछ कम हुआ और वो अपनी गांड उचकाने लगी। सिग्नल मिलते ही मैंने भी पहले हल्के-हल्के और फिर तेज तेज धक्के लगाने शुरू कर दिए।

ममता की सीत्कारें रात के सन्नाटे में मादकता की महक घोल रही थी। आह्ह्ह उम्म्मम्म आह्ह्ह ओह्ह्ह आह्ह्ह बस कमरे में ऐसी ही आवाजें गूंज रही थी। कमरे में चारों तरफ मस्ती का आलम था। मैं पूरे जोश के साथ ममता की चूत को अपने लण्ड से रगड़ रगड़ कर चोद रहा था और वो भी गाण्ड उछाल उछाल कर लण्ड को अंदर ले रही थी। उसकी चूत मेरे लण्ड को अंदर जकड़ रही थी। चुदाई बहुत लम्बी चली और बहुत देर के बाद ममता का शरीर एक बार अकड़ा और ममता के चूत के रस ने मेरे टट्टे भिगो दिए। अब मैं भी अपने आप को ज्यादा देर नहीं रोक सका और पाँच मिनट के बाद ही मेरा लण्ड भी अपने वीर्य की पिचकारियाँ ममता की चूत में छोड़ने लगा और ममता की चूत पूरी भर दी। वीर्य के गर्म एहसास से ममता एक बार फिर से झड़ गई और लण्ड और चूत के रस से सराबोर फच्च फच्च की आवाज कमरे की मादकता को बढ़ाने लगी।

झड़ने के बाद हम दोनों सुस्त होकर लेट गए।

ममता बोली- राज, जानते हो मैंने शादी के बाद पहली बार अपने पति के साथ धोखा किया है… पर मुझे अफ़सोस नहीं क्यूंकि मैंने अपनी जवानी एक तगड़े मर्द के हाथो में दी है… तुम मुझे सारी उम्र याद रहोगे।

मैंने भी ममता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठो पर होंठ रख दिए।

कुछ ही देर के बाद मेरा शेर फिर से दहाड़ने लगा और ममता का और मेरा एक बार फिर संगम हो गया। उस रात हम दोनों सुबह तक नहीं सोये और सारी रात चुदाई का आनन्द लिया। वो मस्तानी रात मुझे आज तक नहीं भूली। उसके बाद मैं बार बार गांव में जाने लगा उसके बाद मैं तीन साल तक ममता को चोदता रहा बाद में उसका पति उसे अपने साथ ले गया ममता मेरे दो बच्चो की माँ है और खुश है। अब तो मैं भी उसकी खुशहाल जिंदगी में दखल नहीं देना चाहता।

यह कहानी कैसी लगी, जरूर बताना,
 


ये दिवाली आपके जीवन

में खुशियों की बरसात

लाए,

धन और शौहरत की

बौछार करे,

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं!
 
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